Monday, November 11, 2013

‘विदेह' १४१ म अंक ०१ नवम्बर २०१३ (वर्ष ६ मास ७१ अंक १४१)PART V

सूचनाक अधिकार विषयपर आधारित मैथि‍ली नाटक
अधिकार-
बेचन ठाकुर
बेचन ठाकुर, गाम चनौरागंज, झंझारपुर, मधुबनी।

बेचनजी विगत पचीस बर्खसँ मैथिली नाटकक लेखन आ निर्देशनमे जुटल छथि। हिनकर एक दर्जन नाटक ग्रामीण सबहक मोन तँ मोहनहि छल जे विदेहमे प्रकाशित छीनरदेवी आ बेटीक अपमान विश्व भरिमे पसरल मैथिली भाषीक बीचमे कएकटा समीक्षात्मक बहस शुरू सेहो कऽ देने अछि। जखनि मैलोरंग अपन सर्वेक्षण शुरू केलक जे मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ नाटक महेन्द्र मलंगियाक ओकर आँगनक बारहमासा वा बेचन ठाकुरक बेटीक अपमान आ आशीष अनचिन्हारक समीक्षापर बहस चलि रहल छल तँ तारानन्द वियोगीक कथन आबि गेल, ऐ सर्वेक्षणकेँ रोकबाक आग्रह करैत-
"हम तं चकित छी प्रकाश। की मैथिलीक एहन दुर्दिन आबि गेलै जे आब एना तुलना कएल जेतै? जकरा बलपर सौंसे भारतीय साहित्यमे मैथिलीक झंडा बुलन्द मानल जाइत रहल अछि, तकरा मादे हमर नवतुरिया सब एना बात करताह? एतेक सतही आ विवेकहीन पीढी मिथिला पैदा केने छथि यौ? की पं० गोविन्द झाक ओ कथन सत्य होब'बला छै जे तीस-चालीस सालमे मैथिली मरि जाएत। (मैथिली माने मैथिली साहित्य।) एना नहि काज चलत। किछु करियौ बाबू।"
मुदा प्रकाश बाबू कहलखिन्ह-
"सर! किछु कारण अछि। सब नवतुरियाक स्थिति एक रंग नहि छनि। सभहक अपन अपन मनतव्य छनि। मुदा अँग्रेजीमे एकटा कहाबत अछि। सरभाइवल ऑफ दी फिटेस्ट....। जे कियो जे किछु सोचैइथ मुदा मैथिली आ नाटक लेल सोचैथि इहए हमरा लेल जीवन दायी अछि।"
तारानन्द वियोगी फेर लिखलनि-
"मिथिलाक प्रति जं प्रेम अछि, तं अपन बिरासत कें चिन्हनाइ आ ओहिपर गर्व करनाइ सीखू। हरेक भाषामे किछु एहन रचना होइ छै जे क्लासिक्स'क कोटिमे अबै छै।। (से मैथिलीओमे छै) जखन आगुओ कोनो ओहि टक्कर के रचना आबि जाइ छै तं ओकरा सम्मान दैत पूर्वक क्लासिक्स के बराबरमे राखल जाइ छै। एहि‍ लेल बिरासत कें खारिज करब जरूरी नै छै। मानि लिअ जे गजेन्द्र ठाकुर बड्ड विशिष्ट कवि छथि, तें की अहां ई सर्वेक्षण कराएब पसन्द करब जे 'विद्यापति पैघ कवि की गजेन्द्र ठाकुर?' साहित्य के संस्कृतिमे आम तौरपर एना नहि कएल जाइ छै। मुदा खास' तौरपर जं करए चाही, तं ताहि सं ककरो के रोकि सकै छै। राजनीति के संस्कृतिमे तं से चलन छैके।"
तैपर उमेश मण्‍डल जवाब देलखिन्ह जे ई उदाहरण तखनि सटीक होइतए जँ बेचन ठाकुर वा महेन्द्र मलंगियाक तुलना ज्योतिरीश्वरसँ कएल जाइत।
ऐ डिसकसनक शुरूमे प्रकाशजीक विचार बेचनजीक नाटकक विरुद्ध छेलनि आ से पुनः सिद्ध भेल जखनि बेचन ठाकुरक "अधिकार" नाटक ऐ टिप्पणीक संग पोस्ट कएल गेल तँ ओ ओकरा डिलीट कऽ देलनि। एना किए भेल? खनि प्रकाश झा महेन्द्र मलंगियाक नाटक करबै छथि (मैथिलीमे विदेहक एलासँ पूर्व प्रूफरीडरकेँ सम्पादक कहल जाइ छल आ नाटकमे जे कियो कोनो काज नै करथि कुरसीपर पएर लटका कऽ बैसथि आ गप छाँटथि तेकरा नाटकक निर्देशक कहल जाइ छल) तँ 90 प्रतिशत दर्शक मैथिल ब्राह्मण आ जखनि संजय चौधरी मलंगीक नाटक करै छथि तँ 90 प्रतिशत दर्शक कर्ण कायस्थ; आ दुनू गोटे मैथिलीक नामपर सरकारी संगठनसँ, जे टैक्सपेयरक पाइसँ चलै छै, पाइ ल' नाटक करै छथि, शहरो वएह दिल्ली छिऐ। ई समाज किए तोड़ल जा रहल अछि? आ दु जातिक अतिरिक्त शेष मैथिली भाषी? मुदा तइले वियोगीजीक आह्वान प्रकाशकेँ नै भेटै छन्हि! किए!! आ प्रकाशजी बेचनजीक नामो बेचा ठाकुर लिखै छथि आ पाठकक ऐपर भेल विरोधक बावजूद सुधार नै करै छथि से उच्चारण दोष, ह्रिजै दोष अनायास भेल नै सायास भेल सिद्ध होइत अछि। प्रकाशजी उमेश मण्‍डलकेँ कहै छथि जे ओ हुनकासँ सम्पर्क बढ़ेबामे रुचि नै राखै छथि मात्र फोनपर गप छन्हि से हमहूँ 2008मे प्रकाशजीक पहिल बेर नाम सुनने रहियनि, मिथिलांगनक अभय दास नाम-नम्बर देने रहथि आ तहियासँ दू-तीन बेर 2-3 मिनटक फोनपर गप अछि आ 2-3 बेर ठाढ़े-ठाढ़े गप अछि, अंतिम बेर जखनि उमेश मण्‍डल जीक कहलापर जगदीश प्रसाद मण्डल जीक नाटक हुनका देने रहियनि आ ओ ओइ बदलामे मलंगियाजीक पोथी कूरियरसँ पठेबाक गप कहने रहथि। वियोगीजी आ प्रकाशजी अखनो धरि "मेडियोक्रिटी" सँ बाहर नै आबि सकल छथि आ सार्थक समाद आ समालोचना सहबामे तत्काल अक्षम छथि। जँ जँ ओ लोकनि आर मेहनति करता"मेडियोक्रिटी"सँ बाहर बहरेता तँ तँ हुनका लोकनिमे समालोचना सहबाक क्षमता बढ़तनि
टैक्सपेयर तँ सभ छथि, ओतए तँ जाति-भेद नै छै। मुदा "अधिकार" नाटक डिलीट नै कएल जा सकल, ई बचि गेल कारण ऐ नाटकक कएटा बैकप कतेक संगणकपर उपलब्ध छल। से ऐ परिप्रेक्ष्यमे बेचन ठाकुर जीक तेसर नाटक "अधिकार" विदेहमे देल जा रहल अछि आ आशा करैत छी जे आशीष अनचिन्हार फेर ऐ नाटकक समीक्षा करता आ सूतल लोक जेना आँखि मीड़ैत उठल अछि तहिना ई नाटक ग्रामीणक पहिने आ मैथिली नाटकक किछु ठेकेदार समीक्षक/ निर्देशक लोकनि पछाति निन्न तोड़त। संगहि जेना मजारपर वार्षिक उर्स होइ छै जेतए लोक सालमे एक बेर चद्दरि चढ़ा आ अगरबत्ती जरा कऽ कर्तव्यक इतिश्री मानि लैए, तहिना मैथिलीक नामपर खुजल कागजी संगठन सबहक, जे बेसी (95 प्रतिशत) मैथिल ब्राह्मण सम्प्रदाय द्वारा टैक्सपेयरक पाइकेँ लुटबा लेल फर्जी पतापर बनाएल गेल अछि, वार्षिक (बर्खमे ओना एक्के बेर हिनकर सबहक निन्न खुजै छन्हि) काजक समीक्षा होएबाक चाही। जखनि हम संस्कृत वीथी नाटकक निर्देशन/ अभिनय करै छेलौं तँ ओतए अभिनय केनिहार सबहक आ सह-निर्देशक लोकनिक प्रतिभा आ मेहनति देखि हर्ष होइ छल; मुदा एतए प्रतिभाक दरिद्रता किएक? उत्तर अछि जे एक जातिकेँ लेब आ तहूमे तै जातिकेँ जेकरा अभिनयसँ पारम्परिक रूपमे कोनो लेना देना नै छै, जेकरा लेना-देना छै तेकरा अहाँ बारने छी तँ की हएत? खनि हरखा पार्टीमे खतबेजी रावणक अभिनय करै छला तँ से आ जखनि ओ चन्द्रहास नाटकमे खलनायकक नै वरन चरित्र अभिनेताक अभिनय करै छला से, दुनूमे कियो नै कहि पबै छल जे कोन अभिनय बीस! बच्चामे गाममे आँखिसँ देखल अछि। संगहि जे लिस्ट गनाैल जाइत अछि, तैमे खतबे जी केतौ नै!! दसटा मैथिली निर्देशक छथि जे पटना, कलकत्ता, दिल्ली, मुम्बइ, चेन्नइमे (सभटा मिथिलासँ बाहर) निवास करै छथि आ 200 लोकक सोझाँमे ऑडिटोरियममे नाटक करबै छथि आ कलाक न्यूनताक पूर्ति लाल-पीअर-हरियर लाइट-बत्ती जड़ा कऽ करै छथि (किछु अपवादो छथि), की भरि मिथिलामे एतबे नाटक मैथिलीमे होइए आ की एतबे निर्देशक मैथिलीमे छथि? गाम-गाममे पसरल असली मैथिली नाटकक निर्देशकक सूची आ हुनका द्वारा बिना टैक्सपेयरक फण्डसँ खेलाएल गेल नाटकक अभिलेखनक काज विदेह टीम द्वारा चलि रहल अछि जेकर विस्तृत सूची "सर्वे ऑफ मैथिली लिटेरेचर वोल्यूम-2 मे देल जाएत।
प्रस्तुत नाटक इन्दिरा आवास योजनाक अनियमितताकेँ आर.टी.आइ.सँ देखार करैबला आ रिक्शासँ झंझारपुरसँ दिल्ली जाइबला असली चरित्र मंजूरक कथा अछि जे डिलीट नै कएल जा सकल मुदा किए डिलीट कएल जा रहल छल, किनकर हितकेँ ऐ नाटकसँ खतरा छन्हि/ छेलनि आ किए एकर विरोध एतेक तीव्र रूपमे भेल, से सभटा आब फरिच्छ भ गेल अछि।

-गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक, विदेह।




















अधिकार


महान सामाजिक एवं क्रांतिकारी मैथिली लघु नाटक अधिकार

बेचन ठाकुर



दृश्य- एक

(स्थान मुखिया चन्दनक घर। दलानपर चारि-पाँचटा कुरसी लगल छै। मुखियाजीक मुहँलगुआ अमरनाथ आ चन्दन कुरसीपर बैसि गप-सप्‍प कऽ रहल छथि।)

अमरनाथ-     मुखियाजी, आइ-काल्हि कोनो मुल्हा फँसलै की नै।
चंदन -      फँसिते रहै छै की। ओना दू-तीनि दिनसँ बोहनी नै भेल अमर भाय।
अमरनाथ -    मुदा बड़ कसि कऽ धऽ लइ छिऐ अहाँ।
चंदन -      की करबै, अहीं कहू। हमरा सरकार कोनो तनखा दइ छै? (मंजूरक प्रवेश पूर्ण गरीबी अवस्थामे)
मंजूर -      मुखियाजी प्रणाम।
चंदन -      प्रणाम प्रणाम। आउ मंजूर भाय। (मंजूर भुइँयापर बैसि जाइ अछि।) मंजूर भाय, नीच्चाँमे कि बैसलौं? कुरसीपर बैसु ने।
मंजूर -      हम कुरसीपर बैसैबला लोके नै छिऐ। कुरसीपर हाकिम सभ बैसै छथि‍न।
अमरनाथ भाय, प्रणाम ।
अमरनाथ-     प्रणाम प्रणाम, कहू मंजूर भाय, की हाल चाल?
मंजूर-       जीऐ छी नै मरै छी, हुक्कुर-हुक्कुर करै छी। अहाँ ऐ फाटल-चिटल लोकपर, कोनो ध्याने नै दइ छी ।।
अमरनाथ -    कहू धिया-पुताक हाल-चाल, घरवालीक हालचाल?
मंजूर -      की कहब, धिया-पुता चारि-पाँचटा बेसी भऽ गेलै। तैसँ अक्कछ रहै छी। कहलनि अपरेशन कराऽ लिअ तँ कहलनि अपना सबहक हदीशमे से नै लिखल छै। आ फेर कहलनि हुअ ने दियौ केते हेतै अपन-अपन कमा कऽ खेतै।
(चन्दन आ अमरनाथ मुस्काए रहल छथि।)
अमरनाथ-     मंजूर भाय, कनियाँ थेहगर छ से?
मंजूर-       की पुछै छी? आब नै सकै छी तैयो बड़ हरान कऽ दइए। आब छोड़ भाय मजाक तजाक। ऐ बुढ़बाकेँ की चटै छी?
चन्दन -      कह मंजूर केम्हर-केम्हर एला?
मंजूर -      सरकार, इन्दिरा आवासबला गप हम कहिया कहलौं 2006एमे। केते दिन भऽ गेलै? ताबे केते आदमीकेँ इन्दिरा आवास भेटबो केलै। सरकार हमरोसँ बेसी गरीब कियो छै? टमटम चलबै छेलौं तँ घोड़ीओ खर्च नै निकलै छेलए। सुखा-टटा कऽ घोड़ीओ मरि गेल। करजा-बरजा लऽ कऽ एगो पुरना रि‍क्‍शा कीनलौं। सेहो कहियो चलैए कहियो नै। टेम्पू-सवारी रि‍क्‍शेबलाक रोजी-रोटी खेलकै। आब हमरोपर धियान दियौ सरकार। बरसातमे एक्को बुन्नी पानि बाहर नै खसै छै।
चन्दन -      बीस हजार तोरा नाम सँ भेटतह । ओइमे की खरचा-बरचा करबहक?
मंजूर -      हम तँ कहब, एक्को पाइ नै । मुदा अहीं कहियौ की केना लगतै?
चन्दन -      अमरनाथ भाय, कनी बूझाए दियौ।
अमरनाथ -    मंजूर भाय, ओना सभकेँ छ-सात हजार लगै छै, अहाँकेँ पाँच हजार लागतै।
मंजूर -      बाप रे बा, तहन हमरा की बँचतै? पनरह हजारमे केहेन घर हेतै?
अमरनाथ -    किछु अपनो दिससँ लगा देबै।
मंजूर -      खाइले मरै छी,धिया-पुता पन्नी बिछै रोडपर। ओइमे से एक-दू साए टका खइ-पीऐले दऽ देब, सरकार। किरपा करियौ।
चन्दन -      पाँच हजार देबै तहने हएत। नै तँ नै हएत। बात जानी साफ।
मंजूर -      हे हे सरकार, पएर पकड़ै छी। दाढ़ी पकड़ै छी। एगो घर डाइनो बकसै छै। एगो गरीबोकेँ कल्‍याण करू। नीक हएत सरकार।
चन्दन -      बेसी नीक हमरा नै पचै छै। ओत्ते लगबे करत।
मंजूर -      तहन जाइ छी सरकार। जे करियौ। ओना एगो गरीबकेँ तारितिऐ ऽ ऽ ऽ ऽ।
(प्रस्थान)
चन्दन -      हम फेर मुखिया हाएब की नै, के जनै छै? माल बनेबाक बेर अनेक नै अछि।
अमरनाथ -    से तँ ठीके मुखियाजी। काल्हि के देखलकै? ओना मंजूर वास्तवमे बड़ गरीब अछि।

(पटाक्षेप)


दृश्‍य दू

(स्थान मंजूरक सलाहकार विनोदक दलान विनोद कूर्सीपर बैसि पेपर पढ़ि रहल छथि। दीन हीन अवस्थामे मंजूरक प्रवेश।)

मंजूर -      नेताजी प्रणाम।
विनोद -      प्रणाम प्रणाम। कहऽ की हाल चाल? आइ बहुत दिनपर देखलिअ। कह केम्हर-केम्हर एला?
मंजूर -      की पुछै छी नेताजी। मुखिया बिना घूसे इंदिरा आवास नै देमऽ चाहैए। तहूमे बीस हजारमे कम-सँ-कम पाँच हजार। कहू तँ पनरह हजारमे की की करब? अहूमे आइ चारि-पाँच सालसँ आइ-काल्हि आइ-काल्हि करैए। अखनि केतबो पएर दाढ़ी पकड़लियन तैयो उ नै घमलथि। एक्के बेर कहलथि, पाँच हजार देबै तहने हएत। नै तँ नै हएत। बात जानि साफ। अपने हमरा बुधि दिअजे एकर कोनो निअम कानून छै की नै?
विनोद -      कानून तँ छै, मुदा दौड़ा-बढ़ी करए पड़तह। तों गरीब आदमी छह। तोरा सँ पार लगतह?
मंजूर- –     नेताजी, मरता क्या नहीं करता। मरल तँ हम छीहे। अहाँ हमरा रस्ता बता दिअ, देखै छिऐ कानूनमे दम छै की नै। उचितक लेल अहाँ हमरा जे कहब से करैले तैयार छी।
विनोद -      हम एगो आवेदन लिखि दइ छि। मुखिया लग अखनि चलि जा दऽ दिहक आ की कहै छह से फेर कहिहऽ
(विनोद मंजूरकेँ एगो आवेदन लिखि दइ छथि आ मंजूर उ लऽ कऽ मुखिया लग तुरंत जाइ अछि।)

(पटाक्षेप)



दृश्‍य- तीन

(स्थान - चन्दन मुखियाक दलान। दलानपर चन्दन आ अमरनाथ कुरसीपर बैसि गप-सप्‍प कऽ रहल छथि। मंजूरक प्रवेश।)

मंजूर -      मुखिया जी प्रणाम।
चन्दन -      प्रणाम प्रणाम।
मंजूर -      अमरनाथ भाय प्रणाम।
अमरनाथ -    प्रणाम प्रणाम मंजूर भाय। बैसू।
मंजूर -      की बैसब? बैसलासँ पेट भरतै। मुखिया जी एगो दरखास छै, देखल जाउ।
चन्दन -      लऽ लिअ अमरनाथ। पढ़ियौ की लिखल छै।
(अमरनाथ दरखास लऽ कऽ पढ़ै छथि। मंजूर भूइयांमे बैसि जाइत अछि।)
अमरनाथ -    सेवामे,
श्रीमान् मुखिया महोदय।
ग्राम पंचायत राज रामपुर।
महाशय,
नम्र निवेदन अछि जे हम अति निर्धन बेकती छी। अपन पंचायतमे किनको सँ पहिने हमरा कोनो सुविधा भेटक चाही। ओइमे अपने हमरा पाछू छोड़ि दइ छिऐ। इंदिरा आवास लेल चारि-पाँच साल सँ घूमबै छी। जै गरीबकेँ पाँच हजार टाका नै रहाए ओकरा इंदि‍रा आवास नै भेटए!
ऐ संदर्भमे अपने सँ करबद्ध प्रार्थना अछि जे एगो महागरीबकेँ निःशुल्क इंदिरा आवास प्रदान कऽ कल्याण कएल जाए। संगहि सूचना अधिकारक तहत पंचायत सचिव सँ इंदिरा आवासबला आय-व्यय फाइल उपलब्ध करबैमे सहयोग कएल जाए। धैनवाद
अपनेक बि‍सवासी-
मंजूर
चन्दन -      जाउ मंजूर, अहाँकेँ जै अधिकारक प्रयोग करबाक अछि करू ग। देखि लेबै। नै, जदी पाँच हजार टाका ओइमे से देबै तँ अखनो भऽ सकैए।
मंजूर -      नै मुखियाजी, हमरा कानूनेमे जाए दिअ।
चन्दन -      जाउ ने हम रोकने छी।
मंजूर -      बेस हम जाइ छी। (मंजूरक प्रस्थान)
अमरनरथ -   मुखियाजी एकरा बुते एगो अल्हुआ तँ उखड़बे नै करतै आ आएल छला धमकी दइले। केहेन-केहेन गेल्ला तँ मोँछबला एल्ला
चन्दन -      हा हा हा ऽ ऽ ऽ ऽ (ठहक्का मारि‍ हँसै छथि।) जाए दियौ अमरनाथ केतए जेतै कानून अपना हाथमे छै।

(पटाक्षेप)


दृश्‍य- चारि

(स्थान -     विनोदक दलान। विनोद ससुराइर जाइक तैयारीमे छथि। तखने मंजूरक प्रवेश।)

मंजूर -      नेताजी प्रणाम।
विनोद -      प्रणाम प्रणाम। कहऽ मंजूर, मुखियाजी भेटलखुन।
मंजूर -      हँ भेटलथि तँ जरूर। मुदा फेर ओएह गप्प। बिना पाँच हजार घुसे काज नै हएत। अहाँके जै अधिकारक प्रयोग करबाक हुआए से करू।
विनोद -      आब हुनक, किछु नै कहक। हम तोरा तीनिगो आवेदन लिखि दइ छि। एगो बी.डी.आे. केँ दऽ दिहक, एगो एस. डी. . के दऽ दिहक आ एगो डी. एम. केँ दऽ दिहक। डर नै ने हेतह?
मंजूर -      डर कथीके हेतै नेताजी। कोनो हम चोरी कर जाएव। अहाँ कनी हानि कऽ लिखि दिअ।
(विनोद तीनगो आवेदन लिखि दइ छथि।)
विनोद -      मंजूर, ई तीनु आवेदन लएह। तीनु ऑफिसमे दऽ दिहक। हम आइ ससुराइर जाइ छि। एक सप्ताहक बाद एबह। देखहक की होइ छै?
मंजूर -      हम अखने जाइ छी नेताजी।
विनोद -      बेस जाह। हमहूँ जाइ छि
(पहिने मंजूरक प्रस्थान। तकर बाद विनोदक प्रस्थान।)

(पटाक्षेप)



दृश्‍य- पाँच

(बी.डी.. कार्यालय। गेटपर एगो सिपाही छथि। बी.डी.. अशोक कार्यालयमे फाइल उनटा रहल छथि। तखने मंजूरक प्रवेश। सिपाही मानसिंह छथि।)
मंजूर -      प्रणाम सर।
मनसिंह -     प्रणाम प्रणाम। का बात हउ?
मंजूर -      सर, कनी बी. डी. . साहैबकेँ भेँट करबाक छै।
मानसिंह -     बात का ह, से पहिले बोल न? साहैब जरूरी काममे फँसल बा?
मंजूर -      सर, हमरो बड़ जरूरी काज छै। इंदिरा आवासबला एगो दरखास छै।
मानसिंह -     अच्छा जा।
(मंजूर अशोक लग पहुँचलथि।)
मंजूर -      हाकिम परणाम।
अशोक -     बाजू की बात अछि?
मंजूर -      हाकिम इंदिरा आवास बला एगो दरखास छै।
अशोक-      खनि सभ काज नै होइ छै ब्लॉकमे। उ काज मुखिए करै छै। अपन मुखिए लग जाउ।
मंजूर -      हाकिम, मुखियासँ अक्कछ भऽ गेलौं तहन ने अपनेक शरणमे एलौं। चारि-पाँच साल पहिने बाढ़िमे घर दहाए गेल। सिरकी तानि सभ परानी कौहुना जीबै छी।
अशोक -     मुखिया की कहलनि‍?
मंजूर -      मुखिया कहलनि जे बीस हजारमे पाँच हजार लेब, तहने हएत, नै तँ नै।
अशोक -     किछु लऽ दऽ कऽ काम कऽ लैतौं ने?
मंजूर -      हाकिम, हमरा उ बात एक्को रत्ती पसीन नै पड़ल। एक-दू साए बला गप रहितै तँ सोंचबो करितिऐ। हाकिम, किरपा कऽ ई दरखास लियौ आ एगो गरीबोसँ गरीबपर विचार करियौ।
अशोक -     बेस लाउ। (मंजूर अशोककेँ दरखास दऽ दइ छथि।)
मंजूर -      परणाम हाकिम। जाइ छी हम। रिक्‍शा चलबैले जाएब।
(प्रस्‍थान)
अशोक -     सेवामे,
श्रीमान् प्रखंड विकास पदाधिकारी महोदय,
कार्यालय - भगवानपुर
महाशय,
सूचना अधिकारक तहत हम पुछैले चाहै छी जे इंदिरा आवास पाँच
हजार घूसे लऽ किए भेटत, ओना कि नै भेटत? एकर लिखित जवाब
दूः दिनक अन्दर चाही। नै तँ आगू बढ़ब। धैनवाद,
मंजूर, ग्राम पंचायत राज रामपुर।
(अशोक आवेदन पढ़ि कूड़ामे फेंक दइ छथि।)
एकर लिखित जवाब दू दिनक अन्दर चाही, नै तँ आगू बढ़ब। जाउ, जेतए
बढ़ब, तेतए बढ़ू। सभठाम एक्के रंग भेटत।

पटाक्षेप



दृश्‍य- छह

(स्थान - अनुमंडल कार्यालय। सुनील एस. डी. . आ बहादुर हुनक सिपाही छथि। सुनील फाइल उनटा रहल छथि। मंजूरक प्रवेश।)

मंजूर -      सर प्रणाम।
बहादुर -     प्रणाम प्रणाम। केतए हुरार जकाँ हुरकल जाइ छी? रूकू। पहिने एतए पाँच गो टका दिअ, तहन अन्दर जाएब।
मंजूर -      (जोर सँ) ऐ देहमे करौआ लगल छह की? सरकार सँ तों तनखा नै लइ छहक?
बहादुर -           अच्छा जा। बेसी बाजह नै (मंजूर सुनील लग पहुँचल।)
मंजूर -      परणाम हाकिम।
सुनील -      की बात?
मंजूर -      इंदिरा आवासबला एगो दरखास छै। लेल जाउ।
सुनील -      (आवेदन लऽ कऽ) अहाँ जाउ।
मंजूर -      जाइ छी हाकिम। एगो गरीबोकेँ कल्यााण करबै। परणाम। (मंजूरक प्रस्थान।)
सुनील -      सेवामे,
श्रीमान् अनुमंडलाधिकारी महोदय, बेनीपुर।
महाशय,
हम मंजूर ग्राम पंचायत राज रामपुरक स्थाइ निवासी छी। चारि-पाँच
साल पहिने बाढ़िमे घर दहा गेने काहि काटि रहल छी। इंदिरा आवास लेल मुखिया चंदन पाँच हजार टाका घूस मांगैए। बी. डी. . साहेब सेहो हमर आवेदन
पर कोनो धियान नै देलनि। सूचना अधिकारक तहत हम एकर लिखित जवाब दू दिनक अन्दर चाहै छी। अन्यथा आगू बढ़ब।
धूः ई बकवासबला आवेदन छै। के माथा पच्ची
करतै ऐमे?
(सुनील आवेदनकेँ कुड़ामे फेंक दइ छथि ।)

पटाक्षेप।


दृश्‍य- सात

(स्थान समाहरणालय। डी. एम. चन्द्रकान्त कार्यालयमे फाइल उनटा रहल छथि। गेटपर सिपाही हंसराज ठाढ़ छथि। तखने मंजूरक प्रवेश।)

मंजूर -      परणाम हुजूर। अन्दरा कलक्टर साहैब छथि‍न?
हंसराज -     की बात?
मंजूर -      हुनके सँ काज य।
हंसराज -     कोन काज से?
मंजूर -      इंदिरा अवासबला एगो दरखस देबाक छै हाकिमकेँ।
हंसराज -     लाउ ने पाँच हजार टाका, हमही काज कराऽ दइ छी। हाथो-हाथ काज भऽ जाएत।
मंजूर -      खाएब, से ओकाइदे नै आ पाँच हजार टाका हम केतएसँ देब?
हंसराज -     तहन ऑफिसमे नै घुसु। घुरि जाउ।
मंजूर -      से कि, अहींक ऑफिस छी लगाएल।
हंसराज -     बेसी फटर-फटर बाजलौंह तँ एक्के झापरमे ठीक भऽ जाएब। कोनो बाप काज नै देत-3
मंजूर -      बेसी बाप-बाप केलौं तँ बूझि लिअ।
हंसराज -     (मंजूरकेँ एक थापर मारि) हरामी कहीं के। आब बाज कोन बाप काज देतौ।
मंजूर -      (हंसराजकेँ एक थापर मारि) हरामी सभ, चोट्टा सभ गरीबकेँ खा कऽ साँढ़-पारा भऽ गेल।
(हंसराज आ मंजूरमे हाथापाई भऽ रहल अछि। हल्ला सुनि चन्द्रकान्त गेटपर एला)
चंद्रकान्त -    अहाँसब हल्ला-फसाद कि करै छी? हंसराज की भेलै?
हंसराज -     सर, ई हमरा बिना मतलबकेँ गाड़ि दऽ देलक।
मंजूर -      सर, पहिने यएह हमरा गाड़ि देलक। तहन हम देलिऐ।
चंद्रकान्त -    धिया-पुता जकाँ गाड़ि-गलाैज, मारि-पीट करै जाइ छी। छिः! छिः! लेक सभ हँसत। बाजू बौआ, की बात अछि?
मंजूर -      हुजूर एगो इंदिरा आवासबला दरखास छै।
चंद्रकान्त -    लाउ अन्दर आउ।
(मंजूर आ चन्द्रकान्त कार्यालसमे जाइ छथि।)
आब बाजू की कष्‍ट?
मंजूर -      हजूर हम रि‍क्‍शा चालक छी। कमाइ छी तँ खाइ छी। नै तँ उपासे रहै छी। चारि-पाँच साल पहीने बाढ़िमे हमर झोपरी दीहा गोल। इंदिरा आवास लेल मुखियालजीकेँ कहलियनि तँ उ कहलनि जे पाँच हजार टाका घूस देबही तहने हेतौ नै तँ नै हेतौ। पएरो दाढ़ी पकड़लियनि जे खाइ पीऐले, एक-दू साए टाका पेटो काटि कऽ देब। हमरापर किरपा कएल जाउ। मुदा टस-सँ-मस नै भेला
हजूर, एगो हमर दरखास स्वीकार कएल जाउ।
चंद्रकान्त -    बेस लाउ। (मंजूर चंद्रकान्तकेँ दरखास दऽ दइ छथि।)
मंजूर -      हजूर, हमरा पंचायतमे हमरासँ बेसी गरीब कियो नै हएत। अपने पता कऽ लियौ। एगो गरीब बड़ आशा सँ अपने लग पहुँचल अछि। किरपा अबस्‍स कएल जाउ हजुर।
आब हम जाइ छी हजुर। तीनि दिनसँ भुखले छी। (मंजूरक प्रस्‍थान)
चंद्रकान्त -    सेवामे,
श्रीमान् समाहता महोदय, परसा
महाशस,
नम्र निवेदन अछि जे हम मंजूर ग्राम पंचायत राज रामपुरक स्थाइ  निवासी छी। हम अति निर्धन रि‍क्‍शा चालक छी। चारि-पाँच साल पहिने पहिने हमर झोपड़ी बाढ़िामे दहा गेल। हम सभ परानी सिरकी तानि पशु जीवन जीबै छी।
कृपया एगो इंदिरा आवासक अनुमति प्रदान कएल जाउ। अइले हम अपनेक आजीवन कृतज्ञ रहब। ओना मुखिया, बी.डी.. आ एस.डी. .के. आचरणसँ हम पूर्ण आजीज छी।
कृपया हमर अनुमति दू दिनक अंदर देबाक कष्‍ट करी। अन्यथा हम सूचना अधिकारक तहत घूसखोरीक विरूद्ध अवाज अबस्‍स उठाएब।
धैनवाद,
(आवेदन पढ़ि चन्द्रकांत कुड़ामे फेक दइ छथि। ई तँ सरासर धमकी भेलै। सूचना अधिकार तँ हमरा मुट्ठीमे छै। हम कोनो आइरी-गाइरी हाकिम छी, डी.एम.छी।)
हंसराज-      (अन्दर कार्यालय जाक) सर, ई आदमी बड़ खच्‍चर छला। जहाँ कहलिऐ पाँच हजार घूस देबै तँ हाथो-हाथ काज करा देब। फट सन एक थापर बैसा देलक। तेकरे हाथापाई छेलै ।
चन्द्रकांत-     जाए ने दियौ। ओकरा कोनो ऑफिस गुदानतै।
पटाक्षेप।


दृश्‍य- आठ

(स्थान- विनोदक दलान। विनोद कुट्टी काटि रहल छथि। मंजूरक प्रवेश।)

मंजूर -      नेताजी परणाम।
विनोद -      परणाम परणाम। कह मंजूर, काज भेलह?
मंजूर -      आइ पनरह दिन भऽ गेल। काजक कोनो अता-पता नै। बेकारे रोजी-रोटी छोड़ि कऽ हरानो भेलौं।
विनोद -      मंजूर, तों जिला तक पहुँचलहक। तोहर काजक कोनो सुनबाई भेलै। आब बुझहक प्रशासन केहेन भ्रष्‍ट छै। एकटा करह, छोड़ह माथा-पच्ची। जा कमैहऽ आ खैहऽ। ऐ सबहक चक्करमे नै पड़ह। ऐ रस्‍तामे बड़ा फेदरत छै।
मंजूर -      नेताजी, परेशानी झेलैले हम तैयार छी। अहाँ हमरा उपए बताउ।
विनोद -      हाईकोर्ट छै, सुप्रीम कोर्ट छै। सूचना आयोग छै।
मंजूर -      नेताजी, हमरा अहाँ जेतए जाइले कहबै ओतए जाइले तैयार छी।
विनोद -      बेस, एगो दरखास हम लिखि दइ छि। तों जगदीशपुर चलि जाह। ओइ गाममे एगो हमर पुरना मित्र छथि‍न। हुनक नाम श्‍यामानन्‍द छियनिपुछै-पुछैत चलि जइहऽ। हुनका दरखास दऽ दिहक। बड़ नीक लोक छथि‍न। गरीबकेँ अपनो दिससँ मदति करै छथि‍न।
मंजूर -      बेस अपने लिखि दियौ।
(विनोद आवेदन लिखै छथि। मंजूर आवेदन लऽ कऽ प्रस्थान करै छथि।)
विनोद -      केहेन भ्रष्‍ट प्रशासन छै जे ओइ बुढ़बाकेँ दौड़बैत-दौड़बैत हरान कऽ देलकै। मुदा बि‍नु घूस एगो इंदिरा आवास नै भेटलै। (मुँह बिजका लइ छथि।)

पटाक्षेप।


दृश्‍य- नअ

(स्थान - नेता श्‍यामानन्दक दलान। दलानपर बैसि उ पत्रिका उनटा रहल छथि। मंजूरक प्रवेश।)

मंजूर -      परणाम सरकार।
श्‍यामानन्द -    परणाम परणाम। नै चिन्हलौं।
मंजूर -      सरकार हम मंजूर छी। रामपुरसँ बड़ी आशसँ पएरे एलौंहें।
श्‍यामान्नद -    बाप रे बा, एत्ते दूरसँ पएरे। धैनवाद अहाँक।
मंजूर -      सरकार, मजबूरीक मारल छी, बाढ़िक झमारल छी, मुखिया-बी.डी..-एस.डी..-कलक्टर सभसँ रिटाइर छी।
श्‍यामानंद -    कहू की बात अछि।
मंजूर -      सरकार, एगो हमर दरखास छै।
श्‍यामानंद -    लाउ दरखास(श्‍यामानंद आवेदन लऽ पढ़ै छथि।)

सेवामे,
श्रीमान् सूचना आयुक्त महोदय, पटना।
महाशय,
निवेदन अछि जे चारि-पाँच साल पूर्व बाढ़िमे हमर झोपड़ी दहा
गेल। हम गरीब आदमी छी। रि‍क्‍शा चला कऽ कौहुना गुजर करै छी। कमाइ छी तँ खाइ छी नै तँ उपासे रहै छी। आइ पाँच सालसँ सिरकी तानि पशु जकाँ रहै छी। बरसातमे एक्कोटा बुन्नी बाहर नै खसै। म्ुखियाजीकेँ पएर-दढ़ी पकड़लियनि तँ उ कहलनि पाँच हजार घूस देबै तँ इंदिरा आवास भेट जाएत। नै तँ कोनो उपाए नै। बी. डी. ., एस. डी. . आ डी. एम लग दरखास देलौं आ सूचना अधिकारक तहत दू दिनमे जवाब मांगलौं। आइ पनरहम दिन छी। कत्तौ कोनो सुनवाइ नै। ऐ संदर्भमे हमर श्रीमान् सँ करबध प्रार्थना अछि जे स्थितिक पूर्ण
जाँच कराबए हमर सूचना अधिकारक औचित्यपर गंभीरतापूर्वक विचार कएल जाए आ एगो उजरल अतिदीनकेँ बसाएल जाए।
ऐ पुण्यात्मक कार्यक लेल हम अपनेक आजीवन आभारी रहब।
धैनवाद,
अपनेक वि‍श्वासी
नाम - मंजूर
ग्राम - रामपुर
प्रखण्ड - भगवानपुर
जिला - परसा (बिहार)
(श्‍यामानंद किछु देर सोंचिकऽ)
आइ धरि हमरा लग एहेन केस नै आएल छल। ई गंभीर केस अछि। खैर मंजूर अहाँ जाउ। हम पूर्ण प्रयास करब।
मंजूर -      हमरा आबो पड़तै पटना।?
श्‍यामानंद -    खनि नै। जरूरी पड़तै तँ बजाए लेब।
मंजूर -      बेस सरकार किरपा अबस्‍स करबै।
श्‍यामानंद -    अहाँ जाउ। एत्ते दूर जेबाको अछि पएरे।
मंजूर -      परणाम सरकार।
श्‍यामानंद -    परणाम परणाम। (मंजूर प्रस्थान करै छथि।)

पटाक्षेप।



दृश्‍य- दस

(स्थान - मंजूरक घर। मंजूर घरक आगू रस्तापर माथा-हाथ दऽ बैसल छथि।)

मंजूर -      अल्ला सबटा विपति हमरे दऽ देलक। घोड़ीओ मरि गेल। सभ दिन रिक्‍शो नै चलै। गाम-घरक काजो सभ दिन नै भेटै। एम्हर धिया-पुता खोखरैए। सिरकी चुबैए। की करी की नैं, किछु नै फुड़ाइए। या अल्लाह, या खुदा।
(श्‍यामानंदक नोकर मालिकक प्रवेश।)
मालिक -     मंजूर अपने छिऐ?
मंजूर -      जी जी, की कहै छी से?
मालिक -     हमर नेताजी श्री श्‍यामानंद बाबू अपनेकेँ काल्हिु पटना बजौलनि। सूचना अधिकारक प्रयोगमे अपनेक बड़ पैघ प्रतिष्‍ठा भेटऽ जा रहल अछि।
मंजूर -      परणाम सर, परणाम सर। धैनवाद अहाँकेँ। एहेन शुभ समाचार आइ धरि कियो नै देने रहथि।
मालिक -     बेस हम जाइ छी। अहाँ जरूर जेबै, बिसरबै नै। (प्रस्थान)
मंजूर -      (घरवाली नजीमा लग जा कऽ) गै नजीमा काल्हि हम पटना जेबै। आब देखही अल्ला की करै छै?
नजीमा -     बटखरचा लेल तँ घरमे किच्छो नै छै। कनी मुरही हेतै।
मंजूर -      सएह दऽ दिहनि‍।
नजीमा -     जेबहक केना? ओत्ते दूर पएरे हेतह जाएल।
मंजूर -      टेनमे मांगैत-चांगैत चलि जेबै गै।
नजीमा -     कनी ओरिया जइहऽ। सेहो तँ गाड़ी आइए पकड़बहक तब ने काल्हि पटना पहुँचबहक।
मंजूर -      ठीक कहै छेँ नजीमा। जो अखने मुरही नेने आ विदे भऽ जाइ। ओना टेन छूटि जाएत तहन। हमरा भीखो मांग पड़तै नजीमा।
नजीमा -     की करबहक? मजबूरीक नाम महात्मा गाँधी होइ छै। तोरा अबेरो होइ छह। हैअए मुरही नेने आबै छि(नजीमा एक मुठी मुरही खोंइछामे आनलथि।) हैअए, एतबे छेलै।
मंजूर -      ला जे छौ से। (नजीमा मंजूरक गमछामे देलक) हम जाइ छियौ। राति-विराति कनी जाइगे कऽ सुतिहेँ। घर बेपरद छौ ।
नजीमा -     बेस, तूँ जा ने अल्लाक नाम लऽ कऽ।
मंजूर -      या अल्ला, या विस्मिला ।

पटाक्षेप।



दृश्‍य- एगारह

(स्थान - सूचना आयुक्त कार्यालय पटना। ब्रह्मदेव सुचना आयुक्त, नेताजी श्‍यामानंद आ उप सूचना आयुक्त अनजार कार्यालयमे बैसि कऽ मंजूरक भूमिकापर समीक्षा कऽ रहल छथि।)

श्‍यामानंद -    सर, आइ धरि हमरा मंजूर जकाँ केस कहियो आ कत्तौ नहि टकराएल राहाए। एत्ते गरीब एवं मूर्ख रहैत एहेन कठिन स्टेप।
अंजार -      साहै, वास्तवमे मंजूर धैनवादक पात्र आछि‍ जेे निच्छछ देहाती आ औंठा छाप रहैत अपन अधिकारक आ कर्त्तव्यक प्रति संघर्शषीलताक प्रदर्शन केलनि।
ब्रह्मदेव -     हम एते पद देखलौं मुदा मंजूर जकाँ अपन हकक प्रति जागरूक एवं कर्मठ बेकती नै भेटल राहाए। जदी उ अखनितए रहितए तँ हम हुनका हार्दिक धैनवाद दैतौं।
श्‍यामानंद -    आइ पटना आबैले ओकरा समाद पठेने रहिऐ। समाद भेटलै की नै। आएत की नै पता नै । (मंजूरक प्रवेश।)
मंजूर -      (श्‍यामानंदकेँ) परणाम हुजूर। (कर जोड़ि)
श्‍यामानंद -    परणाम परणाम।
मंजूर -      (ब्रह्मदेवकेँ) परणाम हुजूर।
ब््राह्ममदेव -   परणाम हुजूर।
मंजूर -      (अंजारकेँ) आदाब हुजूर।
अनजार -     आदाब आदाब।
मंजूर -      हुजूर सभ, हमरा आबैमे बड़ देरी भऽ गेल। क्षमा कएल जाउ। हुजूर? टेने लेट छेलै।
ब्रह्मदेव -     अच्छा चलू कोनो बात नै। बेसी लेट नै भेल। अहींक नाम मंजूर छी ने?
मंजूर -      जी हुजूर।
ब्रह्मदेव -     हम सूचना आयुक्त छी। हम अहाँकेँ हार्दिक धैनवाद दइ छ। (वाह! वाह! कहि पीठी ठोकै छथि।) अहाँ जकाँ अपन अधिकारक आ कर्त्तव्यक प्रति समरपित नागरिक देशकेँ उद्धार कऽ देत। अपनेकेँ बहुत-बहुत धैनवाद(हिन्दुस्तान पत्रकार पवन आ दैनिक-जागरणक पत्रकार महेशक प्रवेश। दुनु मंजूरक फोटो खिंचै छथि आ गप-सप्‍प करै छथि।)
पवन -            मंजूर, ऐ कार्यालयमे अपनेकेँ की भेटलै?
मंजूर -      हुजूर। सूचना आयुक्तक साहैब हमरा धनवाद देलकै।
महेश -      खनि धैनवाद नै दैतथि तहन?
मंजूर -      खनि हमरा हाकिमपर सँ बिसवास हटि जैतए। हम बूझि जइतौं जे बड़को आपिस बकवास अछि बेमतलब अछि।
पवन+महेश - धैनवाद मंजूर भाय।

पटाक्षेप।



दृश्‍य- बारह

(स्थान - आई. बी. एन.-7 चैनलक मनेजर अखिलेशक आवास। उ मिथिला समाद पेपर पढ़ि रहल छथि।)

अखिलेश -    मंजूर को प्रति‍ष्‍ठा।
मंजूर ग्राम-पंचायत राज रामपुर, प्रखंड-भगवानपुर, जिला-परसा (परसा) क स्थाई निवासी छथि। ओ अतिदीन रिक्शा-चालक छथि जे पूर्ण मूर्ख छथि। ओ इंदिरा आवासमे घूसखोरीक विरूद्ध अवाज उठेबामे सूचना कार्यालयसँ प्रतिष्ठा प्राप्त केलनि जइसँ सूचना आयुक्त ब्रह्मदेव हार्दिक धैनवाद दैत पीठ ठोकलनि। ब्रह्मदेव कहलनि, ऐहेन कर्मठ नागरिक देशक उद्धार करत।
(अखिलेश किछु काल सोचि कऽ पेपर रखि दइ छथि।)
मंजूर मूर्ख एवं गरीब रहि कऽ एहेन कठिन कदम उठौलनि देशक महान प्रेरणादायक काज केलनि। उ देशक अस्सल नागरिक छी। हुनका हमरा तरफसँ हार्दिक धैनवाद आ अवार्ड परसु दिल्लीमे भेटतनि। हम हुनका सपरिवार आबै-जाइक भाड़ा पठा दइ छियनि

पटाक्षेप।



दृश्‍य- तेरह

(स्थान मंजूरक झोपड़ी। झोपड़ीमे मंजूर, नजीमा, बेटी सलमा, नाजीनी, खुशबू आ बेटा अजहर, जफर एवं अस्फाक उपस्थित छथि मंजूर सपरिवार दिल्ली जेबाक विचार-विमर्श कऽ रहल छथि।)

मंजूर -      गै नजीमा, अखिलेश अपना सभकेँ दिल्ली आबै-जाइक खर्च पठा देलकौ, से जेबही?
नजीमा -     कथीले हौ?
मंजूर -      से हमरो नै बुझल छौ। एक आदमी कहै छेलए जे जाह दिल्ली, अखिलेश बड़का अबार देतह। कहाँदुन पेपरमे निकलल छेलै।
नजीमा -     चल ने देखियौ तँ ओकरा केहेन छै? हौ हमरा से कुच्छो पूछतै तँ की कहबै?
मंजूर -      जे फुड़तौ से कहिऐ। उ कोनो नै बुझै हेतै जे मुरूख आ गरीबक भनसिया सधारणीमे केहेन होइ छै।
गै नजीमा, लोक सभ हमरा बड़ मजाक करैए जे दिल्ली जा न, रि‍क्‍शापर बैसा कऽ अन्नपूर्णाकेँ खूम घुमबिहऽ
नजीमा -     हौ, अपना सभकेँ अपने गाम लऽ कऽ नै तँ चलि जेतै?
मंजूर -      नै गै, से तँ नै बुझाइ छौ। चल ने बुझल जेतै। बड़ बेसी तँ अपना गाम लऽ जेतै। ऐ सँ बेसी की हेतै? ओतै खाएब, पीयब आ मौज मस्तीमे रहबै। बुझै छी ही, अखिलेश केतेक बड़का आदमी छै?
नजीमा -     हँ हौ, सुनै छिऐ बड़ीटा लोक छै। बिआह-तिआह करैले नै ने कहतै।
मंजूर -      नै गै, तूँ तँ बूरबक जकाँ गप करै छेँ
सलमा -      बाबा, हमहुँ जेबौ तोरा संगे दिल्ली अखिलेशकेँ देखैले
अस्फाक -    बाबा, हमहुँ ओकरेसँ बिआह करबै।
मंजूर -      केकरासँ
अस्फाक -    अखिलेशक साइर सँ।
मंजूर -      धूर बुड़बक, लोक हँसतौ।
खुशबू -      बाबा, सभकेँ दिल्ली लऽ जेबहक आ हम घरपर असगरे रहबै?
मंजूर -      सभ कियो चलबै बुच्ची राजधानी एस्प्रेससँ। ओइ टेनमे जाड़मे गरम आ गरममे जाड़ लगै छै।
गै नजीमा, तू सभ जल्दी तैयार होइ जो। आइ रातिमे पटनासे ओ टेन छै। फेद एत्ते दूर जेबाको छै ने। लेट भऽ रहल छौ।
नजीमा -     जाइ छि तैयार होइलेतोहूँ जा झारा-झपटासँ भऽ आबह। तोरा खुच-खुच झड़े लगैत रहै छह।
मंजूर -      अच्छा हम ओम्हरसँ अबै छी। तों सभ तैयार रह।

पटाक्षेप।



दृश्‍य चौदह

(स्थान - दिल्ली। मंच सजल धजल अछि । दर्शकक भीड़ अछि। अखिलेश आओर अन्नपूर्णा मंचपर उपस्थित छथि। अखिलेशक नौकर किसुन मंचपर घुमि रहल छथि। अखिलेश आ अन्नपूर्णा पेपर पढ़ि रहल छथि।)
किसुन -     मालिक, ओ सभ एखनि धरि नै पहुँचलथि की कारण भऽ सकै छै?
अखिलेश -    ट्रेनक टाइम आब भऽ गेलै। ओ सभ आबिते हएत(सपरिवार मंजूरक प्रवेश)
मंजूर -      परणाम हुजूर। (अखिलशकेँ)
अखिलेश -    परणाम परणाम मंजूर भाय।
मंजूर -      परणाम मैडम।
अन्नपूर्णा -     परणाम परणाम। बैसे जाइ जाउ।
(सब कियो कुरसीपर बैसै छथि।)
अखलेश -    मंजूर भाय, सपरिवार नीके ना एलौं न?
मंजूर -      जी, बड़ नीकेना एलौं। राजधानीमे चढ़ि हम सभ तइर गेलौं।
अन्नपूर्णा -     मंजूर भाय, ई के छथि?
मंजूर -      हमरे घरवाली छिऐ नजीमा।
अन्नपूर्णा -     नजीमा बहिन, नमस्कार।
नजीमा –     नमसकार बहिन।
अन्नपूर्णा -     बहीन, उ सभ के छथि?
नजीमा -     सभ हमरे धिया-पुता छथि।
अन्नपूर्णा -     बहुते धिया-पुता अछि। ऐपर सुधार करू, बहीन।
नजीमा -     की करबै, अल्लाक मर्जी।
अन्नपूर्णा -     सभकेँ नीक जकाँ पढ़ाएब-लिखाएब।
अखिलेश -    मंजूर भाय, आब अपना सबहक आयोजित कार्यक्रमपर धियान देल जाए।
मंजूर -      जी हुजूर।
अखिलेश -    समस्त दर्षक लोकनि,
अखिलेशक नव वर्षक हार्दिक शुभकाना आ अभिनन्दन। आइ ऐ देशक अहोभाग्य अछि जे मंजूर जकाँ अपन अधिकार आ कर्त्तव्यकेँ बुझ बला प्रथम नागरिक हमरा सभकेँ प्राप्त भेल जे गरीब-गवार रहैत देशक भ्रष्‍टाचारीक विरूद्ध बीड़ा उठा कऽ अपन इमानदारी आ कर्मठताक परिचए दैत सफलता समस्त जनताक बीच समरपित केलनि।
हम हिनक अहम भूमिकासँ प्रसन्न भऽ कऽ बेस्ट सिटीजन ऑफ द नेशन अवार्डक लेल चुनलौं आओर अखनि शीघ्र हम हिनका अपन अवार्डसँ सम्मानित करबनि‍।
(थोपरीक बौछार भऽ जाइए।)
मंजूर भाय अपनेक दर्शक लोकनिकेँ किछु कहियौ।
मंजूर -      हम दर्शक भाय सभकेँ की कहबैन। हम तँ मुरूख छी। तहन अपनेक आज्ञा भेलै तँ किच्छो कहि दइ छिऐ।
हम तँ यएह कहब जे देशमे भ्रष्‍टाचारीके जनम जनता देलकै आ ओकर पालन-पोषण से हो जनते करै छै। जदी एकजुट भऽ कऽ सख्ती सँ एकर विरोध कएल जाए तँ पक्का कहै छी जे ऐ महामारीसँ देशके मुक्ति भेटतै आ हमर देशक कल्याण हेतै तथा दुनियाँमे एकर नाम हेतै। ऐ से बेसी हमरा किच्छो नै फुड़ाए य। धनवाद। (फेर थोपरीक बौछार भऽ जाइ छै।)
अखिलेश -    आब अपने सबहक समक्ष हम मंजूर भायकेँ सम्मानित कऽ रहल छियनि
(अखिलेश मंजूरकेँ फुल-माला अरपित केलनि। थोपरीक बौछार भेल। अखिलेश मंजूरकेँ अवार्ड देलनि। थोपरीक फेर बौछार भेल। मंजूर अखिलेशकेँ पएर छूबि‍ प्रणाम कर चाहै छथि। मुदा अखिलेश मंजूरक हाथ पकड़ि लइ छथि।)
मंजूर भाय, सचमुच अपने ऐ देशक महान प्रेरक छिऐ। हमरा सँ बड़ पैघ छिऐ। अहाँकेँ हार्दिक प्रणाम।
मंजूर -      खुश रहू अखिलेश भाय। अहाँकेँ हमर उमेर लगि जाए।
(मंजूर अखिलेश सँ गरदनि मिललथि आ नजीमा अन्नपूर्णाकेँ पएर छूबि‍ प्रणाम केलक। थोपरीक बौछार भेल।)

पटाक्षेप।



दृश्‍य- पनरह

(स्थान - मंजूरक झोपरी। मंजूर अपन भाए रमजानीसँ गप-सप्‍प कऽ रहल छथि।)

रमजानी -     भैया, की केना भेलै दिल्लीमे?
मंजूर -      बौआ, अखिलेश हमरा अबार देलकै आ फुल-माला हमरा पहिरा कऽ नवाजलकै। लोकक बड़ भीड़ छेलै।
(चन्दन आ अमरनाथक प्रवेश।)
अमरनाथ -    मंजूर भाय नमस्कार।
मंजूर -      नमस्कार, नमस्कार। मुखियाजी, परणाम।
चन्दन -      परणाम, परणाम।
मंजूर -      बैसल जाउ, सरकार सभ ।
(चन्दन आ अमरनाथ पीढ़ीयापर बैसलथि।)
अमरनाथ -    मंजूर भाय, खर्च-बर्च करू। अहाँकेँ इंदिरा आवासबला बीस हजार टाका आबि गेल आ मुखियाजी सेहो अपना तरफसँ पाँच हजार टाका दइ छथि।
मंजूर -      अमरनाथ भाय, हमरा हरामक पाइ नै चाही हमरा अपन उचित पाइ बीस हजार चाही अप्पन पाइ मुखियाजी अपने रखथि।
अमरनाथ-     मंजूर भाय, अहाँकेँ मुखियाजीबला पाँच हजार लेमहि पड़त। उ अहाँकेँ पाँच हजार मदतिमे दइ छथि।
मंजूर -      एहेन मदति लेबाक मन नै होइए। कारण मुखियाजी समाजक संग बड़ गददेदारी करै छथि।
चंदन -      इएह लिअ, पच्चीस हजार टाका।
मंजूर -      लाउ, बड़ जिद्ध करै छी तँ ।
(चन्दन मंजूरकेँ पच्चीस हजार टाका देलनि।)
चन्दन -      मंजूर भाय, अहाँ सचमुच महान छी। हमर गलतीकेँ माफ कएल जाए।
मंजूर -      गलती तखने माफ करब जखनि अपने पब्लिक संग नीक बेवहार करब।
चन्दन -      आब केकरो संगे गलत बेवहार नै करब।
मंजूर -      तहन गलती माफ अछि।
अमरनाथ -    धैनवाद मंजूर भाय।
(चन्दन आ अमरनाथक प्रस्थान।)
रमजानी -     भैया, बड़ चौंसैठ छह मुखियाजी। एहेन घूसखोर नै देखल।
मंजूर -      तैं ने हमरा सनक गरीब आ मुरूख सँ घट्टी मानलनि।
रमजानी -     भैया, तोरा एत्ते आगू बढ़ाबामे किनकर यानगदान छै?
मंजूर -      बौआ, नेताजी विनोदक किरपा छैन। ओ गुदरीक लाल छथि‍न। गरीब जरूर छथि‍न मुदा सभ तरहक बुधिमे पारंगत छथि‍न। गरीबक मसीहा छथि। उचितक लेल जी जान लगा दइ छथि‍न। (नेताजी विनोदक प्रवेश।)
परणाम नेताजी।
विनोद -      परणाम, परणाम। कह मंजूर कह रमजानी की हाल-चाल छै?
रमजानी -     अपनेक किरपा सँ बड़ बढ़ियाँ छै। नेताजी, भैयाकेँ खाली अबारेट भेटलै और कहाँ किछु भेटलै।
विनोद -      कथी भेटतै?
रमजानी -     किच्छो पाइ-कौड़ी भेटतै तहन ने?
विनोद -      बौआ, प्रति‍ष्‍ठा से बढ़ि कऽ किछु नै छै। ओना पाइ प्रति‍ष्‍ठाक सिंगार छिऐ। सेहो मंजूरकेँ जरूर भेटतै।
मंजूर तों धैर्य राखह संतोष राखह। सबटा धीरे-धीरे हेतै। बहुत ठाम तोहर सहयोगक चर्चा भऽ रहल छै।
मंजूर -      नेताजी, अपने जेना कहबै। हम साएह करबै। नेताजी, अपने अपन अनुभव पब्लिककेँ किछु दैतिऐ तँ बड़ बढ़िया होइतै।
विनोद -      हम कोन जोकरक छी जे पब्लिककेँ अपन अनुभव देबै। आइ-काल्हि कियो केकरोसँ कम नै छै। तैयो हम दू शब्द कहि दइ छिऐ।
अशिक्षे कारण जनता सुयोग्य प्रतिनिधिक चयन नै कऽ पावै अछि, ताड़ीए दारूए पर बीकी जाइ अछि। स्वभाविक छै जे प्रतिनिधि क्षतिपुर्तीमे घूसखोरीक अाश्रय लेत। ओइ घूसखोरीकेँ मेटाबऽ लेल हमरा लोकनिकेँ एकजुट भऽ कऽ शिक्षाकेँ सबसँ आगू बढ़ेनाइ अछि। हमरा नजरिमे सबटा अव्यवस्थाक मूल कारण अशिक्षा छै।
अशिक्षा हटतै तहने व्यवस्था सुधरतै आ देशक चहुँमुखि विकास हेतै।
अंतमे मंजूरकेँ हार्दिक बधा दैत अपन दू शब्द खत्म करै छी।

जय हिन्द ! जय भारत !! जय शिक्षा !!!

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'विदेह' २२८ म अंक १५ जून २०१७ (वर्ष १० मास ११४ अंक २२८)

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