Sunday, March 02, 2014

‘विदेह'१४९ म अंक ०१ मार्च २०१४ (वर्ष ७ मास ७५ अंक १४९) PART II

फेर पुछबनि


पतझाड़ - जगदीश प्रसाद मण्डल
(लघुकथा संग्रह) पार्ट टू



राकेश आ मुकेश गामेक हाइ स्‍कूलक वर्ग दसममे पढ़ैत। एक तँ एक उमेरि‍या तैपर दुनूक मात्रि‍क एके गाम तँए सम्‍बन्‍ध आरो बेसी गाढ़। गाढ़ सम्‍बन्‍ध तँ वएह ने भेल जे झगड़ा-मिलान संगे एक रहैए। तेतबे किए तहूसँ बेसी होइए। तीत-मीठ दुनू संगे रहैए। तँए कि सनाबटा कऽ डलना तरकारी जे मसल्‍ला सभकेँ एकबट कऽ दइ छै, से भऽ जाइ छै? नै! से नै होइ छै। होइ छै ई जे समए आ जगह पाबि‍ वएह तीत होइए आ समए-जगह पाबि वएह मीठ होइए।
दस घंटी पढ़ाइक बीच नअम घंटीक पढ़ाइ शुरू भेल। शिक्षक आबि‍ जमीनक सर्वेक विषय पढ़बए लगला। जलिआएल वि‍षय तँए आन शि‍क्षक जकाँ धुर-झाड़ तँ नै बाजि‍ पबथि मुदा मन पाड़ि-पाड़ि बजने वि‍द्यार्थी सभकेँ अकछाइत बूझि पड़लनि। मन मोड़ैले बजला-
जोरू जमीन जोरकेँ नै तँ केकरो औरकेँ।
लयवद्ध पाँति‍ तँए वि‍द्यार्थी एकाग्र भेल। मुदा अपन वि‍षयक नांगरि पकड़ि पुन: शिक्षक सर्वेक वि‍षय पकड़ि लेलनि।
छुट्टीक घंटी बजल। सभ विदा भेल। वि‍द्यालयक आँगनक झुण्‍ड पतराइते राकेश-मुकेश एकठाम भेल। झुण्‍डक हल्‍लो कमल। गप-सप्‍प करैक मौसम पाबि राकेश बाजल-
जोरू जमीन जोरकेँ, नै तँ केकरो औरकेँ।
बजैक कारण राकेशक मनमे रहै जे मास्‍टर साहैबक पढ़ौल ओहिना मन अछि। उनटबैत मुकेश बाजल-
छुच्‍छे पाँति‍ बजने हेतौ, कह तँ ओकर माने की भेल?”
मुकेशक चाइलेंजकेँ राकेश केना नै स्‍वीकारैत। बाजल-
घरवाली आ खेत-पथार तागतिक छिऐ जे हर्ही-सुर्ही नै सम्‍हारि‍ पौत।
गपक क्रमक नांगरि पकड़ि मुकेश बाजल-
जहि‍ना सुरेबगरहा लेल सुरेबगरही घरवाली होइ छै तहि‍ना नेंगरा लेल नेंगरीओ होइ छै, तखनि‍ केना बुझलेँ।
दुनूक बीच प्रश्नपर रग्‍गड़ नै होइत, नीक-बेजाएक सीमापर हरदा-हरदी कहि‍ मानि‍ लैत। राकेश मानैत बाजल-
तूँ की बुझहै छीही, बाज।
राकेशक बात सुनि‍ मुकेशक मनमे खुशी उपकल। खुशीओ केना नै उपकैत, केतौ बि‍नु पुछनौं ढाकीक-ढाकी बात छि‍ड़िआइत रहैए आ केतौ सुनिनिहार स्‍वयं जि‍ज्ञासु होइए। बाजल-
खेत-पथारक संग जेकर जोर भेल अछि‍ ओकरे ने ओ भेल आकि‍ दोसराक?”
ओना अखनि धरि राकेश-मुकेश अपना मतभेदकेँ अपन वि‍वेके फरिछा लैत छल मुदा से नै भेल। रक्का-टोकी शुरू भेल, रंग-बिरंगक शब्‍दवाण चलए लगल। वि‍द्यालयसँ घर लग दुनू पहुँच गेल मुदा फरिछाएल नै। अंतमे दुनू सहमत भेल जे काल्हि‍ ओही मास्‍टर साहैबकेँ फेर पुछबनि।¦¦¦
३१ जनवरी २०१४



माघक घूर


नरक नि‍वारण पावनि अन्‍हरिया चतुरदसीक दिन, सतैहिया शीतलहरी अपन कड़कड़ाएल मस्‍त जुआनी पाबि पछिया हवाक संग विहुँसैत गतिये गुनगुनाइत बहि रहल छल। ओना दुनू मीलि‍ दिन-राति‍ बहैत मुदा भोरहरबामे आबि‍ आरो वि‍कराल रूप पकड़ि‍ लैत। वि‍करालक पाछू तेज हवा बहब नै मौसमक अपन सकल-सरूप अछि। दि‍नमे कनी-मनी तँ सुरूजक असरि‍ पाबि‍ कमबो करैत मुदा राति‍क चारि‍म पहर अबैत-अबैत ऊहो असरि‍ हारि‍-थाकि‍, जहिना धारक कि‍नछरि‍क मरि‍याएल पानि‍ कतवाहि‍ पकडि‍ चलैत तहि‍ना कतवाहि‍ पकड़ि‍ नेने अछि। पाँच थान मालबला रघवा कक्काक सिरसिराएल मन सीरको तरमे सिरसि कऽ तरसि‍ रहल छन्‍हि‍। कनारथपर असुआएल बैसल नजरि‍ नोर सि‍रजि‍ रहल छन्‍हि‍। सि‍रजि‍ रहल छन्‍हि‍ अपन जि‍नगीक बेथा-कथा। तेहेन बीखाह समए भऽ गेल अछि जे जहि‍ना माटि‍क पँखाएल दि‍वारकेँ कुदि‍-कुदि‍ बेंग मुँहसँ पकड़ि‍ सुगबुगाइओ ने दैत तहि‍ना अन्‍हार इजोत बीछि‍-बीछि‍ बि‍छौन केने जा रहल अछि‍।
देह परहक सीरक उतारि‍ रघवा काका जि‍नगीक समर भूमि‍ लेल मन बनबए लगला। जँ लड़ि‍ मरब तैयो दुखेक नि‍वारण जँ जीवि‍त रहब तैयो सएह। आखि‍र पाँचो थानक पोसि‍निहारो तँ छीहे। ओकरा मुँहमे कोनो बाेल छै जे अपन बेथाक कथा कहत। ओना कहि‍यो काल खेबा-पीबा लेल आकि‍ अनठि‍या जीव-जन्‍तु देखि‍ आकि‍ दुहै-गाड़ै काल मुँह खोलैए मुदा मनुख जकाँ तँ नै कहि‍ सकैए। नहि‍योँ कहत तैयो तँ एते बुझबे करै छी जे अखनि‍ जे दुरकाल समए अछि‍ तइमे की सभ शक्‍ति‍शाली अछि‍। जाधरि‍ हथि‍यार नै पकड़ाइ छै ताधरि‍ शक्‍ति‍हीनो शक्‍ति‍शाली होइते अछि। सुकाल पाबि‍ भलहिं वएह शक्‍ति‍हीन शक्‍ति‍शाली कि‍ए ने बनि‍ जाए मुदा कुकाल तँ कुकाल छि‍ऐ जेकरा मुँहमे अवाज भलहिं होउ, मुदा जेकरा बोल नै छै ओ अपन बेथाक कथा कहि‍ये केकरा सकैए। देह लगा मारब छोड़ि‍ उपैये दोसर की छै। मुदा जानसँ जाए आकि‍ सोग-रोगसँ पकड़ाए, अपन जि‍नगीक संग हमरो जि‍नगी तँ तोड़बे करत। टुटैत जि‍नगी देखि‍ मन थकथकेलनि‍। थकथकाएल मन बुदबुदेलनि‍। जि‍नगी टुटि‍ कऽ फेरि‍ ओहि‍ना खसि‍ पड़त जहि‍ना दस बरख पहि‍ने छल। जे दस बर्खक बीच ज्ञान-कर्मक संग कठि‍न श्रम केला पछाति‍ भेटल, ओ छीना रहल अछि‍, छीना जाएत। मुदा बँचाइओ तँ नहि‍येँ सकै छी। टुटैत मनकेँ हुथैत वि‍चार कहलकनि‍-
की यएह सोचि‍ एते समैओ आ श्रमो गमेलौं जे छनेमे छनाक भऽ जाए? जखनि‍ जि‍नगीए टुटि‍ कऽ खसि पड़त तखनि‍ कोन जि‍नगी लऽ कऽ ठाढ़ रहब!
अनायास उत्‍साह जगलनि‍। जहि‍ना सूतल लोककेँ साँस भलहिं चलैत रहौ मुदा रहै तँ नि‍ष्‍प्राणे अछि। तँए कि‍ ओकरा मरलो तँ नहि‍येँ मानल जाएत। अहुना तँ लोकक नीन टुटबो करैए, तोड़लो जाइ छै आ तोड़ाएलो जाइ छै। उठल उत्‍साह धकललकनि। देह परहक सीरक ओछाइनपर उनटा दुनू कानकेँ तौनीक मुरेठा बान्‍हि‍ चद्दरि‍ ओढ़लनि‍। दुनू डेनो आ दुनू पएरो बैसले-बैसल झाड़ि‍ कऽ सोझ केलनि‍। सोझ होइते हल्‍लुकपर पहुँचि‍ते उत्‍साह सकसकेलनि‍। वि‍चार जगलनि‍, जगि‍ते वि‍चार मन फुड़फुड़ेलनि। बारहो मासक बारहो रूप अछि जे अरूप-सरूप दुनू अछि। ओहि‍क बीच ने जि‍नगीओ अछि। ओही जि‍नगीक जनक ने मनुख छी। तखनि‍ लगले हारि मानि‍ लेब पीठ देखाएब भेल। नै पीठ देखाएब तँ जि‍नगीक हारि भेल। केना लगले सेहो मानि‍ लेब। जँ लगले मानि‍ लेब तँ केकरा लेल मानि‍ लेब, रहबे के करत जे तेकरा लेल मानि‍ लेब। उठि‍ कऽ रघवा काका ओछानइनपर ठाढ़ भेला।
केबाड़ खोलि रघवा काका बाहर तकलनि तँ अन्‍हार छोड़ि‍ कि‍छु ने देखथि। घर अन्‍हार, बाहर अन्‍हार तखनि केना डेग आगू बढ़त। चोरबत्तीक स्‍वीच दबलनि‍ तँ पसरल अन्‍हारमे छुहिया इजोत कि‍छु दूर धरि‍ भेलनि। देखिते बि‍सवास जगलनि‍ जे चाेरबत्तीक इजोतक बले आगू बढ़ल जा सकैए। जहिना बाट-बटोही आकि‍ राह-राही गाम घर छोड़ि‍ कोनो गामक रस्‍ताबाट पकड़ि‍ आकि‍ कोनो धार-गाछी-बि‍रछी बाध-बोनसँ हटि अपन पेटे चलि‍ गंगामे मिलैए तहिना एक-दोसर गामक सीमान टपि‍ राही-बटोही अपन गण्‍तव्‍य दि‍स बढ़ैए ओहिना रघवा काका माथ-कानमे मुरेठा बान्‍हि‍, चद्दरि‍ ओढ़ि दहि‍ना हाथमे चोरबत्ती नेने ओसारसँ नि‍च्‍चाँ होइत नजरि‍ खि‍रौलनि। जहि‍ना अल्हुआ-सुथनीसँ लऽ कऽ साग-पात, भात-रोटी होइत, खीर-पुरी धरि भोज्‍य होइत तहि‍ना तँ घूरोक अछि। बैशाख जेठक घूर थोड़े छी जे बि‍नु बीखक माछी-मच्‍छर भगबैले हएत। ओ तँ घासो-पातसँ लगौल जा सकैए। लगौले कि‍ए जा सकैए ओइसँ बेसी जरूरते की छै। जहि‍ना तपाएल समए रहै छै तहि‍ना अगियाएल हवो चलै छै, तेहनामे वएह ने नीक भेल जे जँ आगि‍ हवामे उड़बो कएल तँ उड़ि‍ते-उड़िते हवेमे मि‍झाइओ जाएत। तखनि? तखनि‍ तँ बरसातो नहियेँ छी जे खढ़ो-पात आ जरनो-काठी बरसातक भीजान भीजल रहने धुकुड़-धुकुड़ धुआँ होइत रहत आ ने कखनो घूरक आगि‍ लहसत आ नहियेँ मि‍झाएत। ओना माछी-मच्‍छरक बंशो बढ़ि‍ गेल रहै छै आ सौनक नाग-पंचमी पाबि‍ बीखाहो भऽ गेल रहै छै। ओकरा भगबैले तँ कड़ुआएले धुआँ उपयुक्‍तो होइ छै आ अनुकूलो छै। फेरि‍ रघवा कक्काक मन पाछूसँ ससरैत लगमे पहुँचलनि‍। पहुँचि‍ते देखलनि‍ जे ई तँ माघ छी। तहूमे अधडरेरक छी। जहि‍ना राति‍ कड़ुआएल अछि‍ तहि‍ना शीतक रूप बदलि‍ पल्‍ला पकड़ि‍ नेने अछि। एहेन पल्‍ला पकड़ि‍ नेने अछि जे भीतरसँ बाहर धरि‍क जलावन सि‍मसि‍ गेल अछि। बरसातक जरना तँ अधसुखू रहैए। हल्‍लुक-फल्‍लुक भलहिं सामान कि‍ए ने भीज गेल होइ मुदा एहनो तँ रहि‍ते अछि‍ जे ऊपसँ भलहिं भीजल हुअए मुदा भीतरसँ सूखल रहबे करैए। भीतर-बाहरक जोड़ बीचलाकेँ धकि‍एबे करै छै। मुदा माघक तँ ओहेन होइए जे हवेमे धोरा भीतर-बाहर एकबट्ट कऽ दइए। भीतर-बाहर तँ ओकरा एकबट्ट करैए जे झाँपल घरसँ बाहर रहैए, जे घरमे झाँपल रहैए ओ कि‍ए सि‍मसत। मनक उत्‍साह कलशलनि। गठूलाक गोरहा-चि‍पड़ी तँ सूखल हेबे करत तहूमे ओ कि‍ कोनो गाछक चेरा छी जे पल्‍लाक डरे तरे-तर सि‍मसि‍ जाएत। बरद-गाएक गोबरक गोइठा-गोरहा छी जे ओस-पल्‍लाक के कहए जे पानि‍क झीसीओ-झकासकेँ थोड़े गुदानैए। ओकरो अपन रस छै। मन पड़लनि‍ बैशाख-जेठमे गोरहा-गाेइठा कएल घर। बाँसक मचान बना सैंति-सैंति रखने रही, तीन मास बरसातमे सठल तेसर मास जारक गुजरि‍ रहल अछि‍। तेसरोक अदहा बीति‍ए गेल, हो-ने-हो कहीं ऊहो ने सठि‍ गेल हुअए। तीन मास बरसात रहि‍तो अदहासँ कमे खरचा भेल हएत, मुदा जारक तँ तीनू मासमे बेसी होइते अछि। मन ठमकलनि‍। मुदा लगले मन कमला गेलनि‍। अगि‍ले सपता तँ वसन्‍तक आगमन भऽ रहल अछि‍। जँ लगि‍चाइओ गेल हएत तैयो पाँच-दस दि‍न बेसी थोड़े भेल। तहूमे जे शीतलहरी लधने अछि ओकरो कि सीमा-नांगरि‍ छै। आगू बढ़ि‍ गठूला दि‍स वि‍दा भेला। डेग उठि‍ते मनमे उठलनि, उठि‍ते मन कहलकनि-
पत्नीक जोगौल घर छी, पुछि‍ लेब नीक हएत। ओ थोड़े कहती जे हमर छी हम नै छुबए देब। जखनि‍ ओही गाए-बच्‍चाक जीवैक ओरि‍यान कऽ रहल छी, तखनि‍ कि‍ए रोकती तहूमे कि‍ ओ नै बुझै छथि‍ जे ओही लक्ष्‍मीक देलहासँ घर भरि‍ सुख करै छी।
मनमे अबि‍ते रघवा काका पत्नीकेँ पुछब खगता नै बूझि गठूला पहुँचला। घरक मुँहथरिपर धनउसनि‍याँ टीन राखल। चोरबत्तीक इजोतमे तेना टीन चमकल जे रघवा कक्काक आँखि‍ चोन्‍हिआ गेलनि। पएरक ठेँस टीनमे लगि गेलनि। तेते जोरक अवाज भेल जे सुगि‍या काकीक नीन टुटि‍ गेलनि। नीन टुटि‍ते ओछाइनसँ उठि‍ सुगि‍या काकी गठूला दि‍स बढ़ली। केना ने बढ़ि‍तथि, बैशाख-जेठमे भलहिं कम्‍मल-चद्दरि‍ बैसकी बनि‍ जाए, गोरहा-गोइठा बाध-बोनमे छि‍ड़ि‍याएल रहए मुदा माघक तँ गिरथानि वएह ने छी। ओसारसँ निच्‍चाँ उतरिते चोरबत्तीक इजोत गठूलामे देखलनि। बूझि‍ गेली जे कि‍यो जारनि‍ लइले आएल अछि। भरि‍सक जाड़ बरदास नै भेलै तँए घूर करत। मुदा चुपचाप आगू बढ़ब उचि‍त नै बूझि‍ बजली-
गठूलामे के छी?”
पत्नीक अवाज सुनि‍ रघवा काका ओहि‍ना सहमि‍ गेला जहि‍ना कि‍यो पति‍ पत्नीक पौती-सखारीमे हाथ दैत सहमैत अछि।
ओना सुगि‍या काकीक बोलमे चोरक ध्‍वनि‍ नै छेलनि‍ मुदा मनमे जरूर रहनि‍ जे एते राति‍ कऽ घरमे कि‍ए औत। मुदा लगले मन गवाही देलकनि‍ जे एक तँ एते राति‍ दोसर एहेन दुरकाल तहूमे गठूला घर, अन्न-पानि‍क असवावक घर नै, बि‍नु बुझने-परखने केकरो चोर कहब उचि‍त नै। तँए सोझे बजली जे के छी। एहनो तँ भऽ सकैए जे केकरो जाड़ नै बरदास भेल होइ, आगि‍क दुआरे जारनि लइले आएल हुअए। मुदा लगले मनमे आबि‍ गेलनि‍ जे अनका घरमे बि‍ना पुछने कि‍यो कि‍ए औत। बड़ जाड़ भेलै तँ मांगि‍ लैत। फेरि‍ मनमे उठि‍ गेलनि‍ जे एहनो तँ भऽ सकैए जे कि‍यो दुनि‍याँकेँ झूठ बूझि‍ नीक-अधलाक विचारे ने करैत हुअए।
पत्नीक अवाज सुनि‍ रघवा काका बजला-
हम छी।
रघवा काका तेते दाबि‍ कऽ बजला जे नीक जकाँ सुगि‍या काकी सुनबो ने केलनि। तँए कि‍ ओ सोलहन्नी नै सुनलनि‍, सेहो बात नै। शब्‍द आ शब्‍दक भाव नै बुझलनि‍ मुदा अवाज तँ कानमे पड़ि‍ये गेलनि‍। जहि‍ना गंभीर शास्‍त्रीय संगीतक भाव कि‍यो बुझैत वा नै बुझैत मुदा अवाजक कम्‍पन्न तँ कम्‍पि‍त काइए दइ छै। जँ से नै तँ ओहन ध्‍वनि‍पर जंगलसँ मोर आबि‍ आकि‍ बोनसँ हरि‍ण आबि‍ नाचए कि‍ए लगैए।
मने-मन सुगि‍या काकी वि‍चारबो करथि‍ आ गठूला दि‍स बढ़लो जाथि‍। मि‍रमि‍रा कऽ रघवा काकाकेँ बजैक कारण रहनि, पत्नीक झगड़ाउ प्रवृति‍। नान्‍हि-नान्‍हिटा काजक बात लेल सुगि‍या काकी ऐ रूपे रक्का-टोकी करए लगै छथिन‍ जइसँ नोकसाने-नोकसान होइ छन्‍हि। ओना जहि‍ना नि‍आसमे आशाक जनम, अन्‍हारमे इजोतक जनम होइत तहि‍ना रक्का-टोकीसँ छोट-छोट गल्‍ती सहटि‍ कऽ सहीट बनि‍ जि‍नगीकेँ चि‍क्कन बना दैत मुदा से रघवा काकाकेँ नै रहनि। माल-जालक जराएल मन तेना कऽ मनकेँ जरबैत रहनि‍ जे क्षण-क्षण छनकैत रहनि।
दोहरा कऽ सुगि‍या काकी बजली-
गठूला घर छी, साँप-कीड़ा रहैए तखनि एती राति‍ कऽ कि‍ए एलौं। के छी?”
सुगि‍या काकीक बोलक मि‍ठास रघवा कक्काक आत्‍माकेँ हौंड़ि‍ देलकनि। देखल देह चि‍न्‍हल चेहराक चुनचुनाएल स्‍वर, बजला-
अपने छी। 
एती राति‍ कऽ एहेन जगहपर कि‍ए एलौं, एक तँ जाड़सँ ठि‍ठुरल बोन-झाड़, बि‍लक कीड़ी-फतिंगी आबि‍ कऽ राति‍ वि‍श्राम करैत हएत तैपर ओकरा देहपर हाथ कि‍ पएर पड़त तँ ओ थोड़े अहाँक दुख बूझत आकि‍ लपकि‍ कऽ अपन बीखसँ बि‍खा देत।
हँ, से तँ अपनो बुझै छी, तहीले ने हाथमे इजोत रखने छी। हाथ-पएरमे इजोत रहनै ने लोक पएरे-पएरे दुनि‍योँ टहलि‍ लइए आ हाथसँ करबो करैए।
बजैत-बजैत रघवा काका बाजि‍ तँ गेला मुदा लगले मनमे उठि‍ गेलनि‍ जे अनेरे काज वि‍लमबै छी। जँ गपे करक हएत तँ माले-घरक घूर पजारि‍ बैस गप-सप्‍प करब। मालो-जालक आत्‍मा बुझतै जे जहि‍ना जाड़ हमरा होइए तहि‍ना तँ पोसि‍नि‍हारोकेँ होइ छै। एहेन पोसि‍नि‍हारक प्रेमसँ जीवि। बजला-
बड़ दुरकाल भऽ गेल अछि, थोड़े गोरहा-चि‍पड़ी लऽ लि‍अ आ मालक घरमे घूर कऽ दि‍यौ।
पति‍क बात सुनि सुगि‍या काकी कि‍छु ने बजली। मन मानि‍ गेलनि‍ जे कि‍छु छथि तँ छथि‍ मुदा गृहस्‍वामी तँ यएह छथि‍। हि‍नके ऊपर ने खेत-पथारसँ लऽ कऽ माल-जाल आ मनुख धरि‍क रक्‍छाक भार कन्‍हापर छन्‍हि‍। लग आबि‍ बजली-
उसरै बेर तेहेन ई शीतलहरी लाधि‍ देलक जे जेहो जरना-काठीक ओरि‍यान कऽ रखने छेलौं सेहो निंघठि गेल, तैपर तेहेन लधान लाधि‍ देलक जे कोनो ठेकान अछि‍ जे केते दि‍न लधने रहत?”
सुगि‍या काकीक जनगर बात सुनि‍ रघवा काका गुम भऽ गेला, मुदा लगले मनमे फुड़लनि‍-
कौल्हुका चि‍न्‍ता आइ कि‍ए करै छी, काल्हि‍ले काल्हि‍ छै। कोनो ठेकान अछि‍ जे एहने समए कौल्हुको हएत।
दूटा गोरहा आ चारि‍-पाँचटा चि‍पड़ी उठा, मटि‍या तेलक डि‍बि‍या आ सलाइ आनि‍ आगू-आगू सुगि‍या काकी आ पाछू-पाछू रघवा काका आबि‍ मालक घरमे घूर केलनि। सूखल गोइठा, तइमे ढाड़ल मटि‍या तेल सलाइक लपकी पकड़िते लपकि‍ लेलक। घूर धधकि‍ गेल।¦¦¦
 
०६ फरवरी २०१४



खर्च


ओना समैया काका भोरेसँ ठोह फाड़ि‍-फाड़ि‍ कनै छला मुदा हम बुझलौं नअ बजेमे। सेहो ओना नै बुझलौं, रबि‍ रहने गामक अपनो टोलवैया आ आनो-आनो टोलवैया सभकेँ, जेरक-जेर काकाकेँ देखए जाइत-अबैत देखि‍ जखनि‍ पुछलि‍ऐ तखनि‍ भाँज लागल। पहि‍ने भेल जे माघक तेसर मकड़ छी लोक हरड़ी मेला जाइत हएत मुदा लगले घूमि‍ कि‍ए रहल अछि। भाँज लगि‍ते मनमे उठल जे काम-धाम तँ जि‍नगी भरि‍ चलि‍ते रहत मुदा जँ कहीं बि‍च्‍चेमे कक्काक प्राण छुटि‍ जेतनि‍ तखनि‍ तँ भेँटो ने हेता। मात्र चेतनशून्‍य देहसँ भेँट हएत। ओना देहोक महत तँ अछि‍ये, जँ से नै अछि‍ तँ जि‍नगी भरि‍ एकरे पाछू कि‍ए लगल रहै छी।
टोहियबैत-बीहियबैत वि‍दा भेलौं। रस्‍तामे जेते लोकसँ पुछि‍ऐ तेते रंगक बात सुनि‍ऐ। पहि‍ल गोटेसँ पुछलि‍ऐ तँ बाजल-
अपने करमे ने कि‍यो हँसैत मरैए तँ कि‍यो बपहारि‍ काटि‍ मरैए।
एक तँ ओहि‍ना रंग-बि‍रंगक मनक वि‍चारमे ओझराएल रही तैपर कर्मक फल हँसब भेल आकि‍ कानब, भाँजे ने बुझलौं। मन भेल जे फेर पुछि‍ऐ मुदा फेर भेल जे जँ कहीं कहि‍ दि‍अए जे समैक फल पाबि‍ कयो हँसैए तँ कि‍यो कनैए। तखनि‍ तँ एकहरी घुरछी दोहरा जाएत। जखने दोहराएत तखने आरो सक्कत हएत तइसँ नीक जे दोसर-तेसरकेँ पुछबे ने करि‍ऐ। जखनि‍ भेँट करए जाइए रहल छी तखनि‍ पहुँचला पछाति‍ जे पुछैक आकि‍ बुझैक हएत से मुखाैत्रीए भऽ जाएत। जहि‍ना छि‍ड़ि‍याएल-बीति‍याएल पानि‍ आकि‍ गनहाएल-मनहाएल वायु मुखात्र होइते अपन गति‍ पकड़ि‍ लइए तहि‍ना ने भवैत भव मुखात्र होइत भवसागरमे समा समाधि‍ लैत अछि‍।
नजरि पड़ि‍ते देखलि‍यनि जे समैया काका घौना पसारि‍ कऽ कानियोँ रहला अछि‍ आ घुन-घुना कऽ अपन जि‍नगीक गीतो गाबि‍ रहला अछि। एक तँ ओहि‍ना ओझराएल मन तैपर आरो ओझरी लगि‍ गेल। चलचलौ देखि दुनू हाथ जोड़ि प्रणाम करैत पुछलि‍यनि-
काका, मन केहेन लगैए?”
ले बलैया! जि‍ज्ञासा करए जि‍ज्ञासु बनि‍ गेल छेलौं मुदा ओ तँ जेना बि‍हाड़िमे उधि‍या गेल होथि तहि‍ना बजला-
जेते धएल-धड़ल छल सभ सठि गेल, मुदा मनक ताप नै मेटाएल, जे घड़ी जे पहर छी, छी। भने भेँट-घाँट भऽ गेल। 
समैया काका जेना कालचक्रक पूजापर बैसल होथि तहि‍ना बाजए लगला। भुजंग प्रयात जकाँ सुनैत रहलौं, सुनैत रहलौं।।¦¦¦
 
०७ फरवरी २०१४   



अखरा-दोखरा


देवघरसँ अबैत रही, जसीडीहक मुसाफि‍र खानामे एक गोटे भेटला। भेटला कि सिमटीक जे कुरसी बनल छल ओइपर पहिनेसँ असगरे बैसल रही, ऊहो आबि कऽ बैसला। कनीकाल तँ ऊहो चुपे रहला आ हमहूँ चुपे रहलौं मुदा जखनि चुनौटी निकालि तमाकुल चुनबैक सुर-सार केलौं आकि बजला-
एक जुम बढ़ा देबै।
पहिल दिनक भेँट, केना कऽ पुछिति‍यनि जे छोट जुम खाइ छी आकि नमहर। अपने अनुमान करए लगलौं जे मुँहक एकोटा दाँत नै टुटल देखै छियनि तइसँ भरिसक छोटे जुम खाइत हेता। सएह करैक मन भेल, मुदा खुएला पछाति जँ अजश भेल तखनि खुएलहा फले की हएत! तँए अहगरसँ तँ नै मुदा मझोलका घानी लगा देलि‍ऐ। तरहत्‍थीपर औंठा चलए लगल। धिया-पुताक खेल जहानि एतएसँ चलिहेँ बुढ़ि‍या, धोकड़ी समैइहेँ बुढ़िया...। बाँहिपर ओंगरी चलए लगल।
घंटा भरि गाड़ी पछुआएल। भरिपोख दुनू गोटेक बीच गपो-सप्‍प भेल आ दूबेर चाहो-पान चलल। गाड़ीक एके कोठलीमे बैस कऽ भरि रस्‍ता गप-सप्‍प करैत एलौं। दरभंगा अबैक रहए। हायाघाटमे जखनि‍ ओ उतरए लगला तँ कहलनि-
फेर कहि‍या भेँट-घाँट हएब आकि‍ नै हएब।
हमहूँ टोकारा देलि‍यनि-
ऐ देहक कोनो ठेकान अछि, अखने डिब्‍बासँ खसि पड़ब, प्राण ति‍यागि देब।
हठ करि कऽ अपना संग उतारि लेलनि। दू दि‍न पहुनाइ चलल। दू दि‍न पछाति‍ जखनि गाम एलौं तँ बेटा पुछलक-
दू दिन‍ केतए हराएल छेलौं?”
जेना-जेना भेल, सभ बात सुना देलि‍ऐ। सुनि‍ कऽ बाजल-
एना जे अखरा-दोखरा-तेखरा दोस्‍ती हुअए लगल तँ दुनियेँ अछन भऽ जाएत।
जहि‍ना गबैया, खिस्‍सकर शुरू कम स्‍वरमे करैए तहि‍ना बेटो मुँह दाबि‍ कऽ बाजल छल। दोखरा-तेखरा तँ नीक जकाँ सुनलौं मुदा अखरा कहलक आकि सखरा से नीक जकाँ सुनबे ने केलौं। मनमे उठल दोखरा बालु तँ पानिओ बनबैए आ हवो मुदा तेखरा तँ पाथरेटा बनबैए। ओ चाहे कोइला कहबए आकि‍ पाथर मुदा दुनूक (बालु-सि‍मटी) प्रेम केते प्रगाढ़ होइए जे जुग-जुगान्‍तर के कहए जे जन्‍म-जन्‍मान्‍तर धरि ओहिना ठाढ़ रहैए जहिना शुरूमे ठाढ़ होइए।
ओना बेसी थकान नै रहए हायेघाटसँ आएल रही, मुदा पाछू पुछड़ी जोड़ि बजलौं-
बौआ, थाकनिसँ देह भरियाएल अछि, पहिने नहा-खा कऽ कि‍छु समए अराम करब तखनि मन खनहन हएत। पछाति‍ सविस्‍तर बात करबह।
थकान सुनि बेटा अपन जवाबदेही बूझि गुमे रहि गेल।¦¦¦
 
१० फरवरी २०१४



पेटगनाह


कौल्हुका भोजक अजशसँ सौंसे गामेक लोककेँ चोट लगल मुदा सभसँ बेसी लगलनि कुसुमी काकीकेँ। बेसी चोट लगैक कारण भेल जे भोजक अगुआ नेतेजी काका छेलखिन। घरवैया तँ अपन माइयक सराध लेल खर्चक जे मन बनौने छल ओ पाइ-चुक्‍ती केलक। किए ओकर मन कहतै जे दुआरपर सँ पंच अकची-दोकची बजैत गेला। मन तँ यएह ने कहतै जे समाज जेतेक खर्च मंगलनि से तँ दइए देलियनि‍ तखनि‍ काजक भार समाजक ऊपर गेल। जँ कि‍यो नै बुझत बलधकेल अगुऔत तँ अगुआबऽ, अपन मुँह दुइर करता। देखै छी जे केतौ वारीक[1] समाने चाेरा कऽ अपना ऐठाम साहि‍ दइए तँ केतौ देखै छी भनसीए अपन कनारि‍ चुका तीमन-तरकारीमे नोनेक गड़बड़ी कऽ दइए। केतौ देखै छी बजारसँ सड़ल-पाकल समान कीनि‍ दुइर करैए। तइसँ घरवैयाकेँ की? जानए जौ आ जानए जत्ता। सातु सने घून किए पिसाएत? बलजोरी जँ कि‍यो पीसिनिहारि बिना उलौने-फटकने घुनाएल अन्न पीसत तँ दोख केकर हेतै। बलधकेलकेँ कोनो जवाब होइ छै, जेकरा जे फुड़ै छै से बजबो करैए आ करबो करैए। कि‍यो जँ अजशक दोख घरवैयाक माथपर देत से थोड़े मानत, अपनो मन ने गवाही दइते हेतै। काकीक मन ठमकलनि, ठमकलनि कि मानि गेलनि जे भोजैत निर्दोख अछि। जहिना कोनो न्‍यायालयक न्‍यायाधीश दूध-पानि बेड़ा अपन पदक संग अपन गरिमा बढ़ा आत्‍मपरमात्ममे जोड़ि लैत अछि तहिना कुसुमी काकी भोजैतकेँ घिनमा-घीन भेला पछातिओ पनिपत बना कमल फूल जकाँ फुला देलनि। मुदा मन असथिर नै रहलनि, आगू बढ़ि गेलनि।
कुसुमी काकीक नजरि समाज दिस गेलनि। समाजक एहेन दुरगति भेल जे अनगौआँ पंच सभ जे यत्र-कुत्र बाजल से तँ बजबे कएल मुदा ई जे बाजल जे एहेन रही तँ पूजापर बैसबे ने करी। गामक रखलक की! कोनो कि जइ गामक पंच रहए तही गामक लोकटा बाजत आकि‍ साँझ-भोरक तरेगन जकाँ एकटा नढ़िया टाँहि देत आकि‍ गामसँ आन गाम धरिक नढ़िया हुआँ-हुआँ करए लगत। आनो-आन गामक लोक बाजत। लोको तँ लोके छी किने, मान न मान हम तोहर मेहमान। जहिना बजै छी तहि‍ना लील समाज अपन समाजक फरिच्‍छ रूप सोझमे देखब से नीक? आकि‍ बजै छी काग जकाँ आ करै छी कौआ जकाँ से नीक। दुनूकेँ नांगड़ि जोड़ि काग-भुसुंडी मानब, अपन-अपन मन मानब भेल। समाजे गाम भेल आ गामे ने समाज, मुदा गाम तँ ब्रह्म स्‍वरूप निरविकार नीरब अछि ओकर कोन दोख। मनुखे ने समाज बना सूनसँ शून्‍य धरि फड़ैत-फुलाइत अछि। मुदा समाजो टुकड़ी-टुकड़ीमे तेना कटि-खोंटि गेल अछि‍ जे नीक-अधलाक वि‍चार जटि‍लसँ जटिलतर बनि‍ गेल अछि। कुसुमी काकीक मन ठमकि गेलनि। मुदा सुदर्शन चक्र जकाँ मन तेना नचैत रहनि जे कोनो दि‍शा नीक जकाँ बुझिए ने पबै छेली। तखने नेताजी काका आँगन पहुँचला। जेना साँढ़-पारा अपन कनारि असुलैत तहिना कुसुमी काकी बघुआइत बजली-
केते दि‍न मनाही केलौं जे एहेन काजमे[2] नै पड़ू, आब ने ओ राजा भोज छथि आ ने हुनकर दरवार छन्हि।
जहिना टुटल घरमे अकासक बून सोझे लगैत तहिना कुसुमी काकीक बोल नेताजी कक्काक हृदैकेँ बेधि देलकनि। छटपटाइत मन अवाक भऽ गेलनि। नजरि काकीक आँखिमे नाचए लगलनि। बजला कि‍छु ने। दोहरबैत कुसुमी काकी बजली-
जखनि अहाँ देख नेने छी जे अही समाजमे केते भोज-काज भेल अछि जइमे केतेकोकेँ जशो भेलनि आ अजशो। मुदा जश-अजशक भागी के?”
जश अजश सुनि नेताजी काका गोबर संुघौल मुसरी जकाँ मुँह खोललनि। बजला-
अपनो नै अखनि धरि बूझि पेलौं अछि जे हि‍साबमे गलती केतए भेल, जे एना भेल!
हिसाब सुनि कुसुमी काकी बजली-
कागत परहक हि‍साब काजमे नै काज करै छै, केतौ वारीक समाने अपना घर साहि दइए तँ केतौ भनसीए अपन कनारि असुलि नोनगरे-अनोन बना दइए, तँ केतौ खेनिहारे कोनो वस्‍तुक नांगरि पकड़ि चपैत-चपैत चापि‍ दइए।
पत्नीक विचार सुनि नेताजी कक्काक मन मानि गेलनि जे भरिसक सएह भेल हएत। बजला-
ठीके कहै छी।
ठीके की कहब। अहाँ अपने पेटगनाह छी, तेकरे फल भेल।¦¦¦
 
१४ फरवरी २०१४



बड़की माता


अनसोहाँत भऽ गेल! एहेन कहियो ने देखने छेलिऐ!
-ओछाइनपर पड़ल, अपन कुहरब छोड़ि अठासी बर्खक मंगली दादी बजली।
जहिना बाट चलैत बटोही हारि‍-मारि‍ थकान पीड़ासँ पीड़ाएल बजैत तहि‍ना मंगली दादी सेहो बजली। दोसराइत लगमे नै तँए कि‍यो नै सुनि‍ पौलक। जहि‍ना अकासमे मेघक टुकड़ी उड़ि-उड़ि‍ सुर्जक प्रभाकेँ झँपैत तहि‍ना सोगाएल सोग दादीक बोलतीकेँ झाँपि‍ देलकनि। जइसँ बोलती तँ बन्न भेलनि‍ मुदा वि‍चार भीतरे-भीतर सुरकुनि‍याँ मारि बिचड़ए लगलनि। जुग बदलि गेल वृन्‍दावनक गोपी एक सेकेण्‍डक सतरह सौमा भागकेँ जुग मानि कृष्‍णसँ अलग नै हुअ चाहैत, मुदा से थोड़े अछि। अनेरे कि‍यो बजैए जे कलयुग अखनि ढेरबे भेल अछि, समरथाइओ पछुआएले छै आ औरुदो बहुत बाँकी छै। केता हजार बरख आरो रहत। मनमे बि‍चरि‍ते रहनि‍ आकि‍ दुबटि‍या लग पहुँच गेली। पहुँचिते वि‍चार उचड़लनि, ऐ बीच तँ मनुखक केता पीढ़ी गुजरि जाएत! मनुखक जि‍नगीए केतेटा होइ छै! तहूमे चारि‍ टुकड़ी अछि। जँ सए बर्खक मानब तँ पचीस-पचीस बर्खक टुकड़ी भेल, नै जँ अस्‍सी मानब तँ बीस बर्खक भेल आ जँ सरकारी मानब तँ साठि बर्खक पनरह बरख भेल। तइ हिसाबसँ कलयुगक कि‍ए ने बेसी औरुदा पछुआएले छै। तैबीच पोता मनोज आबि‍ अँगनामे बाजल-
दछि‍नवरि‍या टोलमे बड़की माता एलखि‍न, तँए ओइ टोल दि‍स नै जाएब।
आँगनमे दोसराइत नै, ओछाइनपर पड़ल मंगली दादी जोरसँ पोताकेँ सोर पाड़ि‍ पुछलखि‍न-
बौआ की भेल दछि‍नवारि‍ टोलमे?”
दादीक प्रश्न मनोजक मनकेँ जेना धक्का मारलक। धक्का मारलक ई जे दादी पुछलनि। लगमे आबि‍ मनोज बाजल-
दादी, दछि‍नवारि‍ टोलमे बड़की माता एलखि‍न, लोक सभ बजैए जे ओइ टोल नै जइहेँ।
एक तँ झुनाएल पाकल टूर खसैत दादीक स्‍मरण शक्ति‍, तैपर बड़की माता सुनि‍ असल अर्थ नै बूझि‍ सकली। बुझबो केना करि‍तथि‍ माएसँ दादी ने बनि‍ गेल छेली। पोताक बातकेँ सुनि‍ मनमे रखि‍ लेली जे बेटा औत आकि पुतोहु तँ पुछि‍ लेब। बालवोध क्‍याँने गेल जे बड़की माता केकरा कहै छै। देवीओ होइए आ दानवीओ होइए। जीवनदानीओ होइए आ लेनि‍हारि‍नीओ होइए। भेल ई जे रोदि‍याएल सौन भऽ गेल। खाली सौने नै, रौदि‍याएल अखाढ़ो ने बरिसल। फागुन-चैतक मधुआएल रौद बढ़ैत-बढ़ैत अग्नि स्‍वरूपा बनि पृथ्वीकेँ गरसि‍ लेलक। अग्नि‍ स्‍वरूपा बनबो केना ने करैत? पानि‍क छुतिये ने समापत भऽ गेल। अपन सहयोगीक भरपूर सहयोग भेटबे केलै। रस्‍ताबाटक बैसल माटि‍ गर्दा-धुरा बनि‍ धुरिया पकड़ि‍ अकासक रसकेँ चुिस लेलक, गाछ-बि‍रि‍छ अपन हरितमा तियागि पीड़ासँ पीड़ा धरतीपर झड़ि‍ गेल। पोखरि-इनार, धार-धूर माटिक खाधि‍ बनि‍ गेल। सुरूजक प्रखर प्रभाकेँ धरती-अकास बीचक सेना नै रोकि‍ हारि‍ मानि‍ कतबाहि‍ धऽ लेलक, एहेन स्‍थि‍ति‍मे कालचक्रक पूजा केहेन हएत? गामे-गाम रंग-बि‍रंगक तपाएल तप रोग-वि‍याधि‍क संग छोटकी मातासँ सैझली, मैझली बड़की माता[3] पसरि गेल! एक तँ ओहिना समैक गरुआएल गरमी तैपर देहक तपि‍त तापसँ तपीआ जि‍नगीक कठि‍न परीछामे गामक-गाम लोक फँसि गेल।
शुरूमे जखनि दछिनवारि टोलमे चेचकक आगमन भेल आकि‍ एके-दुइए काने-मुँह सौंसे गाम समाचार पहुँच गेल। मैयाक आगमन होइते ओझहा-धामिक संग झालि‍-मि‍रदंग उठि कऽ ठाढ़ भेल। रंग-रंगक प्रहार टोलपर हुअ लगल। ओ सभ तीन सालसँ गहवर खसा अनठौने अछि। तेकरे फल भेट रहल छै। तेतबे नै आनो गामोक आ आन टोलोक आएब-जाएब घटैत-घटैत घटिया गेल। एक्कैसो घरक टोलकेँ जेना गामो आ आनो गाम जरै-मरैले छोड़ि‍ देलक।
छोटकी माता[4] अपन रूप बढ़बैत गेल। जहिना शरीरमे बढ़ल तहिना मौसमो बढ़ैत संग-संग चलए लगल। एक्कैसो परिवार रोगसँ आक्रान्‍त भऽ गेल। आेना दछिनवरिये टोलटा नै गामक आनो टोल आ आनो-आनो गाममे वियाधि पसरि गेल। 
ओछाइनपर पड़ल मंगली दादीक मन फड़फड़ेलनि। मैयाक[5] आगमन तँ चैत-बैशाख आकि‍ आसीन-कातिकमे होइ छेलै, जखनि‍ रीत-बेवहार बदलै छै। अखनि‍ तँ सौन छी तखनि‍ कि‍ए भेल? अखनि तँ बाध-बोन हरिआएल रहैत, पोखरि-झाँखरि‍सँ लऽ कऽ चर-चाँचड़ जलजलाएल रहैत, से किए ने अछि? मासक ठेकान तँ दादीकेँ मन पड़लनि‍ मुदा मौसमक ठेकाने ने रहलनि। ठेकानो केना रहि‍तनि‍, घरहटि‍या घरहटक समैक लछन-करम ठेकना नक्षत्र मन रखैए, कि‍सान कि‍सानी आ बेपारी बेपारक, से तँ आब दादीमे नै रहलनि। तँए मन नै बूझि पेलकनि‍। मुदा सुनाएल मन सपनए लगलनि। सपनाइते खापड़िक मकैक लाबा जकाँ चनकि धरतीपर खसलनि। खसिते चनचनेली-
कहाँ दन साते-आठेटा मखानक फोंका जकाँ देवसुनराकेँ तेहेन नि‍कलि‍ गेल अछि‍ जे तनो-भगन-वेनग्न भऽ गेल अछि। बापो-माए डरे लगमे नै जाइ छै। जेबो केना करतै। जखनि एक्के घरक सातटा स्‍त्रीगण सात सीढ़ीमे तेना बँटा जाइए जे मनुखक शक्‍ले-सुरति‍ बदलि जाइ छै, तहि‍ना ने बरो-बेमारीक अछि। साधारण पेटझड़ीबला जँ रद-दसबला टोल जाएत तँ जानियेँ कऽ ने ढोढ़ीया बीखकेँ गहुमनेक बनौत...
एक्कैसो घरक टोलमे ने एकोटा परि‍वार नागा रहल आ ने एक्कोटा मनुख। जहि‍ना दुनि‍याँक सभ परुखकेँ नारीक संग कऽ देल जाइ छै, तहि‍ना। टोलक सभ चेचक वि‍याधिसँ व्‍यग्र भऽ गेल। के केकरा देखत। सबहक मन कहै, जान रहत तखने ने जहान। जँ जाबे से नै रहत तँ जहाने की। सभ ि‍दन सभ काल दुनि‍याँक उदए-परले तँ होइते छै, तँए कि सभले एक्के होइ छै। दुनूक फेँट-फाँटमे जे जेहेन बीछि‍नि‍हार रहल ओ ओहेन कऽ बीछि लइए। अनायास स्‍मृति‍ जगलनि‍। जगिते मन पड़लनि‍ अपना देहमे भेल चालीस बरख पहिनुका चेचक। मझि‍ली मैया मन पड़ि‍ते देह ओहि‍ना सि‍हरि‍ गेलनि‍ जेना बर्खाक बून पड़ि‍ते अकासमे उड़ैत चि‍ड़ैकेँ होइत। एक तँ उमेरक जर्जर अंग तैपर चालीस बर्खक स्‍मृति‍ तेना कऽ मंगली दादीकेँ गरसि‍ लेलकनि‍ जे गराँसक चोटसँ जहिना अंग भऽ जाइत तहि‍ना भऽ गेली। बेथाएल तन-मन तेना अकड़िदबलकनि‍ जे मुँह भरभरेलनि-
हे भगवान! अनेरे कोन नरकमे रखने छी, कहि‍या धरि‍ राखब।
मुदा लगले मन बदलि‍ गेलनि‍। बदलि‍ ई गेलनि‍ जे जाबे आँखि‍ तकै छी ताबे अहिना ने होइतो रहत आ देखबो-भोगबो करैत रहब। तइसँ नीक जे लऽ चलू जि‍नगीक ओइपार जैठाम ई सभ नै देखब। 
ओसारक दछि‍नवारि‍ भागमे मंगली दादीक ओछाइन, तहीबीच बेटा बुधि‍यार आँगन पहुँचल। माइक सभ बात तँ बुधि‍यार नै सुनि सकल मुदा अंति‍म बात, ‘लऽ चलू...सुनलक। सुनिते बुधि‍यारक मनमे उठल, माए की बाजि‍ रहल अछि! झब दनि‍ लऽ चलू केतए लऽ चलू? मन मुड़ियाएल। मुड़ि‍याइते भेल जे भरिसक रोग-पीड़ासँ रोगाएल-पीड़ाएल मन तड़पि‍ रहल छै।‍ फेर भेलै जे अनेरे मनकेँ औनाबै छी। माइओ कि‍यो आन थोड़े छी जे पुछैमे संकोच हएत। बाजल-
माए, की भेलौ, एना कि‍ए बजै छेँ?”
बुधि‍यारक बोल सुनि मंगली दादीक हूबा जगलनि हूबगर होइत बजली-
सुनै छी जे गाममे मैयाक आगमन भेल अछि?”
माइक बात सुनि बुधि‍यार तारतम करए लगल जे माए लग झूठ केना बाजब? तहूमे जखनि कहि‍यो ने बजलौं, मुदा प्रश्नक जबावो केना देब। जहि‍ना दछि‍नवारि‍ टोलक रस्‍ता छोड़ि‍ देलौं, तहि‍ना तँ उतरवारि‍ओ टोलक। फेर तखनि‍ केना हँ कि‍ नै कहबै। जहि‍ना चिड़ै लोलसँ बोल मि‍लबैत तहि‍ना बुधि‍यार माइयक बोलसँ बोल मि‍लबैत बाजल-
हँ, माए ठीके भेल अछि।
बेटाक बोल सुनि मंगली दादीकेँ सुआस पड़लनि। दोहरबैत बजली-
आनो-गाममे भेल अछि आकि अपने गामटा मे?”
दादीक मन बढ़ैत देखि‍ मनमे भेल जे अखनि‍ धरि‍ सुनलेहे बाजि बजलौं, आन गामक जँ बाजब आ अढ़ा दि‍अए जे अपनो कुटुम-परि‍वार तँ ओइ गाममे अइछे, कनी जि‍गेसा कऽ आबह तखनि‍ तँ भारी पहपटि हएत। रस्‍तापेरा केतए फँसि‍ जाएब तेकर ठीक अछि। बाजल-
माए, कनी नीक जकाँ भँजियबै छी तखनि नीक जकाँ कहबौ। सुनै छी जे कहाँदन ओझहा-धाइम भाउ खेलाएल तँ कहलकै, गामक सीमान बान्हि देलियऽ, तखनि तँ जानक बदला जान दिअ पड़तह।
मंगली दादी पुछलखिन-
वैद की कहलकै?”
ओझहा-वैदक नाओं सुनि बुधि‍यारक मन मानि‍ गेल जे बि‍ना झूठ बजने काज नै चलत। मुदा जहि‍ना बालवोध तहि‍ना थाकल-ठेहि‍याएल बूढ़-बुढ़ानुसकेँ बौसब बड़ भारी नहियेँ अछि। बाजल-
अनेरे कोन फेड़मे पड़ै छेँ। राम-राम कर सभ नीक भऽ जेतै।
राम-रामसुनि‍ मंगली दादी तारतम करए लगली जे राम-रामकी कहलक। मरैकाल राम-रामकेँ सत् लोक मानैए। अधला काज केला पछाति‍ राम-राम कहि‍ दुतकारि‍ दइ छै। शुभ काजक बेर जँ राम-नाम सत् छी बाजब तँ कपर फोड़ौबलि‍ करा लेब, तखनि बुधि‍यार की‍ बाजल। माइओ रगड़ी बजली-
बौआ, ओझहो-गुणी नै देखलक-सुनलक हेन?”
माइक रगड़गड़ बात सुनि बुधि‍यार रगड़ाइत बाजल-
नेति-नेति कहि कातेसँ छुअब छोड़ि सतदिना रोग कहि‍ जीबै-मरैले छोड़ि‍ देलक।¦¦¦
 
१८ फरवरी २०१४



धरती-अकास


सुधीराक बि‍आहक गप-सप्‍प उठल। तीन दि‍न पहि‍ने तक बी..क रि‍जल्‍ट नि‍कलल छेलै। राजनीति‍शास्‍त्र आनर्स पाबि‍ सुधीराक मन मानि‍ गेल छल जे राज-काज बुझै-चलबैक लूरि‍क प्रमाणपत्र युनि‍वर्सिटी दऽ देलक।
सुधीराक पि‍ता प्रोफेसर साहैब संगी-बीच बैस चाहो-पान करैत रहथि‍ आ ठहाका-पर-ठहाका सेहो दैत रहथिन‍। ठहाकाक कारण भेल जे अपन टारगेटक भीतरे बेटीक बि‍आहक गर लगि‍ गेलनि‍। बरो राजनीति‍शास्‍त्रेक प्रोफेसर छथिन‍। साल भरि‍ पहि‍ने नोकरी भेलनि‍। बर-कन्‍या जँ एक वि‍षयक जानकार हुअए तँ ओ जि‍नगीक लेल सोनाक सुगंधे भेल। संगी सभकेँ बजबैक कारण प्रोफेसर साहैब सबहक बीच सुधीराक बि‍आहक चर्च उठा, बेटीक वि‍चार जानए चाहलनि‍।
गद-गदाएल मने प्रोफेसर साहैब सुधीरा दि‍स देखैत संगीक बीच बजला-
बेटीक बि‍आह पसि‍नगर घरमे हएत।
संगी सभ जेना बाँसक एकटा चोंगरामे अनेको गोटे पकड़ि‍ सह दइए तहि‍ना मने-मन सभ देलकनि‍। मुदा सुधीरा राजनीति‍शास्‍त्रक छात्रा छी, अपना लगसँ लऽ कऽ दुनि‍याँ धरि‍क राज-काजक प्रक्रि‍या जनैए। बाजल-
बाबूजी, केहेन परि‍वारमे पठबए चाहै छी?”
पि‍ता चुपे रहला। दोसर जे संगी रहथि‍न ओ बजला-
बाउ, संयुक्‍त परि‍वार, खानदानी परि‍वार, तहूमे सातो भाँइक भैयारीमे सभसँ छोट भाएक संग।
सुधीरा-
जहि‍ना सात तल अकास ऊपर अछि‍ तहि‍ना सात तल पतालो। भैयारीक सातम तलकेँ ऊपर-नि‍च्‍चाँ तजबीज केलि‍ऐ?”¦¦¦          

१९ फरवरी २०१४




बकठाँइ


ओछाइन छोड़ि‍ते दुनू परानी लाल भायकेँ बकठाँइ शुरू भऽ गेलनि‍। बरहमसि‍या बकठाँइ तँए शुभ-अशुभक मद्दी नै। मद्दी तँ ओतए होइए जेतए नि‍अमि‍त कि‍रि‍या-कलाप चलैत। ओना दोसरो कारण छेलनि‍, से छेलनि‍ पति‍-पत्नीक बीच जि‍नगीक सम्‍बन्‍ध। तँए कहि‍यो एहनो भाइए जाइ छन्‍हि‍ जे सुतलीओ राति‍मे आ कहि‍यो अकलबेरोमे तेहेन परोड़क मुड़ी जकाँ सरेड़ नि‍कलै छन्‍हि‍‍ जे अड़ोसीओ-पड़ोसीओ आ दि‍आदोवाद गामसँ फाजि‍ल कहि‍ अपन मुँह बरजि‍ लइ छथि‍। ओना से ओहि‍ना नै कि‍यो बरजलनि‍, कि‍छु दि‍न पहि‍ने जोतखी भायसँ नि‍सभरि‍ राति‍मे तेहेन बजरान बजरलनि‍ जे सौंसे गामक लोक जमा भऽ गेलनि‍। मुदा गौआँकेँ चाबस्‍सी दी जे जोतखीए भायकेँ दोखी बना मुँह बन्न करैले कहि‍, छोड़ि‍ देलकनि‍। बात कोनो कि‍ कि‍छु रहै, एतबे रहै जे कि‍छु एहनो काज होइए जेकर बरजि‍त अकलबेरामे कएल जाए। तँए छुट्टा साँढ़ जकाँ दुनू परानी लाल भायकेँ गौआँ बूझि‍, एक घर डाइनो बरजै छै कहि‍ बि‍नु नीनक पकड़ल ओछाइनपर कर घूमि‍-घूमि‍ कछमछ करि‍तो, कानमे झड़ पड़ैबि‍तो अड़ोसीया-पड़ोसीया ने लगमे पहुँचैक साहस करैत आ ने सुतले-सूतल कि‍यो मनाही करैबला। तेकर कारण ई नै रहै जे लाल भायसँ आन कम तागति‍बला छथि‍ आकि‍ दउगर-पेंचगर कम छथि‍। मुदा कारण जहि‍ना धानक झड़ केतौ धाने झड़ भऽ जाइए आ केतौ झड़ाह बनि‍ झड़ बनैए। माने ई जे एक धानक खेतीक बीच जँ दोसर धान आबि‍ गेल तँ ओ धानो भेल आ झड़ो भेल। धान भेल जे जँ एकरंगाह दोसरमे चलि‍ गेलौं, मुदा फुटै-पकैक, नमती-मोटाइ आ गुद्दाक रंग जँ एक होउ, तँ कि‍ए ने धान भेल। मुदा तुलसीफुल आकि‍ कनकजीर धानक खेतमे जँ उलाँक धान मि‍झड़ा जाए तखनि‍ की कहबै? एकटा धान दोसरसँ दस बड़ नमहरो आ दस बड़ मोटो होइए। खाइकाल तँ पारखी ओकरा पकड़ि‍ घरनीकेँ दसटा सोहर सुनबैक अधि‍कारी तँ बनि‍येँ जेता कि‍ने। बनबाको चाहि‍ए। जैठाम एक-एक दाना पकड़ैक बात अछि‍ तैठाम जँ पँचमुखी रूद्राक्षमे गो-मुखी नुकबए चाहबै तँ की छोड़बो उचि‍त? खैर जे होउ...
बरहमसि‍या बकठाँइ तँए दुनू परानी ओहेन अभ्‍यस्‍त जे घंटो भरि‍ एके आसन एके टाँगे धेने रहै छथि‍। ओना लाल भाय आ लाल भौजीक वि‍चारक दूरी नमहर छन्‍हि‍ मुदा बि‍ना दूरी पार केने सीमोपर नहि‍येँ पहुँचल जा सकैए। तहूमे मनुख सामाजि‍क प्राणी छी, जँ दूटा मनुखकेँ एकठाम रहैक सूत्र नै बनल रहत तँ सदि‍काल भैंसा-भैंसी होइते रहत। वि‍वाह सूत्र तँ दुनू परानी लाल भायकेँ बान्‍हि‍ए देने छन्‍हि‍।
दुनू परानी लाल भाइक आझुका बकठाँइ छेलनि‍ लाल भायक ओ वि‍चार जेकरा ओ सि‍द्धान्‍तसँ जोड़ल छन्‍हि‍। तैबीच भौजीक सुमति‍ जगलनि‍ आ बेडटी केर ओरि‍यानमे लगि‍ गेली मुदा लाल भाय ओछाइनेपर पड़ल रहला। जेना अस्‍सी मन पानि‍ वि‍चारपर पड़ि‍ गेल होन्‍हि‍ तहि‍ना। जहि‍ना बच्‍चाक शुरूक शि‍क्षा जि‍नगीक संग अधि‍क दूर तक संग पुड़ैए तहि‍ना लाल भायक वि‍चार सेहो संगे चलि‍ रहल छन्‍हि‍‍। सि‍द्धान्‍तक बीच फँसल रहनि‍ लाल भायक वि‍चार! चाह पीबैसँ पहि‍ने लाल भायक मन तुरूछि‍ गेलनि‍। तुरूछैक कारण छेलनि‍ जे अखनि‍ धरि‍क जे जि‍नगी रहलनि‍ ओ ई रहलनि‍ जे जँ घर-बाहर एकरंगाह काज हुअए तँ पहि‍ने बाहरक कऽ ली, पछाति‍ घरक। तहि‍ना दोसर वि‍चार रहनि‍ जे जँ अपनो काज रहए ओहने काजक भार जँ दोसराइतोक होइ तँ पहि‍ने दोसराइतक करब नीक। मुदा.., तइ वि‍चारमे फँसल। मनमे रंग-रंगक बात गाड़ीक पहि‍या जकाँ चलैत रहनि‍। पनि‍पत जहि‍ना बीज रूपमे एक दि‍स पाँकमे गड़ल रहैए तँ दोसर दि‍स कमल सदृश आँखि‍ सेहो बनौने रहैए तहि‍ना लाल भायक वि‍चार ऊपर-नि‍च्‍चाँ होइत रहनि‍। बच्‍चेमे एक गुरु नै अनेक गुरु माए-बापसँ लऽ कऽ साहि‍त्‍य धरि‍क गुरुक उपदेश कानमे पड़ैत रहल जे सत् बाजी, केकरो अनुचि‍त नै करि‍ऐ, सत्-धर्मक पालन करी! मुदा देखि‍ की रहल छी। मन बमछि‍ गेलनि‍, बुदबुदेला-
कि‍यो अपन कर्ता-धर्ता छी, सि‍द्धान्‍तक संग कोनो समझौता नै।
शि‍वलि‍ंग जकाँ वि‍चारक बीच खूट्टा गाड़ि‍ देलनि‍।
ओछाइनपर पड़ल लाल भाय जि‍नगीक परीछाक बीच फँसल छला। चाहमे कनी चीनी बढ़बैत लाल भौजी गद्-गद् जे दुनि‍याँक के एहेन पुरुख अछि‍ जे अपन स्‍वेच्‍छासँ जि‍नगी बना लेत? तैठाम तँ अजमौल पुरुख छथि‍ए। लगले पाछू घुसुकि‍ये जेता। धुआइत चाहक कप दहि‍ना हाथसँ उठबैत लाल भौजी बजली-
कि‍ए, महि‍ंस मोड़ जकाँ ओछाइन पकड़ने छी, उठब चाह पीब आकि‍ पड़ले रहब।
लाल भौजीक बात लाल भायकेँ जँचलनि‍। फुड़फुड़ा कऽ उठि‍ जेबीक पाइ सेरि‍यबए लगला। चाह लाल भौजीक हाथेमे। पाइ सेरि‍यबैत देखि‍ भौजी टीपली‍-
भोरे लोक राम-नाम करैए, अहाँ पाइए सेरि‍यबै छी।
लाल भौजीक मनोवृति‍ भैया नीक जकाँ परेखने। परेखने ई छथि‍ जे अनकर काजक कि‍छु होउ, अपन कुरथी बलुआ जाए। तैपर दूधबलाक काजक समैपर सेहो नजरि‍ रहनि‍। दूधबला बेटी बि‍आहक सरंजाम कीनए भोरे बजार जाएत। लाल भायक हाथमे पाइ नै रहनि‍, तँए घुमबैत कहने रहथि‍न-
नअ-दस बजे राति‍ तक पाइ औत, काजक घरमे अनेरे नै बैसह, बजार जाइसँ पहि‍ने तोरा पाइ पहुँचा देबह।
छअ बजेक समए देने रहथि‍न। अँखि‍मुना बि‍सवासू दूधबला, तँए पाइक ि‍चन्‍ता मनसँ हटा नेने रहए। जहि‍ना भक्‍तक भगवानपर सँ हटि‍ भगवान बनि‍ जाइए, तहि‍ना।
चाह पीब लाल भाय सोझे दूधबला ओइठाम वि‍दा भेला। वि‍दा होइते लाल भौजी टोकि‍ देलखि‍न-
केतए जाइ छी?”
दूधबलाकेँ पाइ दइले।
भोरे-भोर अहूँकेँ कि‍छु फुड़ल नै जे अनेरे वि‍दा भेलौं?”
की अनेरे?”
जेकरा खगता रहै छै, ओ अनेरे दौगल अबैए।
हमहूँ खगता बुझलि‍ऐ तँए ने दौगल जाइ छी।
पति‍क सकताएल वि‍चार सुनि‍ लाल भौजी ठमकि‍ गेली। बजली कि‍छु ने। मुदा नजरि‍क लाली कति‍याए लगलनि‍। जहि‍ना बाघक आगू पड़ने दुनूकेँ[6] ज्‍वर लगि‍‍ जाइ छै तहि‍ना लालो भाय आ लाल भौजीओकेँ हुअ लगलनि‍। मुदा दुनूक ज्‍वरक दू कारण छेलनि‍। केकरो रदु-बसातसँ एला पछाति‍ नहेलासँ अबैत तँ केकरो नहेला पछाति‍ रदु-बसातमे गेला पछाति‍ अबैत। लाल भाय अपन वि‍चारक पाछू अपन मानक संग परि‍वारक सम्मानक रक्‍छाक बातमे डूमि‍ कलि‍याएल जाइत रहथि‍ तँ लाल भौजी अपन मान-सम्मानमे।¦¦¦     
२४ फरवरी २०१४  

  

 विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन  
इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष  प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ।
१.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली .मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम

.नेपाल भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक
  उच्चारण आ लेखन शैली
(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित)
मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन

१.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, , , न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना-
अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।)
पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।)
खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।)
सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।)
खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।)
उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि।
नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ।

२.ढ आ ढ : ढक उच्चारण र् हजकाँ होइत अछि। अतः जतऽ र् हक उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना-
ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि।
ढ = पढ़ाइ, बढब, गढब, मढब, बुढबा, साँढ, गाढ, रीढ, चाँढ, सीढी, पीढी आदि।
उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ अबैत अछि। इएह नियम ड आ डक सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि।

३.व आ ब : मैथिलीमे क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि।

४.य आ ज : कतहु-कतहु क उच्चारण जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही।

५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि।
प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि।
नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि।
सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि।
ए आ क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि।

६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि।

७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खडयन्त्र), षोडशी (खोडशी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि।

८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि:
(क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : पढए (पढय) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पडतौक।
अपूर्ण रूप : पढगेलाह, लेल, उठपडतौक।
पढऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पडतौक।
(ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह।
अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह।
(ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि।
अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल।
(घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : पढैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि।
अपूर्ण रूप : पढै अछि, बजै अछि, गबै अछि।
(ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक।
अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ।
(च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि।
अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै।

९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि।

१०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पडि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए।
-(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित)

१.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि
, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन
ठाम
जकर, तकर
तनिकर
अछि

अग्राह्य
अखन, अखनि, एखेन, अखनी
ठिमा, ठिना, ठमा
जेकर, तेकर
तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य)
ऐछ, अहि, ए।

२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। करगेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

३. प्राचीन मैथिलीक न्हध्वनिक स्थानमे लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

४. तथा ततय लिखल जाय जतस्पष्टतः अइतथा अउसदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।

६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

७. स्वतंत्र ह्रस्व वा प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ वा लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढैआ, विआह, वा धीया, अढैया, बियाह।

९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। मेमे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। क वैकल्पिक रूप केरराखल जा सकैत अछि।

११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद कयवा कएअव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

१३. अर्द्ध ओ अर्द्ध क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ’ , ‘’, तथा क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा कलिखल जाय, हटा कनहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

१८. समस्त पद सटा कलिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोडि क’ ,  हटा कनहि।

१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा
' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६

  २. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम
२.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):-   
दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य मे जीह तालुसँ , मे मूर्धासँ आ दन्त मे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे केँ वैदिक संस्कृत जकाँ सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग
गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि।
ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी।
अछि- अ इ छ  ऐछ (उच्चारण)
छथि- छ इ थ  – छैथ (उच्चारण)
पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण)
आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि।
फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र ।
उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव  http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना
छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू।
रहए-
रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)।
मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए
छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो।
संयोगने- (उच्चारण संजोगने)
केँ/  कऽ
केर- (
केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। )
क (जेना रामक)
–रामक आ संगे (उच्चारण राम के /  राम कऽ सेहो)
सँ- सऽ (उच्चारण)
चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ)  रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)।

केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ
क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक
कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ
सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ
सऽ , तऽ , , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित।
के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति क बदला एकर प्रयोग अवांछित।
नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै

त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)।
राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै)
सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन)
पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल
पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै
ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै)
ओइ/ ओहि
ओहिले/
ओहि लेल/ ओही लऽ
जएबेँ/ बैसबेँ
पँचभइयाँ
देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित)
जकाँ / जेकाँ
तँइ/ तैँ/
होएत / हएत
नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै
सौँसे/ सौंसे
बड /
बडी (झोराओल)
गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।)
रहलेँ/ पहिरतैँ
हमहीं/ अहीं
सब - सभ
सबहक - सभहक
धरि - तक
गप- बात
बूझब - समझब
बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ
हमरा आर - हम सभ
आकि- आ कि
सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै)
होइन/ होनि
जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन)
पइठ/ जाइठ
आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ
मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ ।
एकटा , दूटा (मुदा कए टा)
बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ
, आ/ दिय’ , ’, आ नै )
अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोडैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)।
अइमे, एहिमे/ ऐमे
जइमे, जाहिमे
एखन/ अखन/ अइखन

केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित)
भऽ
मे
दऽ
तँ (तऽ, नै)
सँ ( सऽ स नै)
गाछ तर
गाछ लग
साँझ खन
जो (जो go, करै जो do)
 तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले
जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले
ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति‍ कतेक दि‍नसँ कहैत रहैत अइ
लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे
लहँ/ लौं

गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ
जइ/ जाहि‍/ जै
जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम
एहि‍/ अहि‍/
अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) /
अइछ/ अछि‍/ ऐछ
तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍
ओहि‍/ ओइ
सीखि‍/ सीख
जीवि‍/ जीवी/ जीब 
भलेहीं/ भलहि‍ं 
तैं/ तँइ/ तँए
जाएब/ जएब
लइ/ लै
छइ/ छै
नहि‍/ नै/ नइ
गइ/ गै 
छनि‍/ छन्‍हि ...
समए शब्‍दक संग जखन कोनो वि‍भक्‍ति‍ जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्‍यादि‍। असगरमे हृदए आ वि‍भक्‍ति‍ जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्‍यादि‍।  
जइ/ जाहि‍/
जै
जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम
एहि‍/ अहि‍/ अइ/
अइछ/ अछि‍/ ऐछ
तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍
ओहि‍/ ओइ
सीखि‍/ सीख
जीवि‍/ जीवी/
जीब 
भले/ भलेहीं/
भलहि‍ं 
तैं/ तँइ/ तँए
जाएब/ जएब
लइ/ लै
छइ/ छै
नहि‍/ नै/ नइ
गइ/
गै 
छनि‍/ छन्‍हि‍
चुकल अछि/ गेल गछि
२.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम
नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही:
बोल्ड कएल रूप ग्राह्य:  
१.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक
२. आ’/आऽ
३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए
४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए
गेल
५. कर’ गेलाह/करऽ
गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह
६.
लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/
७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला /
करैवाली
८. बला वला (पुरूष), वाली (स्‍त्री) ९
.
आङ्ल आंग्ल
१०. प्रायः प्रायह
११. दुःख दुख १
२. चलि गेल चल गेल/चैल गेल
१३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन
१४.
देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह
१५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि
१६. चलैत/दैत चलति/दैति
१७. एखनो
अखनो
१८.
बढ़नि‍ बढइन बढन्हि
१९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम)
२०
. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ
२१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ
२२.
जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर
२४. केलन्हि/केलनि‍/कयलन्हि
२५. तखनतँ/ तखन तँ
२६. जा
रहल/जाय रहल/जाए रहल
२७. निकलय/निकलए
लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल
२८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए
२९.
की फूरल जे कि फूरल जे
३०. जे जे’/जेऽ
३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/
यादि (मोन)
३२. इहो/ ओहो
३३.
हँसए/ हँसय हँसऽ
३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस
३५. सासु-ससुर सास-ससुर
३६. छह/ सात छ/छः/सात
३७.
की  की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित)
३८. जबाब जवाब
३९. करएताह/ करेताह करयताह
४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस
४१
. गेलाह गएलाह/गयलाह
४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर
४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल
४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि‍ जाइत छल
४५.
जबान (युवा)/ जवान(फौजी)
४६. लय/ लए ’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए
४७. ल’/लऽ कय/
कए
४८. एखन / एखने / अखन / अखने
४९.
अहींकेँ अहीँकेँ
५०. गहींर गहीँर
५१.
धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए
५२. जेकाँ जेँकाँ/
जकाँ
५३. तहिना तेहिना
५४. एकर अकर
५५. बहिनउ बहनोइ
५६. बहिन बहिनि
५७. बहिन-बहिनोइ
बहिन-बहनउ
५८. नहि/ नै
५९. करबा / करबाय/ करबाए
६०. तँ/ त ऽ तय/तए
६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ,
६२. गि‍नतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ  
६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत
६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता
६५. देन्हि/ दइन दनि‍/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि
६६. द’/ दऽ/ दए
६७. (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम)
६८. तका कए तकाय तकाए
६९. पैरे (on foot) पएरे  कएक/ कैक
७०.
ताहुमे/ ताहूमे
 ७१.
पुत्रीक
७२.
बजा कय/ कए / कऽ
७३. बननाय/बननाइ
७४. कोला
७५.
दिनुका दिनका
७६.
ततहिसँ
७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि‍/
  गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍
७८. बालु बालू
७९.
चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध)
८०. जे जे’
८१
. से/ के से’/के’
८२. एखुनका अखनुका
८३. भुमिहार भूमिहार
८४. सुग्गर
/ सुगरक/ सूगर
८५. झठहाक झटहाक ८६.
छूबि
८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ
८८. पुबारि
पुबाइ
८९. झगड़ा-झाँटी
झगड़ा-झाँटि
९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे
९१. खेलएबाक
९२. खेलेबाक
९३. लगा
९४. होए- होहोअए
९५. बुझल बूझल
९६.
बूझल (संबोधन अर्थमे)
९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह
९८. तातिल
९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ
१००. निन्न- निन्द
१०१.
बिनु बिन
१०२. जाए जाइ
१०३.
जाइ (in different sense)-last word of sentence
१०४. छत पर आबि जाइ
१०५.
ने
१०६. खेलाए (play) –खेलाइ
१०७. शिकाइत- शिकायत
१०८.
ढप- ढ़प
१०९
. पढ़- पढ
११०. कनिए/ कनिये कनिञे
१११. राकस- राकश
११२. होए/ होय होइ
११३. अउरदा-
औरदा
११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand)
११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि‍/ बुझयलन्हि (understood himself)
११६. चलि- चल/ चलि‍ गेल
११७. खधाइ- खधाय
११८.
मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखि‍न/ मोन पारलखिन्ह
११९. कैक- कएक- कइएक
१२०.
लग ल’ग 
१२१. जरेनाइ
१२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/
जरेनाइ
१२३. होइत
१२४.
गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ गरबौलन्हि/ गरबौलनि‍
१२५.
चिखैत- (to test)चिखइत
१२६. करइयो (willing to do) करैयो
१२७. जेकरा- जकरा
१२८. तकरा- तेकरा
१२९.
बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे
१३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं
१३१.
हारिक (उच्चारण हाइरक)
१३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज
१३३. आधे भाग/ आध-भागे
१३४. पिचा / पिचाय/पिचाए
१३५. नञ/ ने
१३६. बच्चा नञ
(ने) पिचा जाय
१३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत
१३८.
कतेक गोटे/ कताक गोटे
१३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई
१४०
. लग ल’ग
१४१. खेलाइ (for playing)
१४२.
छथिन्ह/ छथिन
१४३.
होइत होइ
१४४. क्यो कियो / केओ
१४५.
केश (hair)
१४६.
केस (court-case)
१४७
. बननाइ/ बननाय/ बननाए
१४८. जरेनाइ
१४९. कुरसी कुर्सी
१५०. चरचा चर्चा
१५१. कर्म करम
१५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए
१५३. एखुनका/
अखुनका
१५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ
१५५. कएलक/
केलक
५६. गरमी गर्मी
१५७
. वरदी वर्दी
१५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ
१५९. एनाइ-गेनाइ
१६०.
तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि‍
१६१. नञि / नै
१६२.
डरो ड’रो
१६३. कतहु/ कतौ कहीं
१६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर
१६५. भरिगर
१६६. धोल/धोअल धोएल
१६७. गप/गप्प
१६८.
के के’
१६९. दरबज्जा/ दरबजा
१७०. ठाम
१७१.
धरि तक
१७२.
घूरि लौटि
१७३. थोरबेक
१७४. बड्ड
१७५. तोँ/ तू
१७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य)
१७७. तोँही / तोँहि
१७८.
करबाइए करबाइये
१७९. एकेटा
१८०. करितथि /करतथि
 १८१.
पहुँचि/ पहुँच
१८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि‍
१८३.
लगलन्हि/ लगलनि‍ लागलन्हि
१८४.
सुनि (उच्चारण सुइन)
१८५. अछि (उच्चारण अइछ)
१८६. एलथि गेलथि
१८७. बितओने/ बि‍तौने/
बितेने
१८८. करबओलन्हि/ करबौलनि‍/
करेलखिन्ह/ करेलखि‍न
१८९. करएलन्हि/ करेलनि‍
१९०.
आकि/ कि
१९१. पहुँचि/
पहुँच
१९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा)
१९३.
से से’
१९४.
हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए)
१९५. फेल फैल
१९६. फइल(spacious) फैल
१९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि‍/हेतनि‍/ हेतन्हि
१९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब
१९९. फेका फेंका
२००. देखाए देखा
२०१. देखाबए
२०२. सत्तरि सत्तर
२०३.
साहेब साहब
२०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि‍
२०५. हेबाक/ होएबाक
२०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ
२०७. किछु न किछु/
किछु ने किछु
२०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं
२०९. एलाक/ अएलाक
२१०. अः/ अह
२११.लय/
लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक
२१३.सबहक/ सभक
२१४.मिलाऽ/ मिला
२१५.कऽ/
२१६.जाऽ/
जा
२१७.आऽ/
२१८.भऽ /भ’ ( फॉन्टक कमीक द्योतक)
२१९.निअम/ नियम
२२०
.हेक्टेअर/ हेक्टेयर
२२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़
२२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं
२२३.कहिं/ कहीं
२२४.तँइ/
तैं / तइँ
२२५.नँइ/ नइँ/  नञि/ नहि/नै
२२६.है/ हए / एलीहेँ/
२२७.छञि/ छै/ छैक /छइ
२२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ
२२९. (come)/ आऽ(conjunction)
२३०.
आ (conjunction)/ आऽ(come)
२३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना
२३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि‍
२३३.हेबाक- होएबाक
२३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं
२३५.किछु न किछ- किछु ने किछु
२३६.केहेन- केहन
२३७.आऽ (come)- (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह
२३८. हएत-हैत
२३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें
२४०.एलाक- अएलाक
२४१.होनि- होइन/ होन्हि/
२४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/
२४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ
२४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ
२४५
.शामिल/ सामेल
२४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं
२४७.जौं
/ ज्योँ/ जँ/
२४८.सभ/ सब
२४९.सभक/ सबहक
२५०.कहिं/ कहीं
२५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/
२५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल
२५३.कोना/ केना/ कन्‍ना/कना
२५४.अः/ अह
२५५.जनै/ जनञ
२५६.गेलनि‍/
गेलाह (अर्थ परिवर्तन)
२५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि‍/
२५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन)
२५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी
२६०.पठेलन्हि‍ पठेलनि‍/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि‍/
२६१.निअम/ नियम
२६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर
२६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ
२६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित
२६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -/ कऽ/ के
२६६.छैन्हि- छन्हि
२६७.लगैए/ लगैये
२६८.होएत/ हएत
२६९.जाएत/ जएत/
२७०.आएत/ अएत/ आओत
२७१
.खाएत/ खएत/ खैत
२७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पि‍येबाक
२७३.शुरु/ शुरुह
२७४.शुरुहे/ शुरुए
२७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह
२७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/
२७७.जाइत/ जैतए/ जइतए
२७८.आएल/ अएल
२७९.कैक/ कएक
२८०.आयल/ अएल/ आएल
२८१. जाए/ जअए/ जए (लालति‍ जाए लगलीह।)
२८२. नुकएल/ नुकाएल
२८३. कठुआएल/ कठुअएल
२८४. ताहि/ तै/ तइ
२८५. गायब/ गाएब/ गएब
२८६. सकै/ सकए/ सकय
२८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल)
२८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढैत
(पढै-पढैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि‍। बुझैत-बुझैत आब बुझलि‍ऐ। हमहूँ बुझै छी।
२८९. दुआरे/ द्वारे
२९०.भेटि/ भेट/ भेँट
२९१.
खन/ खीन/  खुना (भोर खन/ भोर खीन)
२९२.तक/ धरि
२९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ)
२९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ)
२९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य
२९६.बेसी/ बेशी
२९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला)
२९८
.वाली/ (बदलैवाली)
२९९.वार्त्ता/ वार्ता
३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय
३०१. लेमए/ लेबए
३०२.लमछुरका, नमछुरका
३०२.लागै/ लगै (
भेटैत/ भेटै)
३०३.लागल/ लगल
३०४.हबा/ हवा
३०५.राखलक/ रखलक
३०६. (come)/ (and)
३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप
३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै।
३०९.कहैत/ कहै
३१०.
रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different)
३११.तागति/ ताकति
३१२.खराप/ खराब
३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि
३१४.जाठि/ जाइठ
३१५.कागज/ कागच/ कागत
३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए)
३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय
DATE-LIST (year- 2013-14)
(१४२१ फसली साल)
Marriage Days:
Nov.2013- 18, 20, 24, 25, 28, 29
Dec.2013- 1, 4, 6, 8, 12, 13
January 2014- 19, 20, 22, 23, 24, 26, 31.
Feb.2014- 3, 5, 6, 9, 10, 17, 19, 24, 26, 27.
March 2014- 2, 3, 5, 7, 9.
April 2014- 16, 17, 18, 20, 21, 23, 24.
May 2014- 1, 2, 8, 9, 11, 12, 18, 19, 21, 25, 26, 28, 29, 30.
June 2014- 4, 5, 8, 9, 13, 18, 22, 25.
July 2014- 2, 3, 4, 6, 7.
Upanayana Days:
February 2014- 2, 4, 9, 10.
March 2014- 3, 5, 11, 12.
April 2014- 4, 9, 10.
June 2014- 2, 8, 9.
Dviragaman Din:
November 2013- 18, 21, 22.
December 2013- 4, 6, 8, 9, 12, 13.
February 2014- 16, 17, 19, 20.
March 2014- 2, 3, 5, 9, 10, 12.
April 2014- 16, 17, 18, 20.
May 2014- 1, 2, 9, 11, 12.
Mundan Din:
November 2013- 20, 22.
December 2013- 9, 12, 13.
January 2014- 16, 17.
February 2014- 6, 10, 19, 20.
March 2014- 5, 12.
April 2014- 16.
May 2014- 12, 30.
June 2014- 2, 9, 30.

FESTIVALS OF MITHILA (2013-14)
Mauna Panchami-27 July
Madhushravani- 9 August
Nag Panchami- 11 August
Raksha Bandhan- 21 Aug
Krishnastami- 28 August
Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 5 September
Hartalika Teej- 8 September
ChauthChandra-8 September
Vishwakarma Pooja- 17 September
Anant Caturdashi- 18 Sep
Pitri Paksha begins- 20 Sep
Jimootavahan Vrata/ Jitia-27 Sep
Matri Navami-28 Sep
Kalashsthapan- 5 October
Belnauti- 10 October
Patrika Pravesh- 11 October
Mahastami- 12 October
Maha Navami - 13 October
Vijaya Dashami- 14 October
Kojagara- 18 Oct
Dhanteras- 1 November
Diyabati, shyama pooja-3 November
Annakoota/ Govardhana Pooja-4 November
Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja- 5 November
Chhathi -8 November
Sama Poojaarambh- 9 November
Devotthan Ekadashi- 13 November
ravivratarambh- 17 November
Navanna parvan- 20 November
KartikPoornima- Sama Visarjan- 2 December
Vivaha Panchmi- 7 December
Makara/ Teela Sankranti-14 Jan
Naraknivaran chaturdashi- 29 January
Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 4 February
Achla Saptmi- 6 February
Mahashivaratri-27 February
Holikadahan-Fagua-16 March
Holi- 17 March
Saptadora- 17 March
Varuni Trayodashi-28 March
Jurishital-15 April
Ram Navami- 8 April
Akshaya Tritiya-2 May
Janaki Navami- 8 May
Ravi Brat Ant- 11 May
Vat Savitri-barasait- 28 May
Ganga Dashhara-8 June
Harivasar Vrata- 9 July
Shree Guru Poornima-12 Jul
https://sites.google.com/a/videha.com/videha-archive-part-i/
https://sites.google.com/a/videha.com/videha-archive-part-ii/
http://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi
http://sites.google.com/a/videha.com/videha-audio
http://sites.google.com/a/videha.com/videha-video
 http://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/

"विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाउ। 

.विदेह मैथिली क्विज  : 
http://videhaquiz.blogspot.com/
.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : 
http://videha-aggregator.blogspot.com/
.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित
http://madhubani-art.blogspot.com/
.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ"  : 
http://gajendrathakur.blogspot.com/
१०.विदेह इंडेक्स  : 
http://videha123.blogspot.com/
११.विदेह फाइल : 
http://videha123.wordpress.com/
१२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग)
http://videha-sadeha.blogspot.com/
१३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा
http://videha-braille.blogspot.com/
१४.VIDEHA IST MAITHILI  FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE
१५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव
 
१६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव
१७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव
१८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला
१९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त)
२०.श्रुति प्रकाशन
२३.गजेन्द्र ठाकुर इ‍डेक्स
 २४. नेना भुटका
२५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट
२६. Videha Radio
२७. Join official Videha facebook group.
२८. विदेह मैथिली नाट्य उत्सव
२९.समदिया
३०. मैथिली फिल्म्स
३१.अनचिन्हार आखर
३२. मैथिली हाइकू
http://maithili-haiku.blogspot.com/
३३. मानक मैथिली
http://manak-maithili.blogspot.com/
३४. विहनि कथा
http://vihanikatha.blogspot.in/
३५. मैथिली कविता
http://maithili-kavita.blogspot.in/
३६. मैथिली कथा
http://maithili-katha.blogspot.in/
३७.मैथिली समालोचना
http://maithili-samalochna.blogspot.in/



 
महत्त्वपूर्ण सूचना: The Maithili pdf books are AVAILABLE FOR free PDF DOWNLOAD AT

https://sites.google.com/a/videha.com/videha/
http://videha123.wordpress.com/
http://videha123.wordpress.com/about/
           
विदेह:सदेह:१: २: ३: ४::::::१० "विदेह"क प्रिंट संस्करण: विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित।
सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर।
Details for purchase available at publishers's (print-version) site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com
 विदेह
मैथिली साहित्य आन्दोलन

(c)२००४-१३. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा, राम वि‍लास साहु आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डा. जया वर्मा आ डा. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल।

रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ ऐमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
(c) 2004-13 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.com पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.htmlभालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर  ई प्रकाशित होइत अछि। आब भालसरिक गाछ जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA

                                                      सिद्धिरस्तु 





[1] भोजमे परसैबला
[2] भोज काज
[3] खसरासँ लऽ कऽ बड़की गोटी धरि
[4] खसरा
[5] चेचक
[6] बाघो आ आदमीओकेँ

No comments:

Post a Comment

"विदेह" प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका http://www.videha.co.in/:-
सम्पादक/ लेखककेँ अपन रचनात्मक सुझाव आ टीका-टिप्पणीसँ अवगत कराऊ, जेना:-
1. रचना/ प्रस्तुतिमे की तथ्यगत कमी अछि:- (स्पष्ट करैत लिखू)|
2. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो सम्पादकीय परिमार्जन आवश्यक अछि: (सङ्केत दिअ)|
3. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो भाषागत, तकनीकी वा टंकन सम्बन्धी अस्पष्टता अछि: (निर्दिष्ट करू कतए-कतए आ कोन पाँतीमे वा कोन ठाम)|
4. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो आर त्रुटि भेटल ।
5. रचना/ प्रस्तुतिपर अहाँक कोनो आर सुझाव ।
6. रचना/ प्रस्तुतिक उज्जवल पक्ष/ विशेषता|
7. रचना प्रस्तुतिक शास्त्रीय समीक्षा।

अपन टीका-टिप्पणीमे रचना आ रचनाकार/ प्रस्तुतकर्ताक नाम अवश्य लिखी, से आग्रह, जाहिसँ हुनका लोकनिकेँ त्वरित संदेश प्रेषण कएल जा सकय। अहाँ अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर सेहो पठा सकैत छी।

"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
मुदा ई तँ मात्र प्रारम्भ अछि।
अपन टीका-टिप्पणी एतए पोस्ट करू वा अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ।

'विदेह' २२५ म अंक ०१ मई २०१७ (वर्ष १० मास ११३ अंक २२५)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. १. राजदेव मण्‍डल -  दूटा बीहैन क था २. रबीन्‍द्र नारायण मिश...