Monday, November 11, 2013

‘विदेह' १४१ म अंक ०१ नवम्बर २०१३ (वर्ष ६ मास ७१ अंक १४१)PART IV


बाप भेल पि‍त्ती
अधिकार


बेचन ठाकुर
दोसर अंक

दृश्य- एक

(स्‍थान- रामलालक घर। संतोषी बि‍स्‍तरपर पड़ल अछि‍। पाँच भाय-बहि‍न इसकूल गेल अछि‍। मुदा सोनी घरेपर अछि‍ सोनीक तबीयत ठीक नै अछि‍।)

संतोषी-            सोनी बुच्‍ची, कनी देह दबा दि‍अ तँ?

सोनी-       हमरा अपने माथ दुखाइए। तँए इसकूलो नै गेलौं। अखनि धरि‍ बासि‍ मुहेँ छी। खैर अहाँ तँ छोटकी माए छी। अहाँक अज्ञाक पालन केनाइ हमर परम कर्त्तव्‍य छी।

संतोषी       बुच्‍ची अहाँ बुधि‍यार छी ने।
           (सोनी संतोषीक देह दबाए रहल अछि‍।)
साेनी-       छोटकी माए, बड़ भुख लगल-, कनी खाइले दि‍अ।
संतोषी-            हमरा नै हएत। जाउ अपनेसँ लऽ लि‍अ गऽ।
सोनी-       एक दि‍न अहीं कहने छेलि‍ऐ, अपनेसँ खाइले कहि‍यो नै लइले। धि‍या-पुताकेँ घटि‍ जाइ छै। तँए हम अपनेसँ नै लेब।

संतोषी-      लि‍अ वा नै लि‍अ। हमरा बुते नै हएत देल। अपना देहमे करौआ लगल अछि‍।

सोनी-       जाइ छि‍ऐ बड़की माएकेँ कहैले।
(सोनी, लक्ष्‍मीकेँ कहैले अन्‍दर गेली। एमहर संतोषी और गबदि‍आ कऽ पड़ि‍ रहली। सोनी आ लक्ष्‍मीक प्रवेश।)
लक्ष्‍मी-       छोटकी, छोटकी, छोटकी।
सोनी-       अखने जगले छेलै। तुरन्‍ते देखही। गै माए सूतल लोक ने जगैए, जागल की जगतै।
लक्ष्‍मी-       (जोरसँ) छोटकी, छोटकी, छोटकीऽ ऽ ऽ ऽ।
           (संतोषी फुड़फुड़ा कऽ उठै छथि‍।)
संतोषी-            की कहलि‍ऐ दीदी?

लक्ष्‍मी-       सोनीकेँ अहाँ किए कहलि‍ऐ, देहमे करौआ लगल अछि‍?

संतोषी-      हम से कहाँ कहलि‍ऐ। हम अपना दऽ कहलि‍ऐ जे हमरा देहमे करौआ लगल अछि‍ की। एतबेपर बुच्‍ची भागि‍ गेली
सोनी-       अपन बेटाक माथपर हाथ रखि‍ कऽ कहबै?

संतोषी-            हम बजबे नै केलि‍ऐ। एतेक आगि‍ किए उठबै छी सोनी।
साेनी-       आगि‍ तँ अहाँ उठबै छी आ लगबै छी। हमरे माथपर हाथ रखिकऽ बाजू तँ।

संतोषी-      हँ यै, साँच बात कि‍एक ने बाजब। आउ, लग आउ।
लक्ष्‍मी-       बूझि‍ गेलौं अहाँ केते साँच बजै छी। अनकर बेटा-बेटी उपरेमे अबै छै आ अपन बड़ कसेब कऽ छै। ि‍नर्लज्‍जी नहि‍तन। झूठ बजैत कोनो गत्तरमे लाजो नै होइ छन्‍हि‍।

संतोषी-      ि‍नर्लज्‍जी तँ अहाँ छी जे बेटीक पक्ष लऽ कऽ फेफि‍या कऽ उठै छी।
लक्ष्‍मी-       ि‍नर्लज्‍जी ि‍नर्लज्‍जी करब तँ अखनि झोंटा पकड़ि‍ कऽ पोटा ि‍नकालि‍ देब।
संतोषी-      कनी देखि‍यौ तँ झोंटा पकड़ि‍ कऽ।
(रामलालक प्रवेश)
रामलाल-     अहाँ सभ कथीले हल्‍ला-फसाद करै छी? चुपै जाउ। छोटकी, की बात छै?

संतोषी-      दुनू माइ-धीन हमरा कहैए, झोंटा पकड़ि‍ कऽ पोटा नि‍कालि‍ देब।
रामलाल-     बड़की, अहाँ से किए कहलि‍ऐ?

लक्ष्‍मी-       हँ हँ, हमरा सींग बढ़ि‍ गेलै तँए दुआरे। ओकरे पुछि‍यौ तँ।
रामलाल-     की बात छै छोटकी?

संतोषी-      ओकरे सभकेँ पुछि‍यौ।
रामलाल-     की भेलै बुच्‍ची?

सोनी-       हमरा माथा दुखाइ छेलए। इसकूलो नै गेलौं। बासि‍ मुहेँ रही। छोटकी माएकेँ कहलि‍यनि‍ खाइले दि‍अ। तँ ओ कहलनि‍, अपनेसँ लऽ लि‍अ। देहमे करौआ लगल अछि‍। ई बात बड़की माएकेँ कहलि‍यनि‍ तँ ओ माएसँ लड़ैले तैयार छथि‍।
रामलाल-     हमरा तोरापर बिसवास अछि‍ बुच्‍ची। तों फूसि‍ नै बाजि‍ सकै छेँ। हम बात बूझि‍ गेलौं। छोटकी, सोलहन्नी अहाँक गलती अछि‍। बड़कीसँ अहाँ लगती मानू। नै तँ एहेन घरवाली हमरा नै चाही। अपन जोगार देखू। जेहने हमर परि‍वारक सुबेवस्‍थाक चर्चा सौंसे गाम होइ छेलए तेहने परि‍वारक प्रति‍ष्‍ठाकेँ माटि‍मे मि‍लबए चाहै छी‍। तुरन्‍त सोचि‍ कऽ बाजू, की चाहै छी?

संतोषी-      (कि‍छु सोचि‍ कऽ, बड़कीक पएर पकड़ि‍) हमरेसँ गलती भेलै। आब गलती कहि‍यो नै हेतै।
रामलाल-     बड़की, आइ माफ कऽ दि‍यनु। आइ दि‍नसँ गलती नै करतै। सदिकाल मीलि‍ कऽ रहै जाइ जाउ।
जहाँ सुमति‍ वहाँ सम्पत्ति‍ नाना।
जहाँ कुमति‍ वहाँ वि‍पति नि‍धाना।

पटाक्षेप।


दृश्‍य- दू
(स्‍थान- लखनक घर। लखन दलानपर बैसल छथि‍ आ पारि‍वारि‍क स्‍थि‍ति‍क सम्‍बन्‍धमे सोचि‍ रहल छथि‍।)
लखन-       की करी नै करी, कि‍छु ने फुड़ाइत अछि‍। बेटी रामपरी सेहो ताड़ जकाँ बढ़ि‍ रहल अछि‍। आमदनी कम छै आ परि‍वारमे खर्चा बड़ छै।
           (मनोज आ संतोषक प्रवेश।)
मनोज-       पापा, बहुते छौंड़ा सभ इसकूल जाइ छै पढ़ैले। हमहूँ सभ जाएब। हमरो सभकेँ नाम लि‍खा दि‍अ ने सरकारी इसकूलमे।

लखन-       नाम लि‍खबैमे पाइ लगतै, कि‍ताब-कोपीमे पाइ लगतै, टीशन पढ़ैमे पाइ लगतै। हमरा ओतेक सकरता नै अछि‍। हमरा बुते नै हेतौ। पहि‍ने पेटक चि‍न्‍ता कर।
संतोष-       पापा, रामपरी आ कृष्‍णा जे पब्‍लि‍क इसकूल जाइ छै से? ओकरा सभकेँ पाइ नै लगै छै?

लखन-       से मम्‍मीसँ पुछही गऽ। पाइ कोनो हम दइ छि‍ऐ।
संतोष-       मम्‍मीकेँ बजा कऽ एतए आनू। कनी अपनेसँ कहबनि‍।
लखन-       जो बजा आन।
           (संतोष शीघ्र मीनाकेँ बजा कऽ अनैत अछि‍।)
मीना-        की कहै छी?

लखन-       की कहब। मनोज-संतोष कहैए हमहूँ पढ़ब, से की करबै।
मीना-        कप्‍पार करबै, अंगोरा करबै, धधकलहा करबै।

लखन-       एना किए बजै छी? बोलीमे कनि‍यो लसि‍ नै अछि‍। हरदम निशाँमे चूर रहै छी।

मीना-        बड़ फटर-फटर बजै छी। मुँह बन्न करू, नै तँ बूझि‍ लि‍अ। जाउ अहाँ एतएसँ। एकरा सभकेँ हम जवाब दइ छि‍ऐ।
(लखनक प्रस्‍थान)
की कहलेँ मनोज?

मनोज-       मम्‍मी, हमरो सभकेँ इसकूलमे नाम लि‍खा दि‍अ। बहुते छौड़ा सभ इसकूल जाइ छै।
मीना-        बड़ पढ़ुआ भऽ गेलेँ तो सभ? बि‍ना ढौएक पढ़ाइ होइ छै, की खेनाइ होइ छै? पेट भरै छौ तँए फुड़ाइ छौ। एतएसँ अक्खैन भाग। नै तँ बढ़नी देखै छीहीन। कमा कऽ लाऽ तँ खो वा पढ़। नै तँ घर नै टपि‍ सकै छेँ तों सभ।
मनोज-       मम्‍मी, हमरा सभकेँ कमाएल हेतै। जनमे के रखतै?

मीना-        नै कमाएल हेतौ तँ भीखे मँगि‍हेँ आ ओम्‍हरे खइहेँ

संतोष-       अपना बेटा-बेटीकेँ पढ़ाबै ले होइए आ हमरा बेरमे की होइए?

मीना-        भगलेँ सरधुए सभ की?
           (बढ़नी लऽ कऽ मारैले दौगल। संतोष भागि‍ गेल। मनोज पकड़ा गेल। पढ़ुआकेँ सार अछि‍ भगलेँ एतएसे कहि‍ कहि‍ मनोजकेँ मीना बढ़नीसँ झँटलक। अन्‍तमे हाथसँ छूटि‍ कऽ कनैत-कनैत भागि‍ गेल।)
पढ़ैए। फोकटेमे पढ़ाइ होइ छै।
(हकमैत-हकमैत) ऊपरेमे अल्हुआ फड़ै छै।
पटाक्षेप।

दृश्‍य- तीन

(स्‍थान- आन गामक बाट। मनोज कानि‍ रहल अछि‍। संतोष-संतोष चि‍चि‍या रहल अछि‍। बटोही सभसँ पूछि‍ रहल अछि‍। आँखि‍सँ दहो-बहो नोर जा रहल अछि‍।)
मनोज-       हौ बटोही, हमरा संतोषकेँ देखलहक?

हरेराम-            नै, हम नै देखलियौ।
मनोज-       (हि‍चुकि‍-हि‍चुकि‍ कऽ कानि‍) संतोष रौ संतोष। असगरे हम केना रहबै रौ संतोष। तों केतए भागि‍ गेलेँ रौ संतोष। हौ बटोही, एगो छौड़ाकेँ भागैत केतौ देखलहक?

अनबर-      नै बौआ, नै देखलि‍यौ। के छेलौ तोहर ओ?

मनोज-       हमरे भाए छेलै। यै काकी, एगो छौड़ाकेँ देखलि‍ऐ केम्‍हरो भागल जाइत।

आरती-       हँ बौआ, एगो छौड़ा हमरे पाछू-पाछू अबै छेलए। अखने केम्‍हर गेल केम्‍हर नै। केतेटा छेलए? केहेन कपड़ा-लत्ता पहि‍रने छै?

मनोज-       नअ-दस बर्खक छै। मलि‍-ढलि‍ कपड़ा पहि‍रने छै।
आरती-       हँ देखलि‍यौ बौआ। देखहीन गऽ अही सभमे केतौ बौआइत हेतौ। तुरन्‍ते हमरे पाछू-पाछू छेलौ।
मनोज-       संतोषबा छि‍यँए रौ, संतोषबा छि‍यँए रौ।

संतोष-       (अन्‍दरसँ) हँ, हैइए छी भाइजी। आबै छी।

मनोज-       केतए छेँ रौ? जल्‍दी आ।
संतोष-       भूख लगल छल। अही आँगनामे खाइ छेलौं।
जल्‍दी एलौं।
मनोज-       जल्‍दी आ।
           (संतोषक प्रवेश।)
संतोष-       भायजी यौ भायजी।

मनोज-       बौआ रौ बौआ। तोरा फकरैत-फकरैत हमरा ठोंठ सुखा गेलौ। (दुनू गरदनि‍ मि‍लैत अछि‍)
संतोष, भूख हमरो बड़ लागि‍ गेल छौ। चल, केकरोसँ मांगि‍ कऽ खएब।
संतोष-       भायजी, ई मलि‍काइन बड़ नीक लोक छै। एक्के बेर कहलि‍यनि‍ जे मलि‍काइन कि‍च्‍छो खाइले दि‍अ, बड़ भूख लगल यऽ तँ कहलनि‍- , खा ले। बेचारी भरि‍ पेट खुएलक। एक बेर अहुँले पूछऽ दि‍अ

मनोज-       बौआ, मलि‍काइन की सोचथि‍न जे छौड़ा सभ बड़ लोभी अछि‍।

संतोष-       भायजी, बेगरता भेलापर गदहोकेँ नाना कहए पड़ै छै। आ ओ तँ मलि‍काइन छथि‍न।
मनोज-       बेस, पूछहीन।
(संतोष अन्‍दर जा कऽ)
संतोष-       मलि‍काइन, मलि‍काइन।
राधा-        की कहै छैं?

संतोष-       कहैत तँ लाज होइए।
राधा-        कह ने, की कहए चाहै छेँ?
संतोष-       भायजीओ केँ बड़ भूख लगल छै। परसुए भि‍नसर मम्‍मी हमरा दुनू भाँइकेँ बाढ़नि‍सँ झाँटि‍-झाँटि‍ कऽ घरसँ भगाए देलक।
राधा-        बाप नै छथुन?

संतोष-       बाप ओकरे दि‍स छै। हमरा सभकेँ कहैए पहि‍ने पेटक चि‍न्‍ता कर।
राधा-        माए अपन नै छि‍यौ?

संतोष-       नै, हमर माए मरि‍ गेलै ने तँ पापा दोसर बि‍आह केलकै।
राधा-        भायजीकेँ बजा आनहीन।

संतोष-       मलि‍काइन, दि‍यौ ने, नेने जाइ छि‍ऐ। दूरेपर खा लेतै।
राधा-        तों चल। हम नेने अबै छि‍ऐ।
(संतोष बहराए मनोज लग आएल।)
मनोज-       की कहलखुन?

संतोष-       कहलखि‍न, तों चल। हम नेने अबै छी।
(राधाक प्रवेश। लोटामे पानि‍ आ थारीमे खेनाइ लऽ कऽ)
राधा-        ले बौआ खो।
(मनोज बैसि‍ कऽ खा रहल अछि‍।)
बौआ, नवकी माएकेँ धि‍या-पुता छौ?

मनोज-       हँ, दूगो छै- एगो बेटा-एगो बेटी।
राधा-        ओकरा सभकेँ मानै छै की?

मनोज-       हँ हँ, खूम मानै छै। पढ़ेबो-लि‍खेबो करै छै। हम कहलि‍ऐ- हमहूँ सभ पढ़ब। तइले हमरा बाढ़नि‍येँ-बाढ़नि‍येँ खूम झँटलक आ घरोसँ नि‍कालि‍ देलक।
राधा-        तों खो बौआ। दुनू भाँइ भीखो मांगि‍ कऽ पढ़ि‍हऽ-लि‍खि‍हऽ। आइ-काल्हि‍ बि‍नु पढ़ने काज नै चलतह। केहेन-केहेन पढ़ुआ तँ घास छि‍लै छै आ मुरखाहाकेँ के पूछतै?
           (मनोज खा कऽ थारी धोइ देलक।)
आब तों सभ जो बौआ।
(दुनू राधाक पएर छूबि‍ प्रणाम करै छै। राधा दुनूकेँ असिरवाद माथपर हाथ रखिकऽ दइ छथि‍न।)
पटाक्षेप।

          

दृश्‍य- चारि
(आन गामक बाट। बाटमे चलैत-चलैत मनोज आ संतोष गप-सप्‍प करैत अछि‍। भीख मंगैक योजना बनबैत अछि‍।)
मनोज-       हम गेबै तँ तों बजबि‍हेँ आ तों गबिहेँ तँ हम बजेबौ।

संतोष-       भायजी, अहाँ की गेबै आ हम की बजेबै?

मनोज-       दुनू भाँइ अल्ला-रूदल गेबै आ लोटे-छि‍पली बजेबै। जेना मुसहरीमे होइ छेलै।
संतोष-       लोटा-छि‍पली केतएसँ आनबै?

मनोज-       केकराेसँ मांगि‍ लेबै।
संतोष-       भायजी, एगो कहि‍यौ तँ।
मनोज-       कहै छि‍ऐ। आ ऽऽऽऽ, जतरा बनेलि‍ऐ शारदा मैया आजू गै बनाय ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ।
           भीख मंगैले एलौ, अहीं गाम-घरमे। पढ़ैले कहलि‍ऐ तँ, देलक माए नि‍कालि‍। बढ़नीसँ झाँटि‍-झाँटि‍ कऽ सतौत भगौलक।
           (अल्‍लारूदल सूनि‍ लोक सबहक भीड़ भऽ गेलै।)
रामसेवक-     (संतोषसँ) बौआ, एगो तोहू कही।
संतोष-       पाइ देबहक, खाइले देबहक।
रामसेवक-     हँ देबौ।
संतोष-       एगो छि‍पली आ एगो लोटा देबहक बजबैले? फेरो दऽ देबह।
रामसेवक-     हँ देबौ। आनि‍ दइ छि‍यौ।
(अन्‍दर जा कऽ एगो लोटा आ एगो छि‍पली आनलक आ संतोषकेँ देलक।)
संतोष-       भायजी, लि‍अ छि‍पली-लोटा आ बजाउ अहाँ।
(मनोज छि‍पली-लोटा बजा रहल अछि‍।)
सुनै जाइ जाउ माता-पि‍ता, भाए-बहि‍न सभ।
आ ऽ ऽ ऽ ऽ, से किए गै सतौत माता, अपन बेटा-बेटीले दुनू भायकेँ भगौलेँ।
दुनू भाँइ कोन गलती केलि‍ऐ, नाम लि‍खबए पापाकेँ कहलि‍ऐ।
पापापर ओ शासन केलकै, डरे पापा जुआ पटकलकै।
अपन बेटाकेँ इसकूल धरेलकै, हमरा इसकूलक मुँहोँ नै देखौलकै।
तैयो बैमनमा दुनू भाँइकेँ, पेटोक जोगार नै केलकै यौऽ ऽ ऽ ऽ।
(थोपरीक बौछार भऽ गेलै। मुलकि‍न बि‍स्‍कुट-पाइ सेहो पड़लै। दुनू भाँइ पाइ बि‍स्‍कुट समटि‍ कऽ जाए रहल अछि‍। दर्शकगण सेहो अपन-अपन घर गेल। बाटमे दुनू भाय गप-सप्‍प करैत अछि‍।)

संतोष-       भायजी, कतेक भेलै?

मनोज-       बहुते भेलै बौआ-पच्‍चीस गोट टाका भेलै आ पाँच डि‍ब्‍बा बि‍स्‍कुट भेलै। की सभ करबीहीन पाइकेँ?

संतोष-       चलू ने भायजी होटल। खूम मासु-भात खाएब आ कनी-मनी दारूओ पीब लेब।
मनोज-       एहेन गप्‍प फेर कहि‍यो धोखोसँ नै बजिहेँ। कोन परि‍स्‍थि‍ति‍मे लोक पाइ देलकौ, से मोन पारहीन। अबैकालमे मलि‍काइन की कहने छेलखुन से मोन छौ?

संतोष-       नै भायजी बि‍सरि‍ गेलि‍ऐ। अहीं कहि‍यौ।
मनोज-       पढ़ै दऽ ऽ ऽ।

संतोष-       हँ हँ हँ, आब धक्क दऽ मोन पड़ल। दुनू भाँय भीखो मांगि‍ कऽ पढ़िहेँ-लि‍खिहेँ। आइ-काल्हि‍ बि‍नु पढ़ने काज नै चलतह।
मनोज-       तब सएह, हमरा लोकनि‍ केना पाइक गलत काज करब? गुरो खुद्दीसँ काज चलि‍ जेतै। पहि‍ने पढ़ैक जोगार कर बौआ।
संतोष-       आ रहबै केतए?

मनोज-       चल ने, केतौ हलुको दाममे ओढ़ना-बि‍छौना कीनि‍ लेब आ कोनो टीशनपर रहब। ओतए इजोतो रहै छै। ओही इजोतमे राति‍मे पढ़बो करब आ गुजर जोग गीत गाबि‍ पाइ कमाएब।
संतोष-       भायजी, बड़ चिक्कन वि‍चार अछि‍। चलू, पहि‍ने कोनो सरकारी इसकूलमे दुनू भाँइ नाओं लि‍खा लेब। तहन रहैक जोगार करब। सरकारी इसकूलमे पाइ बड़ कम लगतै। केतौ जँ मोनसँ पढ़बै तँ चि‍क्कन फैदा हेतै।

मनोज-       बेस, चल बौआ। आइ केतौ नाओं लि‍खाइ लेब। चल।
(मनोज आ संतोषक प्रस्‍थान।)
पटाक्षेप।

दृश्‍य- पाँच
(स्‍थान- लखनक घर। लखन आ मीना आपसमे गप-सप्‍प कऽ रहल अछि‍। रामपरी आ कृष्‍णा इसकूल गेल अछि‍।)
मीना-        स्‍वामी, छौड़ा सभ माथा खराब कऽ देने छेलए। भने भागि‍ गेल। कहै छेलए पढ़ब। बड़ पढ़ुआक सार भऽ गेल रहए। अपन दुनू बेटा-बेटीक पढ़ाइ केना होइ छै से हमहीं की अहेँ बुझै छी।
लखन-       अहाँ कोनो गलती कहबै रानी। मुदा कहि‍यो-कहि‍यो मोन पड़ि‍ जाइए तँ बुकौर लागि‍ जाइए।
मीना-        एकर माने अहाँक धि‍यान ओकरे सभ दि‍स अछि‍ हमरा सभ दि‍स नै।
लखन-       आहि‍रेबा, ओकरा सभ दि‍स रहि‍तए तँ ओकरा सभकेँ तैकति‍ऐ ने, खोज-खबरि‍ रखि‍ति‍ऐ ने?

मीना-        नै यौ, अहाँ हमरा सभपर धि‍यान नै दइ छी।
           (आइसँ हमरा अहाँक कोनो मतलब नै।)
(रूसि‍ रहैत अछि‍।)

लखन-       अहाँ खातीर हम दुगो बेटा-ति‍यागलौं आ तैयो उनटे मुँह फुलेने छी।
मीना-        ओइ दुनू चकेठबाक नाओं नै लि‍अ। नै तँ बात केनादन भऽ जाएत।
लखन-       संतोषबा मनोजबाक नाओं आब नै लेब। सएह ने और की?

मीना-        हमरा टोकि‍ नै सकै छी। हमर बेटा-बेटी मेघसँ ढब सन खसलै की।
लखन-       हे हे, पएर पकड़ै छी, दाढ़ी पकड़ै छी।
(छुलकि‍-छुलकि‍ मीना भागि‍ रहल अछि‍। लखन आगाँ-पाछाँ करैत खुशामद करैत अछि‍। मुदा ओ लखनसँ बजा-भुकी बन्न केने अछि‍।)
हे हे, लोक सभ की कहतै? लखना बहुरागी भऽ गेल। लाउ जाँति‍ दइ छी। ऐ बीचमे अहाँ बड़ मेहनति‍बला काज केलौं। मीना कृष्‍णा आ रामपरीक खाि‍तर हम जान दइले तैयार छी। अहाँ सन सुन्नरि‍ दुनि‍याँमे के छै? हेमा मालीन अहाँक तरबो जकाँ नै छै। लाउ पएर रानी, कनी जाँति‍ दइ छी। हे हे, कान-नाक पकड़ै छी। अहाँक कहल नै काटब।
(मीना पएर बढ़ाए देलनि‍। लखन ओकरा जाँति‍ रहल अछि‍।)
मीना-        देखबै, दुनू भाए-बहि‍न नाम करतै। कोनो सरकारी इसकूलमे पढ़ै छै की। पब्‍लि‍क इसकूलमे, पब्‍लि‍क इसकूलमे।
(रामपरीक प्रवेश)
रामपरी-      पापा, मम्‍मीकेँ की भऽ गेलै?

लखन-       कि‍च्‍छो नै। थाकि‍ गेल छेलखुन मम्‍मी।

रामपरी-      हम जाँति‍ देति‍ऐ। अहाँ किए हरान भेलौं। लोक बुझतै तँ की कहतै?

लखन-       की कहतै बुच्‍ची? कहि‍यो गड़ीपर नाउ तँ कहि‍यो नाउपर गड़ी। बुच्‍ची, अहाँ अखने इसकूलसँ किए चलि‍ एलि‍ऐ?

रामपरी-      पापा, कृष्‍णो चलि‍ आएल। नुकाएल अछि‍। इसकूलमे हेड सर खूम मारलखि‍न। परीक्षामे सभ वि‍षयमे लड्डूए नंबर एलै ओकरा।
मीना-        तहन हेड सर पढ़ेलखि‍न की? काल्हि‍सँ तों सभ इसकूल बन्न कर। ऐसँ बढ़ि‍याँ मुरूखे।

रामपरी-      हेड सर पढ़ेलखि‍न नै तँ आन सभ वि‍द्यार्थीक रि‍जल्‍ट बढ़ियाँ किए होइ छै। हमहूँ बढ़ियाँ जकाँ पास छी। चलए नै आबए तँ आँगने टेढ़।

मीना-        कहि‍ देलि‍यौ। काल्हि‍सँ ओइ इसकूल नै जेबाक छौ। सरकारी इसकूल जइहेँ। ओतइ नाओं लि‍खा देबौ।
रामपरी-      बेस जएह कहबीन सएह ने करबै। मुदा।

मीना-        मुदा, तुदा हम कि‍च्‍छो नै बुझै छि‍ऐ। जे कहै छि‍यौ से कर। बुझलेँ।

पटाक्षेप।


दृश्‍य- छह
(स्‍थान- रेलबे स्‍टेशन। मनोजकेँ बामा हाथ कटल छै आ संतोषकेँ दुनू आँखि‍ गायब छै। संतोष मनोजक कनहा पकड़ि‍ प्‍लेटफाॅर्मपर घूमि‍ रहल छै। तखने अटैची लऽ कऽ राम सेवकक प्रवेश। राम सेवक टकटकी लगा कऽ दुनूकेँ देखि‍ रहल अछि‍। मुदा चि‍न्‍हैत नै अछि‍।)
रामसेवक-     बौआ सभ, हमरा चि‍न्‍है छीही?
संतोष-       हँ हौ, किए नै चि‍न्‍हबह। चि‍न्‍हल लोक केतौ अनचि‍न्‍हार होइ छै। बाजबसँ हम बूझि‍ गेलियऽतोहीं ने हमरा छि‍पली-लोटा आनि‍ देने छेलहक आ गानापर पाइ देने छेलहक।
रामसेवक-     हँ हँ हँ बौआ। तोरा दुनू भाँइकेँ एना किए भऽ गेलौ? पहि‍ने केहेन बढ़ियाँ छेलेँ।
मनोज-       दुनू भाँय इसकूलसँ बससँ टूरपर जाइ छेलि‍ऐ। ड्राइबरकेँ आॅभरटेक करैमे संतुलन नै रहलै। बस पलटी मारि‍ देलक। छह-सात गो मरबो केलै। धनि‍ हेड सर जे हमहूँ सभ जीलौं। बेचारा अपना दि‍ससँ खरचा कऽ जी-जान लगा देलखि‍न।

संतोष-       दूगो स्‍पोर्ट डेथ भेलै। दूगो हाॅस्‍पीटल पहुँचैत-पहुँचैत दम तोड़ि‍ देलकै। तीन गो हॉस्‍पीटलमे दू दि‍नका बाद दम तोड़ि‍ देलक।
रामसेवक-     तों सभ आब ठीक छेँ ने?

मनोज-       हँ अहाँ सबहक पएरक दुआसँ आब हमरा सभ वि‍कलांगो भऽ कऽ ठीक छी। अहाँ केतए जाइ छि‍ऐ काका?

रामसेवक-     कनी दि‍ल्‍ली जाइ छि‍ऐ बौआ। हमर छोटका बौआ दि‍ल्‍लीमे पढ़ै छै। ओकर तबीयत खराब छै। सएह अबैले फोन केने रहए। बौआ, हम जाइ छि‍यौ। हमर गाड़ी अबै छै।
           (दुनू भाँइ पएर छूबि‍ प्रणाम केलक।)
राम सेवक असिरवाद दऽ प्रस्‍थान।)
संतोष-       भायजी, अहाँकेँ इसकूलक बेर भऽ गेल हएत ने?

मनोज-       हँ हँ लेटे भऽ रहल अछि‍। वएह भेँट गेलखि‍न। गप-सप्‍पमे टेम लगि‍ गेल।
संतोष-       जाउ, अहाँ इसकूल। बेसी लेट हएत तँ सर मारता
मनोज-       अहाँ ठीकसँ रहब। बेसी एम्‍हर-ओम्‍हर नै करब। स्‍टेशनपर चोर-उचक्का बड़ रहै छै। छि‍पली-लोटो पार कऽ देत।
संतोष-       हम लगे-पासमे घुमबै आ जेतए जेबै झोरा लटकेने जेबै आ लटकेने रहबै। जाउ अहाँ, लेट होइए।
(मनोज बस्‍ता लऽ कऽ प्रस्‍थान)
           पढ़ै तँ हमहूँ छेलौं। पढ़ैक मोन होइए। मुदा भगवानक इएह मर्जी छेलनि‍ तँ हम की कऽ सकै छी? पढ़ि‍ सकै छी मुदा। खैर हमरा नै पढ़ल हएत तँ कोनो बात नै। मुदा जेना-तेना भाइजीकेँ अबस्‍स पढ़ाएब। आगू भगवानक कि‍रपा।
(प्‍लेटफाॅर्मपर एकठाम बैसि कऽ झोरासँ छि‍पली-लोटा नि‍कालि‍ आ झोरा कनहापर लटका अल्‍ला-रूदल गेबाक तैयारी केलक।)
(1) आ ऽ ऽ ऽ ऽ, जतरा बनेलि‍ऐ बाबू भैया
भीख मंगैले आइ। टका-दू टकासँ कि‍नको, कि‍छु नै बि‍गरतै यौऽऽऽ।
करमक फल सभकेँ भेटै छै,
भलाइक बदला भलाइ भेटै छै।
मुट्ठी बान्‍हि‍ सभ कि‍यो अबै छै,
हाथ पसारि‍ सभकेँ जेनाइ छै।
तैयो नै दाइ-माइकेँ दया अबै छै आइऽ ऽ ऽ।
(दर्शक-श्रोताक भीड़ पाइ बरसा रहल छै। संतोष मस्‍तीमे गाबि‍ रहल छै।)

(2) कोन कुकर्म केलि‍ऐ हम, बाबू भैया दाइ-माइ। जेकर फल आइ भोगै छी यौऽ ऽ ऽ।
(2)सतौत माए घरसँ भगौलकै, बाप पि‍त्ती भऽ घूमि‍ नै तकलकै।
(2)दसे-बारहमे दुनूकेँ भगौलकै,
(2)भरि‍ पेट खाइले नै देलकै।
(2)पढ़ैले बढ़नीसँ झँटलकै,
(2)अपनाकेँ खूब पढ़ौलकै।
(2)भीख मांगि‍ दुनू पढ़ै छेलौं,
(2)बस पलटीमे वि‍कलांग भेलौं
(2)आन्‍हर भऽ नै पढ़िसकलौं,
(2)भायजीकेँ इसकूल पठेलौं
(2)अनाथक नाथ अहीं सभ
(2)दुखि‍याकेँ उबारबै यौऽ ऽ ऽ ऽ।
(2)
(थोपरीक बौछार भेल। पाइक ढेर लागि‍ गेलै। पाइ समटि‍ संतोष अपन जगहपर आबि‍ गेल। सभकेँ प्रणाम कऽ संतोषक प्रस्‍थान।)
पटाक्षेप।











तेसर अंक

दृश्‍य- एक
(लखनक घर। लखन आँगन बहारि‍ रहल छथि। मीना खटि‍यापर पड़ल-पड़ल हुनका देखि‍ रहल छथि‍।)

मीना-        कनी हाथ बैसा कऽ बहारब। खर-पात ओहि‍ना छूटि‍ जाइए।
लखन-       हमरा जहि‍ना हएत तहि‍ना ने बहारब।
मीना-        खाली तीन मन भातक गोला खाइमे होइए। होउ, हबर-हबर आँगना बहारू। वर्तनो ओहि‍ना छै।
लखन-       ताबे अहाँ वर्तनो माँजि‍ लेब से नै।
मीना-        किए अहाँक देहमे करौआ लगल अछि‍। हम आइ कि‍च्‍छो नै करब। आइ हम भरि‍ दि‍न बैस-सुति‍ कऽ खुशी मनाएब।
लखन-       कथीक खुशी?

मीना-        आइ दुनू भाए-बहि‍नक मैट्रि‍कक रि‍जल्‍ट नि‍कलैबला छै। दुनू बुझैले इसकूल गेल अछि‍। ओना दुनू बढ़ियाँ नम्‍बरसँ फस्‍ट हेब्‍बे करतै। ई हमर दाबा अछि‍।

लखन-       पानि‍मे मछरी, नअ-नअ कुटि‍या बखरा। रि‍जल्‍ट अपना हाथमे अछि‍ जे दाबा करै छी।
मीना-        अपन हाथमे नै अछि‍ तइसँ की। हमर बेटा फस्‍ट डि‍बि‍जनसँ पास करबे करत।
लखन-       खैर अहाँसँ के जीतत?

मीना-        तहन किए मुँह लगबै छी? जाउ, वर्त-बासन आनि‍ लि‍अ। एत्तै माँजि‍ लि‍अ। खेनाइक बड़ बेर भऽ गेलैए।
(लखन अन्‍दरसँ वर्त-बासन आनि‍ माँजि‍ रहल अछि‍।)
लखन-       खनि तक बौआ सभ नै आएल?

मीना-        जे काज करए गेलै से कए कऽ ने आएत। ओना अबि‍ते हएत। ताबे हम सुतै छी।
(कनैत-खि‍जैत कृष्‍णा आ रामपरीक प्रवेश।)

लखन-       किए कनै छह बौआ? किए कनै छी बुच्‍ची?

रामपरी-      (हि‍चकि‍-हि‍चकि‍ कऽ) हम एक नंबर ले फाइल भऽ गेलि‍ऐ।
लखन-       आ बौआ?

रामपरी-      बौआकेँ तँ और कनीयेँ नंबर छै।
हमरोसँ दस नंबर कम छै।
लखन-       जाउ, दुनू भाए-बहि‍न, मम्‍मीकेँ कहि‍यनु। बड़ दाबा करैत छेली
(कनैत-कनैत दुनू मीना लग पहुँचल। मीना फुड़फुड़ा कऽ उठली)
मीना-        किए कनै जाइ छेँ तों सभ?

कृष्‍णा-       दुनू भाए-बहि‍न फाइल भऽ गेलि‍यौ।
मीना-        इसकूलमे कए गो फाइल भेलै?

रामपरी-      तीन सए विद्यार्थीमे दूगो। उहो हमहीं दुनू भाए-बहि‍न।
मीना-        , बूझि‍ गेलि‍ऐ। मस्‍टरबा कोनो चक्कर-चालि‍ लगौने हएत
रामपरी-      नै मम्‍मी, सरक कोनो चक्कर-चालि‍ नै भऽ सकै छै। हमरे सबहक गलती हेतै।

मीना-        खनि तोरे सबहक गलती हेतै तखनि आइ अखनिसँ तों सभ कि‍ताब-कोपी छुइ नै सकै छेँ। सोचै छेलौं बेटा-बेटीकेँ इसपी. कलक्‍टर बनाएब। जो रामपरी कि‍ताब कोपी नेने आ। डाहि‍ दइ छि‍ऐ। ओते पाइमे केते जमीन कीनने रहि‍तौं? तोरा सभकेँ पढ़ाबैमे कंगाल भऽ गेलौं। अखनि कि‍ताब-कोपी ला, सभटाकेँ डाि‍ह दइ छि‍यौ।

रामपरी-      एगो मौका और दहीन मम्‍मी।
मीना-        मौका-तौका हम नै बुझै छि‍ऐ। तोरा सबहक खाति‍र हम बीकि‍ गेलौं। जो आब तों सभ मुरूखे रह। हमरा नै पढ़ेबाक-लि‍खेबाक अछि‍। हमरा सामनेसँ भागै जाइ-जो।
           (दुनू भाए-बहि‍न मम्‍मीक पएर पकड़ि‍ लैत अछि‍।)
रामपरी-      मम्‍मी, एकटा मौका आैर दहीन।
कृष्‍णा-       मम्‍मी, एगो मौका और दहीन।

लखन-       कहै जाइए तँ एगो मौका और दियौ। असफलते सफलताक जननी अछि‍।
मीना-        हमरा नै सीखाउ। हम अपने बड़ सीखने छी। केहेन केहेन गेल्‍ला तँ मोछबला एल्‍लामोँछबला गेल्‍ला तँ नि‍मोच्‍छा एल्‍ला। अपन काज करू अहाँ। पएर छोड़ै जाइ जो। मौका हम नै बुझै छि‍ऐ।
(कृष्‍णा आ रामपरी पएर नै छोड़ै छै। मीना जबरदस्‍ती लगमे राखल ठेंगासँ दुनूकेँ मारि‍-मारि‍ कऽ भगबै छै।)
सभसँ घटि‍या काज पढ़ेनाइ-लि‍खेनाइ अछि‍। एहनो सड़ल काज कि‍यो करए?
पटाक्षेप।

दृश्‍य- दू
(स्‍थान- रामलालक घर। लक्ष्‍मी, संतोषी, सोनी, मोनी, पप्‍पू, रानी, अमर आ सुमन रामलालक संग प्रसन्न मुद्रामे बैसल छथि‍ दलानपर। सभ एक दोसरकेँ चकलेट खोआ रहल अछि‍। सोनी-मोनीक रि‍जल्‍टक खुशीमे।)
रामलाल-     हमर सोनी बेटी अपन इसकूलमे स्‍टूड फस्‍ट आ मोनी स्‍टूड सकेण्‍ड केली। एहेन सुन्‍दर रि‍जल्‍ट पाबि‍ हम अति‍ प्रसन्न छी। आ बड़की अहाँ?

लक्ष्‍मी-       रि‍जल्‍टक खुशीमे हमरा मोन होइए दारू पीबि‍तौं। मुदा लोक की कहत?

रामलाल-     छोटकी अहाँ?

संतोषी-      हमहूँ बहुत प्रसन्न छी। हमरा मोन होइए जे हमहूँ पढ़ि‍तौ आ एहने रि‍जल्‍ट अनि‍तौं। बड़ नाम होइतए।

रामलाल-     ई तँ आब संभव नै अछि‍। धि‍या-पुताक सम्‍बन्‍धमे अपन वि‍चार दि‍अ।
संतोषी-      हमर इएह वि‍चार जे जेतेक संभव हुअए, सभ धि‍या-पुताकेँ मनसँ पढ़ाउ आ काबि‍ल बनाउ। वि‍द्या सभसँ पैघ धन छी। ई स्‍थायी सम्‍पतिछी।
रामलाल-     अहाँक वि‍चार अति‍ उत्तम अछि‍। हमरा बेसी पढ़ाएल तँ नै हएत मुदा जेतए तक हएत तइमे पएर पाछू नै करब। मरि‍तो दम तक हि‍म्‍मत नै हारब। सुनै जाइ-जाउ बौआ-बुच्‍ची सभ। अहाँ सभ खूम मनसँ पढ़ु। खर्चा जे हेतै से हम जेना-तेना पुराएब।

सभ धि‍या-पुता- जी पापा, हम सभ खूम मनसँ पढ़ब आ बड़का हाि‍कम बनब।
पटाक्षेप।
दृश्‍य- तीन
(स्‍थान- रेलबे स्‍टेशन। संतोष अल्‍ला-रूदल गाबैक तैयारी कऽ रहल अछि‍।)

संतोष-       बारह बजे राति‍मे भाइजी आएल रहथि‍, ओ कहलनि‍- बौआ, हम आइ..सए.क परीक्षामे स्‍टूड फर्स्‍ट केलौं। आब हम कलक्‍टर बनब। हम ट्रेनि‍ंगमे जा रहल छी। तों ठीकसँ रहि‍हऽ। हम जल्‍दी आएब।
           आ भवानक महि‍ना, अगम-अथाह छै यौऽ ऽ ऽ ऽ।
तन मन धनसँ श्रम करू, सफलता भेटबे करत।
अहींसँ भीख मांगि‍ भाइजीकेँ पढ़ौलि‍ऐ। अहींक असिरवादसँ, कलक्‍टर बनेलि‍ऐ। तैयो बाप-पीत्ती भऽ, हुलकी नै देलकै यौ ऽ ऽ ऽ।
           (नीक बेक्‍ती‍त्‍वमे मनोजक प्रवेश।)
संतोष गीत गेेेनाइ बन्न कऽ देलक। मनोज सभकेँ दहि‍ने हाथसँ प्रणाम करैथि‍।
मनोज-       बौआ संतोष, नीक छी ने?

संतोष-       भाइजी एलौं।
           (पएर छूबि‍ प्रणाम कऽ)
हम पूर्ण कुशल छी। अपने नीकेना एलौं ने?

मनोज-       हँ बौआ, हम बढ़ियाँ जकाँ एलौं ट्रेनि‍ंगो बड़ नीकसँ केलौं।
           परम आदरणीय,
           माए-बाप, भाय-बहि‍न।
           मनोजक हार्दिक प्रणाम।
अपने सबहक असिरवादसँ हम आइ आंध्रप्रदेशक कलक्‍टर बनि‍ ज्‍वाइन करए जा रहल छी। एकटा भीखमंगाकें अपनेक टाका-दू टाका तारि‍ देलक। तइले अपने सभकेँ हार्दिक धैनवाद
हमरा कलक्‍टर बनेबाक मूल श्रेय हमर परम प्रि‍य अनुज संतोषकेँ जा रहल छन्‍हि‍।
आइक बाद हमर संतोष अपने सभकेँ सेवा नै कऽ सकता। हि‍नका अपने संग नेने जा रहल छि‍यनि‍। हमरा लेल ई की की नै केला। हम हि‍नकर संग आब केना छोड़ि‍ देबनि‍। हम आजीवन हि‍नकर आभारी रहबनि‍।
अंतमे, यएह कहब जे हमरा सबहक गलतीकेँ क्षमा करब। धैनवाद

संतोष-       हम अपने सबहक संग घूलि‍-मि‍ल गेल रही। एतएसँ टसकबाक मोन नै होइए। मुदा भाइजीक आदेशकेँ केना ठोकरा सकै छी? जाइए पड़त। क्षमाप्रार्थी संतोषक दि‍ससँ समस्‍त दर्शक वृंदकेँ कोटि‍-कोटि‍ धैनवाद

(मनोजक संग झोरा-झपटी लऽ कऽ संतोषक प्रस्‍थान।)
पटाक्षेप।


दृश्‍य- चारि‍म

(स्‍थान- कलक्‍टरक आवास। सि‍पाही वीरभद्र गेटपर ठाढ़ छथि‍। संतोष डेरापर अछि‍। मनोज आॅफि‍स गेल छथि‍। दीन-हीन अवस्‍थामे रामलालक प्रवेश।)
वीरभद्र-      का बात हाउ?

रामलाल-     सरकार, कनी हाकि‍मसँ भेँट केनाइ आवश्‍यक छै।
वीरभद्र-      हाकि‍म अभी न हाउ। जा कल अबिहऽ
रामलाल-     डेरापर कि‍यो छथि‍न्‍ह सरकार?

वीरभद्र-      हँ, हुनकर भाए।
रामलाल-     हुनकोसँ भऽ सकै अछि‍। कथा-कुटमैतीक सम्‍बन्‍धमे गप-सप्‍प छै।
वीरभद्र-      अच्‍छा आबह।
(रामलाल अन्‍दर जा कऽ संतोष लग बैसि गप-सप्‍प शुरू केलनि‍।)
रामलाल-     सर प्रणाम, हम ठहरलौं एगो अति‍ ि‍नर्धन बेकती‍। बड़ आशासँ हम अपने लग पहुँचबाक दुस्‍साहस केलौं।
संतोष-       कहू की बात?

रामलाल-     सर, हमरा तीनटा बेटी अछि‍। ओइमे पहि‍ल बेटीक बि‍आह लेल अपने ओइठाम पहुँचलौं हेन। कलक्‍टर साहैबक हाथ अपना बुच्‍ची ले मांगए एलौं अछि‍।
सर एगो गरीबोकेँ तारीयौ?

संतोष-       गरीबक सम्‍बन्‍धमे हमरा अपने कि‍छु नै कहि‍यौ श्रीमान्। बायोडाटा आ लड़ि‍कीक फोटो अपने अनने छी?

रामलाल-     हँ सर, अनने छी। इएह लि‍अ।
(झोरासँ नि‍कालि‍ कऽ सर्टिफि‍केट आ फोटो संतोषकेँ देलनि‍।)
संतोष-       श्रीमान्, लड़ि‍की केहेन छथि‍?

रामलाल-     अपन मुँहसँ अपन बड़ाइ ठीक नै। ओना अछि‍।
संतोष-       हम बायोडाटा कलक्‍टर साहैबकेँ देखा देबनि‍। हुनकर जे जेना वि‍चार होन्‍हि‍।
रामलाल-     हम काल्हि‍ फेर आएब सर। सर, हमरा ि‍बन्‍दुपर सकारात्‍मक ढंगसँ सोचबाक प्रयास अबस्‍स करबै।
संतोष-       ईश्वरक इच्‍छापर छोड़ि‍ दि‍यनु।

रामलाल-     धैनवाद सर। जय रामजी की।
संतोष-       जय रामजी की।
           (रामलालक प्रस्‍थान।)
पटाक्षेप।

दृश्‍य- पाँच
(स्‍थान- कलक्‍टरक आवास। दुनू भाँइ संतोष आ मनोज बि‍आहक सम्‍बन्‍धमे गप-सप्‍प कऽ रहल छथि‍।)

मनोज-       बौआ, काल्हि‍ आॅफि‍समे बैसल रही तँ बि‍आहक लेल एकटा आॅफर आएल। लड़ि‍की एस.पी. छै। अहाँक सोच सकारात्‍मक अछि‍। तँए अपनेक सलाह हमरा सि‍रोधार्य हएत।
संतोष-       अपने श्रेष्‍ठ छि‍ऐ आ आइ..एस. आॅफि‍सर सेहो छि‍ऐ। अहाँकेँ हम की सलाह दऽ सकै छी? ओना अहाँक अनुपस्‍थि‍ति‍मे काल्हि‍ एगो गरीब पहुँचल छेलथि‍। हुनक जि‍ज्ञासा आ साहसेकेँ धैनवाद दइ छि‍यनि‍। बायोडाटा सभ आ फोटो दऽ गेला आ कहलनि‍ जे कलक्‍टर साहैबकेँ देखा देबनि‍। हम काल्हि‍ फेर आबै छी।
ओ आइए एता। देखि‍यौ हुनकर बायोडाटा आ फोटो।

           (संतोष मनोजकेँ बायोडाटा आ फोटो देलनि‍। मनोज गौरसँ देखि‍ रहल छथि‍।)

मनोज-       बौआ, अहाँक की वि‍चार? ओना डेकोमेन्‍ट्स तँ सभ तरहेँ नीक छै।
संतोष-       यदि‍ डेकोमेन्‍ट्स अहाँकेँ पूर्ण रूपेन नीक लगैए तँ ई बि‍आह कएल जा सकैए। गरीब ने गरीबक दु:ख बुझतै भायजी। वानर जानए आदीक स्‍वाद।
मनोज-       बौआ, अहीं कहू, की ि‍नर्णए लेल जाए? एक दि‍स एस.पी. लड़की आ दोसर दि‍स साधारण बी.. पास लड़ि‍की सेहो गरीब।
संतोष-       हमरा वि‍चारसँ बी.. पास लड़ि‍की अपनाएल जाए। कारण ओ जि‍नगी भरि‍ प्रति‍ष्‍ठा दैत रहतीह।
मनोज-       बौआ, अहाँक वि‍चारकेँ हम कहि‍यो काटि‍ नै सकै छी। कारण हमरा लेल अधलाह अहाँ कि‍न्नहु नै सोचि‍ सकै छी। अहाँक जे जेना वि‍चार हएत से हमरा मान्‍य अछि‍।
           हमरा आॅफि‍सक टाइम भऽ गेल। हम आॅफि‍स जा रहल छी।
(मनोजक प्रस्‍थान आ रामलालक प्रवेश।)
रामलाल-     प्रणाम सर।
संतोष-       प्रणाम-प्रणाम। आउ बैसल जाउ।
           (संतोष आ रामलाल बैसि कऽ गप-सप्‍प कऽ रहल छथि‍।)
रामलाल-     सर, हम अपन समैपर उपस्‍थि‍त‍ छी। अपनेक जे आज्ञा?

संतोष-       अपने श्रेष्‍ठ छि‍ऐ आ कर्मठ सेहो छि‍ऐ। अपनेक आज्ञाक पालन अबस्‍स हेतै। अहाँक प्रस्‍ताव हमरा लोकनि‍केँ मान्‍य अछि‍।

रामलाल-     सर, सचमुच अपने महान छि‍ऐ। एहेन सुन्‍दर वि‍चार आ ि‍नर्णए लेल अपने सभकेँ हमर हार्दिक धैनवाद। तहन की केना अगि‍ला आज्ञा होइ छै सर।
संतोष-       श्रीमान्, अपने गरीब छि‍ऐ आ भाइजी केँ सेहो समैक बड़ बेसी अभाव रहै छन्‍हि‍। तँए काल्हि‍ काली-मंदि‍रमे आबि‍ बि‍अाह कार्यक्रम संपन्न कऽ लि‍अ। पाइ-कौड़ी जे कि‍छु खरच हेतै दुनू दि‍सक से हमर। जाउ, अपने सभ काल्हि‍ काली मंदि‍रक प्रांगणमे एगारह बजे पहुँचजाएब। तखने हमहूँ सभ पहुँचजाएब।
बि‍आह एक बजे हएत। बेसी लाम-काफ नै हेतै।
रामलाल-     बेस, तँ हम जा रहल छी। जय रामजी की।
संतोष-       जय रामजी की।
(रामलालक प्रस्‍थान।)
पटाक्षेप।

दृश्‍य- छह
(स्‍थान- काली मंदि‍र। पुजारी हरि‍नन्‍दन पूजामे लीन छथि‍। रामलाल, लक्ष्‍मी, सोनी, मोनी, पप्‍पु, संतोषी, रानी, अमर आ सुमनक प्रवेश।)
सभ कि‍यो सजल-सजल अछि‍। तुरन्‍त मनोज, संतोष, वीरभद्र, स्‍टेनो अमन, आ नौकर चन्‍दन बरि‍यातीक रूमे प्रवेश। दुनू पक्षसँ नमस्‍कार-पाती भेल। सभ कि‍यो कुरसीपर बैसला। परि‍छन भेल। लड़ि‍का-लड़ि‍की मंदि‍रक सामने लगल वि‍शेष कुरसी-टेबूलपर बैसलथि‍। पुजारी पूजा कऽ आबि‍ कुरसीपर बैसला)
हरि‍नंदन-     रामलाल बाबू, जलखैक जोगार छै की?

रामलाल-     हँ हँ, अबस्‍स छै।
हरि‍नंदन-     तहन जल्‍दी चलाउ। फेर बि‍आह-दान सेहो ने छै।

रामलाल-     जे आज्ञा होइ पंडीजी। बौआ पप्‍पु, नश्‍ता-पानि‍ चलाउ।
           (पप्‍पु, अमर आ सुमन नश्‍ता-पानि‍ चला रहल अछि‍। नश्‍ता कऽ सभ कि‍यो अपन-अपन जगहपर बैसलथि‍।)
हरि‍नंदन-     चलू लड़ि‍का-लड़ि‍की मंदि‍रमे।
           (लड़ि‍का-लड़ि‍की मंदि‍रमे गेलथि‍। पंडीजी कंबलपर आ लड़ि‍का-लड़ि‍की कुशक चटाइपर बैसलथि‍। दुनूक हाथमे कुश दऽ पंडीजी मंत्र पढ़ा रहल छथि‍।)
           पढ़ै जाइ जाउ-
ऊँ यज्ञोपवीतम् परमं पवि‍त्रं प्रजा पतेर् यत सहजं पुरस्‍तात्। आयुष्‍यमग्रयं प्रति‍मृन्‍च शुभ्रं यज्ञोपवीतम् बलमस्‍तुतेज:।।
मनोज+सोनी-   ऊँ यज्ञोपवीतम् परमं पवि‍त्रं प्रजा पतेर् यत सहजं पुरस्‍तात्। आयुष्‍यमग्रयं प्रति‍मृन्‍च शुभ्रं यज्ञोपवीतम् बलमस्‍तुतेज:।।

हरि‍नंदन-     चलू आब जयमाला हएत।

           (लड़ि‍का-लड़ि‍की जयमाला लेल बैसलथि‍। मोनी आैर रानी जयमाला करौलनि‍।)
हरि‍नंदन-     आब दुर्वाक्षत हएत। पहि‍ने दक्षि‍णा लाउ।
रामलाल-     दक्षि‍णा आगू-पाछू भेटबे करत। किए हर-बराइ छी पंडीजी?

हरि‍नंदन-     बि‍आहे कालमे हमर कनि‍याँ सप्‍पत देने छथि‍न जे पहि‍ने दक्षि‍णा तब दुर्वाक्षत।
अमन-       दक्षि‍णा लि‍अ, काज आगू बढ़ाउ।
हरि‍नंदन-     हँ, ई भेल मरदबला गप। लाउ।
           (अमन एक सए एक टाका दक्षि‍णा देलनि‍।)
           दर्वाक्षतक बाद अपने सभ मैयाकेँ प्रणाम कऽ जल्‍दी प्रस्‍थान करबै। पंडीजी पैघकेँ अक्षत देलनि‍‍।)
           ऊँ आब्रह्न ब्राह्नणो............... मि‍त्राणमुदयस्‍तव।
           (पैघ जन लड़ि‍का-लड़ि‍कीकेँ दुर्वाक्ष दऽ सभ कि‍यो मैयाकेँ प्रणाम करै छथि‍। फेर सभ कि‍यो नमस्‍कार-पाती कऽ प्रस्‍थान करै छथि‍।)
पटाक्षेप।

दृश्‍य- सात
(स्‍थान- लखनक घर। अस्‍वस्‍थ अवस्‍थामे मीना चि‍न्‍तामग्‍न अछि‍।)

मीना-        हे भगवान, ऐ सँ बढ़ियाँ हमरा लऽ चलू। दुनि‍याँमे केकरो कि‍यो नै। कोन बेमारी ऐ देहमे पसि‍ गेल से नै कहि‍। इलाजो कराएब से आब खेतो-पथार नै रहल सभटा बीकि‍ गेल। आब डीहेटा बँचल अछि‍। बेटा बेटी नै पढ़लक। दुनू नरहेर जकाँ बौआइए। बेटी जुआन भेल जा रहल अछि‍। ओकर बि‍आह-दानक चि‍न्‍ता सेहो सता रहल अछि‍। एगो कमाइबला की करत? सेहो हमरे बेमारीक चक्करमे फँसल रहैत अछि‍।
           (लखनक प्रवेश)
लखन-       रानी, मोन बेसी खराब अछि‍ की?

मीना-        हँ बड़ बेसी खराब अछि‍। जीअब की नै से नै, कहि‍।
लखन-       यै, सम्‍पतिकिए रहै छै? डीह अछि‍ ने। डीह भरना रखि‍ दइ छि‍ऐ। ओइसँ इलाज कराए लि‍अ। जीअब तहन ने भोगब।
मीना-        लोक की कहत जे डीहो बहुमे लगा देलक।

लखन-       हम अप्‍पन करतब करब।
मीना-        बेस, अहाँक जे वि‍चार।
लखन-       जाधरि‍ अहाँक घटमे परान रहत, ताधरि‍ हम अपन प्रति‍कार नै छोड़ब। कारण हम अहाँक हाथ पकड़ने छी। आइ उ बेटा सभ रहि‍तए तँ कि‍छु उस्‍साहसक आशा करि‍तौं।

मीना-        के बेटा सभ?

लखन-       मनोज आ संतोष।
मीना-        ओकर नाम नै लि‍अ। नै तँ हम अहु दशापर जहर-माहूर खा लेब आ सभकेँ जहल खटाएब।
लखन-       एहेन बात छै तँ हम ओकरा सबहक नाम नै लेब। सएह ने? मुदा जहर-माहूर खा लेब तँ ओकर स्‍वादो तँ अहींकेँ भेटत आ नयन सुख केते हएत सेहो कनी सोचि‍ लियौ। अपनाकेँ बड़ बेसी बुझनाइ सेहो बड़ खराब होइ छै। आबो अपन ई बुझनाइपर नि‍यंत्रण राखू। अन्‍यथा अप्‍पन बुझू।
पटाक्षेप।

दृश्‍य- आठ
(स्‍थान- कलक्‍टरक आवास। आवासपर मनोज, संतोष, सोनी आ वीरभद्र छथि‍। वीरभद्र वर्दीमे छथि‍ और तीनू साधारण पोशाकमे छथि‍।)
सोनी-       स्‍वामी, हम अति‍ प्रसन्न छी। मुदा एतए तीनटा चीजक कमी देखा पड़ि‍ रहल अछि‍।
मनोज-       बाजू प्रि‍य, उ तीन गो कोन चीज अछि‍?

सोनी-       सासु, ससुर आ ननदि‍।
मनोज-       प्रि‍य, अहाँकेँ कोनो चीजक कमी नै अछि‍। मुदा एतए नै, अपन गाममे।
सोनी-       तहन एक्को दि‍न ले गाम चलल जाए। प्राणप्रि‍य हुनको सभकेँ दर्शन तँ कऽ लेब।
मनोज-       मुदा एगो खेद अछि‍ जे कहैमे लाज होइए।
सोनी-       कहबै नै तँ बुझबै केना?

मनोज-       इहए जे हमर अप्‍पन माए स्‍वर्गवास भऽ गेल छथि‍न, माए सतौत छथि‍ आ ननदि‍ सेहो ओही पक्षक छथि‍।
सोनी-       जे छथि‍ से छथि‍, मुदा हमरा लेल वएह अप्‍पन छथि‍, सभ कि‍छु छथि‍।
संतोष-       भौजी, अपनेक वि‍चार तँ उत्तम अछि‍। मुदा वएह मए हमरा दुनू भाँइकेँ बोनक पत्ता तोड़ौलक ने। हमरा दुनू भाँइकेँ कहि‍यो मनुक्‍ख नै बुझलक। भीख मांग कऽ खाइले कहलक पढ़ैले कहलि‍ऐ तँ बढ़नीसँ झँटलक। कोन-कोन करम ने केलौं।
सोनी-       बझै छि‍ऐ बौआ, होनहार वीरवान के होत चि‍कने पात। जदी कैकेयी अपन भरत ले राजगद्दीनै मांगि‍तथि‍ तँ राक्षस राज नष्‍ट होइतै? अहाँ सभ एतए पहुँचितिऐ आ हम एतए पहुँचि‍तौं?

मनोज-       से तँ अहाँ कए लाखक गप्‍प बजलौं।

सोनी-       हम की बाजब प्रि‍यतम, हम तँ मुरूख छी। मुदा भगवान जे कि‍छु करै छथि‍न से नीके करै छथि‍न। हम अपने सभसँ आग्रह करैत छी जे इर्ष्‍या-द्वेषकेँ ति‍यागि‍ गाम चलू आ अपन समाजकेँ देखा दि‍यनु बुझाए दि‍यनु जे ईश्वर जे कि‍छु करै छथि‍न से नीके करै छथि‍न। संगहि‍ अपन समाजमे एगो पार्टी दियौ।

मनोज-       बौआ, भौजीक वि‍चार कटैबला नै छन्‍हि‍। काल्हि‍ गाम चलू आ ओतए एगो चि‍क्कन पार्टी भेनाइ आवश्‍यक छै।
           (एम्‍हर वीरभद्र खैनी चूना कऽ खाइए, ओंघाइए, मोँछ टेरैए, मोँछ फरकबैए।)
सोनी-       प्रि‍यतम, कनी सि‍पाही दि‍स धि‍यान दि‍यौ।

           (मनोज, सोनी आ संतोष सि‍पाही दि‍स धि‍यान देने छथि‍।)
वीरभद्र-      (नि‍न्नमे) कए महिनासँ कनि‍याँ उपासे हएत। सरकार छुट्टी नै दइए। गामक नीक-नि‍कुत खाइमे बड़ नीक लगैए। जेहन हमर कनि‍याँ सुन्नरि‍ तेहने ओकर हाथक भोजन। मोन होइए जे सरकारेकेँ छुट्टी दऽ दैति‍ऐ आ कनि‍येँकेँ सरकार बना दैति‍ऐ। दुनू परानी एक्केठाम रहि‍तौं। कनि‍याँ छोड़ि‍ हम स्‍वर्गोमे नै रहि‍ सकै छी।
मनोज-       सि‍पाही, सि‍पाही, सि‍पाही ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ।

वीरभद्र-      (फुड़फुड़ा कऽ उठि‍) जी जी जी, जीर-मरीच धनि‍या मि‍रचाइ। जगले तँ छी सर। तनी मेहरारूक यादि‍ आ रहल वानी।
मनोज-       ड्युटी पि‍रीयडमे एना नै हेबाक चाही। नैतँ छुट्टी भऽ जाएत।
वीरभद्र-      अब ऐशन ना होइ सर।
           (फेर वीरभद्र खैनी खा कऽ सुति‍ रहल आ सपनाए‍ रहल अछि‍।)
सर कहलनि‍ छुट्टी भऽ जाएत। मुदा मैडम एक्को बेर आइ तक नै टोकलक। बड़ चि‍क्कन छी तँ अपने घरमे। हमरा अहाँसँ कोन मतलब अछि‍। सभटा प्रशासन सभकेँ देखै छि‍ऐ बड़का-बड़का पेट। जेना पेटमे साँढ़-पाराक बच्‍चा होइ। बाप रौ बा, ओइ पेटमे घूस लेल केते जगह छै? ओना हमरो पेट तँ छोट नै अछि‍ नम्‍हरे अछि‍। मुदा हमरा पेटमे तीनि‍टा बच्‍चा अछि‍। उहो बच्‍चा केकरो आनबला नै अछि‍ अपने कनि‍याँबला अछि‍।
सर बि‍अाह केलखि‍न, पाट्री नै देलखि‍न। जाबे तक पार्टी नै देतहीन ताबे तक बच्‍चे नै हेतनि‍। हमर वचनकेँ ब्रह्मो नै काटि‍ सकैए।
मनोज-       सि‍पाही, सि‍पाही, सि‍पाही.......
वीरभद्र-      (फुड़फुड़ा कऽ उठैत) जी सर, जी सर, जी सर।
मनोज-       सि‍पाही, अहाँ किए एना करै छी? नोकरी करब, की छुट्टी लेब?

वीरभद्र-      सर, छुट्टी तँ नै लेब। मुदा पार्टी तँ लऽ कऽ रहब। पार्टी दऽ देबै। सभ नीन्न पार भऽ जेतै।
मनोज-       बेस, काल्हि‍ हमरा गाम चलू। ओत्तै धमगि‍ज्‍जर पार्टी हेतै।
वीरभद्र-      तहन हम मोँ-तोँछ पीजा लइ छी।
पटाक्षेप।

दृश्‍य- नअ
           लखनक घर। मीनाकेँ उनटा साँस चलै छन्‍हि‍। लखन चि‍न्‍ति‍त मुद्रामे बैसल छथि‍। हुनका आँखि‍सँ दहो-बहो नोर जा रहल छन्‍हि‍। रामपरी आ कृष्‍णा हि‍चुकि‍-हि‍चुकि‍ कानि‍ रहल अछि‍।)
लखन-       आब की करब? डीहो बीि‍क गेल। मुदा कारणी चंगा नै भेल। डाक्‍टर कहलनि‍ जे ई पेसेन्‍ट बड़का ऑपरेशनक बादे ठीक भऽ सकैत अछि‍। हम पचास हजार टाका केतएसँ आनब? छुच्‍छाकेँ के पुच्‍छा?

           (मनोज, सोनी, संतोष आ वीरभद्रक प्रवेश। सभ कि‍यो एक-दोसर दि‍स ताकि‍ रहल छथि।‍ मुदा कि‍यो कि‍नको चि‍न्‍है  नै छथि‍।)

लखन-       अहाँ सभ के छी?
मनोज-       हम अहींक बेटा मनोज छी। ई संतोष छथि।‍ ई हमर पत्नी छथि। ई हमर सि‍पाही छथि‍।

लखन-       बौआ मनोज, बौआ संतोष।
(दुनू बेटाकेँ भरि‍ पाँज कऽ पकड़ि‍ खुशीसँ कानि‍ रहल अछि‍। एक-दोसरकेँ छौड़ैक मन नै होइ छन्‍हि‍। फेर छोड़ि‍ दइ छथि‍। सभ एक-दोसरकेँ गोर लागै छथि‍। मुदा मीना, मनोज, संतोष  आ सोनीक गोर लागै कालमे पएर छीप लेलनि‍।)
डोरी जरि‍ जाए मुदा ऐठन नै जाए। आबो चेतू। मरनासन अवस्‍थामे छी।
मीना-        (कुहरि‍ कऽ) आब हम की चेतब, अहाँ सभ चेतु।
लखन-       करतबक फल तँ भेटबे करत।
मीना-        हम तँ नै रहब दुनि‍याँमे। मुदा अहीं अमर भऽ कऽ रहब। से दुनि‍याँ देखत ने। अाह! ओह! प्राणो नै छुटैए।
मनोज-       माताजी केँ की भेलनि‍, पि‍ताजी?

लखन-       आइ साल भरि‍सँ बिमार अछि‍। पेटमे कोनो गड़बड़ी छै। एकर इलाजमे डीहो तक बीकि‍ गेल। डाक्‍टर कहलनि‍ जे एकरा बड़का ऑपरेशन हेतै तबे ठीक हएत। ओइमे कमसँ कम पचास हजार खरच हएत। हम आब केतएसँ ओत्ते पाइ आनब। ने राधाकेँ नअ मन घी हेतनि‍ आ ने ओ नचती। बौआ तोरा सभकेँ एना किए भऽ गेलह?

मनोज-       इसकूलसँ टूरपर जाइ कालमे बस पलटी मारि‍ देलक। ओहीमे दुनू भाँइकेँ एना भऽ गेल। हेड सर जी जान लगा कऽ जि‍औलनि‍। आइ अपनेक कि‍रपासँ कलक्‍टर छी।

लखन-       (आश्चर्यसँ) कलक्‍टर!  कलक्‍टर! साँचे कहै छह?

मनोज-       हँ हँ। कलक्‍टर। साँचे कहै छी। अहाँ सप्‍पत।

लखन-       यै, बेटा कलक्‍टर भऽ गेल। आबो कनी नैन जुड़ा लि‍अ।
मीना-        (कुहरि‍ कऽ) कलक्‍टर होइ की मजि‍स्‍टर होइ, उ अपने गाँइर सम्‍हारत। ओइ सँ हमरा की?

संतोष-       पि‍ताजी, चालि‍ परथि‍त बेमाए। तीनू मुइने जाए।
सोनी-       बौआ, खनि ई सभ नै बजियौ।खनि मधुर वचनक आवश्‍यकता अछि‍। प्राणप्रि‍य एक बेर अपना सभ माताजीकेँ देखति‍ऐ।
मनोज-       हमहूँ सएह साेचैत रही जे बड़के हॉस्‍पीटल चलि‍तौं, ऑपरेशन करा दैति‍ऐ।
मीना-        (कुहरि‍ कऽ) हम ऑपरेशन-तपरेशन नै कराएब। आ ने होस्‍प्‍ीटल जाएब।

संतोष-       सुनै छि‍ऐ भौजी हि‍नकर भाषा।
वीरभद्र-      बड़ी टेढ़ जनानी बा। बड़ी रार जनानी हऽ।

मनोज-       अपने सभ शांत रहि‍यौ। माताजीअपने हाँस्‍पीटल चलियौ। कोनो चीजक डर नै। डाक्‍टरकेँ हम अपने कहबै जे बि‍ना ऑपरेशनक ठीक करैले। अहाँ अबस्‍स ठीक भऽ जाएब। बड़का डाक्‍टर छै।
मीना-        डाक्‍टर बड़का रहै की छोटका रहै। हम आब जी कऽ की करब?
मनोज-       रामपरी आ कृष्‍णा जे ओत्ते कनैए, ओकरा की हेतै?

मीना-        अपना केने की होइ छै? भगवानक जे मर्जी हेतनि‍ सएह हेतै? हम केतौ ने जाएब। हम मरबे करब।
    
सोनी-       स्‍वामी, हमरा लगैए जे ई ओना नै जेती। जबरदस्‍ती एम्‍बूलेंसमे बैसाउ।

मनोज-       हमरो सएह लगि‍ रहल अछि‍। ओना माताजी बुधि‍यारि‍ छथि।‍ जबरदस्‍ती नै करए पड़तै।
मीना-        हम बुधि‍यार रहि‍तौं तँ इएह दशा होइतए हमर।
मनोज-       सभ कि‍यो मि‍लि‍ कऽ हि‍नका उठाउ कोनो तकलीफ ने होन्हि‍।
(सभ कि‍यो मीनाकेँ उठबए चाहैथि‍। मुदा ओ नै-नै करै छथि‍। मुड़ीमचरूआ सरऽधुआ इत्‍यादि‍ सभ कहि‍-कहि‍ गारि‍ सेहो दइ छथि‍। मुदा जबरदस्‍ती हुनका उठा-पुठा कऽ एम्‍बूलेंसमे बैसा, हॉस्‍टपीटल लऽ जाइ छथि‍। सबहक प्रस्‍थान।)
पटाक्षेप।

दृश्‍य- दस
(स्‍थान- हॉस्‍पीटल। डाक्‍टर धीरेन्‍द्र कमपान्‍डर वि‍जय आ वि‍वेक तथा नर्स अनि‍ता आ मनीषा हॉस्‍पीटलक काॅमन रूममे बैसि‍ चाह पीबैत गप-सप्‍प करैथि‍।)

धीरेन्‍द्र-       वि‍जय, आब मोन होइए जे डाक्‍टरी पेशासँ सन्‍यास लऽ ली। दि‍न-राति‍ कखनो चैन नै। एत्ते केतौ लोक बिमार पड़लैए।
वि‍जय-       सर, खान-पान आ जलवायु प्रदूषि‍त भऽ गेलैए। स्‍वाभावि‍क छै लोक बिमार पड़बे करत।
वि‍वेक-       सर, लोककेँ बहुत टेंशनो भऽ गेलैए। व्‍यायाम-योग खतम भऽ रहलैए। तहन लोक स्‍वस्‍थ किए रहत?

धीरेन्‍द्र-       पाइ बड्ड कमेलौं। एकटा बेटा इंगलैण्‍डमे डाक्‍टर अछि‍ आ दोसर अमेरि‍कामे इंजीनि‍यर। आब भगवानक शरणमे जा शांति‍ चाहै छी।
अनि‍ता-      सर, परोपकारसँ सेहो शांति‍ भेटै छै। मुफ्त इलाज कएल जाउ, आत्‍मा संतुष्‍ट रहत।
धीरेन्‍द्र-       नै अनि‍ताजी, ई बात नै छै। मुफ्त इलाससँ वा कम फीससँ डाक्‍टर हल्‍लुक भऽ जाइ छै।

मनीषा-       तहन परोपकार आ इमानदारीकेँ पैघ गुण किए कहल जाइ छै सर?

धीरेन्‍द्र-       एक्‍सट्रा आर्डिनरी प्रति‍ष्‍ठा देखबै तँ अोकरा सभकेँ नजर अंदाज कि‍छु करैए पड़त। ओना आइ-काल्हि‍ परोपकार आ इमानदारी कागजे भरि‍ रहि‍ गेल अछि‍। आइ काल्हि‍ नै उ देवी छै आ ने उ खराह छै।
           (पेसेंट मीना केर संगे लखन सपरि‍वारक प्रवेश।)
मनोज-       (डाक्‍टरसँ) डाक्‍टर साएहाएब, एकटा पेसेंट छै। इमरजेन्‍सीमे भर्ती कएल जाउ।
           (अपन परि‍चए पत्र देखबै छथि‍।)
धीरेन्‍द्र-       (परिचए पत्र देखि‍) वि‍जय, कलक्‍टर साहैबक पेसेंटकेँ इमरजेन्‍सीमे देखबै। जल्‍दी नेने आउ।
(दुनू कमपॉण्‍डर आ दुनू नर्स मीनाकेँ आनलनि‍। आलासँ हुनका जाँचलनि‍।)
           सर, प्रीसकेप्‍शनो सभ छै अपने लग?

मनोज-       जी सर।
           (मनोज धीरेन्‍द्रकेँ प्रीसकेप्‍शन देलनि‍। ओ गौरसँ देखलनि‍।)
धीरेन्‍द्र-            सर, अपनेक पेसेंट ऑपरेशनक अछि‍।

मनोज-       जे आवश्‍यक होइ, से कएल जाउ।

धीरेन्‍द्र-            सर, कि‍छु खूनक आवश्‍यकता हएत।
मनोज-       बाजारसँ आनि‍ देब। जे पाइ लगतै से हम तैयार छी।
धीरेन्‍द्र-            जदी नै उपलब्‍ध हेतै तहन?

मनोज-       हम सभ सभ कि‍यो छी। जि‍नकर खून सेट करतै से तैयार छथि‍। खूनक जाँच कएल जाउ।
धीरेन्‍द्र-            वि‍जय, सबहक खूनक जाँच कऽ लि‍अ।
           (वि‍जय सबहक खूनक जाँच करै छथि‍।)
वि‍जय-       सर, मनोजक ग्रुप मि‍लै छन्‍हि‍।
मनोज-       सर, हम तैयार छी।
धीरेन्‍द्र-       अनि‍ताजी आ मनीषाजी, पेसेंटकेँ ऑपरेशन थि‍येटरमे लऽ चलू। संगमे सर सेहो जेथि‍न।
(दुनू नर्स मीनाकेँ थि‍येटरमे लऽ गेलथि‍। संगमे मनोज सेहो छथि‍।)
अनीताजी, सरसँ खून लऽ लि‍अ। पेसेंटकेँ हि‍नके खून सेट करै छन्‍हि‍।
(अनि‍ताजी मनोजसँ खून लेलनि‍।)
मीना-        हम मरि‍ जाएब तँ मरि‍ जाएब, एकर खून नै लेबै।
धीरेन्‍द्र-            मनीषाजी, पेसेंटकेँ एगो नि‍शाँबला सुइया दऽ दि‍यनु।
(मनीषाजी मीनाकेँ सुइया देलनि‍। पेसेंट बेहोश भेली)
सरकेँ बाहर कऽ दि‍यनु मनीषाजी।
(मनोजकेँ मनीषा डेन पकड़ि‍ बाहर आनि‍ बैसौलनि‍। थि‍येटरमे ऑरेशन भऽ रहल छन्‍हि‍। थि‍येटरमे पेसेंट, डाक्‍टर आ दुनू नर्स छथि‍। रमाकान्‍त आ बलदेवक प्रवेश।)

लखन-       प्रणाम मुखि‍याजी।
रमाकांत-     प्रणाम प्रणाम।
लखन-       नमस्‍कार बलदेव भाय।
बलदेव-      नमस्‍कार, नमस्‍कार भाय।
(आपसमे सभ कि‍यो प्रणाम-पाती कऽ बैसला)
रमाकान्‍त-     लखनजी, पेसेंटक हाल-चाल कहू।
लखन-       पेसेंट ऑपरेशन थि‍येटरमे छथि‍। डाक्‍टर कहलनि‍ घबरेबाक काज नै छै।
रमाकान्‍त-     लखनजी, गामेपर सुनलौं जे अहाँक बेटा कलक्‍टर बनलथि‍। से ठीके बात छि‍ऐ?

लखन-       (मनोजसँ) बौआ, मुखि‍याजी केँ प्रणाम करि‍यनु।
(मनोज मुखि‍याजीक पएर छूबि‍ प्रणाम केलनि‍।)
रमाकांत-     लखनजी, अहाँक बेटा पाथरपर दुबि‍ जनमा देलक। हि‍नक ति‍याग-तपस्‍या लेल हि‍नका हार्दिक धैनवाद
(दुनू नर्स ऑपरेशन थि‍येटरसँ पेसेंटकेँ बाहर नि‍कालि‍ बेडपर सुतौलनि‍। पेसेंट बेहोश छथि‍। पीठेपर डाक्‍टर नि‍कललथि‍। आपसमे प्रणाम-पाती भेलनि‍। डाक्‍टर कॉमन रूममे गेलथि‍। रामलालक प्रवेश।)
रामलाल-     मुखि‍याजी प्रणाम।

रमाकांत-     प्रणाम प्रणाम।
रामलाल-     कहू पेसेंटक हाॅल।
लखन-       अखने ऑपरेशन भऽ कऽ एली। अखनि होशमे नै एली
रामलाल-     लखन भाय, सुनलौं अपनेक बेटा कलक्‍टर भेला आ गामो आएल छथि‍।
लखन-       बौआ मनोज, काकाकेँ गोर लगहुन।
(मनोज, रामलालकेँ पएर छूबि‍ प्रणाम केलनि‍। दुनू एक-दोसरकेँ टकटकी लगा कऽ देखि‍ रहल छथि‍। कि‍यो कि‍नको चि‍न्‍है नै छथि‍। फेर मनोज सोनी लग जाइ छथि‍।)
मनोज-       यै, एगो आदमी माता जीक जि‍ज्ञासामे आएल छथि‍। उ लगै छथि‍ जेना अहींक पि‍ताजी होथि‍। नै हम चि‍न्‍हलि‍यनि‍ आ ने उ चि‍न्‍हलथि‍। कनी चलि‍ कऽ देखि‍यनु तँ।
(सोनी आबि‍ कऽ अपन पि‍ताजी केँ चि‍न्‍हलथि‍।)

सोनी-       पि‍ताजी प्रणाम। (पएर छूबिकऽ)
रामलाल-     खुश रहू बेटी। अहाँ एतए केतए?

सोनी-       माता जीक ऑपरेशन छेलनि‍।
रामलाल-     (आश्चर्यसँ) माताजी! माताजी!!

सोनी-       हँ पि‍ताजी, पेसेंट हमरे सासु छथि‍न।
रामलाल-     तहन तँ लखन हमर समधि‍ हेथि‍न।
नमस्‍कार समधि‍ (लखनसँ)
लखन-       (आश्चर्यसँ) से केना रामलाल भाय?

रामलाल-     से हमरो नै बूझल छेलए। अखने बुझलौं। अहाँक जे पुतोहु हेती से हमरे बड़की बेटी छथि‍।
लखन-       साँचे कहै छी?

रामलाल-     साँचे नै कहै छी तँ फूसि‍। ई गप मजाक वा फूसि‍बला भऽ सकै छै।
लखन-       तहन तँ नमस्‍कार समधि‍।
रामलाल-     नमस्‍कार नमस्‍कार।
लखन-       कहू बाल-बच्‍चा आ समधीनक हाल-चाल।
रामलाल-     बाल-बच्‍चा सभ आनन्‍द अछि‍ आ दुनू समधीन बमकि‍ रहल छथि‍। दुनू एकपर एक छथि‍। हुनका सबहक आगू हमहीं बड़ बूढ़ छी। मुखि‍याजी, रामलाल, भायसँ समधि‍ बनि‍ गेला। मनोज हमरे दमाद छथि‍।
रमाकांत-     रामलालजी, तहन तँ अपने छक्का मारि‍ लेलि‍ऐ। वएह मनोज आ संतोष लखनक बौरेलहा बेटा रहए। आइ देखि‍यौ भगवानक कि‍रपा।
रामलाल-     मुखि‍याजी, भगवान राइकेँ परवत आ परवतकेँ राइ बना सकै छथि‍। आखि‍र प्रेरणा तँ हुनके होइ छन्‍हि‍ आ करतब अप्‍पन।
रमाकान्‍त-     रामलालजी, अपनेक करतबक फल जे दूटा कनि‍याँ रहैत सुसज्‍जि‍त परि‍वारक चर्चा केतए-केतए ने होइए। जखनि कि‍ अहाँ अपन समधि‍केँ देखि‍यौ। एगो समदाही, सतौत बेटाकेँ खाक छानए देलकै।
(मीनाकेँ होश एलनि‍।)
मीना-        कनी पानि‍ पीब।
(सोनी पानि‍ आनि‍ कऽ पीअबैन्‍हि‍।)
सोनी-       माताजी, उठि‍ कऽ बैसल हएत।
मीना-        कनी सहारा दि‍अ तँ कोशि‍श करै छि‍ऐ।
(सोनी मीनाकेँ सहारा दऽ उठा कऽ बैसौलनि‍ आ दुनू डेन पकड़ि‍ बैसल छथि‍।)
रामलाल-     समधीन, आब ठीक छी ने? अपने हमर समधि‍ केना छि‍ऐ, पड़ोसी छेलि‍ऐ ने?

रामलाल-     भगवानक कि‍रपा जे अपनेक डेन पकड़नि‍हारि‍ हमरे बेटी छी आ अपनेक मनोज हमर दमाद।
मीना-        (कर जोड़ि‍) देखि‍यौ भगवानक महि‍मा अपरम्‍पार होइ छै। वएह मनोज आ संतोषकेँ हम कोन-कोन दुर्दशा ने केलि‍ऐ। एतबे नै बढ़नीसँ झाँटि‍ घरसँ नि‍कालि‍ देलि‍ऐ। आइ वएह मनोजक कि‍रपा जे हम अपने सबहक दर्शन कऽ नयन जुड़बै छी।
सचमुच हम बड़ पैघ पापी छी आ मनोज, संतोष और सोनी परम महान छथि‍। ऐ संदर्भमे हम क्षमाप्रार्थी छी, क्षमाप्रार्थी छी, क्षमाप्रार्थी छी।
मनोज-       धैनवाद माताजी। घर चलै चलू। माता जी आब चंगा भऽ गेली
          
           (सबहक प्रस्‍थान)
।पटाक्षेप।
।।इति‍ शुभम्।।


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"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...