Tuesday, January 14, 2014

‘विदेह'१४५ म अंक ०१ जनवरी २०१४ (वर्ष ७ मास ७३ अंक १४५)PART II

आकुल जननी
(बाल कविता)
सूति रहू हमर लाल, अर्द्ध रैनि बीतल।
अहँक अविरल नैनसँ आँचर तीतल।

घोंटि अछिंजल काटि रहलौं अछि जीवन
,
तात दर्शनक आश छिन्न किएल अरपन
,
क्षीर बिनु दुहू वक्ष शुष्क पड़ल।
सूति रहू ......।

कोन सियाहीसँ लिखल विधना हमर कपार
?
अपने प्रवास गेलनि छोड़ि हमरा बेथा धार
,
चानन सन नेनाक हीय
, भूखसँ कानल।
सूति रहू ......।

हुनके की दोष दिअ स्नेहक ओ दिव्यमूर्ति
,
कायादीन विद्या विहिन करथि पंचजनक पूर्ति
,
अहँक अश्रु मातृ नैन शोणित भरल।
सूति रहू ......।

कहबनि गौमाता आनू औता फागुनमे
कामधेनुक सुधा भरब अहँक कण-कणमे
अहाँ निन्न हम कल्पनामे उड़ल।
सूति रहू ......।
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अंतिम छंद
(बाल कविता)
सात बरख केर जखनि वएस छल,
बिहुँसल मन उजड़ल मकरन्द।
एखनौं क्षण-क्षण हीयसँ उफनए
,
माय जे बाजलि अंतिम छंद।
सुनू पूत हम छाड़ि अबनिकेँ
,
जा रहलौं विधना केर घर।
अपन तातकेँ कोंचा पकड़ू
,
मानि जननि शीतल आँचर।
हमर चरण धऽ लिअ अहाँ प्रण
,
तानए धरम केर राखब मान।
कर्म डगरिपर हमर छाँह संग
,
बढ़ब करैत पितृक सम्मान।
हंसवाहिनी चरणमे अरपित
,
अपन शीश दऽ सोखब ज्ञान।
नीच बाटपर डेग नै राखब
,
जीवनमे करब नै सुरापान।
केहन दृष्ट अदृश्य वियाधि ई
,
सभ किछु बुड़ल अहाँ भेलौं दीन।
हीय नै हारू ऐ अखिल भुवनमे
,
छथि केतेक लाल साधन विहिन।
अम्बुज अहाँकेँ हमर सप्‍पत छी-
विलोचनसँ जुनि बहबू नोर।
शिखर लक्ष्यकेँ निश्चित साधव
,
दैत मातृ स्मृतिक वोर।


हुनक दिव्य आशीष प्रतापसँ,
भेल धन
, मन, जश पूरित जीवन।
मुदा
मायगुंजन जौं सुनि हम,
रोम-रोमसँ उपटय क्रन्दन।

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हुरहुर
(बाल कविता)
दलानक पाँजरि गमकि रहल छल,
गदरल गाछ फुलल फुलवाड़ी।
कात सटल कट्ठा भरि लागल,
खसखस साग हरिअर तरकारी।
बाबा कमाबथि सीता गुनि-गुनि,
हमर हाथमे जलक गगरी।
हुनक नैनसँ ओझल भऽ कऽ,
खूब चिबाबी गाजर ककरी।
लदल गाछ छल नेबो बरहर,
अनार शरीफा मधुर लताम।
बिनु आज्ञा केयो पात जौं छूबए,
बाबा छीलथि ओक्कर चाम।
दीर्घ पिपासित किछु गाछ कँपै छल,
ढारि देलौं भरि गगरी नीर।
झन्न पीठपर लागल चटकन,
उमड़ल बेथा गेल देह सिहरि।
खसि पड़लौं कात परतीमे,
तमकैत बाबा लगलनि दुत्कारए।
अछि उदण्ड दीर्घटेंटी नेना,
हम्मर कोनो बात ने मानए।
पुष्पहीन अफलित गाछपर,
देलक सभटा जल उड़ेल।
नीक अधला गप्प बूझए नै,
तेसर कक्षामे चलि गेल।
भनसार आबि मायसँ पूछल,
लोचन डबडब नासिका सुरसुर।
आड़ि मुरझाएल छी कोन झाड़ी,
बाउ ओइ अनाथक नाम हुरहुर।
माल जालसँ फुलवाड़ी बँचबैले,
आड़िपर मालिक ओकरा रोपय।
सामन्ती जिरातक उपेक्षित सेवक,
खाद-पानि लेल केकरो नै टोकए।
लोलुप जहाँनक अपवर्जी छी
सओन जनमल बैशाखे उपटल।
तीत पातमे पुष्प खिलय नै,
उपहासेमे जीवन विपटल।
रैन इजाेरिया गगरी भरि-भरि,
जलसँ देलौं हुरहुरकेँ बोरि।
भोरे-भोरे बाबाकेँ देखल,
सजाबैत कियारी पासनिसँ कोरि।
कर्कष हीयमे प्रीति देखि कऽ,
झट दौड़ि हुनका गर लगाैल।
दलित उपेक्षित जीवन बाँचल,
श्रद्धासँ नोर टपकाैल।

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अंजलि
(बाल कविता)
काका ः सूति रहू अय बुच्ची ओल,
पाकल परोर सन लागए लोल।
उल्लू मुख भदैया खिखिरक वोल
,
नाम
अंजलिकेतेक अनमोल।

अंजलि ः माँ  टिल्लू काका बड़का शैतान
,
थापर मारि ठोकै छथि कान।
अहाँसँ नुका कऽ चिवबथि पान
,
फोड़बनि माथ वा तोड़बनि टॉग।

काका ः भौजी! छोटकी फूसि बजै छथि
,
रीतू संग भरि दिन विन-विन करै छथि।
दावि रहल छी हिनक देह हम
,
उत्छृंखल नेना करै छथि तम-तम।

अंजलि ः काका जुनि घोरू मिथ्याक भंग
,
आब नै सूतब हम अहाँक संग।
माँ लग हमरासँ सिनेह देखबैत छी
,
एकात पावि हमर घेंटी दबैत छी।

काका ः पठा देब काल्हि अहाँकेँ हाँस्टल
,
नेनपन ओइठाँ भऽ जएत शीतल।
ओतए भेटत नै खीरक थारी
,
नै रसमलाइ नै पनीरक तरकारी।

अंजलि ः काकू बनव हम बुधियारि नेना
,
सदिखन बाजब सुमधुर वयना।
केकरो संग नै मुँह लगाएब
,
अहीं लग रहब हाँस्टल नै जाएब।

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अहँक आँचर
(बाल कविता)
आब विसरव केना सुनू जननी अहाँ,
केतेक निर्मल सेहंतित अहँक आँचर।
हीय सिहकै जखनि वहै लोचन तखनि
नोर पोछलौं लपेटि हम अहँक आँचर।
केना अएलौं खलक? मोन नै अछि कथा,
पवित्र पटसँ सटल देह भागल बेथा।
सिनेह निश्छल अनमोल प्रथम सुनलौं मातृबोल,
मोह ममताक आन के करत परतर? 

दंत दुग्धक उगल, नीर पेटसँ बहल,
देह लुत्ती भरल कंठ सरिता सूखल।
जी करै छल विसविस तालु अतुल टिसटिस,
मुँॅहमे लऽ चिबएलौं अहँक आँचर।

नेना वयसक अवसान ताकए चललौं हम ज्ञान,
कएलौं गणना अशुद्ध गुरु फोड़ि देलनि कान।
सिलेट वाटपर पटकि माँक कोरमे सटकि,
तीतल कमलाक धारसँ अहँक आँचर।

देखि पाँचमक फल मातृदीक्षा सफल,
भाल तिरपित मुदा! उर तृष्णा भरल।
गेलौं केतए हे अम्बे केतए गेल आँचर,
ताकि रहलौं हम आँगनसँ पिपरक तर।

mm


स्‍नि‍ग्‍ध-स्‍वाती
झि‍हि‍र-झि‍हि‍र ना हे पि‍या,
झि‍हि‍र-झि‍हि‍र ना!
झहरए स्‍नि‍ग्‍ध स्‍वातीमे बदरा,
झि‍हि‍र-झि‍हि‍र ना...!
परम सुहावन मास वि‍रह हीय,
टपकए नेहक बुन्न
ललि‍त पवनमे ठि‍ठुरि‍ रहल छी,
जीवन भऽ गेल सुन्न
टपकए वि‍रहक अश्रुलाप ई,
झि‍हि‍र-झिहि‍र ना...
तृप्‍ति‍-तपि‍त सि‍तुआक कल्‍पना,
उपटल अर्णव तट मोती
अहाँ बहएलौं नि‍रस जीवनमे,
कि‍ए अगम दु:ख सोती?
मि‍लनक आश कानए पैजनि‍याँ,
झुनुर-झुनुर ना....
कांति‍ श्रवि‍त माणि‍क्‍य बनल,
मदमत्त भेल गजराज
मुग्‍ध जहानक रम्‍य प्रहरमे,
फफकि‍ गेलौं हे ताज!
तोड़ू वेदनाक डोरि‍ ई,
झमड़ि‍-झमड़ि‍ ना.....।।
mm



घटा बसन्‍ती
कूकू केर मादक स्‍वर सुनि‍ते,
ि‍सनेहातुर मन चहकि‍ उठल
उगडुम आनन हरिअर कानन,
घटा वसन्‍ती‍ धार बहल।
ति‍तली रूनझुन नीरज रससँ
केलक झंकृत सकल जहान
अपन मनोरथ सि‍द्धि‍ करैले
प्रेयसी कएल त्रृतुराजक गान।
उमड़ि‍ रहल नव तरूणी यौबन
रसस्‍नात भेलि‍ चंचला-गात
पुष्‍प सेजपर मि‍लन सम्‍मोहक
चभटि‍ गेल अछि‍ दुनू पात।
जर्जर वृद्धा आ सूखल वृद्धमे
धुरि‍ आएल पुनि‍ कामुक जान
भागि‍ गेलनि‍ धर्मराज देखि‍ कऽ
ऋृतुराजक ई अनुपम शान।
हॅसी-खुशीसँ चल-अचल जीवन,
ताकि‍ रहल होरी केर वाट
जड़-चेतनक सुरभि‍त कांति‍ देखि‍ कऽ
केलक गान हृदैसँ भाट।
रंग-वि‍रंगक अवीर गुलाल संग
नाचि‍ रहल उन्‍मादि‍त होरी
सृष्‍टि‍ मनोहर चक-चक तरूवर
मॉतल चह-चह चहुँदिस‍ जोड़ी।
चैतावरक आेंघाएल कलरब


अग्‍नि‍देव केर जुआरि‍ बढ़ल
घटल जहानमे कलकल जीवन
मादकता स्‍वर्गोकेँ जीतल।।

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साहि‍त्‍यक वि‍दूषक
कि‍ए हमरा कहै छी वि‍दूषक।
की हम केलौं अहाँसँ खटपट।।
शैशव अप्‍पन गाममे बि‍तएलौं
सभ ठाम देसि‍ल गीत सुनेलौं
मूड़न हो वा महुअक।
मात्र वि‍देहसँ रखलौं आशा
सभ दि‍न पढ़लौं मैथि‍ली भाषा
व्‍यारव्‍याता बनि‍ भेलौं चकमक।
श्रृंगार पहरमे कवि‍ता लि‍खै छी,
छी गृहस्‍थ मुदा बैराग सि‍खै छी
हमर जीवन दरससँ ओ भेलि‍ भक्।
कहि‍या धरि‍ बाँटब जागरणक परचा
केतौं नै देखलौं अप्‍पन चरचा
दक्षि‍ण नैन भेल फकफक।
दि‍नचर्या लि‍खि‍ कवि‍ बनि‍ गेला
आन्‍हर गुरु संग बताह चेला
उल्‍लू लग कोकि‍ल ठकमक।
केतेक दि‍न भरत वि‍लाप सुनाएब
फोका डबडब परि‍चए प्रसूनक।
आउ-आउ दीर्घ सूत्री भेदमे टा दि‍अ
हमहूँ मैथि‍ल गर लगा लि‍अ
बनाउ मि‍थि‍लाकेँ सम्‍यक।

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मुदा जीबै छी
जीवनक डोरि‍ फुजि‍ उड़ल व्‍योममे
कातर प्राण मुदा जीबै छी
सड़ल वसन पजड़ल अछि‍ आंगुर
गलल ताग गुदरी सीबै छी....
केकरो वाड़ी बेली फुलाएल
केकरो पोखरि‍ भैंटक लावा
हमरा घरक परथनो गि‍ल्‍ल भेल
आँचक बि‍ना सुन्न अछि‍ तावा
कागत-मुद्राकेँ बीड़ी बना कऽ
कोंढ़सँ नेसि‍-नेसि‍ पीबै छी.....
लाल रंग शोणि‍त सन टपकए
पीत कुटि‍ल पि‍लहा बनि‍ धधकए
कुपि‍त होलि‍का छाँह देखाबथि‍
बड़ीपर काक-भुसुण्‍डी हबकए
अग्‍नि‍ देवक हुथ्‍थ डांगसँ
सुधाकेँ खोड़ि‍-खोड़ि‍ जड़बै छी....
कटाह वसंत कहि‍यो नै आबथि‍
राखथु अपने संग वि‍धाता
कुसुमि‍त रहै सबहक आँगन घर
हँसि‍-हँसि‍ कौड़ी खेलथि‍ पुनीता
अपन संत्रासकेँ हि‍यामे नुका कऽ
सबहक सुखक कामना करै छी.....।।

mm


रमा
साँझ पहर दि‍प-वाती दि‍न एलौं
रमा नाओं रखने छलि‍ बाबी
मातृ कोरक हम पहि‍लुक नेना
कोन-कोन जीवन गीत‍ गाबी
खढ़क मचान नि‍लय बनि‍ चमकल
कनक-रजतसँ छनछन माता
पि‍ताक बटुआमे बैसलनि‍ लक्ष्‍मी
कण-कण खह-खह कएल वि‍धाता
लव-कुश बनि‍ जननीक कोखि‍सँ
दू-दू सारस आँगनमे खि‍लाएल
तरूण लताकेँ स्‍नि‍ग्‍ध देखि‍
सर समाज घूरथि‍ औनाएल
धेलकनि‍ पाण्‍डु जर बाबूकेँ
नोकरी छोड़ि‍ खाटपर खसलनि‍
खेत पथार वियाधि संग बूड़ल
तैयो तेसर लोकमे पैसलनि‍
जै ओलती छल तृप्‍त पपि‍हरा
सुग्‍गा चुनमुनीक चहचह शोर
क्षणहि‍ंमे देवराज टपकेलनि‍
शरद-ि‍नशामे आगि‍ इन्‍होर
हाथसँ करची कलम छूटि‍ गेल
छोड़ि‍ पड़ेलनि‍ भामि‍नी- भद्रा
चरण नुपूर धरा खसि‍ टुटल
आँगन वाड़ी भरल दरि‍द्रा
काँच बएसमे सेंथुमे सि‍नूर
गदगद भेली मातु सुनयना
कहुना लाज गेल दोसर घर
सुखद नोर खसबै छथि‍ मयना
कंतक आँगन सेहो कलुष भेल
जखने नि‍कसल वज्र चरण रज
रैन पचीसी संग सि‍नेहक
लहठी फोड़ि‍ नि‍पत्ता पंकज
तुसारि‍क नि‍स्‍तार केना कऽ करि‍तौं
उज्‍जर नूआ खाली हाथ
सेंथुसँ सेनुर अपने पोछलौं
आन्‍हर सासु संग पीटै छथि‍ माथ
आजुक डाइन- कहि‍यो छेलौं लक्ष्‍मी
छाँहसँ भागथि‍ अहि‍वाति‍न सभ
नोरक घृतसँ चि‍नुआर नि‍पै छी
केकरो संग नै बाँटब कलरब
काक-दृष्‍टि‍ धेने छथि‍ बाहर
चानन ठोप केने‍ कि‍छु लोक
आर्य भुवनक रौ बनमानुष सभ
गर्दनि‍ दाबि‍ पठबए परलोक
नारीटा लेल नि‍अम केहेन ई?
वरन् एक तँ कहाएब सती
अपन कांताकेँ छोड़ि‍ घरमे
कहि‍या धरि‍ तकबेँ अबला रति‍?

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उनटा-पुनटा
सबरी मायक सि‍नेह उनटल छन्‍हि‍,
पनटि‍ गेल छथि‍- तात राम
ति‍यागक मूरति‍ सि‍या बदलि‍ गेली
प्रति‍ झण बदलए आठो-याम
बोतल क्षीरमे नेना उगडुम
पुष्‍ट वक्षक लेल अंबा अंध
टाॅप पहि‍रलनि‍ यशोदा मैया
कान्‍हा हेरथि‍ आँचर गंध
काका दलानपर रसमंजरि‍ लागल
पढ़ि‍-लि‍ख पूत भेलनि‍ अधि‍कारी
घूसक टाकासँ दलानकेँ छाड़ब
लालबत्ती बरू भऽ जाउ कारी
अन्न-पानि‍ बि‍नु बाबा मुइला
भीठ बि‍का हेतनि‍ वृषोत्‍सर्ग
सभ बौराएल यशोगान लेल
गजि‍या शीत तप्‍पत अपवर्ग
नांगरक चार चुआठ बनल
ति‍रपि‍त झाकेँ भेटलनि‍ शमि‍याना
गोदानक संग जौं साँढ़ नै दागब
लोकवेद सभ देत ताना
पहि‍ल छायामे हमरो भेटल
राहरि‍ दालि‍ संग वासमती
बाबाकेँ जौं अहिना खुआबि‍ति‍यनि‍
अखनि नै जेता छल तट वागमती
छोट परि‍वारक लेल मामी माहुर
कात भेली नानी बनि‍ अपरतीप
आर्य भूमि‍मे मि‍झा गेल अछि‍
संयुक्‍त परि‍वारक खहखह दीप
सुकेश्वर रामक गाराक कंठी
हाथ धएने धर्मक पतवार
अपैत कुलमे जन्‍म की भेलनि‍?
माथ लि‍खेलनि‍ जाति‍ चमार
सुरावोरि‍ मुर्गी टांग चि‍बाकऽ
वि‍वि‍ध कुलक्षणक संग राति‍ बि‍ताबथि‍  
पंडि‍त वंशक कठुआएल पौरूष
मास्‍टर साहेब ब्राह्मण कहाबथि‍।
mm














कवि‍क कामना
पूत बढ़बैछ वंशक मान
मुदा पि‍परौलि‍या बाबासँ
मंगलनि‍ पोतीक रूपमे सुकन्‍या
अचा अपर्णा वा भव्‍या
कवि‍ बनि‍ गेला पि‍तामह
सफल भेल कबुला-पाती
भगवत कृपा देख-
खुशीसँ फुललनि‍ जीर्ण छाती
जेठका जीवन झखरैत पाषाण
वि‍याहक भेल सोलहम बरख
अखनि धरि‍- नि‍:संतान
दोसर नि‍ष्‍कपट बुड़ि‍बक
परंच पि‍तृसेवक अवि‍राम
करची सन लकलक काया
रंग धन इव श्‍याम
घनश्‍याम कनि‍याँ कोरमे
सद्य: अएली वैदेही बनि‍ कन्‍या
कवि‍क उपवन भेल धन्‍या
मुदा! साक्षीक पि‍ताक स्‍थान
जेठकेकेँ भेटत
श्‍यामकेँ जौं छन्‍हि‍ बाप कहेबाक
सख आश वा दीर्घ पि‍यास
दोसर बेटीक लेल
राखथु एकादशी उपास
यएह भेल
कवि‍ गेला स्‍वर्ग
भेटलनि‍ मुक्‍ति‍ भेलनि‍ अपवर्ग
साक्षीक माताक कोरमे
फेर बेटी बनि‍ अएली भारती
वि‍चि‍त्र अन्‍हेर
प्रकृति‍क फेर
अँगने अँगने अड़ए लागल
गप्‍प हरबि‍ड़रो
बरसए लागल कनफुसकीक झाँट
अपने हाथसँ कवि‍जी
रोपलनि‍ बबूरक काँट
बड़की काकी दि‍अ लगलनि‍ तान
नै छेलनि‍ हुनका संसारक ज्ञान
कबुलामे कि‍एक मंगलनि‍ बेटी
हम जौं हुनका स्‍थानपर रहि‍ति‍यनि‍
तँ जनमिते‍ दाबि‍ देतौं
ऐ राक्षसनीक घेँट
बेटीक लेल प्रार्थना!
आश्चर्य केहन कवि‍क कामना
एकबेर आर अन्‍हेर
भादवक अन्‍हरि‍याक फेर
स्‍तब्‍ध छथि‍ सभ कियो
देख कवि‍ कुलक दशा
आँगनक बहुआसि‍न सभ
टोलक अनन्‍या
कपार पि‍टए लगलखिन
छोटको पुतोहुक कोरमे
जनमलि‍... कन्‍या
हा भगवान महात्‍माक यएह मान
मंगने देलि‍यनि‍ तीन
पुष्प माल लागल फोटोमे
कवि‍ छथि‍ मुग्‍ध तल्‍लीन
जेना कहि‍ रहल होथि‍
के रखलक जहानक मान?
के बढ़ेलक कुलक सम्‍मान?
के बचेलक वंश
सीता अहि‍ल्‍या सावि‍त्री
वा रावण कौरव कंस?

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मुरूदा जगाउ
इजोतमे तँ सभ चलै छै
अन्‍हारमे चलि‍ कऽ देखाउ
स्‍वान सुनि‍ पदचाप जागए
चचरी चढ़ल मुरूदा जगाउ
नृपक मीठ दर्द सुनि‍ बौराएल
पटरानी-मंत्री-सेनापति‍-चाकर
ओइ अभागल दि‍स के तकलकै
जे सर्व विहिन जेकर देह जर्जर
भरल पेट हाफी करैत
पहुँचल महाजन दुआरि‍ जखने
स्‍वार्थक दुग्‍धसँ बनल पयस
भरि‍ थारी आगाँ रखलौं तखने
आँत चटचट कंठ सूखल
पानि‍ नै जे घोंटि‍ पाबए
सुक्‍खल अछोप मध्यम जनकेँ
झाँटि‍ ‘चंडाल’ कहि‍ भगाबए
देवध्‍वनि‍मे नि‍पुण वाचक
पंचतत्‍व देहे भरल छै
पि‍रही नै कियो दैत ओकरा
छुद्र कुलमे ओ जनमल छै
देव धर्मकेँ पीस रहलै
झपटल सोन बोरि‍ कऽ बटोरल
केहेन वि‍कराल मृगतृष्‍णा ई
सभ घोंटि‍ उन्‍मत्त जहर घोरल


अंति‍म आग्रह ि‍थक सुनू बौआ
ऐ फेरमे कखनौं पड़ब नै‍
अपना संग सभकेँ जगाएब
कुमार्ग कहि‍यो धरब नै।।

mm


अस्‍ति‍त्‍वक प्रश्न?
ककरासँ कहबै के पति‍एतै अपने तरंगमे भीजल दुनि‍याँ
बड़ अथाह स्‍वार्थक अर्णव ई शुभ बनि‍ गेलै लोलुप बनि‍याँ
शोणि‍त बोरि‍-बोरि‍ टाट बनेलौं
खर खोड़ि‍ टि‍टही लऽ गेलै
फाटल आँॅचरसँ केना कऽ झँपबै
खाली चि‍नुआर बेपर्द भऽ गेलै
व्‍याल दृष्‍टि‍सँ राकस गुड़कए चि‍हुकि‍-बि‍चुकि‍ कऽ कानए रनि‍याँ
कर्मक नाहमे भेलै भोकन्नर
बामे हाथे पानि‍ उपछलौं
भदवरि‍एमे पतवारि‍ हेराएल
दहि‍ना हाथक लग्‍गा बनेलौं
सभटा आङुर पानि‍ खा गेलै, केना बजतै दर्दक हरमुनि‍याँ
कछेरमे वि‍षनारि‍ उगल छै
थलथल पाँक पएर धँसि‍ गेलै
अन्‍हार मोनि‍मे कछमछ कऽ रहलौं
बि‍नु जाले टेंगड़ा फँसि‍ गेलै
केना कऽ हमरा बाहर करतै नोर चाटि‍ हहरए सोनमनि‍याँ...
कि‍छु छि‍द्दीक तरमे दबि‍ कऽ
पंद्रह अाना अकसक कऽ रहलै
भारी भेल कुकर्मक सोती
ओकरे धारमे गंगा बहलै
घनन दरि‍द्रा तांडव करतै,
अस्‍ति‍त्‍वक- प्रश्न बनल पैजनि‍याँ......।
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क्षणप्रभा
सभ दि‍स सर्द
कि‍यो नै बेपर्द
देह सि‍हकल रेह ठि‍ठुरल
पोखरि‍-इनार ठमकल
पूस रमकल
श्‍याम असर्ध शीतक बीच
टक टक कएने आश
कखनि भरत मोनक पि‍यास
कबदबैत चम्‍पा मुस्‍कैत पलाश
सूर्यमुखीक दशा देखि‍
ओकरासँ किए करैत छी सि‍नेह
जे कुन्‍तीकेँ ठकि‍ लेलक
ओकर कौमार्य नष्‍ट कऽ देलक
आइ आगि‍क ढेपपर
के करत बिसवास?
झाँपू मर्यादा बचाउ गेह
भावक आगाँ प्राप्‍ति‍क कोन मोजर
एतबेमे मेघ उड़ि‍ गेल
शीत लुप्‍त भेल
क्षणप्रभा बनि‍ रवि‍क अर्चिस
सूर्यमुखीक,
कोमल कोंपरमे समा गेल
ज्‍योति‍पुंजकेँ आदि‍त्‍यक चरण मानि‍-
सूर्यमुखी अपन सेंथुमे
भस्‍मीभूत कऽ लेली
अखण्‍ड सौभाग्‍यवतीक आशीषक संग
कि‍रण ससरल
कली फूल बनि‍ पसरल
हम तँ उभय लि‍ंगी छी
नै रहि‍तौं तैयो करि‍ति‍यनि‍
सुरूजसँ प्रेम......
सभ किए दैत छी हुनकापर दोख
ने डूमैत छथि‍ ने उगैत छथि‍
सभ पि‍ण्‍ड घूमि‍-
हुनकापर डूमि‍ जएबाक
कलंक लगबैत अछि‍-
जखनि अपनामे दृढ़ता नै
तँ दोसरपर दोष केहेन?
बि‍नु बजौने सभ लग अबैत छथि‍
आठो याम जरैत छथि‍
कुन्‍ती सभ जनैत किए
कएली वरण-
ज्‍योजि‍पुंजकेँ बान्‍हब
ककरासँ भेल संभव?
आदि‍त्‍य सि‍नेहक तापस
लगले तप्‍पत, लगले वि‍द्रूप
केना भेला छलि‍या?
सि‍नेहक अर्थ सुधि‍ प्रभंजन
नै स्‍पर्श
एकर नै अवसान
नै उत्‍कर्ष......।
क्षणप्रभा जेकरापर खसल
ओ जरल ओ मरल
मुदा! सि‍नेहक क्षणप्रभा
वासना मात्र नै-
शाश्‍वत स्‍पंदन......।
जेकरामे केलक प्रवेश
ओकरा रोम-रोम शेष-अशेष
एकर भंगि‍मा वएह कहत
जेकरामे संवेदना रहत......।

mm



सगर राति‍ दीप जरए

राति‍ माने कारी पहर

गत्र-गत्र शांत

जीव अजीव आक्रांत

रजनीक लीलासँ

क्षणि‍क बँचबाक लेल

लोक जरबैछ दीप

सभ्‍यताक वि‍कासक संग-संग

मनुख चेतनशील होइत गेल

पहि‍ने इजोतक लेल......।

खर-पुआर जारनि‍

लत्ता नूआ फट्टा

सूत छोड़ि‍ रूइयाक बाती

ढि‍बड़ीक बदला लेम्‍प

बहकैत रोशनीमे गबैत पराती

बुइि‍धक वि‍कास भेल......।

 

वि‍द्युत तरंगमे

गैसक उमंगमे

वि‍ज्ञानक जय भऽ गेल......।

सभ ठाम इजोत

मुदा! वैदेहीक घर अन्‍हार

मात्र लि‍खते रहब

केकरोसँ नै कहब

के बूझत कथाक वि‍कास

केकरो नै छल आभास

दधीचि‍ बनि‍ सांगह नेने

आबि‍ गेलनि‍

मैथि‍ली कथा जगतमे प्रभास

सुरुज दि‍न भरि‍ अपन

करेजकेँ जड़ा कऽ

नै मेटा सकल

ऐ वसुन्‍धरापरसँ

वि‍गलि‍त मानुषक प्रवृत्ति

प्रभास दीप बारि‍

अपन करूआरि‍ सम्‍हारि‍

कथा सागरक जमल तरंगमे

दि‍अ लगलनि‍ हि‍लकोर......।

समाज जागत- ई छल बिसवास

मुदा नै आदि‍ भेटलनि‍

नै भेटलनि‍ छोर...

कि‍नछेरि‍पर अपसियाँत

कथाकार लऽ लेलनि‍ ि‍नर्वाण

जागरणक आशामे

कहि‍यो तँ सुखतनि‍

वैदेहीक झहरैत नोर......।

चलि‍ गेला अभि‍लाषा नेने

उत्तराधि‍कारी सभ खेलाइत छथि‍

अट्ठा बज्‍जर करि‍या-झुम्‍मरि‍

उद्यत छथि‍ अधि‍कार हरबाक लेल

पाग पहि‍रबाक लेल

सगर राति‍ दीप जरए......।

रमण रमानन्द- आनन्द वि‍भूति‍

गेरुआ गर लगौने छथि‍

मलंगिया महेन्‍द्र

मसनद पजि‍औने छथि‍

समालोचक- उद्घोषक सूतए

मात्र वाचक मंच चि‍करए......।

कहैत छथि‍ बूढ़ छी

तखनि गोष्‍ठीमे आबि‍

नाटक करबाक कोन प्रयोजन?

दीप बारि‍ दुआरि‍ नै जराउ

जे जगदीश जागल रहत

ओकर गामक जि‍नगी के सुनत?

ओ अछि‍ समाजक कात

कहि‍यो होमए देब

ओकर साहि‍त्‍य साधनाक प्रभात

कि‍एक तँ ओ छी वेमात्र

जइ माटि‍क अन्‍हारकेँ

सुरुज नै हटा सकल

ओ केना हटत माटि‍क दीपक बल?

 

जौं दृष्‍टि‍कोणमे रहत छल

तँ वि‍वेक केना ि‍नर्मल?

ओइ कठकोंकारि‍ सबहक बीच

मैथि‍ली छथि‍ दुबकल

सगर राति‍ दीप जरए

अन्‍हार घर संस्‍कार सड़ए

कथासँ केना पारस ि‍नकसए?

 

mm



कर्मयोगी
ने भगता योगी आ ने डलबाह हरखक तरंग नै,
नै वि‍पत्ति‍क आह पहि‍लुक दर्शन कहि‍या भेल नै
अछि‍ मोन जहि‍यासँ देखैत छि‍यनि‍ वएह गंभीर मुस्की ..
केकरो उपहास नै केकरो परि‍हास नै, नै
ठोरपर वसन्तक गान नै
हि‍अमे ग्रीष्मक मसान
नेना सभक प्रि‍य अध्यापक कर्मयोगी-
अपकल केना भेलनि‍ पि‍तामह चूकि‍?  
रीति‍क कालपुरुखक नाओं- कामदेव!!!  
कोनो नै काम भलमानुष नि‍ष्काम
तेसर पहरक वि‍झनीक बाद
जगतधात्रीक नि‍त्यक दर्शन
तामझामक गाममे रहि‍तो  
त्रि‍पुंडसँ मुक्त छुच्छेक हाथे
तर्पण आब की मंगैत छथि‍ बाबा?  
झबरल आँगनमे शक्ति सहचरी
जाइ रवि‍-शशि‍क कि‍रणकेँ आत्मसात
करबाक लेल लोक करैत अनर्गल प्रलाप
व्यर्थ कुटि‍चालि‍ रचैत
चोरि‍ कऽ आडंवर करैत
तनयक रूपमे ओ दुनू
बाबाक आँगनक श्रवण कुमार
अचलाचंचला बनि‍ देलनि‍
कन्याक उपहार
दु:खक सोतीमे जखनि अकुलाइत
छै मनुख तखनि आस्तिक‍कता जगैत
भूख मुदा! ति‍रपि‍त बाबा नै करैत छथि‍
भगवानसँ छल, सुधामे जल मन नि‍रमल....
समाजमे छन्हि शीतलताक आह
सदेह कवि‍ नै तखनि वैदेहीक चाह?  
अपने नेपथ्यमे रहि‍
नाटकक कएलनि‍ ि‍नर्देशन
देसि‍ल वयनाक प्रति‍ कर्मक गति‍ अर्पण
एकाध प्रहसन लि‍खि‍ अकथ्य कवि‍ता गढ़ि‍
केतेक आजाद भऽ गेल चि‍न्हार मुदा!
इजोतक स्रोत तक पि‍रही अन्हार
कोनो नै छन्हि ‍ छोह सबहक
उत्कर्ष हुअए यएह आश,
यएह मोह की ब्राह्मण की अछोप
की धानुक की गोप सबहक बाबा......
जइ गाछक छिऐ छाहरि‍ वएह उतुंग
वएह श्रंृग सि‍क्कठि‍ हुअए वा नरकट
स्वीकार करैए पड़तनि‍ समाजकेँ
बाबा सन चेतनशील मनुखकेँ
जे संस्कार लूटाबए सबहक कल्याणक लेल
अन्तर्मनसँ सोहर गाबए......।

mm


एकटा छेली आरती
एकटा छेली आरती
भदेसक भारती
आगाँ रायकी लागल
ओ सभ बूझि‍ गेलथि‍
कि‍छु आर
वि‍द्रूप वा होशि‍यार
छलनि‍ खड़ाम देबाक आश
भदेसक कांता
महा भदेसमे छथि‍-
हुनका पड़ाइन लागि‍ गेल छन्‍हि‍
आन कि‍ए जाएत
केना पड़ाएत
कि‍न्नौं नै होमए देलक
मुक्‍तक काव्‍यक आश पूर
कियो नै गेल भागलपुर
आरती रूसि‍ गेली
क्षणि‍क नै
अन्‍तर-आत्‍मासँ हूसि‍ गेली
मुँहजोड़ भाषामे
जे राखत आत्‍मासँ
वि‍देह-तनुजासँ सि‍नेह
आत्‍मासँ गेह
सबहक हएत वएह दशा
भाेगए पड़तनि‍
उत्तराधि‍कारीकेँ क्‍लेश
सभ दि‍नक लेल बि‍ला देतनि‍
जहानसँ भगा देतनि‍
मात्र हमहीं टा नाचब
हमहीं देखब
के सूतल के जागल
के नै बूझए
जे करत प्रयास
ओ भऽ जाएत अभागल
ऐ माटि‍सँ उपटल वैदेहीकेँ
आन भूमि‍क लोक
माटि‍मे मि‍ला देलनि‍
मुदा अपन आरतीकेँ
अपने सांगह खसा देलकनि‍......।

mm

(प्रसिद्ध लेखिका स्‍व. डाॅ. आरती कुमारीकेँ समरपित...)



सुखार
काल रहसल त्रास बहकल
मधुमासे संत्रास महकल
अषाढ़ कुपि‍त इन्‍द्र रूसल
जल बुन्न बि‍नु बि‍आ वि‍हुसल
आड़ि‍ चहकल खेत दड़कल
प्रशान्‍तक प्रकोपे मनसून सरकल
शोषि‍त कलकल जुआनी गरकल
रोहि‍णी-आरदरा सुखले रमकल
ग्‍लोबल-वार्मिगफनकल
क्षुब्‍ध प्रकृति‍ सनकल
वि‍ज्ञानक चमत्‍कारमे उच्‍छावास छनकल
गाछ काटि‍ फोर लेन बनेलौं
पहि‍ने किए नै नवगछुली लगेलौं
अपने गति‍क स्‍टेयरि‍ंग पकड़लौं
मजूर कि‍सानकेँ घर बैसेलौं
कृषि‍ प्रधान देशमे नोरक स्‍नात
आँखि‍क शोणि‍तसँ केना भीजत पात?
ऐ बेर सुखार साउनो बीतल
दीनक आत्‍मा तीतल
भदैया बूड़ल रब्‍बीक कोन आश
सुक्‍खल मुरदैया मरूझल कास
अगि‍ला साल औत बाढ़ि‍
देलौं खेति‍हरकेँ ताड़ि‍?
वाह रौ वि‍ज्ञान वाह रौ धनमान
बि‍नु हथि‍यारे लेलेँ गरीब-गुरवाक जान
जेकर भऽ सकए संलयन आ वि‍घटन
आयुर्वेदमे तइ रसायनक चर्चा
वि‍ज्ञानक बाढ़ि‍मे सगरो पोलिथिन
कागत छोड़ि‍ बाँटि‍ रहलौं प्‍लास्‍टि‍कक पर्चा
आजुक रसायनसँ माटि‍क कोखि‍ उजड़ल
ठुट्ठ डाँट कि‍छु नै मजड़ल
प्‍लास्‍टि‍क छोड़ि‍ लि‍अ जूटक बोरा
पोलिथिन नै ठोंगा-झोरा
छोड़ रौ धनचक्कर
एडभान्‍स बनबाक चक्कर
पकड़ए अपन बाप-पुरुखाक देल हथि‍यार
धरे मौलि‍क संस्‍कार
केमि‍कलसँ नहा तँ लेबेँ
मुदा! की चि‍बेबेँ....?

mm


गजल १
कालरात्रि‍मे महमह दि‍नमान केना आएत
मोनमे पाप झबरल भगवान केना आएत

नै जड़ै प्राण वायु मरल सरल देह संग
अधम नीचाँ खसत धर्म गगनमे बि‍लाएत

माँझ आँगन काँटक बोन नै रोपू प्रि‍यतम
काग कोइली सन कोमल संतान केना पाएत

वि‍रह मासमे ने सोहर सोहनगर लगै छै
कंठमे पि‍त्त चभटल मधुगीत केना गाएत

अपने करू रास लीला नेना दूध बि‍नु कानए
कर्मभीरू पुरुखकेँ जयकार कहेन हएत

mm


गजल २
कहू की बात हम मानि‍नि‍ कलुष भऽ गेल अछि‍ अर्पण
केना सहबै अखल कंटक दबै छै टीसतर तर्पण

सोहाबै नै खुशी सरगम समाजक हास परि‍लक्षि‍त
धुनै छी देल कालक गति‍ गदराबै नै वि‍कल जीवन

पति‍त नि‍यति‍ आकुल भेलै जड़ल अर्णव तरंगे छै
सूतल ईश सभ पंथक एलै समभावमे वि‍चलन

बाहरसँ जे जत्ते गुमसुम हि‍आसँ ओ ओते बि‍खधर
चानन बहलै उषाकाले वाह रौ जहानक संकर्षण

भेटल जेकरा जेतए अवसरि‍ हाथ धोलक हलालीसँ
नीति‍क मंचपर चढ़ि‍ते करै माटि‍ नेह प्रति‍ गर्जन
mm


हाइकू
सूतल जग/  दिनकर लालिमा/ जगा देलक
रविक लाली/ /ऐ सूतल जहाँकेँ/ जगा देलक
बर्खाक बाद/ खहखह पाइन/ वसुधा तृप्त

mm
                                                      

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

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