Tuesday, January 14, 2014

'विदेह' १४२ म अंक १५ नवम्बर २०१३ (वर्ष ६ मास ७१ अंक १४२) PART III

१. अमित मिश्र- गजल समीक्षा (पेटारसँ) २. चंदन कुमार झाबहुत किछु बुझबैए : कियो बूझि नहि सकल हमरा
अमित मिश्र
गजल समीक्षा (पेटारसँ)


कतिआएल आखर

बात चारि बर्ष पहिलुक अछि हमरा संगे एकटा संगी हमरे रूम मे रहैत छल ।
पढ़ैमे कने कमजोर छलै मुदा कंपटीसनमे हमरासँ 2-3 घंटा बेसीए राति कऽ जागै
छल आ एकर फलस्वरूप 10 टा मे 4 टा सबाल जरूर हल कऽ लै छलै ।ओना तऽ हमरासँ
बेशी बात नै करैत छल मुदा भोर होइते बाँकी बचल सबालक लेल हमरा लऽग जरूर
आबि जाइत छल आ एखन ओ मित्र बी 
.टेक कऽ रहल अछि ।इ घटना चारि सालक बाद मोन
पड़ल मुन्ना जीक एकटा शेर पढ़िकऽ

डाहसँ पहुँचब कोस
-दू कोस
आगू बढ़बा लेल तँ प्रेम चाही

पिछला डेढ़ महिनासँ मुन्नाजीक गजल संग्रह 
"माँझ आँगनमे कतिआएल छी "
थोड़े
-थोड़े पढ़ै छलौँह मुदा काल्हि भरि राति एकर गहन अध्ययन केलौँ ।कुल
50 टा गजल आ 10 टा रूबाइ के संग्रह अछि 
"माँझ आँगन मे कतिआएल छी" ।पोथीक
नाम पढ़ि मोनमे किदन
-कहाँदन बात सब उठऽ लागल ।कतिआएल उहो माँझ आँगनमे
बिचित्र सन लागल मुदा पढ़लाक बाद हमरा लागैत अछि जे शाइर एहि समाजके आँगन
आ एहि समाज रुपि आँगनक माँझ मे अपन बैसार बनेने छथि ।इ भऽ सकैए जे समाजक
किछु भागसँ इ कतिआएल हेताह मुदा पूरा समाजसँ किन्नौह कतिआएल नै लागै छथि
। हमर इ कथनक सत्यता एहि संग्रह के पढ़लाक बाद बुझा जाएत । इ तऽ प्रेमो
केलनि तऽ समाजके ध्यान मे राकि तेँए तँ कहै छथि

सब उमरि वर्ग के प्रेम चाही
मरितो दम धरि कुशल छेम चाही
आशा आ निराशाके फरिछाबैत कहलनि

निराशा संग आशापर टिकल छै दुनियाँ
जँ देखलँहुँ भगजोगनी तँ दिबाली बुझू

बिहारक ताकत आ कमजोरी के समेटने इ शेर

बिहारक सिरखारी बदलि गेल सन लगैए आब
श्रमिक घटलासँ कंपनी मालिक लगै बिहारी जकाँ
एहन
-एहन कतेको दमदार शेर सबसँ सजल इ गजल संग्रह अपना-आप मे अलग पहचान बनबैत अछि ।

पहिले गजल के देखलापर एकटा बात हमरा खटकल जे छल मात्र चारि टा शेर ।
गजलमे कमसँ
-कम पाँच टा शेर रहबाक चाही मुदा एहि संग्रहक गजल संख्याँ
1,2,7,10,11,19,22,23,24,25,27,28,32,34,35,37,39,42,43,44,47,48 मे
मात्र चारिए टा शेर अछि जे की गलत अछि ।ओना शाइर आमुखक अंतीममे इ गलती
स्वीकार करै छथि आ एकर जिम्मेदार अपना के मानैत भविष्यमे एकर सुधारक वादा
करैत छथि मुदा हुनक शब्दक पकड़ आ भावक अध्ययन केला के बाद हमरा लागैत अछि
जे शाइरक लेल उपरोक्त गजलमे एक
-एक टा शेर बढ़ेनाइ कोनो भारी बात नै छलै
तेँए हम एकरा आलस मानै छी ।

आब चलु काफियापर । एहि संग्रहक किछु गजलमे एकै काफियाक प्रयोग भेल अछि
जेना 26म गजल मे तीन ठाम काफिया 
"चाहैए" अछि ।29मे पाँच ठाम "एखनो" 31मे
पाँच ठाम 
"उघारू" 46म मे पाँच ठाम"केकरो-केकरो" अछि ।किछु और गजलमे इ बात
अछि ।ओना काफियाक दोहरेलासँ गजल गलत नै होइ छै ।
तेसर गजलमे मतला नै अछि किएक तँ इ गजलक पहिल शेर अछि
फाटैत छल जतए मेघ आ जमीन
पहुँचल पहिने ओतहि अभागल

बचल चारिटा शेरमे 
"अभागल" के काफिया मानि क्रमश: "राँगल ,भाँजल , माँजल आ
साधल लिखल अछि ।4म गजलक मतलामे 
"करैए" आ राखैए" "ऐए" तुकान्त संग अछि
मुदा पाँचम शेर मे काफिया 
"होइए" अछि । छठम गजलक अंतीम शेरमे"कहाइ" के
बदला गलत काफिया 
"कहाइत" लिखा गेल । 32म गजलक मतला अछि
हमरा तँ सुख भेटैए गजलक गाँतीमे
ओहिना जेना जाड़ मे गर्मी भेटैए गाँतीमे

एहिठाम 
"गाँतीमे" रदीफ भेल आ काफियाक अता-पता- नै अछि ।ओना आन शेरमे
काफिया 
"आतीमे" तुकान्त संग अछि ।

41म गजलक मतलामे काफिया 
"झमका आ चमका " तुकान्त "मका" संग अछि मुदा दोसर
शेरमे काफिया 
"उठा" अछि ।
44म गजल मे काफियाक तुकान्त 
"एल" अछि मुदा दोसर शेरमे काफिया "रखैल" "ऐल"
तुकान्त अछि ।
17म गजलमे अंग्रेजी शब्दक काफिया 
"गेम"  "ब्लेम" लिखल अछि ।

एहि संग्रहक सबटा गजल सरल वार्णिक बहरमे अछि ।ओना तँ इ बहर गजलक सबसँ
हल्लुक बहर अछि मुदा शाइर इहो बहरमे बहुते बेर धोखा खाइत छथि । हमरा
जानैत 26टा गजल गजलक कोनो शेरमे एक
-दू टा वर्ण बढ़ा देलनि तँ कोनो मे घटा
देलनि ।जेना
दोसर गजलक अंतीम शेरमे 15 के बदले 16 वर्ण अछि ।7म गजलक तेसर शेरमे 18 के
बदले 19 वर्ण अछि । 9म मे दोसर शेरमे 11 के बदले 10 वर्ण अछि । 11म गजलक
अंतीम शेरक अंतीम पाँतिमे 18 के बदले 17 वर्ण अछि ।एहन गजती गजल संख्याँ
12,14,15,18,19,20,22,24,26,28,29,30,31,32,34,35,38,42,43,46,47 48 मे
सोहो भेल अछि ।

ओना जँ भावक बात करी तँ एहि गजल संग्रहके ऊँचाइ पर पहुँचा देने अछि एकर
भाव । सबटा गजल हृदय के छू लैत अछि आ सोचबाक लेल मजबूर करैत अछि तेँए इ
आन संग्रह सबसँ बिल्कुल अलग अछि आ एकर आखर आन संग्रहक आखरसँ कतिआएल अछि ।
भावक कारणे इ संग्रहक 
"कतिआएल आखर" पढ़बाक योग्य अछि ।हमर सलाह अछि जे
एकबेर एकरा अजमा कऽ जरूर देखू ।
बेस तँ अहूँ सब पढ़ू आ हम जाइ छी दोसर गजलक खोजमे 
. . .


2


गजल आ गीत मे अंतर की छै?

गजल आ गीत मे अंतर की छैमात्र एक अक्षर के । गीत आ गजल दूनू गाओल जाइ
छै । जँ ध्वनीक तुक {राइम्स } सभ पाँति मे मिलैत रहत तगीत वा गजल दूनू
सुनै मेँ बेशी नीक लागै छै । मुदा गीत मे राइम्स नहियो हेतै तचलतै मुदा
गजल मेँ प्राय
: पाँति संख्याँ 1 ,2,आ तकरा वाद 4 ,6 , 8 , 10 . . . मे
हेवाक चाही । गीत मे कतेको पाँति के बाद फेर सँ मुखरा दोहराओल जाइ छै
मुदा गजल मे प्राय
: तुकान्त वाला पाँति बाद कहल जाइ छै । गजल कम सँ कम 10
टा पाँतिक होइ छै जकरा 2-2 पाँति के रूप मे बाँटि क शेर कहल जाइ छै । ।
जहिना गीतक शास्त्र व्याकरण होइ छै{सा रे ग 
. . .तहिना गजलक व्याकरण
होइ छै । जहिना शास्त्रीय गायण मे राग होइ छै तहिना गजल मे बहर होइ छै ।
जहिना गीत कोनो ने कोनो ताल 
. राग . मे होइ छै तहिना गजल कोनो ने कोनो
बहर मे होइ छै । । आब कहू गीत आ गजल मे अंतर की?

नवका गायक तगीतक टाँग 
-हाथ तोड़ि कगाबै छथि । दू तीन टा शब्द के एकै
साथ जोड़ि कगाबैत छथि बूझू जे फेविकाँल सँ साटि देने होइ । जहिना गीत
मे कोनो तरहक चिन्हक {कोमा ,फूल स्टाँप , आदिके मोजरे नै दै छथि ।
ओहिना
गजल मे कोना पाँति मे कोनो चिन्ह{. , ? आदिनै देल जाइ छै ।मात्र अपन
नामक आगू पिछू {" "} चिन्ह लगा सकै छी ।
आब एना किए कैएल जाइ छै से नै पूछू ? अपने सोचू ने गीते जकाँ गजलो के त'
गाओल जाइ छै ।
आ आब कहू गीत आ गजल मे अंतर की?

हमर एकटा मित्र गजलक बारेमे पुछलनि तँ कहलिअन्हि
----

गजलक मे आबै वला किछु शब्द के देखू ।

1} शेर
- शेर दू पाँतिक होइत अछि आ अपना आप मे सदिखन पूर्ण भाव दै अछि आ
आन पाँति सँ स्वतंत्र रहैत अछि ।

2} गजल
- कम सँ कम पाँच टा शेरके जँ किछु तुकान्तक सँग एक ठाम राखल जाए त'
ओ गजल बनै छै । एकटा गजल मे एकै रंग तुकान्त हेवाक चाही ।

3} रदीफ
- गजल पहिल शेर के अंतीम सँ देखू जँ कोनो एहन शब्द जे शेरक दूनु
पाँति मे काँमन होइ तओकरा गजलक रदीफ कहबै ।

आइ चलू संगे प्रेम गीत गेबै प्रिय
एकटा प्रेमक महल बनेबै प्रिय

एहि शेर मे 
"प्रिय "दुनू पाँति मे अछि तेँए एकर रदीफ भेल" प्रिय" 
आब गजलक सब शेरक दोसर पाँति मे इ रदीफ रहबाक चाही इ अनिवार्य अछि ।

4} काफिया 
- काफिया मने मोटा मोटी तुकान्त{राइम्सबूझू । जँ बाजै मे एकै
रंग ध्वनी बूझना जाइ यै तओ भेल काफिया । काफियाक तुक ओहि शब्दक अंतीम
सँ पता लागै छै । जे तुकान्त गजलक पहिल पाँति मे अछि सेह आन सब पाँति मे
हेवाक चाही । मतलब जे गजलक पहिल शेरक दुनू पाँति मे आ आन शेरक दोसर पाँति
मेँ ।

काफिया
- जेना - जेबै . खेबै . नहेबै ऐ मे "एबै" तुकान्त भेल
गमला 
. राधा . चेरा . केरा {एहि मे तुकान्त "" भेल}

हेतै
 , खेबै . झेलै {ऐ मे तुकान्त"" भेल}

रोटी
 , हाथी . रेती{ऐ मे "" भेल}

झोरी
 . बोरी {ऐ मे"ओरी" भेल}
एनाहिते और सब मे काफिया
 {तुकान्त }बनत ।

गजल पहिल शेर मे रदीफ आ काफिया क्रमश
: पाँतिक अंतीम सँ अनिवार्य रूप सँ
हेबाक चाही । आ आन शेरक दोस पाँति मे सेहो रदीफ आ काफिया क्रमश
: अंतीम सँ
हेएत ।

5}
 मतला- गजल पहिल शेर जेकर दूनू पाँति मे रदीफ आ काफिया क्रमश: अंतीम सँ
होइ एकरा मतला कहल जेतै ।

चाँद देखलौ त'
 सितारा की देखब
अन्हारक रूप दोबारा की देखब

प्रेमक सागर मे बड नीक लागै
डुब'
 चाहै छी त' किनारा की देखब

एहि मे पहिल शेरक दुनू पाँति मे काँमन
 "की देखब" अछि तेँए इ एहि गजलक
रदीफ भेल आ रदीफक पहिले देखू
 , दूनू पाँति मे "सितारा " "दोबारा " छै
एकर तुकान्त भेल
 "आरा" तेँए इ भेल काफिया । आब दोसर शेरक दोसर पाँति मे
देखू । रदीफ
 "की देखब" आ तुकान्त "आरा " के संग शब्द "किनारा " अछि । ।
आब एहि गजलक सब शेरक दोसर पाँति मे अंत सँ रदीफ
 "की देखब "
आ काफिया
 "आरा"
तुकान्तक संग हेबाक चाही ।

तुकान्तक पाता शब्दक अंत सँ चलै छै ।

6}
 मकता-- गजल अंतीम शेर जै मे शाइर अपन नामक प्रयोग करै छथि ओहि गजलक
मकता कहल जाइ छै ।

मेघक डरे चान नै बहरायल
नै औता
 "अमित" नजारा की देखब

इ भेल मकता ।
शाइर अपन सब शेर मे अपन एकै टा नामक प्रयोग करैथ । जेना हम पहिल गजल
सँ
"अमित" लिखै छी त' आब कतौ "मिश्र " नै लिख सकै छी ।

वेश त'
 एते देखू आ लिखू । और कनेटा बात छुटल अछि जे अहाँ सब जानैत छी ।
वर्ण वला बात । त
 ' आब लिखू किछ नीक गजल

किछु दिन पूर्व हमरे सन एकटा बिन पढ़ल लिखल गीतकार सँ भेट भेल ।हमरे जकाँ
हुनको रचना लोकक माँथ पर द निकैल जाइ छलै । खैर ओ हमरा बतेलनि जे गीत
लिखैत बेर जँ वर्ण गानि क लिखब त'
 गाबै मे सुविधा हेतै । आ ओ वर्ण गानब
सिखेलनि । तै पर हम कहलयनि जे एना वर्ण गानि क'
 हम सब "गजल "लिखै छी
आ तेकर नाम दै छी
"सरल वार्णिक बहर
"

आ एकर वर्ण एना गानल जाइत अछि ।
हिन्दी वर्णमाला के जतेक वर्ण अछि{
 .आ सँ ल' '  ,  . . . धरि} के
एकटा वर्ण मानै छी ।
जतेक हलन्त रहै अछि तकरा मोजर नै दै छी अर्थात शुन्य{0}
 मानै छी ।
संयुक्ताक्षरमे संयुक्त अक्षर के एक
 {1} मानै छी ।
जेना की
 " भक्त" एहि मे 2 टा वर्ण भेल । एकटा ""आ एकटा "क्त" 

एकर बाद एकटा शेर कहलौँ ।

भाग्य मे जे लिखल अछि तेँ विरह मे मरै छी
आशा केने छी कहियो त'
 मान नोरक धरबै

एहि शेरक दुनू पाँति मे
 17 वर्ण अछि । एहि बहर मे जँ गजल लिखब त' सब
पाँति मे पहिल पाँति एते वर्ण हेबाक चाही ।

ओ गीतकार कहलनि जे अहाँके वर्ण गान'
 आबै यै तेँए अहाँ नीक गीतकार बनब आ
हमहूँ आब गजल लिखब । । गीत आ गजल मे एते समानता अछि त'
 आब कहू गीत आ गजल
मे अंतर की
 ?

चंदन कुमार झा

बहुत किछु बुझबैए : कियो बूझि नहि सकल हमरा
एकैसम शताब्दीक पहिल दशककेँ, मैथिली गजलक इतिहासमे, जँ नवजागरण काल कहल जाए तऽ कोनो अतिशयोक्ति नहि होयत । एहि दशकमे मैथिली गजल अपन नवस्वरूप ओ नवीन छटा'क संग साहित्य-प्रेमी लोकनिक सोझाँ उपस्थित भेल अछि । एहि समयावधिमे मैथिली गजलकेँ अपन फराक गजलशास्त्र भेटलैक जे खाली गजले नहि अपितु रुबाइ, कता, नात आदिक रचना हेतु सेहो व्याकरणिक पृष्ठभूमि तैयार केलक । ई गजलशास्त्र मैथिली गजलकेँ अरबी, फारसी ओ उर्दू गजलक समकक्ष पहुँचेबामे सहायक सिद्ध भऽ रहल अछि । मैथिली गजल-लोक'क परिधिकेँ विस्तृत ओ सुदृढ़ बना रहल अछि । एहिसँ गजल कहबाक (लिखबाक) व्याकरण सम्मत मानक तैयार भेल अछि जाहिसँ सचेष्ट लोक, गजल कहबाक शैली ओ शिल्पक ज्ञान सहजतापूर्वक अर्जित कऽ सकैत छथि ।
एहि सूचनाक्रांतिक युगमे इंटरनेट मैथिली गजल ओ गजलशास्त्रकेँ मैथिली-साहित्यप्रेमी धरि पहुँचेबामे महत्वपूर्ण माध्यम साबित भऽ रहल अछि । संगहि एकर  विभिन्न पक्षपर चर्चा-परिचर्चाक अत्यंत सुभितगर मंच उपलब्ध करा रहल अछि । "अनचिन्हार आखर" नाम्ना ब्लाग मैथिली गजलक विकास ओ विस्तारक हेतु पूर्णतः समर्पित अछि । नेपालमे सेहो मैथिली गजलक एहि नवस्वरूप केर विकासक हेतु किछु एहने सन प्रयास भऽ रहल अछि । कुल मिलाकऽ कही जे पछिला दसेक बरखसँ किछु सजग नवतुरिया मैथिल साहित्यकार लोकनि, गजल प्रेमी लोकनि , मैथिली गजल' भाषायी ओ शिल्पगत विकासक मादेँ अभियान चलौने छथि । ई अभियान एकटा ऐतिहासिक प्रयास थिक ।
वर्तमान समयमे मैथिलीक नवतूरक साहित्यकार लोकनि मैथिली गजलक सर्वांगीण विकास हेतु प्रतिबद्ध छथि । एकदिस जतय ई सभ नव-नव गजलकार लोकनिकेँ प्रशिक्षित-प्रतिष्ठित करबामे लागल भेटैत छथि ततहि दोसर दिस पूर्ववर्ती गजलकार सभक रचना संसारक जोत-कोड़क तकतान सेहो हिनका सभकेँ रहैत छनि । पूर्वक एहि रचना सभसँ उपयोगी-अनुपयोगी तत्वकेँ बेरा रहल छथि । प्रतिफलस्वरूप मैथिली गजलक विभिन्न ऐतिहासिक पक्षसँ मैथिली साहित्यप्रेमी लोकनि अवगत भऽ रहल छथि आ नवतुरिया साहित्यकार वर्गकेँ एहिसँ भविष्यक दिशा-निर्देश सेहो भेटिए जाइत छनि । तखन एहि नवतुरिया अभियानी लोकनिकेँ अपन पूर्ववर्तीक कृतिक ( गजल / गजलेसन किछु ) समीक्षा करैत काल एतबा अवश्य ध्यान राखय पड़तनि जे हुनकर सभक व्यक्तित्वक मादेँ कोनो तरहक कठोर कि अपमानजनक शब्दावलीक प्रयोगसँ बाँचथि । कोनो तरहक पूर्वाग्रहसँ बाँचथि । संगहि हिनकर सभक रचनामे जे-जतबा सकारात्मक पक्ष अछि तकर बेसी चर्चा-परिचर्चा करथि । एहिसँ एकटा सकारात्मक वातावरण बनत । गजल आर लोकप्रिय होयत । गजलकार आर बेसी सम्मानित हेताह । गजलक परंपरा आर सुदृढ़ हेतैक । एतय एहि पूर्ववर्ती साहित्यकार वा एहि पिढ़ीक साहित्य प्रेमी लोकनिकेँ सेहो कनेक उदारता देखबय पड़तनि । कदाचित जँ कोनो कटुवचन ई नवतूर अपन पूर्ववर्ती'क प्रतिएँ कहैत अछि  तऽ तकर पाछाँ सेहो गजलक विकासक प्रति हिनकर सभक मोनक निष्ठेक प्रबलता रहैत अछि । अतः सकारात्मक वातावरणक निर्माण हेतु सभ पक्षकेँ संयमित हेबय पड़तनि । लक्ष्य साधब तखने संभव होयत ।
बीसम शताब्दीक प्रारंभहिमे पं.जीवन झा अपन सुन्दर संयोग” (“रचनामे छपल डॉ. रामदेवझा'क आलेख "मैथिलीमे गजल"क अनुसार १९०४ ई. मे) नाटकमे मैथिली गजल'क इतिहासक श्रीगणेश कएलनि । तदुत्तर मुंशी रघुनंदन दास,यदुनाथझा 'यदुवर', कविवर सीताराम झा, कविचूडामणि मधुप , आदि एहि परंपराकेँ आगाँ बढौलनि । एहि प्रारंभिक गजल सभमे जे सभसँ विशिष्ट तत्व अछि से थिक जे  प्रायः अधिकांश  आरंभिक गजल बहर, काफिया आ रदीफ संबंधी नियमक अनुपालनमे  अरबी बहर (छंद) विधानक अत्यंत लगीच बुझना जाइत अछि । खासकऽ हिनकर सभक गजल केर प्रत्यके चरणमे (शेरमे) अनुप्रास-योजना (काफिया आ रदीफ) केर विलक्षण प्रयोग भेटैत अछि ।उदाहरणस्वरूप १९३२मे मैथिली साहित्य समिति, द्वारा काशीसँ प्रकाशित "मैथिली-संदेश"मे मधुप जीक गजल देखल जा सकैए :-
मिथिलाक पूर्व गौरव नहि ध्यान टा धरै छी
सुनि मैथिली सुभाषा बिनु आगियें जड़ै छी

सूगो जहाँक दर्शन-सुनबैत छल तहीँ ठाँ
हा आइ "आइ गो" टा पढ़ि उच्चता करै छी

हम कालिदास विद्या-पति-नामछाड़ि मुँहमे
बाड़ीक तीत पटुआ सभ बंकिमे धरै छी

भाषा तथा विभूषा अछि ठीक अन्यदेशी
देशीक गेल ठेसी की पाँकमे पड़ै छी?

औ यत्र-तत्र देखू अछि पत्र सैकड़ो टा
अछि पत्र मैथिलीमे एको न तैं डरै छी
(2212-122-2212-122)
कहबाक प्रयोजन नहि जे मैथिली गजल अपन बाल्यकालमे बेस सुरेबगर ओ आकर्षक छल । तकर एकटा इहो कारण भऽ सकैत अछि जे मैथिली गजलक जखन बाल्यावस्था छलैक तखन मिथिलामे फारसी एकटा महत्पूर्ण ओ रोजगारपरक भाषा छल आ संभवतः तकरे प्रभावसँ मैथिलीमे गजलक उत्पति भेल । फारसी कचहरीक दस्ताबेजक भाषा, हिसाब-किताबक भाषाक रूपमे प्रचलित छल । महाकवि लालदास आ उपन्यासकार जीवछ मिश्र फारसी'क शिक्षा ग्रहण कएने रहथि । एहिना मिथिलाक एकटा नमहर वर्ग फारसी पढ़ैत-लिखैत होयत ताहिमे कोनो दू-मत नहि हेबाक चाही । तखन पं. जीवन झा कि कविवर सीताराम झा वा मधुप जी आ'कि आन-आन विद्वान लोकनि जे गजल लिखबाक प्रयोग केलनि, फारसीसँ विधिवत शिक्षित छलाह वा नहि से नहि जानि मुदा, जँ नहियो शिक्षित हेताह तैयो विद्वानक बिच रहैत-रहैत एहि भाषा'क शिल्प ओ विधानसँ परिचित भेल हेताह, तकर प्रयोग अपन-अपन गजलमे कएने हेताह, तकरा अस्वभाविको नहि मानल जा सकैछ ।  एहि संबंधमे प्रायः जुन १९८४ ई.मे "रचना"मे छपल डॉ.रामदेवझा अपन आलेख "मैथिलीमे गजल"मे लिखैत छथि-
" गजलक मार्मिकता ओ लयात्मकता कवि हृदयकेँ सहजे आकृष्ट करैत अछि । मैथिलीयो कवि लोकनि गजल दिश आकृष्ट भेलाह......अठारहम ओ उनैसम शताब्दीमे गजलक रचना ओ गानक केन्द्र लखनउ,बनारस, इलाहाबाद, दिल्ली, इत्यादि बनि गेल छल । उनैसम शताब्दीक उत्तरार्द्ध ओ बीसम शताब्दीक प्रारम्भिक चरणमे पारसी थियेटरक जे प्रवाह चलल, ओही संग गजल सेहो सामान्य लोककेँ श्रुतिगोचर भेल । एहन मैथिली कवि जे कोनहु रूपमे फारसी उर्दूसँ संपृक्त छलाह अथवा उपर्युक्त परिगणित केन्द्रमे प्रवासमे रहबाक अवसर प्राप्त एलनि, से सब मैथिलीमे गजल-रचनाक प्रयोग करबाक चेष्टा कयलनि ।"
किंतु, मैथिली गजलक बाल्यकाल केर शब्द, शिल्प ओ स्वरूप'क मर्यादासँ बान्हल सुसंस्कारी स्वभाव एकर किशोरावस्था अबैत-अबैत जेना अल्हड़पनमे बदलि गेल । जतय एकर भाषायी ओ व्याकरणक स्वरुपक निर्धारण हेबाक चाही छलैक ततय घोषित भेल जे मैथिलीमे गजल कहब (लिखब) संभवे नहि । वैकल्पिक रूपेँ गीतल कहि एकटा नव काव्य संरचना प्रतिपादित कएल गेल । दुर्भाग्यवश एहि घोषणा'क समर्थनमे सेहो मैथिली साहित्यकार लोकनिक पाँत ठाढ़ भेल । तखन एहि मान्यताक विरुद्ध सेहो किछु प्रगतिशील साहित्यकार लोकनि ठाढ़ भेलाह । मुदा, इहो लोकनि अरबी बहर-विधान आ मैथिलीक पारंपरिक छंदशास्त्रक अनुशीलन कए एहि दुनूक मध्य कोनो तरहक सामंजस्य स्थापित नहि कए सकलाह । फलतः मैथिली गजल व्याकरणहीन रहल आ हिनकर सभक गजल काफिया मिलानी धरि सीमित भऽ गेल । एहि संबंधमे उक्त आलेखमे डॉ. रामदेव झाक उक्ति देखू-
"हालक विगत किछु वर्षमे गजल-रचनाक प्रवृतिक पुनर्जन्म भेल अछि आ से एकटा प्रवाह अथवा फैसनक रूपमे परिवर्तित भऽ गेल अछि । एहि क्षेत्रमे किछु प्रौढ़ ओ विशेषतः युवा पीढ़ीक कवि गजल रचना करैत जा रहल छथि.........हिनका लोकनि गजलमेसँ किछुमे अवश्ये गजलत्व अछि । परन्तु अधिकांशकेँ गजल-शैलीमे रचित गीत-मात्र कहल जाय तँ अनुपयुक्त नहि होयत । "
उत्तम भावाभिव्यक्तिक अछैतो ई गजल सभ वर्तमान गजलशास्त्रक आधारपर निंघेस साबित होइत अछि आ एहीठामसँ मैथिली गजलक दू पिढ़ी'क बीच वैमनस्यता सेहो उपजैत अछि । ओना एहिमे किछु गजलकार एहनो छथि जे स्वयं स्वीकार करैत छथि जे उचित छंदशास्त्रक अभावमे हुनकर सभक रचनामे एहन त्रुटि रहि गेल । मुदा, किछु एहनो व्यक्ति छथि जे एखनो जिद्द अरोपने छथि आ गजलक नव-विधानकेँ स्वीकार करबा लेल तैयार नहि छथि । एहिठाम एहि पिढ़ी'क गजलकार'क कृतित्वक आलोचनाक मादेँ नवतूरक समालोचककेँ इहो ध्यान रखबाक चाही जे एहि समयमे मैथिलीमे गजल संबंधित व्याकरण उपलब्ध नहि छल । संभव जे किछु साहित्यकार वर्ग जीवन झा, सीताराम झा आदिक गजलकेँ प्रेरक स्रोततऽ मानैत रहलाह मुदा, अरबी बहरक प्रयोगसँ मात्र एहि हेतु परहेज कएने रहलाह जे ओ सिद्धांत आन भाषासँ आयातित होयत । कारण जे कोनो होउ मुदा परिणाम एतबे अछि जे उत्कृष्ट विषय-वस्तुक अछैतो मैथिली गजल विश्वक आन-आन भाषा'क गजलक समकक्षी नहि बनि सकल । एक सय बरखक इतिहासक अछैतो मैथिली'क अंगनामे अपरिचिते जकाँ जिबैत रहल । तखन एहि पूर्ववर्ती (गजलक पक्षधर) सभक एतबा योगदान त' नहि नकारल जा सकैत अछि जे ई सभ मैथिली-गजलकेँ जियौने रहलाह । मैथिलीमे गजलक संभावना बचल रहल ।
एक सय बरखक इतिहासक बलपर मैथिलीमे गजल कहबाक इएह बाँचल संभावना आ "अनचिन्हार युग"क अभियानी प्रयासक एकटा सुंदर प्रतिफल थिक ओमप्रकाश जीक पहिल गजल-संग्रह-"कियो बूझि नहि सकल हमरा" । एहि शताब्दी'क आरंभहिसँ गजलक विकासक मादेँ जे विरार लगाओल गेल, ई पोथी तकरे उपजा थिक । नेनपनहिसँ साहित्यक प्रति रूचि रखनिहार गजलकार ओमप्रकाशजी एहि पोथीक भूमिकामे स्वयं गछैत छथि जे मैथिली गजल'क विकासे हिनक साहित्य-कर्मक प्राथमिकता छनि । हिनक साहित्य-साधनाक मूल साध्य गजले थिकनि । गजलक प्रति हिनकर इएह लगावक परिणाम थिक जे ई अपन एहि संग्रहक माध्यमे मैथिली गजलकेँ उच्चतर स्थानधरि पहुँचेबाक हेतु प्रयासरत बुझना जाइत छथि । हिनकर एहि संग्रहमे एक्कहि संग अनेक विषय-वस्तु यथा-सिनेह,संवेदना,श्रृंगार-सौंदर्य,सामाजिक सरोकार, चिंतन, संघर्षक स्वर, आदि समेटल गेल  अछि । देश, काल ओ परिवेशजन्य स्थिती-परिस्थितिक सहज अटावेश एहि संग्रहक हरेक मिसरा (पाँति ), हरेक शेर (चरण) मे भेटैत अछि ।
परिवर्तन सांसारिक नियम थिक । समयक परिवर्तनशील स्वभावकेँ जे नहि पकड़ि पबैत अछि सएह समयक संग नहि चलि पबैत अछि । पछड़ि जाइत अछि । आम जनमानस भलेँ समय एहि गतिकेँ नहि पढ़ि पबैत हो मुदा एकटा संवेदनशील हृदय,  एकटा सूक्ष्मदृष्टि, एकटा साकांक्ष मानव, एकटा मसिजीवीसँ ई परिवर्तन-धर्मिता छपित नहि रहि सकैत अछि । एकटा साहित्यकारक सोझाँ ओकर असली रूप देखार भइए जाइत छैक । ओमप्रकाश जीक कलम समयक चरित्रकेँ उघार करबामे सक्षम छनि । वर्तमान समयक चालिकेँ अकानति ओ कहैत छथि जे ई युग मात्र संघर्षक युग नहि थिक बल्कि ई युग संघर्षक बलपर अधिकार प्राप्तिक युग थिक । हुनकर मानब छनि जे आब लोक-चेतना बढ़ि रहल अछि तेँ व्यवस्थाकेँ सेहो सचेत रहय पड़तैक । ई युग जनता'क थिक । आब जनते जनार्दन अछि । लोककेँ आब खैरात नहि चाही । ओकरा अपन कर्मक प्रतिफल चाही । प्रतिफलो एहन जाहिमे ओकर स्वाभिमान, ओकर सम्मान नुकाएल होइ । ओकरा बोनिमे आत्मीयतासँ भरल उपहार चाही । ओमप्रकाश जी एही युगीन जनभावनाकेँ स्वर दैत कहैत छथि-
भीख नहि हमरा अपन अधिकार चाही
हमर कर्मसँ जे बनै उपहार चाही
कान खोलिकऽ राखने रहऽ पड़त हरदम
सुनि सकै जे सभक से सरकार चाही
व्यवस्था लग बल होइत छैक । मुदा ओकरा ई बल जनते-जनार्दनसँ भेटैत छैक । व्यवस्था कतबो बलगर होउ मुदा जनबलसँ बलिष्ठ नहि भऽ सकैत अछि । कोनो सरकारी मिसाइलमे एतबा ताकति नहि होइत छैक जे भूखक ज्वालाक सामना कऽ सकत तेँ शाइर ओमप्रकाश एहि बदलल युगमे व्यवस्थाकेँ चेतबैत छथि -
धरले रहत सभ हथियार शस्त्रागार
बनलै मिसाइल भूखे झमारल लोक
लोकतंत्रमे लोकेक बलक प्रताप थिक जे कियो राजभवन पहुँचि जाइत अछि तऽ कियो सड़कपर बौआइत रहैत अछि । सत्ता-परिवर्तन एही "लोक"क हाथमे रहैत छैक । व्यवस्था परिवर्तन एहि "लोक"क हथियार थिक । तेँ अबोध लोककेँ भने किछु काल राजभवन'क परिधिसँ बाहर राखल जा सकैत अछि मुदा, जखन इएह लोक जागि जाइत अछि तखन स्थिती बदलि जाइत छैक । लोकक तागतिकेँ बिसरबाक नहि थिक । ओमप्रकाश एहिमादेँ राजभवनमे बैसल अकर्मण्य सभकेँ स्मरण करबैत छथि-
लोकक बलेँ राजभवन इ गेलौ बिसरि
खाली करू आबैए खिहारल लोक
व्यवस्थाक अकर्मण्यताक चलतेँ सगरो अराजकता व्याप्त अछि । भौतिकताक आगाँ नैतिकता नतमस्तक भेल अछि । भ्रष्टाचार, महगी, बेरोजगारीक समस्यासँ बेहाल जनताक लेल मृत्यु सभसँ सुलभ उपाय बनि गेल अछि आ जीवन कठिन । विपन्नताक मारल, हकन्न कनैत, श्रमजीवी'क पसेनाक मोल आब दालि-रोटीक दामसँ कमि गेलैए । आम जन-जीवनक एहि मनोभावकेँ अपन दू गोट मिसरामे स्वर दैत छथि ओमप्रकाश जी-
जीनाइ भेलै महँग एतय मरब सस्त छै
महँगीक चाँगुर गड़ल जेबी सभक पस्त छै
महगीक मारिसँ पाबनि-तिहारक, उत्सव-उल्लासक, हँसी-हहारो, निपत्ता भऽ गेल अछि । कोनो सामाजिक, आर्थिक कि राजनीतिक समस्यासँ किछु खास जाति-वर्गेक लोक प्रभावित नहि होइत अछि बल्कि एकर मारि समाजक, सभ वर्गक लोकपर परैत छैक । एहनामे जाति-पाति, गोत्र-मूल, अगड़ा-पिछड़ाक जोर-घटाओ, पंचग्रासक ओरियान केर गणितसँ गतानल मनुक्ख लेल कोन काजक, कोन महत्वक ? ओकर त कोनो धर्मगुरू कि महाज्ञानी लोकनिक ज्ञानसँ सेहो पेट नहिए भरतैक  । तेँ ओमप्रकाश जी कहैत छथि-
भूखल पेटक गणितमे ओझरायल लेल ज्ञान की
गरीबक सभदिन एक्के मोहर्रम की रमजान की
गरीबी'क बात करयबला, अपनाकेँ गरीब-गुरबाक शुभचिंतक कहयबला जखन सत्ता-सिंहासन धरि पहुँचि जाइत छथि तऽ हुनकर अभिष्ट गरीबी उन्मूलन कि गरीबक कल्याण नहि रहि जाइत छनि । जनताकेँ जनार्दन कहि सत्ताधरि पहुँचिते स्वयं जनार्दन बनि जाइत छथि आ जनकल्याण माने अपन आ सर-कुटुम्बक कल्याण बूझैत छथि । जनताक कोष लुटबामे लागि जाइत छथि । व्यवस्थाक गत्र-गत्रमे भ्रष्टाचारी घून पैसल भेटैए । भ्रष्टाचारक नित नव-नव रेकार्ड बनैए आ जनता बाध्य भऽ कहैए-
कर जोड़ै छी सरकार आब रहऽ दिऔ
कते करब भ्रष्टाचार आब रहऽ दिऔ
भूखक ज्वाला, अभावक तापक प्रताप थिक जे शोषित समाज अभिजात्यक मोकाबिला ठाढ़ भऽ जाइत अछि । कहबीयो छैक-मरता, क्या नहि करता ? समाजक दू वर्गक मध्य जे दूरी बनि गेल छैक तकरे परिणाम थिक वर्ग-संघर्ष । भूख आ अर्थाभाव जनित एहि समस्या दिस इशारा करैत अछि ओमप्रकाश जीक ई दू टा मिसरा-
मिझबै लेल पेटक आगि देखू पजरि रहल छै आदमी
जीबाक आस धेने सदिखन कोना मरि रहल छै आदमी
जाहि भूमिपर सिया सन धिया भेलीह आइ ताहि भूमिपर दहेज रूपी दानव "मैथिली"क प्राण हरण कए रहल अछि । मैथिली मूकदर्शक बनल छथि । जनक कानि रहल छथि । हुनका चिंता पैसल छनि जे हुनकर बेटीक विवाह कोना हेतनि-
बिना दाम नै वर केर बाप हिलैत अछि
धरमे गरीबक सदिखन अतिचार रहैत छैक
मात्र भूख, बेरोजगारी, महगी कि भ्रष्टाचारे जीवनक बाटपर समस्या नहि अछि बल्कि एकरा अलावे कतेको कूरीति सेहो अछि जे लोककेँ विकास-पथपर बढ़बामे बाधक बनल अछि । हम सभ जाहि भू-भागक छी ताहि मिथिलाक गौरवशाली अतीत रहल अछि । एहि धरतीपर सामाजिक सद्भाव आ नारीक सम्मानकेँ सभदिन प्राथमिकता देल गेल । मुदा,वर्तमान समयमे हम सभ जाति-पातिमे अपनाकेँ बँटने खण्ड-खण्ड भेल छी । आपसी प्रतिस्पर्धामे अपने समांगसँ ईर्ष्या होइत अछि । अपनहि भाइ-बन्धुक अनिष्ट सोचयमे श्रम-संसाधन उत्सर्ग करय लगैत छी आ परिणाम भेल अछि जे हम सभ असक्त भेल दहो-दिस छिछिया रहल छी । जनक नगरीक बाग उजरि गेल अछि । ओमप्रकाशजीकेँ सेहो ई बात अज्ञात नहि छनि तेँ ओ कहैत छथि-
हक बढ़ै केर छै सबहक इ नै छीनू
बढ़त सभ गाछ तखने बाग निखरै छै
लोक अपन-आनक द्वंदमे फँसल अछि । ओ आधुनिकताक नामपर पसरल भौतिकताक चकचौन्हमे लोक तेनाने आन्हर भऽ गेल अछि जे आब मोनक मर्मकेँ बूझबाक सामर्थ्य ओकर दृष्टिमे नहि बाँचल छैक । ओकरा मात्र बाहरी रंग-रोगन धरि सूझैत छथि । मानवीय मूल्यक ह्रास ओ संबंधक जड़ताक टीस गजलकार ओमप्रकाश जीक करेजासँ सेहो बहराइए जाइत छनि -
कहू की कियो बूझि नै सकल हमरा
हँसी सभक लागल बहुत ठरल हमरा
मुदा, एतेक दुख-दरिद्रा, संकट, समस्या आ संघर्षक अछैतो ओमप्रकाश जी जिनगीक डेन नहि छोड़ैत छथि । बल्कि निरंतर लक्ष्य दिस बढ़ैत रहबाक, सकारात्मक सोच रखबाक आह्वान करैत छथि-
जिनगीक गीत अहाँ सदिखन गाबैत रहू
एहिना ई राग अहाँ अपन सुनाबैत रहू
जीवनमे जिवंतता आ मानवताक डेन धऽ चलैत काल गजलकार गजलक शास्वत मर्म माने प्रेमक तन्नुक तागकेँ सेहो पकड़ने छथि । करेजक इएह प्रेमक भावसँ श्रृंगार छिटकैत अछि जे हिनकर एकटा सूच्चा गजलकार हेबाक परिचिति गढ़ैत अछि -
चमकल मुँह अहाँक इजोर भऽ गेलै
अधरतिएमे लागल जेना भोर भऽ गेलै
ओमप्रकाश जी एहि पोथीक भूमिकामे लिखने छथि जे हिनकर पिता समाजवादी विचारधाराक समर्थक छलखिन तऽ माता उदारवादी सोच रखनिहारि । हिनकर एहि संग्रहक रचना सभमे एहि दुनू विचारधाराक सम्मिश्रण भेटैत अछि जे स्वाभाविके अछि । संगहि सामाजिक सरोकारसँ संबंधित हिनकर अपन चिंता-चिंतन सेहो भेटैत अछि ।
गजलकार ठिक्के कहैत छथि जे संवेदनहीन हृदयसँ गजल नहि बहरा सकैत अछि । हमतऽ कनि बढ़िकऽ कहब जे संवेदनहीन हृदयसँ साहित्ये नहि बहरा सकैत अछि । संवेदनहीन हृदयकेँ साहित्य बुझबाक क्षमतो नहि रहैत छैक तेँ ओ गजल सेहो नहि बुझि सकैत अछि । प्रायः एहने सन किछु भाव गजलकारक मोनमे सेहो रहल हेतनि आ तेँ ई अपन एहि पोथीकेँ नाओं देलनि-कियो बूझि नहि सकल हमरा " । मुदा, एकटा संवेदनशील करेजा राखयबलाक हेतु एहि पोथीमे बुझबाक हेतु बहुत रास सामग्री अछि । गजलक विशेषताक मादेँ ओमप्रकाश जीक इहो कहब उचिते छनि जे -व्याकरण ओ मानवीय संवेदना दुनू एकर दू गोट पहिया थिक । तेँ गजलक रचना काल नहि एकर व्याकरण पक्षकेँ नकारल जा सकैत अछि आ नहिए एकर भाव पक्षकेँ ।
गजलक परिप्रेक्ष्यमे व्याकरणक जे महत्ता ओमप्रकाश जी बुझैत छथि तकर छाप हिनक एहि संग्रहमे सेहो भेटैत अछि । एहि संग्रहमे संकलित कुल सतासी गोट गजलमे चौबीस टा गजल अरबी बहर आधारित अछि एवं शेष तिरसठि टा गजल सरल वार्णिक बहरक अनुसार लिखल गेल अछि । एकर अलावे आठ टा रूबाइ आ दू टा कता संग्रहित अछि । हरेक गजलक निच्चामे तकर बहरक विवरण सेहो देल गेल अछि जाहिसँ पाठककेँ बहरक संरचनाक भाँज सहजहिँ लागि जेतनि । परोक्ष रूपेँ बहरक ई नामोल्लेख ओहि गजलकार सभकेँ एना देखा रहल अछि जिनकर सभक मान्यता छलनि जे मैथिलीमे गजल भइए नहि सकैत अछि, संगहि एहि बातकेँ स्थापित कए रहल अछि जे मैथिलीमे गजल आ सेहो अरबी बहर-विधान आधारित गजल बड़े शानसँ कहल जा सकैत अछि । एहिठाम डॉ. रामदेवझा'क पूर्वोल्लेखित आलेख'क अंतिम अंश जाहिमे ओ कहैत छथि-
" जहिना समदाउनिक रचना हिन्दी-उर्दूमे असाध्य वा कष्ट साध्य अछि तहिना मैथिलीयोमे गजल-रचनाक स्थिती मानल जा सकैछ । मुदा एकरा 'इत्यलम्' नहि मानल जा सकैछ । कोनो प्रतिभाशाली कवि मैथिलीमे उपर्युक्त मान्यताकेँ अन्यथा सिद्ध कए सकैत अछि ।" केँ ओमप्रकाश जी शत-प्रतिशत प्रमाणित करैत छथि आ अपन प्रतिभासँ सिद्ध कएलनि अछि जे मैथिलीयोमे उर्दू-फारसीए जकाँ गजल कहल (लिखल) जा सकैत अछि ।
चूँकि एहि पोथीक सदेह रूप एखनो उपलब्ध नहि भऽ सकल अछि तेँ एकर व्याकरण पक्षक गहन अध्ययन नहि कए सकलहुँ । तखन अपेक्षा करैत छी जे कियो ने कियो गोटे, गजलक व्याकरण गूढ़ जानकार लोकनि, एकर व्याकरण पक्षपर सेहो विस्तृत चर्चा करबे करताह । ओना ओमप्रकाश जीक गजल ओ गलक व्याकरणक अनुसरण करबाक जे अनुराग छनि ताहिसँ जँ कदाचित एहिमे कोनो त्रुटि हेबो करत तऽ से नगण्यप्राये, तेहन विसबास अछि । अपन सिमित ज्ञानक आधारपर एहि पोथीक व्याकरणक पक्षपर जे विहंगम दृष्टिपात कए सकलहुँ ताहि आधारपर हमरा कोनो त्रुटि नहि देखायल अछि । तखन कतहु-कतहु बहरक आखर कि मात्रा पुरेबाक दृष्टिकोणसँ मिसरा सभमे जे वर्ण कि मात्राक जोड़-तोड़ कएल गेल अछि ताहिसँ भावक प्रवाह खण्डित होइत बुझना गेल । संगहि कतेको ठाम वर्तनीक अशुद्धता सेहो एहि पोथीमे एखन देखल जा सकैत अछि । मुदा, इहो संभव जे जखन एकर सदेह रूप हमरा सभक हाथमे आओत तखन एहन बहुत रासेक त्रुटि नहि रहत । पोथीक स्वरूप आ दामक संबंधमे एखन उचित-अनुचित किछुओ नहि कहल जा सकैत अछि मुदा, एतबा तऽ अबश्य लगैत अछि जे एहि पोथीकेँ पाठकक सिनेह भेटतैक । संगहि निकट भविष्यमे ओमप्रकाश जीक गजल मैथिली साहित्यकेँ नव दिशा ओ दृष्टि देत ।



 
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
जगदानन्द झा मनु’- ग्राम पोस्ट  हरिपुर डीहटोल, मधुबनी 
   गजल समीक्षा 
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गजलक लहास

हमरा पढ़क सौभाग्य भेटल कलानंद भट्ट कृत गजल संग्रह कान्हपर लहास हमर
जे की १९८३मे प्रकाशित भेल अछि। एहि गजल संग्रहमे कलानंद भट्ट जीक गजल
प्रति सम्बोधन गजलक मादेक अलाबा कुल ४८टा गजल वा गजल सन किछु अछि।
भट्टजी अप्पन संबोधन गजलक मादेमे तँ विभक्ति सटा कए लिखने छथि मुदा बाद
बांकी गजल सभमे विभक्ति शब्दसँ हटा कए लिखल अछि। ई संकेत अछि हुनक वा
हुनक समकालीन मैथिली लेखकक द्वारा गद्य आ पद्यमे मैथिली प्रति कएल गेल
अन्तर।
एहि संग्रहक मादे, गजलक व्याकरण पक्षपर अबैत छी। एक गोट गजल लेल सभसँ
आवश्यक अछि काफिया आ रदीफक पालन मुदा एहि संग्रहक किछु गिनतीक गजल बाय लक
छोरि कए बाद बांकी गजलमे काफिया आ रदीफक दोख अछि। जेना एहि संग्रहक पहिले
गजलक मतला देखू 
घर घरेक आगि सँ अछि जरल जा रहल
भाइ  सँ  भाइ   द्वेषे   भरल जा रहल 
आब एहि मतलाक हिसाबे काफिया भेल रल’, मुदा एहि गजलकेँ आँगाक शेर सबहक
काफिया अछि – ‘बनल’, ‘बनल’, ‘चलल’, ‘कयल
गजल तीन केर मतला देखू 
कहू की कथा कहुना जीबि  रहल छी
फाटल गुदरी अपन हम सीबि रहल छी
आब एहि मतलाक काफिया भेल ीबि’,  मुदा गजलक आन-आन  शेरक काफिया अछि,
लीबि’,’पीबि’, ‘खीचि’, ‘पीति। एहिठाम लीबि  पीबि तँ ठीक मुदा
खीचि  पीति’ ?
गजल ६ केर मतला 
बाट बाधित पहाड़े छै पाटल जखन
सीयत दरजी के आकासे फाटल जखन
एहिठाम काफिया भेल ाटल जेना की काटल, चाटल, साटल, मुदा एहि गजलक आन आन
काफिया अछि साटल’, ‘फाटल’, ‘जागल’, ‘लागल। एहिठाम साटल तँ ठीक अछि,
फाटल ठीक मुदा एकर पुनः प्रयोग आ जागल  लागल’ ?
गजल संख्या १२ केर मतला 
अहाँ जीबिते मनुक्ख केँ जरा रहल छी
घेरि गामे केँ स्वाहा करा रहल छी
मतलाक काफिया भेल रा मुदा एहि गजलक आगाँक शेरक काफिया प्रयोगमे अछि,
दनदना’,’खड़ा’, ’चला’, ‘बना’, ‘रचा’, ऐ गजल तेसर शेरक काफिया खड़ा ठीक
अछि बांकी सभ गल्ती।
एहि तरहे १८,१९,२०,२१,२२,३३,४८म गजलक काफिया ठीक नहि अछि।
अंतिम गजलक मतला आओर देखू 
शहर केर सागर मे आइ गाम डूमि रहल
कामांध कामिनी केँ पकड़ि जेना चूमि रहल
आब उपरकेँ मतलामे काफिया भेल ूमी’ (दीर्घ ऊ कार आ मी) मुदा एहि गजलक आन
शेरक काफिया राखल गेल अछि, ‘घूमि’, ‘चूसि’, ‘रेड़ि’, ‘बूकि’, आब घूमि ठीक
बाद बांकी चूसि’, ‘रेड़ि’, ‘बूकि’, कोन मादे ठीक भऽ सकैत अछि।
उपरका उदाहरन सभसँ एक डेग आगू बैढ़ बहुत रास गजल तँ एहनो अछि जाहिठाम
काफिया केर कोनो स्थाने नहि राखल गेल अछि। आउ देखी किछु एहनो गजल-
गजल संख्या सातक मतला अछि 
मरि मरि क जे जीबय से आदमी चाही
राखय बिहाड़ि हाथ मे से आदमी चाही
आब एहि मतलामे देखी तँ दुनू पाँतिमे कोमन अछि से आदमी चाही अर्थात ई
भेल रदीफ। आब रदीफसँ पहिने एहि शेरक दुनू पाँतिमे कोनो काफिया अछि ? नहि
ने। एहि तरहे एहि गजलक सभ शेर बिना काफियाक अछि। एहिठाम गजलकार जानि
अनजानि नहि जानि किएक ने धियान देलन्हि, मतलाक निच्चाक पाँतिकेँ कनिक
बदैल कए काफिया ठीक कएल जा सकैत छल, देखू 
मरि मरि क जे जीबय से आदमी चाही
बिहाड़ि हाथमे राखय से आदमी चाही
एहिठाम एकटा गप्प धियान देबए बला अछि जे गजल शास्त्र अनुसार बिना रदीफक
गजल तँ कहल जा सकैए परन्च बिन काफियाक गजल, जेना बिन कनियाँ ब्याहक
कल्पना। एहि तरहे, एहि संग्रहमे बहुत रास गजल बिन काफियाकेँ कहल गेल अछि
जेना गजल संख्या ११,२३,३०,३८,३९,४१,४४,आ ४६। एक बेर फेरसँ गजल संख्या ४६
केर मतला देखी 
ठेंगा जकाँ ठाढ़ भेल नागे देखैत छी
हम बाट-घाट सभठाम नागे देखैत छी
आब एहि मतलाक दुनू पाँतिमे कोमन अछि नागे देखैत छी जे की रदीफ भेल आ
रदीफसँ पहिने काफिया नदारत।
कतौ कतौ बाय लक काफिया ठीको अछि  तँ काफियामे एक्के शव्दक प्रयोग बेर-बेर
अछि। जेना गजल संख्या २९ क मतला देखी तँ-
जनम व्यर्थ बेटीकेँ देलौं विधाता
कर्म अपकर्म हम कोन केलौं विधाता
ऐ शेरमे रदीफ भेल विधाता आ काफिया भेल ेलौं। आब एहि गजलक आन-आन शेरक
काफिया अछि, ‘बनेलौं’, ‘चढ़ेलौं’, ‘सिरजेलौं’, ‘बनेलौं’, ‘चढ़ेलौं
मतलाक शेरक हिसाबे काफिया दुरुस्त अछि मुदा बनेलौं  चढ़ेलौं शव्दक
आवृति काफियामे एकसँ बेसी बेर अछि। एहि तरहे गजल संख्या १५ आ ४५ मे सेहो
काफियामे एक शव्दक आवृति एक बेरसँ बेसी बेर भेल अछि।
बहुत रास गजलमे तँ काफिया आ रदीफ दुनू असमंजसकेँ अबस्थामे अछि अथबा कहू
तँ दुनूकेँ दुनू गल्ती अछि। जेना गजल संख्या ३५केँ मतला देखी 
बानरक हेँज जकाँ बौख रहल लोग
रंगल सियार जकाँ लौक रहल लोक
एहि मतलामे देखी तँ रदीफ भेल रहल लोक आ काफिया ौऽ‘, मुदा एहि गजलक
आन-आन शेर सबहक काफिया आ रदीफ दुनू संगे अछि, ‘दौड़ रहल लोक’, ‘सिरमौर
बनल लोक’, ‘पछोड़ पड़ल लोक’, ‘सिलौट रहत लोक। एहि शेर सभमे, ‘दौड़ रहल
लोकमे मतलानुसार काफिया आ रदीफ दुनू दुरुस्त अछि मुदा तेसर आ पाँचम
शेरमे रदीफ गल्ती अछि आ चारिम शेरमे तँ काफिया आ रदीफ दुनू गरबड़ागेल
अछि। कहि तँ एहि गजलकेँ पाँचो शेरधरि गजलकार ई नहि निर्धारित कए सकल छथि
जे कोन काफिया अछि आ कोन रदीफ, एहि असमंजसमे खिच्चैर बनि सम्पूर्ण गजल
लहास बनि गेल अछि। बिल्कुल एहने तरहक बीमारीसँ ग्रस्त गजल ४३ सेहो अछि।
एहिठाम हम कही तँ गजलकारकेँ सामर्थपर नहि हुनक गजल व्याकरण प्रति
अज्ञानताकेँ दोखी मानि सकैत छी। किएक तँ सामर्थक गप्प करी तँ एहि संग्रहक
१७ म गजलमे दोहरा काफियाक सफल पालन कएल गेल अछि एकरा हुनक सामर्थ अथवा
बाय लक कहि सकैत छी। जिनका काफिया आ रदीफ केर ज्ञान हेतनि ओ अतेक बेसी
गल्तीक गुंजाइस नहि छोरता। एहि सन्दर्भमे २४ सम गजलक मतला देखू 
सरिपहुँ अहाँ भैया कमाल करै छी
अछि भ्रष्ट आचरण मुदा गाल करै छी
अर्थक मादे कहू तँ एहि शेरक दोसर पाँतिमे करैकेँ जगह बजै हेबा चाही
मुदा गजलकार करै छीकेँ रदीफ मानि ालकेँ काफिया बनोलनि। एहि तरहे
मतलाक काफिया आ रदीफ ठीक अछि मुदा गजलक आन-आन शेरक काफिया आ रदीफ संगे
अछि, “ताल करै छी”, “नेहाल करै छी”, “जाल करै छी”, एतए धरि सभ ठीक मुदा
अंतिम शेरमे अछि टाल रखै छी रदीफ करै छीकेँ जगह रखै छी अर्थात रदीफ
गल्ती एकरे कहै छैक सौँसे खीरा खाए कऽ पेनी तीत।
आब आबी काफिया आ रदीफकेँ बाद गजल व्याकरण केर महत्वपूर्ण पक्ष बहरपर, तँ
ई कहैमे कोनो संकोच नहि जे संग्रहक पूरा पूरी गजल बेबहर अछि। सरल वार्णिक
बहरक साइद ओहि समयमे जनमे नहि भेल छल आ नहि एहि रूपमे संग्रहक कोनो गजल
उतरि रहल अछि। वर्णवृत सेहो कोनो गजलमे नहि अछि, कतौ कोनो गजलक एक आधटा
शेरमे वर्णवृत्त अबितो अछि तँ गजलक बांकी शेरमे नहि अछि। एकटा उदाहरन
देखू संग्रहक १४हम गजलमे गजलकार वर्णवृत करैक प्रयासमे छथि 
गजलक मतला अछि 
भेल ई की कहाँ सँ लहरि गेल अछि
 २१२  -२१२ -   ११२  - २१२
प्रश्नवाचक धरा पर पसरि गेल अछि
२१२  २१२ -  २१२ -   २१२
एहि मतलामे २१२-२१२-२१२-२१२केँ वर्णवृत बनैत-बनैत बिगैर गेल अछि। एहिठाम
या तँ गजलकार वर्णवृतसँ अज्ञात छथि अथवा चानबिंदुकेँ दीर्घ मानै छथि।
गजलक आगू केर तीनटा शेरमे २१२x४केँ सटीक वर्णवृतक प्रयोग अछि। गजलक दोसर
शेर देखू 
आदमी आदमी केर बैरी बनल
 २१२  २१२  २१२ -२१२
कोन नभसँ घृणा ई उतरि गेल अछि
२१२   २१२  २१२ - २१२
मुदा गजलक पाँचम शेरमे अबैत अबैत वर्णवृत टूटि गेल अछि। पाँचम शेर 
उर काँपैछ धरतीक भालरि जकाँ
 २२२-   १२      -२१२   -२१२
युग आदम कोना फेर पलटि गेल अछि
२२२-२२२- १ १२- २१२
जँ कनिक धियान देने रहितथि तँ एतेक लअग एला बाद वर्णवृत पूरा ने होबाक
कोनो कारण नहि। कहब ई जे इहो गजल बेबहर भेल।
कतौ कतौ बुझाइत अछि जेना भट्टजी समकालीन हिंदी गजलकार सभसँ प्रेरणा लऽ कऽ
मात्रिक छंदक प्रयोगक फिराकमे छथि। हलाँकी मात्रिक छंद गजलक हिस्सा नहि
अछि तथापि एहि संग्रहक गजल एहनो सिस्टममे पूर्ण फिट नहि भए रहल अछि।
पहिले गजलक मतला देखू 
घर घरेक आगिसँ अछि जरल जा रहल
२१२१ -२११२-१२२१२
भाइ सँ भाइ द्वेषे भरल जा रहल
२११२-२२२१-२२१२
वर्णवृत तँ नहिए अछि मुदा मतलाक दुनू पाँतिमे २०-२० टा मात्रा अछि। ऐ
तरहे गजलक तेसर चारिम आ पाँचम शेरमे २०-२० टा मात्रा अछि मुदा दोसर शेरक
मात्रा गनियो कए कम बेसी अछि। गजलक दोसर शेर 
कोन आयल जमाना जुआरी एतय (२१ मात्रा)
 भवना अविवेकी बनल जा रहल” (१९ मात्रा)
एहिना सम्पूर्ण संग्रहमे नहि कोनो गजल मात्रिक गणनामे पूर्ण अछि आ नहि
वर्णवृतमे। मने ई संग्रह पूरा-पूरी बेबहर गजल संग्रह अछि। काफिया आ रदीफक
अशुध्यताक कारणे एहि तरह केर रचनाक संग्रहकेँ अजादो गजल केर श्रेणीमे
रखनाइ उचित नहि।
गजल व्याकरणक एकटा आओर महत्वपूर्ण हिस्सा अछि मकता, अर्थात गजलक अंतिम
शेर जाहिमे शाइर अपन नाम अथवा उपनामक देने होथि। एहि संग्रहक कोनो गजलमे
मकताक प्रयोग नहि अछि।
आब आबी भाषा पक्षपर। गजलक भाषा एहन होबा चाही जे सुनिते माँतर मुँहसँ
निकलै वाह ! वाह ! आ ई की सुनलहुँ आइ आ बुझै लेल दू दिन बादो शव्दकोश
ताकैत रहू। एहि पोथीमे एकर सदत अभाब अछि। बहुत उपरकेँ भाषा, माटि थालमे
ओँघरे वलाकेँ लेल जेना सुन्दर चौपाइ जकाँ नीक तँ बड्ड छै मुदा किछु
बुझलौं नहि। किछु कठीन शव्द, ऐ संग्रहक पहिले गजलक एकटा शेर 
क्षुब्ध धरती गगन नयन मूनल अपन
अछि वसाती बलाती बनल जा रहल
आब ऐ शेरक की अर्थ बूझल जेए ? आ जँ बुझबो करब तँ कतेक काल बाद आ ओहो के ?
एकटा आओर शेर ३७ सम गजलसँ 
घर छोट-छोट भीत चूना सँ ढेउरल
चित्र ओहि पर राधा कृष्णक ललाम
चूना, चित्र हिंदीक बेसाहल शव्द ओहूपर अर्थ की? ई ललाम की ? के बुझत ?
कठीन भारी भरकम शव्दकेँ अलाबो एहि संग्रहक भाषा मैथिली अवश्य अछि मुदा
एहने एहने पोधी पढ़ला बाद हिंदीक दलाल सभ कहैत छै जे मैथिली हिंदीक अंग
अछि अथवा हिंदीक उपभाषा अछि। ऐ संग्रहक बहुत कम एहेन गजल अछि जाहिमे
हिंदी शव्दक प्रयोग नहि हुए। देखी किछु हिन्दीक शव्द 
गजल १ मे  चमन
गजल 2 मे  श्रम, विवशता
कनीक आगू आबि गजल १० मे  विकृति, रक्त
गजल ११ मे  आदेश, वैशाखी, आतंकित
गजल १२ मे  विकट, मनुष्यता, क्रूरता
गजल १४ मे  कहाँ, प्रश्नवाचक, धरा, संशकित, आभास
गजल १६ मे  निष्क्रिय, शिथिल, सदृश्य, विस्मय
गजल १८ मे  अम्बर, मुरझायल
गजल १९ मे  कहर, अग्रसर
कनी आओर आगू बढ़ी, गजल ३८ मे  घटा, उषम, विषम, जल
बांकीओ गजलमे एनाहिते हिंदी शव्दक भरमार अछि। कतौ-कतौ तँ एकछाहा हिंदीए
अछि। १५हम गजलकेँ ई दुनू शेर देखू 
घरमे फूटल क्रिया गर्म सीमांत अछि
भावना संकुचित विषमयकारी ने भेल

मंत्र मधुमय कहाँ ओ विश्व वन्धुत्व केर
कोन उतरल ई युग दुराचारी ने भेल
उपरकेँ दुनू शेरमे कतेक शव्द मैथिलीक अछि ? ३९ म गजल केर ई शेर देखू 
उर बसा द्वेष इर्ष्या घृणा केर लहरि
रक्त तर्पण करैछ ने कोनो जानवर
जँ ई मैथिली तँ हिंदी की ?
आब आबी भाव पक्षपर, तँ एहि संग्रहक सभ गजलक भाव पक्ष जबरदस्त अछि। समाजक
कोनो एहन कोण नहि जाहिपर शाइर ऐ संग्रहमे वर्णन नहि केने होथि।
चापलूसीसँ शुरू कए आम लोकक जीवनक विषमता, भ्रस्टाचार, महगाइ, अपहरण,
लूटि-पाट, राजनीति सभ विषयपर अपन  कलम चलबैत एक एक भावकेँ उजागर करैमे
सफल छथि।


 

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...