Sunday, March 02, 2014

'विदेह' १५० म अंक १५ मार्च २०१४ (वर्ष ७ मास ७५ अंक १५०)

                     ISSN 2229-547X VIDEHA
'विदेह' १५० म अंक १५ मार्च २०१४ (वर्ष ७ मास ७५ अंक १५०)pastedGraphic.png pastedGraphic_1.png

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ज्योतिरीश्वर पूर्व महाकवि विद्यापति। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र
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गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू
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संपादकीय
मिथिला यूनिवर्सिटी आकाशवाणी दरभंगा आ साहित्य अकादेमी मे जे भऽ रहल अछि सएह "मैथिल ब्राह्मण मात्र लेल मिथिला राज्य" मांगैबलाक मिथिला राज्यमे हएत, से जे शंका लोककेँ छै से असत्य नै छै।
साहित्य अकादेमी मैथिलीक पतन लेल जे काज केलक अछि आ कऽ रहल अछि तकरा मौन आ मुखर सम्बोधन केनिहारक संख्या आंगुर पर गानल जा सकैत अछि। "सगर राति दीप जरए" समानान्तर परम्पराक बौस्तु रहए तकर प्रयास हेबाक चाही, साहित्य अकादेमी पोषित मुख्यधारा लग ने लेखक छै आ ने पाठक आ ने प्रतिभा। ओकर इतिहास लेखन मे एहेन एहेन लोक आ पोथीक वर्णन भेटत जकर अस्तित्व नै छलै, से मूल धारा अपन इतिहास लेखनमे कोनो गनती करबा लेल स्वतंत्र अछि । राधाकृष्ण चौधरी आ सुभाष चन्द्र यादवक संग कएल छ्लक विरोध ओइ धारामे नै भेलै, कारण ओ "स्टेटस को" समर्थित लोकक संगठन छिऐ। साहित्य अकादेमीक गोष्ठी मूल धाराक लेल सगर रातिक गोष्ठी भऽ सकैए समानान्तर धाराक लेल नै।

शिव कुमार झा "टिल्लू"क "अंशु" आ बेचन ठाकुर जी क नाटक "ऊंच-नीच" ८१म सगर राति दीप जरय कथा गोष्ठीक आयोजन देवघरमे लोकार्पित हएत जे ब्राह्मणवादी समीक्षा आ रंगमंचपर अन्तिम मारक प्रहार हएत।
मैथिली आ मिथिलासँ प्रेम करैबला अधिसंख्यक समानान्तर परम्परा सम्बन्धी वर्ग "गरिखर" मुख्यधाराक डरे साहित्य अकादेमी गोष्ठीकेँ "सगर राति दीप जरए" केर मान्यता नै दऽ सकत।

मैथिलीक मूल "गरिखर" परम्परा मे २० टा लेखक छै आ पाठक एक्कोटा नै, ई बीस गोटा बीस ग्रुपमे विभक्त अछिो, सभ आपसमे कुकुड़ कटाउझ करैत रहैत अछि, मुदा विदेहक विरोधमे एक भऽ जाइत अछि आ साहित्य अकादेमीक पक्षमे भऽ जाइत अछि।
"सगर राति दीप जरय" यएह एकटा संस्था छै जतऽ नन्दविलास राय सेहो जा सकै छथि आ जगदीश प्रसाद मण्डल सेहो। गुआहाटीक विद्यापति पर्व मे "मैथिल ब्राह्मण मात्र लेल मिथिला राज्य आ मैथिली भाषा" मांगैबला ब्राह्म्णवादी सभ जइ तरहें जगदीश प्रसाद मण्डल जीकेँ मुख्य अतिथि बनेबा पर निर्लज्जतापूर्ण हंगामा केने रहथि, वा दरभंगाक विद्यापति पर्व मे "नन्द विलास राय"केँ कवि सम्मेलनमे भाग नै लेबऽ देल गेल रहन्हि ई कहि कऽ जे के अहाँकेँ पोस्टकार्ड लिखि कऽ बजेने रहए!!!
जँ समानान्तर परम्परा साहित्य अकादेमी गोष्ठीकेँ मान्यता नै दऽ रहल अछि तँ ऐ सँ मिथिलापर ई कलंक तँ दूर भेबे कएल जे हम सभ "स्टेटस कोइस्ट " छी, आब अधिसंख्यक वर्ग ओइ कुकृत्यसँ अपनाकेँ दूर राखऽ चाहैए।
मैथिली साहित्य आ इतिहास दू खण्डमे बँटि गेल अछि। लोक जेना गांधीजीक विरोध कऽ महान बनऽ चाहैए तहिना विदेहक विरोध कऽ कए सेहो।

साहित्य अकादेमीक गोष्ठीकेँ "सगर राति दीप जरए" केर मान्यता भेटै ओइ लेल कमलेश झा सन "कम्यूनिस्ट" आ ढेर रास "मैथिल ब्राह्मण मात्र लेल मिथिला राज्य आ मैथिली भाषा" मांगैबला ब्राह्म्णवादी (कम्यूनिस्ट ब्राह्मणवादी सेहो) अपस्यांत छथि। मुदा समानान्तर धाराक इतिहास लेखन मे साहित्य अकादेमीक गोष्ठीकेँ "सगर राति दीप जरए" केर मान्यता नै देल जा सकत। मूल धाराक इतिहास लेखन मे ओ साहित्य अकादेमीक गोष्ठी लेल संख्यामे "एक" नै "अनेक" संख्याक वृद्धि कऽ सकै छथि|

सुभाष चन्द्र यादवक "बनैत-बिगड़ैत", साहित्य अकादेमी आ ओकर पुरस्कार: साहित्य अकादेमीकेँ सुभाष चन्द्र यादवसँ भतबड़ी छै। मनुक्खक मनुक्खसँ भतबड़ी होइ छै, मुदा जखन कोनो संस्थाक मैथिली विभाग कोनो मनुक्खक खास संकीर्ण वर्गक कब्जामे चलि जाइ छै तखन ओ संस्था सेहो मनुक्खे संग व्यवहार करऽ लगै छै। पछिला बेर नचिकेताक "नो एण्ट्री: मा प्रविश" क अन्तिम बेर छलै आ ऐ बेर सुभाष चन्द्र यादवक "बनैत-बिगड़ैत"क अन्तिम बेर। ऐ पोथीकेँ आब साहित्य अकादेमी पुरस्कार नै देल जा सकतै। कारण एकटा संस्थाकेँ एकटा पोथीसँ भतबड़ी भेल छै। मूल परम्परा सुखाएल इनारक बेंग छी जकर मृत्यु आसन्न छै। ने ऐसँ "नो एण्ट्री: मा प्रविश" क आ नहिये "बनैत-बिगड़ैत"क महत्व साहित्यिक रूपसँ कम हेतै। मिथिला राज्यक ढोंगी आडम्बरी नेता सभक लेल ओना ई खुशीक विषय थिक मुदा समानान्तर परम्परा लेल ई एकटा चेतौनी छी। की मिथिला राज्य सेहो समानान्तर परम्परासँ भतबड़ी करतै? की ओकरो स्वरूप साहित्ये अकादेमी सन रहतै? मिथिला राज्यक आडम्बरी सभकेँ ई उत्तर देबऽ पड़तै आ नै तँ ओकरो स्थिति सुखाएल इनारक बेंग सन हेतै!!!
 

मिथिला राज्यक लेल जँ अहाँकेँ क्यो धरणा दैत, सभा करैत देखाथि तँ हुनकासँ ई अवश्य पूछू जे "मिथिला यूनिवर्सिटी" "आकाशवाणी दरभंगा" आ "साहित्य अकादेमी" मे जे भऽ रहल अछि सएह "मैथिल ब्राह्मण मात्र लेल मिथिला राज्य" मांगैबलाक मिथिला राज्यमे हएत, से जे शंका सभकेँ छै से की असत्य नै छै, आ ऐ ल्रेल मिथिला राज्य आन्दोलन कर्मी कहियासँ साहित्य अकादेमीक संयोजिका आ मेम्बर सभक घरक सोझाँमे आमरण अनशन करबाक घोषणा कऽ अपन प्रतिबद्धताक प्रमाण उपलब्ध करेता।

पटना,दिल्ली आ दरभंगा मे प्राथमिक शिक्षा मे आ दूरस्थ रूपेँ मैथिलीक पाठन लेल अनशन केनिहार सभ एकटा पैघ षडयंत्रक हिस्सा भ' सकै छथि, मैथिलीक सिलेबस मे भ' रहल अन्यायक प्रति हिनकर सभक चुप्पी सएह सिद्ध करैए। मैथिलीक सिलेबसमे वएह जमीन्दारक जीवनी आ चारिटा परिवारक स्तरहीन ब्राह्मणवादी कथा-कविता-नाटक देल जाइत रहतै, ओइ भूपसभ लेल अनशन केलासँ मैथिलीकेँ भऽ रहल हर्जा आर बढ़बे करतै। मैथिलीक जातिवादी सिलेबसक खिलाफ अनशन मात्रसँ मिथिला राज्यक ब्राह्मणवादी आन्दोलनी सभक कलंक मेटा सकै छन्हि। पटना, दिल्ली आ दरभंगा मे प्राथमिक शिक्षा मे आ दूरस्थ रूपेँ मैथिलीक पाठन लेल अनशन केनिहार सभक कार्यकलाप जाधरि स्प्ष्ट नै भ' जाए, ओ सभ मूल धाराक एजेण्ट छथि सएह बुझबाक चाही,आ हुनका सभक प्रति ओही तरहक व्यवहार हेबाक चाही।
हकार
८१म सगर राति दीप जरय कथा गोष्ठीक आयोजन देवघरमे २२ मार्च २०१४ शनि दिन भऽ रहल अछि। ई आयोजन देवघरमे बमपास टाउन स्थित "बिजली कोठी" नम्बर ३ मे संध्या ५ बजे सँ २२ मार्च २०१४ केँ शुरू भऽ कऽ २३ मार्चक भोर धरि हएत। अहाँ सभ कथाकार लोकनि सादर आमंत्रित छी- अायोजक-अोम प्रकाश झा
पहिल सगर राति जकरा सगर विश्वमे लाइव प्रसारित कएल जाएत।
लिंक अछि:

झंझ-मंझ:
Arvind Thakur
हम आएब ! अवश्य आएब ! 81/82 क चक्करक बादो आएब !

 
Like · · Share · February 8 at 11:05am
Umesh Mandal, रवि भूषण पाठक and 2 others like this.

 
Gajendra Thakur kono 81-82 ka chakkar nai chhai. ee 81 m chhiyai, sahitya akademi goshthi ke sagar raatik manyata nai del jaa sakat.
February 8 at 9:54pm · Like · 2

 
Shyam Darihare EE manyata debak adhikar kon sanstha wa vyakti ke chani. Anere ekta neek andolan ke duri karbak prayas band kayal jaybak chahi. sagar rati deep jaryak madhyame apan rajniti karab nindniy thik.
19 hours ago · Like

 
Gajendra Thakur श्याम दरिहरे जी। सगर राति दीप जरयकेँ साहित्य अकादेमीक बंधक बनेबाक कोनो प्रयास बा ओइ प्रयासक समर्थन क्षम्य नै छै। सगर रातिक माध्यमसँ जे राजनीति कएल जा रहल छल ओकरा ध्वस्त क' देल गेल अछि। सुपौल सगर रातिमे जातिवादी स्वरकेँ रमानन्द झा रमण जी द्वारा देल मौन समर्थनक बाद सगर राति ओरहा मे रमानन्द झा रमण जी द्वारा जे जातिवादी स्वर उठाएल गेल रहै जे ओ श्रोत्रिय रहलाक बादो पासवान ऐठाम जा क' हुनका आ सगर राति पर अहसान केलनि ई सभ गप सगर रातिमे असहनीय अछि।
19 hours ago · Like

 
Shyam Darihare Sagar rati deep jaraya kahiyo kakro badhak wa gulam ne chhalaik aa ne kakaro satta chhaik je ee kay sakat. Maithilik je sthiti chhaik tahi me ehan vivad uthayab ghaatak chhaik. jani bujhi kay kichhu lok ehi aandolan ke hathiyabay aa prachar payba lel apsyant chhathi. sagar raati deep jaray jahina chhaik tahina rahay del jay. Rajniti tuarat band ho. Badhiya likhbak badla rajniti karab nindniy thik.
19 hours ago · Like

 
Gajendra Thakur श्याम दरिहरे जी। चारि गोटे मिलि क' एक दोसराक कथाक बाहबाही करै छला, मात्र एक्के जातिक ई गोष्ठी छलै, क्वालिटीक ओत' अभाव छलै आ ओ राजनीतिक अखारा छल, सर्वहारा वर्ग एकरासँ दूर रहै,नव कथाकार नै जुड़ि रहल छला, किछु गोटे एकरा हथियेने छला, आ सएह सभ आब कब्जा छुटला पर हाक्रोश क' रहल छथि; यएह एकर स्वरूप रहै, एकर स्वरूप ओहिना रह' देल जाइ से अहाँक इच्छा अछि? मैथिली आगाँ बढ़ए आ ओकरा पर लागल जातिवादी कलंक दूर होइ ओइ सँ अहाँक कोनो सरोकार नै। सभ जाति सभ क्षेत्रक लोक मैथिलीसँ आ सगर राति सँ जुड़ि रहल छथि, ओइसँ अहाँकेँ प्रसन्नता नै अछि? आन्दोलन केँ राजनीति आ राजनीतिकेँ आन्दोलन कहिया धरि अहाँ बुझैत रहबै?
19 hours ago · Like

 
Shyam Darihare sagar rati deep jaray ne rajnitik manch chhaik aa ne sarkari rahat kendra. Je neek likhat takar naam hetaik. Neek rachnak prashansa hetaik. Ehi me jativad, sarvhara aadi shabdavalik prayog vaih lok kay sakait achhi jakra rachana karm sa nahi apitu matra rajniti sa matlab hoik. Kharab rachnak yadi keo godhiyanbadak adhar par wah wahi kartaik t se prabudh pathak swikar nahi kartaik. Ehi me jatik kon sawal chhaik. sawal matr rachanak gunvatta chhaik. Anere aamil pibak kono jarurati nahi. Jati aa sarvhara shabd aanika ahan lekhan kary me seho aarakshanvadi rajniti aani rahal chhi. Bhashak ehan seva lel badhai.Yadi kono truti ehi me chhaik t okar samadhan hobak chahi muda mathdukhi chhorabay lel aatmhatya ghor anuchit achhi. Hamra kon chij say sarokar achhi takar chinta me aahan kiyak parait chhi. Rajniti aa andolan me antar bujhbak hamara aahan atek abgati nahi achhi se t aab nahiye achhi.
18 hours ago · Like

 
Gajendra Thakur सगर राति दीप जरय राजनीतिक मंच नै छै, आ नहिये सरकारी राहत केन्द्र; मुदा साहित्य अकादेमी राजनीतिक मंच बनि गेल छै आ मैथिल ब्राह्मणक किछु कट्टर तत्त्व जकर रचनामे कोनो जान नै छै तकरा साहित्य अकादेमी राहत सेहो प्रदान करैए। आ जे ओइ साहित्य अकादेमी आदि सरकारी संस्थासँ बिनु रचनाक श्रेष्ठाक राहत लेबा लेल लालायिय छथि ओ जाति आधार पर सगर रातिकेँ ओकर बंधक बनब' चाहै छथि। सर्वहारा आ जाति शब्दक चर्चा साहित्यमे नै हेबाक चाही ई सुनैत सुनैत हमर कान पाकि गेल अछि। जकर रचनामे जान नै होइ छै, जकरा पाठक नै छै, गोधिया बना क' जे सड़ल पाकल रचनापर प्रशंसा पेबाक आदति धेने अछि, तकरा आन्दोलन राजनीति बुझेतै, जे सुखाएल इनारक बेंग छथि, हुनका मैथिली केँ पाठक भेटने सभसँ बेशी कष्ट छन्हि, कारण गोधियाँ सभपर पाठक हँसि रहल छन्हि। मात्रक एक जातिक (मैथिल ब्राह्मणक किछु कट्टर तथाकथित साहित्यकारक) आरक्षण जाधरि मैथिली लेल छलै (साहित्य अकादेमीमे अखनो धरि छै) तकर पक्षमे आ तकरा हाथे सगर रातिकेँ बेचबापर बिर्त लोक जखन "लेखनमे आरक्षण" क विरोध करै छथि तँ अपन तर्कक घुरछीमे अपने फँसि जाइ छथि, हुनका अपन जातिक सड़ल पाकल साहित्य श्रेष्ठ लगै छन्हि आ तकर विरोधकेँ ओ "मथदुक्खी छोड़ाबए लेल आत्महत्या" कहै छथि, आ जँ सत्य सोझाँ आनल जाए तँ तइपर अपन "आमिल पीबि क'" बजबाकेँ ओ दोसराक आमिल पीब कहै छथि। आ त्रुटि लेल समाधान लेल अहाँ हुनकर पएर पकड़ू, कारण मैथिलीकेँ ओ लोकनि मारि क' सुखाएल इनार रूपी साम्राज्यक मठाधीश बनल छथि, आ भाषाक तइ रूपेँ सेवा केलाक लेल ओ बधाइ सेहो चाहै छथि!! अहाँकेँ कोन चीजक सरोकार अछि से स्पष्ट अछि, आ कोन चीजक अवगति सेहो स्पष्ट अछि।
18 hours ago · Like · 1

 
Shyam Darihare Shyam Darihare Aahank aakrosh bharal bhasha say bujhait achi je aahan kono vyaktigat karne sahitya akadmik virudh jhanda uthene chhi. Se hamra nahi bujhal chhal aane bujhay chahait chhi. Ham baat matr Sagar rati deep jaryak kay rahal chhi. Aahan bat ke sahitya akadmi dis lay ja rahl chhi. Aahan hamara bich kono prichay seho nahi achhi tain binu janane vyaktigat tippani sa bachbak chahi. Takhan ekta baat kahab je ankar dalaan chhinikay hathiya kay chichiyabay sa badhiya je apana butta sa swayngak ekta nishkalank, aa jati varg vihin dalaanak nirman kay ohi par taal thoki se besi purusharthak baat. Hamra sa kono mathadhish galat thapri pitba let se sattha ehi duniya me kakro nahi chhaik. Ehan kono mathadhish ekhan dhari janam nahi lelkaiak achhi. Aahan ke katahu abharay t suchit karb. kono lobh lalach lel bhashai rajniti karybala lok Darihare lag thadh hobak pahine seho ek say ber sochat kiyak t hamara janayvala keo ehan himmat nahi karat. Aa agar karat t ..... Binu kono parichayak etek baat apne sunaol se dhanyvaad.
17 hours ago · Like

 
Gajendra Thakur अहाँकेँ बुझाइत अछि बा अहाँ सएह बुझ' चाहै छी, आ से अहाँ किए बुझ' चाहै छी से स्पष्ट अछि। अहाँकेँ अपन भाषा आक्रोशित नै बुझाइए, आ दोसराक तर्क किए आक्रोश बुझाइए सेहो स्पष्ट अछि। हम सगर राति दीप जरय क गप क' रहल छी, आ कारण सुनेलौं जे अहाँ बा कियो साहित्य अकादेमीक गोष्ठीकेँ सगर राति कोन कारणसँ बनाब' चाहै छथि, मैथिली केँ पाठक भेटलै, ओ एक जातिक घुरछीसँ बाहर निकललै, ओकर स्तर भारत आ नेपालक आन भाषाक साहित्यक समक्ष एलै, तँ ऐ सँ अहाँकेँ खुशी किए नै अछि? अहाँसँ हमरा व्यक्तिगत परिचय नै अछि आ कएक बिलियनक विश्वमे सभक सभसँ परिचय संभव नै छै तैयो अहाँ व्यक्तिगत टिप्पणी करै छी आ से आरोप दोसरा पर किए लगबै छी, सेहो स्पष्ट छै। सगर राति किछु गोटेक दलान रहै, ई स्वीकारोक्ति अहाँक विषयमे बहुत किछु कहि जाइए, आ अहाँ किए चिचिया रहल छी तकरो विषयमे टिप्पणी करैए। अहाँसँ कोनो मठाधीश थोपरी नै पिटबा रहल अछि,लोभ लालच बला अहाँ सँ सटि नै सकैए, आ जँ से सटत तँ तकरा अहाँ गरदा छोड़ा देबै; मुदा तखन अहाँ ई किए क' रहल छी। एकर कारण ई तँ नै अछि जे ओकर सभक सोच आ आइडियोलोजी अहाँक आइडियोलोजी सँ मेल खाइत अछि, आ जे से अछि तँ अहाँक ई स्वीकारोक्ति दुखद अछि आ ओइ आइडियोलोजीसँ हमर मतभिन्नता आजन्म रहत।
  • Gangesh Gunjan प्रिय गजेन्द्र जी!
    'उचितवक्ता ' के एक बेर फेर बाज' पड़ि गेल । माफी चाही।
    अहाँक आदर हम अहाँक मिथिलाँचल-हित साधक युगीन संस्थापना कार्यक लेल करैत छी।
    से अहीं, आ मात्र अहीं टा कएल अछि।अहाँक एहि कृति-लेख कें, चाहियो क' क्यो,
    कोनो तुच्छ तर्क बा तथाकथित मिथिलाँचल हितैषी-प्रेमी लेख लिखि क' मेटा नहि
    सकैत छथि। से निर्विवाद । से किनको बुतें अहाँ सँ पैघ काज कैये क' संभव हेतनि।
    तेँ अहाँ सँ एखनो हमर उमीद नै खत्म भेलय । अपन ताही अग्रज-स्नेहाधिकार सँ
    आग्रह करैत छी जे एहन सृजन हीन,अनुर्वर विषय ल' क' विवाद अहाँक वास्तविक
    योगदानक क्षमता-प्रतिभाक बेकार मे क्षय क' रहल अछि।तकर मात्सर्य अछि हमरा।अहाँ
    मैथिली आ मिथिलाँचलक " श्रेष्ठ आ कालान्तर जीवी " कार्य करबा लेल आएल छी। तेँ।
    एहि सम्पूर्ण विवाद पर हम शायर मोमिनक एक टा अपन अति प्रिय शे-ए-र कहैत अपन
    इच्छा व्यक्त करै छी-
    "मर चुक कि कहीं तू ग़मे हिज्राँ से छूट जाए / कह्ते तो हैं भले की वो लेकिन
    बुरी तरह।" बेशी लोक उचितो बात केँ नितान्त अरुचिकर वाणी आ तेवर मे करबाक
    अभ्यासी होइत छथि। हमरा जनैत एही मे मुख्य मुद्दा हेरा जाइ छैक।तेँ
    फेर वैह -"बात जँचय हमर तं हमरा संतोष । अन्यथा मोन सँ निष्काशित क' देब ।"
    सस्नेह,

    2014-03-14 11:07 GMT+05:30 Gajendra Thakur <
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Gajendra Thakur गंगेश गुंजन जी। गारिक डरे भागलासँ सृजनहीन, प्रतिभाहीन लोकक वर्चस्व फेरसँ काएम भऽ जेतै।

 

विदेह भाषा सम्मान २०१३-१४ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कार)
२०१३ बाल साहित्य पुरस्कार  श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरी- “देवीजी” (बाल निबन्ध संग्रह) लेल।
२०१३ मूल पुरस्कार - श्री बेचन ठाकुरकेँ "बेटीक अपमान आ छीनरदेवी" (नाटक संग्रह) लेल।
२०१३ युवा पुरस्कार- श्री उमेश मण्डलकेँ “निश्तुकी” (कविता संग्रह)लेल।

२०१४ अनुवाद पुरस्कार- श्री विनीत उत्पलकेँ “मोहनदास” (हिन्दी उपन्यास श्री उदय प्रकाश)क मैथिली अनुवाद लेल।



(विदेह ई पत्रिकाकेँ ५ जुलाइ २००४ सँ
 अखन धरि ११९ देशक १,६२६ ठामसँ ८५,६२२ गोटे द्वारा ४३,६३१ विभिन्न आइ.एस.पी. सँ ३,७४,६०६ बेर देखल गेल अछि; धन्यवाद पाठकगण। - गूगल एनेलेटिक्स डेटा।)

ऐ रचनापर अपन मंतव्य
 ggajendra@videha.com पर पठाउ।
pastedGraphic_30.pngगजेन्द्र ठाकुर


  

  




pastedGraphic_9.pngआशीष अनचिन्हार तीन टा बिन्दु
तीन टा बिंदु

भाषा केर मनोविज्ञान भाग-1

जखन केओ कहै छै जे "मैथिली मधुर भाषा थिक" तखन हमरा ओहिसँ बेसी बड़का गारि किछु नै बुझाइत अछि। कोनो भाषा मधुर वा खटगर वा नुनगर की तेलगर होइते नै छै। आ जँ मधुर होइ छै तँ किएक?
ऐ प्रश्नपर एबाक लेल बड़ साहस चाही।
मध्यकालीन मिथिला सामंती छल। सामंत बैसल की चमचा सभ घेरि अपन समस्या सुनबए लागैत छलाह। आ जखन केकरो अहाँ अपन समस्या सुनेबै वा की केकरो चमचइ करबै तखन भाषा तँ मधुर राखहे पड़त। हमरा जनैत मैथिली अहीठाम मधुर भाषा थिक। कारण मैथिल चमचइ कर'मे बहादुर होइ छथि। मधुर बोल तँ राखहे पड़तन्हि।

ठीक विपरीत मिथिलाक दलित ओ गैर-सवर्णक भाषामे चमचइ नै छै तँए ओहिमे टाँस बेसी बुझि पड़ै छै आ ब्राम्हण-कायस्थ सभ ओकरा रड़बोली कहै छथि।मुदा हमरा जनैत ई मात्र दृष्टिगत भेद अछि। जकरा अपन बाँहिपर विश्वास छै ओकर बोली ओ भाषामे टाँस रहबे करतै--जेना मिथिलाक दलित वर्गक मैथिली।आ जे चमचइमे लागल रहत तकर बोली ओ भाषामे मधुरता रहबे करतै--जेना मिथिलाक ब्राम्हण ओ कायस्थ वर्गक मैथिली।

भाषा केर मनोविज्ञान भाग-2

ई हम दू मिनट लेल मानि लै छी जे ब्राम्हण-कायस्थ महातेजस्वी होइ छथि तँ हुनके टा पुरस्कार भेटबाक चाही। मुदा की ब्राम्हण-कायस्थ दरभंगे-मधुबनी-सहरसामे छै वा मिथिला मने की दरभंगे-मधुबनी-सहरसा छै। ऐ समस्यापर जखन हम दृष्टिपात करै छी एना बुझाइए----

१) जेना-जेना दरभंगा-मधुबनी-सहरसाक क्षेत्र खत्म होइत जाइए तेना-तेना ब्राम्हण-कायस्थ ओ आन छोट जातिक भाषाक बीच अंतर खत्म होइत जाइए (१००मे ९७टा केसमे)। चाहे ओ सीतामढ़ी हो की मुज्फफरपुर हो की पूर्णिया हो की भागलपुर हो की समस्तीपुर हो की बेगूसराय हो की चंपारणक किछु क्षेत्र (झारखंडक क्षेत्र बला लेल एहने बुझू, राजनैतिक बाध्यताकेँ देखैत नेपालीय मैथिलीक उल्लेख नै क' रहल छी)। 

२) जेना-जेना ब्राम्हण-कायस्थओ छोट जातिक भाषाक बीच अंतर खत्म होइत गेलै ब्राम्हणवादी सभ ओकरा मैथिली मानबासँ अस्वीकार क' देलक। ऐ कट्टर ब्राम्हणवादी सभहँक नजरिमे ई छलै जे भाषाक भेदसँ ब्राम्हण वा छोट जातिमे भेद छै। आजुक समयमे अंगिका ओ बज्जिका भाषाक जन्म ब्राम्हणवादक एही प्रवृतिसँ भेल अछि। किछु दिन पहिने नरेन्द्र मोदी द्वारा मुज्फफरपुरमे भोजपुरीमे भाषण देब एही ब्राम्हणवादक विरोध अछि आ हम एकर स्वागत करै छी तथा ओहि दिनक बाट जोहि रहल छी जहिया ओ दरभंगा-मधुबनीमे भोजपुरी बजता। जँ ठोस विचारक रूपमे आबी तँ निश्चित रूपें कहि सकै छी जे मैथिलीकेँ तोड़बामे ई ब्राम्हणवादी सभ १०० प्रतिशत भूमिका निमाहला। जँ कदाचित् ई ब्राम्हणवादी सभ दरभंगा-मधुबनी-सहरसासँ हटि क' सीतामढ़ी, मुज्जफपरपुर, पूर्णिया,भागलपुरक,चंपारण आदिक ब्राम्हण-कायस्थकेँ पुरस्कार देने रहितथि तँ कमसँ कम मैथिली टुटबासँ बचि गेल रहैत। ई अकारण नै अछि जे रामदेव झा,चंद्रनाथ मिश्र अमर, सुरेश्वर झा आदि एहन महान ब्राम्हणवादीक कारणे दरभंगा रेडियो स्टेशनसँ बज्जिकामे कार्यक्रम शुरू भेल।

३) आ जँ मैथिली टुटबासँ बचि गेल रहितै तखन मिथिला राज्य लेल एतेक मेहनति नै कर' पड़ितै। कारण चंपारणसँ गोड्डा धरि सभ अपन भाषाकेँ मैथिली बुझितै। ऐ ठाम हम ई जोर द' क' कहब चाहब जे पुरान होथि की नव राज्य आंदोलनी सभ सेहो ब्राम्हणवादी छथि। अन्यथा ओ सभ सेहो रामदेव झा. चंद्रनाथ मिश्र अमर, सुरेश्वर झा आकी आन-आन मैथिली विघटनकारी सभहँक विरोध करतथि।

आखिर की कारण छै जे धनाकुर ठाकुर अपन मानचित्रमे चंपारण वा गोड्डाकेँ तँ लै छथि मुदा ओहि क्षेत्रक साहित्यकार लेल पुरस्कारक माँग नै करै छथि। ई प्रश्न मात्र धनाकुरे ठाकुरसँ नै आन सभ राज्य आंदोलनीसँ अछि।
ऐठाम ई बिसरि जाउ जे पुरस्कार कोनो छोट जातिकेँ देबाक छै। जँ ब्राम्हणे-कायस्थकेँ देबाक छल तखन फेर सीतामढ़ी, मुज्जफपरपुर, पूर्णिया,भागलपुरक,चंपारण आदिक ब्राम्हण-कायस्थकेँ किएक नै ?

तँ आब ई देखबाक अछि जे के-के मिथिला राज्य आंदोलनी ब्राम्हणवादी छथि आ के-के साँच मोनसँ मिथिला राज्यकेँ चाहै छथि।

भाषा केर मनोविज्ञान भाग-3

लोक जखने ब्राम्हणवादक नाम सुनै छथि हुनका बुझाइत छनि जे सभ ब्राम्हणकेँ कहल जाइत छै। मुदा हमरा लोकनि बहुत पहिनेसँ कहैत आबि रहल छी जे ब्राम्हण आ ब्राम्हणवादक कोनो सम्बन्ध नै। कोनो चमार सेहो ब्राम्हणवादी भ' सकै छथि। ब्राम्हणवाद जाति विशेष नै भेल ई मात्र मानसिकता भेल जे कोनो जातिमे भ' सकैए। ब्राम्हणवादक प्रमुख तत्व वा लक्षण एना अछि---

१) केकरो आगू नै बढ़' देब------ एकटा छलाह स्व. रमानाथ मिश्र "मिहिर"। ई नीक हास्य-व्यंग केर कविता लीखै छलाह। मुदा ई मैथिली साहित्यमे आगू नै बढ़ि सकला। कारण? कारण हिनक दोख छलनि जे ई चंद्रनाथ मिश्र " अमर" जीक भातिज छलखिन्ह। दालि आ देयाद जते गलत तते नीक। साहित्यक स्तरसँ ल' क' पारिवारिक स्तरपर रमानाथ मिश्रजीकेँ पददलित होम' पड़लनि।

ब्राम्हणवाद मात्र दलिते लेल नै छै। बहुत रास ब्राम्हण अपनो जाति केर लोककेँ आगू नै बढ़' दैत छै। 

२) मात्र अपने टाकेँ नीक बुझब--- जँ साहित्य अकादेमीक लिस्ट बला झा-झा सभ प्रतिभावान छथि तँ फेर मैथिली साहित्य विश्वक छोड़ू भारतीय साहित्य केर समकक्ष किएक नै अछि। आ जँ प्रतिभे छै तखन तँ श्री विलट पासवान "विहंगम" भारतीय राजनीतिसँ ल' क' मैथिली साहित्य धरि योगदान देने छथि। की विहंगम जी प्रतिभाहीन छथि। विहंगम जी सन-सन आर बहुत बेसी नाम अछि।

३) परिवारवाद---- रामदेव झा जखन रिटायर भेलाह तँ साहित्य अकादेमीमे ओ अपन ससुर चंद्रनाथ मिश्र अमरकेँ बैसा देलाह। तकर बाद अमर जी अपन समधि विद्यानाथ झा विदितकेँ बैसेलाह। आब विदितजीक निकट संबंधी (चेलाइन) छथि।

कारण-- ब्राम्हणवादक एकमात्र कारण हीन भावना अछि।


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pastedGraphic_31.pngजगदीश प्रसाद मण्‍डलक पाँचटा लघुकथा-



वारंट


बोरिंग-दमकलक कर्ज चुकौला पछातिओ हरिहर काकाकेँ केसक वारंट भऽ गेलनि‍। ओना वारंटसँ घबड़ेला नै मुदा एते शंका तँ आबिए गेलनि‍ जे रंग-बि‍रंगक चेहराक बीच जीनाइओ तँ असान नहियेँ छी।
सरसठिक रौदीक पछातिक समए। सरकारोक नजरि‍मे कनी पानि‍ आएल आ रौदि‍याएल कि‍सानोक मन ठेहियाएल। अखनि धरि‍ जे वि‍चार-सोलहन्नी भाग-तकदीरक बीच जीवैत चलि‍ आबि‍ रहल छल तइमे कनी धक्का लगलै। धक्काक कारणो भेल जे गामक-गाम सून भऽ भऽ मसान जकाँ बनए लगल छल, बनबो कएल। नम्‍हरो-नम्‍हरो गाछमे सूखनि‍याँ लगि‍ गेल केते रंगक फलो आ अन्नो गामसँ लोकेक संग पड़ा गेल। माल-जालक उजाड़ भऽ गेल। खेती-पथारीक चर्चे की, जे मिथिला दार्शनिक जगह रहल ओइ मि‍थि‍लाक दुर्दिनक बीच कुदि‍न सेहो आबि‍ गेल।
बी.डी.सी. मीटिंग बि‍हानपुरमे भेल। जेना छोट आँट-पेटक मीटिंग तेना खूब जमगर भेल। गामसँ जि‍ला धरि‍क अफसर-अफसरान एकठाम चारि‍ घंटा बैसला, कम नै भेल, मुदा तैबीच चाह-पान-जलखैमे जे समए लगल हुअए तइ लगा कऽ। कलक्‍टर साहैब सभसँ सि‍रगर रहथि‍। ओना अखुनका जकाँ नवतुरि‍या नै, उमेरगर सेहो। हुनके बातक प्रतीक्षामे सभ कि‍यो। उठि‍ कऽ तोहफा बाँटए लगला। श्रीमुखसँ व्‍याख्‍यान देलखि‍न जे सौनक मेघ जकाँ सरकार लटकि‍ कऽ निच्‍चाँ आबि‍ गेल, तँए मुँहमंगा बर्खाक झड़ी लगत। इच्‍छित वस्‍तु लोककेँ भेटत। कहि‍ चारि‍ श्रेणीमे गाम बाँटि‍ देलनि‍। तीन श्रेणीक कि‍सान आ चारि‍म बोनि‍हार। बोनि‍हार लेल गाए-महिंस, रि‍क्‍शा, टमटम इत्‍यादि‍ भेटतै जइमे तीन हीसमे एक हीस सरकार देत आ दू हीस अपन लगतै। तहि‍ना सीमांत कि‍सानकेँ बोरिंग दमकल ति‍हाइ छूटपर भेटत। आ जे अढ़ाइ बीघासँ पाँच बीघाक कि‍सान छथि‍ हुनका चौथाइ छूट भेटत। कहि‍ मुस्‍कीआइत बैसि गेला। धन बर्खा हुअ लगल। सौनक सतैहिया लादि देलक। खाद छूटपर, बीआ छूटपर, खेतीक औजार छूटपर, गाए-महिंसक संग रि‍क्‍शा, टमटम, लाेडस्‍पीकर, चूड़ी दोकान तक।
नाराक संग मीटिंग समाप्‍त भेल। भोजन-भात चलल ढेकार करैत जश देत सभ सीमान टपला।
हवा जकाँ समाजमे उठल। गाम-गामक लोक ब्‍लौक दि‍स मुड़ीआरी देलक। मुदा अनभुआर माल-जाल जहिना डोरी-खुट्टा तोड़ि लंक लऽ पड़ाइए, जे गोटे-गोटे पकड़ेबो करै छै आ गोटे-गोटे बौरौ जाइते छै। खैर जे होउ, भागल चोरक भगबे नफा। तैसंग ई बात सेहो, सभ नै बूझि‍ पौलक जे आम खाइले गाछ रोपए पड़ै छै। भलहिं गाछ रोपब असान किए ने होइ मुदा आमक चुनाव कऽ माटि‍-जगहक चुनाव सेहो करए पड़ै छै, जँ से नै तँ धनखेतीक कलम जेहने जुति‍गर होइ छै तेहने हएत। व्‍याख्‍यानक क्रममे उधि‍या कऽ एते लोक भाँसि गेल जे बुझैक होशे ने रहलै जे गीता जि‍नगी छिऐ ने कि पाठ। अध्‍यात्‍म दर्शने छिऐ आकि‍ जीवन दर्शन। तहि‍ना कलक्‍टर साहैब वि‍चारकेँ सभ बुझलक जे मीटिंग समाप्‍त हेतै आ काल्हि जखने आॅफिसक कुरसीपर बैसै जाइ जेता कि‍ धाँइ-धाँइ गाममे बोरिंग-दमकलक ट्रक संग पंजबिया गाएक पथार लगि जाएत। अकास-धरतीक जे मि‍लन स्‍थल क्षि‍ति‍ज होइ छै ओ हस्‍तांतरणक होइ छै। बोरिंग-दमकल बेपारीक घरसँ जहि‍ना औत तहि‍ना पशुपालकक घरसँ पशु औत। जइ दृष्‍टिएँ मिथि‍लांचल कौड़ीओ बरबरि नै। सोलहन्नी बहरबैयाक आशा।
ब्‍लौक दि‍स गामक लोक मुड़ी उठबैत पौलक जे पहि‍ने-ब्‍लौकक रजि‍ष्‍टरमे नाओं दर्ज करबए पड़त, ओ कागत आगू बढ़ि अगि‍ला आॅफिसमे दर्ज भेला पछाति रजिष्‍टरमे औत। ओइठामसँ बैंक पठौल जाएत, तेकर पछाति‍ काजक दौड़ शुरू हएत। काजोक दौड़ तँ हल्‍लुक नहियेँ। ब्‍लौकक चक्करक संग जि‍लाक चक्कर आ तैपरसँ बैंकक चक्कर धरि‍मे दू बर्ख समए आ बि‍नु हि‍साबक खर्च जहि‍ना सभ गमौलक तहि‍ना हरि‍हर काका सेहो गमौलनि‍। मुदा तेकर मिसिओ भरि‍ चि‍न्‍ता नै भेलनि‍। चि‍न्‍तो केना होइतनि‍, जहि‍ना हजार हाथक गाछक छि‍प्‍पीपर चढ़ला पछाति‍ जँ धरतीपर खसल वा पड़ल फलपर नजरि‍ पड़ै छै, जेकरा पबैले गाछपर सँ उतरैक समैओ आ भीरो कि‍छु ने बूझि‍ पड़ै छै तहि‍ना मनमे घमौड़ लैत रहनि‍। समए आ खर्चक फल एकटा टटके जरूर भेटलनि‍ जे जहि‍ना परि‍वारमे तहि‍ना समाजमे गप-सप्‍पक क्रम बदलल। रजनी-सजनीक खि‍स्‍सामे कमी आएल, खेती-पथारी, माल-जाल इत्‍यादिक बात समाजक मंचपर आएल। छोट-मोट मीटिंग भी.एल.डब्‍लू.क माध्‍यमसँ हुअ लगल। जइसँ लोकक आकर्षण बढ़ल। बैंकक माध्‍यमसँ कर्जमे भेटत आ बैंकेक माध्‍यमसँ असुलीओ हएत। मुदा तैबीचमे जि‍ला स्‍तरपर सब्‍सिडी-आॅफिस हएत। जाबे ओ आदेश बैंककेँ नै भेटतै ताबे कटौती नै हएत, लोनक सूदि चलैत रहत। तेतबे नै छह मासक बीच जँ अदा नै करब तँ सूदिओ मुइरे पकड़ि‍ लेत।
सरसठिक सरकारक मालगुजारी माफक जबरदस असरि‍ भेल। लोकमे नव बि‍सवास जगल जे जइ मालगुजारीक चलैत खेत सभ नि‍लाम होइ छल आब नै हएत। जहि‍ना मालगुजारी देनिहार बि‍सरि‍ गेल तहि‍ना सरकारो अपन कर्मचारीकेँ समेटि दोसर फाइल दि‍स लगा लेलक। ने मालगुजारी देनिहार आ ने लेनिहार रहल। मुदा बैंकमे टटका रसीदक जरूरति‍ भेल। मालगुजारी माफ मुदा केते माफ तेकर चि‍ट्ठी आॅफिसेमे लटकि‍ गेल। जहि‍ना सबहक तहि‍ना हरि‍हरो कक्काक साल भरि‍ टहलैएमे चलि‍ गेलनि।
हरिहरो काका तँ जिद्दी, तहीले समाजमे जश-अजश सदिकाल होइते रहै छन्‍हि। जश ई होइ छन्‍हि जे काजक प्रति‍ जि‍द्दी छथि, मुदा काजे तँ उनटा-पुनटा अछि नीको आ अधलो, दुनू तँ काजे छी। जे वि‍परीतो दि‍शामे काज करबे करत। जि‍द्दी तेहेन जे रगड़ि कऽ टटका रसीद कटा बैंकसँ रूपैआक नि‍कासी कराइए लेलनि‍। पहि‍ल खेप दू सए रूपैआक चेक माइनर एरीगेशनक नाओंसँ देलकनि‍। जि‍नगीक पहि‍ल चेक देखि‍ हरि‍हर काकाकेँ नीक खुशी भेलनि‍। खुशीओ केना ने होइतनि‍, छोटके चेक ने बड़का चेक बनैए।
बैंकसँ नि‍कलि हरि‍हर काका माइनर एरीगेशनक भाँजमे वि‍दा भेला। भँजियबैत-भँजियबैत भाँज लगलनि‍। मात्र दू गोटेक आॅफिस। बोरिंग गाड़ैक ठीकेदारी। चेक जमा करि‍ते रजिष्‍टरमे दर्ज भेला पछाति ठीकेदारक नाओं कहलकनि‍ ठीकेदार तँ ठीकेदारे छी। चाहे-सरकारी हो आकि‍ गैर सरकारी ओ तँ सबहक ठीकेदार भेल। एक संग पचासो ठीकेदारी चलि‍ सकै छै, तँए ओहन लोकक भेँट तँ थोड़े कठि‍न अछि‍। ठीकेदार भेटलनि‍। भेटि‍ते पुछलखि‍न-
“ठीकेदार साहैब, कहि‍या तक काजमे हाथ लगत।”
ठीकेदारी शैलीमे ठीकेदार बजला-
“काल्हि नै परसू आउ?”
ऐ दौग-बरहामे पाँच दिन पछाति फेर भेँट भेलनि। भेँट होइते पुछलखिन-
“अहाँक भेँटो हएब कठि‍न होइए तँए एकटा निठाही दिनक नाओं कहू।”
ठीकेदार स्‍पष्‍ट कहलखि‍न-
“मात्र दूटा पलान्‍ट छै। अहाँक नम्‍बर आठम भेल। बीचक काज भेला पछाति हएत।”
हरिहरो कक्काक तीन गोटेक बैच रहनि। तीनू गोटे वि‍चारलनि‍। काज जहि‍ना अपन तहि‍ना दोसरोक। प्रतीक्षा तँ करए पड़त। पुछलखि‍न-
“केते समए लगत?”
“महिना दि‍नमे भऽ जाएत।”
मास दि‍न पछाति तीनू गोटेक संग हरि‍हरो काका ठीकेदारक खोजमे नि‍कलला तँ पता लगलनि‍ ओ वि‍धान सभा एलेक्‍शनक भाँजमे चलि‍ गेल छथि‍, छह मास पछाति‍ औता। पछुआइत काज देखि‍ सबहक धैर्जक सीमा डगमगाइत तँ रहबे करनि‍। समए बीति रहल अछि कर्जक सूदि बढ़ि‍ रहल अछि। जहि‍ना समए बेठेकान भऽ गेल तहि‍ना परि‍वारक काज सेहो बेठेकान भेने आमदनी टूटि रहल अछि। ऐसँ नीक तँ अपन खेत बेचि‍ बोरिंग करबितौं। कोन फेरामे पड़ि‍ गेल छी। अधमड़ू साँप जकाँ बनि गेल छी।
साल बीति गेल। आॅफिसक उनटा फेरि‍ भऽ गेल। जहि‍ना दुनू स्‍टाफ (अफसर-कि‍रानी) बदलि‍ गेला तहि‍ना ठीकेदारो छोड़ि‍ कऽ पुलक ठीकेदारीमे चलि‍ गेल। भाँज-भुँज लगबैत मास दि‍नक पछाति‍ फेर काजकेँ पटरीपर अनलनि‍। कारगर अफसर। काज करैक उग्र जि‍ज्ञासा। दुनू प्‍लान्‍टक भाँज लगौलनि‍। एकटा काजमे लगल दोसर माटि‍क तरमे चलि‍ गेल। भेल ई जे अंधराठाढ़ी इलाकामे लेअर बहुत नि‍च्‍चाँमे छै। साढ़े चारि‍ सए फुट बोर भेला पछाति‍ लेअर भेटलै। बोरिंग लोड भेल। लोड भेला पछाति‍ जखनि‍ क्रेसिंग पाइप उखाड़ब शुरू भेल तँ पचास फीट तरेमे सौकेट फेल कऽ गेलै। पचास फीट नि‍कलल बाँकी माटिएमे रहि‍ गेल। तहूमे तेहेन जगहपर गेल जे अफसरो बेवस भऽ गेला। कोनो सस-बस नै चललनि‍। अंतमे बेवस होइत हरि‍हर काकाकेँ कहलखि‍न-
“जँ रहि‍ गेलौं तँ जरूर बोरिंग हएत नै तँ देखि‍ते छि‍ऐ, आॅफिसक काज आइ एतए छी काल्हि‍ केतौ रहब।”
जि‍ज्ञासु हरि‍हर काका, अपन काज बि‍सरि‍ पुछलखि‍न-
“सर, एना किए अनि‍यमि‍त छै?”
अफसर-
“किए छै तेकर कोनो एक्केटा कारण छै। रंग-बिरंगक कारण छै। अनेरे कोन समुद्र उपछै भाँजमे जाएब, ओकरा छोड़ू। हेबा की‍ चाहै छेलै से कहै छी।”
ओझरीमे जहि‍ना अमती काँट, पेरासूत ओझराइ छै तहि‍ना ने मनो ओझराइ छै। तइसँ नीक हरि‍हर काका बुझलनि‍ जे जएह कहै छथि सएह नीक। पुछलखि‍न-
“की हेबा चाहै छेलै?”
“होइओक बहुत रस्‍ता छै, तँए एकटा कहब उचि‍त नै हएत मुदा सही रहने, नै सोलहन्नी तैयो उचि‍त तँ भेबे कएल।”
मानब मुड़ी डोलबैत हरि‍हर काका कहलखि‍न-
“एकरा के टोनत?”
अफसर बजला-
“सुनू, नीक होइतै, जे आॅफिसेमे कागत-कलमक करै छथि हुनका निश्चित समए, नि‍श्चित काजक भार देल जान्हि। तइ काजमे की बाधा उपस्‍थित भऽ रहलनि तेकर निश्चित समैपर देखल जान्हि।”
मुड़ी डोलबैत हरि‍हर काका बजला-
“हँ, से तँ देखिते छिऐ जे काज जेहेन होउ मुदा आॅफिसक कागत टन्‍च रहैक चाही। नै तँ दुनियाँ देखै छै जे काेसी योजना सन योजना अरबोक योजना, मुदा राज रौदि‍याएल अछि। एना जँ सराध-बि‍आह दुनू दि‍स योजना चलत तँ केते आशा।”
माइनर एरीगेशनक दौग-बरहा करैत सालक सिजिन समाप्‍त भऽ गेल। सिजिनक अर्थ भेल, जे काज माटिक छै ओ सुखारमे हएत। बरसातक समए बोरिंग गाड़ैमे असुवि‍धा होइ छै धसना खसैक डर रहै छै, नव तकनीकसँ गाड़ल जा सकैए। मुदा दुनूक बीच सामंजस केना हएत से मूल भेल। एक पक्ष बुझैए जे पाइ सरकारक छि‍ऐ, तँ दोसर पक्ष बुझैए पाइ जनताक छि‍ऐ, जेकर गेलै तेकर, हमर की। मुदा की तइसँ काज चलतै???
अगिला साल बिहानपुर, तीन बोरिंग-दमकलक संग काजक केंचुआ छोड़लक। कि‍छु गाएओ-महिंस गाम आएल। कि‍छु रि‍क्‍शा टम-टम बढ़ने सवारीक सुवि‍धा भेल। मुदा जहि‍ना कि‍छु नव उत्‍पादित हथि‍यार गाम आएल तइसँ बेसी लूटैक भूत पछुआ बनि पकड़लक। भोज-भात, बि‍आह-सराध जोर पकड़लक। बैंक कर्ज तर पड़लै। जेकरा असुलैमे शख्‍तीसँ बैंक पेश भेल जइसँ दि‍शाहीन समाज डरा गेल! कारोबार कमैत गेलै...।
बोरिंग गड़ौला पछाति सब्‍सिडी आॅफिसक काज एलनि। जि‍ला भरि‍मे एकटा आॅफिस। जेते काजक भीड़ तइसँ बेसी खेनिहारक भीड़! पहि‍ल दि‍न तीनू गोटे हरि‍हर काका हँसीए-ठठ्ठामे ओझरा, घूमि एला। दोसर दि‍न टेबुलपर जा कहलखिन-
“तीन गोटे बोरिंग-दमकल नेने छी, बाजाप्‍ता बैंकक कागत अछि‍, से सब्‍सिडीक आदेश देल जाए।”
जेना कि‍यो सुनिनिहारे नै! रंग-बिरंगक गप-सप्‍प चलैत! जहि‍ना स्‍कूलमे गल्‍ती केला पछाति वि‍द्यार्थीकेँ ब्रेंचपर ठाढ़ कऽ देल जाइ छै तहि‍ना टेबुलक आगूमे ठाढ़ कऽ देलकनि। घंटा भरिक पछाति कहलकनि-
“परसो आना।”
परसू गेला पछाति फेर परसू। ऊहो भाँज लगबैत जे कि‍नका सम्‍पर्कमे अबैए, मुदा परसू अंत नै भेल। ने आॅफिसमे दैछना देलखि‍न आ ने सब्‍सिडीक कागज आॅफिस छोड़लक।
सतासी-अठासीक भुमकम-बाढ़ि राज्‍यकेँ हि‍ला देलक। दस हजार रूपैआ बैंक लोन माफक अवाज उठल। नव सरकार बनल। लोन माफ भेल।
बैंकक अंतिम चिट्ठी जखनि हरिहर काकाकेँ पहुँचलनि तखनि केस खर्च सहित जमा कऽ देलखिन।
ओही केसक वारंट हरिहर काकाकेँ भेल छन्‍हि।

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कनियाँ-पुतरा


कमला-कमलक जन्मक उनैसम दिन। उनैसमासी कर्म केला पछाति जहि‍ना कर्ता चैनक साँस लेबो करैत आ छोड़बो करैत तहिना सुधनी दादी पोती (कमला) पोता (कमल) केँ जाँति-पीचि, पछबरिया ओसारपर कजरौटी दऽ पूब सिरहौने सुता बेटा-पुतोहुकेँ कहलखिन-
“आब अपन करमकेँ करम-धरम करह, वाड़ी-झाड़ी बिरहा गेल हएत ओकरो तकतियान नै करब तँ जीब केना?”
कहि सुधनी दादी आँगनसँ निकलि वाड़ी दिस वि‍दा भेली आकि दछिनवरिया घरक कोनचर लगपहुँचिते मनमे ठहकलनि। ठहकिते ठाढ़ भऽ गेली। ठहकलनि ई जे कहुना तँ घरमे हमहीं बूढ़ छी, मुदा सुनैत तँ यएह एलिऐ जे जँ बेटा-बेटीक जौंआ संतान हुअए तँ पहिने बेटाक जनम होइ छै पछाति बेटीक। मुदा से भेल कहाँ। पहिने बेटीक जनम भेल? मुदा पुछबो केकरा करबै? बेटा-बेटे भेल, पुतोहु कनियेँ छथि, तखनि? समाजमे जँ केकरो पुछबै तँ कहत जे बुढ़िया बताह भऽ बड़बड़ाइए। गुनधुनमे सुधनी कोनचर लग ठाढ़ भेल ने आगू बढ़ैत आ ने पाछू ससरैत। अपन दतारी दोसरो-तेसरो तँ पुछैवाली छथिए। मुहाँ-मुहीं नै पूछि हएत, मुदा पुछबा तँ सकै छियनि। चोटे आँगन दिस घूमि पुतोहुकेँ हाथक इशारा दैत कहलखिन-
“कनियाँ, कनी एम्‍हर आउ।”
ओसारपर बैसल धीरजकेँ मिसिओ भरि शंका नै भेलनि जे एहेन कोन गप छी जे सोझहामे नै बाजि माए कातमे कहै छथिन। शंको केना होएत चुल्हि-चौकाक बात तँ सासु पुतोहुएकेँ ने कहथिन, तइले बेटाकेँ किए कोनो तरहक कुवाथ हेतनि। लगमे अबिते सुधनी बुधनीकेँ कान लग फुसफुसा कऽ बजली-
“कनियाँ, अहाँ तँ अखनि नव-नौताड़ि छी, अखनि ओते नै बुझबै मुदा माए तँ छथि। चुपचाप हुनकासँ बूझि लिअ जे जौंआ संतानमे पहिने बेटीओक जनम होइ छै?”
सासुक बात सुनि बुधनी मानि तँ गेली, मुदा तैयो बजली-
“ओना काल्हिए हम पूछि लेबनि, मुदा कहियो बाजल छेली जे पहिने बेटेक जनम होइ छै।”
पुतोहुक बात सुनि सुधनी ठमकि गेली। मुदा तैयो बजली-
“कनियाँ, आँखिक देखल अहूँकेँ अछि आ हमरो तखनि सुनलेहे बात मानब उचित हएत?”
सासुक बात सुनि बुधनी ठमकली। बल्ला आकि चूड़ी देखैले कोन ऐनाक जरूरी कोन स्‍त्रीगणकेँ होइ छै। ई तँ सद्य: आँखि देखैत अछि। जेकरा आँखि नै देखैत तइले ने ऐनाक जरूरति। कमसँ-कम एते तँ हेबे करत जे जहिना ऐ समाजमे (सासुरक) तहिना नैहरोक समाजमे अहिना लोक उनटा-पुनटा बुझबो करैए आ बजबो करैए। तैसंग ईहो हएत जे माइयो अपन बातमे मजगूती अनैले दोसरो-तेसरोकेँ पुछथिन वा निम्न बूझि नहियोँ पूछि सकै छथिन। मुदा जँ नै पूछि लेब आ झोंकमे कहियो बुढ़ही झोंकि देलनि तखनि तँ अनेरे आफतमे पड़ि जाएब। पुछैएमे की लगल अछि यएह ने आठ आना मोबाइलमे खर्च हएत, तइले अनेरे सासुक धौजनि बेसाहि कऽ रखब नीक नै। मने-मन बुधनी वि‍चारिते छेली आकि अंकुड़ित भगवान जकाँ मनमेअकुड़लनि। अकुड़लनि ई जे अपना जौंआ सन्‍तान भेल, किनको एक-दू-तीन संतान होइ छन्‍हि, हमर बेथा जहिना ओ नीक जकाँ नै बूझि सकै छथि तहिना तँ हमहूँ नहियेँ बूझि पएब। अपना दू संतानक बेथाक अनुभव अछि, दोसरकेँ तीनक अनुभव रहितो एक-एकक अनुभव छन्‍हि। डायविटीज आ ब्‍लडपेसर किनको एक संग छन्हि आ कि‍नको भेलनि दुनू मुदा बेरा-बेरी। अनुभव तँ दुनू गोटेकेँ दुनू बिमारीक भेलनि मुदा की दुनूक इलाजमे सोलहन्नी एके दबाइ कएल जाएत...।
पत्नीक ओझराएल मनक ओझरी चेहराकेँ रसे-रसे ओझरबैत चलि‍ जाइत। ओसारपर बैसल धीरज बेर-बेर चेहरा देखैत तँ टुटल फूल जकाँ बेसीए मलिन होइत चलि जाइत देखैत। मुदा सासु-पुतोहुक बीचक विवादमे पड़बो ओते नीक नै हएत जेते हेबा चाही। एकर माने ई नै जे परिवारमे कि‍यो चि‍न्तित हुअए आ केकरो लेल धैनसन, सेहो तँ नीक नहियेँ हएत? मुदा पुछबो केना करब? दुनूक बीचक सवाल जँ एक पक्षसँ पूछब तँ दोसर पक्ष पञ्छीए जकाँ ने बुझती, जँ एकठाम बात उठाएब आ ओ लिंग-वि‍शेषक होइ तखन ने माए बाजत आ ने माइयक डरे (सोझमे रहने) पत्नी बजती। तखनि? मुदा जे बदनामे चलि गेल ओ कहियो ने कहि‍यो नि‍कलबे करत, तहि‍ना जे परि‍वारक भीतर घूसि गेल ऊहो भुमहुर-आगि जकाँ धुँएबे करत, तइले अनेरे मन घोर-मट्ठा करब नीक नै, दुधे किए ने पीब लेब जे सभ संगे रहत। दूधक मोहनि जकाँ धीरजक मनमे चलि‍ते रहै आकि दोसर अकुड़ गेल। ओ ई अकुड़ल जे ऐ घरक अगि‍ला भार (चलबैक भार) तँ अपने दुनू बेकती (पति-पत्नी) पर पड़त, जाबे माए जीबैए ताबे गारजन बूझि‍ भार हटौने छी मुदा अखने जँ ओ बिमार पड़ए आ भार उठबै जोगर नै रहि जाए तखनि तँ एकाएक भार पड़बे करत। जँ कोनो काजक भार अबैसँ पहिने अदहो-छि‍दहो बूझल रहत तँ एते हल्‍लुक तँ बनिए जाइ छै जेते सोलहन्नी बिनु बूझलक होइ छै। समाजमे देखै छी जे कि‍नको सत-सतटा बेटी भेने डीह-डाबर दोसराक हाथ चलि‍ जाइ छन्‍हि, तँ कि‍नको सात बेटा भेने गामक अनको सभटा इनार-पोखरि‍ हाथ चलि‍ अबै छन्‍हि‍। धू: अनेरे मनकेँ छिछियबै छी। देखै छी जे एते-दिन बापे बेटाक भि‍नौजी होइ छेलै आब दुनू बेक्‍तीओमे देखै छी। तखनि‍ अनेरे मन किए बौआएब किए ने दुनू बेकती पति-पत्नी बनि‍ बुढ़ाड़ीओमे कोहवर घरक गप करब। पत्नी दिस नजरि उठा धीरज बाजल-
“एम्हर कनी सुनू। अखनि भने माएओ अँगनामे नै अछि, एकटा बात पुछै छी?”
सासुसँ हटि बुधनीक जि‍ज्ञासा पति दिस बढ़ल। जहिना बाल-बोध बच्‍चा खिस्‍सा सुनि माल-जालक बच्‍चा जकाँ ‘घूटड़ू-घू’ सुनि मुँह बाँबि दइ छै तहि‍ना जिज्ञासा भरल बात सुनैले बुधनी मुँह उठा बजली-
“की?”
धीरज-
“अहाँक पीड़ा (उनैस दिनक) देखि मन महकि गेल जे आब संतान नै हुअए सएह नीक। दूटा भेबे कएल जँ दुनूकेँ दुनू बेकती सेवा कऽ मनुख बना ठाढ़ कऽ देबै तँ एकसँ दू परि‍वार तँ अवाद हेबे करत कि‍ने?”
हाल-बेहाल भेल बुधनी देहक मन मानि‍ गेल जे पति‍क वि‍चार सोलहन्नी नीक छन्‍हि। हूँहकारी भरैत बजली-
“अहाँ विचारकेँ काटब से दरकार हमरा अछि। तखनि तँ पुरुख अपने खेतमे आड़िओ दइए आ तामस उठै छै तँ ढाहियो दइए। तँए अहाँ जानी। हम तँ संगीए ने भेलौं। बड़ हएत तँ एतबे ने, जे कानि-कानि लोककेँ कहबै, संगियाँ मरि गेल हम भुतियाइ छी।”
जिनगीक सचाई जहिना धीरजकेँ तहिना बुधनीकेँ एक-दोसरा दिस खिंचए लगल। आगूक लेल दुनूक जिज्ञासा बढ़लनि। तही बीच सुधनी खोंइछामे झिंगुनी आ मुट्ठीमे सुखेलहा कड़ची नेने पहुँचली। अबिते चुल्हि लग कड़ची-जारनि रखि पुतोहुकेँ कहलखिन-
“कनियाँ, बड़ीकाल भऽ गेल। बच्‍चा सभकेँ दूध पीएलौं?”
कड़ची रखि ओसारपर झिंगुनी खोंइछासँ उझलि बुधनीक लग बैसि सुधनी वाड़ीक खिस्‍सा पसारि देलनि। बाजए लगली-
“उनैसे दिनमे वाड़ीक दशा बिगड़ि गेल। लत्ती सभ मचान छोड़ि-छोड़ि निच्‍चाँ उतरि कठुआ-कठुआ गेल। रामझिंमनी पँच-पँच, छह-छहटा जुआ कऽ गाछेकेँ कठुआ देलक। तेते ने खढ़-पात जनमि गेल जे वाड़ीक रुइखे खतम भऽ गेल अछि।”
वाड़ी-झाड़ीक अपसोच सासुकेँ करैत देखि पुतोहु मलसारि दैत बजली-
“वाड़ी गेल तँ गेल मुदा घरमे जे दूटा लाल आएल से?”
पुतोहुक बात जेना सुधनीकेँ हिलकोरि देलकनि। अगम पानि‍मे हेलए लगली-
“से तँ अही दुनू लालले ने ओ सभ अछि। लालक पतिपाल हेतै तँ ओ सभ ढेर हेतइ।”
पुतोहुक बात सुधनीकेँ धारक पानि जकाँ भँसौलकनि नै समुद्र जकाँ हि‍लकोरए लगलनि। परि‍वार तँ खाली मनुखे टाक नै होइ छै, घर-दुआर, खेत-पथार, माल-जाल इत्‍यादि अनेको मि‍ला कऽ बनै छै, जे मनुखसँ लऽ कऽ आनो-आनो वस्‍तुकेँ एक निश्चित सीमामे बान्हि‍ दइ छै। मुदा एक बान्‍हमे रहि‍तो तँ सबहक अपन-अपन महत्तो छै आ काजो छै। जइसँ एक दोसरकेँ जानो-पराण दइ छै आ जि‍नगीओ दइ छै। वाड़ी-झाड़ी, तीमन-तरकारी तँ मासे-मास दि‍ने-दि‍ने होइत-जाइत रहैए मुदा मनुख तँ से नै छी। तँए मनुखे ने मूल भेल। मूलक मूल्‍य तँ तखने ने बढ़ैत जाएत जखनि‍ मूलक सेवा हेतै। मूलेक पानि‍ ने छीप धरि‍ रस पहुँच हँसबै-खेलबैए। अनेरे मनमे धौजनि करै छी। जेना सुधनीक मन हल्‍लुक भेलनि। बजली-
“कनियाँ, आब तँ दूध थीर भऽ गेल हएत, कहू जे दुनू बच्‍चाकेँ भरि पोख दूध होइ छै किने। जँ से नै हएत तँ बच्‍चाक पति‍पाल करब कठि‍न भऽ जाएत। जँ अखनेसँ दूधकट्ट भऽ जाएत तँ सभ दि‍न खि‍द-खि‍दाइते रहत। रंग-रंगक रोग सेहो दबतै, आ अगुओ-पछुओ पकड़तै।”
सासुक बात सुनि बुधनी सकपका गेली। मुदा परि‍वारेक गार्जनेटा नै, बच्‍चाक दादीओ ने सुधनी छथि‍न तँए बाल-बोधक कोनो बात छि‍पाएब उचि‍त नै बूझि बजली-
“माए, एकटा तँ बि‍सरिए गेल छेलौं, हि‍नका कहबो ने केने छेलियनि। ई तँ गपपर गप चलल तखनि मन पड़ल।”
पुतोहुक बातमे सुधनीकेँ मि‍सि‍ओ भरि‍ अनुचि‍त नै बूझि‍ पड़लनि‍। बजली-
“से की?”
“पुरनी (पल्हनि) एकहक घोंट कऽ दुनू बच्‍चाकेँ सेहो दूध पीआ दइ छै।”
बुधनीक अधखरूए बात सुधनी बूझि गेली। ओ बूझि गेली जे परसौतीक पहिल पूरक तँ पल्‍हनिए ने होइ छथि। ओना धि‍यान अपनो दिअए पड़त। पल्हनि दस दुआरी होइए। समाजक काज तँ सबहक बरबैरे होइ छै मुदा काजे छोट-पैघ होइए जेकरा लोक पकड़ि‍ चलैए। मुदा खतराक तँ घड़ी अछिए। जँ केतौ (पल्हनिक) हमरा (अपना) काजसँ पैघ काज दोसर ठाम भऽ जाए तखनि जँ ओकरा छोड़ि दिअए ईहो तँ नीक नहियेँ भेल। मुदा जे होउ, एते तँ वेचारी (पल्हनि) चेताइओ देलक जे बच्‍चाकेँ भरि‍ पोख दूध नै होइ छै। खैर अखनि‍ तक जँ बच्‍चा नीक जकाँ जीब गेल तँ आइएसँ दोसर जोगार कऽ लेब, जरूरी अछि। बजली-
“अच्‍छा कनियाँ एकटा बात कहू जे वेचारीकेँ खुआ-पीआ दइ छि‍ऐ कि‍ने? वेचारी एहेन पीतमरू अछि जे आइ उनैसम दि‍न बीति रहल अछि अखनि तक अपन सिदहो-बोइननै मंगलक हेन। जखने बच्‍चा जनमैत अछि तखन माइए-बापटा केँ कि परिवारो-समाजोकेँ आशा जगि‍ते छै। मुदा ईहो नीक नै जे जे मुँह खोलि नै बाजए ओकरा सुपतो नै भेटै। आइ पल्हनि‍ जखने औत, तखने मन पाड़ि देब, जेना जे हेतै से दाइए देबै।”
एकटा बच्‍चाकेँ दूध पीआ बुधनी सासुक कोरामे देलक। दोसर बच्‍चाकेँ ओछाइनसँ उठा कोरामे लइते छल आकि हकोपरास भेल पल्हनि पहुँचली। जेना समैपर नै एने कि‍यो अपनाकेँ दोखी बुझैत तहि‍ना पुरनीओ बुझलक। अबि‍ते बाजलि‍-
“काकी, अबेर भऽ गेल।”
पुरनीक बात सुनि‍ सुधनी गुमे रहली। मुदा सुधनीक गुमी पुरनीकेँ आरो झकझोड़ि देलकै। झकझोड़ि ई देलकै जे भरि‍सक मने-मन सुधनीकाकी गुम्‍हरि रहली अछि। मुदा से नै भेल, भेल ई जे पुरनीक बोली-वाणी, चालि‍-ढालि, चेहरा-मोहरा जोर-जोरसँ बाजि रहल छल जे पुरनी तेहेन उकड़ू काजमे फँसि गेल छेली जे तन-मन दुनू फ्रीसान भऽ गेल छेलनि। मुँहसँ फुफड़ी उड़ैत थाकल-मारल बटोही जकाँ देखि सुधनी बजली-
“पुरनि, पहिने हाथ-पएर धो कऽ कि‍छु खा लिअ। जखनि आबि गेलौं तखनि काज हेबे करतै। किए एते परेशान बूझि पड़ै छी?”
सुधनीक बात सुनि‍ पुरनी पोखरि‍क पानि‍ जकाँ थीर होइत बजली-
“काकी, की कहबनि‍। दछिनवारि टोल प्रसव करबए गेल छेलौं। उनटा बच्‍चा छेलै। दरदे कनि‍याँ छटपटाइ छेली, बच्‍चा जनमिते ने छेलनि। मुदा कहुना-कहुना कऽ सम्‍हरल। ओही काजमे एते अबेर भऽ गेल।”
पुरनीक बात सुनि सुधनी बजली-
“अहिना होइ छै। ने एकेटा मनुख अछि आ ने एके रंग काज हेतै। मुदा मनुखो तँ कम भेदि‍या नै ने अछि‍, देखिओ-सुनि आ गरो अँटका कऽ भेद तँ बूझिए जाइए।”
हाथ-पएर धोइ पुरनी खाए लगली। खाइते-खाइते बजली-
“काकी, अपना बच्‍चाकेँ भरिपोख दूध नै होइ छै, हमरो कोनो ठेकान नै अछि। से कोनो ओरियान कऽ लोथु। अखनि अन्न चटबैबला थोड़े भेलनि जे अन्न चटौथिन।”
पुरनीक बात सुनि‍ सुधनी बजली-
“बौआकेँ कहलिऐ हेन जे ओना गाएओ-महिंसक दूधसँ काज चलि‍ सकैए मुदा नीक हएत जे बकरीए दूध दि‍ऐ।”
पुरनी-
“हँ-हँ काकी बेस वि‍चार छन्‍हि। एना तँ बजारोक दूध एकपर एक छै मुदा ओकर कोन बिसवास। अपना हाथक जे अछि तेकरे ने बिसवास।”
दुनू गोटेक (माएओ आ पल्हनिओ) बात सुनि धीरजकेँ भेल जे जखनि‍ दूध लेल बकरीक ओरि‍यान करैएक अछि तखनि‍ समए गमाएब नीक नै। जरूरीक जे काज अछि जँ ओकरा पछुआएब आकि अनठाएब ओ परि‍वारकेँ पाछू धकेलब भेल। जखनि‍ बुझै छि‍ऐ जे एक परि‍वार रहि‍तो, सभ काज परि‍वारेक रहि‍तो करैक तँ कि‍छु सीमा अछिए। उठि‍ कऽ आँगनसँ नि‍कलि‍ दूधारू बकरी भँजियबैले वि‍दा भेल। समाजो तँ समाज छी। जहि‍ना रंग-रंगक मनुख तहि‍ना रंग-रंगक धनक खाड़ी सेहो बनले अछि‍। काेनो दरबाजा एहनो अछि जैठाम हाथी-घोड़ा रहैए आ कोनो एहनो अछि जैठाम कि‍छु ने रहैए। मुदा तँए कि गाममे गाए-महिंस बकरी नै अछि से तँ अछिए।
धीरजकेँ आँगनसँ नि‍कलिते बुधनीकेँ अपन बात बजैक गर भेटल। गर ई जे एक परि‍वार रहितो, सभ बात बुझला पछातिओ सभ लग सभ बात सभ नै बाजि‍ पबैए। बजली-
“भने माएओ छथि आ अहूँ छी, जि‍नगीमे एहेन दुख कहि‍यो ने भेल छल, जे भेल तँए...?”
बुधनीक बात सठलो ने छल आकि बिच्‍चेमे पुरनी बजली-
“कनियाँ, हमर-अहाँक (नारीक) यएह अग्‍नि परीछा छी। राजासँ रंक तककेँ ई परीछा होइ छै। तइले दुख-बेकल मनमे रखब तँ दुनियाँ चलत।”
पुरनीक विचारकेँ बुधनी सुनिते द्रवित भऽ गेली। एक संग मनमे अनेको प्रश्न उठि गेलनि। परि‍वार लेल बच्‍चा अनिवार्य ऐ दुआरे अछि जे वएह बच्‍चा बढ़ैत सि‍यान-चेतन होइए, जैपर कुले-खनदान नै परि‍वार, समाज, देश-दुनि‍याँ ठाढ़ अछि। एहेन जे मनुखक अनिवार्यता छै तैठाम संतानक अनि‍वार्यता तँ छइहे। मुदा जि‍नगीक तँ कोनो ठेकान नै अछि, बच्‍चासँ सियान आकि‍ बूढ़ धरि‍ कखनो-कहि‍यो कि‍यो मरि‍ जाइए, तखनि‍? एक बच्‍चापर आश्रितो तँ नहियेँ रहल जा सकैए। दोसर ई जे जँ बेटा-बेटीकेँ बरबरि‍ मानि‍ लेब, सेहो तँ सोलहन्नी उचि‍त नहि‍येँ। हँ कोखि‍क लेल संतान भेल मुदा सामाजिक जे ढाँचा अछि तइमे बराबरी केना औत। मुदा मनो तँ मने छी। देहमे दुख भेने जे वि‍चारमे अबै छै, सुख भेने बदलि जाइ छै। अपने दुनू परानी वि‍चार केलौं जे एहेन दर्द (बच्‍चा जन्‍मक) दोहरा कऽ नै उठाएब मुदा...? पीड़ाएल मन बुधनीक दृढ़तासँ मानि‍ गेल जे आगू सन्‍तान नहियेँ हएब नीक। बजली-
“अखनि तँ सोझहामे ईहो दुनू गोरे छथिए, नीक-बेजए बुझबे करै छथिन।”
बुधनीक बात सुनि‍ पुरनी बजली-
“कनियाँ, अगुताएल किए छी, अखनि पहिने देह-हाथ सक्कत बना लिअ। ताबे बच्‍चो सकताइए। अबि‍ते-जाइते रहै छी जेहेन अपन परहेज करब, तेहेन जे चाहब से हेतै।”
पुरनीक बातमे बुधनी जि‍नगीक बिसवास पौलक। आँखि उठा पुरनीक आँखिपर दैत अपन बेथा कहलक। बुधनीक बेथीत मन देखि पुरनी बजली-
“कनियाँ, जहि‍ना कामि‍नी फूल महिनामे चारिए दि‍नक जि‍नगी पबैए तहि‍ना सन्‍तानक खेल सेहो अही चारि‍ दि‍नमे नि‍हीत अछि। पछाति बुझा देब।”
गप-सप्‍पकेँ सीमा छुबैत देखि‍ सुधनी पुरनीकेँ पुछलखिन-
“तोहर सि‍दहा केते हेतह। कहुना भेलह तँ तूँ दसारी भेलह, तँए तोहर रस्‍ता रोकब उचि‍त अपन रस्‍ता रोकब हएत। दाइए दइ छिअ। अपन नेने जइहऽ।”
सिदहा सुनि अखनि धरि‍क कएल काजक फल देखि पुरनीक मन खुशीभेल, बाजलि-
“काकी, हमर खेत-पथार, माल-जाल, राज-पाट सभ तँ यएह छी। दोसर कोन असरा अछि। आइ दि‍नसँ हि‍नका ऐठाम खेनि‍हार सभ आबए लगतनि‍। मुदा जे काज हम केलि‍यनि‍ सेहो कि‍यो करतनि‍।”
पुरनीक बात सुनि‍ सुधनी सहमि‍ गेली। बजली-
“कनियाँ, एक बेर अपना मुँहसँ बाजि‍ जाउ, केते हएत। काजक भीर हमरो नजरि‍मे अछि। अन्‍हार घर साँपे-साँप होइ छै। समाजमे जेते हमरो सन लोक दइए तइसँ कम नै देब।”
सुधनीक वि‍चारमे आशा देखि‍ पुरनी बाजलि‍-
“बेटाक अदहा बेटीक सि‍दहा भेल, तँए दोबर नै डेढ़िया भेल। अनका लिए जे होउ, मुदा हमरा लि‍ए तँ जेहने बेटा तेहने बेटीओ भेल।”
मास दि‍नक कमला-कमल भऽ गेल। सुभ्‍यस्‍त समए भेने गामोक चुहचुही ऐ साल नीक अछि। धनमंडल भेल अछि। बच्‍चाक नि‍बि‍ते जहि‍ना पमरि‍या, बकूनि‍याँ, हिजरा-हिजरनीक ढबाहि लागत, तहि‍ना ठको-फुसियाहक ढबाहि लगबे करत कि‍ने?
दीपेक पमरि‍या, कहि‍यो बपहरक नाओंसँ तँ कहयो ममहरक नाओंसँ एबे करत। से कि कोनो एकेठामक औत नैहर-सासुर सबतरि‍ पसरत। जीवि‍काक तँ दोसर साधनो ओकरा छइहो नै ने।
दोसर मास चढ़िते चारि‍ गोटे पमरि‍या पहुँचल। बेटाक बधैया मांगए। मुदा बेटीक?
mmm


स्‍वरोजगार


एक तँ अहुना शिक्षण संस्‍थानक वातावरण देखि रविशंकरक मन कौलेजक पढ़ाइसँ उचटि गेल, तैपर परसुका कि‍रि‍या-कलाप तँ आरो मनकेँ तोड़ि‍ देलकै। भेल ई जे कौलेजमे वि‍श्ववि‍द्यालय स्‍तरक परि‍चर्चा छात्र सबहक बीच भेल जइमे रवि‍शंकरकेँ आमंत्रि‍त नै कएल गेलै। बनल-बनाएल परि‍चर्चाक दि‍शा ि‍नर्देश, बनल-बनाएल कर्ता-धर्ता आ बनल-बनाएल पाठक सुनि‍नि‍हार। आमंत्रि‍त नै करैक कारण रहै जे कौलेजक वातावरणमे ओ चुप्‍पा बताह आ गोंग बूझल जाइत। जइसँ संगी-साथीक बीच अधि‍ककाल रवि‍शंकरक बतहपनीए चर्च होइत। जहि‍ना बघबा खाए वा नै खाए लोहारक लोहराइन महकबे करत, तहि‍ना रवि‍शंकरोक रहए। एकटा अवगुण रवि‍शंकरोमे जरूर रहै जे हाइ स्‍कूलमे जेते वि‍षय पढ़ने छल ओते वि‍षयसँ सम्‍बन्‍ध बनौनहि‍ रहि‍ गेल। ऐ बातकेँ मनसँ हटा नेने छल जे हाइ स्‍कूलक कि‍छुए वि‍षय कौलेजमे रहि‍ जाइ छै, सेहो दि‍नो-दि‍न घटि‍ते चलि‍ जाइ छै। अही सीमाक उल्‍लंघनक चलैत छात्रे नै शि‍क्षकोक बीच चर्च रहए। जखनि‍ कि‍ रवि‍शंकरक स्‍पष्‍ट समझ रहै जे भाषा कामधेनु छी। जे सदि‍काल दूध दऽ सकैए। एकर माने ई नै जे नि‍मुआन धन बूझि‍ ओकर दुरूपयोग होइ। ओतबे शब्‍दक प्रयोग नीक होइ छै जेतेसँ वि‍चारक माध्‍यमसँ वि‍षय गति‍मान बनै छै। भाषा ओहन धार होइए जेकरा पार करैमे घटवारकेँ घटवारि‍ नै दि‍अ पड़ै छै।
वि‍श्ववि‍द्यालयक परीक्षाक अधडरेड़ेपर छोड़ि‍ रवि‍शंकर अपन सभ वस्‍तु समेटि‍, लगक जे कि‍ताब-काैपी रहै ओकरा अलग छँटिया, दोसराक संग जे लेन-देन रहै ओकरो फड़िया, पुस्‍तकालयक सेहो फड़िया, पड़ोसक लेन-देन सबहक मुँहमि‍लानी कऽ बि‍ना कि‍छु केकरो कहने रूमक चाभी भागेसरकेँ सुमझा जहि‍ना यागवल्‍क गुरुआइसँ दुनू पत्नीओ धरिकेँ छोड़ि वि‍दा भेल छला तहि‍ना वि‍दा भऽ गेल। ओना भागेसर मात्र गौअँए रूमेट नै दि‍यादि‍क संग खानदानी सेहो। तथापि‍ ने रवि‍शंकर कि‍छु बाजि‍ अपन बेथा भागेसरकेँ सुनबए चाहैत आ ने भागेसर कि‍छु बाजए। नै बजैक कारण भागेसरकेँ बुझले रहै जे गणेशजी जकाँ कभग्‍गू अछि‍ए जेमहर नजरि‍ गेलै तेम्‍हरे जनकक हरबाहि‍सँ मूसक राखल मुसहनि‍ तक खुनि‍ कऽ नि‍कालि‍ लैत, जेमहर नै गेल तेमहर हाथी आँखि‍ जकाँ लूब-लूबबैत रहलौं। ओसारसँ नि‍च्‍चाँ उतरि‍ते पाछूसँ भागेसर पुछलकै-
“रवि‍ भाय, आगूक की कार्यक्रम अछि‍?”
जहि‍ना गणेशजीक मन सदि‍काल एकेरंग रहैत तहि‍ना रवि‍शंकर बाजल-
“अखनि‍ वि‍चार मनमे अछि‍। गाम जाएब समाजक संग परि‍वारकेँ देखब दुनू बापूत मि‍लि‍ वि‍चारब जे केना बाप-दादाक लगौल फुलवाड़ी आरो हरिआइत रहत तखनि‍ ने।”
एक दि‍स रवि‍शंकर डेग बढ़ौलक दोसर दि‍स भागेसर पल्‍ला झाड़लक जे सभ दि‍नक एके रंग बूड़ि‍वाण रहि‍ गेल। जा जे कपारमे लि‍खल छह से कि‍यो बाँटि‍ लेतह। खैहनु चेतानन्‍दक कपार।
कौलेजक हातासँ नि‍कलि‍ते रवि‍शंकरक मनमे घौंदा जकाँ प्रश्न लुलुकि गेलै। बि‍औहता बर आ दुरगमनि‍याँ कनि‍याँ जकाँ मनमे समस्‍याक सोहरी लगि‍ गेलै। मुदा जहि‍ना छोट बच्‍चाकेँ कि‍यो दुलार कऽ कना दइ छै आ ओ अपना माए लग जा कहै छै, ‘फल्‍लाँ मार’, तहि‍ना सभ प्रश्नकेँ छँटिया रविशंकरक मन परसुकाकेँ आगूमे रखलक। की हम परि‍चर्चामे अपन वि‍चार व्‍यक्‍त करैबला नै छी? भऽ सकैए जे जे वि‍चार हमर अछि‍ ओ दोसरोक होइ, मुदा सेहो तँ सुनला पछाति‍ए ने बुझि‍तौं। नहि‍येँ बजि‍तौं मुदा जँ आनोक मुँहसँ सुनि‍तौं तैयो तँ मनमे सबूर हेबे करैत, सेहो ने भेल। ने बजनि‍हारे भेलौं आ ने सुनि‍नि‍हारे।
रवि‍शंकरो आ भागेसरो संगे दुनू ब्रह्मपुर हाइ स्‍कूलसँ मैट्रि‍क पास कऽ राजधानीक एक्के कौलेजमे नाओं लि‍खौलक। ओना पढ़ैमे रवि‍शंकरक अपेक्षा भागेसर हल्‍लुक मुदा मैट्रि‍कमे बेसी नम्‍बर भागेसरेकेँ आएल छेलै, जे सुनि‍ए कऽ रवि‍शंकर रहि‍ गेल। वि‍चारि‍ नै सकल जे जखनि‍ भागेसर दब अछि‍ तँ ओकर नम्‍बरो ने दबे अबि‍तै। बाल-बोध मन रवि‍शंकरक, एतबे बुझलक जे परीक्षा तँ शि‍कार करब भेल। अनाड़ीओ शि‍कारीकेँ बेसी शि‍कार हाथ लगै छै आ जीवनीओकेँ कम। ई नै बूझि‍ सकल जे जहि‍ना खेतमे जोत-कोरसँ फसल लगबै धरि‍ वा बाँस-खढ़-खरहीसँ घर बन्‍है धरि‍ कोनो पेंच-पाँच नै होइ छै, पेंच-पाँच होइ छै फसल लगला पछाति‍ आ घर बन्‍हला पछाति‍। अपन रोपल अपने खा दोसरोकेँ खुआबी आकि‍ अपने पुराबी आकि‍ अनके रोपल खाइ। भागेसरमे एकटा वि‍चार जरूर अछि‍ जे रवि‍शंकरकेँ श्रद्धाक नजरि‍सँ जरूर देखैत। मुदा से सेझहामे, परोछमे वि‍चारक दूरी एते लतड़ि‍ गेल छेलै जे जड़ि‍सँ मुड़ीक दूरी देखबे ने करै। ओना हाइ स्‍कूल धरि‍ दुनूमे (रवि‍शंकर आ भागेसर) एते दूरी नै बनल छेलै जेते कौलेजमे आबि‍ बनलै। तेकर कारणो भेल जे जहि‍ना रवि‍शंकर अध्‍ययनमे खिंचाइत एकाग्रता दि‍स बढ़ैत गेल तहि‍ना भागेसर देखा-देखीक अनुकरण करैत दोसर दि‍स बढ़ि‍ गेल। तइसँ नजरि‍मे दोष आबि‍ गेने बुझबे ने करैत जे छबड़दानी अपने सुरक्षि‍त पानि‍क तरमे रहि‍ छबड़ाकेँ कहैत जे ऊपरेमे छि‍औ।
ओना पटना अबि‍ते दुनू गोरे एक्के लाैजमे रूम भाड़ा लेलक। मुदा भड़ैते बनैकाल रवि‍शंकर बाजल रहए-
“गौआँ छोड़ि‍ दोसरकियो रूममे नै आबि‍ सकैए।”
अखनि‍ तँ भागेसरो एक पुरखि‍याहे छल संगीक जरूरति‍ बूझि‍ बाजल रहए-
“बड़बढ़ियाँ।”
माथपर मोटरी नेने डेग आगू दि‍स बढ़ैत, मुदा मनमे बेर-बेर पानि‍क हि‍लकोर जकाँ रवि‍शंकरकेँ उठैत जे वि‍श्ववि‍द्यालय स्‍तरक कार्यक्रम भेल, बेक्‍ती-वि‍षेषक नै छल, तखनि‍ कि‍ए ने बुझलौं। ने प्रश्नक जड़ि‍ भेटै आ ने वि‍चार आगू बढ़ै। मुदा तैयो बाढ़ि‍क पलाड़ी जकाँ बहबे करै। मन बहकलै, इन्‍दि‍रा आवासक जेकरे पक्का घर रहै छै हथि‍याक झटकीमे खसल घरक अनुदानो तेकरे भेटै छै। सएह ने तँ भेल। की अहि‍ना भोजे-भातक शि‍क्षण संस्‍थान बनल रहत? धू:! अनेरे मनकेँ बौअबै छी। ठीके लोक बताह कहैए। एहने-एहने घतहपनी साेचने ने लोक बताह होइए। अनेरे हमरे कि‍ए एते सोग अछि‍। जानए जअ जानए जत्ता। लसि‍गर होइ आकि‍ खढ़हर से ओ जानए। हमहीं की बजि‍तौं जे अनेरे माथ धुनै छी। बड़ बजि‍तौं तँ यएह ने बजि‍तौं जे साहि‍त्‍य जगतमे मध्‍यकालीन युग स्‍वर्णिम रहल। भक्‍ति‍मय साहि‍त्‍यक सृजन एते कहि‍यो ने भेल। मुदा भक्‍ति‍ साहि‍त्‍यक पछाति‍ वैराग्‍य अबैत आकि‍ श्रंृगार? एबाक चाहै छल वैराग्‍य से नै आबि‍ श्रृंगार आबि‍ गेल। समैओ मुगले शासनक छल। मि‍थि‍लांचलक कि‍सानक सुदि‍न नै दुर्दिन छेलै। बीससँ तीस रौदी प्रति‍ सदी होइत आबि‍ रहल छेलै‍। बाढ़ि‍-झाँट छोड़ि‍ कऽ। तैसंग बड़का-बड़का भुमकमो भेल। आजुक संचार नै, दू-गाम चारि‍ गाम पसरैत-पसरैत अवाज वि‍लीन भऽ जाइ छल। ने धार-धूर आजुक छी जे आबे बाढ़ि‍ अबैए आ पहि‍ने नै अबै छल। खैर छोड़ू। रौदीक मारि‍सँ जे परि‍वार नष्‍ट भेल, वा गाम छोड़ि‍ कऽ जे भागल, तेकरा छोड़ि‍ कऽ। जे इमानदार कि‍सान छला ओ मिसिओ भरि‍ ओइ सभ प्रकोपसँ डोलला नै। मातृभूमि‍क माटि‍-पानि‍मे अपनाकेँ समरपित केने रहला। भलहिं एक रौदीक मारि‍ पाँच बर्खमे कि‍ए ने भरपाइ करए पड़ल रहल होन्‍हि‍। एकाएक रवि‍शंकरक वि‍चार आगू बढ़ल। वि‍श्ववि‍द्यालय सर्वोच्‍च शि‍क्षण संस्‍थान छी। जे मि‍थि‍लांचल ऋृर्षि-मुनि‍क बासस्‍थल अदौसँ रहल आकि‍ ओतबे गनल-गूथल छथि‍ जेतेकेँ द्वारि‍का छाप भेट गेल। वि‍श्ववि‍द्यालयक दायि‍त्‍व बनैत अछि‍ जे जि‍नकर रचना दि‍वारमे सड़ि‍ गेलनि‍ पानि‍क चुबाटमे गलि‍ गेलनि‍ ओहनो-ओहनो रचनाकारक खोज हुअए।
गामक सीमानपर अबि‍ते रवि‍शंकरकेँ भागेसर मन पड़ल। मन पड़ि‍ते बुदबुदाएल-
“गौआँ-घरूआ रहने भागेसर बहुत उपकार केलक। ओकरे केने कौलेजक पुस्‍तकालयसँ सम्‍बन्‍ध बढ़ल। नै तँ तेहेन-तेहेन लुटि‍हारा सभ अछि‍ जे कि‍ताबक कोन चर्च जे आलमारीओ उठा कऽ लऽ जाइए। जँ ओ नै रहि‍तए तँ की अपने बुते ओते भीतर तक जा सकै छेलौं। ओकरे पाबि‍ ने सभ रंगक कि‍ताबसँ भेँट भेल। जि‍नगी भरि‍ ओकर उपकारकेँ नै बि‍सरब।”
रवि‍शंकरकेँ पटना छोड़ि‍ते भागेसर अपना पत्नीकेँ मोबाइलसँ कहि‍ देलक जे रवि‍शंकर बताह भऽ गेल। गाम अबैसँ पहि‍ने तेना चालनि‍मे दऽराधा चाललनि‍ जे सौंसे गाम पसरि‍ गेल, रवि‍शंकर बताह भऽ गेल। तहूमे चुप्‍पा बताह। कखनि‍ की कऽ देत तेकर ठेकान नै। काने-कान सौंसे गाम बीआवान भऽ गेल। ओना ई बात नै परोछ रूपे चेतानन्‍दोक कान तक पहुँचलनि‍ मुदा सोझहा-सोझही नै भेने अनेरे सुनलाहा बातक पाछू जाएब उचि‍त नै बूझि‍ चुपे रहला। कौआ कान नेने जाइए, तइले कौआकेँ खेहारैसँ नीक अपन कान देखब होइ छै। ओना पोखरि‍क पानि‍ जकाँ असथि‍र चेतानन्‍दक परि‍वार तँए चि‍ड़ैक एक लोल पानि‍ उठौने हि‍लकोर नै उठैत।
दलानक ओसारपर मोटरी रखि‍ रवि‍शंकर हि‍या-हि‍या चारू दि‍स ताकए लगल जे अपन हाजि‍री तँ दर्ज करबैक अछि‍।
कनीए पछाति‍ चेतानन्‍द बाड़ी दि‍ससँ एला। अबि‍ते रवि‍शंकरकेँ पूछि देलखि‍न-
“बाउ, नीके छेलह कि‍ने?”
जहि‍ना बि‍नु बोलक बच्‍चा माए-बापक बोल सुनि‍ हँसि‍-कानि‍ अपन बात कहैत तहि‍ना रवि‍शंकर मुस्‍की भरि‍ उत्तर दैत गोर लगलकनि‍। गोर लागि‍ रवि‍शंकर अपन वस्‍तुजात सेरि‍याबए कोठरी दि‍स वि‍दा भेल।
समाजक बीच अनेको सुआदक (तीत-मीठ-खट्टा) बात-वि‍चार हवा-बि‍हाड़ि‍ जकाँ वातावरणमे पसरैत रहै छै। बात कोन आवरणमे पसरि‍ रहल अछि‍ ओ बूझब बाल-बच्‍चाक खेल नै छी। एहनो तँ होइते अछि‍ जे पहि‍ने दीक्षे छि‍टाइत अछि‍ शि‍क्षा हरा जाइत अछि‍। खैर जे होउ, चेतानन्‍दक मनमे उठलनि‍ जे काल्हि‍सँ जे गाममे बीआबान भेल अछि‍ ओकर मुड़ी पहि‍ने देख ली। जँ रखै जोकर हएत राखब नै तँ मचोड़ि‍ कऽ तोड़ि‍ कातमे फेक देब। आगू ससरि‍ते मनमे उठलनि‍ एक तँ ओहि‍ना रस्‍ताक झमारल रवि‍शंकर अछि‍ तैपर कौलेजमे पढ़ैए। कौलेजीआ छौड़ा सबहक जे चालि‍ देखै छि‍ऐ से कि‍छु ने फुड़ाइए। जँ कहीं रवि‍शंकरो ओहि‍ना करए। मुदा कानमे नहि‍योँ देब हमरा लेल उचि‍त नै भेल। पि‍ते नै आदि‍गुरु सेहो छि‍ऐ। ओकर नीक-बेजए नै बूझब बाल-बोधक संग अन्‍याय हएत। कोनो जरूरी छै जे नीक बात सभकेँ अधले लगै, कि‍छु के नीको तँ लगबे करै छै। छातीपर पाथर रखि‍ चेतानन्‍द बजला-
“बाउ, लोकक मुहेँ सुनै छी जे तोँ बताह भऽ पढ़ाइ छोड़ि‍ गाम चलि‍ एहल हेन! से की बात छि‍ऐ?”
पि‍ताक प्रश्न सुनि‍ रवि‍शंकर मिसिओ भरि‍ वि‍चलि‍त नै भेल। जहि‍ना पोखरि‍क असथि‍र पानि‍, काह-कूह नि‍च्‍चाँ बैसि‍ गेने परीच्‍छ रहै छै तहि‍ना रवि‍शंकरक मन असथि‍र। बाजल-
“बाबूजी, एक संग तीनटा प्रश्न उठा देलिऐ। उत्तर बेराबेरी देब। पढ़ाइ छोड़ि‍ कऽ कि‍ए एलौं। बहुत बेसी तँ अखनि‍ धरि‍ नै पढ़लौं जे भरि‍पोख उत्तर देब। मुदा एते जरूर बुझलौं जे अपन जि‍नगी अपने हाथमे लऽ कर्मकेँ धर्ममे प्रति‍ष्‍ठि‍त कऽ सकै छी। नै तँ मुँह कि‍म्‍हरो बोल कि‍म्‍हरो बनल रहैए। अपन जि‍नगी अपना हाथमे लऽ क्षमतानुसार अपनो आ दोसरोक सहयोग करि‍ऐ। मुदा सहयोगोक सीमा छै। जखनि‍ मनुख अपन सीमांकन कऽ चलत तँ ओहन सहयोगक बेगरते नै रहि‍ जाइ छै। मुदा बेकतीसँ परि‍वार, परि‍वारसँ समाज, देश-दुनि‍याँ बनैत, तँए बढ़ैत चलबे ने जि‍नगी छी।”
चेतानन्‍दकेँ बतहपनीक आभास नै भेलनि‍, तँए दोहरा कऽ बतहपनी शब्‍दक प्रयोग करब नीक नै बुझलनि‍। पि‍ताक बात छि‍ऐ जँ कहीं उनटे रोपा जाए। शब्‍द तँ मनसँ उचरैत अछि‍। तँए अशुभकेँ शुभ बनाएब उचि‍त भेल, मुदा शुभकेँ अशुभ बनाएब केना उचि‍त हएत? अपनो नीक हएत जे जुआन बेटा भेल, सरकारो मानीए नेने हेतइ, तँए अपना अधि‍कार आ कर्तव्‍यकेँ हमहीं कि‍ए रोकबै। हँ तखनि‍ बि‍आह कराएब पछुआएल अछि‍ से कराबै धरि‍ भार अछि‍। लेत अपन घर-परि‍वार, सर-समाज। साठि‍ बर्ख नहि‍येँ पूरल हएत तइले कि‍ए बैसल रहब। से नै तँ एकटा आरो बात पूछि‍ए लि‍ऐ। पुछलखि‍न-
“बौआ, गाममे रहि‍ करबह की? पढ़ि‍-लि‍खि‍ सभ नोकरी-चाकरी करैए आ तूँ?”
गंभीर होइत रवि‍शंकर बाजल-
“बाबू, अखनि‍ गामक असली रूप बुझैमे कनी बाँकी रहि‍ गेल अछि‍ तँए अखनि‍ कि‍छु ने कहब।”
“की असली रूप?”
“गामक माटि‍-पानि‍क लम्‍बाइ-चौड़ाइ की छै, अपना केते अछि‍, गाममे परि‍वार केते छै इत्‍यादि‍। कि‍छु बुझैक बाँकी अछि‍ से बूझि‍ गेला पछाति‍ अपन योजना आगूमे रखि‍ अहूँक वि‍चार लेब।‍”
रवि‍शंकरक वि‍चार सुनि‍ चेतानन्‍द ठमकि‍ गेला। मनमे रंग-रंगक वि‍चार उठए लगलनि‍। की योजना? कोनाे कि‍ सरकारी कारोबार छी जे योजना बनौत। मुदा धाँइ दऽ नै मानब उचि‍त नै हएत। भलहिं बीकछा कऽ पूछि‍ लेब अलग भेल। तहूमे कौलेजमे पढ़ैए, जँ कहीं कि‍ताबक भाषा बाजल हुअए। तखनि‍? से नै तँ नीक हएत जे अखनि‍ रवि‍शंकरोक मन थीर नै हेतइ ताबे ओहो थीर होइए, तैबीच अपनो अधखरूआ काज पूरा लइ छी। ओहो नि‍चेन हएत अपनो नि‍चेन हएब तखनि‍ खरि‍यारि‍ कऽ बूझि‍ लेब।
बेरका समए। चाह पीब चेतानन्‍द रवि‍शंकरकेँ चाल पाड़लनि‍। अबि‍ते रवि‍शंकर पुछलकनि‍-
“कि‍ए सोर पाड़लौं?”
चेतानन्‍द बजला-
“तखुनका बात नीक जकाँ नै बुझलौं?”
रवि‍शंकर बाजल-
“जाबे धरि‍ गामक माटि‍-पानि‍, गाछ-बि‍रि‍छ, माल-जालक संग परि‍वारकेँ नै बूझि‍ लेब, ताबे अपन सीमा-सरहद नीक जकाँ नै बना सकै छी।”
माटि‍-पानि‍, गाछ-बि‍रि‍छ इत्‍यादि‍ सुनि‍ चेतानन्‍द बजला-
“ई कोन बड़का उलझन भेल जे तूँ ओझराएल छह। सात सए बीघाक गाम अछि‍, एगारहटा पोखरि‍ अछि‍। इनार तँ मरि‍ये गेल अछि‍। दूटा बाट गाममे अछि‍। जे दुनू मि‍लि‍ चौराहा बनल अछि‍। एकटा पूबे-पछि‍मे अछि‍ आ दोसर उत्तरे-दछि‍ने। तैसंग पाँच सए परि‍वारो अछि‍।”
चेतानन्‍दक वि‍चार सुनि‍ रवि‍शंकर बाजल-
“बाबू, जे बात नै बूझल छल से बुझलौं। कनी थमहू, कागतपर लि‍खि‍ लेब नीक हएत।”
कागत-कलम आनि‍ रवि‍शंकर बाजल-
“गामक रकबा केते अछि‍?”
“सात सौ बीघा।”
“परि‍वार केते अछि‍?”
“पाँच सौ।”
“अपना केते जमीन अछि‍?”
“साढ़े पाँच बीघा।”
“तखनि‍ तँ परि‍वारक हि‍साबसँ बेसी अछि‍?”
“हँ से तँ अछि‍ए। तँए कि हम बेसी खेनि‍हार छी?”
बेसी खेनि‍हार सुनि‍ रवि‍शंकरक मन ठमकल। मुदा जखनि‍ चोर-मोट सोझहेमे अछि‍ तखनि‍ पुछि‍ए लेब नीक हएत। पुछलकनि‍-
“बेसी खेनि‍हार माने?”
चेतानन्‍द कहलखि‍न-
“बाउ, अपनो मनमे अछि‍ जे जेते खेतमे काज केनि‍हार छथि‍ हुनका सबहक बीच एक रंग खेत होन्‍हि‍, जइसँ श्रमक प्रति‍योगि‍ता हएत। मुदा जेकरो बटेदारी, भूदानी खेत भेलै, सेहो सभ कि‍यो भरना लगा तँ कि‍यो केबाला कऽ दि‍ल्‍ली–बम्‍बै धेने जा रहल अछि‍। तैसंग जि‍नका बेसी छन्‍हि‍, ऊहो नोकरी-चाकरी करए चलि‍ गेल छथि‍, गामक खेत तँ आेहने परती बनि‍ गेल अछि‍ जेहेन उजड़ल गाम होइ छै। तखनि‍ तोहीं कहऽ जे की कएल जाए?”
प्रश्नकेँ ओझराइत देखि‍ रवि‍शंकर बाजल-
“पहि‍ने अपन समए आ खेतीक मि‍लान करए दि‍अ, तखनि‍ फेर आगू गप करब।”
उत्‍सुक होइत चेतानन्‍द बजला-
“हँ, हँ, नीके सोचै छह। कोनो काज करैसँ पहि‍ने बूझि‍-जानि‍ लेब बेसी नीक होइ छै।”
रवि‍शंकरक जि‍ज्ञासा देखि‍ चेतानन्‍दकेँ खुशी भेलनि‍। मनमे उठलनि‍, ‘नै दुनि‍याँ तँ कम-सँ-कम अपन परि‍वारक तँ सभ एक रंग खाएब, ओढ़ब-पहि‍रब, एकरंगक घरमे तँ रहब।’ यएह ने भेल परि‍वारक एकरूपता। ई तँ नै ने जे कुरसीपर बैसल बेटा बापकेँ कहत- ‘ऐ बूढा, कहाँ रहता है।’ मुदा जखनि‍ अकासे फाटि‍ गेल अछि‍ तखनि‍ दरजीक बपहारि‍ए कटने की हएत?
साँझक समए। लालटेन नेसि‍ चेतानन्‍द दरबज्‍जाक चौकीपर चाह पीब असगरे बैसल रहथि‍। बाजाप्‍ता कागज कलम नेने रवि‍शंकरो आबि‍ बैसल। हाथमे कागज देखि‍ते चेतानन्‍द पुछलखि‍न-
“बौआ, कथीक कागत-पतर छि‍अ?”
जहि‍ना कोनो काजकेँ पहि‍ने भूमि‍का बान्‍हल जाइ छै तहि‍ना भूमि‍का बान्‍हि‍ कागत खोलि‍ रवि‍शंकर बाजल-
“बाबूजी, अपन कि‍सान परि‍वार छी।”
कि‍सान परि‍वार सुनि‍ चेतानन्‍द बजला-
“से तँ छीहे। जँ से नै छी तँ कि‍ए बड़को-बड़को कुरसीबला अपनाकेँ नि‍धोख कि‍सान परि‍वार आ कि‍सानक बेटा बजैए।”
मुस्‍कीआइत रवि‍शंकर बाजल-
“पहि‍ने सुनि‍ लि‍अ, तखनि‍ अपन वि‍चार देब। पानि‍ खेतीक प्राण छी। बि‍नु पानि‍क कि‍सानक जि‍नगी मुरदाक होइ छै। चारि‍ए मासक बरसात बारहो मासकेँ सजबैए। जँ हाथमे पानि‍ आबि‍ जाएत, तखनि‍ लत्ती जकाँ कि‍सानी पसरि‍ जाएत। तँए कि‍छु खेत बेचि‍ बोरिंग कराएब। खेतीक वि‍कसि‍त रूप बनबैमे जेते खर्च हएत ओ खेत बेचि‍ कऽ करब।”
चेतानन्‍द मुड़ी डोलबैत बजला-
“घर-परि‍वार सुमझाबैक अर्थ ई नै ने होइ छै जे वि‍चार रोकल जाए। जे मन फुरह से करह मुदा पाँच कट्ठा तीमन-तरकारीले हमरो बना दि‍हऽ देखै छी जे तेते ने लोक दबाइ दइ छै जे ओकर गुणे बि‍गाड़ि दइए। अपना हाथे उपजाएब मनसँ खाएब। अछैते औरुदे मरनाइओ नीक नै छी।”
चुटकी लैत रवि‍शंकर बाजल-
“घरक आगूओमे धनखेतीए रखने छी आ मन नि‍रोग तरकारीपर जाइए।”
चेतानन्‍द कहलखि‍न-
“अखनि‍ तूँ नै ने बुझबहक। ई खेत गोरहा छि‍अ। नहि‍योँ तँ बोरा कट्ठा भइए जाइए।”
“जइबेर रौदी भऽ जाइ छै?”
“एते लोक हि‍साब जोड़त तखनि‍ काज चलतै।”
“तँए ने...?”
mmm


केलवाड़ी


पूर्णिमा हिसाबे अदहा कातिक टपि गेल मुदा सकराँइतिक हिसाबे पचीस दि‍न पछुआएल अछि। रातिए दिवाली भेल, परीवक पखेबो आ धनमनतरि सेहो छी। काल्हि भरदुतीओ आ चित्रगुप्‍तो छी। साठि बर्ख पार केला पछाति‍ जीवन काका नव जिनगी पाबि केलवाड़ी पहुँचला।
चारि कट्ठा चौमासा (पानि भेटने) वाड़ी-फुलवाड़ी केलवाड़ी बनि हँसैत देखि‍ बीच केलवाड़ीमे बैसि‍, वृन्‍दावन जकाँ कखनो नजरि उठा कोनो घौरपर दैत तँ कखनो पूर्बाक लहकीमे लट-पट सट-पट करैत भालरि‍ सभकेँ सेहो देखैत रहथि‍। लहकीमे लहकि जीवन काका अपन संगी-केलवाड़ीक परि‍चए-पात करए लगला। बाबाक लगौल आमक गाछीकेँ अदहा उपटा केलवाड़ीमे जि‍नगी देखि‍ रहल छी। आमक गाछीमे बबो अहिना ने देखै छल हेता यएह धड़-धरती ने कुलो-खनदान, उपजो-वाड़ी, खेनाइओ-पीनाइकेँ अपना पेटमे समेटि‍ कऽ रखने अछि। बाबाक बराबरी कहाँ कऽ पाबि‍ रहल छी। पछिला सर्वेमे जेते हुनका खेत छेलनि‍ तेते तँ हमरो अछिए। मुदा सबहक अपन समए होइ छै, तहीक कर्तो-धर्ता ने छी। हुनका अमलदारीमे गाममे एकटा वैद्य छला। वैद्य की छला अखुनका करखन्ना जकाँ छला। अपने हाथे मंडूल बनबै छला, जे पौण्‍ड रोगक रामवाण छेलै। सीतामढ़ीसँ पूर्णिया, नेपालक झँपा जि‍लासँ लऽ कऽ वीरगंज होइत गंगाक उत्तरी छोर धरिक बजार छेलनि। रोगीक आवाजाही छेलनि‍। जहि‍ना इलाकाक लोक वैद्य जीकेँ जनैत तहि‍ना रहैक जगह बाबाकेँ सेहो जनैत रहनि‍। अनका अपेक्षा स्‍थि‍ति बहुत नीक नै रहनौं, दरबज्‍जाकेँ दरबज्‍जा बना रखने छला। अनठिया-बहरबैया लेल कोनो रोक-राक नै, मुदा तँए कि‍ गामो ओहने छल। नै। जातीय रंग-रूप नीक जकाँ गछाड़ने छेलै। बाबासँ आगू बढ़ि‍ अपनापर नजरि‍ पड़िते जीवन काका चौंकला, की अपने जकाँ पोतो मनमे रहबै, नै। अहि‍ना ऊहो सोले-साल बरखी आ पि‍तृपक्षमे मन पाड़त! मुदा एना भेल किए? अपना अछैत जुआन बेटा काज करै जोगर भेल, बाहर कमाए कहलिऐ। परि‍वारमे अन्न-पानिसँ लऽकऽ रूपैआ-पैसा धरि‍क काज पड़ि‍ते छै। कि‍सानी जि‍नगीमे नगदी खेती नै भेने पाइक समस्‍या छैहै। पढ़ौनाइ-लि‍खौनाइ, दबाइ-दारू, लत्ता-कपड़ा सभ तँ कीनै पड़ै छै।
अखनि धरि‍ जीवन काका अपनाकेँ अपन सीमानक भीतर बुझै छला तँए मनमे कोनो लहरि‍ नै उठै छेलनि‍। उठबो केना करि‍तनि‍? जाबे समुद्र आकि‍ मरूभूमि‍मे जुआरि नै उठैत ताबे केना लहरि‍-लहरि‍ लहराइत वायुमंडल दि‍स बढ़ैत। ओना खुशीलाल आज्ञाकारी बेटा छन्‍हि‍। तैबीच वैचारि‍क मनभेद केना बनल से बुझित जीवन कक्काक मन बगदि‍ गेलनि‍। जहि‍ना पोसो हाथी बगदि‍ जाइत तहि‍ना। भेल र्इ जे खुशीलालकेँ एते छूट तँ दाइए देने छेलखिन जे नीक काज बि‍ना केकरो पुछनौं करब अधला नै। आज्ञाकारी बेटा केतौ सीमाक उल्‍लंघन नै केलनि‍, मुदा सीमाक उल्‍लंघन तँ भाइए गेल। नव पद्धतिक पढ़ाइ एकभग्‍गू भऽ गेल अछि‍, जखनि‍ कि जीवन काका समग्रतामे बि‍सवास करै छथि। मुदा जीवन काकाकेँ अपनो मन उग-डूम तँ करि‍ते छन्‍हि‍ जे बेटा ई बात अखनि‍ धरि‍ किए ने बूझि‍ पौलक जे भँसि‍ गेल। माए-बाप जीबैतै दिशा ने बेटा-बेटीकेँ सि‍खौत-पढ़ौत आकि‍ जि‍नगी भरि‍ संगे-संग रहि‍ बेर-बेर सि‍खबैत रहत। जँ से हेतै तँ जि‍नगीओ आ कालखंडोक बँटवारा केना हेतै। की आब कि‍छु कहब उचि‍त हएत? उचि‍त तँ ओइ दि‍न तक होइत जइ दि‍न काज करैले डेग उठबए लगल, अन्‍तो-अंत धरि‍ जँ कहैत। मुदा आब?‍
गंभीर प्रश्न जीवन काकाकेँ गंभीर परि‍स्‍थिति पैदा कऽ देलकनि। जँ बताह जकाँ बड़बड़ा बेटोकेँ कहबै, पुतोहुओकेँ कहबै आ जँ कहीं टोकारा पाबि‍ खि‍सिया कऽ गाम दि‍स टहलि समाजोकेँ कहबै, से उचि‍त हएत? काजक तँ फले काजक पूर्णता छी। ऐठाम तँ ओहूसँ बेसी परिस्‍थिति चहकि गेल अछि। तेहेन पढ़ाइ-लि‍खाइ भऽ गेल अछि जे अखनि‍ ने मोटगर पाइ देखै छै, मुदा रि‍टायर करि‍ते अदहा भऽ जाएत, आ बेटा-बेटीक जि‍नगी तेते भारी भऽ जेतै, जे सम्‍हारि‍ नै पौत। एहेन परिस्‍थितिमे कि‍यो माए-बापकेँ देखत आकि‍ बेटा-बेटीकेँ। उगैत सुरुजक दर्शन ने शुभ होइ छै आकि‍ डुमैत सुरूजक। तखनि‍? जेकरा मूस जकाँ बि‍ल खुनैक लूरि‍ नै होइ छै तेकरा लेल दुनि‍याँ जे होउ मुदा जेकरा खुनैक लूरि‍ हेतै ओ सीमा किए टपत। बाढ़ि‍ औतै ऊँचकापर चलि‍ जाएत रौदी हेतै नीचका दि‍स बढ़ि‍ जाएत। यएह सोचि‍ जीवन काका चारू कट्ठा खेतकेँ, जे आमक गाछी तोड़ि‍, केलवाड़ीओ आ तीमनो-तरकारीक चौमास खेत बना लेलनि‍। खेतोक लीला की कृष्‍ण लीलासँ कम अछि‍, रौदी भेने जीरो, सुभ्‍यस्‍त समए भेने हीरो। केतौ तीनिओ बीघा बीघासँ कम गोबरबैए तँ केतौ बीघा पाँच बर गोबरबैए।
चारू कट्ठाक बीच एकटा कल गड़ा लेलनि, चारूकात निम्‍मन हाता कटा, माटि‍ ढहै दुआरे साबे आ आड़ि‍पर अनरनेबा, नेबो, दारीम, सरीफा इत्‍यादि‍ छोटका गाछबला फलक रोपि‍ देलखि‍न। डेगसँ नापि‍ एक-एक लग्‍गीक दूरीमे केरा गाछ सोहो रोपलनि। जे चालीस बीट भेल। जेठुआ रोप भेने काति‍कमे दू-दूटा पौंच गाछ देलक। मघारि आबि‍ फूटि गेल। कुहरि‍ कहारि‍ कऽ घौर भेल। खैर जे भेल, भेल तँ। वएह बीट तेसर सालमे पहुँच गेल। साठिटा घौर पनरहसँ पचीस हत्‍थाक भेलनि।
एक तँ ओहि‍ना मन तुरुछाइत रहए जे आइए झंझारपुरक हाटो छिऐ आ पखेब पावनिओ। हाटो तेहेन जे सुति‍ उठि‍ आँखि मीड़िते वि‍दा होउ। केना चौरीसँ करमी लत्ती आनब, सोनहौनक ओरि‍यान करब। जखनि‍ दुनू काज लोके हाथक छी तँ आगूओ पाछू कएल जा सकै छेलै। खैर जे होउ। गर अँटबैत झंझारपुर हाट गेलौं। केरोक सूर-पता लगबैक छल आ पावनिओक वस्‍तु-जात कीनैक रहए। हाटपर पहुँचलो ने रही आकि आढ़ति‍बला भेट गेल। पुछलिऐ-
“कारोबारक की हाल-चाल अछि?”
मनमे एक्को मि‍सि‍या नै रहए जे अधला नजरि‍सँ पूछि रहल छि‍ऐ। तीन माससँ झंझारपुर गेलो नै छेलौं। हाल-चाल सुनि‍ते गुम्‍हरि‍ कऽ बाजल-
“सभ बूडि गेला गंगा नहए आ ई रहि गेला गामेमे।”
परि‍चि‍त लोकक मुहेँ कठानि बात सुनि‍ अवाक् भऽ गेलौं। आगू बढ़ि भाँज लगल जे हाजीपुरसँ लऽ कऽ भागलपुर धरिक बीचक जेते अछि‍ सभ लगा कऽ केरा दहा गेल। जे केरा खुदरा-खुदरी गाम धरि‍ पकड़ि‍ नेने छल। की गाममे केरा सन फलक जेकर खेतीओ असान, तेकर कीनिनिहार कि‍सान बनि‍ गेल छथि! झंझारपुरसँ वि‍दा होइते मनमे उठल जे केरा घौर छौड़ाक कबुला छै, जँ से नै भेलै तँ छौड़ाक माए घरोमे ने रहए देत। मन ठमकल, एहेन कबुले की जे सौंसे घौर कबुला कऽ लेलनि‍। जे कीनि‍ कऽ खाइए ओ दर्जनक हि‍साबसँ कीनत आकि‍ घौरे कीनि‍ लेत। आइसँ पाँचे दि‍न छठि‍क रहल तहूमे तीन दि‍न पहि‍नेसँ शुरूहे भऽ जाइए। जखनि‍ चीजो ने हाट-बजारमे छै तखनि‍ एहेन की हमहींटा छी आकि‍ अपन अड़ोसीओ-पड़ोसीओक गति‍ सएह हेतनि‍। पत्नी बड़ खिसिएती तँ पाइ आगूमे फेक देबनि‍। पाइ देखि‍ जखनि‍ दोसर-तेसरसँ भाँज लगतनि‍, अनेरे ने उचि‍ती-वि‍नती कऽ छठि‍क वि‍सर्जन करती। दलदलसँ सक्कत माटि‍पर पएर पड़ल। मन थीर भेल। मुदा ई तँ अपना मनमे छल। झंझारपुरसँ अबि‍ते पत्नी झपटि‍ कऽ बजली-
“जेकरा काज करैक छिछा रहै छै से ने काज करैए आ जे सदि‍काल जेबीए टोबत ओकरा बुते देवता-पित्तर राखल हेतै।”
अपन हारल की बाजब। अनधुन बि‍ना कौमा-फुलस्‍टोपक बजैत-बजैत बजा गेलनि-
“गामेमे जीवन काका केराक वोन लगौने छथि।”
हारल मन घूमि तकलक। बजलौं-
“एना किए छान-पगहा तोड़ने जाइ छी। अखनि पाँच दि‍न पावनि‍मे बाँकी छै। तैबीच की कोनो ओछाइन धऽ लेब। आकि‍ छुटल-बढ़ल जे काज अछि तेकरे जोड़ियाएब।”
मुदा मानि‍ गेली। खेला-पीला पछाति नीनो किए हएत बड़दकेँ सोनहौन पिऔनाइ रहए, गरदामी देनाइ रहए, तैसंग धानो काटि कऽ नै अनने रही, ऊहो आनए पड़त। पान ओ (पत्नी) पीसि देती मुदा लगा कऽ तँ अपने दिअ पड़त। जेते काल नीन घेराएल रहल तेते काल टटका गपो सभ गपकेँ ठेलने रहल। तँए कखनो मन हुअए जे एहेन कबुला केनि‍हारि‍केँ चारि‍ थापर लगा दियनि। कहू जे एहनो हाड़-काठबलाकेँ कबुला-पाती केने धिया-पुता हएत।
बरदकेँ सोनहौन-तेल पीअबैत गरदामी पहि‍रबैत, सींगमे तेल लगबैत, मुँहमे पान खुआ दूधाएल धान, आगूमे दैत केराक भाँजमे जीवन काका ऐठाम वि‍दा भेलौं। दरबज्‍जा खाली देखि‍ मनमे उठल, लोक या राजधानीएमे रहैए आकि वोनेमे। जखनि दरबज्‍जा सून छन्‍हि तखनि‍ केदलीए वोनमे हेता। तहूमे एक तँ छठि‍क लहकी दोसर तेहेन इलाकाक केरा वोन दहाएल जे अनेरे एकक तीन हेतनि। चारूकात चकोनो होइत करजान पहुँचिते जेना मने हरा गेल। कहू जे एकटा घौर लेल एक दुपहरि‍या हरान भेनौं, नै भेल। जेकर वोने देखै छी। जइसँ तरपट्टीओ सुनए पड़ल। मुदा परि‍वार तँ परि‍वार होइ छै, एहेन-एहेन बातक जँ मद्दी हएत तखनि‍ परि‍वार ठाढ़ रहत। भूतलग्‍गू घर जकाँ अनेरे ढनमना कऽ खसि पड़त। केलवाड़ीक हत्तापर ठाढ़ होइतै भेल जे बिना चीजबलाकेँ पुछने आगू डेग उठाएब उचि‍त नै। मुदा देखबो तँ नहियेँ करै छियनि। गर लागल। बजलौं-
“काका छी यौ, काका?”
जहिना राति‍मे ओछाइनपर पड़ल अनभुआर बोली सुनि‍ अकानए लगैए मुदा उत्तर दोहरेला पछाति‍ तेहरेलोत्तर दइए। जीवनो काका बोली अकानए लगला। बुझलेहे जकाँ दोहरी अवाज दैत डेग आगू बढ़ेलौं एक तँ केराक वोन, गाछो अवाज रोकैत आ पातो। तैसंग शर्बतक गि‍लास जकाँ अवाजोकेँ दुनू घोड़िते अछि। एक तँ निशाँएल जकाँ जीवन काका बैसल रहथि‍। बहरबैया अवाजकेँ नीक जकाँ नै अकानि‍ सकला, सहरगन्‍जे बजला-
“के छिअ, आबह।”
आबह सुनि‍ मनमे हूबा भेल जे हाजि‍री दर्ज भाइए गेल। जीवन काका बि‍सरि‍ गेलौं। बिच्‍चेमे केरा घौर वि‍चारकेँ बोहि‍या देलक। साठि-सत्तरिटा कटैबला केराक घौर। कि‍छु तरकारीबला आ कि‍छु फुल्‍लीओ छइहे। जइमे कोशा लगले छै। देखैत दोसर कोन दि‍स पहुँचलौं आकि‍ काका बोली देलनि‍-
“के छियऽ केम्‍हर गेलऽ।”
बाढ़िक इलाकामे जहि‍ना लोक पुक्की-पाड़ि‍-पाड़ि जि‍नगीक उपस्‍थिति दर्ज करबै छथि, तहि‍ना हमहूँ बीटे-बीटे, दोगे-दोग देखैत पूबरिया-उत्तरबरिया कोण दि‍स बढ़ि‍ गेलौं। बढ़ि‍ की गेलौं, केरा अपन जिनगीक कथा देखबए-सुनबए लगल। कि‍छु उत्तर नै देब उचि‍त नै बूझि बजलौं-
“काका, तेहेन वोन अहाँ लगा देने छि‍ऐ जे बौआइ छी।”
“अच्‍छा बोली अकानैत चलि‍ आबह।”
लग अबि‍ते जेना बूझि‍ पड़ल जे जीवन काका जेना सोनाक घैल पौने होथि तेहने खुशी देखलियनि। खुशीओ केना ने हेता, घोंग्‍हीसँ मोती, कोयलासँ हीरा होइते अछि तखनि‍ महि किए ने अकास उड़ए। जे केहेन सोंगर लगौलासँ काज चलत। जँ से नै भेल तखनि‍ तँ अनेरे बनलो काज बिगड़ि जाएत। मुस्‍कीआइत तीर फेकलौं-
“काका, बुढ़ाड़ीओमे जेना केंचुआ छोड़ने होइ तेहने चकचकी बूझि पड़ैए।”
हमर बात सुनि‍ काका गुम भऽ गेला। अगुता कऽ ओहन जकाँ नै जे कहबै सासुरक सुपारी खुआबह। तँ कहत जे तीनटा सारिओ अछि। केचुआ छुटिते ने नव-जीवन भेटै छै। मुदा बातकेँ बदलैत बजला-
“पहिने ई कहऽ जे अगुताएल तँ ने छह? तेहेन अखनि पावनिक लदान पड़ि गेल अछि जे दमो माड़ैक छुट्टी नइए।”
काजो अपने रहए, काज तँ काजे छी। एकक पछातिओ दोसर हएत, तइले झंझारपुरक समए अछि आ ऐठाम नै अछि। बात बिहियबैत कहलियनि-
“काका, हम तँ छेहा बेरोजगार छी। अनेरे भरि‍ दि‍न ढहनाएल घुमै छी।”
हाथक इशारा दैत बैसबैत बजला-
“बौआ, केचुआ छोड़ैक लूरि‍ जेकरा रहै छै वएह ऐ धरतीक सुख बुझै छै। अपना ऐठाम केराक खेती अदौसँ होइत आबि रहल अछि। जेहने गुणगर तेहने पेटभर। मुदा ऐठाम तँ पौष्‍टिक वस्‍तुक उत्‍पादन होइ वा नै होइ मुदा जन-जनकेँ पोष्‍टिक अहार भेटि‍ रहल छै। जइसँ स्‍वस्‍थ शरीरक ि‍नर्माण भऽ रहल छै।”
साँस छोड़िते मन पड़लनि‍ जे किम्‍हर आएल से तँ पुछबे ने केलौं। आ अनेरे सासुरसँ भागल स्‍त्रीगण जकाँ भटभटाइ छी। मुदा लगले मन सम्‍हरलनि। दुआरपर आएल अभ्‍यागतकेँ चट दनि‍ पूछि‍ देब जे केम्‍हर एलौं, सेहो तँ नीक नहियेँ। भने चाससँ समार भऽ गेल। एक रस भेने ने अनुकूलता अबै छै, ओना जँ ओहन वस्‍तुक शर्बत बनाएब जेकरा छानए पड़ैत तखनि अनेरे किए एक बेर पानि‍ छानू दोसर बेर शर्बत। एक्के बेर किए ने छानि एक रस बना लेब। बजला-
“बौआ, केम्‍हर एलह, से पहिने बाजह। ई काज भेल, काजकेँ कखनो टाड़ैक वा अँटकबैक काशिश नै करी। ई दीगर भेल जे कोन काज केहेन काज।”
जहि‍ना तीन कोनियाँ तीर आकि‍ बंशीक कोण अपने दि‍स बैसला जकाँ रहै छै जे प्रवेश काल तँ पैसि गेल मुदा नि‍कलै काल खोखरनहि औत। जीवन काकाकेँ मचकीपर चढ़ल देखि आस मारलौं। मुदा केकरोसँ कि‍छु मंगैसँ पहि‍ने केकरो दोख अबै छै। मन घुड़ि‍या गेल जे जँ अपन दोख लगा कहबनि‍ तँ सोझहा-सोझही गप केना करब, जँ पत्नीक दोख लगाएब ऊहो नीक नै हएत, कि‍छु छथि‍ तँ अर्द्धांगिनी तँ वएह छथि। जँ समूहमे कबुलाक चर्च करब तँ मुहेँ छि‍ऐ जँ कहीं बजा गेलनि‍ जे एहेने पुरुख छह जे कबुला-पाती केने धिया-पुता होइ छह। असमनजसमे पड़ले रही आकि काका बजला-
“समाजमे ने केकरोसँ लजाइ आ ने छिपाइ। आन किए बुझै छह। एते केरा जे लगौने छी से अपने खाइले, पाकल घौर पाँच दि‍न अँटकै छै। जँ चरि‍-चरि छीमी खाएब तँ बीस छीमी भेल। एहेन-एहेन हत्‍था सभ अछि‍ जइमे पचीस-पचीस छीमी छै। तोहीं कहऽ जे एको हत्‍था अपना बुते सठत।”
रसगुल्‍ला रसक बोरमे डुमल कक्काक बात सुनि‍ जेना अपने हँसी फुटि गेल। कहलियनि-
“काका, छठि पावनि छिऐ, एक घौर केरा लेब। आन साल तँ दू-तीन हत्‍थाक घौर लऽ कबुला पूरा लइ छेलौं, जइमे बारह-चौदहटा छीमी रहै छेलै, मुदा ऐठाम तँ ओहन घौरे ने देखै छिऐ?”
हम तँ अपना मने कहलियनि। ओ की बुझलनि‍ से तँ वएह जानथि। मुदा अपनोसँ नम्‍हर हँसी हँसि‍ बजला-
“जा जे घौर मन हुअ ओ काटि लिहऽ।”
सुनि तँ लेलौं मुदा मनमे भेल जे कहीं काका भक्की मारलनि तखनि तँ जेतेमे पावनि हएत, तेते केरेमे चलि जाएत। मुदा मन पड़ल जे अपनासँ श्रेष्‍ट लग चुपे रहब नीक। जे कहता ओकरे सरि‍-सुर करैत अपना अनुकूल बनाएब नीक रहत। चुप देखि जीवन काका बजला-
“सुनह, टटका केरामे पानि‍ नि‍कलै छै जे देहो-हाथकेँ आ कपड़ो-लत्ताकेँ दगा दइ छै। तँए पहि‍ने केरे काटि‍ लए जाबे दूध सुखतै ताबे गपो उसरि‍ जाएत।”
कक्काक बात सुनि भरोस भेल जे केरा तँ भाइए गेल, दाम केना पुछबनि‍। जँ दाम लेबाक रहितनि तँ गनि नेने रहितथि, से गनबे ने केलनि। गर भेटल, पुछलियनि-
“छीमी-हत्‍था कहाँ गनलिऐ?”
जेना ठोरेपर रहनि बजला-
“जँ एक साँसमे गामपर लऽ जेबह तँ ओहि‍ना भेलह। नै तँ जेते पावनिक फीरिस्‍तमे जे हुअ ओते दऽ दिहऽ।”
केराक घौर छोड़ि दुनू गोटे बैसलौं। नफगर काज देखि‍ धैनवाद नै देबनि‍ सेहो नीक नै। बजलौं-
“काका, गामक टेक रखि लेलिऐ।”
टेक सुनि काका गुम भेला। की टेक? पाशा बदलैत बजला-
“बौआ, अपन धरती एकसँ एक अन्न, फल, फूल उपजबैक शक्‍ति अपना गर्भमे रखने अछि। तखनि तँ जेहने दुहनिहार तेहने ने कामधेनु। चालिस बर्ख पूर्ब केरा खेती करै छेलौं, मुदा खोप सहित कबुतरो चलि गेल छल जेकरा घुमा कऽ लाबलौं।”
जिज्ञासा भेल। पुछलियनि-
“से की?”
विह्वल होइत काका बाजए लगला-
“जहिना देखबहक जे जामुनक मासमे लोक जामुनक बीआ रोपैए, आम रौपैए, अनारसक मासमे अनारस रौपैए तहि‍ना अपना ऐठाम सरसठिक रौदीक पछाति‍ जे उथल-पुथल भेल तइमे करो खेती आएल। बाहरी किस्‍मक केरा, एकमौसमी। जहपटार लोक अपन पुरना करजान सभ उपटा-उपटा लगा लेलक। जे केरा अपना ऐठाम बहुत पहिनेसँ होइत चलि आबि रहल छल, ओ उपटि गेल। रोपाएल ओ जे समायानुकूल नै छल, अपनो गेल आ जेहो आएल सेहो गेल। मिथिलांचलक केदली वन महराइ गाबए लगल।”
जीवन कक्काक वि‍चारमे रस भेटल। पुछलियनि-
“हेबा की चाहै छेलै, काका?”
प्रश्न सुनि गुम भऽ गेला। कि‍छु काल पछाति गुम्मी तोड़ैत बजला-
“दिनो, उनहल जाइए, केराक दूधो सुखि‍ गेल हेतह।”
प्रश्नकेँ टाड़ैत देखि दोहरबैत पुछलियनि-
“काका, जखनि एते गप भाइए गेल, तखनि कनीक्के पुछड़ी किए छोड़ि देलिऐ?”
ई बुझले ने रहए जे बि‍लमे चलि गेला पछाति जँ साँपक नांगरि पकड़ि खींचौ चाहब तँ नांगरि टूटि जाइ छै मुदा साँपक मुँह नै नि‍कलै छै। विस्‍मित होइत बजला-
“बौआ, जे कहबह, ओ तँ काइए नेने छी, देखिते छहक। मुदा एकटा बात तैयो रहि जाइए। अपन जे पुश्‍तैनी, जुग-जुगसँ अबैत वस्‍तु छल आकि‍ अछि ओकरा अनुकूल समए नै भेटलै, जइसँ आगू बढ़ैत। जे एहेन बाधा उपस्‍थित कऽ देल गेलै जे धात्री गाछ तर भोजन केरा पातक जगह बजरूआ थारीमे होइए।”
उठि कऽ वि‍दा होइत पुछलियनि-
“काका, केराक किस्‍मक नाओं की भेल?”
“ओना केते गोटे मर्तमान कहै छथि, मुदा सहरगंजा नाओं छिऐ मरीचमान।”
दोहरबैत पुछलियनि-
“बजारसँ तँ पकले घौर लऽ अबै छी, एकरा तँ पकबऽ पड़त।”
अदहा बात मुहेँमे छल आकि बड़बड़ए लगला-
“देखह, अपना ऐठाम माटिक तरमे गोरि धानक भूसा, डाबामे दऽ धूकि कऽ पकौल जाइ छै, जे नीक होइ छै। बजारक केरा, तरकारी (टमाटर) आ आम सभकेँ कारबेटसँ पकौल जाइ छै, जे नीक नै होइ छै। अखनि पाँच दि‍न बाँकीए अछि, काल्हि गोरि देबहक तँ समैपर पकि जेतह।”
केरा घौर उठा आँगन अनलौं। जेते गोरे झंझारपुर हाटसँ घूमि-घूमि आएल रहथि, एक्के-दुइए सभ पुछए लगला। मुदा एकटा धोखा भऽ गेल रहए जे पत्नी मन पाड़लनि। मन ई पाड़लनि जे छीमीमे चुन कहाँ लगौलिऐ, कि‍यो देखि नेने हएत तँ पाकत?
पत्नीक बातक कोनो मानियेँ ने लागल। एक तँ कोनो माससँ अनुकूल, केरा पकबैक समए काति‍क होइ छै। मौसम परिवर्त्तनक समए रहै छै। तैठाम चुन की करत?
मुदा अपन अनुकूल बनबैले तँ कि‍छु भकमोड़ अबिते छै, बजलौं-
“ऐ बेर छठि परमेसरी खुशी छथि, देखै छि‍ऐ शुरुहेसँ केहेन बाट धड़ा देलनि।”
अपना जनैत तँ अनुकूल हुअ चाहलौं मुदा से भेल नै। बजली-
“लोकक नजरि नीको होइ छै, अधलो होइ छै। मुदा यएह दुनू नीक अधला तेते वि‍आन करैए जे नीक तँ केते नीक आ अधला तँ केते अधला। पावनिक नाओंपर एक दि‍न केरा खेनहि की। एक दि‍नक भोजे आ राजेक की महत छै।”
पत्नीक बात सुनि अनुकूल नै देखि, पाशा पलटैत बजलौं-
“आब कथी सभ बाँकी रहल, से मन पाड़ि दिअ।”
mmm


मुसहनि


भोरेसँ बेलबा घुसकीपट्टीवालीक हरिअर मन देखि तारतम करैत रहए जे की बात छिएे जे यएह छी, कहियोकाल जहिना खढ़ देखि लप दऽ आगि पकड़ि जरा दइत तहिना बुझि पड़ैत रहैए आ आइ की बात छिएे? मुदा चेहरा केतबो मेकअप किए ने करए हृदैक बात सोलहन्नी तँ नहियेँ बुझि सकैए। घुसकीपट्टीवालीक खुशीक कोनो अरथे ने बेलबाकेँ लगै, दिन बीति गेल मुदा भाँज नै लगल। भाँज लगलै रातिमेखाइकालजखनि मनोनुकूल खेसारी दालिक पाँचटा कचौड़ी थारीमे देखलक। सेहो भाँज सुपते कहाँ लगलै, पुछला पछाति लगलै। लगिते मनोहल्लुक भेलै। हल्लुक होइत मुँहसँ फुटलै-
“ह-ह चेनसेसूतब किने। अनेरे, नान्हिटा गपमे भरिदिन मड़ियाइत रहलौं।”
बेलबाकेँ अपन खेत-पथार नै,ने हरे-बरद, आ ने दोसर समांगे जे एक समांगक कमाइसँ गुजर चलैत आ दोसर बटाइ खेत करैत। सेहो नै रहै। मुदा भगवान जँ खाइले आ बजैले मुँह चीरलखिन तँ कमाइक चालि चलैले हाथो-पएर देलखिन। किछु होउ, ई पैरुख (पुरुखपना) तँ बेलबामे छइहे जे अपन बाँहुबलसँ गामक मुसहनिपर अधिकार केनिहार अछि। तहू भीर तँ दोसराकेँ नहियेँ आबए देने अछि। आबिओ केना सकै छै हल्लुक माटि ने बिलाइ तकैए भारी भीरमेकिए जाएत। की समुद्र मथन पछाति यएह ने बँटवारा भेल जे माटिक ऊपरका अनका दिस बँटा गेल आ नुका कऽ तरमे रखलाहा बेलबाक हिस्सा भेल। दोसरि साँझ। दिन भरिक टालाक काज उसारि, पोखरि-झाँखड़ि दिससँ आबि चीलमक चौरखीमे बेलबा बैसल। घुसकीपट्टीवाली तइसँ पहिने चौरखीकेँ बहारि,चटकुनी बीछा, एकटा गोइठाँ सुनगा रखि देने छलि। बेलबाकेँ बैसिते तेतरा, झिंगुरा, लेलहा सेहो पहुँचल चारू गोटेक बीच अजीव प्रेम। जेना प्रेमास्पद होइत,तहिना एक-दोसराले जान अरपनिहार। ओना चारूक जिनगीमे दूरिओ आ लगिचो, परिवार बनौनहि छै। अपन-अपन किछु चालिओ-परकीत तँ छइहे। तेतराक पहिलुकघरवालीकेँ जहिया बम्बैआ छौड़ा (बम्बइमे नोकरी केनिहार) उड़हाड़िकऽ लऽ गेलै तहिएसँजेना दुनियाँसँ विरक्‍ति भऽ गेलै। मनमे सदिकाल होइ जे बिनु इज्जतक जिनगी ओहने जेहने बिनु गमकक फूल। ओना निर्णए करैमे अगुता जरूर गेल तेतरा। ओ ई नै बुझि पेलक जे पति-पत्नीओक बीच बेक्‍तिगत चालि होइ छै। जे इज्जतक खाम्हीक काज करै छै। बुझबो केना करैत? ओ अर्द्धांगिनि बुझि सभ किछु अदहा-अदही बुझैत। ओना जइदिन स्त्री घरसँ पड़ेलै तइदिन ओते दुख नै भेलै मुदा मनमे सोग तँ समाएले छै। तैयो जिनगीमे हारि नहियेँ मानलक अछि। हारिओ केना मानैत एकटा गेलै दोसर आनि तीनटा बेटा-बेटीक संग परिवार तँ बनौनहि अछि।
चारूगोटे एकठाम होइते जेना आॅफिसमे टेबुल-टेबुलक काज अलग-अलग अंगक होइत तहिना चारूगोटे अपन-अपन काजमे जुटि गेल। झिंगुरा गाँजा,चीलम निकालि आगूमे रखलक। आमदनी परहक टीपगर जहिना गाँजा तहिना समस्तीपुरक बड़की तमाकुल। ओना बेसीकाल चारूगोटे भाँगे पीऐत अछि। बाड़ी-झाड़ीमे फूलक समए भांगक फूलो झाड़ि लइए, आ वसन्ती गाछ बीछि-बीछि सुखा कऽ रखिओ लइए, मुदा परसुका मुसहनि चारूक सुरखीए बदलि देलक, तँए जेहने टीपगर तमाकुल तेहने गाँजा। ओना चारूगोटेक परिवार एकरंगाहे कनीएकऽतल-बिचल छै।झिंगुराक दोसर आमदनी छै। जे दोसरकेँ नै रहै। ओ रहै जे घरवाली फुदनी गछ-चढ़नी, जे गाछपर चढ़ि जारनि तोड़ै, ओना लग्गीओ रखने अछि मुदा केहनो-केहनो घोड़नाह गाछपर चढ़ि कऽ जारनि तोड़ि लइए। तइले कोनो रोको-राक नहियेँ छै। सूखल जारनिक रोको किए हएत। गछचढ़नीए दुआरे सरही आमक गाछीक ओगरवाहि सेहो लोक दइते छै। आगूमे गाँजा अबिते लेलहा लटबए लगल। बेलबा कटकीसँ चीलम साफ करए लगल। तेतरा गोइठाकेँ तोड़ि घुर जकाँ लगा गूल बनाबए लगल। चीलम साफ कऽ बेलबा गिट्टी सेहो खोखरलक। गाँजा लटा, तमाकुल मिला चीलममे बोझि लेलहा तेतरा दिस बढ़ौलक। गूल चढ़ा तेतरा बेलबा दिस बढ़ौलक। चारूगोटेमे बेलबा सभसँ जेठ। बेलबामे सभसँ प्रमुख गुण छै जे केकरो बनहौटा जन नै छी। ने नीक-बेजएमे आ ने पावनि-तिहारमे केकरोसँ एको सेर आकि एको पाइ कर्ज लइए। कियो भैया तँ कियो गुरूकाका सेहो कहै छै। आगूमे चीलम रखि बेलबा भोग लगबैत फुस-फुसा कऽ मंत्र पढ़ए लगल,‘जेकर जे हक-हिस्सा छह से अपन-अपन लऽ जा।’ तीनबेर पढ़िदम मारि, तेतरा दिस बढ़ौलक। मुदा धुँआ मुहेँमे रखि शरबत जकाँ घोड़ए लगल। दम मारि तेतरा जखनि झिंगुरादिस बढ़ौलक तखनि बेलबा मुँहक धुँआ निकालि बाजल-
“परसुका सगुन बढ़ियाँ रहल।”
बेलबाक सगुन सुनि लेलहा खिसिया कऽ बाजल-
“सगुन-तगुन किछु ने होइ छै।”
लेलहाक तामस बेलबा बुझि गेल जे भुखाएल बिलाइ खौंझाइते छै। जखनि ओहो दम मारत तखनि ने मन असथिर हेतै। तँए किछु ने बाजल। ताबे लेलहा हाथ चीलम पहुँच गेल। जिराएल लेलहा रहबे करए तेते जोरसँ दम मारलक जे एकबित धधड़ा चीलमसँ धधकिगेलै। दम मारि जहिना हाथसँ चीलमक धधड़ा मिझेलक तहिना अपनो मनक धधड़ा मिझा गेलै। मुदा तेतरा लेलहाक बातकेँ पकड़ि लेलक। दोहरौनी भाँज जाबे चीलमक शुरू होइ तैबीचमे सवाल फँसि गेल। अपनेमे दू पाटी बनि गेल। दू गोटे कहै जे सगुन-तगुन किछु ने होइ छै आ दू गोटे कहै जे होइ छै। तेहल्ला कियो ने, जेकरा दुनू पंच मानि फड़िछबैत। रूकल चीलमकेँ धुँआइत देखि लेलहा बाजल-
“झगड़ा ने दन चुन-तमाकुल किए बन्न हौ। गप्पो चलतै आ चीलमो चलए दहक।”
जहिना एकघोंट चाह पीला पछाति आकि एक कौर खेला पछाति दोसर अपने अबै लगैत तहिना लुबलुबाइल लेलहा बाजल-
“सगुन-तगुन किछु ने होइ छै।”
दोहरा कऽ बेलबा दम मारि चीलम आगू बढ़बैत बाजल-
“सगुन बड़ पैघ गुण छिएे, तँए एकरा दोखी बनाएब उचित नै हएत?”
बेलबा आ तेतराक विचार एक बटिया रहै तँए एकदिस भऽ गेल आ झिंगुरा, लेलहाक एक बटिया रहै तँए दोसरदिस भऽ गेल। दू-दू गोटेक पाटी चारूगोटेक बीच बनि गेल। बेलबा विचारकेँ रोकैत झिंगुरा बाजल-
“सगुनकेँ दोखी कहाँ कहै छिएे, जँ गुण सगुन भऽ जाए तखनि तँ जरुर नीक भेल, मुदा जँ कोनो काजे केतौ विदा होइ आ माछ-दहीसँ सगुन बनाबी एकरा हम नीक नै कहबै?”
बेलबाक प्रश्नकेँ ठमकैत देखि सोंगर लगबैत तेतरा बाजल-
“दुनियाँ बड़ीटा छै, रंग-बिरंगक खेल चलै छै तँए अनका छोड़ह। अपने बात लएह। परसू जे छह-छह पसेरी मुसहनि भेल तेकरा की कहबहक?”
तेतराक बातकेँ लेलहा लपकि कऽ पकड़ैत बाजल-
“जँ माछे-दहीसँ सगुन बनिते तँ मछिबारे आ माले-जाल बलाकेँ सभ किछु भऽ गेल रहितै, दिन-राति ओकरे देखैत-सुनैत रहैए।”
तैबीच पहिल चीलमक गाँजा जरि गेल। गुलाब तकथीपर लटाएल-काटल गाँजा रहबे करै, झिंगुरा चीलममे बोझि आगि चढ़ा बेलबा दिस बढ़ौलक। तइले अपना बीच कोनो मलिनता केकरोमे नै रहै। करणो रहै जे एक-एके दम ने कियो लगबैए। बरबरिक हिस्सा ने भेल।बड़ बेसी हएत तँ कियो दमगर अछि तँ कनी बेसी जोरसँ दम खींच लेत। तइसँ बेसी की करत? मुदा तैसंग ईहो तँ रहबे करै जे पेटगरोकेँ बेसी खेनो पेटे भरै छै आ कम खेनहारकेँ सेहो पेट भरिते छै। धुँआ फेकैत बेलबा बाजल-
“परसू जे अपना सभकेँ ओते मुसहनि भेल ओकरा नीक सगुन नै कहबै तँ की कहबै?”
जेना लेलहाकेँ प्रश्नक उत्तर बुझले रहै तहिना बाजल-
“तूँसभभलहिं जे कहक मुदा हमर मन नै मानैए। तीन सालक बाढ़िमे, धान तँ उपजि गेल मुदा मुसहनि किए निपत्ता भऽ गेल। जे चीजे निपत्ता अछि ओ सगुन केना भऽ पौत।”
लेलहाक बातमे चोंगरा भरैत झिंगुरा बाजल-
“दिल्ली गेल छहक, रेलबेटीशनमे जे मूस देखबहक तँबिसवासे ने हेतह जे मूस छी आकिबिलाइ। मुदा गाममे तँए देखि‍ते छहक रौदी होइ छै तैयो मूसकेँ पड़ाइन लगि जाइ छै आ बाढ़िमे तँ सहजे जँ नै भागत तँ डुबकुनियाँ काटि-काटि मरबे करत। ई तँ गुण भेल जे सुभितगर समए भेल तँए धानो उपजल आ मूसक बाढ़ि एने मुसहनिओ भेल।”
तेसर चीलम चलैत-चलैत चारूक मन भरि गेल। कौल्हुका विचार करए लगल। तेतरा बाजल-
“काल्हि दू ठाम काज अछि। एकठाम तीनगोरेक आ दोसरठाम दूगोरेक।”
तेतराक बात सूनि झिंगुरा बाजल-
“तीनगोटे तँ जोड़ियाएल छी मुदा पाँचम नै रहने दोसर केना हएत?”
बेलबा बाजल-
“किए ने हएत? दुनू काजकेँ मिलानी करिकऽ देखहक। टुकड़ी बनै जोकर जँ हेतै ओकरा टुकड़ी बना लेब आ जँ नै बनैबला हेतै ओकरा पूरा कऽ करब।”
बेलबाक बात सुनिते लेलहाक मन मानि गेलइ। बाजल-
“बेस तँ भैया कहलहक। दुइएटा ने भऽ सकै छै, या तँ पाँचम केनिहार भाँजऽया तँ काजेकेँ टुकड़ी कऽ दहक।”
तेतराक मन सीकपर टाँगल, तँए खोलिकऽ तँ नै बजैतमुदा मुड़ी डोला-डोला हूँ-हूँकारी भरैत रहए। सीकपर टाँगल ई रहै जे परसू जे मुसहनि खुनलक तइसँ नमहर दोसर रहै। ओना ईहो मनमे उठै जे ऊपरका काज ने हूसि सकै छै, तरका काजपर तँ एकाधिकार अछिए, दोसर कइएकी सकैए। मुदा तँए कि,काज करए जाएब तइसँ दोबर-तेबर बेसी ओइमे हएत, तेकरा पहिने करब आकि जइमे कम हएत, तेकरा करब।
गाममे खेती छोड़ि दोसर काज नै। जे छोट-छोट टुकड़ीमे विभाजित रहैए। छोट-छोट काज रहने कम केनिहारक जरूरति पड़ै छै तँए, बोनिहार-मजदूरक बीच संगठन नै। मुदा शहर-बजारक बीच तँ से नै अछि। पैघ-पैघ कारखाना रहने बेसी मजदूरक जरूरति पड़ैए। तहूमे खेती काज दिने भरिक होइ छै जखनि कि कारखाना चौबीसो घंटा बारहो मास चलै छै। तैसंग ईहो होइ छै जे कारखाना घरमे बनल रहैए जइसँ हवा-बिहाड़िक संग झाँटो-पानिमे चलिते रहैए मुदा से खेतीमे तँ नै होइए। ओना शहरो-बजारमे कारखाना सभ रंग भेने मजदूरक कमी-बेसी होइ छै मुदा जेना-जेना बजार बढ़ैत जाइए तेना-तेना कारखानोक रूप बढ़ल जाइ छै, जइसँ खुदरा मजदूर थौकक रूपमे थकिआइत जाइ छै। जेकर विपरीत गतिए किसानी अछि। जेना-जेना समए आगू बढ़ैए तेना-तेना परिवारो बढ़ै छै आ परिवार बढ़ने खेत विभाजित होइत जाइ छै। विभाजित भेने काजक रूप सेहो छोट होइत जाइ छै। दोसर ईहो होइ छै जे जेकरा बेसी खेत रहल ओ मशीनक सहारासँ काज लइए जइसँ मजदूरक(बोनिहारक) संख्यामे कमी अबै छै। तँए जहिना शहर-बजारक श्रमिक संगठित होइत जाइए तहिना गामक मजदूर अंसगठित होइत जाइए। तैसंग दोसर ईहो छै जे गाम-घरक अधिकतर बोनिहार बन्हुआ बनल अछि जखनि कि शहर-बजारमे से नै छै। ओना शहरो-बजारक रूप बदलि रहल अछि, लोकक (श्रमिकक) काज लोहाक मशीन हथियौने जा रहल छै जइसँ हजारक-हजार हाथ निकम्मा भेल जा रहल छै। जहिना सभ गामक काज तहिना अँहू गामक काज रहने ने काजमे एकरूपता आ ने श्रमिकक बीच एकरूपता। रहबो केना करत, कियो पजेबा घर बनबैए तँए ओकरा सीमेंट-बालु लोहा आ राज मिस्त्रिक जरूरति पड़ै छै आ कियो फूसिक घर बनाबैए तँए ओकरा लकड़ी, बाँस खढ़क जरूरति संगे घरहटि‍याक जरूरति‍ पड़ै छै। जइसँ जहिना काजक एकरूपता नै रहै छै तहिना हाथ आ हाथक ओजारोक एकरूपता नै रहै छै। मुदा छोटो-छोटो काज रहने किछु-ने-किछु एकरूपता तँ रहिते छै। तीन गोरेक काज खढ़ अँटियेनाइ रहै आ दू गोरेक मटिकटियाक। दुनू काजकेँ टुकड़ी बनौल जा सकै छै। खढ़ अँटियेला पछाति चारिदिन खढ़ सोझ होइले जँकियाएल जाइ छै, तहिना खाधि भरैक सेहो अछि। मुदा एकरंग बोइन रहितो कनी हल्लुक-भारी तँ अछिए। एकटा जहिना बैसारी काज अछि तहिना दोसर ठढ़का काज अछि। तहूमे माटिक फेकब भारी भेल, जखनि कि खढ़ अँटियाएब मात्र खढ़केँ सेरिया कऽ छोट-छोट आँटी बनाएब अछि। कोल्हका काज सुनि बेलबा बाजल-
“दुनूठाम एके काज अछि आकि दू रंगक?
तेतराकेँ दुनू काज बुझले रहै, बाजल-
“काज तँ दू रंग अछिए एकठाम खाधि भरैक छै दोसरठाम खढ़ अँटियबैक।”
बीच-बचाउ करैत झिंगुरा बाजल-
“अपना सबहक बीच बेलबा भैया बुढ़े भेल, आ हमरा देखनहि रहऽ जे सातमे दिन बोखारक पथ पड़ल, अखनो तक नीक जकाँ देहमे तागतिनहियेँ आएल हेन परसुए मुसहनि खुनैकाल देखलहक ने जे केते बेर बैसलौं। तँए हम दुनूगोरे खढ़ अँटियाबए जाएब आ तूँ दुनूगोरे खाधि भरए चलि जइहऽ। जुआन-जवान तँ छहे।”
उठैत-उठैत लेलहा बाजल-
“भैया, एहेन प्रेम रहतह तँए सभ दिन आनन्‍दे-आनन्‍द रहतह। नै तँए देखिते छहक?”
देखिते कहैत लेलहा चुप भऽ गेल।बात खुजबे ने कएल? मुदा चीलमक भरल मन छोड़िओ तँ नहियेँ सकैए। झिंगुरा पुछलक-
“की कहलहक?”
लेलहा-
“यएह ने कहलियऽ जे दुनियाँमे केना उनटा-पुनटा होइ छै, जे महिला शरीरसँ पुरुखक अपेछा निरबल होइए ओकरा कारखानाक इंजन आ पुलिसक लाठी हाथमे थम्हा दइ छै आ जे पुरुख सबल होइए ओकरा हाथमे कागत-कलम थम्हा दइ छै। एहने रीतकेँ ने वसन्‍त रीत कहै छै।”
तेतराक आँखिपर निशाँ लटकि गेल, बातक चिड़ौड़ी देखि बाजल-
“अनेरे समुद्र उपछैक कोन चिड़ौड़ीमे लागल छह, ठनका जेकरा माथपर खसै छै से बुझै छै ठनकाक गुण। चलह, अनेरे मनमे खुट-खुटी रखने छह। कौल्हका काज कल्हि देखल जेतै। चेनसँ खाएब, भगवानक नाओं लऽ निचेनसँसुतनाइ छोड़ि अनेरे कौल्हुका चिन्तामे किए माथ धूनब?”
बेलबा बाजल-
“दुनू काज सेरिया लएह, तखिन ओहू मुसहनिकेँ खुनिए लेब।”
बेलबाक बात सुनि तेतरा बाजल-
“भैया, भने खेतमे पड़ल छै। परसुके धान तँ घरे-अँगने छिड़ियाएल अछि ओकरा सदहऽदहक तखनि खुनब।”
तीनू गोटेकेँ जाइते घुसकीपट्टीवाली बेलबा लग आबि बजली-
“संगतिया सबहक भाँजमे पड़ि अहूँ दुइर भेल जाइ छी। कहू जे केतेखान पहिने ठकुरवारीमे घड़ी-घंटा बजलै असतुत भेलै आ अहाँले धैनसन।”
पत्नीक खौंझसँ बेलबा मिसियो भरि डोलल-डालल नै। किएकतँए पत्नीक खौंझक कारण बिनु बुझने डोलि-डालि जाएब नीक नै। बाजल-
“ठकुरवारी ठाकुर सबहक छिएे आकि हमर छी जे ओकर देखौंस करब। हमर तँ यएह संगतिया सभ ने छी जेकरा संगे जीबै-मरै छी।”
निरुत्तर भेल घुसकीपट्टीवाली पाछू नै हटली, पाशा बदलि लेलनि। जहिना शिवजी पाशा बदलि शिवानी भऽ गेला, तहिना। पाशा बदलैत बजली-
“अन्न तीमनक सुआद टटकेमे होइ छै, आकि सेराकऽ पानि भऽ जाइए तखनि होइ छै।”
बेलबोक मन हल्लुक रहबे करै,तँए अवसरकेँ हाथसँ गमाएब नीक नै बुझलक। किएकतँ गमौनाइ ओहने होइ छै जेहने डारिक चुकल बानरक होइ छै। बाजल-
“लोक सुआदले खाइ छै आकि पेट भरैले खाइ छै। सरेने जँ ओकर गुणो निकलि जाए तखनि ने?”
पतिक बात सुनि घुसकीपट्टीवालीक मनमे एलनि, एना जँ बात छिड़ियाएत तखनि तँ काजक गप बिसरिए जाएब। एक तँ ओहिना ओहन बिसराह छी जे आन तँ कनी मनो रहैए जे काजे बिसरि जाइ छी। काजे नै तँ राज की? हृदए खुशीसँ भरलतँए घुसकीपट्टीवाली सोचलनि जे जे बात पति बजता तेकरा जँ मुँह-नांगरि जोड़ब तखनि ने, जँ से नै जोड़ि सोझहे अपने मनमे दोसर काज आबि गेल तखनो तँ गड़बड़ाइए जाएत। घरो कि घर जकाँ रहए तखनि ने,सेतँ सतरहटा भुरकी हरिदम रहिते अछि। हाथमे पानिक लोटा बढ़बैत घुसकीपट्टीवाली बजली-
“लिअ, अखने कलपर सँ अनलौं कुर्ड़ा कऽ लिअ।”
आन दिनसँ दोसर रंग बात सुनि बेलबाक मन खुट-खुटाएल। आन दिन कहाँ पानिक बात बजै छेली, आइ किए बजली! जरूर किछु रहस्य हेतै! मुदा इशारोमे जँ रहस्यकेँ नै रखल जाएत, तखनि तँ ओ तेना तरेमे दबा जाएत जेना कोनो सीखे-लीखे ने रहत। आँखि तँ पत्निक आँखिपर रहै मुदा नजरि नजरि दिस बढ़ौलक। कुर्ड़ा कऽ ओसारपर बैसिते घुसकीपट्टीवाली घरसँ थारी निकालि आगूमे देलखिन। घरदेखिया थारी जकाँ साँठल थारी देखि बेलबाक मनमे भेलै जे बिनु कारणे टिटही थोड़े लगै छै, जरूर किछु बात छिऐ। लगले मन हुमरलै हम कि कोनो घटिया घरदेखिया थोड़े छी जे खेनाइयए-पीनाइमे केकरो गरदनि काटि लेबइ। भातक ऊपरमे पाँचो कचौड़ी तेना पसारल जे आगूमे सानैओक जगह नै। भात सानब छोड़ि बेलबा पहिल नम्बरक कचौड़ी उठा (पहिल नम्बर वएह ने जे आगूमे रहै) हिया-हिया देखए लगल। ई तँ पुड़ी जकाँ लगैए मुदा छी तँ कचौड़ीए। कचड़ी नै छी आ ने पकौड़ी छी, छी तँ सोलहन्नी कचौड़ीए। किएकतँ ओहिना खेसारीक सौंसका दालि, मिरचाइक टुकड़ी आ पिऔजक टुकड़ी टक-टक तकै छै। नून-तेल ने तरे-ऊपरे सटि गेल अछि आरो तँ तकिते छै।
कचौड़ीकेँ निहारि-निहारिदेखैत पतिकेँ देखि घुसकीपट्टीवालीक छाती चहकए लगलनि। बजली-
“ई तँ ओही भगवानकेँ धैनवाद दियनि जे बेटाक पुसौठ हएत, नै तँ जहिना तीनसाल नै केलौं,हाथ-पएर फाटए लगलै तहिना अहूबेर फटितै।”
तीनसाल पूर्वक पुसौठ बेलबा बिसरि गेल। बिसरिओ केना ने जाएत। एक तँ ओहिना गजेरी-भगेंरी गाँजा-भांगक प्रेममे दुनियाँ बिसरैले तैयार रहैए, तैपर बेलबा संगतिया छीहे। संगितियाक जिनगी तँ ओहन जिनगी होइ छै जइमे दस दिसक धार-नाशीक संग गंगा-जमुना सन धारक पानि मिलि समुद्र सिरजन करैए। बाजल-
“पुसौठ केकरा कहै छै?”
लहकी देखि घुसकीपट्टीवाली अवसरकेँ हाथसँ नै छोड़ि बजली-
“एहने मुनसा ने धिया-पुताक पावनि बिसरि धियो-पुताकेँ बिसरि जाइए।”
तैबीच बेलबा पहिल कौर तँछुच्‍छे दालि-भातक खेलक मुदा दोसर करमे जे मिरचाइक टुकड़ी मुँहमे पड़लै से सुसुआते बाजल-
“पावनिमे कि सभ होइ छै?”
धनलक्ष्‍मी जकाँ घुसकीपट्टीवाली बजली-
“किच्‍छो ने होइ छै। जे होइ छै तइसँतँ घर भरल अछि, किच्‍छोकथीताकए पड़त।”
पत्नीक धारक प्रवाहमे बेलबा बाजल-
“शुभ काजमे अनेरे देरी करब कोन कबिलती भेल, तइले पुछैक कोन जरूरी अछि। अच्‍छा ई कहूँ जे पावनिमे की सभ हएत?”
जहिना छोट बच्चाकेँ माए-बाप सिखबै छथि तहिना बिकछा-बिकछा घुसकीपट्टीवाली बाजए लगली-
“पावनिमे किछु ने होइ छै आ सभ किछु होइ छै।”
उड़ैत चिड़ैक बोल जकाँ बेलबा किछु थाहि नै पबै छल। तँए जहिना धार थाहैक नाहक लग्गा होइ छै तहिना थाहैत पुछलक-
“खेबा-पीबामे की सभ होइ छै?”
“अगबे चाउरक चिक्कसक बगीया बनै छै, ओही लऽ कऽ बाल-बच्चाक हाथ-पएरक पुसौट होइ छै।”
“घीओ तेलक काज पड़ै छै?”
“घी-तेल किए कहै छिऐ, नूनो-मिरचाइक काज नै पड़ै छै।
“चिक्कसक मुँह-नांगरि बना,छतिया-पीठिया बनौल जाइ छै, टटका पानिमे नहा कऽ चुल्हिपर सिद्ध कएल जाइ छै। सिद्ध होइते भऽ गेल बगिया।”
“एके रंगक होइ छै, आकि दोसरो-तेसरो रंगक?”
“एकटा सुच्चा भेल, दोसर कुरथीओ दालि दऽ कऽ आ तेसर गुरो दऽ कऽ बनौल जाइ छै।”
“तब तँ नामो सबहक हेतै।”
“छइहे कि‍, जहिना आमक गाछ भेल, आ दालि-दलिहन भेल ई जड़ि भेल। जड़िक पछाति अमुख आम आकि अमुख दालि बनैए। तहिना बगिया जड़ि भेल। दलिबगिया,गुरबगिया किसिम भेल।”
“एकदिन तँएके रंगक ने खाएब, दोसर-तेसर?”
“एना अनाड़ी जकाँ किए बजै छी। पहिलदिन टटका खाएब, दोसर दिन बसिया खाएब, तेसरदिन दलिबगिया खाएब, चारिमदिन गुरबगिया खाएब।”
“गुर दालिए जकाँ केना रहत?”
“खेबै तखनि देखबैतँ केहेन रसगर छै। एते पघिलल रहत जे छातीमे चुहुटि कऽ पकड़ि लेत।”
“जखनि चारिदिनक ओरियान एकेदिन केने भऽ जाएत तखनि अहाँकेँ चारिदिनक छुट्टी दऽ दइ छी। तैबीच कुशेसर आकि सिंहेसर आकि जनकपुरसँ घूमि आउ।”
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pastedGraphic_32.pngशि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’
बड़का साहेव : परम्‍परागत संस्‍कार केर पराभवक वृति‍ चि‍त्र
मैथि‍ली नाट्य साहि‍त्‍यमे लल्‍लन प्रसाद ठाकुरक प्रवेश आधुनि‍क मैथि‍ली नाटकक लेल क्रांति‍काल मानल जा सकैत अछि‍। लौंगि‍या मि‍रचाइ आ मि‍. नीलो काका सन चर्चित नाटकक कृति‍कार लल्‍लन जीक नाटक “बड़का साहेव” सन् 1985 ई.मे प्रकाशि‍त भेल। प्रकाशनसँ पूर्वे 20 नवम्‍वर सन् 1983 ई.मे एकर पहि‍ल मंचन रवीन्‍द्र भवन जमशेदपुरमे लोकप्रि‍यताक नूतन आयाम स्‍थापि‍त केलक।
लल्‍लनजी टाटा स्‍टीलमे अधि‍कारी संवर्गमे नि‍युक्‍त छला। बेस्‍त दैनन्‍दि‍नीमे रहि‍तो अपन अभि‍नय आ साहि‍त्‍य प्रेममे लि‍पि‍त ऐ मैथि‍ली भक्‍तकेँ साहि‍त्‍यि‍क मानस पटलपर ओ नाओं आ ठाओं नै भेटल जेकर ई अधि‍कारी छल। मैथि‍ली नाटककेँ “मंच ि‍नर्देश” आ परम्‍परावादी संस्‍कारकेँ आधुनि‍कतासँ तारतम्‍य स्‍थापि‍त कऽ अपन मौलि‍कताकेँ बचा कऽ राखब हि‍नक रचनाक वास्‍तवि‍क उदेस मानल जाए। ऐ क्रममे महान कलाकार कथाकथि‍त भलमानुष समाजक स्‍वीकृति‍क परवाहि‍ नै कऽ कऽ मात्र अपन उदेसक दि‍स धि‍यान दैत एकटा सरल आ सौम्‍य भाषामे 45 पृष्‍ठक नाटकक लि‍खि‍ मैथि‍ली समाजक आगाँ 30 वर्ष पूर्वे एहेन प्रश्नचि‍न्‍ह ठाढ़ कऽ देलक जेकर नि‍दान अखन धरि‍ नै भेटल। कलाकारक अभि‍यानक मौलि‍क उदेस होइत अछि‍ जनप्रि‍यताकेँ धि‍यानमे राखि‍ मंचन करबाक चेष्‍टा। नाटककार स्‍वयं ि‍नर्देशक छला। ऐ उदेससँ बाहर नि‍कसि‍ कऽ पूर्ण साहि‍त्‍यि‍क रूप देब हि‍नको लेल असंभव छल। मुदा एकरा साहि‍त्‍यि‍क भाषामे सरल वि‍षयकर “मौलि‍क संस्‍कार पराभव” चयन आ ओकरा बहुत हद धरि‍ सफल प्रति‍बि‍म्‍बमे समाहि‍त करब नि‍श्चि‍त समालोचककेँ स्‍तब्‍ध कऽ देलक। इहए कारण थि‍क जे सुधांशु शेखर सन चर्चित साहि‍त्‍यकार सेहो ऐ पाेथीक आमुख लि‍खबाक क्रममे कहुना कऽ पि‍ण्‍ड छोड़ा लेलनि‍।
      वि‍षय बि‍म्‍बमे ऐ नाटकक कोनो वि‍शेष योगदान नै, मुदा आकर्षक अछि‍ तँ उदेसक दूरदर्शिता पूर्ण वि‍वेचन। तेकर परि‍णाम भेल जे “बड़का साहेव”अर्न्‍तराष्‍ट्रीय मैथि‍ली नाटक प्रति‍योगि‍तामे पहि‍ल स्‍थान प्राप्‍त केलक। “मि‍थि‍लाक्षर” नाट्य संस्‍था जमशेदपुरक प्रणेता लल्‍लनजी मैथि‍ली नाट्य मंचनक पहि‍लुक सम्‍पूर्ण हस्‍ताक्षर छथि‍ जे प्रकासमे ओ लोकप्रियता प्राप्‍त केलनि‍। जे देसि‍ल परि‍धि‍मे रहनि‍हार नाटकार लोकनि‍केँ ताधरि‍ तँ प्रात्रत नि‍श्चि‍त नै भेल छल। महि‍ला पात्रक अभि‍नय महि‍लेसँ करौल गेल।
      ऐ नाटकक पहि‍लुक पात्र छथि‍ छेदी झा जे वृद्ध ग्रामीण मैथि‍लक भूमि‍कामे छथि‍। छेदी झाक भागनि‍ चूड़ामणि‍ झा गामसँ शि‍क्षा ग्रहण कऽ कऽ नौकरी लेल प्रवेश परीक्षा देबाक उदेससँ अपन माम संग जमशेदपुर अबै छथि‍। ग्रामीण जीवनमे सहज अर्थ पीड़ाक दंशसँ मर्माहि‍त प्रति‍भाक उद्वेलन एकर पहि‍ल दृश्‍यक मूल उद्बोधन मानल जाए। माम आ भागि‍न दुनू साधन वि‍हि‍न तँए जमशेदपुरमे आबि‍ क्षणि‍क प्रवासक छाँह तकैत बी.सी. झा सन अभि‍यन्‍ताक ओइठाम आबि‍ गेल छथि‍। बी.सी. झा कहि‍यो छेदी कक्काक “बालो” छला। समए आ कालक प्रभावसँ आब ऑफि‍सर बनि‍ अपन मौलि‍क संस्‍कारकेँ बि‍सरि‍ जेबाक नाटक कऽ रहल छथि‍। ऐ नाटकक मूल कारण थि‍क अपन गरीब समाजसँ स्‍वयंकेँ दूर रखि‍ पाश्चात्‍य शैलीक जीवन जीबाक चेष्‍टा द्वारा अपनाकेँ भलमानुष देखेबाक प्रयास। गामक लोक बंगलापर आबि‍ खूब खएत आ गाममे जा कऽ बेर्थ गोलौसी करत। वालचन्‍द झाक स्‍त्री आब “एडभान्‍स” पलायनवादी नटकि‍याक अर्द्धांगि‍नी तँ छथि‍ मुदा अपन मौलि‍कताकेँ छोड़ए नै चाहै छथि‍। ऐमे हि‍नको स्‍वार्थे छन्‍हि‍। जौं अपन घर आएल गमैया मैथि‍लकेँ अपमानि‍त कएल जाएत तँ लोक गाममे खि‍स्‍सा करतनि‍ जे बी.सी. झा जि‍नका -अंग्रेजी नै जनबाक कारणें छेदी कक्का बेसी झा बूझि‍ गेलखनि‍।-क स्‍त्री नीक वि‍चारक नै छथि‍न। ऐ स्‍वाथि‍क संग-संग बेवहारि‍कता नाटकक दोसर कारण छन्‍हि‍। मीना जीक अपन तनया मि‍क्कीक लेल चूड़ामणि‍मे संभावना देखब। छेदी कक्काक अनुसारे चूड़ामणि‍क पि‍ता बी.सी.झामे कहि‍यो “समाधि‍” बनबाक वि‍चार पनकल छल। चूड़ामणि‍क पि‍ता आब नै छथि‍। चूड़ा स्‍वयं मसुआ गेल छथि‍। बी.सी.झा आ हुनक पुत्री मीनाक दृष्‍टि‍मे हि‍नक स्‍थान “टीकधारी” पुरोहि‍तसँ बेसी नै जमशेदपुर सन छोट-छीन बम्‍बईमे टाटा स्‍टीलक माटि‍-पानि‍सँ पोरगर भेलि‍ मीना तँ कन्‍वेन्‍टक छात्रा छथि‍। चूड़ामणि‍क सन“टीकमोहन” केना ऐ शहरी रम्‍भाकेँ रमतनि‍? ओ तँ अपन मैथि‍लीकेँ बि‍सरि‍ जेबाक टाटकमे लागल छथि‍। बापक रचनात्‍मक सहयोग मैथि‍ल संस्‍कृति‍क दोहन मात्र मानल जाए।
नाटककार उद्वि‍ग्‍न छथि‍। सम्‍पूर्ण सहरसासँ मधुबनीकेँ प्रवासमे बसेबाक हि‍नक स्‍वपन्न ढहि‍ रहल अछि‍। एतेक पूर्वे सम्‍भ्रान्‍त मैथि‍लमे अपन संस्‍कृति‍क साँचल शि‍ल्‍पकेँ ध्‍वस्‍त करबाक संकेतन वर्त्तमान समैले एकटा रक्त स्‍तम्‍भ ठाढ़ कऽ देलक। स्‍वयंकेँ कुलीन मानैबला लोक सभसँ बेसी अपन मातृकेँ मर्दन कऽ देने अछि‍। वालचन्‍दक प्रकोपसँ ति‍लमि‍लायल छेदी आ चूड़ा हि‍नका डेरासँ पड़ा जाइ छथि‍। मीनाजी एकटा नीक काज करैत छथि‍न जे अपन मि‍त्र रानीक माध्‍यमसँ चूड़ाक नौकरी लेल पैरवी कऽ कऽ चूड़ाक दृष्‍टि‍मे अपन प्रति‍ श्रद्धा उत्पन्न कऽ लेलीह। रानीक पति‍ वर्माजी द्वारा ई गप्‍प जे पहि‍ने पोल छल आ फूजि‍ गेल। वालचन्‍द झाक उपहारसँ द्रवि‍त भऽ चूड़ामणि‍क पुरुषार्थ जागि‍ गेल। ओ योगदान पत्र फाड़ि‍ देलनि‍।
      कालक चक्र उनटि‍ गेल। चूड़ामणि‍ आब आइ.ए.एस. भऽ गेल छथि‍। वालचन्‍द झा अा हुनक पुत्री मीनाक दृष्‍टि‍मे आब चूड़ामणि‍ टीक मोहन झासँ“चूड़ामणि‍जी” बनि‍ गेल छथि‍। कुलीनक स्‍वार्थक आगू कुकुरो असफल भऽ गेल। कालान्‍तरमे हाथ-पएर जोड़ि‍ मीनाक सि‍नेहकेँ हथि‍यार बना कऽ बी.सी. झा चूड़ामणि‍केँ अपन जमाए बना लेलनि‍। ऐ नाटकमे हास्‍य समागम लेल “भोला” सन पात्रकेँ सम्‍मि‍लि‍त कएल गेल अछि‍। ऐठाम नाटकमे वास्‍तवि‍कता सेहो देखैमे आएल। भोला, बाबूजी आ माए सन सासुरक उपहार पाबि‍ वालचन्‍द झा गदगद छथि‍। एहेन सासुर भक्‍ति‍मे शक्‍ति‍सँ बेसी अपन गि‍रगि‍टि‍या रूपान्‍तरणक नाटक बेसी अछि‍। कालान्‍तरमे बी.सी.झाक जमाए चूड़ामणि‍ जी आब बी.सी.झा (आइ.ए.एस.) भऽ गेल छथि‍। परि‍वर्त्तन तँ प्रकृति‍क नि‍अम छी। मैथि‍ल ऐसँ केना बाँचथि‍...? हमरा सबहक-शि‍क्षि‍त समाजक, सभसँ पैघ वि‍डम्‍बना (जे भलमानुषक मौलि‍क गुण छन्‍हि‍) छी “नकल करबाक पीपासा।” बी.सी.झासँ दस डेग आगू बढ़ि‍ अपन मौलि‍कताकेँ ति‍यागि‍ चूड़ामणि‍जी वि‍देशी शराब पि‍बएबला पलायनवादी बनि‍ गेल छथि‍। कोनो अर्थमे हि‍नका आब मैथि‍ल नै मानल जान्‍हि‍ आ ने ओइले हि‍नका कोनो जि‍ज्ञासा वा तृष्‍णा छन्‍हि‍।
      मंचनक हेतु उपयुक्‍त बनेबाक क्रममे नाटककार ऐ गंभीर चि‍न्‍तनयुक्‍त वि‍षएकेँ कनीक झुझुआन बना देलनि‍ आ नाटक छोट भऽ गेल। जौं लल्‍लन बाबू कनीक आरो चि‍न्‍तन करि‍तथि‍ वा अपन प्रकृति‍केँ गंभरी बनेबाक प्रयास करि‍तथि‍ तँ नाटक बहुत उपयुक्‍त साहि‍त्‍यि‍क कृति‍ मानल जाइतए। ओना लोक अपन प्रकृति‍ आ प्रवृति‍सँ बि‍मुख नै भऽ सकैत छल। समग्र मूल्‍यांकन केलासँ ई तँ नि‍श्चि‍त प्रमाणि‍त हएत जे लल्‍लनजी एकटा अद्भुत व्‍यक्‍ति‍त्‍वक नाटककार छथि‍।
      ऐ नाटकक सभसँ उत्‍कृष्‍ठ सबल पक्ष अछि‍ मौलि‍क संस्‍कारक अद्योगति‍क वास्‍तवि‍क कारण केर तात्वि‍क वि‍वेचन। ऐ क्रममे संवादक रूपेँ जे शि‍ल्‍प सोझहा आएल ओ बड़ पोखगर मानल जाए। समाजक आगूक आसनपर बैसल लोक संस्‍कृति‍क उत्‍थानक लेल स्‍वयंकेँ उत्तरदायी मानैत छथि‍। ई सर्वथा सत्‍य जे मि‍थि‍ला मौथि‍लीक वि‍कासक प्रारंभि‍क दायि‍त्‍व ऐ वर्गपर छेलनि‍। स्‍वाभावि‍क अछि‍ तंत्र जेकरा हाथमे रहै छै सारथी वएह बनि‍ सकैए। लल्‍लनजी ऐ वर्गसँ संबद्ध रहि‍तो रचनामे सभठाम ईमानदारीक अनुपालन केलनि‍।
      मि‍थि‍ला मैथि‍लीक अधोगति‍ लेल सबल समाज जि‍म्‍मेवार छथि‍। शि‍क्षा-दीक्षा गामे ग्रहण कऽ कऽ चमकैत दुनि‍याँमे प्रवेश करैत काल अपन संस्‍कारकेँ गामेमे छोड़ि‍ देलनि‍। पलायन तँ कोनो वर्गमे भऽ सकै छै। अर्थनीति‍ भौति‍कतावादी सोचक आगू मलीन भऽ गेल अछि‍। ऐ पलायनसँ सम्‍पूर्ण भारतवर्ष प्रभावि‍त अछि‍। मुदा आन वर्ग अपन संस्‍कृति‍केँ कोंचामे बान्‍हि‍ पलायन केलनि‍। वि‍डम्‍बना अछि‍ तँ मि‍थि‍लाक भलमानुष वर्गक लेल भस्‍मासुर बनि‍ अपन मौलि‍क संस्‍कारक श्राद्ध मि‍थि‍लाक गहबरक सोझहा करैत पलायनकेँ आत्‍मि‍क स्‍वीकृति‍ दऽ देलनि‍। यएह ने नाटकक दूरदर्शी दृष्‍टि‍कोण मानल जाए।         

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अमर कान्त अमर
सुजीतक गन्ध सुगन्ध छोड़ि रहल (पुस्तक समीक्षा)


साहित्य क्षेत्रमे पत्रकार सुजीत कुमार झा एकटा सशक्त कथाकारक रुपमे उभरि कऽ अएलाह अछि । दू अढाई वर्षमे हिनक पाँचम कृति सार्वजनिक भऽ चुकल अछि । जाहिमे चारिटा कथा संग्रह अछि ।
 
हम पाँचो किताब पढने छी । मुदा गन्ध तऽ गन्धे अछि । एहि पुस्तकमे संग्रहित सभ कथा एकसँ एक अछि । मानव मोनक सुक्ष्मतम सम्बेदनाकेँ छुने अछि । कोनहुँ सामान्यहुँ घटनाकेँ विलक्षण कथाक रुपमे सुजीत प्रस्तुत कएने छथि ।
 
हिनका कल्पनाशीलता अदभूत अछि एकर उदाहरण हिनक पाँचो पुस्तक पढलासँ लगैत अछि । फेर गन्धक तऽ जोड़ा नहि ।
 
नेपाली मैथिली साहित्यमे ओहँुना बहुत कथाकार नहि छथि जे छथिओ से पुस्तक निकालए पर ओतेक ध्यान नहि दैत छथि । मुदा सुजीत जाहि गतिसँ पुस्तक निकालि रहल छथि आ गुणवत्ताक सिढी चढि रहल छथि ओ लाजबाब अछि ।
 
बारहो कथामे चेचक दागबला, गन्ध, मीना कुमारी, दर्दक कथा, अनार वा ई कही कोन बढिया अछि वा खराप छुटिआएब कठीन लगैत अछि । कथा पढलापर अन्तमे तेहन अदभूत घटना वा परिवर्तन देखा दैत छथि जे हृदय आ मोनमस्तिष्ककेँ हिला दैत अछि ।
 
चेचक दागबलामे रेखा नामक एकटा चर्चित कलाकारक जीवनमे एकटा दर्शक अबैत अछि आ ओ दर्शक आ कलाकार बीचक उहापोह स्थितिक वर्णन एहिमे देखएमे अबैत अछि । जखन चेचक दागबला दर्शक अबैत छथि तऽ रेखा डेरा जाइत छथि आ नहि अएलापर प्रतीक्षा करैत रहैत छथि ।
 
आश्चर्य सन हालत रेखाकेँ रहैत अछि जकरा ओ पसिन नहि करैत छथि जकर बात हुनका आकर्षित नहि करैत जे पति सन सुन्दर चेहरा आ शरीरक मालिक नहि अछि ओ ओकर विषयमे किए सोचि रहल छथि । ओ गलत तऽ नहि छथि ? ओ टुटल भावनात्मक सम्बन्धक शिकार तऽ नहि छथि ? हुनका कोनो परेशानी आ दुःख सेहो नहि, फेर रातिमे जखन चारु दिस अन्हार पसरि जाइत अछि तऽ कोनो छोटका सन भगजोगनी हुनकर बन्द खिड़की आ गेटक भीतर रुपमे कोना आबि भुकभुकाए लगैत अछि ई बात रेखा सन प्रगतिशील आ बुधिआरि महिलाक बुझबसँ बाहर अछि ।
गन्ध कथामे मनोहर बाबू एकटा नाम चलल राजनीतिज्ञ छथि । ओ आजिवन कुमारे रहि पार्टी चलाबएकेँ सपथ लेने छथि । हुनकर जीवनमे पार्टीक कार्यकर्तासँग भेटघाटसँ लऽ कऽ संगठन विस्तार आ विकासक काज बढाएबमे लागल रहैत छथि । ४५ वर्षक उमेरमे एका एक हुनका विवाह करबाक इच्छा जगैत छन्हि । एकरे सुजीत बहुत बेजोड़ ढंगसँ कथा बनौने छथि । नव स्वाद एहि कथामे भेटैत अछि ।
मीना कुमारी गन्ध कथा संग्रहक तेसर कथा अछि । एकटा कलाकारकेँ जीवन पर आधारित कथा अछि । एकटा सामान्य व्यक्ति फेकनसँ चर्चित कलकार मीना कुमारी धरिक यात्राक बृतान्त एहि कथामे उल्लेख रहल अछि । डा. राजेन्द्र विमल तऽ नेपालक श्रेष्ठ कथामेसँ एक मीना कुमारीकेँ मानैत छथि ।
सुलेखा दीदी कथामे एकटा वच्चाक कल्पना पर आधारितसँ बेसी वच्चाकेँ सँग टोलक पिसीक काजक अनुभव एहिमे देखाओल गेल अछि ।
 
कोना सुलेखाकेँ एकटा लाइट म्यानसँ प्रेम होइत अछि, फेर लाइट म्यानकेँ हत्या । एकरबाद सुलेखाकेँ विवाह आ फेर दहेज उत्पीडनक नाम पर सुलेखाक हत्या ।
दर्दक कथा एहि संग्रहक पाँचम कथा अछि । जहिना नामसँ दर्द अछि पढलाक बाद आँखिसँ नोर खसा दैत अछि । प्रेमक उत्कृष्ट जादुगरी एहि कथामे देखल जाइत अछि ।
 
काठमाण्डूमे काज करएकेँ क्रममे एकटा मैथिल युवककेँ एकटा गुरुङ्ग महिलासँ भेट होइत अछि आ फेर प्रेम एकर बाद विछोड़ फेर ओ युवककेँ वेलायतमे एक महिला संग विवाह । फेर वर्षो बाद जखन सुमित नामक ओ युवक काठमाण्डू घुरैत छथि तऽ फेरसँ नगिना नामक महिलाक खोजी करैत छथि जकरासँग विचोड़ भऽ बेलायत चलि गेल छलथि ।
 
कथाक अन्तमे लिखल अछि म्यानेजर बुझए चाहैत छल नगिना केँ अछि ? आ सुमितकेँ हुनका सँग की सम्बन्ध छल ? भड़ल आँखि सँ म्यानेजरकेँ विदा लैत सुमित कहलन्हि,‘ की करब ई बुझि कऽ ई हमर दर्दक कथा अछि जे हमरे सँग जाएत ।’
अन्तिम साँझ कथा एक परिवारक कथा अछि । जाहिमे एक पति पत्नी छथि, हुनका एकटा लड़का आ लड़की अछि । माय सेहो अछि । एकटा परिवारकेँ जीवनमे आएब जटिलताक विषयमे बहुत सुन्दर सन प्रस्तुती एहिमे भेटैत अछि ।
 
पोष्टमार्टम कथामे एकटा पत्रकार महिलाक उच्च आकंक्षा आ एकर परिणामकेँ पोष्टमार्टम कएल गेल अछि ।
 
वर्तमान समयमे एहन घटना बराबर देखएमे अबैत अछि । कथ्यक दृष्टिसँ कोनो नव नहि मुदा प्रस्तुती दोसर कथाकारसँ एकरा फरक बना देने अछि ।
 
अनार कथा लाजबाब बनल अछि । एकटा महिलाक पीड़ा एहिमे देखाएल अछि । एकटा गरीबिकेँ बढिया जेकाँ अनुभव एकरा माध्यमसँ कहल गेल अछि ।
 
इम्हर गाछ बढि रहल अछि उम्हर गर्वमे कोनो आकार लऽ रहल अछि । दुलरी सतर्कता अपनारहल छथि । शिशु सकुशल अपन गर्वकाल पूरा करए आ अनार खुब फल लगए । एहि कथाक अन्तमे एकटा बात उल्लेख अछि जे देहकेँ सिहरा दैत अछि । जखन दुलरीकेँ अनार मालिकक बेटा तोड़ि दैत अछि तऽ फुसलाबए लेल मलिकानि दोसर अनार दैत छथि मुदा दुलरी लेब स्वकार नहि करैत छथि । हुनका मोनमे अबैत अछि कुरुपे सही, अपन वच्चा कोनो माय अन्य सुन्दर वच्चासँ नहि बदलैत अछि । सर्वनाशक दर्द लऽ दुलरी अपन घरमे चलि अबैत छथि ।
 
बोझ कथामे वृद्धावस्थामे माय बाप कोना बोझ होइत अछि एकर बहुत मार्मिक ढंगसँ चित्रण कएने छथि ।
अपन सिन्धुली कथा माओवादी जनयुद्धकालक अवस्था मोन पाड़ि दैत अछि । जनकपुरसँ सटले रहल जिल्ला सिन्धुली माओवादी जनयुद्धकालमे केहन बनि गेल छल तकर बहुत सुन्दर वर्णन अछि ।
 
एगारहम कथा परिवर्तन अछि । महिलाक आगा बढएमे आबएबला अड़चनसभकेँ एहिमे देखाओल गेल अछि । एहि कथाक अन्त संयोगान्त भेल अछि । हरेक समय बाधक बनल डाक्टर शिव नारायण अन्तमे पत्नीक आगु हारि मानि लैत छथि ।
 
ओ सुष्मा दिस एना तकलथि जेना आब पुरान राग द्वेषसभ धोआ गेल हुए ।
शायद सुषमो इहे चाहैत छलथि ।
संग्रहक अन्तिम कथा बादल अछि । इहो परिवारक स्थितिक वा ई कही समस्याक रेखांकित करैत अछि ।
 

 
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।

pastedGraphic_5.pngजगदानन्द झा ‘मनु’- ग्राम पोस्ट  हरिपुर डीहटोल, मधुबनी 
  
अनमोल झा जीक पोथी “टेकनोलजी”क समीक्षा

मिथिला संस्कृतिक परिषद, कोलकत्ता द्वारा प्रकाशित श्री अनमोल झा जीक लघुकथा संग्रह “टेकनोलजी” एखन हमरा हाथेमे अछि। पाँछाक तीन दिनसँ लगातार एकरा पढ़ि रहल छी। सुन्नर कवर पेंजसँ सजल तेहने भीतरक कथा सभ एकसँ एक उपरा उपरी।
सबसँ पहिने अनमोल जीकेँ एहि --- कथा संग्रह हेतु बहुत बहुत बधाइ आ संगे संग मंगल कामना जे मैथिली साहित्यमे दिनो दिन ओ शुक्ल पक्षक चाँन जकाँ उदयमान होइत रहथि।
मिथिलांचल टुडे टीमक तरफसँ हमरा एहि पोथीक समीक्षा केर दायित्व भेटल। हमरा लेल ई कठिन काज आ ओहूसँ बेसी कष्टकर छल बिना कोनो पक्ष बिपक्षमे गेने तटस्थ एहि पुस्तककेँ समीक्षा केनाइ। हमरामे कौशल आ शहास दुनूक अभाब मुदा माँ सरोस्वती आ गुरुदेवकेँ सुमिरैत अपन आँखिकेँ पोथीक पन्नापर आ कलमकेँ कागदपर चलबए लगलहुँ।
अनमोल जीक समर्पण देख मोन गदगद भए गेल। जतए आजुक नव पीढ़ी अपन माए बाबूकेँ बोझ बुझि रहल अछि ओहिठाम अनमोल जीक ई पोथी हुनक पूज्य बाबूजीक श्रीचरण कमलमे समर्पित अछि। नवका पीढ़ी लेल ई एकटा नव रस्ता काएम करत।
आगू पोथी पढ़ैसँ पहिने एकटा बात मोनकेँ कचोटलक, जे अनमोल जीक एहिसँ पहिने दूटा विहनि कथा संग्रह प्रकाशित भए चुकल अछि। हुनक नाम मैथिली साहित्यमे एकटा स्थापित विहनि कथाकारकेँ रूपमें लेल जा रहल अछि तकर बादो ओ अपन एहि नव विहनि कथा संग्रहकेँ, विहनि कथा संग्रह नहि कहि लघु कथा संग्रह कहि रहल छथि। जखन की आइ विहनि कथा एकटा स्थापित विधाकेँ रूपमे मैथिली साहित्यमे स्थापित भए चुकल अछि। विहनि कथा आब कोनो तरहक परिचय लेल मोहताज नहि अछि। श्री जगदीश प्रसाद मंडलजी अपन विहनि कथा संग्रहपर टैगौर पुरस्कार जीत कए दुनियाँक बड़का-बड़का भाषाकेँ एहि दिस सोचै लेल बिबस कए देलखिन्ह। अंग्रेजी एकरा seedseedseed”सीड स्टोरी” कहि सम्बोधित केलक। हिंदी अंग्रेजीमे जकर कोनो स्थान नहि ओहेन एकटा नव बिधाक अग्रज मैथिली साहित्य आ ओ बिधा, “विहनि कथा”।
विहनि कथा आ लघु कथामे बहुत फराक अछि। विहनि अर्थात बिया। बिया वटवृक्षकेँ सेहो भऽ सकैए आ सागक सेहो। तेनाहिते मोनक बिचारक बिया जे कोनो आकारमे फूटि सकैए, विहनि कथा। विहनि, बिया, सीडमे सँ केहन गाछ पुट्टै कोनो आकारक सीमा नहि। लघु कथा मने एकटा छोट कथा जेकर आरम्भ आ अन्त दुनू छैक।
अनमोल झा जीक एहि संग्रहक एक एकटा कथा जबरदस्त विहनि कथा अछि। तहन लघु कथाक जामा किएक ? हाँ, किछु गोट लघु कथाक श्रेणीक कथा सेहो अछि मुदा अल्प मात्रामे, जेना पृष्ट संख्या ७६ पर “बढ़ैत चलू”, ७९ पर “समाज”, ८० पर “मर्माहत”, ८२ पर “सपूत सब”, ८३ पर “शोध”, ८५ पर “प्रायश्चित”, ९० पर “बड़का लोक”, ९५ पर “समय समय केर बात” आ पृष्ट संख्या १०१ पर “अप्पन जकाँ"। पृष्ट संख्या ८८ पर “मिथिला राज्यक” तँ नहि विहनि कथा अछि आ नहि लघु कथा, एहिपर जँ कनीक आओर मेहनत कएल गेल रहथि तँ एकटा नीक आलेख अवश्य भए सकैत छल।
प्रकाशक, मिथिला सांस्कृतिक परिषद, कोलकत्ता केर मन्त्री श्री गंगाधर झाजी अपन प्रकाशकीयमे “लघु कथा"केँ एकटा नवीन विधा कहि सम्बोधित कए रहल छथि, एहिठाम जँ ओ विहनि कथा कहितथि तँ साइद उचितो रहितए मुदा लघु कथा आ नवीन विधा हास्यपद। हम एहि कथा संग्रहक कथाकेँ आँगाक  उल्लेखमे विहनि कथा कहि सम्बोधित करब।
“टेकनोलजी” विहनि कथा संग्रह रूपी मालामे कुल १५५ गोट विहनि कथा गाँथल गेल अछि। संग्रहक पहिले विहनि कथा “टेकनोलजी” एकरे नामपर संग्रहक नामकरण भेल अछि। अनुपम विहनि कथा, विहनि कथाक सबटा गुण कुटि-कुटि कए भरल अछि। जतेक प्रसंशा करी कम। एहि विहनिमे, कोना एकटा परदेशीया पुतहु अपन ससुरकेँ मात्र एहि द्वारे पाइ पठाबैक इक्षा रखैत छथि, जाहिसँ समाजमे हुनक नाम होइन। एहि द्वारे ओ नव टेकनोलजी बैंकिंगकेँ छोरि मनीआडर द्वारा पाइ पठबै छथि।
“टेकनोलजी” नाम धरी ई विहनि कथा संग्रह नामक भ्रम उत्पन्य कए रहल अछि। पहिल नजरिमे टेकनोलजी नामसँ एना बुझा रहल अछि जे विज्ञान, टेकनोलजी आदिसँ सम्बंधित विषय बस्तु होएत मुदा एहन कोनो गप्प नहि। समस्त पोथीमे एकसँ एक नीक, रुचिगर विहनि कथा अछि मुदा टेकनोलजी, विज्ञान, तकनीकीसँ सम्बंधित एकौटा नहि।
विहनि कथाक मुख्य अंग संबाद अछि आ अनमोल जीक विहनि कथा संबादसँ डूबल अछि, जबरदस्त ! मुदा संबाद “--------“ इनवरटेड कोमामे बन्द कए कऽ नहि लिखल अछि, एकर अभाब सम्पूर्ण पोथीमे अछि।
दोसर कमी जे हमरा सम्पूर्ण पोथीमे, कथासँ प्रकाशकीय तक लागल, विभक्ति। विभक्ति अप्पन पहिलुका आखरसँ हटा कए लिखल अछि जाहि कारण कतौ कतौ अर्थकेँ फरिछौंतमे असमंजसकेँ स्थिति उत्पन्न भऽ रहल अछि।
पृष्ट १३ पर लिखल विहनि कथा “टेकनोलजी” आ २७ पर लिखल “लोक बुझाउन” दुनू एक्के सन कथा थिक मात्र नामेटा बदलल अछि।
एहि संग्रहमे कोनो एहन पक्ष नहि जाहिपर अनमोल जीक कलम नहि चलल होइन। मनक भावसँ समाजकेँ बिडम्बना धरि, अन्तरंग अम्बन्धसँ हँसी ठठा धरि सभ पक्षक उचित स्थान देल गेल अछि। पृष्ट ३३ पर “ड्यूटी”, ३८ पर “चिन्ता (एक)”, ३९ पर “बेटा बेटी”, ४३ पर “दुख”, ४५ पर “खोराकी”, ४६ पर “गोहारि”, ५८ पर “भीख”, ६० पर “मोनमे”, ९८पर “अन्हरजाली”, १०१ पर “अप्पन जकाँ”, १०३पर “मनुक्ख के कुकुर के”, मनकेँ छुबैत करेजाकेँ मोम जकाँ गला कए आँखिक रस्तासँ  बाहर आबैक पर मजबूर कए कऽ मोनक कोनो कोनामे एकटा टीस छोरि दै छैक। ओतए पृष्ट संख्या ३२ पर “एकदम ठीक” आ ३७ पर “टास्क”  समाजक कुप्रथाकेँ देखार कए रहल अछि।
पृष्ट ३४ पर “सुरक्षित (एक)”, ४० पर “मन्त्र”, ७७ पर “आन्हर”, आ ८७ पर “व्यवस्था”, आजुक राजनीति आ व्यवस्थापर प्रहार करैत उत्तम विहनि कथा अछि। तँ दोसर दिस पृष्ट ३५ पर “जागरण”, ४२ पर “चेतना(एक)”, ४६ पर “विज्ञान”, आजुक जागरूक लोकक सत्य विहनि थिक। बाल मोनकेँ कागदपर उतारैत अनमोल जी एहि पोथीक पृष्ट ६५ पर “प्रश्न (दू)”, आ ६९ पर “चिन्तित”, वास्तबमे मोनकेँ चिन्तामे झोँकैक लेल प्रयाप्त अछि। ओतए ६३ पर “उत्तर” आ ७१ पर “भरम”केँ सवाल जबाव एहन अछि जेना शेरपर सबा शेर। सम्बन्धकेँ उजागर करैत पृष्ट ४८ पर “बुद्धू”, ६७ पर “महक”, आ ८१ पर “श्रधा” अछि तँ ३६ पर “सअख” आ ६० पर लिखल “युद्ध” पढ़ि हँसीसँ मुँह मुनेबे नहि करत। 
कनीक साहित्यक पक्षकेँ छोरिदि तँ कुल मिला कऽ नीक विहनि कथा संग्रह। पाठकक मोनमे शिक्षा संगे संग जिज्ञासा आ रूचि जगबैमे पूर्ण सफल। एक बेर किनको हाथमे ई पोथी आइब गेल तँ बिना पूरा पढ़ने चेन नहि|                                                                                                                                                                                                                                           

 
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pastedGraphic_8.pngउमेश मण्डल
मैथि‍ली : सरकार आ हम सभ

मि‍थि‍लांचल वि‍कास परि‍षद्क अध्‍यक्ष, डॉ. वि‍द्यानाथ झा, कार्यकारी अध्‍यक्ष, डाॅ. गोपाल प्रसाद सिंहजी।
साक्षर दरभंगाक अध्‍यक्ष, श्री राम नरेश साहु ‘निर्मोही’ एवं महासचि‍व, श्री अशोक कुमार चौधरीजी। 
मि‍थि‍ला संघर्ष समि‍तिक कार्यकारी अध्‍यक्ष, श्री शि‍वली नोमानी एवं महासचि‍व, श्री शंकार यादवजी।
संयोजक- आदरणीय श्री कमलेश झाजी।
मंचासीन वि‍द्वतजन। अखि‍ल भारतीय साहि‍त्‍य परि‍षद् प्रांगणमे उपस्‍थि‍त‍ चि‍न्‍तक श्रोता, मि‍थि‍ला-मैथि‍ली वि‍कास प्रेमी। माए-बहि‍न। भाय-बन्‍धु तथा मि‍डि‍याकर्मी।

आइ ऐ शुभ पहरमे “मैथि‍ली : सरकार आ हमसभ” सन वि‍षयपर अपने लोकनि‍क बीच दू शब्‍द वि‍चार करबाक अवसरि‍ पाबि‍ हम अपनाकेँ सौभाग्‍यशाली बुझै छी।
मैथि‍ली- मैथि‍ली एक ओहन भाषाक नाओं छी जइ भाषाक अपन जमीन कोनो आन भारतीय भाषा साहि‍त्‍यक जमीनसँ कम नै। ईहो बात अछि‍ए‍ जे बहुतो भाषासँ मैथि‍लीकेँ तुलनो योग्‍य बूझब, उचि‍त नै बुझना जाइत अछि। तहि‍ना ईहो बात अछि‍ए जे दुनि‍याँक साहि‍त्‍यक चि‍न्‍तनक बीच मि‍थि‍लाक आध्‍यात्‍मि‍क चि‍न्‍तन अग्रि‍म पाँति‍मे अछि‍ जे दुनि‍याँक नजरि‍मे आइओ अछि‍। ई बात अलग जे डि‍बि‍याक पेनमे अपना सभ सभ दि‍नसँ रहलौं। ईजोतमे जे कि‍यो रहबो केला आकि‍ छथि‍ओ आे कखनो इजोतक मतलब इजोत आ कखनो इजोतक मतलब ज्ञान कहि‍ भकमोड़मे फँसबैत अपनो फँसल छथि‍।  
सरकार- अपनासँ उगारे नै...बला स्‍थि‍ति‍मे अपन सद्य: परि‍चए आइए नै सभ दि‍नसँ दैत रहल। खएर जे कि‍छु...।
हमसभ- संघर्ष छोड़ि‍ हाथ-पएर मोड़ि‍ थुसकुनि‍याँ मारि‍ बैसल रही सेहो बात नै। अपन मैथि‍ली साहि‍त्‍य माने मि‍थि‍लाक सामुहि‍क वि‍कास लेल हमसभ सतत् संघर्षशील रही तइ आग्रहक संग हम स्‍वयंकेँ वचनवद्ध करै छी।
तखनि‍ तँ बात ओतए आबि‍ जाइत अछि‍ अपना-अपनी, देहा-देही। तइले हम सभ पहि‍ने अपनाकेँ वचनवद्ध करी जे आपसीसँ लऽ कऽ सामुहि‍क स्‍थल धरिक भाषाक माध्‍यम‍ मैथि‍लीमे करी। तैकाल हम सभ अपनाकेँ थोड़े कात करैत वि‍भि‍न्न तरहक परि‍चए दैत पबै छी। सरकारो अपने खेल खेलाइत रहल अछि‍। हमहूँ सभ कम खेलाड़ नै जे अष्‍टम अनुसूचि‍मे मैथि‍लीक स्‍थान लेल संघर्षरत् लोक सबहक जे कइएक बेर जहलक हाबा खेलक तेकरा बि‍सरि‍ सुवि‍धा अनुसार गपक मि‍लानी करैत रहै छी। जरूरति‍ अछि‍, संघर्ष सतति‍ बनल रहए तइले तेकर वैज्ञानि‍क अध्‍ययन करब आवश्‍यक अछि‍। ओइपर अपनाकेँ चलाएब। जेतबो सुवि‍धा भेटल अछि‍ तेकर उपयोग करब। तैकालमे हम सभ भातेपर भात करए लगै छी। भुखाएलकेँ भुखाएल नै बूझि‍ दान-पून करए लगै छी। जइ कारण, आध्‍यात्‍मि‍क चि‍न्‍तन खाली गप्‍पे बनि‍ कऽ रहि‍ जाइए। एक तँ ओहुना मनुख-मनुखकेँ बाँटि‍ सरकार अपन रोटी सकै पाछू बेहाल अछि‍। तैपर हमहूँ सभ रंग-बि‍रंगक तराजू बना एक्के चीजकेँ एक आदमी अदहा सेर तँ एक आदमी सबा सेर कहैत एकटा अलगे बखेरा ठाढ़ केने छी। जे सरकारो देखैए। सरकार मानै कथी? एक-एक आदमी। आम आदमी। आम आदमी माने अपना नै? अपने सभ! जरूरति‍ अछि‍ हमरा लोकनि‍केँ पहि‍ने अपनामे सम्‍बन्‍ध मजगूत बनए आ तेकर वास्‍तवि‍क रूप केहेन अछि‍ आ से केहेन तन्नुक अछि‍ आकि‍ सक्कत से अनुभव भाइए रहल अछि‍। एक तँ अहुना एक आदमीक आठ घंटाक मेहनति‍ दोसर आदमीक बैसारीसँ कम पड़ि‍ रहल अछि।‍ तैठाम केतेक सहचेतीक खगता अछि‍ ओ स्‍वयं सोचल जा सकैए। औहुना हम सभ अपनो गामक पुल-पुलि‍या बनबैमे दू-नम्‍बर सि‍मेंट तकै पाछू लगल रही छी। तहि‍ना भाषा-साहि‍त्‍य, पत्र-पत्रि‍काक स्‍थि‍ति‍ अछि‍। जि‍नके हाथ जएह पड़ैए तहीमे अपन-अपन परि‍चए दऽ दऽ ठाढ़ छी। अगि‍ला यात्रा लेल सुन्‍दर-सुन्‍दर बात कहि‍ नम्‍हर प्‍लान लऽ लऽ चि‍चि‍या रहल छी। जरूरति‍ अछि‍ आपसी बि‍सवास केना बनत तैपर सोचैक। अपना पहि‍ने चि‍नी खेनाइ छोड़ि‍ जखनि‍ दोसरकेँ मनाही करब तखने कारगर हएत...। ऐ बातपर धि‍यान हमरा सभकेँ दि‍अ पड़त। सुनि‍हार आ कहनि‍हार दुनूक बीच जे एकटा तेसर यथार्थ काज करैत रहल अछि‍। तेकरा चि‍न्हब जरूरी अछि‍। आजुक ऐ मंचसँ जे सम्‍मान समारोह रहल ओ जरूर तइ दि‍शामे वि‍चारणीय-वि‍श्वनीय रहल। मुदा जरूरति‍ अछि‍ अहूसँ आगू बढ़बाक आ तइले सभसँ पहि‍ने हम सभ ओहन उदेस बनाबी जे सर्वकल्‍याणकारी हुअए। सर्व कल्‍याणक माने ई जे सबहक आवश्‍यकताकेँ धि‍यानमे रखि‍ काज करब। तखने सभकेँ बि‍सवासमे लेल जा सकैत अछि‍। जाधरि‍ हम सभ एकठीम नै हएब, ताधरि‍ शक्‍ति‍ केना औत?एकठीम भेनाइमे सेहो केतेक रंगक समस्‍या  अछि‍। जेतबे भारी अछि‍ ओतबे हल्‍लूक सेहो अछि‍। हल्‍लूक ई अछि‍ जे एक वि‍चार करब। बजैले तँ सभ बजि‍ते छी जे मि‍थि‍ला-मैथि‍लीक वि‍कास चाहै छी। तँए हल्‍लूको अछि‍ए। मुदा मूसो तँ हराएले अछि! कोइ काहू मगन तँ कोइ काहू मगन। मुदा अपनो अपनो तँ भार अछि‍ए। से अपन-अपन भारक इमनदारीसँ संपादन करी, तेकर जरूरति‍ अछि‍। सेवा तँ सेवे होइए। मुदा की पछुआएलक सेवा आ अगुआएलक सेवाकेँ एक्के कहल जाए? की आवश्‍यक्‍ता आ आवश्‍यक आवश्‍यक्‍ताकेँ एक्के कहल जाए। फर्क एतए आबि‍ कऽ भऽ जाइए।
एक-दोसरमे एतेक खाधि‍ कि‍एक बनल अछि‍। एक-दोसराक बीच सम्‍बन्‍ध कि‍एक एतेक कमजोर अछि‍। कि‍एक एक-दोसरपर भरोष कमि‍ रहल अछि‍। बि‍सवास नै कि‍एक भऽ रहलै हेन। तेकरो कारण अछि‍। कारण ई अछि‍ जे सभ सभकेँ ठकै पाछू लगल रहै छी। नै तँ अपनापनक भावमे कमी कि‍एक?नि‍श्चि‍त रूपे सार्वजनि‍क संस्‍था सभ सार्वजनि‍क रहि‍तो सार्वजनि‍क नै बुझना जाइए। माने ओहन-ओहन काज करैत रहल अछि‍ जे तइसँ अलग परि‍चए बना हमरा सबहक बीच अछि‍।
कखनोकाल लोक स्‍वयं गलती करै छथि‍ आ बेसीकाल ओहन गलती भऽ जाइए जे बेवस्‍था करबैपर मजबूर सेहो करै छै। तेकरा सभकेँ चि‍न्‍हि‍त करब जरूरी अछि‍। तखने हम सभ हमसभ दि‍स बढ़ि‍ पएब।
हमसभ आ बि‍हार सरकार। सरकार तँ पटनामे अछि‍। समस्‍या दरभंगो आ आनो-आनो जगहमे अछि‍। बहुत एहेन समस्‍या अछि‍ जेकरा हम सभ उठबै बैसबै छी। दोसर बात, दरभंगा अकासवाणी आकि‍ पत्र-पत्रि‍काक जे बेवहार अछि‍ ओकरा हमरे सभकेँ देखए पड़त। आइएक ऐ कार्यक्रमक समाचार अकासवाणी दरभंगा द्वारा दू दि‍न पहि‍ने प्रसारि‍त कएल गेल जइमे इत्‍यादि‍ कवि‍क रूपमे झारूदार जीकेँ कहल गेलनि‍। झारूदारजी उपस्‍थि‍त छथि‍। कहि‍यो ई स्‍वयं अपन रचना लऽ सम्‍बन्‍धि‍ जगहपर पहुँचल छला। हलाँकी झारूदारजी रचना कार्यक्रम नै लेल गेलनि‍। हि‍नका टाड़ि‍ देलकनि‍। तइ पाछू आनो-आनो कारण भेल होएत जे यथोचि‍त सेहो भऽ सकैए। मुदा ईहो तँ भेबे कएल जे आेइमे ई अपनाकेँ अपन नहि‍योँ बूझि‍ सकल हेता। झारूदारजी स्‍वयं बाजल छला-
“मन तँ भेल रहए जे चारि‍-पाँचटा झारू लि‍खि‍ दरभंगा अकासवाणीक देबालपर साटि‍ दि‍ऐ!”
साइत गोवि‍न्‍दे झा कहने छथि‍न जे भोजपुरीकेँ वि‍द्यापति‍ आ मैथि‍लीकेँ भि‍खारी ठाकुर जनु नै भेट पेतै।
भोजपुरीकेँ वि‍द्यापति‍ भेटौ आकि‍ नै मुदा मैथि‍लीकेँ भि‍खारी ठाकुर भेट गेल अछि‍, श्री रामदेव प्रसाद मण्‍डल “झारूदार”।
दरभंगा अकासवाणीसँ तँ हमरा सभकेँ कोनो आश नहि‍येँ अछि‍। तइले भुरुकबा एफ-एम अछि‍। मुदा तैयो जौं “हमसभ” काज करैले डेग उठा रहल छी‍ तँ से सचमुच प्रशंस्‍णीय अछि‍।
जहि‍ना कोनो बच्‍चाकेँ एकटा पेन मंगला पछाति‍ जौं ओकरा खाली संतोख बन्‍हैले कहल जाए से, आ परि‍स्‍थि‍ति‍वश करचीओक बनौल लेखनीक प्रवन्‍ध कऽ देलापर परहक संतोखक चाह करने नीक खाली संतोषसँ नीक करचीक पेन नीक भऽ जाइए, तहि‍ना हमसभ गपक बाट छोड़ि‍ काजक रस्‍ता पकड़ि‍ चली तँ से कल्‍याणकारी बुझाइए।
साहि‍त्‍य अकादेमी द्वारा प्रसारि‍त कार्यक्रम मात्र मैथि‍लीए साहि‍त्‍य लेल नै अछि‍, आनो-आन जनू 24 भाषा-साहि‍त्‍यक वि‍कासक लेल अछि‍। कनी कम आकि‍ कनी बेसी खर्च तँ होइते अछि‍। मुदा से मैथि‍ली वि‍कासक लेल साहि‍त्‍य अकादेमीक केते सदुपयोग होइत आबि‍ रहल अछि‍? हमसभ तैपर केतेक वि‍चार करह छी जे हमरे सभ द्वारा संचालि‍त भऽ रहल अछि‍। अपना हाथक काज अछि‍। तैकाल हम-हम आ तूँ-तूँ भऽ जाइए। जाधरि‍ “हमलोग-तुमलोग”बला मानसि‍ता हमरा सभमे रहत ताधरि‍ सभ कल्‍पना लोक रहबे करत। मुदा जीवनमे ईहो समए तँ एबे करैए जखनि‍ लोकक मुँहसँ स्‍वत: नि‍कलए लगै छै-
“थाकल पाव पलान भेल भारी आब की लादबो हौ वेपारी।”


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pastedGraphic_7.pngपूनम मण्डल
"सगर राति‍ दीप जरय"क ७९ म आयोजन ‘कथा कोसी’ उमेश पासवानक संयोजकत्‍वमे औरहामे सम्पन्न/ ८० म सगर राति‍ दीप जरय सुपौल जि‍लाक निर्मलीमे उमेश मण्‍डलक संयोजकत्वमे 
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सगर राति‍ दीप जरय’क 79म आयोजन ‘कथा कोसी’ नामक वैनरक नीचाँ दि‍नांक 15 जून संध्‍या 6.30 बजेसँ शुरू भऽ 16 जूनक भि‍नसर 6 बजे धरि‍ लौकही थाना अन्‍तर्गत औरहा गामक मध्‍य वि‍द्यालयक नव नि‍र्मित भवनमे श्री उमेश पासवानक संयोजकत्‍वमे गोष्‍ठी सुसम्‍पन्न भेल। अगि‍ला ८०म गोष्‍ठी सुपौल जि‍लाक निर्मलीमे हेबाक लेल उमेश मण्‍डल प्रस्‍ताव आएल जे सर्वसम्मति‍सँ मान्‍य भऽ घोषित भेल।
श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल एवं श्री रामचन्‍द्र पासवान जीक संयुक्‍त अध्‍यक्षतामे तथा श्री वीरेन्‍द्र कुमार यादव आ श्री दुर्गागान्‍द मण्‍डलक संयुक्‍त संचालनमे ऐ कथा गोष्‍ठीक भरि‍ राति‍क यात्रा भेल। गोष्‍ठीक शुभारम्‍भ श्री लक्ष्‍मी नारायण सिंह एवं श्री रामचन्‍द्र पासवानजी संयुक्‍त रूपे दीप प्रज्‍वलि‍त कऽ उद्घाटन केलनि‍।
वि‍देह-सदेह-5 वि‍देह मैथि‍ली वि‍हनि‍ कथा, वि‍देह सदेह-6 वि‍देह मैथि‍ली लघुकथा, वि‍देह-सदेह-7 वि‍देह मैथि‍ली पद्य, वि‍देह-सदेह-8 वि‍देह मैथि‍ली नाट्य उत्‍सव, वि‍देह-सदेह-9 वि‍देह मैथि‍ली शि‍शु उत्‍सव तथा वि‍देह-सदेह-10 वि‍देह मैथि‍ली प्रबन्‍ध-नि‍बन्‍ध-समालोचना नामक पोथीक लोकार्पण स्‍थानीय वि‍द्वतजन श्री संजय कुमार सिंह, श्री रामचन्‍द्र पासवान, श्री मि‍थि‍लेश सिंह, श्री राजदेव मण्‍डल, श्री लक्ष्‍मी नारायण यादव तथा श्री वीरेन्‍द्र प्रसाद सिंह द्वारा भेल हाथे भेल।
लोकार्पण सत्रक पछाति‍ दू-शब्‍दक एकटा महत्‍वपूर्ण सत्रक सेहो आयोजन भेल जइमे श्री रामचन्‍द्र पासवान, श्री बेचन ठाकुर, श्री कपि‍लेश्वर राउत, श्री कमलेश झा, श्री राजदेव मण्‍डल, श्री राम वि‍लास साहु, श्री उमेश नारायण कर्ण, श्री रामानन्‍द झा ‘रमण’, श्री शंभु सौरभ, श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल, डॉ शि‍वकुमार प्रसाद, श्री अरूणाभ सौरभ तथा श्री उमेश मण्‍डल तथा संयोजक श्री उमेश पासवान द्वारा ‘सगर राति‍ दीप जरय’ कथा गोष्‍ठीक दीर्घ यात्रा तथा उदेसपर सभागारमे उपस्‍थि‍त दूर-दूरसँ आएल कथाकार, समीक्षक-आलोचक एवं स्‍थानीय साहि‍त्‍य प्रेमीक मध्‍य मंचसँ अपन-अपन मनतव्‍य रखलनि‍। जइमे सगर राति‍क 75म आयोजनक पश्चात 76म आयोजन जे श्री देवशंकर नवीन दि‍ल्‍लीमे करेबाक घोषना तँ केने रहथि‍ मुदा से नै करा साहि‍त्‍य अकादेमी द्वारा आयोजि‍त कथा गोष्‍ठीकेँ गनि नेने रहथि‍ जहू गि‍नतीकेँ सोझरौल गेल आ तँए ऐ गोष्‍ठीकेँ श्री उमेश पासवान अपन इमानक परि‍चए दैत ७९ म गोष्‍ठीक आयोजन केलनि‍। ओ कहलनि‍ जे हम सभ अर्थात् वि‍देह मैथि‍ली साहि‍त्‍य आन्‍दोलनसँ जूड़ल मैथि‍ली वि‍कास प्रेमी छी। हम सभ ७७म, ७८ म आयोजनक आयोजन कर्ताकेँ स्‍पष्‍ट रूपे कहैत एलि‍यनि‍ जे मुदा हमरा सबहक बात नहियेँ वि‍भारानी मानलनि‍ आ नहि‍येँ कमलेश झा मानलनि‍। मुदा से हमहूँ नै मानब आ सही-सही गि‍नती करब। आ तही दुआरे ऐ गोष्‍ठीक आयोजन ७९मे आयोजन तँइ भेल, आयोजि‍त भेल। हलाँकि‍ दरभंगासँ आएल कथाकार श्री हीरेन्‍द्र कुमार झाक उकसेला पर रहुआसँ आएल श्री वि‍नय मोहन झा जगदीश, श्री दुखमोचन झा आ दरभंगेसँ आएल श्री अशोक कुमार मेहता हीरेन्‍द्र झाक संग गोष्‍ठीक आरम्‍भक घंटा भरि‍क पछाति‍ चलि‍ जाइ गेला।

जीवि‍ते नर्क (उमेश मण्‍डल), शि‍क्षाक महत (राम वि‍लास साहु), बि‍आहक पहि‍ल गि‍रह (दुर्गानन्‍द मण्‍डल), बौका डाँड़ (लक्ष्‍मी दास), बंश (कपि‍लेश्वर राउत), टाटीक बाँस (राम देव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’), सगतोरनी (शि‍वकुमार मि‍श्र), पाथर, पि‍यक्कर, जोगार आ अंग्रेज नैना (अमीत मि‍श्र), संत आकि‍ चंठ (बेचन ठाकुर), अछोपक छाप (शम्‍भु सौरभ), नमोनाइटिस (उमेश नारायण कर्ण), द्वादशा (सुभाष चन्‍द्र ‘सि‍नेही’), राँड़ि‍न (रोशन कुमार ‘मैथि‍ल’), पँचवेदी (अखि‍लेश कुमार मण्‍डल), मुइलो बि‍सेबनि (जगदीश प्रसाद मण्‍डल) इत्‍यादि‍ महत्‍वपूर्ण लघु कथा/वि‍हन‍ कथाक पाठ भेल आ सत्रे-सत्र मौखि‍क टि‍प्‍पणी आ समीक्षा भेल।
अछोपक छाप (शम्‍भु सौरभ) क समीक्षाक क्रममे श्री रमानन्द झा "रमण" कथावस्तुसँ अपन असहमति देखेलनि आ कहलनि- " नै आब ई गप नै अछि, एकटा गप एतै देखियौ, हम रमानन्द झा "रमण" श्रोत्रिय उच्च कुलक, आ कतऽ आएल छी! उमेश पासवानक दरबज्जापर!" श्री बेचन ठाकुर श्री रमानन्द झा "रमण"क नव-ब्राह्मणवादी सोचक विरोध करैत कहलनि- " लोकक मगजमे अखनो जाति-पाति भरल छै, मैलोरंगक प्रकाश झा तेँ ने कहै छथि जे बेचन ठाकुर भरि दिन तँ केश काटैत रहैए, ई रंगमंच की करत!! श्रीधरमकेँ सेहो ई गप बुझल छन्हि। माने मैथिली साहित्यकार, समीक्षक आ रंगमंचसँ जुड़ल ब्राह्मणवादी आ नव-ब्राह्म्णवादी सोचक लोककेँ देखैत ई कहल जा सकैए। २१म शताब्दीमे श्री रमानन्द झा "रमण"क बयान ई देखबैत अछि जे कोना ओ उमेश पासवानक दरबज्जापर आबि उपकृत करबाक भावनासँ ग्रसित छथि।
अगि‍ला ८०म गोष्‍ठी सुपौल जि‍लाक निर्मलीमे हेबाक लेल उमेश मण्‍डल प्रस्‍ताव आएल जे सर्वसम्मति‍सँ मान्‍य भऽ घोषित भेल।
 
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pastedGraphic_8.pngउमेश मण्डल
80म सगर राति‍ दीप जरय'' निर्मलीमे 45 गोट पोथीक लोकार्पण- २८म विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी
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45 गोट पोथीक लोकार्पण
बाल निबंध-

1. देवीजी (ज्योती झा चौधरी) कवि‍ राजदेव मण्डल

वि‍वि‍धा-

1. कुरुक्षेत्रम अन्तर्मनक- (गजेन्द्र ठाकुर) डॉ. बचेश्वर झा

शब्द.कोष-

1. अंग्रजी-मैथि‍ली शब्दकोष- (गजेन्द्र ठाकुर) डॉ. रामाशीष सिंह
2. मैथि‍ली-अंग्रेजी शब्दकोष भाग-१- (गजेन्द्र ठाकुर) डॉ. अशोक अवि‍चल

वि‍हनि‍ कथा संग्रह-
1. बजन्ता-बुझन्ता (जगदीश प्रसाद मण्डाल) अनुमण्‍डलाधि‍कारी अरूण कुमार सिंह
2. तरेगन- दोसर संस्करण (जगदीश प्रसाद मण्डल)- वि‍धायक सतीश साह

लघु कथा संग्रह-
1. सखारी-पेटारी (नन्द वि‍लास राय) डॉ. शि‍वकुमार प्रसाद
2. उलबा चाउर (जगदीश प्रसाद मण्डल) वि‍नोद कुमार ‘वि‍कल’
3. अर्द्धांगि‍नी (जगदीश प्रसाद मण्डल) दुर्गानन्द मण्डल
4. सतभैंया पोखरि‍ (जगदीश प्रसाद मण्डल) प्रो. जयप्रकाश साह
5. भकमोड़ (जगदीश प्रसाद मण्डल) फागुलाल साहु

दीर्घ कथा संग्रह-

1. शंभुदास (जगदीश प्रसाद मण्डल) सदरे आलम गौहर

कवि‍ता संग्रह-

1. बसुन्धरा (राजदेव मण्‍डल) गजलकार ओम प्रकाश झा
2. राति‍-दि‍न (जगदीश प्रसाद मण्डल) रामजी प्रसाद मण्डल
3. रथक चक्का उलटि‍ चलै बाट (रामवि‍लास साहु) नाटककार बेचन ठाकुर
4. नि‍श्तुकी दोसर संस्‍करण (उमेश मण्डल) जनकवि‍ रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’
5. इन्द्र्धनुषी अकास (जगदीश प्रसाद मण्डल) पत्रकार राम लखन यादव
6. प्रतीक (मनोज कुमार कर्ण मुन्नाजी) अधि‍वक्‍ता वीरेन्द्र कुमार यादव

गजल संग्रह-

1. कियो बूझि‍ नै सकल हमरा (ओम प्रकाश झा) साहि‍त्‍यकार जगदीश प्रसाद मण्डल
2. माँझ आंगनमे कति‍याएल छी (मनोज कुमार कर्ण मुन्नाजी) गायक रामवि‍लास यादव
3. मोनक बात (चन्दन कुमार झा) डॉ. शि‍वकुमार प्रसाद
4. अंशु (अमि‍त मि‍श्र) कथाकार कपि‍लेश्वर राउत

गीत संग्रह-

1. गीतांजलि‍ (जगदीश प्रसाद मण्डल) अमीत मि‍श्र
2. तीन जेठ एगारहम माघ (जगदीश प्रसाद मण्डल) चन्दन कुमार झा
3. सरि‍ता (जगदीश प्रसाद मण्डल) बालमुकुन्द
4. सुखाएल पोखरि‍क जाइठ (जगदीश प्रसाद मण्डल) बि‍पीन कुमार कर्ण
5. हमरा बि‍नु जगत सुन्ना छै (रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’) अधि‍वक्‍ता मनोज कुमार बि‍हारी
6. क्षणप्रभा- (शि‍व कुमार झा ‘टि‍ल्लू‘’) राजाराम यादव

अनुवाद साहि‍त्य-

1. पाखलो (उपन्यास (कोंकणीसँ हि‍न्दी सेवी फर्णांडि‍स एवं शंभु कुमार सिंह तथा हि‍न्दी‍सँ मैथि‍ली शंभु कुमार सिंह- कवि‍ शंभु सौरभ

नाटक-

1. रि‍हर्सल (रवि‍ भूषण पाठक) कवि‍ राम वि‍लास साफी
2. बि‍सवासघात (बेचन ठाकुर) बाल गोवि‍न्द यादव ‘गोवि‍न्दाचार्य’
3. बाप भेल पि‍त्ती आ अधि‍कार (बेचन ठाकुर) कवि‍ रामवि‍लास साहु
4. रत्नाकार डकैत (जगदीश प्रसाद मण्डल) कि‍शलय कृष्ण
5. स्वयंवर (जगदीश प्रसाद मण्डल) कवि‍ शंभु सौरभ
6. पंचवटी एकांकी संचयन- (जगदीश प्रसाद मण्डल) उपन्‍यासकार राजदेव मण्डल
7. कम्‍प्रोमाइज- (जगदीश प्रसाद मण्डल) कथाकार राम प्रवेश मण्डल
8. झमेलि‍या बि‍आह (जगदीश प्रसाद मण्डल) अधि‍वक्‍ता वीरेन्द्र् कुमार यादव

उपन्यास

1. हमर टोल (राजदेव मण्डल) कवि‍ हेम नारायण साहु
2. जीवन संघर्ष (दोसर संस्करण) जगदीश प्रसाद मण्डाल) नारायण यादव
3. बड़की बहि‍न (जगदीश प्रसाद मण्डल) कवि‍ शारदा नन्द सिंह
4. जीवन-मरण (दोसर संस्करण) (जगदीश प्रसाद मण्डल) डाकबाबू छजना
5. नै धाड़ैए (बाल उपन्यास, जगदीश प्रसाद मण्डल) गुरुदयाल भ्रमर
6.सहस्रबाढ़नि‍ (ब्रेल लि‍पि‍) गजेन्द्र ठाकुर- शि‍क्षक मनोज कुमार राम

बायोग्राफी-

1. जगदीश प्रसाद मण्डल एकटा वायोग्राफी- (गजेन्द्र ठाकुर) कवि‍ उमेश पासवान

बाल साहि‍त्‍य (संस्‍मरण)-

1.मध्य प्रदेश यात्रा (ज्योति‍ झा चौधरी) कथाकार नन्द वि‍लास राय


80म कथा गोष्ठी “कथा मि‍लन सदाय-सगर राति‍ दीप जरय” निर्मलीमे पठि‍त कथा एवं कथाकारक नाओं-
1. जीवपर दया करी- पल्लवी कुमारी
2. स्पेशल परमीट- ओम प्रकश झा
3. ढेपमारा गोसाँइ- ओम प्रकाश झा
4. ओ स्त्री - सदरे आलम गौहर
5. बाल अधि‍कार- नारायण झा
6. मांग- अमि‍त मि‍श्र
7. नवतुरि‍या- अमि‍त मि‍श्र
8. जनता लेल- अमि‍त मि‍श्र
9. थ्रीजी- मुकुन्द मयंक
10. पढ़ाइ आ खेती- बि‍पीन कुमार कर्ण
11. बदरि‍या मूसक घर- उमेश पासवान
12. अपन घर- लक्ष्मी दास
13. मि‍त्र- नारायण यादव
14. प्रेम एगो अचम्भा - बाल मुकुन्द पाठक
15. भगवानक पूजा- संजय कुमार मण्डल
16. वि‍पन्नता- पंकज सत्‍यम
17. गौतमक अहि‍ल्या-- दुखन प्रसाद यादव
18. तरकारीक चोर- ललन कुमार कामत
19. व्यंग्य- मि‍थि‍लेश कुमार व्यास
20. खेनि‍हारक लेखा- चंदन कुमार झा
21. चाहबला- कपि‍लेश्वर राउत
22. बि‍लाइ रस्ता काटि‍ देलक- राम वि‍लास साहु
23. भैरवी- रौशन कुमार झा
24. संदेह- शारदा नन्द सिंह
25. अंधवि‍श्वास- शम्भू सौरभ
26. डीजे ट्रोली- बेचन ठाकुर
27. मुखि‍याजी सँ मंत्री धरि‍ एक्के रंग- दुर्गा नन्द ठाकुर
28. कारागार- कि‍शलय कृष्ण
29. पैघ लोक के?- नन्द वि‍लास राय
30. पेंच-पाँच- शि‍व कुमार मि‍श्र
31. महेशबाबूक चौकपर एकदि‍न- गौड़ी शंकर साह
32. परि‍वर्त्तन- राजदेव मण्डल
33. एकघाप जमीन- जगदीश प्रसाद मण्डल
34. गइ बुढ़ि‍या हम बड़ बि‍हर छी- डॉ. शि‍व कुमार प्रसाद
35. भीखमंगा- डॉ. अशोक अवि‍चल

मिथिलांचलक प्रसिद्ध साहित्यिक मंच “सगर राति‍ दीप जरय” केर 80म आयोजन जे निर्मली (सुपौल)मे स्थानीय कलाकार स्व. मि‍लन सदाय केर नाओंपर आयोजित छल तइ कथा गोष्ठीमे जे समीक्षक-आलोचक सभ पठि‍त कथापर समीक्षा केने रहथि‍, आलोचना केने रहथि‍ से सूची निम्न अछि‍-
डॉ. शिव कुमार प्रसाद
ओम प्रकाश झा
राजदेव मण्डल
जगदीश प्रसाद मण्डल
डॉ. अशोक अवि‍चल
डॉ. रामाशीष सिंह
उमेश पासवान
चन्दन कुमार झा
राम वि‍लास साहु
फागुलाल साहु
पंकज सत्यम्
किशलय कृष्ण
शंभु सौरभ
कपिलेश्वर राउत
बाल गोवि‍न्द यादव गोवि‍न्दा‍चार्य
वीरेन्द्र कुमार यादव
राम वि‍लास साफी
शि‍व कुमार मि‍श्र
दुर्गानन्द मण्डल
नारायण यादव
संजय कुमार मण्‍डल
राम प्रवेश मण्डल
नारायण यादव
बालमुकुन्द पाठक
बेचन ठाकुर
दुर्गानन्द ठाकुर
शारदा नन्द सिंह
२८ म विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी दि‍नांक ३० नवम्बर २०१३ संध्‍या 6.30 बजेसँ शुरू भऽ ०१ दिसम्बर २०१३ भि‍नसर 6 बजे धरि‍ ८०म म सगर राति दीप जरय"क (उमेश मण्डलक संयोजकत्‍वमे निर्मली (जिला सुपौल) अवसरपर सम्पन्न।
वि‍देह द्वारा मैथि‍ली पोथी प्रदर्शनी-
1. ‘वि‍देह’क पहि‍ल मैथि‍ली पोथी-प्रदर्शनी, दि‍नांक- 27/09/2009 स्‍थान- नई दि‍ल्‍ली स्‍थि‍त श्रीराम सेन्‍टरक प्रेक्षागृहमे। अवसर- ‘जल डमरू बाजे’ नाटक-मंचन।
2. ‘वि‍देह’क दोसर मैथि‍ली पोथी-प्रदर्शनी, दि‍नांक- 03/04/2011 स्‍थान- रामानन्‍द युवा कलव, जनकपुरधाम, नेपाल। अवसर- ‘सगर राति‍ दीप जरय’क 69म कथा गोष्‍ठी।
3. ‘वि‍देह’क तेसर मैथि‍ली पोथी-प्रदर्शनी, दि‍नांक- 12/06/2010 स्‍थान- कवि‍लपुर लहेरि‍यासराय, दरभंगा। अवसर- ‘सगर राति‍ दीप जरय’ 70म कथा गोष्‍ठी।
4. ‘वि‍देह’क 4म मैथि‍ली पोथी-प्रदर्शनी, दि‍नांक- 02/10/2010 स्‍थान- बेरमा (तमुि‍रया) जि‍ला- मधुबनी। अवसर- सगर राति‍ दीप जरय’क 71म कथा गोष्‍ठी।
5. ‘वि‍देह’क 5म मैथि‍ली पोथी-प्रदर्शनी, दि‍नांक- दुर्गापूजा-2010 स्‍थान- बेरमा (तमुि‍रया) जि‍ला- मधुबनी। 4 दि‍वसीय प्रदर्शनी।
6. ‘वि‍देह’क 6म मैथि‍ली पोथी-प्रदर्शनी, दि‍नांक- दुर्गापूजा-2010 स्‍थान- घोघरडीहा (मधुबनी) दुर्गापूजाक मेला परि‍सर। अवसर- दुर्गापूजा-2010
7. ‘वि‍देह’क 7म मैथि‍ली पोथी-प्रदर्शनी, दि‍नांक- दुर्गापूजा-2010 स्‍थान- हटनी (मधुबनी) दुर्गापूजाक मेला परि‍सर।
8. ‘वि‍देह’क 8म मैथि‍ली पोथी-प्रदर्शनी, दि‍नांक- 04/12/2010 स्‍थान- व्‍यपार संघ भवन, सुपौल। अवसर- सगर राति‍ दीप जरय’क 72म कथा गोष्‍ठी।
9. ‘वि‍देह’क 9म मैथि‍ली पोथी-प्रदर्शनी, दि‍नांक- 05/12/2010 स्‍थान- महि‍षी (सहरसा) अवसर- सगर राति‍ दीप जरय’क 73म कथा गोष्‍ठी।
10. ‘वि‍देह’क 10म मैथि‍ली पोथी-प्रदर्शनी, दि‍नांक- 09/07/2011 स्‍थान- अशर्फीदास साहु समाज महि‍ला इंटर महावि‍द्यालय परि‍सर- नि‍र्मली (सुपौल), अवसर- सामानांतर साहि‍त्‍य अकादमी मैथि‍ली कवि‍ सम्‍मेलन-2011
11. ‘वि‍देह’क 11म मैथि‍ली पोथी-प्रदर्शनी, दि‍नांक- 02 नभम्‍बर 2010 स्‍थान- एस.एम. पब्‍ि‍लक स्‍कूल परि‍सर झि‍टकी-वनगामा (मधुबनी), अवसर- स्‍कूल वार्षिकोत्‍सव।
12. ‘वि‍देह’क 12म मैथि‍ली पोथी-प्रदर्शनी, दि‍नांक- सरस्‍वतीपूजा- 2011 स्‍थान- चनौरागंज (मधुबनी) अवसर- सरस्‍वतीपूजा नाट्य उत्‍सव- 2011
13. ‘वि‍देह’क 13म मैथि‍ली पोथी-प्रदर्शनी, दि‍नांक- 10/09/2011 स्‍थान- हजारीबाग (झारखण्‍ड), अवसर- सगर राति‍ दीप जरय’क 74म कथा गोष्‍ठी।
14. ‘वि‍देह’क 14म मैथि‍ली पोथी-प्रदर्शनी, दि‍नांक- दुर्गापूजा-2011 स्‍थान- बेरमा (मधुबनी) 4 दि‍वसीय प्रदर्शनी।
15. ‘वि‍देह’क 15म मैथि‍ली पोथी-प्रदर्शनी, दि‍नांक- 02/11/2011 स्‍थान- उच्‍च वि‍द्यालय परि‍सर- खरौआ जि‍ला- मधुबनी। अवसर- महाकवि ‍लालदासक 155म जयन्‍ती समारोह।

16.विदेहक १६म मैथिली पोथी प्रदर्शनी १०-११ दिसम्बर २०११ केँ ७५म सगर राति दीप जरएक अवसरपर ,१० दिसम्बर २०११ केँ साँझ ६ बजेसँ शुरू भेल, स्थान-कॉपरेटिव फेडेरेशन हॉल, निकट म्यूजियम, पटनामे शुरू भेल आ ११ दिसम्बर २०११क भोर ८ बजे धरि चलल।
17.१७म विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी:- २२-२४ दिसम्बर २०११ केँ गुवाहाटीमे। २२-२३ दिसम्बर २०११ केँ प्राग्ज्योतिष आइ.टी.ए. सेन्टर, माछखोवा, गुवाहाटी- ७८१००९ (२२ दिसम्बर २०११ केँ ४ बजे अप्राह्णसँ ९ बजे राति धरि आ २३ दिसम्बर २०११ केँ ११ बजे पूर्वाह्णसँ ३ बजे अपराह्ण धरि आ २३ दिसम्बर २०११ केँ फेर ५ बजे अपराह्णसँ देर राति धरि) आ २४ दिसम्बर २०११ केँ भोरसँ राति धरि स्थान- रूम संख्या २१७, होटल ऋतुराज, माछखोवा, गुवाहाटीमे। अवसर मि‍थि‍ला सांस्‍कृति‍क समन्‍वय समि‍ति‍क आयोजि‍त "अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली सम्मेलन" आ "आठम मिथिला रत्न सम्मान समारोह" ( २२ दि‍सम्‍बर २०११) आ "वि‍द्यापति स्‍मृति‍ पर्व समारोह" (२३ दि‍सम्‍बर २०११) । १७म विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी ग्राहकक आग्रहपर एक दिन लेल (२४ दिसम्बर २०११ केँ ) बढ़ाओल गेल।

18..१८म विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी-तिथि १४ जनवरी २०१२ स्‍थान- अशर्फीदास साहु समाज महि‍ला इंटर महावि‍द्यालय परि‍सर- नि‍र्मली (सुपौल), अवसर- समानांतर साहि‍त्‍य अकादमी मैथि‍ली साहित्य उत्सव- सह विदेह सम्मान समारोह (समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार)

19.१९म विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी- 27 जनवरी 2012 (शुक्र दि‍न), अवसर स्‍थानीय कवि‍ परि‍षद (सलहेसबाबा परि‍सर- औरहा, प्रखण्‍ड- लौकही)क चारि‍म वार्षिकोत्‍सव- 2012

20.२०म विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी- जे.एम.एस. कोचिंग सेन्टर , चनौरागंज,झंझारपुर, जिला-मधुबनी, अवसर विदेह नाट्य उत्सव २०१२ दू दिन दिनांक २८.०१.२०१२ आ २९.०१.२०१२

21. २१म विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी (अवसर बीसम नव दिल्ली विश्व पुस्तक मेला २०१२ जखन भारतीय सिनेमाक सए बर्ख, दिल्लीक राजधानी रूपमे सए बर्ख आ रवीन्द्रनाथ टैगोरक १५०म जयन्ती संगे पड़ि रहल अछि, एकर आयोजक रहैत अछि नेशनल बुक ट्रस्ट, भारत, सौजन्य अंतिका प्रकाशन) २५ फरबरी २०१२ सँ ०४ मार्च २०१२,प्रतिदिन भोर ११ बजेसँ ८ बजे राति धरि, स्थान- अंतिका प्रकाशन , स्टाल 80-81, हॉल 11, प्रगति मैदान,२०म नव दिल्ली विश्व पुस्तक मेला 2012 नव दिल्ली। ई विश्व पुस्तक मेला दू सालमे एक बेर होइत अछि आ ४० साल पहिने १९७२ ई. मे एकर पहिल आयोजन भेल छल।
22.२२म विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी, वेस्टर्न रेलवे हेडक्वार्टर्स ऑडिटोरियम, मुम्बइ, दिनांक १४ सितम्बर २०१२, अवसर श्रुति प्रकाशनक कार्यक्रम
23.२३म विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी २२ अक्टूबर २०१२- २४ अक्टूबर २०१२- बेरमा (भाया तमुरिया), झंझारपुरमे, दुर्गापूजा मेलामे।
24. २४म विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी २८ अक्टूबर २०१२ केँ इण्डिया इण्टरनेशनल सेन्टर, लोदी रोड नई दिल्लीमे सायं ६ बजेसँ ०८.३० बजे धरि

25.25 म विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी 20 नवम्बर 2012 केँ खरौआ जि‍ला- मधुबनी। अवसर- महाकवि ‍लालदासक 156म जयन्‍ती समारोह। अपराह्न 2 बजेसँ 9 बजे राति धरि
26.26 म विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी 01-02 दिसम्बर 2012 केँ दोसर चरणक पहिल "सगर राति दीप जरय"क अवसरपर 01 दिसम्बर 2012 केँ साँझ ६ बजेसँ शुरू भेल, स्थान-दरभंगाक कटहलवाड़ी स्‍थि‍त एम.एम.टी.एम महावि‍द्यालयक प्रेक्षागार-मे शुरू भेल आ 02 दिसम्बर 2012 क भोर ६ बजे धरि चलल।

27. २७ म विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी दि‍नांक 15 जून संध्‍या 6.30 बजेसँ शुरू भऽ 16 जूनक भि‍नसर 6 बजे धरि‍79" ७९म सगर राति दीप जरय"क (उमेश पासवानक संयोजकत्‍वमे गाम औरहा (जिला मधुबनी) मे सम्पन्न) अवसरपर।
28.२८ म विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी दि‍नांक ३० नवम्बर २०१३ संध्‍या 6.30 बजेसँ शुरू भऽ ०१ दिसम्बर २०१३ भि‍नसर 6 बजे धरि‍ ८०म म सगर राति दीप जरय"क (उमेश मण्डलक संयोजकत्‍वमे निर्मली (जिला सुपौल) मे सम्पन्न) अवसरपर।
 
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pastedGraphic_9.pngआशीष अनचिन्हार- दू टा गजल

गजल

सीताक बनबास छी हम
बौआ रहल आस छी हम

दाहीक संगे तँ रौदी
उपटल सनक चास छी हम

हमरा बुझाएल एना
जेना हुनक खास छी हम

भुखले तँ मरि गेल जै ठाँ
तै ठाँक मधुमास छी हम

सुर ताल छी राग सेहो
नोरसँ सजल भास छी हम

2212+2122 मात्राक्रम सभ पाँतिमे


गजल

किछु नै बाँचल तोरा लेल
नोरे साँठल तोरा लेल

गम-गम गमकै तोहर देह
छै सभ मातल तोरा लेल

हम पेटो काटल रहि रहि क'
जीहो जाँतल तोरा लेल

पंडित मुल्ला पासी संग
ताड़ी चाखल तोरा लेल

सरदी गरमी अन्हड़ बाढ़ि
ई अवधारल तोरा लेल

सभ पाँतिमे 222-222-21 मात्राक्रम।

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pastedGraphic_5.pngजगदानन्द झा ‘मनु’- ग्राम पोस्ट  हरिपुर डीहटोल, मधुबनी 
२ टा गजल 
गजल-१

 

देखलौं जखनसँ अहाँकेँ होस गेलौं बिसरि हम

आगि ख’र बिनु लेसने सौँसेसँ गेलौं पजरि हम

 

एकटा मुस्की अहाँकेँ प्राण लेलक लय हमर

खा क’
 मोने मोन मुँगबा चट्ट गेलौं पसरि हम

 

अछि निसा चानक अहाँमे भ्रमित केने रातिमे

मुँह अहाँकेँ मोरिते बिनु पानि गेलौं पिछरि हम

 

स्वर्ग पेलौं बिनु अहाँ ओ स्वर्ग भेलै नर्क सन

छोरि छारि स्वर्गकेँ पाछूसँ गेलौं ससरि हम

 

खुजल आँखिक
 ‘मनु’क सपना प्रगट भेलौं जगतमे      

देख निरमल नेह
  बिनु बरखाक गेलौं झहरि हम            

 

(मात्रा क्रम- २१२२-२१२२-२१२२-२१२)

 
********************************************
 

गजल-२

 

किए तीर नजरिसँ अहाँकेँ चलैए
हँसी ई तँ घाएल हमरा करैए

 
मधुर बाजि खन-खन पएरक पजनियाँ
हमर मोन रहि रहि कए डोलबैए  

 
छ्मकए हबामे अहाँकेँ खुजल लट
कतेको तँ  दाँतेसँ   आङुर कटैए


ससरि जे जए जखन आँचर अहाँकेँ

जिला भरि
 करेजाक धड़कन रुकैए

 

अहीँकेँ तँ मुँह देखि जीबैत
 'मनु' अछि

बिना संग नै साँस मिसियो चलैए

 
(बहरे - मुतकारिब,
 मात्राक्रम -१२२-१२२-१२२-१२२)

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pastedGraphic_35.pngकामिनी कामायनी
जहिया ओ इतिहास सुनौलक

जहिया ओ इतिहास सुनौलक
रोम रोम बरछी बनि मारल /
केहेन आगि मे जरि रहल छी /
कोन मूह स कथा कहु आब?
तपत बौल मे तड़ैप रहल छी
अपन  परती खेत पड़ल छल
मुदा बाध अनकर लहरायल
अपन सपना बेच रहल ओ  /
हम्मर किम्हरो  मूह नुकायल/
भांति भांतिक भइज लगाकऽ /
सब तर छल दाना छिड़ियौने /
मुसुकि मुसुकि कऽ नमरि नमरि कऽ
चान देखा कऽ जिह ललचौने /
बान्हि देल गरदनि पर टाइ /
गरा मिलल छल बनिक भाइ /
पड़ा रहल छल तैयो मुड़ि कऽ /
भाखा केँ मोटका जौरसँ बान्हल /
चिचिया कऽ /घिसिया कऽ कहलक /
अहि सँ केना आब तोँ बचमे /
अहि जौर केँ काटि ने सकबेँ /
परचम हमर सदा लहरायत
अपन आब बचल कतय किछु /
सबटा पच्छिम हड़पि रहल अछि

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pastedGraphic_36.pngज्योति
बिन रदीफक एकटा गजल
लोकक बातक डरे जे हम नुकेलौं
अपन अलग दुनियाँमे डूमि गेलौं

से ओ दुनियाँ मुदा बड नीक छल यै
से जतऽ सँ बहराय नै हम चाहलौं

से जे लोककेँ बातक बहन्ना देलनि
तिनका तँ धैनवादो नहिये कहलौं

मोनक तरंग तँ पहुँचले हएत
से डोरी जकॉंं हम से हाथेमे बन्हलौं
 

एक साहिल जकाँ इच्छा छल हमर से
हलचल तँ अखनो बॉंकी बिसरलौं

तकर बाद डूमत स्वप्न संग ज्योति
जिनगी बितै डूमि चाहत से रखलौं
(सरल वार्णिक छन्द वर्ण १४)


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pastedGraphic_37.pngमो. गुल हसन

गीत-

छोटका कि‍सान

कन्‍हापर हर लऽ चलल जाइ कि‍सान
चलल जाइ कि‍सान...।
कि‍साने छै हम्‍मर देशक अभि‍मान
कि‍साने छै हम्‍मर भाय देशक शान
कि‍साने छै हम्‍मर भाय देशक शान।

भोरे उठै छै खेतपर जाइ छै
सरदी-गरमीकेँ कि‍छु ने बुझै छै
नसीबो ने होइ छै समैपर चाहो-पान।।
कि‍साने छै देशक अभि‍मान...।

कखनि‍ दि‍न होइ छै कखनि‍ होइ छै राति‍
ओगरैत रहै छै भैया अपन जजाति‍
खेतेमे होइ छै भाय खएक-जलपान।
कि‍साने छै हम्‍मर देशक अभि‍मान
कि‍साने छै हम्‍मर देशक शान...।

नि‍पौनी-पटौनीमे लगल रहै छै
कान्‍हपर कोदारि‍ ओकरा हरि‍दम रहै छै
पार्टी-पोलटीससँ कोनो नै मतलब
हरि‍दम रहै छै फसीलेपर धि‍यान।
कि‍साने छै हम्‍मर देशक अभि‍मान।

गुल हसन कहैए सरकार अहाँ सुनि‍यौ
कि‍सानक समस्‍याकेँ पहि‍ले बुझि‍यो
खाद-बि‍आकेँ करि‍यो नि‍दान।
कि‍साने छै हम्‍मर देशक अभि‍मान
कि‍साने छै हम्‍मर देशक शान।    

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pastedGraphic_38.pngओम प्रकाश झा
दू टा गजल
राम जपैत छी रहम करू
कृष्ण सुमरि अहाँ करम करू

कष्ट अनकर बूझिकऽ सदिखन
धन्य कनी अपन जनम करू

कानि रहल बहिन-माय अपन
अंतरमे कनी शरम करू

पजरत आगि ठंढा हियमे
अपन विचारकेँ गरम करू

"ओम"क बात राजा सिनि लिअ
राजक आब किछु धरम करू

दीर्घ, ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ(मुतफाइलुन), दीर्घ, ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ
२-११२१२-२-११२ (प्रत्येक पाँतिमे एक बेर)

हेतै खतम गुटबाज बेबस्था
बनतै सभक आवाज बेबस्था

भेलै बहुत चीरहरणक खेला
राखत निर्बलक लाज बेबस्था

देसक आँखिमे नोर नै रहतै
सजतै माथ बनि ताज बेबस्था

मिलतै सभक सुर ताल यौ ऐठाँ
एहन बनत ई साज बेबस्था

"ओम"क मोन कहि रहल छै सबकेँ
करतै आब किछु काज बेबस्था
दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-लघु, दीर्घ-दीर्घ-लघु-दीर्घ, दीर्घ-दीर्घ प्रत्येक पाँतिमे एक बेर।
२२२१-२२१२-२२


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pastedGraphic_14.pngशारदानन्द दास परिमल
दू टा गीत

पूर्णेन्दु नभांगनमे

उतरल पूर्णेन्दु नभांगन मे ज्योत्सना
 मंगल-घट  छिलकौने ।
उत्त्तुंग द्रुमदलक परसि माथ आशीष मुकुट अछि पहिरौने ।
पबितहिं स्पर्श सिहकल बसात शेफालिकाक दृग बन्न फुजल,
उछ्वासक नेने हर्ष विपुल सुर-सौरभ पसरल छन्द भरल ।
अणु-अणु,कण-कण मे सम्बोधन ममता सँ भरल सुधि सरसौने ।
धुरियाएल तन सँ शिशुक जेना रज पोंछि लैछ माइक आँचर ,
तहिना हरि तिमिरक छाँह, नभक आनन कें कएल ज्योत्सना भास्वर ।
सौन्दर्य निसर्गक धरती पर आनल इंगिति सँ परिछौने ।।
शीतल स्पर्श सँ ज्योत्सनाक सहजहिं स्फूर्तित भेल धरा ,
अम्बर सँ अवनी तक पसरल आनन्दक छन्द अमित अपरा ।
तृण-तरु-वन-उपवन शैल उदधि सभ मस्त अपन हक़ अछि पौने ।
अछि मानव लेकिन निरानन्द अनुबन्धित कृत्रिम जीवन सँ,
संसृतिक बघारल ऐश्वर्यक अप्रतिम गौरवक प्लावन सँ,--
रहि दूर चलि रहल अपन लाश अपनहिं कनहा पर घिसियौने ।।
घुरि आओत कहिया पूत जे कि भसिया क गेल चलि बहुत दूर,
ममता माईक पथ मे पसरल करि पबइछ नहिं अभिलाष पूर ।
पथ-पाँतर नजरि बहारि रहल आशा सँ मनोरथ भरियौने ।।
उतरल पूर्णेन्दु नभांगन मे ज्योत्सना मंगल-घट छिलकौने ।।


फागुनक गीत
 
 
फगुनहटिक लए रहल  लहरि छी।
मस्त उमंगक उमरल धार सँ लैत अंश हमहूं उपकरिछी। फगुनहटिक--

मधुमासक उल्लास रास मे,
परिरंभित रहि प्रणय-पाश मे,
मांगपूरक हितउचित अवसरक उडंति अवनि सँ अम्बर धरि छी। फगुनहटिक--

सुरक मधुर उर्मिल वितान मे
 ,
वरवस उधियाइत उडंान मे
भै विभोर सहजहि हिलोर सँ हेरा जाइत हम सम्हरि - सम्हरिछी।फगुनहटिक लए

स्फू्रतित गमकैछ दश दिशा,
अधिक बढाबति अछि जिजीविषा
नैसर्गिक ऐश्वर्यक मह-मह बा ढि बीच स्फुरित लहरि
  छी।।फगुनहटिक---

एहन मधुरितुक गुण सुर-रंजन,
बहति समीरण अछि दुखभंजन
जीवन मे सौन्दर्य
 यौवनक लैत अपन सुख अंजलि भरि  छी।।.                   

कण-कण मे आकर्षण
पवनक हठपूऱवक मधुवरषन
मधुमासक एहि रास-भास केर थाह लैत हम ठहरि - ठहरि
  छी। फगुनहटिक लए रहल--

रहलआब नहिं
 जाड़क ठिठुड़न
ढीठ तुषारक निरलस अड़चन,
अकड़न वातावरणक दुर्बह
  दूर हटल  हमगेल पसरि छी।। फगुनहटिक---

इहलौकिक सीमा क पार बहि,
रितुक प्रसादित स््वनक संग रहि,
उतरि अनन्त नभक प्रांगण मे आनन्दक सुर गहि सुरसरि छी।।फगुनहटिक,़़़़़़


 
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pastedGraphic_39.pngयोगानंद हीरा
४ टा गजल


मोनमे अछि सवाल बाजू की
छल कपट केर हाल बाजू की

दुख सुखक गप्प आब सूनत के
सभ बजा रहल गाल बाजू की

छोट सन चीज कीनि ने पाबी
बाल बोधक सवाल बाजू की

माँग सभहँक तँ ओहिना बड़का
आँखि सभहँक बिड़ाल बाजू की

भाग लिखलक ललाट ई मँहगी
हाथ लेलक भुजाल बाजू की

सभ पाँतिमे 2122.12.1222 मात्राक्रम अछि


हमरहुँ घरमे आयल पाहुन
घर आँगनमे छायल पाहुन

जिनकर खातिर आँखिक पुतरी
छल पथरायल आयल पाहुन

अँगना गमकल कंगना खनकल
घर आयल चोटायल पाहुन

मेना बाजल सुगना नाचल
दीदीकेँ भरमायल पाहुन

कनखी मारै पोसा पिल्ला
देशी मुरगी खायल पाहुन

हीरा जे छल दुबकल घरमे
तरहथपर चमकायल पाहुन

सभ पाँतिमे आठटा दीर्घक प्रयोग अछि।


रहू कमल सन सदा सुवासित
बनू मनोहर हवा सुवासित

उड़ै भमर चहुँ दिशा सुनाबै
हमर हुनक ई कथा सुवासित

दुखक झमारल हँसी लुटाबै
अलख जगाबै धरा सुवासित

किनक कने घोघ उठि रहल अछि
हवा करै अंगना सुवासित

चढ़ल गुलाबी निसा कमल सन
भरम हमर कंगना सुवासित

चलू बढ़ू सबजना निमंत्रण
बनी कुसुम हम मुदा सुवासित

सभ पाँतिमे 12+122+12+122मात्राक्रम अछि

देखू बौआ
आयल कौआ

छतपर बैसल
माँगय खोआ

कुचरय आनय
पाहुन कौआ

विरही पीड़ा 
जानय कौआ

कानय बौआ
पकड़य कौआ

एके आँखिन
देखय कौआ

सभ पाँतिमे 2222 मात्राक्रम।


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१. pastedGraphic_16.pngज्योति झा चौधरी २.pastedGraphic_17.pngराजनाथ मिश्र (चित्रमय मिथिला) ३. pastedGraphic_18.pngउमेश मण्डल (मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव-जन्तु/ मिथिलाक जिनगी)
१.
pastedGraphic_40.pngज्योति झा चौधरी


pastedGraphic_41.png

२.
pastedGraphic_42.pngराजनाथ मिश्र
चित्रमय मिथिला (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ )

३.
pastedGraphic_8.pngउमेश मण्डल

मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव जन्तु/ मिथिलाक जिनगी  (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ )


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बालानां कृते
१. pastedGraphic_21.pngमिहिर झा- दूटा बाल गजल २.pastedGraphic_22.pngबृषेश चन्द्र लाल- होरीक गीत
pastedGraphic_43.pngमिहिर झा
दूटा बाल गजल


माय तरेगन तोडि दे
 
भानस बासन छोडि दे
 
खिस्सा राजा भोज के
कहिके घूरो कोडि दे
खेबौ दाना फोँक नै
मूँगफली तूँ फोडि दे
छूछे चूडा पात पर
दहियो कनिये पोडि दे
टूटल घोडा टाँग गै
माटि लगा के जोडि दे

२२२२ २१२
पूड़ी बनलै गोल गै
बाजू मिठगर बोल गै
 
पूड़ी गेलै पेट मे
 
नाचब सौंसे टोल गै
 
होली एलै दोग से
बजतै तासा ढोल गै
ममता तोहर चान सन
कोना लगतै मोल गै

२२२२ २१२


 
pastedGraphic_44.pngबृषेश चन्द्र लाल

होरीक गीत

युवा - गोरकी नाचए पहिर चुनरिया
जियरा झुमल जाय रे !
युवती -धिन धिन ता ता बाजे रे लहरी
हियरा जुमल जाय रे !!


युवा- फुलल गुलाब गमकलि चम्पा
महकि उठल बन जोर
 
रग-रग राग रागकेर गाबए
मांगए नेहक कोर
शीतल पवन ई मारए अगनमा
मदेँ सहल ने जाए रे !
गोरकी नाचए पहिर चुनरिया
जियरा झुमल जाय रे !!


युवती- आएल बसन्त छाएल फगुनी
कुहकए कोइली चहुँओर
टनकए तन झनकए झन-झन
गाढ नीन्न पहुँमोर
खोलू नयन ओ नेही सजनमा
भानु उगल अब जाए रे !
धिन धिन ता ता बाजे रे लहरी
हियरा जुमल जाय रे !!


युवा – लाल रंग सब अंग लाल छै
लाले के छै जोर
लाल गाल तैपर गुलाल छै
लाले गोरीके ठोर
लाले लगओलक लाली लगनमा
लाले लाल देखाए रे !
गोरकी नाचए पहिर चुनरिया
जियरा झुमल जाय रे !!

 
युवती- लाल कहै छै लालेके संग
लालीक भेलै शोर
लाले दिन राति छै ई लाले
सुखद लालिमा भोर
लाल निशासँ घुमए गगनमा
लाले पिय देखाए रे !
धिन धिन ता ता बाजे रे लहरी
हियरा जुमल जाय रे !!
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बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
१.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥
१०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२)
आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥
आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥
मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।
ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।
हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥
मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि।
एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।
अन्वय-
ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म
रा॒ष्ट्रे - देशमे
ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त
आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए
रा॑ज॒न्यः-राजा
शुरे॑ऽ–बिना डर बला
इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण
ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला
म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर
दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली)
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित
सप्तिः॒-घोड़ा
पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री
जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला
र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर
स॒भेयो॒-उत्तम सभामे
युवास्य-युवा जेहन
यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे
वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला
निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे
नः-हमर सभक
प॒र्जन्यों-मेघ
वर्षतु॒-वर्षा होए
फल॑वत्यो-उत्तम फल बला
ओष॑धयः-औषधिः
पच्यन्तां- पाकए
योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा
नः॑-हमरा सभक हेतु
कल्पताम्-समर्थ होए
ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी।
8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS
8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH


pastedGraphic_45.pngRamnarayan Thakur
 Ancient India                 
               The Sources of the History of  Pilgrimage       
        
   The primary sources on the basis of the study are following literature, inscriptions  and archaeological excavations. The literary sources include the two epics, the Ashtadash Purans , earliest smritis, foreign traveler accounts and certain non-religious texts.
  Epics and purans- The epics began from the third-second centuries and the final compilation took place during the Gupta period. Ramayan describes the Gokarna, puskar, chitrakuta, praya and Rsyamuka mountain.1
  In next contest the sage visvamitra is said to have mediated for a thousand years at the kirtha of puskara.2
    In the yuddhekand, Ayodya3 is compared with Amravati of Indra in the matter of grandeur. In the Aranyakanda, Visala4 Panchvati5 and panch sarovar6 is a religious place. The Balkanda of the Ramayan refers to Janakpur7 and Dandakaranya8.
    The Mahabharat turnishes a lot of informations about big and small tirths. The Vanaparv and Salyaparva of the text contain near about 3900 verses on pilgrimage9.
   Traditionally, the purans are said to have underline features (puranani panchalaksanani). These include creation (Sarga), recreation(pratisarga), genealogy(Vamsa), cosmic cycles(manvantra) and account of royal dynasties( Vamsacharit).
    The Vayupuran which is one of early purans devotes considerable space to Gaya tirtha. It describes the importance of different small and big tirthas like Gokula, Braja, Vrindavan and Mathura.
      The Matsypurana which is an early vaisnava puran provides useful nformations for the study of pilgrimage centrs and related ritual.
    The kishikhanda and the Prabhashkanda of the Skandapurana ranging between the 10th  and 13th centuries respectively fefer to the Chinese traveller accounts.
        The account of Chinese pilgrims fa-hien and Hiuen Tsang are important for our purpose. Fahien arrived  in Indian in A.D 399 and stayed here till A.D. 414. Hiuen tsang came to India in A.D. 629 to 644 A.D. . Both are great scholars of buddhist religion and theology. According to him, the hindus believe in philosophy of religions Merit(punya) and sin, next birth and importance of Karma.
    Fahiyans chief contribution to our purpose is that he gives and account of a number of towns like Kapilavastu, Sravasti, Gaya etc.
    Hiuen Tsang lays more emphasis on the description of different Buddhist centres including Nalanda, Bodhgaya and Takasila and holy places of Ayodhya and sravsti also Gaya.
       Inscriptions-Inscriptions are important because these provide precies dates by which a pilgirmage centre had come into  existence. The Gunji inscription of kumarvadatta from chattisgarh region to Rsabha tirtha. The karle cave inscriptions of the prabhasa as a tirtha, Nasik cave inscriptions of about the importance of Puskara tirtha. Kailvin brahmi Inscription of A.D. 186 attests to the sanctity of the river phalgu which passes through Gaya10.
     The inscriptions give informations inscribed on stones, rocks, metals. Wells of forts and walls of temple in different parts of the country. The languages, used are mainly Sanskrit, Prakrit, Tamil and Kanner.
     The Nagardham copperplate of swamiram refers to prayaga as a tirtha is written in Sanskrit.
     Excavation reports-
   Archaeological materials also underline the classification of excavated sites according to the degrees of urbanization. In fact some of the later category of tirths became as reputed and popular as those which represent the major decaying urban places.
   Fut note:
1.   Ramayan , Balkanda , 42.11-12
2.   Ibid, 62-28
3.   Do , yuddhakanda, 123.57
4.   Do, Aranayak Kand-1.1
5.   Do, 13.24
6.   Do, 73.22-23
7.   Do, Balkand, 48.10
8.   Do 47.11-12
9.   Vanaparva -82.13
10.              Do-88.4
From
Dr. Ram Narayan Thakur
Asst. professor(history)
Rashtriya Sanskrit sansthan
Vedvyas campus
Balahar, Kangra (H.P.)
177108
VIDEHA MAITHILI SAMSKRIT TUTOR
डॉ. अमर जी झा
क्रियाकालर्योसंबंध

क्रियाकालौ शब्दब्रह्मणः शक्तिरेव वर्त्तते। भर्तृहरिमते क्रियायाः विविध्भेदानां आश्रयः कालशक्तिरेव अस्ति। क्रियायाः षड्भावविकाररूपभेदाः कालसापेक्ष एव भवन्ति यथा- जायते, अस्त्यादि । वाक्यपदीये क्रियाभेदस्य कारणरूपे कालः मनुते। क्रियायाः क्रमरूपतायाः आधरः कालशक्तिरेव अस्ति। भर्तृहरिणा कालसमुद्देशे उक्तं यत् कार्यकारणस्य अभेदोपचारेण कालोऽपि व्यापाररूपः वर्त्तते।
 
महाभाष्यकाराणुसारेण भूतभविष्यद्वर्त्तमानादि कालस्य अभिव्यक्ति क्रियाविना ;क्रियाभावेद्ध न भवितुं शक्यते। अर्थात् कालः क्रियाभिभा नास्ति।
 
भर्तृहरिमते क्रिया कालानुपाति भवति-
कालानुपाति यद्रूपं तदस्तीति प्रतीयते।
परितस्तु परिच्छिन्नं भाव इत्येव कथ्यते।।
अभिप्रायमस्ति यत् प्रसिद्धपरिणामयुक्तक्रिया अप्रसिद्धपरिणामयुक्तक्रियां प्रति परिच्छेदिका भवति।
यथा- दिवसमध्ीते इति दिवस शब्देन उदयादिः अस्तमयान्तः आदित्यगति प्रबन्ध्ः उच्यते। स च परिच्छेदकत्वात् कालः अस्ति।
 
चार्वाकमतेऽपि कालः क्रियां प्रति क्रियान्तरपरिच्छेदप्रवृत्ता भवति अर्थात् या क्रिया निज्ञात, परिमाणा भवति सा कालेन अभिध्ीयते।
 
उदा. - गोदोहमास्ते।
 
भर्तृहरिमतेः यदाः बहिर्क्रियायाः अवधरकस्य निश्चितं न भवितुं शक्यते तदा ज्ञाने बहिर्क्रियायाः संक्रान्तिः भवति पुनश्च बुद्धौ संकलनया समूहीकरणं भवति। अतः क्रियान्तराभावे बाह्यक्रियाणामभावे वा सा क्रिया ज्ञानरूपा काल इष्यते। हेलाराजानुसारेण प्राणप्रवाहादिक्रिया एव बाह्यक्रियायाः परिच्छेदिका वर्त्तते।
 
पूर्वपक्षः कथयति यत् क्रियाव्यतिरिक्तः कालः यदि नास्ति तर्हि भावरूपक्रियायाणां मध्ये योगः न भवितव्यम् पुनश्च ‘भूता सताः’ इति कथनं निरर्थकम् वर्त्तते। भर्तृहरिः पूर्वपक्षस्य शंकायाः समाधनं करोति यत् यथा ‘भूतो घटः’ वाक्ये सत्तारूपक्रियायाः भूतत्वं भवति न तु घटस्य। तथैव ‘भूता सत्ता’ वाक्येन द्रव्यवाच्यसत्तायाः भूतत्वं कथनं न भवति। अपितु सत्तारूपक्रियायाः कथनं भवति। हेलाराजमते कालः क्रियाद्वारकः क्रियोन्मुखश्च भवति। अपि च पफलावसानपर्यन्तः क्षणमात्राः वर्तते। भर्तृहरिः मनुते यत् यौगपद्यरूपे क्रिया श्रुत्वाऽपि तासु क्रमरूपता वर्त्तते। समूहरूपे{पि क्रियायाः मध्ये कालभेदेनेव भेदं स्पष्टं भवति यतोहि कालेन एव क्रमरूपता भवति।
 
भर्तृहरिः कालं ‘हायन’ इति कथयति। ‘हायन’ इत्यस्यर्थः ‘‘जहाति क्रिया इति हायनः’’ वर्त्तते। क्रियायाः परिच्छेदकेनेव एवम्प्रकारण्ेा सम्बोध्नं वर्त्तते। अर्थात कालः क्रियोपाध्किः वर्त्तते। निष्कर्षतः कथितुं शक्यते यत् क्रियाकालयोः संबंध्ः अन्योन्याश्रयः वर्त्तते।
 अध्याहितकलां यस्य कालशक्तिमुपाश्रिताः।
जन्मादयो विकारः षड्भावभेदस्य योनयः।। वा.प. 1.3
२ (क) क्रियाभेदाय कालस्तु। वा.प. 3.9.2
(ख) कालो भेदाय कल्पते। वा.प. 3.9.8
३ प्रत्यवायं तु कालस्य व्यापारो एव व्यवस्थितः।
काल एव हि विश्वात्मा व्यापार इति कथ्यते।। वा.प. 3.9.12
४अथवा नान्तरेण क्रियां भूतभविष्यद्वर्त्तमानाः काले व्यग्यन्ते अस्त्यादिभिश्चापि भूतभविष्यद्वर्त्तमानः कालो व्यग्यते। म.हा. 1.3.1
१म.भा. 1.170
२क्रियान्तरपरिच्छेदं प्रवृत्ता या क्रियां प्रति।
निर्ज्ञात परिमाणा सा काला इत्यभिध्ीयते।।
३ज्ञाने रूपस्य संक्रान्तिर्ज्ञानेनैवानुसंहृतिः।
अतः क्रियान्तराभावे सा क्रिया काल इष्यते।। वा.प. 3.9.78
४वा.प. 3.9.78, प्रकाश टीका
५भूतो घट इतीयं च सत्ताया एव भूतया।
भूता सत्तेति सत्तायाः सत्ता भूताभिध्ीयते।। वा.प. 3.9.79
६व्यतिरिक्तकालदर्शनेऽप्यस्ति संबंध्ः। क्रियामुखस्तु सः।। वा.प. 3.9.79. पर हेलाराज टीका, पृ. 571
१वा.प. 3.9.83 पर हेलाराज टीका, पृ. 578
२क्रमे विभिदयते रूपं यौगपद्ये न भिद्यते।
क्रिया तु यौगपदये{पि क्रमरूपानुपातिनी। वा.प. 2.465
३जहति क्रिया इति हायनः। वा.प. 3.0.29
४क्रियोपाध्श्चि सन् भूतभविष्यद्वर्त्तमानता। वा.प. 3.9, प्र.प्र. पृ. 526

संदर्भग्रन्थाः-
1. महाभाष्य, सं.-भार्गव शास्त्राी, चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली।
2. वाक्यपदीय, द्वितीयकाण्ड, ;पुण्यराज टीका सहितद्ध के.एस.एस. अ
Õयर, पूना, डस्ठब् 1983 
3. वाक्यपदीय ;तृतीय काण्डद्ध, ;प्रकाश एवं अम्बाकर्त्राी टीका सहितद्ध - रघुनाथ शर्मा, सं. सं. वि.वि. 1977.

विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन  
इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष  प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ।
१.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम

१.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक
  उच्चारण आ लेखन शैली
(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) 
मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन

१.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- 
अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।)
पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।)
खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।)
सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।)
खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।)
उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि।
नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ।

२.ढ आ ढ : ढक उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना-
ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि।
ढ = पढ़ाइ, बढब, गढब, मढब, बुढबा, साँढ, गाढ, रीढ, चाँढ, सीढी, पीढी आदि।
उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ अबैत अछि। इएह नियम ड आ डक सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि।

३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि।

४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही।

५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि।
प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि।
नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि।
सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि।
ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि।

६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि।

७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खडयन्त्र), षोडशी (खोडशी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि।

८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि:
(क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : पढए (पढय) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पडतौक।
अपूर्ण रूप : पढ’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पडतौक।
पढऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पडतौक।
(ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह।
अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह।
(ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि।
अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल।
(घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : पढैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि।
अपूर्ण रूप : पढै अछि, बजै अछि, गबै अछि।
(ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक।
अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ।
(च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि।
अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै।

९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि।

१०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पडि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए।
-(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) 

१.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन
ठाम
जकर, तकर
तनिकर
अछि

अग्राह्य
अखन, अखनि, एखेन, अखनी
ठिमा, ठिना, ठमा
जेकर, तेकर
तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य)
ऐछ, अहि, ए।

२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।

६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढैआ, विआह, वा धीया, अढैया, बियाह।

९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोडि क’ ,
  हटा क’ नहि।

१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६

  २. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम 
२.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):-    
दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य मे जीह तालुसँ , मे मूर्धासँ आ दन्त मे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे केँ वैदिक संस्कृत जकाँ सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ 
गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। 
ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी।
अछि- अ इ छ  ऐछ (उच्चारण)
छथि- छ इ थ  – छैथ (उच्चारण)
पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण)
आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि।
फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । 
उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव  http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना 
छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। 
रहए- 
रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। 
मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए
छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो।
संयोगने- (उच्चारण संजोगने)
केँ/  कऽ
केर- (
केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) 
क (जेना रामक) 
–रामक आ संगे (उच्चारण राम के /  राम कऽ सेहो) 
सँ- सऽ (उच्चारण)
चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ)  रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)।

केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ
क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक
कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ
सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ
सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित।
के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित।
नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै 

त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)।
राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै)
सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन)
पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल
पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै 
ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै)
ओइ/ ओहि
ओहिले
ओहि लेल/ ओही लऽ 
जएबेँ/ बैसबेँ
पँचभइयाँ
देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित)
जकाँ / जेकाँ
तँइ/ तैँ/
होएत / हएत
नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै
सौँसे/ सौंसे
बड
बडी (झोराओल) 
गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।)
रहलेँ/ पहिरतैँ
हमहीं/ अहीं
सब - सभ
सबहक - सभहक 
धरि - तक
गप- बात
बूझब - समझब 
बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ
हमरा आर - हम सभ 
आकि- आ कि
सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै)
होइन/ होनि
जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन)
पइठ/ जाइठ
आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ
मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । 
एकटा , दूटा (मुदा कए टा)
बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ
, आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) 
अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोडैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)।
अइमे, एहिमे/ ऐमे
जइमे, जाहिमे
एखन/ अखन/ अइखन

केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) 
भऽ
मे
दऽ 
तँ (तऽ, त नै)
सँ ( सऽ स नै)
गाछ तर
गाछ लग
साँझ खन
जो (जो go, करै जो do)
 तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले
जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले
ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति‍ कतेक दि‍नसँ कहैत रहैत अइ
लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे
लहँ/ लौं

गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ
जइ/ जाहि‍/ जै 
जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम 
एहि‍/ अहि‍/ 
अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) /  
अइछ/ अछि‍/ ऐछ 
तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ 
ओहि‍/ ओइ 
सीखि‍/ सीख 
जीवि‍/ जीवी/ जीब  
भलेहीं/ भलहि‍ं  
तैं/ तँइ/ तँए 
जाएब/ जएब 
लइ/ लै 
छइ/ छै 
नहि‍/ नै/ नइ 
गइ/ गै  
छनि‍/ छन्‍हि ... 
समए शब्‍दक संग जखन कोनो वि‍भक्‍ति‍ जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्‍यादि‍। असगरमे हृदए आ वि‍भक्‍ति‍ जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्‍यादि‍।   
जइ/ जाहि‍/ 
जै 
जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम
एहि‍/ अहि‍/ अइ/
अइछ/ अछि‍/ ऐछ
तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍
ओहि‍/ ओइ
सीखि‍/ सीख
जीवि‍/ जीवी/ 
जीब  
भले/ भलेहीं/ 
भलहि‍ं  
तैं/ तँइ/ तँए
जाएब/ जएब
लइ/ लै
छइ/ छै
नहि‍/ नै/ नइ
गइ/ 
गै  
छनि‍/ छन्‍हि‍
चुकल अछि/ गेल गछि
२.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम 
नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही:
बोल्ड कएल रूप ग्राह्य:  
१.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक 
२. आ’/आऽ
आ 
३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए 
४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए
गेल 
५. कर’ गेलाह/करऽ
गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह 
६.
लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ 
७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला /
करैवाली 
८. बला वला (पुरूष), वाली (स्‍त्री) ९
आङ्ल आंग्ल 
१०. प्रायः प्रायह 
११. दुःख दुख १
२. चलि गेल चल गेल/चैल गेल 
१३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन 
१४.
देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह 
१५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि 
१६. चलैत/दैत चलति/दैति 
१७. एखनो 
अखनो 
१८. 
बढ़नि‍ बढइन बढन्हि 
१९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम)  
२०
. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ 
२१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ 
२२. 
जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर 
२४. केलन्हि/केलनि‍/कयलन्हि 
२५. तखनतँ/ तखन तँ 
२६. जा
रहल/जाय रहल/जाए रहल 
२७. निकलय/निकलए
लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल 
२८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए 
२९.
की फूरल जे कि फूरल जे 
३०. जे जे’/जेऽ 
३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ 
यादि (मोन) 
३२. इहो/ ओहो 
३३. 
हँसए/ हँसय हँसऽ 
३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस 
३५. सासु-ससुर सास-ससुर 
३६. छह/ सात छ/छः/सात 
३७.
की  की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) 
३८. जबाब जवाब 
३९. करएताह/ करेताह करयताह 
४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस 
४१
. गेलाह गएलाह/गयलाह 
४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर 
४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल 
४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि‍ जाइत छल 
४५. 
जबान (युवा)/ जवान(फौजी) 
४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए
४७. ल’/लऽ कय/
कए 
४८. एखन / एखने / अखन / अखने 
४९. 
अहींकेँ अहीँकेँ 
५०. गहींर गहीँर 
५१. 
धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए 
५२. जेकाँ जेँकाँ/
जकाँ 
५३. तहिना तेहिना 
५४. एकर अकर 
५५. बहिनउ बहनोइ 
५६. बहिन बहिनि 
५७. बहिन-बहिनोइ
बहिन-बहनउ 
५८. नहि/ नै 
५९. करबा / करबाय/ करबाए 
६०. तँ/ त ऽ तय/तए 
६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ
६२. गि‍नतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ  
६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत 
६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता 
६५. देन्हि/ दइन दनि‍/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि 
६६. द’/ दऽ/ दए 
६७. (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) 
६८. तका कए तकाय तकाए 
६९. पैरे (on foot) पएरे  कएक/ कैक 
७०.
ताहुमे/ ताहूमे 
 ७१.
पुत्रीक 
७२. 
बजा कय/ कए / कऽ 
७३. बननाय/बननाइ 
७४. कोला 
७५. 
दिनुका दिनका 
७६.
ततहिसँ 
७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि‍/
  गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ 
७८. बालु बालू 
७९. 
चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) 
८०. जे जे’ 
८१
. से/ के से’/के’ 
८२. एखुनका अखनुका 
८३. भुमिहार भूमिहार 
८४. सुग्गर
/ सुगरक/ सूगर 
८५. झठहाक झटहाक ८६.
छूबि 
८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ 
८८. पुबारि 
पुबाइ 
८९. झगड़ा-झाँटी
झगड़ा-झाँटि 
९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे
९१. खेलएबाक 
९२. खेलेबाक 
९३. लगा 
९४. होए- होहोअए 
९५. बुझल बूझल 
९६. 
बूझल (संबोधन अर्थमे) 
९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह 
९८. तातिल 
९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ 
१००. निन्न- निन्द 
१०१.
बिनु बिन 
१०२. जाए जाइ 
१०३. 
जाइ (in different sense)-last word of sentence 
१०४. छत पर आबि जाइ 
१०५.
ने 
१०६. खेलाए (play) –खेलाइ 
१०७. शिकाइत- शिकायत 
१०८. 
ढप- ढ़प 
१०९
. पढ़- पढ 
११०. कनिए/ कनिये कनिञे 
१११. राकस- राकश 
११२. होए/ होय होइ 
११३. अउरदा-
औरदा 
११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) 
११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि‍/ बुझयलन्हि (understood himself) 
११६. चलि- चल/ चलि‍ गेल 
११७. खधाइ- खधाय 
११८.
मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखि‍न/ मोन पारलखिन्ह 
११९. कैक- कएक- कइएक 
१२०.
लग ल’ग  
१२१. जरेनाइ 
१२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/
जरेनाइ 
१२३. होइत 
१२४.
गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ गरबौलन्हि/ गरबौलनि‍ 
१२५.
चिखैत- (to test)चिखइत 
१२६. करइयो (willing to do) करैयो 
१२७. जेकरा- जकरा 
१२८. तकरा- तेकरा 
१२९. 
बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे 
१३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं 
१३१.
हारिक (उच्चारण हाइरक) 
१३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज
१३३. आधे भाग/ आध-भागे 
१३४. पिचा / पिचाय/पिचाए 
१३५. नञ/ ने 
१३६. बच्चा नञ 
(ने) पिचा जाय 
१३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत
१३८. 
कतेक गोटे/ कताक गोटे 
१३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई 
१४०
. लग ल’ग 
१४१. खेलाइ (for playing) 
१४२. 
छथिन्ह/ छथिन 
१४३. 
होइत होइ 
१४४. क्यो कियो / केओ 
१४५.
केश (hair) 
१४६.
केस (court-case) 
१४७
. बननाइ/ बननाय/ बननाए 
१४८. जरेनाइ 
१४९. कुरसी कुर्सी 
१५०. चरचा चर्चा 
१५१. कर्म करम 
१५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए 
१५३. एखुनका/ 
अखुनका 
१५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ 
१५५. कएलक/ 
केलक 
५६. गरमी गर्मी 
१५७
. वरदी वर्दी 
१५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ 
१५९. एनाइ-गेनाइ 
१६०.
तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि‍ 
१६१. नञि / नै
१६२. 
डरो ड’रो 
१६३. कतहु/ कतौ कहीं 
१६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर 
१६५. भरिगर 
१६६. धोल/धोअल धोएल 
१६७. गप/गप्प 
१६८. 
के के’ 
१६९. दरबज्जा/ दरबजा 
१७०. ठाम 
१७१.
धरि तक 
१७२. 
घूरि लौटि 
१७३. थोरबेक 
१७४. बड्ड 
१७५. तोँ/ तूँ 
१७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) 
१७७. तोँही / तोँहि 
१७८.
करबाइए करबाइये 
१७९. एकेटा 
१८०. करितथि /करतथि 
 १८१. 
पहुँचि/ पहुँच 
१८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि‍ 
१८३. 
लगलन्हि/ लगलनि‍ लागलन्हि 
१८४. 
सुनि (उच्चारण सुइन) 
१८५. अछि (उच्चारण अइछ) 
१८६. एलथि गेलथि 
१८७. बितओने/ बि‍तौने/ 
बितेने 
१८८. करबओलन्हि/ करबौलनि‍/
करेलखिन्ह/ करेलखि‍न 
१८९. करएलन्हि/ करेलनि‍ 
१९०. 
आकि/ कि 
१९१. पहुँचि/ 
पहुँच 
१९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) 
१९३. 
से से’ 
१९४. 
हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) 
१९५. फेल फैल 
१९६. फइल(spacious) फैल 
१९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि‍/हेतनि‍/ हेतन्हि 
१९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब 
१९९. फेका फेंका 
२००. देखाए देखा 
२०१. देखाबए 
२०२. सत्तरि सत्तर 
२०३. 
साहेब साहब 
२०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि‍ 
२०५. हेबाक/ होएबाक 
२०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ 
२०७. किछु न किछु/ 
किछु ने किछु 
२०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं 
२०९. एलाक/ अएलाक 
२१०. अः/ अह 
२११.लय/ 
लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक 
२१३.सबहक/ सभक 
२१४.मिलाऽ/ मिला 
२१५.कऽ/ क 
२१६.जाऽ/
जा 
२१७.आऽ/  
२१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) 
२१९.निअम/ नियम 
२२०
.हेक्टेअर/ हेक्टेयर 
२२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ 
२२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं 
२२३.कहिं/ कहीं 
२२४.तँइ
तैं / तइँ 
२२५.नँइ/ नइँ/  नञि/ नहि/नै 
२२६.है/ हए / एलीहेँ/
२२७.छञि/ छै/ छैक /छइ 
२२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ 
२२९. (come)/ आऽ(conjunction) 
२३०. 
आ (conjunction)/ आऽ(come) 
२३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना
२३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि‍
२३३.हेबाक- होएबाक
२३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं 
२३५.किछु न किछ- किछु ने किछु
२३६.केहेन- केहन
२३७.आऽ (come)- (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह
२३८. हएत-हैत
२३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें
२४०.एलाक- अएलाक
२४१.होनि- होइन/ होन्हि/
२४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/
२४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ
२४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ
२४५
.शामिल/ सामेल 
२४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं
२४७.जौं
/ ज्योँ/ जँ/ 
२४८.सभ/ सब
२४९.सभक/ सबहक
२५०.कहिं/ कहीं
२५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/
२५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल
२५३.कोना/ केना/ कन्‍ना/कना
२५४.अः/ अह
२५५.जनै/ जनञ
२५६.गेलनि‍/ 
गेलाह (अर्थ परिवर्तन) 
२५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि‍/ 
२५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन)
२५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी
२६०.पठेलन्हि‍ पठेलनि‍/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि‍/
२६१.निअम/ नियम
२६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर
२६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ
२६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित
२६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -/ कऽ/ के
२६६.छैन्हि- छन्हि
२६७.लगैए/ लगैये
२६८.होएत/ हएत
२६९.जाएत/ जएत/
२७०.आएत/ अएत/ आओत
२७१
.खाएत/ खएत/ खैत 
२७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पि‍येबाक 
२७३.शुरु/ शुरुह
२७४.शुरुहे/ शुरुए
२७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह
२७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/
२७७.जाइत/ जैतए/ जइतए
२७८.आएल/ अएल
२७९.कैक/ कएक
२८०.आयल/ अएल/ आएल
२८१. जाए/ जअए/ जए (लालति‍ जाए लगलीह।)
२८२. नुकएल/ नुकाएल
२८३. कठुआएल/ कठुअएल
२८४. ताहि/ तै/ तइ
२८५. गायब/ गाएब/ गएब
२८६. सकै/ सकए/ सकय
२८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल)
२८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढैत
(पढै-पढैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि‍। बुझैत-बुझैत आब बुझलि‍ऐ। हमहूँ बुझै छी। 
२८९. दुआरे/ द्वारे
२९०.भेटि/ भेट/ भेँट
२९१. 
खन/ खीन/  खुना (भोर खन/ भोर खीन) 
२९२.तक/ धरि
२९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ)
२९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ)
२९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अ