Monday, November 11, 2013

‘विदेह' १३९ म अंक ०१ अक्टूबर २०१३ (वर्ष ६ मास ७० अंक १३९) PART II

बड़की बहीन
(उपन्‍यास)


माझिल भाए जुगेसरपर सँ साझि‍ल भाए मुनेसरपर सुलोचना बहि‍नक नजरि‍ बढ़लनि‍। दुनू भाँइमे मुनेसरे सहोदर बहि‍नो बुझैए आ जेतए तक वेचाराकेँ भऽ पबै छै मदतिओ करैए। मुदा ओही वेचाराकेँ की दोख देबै। गाममे रहैत आ लग-पासमे नोकरी करैत तखनि‍ ने से तेते दूरमे अछि‍ जे मदति‍ए की हएत। तहूमे तेहेन घरवाली भगवान देलखि‍न जे सदि‍खन अपने परि‍वारक पाछू तबाह रहैए। एक तँ दुनू बेकतीक बात, दोसर पढ़ल-लि‍खल परि‍वार, केतौ जे कि‍छु बाजत आकि‍ केकरो कहतै सेहो केहेन हएत। खैर जे होउ, एते तँ वएह वेचारा करैए जे एते दि‍न कहि‍यो काल कि‍छु पठा दइ छेलए जइसँ दीके-कि‍-सीके कहुना कऽ गुजर करै छेलौं। मुदा आब तँ से नहियेँ अछि‍। एकेबेर तेते रूपैआ बैंकमे जमा कऽ दइए जे साल-मालमे कोनो दि‍क्कत नहि‍येँ रहैए।
छोट बहि‍न जे अछि‍ तेकरा अपने तेहेन परि‍वार छै जे नैहरो बि‍सरि‍ गेल। जँ कहि‍यो भेँटो करए चाहै छी सेहो नै होइए। केना कऽ छोट-बहि‍नक सासुर जाएब। लोक की कहत? जेठ बहि‍न माए दाखि‍ल होइ छै।
घर-आँगन बहारि‍, चुल्हि‍-चि‍नमार नीपि‍ वर्तन-बासन माँजि‍, जारनि‍-काठी ओरि‍या सुलोचना बहि‍न कलपर पानि‍ आनए गेली। बाल्‍टीन भरि‍ उठा जखनि‍ वि‍दा भेली आकि‍ बाल्‍टीन नेनहि‍ चबुतरापर खसि‍ पड़ली। गुण रहलनि‍ जे गरदनि‍सँ ऊपर चबुतरासँ बाहर रहलनि, नै तँ तेहेन खसान खसलथि‍ जे मरिए जैतथि‍। ओना माथक भाग बँचलनि‍ मुदा डाँड़सँ नि‍च्‍चाँ थौआ भाइए गेलनि‍। एक तँ सि‍मटीक चबुतरा तैपर भरल बाल्‍टीन पानि‍। खसि‍ते एकबेर पि‍ति‍यौत भाइक नाओं लऽ कऽ जोरसँ बजली-
मनोहर, हौ मनोहर, कलपर खसि‍ पड़लौं।
अवाज तीनू भैयारीक आँगन तक पहुँचलनि‍। मुदा एक अवाज (पहि‍ल अवाज) सुनि‍ जहि‍ना कि‍यो कान ठाढ़ कऽ दोसर अवाज अकानए लगैए तहि‍ना सभ (भैयारी परि‍वार) दोसर अवाजक आशा-बाट देखए लगला। मुदा दोसर अवाज दइसँ पहि‍ने सुलोचना बहि‍न अचेत भऽ गेली। डाँड़क जोड़क हड्डी टुटि‍ गेलनि‍। तैपर भरल बाल्‍टीनक चोट सेहो लगल रहनि‍। दोसर अवाज नै उठने (सुलोचना बहि‍न अवाज) मनोहरकेँ शंका भेलनि‍ जे दोहरा कऽ अवाज कि‍ए ने आएल। से नै तँ केतौ अनतुका बात थोड़े छी। अँगनेसँ घरक पछि‍ला खि‍ड़की खोलि‍ देखलनि‍ जे सुलोचना बहि‍न कलपर चारूनाल चीत खसल अछि‍। घरेसँ हल्‍ला करैत नि‍कलला जे सुलोचना बहि‍न कलपर खसल अछि‍। मनोहरक अवाज सुनि‍ तीनू भैयारीक आँगनसँ धि‍यो-पुता आ स्‍त्रीगणो दौड़ कऽ सुलोचना बहि‍न लग पहुँचली। मरदा-मरदी मनोहरेटा। स्‍त्रीगणो तँ स्‍त्रीगणे छी। काजक भीड़-भाड़ तँ नै मुदा वि‍चारक तँ समुद्रे छी। रंग-रंगक वि‍चार चलै लगल। वि‍चारक तीर तेते तेज जे मनोहरक अपन बुधि‍ए हरा गेलनि‍, वि‍चारे थकथका गेलनि‍। तँइए ने कऽ पबथि जे बहि‍न जीवि‍त अछि‍ आकि‍ मुइल। देहो-हाथ ने एकोबेर सुगबुगाइन। जहि‍ना बि‍ना ब्रेकक साइकि‍ल वा गाड़ीक ठेकान नै रहै छै जे केम्‍हर जाएत तहि‍ना मनोहर भऽ गेला। तहूमे अपन पत्नी कहलकनि‍-
नाकक साँस देखि‍यौ?”
मुदा तैबीचमे पति‍यौत भाइक पत्नी, भावो बाजि‍ देलखि‍न-
छातीपर हाथ दऽ कऽ देखथुन।
दुनू गोटेक दुनू वि‍चार सुनि‍ मनोहर अकबका गेला। मुदा भावो वि‍चारक आदर करैत मनोहर छातीपर हाथ देलखि‍न तँ धक-धकी बूझि‍ पड़लनि‍। मुदा तैबीच पत्नी गुम्‍हरैत बजली-
कहलौं जे नाकक सोंसा देखि‍यौ, तँ डाक्‍टर जकाँ छातीमे आला लगबए लगलौं?”
पत्नीक बातकेँ मनोहर नै ठेकानि‍ सकला। कि‍एक तँ काल्हि‍ साँझमे जखनि‍ पत्नी आ भावोक बीच झगड़ा भेल रहनि‍ तखनि‍ गामपर नै रहथि‍, तँए नै बूझल रहनि‍। दुनू गोटेमे सँ कि‍यो कहबो ने केने रहनि‍। नै कहैक कारण रहै जे दुनू गोटे अपने फड़ि‍छबैक वि‍चारि‍ नेने रहथि‍। छातीक धुकधुकी देखि‍ मनोहर नाक लग हाथ देलखि‍न तँ बूझि‍ पड़लनि‍ जे साँस रूकि‍-रूकि‍ चलै छन्‍हि‍ मुदा अखनि‍ उपाइए कथी अछि‍? मरदा-मरदीमे असगरे छी, केना उठा कऽ ओसारोपर लऽ जाएब? गाड़ि‍-गड़ौबलि‍ आ मारि‍-मरौबलि‍ करैकाल ने भैंसूर-भावोक सम्‍बन्‍ध नै रहैए मुदा बेर-बेगरतामे तँ रहि‍ते अछि‍। असगरे पत्नीएटा छथि‍ जे संग भीड़ि‍ काज करती बाँकी सभ भावोए छथि‍। देहमे केना भीड़ती। तहूमे अधमड़ू जकाँ छथि‍। देहो-हाथ लरे-तांगर हेतनि‍। जँ होशगर रहि‍तथि‍ तँ घुघुओपर उठा लइतौं। एक गोरे तँ दुनू डेने सम्‍हारैमे रहि‍ जेती। अपने जँ धड़ पकड़ब तँ दुनू टाँगकेँ की हएत। तहूमे जँ टुटल हेतनि‍ तँ आरो टुटि‍ कऽ नि‍च्‍चे खसि‍ पड़तनि‍। डाक्‍टरो ऐठाम केना जाएब। डाक्‍टर बजबए जाएब तैबीच की हएत, तेकर कोन ठेकान। जहि‍ना बाल-बोध बच्‍चाक बुधि‍क पौती बन्न रहैए तहि‍ना मनोहरक बुधि‍क नीचला खप्‍पीमे ऊपरा लगि‍ गेलनि‍। कलपर पड़ल सुलोचना बहि‍न फक-फक करैत। मनोहरकेँ सुमति‍ एलनि‍। कलपर सभकेँ छोड़ि‍ अपन कोठरी आबि‍ मोबाइल नि‍कालि‍ चि‍न्‍हरबा डाक्‍टरकेँ फोन केलखि‍न। पछाति‍ पि‍ति‍यौत भाएकेँ केलखि‍न। मुदा जहि‍ना फोन केलखि‍न तहि‍ना एक्के-दुइए सभ पहुँचला। पहुँचि‍ते डाक्‍टर डाँड़ फुलब देखि‍ बजला-
डाँड़ भरि‍सक टुटि‍ गेल छन्‍हि‍। चाहे डाँड़क जोड़ छि‍टकि‍ गेल छन्‍हि‍। हमर साधसँ बाहरक काज अछि‍। ओना तत्‍काल इन्‍जेक्‍शन दऽ दइ छि‍यनि‍ मुदा हि‍नका नीक डाक्‍टर ऐठाम लऽ जैयनु।
तीनू-चारू भाँइओ आ डाक्‍टरो मि‍लि‍ हाथे-पाथे उठा ओसारक बि‍छानपर सुलोचना बहि‍नकेँ पाड़ि‍ देलकनि‍। इन्‍जेक्‍शन पड़ला पछाति‍ सुलोचना बहि‍नकेँ कुहरब शुरू भेलनि‍। मुदा बोली नै फुटनि‍। हाथोक इशारा नै देल होन्‍हि‍। लगले मनोहर जुगेसरकेँ समाद पठौलखि‍न। ई सोचि‍ जे कि‍छु छि‍यनि‍ तँ सहोदर बहि‍न हुनके छि‍यनि‍। हुनका पीठेपर ने हम सभ रहब। नै कि‍छु करथि‍न तेकर पछाति‍ओ ने दि‍याद-बाद आकि‍ सर-समाज। समाज तँ सहजे समुद्र छी, आइ नै अदौसँ होइत आएल अछि‍ जे कि‍यो असाध रोगक शि‍कार हुअए आकि‍ पढ़ए-लि‍खए चाहैत हुअए आकि‍ बेटा-बेटीक बि‍आह करए चाहैत हुअए तँ समाज चंदा (दान) दऽ ओइ काजक सम्‍पादन करैत आएल अछि‍। समदि‍याक समाद सुनि‍ते सोमनी स्‍वामीकेँ सुसकारी देलखि‍न-
अखनि‍ कि‍ए ने बहि‍न हेतनि‍?”
पत्नीक बात सुनि‍ जुगेसर फटो-फनमे पड़ि‍ गेला। जि‍नगीक हारल जुगेसर जे परि‍वारमे मात्र दुइए परानी रहि‍ गेल छथि‍। संंगीनक बातकेँ रोकि‍ नै सकला। समदि‍याकेँ कहलखि‍न-
दुखमे सुमि‍रन सभ करे। अखनि‍ कि‍ए ने बहि‍न हएत। बजले तँ रहए जे चारि‍ कट्ठा जमीन बेइमानी कऽ लेलि‍ऐ। तैकालमे मुनेसरा भाए रहै आ अखनि‍ हम भऽ गेलि‍ऐ।
पति‍क सह पाबि‍ सोमनी गोटी चलली-
जेहेन जे करत से तेहेन पौत।
दुनू परानी जुगेसरक बात सुनि समदि‍या आबि‍ मनोहरकेँ कहलखि‍न। सहोदर भाएक बात सुनि‍ मनोहर चौंकि‍ गेला। सहोदरसँ कनीए हटि‍ पि‍ति‍यौत भेल कि‍ने। एकर आगू ने समाज भेल। ओना पि‍ति‍यौत चारि‍ भाँइ अखनो छीहे। सेवे (जेते कएल हएत) भरि‍ ने करबै। भगवान नै ने छी जे प्राण दऽ देबै। मुदा नीक हएत जे मुनेसरोकेँ कहि‍ दि‍ऐ। जुगेसर भैया संगे ने खट-पट छन्‍हि‍ मुदा सोलहो आना मुनेसर तँ सेवा करि‍ते छन्‍हि‍। फोन लगा मुनेसरकेँ मनोहर कहलखि‍न-
मुनेसर, बड़की बहि‍न कलपर खसि‍ पड़ली, चोट बहुत छन्‍हि‍। अखनो अचेते छथि‍, से जल्‍दी आउ?”
समाचार सुनि‍ते मुनेसरक मनमे अनेको प्रश्न उठि‍ कऽ ठाढ़ भऽ गेलनि‍। हँ-हूँ कि‍छु उत्तर नै दऽ सकला। अखनि‍ हम हजारो कि‍लो मीटर हटल छि‍ऐ, जरूरति‍ छै डाक्‍टर ऐठाम लऽ जाइक, तखनि‍ तँ मनोहरेपर कि‍ए ने छोड़ि‍ दिऐ जे जाबे पहुँचब ताबे तक ओ सम्‍हारत। मुदा हाथ-पर- हाथो दऽ बैसब नीक नहियेँ हएत। समाजमे केकरो जे कहबो करबै से मुहेँ ने अछि‍। एतेटा जि‍नगीमे समाजक कोन उपकार केलि‍ऐ। लगले मनोहरकेँ फोनपर कहलखि‍न।
मनोहर, अबैक तैयारीमे जुटि‍ गेलौं। जेते जल्‍दी भऽ सकत पहुँच रहल छी। तखनि‍ तँ गाड़ी-सवाड़ीक रस्‍ता छी, तँए स्‍पष्‍ट कि‍छु नै कहल जा सकैए। तैबीच खर्चक दुआरे कोनो काज बाधि‍त नै होइ।
मनोहरपर भार दइते मुनेसरक नम्‍हर साँस छुटलनि‍। साँस छुटि‍ते मन भेलनि‍ जे एकबेर फेर मनोहरकेँ कहि‍ऐ जे कनी बड़की बहि‍नसँ गप करा दैह। मुदा लगले भेलनि‍ जे काजक दौड़मे गपो-सप्‍प बाधक होइ छै। छुच्‍छे गप्‍पो केने तँ कोनो लाभो नहि‍येँ अछि‍। छोटकी बहि‍नकेँ कहलखि‍न-
बुच्‍ची, बड़की बहि‍न कलपर खसि‍ पड़लखुन से जहि‍ना हुअ तहि‍ना जल्‍दी गाम पहुँचऽ।
मुनेसरक बात सुनि‍ कवि‍ता उत्तर देली-
भैया, हमरा छुट्टी कहाँ अछि‍ जे जाएब। कि‍यो घरमे नै अछि‍। असगरे छी। जखने घर छोड़ि‍ जाएब तखने घर वि‍रहा जाएत।
छोटकी बहि‍नक बात सुनि‍ मुनेसर सकदम भऽ गेला। हम हटले छी, जेहो सभ लगमे अछि‍ सेहो सभ हटि‍ए रहल अछि‍। कहू जे ई की भेल। घर वि‍रहा जाएत। घरक चीजे-बौस ने लोक चोरा लेत सभ समांग कमाइते अछि‍ फेर कीनि‍ लेत। मुदा सहोदर बहि‍न...
मने-मन मुनेसर गामक गर अँटबए लगला। राँची-जयनगर गाड़ी काल्हि‍ नै छी। आइ पकड़ि‍ नै हएत। सोझहे वि‍दा भऽ जाएब सेहो नै हएत। सोझहे तँ लोक ओइठाम ने चलि‍ दइए जैठाम काजक आशा रहै छै। जैठाम काजक आशा नै रहै छै तैठाम तँ तैयारे भऽ कऽ जाए पड़ै छै। बसक जे रूट अछि‍ ऊहो गाड़ीसँ पहि‍ने नै पहुँचा सकैए, तखनि‍? परसूका गाड़ी नि‍श्चि‍त पकड़ि‍ लेब। नीक हएत जे दुनू बेकती जाइ। महि‍ला रोगी संग महि‍ला नीक। बीचमे काल्हि बैंको काज कऽ लेब। ओना अबैले नै कहबै मुदा दुनू भाँइओ (दुनू बेटा) केँ जानकारी तँ दइए दइक अछि‍। अबैले तखनि‍ कहब ने नीक हएत जखनि‍ असगर-दुसगर रहैत। परि‍वारक संग बि‍ना रि‍जबेशनक चलब तँ कठि‍न अछि‍। ईहो तँ नीक नहियेँ हएत जे रस्‍तेमे समानो (चीज-बौस) चोरि‍ भऽ जाए आकि‍ बच्‍चे सभकेँ कि‍छु भऽ जाए। नीक हएत जे दुनू भाँइकेँ जनतब दऽ दि‍ऐ। मोबाइल उठा रघुनाथकेँ कहलखि‍न-
बौआ, दीदी कलपर खसि‍ पड़लखुन, से सुनैमे आएल अछि‍ जे डाँड़े कज्‍जी भऽ गेलनि‍।
दीदीक नाओं सुनि‍ रघुनाथक मन चौंकि‍ गेल। बाजल-
बड़का बाबूकेँ ताबे नै कहि‍ देलि‍यनि‍ जे आबि‍ रहल छी। तैबीचक भार अहाँक। आगू भऽ कऽ अहाँ जाउ, पाइ-कौड़ीक चि‍न्‍ता नै करब। अखनि‍ आॅफि‍समे छी, बेसी बात नै हएत, डेरापर गेला पछाति‍ फोन करब।
रघुनाथक वि‍चार सुनि‍ मुनेसर छोटका बेटा रमाकान्‍तकेँ मोबाइलपर कहलखि‍न-
बौआ, बड़की दीदी कलपर खसि‍ पड़लखुन। मनोहर अखने फोनपर कहलक हेन।
बाल-बोध रमाकान्‍त बाजल-
आर, की सभ भेलनि‍?”
मुनेसर-
एतबे जानकारी भेटल अछि‍। आरो जानकारी होइए तखनि‍ फेर कहबह।
बाबू, केकरो कि‍यो परान नै दऽ सकै छै, मुदा परान बँचबैक तँ परि‍यास कइए सकै छै। तइले आगू बढ़ि‍ कऽ जाउ, पछाति‍ जँ हएत तँ हमहूँ आएब। ओना रघुनाथ-भैयासँ आॅफि‍सक पछाति‍ गप करब। गाम-घरमे इलाजक असुवि‍धा छै तँए जरूरति‍केँ देखैत कहब। ऐठाम तँ इलाजक नीक बेवस्‍था छइहे।
अखनि‍ जानकारीए बुझह। जाबे अपना नजरि‍ए नै देखि‍ लेब ताबे कि‍छु कहब नीक नहियेँ हएत। सुनल बात गड़ि‍-मुड़ाह होइ छै, हल्लुको बात भारी आ भारीओ बातकेँ हल्‍लुक बना लोक बजैए।
दुनू बेटाक बात मुनेसरकेँ बल भरलकनि‍। मनमे मजगूती एलनि‍। परसूका गाड़ी कोनो हालति‍मे छोड़क नै अछि‍। रहली पत्नी, कहब उचि‍त अछि‍, कहबनि‍, मुदा नाकर-नुकर तँ करबे करती। खैर, नाकर-नुकर कि‍छु करथि‍, हमरो निर्णयक दौड़सँ चलए पड़त। जँ नाकर-नुकर करती तँ मुँह फोड़ि‍ कहबनि‍, माए दाखि‍ल बहि‍न छी, जँ दुनि‍याँमे कि‍यो माए-बापक सेवाकेँ नीक बुझैत हेतै तँ हमहूँ बुझै छि‍ऐ। पत्नीक मतलब ई नै जे पथभ्रष्‍ट करए। नीक हएत जे अखने हुनको (पत्नी) सँ गप-सप्‍प कइए ली। मोबाइल लगा मुनेसर साधनाकेँ कहलखि‍न-
परसू गाम जाएब जरूरी अछि‍, तँए स्‍कूलमे छुट्टीक आवेदन दऽ काल्हि‍ राँची चलि‍ आउ?”
पति‍क बात सुनि‍ साधना बजली-
एहेन कोन हलतलबी भऽ गेल जे एकाएक जाइक वि‍चार कऽ लेलि‍ऐ?”
सुलोचना बहि‍नक सभ समाचार सुना मुनेसर बजला-
ओइठाम जा हम नै सेवा करबै तँ दुनि‍याँमे वेचारीकेँ रहलै के, जे करतै। सुनैमे आएल अछि‍ जे भैयो दुनू परानी खुशीए मनबै छथि‍ जे भने नीक भेल। तैठाम अपन दायि‍त्‍व नै बुझि‍ऐ, से मन गवाही नै दइए। खैर जे होउ, अखनि‍ एतबे जे काल्हि‍ चलि‍ आउ।
पति‍क वि‍चार साधनाकेँ दबाबमे बूझि‍ पड़लनि‍। ओ अपन दायि‍त्‍वक वि‍चार नै करैत बजली-  
अखनि‍ स्‍कूलमे छुट्टी नै देत।
मुनेसर-
हमरो जि‍नगी स्‍कूलेमे बीतल, कि‍ए ने छुट्टी देत, जँ नै देत तँ ओहि‍ना चलि‍ आउ।
साधना-
ओहि‍ना केना चलि‍ आउ।
मुनेसर-
रि‍जाइन दऽ कऽ। मुदा गाम चलैक अछि‍?”
जहि‍ना दबाबमे साधना बजै छेली तहि‍ना दबाबमे मुनेसर सेहो आबि‍ गेला। दुनूक दू दबाब, एककेँ कर्तव्‍यक दबाब दोसरकेँ सत्ताक दबाब। दुनू दू दि‍शामे बहैत जाइत। तुरछि‍ कऽ साधना बजली-
बहि‍न अहाँक छथि‍, अहाँ जा कऽ देखि‍यनु। हम अखनि‍ नै जाएब!
साधनाक उत्तर सुनि‍ मुनेसर अमबसि‍याक अन्‍हारमे पड़ि‍ गेला। दुनि‍याँक अन्‍हेरमे सभ कि‍छु सबहक अन्‍हरा रहल छै, अन्‍हरा कि‍ रहल छै जे सभ अपने अन्‍हराइ पाछू पड़ल अछि‍। एकक पति‍ आ दोसराक भाए तँ हमहीं छी। ई बात सत् जे जे नगीची बहि‍नक संग अपन अछि‍ ओ पत्नीक नै छन्‍हि‍। मुदा की हुनका (पत्नी) आन बूझल जाए...?
जि‍नगीक संगि‍नी। संग मि‍लि‍ जि‍नगीक दुर्गकेँ टपैक व्रती। मुदा काल्हि‍ एकर वि‍परीतो तँ भऽ सकै छै। अनेरे मनकेँ बौअबै छी। कि‍यो अपन मन, अपन भाव, अपन वि‍चारक अनुकूल अपन दुनि‍याँ गढ़ैए आ ओइमे बास करैए। जेते करैक शक्‍ति‍ अछि‍, ओते करैक अधि‍कारी छी। परसू नि‍श्चि‍त गाड़ी पकड़ब चाहे बीचमे जेते वि‍ध्‍नबाधा उपस्‍थि‍त किए ने हुअए।
राँचीसँ जयनगरक गाड़ी खुजैक समए पौने छह बजे साँझमे छै। तीन बजि‍ते मुनेसर बेर-बेर घड़ी देखथि‍ जे कहीं गाड़ी ने छुटि‍ जाए। पनरह मि‍नट स्‍टेशनक रस्‍ता अछि‍। चारि‍ बजि‍ते भाड़ा-दारकेँ कहि‍ मुनेसर बैगक संग घरमे ताला लगा नि‍कलि‍ गेला। ओना अखनि‍ पौने दू घंटा समए अछि‍ मुदा मनमे होन्‍हि‍ जे हो-ने-हो जँ समैक हि‍साबसँ जाएब आ बीचमे कोनो बाधा उपस्‍थि‍त भऽ जाए आ गाड़ी छुटि‍ जाए तखनि‍ तँ सभ वि‍चारल चौपट भऽ जाएत। तइसँ नीक जे जखनि‍ डेरोपर गाड़ीएक प्रति‍क्षा कऽ रहल छी तखनि‍ किए ने स्‍टेशनेपर जा कऽ टि‍कटो कटा लेब आ प्‍लेटफार्मेपर बैसब जे गाड़ी पकड़ैक पूरा बि‍सवास बनल रहत।
स्‍टेशन पहुँच पूछ-ताछ आॅफि‍स दि‍स मुनेसर बढ़ला। ओना एकेटा ट्रेन राँची-जयनगरक जे सप्‍ताहमे तीन दि‍न चलैत तँए समए तँ अपनो बुझले मुदा मनमे रंग-रंगक वि‍चार उठने अपनोपर शंका होइत जे हो-ने-हो गाड़ीक समए-सारणीमे कि‍छु फेर-बदल बीचमे ने भऽ गेल होइ। ओना दि‍न-राति‍क हि‍साबसँ अप्रील अक्‍टूबरमे समैक बदलाब होइ छै मुदा से आब कोनो ठेकान अछि‍। कहि‍यो समए बदलि‍ देल जाइ छै। तेकर कारणो अछि‍ जे जाबे दूरगामी ट्रेन कम छल ताबे दि‍न-राति‍क सुवि‍धा बूझल जाइत छल मुदा आब तँ से नहि‍येँ रहल। दि‍न-राति‍ दौड़ैबला ट्रेनक बीच केतेको जक्‍शन आ केतेको साधारण स्‍टेशन पड़ि‍ते अछि‍, तैबीच समैक की सुवि‍धा हएत। पूछ-ताछमे बुझले बात दोहरा कऽ बूझि‍ मुनेसर प्‍लेटफार्मक सि‍मटीक बैसकीपर बैसि‍ गाम दि‍स नजरि‍ देलनि‍, ने अन्‍हारे आ ने इजोते बूझि‍ पड़लनि‍। झल अन्‍हार जकाँ सभ कि‍छु देखथि‍। देखए लगला चारि‍ भाए-बहि‍नक बीच हमहूँ छी आ सुलोचनो बहि‍न छथि‍ मुदा अखनि‍ तकक जे जानकारी अछि‍ तइमे की छी। चारि‍ छी आकि‍ दू छी? आइ जँ दुनू परानी भैयो बहि‍नकेँ बूझि‍ आगू इलाज करबए बढ़ि‍ गेल रहि‍तथि‍ तँ जे परि‍स्‍थि‍ति‍ बनि‍ गेल अछि‍ से थोड़े रहैत। कोनो अस्‍पताल आकि‍ डाक्‍टरक देख-रेखमे रहि‍तथि‍, मुदा से...
तत्‍खनात कि‍यो (समांगो) कर्जो हाथे अखनि‍ धरि‍क प्रति‍कार केने रहि‍तथि‍ तँ जेते चि‍न्‍ता अछि‍ से थोड़े रहैत। बिमारीक अंति‍म सीमा जँ घेरा पाछू दि‍स ससरैत रहैत सेहो नहि‍येँ भेल। बि‍नु प्रति‍कारक रोगेकेँ ने अवसरि‍ भेटल। जे बि‍ससँ बि‍सम बनैत गेल हएत। मुदा वि‍चार तँ मात्र वि‍चार छी। वि‍चार केना काजक रूप पकड़ि‍ चलत, ई नान्‍हि‍टा थोड़े अछि‍ मुदा, खैर जे होउ, अपन नाप-जोख तँ अपने जि‍नगीक कसौटीपर ने हएत। भावलोक (भवलोक) आकि‍ वि‍चारलोक कर्मेपर ने निर्भर करै छै। जैठाम छी तैठामक कसौटी आ जैठाम नै छी तैठामक कसौटी एके थोड़े हएत।
प्‍लेटफार्मक हजारोक भीड़मे मुनेसर अपनाकेँ असगरे देखथि‍, के केकरा देखत, सभकेँ अपने भवसागर पार करैक छै। सभकेँ अपन-अपन बाट छै, अपन-अपन घाट छै, अपन-अपन घट छै आ अपन-अपन घटबारि‍ छै। लाखोक भीड़मे प्रेम जहि‍ना केतौ दोसरठाम नै अँटकि‍ प्रेमीक हृदैमे सटि‍ जाइ छै तहि‍ना मुनेसरक हृदए सुलोचना बहि‍नक हृदैमे सटल। एहनो तँ भऽ सकैए जे पहुँचैसँ पहि‍ने मरि‍ जाए। जँ सएह हएत तँ रोकि‍ओ तँ कि‍यो नहि‍येँ सकैए। जँ रोकनि‍हार रहैत तँ रोकलो जा सकै छल सेहो तँ नहि‍येँ अछि‍। तखनि‍ यएह ने हएत जे जे समए आ श्रम जि‍नगीमे लगबि‍तौं से दोसर दि‍स लागत।
प्‍लेटफार्मपर हल्‍ला भेल जे गाड़ी नै जाएत। इंजन खराप भऽ गेलै। हल्‍ला होइते जहपटार यात्री एक दोसरसँ पूछ-ताछ करए लगल। पूछ-ताछ कौैन्‍टरक आगू पुछि‍नि‍हारक भीड़ लगि‍ गेल। सबहक एके प्रश्न जे की भेल कि‍ए ने गाड़ी औत। बि‍नु बूझल जबाव देनि‍हार बि‍गड़ि‍-बि‍गड़ि‍ एतबे जबाव करैत जे कोनो जानकारी नै अछि‍। मुदा यात्रीओ तँ यात्रीए छी, सभकेँ अपन-अपन काज छै। केकरो कम जरूरी तँ केकरो बेसी। जेकरा कम जरूरी काज छै ओ तँ धीरे-धीरे अस्‍थि‍र भेल मुदा जेकरा कोट-कचहरी आकि‍ डाक्टर-अस्‍पतालक काज छै, ओ केना अस्‍थि‍र हएत। समैपर कचहरी नै पहुँच हाजि‍री नै देने वारंट हएत तहि‍ना अस्‍पतालोक। समैपर जँ मरीज आ मरीजाकेँ दबाइ नै भेटि‍तै तँ मरत। मुदा पनरहे मि‍नटक पछाति‍ हल्‍लाक रूप बदलल। प्‍लेटफार्मक रूप-रंग बदलि‍ बेदरंग हुअ लगल। केतौ चर्च होइत जे गाड़ी नै चलने भारी नोकसान भेल, तँ केतौ चर्च होइत जे तीन दि‍न काज पछुआ गेल। मुदा गाड़ी चलैक समाचार सेहो एके-दुइए पसरैत-पसरैत सौंसे प्‍लेटफार्म पहुँच गेल।
पनरह मि‍नटक पछाति‍ ट्रेन स्‍टेशनमे लगि‍ जाएत। यात्री सभ अपन-अपन छुटल काज पूरबैमे लगि‍ गेल। कि‍यो पानि‍क बोतल कि‍नए लगल तँ कि‍यो बटखर्चा। तैबीच मुनेसर बेर-बेर घड़ी देखथि‍ जे केते समए बँचल अछि‍। आब केम्‍हरो उठि‍ कऽ नै जाएब। रि‍जबेशन टि‍कट रहैत तँ जगहक बि‍सवासो रहैत सेहो ने अछि‍। जेनरल बोगीमे अगुआ कऽ नै चढ़ब तँ रेड़ामे पड़ि‍ जाएब। जुआन-जहान तँ रेड़ा-रेड़ी बरदासो कऽ सकैए मुदा सेहो ने हएत। ओना खलासी-कुली सभ पहि‍नेसँ माने पाछूएसँ सीट अजबारने रहैए आ पाइ लऽ लऽ एक्‍सट्रा सीटा सेहो बेचैए। अंतमे बूझल जेतै। समए तँ समए छी, अधलो काज तेहेन सि‍रचढ़ भऽ जाइए जे बेवस कऽ दइ छै।
गाड़ी अबैक मात्र दस मि‍नट समए शेष रहल। बेर-बेर मुनेसर मुड़ी उठा-उठा पाछू दि‍स तकथि‍ जे गाड़ी अबैए आकि‍ नै। तैबीच जेबीमे मोबाइलि‍क घंटी बाजल। जेबीसँ मोबाइल नि‍कालि‍ मुनेसर नम्‍बर देखलनि‍ तँ पत्नीक नम्‍बर रहनि‍। नम्‍बर देखि‍ ने रि‍सि‍भ करथि‍ आ ने रिजेक्‍ट। मोबाइलि‍क घंटी टनटन करैत मुदा मुनेसरक मन पत्नीक सिंहावलोकन करैत। एहेन पत्नीकेँ की बूझल जाए? मुदा गाड़ी अबैक समए अछि‍, अखनि‍ की कहल जाए। कि‍छु ने। मुदा तरे-तरे मन तड़ियाइत-तड़ियाइत तुरूछि‍ गेलनि‍। तुरुछिते स्‍वीच दाबि‍ झंझटि‍ कात केलनि‍। मुदा लगले दोसर घंटी बाजि‍ उठल। नम्‍बर देखि‍ जहि‍ना रेती चढ़ि‍ते घार पनिया जाइत तहि‍ना मुनेसरक मन अनायासे पनि‍या गेलनि‍। मन चहकलनि‍, रघुनाथक नम्‍बर छी। रि‍सि‍भ करि‍ते रघुनाथ कहलकनि‍-
बाबू, गाड़ी पकड़ि‍ रहल छी की नै?”
बेटाक प्रश्न सुनि‍ मुनेसर पसीज गेला। वि‍चारए लगला जे एकरा की बूझल जाए! की बेटा आदेश दऽ रहल अछि‍ आकि‍ काजपर सि‍रचढ़ अछि‍। मुदा समैक कमी वि‍चारकेँ रोकि‍ देलकनि‍। उत्तर दैत बजला-
बच्‍चा, स्‍टेशनपर गाड़ी पकड़ए आएल छी। गाड़ी अबैएपर अछि‍।
रघुनाथ-
बाबू, अखनि‍ बेसी बात करैक समए अहाँकेँ नै अछि‍। मुदा हम डेरेपर छी। पोतो अछि‍ आ पुतोहुओ लगेमे अछि‍।
पोता-पुतोहु सुनि‍ मुनेसरक मन मेमि‍या उठलनि‍-
ईहो तँ रघुनाथ बाजि‍ सकै छल जे दुनू बेटो आ पत्नीओ लगेमे छथि‍। से कि‍ए ने बाजि‍ बाजल जे पोतो आ पुतोहुओ अछि‍। अपन रहि‍तो अपन कि‍ए ने कहलक।
पतालक पानि‍ जकाँ जेहने सुन्नर तेहने शीतल मनमे मुनेसर कहलखि‍न-
बौआ, बेसी गप करैक समए नै अछि‍। मुदा ि‍धयानमे रखिहऽ।
रघुनाथ-
धि‍यानमे रखब आकि‍ धि‍यानमे छथिए। अहाँ बुलन्‍दीसँ जाउ। बोकारो, जसीडीह, बरौनी, दरभंगा पहुँच जरूर जानकारी देब। काज करैएबला ने हम-अहाँ भेलि‍ऐ, तइमे जानि‍ कऽ कनीओं ति‍रोट नै हो। अनजानमे भैयो सकै छै, तँए तेकर चि‍न्‍ता नै करब। रखि‍ दि‍यौ मोबाइल।
रखि‍ दि‍यौ सुनि‍ मुनेसरक मनमे समुद्रक बाढ़ि‍ जकाँ हि‍लकोर मारलकनि। बजला-
बौआ, अखनि‍ पाँच मि‍नट गाड़ीमे देरी अछि‍ ताबे एकटा गप आरो कऽ लेब।
एकटा गप सुनि‍ रघुनाथक मनमे उठल, भुखाएलकेँ जहि‍ना ई थाह नै रहै छै जे केते खाएब, पि‍यासलकेँ पानि‍क अंदाज नै रहै छै तहि‍ना भऽ रहल छन्‍हि‍। जरूरति‍ छन्‍हि‍ संगीक। मुदा हम तँ बेटा भेलि‍यनि‍, पाछू रहि‍ संग दऽ सकै छियनि‍, बराबरीमे केना देबनि‍। से दइवाली तँ माइए छथि‍न, से की केलखि‍न। मुदा पुछबो केना करबनि‍ जे माइओ संग छथि‍ आकि‍ नै। बाजल-
बाबू, गाम पहुँचि‍ते, से जखनि‍ पहुँची राति‍ होइ आकि‍ दि‍न, सुलोचना दीदीक सभ कि‍छु बूझि‍ जानकारी देब। हमहूँ ऐठाम डाक्‍टरक सम्‍पर्कमे रहब। जेना जे जरूरति‍ हेतनि‍ से तहि‍ना हेतै। जँ गाममे अँटाबेश नै हुअए तँ हुनका लाइए कऽ ऐठाम चलि‍ आएब। जेते काल ऑफि‍सक काज रहत तेतबे काल ने, तैबीच पुतोहु लगमे रहतनि‍; बाँकी समैक काज तँ अपनो कऽ सकै छी कि‍ने? अखनि‍ नि‍चेन से गाड़ीमे जाउ।
रघुनाथक बात सुनि‍ मुनेसर बजला-
बौआ, अखनि‍ तीन मि‍नट समए बाँकी अछि‍, अखनि‍सँ की करब। कि‍यो दोसराइतो रहैत तँ गपो करि‍तौं, सेहो ने...
मुनेसरक भरभराइत अवाजमे चनकि‍ कऽ खापड़ि‍क तीसी जकाँ एकटा बात कूदि‍ नि‍च्‍चाँ खसल। ओ अछि‍ दोसराइत। जखनि‍ कोनो प्रश्नपर रघुनाथ दुनू बेकती माएओ आ पि‍तोसँ गप करैत तँ स्‍पष्‍ट आभास भऽ जाइ जे दुनूक वि‍चारक दूरी अछि‍। मुदा दूरि‍ओ तँ दूरी छी आगूक दूरी आकि‍ पाछूक दूरी। एक रास्ताक दूरीसँ विपरीत दूरी दोबर होइत। मुदा दुनियाँक अजीव खेल अछि। विषुवत रेखासँ जेते दूरी दछिनक रहत ओते दूरी उत्तर भेने मौसम मिलि जाइए। ओना दुनू बेकती बीए, बीएस-सी छी तँए वैचारि‍क दृष्‍टि‍सँ कम-बेसी आँकब उचि‍त नै, तेकर दोसरो कारण अछि‍ जे उमरोक हि‍साबसँ एकरंगाहे छथि‍। तँए ईहो प्रश्न उठब जे हम बेसी दुनि‍याँ देखलि‍ऐ आकि‍ अहाँ। मुदा एकटा नम्‍हर प्रश्न तँ अछि‍ए जे एके काजक दू वि‍चारक बाट परि‍वारमे उठि‍ कऽ ठाढ़ भऽ जाइए। परि‍वारोक तँ दि‍शा छै जे आगू मुहेँ बढ़त आकि‍ ठमकल रहत आकि‍ पाछू मुहेँ सरकत। रघुनाथक मन ठमकए लगल। हाथक कोनो आँगुर काटू घा अपने। मुदा वि‍चारो तँ वि‍चार छी। कि‍यो बन्‍दूकक गोलीओक आगू वि‍चार भंग नै करए चाहैत तँ कि‍यो बुधि‍क खेल बूझि‍ गेन जकाँ गुड़कबैए। खैर जे होउ, जानए जअ आ जानए जत्ता। मुदा ऐठाम तँ एक परि‍वारक प्रश्न अछि‍ जइमे बाबू-माए छथि‍, दू भाँइ दू दि‍यादि‍नी आ तीनटा बच्‍चा अछि‍। बच्‍चा तँ अखनि‍ दूधमुहाँ अछि‍ तँए जरूरीओ नै अछि‍। मुदा चारि‍ गोटे तैयो बँचलौं ई चारि‍ वि‍चार जाबे एकठाम नै हएत ताबे समुचि‍त ढंगसँ परि‍वार चलत केना? जँ परि‍वारकेँ दू पहि‍या गाड़ी बूझि‍ वि‍चारब तँ, माइए-बाबू भेला। तइमे दुनू दि‍शि‍या, केना परि‍वार आगू मुहेँ ससरत। तहूमे ढलानपर नै चढ़ाइपर। कोनो काजक सोलहन्नी बि‍सवास ताबे धरि‍ नै कएल जा सकैए जाबे तक मनक सोच (वि‍चार) वाणी होइत कर्म दि‍स नै बढ़त। जखने हाथ रहत घाटपर आ मन रहत सीकपर तखने केहेन हएत...। हाथमे रघुनाथोक मोबाइल आ मुनेसरोक मोबाइल सनसनाइत। बोली आशा करैत। मुदा बोल कोनो मुँहमे नै। मुदा वि‍रामक पछाति‍ ने वि‍श्राम हएत, बीचमे केना वि‍श्राम हएत। तैबीच ट्रेनक अवाज धमकल। कानमे धमक लगि‍ते मुनेसर बजला-
बौआ, गाड़ी आबि‍ गेल, जाइ छि‍अ।
पि‍ताक बात सुनि‍ रघुनाथ, खापड़ि‍क खराएल अन्न जकाँ बाजल-
बाबू, अहाँ आगू बढ़ि‍ जानकारी दि‍अ, जरूरति‍ देखि‍ वि‍चारब। जुआन-जहान छौड़ा छी, अखनि‍ नै ट्रेनक धक्का-धुक्की बरदास करब तँ कहि‍या करब। जेहेन स्‍थि‍ति‍ रहत तइ हि‍साबसँ काज करब। कोनो जरूरी अछि‍ जे परि‍वारकेँ संगे लऽ चली। अपन डेरा अछि‍, अपना घरमे रहत। काजोक तँ लहरि‍ होइ छै, दू-चारि‍ दि‍न ने समुद्र जुआरि जकाँ रहैए, मुदा रसे-रसे रसाइए जाइए कि‍ने।
बाजि‍ रघुनाथ मोबाइलक स्‍वीच दाबि‍ आगूमे रखलक। लगमे ठाढ़ पत्नी-सुनीता पुछलखिन-
बाबूजी असगरे गाम जाइ छथि‍न? एक तँ अपने देहमे सभ रोग रखने छथि‍, तैपर आॅपरेशन कएल पेट छन्‍हि‍?”
कहि चुप भऽ गेली। गुम भेल रघुनाथ एक दि‍स नजरि‍ पि‍तापर दैत तँ दोसर दि‍स पत्नी-बच्‍चा आगूमे। सभ तँ अपने भेल तैठाम डेग उठाएब असान नै। मुदा जहि‍ना भुमकम-बाढ़ि‍ जेतेकाल रहैए ओते काल तँ दुनि‍याँसँ पकड़ि‍ अनबे करैए। भलहिं चलि‍ गेला पछाति‍ जे होउ। पत्नीकेँ हाथक इशारासँ बैसबैत रघुनाथ बाजल-
माएसँ अहीं गप करू, हम सुनब।
सुनीता-
माए, सुनलिऐ हेन जे गाममे दीदीक डाँड़ टुटि‍ गेलनि‍ से बाबूजी गेला हेन?”
मुनेसरक आगूक छुटल मुँह पुतोहुक आगू तँ छुटले-छुटले, साधनाक मुँह बजली-
बहि‍न छि‍यनि‍ तँ जेता नै?”
सुनीता-
अपनो तँ बि‍मरयाहे छथि‍, तखनि‍ जँ अपनो बि‍मार पड़ि‍ जाथि‍, तखनि‍?”
सुनीताक प्रश्न सुनि‍ साधना मोबाइल रखि‍ देलनि‍। बेर-बेर सुनीता हेलौ-हेलौ करैत रहली मुदा कोनो उत्तर नै।
मुनेसर हजारो यात्रीक बीच कोणक सीटपर बैसला। जहि‍ना चौड़ी खेतमे आनो-धान झरे भऽ जाइए तहि‍ना मुनेसरक कानमे लोकक बात जड़ाहे बुझाइत रहनि‍। मन टाँगल रहनि‍ अपन यात्रापर। चारि‍ भाए-बहि‍नक बीच जहि‍ना सुलोचना बहि‍न तहि‍ना ने हमहूँ भेलौं। तहि‍ना ने ऊहो (जुगेसर-कवि‍ता) दुनू भाए-बहि‍न भेलखि‍न। मुदा चारि‍मे दुइए किए? फेर अपना दि‍स मन घुमलनि‍ अपनो तँ सएह छी। जखनि‍ बेर-बेगरतामे पत्नीओ संग नै एली तखनि‍ केकरा कहबै। कि‍यो अपन मनक राजा छी आकि‍ भि‍खाड़ी। पोथीमे छापल फोटो जकाँ दुनि‍याँ नै ने अछि‍। कर्ता बनि‍ सभ जनम नेने अछि‍, दि‍न-राति‍ कर्मो करि‍ते अछि‍। मंशो सबहक एके छै मुदा भऽ की जाइ छै, से केकर के देखत। मुदा अपना संग परि‍वार आ समाजक जे दायि‍त्‍व ऊपरमे रहै छै, सेहो तँ अपने केने हेतै।

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बचकानी मन जेहने रघुनाथक तेहने सुनीताक। बचकानी ऐ मानेमे जे ने रघुनाथ बेकती-परि‍वारसँ आगूक दुनि‍याँ देखने आ ने सुनीता। तीस बर्खक रघुनाथ स्‍कूल-कौलेजसँ बैंक धरि‍ जहि‍ना देखने तहि‍ना सुनीतो स्‍कूल-कौलेजसँ परि‍वारे धरि‍ समटाएल। ओना सुनीताक अपन प्रवल इच्‍छा जे जखनि‍ ग्रेजुएशन केने छी तखनि‍ केतौ नोकरी करब जइ कमाइसँ परि‍वारक भरण-पोषण हएत। बेक्‍तीगत तौरपर तँ सामान्‍य वि‍चार भेल, सभकेँ अपन कर्मपर ठाढ़ भऽ जि‍नगीक जतरा करक चाहि‍ए। मुदा मनुख तँ मनुख छी जेकरा मनुख पैदा करैक क्षमता छै। तँए स्‍त्रीपुरुखक सम्‍मि‍लि‍त रूप परि‍वार छी। जइमे पति‍-पत्नीक दुनूक वि‍चारक समावेश केला पछातिए ने रस्‍ता धेने टघरत। ओना जँ दुनू बेकतीक तलब एकठाम जोड़ल जाएत तँ एक काज भेने एक रंग नै तँ कमी-बेसी कि‍छु हेबे करत। कारणो अछि‍ दू रंगक काज। जहि‍या रघुनाथ सुनीताक बीच सम्‍बन्‍धक नाओं लेल गेल तहि‍या दुनूक वि‍चार अपन-अपन। कारणो छल जे ने रघुनाथ नोकरी करै छल आ ने सुनीते। जइसँ वि‍चारमे बान्‍ह-छेक पड़ैत। जहि‍ना सुनीता टटके कौलेज छोड़ने तहि‍ना रघुनाथो। ओना रघुनाथ दू-तीन साल सुनीतासँ बेसी उमेरक। सुनीता कौलेजसँ मात्र बीए आनर्स केने जखनि‍ कि‍ रघुनाथ बीएस-सी आर्नसक संग एमबीए सेहो केने। जहि‍ना रघुनाथक पि‍ता-मुनेसरक धारणा जे नोकरी दू-चारि‍ साल आगूओ-पाछू होइ छै मुदा बि‍आहोक तँ अपन समए अछि‍। अपनो (मुनेसरकेँ) तँ बि‍आहक पछाति‍ए नोकरी भेल‍ तँए हाथक चूड़ी लेल ऐनाक कोन प्रयोजन। तहि‍ना सुनीताक पि‍ता मदन मोहनोक धारणा। अपनो जि‍नगीमे तहि‍ना भेल जे प्रशासनि‍क परीक्षा पास केला पछाति‍ ट्रेनिंग पछुआएले छल। जे नोकरीक पूर्ब अवस्‍था भेल। मुदा दुनूक अपन-अपन पारि‍वारि‍क स्‍थि‍ति‍क कारण रहनि‍। मुनेसरक पारि‍वारि‍क स्‍थि‍ति‍ रहनि‍ जे बि‍आहक तीन साल-पान साल पछाति‍ दुरागमन होइ छै। तैबीच नोकरीक परि‍यास करब। मुदा मदन मोहनक परि‍वारक वि‍चार धारा संग बेवहारि‍क धारा सेहो फुटकौर छेलनि‍। अखनि‍ धरि‍ मदन मोहन सोलहो आना माता-पि‍ताक आदेशमे छला। जइसँ दू धारणा परि‍वारमे नै जनम नेने छेलनि‍ जे नोकरी होइते बेटा-पुतोहुकेँ अगुआ नोकरी लेल घर छोड़त। जहि‍ना पति‍क अधि‍कार पत्नीपर आ पत्नीक पति‍पर तहि‍ना सासु-ससुरक सेहो ने पुतोहुपर। समैनुकूल खेनाइओ-पीनाइ-भानसो-भात एते असान तँ भाइए गेल जे घंटो भरि‍क काज नै रहल।
दुरागमनसँ पहि‍ने रघुनाथकेँ बैंकमे नोकरी भऽ गेल। सुनीता सासुरेक ताकमे। बि‍आहक पछाति‍ नैहर-सासुरक बीच संक्रमण होइते छै। मदन मोहन दुनू परानीक स्‍पष्‍ट सोच रहनि‍ जे बि‍आहसँ पहि‍ने धरि‍ सुनीतापर जेते अधि‍कार छल तइमे कम करए पड़त। जँ अपना सभ नोकरीक पक्षमे छी आ ओइठामक (सासुर) वि‍पक्षमे होथि‍ तखनि‍ एहेन काज औगता कऽ करबो नीक नै। दुरागमनक पछाति‍ रघुनाथकेँ एक संग तीन घर सोझहा पड़ल। पहि‍ल अपन वि‍लासपुरक डेरा, सभ तरहक सुवि‍धा। दोसर, राँचीक डेरा मुदा पि‍ता पलामूमे भाड़ाक घरमे रहै छथि‍! तेसर पूर्वजक गाम जे समैक धक्कामे से डोलि‍-डोलि‍ उखड़ि‍ रहल अछि‍। केना नै उखड़त? बि‍आहेमे वि‍दागरी आ वि‍दागरीओ केतए तँ जैठाम नोकरी करै छी तैठाम! सासुर तँ पहि‍ने छुटल जे रसे-रसे नैहरो छुटि‍ए जाइत। तैसंग कोजगराक मखान, ति‍लासंक्रान्‍ति‍क जड़ौउ-वस्‍त्र आ मोसरामनीक हि‍साबे केतए। पत्नीक बेवहारसँ परि‍चि‍त मुनेसर अपन भार हटबैत रघुनाथकेँ दुरागमनसँ पहि‍ने कहि‍ देने रहथि‍न, बौआ नीक हेतह जे दुरागमनक पछाति‍ वि‍लासेपुर चलि‍ जइहऽ। अगि‍ला छुट्टीमे हमहूँ एबह।
वि‍लासपुरक तीन कोठरीक डेरा, अति‍रि‍क्‍त-अति‍रि‍क्‍त। बैंकसँ वेतन उठा रघुनाथ डेरा आबि‍ पलंगपर रूपैआ रखि‍ वाथरूम वि‍दा होइत सुनीताकेँ कहलक-
जलखै करैक मन नै अछि‍, केन्‍टिंगेमे कऽ लेलौं। मुदा चाह पीब। तँए जाबे बाथरूमसँ नि‍कलै छी ताबे अहूँ चाहक जोगार करू।
जैठाम चाह-चीनीक समस्‍या रहैत तैठाम ने एहेन आदेश पाबि‍ पत्नी अँगैठी-मड़ौर करै छथि‍, जैठाम से नै तैठाम तँ काजे उत्तर होइ छै। सएह भेल। रघुनाथ अपन कमाइपर अपन जि‍नगी ठाढ़ करैक प्रश्न उठबैत बाजल-
अहाँक एलापर ई पहि‍ल दरमाहा छी, हम तँ बाहरसँ कमा हाथमे दऽ देलौं, आब अहाँ कहू जे केना चलाएब?”
जि‍नगीक नक्शा नै बना सुनीता अपन मनक बात उगलि‍ देलनि‍-
हमहूँ केतौ नोकरी करि‍तौं।
पत्नीक वि‍चार सुनि‍ रघुनाथ गुम भऽ गेल। मुदा ऐठाम तेसर अछि‍ के जे गुमी छजत। ऐठाम तँ प्रश्नक उत्तर दि‍अ पड़त। एक संग अनेको प्रश्न रघुनाथक मनमे तड़कैत मेघ जकाँ आबि‍ गेल। मरदा-मरदी डेरासँ नि‍कलि‍ते डरए लगै छी जे बैंकक स्‍टाफ बूझि‍ कि‍यो आक्रमण ने कऽ दि‍अए तहि‍ना आॅफिस आबि‍ थड़थड़ाइत रहै छी जे फेड़-फाड़ ने भऽ जाए। ई तँ घरक बाहर भेल मुदा डेरोकेँ सुरक्षि‍त नै देखै छी। सभ कि‍छु रहि‍तो डरौन जकाँ लगैत रहैए। तैठाम महि‍लाकेँ असगरे घरसँ नि‍कलब...?
दोसर बात उठल जे परि‍वारक स्‍तर बना ने घरक खर्च निर्धारि‍त हएत मुदा ऊहो तँ घरक काजेपर निर्भर करैए। घरक काज यएह ने जे समुचि‍त भोजन, वस्‍त्र, घर, बाल-बच्‍चाकेँ पढ़ैसँ लऽ कऽ बि‍आह-दान आ मौका-मुसीबत (बर-बि‍मारीसँ लऽ कऽ सामाजि‍क काज‍) सम्‍हारै धरि। अपन मनक दौड़मे रघुनाथ परेशान होइत गुमकी लधने। मुदा तँए कि‍ सुनीताकेँ प्रश्न दोहरबैक मन रहलनि‍। मन बौआइत माता-पि‍तापर चलि‍ गेलनि‍। पि‍ताजी जि‍ला- स्‍तरक प्रशासनि‍क अफसर रहि‍तो पाँच गोटेक परि‍वारमे आठ दि‍नपर सौ ग्राम खस्‍सीक कलेजी चाहे तीनटा अंडा अनै छला आ सभ मि‍लि‍ खाइ छेलौं। टुकड़ी-टुकड़ी बना-बना हि‍स्‍सा पूरबै छेलौं। बच्‍चेसँ कहि‍यो झूठ नै बजलौं हेन। कहि‍यो केकरो कोनो चीज नै छुलि‍ऐ। एहने आदति‍ ने अपनो परि‍वारमे बाल-बच्‍चाकेँ लगबैक अछि‍। रघुनाथ बाजल-
अपन की वि‍चार, स्‍पष्‍ट करू?”
वि‍चार स्‍पष्‍ट सुनि‍ सुनीता ठमकली। ठमकैक कारण भेलनि‍ जे जेते पि‍ताजी दरमाहा उठा पाँच गोटेक परि‍वार नीक जकाँ चलबै छला तेते तँ पति‍ओ कमाइ छथि,‍ माएओ नोकरी नै करै छली, तखनि‍ नोकरीक की प्रयोजन। परि‍वारो तँ परि‍वारे छी। जहि‍ना कोनो देशक कि‍रि‍या-कलाप छै तहि‍ना ने परि‍वारोक अछि‍। जे केला पछाति‍ए पूर्ति हएत। जँ पाइएक पाछू दुनू बेकतीक समए चलि‍ जाएत तखनि‍ बाल-बच्‍चा आकि‍ परि‍वार-समाजक बीच सम्‍बन्‍ध केना बनत? अपना ऐठामक चि‍न्‍तनधारा (अध्‍यात्‍मि‍क सोच) मे माए-बापकेँ सि‍रि‍फ जन्‍मदते नै गुरु सेहो मानल गेल अछि‍। प्रश्न अछि‍ जे पति‍-पत्नी मि‍लि‍ बच्‍चाकेँ जन्‍मसँ तीन साल धरि‍ पोसि‍-पालि‍ कोनो वि‍द्यालयमे दऽ दइ छि‍ऐ, माए-बापसँ कोसो दूर। तैठाम माए-बापक आकर्षण बच्‍चाक प्रति‍ केते दि‍न टि‍कत। तहूमे जे नोकरीक (काजक) रूप बनि‍ गेल अछि‍ ओ घंटाक समए कि‍ताबक पन्नेमे नुकाएल जाइए। एक तँ ओहुना सभकेँ अपन जि‍नगीक बेक्‍तीगत काज (शौच क्रि‍यासँ सुतै धरि‍) अछि‍ए तैपर काजक वृहत् भार सेहो पड़ि‍ए रहल अछि‍। समए गमौने आमदनी तँ बढ़ि‍ए जाइए। आमदनी अनुरूप जि‍नगी बनबैक इच्‍छा तँ मनमे अछि‍ए। प्रश्न चौबीस घंटाक दि‍न-राति‍मे अपन आकि‍ परि‍वारक फड़ै-फुलैक केते समए बँचैए आ केते दुनि‍याँक दौड़मे जा रहल अछि‍। चाहे बेक्‍तीगत जि‍नगी हुअए आकि‍ पारि‍वारि‍क, समैनुकूल रस्‍ता तँ बनबैए पड़त, नै तँ धारासँ कटि‍ कि‍नछरि‍‍ चलि‍ जाएब।
बेकतीक निर्माण (मनुख‍ बनैले) लेल बेक्‍तीगत कर्मक आवश्‍यकता पड़बे करै छै जँ से नै हएत तँ मानवीय संवेदनापर चोट पड़बे करत। तहि‍ना परि‍वारो-समाजाेक छइहे। सुनीतासँ स्‍पष्‍ट पुछैक कारण रघुनाथक मनमे अपन परि‍वार (माए-बापक) आबि‍ गेलै। परि‍वार तँ परि‍वारक लोककेँ बि‍सवासमे लइए कऽ चलत। तखने परि‍वारक असल रूप सोझहा पड़त, जइमे बेकतीक समुचि‍त वि‍कास होइ छै। पत्नीक मनक बात बुझै दुआरे प्रश्न उठौलक। मुदा जइ परि‍वारमे वौधि‍क अनुशासन अछि‍ तइ परि‍वारक सुनीता, तँए प्रश्नपर ठमकि‍ गेली। दुनूक बकार बन्न। ने रघुनाथ आगू बढ़ि‍ कि‍छु बाजि पबैत आ ने सुनीता। मुदा चि‍ड़ै जकाँ बोलक बदला लोलोसँ तँ काज नहि‍येँ चलत। लाेलो तँ सुग्‍गामोनाक छी। एकटा पाकल ति‍लकोर-लताम खाइबला दोसर काँचोसँ काँच खाइबला। मुदा यक्ष प्रश्न जेहने रघुनाथक संग तेहने सुनीताक संग सेहो। एक पलंगपर बैसल रहि‍तौ जोगि‍नी जकाँ सौ जोजनपर दुनूक मन बौआइत। केना नै बौऐतै? आखि‍र परि‍वारक नीब गाड़ैक प्रश्न अछि‍ ने।
अपन गतिए गाड़ी (ट्रेन) चलि‍ रहल अछि‍, कोणक सीटपर बैसल मुनेसर बि‍सरि‍ गेला, बेटाक फोनपर जानकारी देनाइ। ईहो थाह नै रहलनि‍ जे कैकटा टीशन पार केलौं। मनमे सुलोचना बहि‍नक जि‍नगी नचैत। आइ जँ आने बहि‍न जकाँ सुलोचनाे बहि‍न सासुरमे रहि‍तथि‍, बेटा-पुतोहु, पोता-पोती रहि‍तनि‍ तँ हमरा राति‍केँ किए चलए पड़ैत। मुदा जँ से नै छन्‍हि‍ तँ की हमहूँ वि‍रान भऽ जैयनि‍। एक तँ ओहि‍ना भैया-भौजी लगमे रहि‍तो हटल छथि‍न। तैसंग छोट बहि‍नो हटले सन अछि‍ तैठाम के देखत वेचारीकेँ? तीनमे एक हम भेलि‍ऐ, मुदा जँ तीनू कनी-कनी कऽ भार उठा लि‍तथि‍ तँ मोटा तँ हल्‍लुक भाइए जाइत। भने तँ बेटा कहबे केलक जे केकरो कि‍यो परान नै दइ छै मात्र सेवा धरि‍ करै छै। तइमे जानि‍ कऽ कोनो खोंट नै होइ। बि‍नु बूझल भाइओ सकैए। नजरि‍ पत्नीपर गेलनि‍-जि‍नगीक संगि‍नीक संकल्‍प लेनि‍हारि‍ पत्नी सेहो बि‍छुड़ले जकाँ छथि‍, जकाँ की‍ छथि‍ जे जइ काजक नीवि‍ते जा रहल छी आ ओ संग नै छथि‍ तँ की भेल? मुदा बेटा तँ पीठपोहू अछि‍ए। बेटापर नजरि‍ पड़ि‍ते मुनेसर हाँइ-हाँइ कऽ जेबीसँ मोबाइल नि‍कालि‍ धरेलनि-
बौआ, तेज गति‍ए जा रहल छी, कोठरीमे तँ इजोत छै मुदा कोठरीक बाहर तेते अन्‍हार छै जे कि‍छु देखि‍ नै पड़ैए जे केतए आबि‍ गेलौं। स्‍टेशनक ठेकान नै रहल।
पि‍ताक बात सुनि‍ रघुनाथ बाजल-
कोनो चि‍न्‍ता मनमे नै राखू। हमहूँ जगले छी, समए-समैपर जानकारी दैत रहब। अखनि‍ कोनो डाक्‍टर सभसँ सम्‍पर्क करब उचि‍त नै बूझि‍ रहल छी, तँए कि‍नकोसँ सम्‍पर्क नै केलौं हेन।
ठीक छै, मोबाइल रखि‍ दहक।
मोबाइल रखि‍ते सुनीता बजली-
एक तँ अपनो बाबूजी केतेको रोगसँ रोगाएल छथि‍ तैपर बहि‍नक ई दशा छन्‍हि‍! केना कऽ सम्‍हारि‍ पौता?”
सुनीताक बात सुनि‍ रघुनाथ बाजल-
दोसर उपए?”
रघुनाथक प्रश्नक उत्तर सुनीताकेँ नै फुड़लनि‍। असमनजसमे पड़ल सुनीताकेँ देखि‍ रघुनाथ बाजल-
पि‍ताजी धैनवादक पात्र छथि‍। जे अपन रोगाएल वृद्ध शरीरमे अखनो सेवा लेल तैयार छथि‍। जँ थोड़ो-थाड़ सभ कि‍यो संग देबनि‍ तँ की ओ पाछू हटता। कि‍न्नहु नै पाछू हटता। पाछू हटथि‍ वा नै, मुदा जँ पीठपर रहबनि‍ आ काजक महत देखब तँ हुनका हटने की हेतनि‍। जैठाम तक ओ अगुआ कऽ पहुँचल रहता तैठाम तकक अपनो आ परि‍वारोक तँ बनले रस्‍ता भेटत, मात्र ओइ दि‍शामे आगू बढ़ैक अछि‍।
रघुनाथक वि‍चार सुनीताक मनकेँ तेना हौंरलकनि‍ जे पाशा बदलि‍ गेलनि‍। जहि‍ना अखड़ाहापर हारैत खलीफा वा रंगमंचपर पछड़ैत नर्तक, कुश्‍ती वा मंचक मंचन बदलि‍ दोसर दाओ वा चालि‍ पकड़ि‍ नव दृश्‍य सृजन करैए तहि‍ना सुनीता पाशा बदलैत बजली-
बाबूजीक जे दशा छन्‍हि‍ ओ माए किए ने बूझि‍ पौलनि‍?”
जहि‍ना नि‍रुत्तर होइत सुनीता पाशा बदलि‍ लेलनि‍ तहि‍ना सुनीताक प्रश्न रघुनाथकेँ पाशा बदलैले बाध्‍य केलकनि‍। मुदा प्रश्न तँ एहेन सघन भऽ गेल जे बि‍हि‍या कऽ जड़ि‍ पकड़ब कठि‍न अछि‍। बि‍ना जड़ि‍ भेटने केतबो चि‍क्कन शब्‍द किए ने प्रयोग होइ मुदा वस्‍तुस्‍थि‍ति‍ तँ हराएले रहत। एक संग अनोको प्रश्न रघुनाथक मनमे उठल। माएक खिधांस जाँघ तरक पत्नीकेँ कहब उचि‍त हएत? जँ नै कहबनि‍ सेहो तँ उचि‍त नहि‍येँ हएत, एक तँ ओहुना पढ़ल-लि‍खल बुझनुक पत्नी छथि‍ आन जकाँ जँ चौबन्नीओ-अठन्नी अबूझ रहि‍तथि‍ तँ अँटाबेशो भऽ सकै छल, सेहो नै अछि‍। दोसर पति‍-पत्नीक बीच नव सम्‍बन्‍ध संगीक रूपमे ठाढ़ भेल। जहि‍ना कोनो छोट गाछक पहि‍ल डारि‍ सुखने-टुटने वा कटने, जि‍नगी भरि‍क दाग बना दइ छै, तेना जँ भेल तँ कहि‍यो सीना तानि सकै छी? जखने सीना तानि‍ कि‍छु बाजए लगब आ जँ ओही बातक गोलासँ गोलि‍यौल जाएत तखनि‍ छाती छोड़ि‍ लगत केतए! जखने सीनामे गोला भीड़त तखने दलदला कऽ करेजमे भूर करबे करत! वि‍चि‍त्र स्‍थि‍ति‍मे रघुनाथ उलझल। जि‍नगीमे जखनि‍ आन संकट अबै छै तखनि‍ धर्म ओकरा बँचबैए, मुदा जखनि‍ धर्मेपर संकट औत तखनि‍ के बँचौत? जेना-जेना रघुनाथ प्रश्नक जड़ि‍ तकैत तेना-तेना संकट बढ़ल चलि‍ जाइत। अखनि‍ धरि‍ माएक देख-रेखमे रहलौं, जेकरा नकारब अनुचि‍त हएत मुदा कोन रूपमे रहलौं, ई तँ नकारल नै जा सकैए। वि‍चारक गंभीरता रघुनाथक चेहराकेँ एते मलि‍न कऽ देलक जे लगले पत्नीक प्रति‍ बि‍सवास रोपब कठि‍न तँ भऽ गेल। होइतो छै, पोसल बच्‍चा कनीओं सेवा पाबि‍ कलशए लगैए मुदा रोगाएल, दूधकट्टू बच्‍चाकेँ कलशैले जड़ि‍मे मालीकेँ तेलक माली लऽ कऽ बैसला पछाति‍ए आशा जगै छै। मुदा रघुनाथकेँ से नै भेल, भेल ई जे जहि‍ना पाँच बर्खक पछाति‍ भेटल संगी वा परि‍वार जनकेँ बि‍छुड़ैक अंति‍म दि‍नक मि‍लाप पहि‍ल दि‍नसँ मि‍ला आगू बढ़ैए। मनमे अबि‍ते रघुनाथ बाजल-
भने दुनू परानी अपनो सभ छी आ पि‍तोजी गाड़ीमे असगरे हेता, एक तँ दूरक सफर तहूमे असगर आरो गड़ूगर होइ छै। तँए नीक हएत जे अहीं हुनकासँ गप करू।
ससुरसँ मुहाँ-मुहीं गप करब सुनीताकेँ अनुचि‍त बूझि‍ पड़लनि‍। अनुचि‍त ई जे ससुर-पुतोहुक बीच पति‍ होइ छथि‍। भऽ सकैए कि‍छु एहेन बात बजा जाए जे उपयुक्‍त नै होइ। कारणो अछि‍। कारण ई अछि‍ जे ऐठाम हम दुनू परानी छी, भरल-पूरल परि‍वारक बीच छी, मुदा ओ तँ गाड़ीमे असगरे छथि‍, तहूमे राति‍क रस्‍ता, एक तँ ओहुना बोनो-झाड़मे मूससँ बेसी छुछुनरिए फड़ि‍ गेल अछि, गाड़ी तँ सहजे गाड़ीए छी। जँ कहीं कि‍यो बैगे पार केने होन्‍हि‍, जइसँ ने कि‍छु खाइक बँचल होन्‍हि‍ आ ने बि‍मारीक गोटी-दबाइ। ओ तँ बिषमो स्‍थि‍ति‍मे भऽ सकै छथि‍। बेटा तँ बेटा भेलखि‍न। पुरुष-नारीक बीच एकटा ओहनो सम्‍बन्‍ध सूत्र अछि‍ जे मरदा-मरदी भावहीन अछि। वि‍चार मनमे अबि‍ते सुनीता बजली-
नीक हएत जे अहीं मोबाइलक सम्‍पर्क करू हमहूँ सुनब?”
सुनीताक बात सुनि‍ रघुनाथक मनमे उठल केकर मन कोन रूपमे कोनो चीज बुझैए ई तँ बजने बूझब। जँ हमहीं दुनू बापूत गप करब तँ अपने ढंगसँ ने करब। काजक दौड़मे जेतए धरि‍ आबि‍ चुकल छी तइसँ आगूएक गप ने करब। तइसँ हि‍नका की‍ भेटतनि‍। मुदा प्रश्न तँ अछि‍ परि‍वारि‍क वि‍चारक। बाजल-
देखि‍यौ, जहि‍ना कोनो गाछ तँ बीजसँ होइ छै। एक दि‍स गाछ नि‍कलि‍ अकास दि‍सन बढ़ै छै आ दोसर दि‍स सि‍र नि‍कलि‍ मुसराइत पताल दि‍सन बढ़ै छै। पतालो दि‍स ने सि‍रगर सि‍र मुसरासँ आरो-आरो सि‍र सभ नि‍कलै छै। सि‍रोसँ सि‍र नि‍कलै छै, तहि‍ना धरतीक ऊपरोक गाछमे डारि‍ सभ नि‍कलै छै। सि‍रगर डारि‍ गाछेक रूपमे बढ़ैत नि‍कलै छै माटि‍क तरक मुसरा ऊपर आबि‍ शील बनि‍ गाछक रूपमे बढ़ै छै आ दोसर-तेसर डारि‍ सेहो नि‍कलै छै। तहि‍ना जइ परि‍वारमे अपना सभ छि‍ऐ ओइ परि‍वारक पछि‍ला पीढ़ीक सभसँ ऊपर (आगू) हम भेलि‍ऐ। हमरा पछाति‍ (पाछू) एक दि‍स अहाँ भेलि‍ऐ आ दोसर दि‍स भाए। अहाँ ऐ मानेमे जे हमरा कान्‍हीक भेलि‍ऐ। अहाँसँ उमेरो भाएक कम छै। अहाँ पहि‍ने स्‍कूल धेलि‍ऐ, आगू भऽ दुनि‍याँक मंचपर एलि‍ऐ, भाए पाछू आएल। तँए देहा-देही सम्‍बन्‍ध देखए पड़त। हमरा संग पति‍-पत्नीक सम्‍बन्‍ध अछि‍ भाएक संग दि‍अर-भौजाइक। तहि‍ना दुनू दि‍यादि‍नी भेलौं। जहि‍ना छोट दि‍यादि‍नी बेटी तुल्‍य होइ छै तहि‍ना ने छोट भाए बेटे जकाँ होइ छै। यएह ने पारि‍वारि‍क सम्‍बन्‍ध अछि‍। तँए अखनि‍ पि‍ताजी जइ स्‍थि‍ति‍मे हेता तइसँ हटि‍ आन बात पूछब हमराले उचि‍त नै भेल। जँ कहीं काल्‍हि‍ हमरो जाइक जरूरति‍ भऽ गेल तँ भाए (छोट भाए) ऐठाम अहूँ चलि‍ जाएब। जाबे धरि‍ बहराएल रहब ताबे तक अहूँ रमाकान्‍त ऐठाम रहब। जखनि‍-जखनि‍ गप करैक समए भेटत तखनि‍-तखनि‍ अपनो दुनू दि‍यादि‍नीक परि‍वारक आ अपने परि‍वारक गप-सप्‍प करब। गप-सप्‍प की करब जे सभ मि‍लि‍ वि‍चार करब जे पि‍ताजी केतए धरि‍ हमरा सभकेँ पहुँचा देलनि‍ आ आगू हम सभ केना बढ़ब।
एक संग रघुनाथक मुँहसँ केतेको प्रश्न उठि‍ गेल। मि‍थि‍लांगना सुनीता एके धारक अनेको घाट देखि‍ बौअए गेली जे कोन घाट पहि‍ल स्‍नान कएल जाए। तैबीच मोबाइलक घंटी बाजल। घंटी बजि‍ते रघुनाथ उठौलक। लगले रघुनाथकेँ मोबाइल उठबैत सुनि‍ मुनेसर असीरवाद दैत बजला-
बौआ, जगले छी।
जागल सुनि‍ रघुनाथकेँ कि‍छु जबाव नै भेटि‍ सकल। खखास केलक। खखास सुनि‍ मुनेसर बजला-
बौआ, करीब जसीडीह आबि‍ गेल छी। अखनि धरि‍‍ गाड़ीमे एको बेर उकासीओ ने भेल हेन। ओना दबाइओ आ पानि‍ओ रखने छी, जखने खाहिंस हएत तखने खा लेब। मुदा कि‍छु छि‍ऐ तँ गाड़ीए छि‍ऐ। भुमकमक समए धरती डोलने देह-हाथ तँ डोलबे करै छै तहि‍ना ने गाड़ीओ छी।
पि‍ताक बात सुनि‍ तोष भरैत रघुनाथ बाजल-
भोर तँ भाइए गेल, फरि‍च जकाँ सेहो भऽ गेल, ओमहर केहेन बूझि‍ पड़ैए।
एक तँ खि‍ड़की-केबाड़ बन्न तैपर बि‍जलीक इजोत तँए कोठरीक भीतर तँ दि‍ने जकाँ बूझि‍ पड़ैत मुदा गाड़ीक बाहर धुनि‍ जकाँ रहने अन्‍हराएले। सर्द हवा अबै दुआरे मुनेसर खि‍ड़की खोलि‍ बाहर नै देखलनि‍। एक तँ तेज गति‍ए ट्रेन अछि‍ तैपर जँ अहि‍ना पूरबो-पछि‍याक गति‍ होइ तखनि‍ तँ जाबे खि‍ड़ीक खोलि‍ देखि‍ बन्न करब ताबे खि‍ड़की मुँहक हवा तँ सर्द कइए देत। बाहर देखब ओते खगतो नहि‍येँ अछि‍। अखनि‍ तँ अदहासँ कनीए आगू बढ़लौं हेन, कहुना-कहुना तँ पान-सात घंटाक रस्‍ता बाँकीए अछि‍। बजला-
बौआ, दस बजे तक दरभंगा पहुँच जाएब।
दरभंगा सुनि‍ रघुनाथ बाजल-
दरभंगासँ केना जेबइ। सुनै छी सकरीमे गाड़ी नै रूकै छै, तखनि‍ तँ दरभंगे उतरए पड़त कि‍ने?”
हँ, से तँ दरभंगे उतरए पड़त। मुदा दोसर उपएओ तँ नहि‍येँ देखै छी। जँ आगू बढ़ि‍ जाएब तँ मधुबनीमे गाड़ी रूकत। मधुबनीसँ नीक दरभंगे उतरब हएत। एक तँ मधुबनीसँ सवारीक रस्‍ता नीक नै अछि‍, तेते जरकीन अछि‍ जे देह-हाथ तोड़ि‍ दइए। तैसंग सवारीओक मेल नीक नहि‍येँ अछि‍। मुदा दरभंगासँ से सभ नीक अछि‍। बड़ी लाइनिक गाड़ी जाइयोनगर जाइए आ बि‍रौलो जाइए। एक-आध घंटा पछातिओ जँ गाड़ी हएत तँ गाड़ीएसँ सकरी चलि‍ जाएब आ ओइठामसँ निर्मलीक गाड़ी पकड़ि‍ लेब। कि‍छु अछि‍ तँ ट्रेन सभसँ नीक सवारी अछि‍। दरभंगेमे नहा-धो सेहो लेब। आ कि‍छु खाइओ लेब। जँ से नै हएत तँ दबाइक बेरे हूसि‍ जाएत।
पि‍ताक आशा भरल बात सुनि‍ रघुनाथ मने-मन खुशी भेल। खुशीक कारण ई जे कोनो काज करैले जखनि‍ कि‍यो वि‍दा होइए तखनि‍ काज पहि‍ने कहि‍ दइ छै, जे जेते मनसँ करबह से तेते पेबह। ठढ़ि‍या प्रणाम आ छठि‍क हाथी, पानि‍क कि‍नछरि‍मे बैसल रहि‍ जाइए। मुदा मुनेसरक काजक बीच कर्मठता झलकैत। जैठाम कर्मठता रहत तही ठामने सफलतो रहत। बाजल-
बाबूजी आब हमहूँ ओछाइन छोड़ि‍ए दइ छी। फरि‍चो भाइए गेल। मुदा दरभंगा पहुँचि‍ते फोन करब।
रघुनाथक बात सुनि‍ मुनेसरक देहक थकान जेना मेटा गेलनि‍। मेटा ऐ दुआरे गेलनि‍ जे मन दरभंगा स्‍टेशनक बाथरूमे सँ नि‍कलि‍ अपनाकेँ दोकानपर खाइत बूझि‍ पड़लनि‍। मने-मन गोटीक मि‍लान करए लगला जे तीनू गोटी एकबेर खेने चौबीस घंटा नि‍चेन भऽ जाएब। ताबे गामो पहुँचि‍ए जाएब। गाम तँ गाम छी, नै कि‍यो सेवा रूपमे औत तँ चारि‍ गोरेकेँ भरि‍ दि‍नक बोइने दऽ देबै। तँए कि‍ काज छोड़ि‍ देब। बजला-
बौआ, आइ बूझि‍ पड़ैए जे सेवा-निवृति‍ नै भेलौं हेन। भलहिं स्‍कूलसँ भऽ गेलौं मुदा परि‍वारो तँ छोट पाठशाला नहियेँ होइए। चारि‍ भाए-बहि‍नक बीच सुलोचना बहि‍न सभसँ जेठ छथि‍ जि‍नका परि‍वारसँ लऽ कऽ सासुर धरि‍ ठोकरा जि‍नगीकेँ नीरस बना देलकनि‍, जि‍नका सोझहा मृत्‍युक सि‍वा कि‍छु शेष नै बँचलनि‍, तैठाम जँ अपनाकेँ पबै छी तँ ऐसँ बेसी जि‍नगीमे की करब। जि‍नगी जँ जि‍नगी पकड़ि‍ चलत तँ जि‍नगी छोड़ि‍ आरो भेटबे की करतै। जि‍नगी भेटल, सभ कि‍छु भेटल।
पि‍ताक अह्लाद सुनि‍ अह्लादि‍त होइत रघुनाथ बाजल-
बाबूजी, मनमे कखनो नै आनब जे खर्च-बर्च दुआरे काज नै कऽ पाबि‍ रहल छी। हमहूँ तैयार भऽ कऽ बैंको आ डाक्‍टरो सभसँ सम्‍पर्क बना लइ छी। अहूँ दरभंगा उतरि‍ते जानकारी देब।
बड़बढ़ि‍याँ, मोबाइल रखि‍ दहक।
भोरक भैड़ाएल भौंरा जकाँ रघुनाथकेँ देखि‍ सुनीता अवसरि‍केँ हाथसँ नै गमा टीप देलनि‍-
वृन्‍दावनमे आगि‍ लगल काेइ ने मि‍झाबै हौ।
सुनीताक प्रभात बेल सुनि‍ रघुनाथ वि‍स्‍मि‍त भऽ गेल। जहि‍ना चकेबा परि‍वार-समाजसँ भगौल श्‍यामा लेल माए-बाप सभकेँ छोड़ि‍ बहि‍नक पीठपोहू भेला तहि‍ना ने पि‍तोजी भेल छथि‍। की माएकेँ उचि‍त भेल जे संगी नै भेलखि‍न। हो-ने-हो जँ कहीं रस्‍तेपेरे हुनका कि‍छु भऽ जाइ छन्‍हि‍ तँ यएह भेल अर्द्धांगि‍नी, जि‍नगीक आधा। मुदा पि‍ता लेल जे बनि‍ सकत तइमे पाछू हटब बि‍सवासघात भेल। हो-ने-हो जँ दीदीक सेवा लेल माएओ बेपाट हेती तँ हुनका कि‍न्नहु नै नीक कहबनि‍। जइ परि‍वारमे जनम भेलनि‍ तइ परि‍वार दि‍स बेसी झूकल रहै छथि‍, रहथु। तइसँ परि‍वारमे कोनो बाधो तँ उपस्‍थि‍त नहि‍येँ होइए। मुदा जखनि‍ सोझहा-सोझही दुनू परि‍वारक बीच जँ कोनो प्रश्न उठैत अछि‍ आ माए सासुरसँ नैहर दि‍स झुकै छथि‍ तँ अनुचि‍त भेल। दुनूक बीच कोनो तरहक अनोन-बि‍सनोन आकि‍ मधनोने-मि‍ठनोन नै होउ से नीक बात मुदा जैठाम परि‍वारक जड़ि‍क प्रश्न रहत तैठाम तँ वि‍चारए पड़त जे केकरा जड़ि‍मे पानि‍ ढारल जाए।
दि‍नक सबा दस बजे गाड़ी दरभंगा स्‍टेशन पहुँचल। निर्मली-सकरीक गाड़ी जकाँ नै जे जहि‍ना चढ़ैकाल धक्कम-धुक्का आ पाॅकेटमारी होइए तहि‍ना उतरैकाल। ओना मुनेसरक मनमे उठलनि‍ जे गाड़ीएसँ रघुनाथकेँ फोन कऽ दि‍ऐ मुदा फेर मन बदलि‍ प्‍लेटफार्मेक भेलनि‍। गाड़ीसँ उतरि‍ते रघुनाथकेँ कहलखि‍न-
बौआ, दरभंगा पहुँच गेलौं। एके घंटाक तरपटमे बि‍रौलक गाड़ी अछि‍ तइसँ सकरी चलि‍ जाएब। अखनि‍ बेसी बात नै करब। घंटे भीतर तैयारो होइक अछि‍।
बैंक आ आॅफि‍सक काज रोकि‍ रघुनाथ मने-मन पि‍ताक रूप देखए लगल। एक तँ रोगसँ रोगाएल तैपर उमेरक रोग सेहो छन्‍हि‍हेँ, मुदा काज केहेन करैक बाट धेने छथि‍।
जि‍तेन्‍द्रीक इन्‍द्री जहि‍ना क्रि‍याशील होइत तहि‍ना मुनेसरक सेहो रहनि‍। लगले बैग उठा शौचालय गेला। बैग रखि‍ अपन क्रि‍या-कर्म करैत, कौनटरपर दू-टकही दैत प्‍लेटफार्मसँ नि‍कलि‍ होटल पहुँचला। अधपेटा खा दबाइ खेलनि‍। हि‍साब दैत, टि‍कट कटा पुन: प्‍लेटफार्मपर पहुँच गेला। गाड़ी लगले रहै, जा कऽ बैसला। बसि‍ते साँस छोड़लनि‍। ओना सकरीसँ दुनू सुवि‍धा अछि‍। गामो लगे अछि‍। जे जरूरी बूझि‍ पड़त से पकड़ि‍ लेब। भने दि‍न-देखार अछिए। घरपर जा वस्‍तु स्‍थि‍ति देखैत जेना-जे हएत से करब। गाड़ी खुजैसँ पहि‍ने गामेक राधाचरण सेहो धड़फड़ाएल ओही डि‍ब्‍बामे पहुँचल। जगहक सि‍केस देखि‍ मुनेसर राधाचरणकेँ कहलखि‍न-
राधाचरण ऐठाम आबह।
अपने मुनेसर कनी घुसुकि‍ राधाचरणकेँ बैसबैत पुछलनि‍-
सुलोचना बहि‍नक की स्‍थि‍ति‍ छन्‍हि‍?”
राधाचरण-
सात दि‍नपर दरभंगासँ जा रहल छी। नीक जकाँ नै बूझल अछि‍। उड़न्‍ती समाचार सुनलौं।‍
मुनेसर-
किए सात दि‍नपर जाइ छह?”
राधाचरण-
छोटकी बहि‍नकेँ पेटक ऑपरेशन भेल हेन।
आगू बात नै बढ़ा मुनेसर बजला-
आॅपरेशन सफल भेल कि‍ने?”
हँ हँ, खर्चा तँ बहुत भेल। परसू टाँका कटत। कि‍छु रूपैआ-पैसाक भाँजमे जाइ छी। फेर काल्हि‍ घूमब।
राधाचरणक काजमे मुनेसर अपनो काज देखलनि‍। काज ई देखलनि‍ जे जखनि‍ बहि‍नक आॅपरेशन भेल तखनि‍ माएओ आएले हेतनि‍। तैसंग एकटा-दूटा आरो समांग हेबे करतै। अपने ने अनाड़ी रहब मुदा जखनि‍ राधाचरणो काल्हि‍ घुमबे करत तखनि‍ अपने हि‍साबसँ समए (बहि‍नकेँ दरभंगा लऽ जाइक समए) बना लेब। कम-सँ-कम एते तँ हेबे करत जे समांगे जकाँ राधाचरण गामेपर सँ जा रहल अछि‍, जँ कहीं समैपर पाइक भाँज नै हेतै तँ कौल्हुका बदला परसूओ घूमि‍ सकैए। किएक तँ काजपर काज ठाढ़ अछि‍। टाँका परसू कटतै। परसू तक पहुँचबाक समए तँ छइहे। मुदा अपना तँ से नै अछि‍ भऽ सकैए जे आइओ घुमए पड़ए। मने-मन मुनेसर हि‍साब बैसबए लगला। गुन-धुन करैत मनमे उपकलनि‍, आब कि‍ कोनो ओ जमाना रहल जे मास-मास, दू-दू मासपर पोस्‍ट आॅफि‍ससँ पाइ भेटै छै। आब तँ जेतए जाउ तेतए बक्‍सा-पेटी संगे रहत। तेहेन ने एटीएम भऽ गेल अछि‍ जे जखने खगता तखने पूर्ति होइए। सामंजस्‍य करैत मुनेसर बजला-
राधाचरण, अखनि‍ तँ तूँ सगरे अस्‍पताल घुमैत हेबह?”
अपन प्रशंसा सुनि‍ राधाचरणक मनमे खुशी उपकल। खुशी उपकि‍ते बड़बड़ए लगल-
काका, साते दि‍नमे की सभ ने देखलौं। एकटा नवका दुनि‍याँ देखलौं।
नव दुनि‍याँ सुनि‍ मुनेसर बजला-
की नव दुनि‍याँ देख्‍ालह? कोनो कि‍ आइए अस्‍पताल बनल जे नव देखलह।
  जहि‍ना चुल्हि‍पर चढ़ल वर्तनमे नि‍च्‍चाँसँ आँच लगला पछाति‍ वर्तनक पानि‍ उधि‍या लगैत तहि‍ना राधाचरणक मन उधि‍याइत। मुदा पाइक चि‍न्‍ता मनकेँ दबैत। मुँहक सुर्खीसँ मुनेसर बूझि‍ गेला जे पाइक मारि‍ वेचाराक मनकेँ मारि‍ रहल छै। गरजू अखनि‍ जेहेन ई अछि‍ तेहने तँ अपनो छी। तँ किए ने अन्‍हरा-नेंगराक दोस्‍ती जकाँ हाथ बढ़ाबी। बजला-
केते पाइक खगता छह राधाचरण?”
ओना लोकक बीच एहेन धारणा बनि‍ गेल अछि‍ जे दुनि‍याँ-जहानक सभ बात बाजत मुदा लेन-देनक बात छिपा कऽ रखैए। मुदा खगता एहेन परि‍स्‍थि‍ति‍ पैदा करैए जे छि‍पारोकेँ देखार काइए दइ छै। राधाचरण बाजल-
काका, हम तँ संकोचे मुँह नै खोललौं। किएक तँ एक तँ अहाँ सेने ओहन सम्‍बन्‍ध नै अछि‍, दोसर अहूँ तँ वि‍पति‍एमे पड़ल छी।
राधाचरणक बात सुनि‍ मुनेसर गुम भऽ गेला। हमरा परि‍स्‍थि‍ति‍केँ आँकि‍ बाजि‍ रहल अछि‍ जे अहूँ वि‍पतिएमे छी। बजला-
जखनि‍ जि‍नगी अछि‍ तखनि‍ कि‍छु-ने-कि‍छु आपति‍-वि‍पति‍ एबे करत, तइले लोक घबड़ा जाएत तँ‍ काज चलतै। जानियेँ कऽ तँ अन्‍हार घर साँपे-साँप अछि‍ए। मुदा ओहीमे ने सपहरि‍या अपन शि‍कारो खेलाइए।
मुनेसरक बात सुनि‍ राधाचरण थकथका गेल। बाजल-
काका, अखनि‍ धरिक सभ काज सम्‍हारि‍ नेने छी मौका-मुसीबत दुआरे माइयक हाथमे पान सौ दइयो कऽ आएल छि‍ऐ। सभ कि‍छु मि‍ला डेढ़ हजारक खर्च आगू अछि‍।
डेरहे हजार सुनि‍ मुनेसर हल्‍लुके बुझलनि‍। बजला-
अच्‍छा पाइक चि‍न्‍ता मनसँ हटा लैह।
पाइक चि‍न्‍ता हटि‍ते जेना फलकैत फूलसँ भौंरा फुड़फुड़ा कऽ नि‍कलि‍ उड़ैए तहि‍ना राधाचरण बाजल-
काका, कहए लगलौं जे नवका दुनि‍याँ देखलि‍ऐ, से कहै छी। जहि‍ना असमसान घाटक लीला अछि‍ तहि‍ना अस्‍पतालक लीला अछि‍। एक गोरेकेँ कनैत देखलि‍ऐ पुछलि‍ऐ तँ कहलक। खेत बेचि‍ कऽ बेटाक इलाज करबए एलौं, डाक्‍टर ऐठाम पहुँचबो ने केलौं आकि‍ तइ बि‍च्‍चेमे तीनटा बदमास आएल आ रूपैआ छीनि‍ लेलक। मुँह तकैत रहि‍ गेलौं। के हमर बात पति‍याएत। लगमे थाना, जेरक-जेर लोक तैठाम एना भेल।
मुनेसरक मन सुलोचना बहि‍नपर टँगल तँए दोसर बात कानमे झड़ जकाँ बूझि‍ पड़नि‍। बजला-
अनेरे किए बौआइ छह राधाचरण। ठन्‍का ठनकै छै तँ कि‍यो अपना माथापर हाथ दइए। ई कहऽ जे टुटल हड्डीक इलाज कोन-कोन डाक्‍टर करै छथि‍?”
मुनेसरक बात सुनि‍ राधाचरण गुम भऽ मने-मन वि‍चारए लगल। इलाज तँ अस्‍पतालोमे होइ छै आ प्राइवेटोमे होइ छै। मुदा जहि‍ना अनेर गाएक धरम रखबार होइ छै तहि‍ना अस्‍पतालोक गति‍ अछि‍। कि‍यो फीसक दुआरे काजमे बेइमानी करैए तँ कि‍यो दबाइए बेचि‍ लइए। कि‍यो कमीशनक भाँजमे काज बि‍गाड़ैए तँ कि‍यो खेनाइए बेचि‍ लइए। तइसँ नीक सुवि‍धा प्राइवेटमे छै। मुदा ओ तँ पाइबलाक छी एकक तीन लगै छै। बाजल-
काका, जेहेन पाइ तेहेन इलाज। की कहब।
राधाचरणक बात सुनि‍ मुनेसर तारतम करए लगला जे की नीक। मुदा जहि‍ना बि‍नु हवोक कोनो आम गाछसँ धब दऽ खसैए तहि‍ना मनमे खसलनि‍। इलाजो तँ इलाज छी। ई तँ नै जे सए बर्खक बूढ़क पाछू घर-घराड़ी बेचि‍ लगा देब। जँ से लगा देब तँ अगि‍ला पीढ़ीमे जँ ओहने रोग लगि‍ जाए तखनि‍ की कएल जाएत। मुदा अछैते सम्‍पति‍ए इलाज नै होइ ईहो तँ नीक नहियेँ हएत। खैर जे होउ, जहाँ धरि‍ संभव हएत तहाँ धरि‍ मनसँ कसेर नै करब। बजला-
राधाचरण, जँ आइए पाइक जोगार भऽ जेतह तँ आइए घूमि‍ जेबह?”
उत्‍सुक होइत राधाचरण बाजल-
आइए किए कहै छी, अखने जँ भऽ जाए तँ अगि‍ला टीशनमे उतरि‍ दोसर गाड़ी पकड़ि‍ लेब। कहुना भेल तँ बि‍मारीक अवस्‍था भेल कि‍ने। कखनि‍ कि‍ भऽ जेतइ तेकर कोनो ठेकान छै, से तँ रहनहि‍ प्रति‍कार हएत।
राधाचरणक वि‍चार सुनि‍ मुनेसरक मनमे उठल, पकड़ाएल संगी छूटि‍ जाएत। से नै तँ गाम पहुँच कम-सँ-कम सुलोचना बहि‍नकेँ देखि‍ लेब उचि‍त हएत। बजला-
गाम गेलासँ परि‍वारोक हाल-चाल बूझि‍ लेबह, नीक हेतह ने। कहै छह जे सात दि‍न गाम छोड़ना भऽ गेल।
राधाचरणक दहलाएल मन आरो दहलि‍ गेल। बाजल-
हँ से नीक हएत। गामक आरो समाचार सभ बूझि‍ लेब। एक लपकन खेतो-सभ देखि‍ लेब।
अपन सुढ़ियाइत काज देखि‍ मुनेसर बजला-
अच्‍छा, एकटा कहऽ जे गाममे गाड़ी-सवारी समैपर भेट जाएत कि‍ने?”
गाड़ी-सवारीक कोन कमी छै। तखनि‍ तँ समए-कुसमए कनी दब कि‍ उनार भाइए जाइ छै। जखनि‍ खगता हएत तखनि‍ गाड़ी भेटत। अहाँकेँ नै ने बूझल अछि,‍ हमरा तँ सभ गाड़ीबला सभसँ ि‍चन्‍हारए अछि‍। घरेपर बैसल-बैसल सभ काज भऽ जेतै।
स्‍टेशनसँ संगे दुनू गोटे गाम पहुँचला। गाम आबि‍ राधाचरण अपना ऐठाम गेल आ मुनेसर अपना ऐठाम एला। आँगन पहुँचि‍ते मुनेसर देखलनि‍ जे ओसारक ओछाइनपर सुलोचना बहि‍न पड़ल कुहरि‍ रहल छथि‍। सि‍रमा लग लोटामे पानि‍ राखल अछि‍। सौंसे देह झाँपल, खाली मुँहटा उघार छन्‍हि‍। दोसराइत कि‍यो ने। मनमे उठलनि‍ जे सम्‍बन्‍धो तँ दू रंगक होइए। ओना सम्‍बन्‍धक अनेको डारि‍-पात छै मुदा मोटा-मोटी दू रंगक तँ अछि‍ए। एक ओ भेल जे कुल-खनदान, दि‍याद-वादक होइए आ दोसर उपकारक होइए। अखुनका समैमे केकरा एते पलखति‍ छै जे अपन काज छोड़ि‍ दोसरकेँ देखत। सभ अपने पाछू बेहाल अछि‍। ने बाप-माएकेँ बेटा-पुतोहु देखैए आ ने बेटा-पुतोहुकेँ बाप-माए। ओना पढ़ै-लि‍खै-बि‍आह-दान धरि‍ बाप-माए बेटाकेँ देखि‍ते अछि‍ भलहिं कमाइ-खटाइ बेरमे छुटि‍ जाए मुदा से नै। जखने बेटा-बेटीक जनम होइए तखने सँ माए अपन सुन्नरता दुरि‍ होइ दुआरे अपन दूध नै पीआ बजरूआ दूध पि‍अबऽ लगैए। तैसंग कनीए टेल्हुक भेला पछाति‍ आवासीय वि‍द्यालयमे नाओं लि‍खा भर्ती करा दइए। जइसँ मौके-कुमौके सोझहा-सोझही भेँट-घाँट होइए। जँ अहि‍ना हएत तँ कि‍ए केकरो कोइ चि‍न्‍हत। मुदा उपकारक सम्‍बन्‍ध से नै होइ छै। एक तँ ओहुना लोकक आँखि‍मे पानि‍ रहि‍ते छै जे फल्लाँ बेरपर पाइसँ आकि‍ समांगसँ ठाढ़ भेल रहए तँए अपन कर्ज चुकाएब उचि‍त अछि‍। मुनेसरक मन दुनू दि‍ससँ ओझरा गेलनि‍। गाममे नै रहने समाजक बीच कि‍छु कएल नै अछि‍। दि‍यादो-वाद तेहेन जे भोज तँ खाइओ लइए मुदा छुतका-केश कटबैमे नाकर-नुकर करि‍ते अछि‍।
सुलोचना बहि‍न लग मुनेसर बैसि‍ बजला-
बहि‍न, बहि‍न, हम मुनेसर। एलौं।
मुनेसरक अवाज सुनि‍ सुलोचना बहि‍न आँखि‍ खोलि‍ उठए लगली। पेटसँ ऊपरक अंग तँ डोललनि‍ मुदा डाँड़क नि‍च्‍चाँ सगबगेबो ने केलनि‍। तहूमे फुलि‍ सेहो गेल रहनि‍। उठैक प्रक्रि‍या देखि‍ मुनेसर बजला-
नै उठि‍ हएत, सुतले रहू।
मनमे एलनि‍ जे पहि‍ने पि‍ति‍यौत समांग सभकेँ बजा पुछि‍यनि‍ आकि‍ पहि‍ने बहि‍नेक बात सुनी। बहि‍नक बात उचि‍त बूझि‍ बजला-
बहि‍न, की सभ भेबो कएल, आ होइतो अछि‍?”
बाढ़ि‍क लहरि‍मे जहि‍ना कोनो चुट्टी वा आन जन्‍तु नान्‍हि‍ओटा सहारा पाबि‍ खुशीसँ खुशीया जाइत तहि‍ना सुलोचना बहि‍न अंति‍म सहारा पाबि‍ खुशी भेली। खुशी एते भेली जे मने दहला गेलनि‍। बजली-
बच्‍चा मुनेसर, जे भेल से तँ भेबे कएल आ जे होइए से होइते अछि‍ मुदा तँू गाड़ीक झमारल छह पहि‍ने कि‍छु खा लैह। चाहो बना कऽ दैति‍यऽ से तँ समांगे खसल अछि‍।
सि‍नेहासि‍क्‍त बहि‍नक बोल सुनि‍ मुनेसर वि‍स्‍मि‍त भऽ गेला। मुदा अपनो आगू-पाछूक बाट बन्न देखि‍ ठक-ठका गेला। ठकठकाइत मन हारैत जि‍नगी देखि‍, अंति‍म साँस गनैत बजला-
बहि‍न, जेते दि‍न सोझहा-सोझहीक दर्शन अछि‍ से तँ नीके कि‍ अधले रहबे करत, मुदा अपनो हूबा करू आ जेते पार लगत से करबो करब।
दहलाइत मन सुलोचना बहि‍नक, मुनेसरक बात नीक जकाँ सुनबो ने केलनि‍। मुदा गपक वि‍राम देखि‍ बजली-
बच्‍चा, ने एको बेर दर-दि‍याद देखए अबैए आ ने एको परानी जुगेसर। बड़ आशा छल जे बेर-वि‍पति‍मे छोटकी बहि‍न-कवि‍ता ठाढ़ हएत। मुदा ऊहो एको बेर घूमि‍ कऽ नै तकलक। तखनि‍ तँ दुनि‍याँमे रहल के जेकर मुँह देखि‍ जीबो करब, तइसँ नीक जे भगवान जगहे दथि‍।
सुलोचना बहि‍नक टुटैत दुनि‍याँक सम्‍बन्‍ध देखि‍ मुनेसर बजला-
दुनि‍याँमे अहि‍ना सभ दि‍नसँ होइत एलैए, होइत रहतै। तहीले ने लोक नीक कि‍ अधला कऽ लइए। अच्‍छा पि‍ति‍यौतो सभसँ कनी गप कऽ लइ छी आ अखने डाक्‍टर ऐठाम लऽ जाएब।
कहि‍ मुनेसर पि‍ति‍यौतक दरबज्‍जा दि‍स बढ़ला तँ मरदा-मरदी कि‍यो भेँट नै भेलनि‍। तही बीच राधाचरण पहुँचल। राधाचरणकेँ देखि‍ते मुनेसर कहलखि‍न-
राधाचरण, कनी झंझारपुर चलू। अहूँक काज रस्‍तेमे कऽ देब। झंझारपुरमे बहि‍नकेँ देखा, जेना जे नीक बूझि‍ पड़त तेना से करब।
मुनेसरक बात सुनि‍ राधाचरण बाजल-
काका, गाड़ीओ बलाकेँ कहि‍ दइ छि‍ऐ जाबे ओ औत ताबे गामपर सँ तैयारो भेल अबै छी।
गाड़ी अबि‍ते राधाचरण जनि‍जाति‍ सभकेँ चरि‍यबैत कहलकनि‍-
चारि‍-पाँच गोरे उठा कऽ चढ़ा दि‍यनु।
मुदा बगलमे ठाढ़ मुनेसरक मनमे रंग-बि‍रंगक प्रश्न उठि‍ गेलनि‍। जँ मुँह खोलि‍ कि‍नको संग चलैले कहबनि‍ तँ पुरुखक नाओं लगा बहाना करबे करती। तखनि‍? बजला-
राधाचरण, परि‍चरजा करैमे जनि‍जाति‍क जरूरति‍ हएत, से...?”
मुनेसरक बात सुनि‍ते राधाचरण बाजल-
काका, चि‍न्‍ता कि‍ए करै छी। अस्‍पतालमे नर्स सभ रहि‍ते अछि‍। तइले काज रोकब नीक नै।
जहि‍ना मुनेसर राँचीसँ आएल रहथि‍ तहि‍ना बैग समटले रहनि‍। तैयार होइक प्रश्ने नै, तैयारे रहथि‍। हाथे-पाथे तीन-चारि‍ गोटे पकड़ि‍ सुलोचना बहि‍नकेँ गाड़ीमे चढ़ौलनि‍। 
ओना झंझारपुरमे सरकारीओ अस्‍पताल अछि‍ आ प्राइवेटो इलाज चलि‍ते अछि‍। सरकारी अस्‍पतालक कि‍यो माए-बाप अछि‍ए नै। भगवाने भरोसे चलैए। बाटमे मुनेसर राधाचरणकेँ पुछलखि‍न-
सभसँ नीक डाक्‍टर के छथि‍?”
नीक डाक्‍टर सुनि‍ राधाचरण अकबका गेल। नीक-अधलाक वि‍चार तँ ओइठाम होइए जैठाम एके-वि‍भागक अनेको डाक्‍टर रहैए मुदा जैठाम सभ बि‍मारीक डाक्‍टरो फुटा-फुटा नै अछि‍ तैठाम केना नीक-अधला बूझब। तहूमे हड्डी रोगक तँ लऽ दऽ कऽ एके गोटे छथि‍ तैठाम केना नीक-अधला बूझब। तखनि‍ तँ जएह छथि‍ सएह नीक। नै मामासँ कनहे मामा नीक कि‍ने। बाजल-
काका, ऐठाम जे राँची जकाँ आकि‍ दरभंगा-पटना जकाँ तकबै तइ तकने काज चलत। ऐठाम तँ टूट-फाटक एके गोटे इलाज करै छथि‍, दोसर ठाम जइए कऽ की हएत?”
राधाचरणक बात सुनि‍ मुनेसर मने-मन वि‍चारलनि‍ तँ दमगर बूझि‍ पड़लनि‍। दोसर उपाए की अछि‍। तहूमे कोनो जरूरी अछि‍ जे जँ एको गोटे छथि‍ तँ अधले छथि‍। नीको भऽ सकै छथि‍। तखनि‍ तँ एकटा कमी डाक्‍टरोमे छन्‍हि‍हेँ, जे जेहो रोग परेखि‍मे नै आएल ओहू रोगीकेँ पकड़ि‍ घि‍सि‍एबे करै छथि‍। खैर जे होउ, अपनो तँ सोलहन्नी चौपट्टे नै छी, नीक कि‍ अधला देखबे करब। 
डाक्‍टर ऐठाम पहुँचैत-पहुँचैत गोसाँइ डूमि‍ गेल। टहलैले डाक्‍टर रमेशो चलि‍ गेल छला। मुदा गाड़ी पहुँचि‍ते पत्नी जानकारी देलखि‍न। डाक्‍टर रमेश लगले पहुँचला। पहुँचि‍ते सुलोचना बहि‍नकेँ देखलखि‍न। देखि‍ते बजला-
मास्‍सैब, जेते ओजारक जरूरति‍ पड़त तेते नै अछि‍। नीक हएत जे दरभंगा लऽ जैयनि‍।
दरभंगा सुनि‍ मुनेसर मने-मन तारतम करए लगला जे एक संग केतेको समस्‍या अछि‍। सोझहे होलो-लोलो करैत चलि‍ जाएब आ ओइठाम सम्‍हारल नै हुअए तखनि‍ की करब। दरभंगा गाम थोड़े छी जे लाजो-पछे लोक मदति‍ करत। अपने असगर छी, तहूमे नीक जकाँ बूझल गमल नै अछि‍। ई तँ धैनवाद राधाचरणेकेँ दी जे एतबो मदति‍ केलक। मुदा रोगीक जे दशा अछि‍ ऊहो राँची-पटना लऽ जाइबला नै अछि‍। गाड़ीओ-सवारीक असुवि‍धा अछि‍। एन-एच बनने पटनाक तँ भाइओ गेल मुदा राँचीक तँ नहि‍येँ भेल अछि‍। छोटकी गाड़ीबला एते दूर जाइओसँ हि‍चकि‍चेबे करत। जँ पटना जाइले तैयारो हएत तँ जे समस्‍या (समांगक) दरभंगामे अछि‍ से तँ पटनोमे हेबे करत। काज भरि‍याइत देखि‍ मुनेसर राधाचरणकेँ पुछलाखि‍न-
राधाचरण, हमरा की असान हएत?”
मुनेसरक प्रश्न सुनि‍ राधाचरण पेसो-पेसमे पड़ि‍ गेल। जहाँ धरि‍ बनि‍ पड़ल, संग देलि‍यनि‍। अपनो बहि‍नक आॅपरेशन भेल अछि‍, तेकरो छोड़ब उचि‍त नै। बि‍मारी बि‍मारी छी, कखनि‍ की भऽ जाएत तेकर कोन ठेकान। जँ हम भार लेबनि‍, तँ पार लगाएब कठि‍न भऽ जाएत। एक संग केरा-दहीक भार कि‍यो थोड़े उठा सकैए। जखनि‍ उठबे ने करत तखनि‍ चलत केना। एकटा भेल कसताराक दही दोसर भेल बागनरक घौर। ठढ़कानर जकाँ छीपक मुँह केतौ करीनक मुँह केतौ रहत। मुदा तइसँ की! मनुख तँ मनुख छी, नीक बात सभकेँ प्रिय लगै छै। ओना नीकोक अनेक रूप छै, मुदा से नै, काजक नीक नीक भेल। काजकेँ ठेकनबैत राधाचरण बाजल-
काका, ऐ देहक काजे की छै, जगरनाथ, केदारनाथ नीक रहि‍तो दुनू दू दि‍स अछि‍। एकटा पूब अछि‍ आ दोसर पछि‍म। कि‍म्‍हरो तँ एके दि‍स जेबै। एकर माने ई नै ने भेल जे दोसर अधला भेल। हमरो तँ अहाँ देखि‍ते छी।
राधाचरणक बात सुनि‍ मुनेसर मने-मन वि‍चारए लगला जे जहि‍ना बहि‍न हमर तहि‍ना तँ अपनो भेल। तहूँमे दुनि‍याँक बोनमे अपन सम्‍बन्‍ध आ भूमि‍ सेहो अछि‍ए। तखनि‍  जहि‍ना सुलोचना बहि‍नक भार हमरा ऊपर अछि‍ तहि‍ना तँ राधाचरणोकेँ छै। तहूमे सुलोचना बहि‍न अस्‍सी बर्ख पार कऽ गेल छथि‍ जखनि‍ कि‍ राधाचरणक बहि‍न कुमारि‍ए अछि‍। जे दुनि‍याँकेँ कि‍छु ने अखनि‍ धरि‍ देखलक हेन। उचि‍त हएत जे राधाचरणकेँ अपन काज करैले छोड़ि‍ दि‍ऐ। अखनि‍ धरि‍ वेचाराक जान भरि‍याएले छै तँए भऽ सकैए जे बेबस (दोसराक भाँज) हुअए। से नै तँ पहि‍ने राधाचरणकेँ रूपैआ दऽ देब उचि‍त हएत। जखनि‍ ओकरो काज सुढ़ि‍या जेतै तखनि‍ देखैओक अवसरि‍ भेटत जे आब ओ कि‍ करैए। काज छोड़ि‍ चलि‍ जाइए आकि‍ काज सुढ़ि‍या कऽ जाइए। कहलो गेल छै दुखमे सुमि‍रन सभ करे। पछि‍ला जेबीसँ पर्श नि‍कालि‍ मुनेसर डेढ़ि‍ हजार रूपैआ दैत राधाचरणकेँ पुछलखि‍न-
काज सम्‍हरि‍ जेतह आकि‍ आरो खगता छह?”
ओना अखनि‍ धरि‍क हि‍साब राधाचरणक डेरहे हजारक छल मुदा कोट-कचहरी आ अस्‍पतालक हि‍साब अनठि‍या लेल कनी उकड़ू छेबे करै। आएल लक्ष्‍मीकेँ हाथसँ छोड़ब नीक नै बूझि‍ राधाचरण बाजल-
काका पान सौ जँ आगरे कऽ दऽ देब सेहो नीके हएत?”
राधाचरणक बात सुनि‍ मुनेसरक मनमे उठलनि‍, खगल लोककेँ अहि‍ना होइ छै। मुदा जखनि‍ पूछि‍ देलि‍ऐ तखनि‍ नहि‍योँ देब नीक नहि‍येँ हएत। दू हजार रूपैआ पूरा कऽ दैत मुनेसर बजला-
आब तँ कोनो उलझन नै ने रहतह?”
कलि‍याएल फूल जकाँ मुस्‍की दैत राधाचरण बाजल-
काका, आब तँ परसू अपन रोगीकेँ घर पहुँचा अहूँ जेतए रहब (राँची आकि‍ पटना) तेतए पहुँच जाएब। रस्‍तोक भाड़ा भाइए गेल।
राधाचरणक बात सुनि‍ मुनेसरकेँ ग्‍लानि‍ भेलनि‍। ग्‍लानि‍ ई भेलनि‍ जे एकसँ अधि‍क वस्‍तु मि‍लौला पछाति‍ जहि‍ना खि‍चड़ीओ आ खीरो बनैए मुदा दुनू एक तँ नै भेल। एकमे जहि‍ना नोन-मीठनोन तँ भाइए जाइए। 

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डाक्‍टर रमेशक बात सुनि‍ मुनेसर मने-मन गर अँटबए लगला जे कोनो धरानी सुलोचना बहि‍न जे राँची पहुँच जाइ छथि‍ तँ सभसँ नीक हएत। राँचीक गाड़ी काल्हि‍ आठ बजे राति‍मे दरभंगासँ अछि‍। तैबीच भरि‍ दि‍नक बात रहल। गाड़ीमे बूझल जेतै। बजला-
डाक्‍टर साहैब, राँची पहुँचै तकक ओरि‍यान अहाँ कऽ दि‍अ।
मुनसेरक बात सुनि‍ डाक्‍टर अपन भार कम होइत देखि‍ बजला-
इन्‍जेक्‍शन, दबाइ दऽ दइ छि‍यनि‍ काल्हि‍ चारि‍ बजे तक एतै अँटकि‍ जाउ। सभ बेवस्‍था अछिए। भरि‍ दि‍नक घर भाड़ा आ दबाइक खर्च लागत। तीन दि‍न तक एक्के उपे रहती, कोनो बेसी तरद्दुतक जरूरति‍ नै पड़त।
मुनेसर-
बड़बढ़ियाँ। राधाचरण कौल्हुको गाड़ी पकड़ि‍ चलि‍ जाएब।
मुनेसरक बात सुनि‍ राधाचरण बाजल-
हमरा की कहै छी? हम की कहब।
मुनेसर-
डाक्‍टरो साहैबक वि‍चार सुनि‍येँ लेलि‍यनि‍। तखनि‍ तँ कौल्हुका गाड़ी पकड़ै धरि‍ तँू संग दैह।
राधाचरण-
अोहुना काल्हि‍ दरभंगा जाइए कऽ अछि‍, तैबीच जँ दोसरो काज भऽ जाइए तँ हरजे की। मुदा भरि‍ दि‍न जे झंझारपुरमे बैसल रहब तइसँ नीक दरभंगे जाएब हएत। कि‍एक तँ अपनो रोगीकेँ देखि‍ लेब आ ईहो काज सम्‍हारि‍ लेब।
झंझारपुरमे सभ सुवि‍धा देखि‍ मुनेसर बजला-
ओना तोरो वि‍चार कटैबला नहि‍येँ अछि‍। मुदा जखनि‍ भरि‍ दि‍नक घरक भाड़ा ऐठाम लागि‍ए जाएत आ सभ सुवि‍धो अछि‍ए तखनि‍ एना कऽ जेबाक प्रोग्राम बनाबह जे दरभंगामे रहैक जोगार नै करए पड़ए।
दुनू काजकेँ अँटावेश करैत राधाचरण बाजल-
काल्हि‍ बारह बजे तक ऐठाम रहू तेकर पछाति‍ एतएसँ चलि‍ जाएब। हमहूँ अपन रोगी देखि‍ डाक्‍टर साहैबसँ राय-वि‍चार कऽ लेब आ अहूँकेँ गाड़ीमे बैसा देब।
राधाचरणक बात मुनेसरकेँ जँचलनि‍। मुड़ी डोलबैत स्‍वीकार करि‍ते रहथि‍ आकि‍ धक दऽ बेटा-रघुनाथ मन पड़लनि‍। मन पड़ि‍ते मोबाइलसँ रघुनाथकेँ कहलखि‍न-
रघुनाथ, झंझारपुरमे छी। ऐठाम दरभंगा-पटना आकि‍ राँची जकाँ तँ सुवि‍धा नहि‍येँ अछि‍, डाक्‍टरो साहैब कहलनि‍ जे नीक हएत राँचीए लऽ जैयनु।
मुनेसरक बात सुनि‍ रघुनाथ बाजल-
राँची बीचक भार जँ ओ लऽ लइ छथि‍ तँ नीक हएत जे राँचीए चलि‍ आबी।
मुनेसर-
हँ, से डाक्‍टरो साहैब कहै छथि‍ जे तीन दि‍नक बेवस्‍था कऽ दइ छी। जँ दरभंगा आकि‍ पटना जेबो करब तँ असगरे फ्रीसान भऽ जाएब, तइसँ नीक राँचीए हएत।
रघुनाथ-
जे बेसी नीक हुअए से करू।
प्रात भने दोसर चरि‍पहि‍या गाड़ी भाड़ा कऽ बारह बजे तीनू गोटे दरभंगा वि‍दा भेला।
दरभंगा पहुँच मुनसेर स्‍टेशनमे पता लगौलनि‍ जे कोन प्‍लेटफार्मपर गाड़ी अबै छै। भाँज लगा दूटा कुली पकड़ि‍ प्‍लेटफार्मपर सुलोचना बहि‍नकेँ लऽ जा सुता देलनि‍।
राधाचरण बाजल-
काका, चारि‍-पाँच घंटा अहाँ ओगरि‍ कऽ रहू, तैबीच हम अपनो समांग सभसँ भेँट केने अबै छी।
बड़बढ़ियाँ।
स्‍टेशनसँ वि‍दा होइत राधाचरण मने-मन हि‍साब बैसबए लगल जे साढ़े-सात बजे जयनगरसँ गाड़ी पहुँचैए। तैबीच एनौं कोनो काज नहि‍येँ हएत। मुदा अपन जे काज अछि‍, तहूमे काल्हि‍ टाँका कटि‍ते डेरो तोड़ब। तैबीच जेकर जे हि‍साब-बाड़ी छै सेहो सभ फरि‍या लेब। साढ़े-सात बजे गाड़ी छै साते बजे पहुँच जाएब। सएह केलक।
राँचीक गाड़ीमे दुनू भाए-बहि‍नकेँ बैसा राधाचरण बाजल-
काका, ओना राँचीमे अपन घरे अछि‍, जानो-पहि‍चानोक लोक सभ छेबे करथि‍, असुवि‍धा नहि‍योँ हएत, मुदा तैयो कहि‍ दइ छी जे जँ जरूरति‍ हुअए तँ कहब।
राधाचरणक बात सुनि‍ मुनेसर वि‍स्‍मि‍त भऽ गेला। मनमे उठलनि‍ कोन जन्‍मक उपकार कएल छल जे राधाचरण एते केलक। जे पाइ देलि‍ऐ से नै लेब। अहू वेचाराकेँ पैंच-पालट नै हेतइ आ अपनो मन कहत जे बि‍मारीमे मदति‍ केलऐ। जि‍नगी भरि‍ तँ कमेबे केलौं, मुदा एहेन उपकारो तँ नहि‍येँ केने छेलौं। ओना अखनो समाजमे एहेन फुसि‍-फटक खर्च सभ अछि‍ जे जँ ओकरा बँचा कऽ (रस्‍ता बदलि‍ कऽ) खर्च कएल जाए तँ समाजक जे पढ़ैबला अछि‍ आकि‍ बर-बि‍मारी अछि‍ ओ शत-प्रति‍शत समाधान भलहिं‍ं नै होउ, मुदा बहुत हद तक तँ हेबे करत। तेतबे कि‍ए, समाजो जे दि‍शा-वि‍हि‍न चलि‍ रहल अछि‍ ऊहो सुढ़ि‍या कऽ रस्‍तापर चलि‍ औत। जाबे समाज आकि‍ बेकती अधला रस्‍ता छोड़ि‍ नीक रस्‍ता पकड़ि‍ नै चलत, ताबे कल्‍याण केना हएत। कल्‍याणक ढोल केतबो कि‍ए ने बजौल जाए मुदा ढोलेसँ काज थोड़े चलत। लगले मन घूमलि‍न। कोनो जरूरी अछि‍ जे राधाचरणकेँ कोनो उपकार हमरासँ भेले हेतै। एहनो तँ भऽ सकैए जे ओकर अगुरबारे होइ। होइ कि‍ए भेबे कएल ने। जँ कि‍छु उपकार कएल रहैत तँ मन नै रहि‍तए? जि‍नगीमे सभ काज सभकेँ मन रहौ आकि नै रहौ, मुदा उचि‍त-उपकार तँ रहि‍ते छै। बजला-
राधाचरण, तँू भगवान बनि‍ आगूमे ठाढ़ भेलह। जीवनमे कहि‍यो नै बि‍सरबह। तोहूँ मनमे रखि‍ लैह जे जँ कहि‍यो जरूरतिहुअ तँ कहि‍हऽ। शरीर तँ देखि‍ते छह जे अपनो दबाइएपर चलै छी, एकर माने ई नै ने जे अकाजक भऽ गेल छी।
मुनेसरक बात सुनि‍ राधाचरण बि‍सरि‍ गेल जे तीन कि‍लो मीटर असगरे जाइओक अछि‍। बाजल कि‍छु ने। मुनेसरक आँखि‍-पर-आँखि‍ गाड़ि‍ सोझहे देखैत रहल। गाड़ीक समए होइते सीटी देलकै। सीटी सुनि‍ राधाचरणक भक्क खुजल। गाड़ी ससरलै। राधाचरण प्‍लेटफार्मपर ठाढ़, मुनेसर राँचीक बाट पकड़लनि‍। पाछू उनटि‍ मुनेसर आ आगू देखैत राधाचरण, धीरे-धीरे ओझल होइत गेल।
राँची पहुँच मुनेसर अपना डेरापर पहुँचला। एक्के दुइए भाड़ादार सभ आबि‍-आबि‍ सुलोचना बहि‍नकेँ देखए लगलनि‍। जेते मुँह तेते जुति‍-भाँति‍। ओसारपर सुलोचना बहि‍नकेँ सुता अपने मुनेसर आगूले सोचए लगला। स्‍त्रीगण छी तँए स्‍त्रीगणक जरूरति‍ अछि‍ए। ओना भाड़ादार सभ अछि‍ओ मुदा अपनो तँ परि‍वार अछि‍ए। हुनका (पत्नीक) मनमे अनोन-बि‍सनोन रहि‍ते छन्‍हि‍ मुदा की? परि‍वारो आ समाजेमे तँ ई गुण अछि‍ए जे समैपर चुनो-तमाकुल लेल झगड़ा होइ छै आ बेर-बेगरतामे सम्‍हारो होइ छै। दि‍नक दोख कहि‍ लोक टारि‍ दइ छै। नीक हएत जे इलाजमे जाइसँ पहि‍ने परि‍वार जनसँ राय-वि‍चार कऽ ली। ओना परि‍वारमे तीन बापूत आ तीन सासु-पुतोहु अछि‍, मुदा ऐठाम लगमे तँ पत्नीएटा छथि‍। सए कि‍लो मीटर कोनो दूर भेल। तैसंग ईहो हएत जे जँ पुतोहुकेँ कहबनि‍ तँ बेटो बरदाएत। तइसँ नीक पत्नीए भेली। मन तँ मानि‍ गेलनि‍ मुदा लगले प्रश्न अँकुर गेलनि‍ जे जँ कहीं पत्नी सहयोग नै करथि‍, तखनि‍? मुड़छैत मन तुड़ुछि‍ गेलनि‍। एक गड़ूकेँ बहत्तरि‍ आशा। पत्नी-साधनाकेँ मोबाइल लगा मुनेसर बजला-
सुलोचना बहि‍नकेँ एतै लऽ अनलि‍यनि‍। आनठामक (दरभंगा-पटनाक) असुवि‍धा देखि‍ यएह नीक बूझि‍ पड़ल, तँए अहाँ छुट्टी लऽ कऽ चलि‍ आउ?”
मुनेसरक बात सुनि‍ते जेना जीएपर साधनाकेँ रहनि‍ तहि‍ना बजली-
अनलि‍यनि‍ तँ नीक केलौं। अस्‍पतालमे भर्ती करा दि‍यनु। ओइठाम सभ बेवस्‍था छइहे, हमर कोन काज अछि‍। अपने डेरामे रहब, एक बेर-दू बेर देखि‍-सुनि‍ एबनि‍।
पत्नीक वि‍चार सुनि‍ मुनेसर सकदम भऽ गेला। आगू बजैक साहस नै भेलनि‍। मोबाइल रखि‍ वि‍चारए लगला जे की कएल जाए? अस्‍पतालक जेहेन बेबस्‍था अछि‍ से केकरा ने बूझल छै। कनी-नीक आकि‍ कनी अधला, सबहक एके गति‍ अछि‍। तखनि‍ तँ दरभंगामे बेसी रद्दी अछि‍ राँची-पटनामे कनी तहदर अछि‍। तँए नीक कहबै सेहो नहि‍येँ। वएह डाक्‍टरो आकि‍ नर्सो ने अदलि‍-बदलि‍ ऐठाम-ओठठाम करै छथि‍। दोष की कोनो जगहक होइ छै, दोष होइ छै लोकक चालि‍क। जेहेन चालि‍-चलनि‍क लोक रहैए तेहने तेकर काजो होइ छै। मुदा सेहो की ओहि‍ना होइ छै, होइ छै बेवस्‍थाक अनुरूप। बेकती-वि‍शेषक दोख तँ लोक खि‍सि‍या कऽ लगा दइ छै, मुदा से थोड़े अछि‍। नि‍च्‍चाँ-ऊपर एके-रंग अछि‍। कनी कम आकि‍ कनी बेसी, मुदा अछि‍ सबतरि‍। दृढ़ होइत, नै हम सुलोचना बहि‍नक नीक इलाज करेबनि‍। मरण-जीअन अपना हाथमे नै अछि‍, मुदा नीक-अधलाक जोगार तँ अपना हाथमे अछि‍ए। हम जे करब से की सुलोचना बहि‍न नै देखती, देखबे करती। कखनो-पानि‍ पीबैक मन हेतनि‍ आ कि‍यो दइबला नै रहतनि‍, तखनि‍ ओ की बुझती जे नीक सेवा होइए। पत्नीक वि‍चार सुनि‍ए लेलौं, बेटोसँ पुछि‍ए लि‍ऐ। मुदा पुतोहुकेँ अबैले नै कहबनि‍। पत्नी जँ रहि‍तथि‍ तँ उमेरदारो भेली आ ऐठामक सभ कि‍छु बुझलो-सुझल छन्‍हि‍। से तँ पुतोहुकेँ नै छन्‍हि‍। रघुनाथकेँ मोबाइल लगा कहलखि‍न-
बौआ, बहि‍नकेँ राँचीए आनि‍ लेलि‍यनि‍। ऐठाम सुवि‍धो हएत।
मुनेसरक बात सुनि‍ते रघुनाथ बाजल-
नीक केलौं। पहि‍ने ई भाँज लगा लि‍अ जे सभसँ नीक बेवस्‍था कोन ठाम अछि‍। पाइ भलहिं कि‍छु बेसीओ खर्च हुअए मुदा इलाजमे कमी नै होन्‍हि‍।
रघुनाथक बात सुनि‍ मुनेसरक मन भरि‍ गेलनि‍। बजला-
बौआ, परि‍वारमे अहि‍ना सभ एक-दोसरपर आश्रि‍त रहैए, जँ से नै रहत तँ कुत्ता-बि‍लाइ आ मनुखमे अन्‍तरे की भेल। एक तँ ओहुना बि‍नु वि‍वेकेक सभ अछि‍ सि‍बा मनुखक। दोसर मनुखेक योनि‍ ने कर्म योनि‍ छी, बाँकी तँ भोगे योनि छी कि‍ने। से जँ मनुखमे नै आएल तँ कर्म-योनि‍ आ भोग-योनि‍मे दूरीए की रहल।
पि‍ताक बात रघुनाथ कान ठाढ़ कऽ सुनैत रहल, सुनैत रहल। बाजल कि‍छु ने। मुदा लगमे पत्नी-सुनीता जे बजलनि‍ से मुनेसरो सुनला। बाजल छेली-
माए छथि‍न की नै से पूछि‍ लि‍अनु?”
रघुनाथ-
किए?”
सुनीता-
लगमे रहने काज असान हेतनि‍। एहेन समैमे जनि‍जाति‍केँ रहब जरूरी होइ छै। सेवा-टहलसँ लऽ कऽ पानि‍क ओरि‍यान धरि‍क जरूरति‍ तँ होइते छै कि‍ने? मरदकेँ तँ क्‍लिनिकसँ दबाइ दोकान आ दबाइ दोकानसँ डाक्‍टर लग करैत-करैत समए चलि‍ जाइ छै।
बहाना बनबैत रघुनाथ पि‍ताकेँ कहलखि‍न-
टाबर कटि‍ रहल अछि‍। कनीकालमे फेर मोबाइल करै छी।
कहि‍ पत्नी-सुनीताकेँ कहलखि‍न-
अहाँ जे बात कहै छी, से उचि‍त हएत। केना पुछबनि‍ जे माए छथि‍ की नै।
जइ नजरि‍ए रघुनाथक प्रश्न छल तइ नजरि‍ए उत्तर नै दैत नजरि‍ बदलि‍ सुनीता बजली-
नारीक स्‍वभावक ठेकान नै अछि‍। नान्‍हि‍टा बात लऽ कऽ लोक मूसक दबाइ खा जि‍नगी मेटा लइए। जि‍नगी घि‍या-पुताक खेल नै ने छी जे हाथेसँ बहारि‍ गरदा-माटि‍क घर-अँगना बना खेला लेब आ मन उचटत तँ हाँइ-हाँइ कऽ मेटा चलि‍ देब।
रघुनाथ-
हँ से तँ नहि‍येँ छी, मुदा...
सुनीता-
मुदा-तुदा कि‍छु ने, मुँह खोलि‍ कऽ बाजू। कहि‍यनु जे एकटा महि‍लाक जरूरति‍ अछि‍ए, जँ माए नै अबै छथि‍ तँ पुतोहु अबैले तैयार छथि‍। अहाँ बहि‍नकेँ इलाजमे लऽ चलि‍यनु, गाड़ी पकड़ि‍ आबि‍ रहल छी। भरि‍ दि‍न गाड़ीमे लगत, गाड़ी पकड़ि‍ आबि‍ रहल छी।
भरि‍ दि‍न गाड़ीमे लागत, परसूका नाओं कहि‍ दि‍यनु जे पहुँचब। पत्नीक बात सुनि‍ रघुनाथ थकथका गेल। मुदा धर्म संकट तँ अछि‍ए। पत्नीओक वि‍चार अकाट्य अछि‍ मुदा माइक सम्‍बन्‍धमे पि‍तासँ पुछलो नहियेँ हएत। तखनि‍? तखनि‍ कि‍ए ने दुनूकेँ मुहाँ-मुहीं बात होन्‍हि‍। ने ससुर आन भेलखि‍न आ ने पुतोहु। पि‍ते-पुत्रीक सम्‍बन्‍ध भेलनि‍, कि‍ए ने दुनूक बि‍च्‍चे वि‍चार जानि‍ वि‍नि‍मय भऽ जाइन। मोबाइल उठा नम्‍बर मि‍ला रघुनाथ सुनीताक हाथमे देलखि‍न। सुनीता-
बाबूजी, गोड़ लगै छि‍यनि‍।
पुतोहुक बोल अकानि‍ मुनेसर असीरवाद तँ दऽ देलखि‍न मुदा आगू कि‍छु बजैसँ परहेज केलनि‍। परहेज ऐ दुआरे केलनि‍ जे जे कि‍छु कहैक हएत बेटाकेँ कहबै, हि‍नका कि‍ए कहबनि‍। ससुरक कोनो आगूक बात नै सुनि‍ सुनीता बजली-
जहि‍ना सुलोचना बहि‍न हि‍नकर जेठ बहि‍न छि‍यनि‍ जे माए दाखि‍ल भेली, तहि‍ना तँ हमरो जेठ दीदीए भेली? पि‍ताक बहि‍न तुल्‍य।
मुनसेर-
भेली। जँ झगड़ा-दन भेने बेवहारि‍क पक्ष टुटि‍ओ जाइ छै तैयो पुश्‍तैनी पक्ष तँ रहबे करै छै। एकरा हम केना नकारि‍ देब।
सुनीता-
काल्हि‍ गाड़ी पकड़ि‍ आबि‍ रहल छी।
गाड़ी पकड़ि‍ आबि‍ रहल छी, सुनीताक बात सुनि‍ मुनेसर थकथका गेला। पुतोहु औती सासुक कि‍रदानी देखती। हो-ने-हो जँ कहीं पूछि‍ दथि‍ जे माए कि‍ए ने छथि‍, तखनि‍ की जबाव देबनि‍। मुदा काजक दौड़ तँ ओहन दौड़ होइए जे नीक-अधलाक भण्‍डाफाेर करि‍ते अछि‍। मन गरमेलनि‍। गरमाइते मन बाजि‍ उठलनि‍- ‘सत्‍यपर पर्दा देब पाप छी। मनुखक बीच देहा-देहीक सम्‍बन्‍ध होइ छै, सभकेँ अपना लेल करैक अधि‍कार छै। हुनको छन्‍हि‍, तँए रोकब नीक नै।
ससुरक कोनो बात नै सुनि‍ सुनीता बजली-
एक तँ हि‍नको बेसी उमेरा भऽ गेलनि‍ तैपर केते रंगक रोगो छन्‍हि‍हेँ। एहनो तँ भऽ सकैए जे एके-बेर दुनू गोटेकेँ रोग जोर मारनि‍। तखनि‍ के केकरा देखथि‍न?”
निरुत्तर होइत मुनेसर उत्‍साहि‍त भऽ बजला-
कनि‍याँ, केकरो अधि‍कारमे दखल देब उचि‍त नै बूझि‍ पड़ैए तँए हम कि‍छु ने कहब, जे मन हुअए से करू। अहाँ स्‍वतंत्र छी।
कहि‍ मोबाइल रखि‍ देलखि‍न। मोबाइल रखि‍ते सुनीता रघुनाथकेँ कहली-
काज-उदेममे कोनो काजकेँ झाँपि‍-तोपि‍ नै राखी। ऐसँ काज बाधि‍त होइ छै। जँ काजे बाधि‍त भऽ जाएत तखनि‍ काज हएत केना।
रघुनाथ-
हँ, से तँ नै हएत?”
सह पबैत सुनीता बजली-
कौल्हुका गाड़ीसँ हमरा राँची पहुँचा अहाँ घूमि‍ जाएब। अहाँ नोकरी करै छी तँ छुट्टी कटत, दरमाहा कटत। मुदा ओइठाम पहुँचला पछाति‍ तँ अपन चसमसँ सभ कि‍छु देखबै। नै जरूरति‍ पड़तनि‍ जि‍गेसा भेल, जरूरति‍ पड़तनि‍ रहि‍ कऽ सेवा करबनि‍।
पुतोहुक बात मुनेसरक मनकेँ खोड़ि‍ देलकनि‍। वि‍चारए लगला जे केना कएल जाए। ओना अपन अंगीते (पि‍सि‍यौत जमाए) डाक्‍टर छथि‍। ऊहो जनै छथि‍ मुदा सोझहा-सोझही गप-सप्‍प नै भेने चेहरासँ ने ओ चि‍न्‍है छथि‍ आ ने हम चि‍न्‍है छि‍यनि‍। मुदा लगले मनमे द्वन्‍द्व ठाढ़ भऽ गेलनि‍। एक मन कहए लगलनि‍ जे जखनि‍ समांग डाक्‍टर छथि‍ तखनि‍ नीक काज कि‍ए ने हएत। दोसर कहनि‍ जे जखनि‍ पाइएक खेल-तमाशा अछि‍ तखनि‍ परि‍चए दऽ कऽ अपन प्रति‍ष्‍ठा कि‍ए गमाएब। प्रति‍ष्‍ठो तँ प्रति‍ष्‍ठा छी। सासु-ससुर जँ भीखो मांगि‍ खेती आ जँ बेटी-जमाइक दरबज्‍जापर हाथीए रहतनि‍ तँ केना हाथ पसारती। मुदा सम्‍पति‍ सम्‍पति‍ छी जे भोज्‍य पदार्थ छी मुदा प्रति‍ष्‍ठो सएह छी। खैर जे होउ, मुनेसर वि‍चार केलनि‍ जे एक शि‍क्षकक रूपमे अपन परि‍चए देबनि‍। गाम-घरक कोनो चर्च नै करब। मन ठमकलनि‍, उत्‍साह जगलनि‍, काल्हि‍ निश्चि‍त डाक्‍टर ऐठाम जेबे करब। मुदा जाइसँ पहि‍ने नीक हएत जे अस्‍पतालोक बेवस्‍था देखि‍ लि‍ऐ आ प्राइवेटो सभकेँ देखि‍ ली। आँखि‍क देखलकेँ मनो मानै छै। बि‍नु देखलमे एहनो भऽ सकैए जे औगताइमे अधले भऽ जाए। पछाति‍ जँ बुझैओमे औत तँ काजे हूसि‍ गेल रहत।
दोसर दि‍न सबेरे आठ बजे मुनेसर टेम्‍पू पकड़ि‍ अस्‍पताल पहुँचला। रोगी-वार्ड सभमे जा-जा देखलनि‍ तँ मन मानि‍ गेलनि‍ जे प्राइवेटेमे इलाज कराएब नीक। ओना हड्डीओ रोगक केते डाक्‍टर छथि‍, मुदा तइमे नीक के छथि‍? भाँज लगबैत-लगबैत भाँज लगलनि‍ जे डाक्‍टर शेखर नीक छथि‍। मुदा छि‍या तँ अंगीत। पाइबला सबहक स्‍वभावो बदलि‍ जाइ छै। केतबो लगक कि‍ए ने हुअए, पाँच प्रति‍शत छोड़ि‍ कऽ, मने-मन बाजिए देता जे जेते-हराएल-भोथि‍याएल रहैए, धरमशाला बुझैए। तँए नीक जे जखनि‍ चेहराक चि‍न्‍हारए नै अछि‍ तखनि‍ भषो तँ दूरी बनबि‍ते छै।
वार्ड सभ देखि‍-सुनि‍ मुनेसर आॅफिसक आगू पहुँचबे केला आकि‍ डाक्‍टर शेखर गाड़ीसँ उतरि‍ आॅफिसमे प्रवेश केलनि‍। संयोग नीक बूझि‍ मुनेसर कनीए अँटकि‍ पाछूसँ अपनो आॅफि‍स पहुँचला। कुरसीपर बैसैत पुछलखि‍न-
डाॅक्‍टर साहब, अस्‍पताल अच्‍छा होगा कि‍ प्राइवेट?”
डाक्‍टर शेखर-
अच्‍छा दोनो है। हमहीं लोग ने दोनो जगह हैं। रही बात देख-रेख की, यहाँ हम स्टाफ को कह सकते हैं, दबाव नहीं दे सकते हैं। लेकि‍न प्राइवेट कि‍ दूसरी बात है।
दुनू गोटेक बीच गप-सप्‍प शुरूहे भेल छेलनि‍ आकि‍ मुनेसरक पि‍सि‍यौत भातीज माने डाक्‍टर शेखरक सार, आॅफि‍स पहुँचला। मुनेसरकेँ देखि‍ते गोड़ लागि‍ पुछलकनि‍-
काका, केम्‍हर-केम्‍हर आएल छी?”
मुनेसर-
कलपर बहि‍न खसि‍ पड़ली से डाँड़मे कज्‍जी भऽ गेल छन्‍हि‍ सएह एलौं जे नीक अस्‍पताल हएत आकि‍ प्राइवेट।
डाक्‍टर शेखरक सार-देवेन्‍द्रक संग मुनेसरक बीच सम्‍बन्‍धकेँ अँकैत डाक्‍टर शेखर मुँह खोललनि‍-
अपने पलामूमे कार्यरत छि‍ऐ?”
मुनेसर-
छेलि‍ऐ। आब सेवा-नि‍वृत भऽ गेलौं।
जहिना डाक्‍टर शेखर मुनेसरक सम्‍बन्‍धमे बहुत बात जनै छथि‍ तहि‍ना मुनेसर सेहो डाक्‍टर शेखरक सम्‍बन्‍धमे जनि‍ते छथि‍। मुदा पनरह साल पहि‍ने जे शेखरक बि‍आह भेलनि‍ तइमे मुनेसरकेँ नै रहनौं चेहराक चि‍न्‍ह-पहचि‍न्‍ह नै भेल रहनि‍। जहि‍ना कोनो पोथी पढ़ैक जि‍ज्ञासुकेँ अनायास कोनो समांगक माध्‍यमसँ एने मनक पोटरी अपने खुजि‍ जाइत तहि‍ना डाक्‍टर शेखरोकेँ भेल छेलनि‍। होइक कारण भेलनि‍ जे बि‍आहक पद्धतिमन पड़ि‍ गेलनि‍। मन पड़ि‍ गेलनि‍ पत्नी-पि‍ताक मात्रि‍क। नीक कुल-मूल। अपनासँ दोसर भेल। ऐठाम भेल अर्थक कारण। उदार पि‍ता बेटीक सुख-सुवि‍धा (आर्थिक) देखि‍ अपन वि‍चार सुधार केने रहथि‍। मन पड़लनि‍ सुलोचना दीदीक जि‍नगी। केना नैहर-सासुरमे ठोकरौल गेल छथि‍। एहेन जगहपर जँ मानवीय वि‍चार प्रति‍पादि‍त नै करब तँ हमरा वि‍चारक कोनो मोल नै। मनमे वि‍चार फुटि‍ते डाक्‍टर शेखर, देवेन्‍द्रकेँ कहलखि‍न-
चाचाजी एला अछि‍, आ अहाँ बैसल गप-सप्‍प करै छी।
डाक्‍टर शेखरक मनमे एलनि‍ जे कि‍ए ने घरे सुमझा दि‍यनि‍। नै तँ अनेरे फज्झति‍मे पड़ब। जखने ओ (पत्नी) बुझती जे चाचाजी केँ चि‍न्‍हबो ने केलनि‍ तखनि‍ आन काल जे हुअए मुदा खाइक गड़गट भाइए जाएत। तइसँ नीक ने हएत जे अखनि‍ सभ बुझै छथि‍ जे नोकरीक ड्यूटीमे छी। यएह ने हएत जे अपन आॅफि‍सो सुमझा देबनि‍, खेता-पीता अराम करता। काज तँ काजक पछातिए हएत कि‍ने। तहूमे जाबे चाह-पान करता ताबे एकेटा काज अछि‍, ओकरा हमहूँ पूरा कऽ अगि‍ला काजक योजना बना लेब।
डाक्‍टर शेखरक इशारा देवेन्‍द्र बूझि‍ गेल। बूझि‍ गेल ई जे जँ जेठ रहि‍ति‍यनि‍ (पत्नीक जेठ भाय) तखनि‍ जँ कहि‍तथि‍, तँ वि‍चारो करि‍तौं। मुदा से नै अछि‍। जे मन फुड़त से करब। खर्चा तँ दि‍अ पड़तनि‍। बाजल-
काकाजी, अहाँ ताबे अराम करू। घर नै ने छि‍ऐ, सरकारी अस्‍पताल छि‍ऐ कि‍ने, ऐठाम की खाएब की नै खाएब आ की पीअब से तँ वि‍चारए पड़त कि‍ने।
भार उतरैत देखि‍ डाक्‍टर शेखर बजला-
एकटा ऑपरेशन अछि‍, ताबे हमहूँ नि‍चेन भऽ जाइ छी। तखनि‍ अगि‍ला काजमे भीड़ जाएब।
अस्‍पतालक आॅफि‍सकेँ घर जकाँ देखि‍ मुनेसरक मनमे बि‍सवास जगलनि‍ जे ठौर परहक काज भेल। जँ पत्नी-साधना लगमे नहि‍योँ रहती तैयो भतीजी (डाक्‍टर शेखरक पत्नी) तँ अछि‍ए। बच्‍चेसँ देखल अछि‍ जे केहेन बचि‍या अछि‍। 
टेबुलपर सँ उठैत शेखर देवेन्‍द्रकेँ कहलखि‍न-
डेरोपर चाची जीक जानकारी दऽ दि‍यनु। कहि‍ दि‍यनु जे दू घंटा पछाति‍ आबि‍ रहल छी।
दू घंटा आगत-भागतक पछाति‍ तीनू गोटेक डाक्‍टर शेखर, मुनेसर आ देवेन्‍द्रक बीच काजक गप-सप्‍प उठल। ने डाक्‍टर शेखर सोझ मुहेँ मुनेसरकेँ कि‍छु कहथि‍न आ ने मुनेसर डाक्‍टर शेखरकेँ। दुनूक बीच देवेन्‍द्र, तँए दुनू गोटे देवेन्‍द्रेकेँ मानि‍ बजथि‍।
वि‍चार करैत मुनेसर बजला-
जखनि‍ डेरेक वि‍चार भेल तखनि‍ नीक हएत जे पहि‍ने हुनका (बड़की बहि‍नकेँ) लऽ अबि‍यनि‍।
डाक्‍टर शेखर चुप-चाप सुनैत रहथि‍, देवेन्‍द्र बाजल-
काकीक संग दीदीओकेँ डेरेपर पहि‍ने पहुँचा लि‍अ। अखनि‍सँ डाक्‍टरो साहैब छुट्टीएमे रहता। अपन क्‍लिनिक छन्‍हि‍ तँ बीच-बीचमे देखि‍ औता।
देवेन्‍द्रक बात सुनि‍ मुनेसर सकपका गेला। सकपका गेला ई जे काकीओ केँ संगे नेने एबनि‍। मुदा डुमैत मनुखक धैर्य थड़थड़ेबे करै छै, मुदा बि‍च्‍चेमे युक्‍ति‍ फुड़लनि‍। बजला-
बौआ, एहनो बात लोक बजैए जे काकीओकेँ संगे नेने एबनि‍। अहि‍ना कुल-खनदानकेँ बुझै छहक।
जमाइक सोझ अपनाकेँ छि‍पबैत मुनेसर बाजि‍ तँ गेला मुदा मन धि‍क्कारए लगलनि‍। ग्‍लानि‍ अपनापर भेलनि‍ जे पढ़ल-लि‍खल (पति‍-पत्नी) परि‍वारमे जँ एना हुअए तँ आनक की गति‍ हएत। मुदा, जहि‍ना एक झूठ हजारो झूठकेँ हजम कऽ जाइए तहि‍ना एक सतोक तँ गुण छइहे। जमाएकेँ परोछ होइते देवेन्‍द्रकेँ कहि‍ देबै जे बौआ पत्नीक सहयोग नै अछि‍।
टेम्‍पू अबि‍ते‍ मुनेसर देवेन्‍द्रकेँ कहलखि‍न-
बौआ, तोरासँ लाथ कोन। भानस अपने करै छी। जखनि‍ काज नै रहैए तखनि‍ तँ गैसक बेवस्‍था अछि‍, भीड़ नै बूझि‍ पड़ैए मुदा, जेना आइए देखहक जे भानस करब आकि‍ बहि‍नकेँ डाक्‍टर ऐठाम लऽ जाएब।
मुनेसरक बात सुनि‍ देवेन्‍द्र बाजल-
ऊहो घर की आन भेल। कहि‍ देने छि‍ऐ, सभ ओतै भोजन करब।
टेम्‍पूसँ तीनू गोटे डाक्‍टर शेखरक डेरापर पहुँचला। डेरापर पहुँचि‍ते यमुनाकेँ नैहर मन पड़ि‍ गेलनि‍। मन पड़ि‍ गेलनि‍ जे जहि‍या सुलोचना बहि‍न अपना ओतए रहथि‍। केते सामोक गीत आ आनो-आन सि‍खा देने रहथि‍। यएह ने सुलोचना दीदी छथि‍। मुदा बजली कि‍छु ने। डाक्‍टर शेखर सुलोचना बहि‍नकेँ डाक्‍टरी नजरि‍ए देखि‍ वि‍चारलनि‍। वि‍चारलनि‍ ई जे देहक काज-खोंट छी, हो-ने-हो अपनत्‍वमे मन पघि‍ल जाए। मुदा डाक्‍टर होइक नाते बाजि‍ओ तँ नै सकै छी। बात बदलि‍ यमुनाकेँ कहलखि‍न-
काज गड़ूगर तँ अछि‍ए, मुदा असाध नै अछि‍। तैयो नीक हएत जे दोसरो सहयोगीकेँ बजा लि‍यनि‍।
डाक्‍टर शेखरक भक्की यमुना नै बूझि सकली। मुदा नीक होन्‍हि‍ से तँ मनमे रहबे करनि‍। बजली-
एकटा कि‍ए जेतेक जरूरति‍ हुअए आकि‍ राँचीक सबहक (हड्डी रोगक डाक्‍टर) जरूरति‍ हुअए तँ सभकेँ बजा लि‍अ, मुदा दीदी ऐठामसँ अपना पएरे जाथि‍ से तँ देखबए पड़त।
साढ़े छह बजे साँझमे तीनटा डाक्‍टर बीच सुलोचना बहि‍नक आॅपरेशन भेलनि‍। नीक ऑपरेशन।
तेसरा दि‍न हहाएल-फुहाएल रघुनाथ पहुँचला। डेरा बन्न देखि‍ मोबाइलसँ सम्‍पर्क केलक। मुदा चीज-बौस तँ रहबे करै। भाड़ादारक डेरामे सभ समान रखि‍ दुनू परानी रघुनाथ शेखरक डेरापर वि‍दा भेल।
डाक्‍टर शेखरक डेराक बाहर ओसारपर राखल कुरसीपर बैसल मुनेसर वि‍चार करैत रहथि‍ जे एक दि‍स बेटा-पुतोहु, भतीजी-जमाइक बीच छी तँ दोसर दि‍स अर्द्धांगि‍नीसँ दूर। यएह छी जि‍नगी।
सड़कपर बेटा-पुतोहुकेँ गाड़ीसँ उतरि‍ते मुनेसर आगू बढ़ला। मुदा बि‍ना गोड़ लगने रघुनाथ केना कि‍छु पुछि‍तनि‍ आकि‍ बि‍नु असीरवाद देने मुनेसरे कि‍छु बजि‍तथि‍। मुदा दुनू दि‍ससँ दुनू आगू बढ़ैत गेला। लग अबि‍ते रघुनाथसँ पहि‍ने सुनीता गोड़ लगलकनि‍। गोड़ लगि‍ते मुनेसर असीरवाद दैत बजला-
कनि‍याँ, अपने भतीजीक परि‍वार छी।
सड़कपर गाड़ीक अवाज सुनि‍ यमुना सेहो बहरा गेल छेली। मुदा परि‍चि‍त अनठि‍या देखि‍ ठमकि‍ गेली। लग अबि‍ते मुनेसर बजला-
रघुनाथ दुनू बेकती छी। बौआ, यमुना बहि‍न छथुन।
सौझुका समए। रघुनाथ डाक्‍टर शेखरसँ पुछलकनि‍-
डाक्‍टर साहैब, ऐठाम थोड़े असुवि‍धा अछि‍। असुवि‍धा ई अछि‍ जे मध्‍य प्रदेशक वि‍लासपुरमे कार्यरत छी। एक तँ नोकरी तहूमे बैंकक, ऐठामसँ ओइठाम नै लऽ जा सकै छी।
डाक्‍टर शेखर-
सात दि‍न एतै रहए दि‍यनु, तहीमे एते भऽ जेतनि‍ जे दोसर डाक्‍टर ऐठाम नै लऽ जाए पड़त। दबाइ-दारू चलतनि‍।
सएह भेल। सात दि‍न पछाति‍ सभ कि‍यो- सुलोचना बहि‍न, मुनेसर दुनू बेकती रघुनाथ आ बच्‍चाक संग वि‍लासपुर रबाना भेला।
छह मास पछाति वि‍लासपुर सँ सभ कि‍यो गाम एला।

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'विदेह' २२८ म अंक १५ जून २०१७ (वर्ष १० मास ११४ अंक २२८)

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