Tuesday, January 14, 2014

‘विदेह'१४५ म अंक ०१ जनवरी २०१४ (वर्ष ७ मास ७३ अंक १४५)PART I

                     ISSN 2229-547X VIDEHA
विदेह'१४५ म अंक ०१ जनवरी २०१४ (वर्ष ७ मास ७३ अंक १४५)  

 

अंकमे अछि:-

  क्षणप्रभा








शिव कुमार झा टिल्लू









श्रुति‍ प्रकाशन
दि‍ल्‍ली













अपन छोटका कक्का
स्व. नवलकान्त झाक
चरण रजमे
सादर समरपित...



आमुख



क्षणप्रभाक अर्थ होइछ बि‍जरी जेकरा प्रबुद्ध जन तड़ि‍त कहैत छथि‍। हम कोनो नैसर्गिक कवि‍ नै, क्षणि‍क भावना कवि‍ताक रूपेँ अभि‍व्यक्त भेल जेकर प्रासंगि‍कताक ि‍नर्णए पाठकगणपर छन्हि।
हमर कहब मात्र ईएह जेे हमर ई पहि‍लुक प्रयास छी ऐमे काव्य लक्षणा ओ व्यंहजनाक अनुपालन भेल वा नै ऐ वि‍षयमे हम कि‍छु नै कहि‍ सकै छी, मात्र ईएह कहबाक लेल नीति‍ संगत हएत जे जइ भाषाकेँ बाल कालहि‍ंसँ ि‍हयामे लगा कऽ रखलौं ओइ भाषामे अपन कि‍छु अभिव्यक्ति पाठकगण लग परसि‍ रहल छी।
हमर जनम मातृक मालीपुर मोड़तरमे भेल, हाशमीजी ओइ गामक बगलमे शिक्षक छला, मालीयेपुर गाममे रहै छला, हमर बाबूजी स्व. कालीकान्त झा ‘बूच’सँ साहित्य साधनाक क्रममे बड्ड अन्तरंगता भऽ गेल छेलनि, पारिवारिक सम्बन्ध जकाँ। हमर बाल्यकालक उपनाम "टिल्लू" हिनके राखल छियनि, जखनि‍ हम नेना छेलौं (-५ बर्खक) तँ ओ हमरा कहै छला- "टिल्लू मियाँ राही, पेटमे कराही, आ दौगऽ हौ सिपाही" माए चन्द्र कला देवी सेहो मैथि‍लीमे कि‍छु पद्य लि‍खने छेली। बालकाल मातृकमे बितल, तेकर पछाति पैतृक गाम उदयनाचार्यक भूमि‍ करि‍यनक माटि‍-पानि‍मे रमि‍ आगाँ बढ़ैत गेलौं। पि‍ताक कवि‍त्वक कारणेँ महाकवि‍ आरसी, चन्द्रभानु सि‍ंह, प्रवासी, प्रो. नरेश कुमार वि‍कल, प्रो. वि‍द्यापति‍ झा, प्रो. राम कृपाल चौधरी राकेशसँ परि‍चए भेल। तेकर परि‍णाम छी ई छोट-छीन कृति‍।
धैनवादक पात्र छथि‍ श्रुति‍ प्रकाशनक संग-संग श्री गजेन्द्र ठाकुर आ उमेश मण्डलजी जि‍नकर सानि‍ध्यमे ई झुझुआन रचना संकलन मैथि‍लीक पटल सोझहा आएल।
संग-संग डॉ. शेफालि‍का वर्मा, श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, श्रीमती ज्योति‍ सुनीत चौधरी सन प्रवीण साहि‍त्यकार सेहो धैनवादक पात्र छथि‍ जनि‍क उत्साहवर्द्धनक कारण ई पोथी अपनेक हाथमे वि‍चार करबाक लेल उपस्थित अछि‍।
सादर
-शि‍व कुमार झाटिल्लू



ऋतुराजमे विरहिनी
 पिया केना कऽ बिततै फागुन मास अपार औ,
जीवन भेल पहाड़ औ ना......।

कोइली कुहकै ठाढ़ि पात
होइत मनमे अघात
एकसरि डूमि रहल छी, अहीं बिनु हम मझधार औ
जीवन भेल पहाड़ औ ना......।

 भ्रमरक गुंजन लागए तीत,
केहेन निष्‍ठुर भेलौं मीत
केना कऽ सूखि सकत ई फूटल अश्रुधार औ,
जीवन भेल पहाड़ औ ना......।

सखी सभ सदिखन अछि कवदाबए,
बिछुरन रोदन लऽ कऽ आबए
बिहुँसल यौवन पसरल मेघ आ अभिसार औ,
जीवन भेल पहाड़ औ ना......।

देखिते अबीर गुलालक रंग
विरह बनौलक कलुष उमंग
कहू केना उठत ई मृत शय्याक कहार औ,
जीवन भेल पहाड़ औ ना......।
mm






कंतक आवाहन
आजु मुदित मन बालारूण केर-करू मंगल गुणगान अय।
जड़ उपवनमे सुमन फुलाैल यौवन महमह भान अय।
श्रैंगारिक वेलामे सपनहिं
प्रियतम छूलनि कपोल हमर।
अर्द्ध निन्नमे चिहुँकल जहिना,
सासु मरोड़लि लोल हमर।
अभिनव औता आजु सुनल दुरभाषमे अपने कान अय।
जड़......।

झट उठि देखल धर्म मातृ केर,
आनन परिमल पुष्प बनल।
पूत दर्शनक आशमे डुमलि,
मंजुल मुसकी पनकि रहल,
चलू रम्भा भंडार चढ़ाबू हेता भुखल अहँक पराण अय।
जड़......।

असमंजसमे दुहु भैरवी,
मातृक लोचन सुधा भरल।
बामा हम तँ नेहक लुत्ती,
तनय अनल प्रेम धधकि रहल।
जननी हृदए छोहसँ आकुल स्वार्थहि हमर जहाँन अय।
जड़......।

चरण छूबि नाथक माता केर,
कएलौं चटपट स्नान हम।
कुमकुम केसर जूही चमेली,
कुलदेवी गमगम अनुपम।
देवकी नन्दन बंसी बजाबथु बोरि-बोरि द्राक्षा तान अय
जड़......।

संभवि अहाँ ननदि नै अनुजा,
बनि कम कएलौं ताप हमर।
नै तँ फँसि विरहक संतापे,
पीब लेतौं कखनौं जहर।
आनब उपहारेमे अहीं लेल विज्ञ, धान्यवर चान अय
जड़......।

mm


मि‍थि‍ला-पुत्र

मि‍थि‍लाक बेटीकेँ सहए पड़लनि‍
झमेलि‍या बि‍आहक दंश
सतभैंया पोखरि‍सँ पंचवटी धरि‍
ि‍कसुन तकलौं
केतौ ने भेटल
सभ राकश सभ कंश
नअ मास नै ‍
पैंसठि‍ बरख धरि
मयना उठबैत रहली
प्रसव वेदनाक टीस
तखनि जा कऽ भेल
जीवन संघर्षक जीत
दि‍वसेमे तरेगन बहकल
वि‍देहक आँगन जनमल जगदीश
मौलाइल गाछक फूल गमकल
तापसमे भैंटक लावा चमकल
पूर्वाग्रहक चपेटि‍मे
जाति‍-पजाति‍क गेँठमे
ओझरा कऽ मैथि‍ली
भऽ गेल छलि‍ ि‍नर्मूल
बेदम्म गजेनक आश जागल
सुखैत गुल्‍लरि‍मे फूल लागल
रमकल जि‍नगीक जीत
वैयक्ति‍क नै-
पसि‍झैत गामक जि‍नगी
मात्र मेंहथ आ बेरमा नै
मौरंगसँ सिमरिया धरि‍
चमकि‍ उठल इंद्रधनुषी अकास
केकरो नै छल बिसवास
द्विजक मुरदैयाक संग-संग
अछोपक सोती बहत...?
स्‍वाभावि‍क छल उपहास हएब
मुदा! ति‍रस्‍कारक क्षोभ नै
जीवन-मरण तँ प्रकृति‍स्‍थ लीला
तखनि केकरोसँ केहेन द्वेष?
अवतारवादक सेहो होइत पराभव
कियो पनही देत की नै
कोनो तृष्‍णा नै
नै उत्‍थानक आश
पतनसँ घृणा नै
अकाल भेल तँ बि‍साँढ़ चि‍बा कऽ
राि‍त-दि‍न समरसता दीप
जड़बैत रहल
अपन गीतांजलि‍ गाबि‍
कम्‍प्रोमाइज करैत रहल
कोनो कलुष कम्‍प्रोमाइज नै
गत्र-गत्रमे समन्‍वयवाद
कलमे टासँ नै
जीवन दर्शनमे सेहो
चलि‍ गेला भोगेन्‍द्र
नै तँ उत्तर भेटि‍ जइतए
यात्री, आरसी आ फजलुरसँ
सेहो कोनो तुलना नै
आन इचना-पोठीक कोन गप्‍प
लोक चानी नै टलहा कहए
विज्ञ नै बुड़ि‍बक बूझए
संस्‍कार नै छोड़ब
खाँटी कि‍सान मजदूरक रूप
ब्रह्म बेलामे कलम खियाबथि‍
सरल धबल बेरमाक भूप
एहेन साम्‍यवादी-
फाँसीपर चढ़ि‍ जाएब
मुदा बटोहीकेँ अधला
बाट नै देखाएब
केकरो नै सुनलक
संतति‍क कोन कथा
अर्द्धांगि‍नी सेहो सहैत रहली
ऐ लेलि‍नक सेहो देल बेथा
ने केकरो तर करब
ने केकरोसँ ऊपर जाएब
सबहक शोणि‍त एक्कहि‍ रंग
केलक वि‍रोध बेवस्‍था बेढंग
मरल गरीबक बाप मुदा की
पुरहि‍त-पात्रकेँ भरि‍गर चाही
धूर-धूर बास बि‍का गेल
काहि‍ काटि‍ लूटबैत बाहबाही
लेस मात्र नै दया अग्रजकेँ
सि‍हरि‍-सि‍हरि‍ अश्रु-उच्‍छवास
कहि‍यो नै अगि‍ला पएर पुजाबथि‍
केतए राम धर भूत पि‍शाच?
सभा बजौलनि‍ धानुक टोलक
अपनहि‍ जाति‍मे पंडि‍त देखू
भाँज पुराएब जटि‍ल कर्मकाण्‍डक
माइक समान नै धरती बेचू
मात्र बाटपर आनै खाति‍र
करै छथि‍ प्रति‍क्षण सामन्‍त वि‍रोध
सम्‍यक समाज मि‍थि‍लेमे बनतै
जगा रहला समभाव बोध
अक्षोपसँ नै गंग छुआबथि
तखनि केना कऽ हाड़ छुआइत
मन: दीपसँ हीयमे तकबै
मि‍थि‍ला पुत्रक स्‍पन्‍दन हएत......

सधवा-वि‍धवाक बीचक खाधि‍
भरबाक केलक प्रयास
भादवक अन्‍हारमे नै धारलकनि‍
उलबा चाउरक आश
बड़की बहि‍न राति‍-दि‍न
सुखाएल पोखरि‍क जाइठ पकड़ि‍
सरि‍ताक बाट जोहैत छेली।
केना स्‍वयंवर हएत
मकोबकी उद्वि‍ग्‍न छथि‍
मि‍थि‍ला पुत्र रत्नाकर डकैतकेँ
भकमोड़सँ सुपथ दि‍स
आनए लेल बेकल
मुदा केकरो नै सुनत
अपने बजन्‍ता अपने बुझन्‍ता
पंचवटीपर ठाढ़
शंभुदासकेँ तकैत
राति‍-दि‍न समताक
गीतांजलि‍ गाबैत
तीन जेठ एगारहम माघ बीतल
एक धाप जमीनक लेल वारंट नि‍कसल
वेचारी मनसारा बेथे बेथाएल
बेरमा कानि‍ रहल अछि‍
पि‍तृदोखसँ वि‍दीर्ण भऽ गेल तीनू पुत्र
कानि‍ रहल छथि‍ रामसखी
रघुवरक सहचरि‍ सन नाओं।

सीता सन उत्ताप
बरदास करए पड़तनि‍
मि‍थि‍लाक ईश
मि‍थि‍लाक ईशकेँ जनम देलनि‍
सुरक प्रभु सेहो कोइखमे
उमेश तँ सद्य: छथि‍
मुदा! जखनि‍ जगतक ईश
र्स्‍वे भवन्‍तु सुखीन:मे लगल रहत
परि‍वारमे अभावक भाव सोभावि‍क हएत
ई तँ हरि‍हर काका भऽ गेल छथि‍
ठीकेदार साहैब दऽ देलकनि‍ टैगोर
अन्‍चोक्केमे...। 
की ऐसँ समाजक दायि‍त्‍व पूर्ण भऽ गेल
नै कथमपि‍ नै
जे मि‍सि‍र जीक सि‍नेहकेँ
हीयसँ लगा लेलक
अपनाकेँ साम्‍यवादसँ दूर भगा देलक
नि‍रंतर सतबेधसँ
बाभन-सोलकनक खादिकेँ भरि‍ रहल‍
ओकरा टैगाेर बना कऽ नै छँटियौ
ओकर मि‍थि‍ला दि‍स तकियौ
वएह शांति‍ नि‍केतन
वएह ओकर विश्व भारती
तखने जनम लेत दोसर मि‍थि‍ला पुत्र
मुदा! अखनि‍ तँ असंभवे लगैत।
mm
(श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल जीकेँ समरपित...)


अतृप्त नैन
आकुल पड़ल विगलित नभ दिस तकैत,
छेलौं रैनि केर निर्वांणक प्रतीक्षा करैत।
केना काटब ऐ संतापी जामिनीकेँ,
ओ तँ छेली हमरे कटैत।
झकझोड़ि देलक अन्तर्मनकेँ
नैनाक पूछल अंतिम प्रश्न-
अहूँ अहिना करब की?

पददलित केलक विष रहित फनकेँ।
दुहू नैन नोरसँ सरावोरि,
देलनि हमर आत्माकेँ मड़ोरि।
निःछल करूणामयी भऽ भाव विभोर
देखए लगलौं अवलाक धधकैत ज्वार
सुनैत गेलौं सुनैत गेलौं।
निरूत्तर हमर बेथा क्षीण भऽ गेल-
मंचसँ नेपथ्य भरिगर लागल
की सोचैत छेलौं? वास्तविकता......।

चाननक सेजपर पड़लि अर्धांगिनी
धान्य, रजत, कांचन, भरल......।

मुदा! सदिखन खसैत् वेदना केर दामिनी?
छल अपूर्ण यौवन अतृप्त नैन
हा! तात केना कएल वरन
एक गाही वयसक सुकन्या केर
कंतक वयस पचपन......।

गामक चुलबुली मोनालिसा
कुहरि रहलि कनक गृहमे-
असहाय तातक देल विपदाकेँ 
भोगि रहलि जोगि रहलि।
केना पार करती लछिमन रेखा-
अपन विंहुसल हिलोरकेँ
केतए करती प्रस्फुटित
हमरासँ कएली अपन पीड़ा प्रकट
पाषाणी नर कऽ देलनि जीवन विकट
बूढ़ कंतक डोलि गेल आसन
शंकाक अजगर तोड़ि देलक प्रीति स्तंभ
कठोर आदेश देलनि अपन दाराकेँ-
आजुक पश्चात्पर पुरूषसँ गप्प
कथमपि नै करब
नै तऽ?
हम अचंभित सुन्न शिथिल
कलंकित चरित्र लऽ कऽ
धूरि गेलौं निःतरंग अपन पुरान पथपर
काॅपि रहल दुहु पग......।

कोन अपराध कएलौं
हम तँ छेलौं पोछैत नोर।
अतृप्त नैनसँ झहरैत नोर।

mm



कुरूक्षेत्रमे राधा
नवनीत अहाँ पतवार बनू ऐ करूस सरोवर जीवनकेँ,
ठिठुरल कदम्ब जमुना ठहरल सखी हँसी उड़ौल अर्पणकेँ।
आक्रांतित चहुँ दिस सुमन तरू,
विकल जड़ चेतन नभ धरती,
जल बुन्न बनल घन घनन घटा,
त्रासित राधा मन अछि परती।
नवनीत......।
सत् असत कर्म बीचि घूमि रहल,
सभ जनितो अहाँ अनजान बनल,
भेटत की जन संहारेसँ,
अवला चित्कार आ नोर भरल।
नवनीत......।
शापित करती ओ हिन्द सती,
जनिक नाथ लुप्त भू आंचलसँ,
संगहि करूणित वृन्दा-मथुरा,
लेब पाप सभक युद्ध माॅचत जँ,
नवनीत......।
खोलू रण कर्मक डोरा डोरि,
डुमू पीयूष राधा-रसमे,
उत्ताप प्रेम तिल सुनगि रहल
नै आब ई यौवन अछि वशमे
नवनीत......।
mm


मधु श्रावणी
मधुप विना सुन्न उपवन रे, मधुश्रावणी आएल।
कंत विनय विवश केतए रे हीय आरतीहराएल।

सुनू शिव छलिया स्वांगी बनि हमरा विरहएलौं,
संग महादेव नाम दियरकेँ कलंकित कएलौं
मधुप......।

हम कएल केतेक अनुग्रह रे अहूँ हमरा वचन देल,
मंजुल मिलन केतए गेल रे, केतए बात कलित गेल,
मधुप......।

हम अभागलि मैथिली रे, अपनै देल घात,
नुपूर खनकि दुःख कातर रे, तोड़ल दामिनी गात,
मधुप......।

विकल मल्हार सुनि शिव, आनन हँसीसँ उमड़ाएल,
जुनि हहरू सिये, अहँक लखन रघुवर संग आओल,
मधुप......।
mm


बरहमासा
प्रियतम आकुल कुम्हरल दारा मन,
टिहुकि उठल ना।

मूक शिशिर पुचकारथि केना?
दूर द्वीप सजना।
जामिनी बनल कंत बिनु विजन,
तरूणी माघ मनाैल क्रन्दन,
सरस वसन्त क ललित रात्रिमे-
हहरै कंगना।
प्रियतम......।

दादुर ठहकए तृप्ति सरोवर,
अश्रुधारसँ सींचित कोबर,
कीर मृदुल सुनि चैतो बीतल,
विह्वल नैना।
प्रियतम......।

अहँसँ सिनेहक धंधा कएलौं,
पौन आस बैशाख बुड़एलौं
हृदैक मीन नीर बिनु व्याकुल -
सुन्न पलना।
प्रियतम......।

जेठक रौदी काटि रहल छल,
सूखल कानन झाँटि रहल छल,
उदधि अकासे जलसँ तिरपित-
लवालव अँगना।
प्रियतम......।

सौन-भादो मौन मनाैल,
तुहिन गात तर आश्विन आएल,
कातिक-अगहन बिहुँसथि -
पूस मांगै छथि ललना।
प्रियतम......।
mm



कोप भवनमे कनियाँ
रूसलि किए सूतलि छी बनबू ने कनेक चाय अय।
मिथिला हम चललौं, टाटानगरीसँ आइ अय।

अहाँ जौं एना रहब तँ हम केना जीअब,
सदिखन कनिते-कनिते बेथे जहर पीअब।
एना अहाँ रूसब तँ हम कऽ लेब दोसर सगाइ अय,
मिथिला......।

अहाँ केर रूप देखिते कामदेवो कानैत छथि,
‘‘
मृगनयनी‘‘ केँ ओ उर्वशी मानैत छथि।
बिहुँसल मादक घुघना लागै लौंगिया मिरचाइ अय,
मिथिला......।

छगनलाल ज्वेलरीसँ कनक हार लाएब,
आजु रैन पूनमकेँ, पार्कमे घुमाएब।
हहरल मनक तृष्णा, नै बनू हरजाइ अय,
मिथिला......।

ऊठू प्रिये, अहाँ जल्दी नहाबू,
कोप भवनसँ उठि कऽ लगमे आबू।
मंदहि मुस्की मारू, हम अनलौं अछि मलाइ अय,
मिथिला......।
mm


प्रेयसीक विलाप
लागै बरखा इन्होर,
मारै बएसक जोर,
मिलनक आशामे बैसलि -
छी आबू ने चकोर।
 बाटे तँ तकिते तकिऐ,
नैन सूखि गेलै,
प्रेयसीक विलापपर नै-
अहँक धियान एलै।
ठनका गर्जय मांचल शोर,
तिरपित नृत्य मोरनी मोर।
मिलनक आशामे बैसलि,-
छी आबू ने चकोर।
बेदर्दी जुनि बनू,
मोन टूटि गेलै।
पावसक शीतलता -
आतप्त भेलै।
लुप्त भगजोगिनी दर्शय भोर,
लटकल मेघ गगन घनघोर,
किएक हृदए तोड़ि रहलौं।
हाँ! हम्मर मन चित चोर।
mm



लंका
खुरखुर भैया सूट सियौलनि,
बतही काकीक हाथ रूमाल।

अध वयसि चोकटलही भौजी
,
बाट पसारलि प्रेमाजाल
मैथिली कुहरथि पर्णकुटीमे
,
सूर्पनखा बनली रानी।

नेना पेट क्षीर बिनु आकुल
,
मोबाइल नचाबथि पटरानी।
अर्द्धांगिनी नेत्रीसँ कुपित भऽ
शंखनाद केलनि मामा।

हस्त ऊक लऽ मामी खेहलथिन्ह
,
फूजल मामा केर पैजामा।
अपन पुतोहुकेँ झोंकि अन लमे
,
बनि गेली गामक सरपंच।
धर्माचार्य देव मंदिर केर
,
मुदा हृदए भरल परपंच।

केतेक घरमे सान्हि काटि
,
शांति समिति केर आब प्रधान।
रक्षक छथि चुटकीमे बैसल
,
केना बाँचत अवला केर मान
?
विद्यालयकेँ  मुँह नै देखल
,
धएने कुरसी शिक्षा सचिव।
कुटिल तंत्र केर ईह लीलामे
मारल गेलनि मूक गरीब।

मुंडी इनारमे हुरहुर जनमल
,
कमीशन लागत दस परसेन्ट।
नौकरशाह मोटरमे घूमथि
,
आँखि गोगल्स काँखिमे सेन्ट।

सभ काजमे दियौ भेँट
,
शौच करू वा लघुशंका।
रामराज्यकेँ बिसरि जाऊ
,
आर्यावर्त आब सद्यः लंका।
राजनीतिमे अज्ञ-विज्ञ केर
,
नै कोनो अछि वर्ग विभेद।
अपने पीबथि ताड़ी दारू
,
मंत्री विभाग मद्य निषेद्य।

राग वसंतक गेल जमाना
सुनू ब्रितानी विकट संगीत।
डंकल कुरथी पाक बनल
आ अप्पन वारिक पटुआ तीत।

mm



होरी
हाथ अबीर काॅरव पिचकारी,
भालपर गदरल चाह उमंग।
पूरन भैया होरी खेलथि
,
नव नौतारि सारि केर संग।
कखनौं डुमकी लैत अधरमे
,
जुट्टीमे कखनौं हिलकोर।
नील
, वैंजनी लाल गुलालसँ,
रंगलनि चम्पा पोरे-पोर।

टिल्लूनैनपर अचरज पसरल,
देखि भ्राता केर बसन्ती वुन्न।
एखनौं श्रृंगारक आह भरल मुदा -
आँखि अन्हार कान छन्हि सुन्न।
हम पुछलयनि केना कऽ कएलौं
,
मधुसँ उगडुम मधुर प्रबंध।
सकल तन अछि बेकार मुदा हम
,
ध्राण शक्तिसँ सूॅघल गंध।
भौजी लऽ बाढ़नि आ खापड़ि
,
झाड़ि देलनि भैया केर अंग।
कुरता फाटल नैन नोरायल
भूतल खसल होरी के रंग।

mm


माॅडर्न जमाना
नुआ धोती मिल बरहर जनमल,
आएल बरमूडा मिनी स्कर्ट।
मुन्ना भैया चुनरी ओढ़ू
,
भौजी पहिरलनि जोलही सर्ट।

काकी मरौत काढ़ने बैसलि
,
काका गर धरम केर वाना।
कदली कनियाँक हाँथमे वीयर
,
आबि गेल माॅडर्न जमाना।

भरि दिवसक गणना जौं करबै
,
बहुआसिनक सात बेर सतमनि।
भरल साँझ स्वामी आएल छथि
,
अॅइठार बैसलि लऽ मुँहमे दतमनि।

अस्सी दशकमे मायसँ मम्मी
फेर माॅम आब भेली मम्मा।
मायक भ्राता केर नाम की राखब
?
मामा पिघलि बनला झामा।

अपन नेनासँ बेस पियरगर
,
संकर झवड़ा चायनीज कुकुर।
भुटका-नाथकेँ छाड़ि घरमे
टाॅमी संग गेलि अंतःपुर।

चरण स्पर्श निर्वांण लेलक आब
,
छुट्टो कैंचाकेँ भऽ गेल वाय।
भौजी एकसरि मधुशालामे
भैयासँ गेलनि मोन अघाय।

नेना पच्छिमक बोली उगलै।
माँ मैथिली केना बजती दैया।
बात अंगरेजिया माथ घुसल नै
,
मुदा करै छथि याँ! याँ! याँ

तिलकोर मखान नीक नै लागए
,
नै सुस्वादु मकैयक लावा।
पाॅपकाॅर्न चाउमीन दलिया लेल
,
मोँछ पिजौने बैसलनि बाबा।

mm



ऋतुराज
सोहर गाबथि कोइली बहिना,
कीर मधुर ध्वनि बजबथि साज।
जननी वीणा वादिनी हर्षित
,
अवतार लेलनि सद्यः ऋृतुराज।
गर्वित उपवन मधुपक गुंजन
,
वर्णक पुष्पक दिव्य सोहनगर।
सरिता लवलव शांत उदधि छथि
,
महु रसालमे उमड़ल मज्जर।
माघक सातम धवल इजोरिया
,
भेल नवल ऋृतु नृप छठिहार।
चिनुआर भरल पायस पूआसँ
,
कुलदेवी साजल उपहार।
भगजोगिनी केर पंचम सुर सुनि
,
आँगन महमह मुग्ध दलान।
दशो दिस मलमल गेना फूलल
,
सरिसब बूट भरल खरिहान।
रवि संग सुषमा अछिंजल उष्मा
,
पात-पातपर पछबा वसात।
विरहिनी बैसलि कंत आशमे
वयः तापसँ उपटल गात।
मातु उमा मन मुदित विभूषित
,
सजल नुपूर चरण चमकल।
शिवरात्रिक अवाहन भेलै
,
नाथ कुशेश्वर छथि गमकल।
संवत जड़ल आ होली आएल
,
अबीर गुलाबी हरिअर लाल।
क्षितिज धरित्री एक बनल छथि
,
ढोलक डुग्गी झाॅझक ताल।
छोट पैघ केर भेद मिटाएल
,
वृद्ध जुआन संगमे बाल।
छोटकी कनियाँ ठोर रंगलि आ -
बरक भरल पानसँ गाल।
भैया भांग सुधामे सानल
,
शिथिल पड़ल छथि माँझ ओसार।
रंगलौं हम भौजीक चरणकेँ
,
विदा बसन्त ऐ लोकसँ पार।

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नवतुरिया होरी
बाढ़िक पसाहीमे डुमल सगरो मिथिला धाम।
बागमती करेहक आंतमे, ओझराएल हम्मर गाम।
भदैया संग रब्बी बुड़ल, जिरातमे फाटलि गंग।
बीति गेल फागुन मुदा, ऊँच जोताँस जलमग्न।
नेना टोली हेरि रहल, सम्मत लेल खर पतवार।
रामू बाबा सूतल खाट पर, ऊड़ल खोपरिक चार।
पौत्रक नीन जहिना फूजल, झमाड़ल कुंभकरण।
झट सनि ऊठू औ बाबा देखू नभ तरेगन।
राम लोचन दौड़लनि गाड़ि पढ़ैत बड़ी पोखरिक मोहारि।
बनि कपीश नेना भुटका देलक खोपड़ी जाड़ि।
लालिमा देखि आदित्यकेँ कदबा कएल दलान।
शंभू रंगलनि गोबर थालसँ छोटका पाहुनक कान।
तीन फुटिया लाला पैघ खोंचाह, हाकिमपर फेकल रंग।
फूदन चिनुआरक घैलमे, मिलाैल चिन्नी भंग।
भरि कठौत पायस भरल, घिवही पूआ केर संग।
भौजी तन बोरल गुलालसँ, उमड़ल मातृ उमंग।
चैतावर टिटही तानमे, गाबथि टलहा दल।
छोट छीन गुंजन-सुमन्त, घूमथि भूत बनल।
सा रा रा रा गूंजि रहल लूटकुन जीक बथान।
सियाराम जय गानसँ गमगम मैथिल दलान।
डाक्‍टर भैयाक सारपर ढ़ारल कारी मोबिल।
देखि नेना गण केर होरी गहुमनो घुसि गेल विल। 
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चैतावर
आएल चैत मधुर रंग पाँचम,
उपवन बुलबुल गावय ना ......।
सन-सन पुरबा मलय वसात,
झन-झन देह झनकाबए ना......।
कुहकै कुक कोइली बबुर वन,
चहकै अलि पाटलि मधुवन,
फड़कै मोर मोरनि लोचन,
फनकै मृगी पद फन-फन,
भन-भन मन भनकावय ना।
सन-सन......।
भाविनी खिलायलि गहवर,
वहिना मुदित हीय फरफर,
सखी नेह मातलि कोहवर
भौजी रेह गाबथि सोहर,
क्षण-क्षण तन छनकावय ना।
सन-सन......।
प्रियतम बेथित ई आखर,
नोरक सियाही झरझर,
कोमल शय्या भेल खरखर,
सुखि देह वक सन पातर
कण-कण पट सिहरावय ना।
सन-सन......।
उपटल फागुन केर रस बून,
हहरल नुपूर स्वर झुन-झुन,
विकल नैन भेल अधर सुन्न
अछि कोन कांतामे अवगुन?
घन-घन घट सनकावय ना।
सन-सन......।
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व्रत एकान्त
लूटकुन जी केर चकचक भाल,
कपोल सिनुरिया बनल रसाल।
टीशन चलला लऽ घटही कार,
आबि रहल थिन्ह सासु आ सार।
छहछह तन मन भरल उमंग,
गृह घुरलनि विधि माताक संग।
झटपट शांभवि चाह बनाबू,
पहिने रूहे आफजा लाबू।
मम्मी छथि बड़ जोड़ पियासलि
भूक्खे समस्तीपूरसँ मैसूर आयलि।
जलखै सेबै दलिपूड़ी क बोर,
मझिनी भुजल परोर आ इचना झोर।
जुनि करू अकरहरि श्रवण जमाय,
अहँक सासु तँ हमरो माय।
माय हमर आडम्वरि धर्मी,
सनातन पालिका संग षट्कर्मी।
मतिसुन्न लक्ष्मीनाथ बजार गेलनि,
फुलल परोर माँछ इचना लेलनि।
देखिते भरल माँछक झोरा,
फुजलनि सासु वन्न मुँह बोरा।
पाहुन देलखिन घर घिनाय,
केना करब हम नहए खए?
काल्हि हमर छी व्रत एकान्त
मछैन गृह केर सगरो प्रान्त।
फेकू माँछ सटल तरकारी,
ग्ंागाजलसँ धोयब आँगनवाड़ी।
गैस चढ़ल अन्न नै खायब,
बौआसँ अंगूर सेव मंगाएब।
काल्हुक लेल चाही आमक चेरा,
माटिक चूल्हि आ बाँस चंगेरा।
सिंगापूरी नै चिनियाँ केरा,
शुद्ध सुधा गुड़ सानल पेरा।
शांभवि ई मैसूर नै गाम,
केतए हम ताकू जारनि आम?
विकट भेल रवि व्रत एकान्त,
ऐ चक्कर हमर जीवन अशान्त।
लूटकुन माथमे शोणित अटकल,
भाय वहिन मुँह मुस्की फटकल।
हम की करब सभ दोष अहाँकेँ,
पावनि मास किएक बजौलौं माँ के?
ताकए चललनि कर्नाटक केर गाम,
हाँथ चूल्हि माँथ गठरी आम।
सोझहे आबि खाटपर खसलनि।
शांभवि जोर ठहक्का हँसलनि।
सुनू प्रिये तारू सूखल अछि,
जल बिनु हम्मर हीय विकल अछि।
एहेन बेथा नै हँसि उड़ाबू,
त्रास कंठगत नीर पियाबू।

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अनाचार
बिहुँसल विजुकल दुष्यन्तक मन तनए गड़ल अछि थालमे।
न्याय-धर्म भू हिन्द घेराएल अनाचार केर जालमे।
परदारा आ परक द्रव्य दिस,
अधम कुलोचन हुलकि रहल।
राजकोष केर बात की कहू?
श्वेत वस्त्र बीचि फुदकि रहल।
जनतंत्रक आंचर वसुधापर मुस्की कौरव भालमे।
न्याय ......।
उदयन दर्शन आब अलौकिक,
भेल विदेहक कथा विलुप्त,
सभजन लागल भौतिकतामे
बुद्ध अयाची पुंज शुशुप्त,
खर खबाससँ मालिक धरि नाचय कैंचा केर तालमे।
न्याय ......।
काटर लऽ कऽ गृहस्थ धर्मकेँ,
पालन कऽ रहलनि मनुसंतान।
जानकी माता पातरि सजाबथि,
मधुशाला पैसलनि हनुमान।
गर्भक कन्या भ्रूण हत्यासँ समायलि कालक गालमे।
न्याय ......।
जाति, पंथ, भाषा विभेद ई,
प्रजातंत्रकेँ साड़ि रहल।
कुटिल राजर्षिक चक्रव्यूह,
अपने अपनाकेँ जाड़ि रहल
देवभूमिकेँ दियौ मुक्ति फँसि गेल दलालक चालमे।
न्याय ......।
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अभिनव मिथिला धाम
‘‘माँ मिथिले अभिनव मिथिला धाम।
अहँक कोरकेँ छोड़ि आब हम,
नै जाएब दोसर ठाम।
माँ मिथिले......।

वौरएलौं सगरो आर्य भुवनमे,
केतौ ने भेटल चैन।
अकबक विकल दिवस दुःख भोगलौं,
तमस कटै छल रैन।
माँ मिथिले......।

नवटोल नववोल देखलौं नवल चालि,
भाउज भावहुक नै भान।
तात पूत एक्के संग बैसल,
करथि सुरारस पान।
माँ मिथिले......।

मैथिल दीन जनेर फँकै छथि,
मुदा देव पितरक मान।
छोट पैघ बीच‍ लक्षिमन रेखा,
नै केकरो अपमान।
माँ मिथिले ......।

उदयनसँ दर्शन सीखि बाँटब,
अयाचीसँ, आत्म सम्मान।
भारती मंडनसँ ब्रहम ज्ञान लेब,
आरसी यात्रीसँ स्वाभिमान।
माँ मिथिले ......।

उर्मि धिआक त्याग देखिक,
कण-कण भाव विभोर,
वैदेहीक सती धर्मसँ उमड़ल,
कमलामे हिलकोर।
माँ मिथिले ......।

गोविन्द मधुपक सुनब पराती,
खोलि क दुनू कान।
शिव शक्तिकेँ श्रद्धासँ पूजव,
सुनबैत विद्यापति गान।
माँ मिथिले......।

खोरा चाउर संग भाटा अदौरी,
वथुआ तिलकोर मखान।
आचमनि श्वेत वलानक जलसँ,
गलोठि पतैलीक पान।
माँ मिथिले......।

आन धामसँ रास सोहनगर,
कुलदेवी क गहवर।
पच्छिमक त्वरित गीतसँ रूचिगर
अपन वैन सोहर।
माँ मिथिले......।
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हे तात
विलखि रहल छी अन्हर जालमे,
छोड़ि कत चलि गेलौं तात।
कॉपि रहल छथि सूर्यमुखी आ,
कुहरथि वृद्ध कनैलक पात।
टोलक सभटा नेना भुटका,
आश लगौने घूमथि वथान।
के देत उदयन धामक पेड़ा,
के देत मिठगर मगही पान।
पंडित बाबा खाट पकड़लनि,
ककरा मुखसँ सुनता गान।
श्यामजी अश्रु इनारमे पैसलनि,
आब के कहतनि पैघ अकान।
आर्या माँक दुआरि सुन्न अछि,
सत्संगी सभ ओलतीमे ठाढ़।
भक्ति सागरक धार विलोकित,
लुप्त गगनमे अहँक कहाँर।
अनसोहाँत ई दैवक लीला,
केना बनौलनि मर्त्य भुवन?
विज्ञानक आँगनसँ बाहर,
जन्म मरण जीवन दर्शन।
करती केना श्रृंगार मेनका,
करतनि के रूपक वर्णन।
देवराज छथि कोप भवनमे
जल बिनु करब केना तर्पण?


मुख मलीन कहियो नै देखलौं,
सुख दुखसँ अहाँ विलग विदेह।
अंतिम भीख मॅगै छी बाबू,
दर्शन दियौ एक बेर सदेह।

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आत्म उद्बोधन
अहाँ अपने पड़ल छी घोंटि धथुर कैलाश औ,
टुटल हम्मर आश औ ना।
धरापर अएलौं प्रदोषक दिन,
मातु-पितु अहँक भक्तिमे लीन,
बूझल सभ जन वम वम लेलनि हमर घर वासऔ।
टुटल ......।
नेन कालहिंसँ छी हर भक्त,
सुखाएल करम-धरममे रक्त,
शारदालीन संगमे शंकरपर विश्वास औ।
टुटल ......।
देखिते वितल सुधामयी बर्ख,
जीवनसँ दूर भागि गेल हर्ख,
जननी उठलि भूमिसँ छोड़ि मोहक पाश औ।
टुटल ......।
चहुँ दिस कालक भेल प्रहार,
करम गति फॅसल बीच मॅझधार,
उदधि मरूस्थलि भेली हीयमे पसरल त्रास औ।
टुटल ......।
आशुअछि मात्र अहींसँ मोह,
होईछ अपन भागपर छोह,
हरू दुःख वा करू हम्मर निरस जीवनक नाश औ।
टुटल ......।
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केना कऽ अंतिम नमन करब  
(कन्या भ्रूण हत्यापर एक छोट रचना)

केना कऽ अंतिम नमन करब,
आँचरकेँ अहाँ कलंकित कएलौं
पुत्र जन्म सेहंतित सपनामे
करूणाधारिणी निर्दयी भेलौं।
नै देखलौं आदित्य नै शशिक शिखा,
नै नभ देखलौं नै देखलौं वसुधा
नै भेटल छोह नै मृदुल क्षेम,
नै मोती माणिक्य रजत हेम,
पाँच मास अहँक गर्भमे रहलौं
जनपरिजनक तिरस्कार सहलौं
अपैत बूझि कएलौं अहाँ गर्भपात
भेल अपूर्ण नेनापर वज्रपात
अछि कोन ओ शक्ति मनुसुतमे
जे बेटीमे नै दर्शित भेल
मणिकर्णिका क शंखनाद सुनिते
वृद्ध कुंवरक यौवन झट धुरि गेल
दुःख एक्के बातक तातप्रिया
सृष्टि देलनि संततिकेँ गरल पिआ
पावन आर्यभूमिक सुनयना
वैदेहीकेँ देली माटि मिला
भववंधनक ई केहेन दर्शन
नीर क्षीर बिनु बितल जीवन
तजि गेल प्राण तँ अनल अर्पण
अमिय मधुसँ पुत्र कएलनि तर्पण
एक बेर हमरो जौं कहितौं अहाँ
जीवनमे सुधा वोरि देतौं माँ
देतौं सतरंगी परिधान
पुत्रसँ वढ़ि कऽ करितौं सम्मान
दिअ आशीष हमर जननी
फेरि वेटी बनि नै आवी अवनी
नै सूखए पुनि नव किसलय दल
नै जलसँ पहिने भेटए अनल।

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पावस
लगिते आतप अनल ज्वालसँ,
पसरल सगरो हाँहाँकार
तरूण-वरूणक अग्निवेशसँ
जीव-अजीवमे अशंातिक ज्वार
मोन विरंजित हृदए सशंकित
वनल सरोवर कलुष मसान
सूखल किसलयक कोमल कांति
धधकि रहल नव लता वितान
नष्ट करब ऐ प्रलय भयंकर
प्रकट भेलनि अपने देवेश
घन घन घटाक संग आगमन
शीतल पावस बूनक बेस
नव रंग नव धुन नव मुस्कान
घुरल सृष्टिमे नवल जान
पुष्प खिायलि कांचन उपवन
फूरल भ्रमरकेँ मधुर गान
मंातलि सरोवर कलकल सरिता
नूतन नीरक खहखह धारा
आएल कृषकमे दिव्य चेतना
भागल वेदनाक पुरा अँधियारा
पंकज प्रस्फुटित भेल सरोवर
वकः काक चित शांत सोहनगर
भरल घटामे मोर मजूरक
नाच मधुर बड़ लागए रूचिगर
गोधूलिक पवन वेगमे
चहकि उठल भगजोगिनी
वयः तापमे उमड़ि गेलि
मिलनक वियोगमे तरूणी
उन्मत्त घटा संग मधुर प्रेममे
नर-नारी भऽ गेल विभोर
दुई मासक ई रूचिगर पावस
उमड़ाैल नव सृष्टिक जोर

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गीत
पिया निर्मोही खनकि गेल कंगना,
विपुल मृगी नैना,
किएक अहाँ बनलौं औ -
प्रवासी सजना।

आगि भेल शीतल उधिया रहल पानि,
सुवासित जीवनमे उफनि गेल ग्लानि,
सुन्न प्रेयसीक सिनेह हृदए अँगना,
विपुल मृगी नैना ......।

उमड़ि रहल विरह प्रखर आतप समान,
मुरूझाएल शुष्क अधर मरूघटमे प्राण,
धँसल बान्ह मर्यादाक सजना,
विपुल मृगी नैना ......।

क्षणहिमे जीवन अभिशापित वनल,
सूखि गेल नेह पुष्प नोरसँ भरल,
आब कहि ने सकव हम सजना
विपुल मृगी नैना......।

mm


काका औ (बाल कविता)
सिबू मरसएब बड़ मरखाह छथि
छक्का छोड़ौलनि काका औ
दाँत कीचि दुनू भौं सिकुड़ाबथि
हाँथमे नरकटिक सटक्का औ...
भूगोलक पहरि संस्कृत वचै छथि
क्षणे-क्षण नोंइस लऽ हाँफी छिकै छथि
पंचतंत्रपर करथि टिटम्भा
विष्णुशर्मासँ नमछर खम्भा
बरहर गाछ तर गदहा बना कऽ
पाँछासँ मारथि धक्का औ...
जखनि कोनो छन्दक अर्थ पुछै छी
कहै छथि कुकुरपर लेख लिखें रौ
कहू तँ केना हम एक्के पहरिमे
रंग-बिरंगक बयना सीखू
हाँथ मचोरि पीआठपर देलनि
बज्जर सन दू मुक्का औ...
मुरुखे रहब आ महिस चराएब
कहियो नै ओइ इसकुल जाएब
एहेन राकससँ जान छोड़ाउ
भरि जिनगी अहँक गुण गाएब
बजै छी किछु जौं नजरि झुका कऽ
खिसियाबथि कहि भूतक्का औ...।
mm




हिंसक नानी
खापड़ि बेलना केर कहानी,
आब नै दोहराबू अय नानी।

नाना बनल छथि सियार,
भक् छथि जेना हुलुक बिलार,
दंतक गणना घटि कऽ बीस
हुरथि गूड़-चूड़ाकेँ पीस
गाबथि दारा दरद जमानी।
आब......।

वरन् केर बर्ख भेल चालीस,
अर्पित अहँक चरणमे शीश,
अहाँ लेल लबलब दूध गिलास,
नोर पीबि अपन बुझाबथि त्रास,
क्षमा करू! छोड़ू आब गुमानी।
आब......।

अवकाश क बीति गेल दस साल,
पेंशनसँ आनथि सेब रसाल,
भरि दिन पान अहाँ केर गाल
ऊपरसँ मचा रहल छी ताल,
चमेलीसँ भीजल अछि चानी
आब......।

केतेक दिन सुनता पितृ उगाही,
संतति पूरि गेलनि दू गाही,


मामा मामी क बिहुँसल ठोर,
माॅ छथि, चुप्प! साधने नोर,
केना बनि जेता आत्म बलिदानी
आब......।

mm


चश्‍माक बोखार
सोलहममे कएल अंतःस्‍थ प्रवेश,
हुलसल मन गेलौं नवल देश।
हीय बसथि कला धएलौं विज्ञान,
राखल जननी इच्‍छाक मान।
वैद्य अंगरेजियाँ बनि बचाबू दीनक पराण,
अर्थहीन मिथिलामे बढ़त शान।
धऽ धियान सुनल सृष्‍टिक इच्‍छा,
गाँठि बान्‍हि लेलौं लऽ गुरुदीक्षा।
कॉलेजमे बीतल पहिल सत्र,
आओल तातक आदेश पत्र।
पढ़िते आबू अहाँ अपन गाम,
हैत ज्‍येष्‍ठक बि‍आह विद्यापति धाम
तन झमकि गेल, मन गेल गुदकि
भौजीकेँ देखबनि हम हुलकि।
आगत रवि पहुँचल जनम ग्राम,
शत अभ्‍यागत छथि ताम-झाम।
चहुँ-दिस भऽ रहल चहल पहल,
चिन्‍ह-अनचिन्‍ह सखासँ भरल महल।
एक नव नौतारि बहुआयामी,
पूछलसँ छथि छोटकी मामी।
प्रथमहि हुनकासँ भेँट भेल,
भेल दुनू गोटेमे क्षणहिं मेल।
साँझे औती दीदी अनिता,
आकुल माँ केर एक मात्र वनिता।
देखिते देखैत आबि गेल साँझ,
माँ तकिते बाट ओसार माँझ।
दीदी आँगन आएल हँसिते हँसैत
माँ गर लगौलनि ठोहि कनैत।
हिनक नैन हेराएल रिमलेसमे,
देखि मामी पड़लनि पेशोपेसमे।
चश्‍मामे सुन्‍नर दाईक विभा,
बढ़ि रहल हिनक नैनक शोभा।
मामी! ई सऽख नै आँखिक इलाज,
माँथ दर्दसँ छल बाधित सभ काज।
सुनि मामी मोन भऽ गेल अलसित,
हुनक बाम आँखिमे पीड़ा अतुलित।
नोचिते नोचैत भेल नैन लाल,
दर्द पसरि रहल सम्‍पूर्ण भाल।
आँगन दलान पीड़ा किल्‍लोल,
आँखि धोलनि लऽ जल डोले डोल।
फूलि गेल नैन केर अधर पल,
हम सेकलौं लऽ गुलाब जल।
वैद्यो आएल नै कोनो असरि,
कछमछ कऽ रहली-रहली कुहरि।
माते केलनि बाबूजीक ध्‍यानाकर्षण,
आँगनमे आबि ओ दऽ रहला भाषण।
सभ दोष सारक नै दैत धियान,
वयस तीस मुदा एखनौं अज्ञान।
रक्‍त जमल विलोचन झिल्‍लीमे,
सैनिक कंत पड़ल छथि दिल्‍लीमे।
सरहोजिसँ पुछलनि पीड़ाक काल,
पहिल बेरि भेल छल परूॅका साल।
माँ सऽ कहलनि लाउ नव अंगा,
हिनका लऽ जायब दड़िभंगा।
तिरस्‍कार करब नै हएत उचित,
कनियाँ दरदसँ अति बिहुँसित।
काल्हि अछि बिआह अहाँ जुनि जाऊ,
करैत छी उपाय नै घबराऊ
भोरे टिल्‍लू' जेता हिनक संग,
नै बिआहमे कऽ सकलनि हुड़दंग।
भातृक सासुर जेता चतुर्थीमे,
मातृ आदेश लागल हम अर्थीमे।
नै बात काटल शांत छेलौं सुनैत,
राति बितल सुजनीमे कनिते कनैत।
कोन बदला लेलक बापक सार,
अपन संकट बान्‍हल हमरा कपार।
मामीकेँ हम नै चीन्‍हि सकल,
भीतरसँ इन्‍होर ऊपर शीतल।
नै जा सकलौं हम वरियाती,
गाबै छी हुनक दुःखक पाँती,
भोरे उठि दड़िभंगा जा रहलौं,
नैनक शोणितसँ नहाँ रहलौं।
पहुँचल डाक्‍टर मिसिर केर क्‍लिनिक,
चक्षुक चिकित्‍सक सभसँ नीक
दुआरेपर कम्‍पाउन्‍डर नाम पुछल,
मामी नुपूर कहलनि ओ कुकुर लिखल।
देखएमे भलपर वज्र बहीर,
उपरि मन हँसल, भीतर अधीर।
वैद्य मिसिर कहल नै दृष्‍टि दोष
दुहू आँखिए देखै छथि कोसे-कोस।
नेत्रक आगाँ नै अछि अन्‍हार
हिनका लागल चश्‍माक बोखार।
हम लिखि दैत छी शून्‍य ग्‍लास,
बुझा दियनु हिनक रिमलेशक प्‍यास।
ताहूसँ जौं नै हेती नीक,
आँखि सेकू बनि सिनेही बनि कऽ,
अधरपर मुस्‍की आगाँ अन्‍हार,
कानल मन सोचि बिआहक मल्‍हार।
डाक्‍टर बनऽ केर तृष्‍णा मनसँ भागल,
एहेन मरीज भेटत तँ हएब पागल।
धुरि गाम माता केर करब नमन,
तोड़ू जननी हमरासँ लेल वचन।
चशमिश नैन मामी छथि अति गदरल,
हमर योजना हिनक भभटपनमे उड़ल।


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"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २२४ म अंक १५ अप्रैल २०१७ (वर्ष १० मास ११२ अंक २२४)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -    मैथिलानी केर उपराग राम सं आ समाज ...