Tuesday, January 14, 2014

‘विदेह'१४४ म अंक १५ दिसम्बर २०१३ (वर्ष ६ मास ७२ अंक १४४) PART III

71
हम गजल कोना कहू भीड़मे रसगर
सगर मुँह बेने मनुख भेसमे अजगर

पाइ घोटाला हबालाक खाएकेँ
रोग छै सबकेँ पकरने किए कसगर

बहिन माए भाइ बाबू अपन कनियाँ
सब तकै सम्बन्धमे दाम ली जथगर

गामकेँ बेटा परेलै शहर सबटा
खेत एकोटा रहल आब नै चसगर

छै बिकाइ प्रेम दू-दू टका मोले
रीतमनुकेँ नै लगै छै कनी जसगर

(बहरे कलीब, मात्रा क्रम-२१२२-२१२२-१२२२)
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72
आब चाही बस अहाँ केर मुस्कीटा
नै मरब पीने बिनु प्रेम चुस्कीटा

जे अहाँ बजलौं करू ओकरो पूरा
की अहूँ भेलौं खली बम्म फुस्कीटा

नै कटाबू नाक आबू सभक सोंझाँ
की तरे-तर रहब मारैत भुस्कीटा

डर लगैए भीड़मे नै निकलु बाहर
देख टीभी बसि घरे करब टुस्कीटा

मनुदखेलौं सभक अपनो कनी देखू
बिसरि अप्पन काज नै बनब घुस्कीटा

(बहरे कलीब, मात्रा क्रम२१२२-२१२२-१२२२)
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73                         
लदने नै अनेरे लाश छी कान्हपर
जीवन केर सबटा आश छी कान्हपर

दिन भरि जे कमेलौं ओकरे दाम अछि
ढाकीमे बुझू नै घास छी कान्हपर

खूजल उक जकाँ  कोना फरफराइ छी
नै रखने मनुक्खक भाष छी कान्हपर

भैया भेल नेता आब नै हम डरब
रखने हाथ सदिखन खास छी कान्हपर

कुक्कुर पोसि नव-नव साहबी केरमनु
दू कट्ठा बचेने चास छी कान्हपर 

(बहरे कबीर, मात्रा क्रम२२२१-२२२१-२२१२)


74
होए मोन हरखीत ढोलो सोहाइ
नै बिनु कारने मीठ बोलो सोहाइ

प्रियगर भेट नवकी कनियाँ गेलै जँ
हाथक हुनकर नोनगर ओलो सोहाइ

जेबीमे जखन भरल रुपैया होइ
तहने महग सस्ताक मोलो सोहाइ

सिम्बर तूरकेँ नीक गदगर मसलंग
सुन्नर ओहिपर आब खोलो सोहाइ

भरि सन्दूक घर जाहिमे भेटै सोन
एहन घरक महकैत झोलो सोहाइ

(बहरे हमीद, मात्रा क्रम -२२२१-२२१२-२२२१)
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75         

उठलै करेजामे दरदिया हो राम
भेलै पिया जुल्मी बहरिया हो राम

कुक कोइलीकें सुनि हिया सिहरल हमर
आँखिसँ बहे नोरक टघरिया हो राम 

साउन बितल जाए  सुहावन मन सुखल
एलै पियाकेँ  नै कहरिया हो राम

जरलै हमर  जीवन बिना प्रेमक आगि
लागल हमर सुखमे वदरिया हो राम

जीवनमनु बनलै बिना तेलक दीप 
कोना जरत  मोनक  बिजुरिया हो राम

(बहरे सरीअ, मात्रा क्रम  - २२१२-२२१२-२२२१)
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76                

जनमेसँ टूगर हम प्रेमक लेल तरसैत रहलौं
भेटल किरण एक आशक तकरो तँ मिझबैत रहलौं

दुख एहिकेँ केखनो नै की प्रेम किछु नै पएलौं
अफसोस की एहि दुनिआमे चुप्प जीबैत रहलौं  

चमकैत सभ बस्तुकेँ हम अनजानमे सोन बुझलौं
सोना जखन हम पएलौं नै बुझि ' हरबैत रहलौं

किछु नै बचल आब अपनेकेँ लूटबअमे लागि गेलौं
तारी कटीयाक मेलामे होस हारैत रहलौं

आँखिक बिसरि आश गेलौं अनुराग सभटा बिसरलौं
गेलौं हराएब दुखमनुछन सुखक बिसरैत रहलौं

( बहरे मुजस्सम वा मुजास, मात्रा क्रम-२२१२-२१२२/२२१२-२१२२)
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77
हेरौ कोआ खसा दे एगो आम हमरो लेल
देबौ बाली माए जे देतै दाम हमरो लेल

चल-चल गे बूचनी चलै आब खेलएब
भऽ गेल देलकै जे माए काम हमरो लेल

नहि छमकै एना लए कऽ अपन पुतूल
तोरासँ सुन्नर देथीन राम हमरो लेल   

बहुत केलहुँ काज   लगेलहुँ  बड़ राज
आबो तँ घुरि आउ बाबू गाम हमरो लेल

सभकेँ नाम गे माए कते सुन्नर-सुन्नर
किएक नहिमनुसन नाम हमरो लेल

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१६)
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78
लाल-दाईकेँ  ललना लाले लाल लगैत छथि
लाली अपन माएकेँ चोरा कऽ नुकाबैत  छथि

हिनकर आँखिमे काजरक बिजुड़ीया लोके
मएयोसँ सुन्नर  झिलमिल झलकैत छथि

लटकल माथपर   सुन्नर लट  हिनकर
देखियौंह चंद्रमाकेँ आब लजाबैत छथि

सुनि-सुनि बहिना सभ  हिनकर किलकाड़ी
कियो खेलाबैत कियो हिनका झुलाबैत छथि

रंग-रूप चालि-चलन सभटा निहाल छनि
मुस्कीसँ तँ अपनमनुकेँ लुभाबैत छथि

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१७)
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79
बिनु पानिक  नाउ चलाएब हम
बिनु चक्काक गाड़ी बनाएब हम

हमर मोनमे तँ जेँ किछु आएत
बिन सोचने सभ सुनाएब  हम

अपन ब्याहमे  हम नहि जाएब
सराध दिन बजा बजाएब  हम

कनियाँकेँ लय ओकर नैहरसँ
सासुरसँ खूब कतियाएब हम

मनुमन  चंचल टोनए सभकेँ
केकरो हाथ नै घुरि आएब हम 

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१३)
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80
हे माए नहि चरबै लए  गाए जेबौ हम
जेबौ आब इसकूल कोपी पेन लेबौ हम 

अपन भाग हम  आब अपनेसँ लिखबौ
कुकूर जकाँ नै माँड़े तिरपीत हेबौ हम

रोगहा-रोगहा सभ कियो  कहए हमरा
एक दिन बनि डाक्टर रोग हरेबौ  हम

टूटल फूटल अपन फुसक घर तोरि
सुन्नर सभसँ पैघ  महल बनेबौ हम

हमरा कहैत अछिमनुमुर्ख चरबाहा
पढ़ि कए सभ चरबाहाकेँ  पढ़ेबौ हम

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण- १६)
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81
माएगै हमर फुकना की भेल
दाइ हमर झुनझूना की भेल

बाबाकेँ कहबनि  सभ हरेलौं
सभटा हमर खेलौना की भेल

दूध-भात आब हम नहि खेबौ
पेटमुका हमर  सन्ना की भेल

हम जे बुललौं बाबा बाबी संगे
रातिक हमर   सपना की भेल

मनुमामा परसु जे अनलन्हि
हमर निकहा  चुसना की भेल

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१२)
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82
चम चम चम चम तारा चमकए
बौआ कए हाथक तरुआ गमकए

करीया बकरी  नव उज्जर महीस
लाल बाछी किए दौर-दौर बमकए

बौआक घोरा सय-सय टाकाकेँ देखू
काकाकेँ घोरा पिद्दी कतेक कमकए

बाबीकेँ सारी माएकेँ लहंगा बहए
बौआकेँ घघरी तँ  कतेक छमकए

बौआ हमर आब गुमशुम किएक
मनुसंग ठुमुक-ठुमुक ठुमकए

(सरल वार्णिक, वर्ण-१४)
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83
बेलगोबना नहि सुनलक गप्प
ओकर माथसँ बेल खसल धप्प

बरखा बुनि लऽ कऽ एलै कारी मेघ
पएर तर पानि करे छप्प छप्प

बोगला भेल देखू कतेक चलाक
एके पएरे करे दिन भरि जप्प

बुढ़िया नानीकेँ दुनू काने हरेलै 
चाह पीबे भरि दिनमे दस कप्प

बैसमनुझोँटा छटा ले चुपचाप
नै तँ काटि देतौ कान हजमा खप्प

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१३)   
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84
नेना हम    मएँकेँ आँखि जूराएब
मिथिलाकेँ अपन  सोनासँ चमकाएब

मूरत सभ घरे रामे सियाकेँ देखु
एहन आँन  कतए  मेल  देखाएब

गंगा बसति पावन घर घरे मिथिलाक
डुबकी मारि कमला घाट नाहाएब

मुठ्ठी भरि बिया भागक अपन हम रोपि
अपने माटिमे हँसि हँसि कऽ गौड़ाएब

मनुदे सपत घर घुरि आउ काका बाबू
नेन्नाकेँ कखन तक कोँढ़ ठोड़ाएब

(बहरे रजज, मात्रा क्रम-२२२१-२२२१-२२२१)
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85
चलै चुनमुन चलै गुनगुन तमासा घुमि कए आबी
जिलेबी ओतए छानैत तोहर भेटतौ बाबी

पढ़ैकेँ छुटल झंझट भेल इसकूलक शुरू छुट्टी
दसो दिन राति मेला घुमि कए नव वस्तु सभ पाबी

करीया बनरिया कुदि कुदि कए ढोलक बजाबै छै 
चलै चल ओकरा संगे   सगर नेना कनी गाबी

बनल मेनजन अछि बकरी पबति बैसल अचारे छै
बरद सन बौक दिनभरि चूप्प रहए पहिरने जाबी   

बुझलकौ आब तोरो होसयारीमनुतँ बुढ़िया गै
लगोने ध्यान वक कतएसँ सम्पति नीकगर दाबी  

(बहरे हजज, मात्रा क्रम-१२२२ चारि-चारि बेर सभ पाँतिमे)
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86
तिला संक्रातिकेँ खिचैर खाले रौ हमर बौआ
लऽ जेतौ नै तँ कनिए कालमे आबिते कौआ

चलै बुच्ची सखी सभ लाइ मुरही किन कऽ आनी
अपन माएसँ झटपट माँगि नेने आबि जो ढौआ

बलानक घाट मेलामे कते घुमि घुमि मजा केलक
किए घर अबिते मातर बुढ़ीया गेल भय थौआ

कियो खुश भेल गुर तिल पाबि मुरही खुब कियो फाँकेँ
ललन बाबा किए झूमैत एना पी कए पौआ

सगर कमलाक धारक बाटमे बड़ रमणगर मेला
सभ कियो ओतए गेलै कि भेलैमनुकुनो हौआ

(बहरे रमल, मात्रा क्रम - १२२२-१२२२-१२२२-१२२२)
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87
फेर एलै दिवाली लेबै फटक्का
फोरबै मिल कए सभ मारत ठहक्का

बड़ रमनगर बुसऽट नव अनलन्हि मामा
देखते सभ भऽ गेलै कोना कऽ बक्का

घीक लड्डू दुनू हाथे दैत भरि भरि
अपन बेटाक कोजगरामे तँ कक्का

दौड़ चलबैत सासुरकेँ फटफटिया
हरसँ भरि थालमे सौंसे फसल चक्का

आइ कुसियारक ट्रककेँ परल पाँछा
संगमेमनु गामक छौंड़ा उचक्का

(बहरे असम, मात्रा क्रम- २१२२-१२२२-२१२२)
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88
अहाँ तँ सभटा बुझैत छी हे माता
सुमरि अहाँकेँ कनैत छी हे माता

दीन हीन हम नेना बड़ अज्ञानी
आँखि किए अहाँ मुनैत छी हे माता

अहाँ तँ  जगत जननी छी भवानी
तैयो नहि किछु सुनैत  छी हे माता

श्रधाभाव किछु देलौं अहीँ  हमरा
अर्पित ओकरे करैत छी हे माता

नहि हम जानी किछु पूजा-अर्चना
जप तप नहि  जनैत छी हे माता

जगमे आबि    ओझरेलहुँ एहेन
अहाँकेँ नहि सुमरैत छी हे माता

छी मैया हमर हम पुत्र अहीँकेँ
एतबे तँ हम बजैत छी हे माता

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१३)
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89
धूप आरती हम अनलहुँ नहि
जप-तप करब सिखलहुँ नहि

सदिखन कर्तव्यक बोझ उठोने
अहाँक ध्यान किछु धरलहुँ नहि

की होइत अछि माए पुत्रक नाता
एखन तक हम बुझलहुँ नहि

हम बिसरलहुँ अहाँकेँ जननी
अहुँ एखन तक सुनलहुँ नहि

अपन शरणमे लऽ लिअ हे माता
ममता अहाँक तँ जनलहुँ नहि

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१३ )
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90
निर्धन जानि कऽ छोरि गेलहुँ  माँ    
कोन अपराध हम केलहुँ माँ

केहनो छी तँ हम पुत्र अहींकेँ
सभ सनेश अहींसँ पेलहुँ माँ  

दामक तराजुमे नै एना जोखू
ममताकेँ  पियासल भेलहुँ माँ

दर-दर भटकि खाक छनै छी
दर्शन अपन नै दखेलहुँ माँ

मनुकेँ अपन सिनेह नै देलहुँ
सोंझाँसँ दूर आब भगेलहुँ माँ

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१२)
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91
हे राम बसु मनमे हमर
प्राण धरि तनमे हमर

सदिखन अहीँक ध्यानमे
नै मन बसै धनमे हमर

प्रभु दरसकेँ आशासँ
भटकैट मन बनमे हमर

एतेक मन चंचल किए
प्रभु रहथि कण कणमे हमर

हे राममनुपर करु दया
नै मन बहै छनमे हमर

(बहरे रजज, मात्रा क्रम २२१२-२२१२)
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92
चलि अहाँ कतए किए गेलहुँ मुरारी
एहि दुखियाकेँ हरत के कष्ट भारी

तान मुरलीक फेरसँ आबि टारू
बिकल भेलहुँ एतए एसगर नारी

द्रोपतीकेँ लाज बचबै लेल एलहुँ
नित्य सय सय बहिनकेँ कोना बिसारी

बनि कऽ फेरसँ सारथी भारत बचाबू
सभक रक्षक हे मधुसुदन चक्रधारी 

वचन जे रक्षाक देलहुँ निभाबू
कहत कोनामनुअहाँकेँ हे बिहारी

(बहरे रमल, मात्रा क्रम - २१२२-२१२२-२१२२)
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93
माँ शारदे वरदान दिअ
हमरो हृदयमे ज्ञान दिअ

हरि ली सभक अन्हार हम
एहन इजोतक दान दिअ

सुनि दोख हम कखनो अपन
दुख नै हुए कान दिअ

गाबी  अहीँकेँ गुण  सगर
सुर कन्ठ एहन तान दिअ

बुझि पुत्रमनुकेँ माँ अपन
कनिको हृदयमे स्थान दिअ

(बहरे रजज, मात्रा क्रम - २२१२-२२१२)
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94
कनी हमरो बजा दिअ माँ 
अपन दर्शन करा दिअ माँ

कते आशा लगोने छी
अपन चाकर बना दिअ माँ

जनम भरि बनि टुगर रहलौं
सिनेहक निर चटा दिअ माँ  

जँ हम नेना अहाँकेँ छी
अलख मनमे जगा दिअ माँ

सुखेलै नोर जरि आँखिक
चरणमनुकेँ दखा दिअ माँ  

(बहरे हजज, मात्रा क्रम  १२२२-१२२२)
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95
 (हजल मने हास्य गजल)   

लाल धोती केश राँगि समधि चुगला बनला ना
बेटा बेचि आनि बरयाती पगला बनला ना

सभ बिसरि आँखि मुनि ध्यानसँ ताकथि रुपैया
भीतर कारी बाहर उज्जर बोगला बनला ना

खेत खड़ीहान बेच बेच पीबथि बभना तारी
आब लंगोटा खोलि खालि तँ हगला बनला ना

तमाकुल चूनबैत पसारने  दिनभरि  तास
घर आँगनक चिंता नहि खगला बनला ना

जेल छोरि बाहर आबि हाथ जोरि माँगथि भोट
जितैत देरीमनुकेँ बिसरि दोगला बनला ना

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१८)
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96
गदहराज धन्य छी दिअ सदबुद्धि हमरो अहाँ
उपर लदने बोझ नै आँखि देखाबी ककरो अहाँ

धियान मग्न रहि मधुर तान ढेंचू-ढेंचू करै छी
मन्त्र जनैत छी शास्त्रीय गायन कए सगरो अहाँ

मनुक्ख पबैत सम्मान विशेष नाम अहीँक लऽ कऽ
बिन आपति बर्दास्त करी नहि करी झगरो अहाँ

स्वर्ग गेलौं लागले छान कथा जगजाहिर अछि
करु पैरबी कनी हमर बियाहक  जोगरो अहाँ

गृहस्थक जुआ कान परमनुखटब आब कोना
दिअ  गदहपन    जँ बुझलौं अपन हमरो अहाँ

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१९)

97
डूबने बिनु बुझब कोना निशा की छै
प्रेम बिनु केने कि जानब सजा की छै

बसि धारक कात हेलब सिखब कोना
आउ देखी कूदि एकर मजा की छै

नोकरी कय नै कियो धन कमेलक बड़
अपन मालिक बनु तँ एहिसँ भला की छै

आइ अप्पन बलसँ पीएम बनतै
हारि झूठ्ठे ढोल पीटब हबा की छै

रोडपर कोनो करेजक परल टुकड़ा
ओहि छनमे मनुसँ पुछबै दया की छै  

(बहरे कलीब, मात्रा क्रम, २१२२-२१२२-१२२२)



98
देखलौं जखनसँ अहाँकेँ होस गेलौं बिसरि हम
आगि बिनु लेसने सौँसेसँ गेलौं पजरि हम

एकटा मुस्की अहाँकेँ प्राण लेलक लय हमर
खा मोने मोन मुँगबा चट्ट गेलौं पसरि हम

अछि निसा चानक अहाँमे भ्रमित केने रातिमे
मुँह अहाँकेँ मोरिते बिनु पानि गेलौं पिछरि हम

स्वर्ग पेलौं बिनु अहाँ स्वर्ग भेलै नर्क सन
छोरि छारि स्वर्गकेँ पाछूसँ गेलौं ससरि हम

खुजल आँखिक मनु सपना प्रgगट भेलौं जगतमे      
देख निरमल नेह   बिनु बरखाक गेलौं झहरि हम            

(मात्रा क्रम- २१२२-२१२२-२१२२-२१२)

  
99
किए तीर नजरिसँ अहाँकेँ चलैए 
हँसी  तँ घाएल हमरा करैए 

मधुर बाजि खन-खन पएरक पजनियाँ 
हमर मोन रहि रहि कए डोलबैए   

छ्मकए हबामे अहाँकेँ खुजल लट 
कतेको तँ  दाँतेसँ   आङुर कटैए

ससरि जे जए जखन आँचर अहाँकेँ 
जिला भरि  करेजाक धड़कन रुकैए 

अहीँकेँ तँ मुँह देखि जीबैत 'मनु' अछि 
बिना संग नै साँस मिसियो चलैए 

(बहरे - मुतकारिब, मात्राक्रम -122-122-122-122)


100
टूटल करेज राखब नहि एखन हम  सिखने छी 
किछु अपने तोड़लहुँ  किछु भागे एहन रखने छी  

जिनका लूटेलौं हम अपन सिनेह भरल करेज 
हुनकासँ दूर होबाक  माहुर अपनेसँ चीखने छी 

सोचने तँ  छलहुँ एक दिन जीवनमे होएत रंग 
ओहि रंग भरल दुनियाँसँ कतेक दूर एखने छी 

दोसरसँ करू की शिकाति मनु अपने नै बुझलक
जिनका केलौं नेह करेज तोरैत हुनका देखने छी 

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-२०)


101
नुका-नुका कऽ सदिखन कनै छी हम 
घुटि-घुटि कऽ  दिन राति मरै छी हम 

लगन एहन है छै छल नै बुझल  
विरहकेँ आगिमे आब जरै छी हम 

छन भरिकेँ दूरी सहलो नै जाइए
छन-छन घुटि-घुटि कऽ रहै छी हम 

सभ तँ बताह कहैत अछि हमरा 
हुनक ध्यानमे रमल चलै छी हम 

जाहि बाट पर चलि प्रियतम गेला 
मनु बाटकेँ निहारि तकै छी हम 

(
सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१४)













गजल नहि लिखतौं तँ हम करितौं की
गजल बिनु जिनगी अपन जीबितौं की


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पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...