Tuesday, January 14, 2014

‘विदेह'१४४ म अंक १५ दिसम्बर २०१३ (वर्ष ६ मास ७२ अंक १४४) PART I

                     ISSN 2229-547X VIDEHA
विदेह'१४४ म अंक १५ दिसम्बर २०१३ (वर्ष ६ मास ७२ अंक १४४)  

 

अंकमे अछि:-

                                                       

 नढ़िया भुकैए हमर घराड़ीपर
( गजल संग्रह)

जगदानन्द झा मनु


                                              
                          श्रुति‍ प्रकाशन













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समर्पण
नढ़िया भुकैए हमर घराड़ीपर  सादर समर्पित अछि हुनक सबहक श्रीचरण कमलमे जे अपन माटि पानिसँ दूर होएबाक बिछोह अपन करेजमे समटने छथि।
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दू आखर
आदरणीय रसिकजन सादर प्रणाम। अपनेक हाथमे हमर  कोनो तरहक   पहिल  पोथी अछि। हमरा हेतु हार्दिक हर्खक गप्प अछि। नीक बेजाए केहेन से तँ आब अपने लोकनि कहब। जेनाकी अपने सभ जनैत छी गजल मने प्रेम, प्रेम मने जीवन, एहिठाम हमर प्रेम अर्थात हमर जीवन मिथिलाक माटि पानिसँ अछि। एहि संग्रहमे हम मिथिलाक माटि पानिसँ सरोकार रखैत विषयबस्तु परसने छी। समाजक स्थिति देखाबैक प्रयास केने छी। कोनो रचनासँ जँ किनको मोनकेँ ठेस पहुँचनि तँ हम क्षमाप्राथी छी अन्यथा  नहि लेब, मात्र संजोग अछि।
हम गजलक ओस्ताज नहि, मात्र एकटा विद्यार्धि छी। गजल व्याकरणक वा गजल नियमाबलीक पूर्ण एवं शुद्ध ज्ञान सिखैक इच्छुक, विद्यार्धि, शोधकर्ता रासिकजनसँ आग्रह जे सभ अनचिन्हार आखर (http://anchinharakharkolkata.blogspot.com) ब्लॉगक अध्य्यन मनन करथि। हम अपन अपूर्ण गजलक ज्ञान संगे अपनेक समक्ष उपस्थित छी तँए एहि संग्रहमे बहुत रास वार्णिक व्याकरण सम्बन्धित दोख भऽ सकैए। आशा अछि अपने सभ कोनो तरहक गलती लेल अज्ञानी जानि क्षमा करैत हमरा सूचित करब जाहिसँ हम अपन अज्ञानताकेँ  दूर कए आगूसँ अपनेक सेवामे आओर  शुद्ध नीक गजल प्रस्तुत करब।
हमर साहित्यक बएस कोनो बेसी नहि भेलए।  विद्यार्थी जीवनमे कविता लेखनमे रूचि छल मुदा गृहस्थ जीवनमे सभटा बिसरा गेलहुँ। अक्टूबर २०११, श्री गजेन्द्र ठाकुरजी विदेह ग्रुपसँ जोड़लनि, ओतएसँ हमर साहित्यक जीवन शुरू भेल। विदेहपर सभकेँ नीक-नीक लिखैत देख कए हमरो भितरक मरल साहित्यक सिनेह बाहर निकलल, दू-तीनटा कविता लिख विदेहक देबाल पर देलियै। पाठकक वाह-वाही पढ़ि नीक लागल। आगू  लिखैक प्रेरणा भेटल। संगे अपन कविताकेँ विदेह -पत्रपर छपल देख आओर खुशी भेटल। मुदा हमर मैथिली भाषाक पक्ष बड्ड कमजोर छल, एखनो अछिए। नवम्बर २०११ मे गुरुबर आशीष अनचिन्हारजी विदेह ग्रुपकेँ आशिर्वादे भेट भेलाह ओहिठामसँ हुनक मार्गदर्शनमे  शुरू भेल हमर गजल मैथिली लिखैक यात्रा। ओकर बादक सभ किछु अपने लोकनिकेँ समक्ष अछि। हमर जीवनमे साहित्यक कोनो जगह अछि तँ ओहि लेल हम आभारी छी मार्गदर्शक श्री गजेन्द्र ठाकुर जीकँ, गुरुबर श्री आशीष जीकँ, विदेह ग्रुपक मित्रमंडलीक समस्त पाठक लोकनिक जिनक मार्गदर्शन प्रेरणाक बलसँ अर्जित पूजीकेँ हम एहिठाम परसने छी।
अपने सिनेहक आशमे
जगदानन्द झा मनु
ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीहटोलमधुबनी
-मेल jagdanandjha@gmail.com


                                         




                                













क्रम

सँ ३६ गजल, सरल वार्णिक बहर
३७ सँ ४१ गजल, समान वर्णवृत
४२ सँ ४४ गजल, बहरे मुतकारिव
४५ गजल, बहरे मुतदारिक
४६ सँ५१ गजल, बहरे रमल
५२-५३ गजल, बहरे रजज
५४-५६ गजल, बहरे हजज
५७ गजल, बहरे मुन्सरक
५८-५९ गजल, बहरे मुशाकिल
६० सँ ६२ गजल, बहरे असम
६३ सँ ६५ गजल, बहरे खफीक
६६-६७ गजल, बहरे सलीम
६८-६९ गजल, बहरे जदीद
७०-७२ गजल, बहरे कलीब
७३ गजल, बहरे कबीर
७४ गजल, बहरे हमीद
७५ गजल, बहरे सरीअ
७६ गजल, बहरे मुजस्सम वा मुजास
७७ सँ ८७ बाल गजल
८८ सँ ९४ भक्ति गजल
९५-९६ हजल
९७ बहरे कलीब
९८ मात्रा क्रम- २१२२-२१२२-२१२२-२१२
९९ बहरे मुतकारिब
१०० १०१ सरल वार्णिक बहर














1

ससिनेह संग्रह अहाँक हाथमे पसरल जे
अहाँक लेल परसलहुँ मोनमे निखरल जे

सिनेह हमर सभटा मिथिलाक माटि पानिसँ
करेजासँ निकलि कऽ कागजपर उतरल जे

नहि ज्ञान बुद्धि साहित्यक शिक्षा किछु पएलहुँ    
  सभ आशीष गुरुवरकेँ अछि चतरल जे

हमर अल्पज्ञानसँ परिचय अहाँ कराएब 
प्रिय पाठक अपने पढ़ि गलती पकड़ल जे

समेटतमनुएक एक अनमोल सिनेहकेँ
हमर प्रति करेजासँ अपनेक  झहरल जे

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१८)
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2
भाइ आब हमहूँ   लिखब अपन फूटल कपारपर
जेना   भात-दालि तीमन ओकर उपर अचारपर

सोन सनक घर-आँगन  स्वर्ग सन हमर परिवार
छोड़ि एलहुँ देश अपन  दू-चारि टकाक बेपारपर

कनिको आटा नहि एगो जाँता नहि करछु कराही नहि
नून-मिरचाइ आनि लेलहुँ सभटा पैंच-उधारपर

चिन्हलक नै केओ नै जानलक टूअर बनि रहलहुँ
गेलहुँ अपन माटि-पानि छोड़ि दोसरक द्वारपर

हम कमेलौं घर भरलक हमर खोपड़ी खालिए
आब बैसलमनुकनैए   बरखामे चुबैत चारपर

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-२१)
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3
नढ़िया भुकैए हमर घराड़ीपर
कुकूर सुतैए हमर दुआरीपर

गामक पनिगर भात छोड़ि कऽ एलौं
छी पेट पोसने मासक उधारीपर

जे किछु कमेलौं हाथ-पएर तोड़ि कऽ
साँझे राति खर्च भेल छुच्छे ताड़ीपर

बचेलौं बर्ख भरि पेट काटि-काटि कऽ
गमेलौं गाम जे आबक सबारीपर

छोरु आनक आशा अप्पन बसाऊ यौ
घुरि आउमनुसोनसन बाड़ीपर

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१४)


4
किस्त-किस्तमे जिनगी बिताबै लेल मजबूर छी
माटि पानि छोड़ि अपन  किएक एतेक दूर छी

आबै जाए जाउ घुरि-घुरि अप्पन-अप्पन घर
घरमे रोटी नै रखने माछ-भात भरपूर छी

तिमन-तरकारी बेच-बेच करु नै गुजारा यौ
घुरि आऊ अप्पन गाम एतुका अहाँ हजूर छी

परदेशमे कतेक दिन रहब बनि पड़बा
अप्पन घर आऊ एतएकेँ अहाँ तँ गरूर छी

अपन लोकक मन-मनमेमनुअहाँ बसुयौ
परक द्वारिपर बनल किएक मजदूर छी

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१८)
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5
सोना भसल जाइए जुनि काँटीकेँ पकरू
छोड़ि अपन भाषा नहि खराँटीकेँ पकरू

दोसर घर धेने  भेटत नहि सिनेह
छोरि आनक बोझ अपन आँटीकेँ पकरू 

आदी कालसँ अपन शिक्षा लेने विश्व अछि
नवीनताकेँ धारमे नहि काँटीकेँ  पकरू 

संपन्न हमर संस्कृति मधूर भाषा अछि
लात मारि टल्हाकेँ अपन खाँटीकेँ पकरू

छोरि दिल्ली मुंबई घुरि आऊ अप्पन घर
आब  दरभंगा मधुबनी  राँटीकेँ पकरू

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१६)
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6
बाबा पोखरिकेँ रौहक की कही
बहुत कचोटैए   गामक  दही

अशोक ठाढ़िसँ कूदि पोखरिमे
जाइठ छुबि कोना पानिमे बही

बनसी बनाबी कोना नूका कए
पूल्ली बनाबै लेल काटी खरही

छीन कऽ नानी हाथक मटकूरी
छोट-छोट हाथसँ छाल्ही मही

जखन अबैत गामक इआद
कनि-कनि कऽ हम नोरेमे बही

सभ सुख रहितो परदेशमे
माटिक बिछोह कते हम सही

मैरतोमनुसभ सुख छोरि कऽ
मिथिलाक माटिपर हम रही

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१२)
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7
नहि हम कागजक आखर जनि पएलहुँ
नहि केकरो करेजमे  हम सनि  पएलहुँ

आब के पतियाएत हमर मोनकेँ कनिको
हम तँ नहि केकरो अपन बनि पएलहुँ

बिन पानिक गति जेना माछक होएत छैक
ओहे गति हमर  हम नहि कनि पएलहुँ

अप्पन घर छोड़ि कऽ परदेश जा बसलहुँ
सुन्नर यादि छोड़ि नहि किछु अनि पएलहुँ   

बरख-बरख हम रहलहुँ परदेशमे
ओकरा तँमनुअपन नहि मनि पएलहुँ

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१७)
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8
जाति पातिपर आब हम नहि लड़ब यौ
हम मैथिलपुत्र मिल कऽ आगू बढ़ब यौ

अपन  माटि पानिपर आब जीयब हम
प्राण  अप्पन छोरब वचन नै तोरब यौ

बाहर बहुत छैक दूध मलाइ  राखल
मड़ुआ रोटी नून लेल सभटा छोरब यौ

खून पसीनासँ अप्पन धरती पटाएब
मेहनतसँ सोना उपजा कए  रहब यौ

बिसरल मान सम्मान फेरसँ जगाएब
दुनिआक नक्शामेमनुफेरसँ उठब यौ

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१६)
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9
बूझलक नेता   जनता पाकल अछि
आम जनता तँ सदिखन भागल अछि

बचल छै गाममे बूढ़ पुरान बच्चा
कबिलाहा सभ प्रदेशमे पागल अछि

खेत बनल छै परती घर सुनशान
सूतैत पिचपर सभ अभागल अछि

पिया विरहमे वौराएल नब कनियाँ
कनि कनि सगरो देह सुखायल अछि

जागू जनता जनार्दन आबो हक जानू
भगाबू ओकरा जे नेता बिकायल अछि

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१५ )
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10
हमर कमाइ कोन कोनामे परल अछि
मंत्री घरमे बैमानीक सोना गरल अछि

गरीब बनि गेल आइ जब्बहकेँ बकरी
चिकबा धनिकाहा गामे गाम फरल अछि

डाका परै परोसमे जँ सुतलौं निचैनसँ
निश्चय बुझू आत्मा हमर मरल अछि

ढोंगी भक्तकेँ नहि निकलै रुपैया दानमे
भरि थारी लेने खंड माछक तरल अछि

शहर नहिमनुगाम गामकेँ चौकपर
मनुक्खसँ सजि शराबखाना भरल अछि

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१६)
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11
मिथिला राज अभियानमे सर्मपित शहीद सभकेँ श्रधा सुमन -

खूनसँ भिजलै धरती  मिथला बनबे करतै
आब जोड़ लगाबए कियो झंडा गरबे करतै

सुनू बलिदानी सुनू शैनानी आब दिन दूर नै
विश्वक नक्शामे मिथिला राज चमकबे करतै

कतबो चलतै बम निकलै चाहे हमर दम
क्रांति बढ़ल आगू आब जुनि रुकबे करतै

बहुत सहलहुँ सभ सहबै नै आब ककरो
सोनितक हिलकोरसँ दुश्मन मरबे करतै

एक खूनक बूंदसँ सए बलिदानी जन्म लेतै
अपन अधिकार लेबै लेल लड़बे करतै   

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१८)
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12
हम चान लेबैलए बढ़लौं अहाँ रोकब तैयो तारा लेबै
मैथिलकेँ बढ़ल डेग नहि रुकत आब जयकारा लेबै

मिथिलाराज मँगै छी हम भीखमे नहि अधिकार बूझि
चम्पारणसँ दुमका नहि देब किशनगंज  तँ आरा लेबै

छोरलौं दिल्ली मुंबई अमृतसर सूरतकेँ बिसरै छी
अपन धरतीपर आबि नहि केकरो सहारा लेबै

गौरब हम जगाएब फेरसँ प्राचीन मिथिलाक शानकेँ
विश्व मंचपर एकबेर  फेर पूर्ण मिथिलाक नारा लेबै

उठू ’’मनु’’ जयकार करू अपन भीतर सिंघनाद करू
फेरसँ निश्चय कए सह सह अवतार बिषहारा लेबै     

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-२२
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13
केहन-केहन दुनियाँ   केहन-केहन रंग एकर
कियो हँसैए कियो कनैए कियो झूमैए संग एकर

कियो मरैए दूधक द्वारे कियो भाँगमे डूबल अछि
बुझि नहि पएलहुँ आइतक कनिको ढंग एकर

पथैत चिपड़ी लक्ष्मी देखलौं कुबेड़ चराबथि पाड़ी
गंगा-यमुना पानि भरैत की हमहूँ छी अंग एकर

भोट मांगे पोहला पोहला कऽ गदहोकेँ बाप बना कऽ
जितैत देखु गिरगीट जकाँ बदलैत रंग एकर

मनुछल कारिझाम चिन्हार बनोलन्हि अनचिन्हार
घड़ी-घड़ीमे बदलैत देखू  आब तँ उमंग एकर

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-२०)
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14
भ्रष्टाचारकेँ ठेका आजुक सरकार लेने
कारी रुपैयाक करमान धर्माचार लेने

बोगला भगत छै बैसल घाट-घाटपर
खून पिबैक लेल तैयार हथियार लेने

कर्तव्य बिसरल अछि मिडिया समाजमे
नीक बेजाए छोरि कमाऊ समाचार लेने

प्रेमक भाषा सिमैट गेल अछि पाइ तक
पाइ  अछि एक दोसरसँ सरोकार लेने

सुनलौं कोयला दलालीमे मुँह कारी हैछै
मनुसगरो कारी छैक मिथ्या प्रचार लेने

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण - १६)
15
नीक नीक लोकक केहन काज अछि
बेटा बेचैत नै कनिको किए लाज अछि

मायाक महिमा सगरो पसरल अछि
जतए देखू आब रुपैयाक राज अछि

धर्म निकलैत अछि पाखण्डमे बोड़ि कऽ
नवका  आइ  केहन एकर शाज अछि

बैमानी शैतानी बिच्चेठाम पोसाइ छैक
शुद्धाक जीवनमे तँ खसल गाज अछि

अपन बड़ाइमेमनुबुड़ाइ कहै छी
माथक बनल केहन नव ताज अछि

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण - 15)




16

आइ  काल्हि तँ राजनीतिक बाजार बहुत गर्म अछि
देखू नेता सभक हाल बनल कतेक  बेशर्म अछि

चानन टिका लगा कए बनल बड़का-बड़का भक्त
नहि पुछू एहि संसारमे केने कतेक कुकर्म अछि

अछि जे कर्मयोद्धा धीर बीर कतए बजैत अछि
चुप्प भऽ  करैत सदिखन अपन-अपन कर्म अछि

भैय्यारी सद्भावना तँ सबसँ बड़का प्रेम अछि
जे लडाबए एक दोसरसँ नहि कोनो धर्म अछि

हम छी मैथिल आन नैमनुकोनो हमर धर्म अछि
सपनोमे  जँ तियागी  सभसँ बड़का अधर्म अछि

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-२०)
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17
घर-घर रावण  आइ  बसल अछि
सौभाग्यक सीता कतए भसल अछि

करेजाक सिनेहक मोल रहल नै
सभक पिआर पाइमे फसल अछि

कर्तव्य बोध बिसरा गेल सभतरि 
भ्रष्टाचारमे सभ कियो धसल अछि

बैमान बैसल अछि राजगद्दीपर
इमानक मीटर कते खसल अछि

देश समाजमनुनहि कुशल आब
जमाए बनल आतंकी असल अछि

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१४)
18

हाथीक दाँत देखाबैकेँ  आर नुकाबैकेँ छै आर
नेताकेँ  कहैक गप्प छै आर बनाबैकेँ छै आर

केलक भोज नै दालि बड्ड सुड़के बूझल
भोज करैक बात आरो छैक देखाबैकेँ छै आर

दोसरकेँ फटलमे टाँग सभ  कियो अड़ाबै छै
फाटल अपन सार्बजनिक कराबैकेँ  छै आर

सासुरकेँ मजा बहुते होइ छै सभकेँ बुझल
कनियाँ सन्ग सासुरमे मजा सुनाबैकेँ छै आर

भाइ धनक गौरब तँ गौरबे  आन्हर रहै छै 
मोट रुपैया जखन बाप जे पठाबैकेँ छै आर 

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१८)
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19
हम बनि गेलहुँ आन्हर कन्हा राज करैत अछि
अज्ञानी बनि रहलहुँ भाग हमर जड़ैत अछि

के चलबैए गोली कएकर सीना छलनी होइए
कतहुँ देखू हाथ हमरे  सभतरि  लड़ैत अछि

बिनु अन्नकेँ सभतरि जनता भूखे सुतैत अछि
गोदाममे भरल अन्न एखनो खूब सड़ैत  अछि

सभक घरमे  हड़ हड़   खट खट हैते छैक
बेटी साउस कहियो नै पुतौह किए मरैत अछि

झूठ कहब झूठ सुनब सत्यसँ सभ भागि गेलै
सत्य कहक मोलमनुगदहा बनि भरैत अछि

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१९)
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20
घर घरमे चक्कू पिजाबैत देखलौं
नेनाकेँ तमाकुल चूनाबैत देखलौं 

बेगरता निकालि कऽ आजुक घड़ीमे
नीक नीककेँ ठेँगा देखाबैत देखलौं

मोनक दोख मोनेमे नूका कऽ सभटा
कपटसँ करेज लगाबैत  देखलौं

दियादक फसादमे अपने मोलमे
घरमे धिया पुता नुकाबैत देखलौं

पाइकेँ जमाना छै पाइकेँ हिसाबमे
पानिमे मनुक्खता डूबाबैत देखलौं

नै रहिगेल मोल प्रेम सिनेहक
प्रेमकेँ डबरामे बहाबैत   देखलौं

मनुमन कोमल सहि नहि सकलौं
किए माएकेँ नोर खसाबैत देखलौं

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१४)
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21
कान नै अपन  देखब  कौआ खिहारब
कहू कहू कोना अहाँ मिथिला सुधारब

घोघ तर कनियाँ कोठी तरहक माछ
मोन होइतो कहू कियो कोना निघारब

लागल आगि जीवनक  मिझाएब कोना
की जिनगी भरि खड़ेल खड़े पजारब

कहियो तँ  बसब ककरो बसाएब
भटकैत सीथ कतेक आरो उजारब

पानि केखनोमनुपियासलोकेँ पीएब   
की बनि बकलेल माटिपर टघारब

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१५)
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22
मनुक्खक एहि दुनियाँमे कोनो मोल नहि रहल
हमरा लेल केकरो लग दूटा बोल नहि रहल

बजाएब  कतए ककरा  सभटा साज टूटिगेल
छल एकटा फूटल ओहो आब ढोल नहि रहल

सभतरि घुमैत अछि   मनुक्खक भेषमे हुड़ार
नुकाबै लेल ओकरा लग कोनो खोल नहि रहल 

रातिक भोजन ओरिआनमे माएक मोन अधीर
छल हमर बाड़ीमे एकटा से ओल नहि रहल

हँसैत मुस्काइत रहए जतएकेँ सभलोक
मिथिलाक गाममेमनुआब टोल नहि रहल

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण - १९)
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23
सभकियो दुनियाँमे किएक आँखि चोराबै छैक 
माँगि नहि लिए कियो तेँ सभकिछु नुकाबै छैक 

गरीबी भेलैक बहुते केहन व्यबस्था छैक
गरीबी नहि सरकार गरीबेकेँ मेटाबै छैक

साउस भेली सरदार गलती नहि हुनकर
जतए ततए किएक पुतोहुकेँ जड़ाबै छैक

जतेक दर्द बेटामे  बेटीयोमे ओतबे सभकेँ
बेटा बिकाइ किएक बेटीकेँ सभ हटाबै छैक

दुनियाँक रीत एहनमनुकेँ नै सोहाइ छैक
खोपड़ीमे रहए जे  सभक घर बनाबै  छैक 

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१८)    
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24
अनकोसँ सम्बन्ध जोड़ाबै छै पाइ
छोटकाकेँ बड़का बनाबै छै पाइ

फूसियो बिकाइ छै मोलेमे आइ तँ 
सतकेँ सभतरि नुकाबै छै पाइ

ज्ञानक कनिको मोल नहि रहल 
प्रवचन सभटा सुनाबै छै पाइ

नहि माए बाबू नहि भाइ बहिन
दुनियाँमे सभकेँ कनाबै छै पाइ

चिन्हार नै अनचिन्हार एहिठाम
मनुआइ सभकेँ हँसाबै छै पाइ

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१३)   

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पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २२४ म अंक १५ अप्रैल २०१७ (वर्ष १० मास ११२ अंक २२४)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -    मैथिलानी केर उपराग राम सं आ समाज ...