Monday, November 11, 2013

‘विदेह' १४१ म अंक ०१ नवम्बर २०१३ (वर्ष ६ मास ७१ अंक १४१)PART III


बाप भेल पि‍त्ती
अधिकार


बेचन ठाकुर

पहि‍ल अंक


दृश्‍यएक

     (स्‍थानलखनक घर। दलानपर लखनलखनक काका मोतीलालभाए बौहरू बड़का बेटा मनोज आ छोटका बेटा संतोष उपस्‍थि‍त छथि‍। लखन चि‍न्ति‍त मुद्रामे छथि‍। सभ कि‍यो चौकीपर बैसि वि‍चार-वि‍मर्श कए रहल छथि‍। बारह वर्षीय मनोज आ दस बर्षीय संतोष दलानपर माटि‍-माटि‍ खेल रहल अछि‍।

मोतीलाल-     लखनचि‍न्‍ता-फीकीर छोड़ू। की करबै? भगवानकेँ जे मर्जी होइत अछि‍ओकरा के बदलि‍ सकैत अछि‍? अहाँ कनि‍याँकेँ एतबे दि‍नका भोग छेलै। आब अहाँक की वि‍चार भऽ रहल अछि‍?

लखन-       काकाअपने सभ जे जेना वि‍चार देबै।
मोतीलाल-     हम सभ की वि‍चार देब? पहि‍ने तँ अहाँक अपन इच्‍छा।
लखन-       दूटा छोट-छोट बौआ अछि‍। ओकर पति‍पाल केना हएत? जँ कुल-कनि‍याँ नीक भेटत तँ दोसर कऽ लइतौं।
मोतीलाल-     भातीजअहाँक नीक वि‍चार अछि‍। ऐ उमेरमे अहाँक ि‍नर्णए हमरो उचि‍त बुझना जाइत अछि‍।
बौहरू-       काकाएगो कहबी जे छै सतौत भगवानोकेँ नै भेलै’ से?

मोतीलाल-     बौआतोहर की कहब छह? लखनकेँ बि‍आह नै करबाक चाही की?

बौहरू-       हँहमर सहए कहब रहए। भैया कनी ति‍याग कऽ दुनू छौंड़ाकेँ पढ़ा-लि‍खा कऽ बुधि‍यार बनाबि‍तथि‍। ओना भैयाकेँ कनि‍याँ केहेन भेटतनि‍ केहेन नै।
मोतीलाल-     हमरा वि‍चारसँ लखनक परि‍स्‍थि‍ति‍ बि‍आह करैबला अबस्‍स अछि‍।
लखन-       काकानजरि‍मे दऽ देलौं। जदी सुर-पता लगए तँ जोगार लगाएब।
मोतीलाल-     बेस देखबै।
पटाक्षेप।

दृश्य- 2
(स्‍थानमदनक घर। ओ अपन बि‍आहल बेटीक बि‍आहक चि‍न्‍तामे लीन छथि‍। कातमे पत्नी-गीता दलान झाड़ि‍ रहल छथि‍। मोतीलालक समधि‍क समधि‍ हरि‍चन मोतीलालकेँ मदनक ऐठाम कुटुमैतीक सम्‍बन्‍धमे लऽ जाए रहल छथि‍। हरि‍चन मदनक ग्रामीण छथि‍। हि‍नका दुनूक पहुँचैत मातर गीता घोघ तानि‍ अन्‍दर चलि‍ जाइ छथि‍। दलानपर तीन-चारि‍टा कुरसी लगल अछि‍। मोतीलाल आ हरि‍चनक प्रवेश।)

हरि‍चन-      (कर जोड़ि‍नमस्‍कार मदन भाय।

मदन-        नमस्‍कार नमस्‍कार।
मोतीलाल-     नमस्‍कार कुटुम।
मदन-        नमस्‍कार नमस्‍कार। बैसै जाइ जाउ।
(दुनू जन बैसला)
संजयसंजयबेटा संजयसंजय।
संजय-       (अन्‍दरसँजी पि‍ताजीहैइए ऐलौं। (संजयक प्रवेश।)

           (हरि‍चनकेँ मदन पकड़ि‍ कऽ अंदर लऽ जाइ छथि‍।)
मदन-        लड़ि‍काकेँ बेटा दुगो छै आ अस्‍था-पाती?

हरि‍चन-      गोटेक बीघाक अन्‍दरे छै। अपना भरि‍ कोनो दि‍क्कत नै छै।
मदन-        की करी की नैकि‍छु नै फुड़ाइए।

हरि‍चन-      हमरा सभकेँ लेट होइए। यदि‍ वि‍चार हुअए तँ हुनका लड़ि‍की देखा दि‍यनु। नै तँ कोनो बात नै।
मदन-        बेसअपने दलानपर चलू। हम बुच्‍चीकेँ नेने आबै छी।
(हरि‍चन दलानपर आबि‍ गेला। कि‍छुए काल बाद मदन सेहो आबि‍ गेला)
मदन-        चलूदेखल जेतै। कऽ लेबै। आगू भगवानक मर्जी। हम लड़ि‍कीक बाप छि‍ऐ। तँ हमरा लड़ि‍का देखबाके चाही। मुदा हम सभ दि‍न अहाँपर बिसवास करैत रहलौं। आइ केना नै करब?

हरि‍चन-      हम अहाँक संग कहि‍यो बि‍सवासघात केलौं?

मदन-        से तँ कहि‍यो नै। ओना दुनि‍याँ बि‍सवासेपर चलै छै।
(वीणाक संग मीनाक प्रवेश। मीना सभकेँ पएर छूबि‍ गोर लगैत अछि‍।)

हरि‍चन-      कुरसीपर बैसू बुच्‍ची।
(मीना कुरसीपर बैसैत अछि‍। वीणा ठाढ़े अछि‍।)
मोतीलाल बाबूलड़ि‍कीकेँ कि‍छु पूछबो करबनि‍तँ पुछि‍यौ।
मोतीलाल-     की पुछबनि‍कि‍छु नै।
हरि‍चन-      बुच्‍ची अहाँ चलि‍ जाउ।
(मीना सभकेँ गोर लागि‍ अन्‍दर गेली)

मदन-        हरि‍चन भायलड़ि‍की अपने सभकेँ पसीन भेली?

मोतीलाल-     हँलड़ि‍की हमरा लोकनि‍केँ पसीन अछि‍।

मदन-        तहन अगि‍ला कार्यक्रम की हेतै?

हरि‍चन-      जे जेना करीयौ। ओना हम वि‍चार दैतौं जे बि‍आह मंदि‍रमे कऽ लैतौं। चीप एण्‍ड बेस्‍ट।
मदन-        कहि‍या तक?

हरि‍चन-      कहि‍या तकचट मंगनी पट बि‍आह। काल्हि‍ कऽ लि‍अ। बढ़ि‍याँ दि‍न छै। कुटुमैती लगा कऽ नै रखबाक चाही।

मदन-        भायओरि‍यान कहाँ कि‍च्‍छो छै?

हरि‍चन-      जे भेलै सेहो बढ़ियाँजे नै भेलै सेहो बढ़ि‍याँ। आदर्शेमे आदर्श।
मदन-        बेसकाल्हुके दि‍न रहए दियौ।
हरि‍चन-      जाउजे भऽ सकएओरि‍यान करू। हम सभ सेहो जाइ छी। जय रामजी की।
मदन-        जय रामजी की।
(हरि‍चन आ मोतीलालक प्रस्‍थान।)
होनी जे हेबाक हेतैसएह ने हेतै। आप इच्‍छा सर्वनाशीदेव इच्‍छा परमबल:

पटाक्षेप।

दृश्‍य- 3
(दृश्‍यलखनक बरि‍आतीक तैयारी। बर लखनमोतीलालबौहरूमनोज आ संतोष मदनक ओइठाम जा रहल छथि‍। मदन अपन घरक कातमे एकटा शि‍व मंदि‍रक प्रांगणमे बि‍आहक पूर्ण तैयारी केने छथि‍। सात गोट कुरसी आ एक गोट टेबूल लगल अछि‍। पंडीजी गणेश महादेवक पूजा कए रहल छथि‍। मदनमीनागीता हरि‍चनसंजय आ वीणा मंदि‍रक प्रांगणमे थहाथही कए रहल छथि‍ तथा बरि‍यातीक प्रतीक्षा कए रहल छथि‍। मीना कनि‍याँक रूपमे पूर्ण सजल अछि‍। बरि‍याती पहुँचला। डोलमे राखल पानि‍सँ सभ बरि‍याती हाथ-पएर धोइ कऽ कुरसीपर बैसला आ लखन बरबला कुरसीपर बैसला। बापेक कातमे एक्के कुरसीपर मनोज आ संतोष बैसला। मदन प्रांगणमे आबि‍ जलखैक बेवस्‍था केलनि‍। सभ कि‍यो जलखै कऽ रहल छथि‍।)
मनोज-       पापापापानाच कखनि शुरू हेतै?

लखन-       धूर बूरबकखनि कि‍छु नइ बाज। लोक हँसतौ।
मनोज-       किए हौलोक हँसतै तँ हमहूँ हँसबै। कहऽ न नटुआ कखनि औतै?

लखन-       चुप चुपनटुआ नै कही। लड़ि‍की औतै।

मनोज-       कए गो लड़ि‍की औतै? आर्केस्‍ट्रा कखनि शुरू हेतै? लड़ि‍की संगे हमहूँ नचबैगेबै आ रूमाल फाड़ि‍ कऽ उड़ेबै। पापा हौलड़ि‍कीकेँ कहबै खाली रेकाँडि‍ंगे डांस करैले। अगबे भोजपूरीपर।
लखन-       चूप बड़ खच्‍चर छेँ रौ। आर्केस्‍ट्रा नै हेतै। डांस नै हेतै।
मनोज-       तखनि एतए की हेतै हौ पापा?

लखन-       हमर बि‍आह हेतै बि‍आह।
संतोष-       पापा हौतोहर बि‍आह हेतै आ हमर नै।
लखन-       हँ हँतोरो हेतै।
संतोष-       कहि‍या हेतै?

लखन-       नमहर हेबहीन तहन हेतौ।
संतोष-       हम नमहर नै छि‍ऐ। एत्तेटा तँ भऽ गेलि‍ऐ। आब बि‍आह कहि‍या हेतै?

लखन-       बीस साल बाद हेतौ।

संतोष-       बीस साल बाद बुढे भऽ जेबै तँ बि‍आह कए कऽ की हेतै? हम आइ करब।
लखन-       आइ तोरा ले लड़ि‍की कहाँ छै?

संतोष-       आँइ हौ पापातोरा ले लड़ि‍की छै आ हमरा ले नै छै। केकरोसँ कऽ लेबै।
लखन-       केकरासँ करबि‍हीन?

संतोष-       मौगी सभ औतै नतँ ओइमे जे सभसँ मोटकी मौगी हेतैओकरेसँ करबै। दूधो खूब पीबै नम्‍हरो हेबै आ मोटेबो करबै। पापा हौहमरा लोकनि‍यामे तोरे रहए पड़तह।
लखन-       बेस रहबौ बौआ।
(जगमे पानि‍ आ गि‍लास लऽ कऽ संजयक प्रवेश। सभ कि‍यो पानि‍ पीलनि‍ आ हाथ-मुँह धोइ अपन-अपन जगहपर बैसला। पंडीजी पूजा पूर्ण आहुतिक पश्चात बर लग बैसि जलखै केला)
गणेश-       अहाँ सभ वि‍लंब किए करै छी? बि‍आहक मुहुर्त्त हुसि‍ रहल अछि‍। हौहौजल्‍दी चलै चलू। कोनो चीजक टेम होइ छै कि‍ने?
           (लड़ि‍कीक संग सरयातीक प्रवेश। सभ कि‍यो मंदि‍रपर गेला। सतहपर बि‍छाएल दरीपर बैसला)

गणेश-       आउ लड़ि‍का-लड़ि‍कीहमरा लग बैसू।
(लखन आ मीना पंडीजी लग बैसै छथि‍। पंडीजी दुनूकेँ अपन रामनामबला चद्दरि‍ ओढ़ा दइ छथि‍न। दुनूकेँ हाथमे अरबा चाउर आआेर कुश दइ छथि‍न।)
गणेश-       लड़ि‍का-लड़ि‍की पढ़ू-
मंगलम् भगवान विष्‍णुमंगलम् गरूड़ध्‍वज:
           मंगलम् पुण्‍डरीकाक्ष मंगलाय तनोऽहरि‍:।।
लखनमीना-   मंगलम्.....
           (पंडीजी तीन बेर ई मंत्र पढ़ा कऽ अपना बगलमे राखल सिनूरक पुड़ि‍यामे सँ एक चुटकी सिनूर लड़ि‍काक हाथमे देलनि‍।)
गणेश-       बि‍आहक मुहुर्त्त बीति‍ रहल छल। तँए हम एक्केटा मंत्रसँ बि‍आह करा दइ छी। आब सिनूरदान होइए।
लड़ि‍कालड़ि‍कीक मांगमे सि‍नूर दियनु
           (लखन मीनाक मांगमे सिनूर देलनि‍।)
आब अपने सभ दुर्वाक्षत दि‍यनु
(पंडीजी पैघ सबहक हाथमे दुर्वाच्‍छत देलखि‍न।)
मंत्रऊँआब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसौ जायतामाराष्‍ट्रे राजन्‍यशूर........
           सन्‍तु पूर्णा सन्‍तु मनोरथा शत्रुणां बुद्धि‍नाशोस्‍तु मि‍त्राणामुदयस्‍तव।
(मंत्रक बाद सभ कि‍यो लड़ि‍का-लड़ि‍कीकेँ दूर्वाक्षत देलखि‍न।)
लाउदुनू समधि‍ दक्षि‍णा-पाती। सस्‍तेमे अहाँ सभ नि‍महि‍ गेलौं।
(दुनू समधि‍ एकावन-एकावन टका दक्षि‍णा देलखि‍न।)
इएह यौएक्को कि‍लो रहुक दाम नै। खैर जाउ।
मदन-        पंडीजी लड़ि‍की-लड़ि‍कीकेँ असिरवाद दि‍यनु
(लड़ि‍का-लड़ि‍की पंडीजीकेँ पएर छूबि‍ प्रणाम करै छथि‍। पंडीजी असिरवाद दइ छथि‍न।)
मोतीलाल-     पंडीजीमोनसँ असिरवाद देबै।

गणेश-       हँ यौदक्षि‍णे गुणे ने असिरवाद भेटत।
           (सभ कि‍यो जा रहल छथि‍।)

पटाक्षेप।


दृश्‍यचारि
         

(स्‍थानरामलालक घर। रामलालक दुनू पत्नी लक्ष्‍मी आ संतोषी घरमे हुनका सेवा कऽ रहल छथि‍। लक्ष्‍मी पक्षमे दूगो बेटी-एगो बेटा छन्‍हि‍ तथा संतोषी पक्षमे एगो बेटी-दूगो बेटा छन्‍हि‍। छओ भाए-बहि‍न एक्के पब्‍लि‍क स्कूलमे पढ़ए गेल छथि‍।)

रामलाल-     बड़की सभ धि‍या-पुता नीक जकाँ घरपर पढ़ै-लि‍खै अछि‍ न? हम तँ भि‍नसर जाइ छी से राति‍मे अबै छी। पेटक पूजा तँ बड़ पैघ पूजा छै कि‍ने? हम नै पढ़लौं से अखनि पछताइ छी।

लक्ष्‍मी-       छौड़ाक लक्षण अखनि बड़ नीक देखै छिऐअग्रि‍म जे हुअए। हमरा सभकेँ पढ़ैले कहए नै पढ़ै अछि‍।
रामलाल-     छोटकीअहाँ कि‍छु नै बजै छी।

संतोषी-      दुनू गोटे एक्के बेर बाजि‍ देब तँ अहाँ की सुनबै आ की बुझबै?

रामलाल-     कोनो तकलीफ अछि‍ की?

संतोषी-      जेकरा अहाँ सन घरबला रहतैतेकरा तकलीफो हेतै आ अहुँसँ होशगर बड़की छथि‍। स्‍वामीएगो गप्‍प पूछी?

रामलाल-     एक्के गो किएहजार गो पूछि‍ते रहू।
संतोषी-      अहाँएहेन चि‍क्कन घरवालीकेँ रहैत दोसर बि‍अाह किए केलि‍ऐ?

रामलाल-     बड़कीसँ बेटा होइमे कि‍छु बि‍लंब देखलि‍ऐ तँए दोसर केलि‍ऐ।
संतोषी-      नै यौदोसर गप्‍प भऽ सकै छै।
रामलाल-     हमरा तँ नै बूझल अछि‍अहीं बाजू दोसर की भऽ सकै छै?

संतोषी-      अहाँकेँअहाँकेँअहाँकेँएगोसँ मोन नै भरल।
रामलाल-     बस करूबस करूअहाँ तँ लाल बुझक्करि‍ छी। अहाँ तँ अंतर्यामी छी। ओना मोनकेँ जेतए दौगेबैओतए दौगतै।
           मन ही देवतामन ही ईश्वर,
मन से बड़ा न कोइ।
मन उजि‍यारा जब जब फैले,
जग उजि‍यारा होय।।
(इसकूल पोशाकमे सोनीक प्रवेश।)

सोनी-       पापापापाइसकूलक फीस दि‍यौ।

रामलाल-     माएकेँ कहि‍यौ बुच्‍ची।
सोनी-       माएइसकूलक फीस दहि‍न।
लक्ष्‍मी-       केते फीस लगतौ?

सोनी-       तों नै बुझै छीही छअ गो वि‍द्यार्थीक छअ सए टाका।
लक्ष्‍मी-       छोटकीजाउदऽ दियौ ग।
संतोषी-      बेसनेने अबै छी।
(संतोषी अन्‍दर जा कऽ छअ सए टाका आनि‍ सोनीकेँ देलनि‍ आ फेर पति‍ सेवामे भीर गेली)
रामलाल-     छोड़ै जाइ जाउ आब। आँगना-घर देखि‍यौ। अहुँ सभकेँ कनीकाज होइ छै।
(दुनू पत्नी चलि‍ गेली)
पटाक्षेप।


दृश्‍यपाँच
(स्‍थानरामलालक घर। रमाकान्‍त मुखि‍याक संग बलदेब वार्ड सदस्‍यक प्रवेश।)
बलदेव-      (दलान परसँरामलालरामलाल भाय।
रामलाल-     (अन्‍दरेसँहैइए एलौं भाय। दलानपर ताबे बैसु। जलखै कएल भऽ गेल।
बलदेव-      मुखि‍योजी एलाकनी जल्‍दी एबै।
रामलाल-     तहन तुरन्‍त एलौं।
(हाथ-मुँह पोछि‍ते प्रवेश। प्रणाम-पाती कऽ अन्‍दरसँ दूटा कुरसी अनलनि‍। रमाकान्‍त आ बलदेब कुरसीपर बैसला। मुदा रामलाल ठाढ़े छथि‍।)
रामलाल-     मुखि‍याजीआइ केम्‍हर सुरूज उगलै? आइ रामलाल तरि‍ गेल सरकार। कहि‍यौ सरकार हम केना मन पड़लौं। इनरा आवासबला कोनो गप्‍प छै की?

बलदेव-      गप्‍प तँ इएह छै। मुदा पहि‍ने कुशल-छेमतहन ने अगि‍ला गप-सप्‍प। कहू अपन हाल-समाचार।

रामलाल-     अपने सबहक कि‍रपासँ हमर हाल-समाचार बड्ड बढ़ि‍याँ अछि‍। भायअपन हाल-चाल कहू
बलदेव-      भायएकदम दनदनाइ छै।
रामलाल-     आ मुखि‍याजी दिसका।
रमाकान्‍त-     हमरो हाल-चाल बड़ बढ़ियाँ अछि‍। वएह एलेक्‍शन नजदीक छै तँए पंचायतमे घुमनाइ अावश्‍यक बुझलौं। संगे-संग अहुँक काज रहए।
रामलाल-     तहन अपने किए एलि‍ऐहमहीं चलि‍ अबि‍तौं।
रमाकान्‍त-     देखि‍यौजनता जनार्दन होइ छै। पहि‍ने जनता तहन हम। जनता मुखि‍याकेँ बड़ आशासँ चुनै छै। ओइ आशाक पूर्ति केनाइ हमर परम कर्त्तव्‍य छै।
रामलाल-     अपने महान छि‍ऐ। अपनेक आगू हम की बजबै?

बलदेव-      मुखि‍याजीकनी ओकरो ऐठाम जाइक  छै। हि‍नकर काज जल्‍दी कऽ दि‍यनु।
रमाकान्‍त-     तहन दऽ दि‍यनु।
(बलदेव बेगसँ बीस हजार टाका नि‍कालि‍ रामलालकेँ देलखि‍न।)
रामलाल-     (पाँच सए टाका नि‍कालि‍मुखि‍याजीई अपने रखि‍ लि‍यौ।
रमाकान्‍त-     नैई नै भऽ सकैए। ई अपने रखि‍यौ। हमरा पेट ले बहुते फण्‍ड छै। कहबी छैओतबे खाइ जइसँ मोँछमे नै ठेकए।

रामलाल-     भगवानएहेन मुखि‍या सगतर होइतै।
बलदेव-      रामलाल भायजेतए-तेतए सुनै छी अहाँक परि‍वारक सम्‍बन्‍धमे। तँ मन हर्षित भऽ जाइए। एहेन सुन्‍दर ढंगसँ परि‍वार चलेनाइ आइ-काल्हि‍ असंभव अछि‍।

रामलाल-     सभ भगवानक कि‍रपा छन्‍हि‍‍ आ अपन करतब तँ चाहबे करी।
रमाकान्‍त-     हमरा लोकनि‍ जाइ छी। जाउअहुँ अपन काम-काज देखि‍यौ।
(रमाकान्‍त आ बलदेवक प्रस्‍थान)
रामलाल-     धैनवाद बलदेव भायधैनवाद मुखि‍याजी एहि‍ना सभ जनतापर खि‍आल रखबै।
पटाक्षेप।

दृश्‍यछह
(स्‍थानलखनक घर। मीना अपन बेटी रामपरी आ बेटा कृष्‍णाक संग बैडमि‍ंटन खेल रहल अछि‍।
रामपरी-      मम्मीकसि‍ कऽ मारहीन ने। काॅर्क नै उड़ै छौ।
मीना-        बेसी कसि‍ कऽ नै लगै छै। कम-सँ-कम बौओ जकाँ बमकाही ने?
           (मनोजक प्रवेश)
मीना-        ओएहएलौ सरधुआ भाँड़ैले।
रामपरी-      आबए दहीन ने मम्‍मी। भायजी छथि‍न।

मीना-        भायजी छथि‍न। कप्‍पार छथि‍न। काॅर्क फूटि‍ जेतौ तँ आनि‍ कऽ देतौ?

रामपरी-      मम्‍मीभायजी केतएसँ आनि‍ कऽ देतैतोहीं कह तँ। आकि‍ पापा आनि‍ देथि‍न।
मीना-        पापाकेँ हम जे कहबैसे करथुन। तोहर कहल नै करथुन।
रामपरी-      मम्‍मीई गप्‍प तोहर नीक नै भेलौ आ पापोकेँ नीक नै भेलनि‍।
 मीना-       तों पंचैती करैले एलँह की बैडमि‍ंटन खेलैले? खेलबाक छौ तँ खेल नै तँ जो एतएसँ।
रामपरी-      तोहीं सभ खेलहम जाइ छी।
(खीसि‍या कऽ रामपरीक प्रस्‍थान। रामपरीबला बैटसँ मनोज बैडमि‍ंटन खेलए लगैत अछि‍। मीना बैटेसँ ओकरा मारैले छुटैत अछि‍। फेर दुनू माय-पूत बैडमि‍ंटन खेलए लगैत अछि‍।)
कृष्‍णा-       मम्‍मीतोरा दीदी जकाँ खेलल नै होइ छौ। कनी पापाकेँ कहबीन सीखा दइले से नै।
मीना-        बौआपापा हमरा की सीखेथुनहमहीं सीखा दइ छि‍ऐ।
कृष्‍णा-       तेकर माने तों पापासँ जेठ छीही?

मीना-        उमरमे भलहि‍ं छोट हएब मुदा अकलमे नि‍श्चि‍ते जेठ।
(संतोषक प्रवेश)
संतोष-       हमहूँ खेलबै कृष्‍णा। (बैट लऽ कऽ खेलए लगैत अछि‍। झटसँ मीना संतोषक हाथसँ हाथ मोचारि‍ कऽ बैट लऽ लैत अछि‍। टुनकीबला आ मुड़ीमचरूआ कहि‍ बैटसँ मारैले दौगैत अछि‍‍। संतोष भागि‍ जाइत अछि‍। ओइपर खीसि‍या कऽ कृष्‍णा एक बैट मम्‍मीकेँ बैसा दैत अछि‍।)

कृष्‍णा-       तों बड़ खच्‍चर छेँ मम्‍मी। खेलल-तेलल होइ छौ नहि‍येँ आ जमबै छेँ। अखनि संतोष भायजी रहि‍तै तँ खूम बैडमि‍ंटन खेलतौं की नै।
मीना-        संतोषबा तोहर भायजी नै छियौ। जेकर छि‍ऐ से बुझतै। तोरा ओकरासँ कोनो मतलब नै।

कृष्‍णा-       किए मम्‍मी? उहो तँ हमरे पापाक बेटा छि‍ऐ ने?

मीना-        मुदा तोहर मम्‍मीक बेटा नै ने छि‍ऐ।
कृष्‍णा-       बुझबीहीन तँ किए नै हेतै? नै बुझबीहीन तँ हमहूँ तोहर दुश्मन छि‍यौ।

मीना-        बकबास नै कर। काल्हि‍ जनमलेँ आ बुढ़बा जकाँ गप्‍प करै छेँ। सभ बात तों अखनि नै बुझबीहीन। आब काल्हि‍ खेलि‍हेँ चल।
           (बैट-काॅर्क लऽ कऽ मीना-कृष्‍णाक प्रस्‍थान।)

पटाक्षेप। 

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"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २२८ म अंक १५ जून २०१७ (वर्ष १० मास ११४ अंक २२८)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -  गौरी चोरनी ,  गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर ...