Monday, November 11, 2013

‘विदेह' १४० म अंक १५ अक्टूबर २०१३ (वर्ष ६ मास ७० अंक १४०) PART I

                     ISSN 2229-547X VIDEHA
विदेह' १४० म अंक १५ अक्टूबर २०१३ (वर्ष ६ मास ७० अंक १४०)  

 

अंकमे अछि:-
बिसवासघात

बेचन ठाकुर

भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली]


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बिसवासघात

बेचन ठाकुर
पहिल अंक

पहिल दृश्य

(राम किशुन अपन बरंडापर बैस पेपर पढ़ै छथि। तखने हुनकर जेठ बेटा राम सेवकक चाह लऽ कऽ प्रवेश।)

राम सेवक-     पप्पा, पप्पा, चाह लिअ।
राम किशुन-    (चाह लऽ कऽ) बौआ, लखन कक्का आ सियाराम ककाकेँ सेहो बजा लाउ। हम असगरे चाह पीब? (राम सेवक लखन आ सियारामकेँ अन्दरसँ बजा आनैत अछि।) आउ आउ भैया, बैसू। अहाँ दुआरे हमरो चाह सरा गेल। असगरे केना पीबितौं? (लखन आ सियाराम बैसै छथि।) बौआ, ई चाह नेने जाउ आ तीन कप चाह नेने आउ। (राम सेवक सरेलहा चाह लऽ कऽ अन्दर जा कऽ तीन कप चाह आनैत अछि आ सभकेँ आगू बढ़ा दइ अछि। तीनू भाँइ चाह पीबैत गप-सप्‍प करै छथि।)
लखन-        (राम किशुनसँ) एन.एचमे जे जमीन पड़लै तेकर तीनू भाँइ नामे नोटिस एलै। हम तँ मुरूख तरे गेलिअ आ तूँ सभ की केना करै जेबहक से करहक। हाकिम बजै छेलखिन जे एक सप्ताहक अन्दर अपन अपन कागत लऽ कऽ ऑपीस आबैले।
सियाराम-      राम किशुनबला जमीनक कागत तोरा घरमे नै छै (लखनसँ) हम काल्हि देखने छेलिऐ। अपना दुनू भाँइक कागत छै। खाता-खेसरा हम मिलौलिऐ।
राम किशुन-    हँ, भैया ठीके कहै छथिन। हमरा घरमे हमरे टा कागत अछि। (तीनू भाँइ चाह पीब कप रखि‍ दइ छथि।) भैया, अहाँ सभ नीफीकीर रहू। हम छी। भैया अहाँ सभ अपन नोटिस आ कागत सभ दऽ दिअ। देखै छि‍ऐ ऑफिसक की स्थिति छै?
सियाराम-      लऽ लिहऽ तोरा हाकिम-हुकुमसँ जान-पहिचान सेहो छै।

पटाक्षेप।


दोसर दृश्य

(लखन आ हिनकर कनियाँ लक्ष्मी अपन दलानपर बैस जमीनक कागतक सम्‍बन्धमे गप-सप्‍प करै छथि।)

लखन-        तोरा रातिमे जे जमीनक सभटा कागत बक्सामे से निकालै लए कहलियौ से निकाललेँ?
लक्ष्मी-        नै निकाललौं।
लखन-        किए? किए नै निकाललेँ?
लक्ष्मी-        हम सोचलिऐ की जे पहिने दू-चारिगो काबिल लोक सभसँ बूझि‍ लैतहक तहन दैतियनि। कागतक सम्‍बन्‍धमे हम-तूँ तँ किच्छो नै बुझै छिऐ। बुझै छहक, दर-दियाद केकराके होइ छै।
लखन-        तूँ बेसी बुझै छिहीन। लाल बुझक्करि छेँ। अँए गै, सभ दियाद एक्के रंग होइ छै?
लक्ष्मी-        से तँ नै होइ छै। मुदा सएमे नै, हजारगोमे एगो चिक्कन होइत हेतै।
लखन-        से बुझै छिहीन तँ सएह बुझहीन। हजारगोमे एगो हमर चिक्कन दियाद राम किशुन छै। एहेन दियाद तँ परलो पाबी।
लक्ष्मी-        हौ, दिन-दुनियाँ ठीक नै छै। काम लइ बेरमे गदहो के नाना कहै छै लोक। हम तँ कहै छिअ जे कागतक सम्‍बन्धमे पूछि लैतहक केकरो-केकरोसँ।
लखन-        हम केकरोसँ नै पुछबै। हमरा राम किशुनपर पूरा बिसवास अछि आ ओकरासँ बेसी बुझैबला हमरा नजरिमे कि‍यो नै अछि। तोँ हमरा बेसी नै पढ़ा। हम बुझै छिऐ, जनानी दियाद- दियादमे आगि लगाए दइ छै। अखनि कागत निकालि कऽ नेने आ।
लक्ष्मी-        घरबला छह। तोहर कहल तँ कहुनाकेँ करहे पड़त। हमरा जे कहै के छेलह से कहलिअ। ऐसँ आगू तूँ बुझहक। खाइर हम कागत आनि दइ छिअ। (लक्ष्मी अन्दरसँ कागत आनै छथि।) हे लएह कागत। जे करबाक हुअ से करिहऽ
लखन-        (कागत लऽ कऽ) तूँ जो, अपन काज कर। (लक्ष्मीक प्रस्थान) आब मौगीक चक्करमे नै रहलौं। अपने संगमे राखब आ जखनि राम किशुन माँगत तखने दऽ देबै। बाप रे बा, मौगी सभ जे खच्चर होइ अए।

पटाक्षेप।


तेसर दृश्य

(राम किशुनक ऐठाम होलीक अवसरपर आयोजित पार्टीमे एस.पी. जीतेन्द्र, डी.एस.पी. मनोहर, ओकील जगन्नाथ, अपेक्षित बीरूक संग दुनू भाए लखन आ सियाराम उपस्थित भऽ मस्तीसँ दारू पी रहल छथि। पार्टीमे एक कात जीतेन्द्र, मनोहर, जगन्नाथ राम किशुन छथि तथा दोसर कात बीरू, लखन आ सियाराम छथि। राम किशुनक जेठ बेटा राम सेवक सबहक सेवामे तत्पर अछि।)
राम किशुन-    (मस्तीमे) एस.पी. साहैब, हम गरीब आदमी अपनेकेँ की सेवा करब? गरीब आदमी दबाल बरबरि होइ छै।
जीतेन्द्र-       नै राम किशुन बाबू, गरीब आदमीमे जे सेवाक भावना होइ छै से अमीरमे केतए? अपनेक पार्टी जश-जश भऽ गेल।
मनोहर-        राम किशुन बाबू, हम केतेको पार्टीमे गेलौं। मुदा एकर जोड़ा केतौ नै रहल।
जगन्नाथ-       साहैब, राम किशुन बाबू जे किछु करै छन्‍हि से दिल खोलि कऽ। बड्ड तेज आदमी छथि। बोलीमे जे मधुरता छन्‍हि से लागत जे मौध चुबै छन्‍हि। ई जेतए पहुँच जाइ छथिन उ काज भेनाइ छै चाहे जेना होइ।
राम किशुन-    हम तँ इनारक बेंग छी। ओना साहैबक किरपासँ पूरा ठीक छी।
बीरू-         (मस्तीमे) की लखन भाय, मन आनन्द छै कीने?
लखन-        बीरू भाय, हम केतौ नै छिअ। हौ, मुख्यमंत्रीकेँ हमहीं कहलिऐ सभ चौक-चौबटियापर दारूक भट्ठी खोलबै लए। हमर बात मानि ओ सभकेँ आनन्द करबै छथिन। अहा! बड्ड नीक लोक छथि।
सियाराम-      (बीरूसँ) बुझै छिऐ भाय, जदी ई मुख्यमंत्री नै रहितए तँ सभटा गरीबहा दारू बेगैर मरि जैतए।
जीतेन्द्र-       राम किशुन बाबू, आब चलैक आज्ञा देल जाए। एगो मर्डर केसकेँ देखए जेबाक छै।
मनोहर-        हमरो चलैक आज्ञा देल जाए। काल्हि ननौरमे एगो पुलिसकेँ गौआँ सभ बंदूक छीन लेलकै। ओहीमे जेबाक छै।
जगन्नाथ-       हमहूँ एगो मोकीरकेँ आइ अखुनके समए देने छिऐ। बेचारा आबि गेल हएत। हमहूँ निकलि जाएब।
राम किशुन-    हम केना कहब अपने सभकेँ चलि जाइ लेल। रात्रि विश्राम एत्तै होइतै। तहन भोरे जलखै कऽ जैतिऐ।
जीतेन्द्र-       बहुत भेलै, बहुत भेलै राम किशुन बाबू। आब हमरा लोकनि चलि रहल छी।
राम किशुन-    (हाथ जोड़ि) घट्टी-कुघट्टी माफ कएल जाए साहैब सभ।
जीतेन्द्र-       कोनो घट्टी-कुघट्टी नै। एकदम जश-जश भऽ गेल। (जीतेन्द्र, मनोहर आ जगन्नाथक प्रस्थान।)
बीरू-         (राम किशुनसँ) दोस, एन.एचमे कागत पेस केलिऐ कीने?
राम किशुन-    कहाँ केलिऐ। अपन कऽ दैतिऐ आ दुनू भाँइकेँ नै करितियनि तँ हिनका सभकेँ बड्ड कष्ट होइतनि। सएह सोचलौं जे तीनू भाँइबला एक्के बेर पेश कऽ देबै। भैया, कागत दऽ कहने रहिऐ, से की विचार भेल?
लखन-        की विचार हेतै? कागत हमरा संगेमे अछि दुनू भाँइबला, लऽ लए।
राम किशुन-    लाउ कागत। (लखन कागत देलनि।)


पटाक्षेप।



चारिम दृश्य

(भू-अर्जन कार्यालयमे भू-र्जन पदाधिकारी सुशील आ हिनकर चपरासी बिन्देश्वर बैस दस्तावेजकेँ उनटा- पुनटा रहल छथि। तखने कागतक संग राम किशुनक प्रवेश।)

राम किशुन-    (सुशीलसँ) सर, प्रणाम।
सुशील-       प्रणाम प्रणाम, कहू की बात?
राम किशुन-    सर, अपनेक नोटिसक मोताबिक हमर जमीनक कागत इएह अछि, लेल जाउ।
सुशील-       (कागत लऽ कऽ) कागतमे रसीदक फोटो कॉपी कहाँ अछि?
राम किशुन-    सर, अगिला हाजिरीमे दऽ देब। तावत पावती रसीद देल जाउ।
सुशील-       रसीद- तसीद नै भेटत। एतए कोनो रसीद नै भेटै छै।
राम किशुन-    सर, एक मिनट समए दैतिऐ अपने।
सुशील-       (कुरसीसँ उठि राम किशुन लग आबि) बाजू,की बात?
राम किशुन-    सर, ऑफिसक हाल- चाल की केना छै? किछु बाहरियो बेवस्था छै?
सुशील-       की बाहरी बेवस्था, नै बुझलौं।
राम किशुन-    इएह जे गरीबक दुःख ऑफिस बुझै छै की नै? कोनो भाँज-भुज लगै छै की नै?
सुशील-       की भाँज-भुज? खोलि कऽ कहू। अहाँक बात नै बुझै छी।
राम किशुन-    मालपर कमाल होइ छै, की नै?
सुशील-       (पीनकि कऽ) चुप्पेचाप भागि जाउ। एकर नाओं नै लिअ हमरा लग। ऐ
ऑफिसमे घूस आ तहूमे हमरा लग।
राम किशुन-    ठीक छै सर, ओइ गपकेँ छोड़ि देल जाए। चलू, चाह पी लेल जाए।
सुशील-       अधिकसँ अधिक ई भऽ सकैए।
(दुनू गोटे चाह दोकानपर जा बैस कऽ गप-सप्‍प करै छथि। श्यामलाल चाह बनए बेच रहल अछि। दोकानपर गैहिकीक भीड़ छै।)
राम किशुन-    सर, अपनेक शुभ नाओं?
सुशील-       सुशील। आ अपनेक?
राम किशुन-    राम किशुन। यौ चाहबला बाबू, दूगो स्पेशल चाह एम्हरो बढ़ाएब।
श्यामलाल-      तुरंत दइ छी सर। अही घानीमे भऽ जाएत।
राम किशुन-    कनी जल्दी देबै। सुशील बाबूकेँ आॅफिसमे बड्ड काज छन्‍हि।
श्यामलाल-      तइले हम नाचू गऽ। आगिओ-पानि डेराइ छै। चुल्हीमे अपन मुड़ी लगाए दिऐ।
राम किशुन-    एना किए बाजै छी?
श्यामलाल-      एक बेर कहलौं जे अही घानीमे भऽ जाएत। तँ अहाँ कहै छी जल्दी देबै। अहाँ देखै नै छिऐ जे हम बैसल छी की काजे कऽ रहल छी। एगो कहबी छै जे औगताएल कुमहनि कथीदुन लऽ कऽ माटि कोराए।
राम किशुन-    बुझलौं, जे अहाँ बड्ड ब्यस्त लोक छी। चाह देब, की नै, से कहू।
श्यामलाल-      हँ यौ, देब किए नै। अहाँ हमर लक्ष्मी छी। लक्ष्मीकेँ दोकानपर सँ तँ नै घुमए देब।
राम किशुन-    सुशील बाबू, जदी कनी माथा लगेलासँ किछु फायदा भऽ जाए, तैमे कोन हर्जा? एना कऽ चलब जे साँपो मरि जाए लाठी नै टूटए। (श्यामलाल दुनूकेँ चाह बढ़ौलक। दुनू चाह पीबैत गप-सप्‍प करै छथि।)
सुशील-       अच्छा, ऐपर निचेनसँ सोचबै।
राम किशुन-    महगाइ आकाश छूने जा रहलए। ओइ अनुपातमे कर्मचारीक तनखा बड्ड कम छै। परिवारमे खरचा मानै नै छै। धिया-पुताक भवि‍स सेहो देखनाइ छै। केतएसँ ओतेक खर्च पुराएब?
सुशील-       बात तँ विचारणीय अबस्‍स अछि।
राम किशुन-    हम अनुचित किए कहब? अनुचितसँ हम अपने अस्सी कोस दूर रहै छी। मुदा किछु हाथ-पएर कातसँ लारबै-चारबै नै, तँ जीवनक गाड़ी नीक जकाँ नै चलि सकत।
सुशील-       अहीं कहू, की कएल जाए?
राम किशुन-    एन.एच. पाइ छै। जेतए धरि सुतराए तेतए धरि सुतारू। ऐमे पब्लिको खुश आ अहूँ खुश।
सुशील-       बेस, सएह करए पड़त। गुंजाइश हुअए बला नै छै। ऐमे अहूँकेँ संग दिअ पड़त।
राम किशुन-    सुशील बाबू, अपने लेल हम जान दइ लऽ तैयार छी।


पटाक्षेप।



पाँचम दृश्य

(एन. एच. केर इंजीनियर उमा शंकर अपन डेरा बैस पेपर पढ़ै छथि। तखने राम किशुनक प्रवेश।)

राम किशुन-    सर, प्रणाम।
उमा शंकर-     प्रणाम प्रणाम। बैसू। (राम किशुन बैस जाइ छथि।) केम्हर-केम्हर एलौं हेन? (ऊपर-निच्‍चाँ निहारए लगै छथि।)
राम किशुन-    एन.एच.बला काज छेलै सर।
उमा शंकर-     मकान सम्‍बन्‍धी की?
राम किशुन-    जी सर।
उमा शंकर-     बाजू की बात?
राम किशुन-    सर, मकानक रेट किछु बढ़ा दैतिऐ।
उमा शंकर-     बाजू की बढाए दिऐ?
राम किशुन-    जेते धरि भऽ सकै।
उमा शंकर-     नोटिसपर जे रेट अछि ओकर दस गुना धरि हम बढ़ा सकै छी। मुदा पच्चीस प्रतिशत हम पहिने लऽ लेब। से विचार अछि तँ बाजू।
राम किशुन-    विचार तँ अछि सर। मुदा अखनि पाइ तँ नै अछि। हमरा पाइक ओरियान लए किछु समए देल जाउ।
उमा शंकर-     बाजू, अहाँकेँ केतेक समए चाही?
राम किशुन-    कम-सँ-कम एक घंटा ताकि बैंकसँ निकालल भऽ जाए। सर, नवका नोटिसक पूर्ण गाइरेन्टी रहत की ने? कोनो डर नै न?
उमा शंकर-     कोनो डर नै। नोटिसक पूर्ण गाइरेन्टी। काज नै भेलापर अहाँक पूरा पाइ आपस करब।
राम किशुन-    सर, लखनबला नोटिस अस्सी हजारक, सियारामबला नोटिस एक लाखक आ हमर नोटिस एक लाख चालीस हजारक अछि। ऐमे की केना करबै हेर-फेर?
उमा शंकर-     अस्सी हजारबलाकेँ आठ लाख, एक लाखबलाकेँ दस लाख, एक लाख चालीस हजारबलाकेँ चौदह लाख असानीसँ कऽ सकै छी कम्प्यूटरसँ। कुल बत्तीस लाख भेल जइमे आठ लाख हमरा चाही।
राम किशुन-    सर, बैंकपर सँ आबि रहल छी।
उमा शंकर-     बेस आउ। हे भगवान, पाइ निकासी भऽ जाइ। (राम किशुन अन्दर जा कऽ अटैचीमे आठ लाख टाका आनै छथि।)
राम किशुन-    लेल जाए सर। (उमा शंकर अटैचीमे पाइ गिन अटैची रखि‍ लइ छथि।)
उमा शंकर-     ठीक अछि। जाउ, अहाँक काज सभसँ पहिने हएत।
राम किशुन-    सर, स्वेच्छासँ किछु आपस कऽ दैतिऐ। कम-सँ-कम अटैचीक दाम।

उमा शंकर-     ओतेक पाइ देलिऐ आ एगो अटैची नै छोड़ल हएत खुशीसँ?
राम किशुन-    किए नै छोड़ल हएत सर। मुदा ऽ ऽ ऽ।

उमा शंकर-     मुदा-तुदा छोड़ू। खुशी- खुशी जाउ। बुझै छिऐ आइ अहाँक संजोग नीक रहए, जतरा बनल रहए जे एक्के बेरमे मन मोताबिक काज कऽ देलौं। नै तँ अही काज लए दस दिन दौगैबतौं। अँए यौ, आइ काल्हि बिना माले उचितो काज नै होइ छै तँ अनुचित काज बिना माले केना संभव भऽ सकै छै?
राम किशुन-    से तँ ठीके, ऐ बातकेँ कियो नै काटि सकै अए। खाइर सर, चलैक आज्ञा देल जाए।
उमा शंकर-     बेस जाउ। जदी एहेन मोकीर फँसए तँ चुप्पेचाप हुनका नेने चलि आएब। अहुँकेँ कमीशन भेट जेतै।
राम किशुन-    ठीक छै सर, तँ चलै छी। (प्रस्थान)


पटाक्षेप।



छअम दृश्य

(भू-र्जन कार्यालयमे पदाधिकारी सुशील आ चपरासी बिन्देश्वर बैस कागत-पत्तर देख रहल छथि। तखने राम किशुनक प्रवेश।)

राम किशुन-    सुशील बाबू, प्रणाम।
सुशील-       प्रणाम प्रणाम, आउ बैसु।
(राम किशुन सुशीलक बगलमे बसि जाइ छथि।)
राम किशुन-    सुशील बाबू, की हाल- चाल छै?
सुशील-       नै बढ़ियाँ तँ ओते खराबो नै, बीचबिचौवामे छै। अपनेक की हाल-चाल?
राम किशुन-    ठीक छै सर। एन.एच. इंजीनीयर उमा शंकर बाबूसँ सभ काज नोटिसबला सुधार करा आनलौं। आब अपनेक काज रहलैए। इएह अछि तीनू नोटिस। लेल जाउ।
सुशील-       (नोटिस लऽ कऽ देखि आश्चर्यमे पड़ि) बाप रे बा, तीन लाख बीस हजारकेँ बत्तीस लाख, दस गुना अधिक। ई बिल हमरा पास कएल नै हएत, हम फँसि जाएब।
राम किशुन-    सुशील बाबू, अपने बड्ड डेरबूक छिऐ। हिम्मत हारि देबै तँ कोनो काज सफल नै हएत। कनी सोचियौ, देशक स्वतंत्रतामे केतेक हिम्मतक खगौट भेल हएत।
सुशील-       राम किशुन बाबू, अपने जे काज हमरा कहै छिऐ से देशक स्वतंत्रतासँ बड्ड हटल अछि। तँए हमरा मजबूर नै करू। हम जत्तै छी तत्तै रहए दिअ।
राम किशुन-    सुशील बाबू, चाहो-पान कटाउ ने। एतेक कियो कंजूश हुअए हाकिम भऽ कऽ।
सुशील-       बिन्देश्वर, जा दूटा चाह नेने आबह।
बिन्देश्वर-       सर, दुइएटा चाह आ हमर हिस्सा नै?
सुशील-       अखनि पाइक अभाव छै। तोँ दोसर दिन पीब लिहऽ
राम किशुन-    बिन्देश्वर, सरकेँ अखनि पाइक अभाव छन्‍हि। हमहीं पाइ दऽ दइ छिअ, तीनटा चाह नेने आबह। (राम किशुन बिन्देश्वरकेँ पाइ देलखिन आ उ चाह आनै लए बहराएल।) सुशील बाबू, अपने बत्तीस लाखक बिल पास कऽ हमरा चेक दऽ दिअ। अहाँकेँ खुश कके जाएब।
सुशील-       बड्ड जिद्द करै छी तँ बाजू, हमरा केते देब?
राम किशुन-    अहीं बाजू, केते लेब?
सुशील-       हम तँ बाप जनममे आइ धरि घूस नै लेलौं किनकोसँ। तैयो बाजह पड़ए। दस हजारसँ कम नै लेब।
राम किशुन-    हम देब, अबस्‍स देब।
सुशील-       अखनि लाउ। तहन काज करब। (राम किशुन सुशीलकेँ पचास हजार टाका दऽ दइ छथि। सुशील गिनै छथि।) धोखासँ बेसी आबि गेल चालीस हजार। ई चालीस हजार लेल जाउ।
राम किशुन-    कहने रही ने हम अहाँकेँ खुश कके जाएब। पाइ हम आपस नै लेब। अहाँ राखु। हम चालीस हजार अपनेकेँ इनाम देलौं हेन कंठी तोड़ैके। अँए यौ, जाइतो गमेलौं आ सुआदो नै पौलौं।
सुशील-       धन्यवाद अपनेकेँ। अपने हीरा छी हीरा। (बिन्देश्वरक चाह लऽ कऽ प्रवेश) बड्ड देरी लगलह बिन्देश्वर।
बिन्देश्वर-       दोकानपर आइ बड्ड भीड़ छेलै। संगे अहाँ सभकेँ किछु तरपेस्की गप सेहो करैक छेलए ने। सभटा ने सोचए पड़ै छै।
सुशील-       हुअ, जल्दी चाह पीअ फाइल नं. 21 नेने आबह। (तीनू गोटे चाह पीब रहल छथि। बिन्देश्वर चाह पीब गिलास रखि‍ फाइल नं. 21 आनि कऽ सुशीलकेँ देलकनि। सुशील लिख-पढ़ि कऽ चेक तैयार कऽ देलनि।)
बिन्देश्वर, ऐ चेकपर मोहर दहक।
बिन्देश्वर-       सरकेँ, मोहर दियाइ एक हजार एक टाका लगतनि। चेक बड्ड भारी छै। बाप रे बा, बत्तीस लाख।
सुशील-       पहिने तो मोहर दहक ने, अबस्‍स भेटतै। (बिन्देश्वर मोहर दऽ चेक राम किशुनकेँ देलक।)
राम किशुन-    बाजह बिन्देश्वर केते लेबहक?
बिन्देश्वर-       (हँसि कऽ) कहलौं तँ एक हजार एक। (राम किशुन पाँच हजार टाका बिन्देश्वरकेँ देलनि।) धन्य छी सरकार, धन्य छी। अपने साक्षात् महादेव छी।
राम किशुन-    सभ इंजीनियर साहैब आ सुशील बाबूक असीम किरपाक फल छी। बेस, आब चलैक आज्ञा देल जाए।
सुशील-       बेस, जय रामजी की।
राम किशुन-    जय रामजी की। (प्रस्थान)

पटाक्षेप।


सातम दृश्य

(लखनक बेटा रामलाल,काका राम किशुन ऐठाम बरण्डापर बैस पेपर पढ़ि रहल अछि। अही क्रममे राम किशुन, लखन आ सियारामक पूर्ण भुगतान सम्‍बन्‍धी समाचार पढ़ि दौग कऽ गेल अपन बाप आ काका सियारामकेँ कहैले।)

रामलाल-       बाबू- बाबू, एगो गप बुझलिऐ। (खुशीसँ)
लखन-        नै, कोन गप? (आश्चर्यसँ)
रामलाल-       अहाँ तीनू भाँइकेँ एन.एच.बला पूरा भुगतान भऽ गेल।
लखन-        ठीके बौआ! के कहलकह?
रामलाल-       कियो नै कहलनि। पेपरमे निकलल छै। अखने पढ़लौं राम किशुन काका ऐठाम। तीन भाँइक नाओं लिखल छै।
लखन-       बौआ, सियारामो काकाकेँ कहि दैतहक ने।
रामलाल-       अपनेसे कहि दियनु।
लखन-        जा, बजा आनहक। हमहीं कहि देबै।
(रामलाल अन्दरसँ सियारामकेँ बजा आनैए।)
सियाराम-      की भैया? की कहलौं?
लखन-        कहाँदुन अपना तीनू भाँइक पूरा भुगतान भऽ गेल छै। बुझबो केलहक?
सियाराम-      नै बुझलिऐ। के कहलनि?
लखन-        कहाँदुन पेपरमे निकलल छै। बौआ पढ़लक अपने।
सियाराम-      ठीके बौआ?
रामलाल-       ठीके नै तँ झूट्ठे। हम अपने पढ़लौं। काका, जखनि अपना सबहक भुगतान भऽ गेलै तँ राम किशुन काकाकेँ कहियनु जे अपना सबहक पाइ बाँटि दैथ। कारण अपना सभकेँ आही पाइसँ जमीन आ घरक जोगार हएत। आब एन.एच कखनो घर तोड़ि जमीन खाली कराए सकै अछि। अपन सहचेती तँ बड्ड आवश्यक अछि।
सियाराम-      रामलाल, राम किशुनकेँ तगेदा करैक खगता नै छै। जदी भुगतान भऽ गेल हेतै तँ ओ अपने सबहक हिस्सा पाइ बाँटि देता। हमरा हुनकापर पूरा बिसवास अछि। की भैया?
लखन-        एहेन भाए तँ भगवान सभकेँ देथुन। अपना सभकेँ हरबड़ाइ कऽ नै छै। अपना सबहक सभटा चिन्ता हुनका अपने हेतनि।
रामलाल-       बाबू, अपने जे कहियौ मानहि पड़त। मुदा हमरो कहबपर कनी धि‍यान देबै।
लखन-        अखनि तो धिया-पुता छह। ऐ सभमे नै पड़ह।
रामलाल-       वोटर लिस्टमे हमर नाओं अछि। हमरा अधिकार अछि अहाँकेँ उचित बात कहैके। माननाइ वा नै माननाइ अहाँक काज अछि।
लखन-        तोँ अपन उचि‍त बात अपने लग राखह। हमरा नै पढ़ाबह। तोँ जा, अपन काज करह।
(रामलालक प्रस्थान)
छौड़ा आब बेसी बुझए लगल हेन।

पटाक्षेप।




आठम दृश्य

(राम किशुन अपन बरन्डापर बैस पेपर पढ़ि रहल छथि। तखने रामलालक प्रवेश)

रामलाल-       काका गोर लगै छी। (पएर छूबि प्रणाम केलक।)
राम किशुन-    खुश रहू। की बात बौआ?
रामलाल-       काका, अपना सभकेँ एन.एच.बला पूरा भुगतान भऽ गेलै की?
राम किशुन-    के कहलक बौआ? (गंभीर भऽ)
रामलाल-       काल्हि हम पेपरमे पढ़लिऐ अहीं ऐठाम। अहाँक, हमर बाबूक सियाराम कक्काक नाओं देल छेलै।
राम किशुन-    से तँ हमहूँ पढ़लौं? ओइमे लिखल छेलै जे राम किशुन, लखन आ कागत-पत्तर पूर्ण ठीक- ठाक अछि। तँए हिनका सबहक पूर्ण भुगतान जल्दी हेबाक चाही। भुगतान भऽ जेतै तँ हम अपने सभकेँ बाँटि देबनि। (लखन आ सियारामक प्रवेश) बौआ राम सेवक, राम सेवक।
राम सेवक-     (अन्दरसँ) इएह एलौं पापा। (राम सेवकक प्रवेश) की पापा? मम्मी कहलनि जलखै कऽ लइ लए
राम किशुन-    असगरे हमहींटा करबै। काका सभ जे आएल छथि, हुनका नै करेबनि। जाउ, चारि ठाम जलखै एत्तै नेने आउ। (राम सेवक अन्दर जा कऽ पहिने चारिटा खलिया गिलास आ जगमे पानी भरि कऽ आनि टेबूलपर रखलक। फेर दू बेरमे चारि ठाम जलखै आनि टेबूलपर रखलक। सभ कियो जलखै कऽ रहल छथि।) लखन भैया, रामलालकेँ अहीं पठेने रहिऐ भिनसरे भिनसर?
लखन-        (मुड़ी डोला कऽ ) उँ हूँ। नै तँ। हमरा एकरा कोनो गपो नै अछि।
सियाराम-      पहिने जलखै कऽ लिअ तहन गप-सप्‍प करब। (सभ कियो जलखै कऽ पलेटमे हाथ धोलनि। राम सेवक चारूटा पलेट, गिलास आ जग अन्दर रखि‍ आबि साफी लऽ कऽ टेबूल पोछलक।)
राम किशुन-    राम सेवक, बस भऽ गेलै। ऐसँ आगू किछु नै?
राम सेवक-     चाह बनै छेलै पापा, देखै छिऐ।
राम किशुन-    जल्दी देखियौ (राम सेवकक प्रस्थान फेर ट्रेमे चारिटा चाह लऽ कऽ प्रवेश) राखु बौआ, अहाँ जाउ। (राम सेवकक प्रस्थान) (सभ कियो चाह पीब रहल छथि आ गप-सप्‍प सेहो करै छथि।) लखन भैया, एन.एच.बला काज बड्ड झनझटिया काज छै। हाकिमो सभ बड्ड हरामी छै। गुदाइन्ते नै रहै छै। कहलौं एम्हर तँ टेरल ओम्हर। काज प्रक्रियामे छै। जदी भुगतान भऽ जेतै तँ हम अपने अहाँ दुनू भाँइक हिस्सा बजा कऽ बाँटि देब। (मुस्‍कीआइत) मुदा अहाँक बेटा रामलाल हमरा भिनसरे-भिनसरे तगेदा कऽ देलक। हमरा बड्ड खराप लगल।
लखन-        तैं हम दुनू भाँइ सहटि कऽ तोरा लग एलौं। देखलिऐ एकरा तोरा दरबज्जा दि‍स घुमैत। खाइर, गलती हमरेसँ भेलह। माफ कऽ दहक। छौड़ा पागल छै। ऐ पगलापर धियान नै दिहक। जखनि हम काइम छी तँ ई के? (रामलाल आँखि बाप दि‍स लाल-पीअर करैत प्रस्थान)
सियाराम-      (राम किशुनसँ) हौ, छौड़ा एतेटा भऽ गेलै आ एक्को पाइक उपति नै करैए। हरिदम नरहेर जकाँ एम्हरसँ ओम्हर बौआइत रहैत अछि। चाहो- पानक खर्चा लेल बापेकेँ सोधैए। केकरासँ कोन बात करी आ केना करी, से बुधि तँ छैहे नै आ कहैत रहत जे हमरासँ काबिल कि‍यो नै छै दुनियाँमे। छोड़ह ओकरा गपपर धियान नै दहक।
राम किशुन-    अहीं सभ बाजू जे अहाँ सबहक प्रति हमर केहेन श्रद्धा आ सिनेह अछि?
सियाराम-      एहेन भाए साए धर दुश्मनोकेँ होइ। एते मेल-मिलापसँ दियादीमे रहनाइ आइ काल्हि साधारण गप छै की? तइ दियादपर उ छौड़ा पगला, दोख लगाबए?
राम किशुन-    छोड़ू भैया, धिया- पुता छै। अपना सभ ठीक रहूँ तँ सभ ठीके रहत। आब गप-सप्‍प छोड़ल जाए। हमरा कनी जेबाक अछि भू-र्जन कार्यालय। बिलम भऽ रहल अछि।

पटाक्षेप।



नअम दृश्य

(लखन आ सियाराम दुनू भाँइ लखनक दलानपर बैसल छथि। दुनू भाँइ जमीन आ घरक सम्‍बन्धमे गप-सप्‍प करै छथि।)

सियाराम-      भैया, सुनै छिऐ जे ऑफिसमे घूसपर उनक दून पाइ उठबै जाइ अए। जेकरा एक लाखक नोटिस छेलै से घूस दऽ कऽ दस लाख उठौलक। सौंसे हल्ला छै। हमरबला नोटिस एक लाखक छेलै तोहरबला नोटिस केते कऽ छेलह भैया?
लखन-        हमरबला भरिसक अस्सी हजारक छेलै।
सियाराम-      राम किशुन तँ बड्ड जोगारी छथि। उ तँ अपन जोगारमे पाछू नै हटल हेता। (मोँछ पीजबैत) चलह, लोटिया बुरि जेतै तँ पाँचो लाख हमरा भेटबे करत आ तोरा चारि लाखसँ कम नै।
लखन-        तखनि लगैए जमीन आ घर दुनू भऽ जाएत हमरा आ तोराे बढ़ियाँ जकाँ भऽ जेतह।
सियाराम-      एक्को लाख कट्ठे जमीन भेटतै तँ दू कट्ठा जमीन लऽ लेब आ तीन लाख मकानमे लगाए देबै।
लखन-        हमरा तँ ओइमे से कर्जो-बर्जो झाड़बाक छै। हम ओतेक जमीन नै लेबै। मुदा मकान बढ़ियाँ बनेबै। (मन बिधुएने राम किशुनक प्रवेश) बैसह बौआ, बैसह।
राम किशुन-    की बैसब भैया। मुड ऑफ अछि। सभ हाकिम हरामी अछि, चोट्टा अछि। घूसो बड्ड लऽ लेलक आ काजो नै केलक तेहेन। (बैस जाइ छथि।)
एन.एच.बला पेमेन्ट तँ भेल मुदा ऽ ऽ ऽ।
सियाराम-      मुदा की?
लखन-        हरामी सभ कुकुर होइ छै। नमहर धोखा देने हेतै।
राम किशुन-    चोट्टा हाकिम बात केलक दस गुना बढ़ा कऽ पेमेंट करब आ ओइ लोभे घूसो बड्ड लगि गेल। मुदा पेमेंट नोटिसक आधारपर भेल। तखनिसँ अक्क-बक्क नै फुराए रहल अछि। ओतबे पाइसँ हम की करब आ अहाँ सभ की की करबै। हाथो तरसँ गेल आ लातो तरसँ चलि गेल।
सियाराम-      की केना भेलह?
राम किशुन-    (अफसोच करैत) कहल नै जाइए। तैयो नै कहब तँ बुझबै केना?
लखन-        नशीबमे जतबे रहतह तैसँ बेसी नै भऽ सकै छह। की केना भेलै से बाजहक। आब पछता कऽ की हेतह?
राम किशुन-    सभ खर्चा-बर्चा काटि कऽ लखन भैयाकेँ पचास हजार हम देबनि आ सियाराम भैयाकेँ सत्तरि हजार देबनि।
सियाराम-      सभटा सोचलाहा- विचारलाहा पानिमे चलि गेलह भैया। कहै छै आप इच्छा सर्वनाशी देव इच्छा परम बलः।
लखन-        दहक जे देबहक से। कहुना विधाता पार लगेबे करथिन।
(राम किशुनक आँखिसँ नोर जा रहल छै आ ओ लखन आ सियारामकेँ पाइ गिन कऽ दऽ रहल छथि।)
राम किशुन-    अहाँ दुनू भाँइकेँ पाइ भेट गेल ने?
लखन-सियाराम- हँ, भेट गेल।
राम किशुन-    अहाँ सभ चिन्त नै करू। अहाँ सबहक पीठपर हम छी। जेतए धरि संभव हएत, हम अहाँ सबहक मदति तन-मन-धनसँ करैत रहब।
सियाराम-      तोहर ई वचन सुनि हम दुनू भाँइ गदगद छी।
राम किशुन-    आब जाइ छिअ भैया।
लखन-        बेस। (राम किशुनक प्रस्थान)
सियाराम-      संतोख करह भैया। की करबहक? कनियोँ- मनियोँ जमीन कीनि केहनो-मेहनो घर बना कऽ गुजर करब। कनी-मनी पाइक खगता हेतै तँ दुनू भाँइ राम किशुनेपर बजारबै की।
लखन-        तँ आन कोन उपए ठीके कहलह। (रामलालक प्रवेश)
रामलाल-       बाबूजी, राम किशुन काका आएल छेलखिन, की बात छेलै?
लखन-        एन.एच.बला पाइ देमए आएल छल।
रामलाल-       केते-केते भेटल?
लखन-        अपना पचास हजार आ सियाराम काकाकेँ सत्तरि हजार।
रामलाल-       बस बूझि‍ गेलौं मूस लगि गेल। मूस बड्ड जुआएल अछि। बेसी बुझैबला तीन ठाम गूँह मखै छै। कहब तँ लागत छक द। दुनियाँ केतए पहुँच गेल अछि से अहाँ जानै छिऐ पहिने?
लखन-        रामलाल, तोँ बेसी बुझै छहक। अपन बुझनाइ अपने लग राखह। बतहपनी छोड़ह आ जाह घुमह-फिरह।
रामलाल-       नीक कहै छी तँ बतहपनी बुझै छी। हमरा ऐ पेमेंटपर बिसवास नै होइए। हम आफिससँ भाँज लगबै छी। जदी पेमेंट ठीके हएत तँ कोनो बात नै। मुदा जदी गलत हएत तँ अघिकारक लेल हम अबस्‍स लड़ब।
लखन-        रामलाल, जे भेलै से भेलै। आब समून्द्र नै उपछबाक छह।
रामलाल-       हिस्सा लए हम लड़बे करब आ काल्हि ऑफिस जेबे करब। चाहे जे भऽ जाए।
लखन-        हमरा जे कहबाक छेलह से कहलिअ आ तोरा जे करबाक हेतह से करिहऽ। हम रोकिए देबह तँ तोँ थोड़हे मानबह।
सियाराम-      रामलाल, बाबू ठीके कहै छथुन। आब ऑफिसक चक्करमे नै पड़ह।
रामलाल-       हम ऑफिस जेबे करब, जेबे करब, जेबे करब।
पटाक्षेप।



दसम दृश्य

(भू-अर्जन कार्यालयमे पदाधिकारी सुशील आ चपरासी बिन्देश्वर बैस कऽ कागत-पत्तर उनटा रहल छथि। तखने रामलालक प्रवेश।)

रामलाल-       (सुशीलसँ) सर, प्रणाम।
सुशील-       की बात छियौ?
रामलाल-       सर, पेमेन्टक सम्‍बन्धमे बुझैक छेलै। पेपरमे निकलल छेलै।
सुशील-       जो, काल्हि आबिहेँ। आइ फुर्सतिक अभाव छै।
रामलाल-       (गिड़गिड़ा कऽ) हम बड्ड गरीब छी। अबै-जाइमे बड्ड पाइ लगै छै सर। हे हे सर, अपने बड्ड दयालु छिऐ। पएर पकड़ै छी सर, दाढ़ी पकड़ै छी सर। ऐ गरीबपर कृपा करियौ सर।
सुशील-       ऐ ऑफिसमे पएर-दाढ़ी पकड़लासँ काज नै चलै छै। एतए पैसा फेंकु तमाशा देखु बला भाँज छै। मालपर कमाल होइ छै। पाइ छौ संगमे?
रामलाल-       केते सर? (कनीकाल गुम्म भऽ)
सुशील-       एगो हरियरका पत्ता।
रामलाल-       केकरा कहै छै सर?
सुशील-       अखनि धरि ईहो नै बुझै छीही। लगै छेँ जे दू-चारिटा धिया-पुताक बाप रएहेँ।
रामलाल-       नै सर, बियाहो नै भेलए। बाबू कहै छथि जे एन.एच.बला पाइ भेटतौ तँ घरो बान्हब आ बियाहो कऽ देबह।
सुशील-       एगो निब्स लगतौ।
रामलाल-       निब्स केहेन होइ छै सर?
सुशील-       एगो दारू बोतलके निब्स कहै छै। से छौ?
रामलाल-       सर, चाह-पान कराए देब।
सुशील-       ओइमे नै हेतौ, जो भाग। (खिसिया कऽ)
रामलाल-       हे सर, कृपा करियौ एगो गरीबपर। गोर लगै छी सर, पएर पकड़ै छी सर।
सुशील-       संगमे केते पाइ छौ?
रामलाल-       बीसे टाका सर। भाड़ा लेल रखने छी।
सुशील-       ला, बीसेटा ला।
रामलाल-       तहन सर, गाम केना जेबै? बड़ी दूर छै सर।
सुशील-       पएरे चलि जइहेँ। ऊहो तोरा गरीबीपर कृपा करै छियौ। ला बीसेटा।
रामलाल-       (गिड़गिड़ा कऽ) सर, लइए लेबै। सर, चाह- पानमे दसे टाका लगितै।
सुशील-       (बड्ड बेसी खिसिया कऽ) तखनिसँ कपार चटैए। भगलेँ की नै भाग। नै तँ बीस टाका ला आ अपन काज बूझि‍ कऽ जो। (रामलाल सुशीलकेँ बीस टकही निकालि कऽ देलक) बिन्देश्वर, ई जे पुछै छह से बताए दहक।
बिन्देश्वर-       बाज, की पुछबाक छौ?
रामलाल-       सर, राम किशुन, लखन आ सियारामबला पेमेन्ट केते-केते भेलै?
बिन्देश्वर-       (फाइल उनटा कऽ देखि) आठलाख लखनक नामे, दस लाख सियारामक नामे आ चौदह लाख राम किशुनक नामे चेक राम किशुनकेँ देल गेल छन्‍हि‍।
रामलाल-       ओइमे राम किशुनकेँ बेसी-सँ-बसी खर्चा की भऽ गेल हेतनि?
बिन्देश्वर-       बड्ड बेसी तँ चालीस प्रतिशत।
रामलाल-       सर, हमरा बाबूकेँ आठ लाखक पेमेन्टमे राम किशुन काका पचास हजार देलखिन आ काकाकेँ दस लाखक पेमेन्टमे सत्तरि हजार देलखिन। ई उचित भेलै सर।
बिन्देश्वर-       ई उचित केतए अनुचितो नै, महानुचित भेलै।जो ओइ डकैतकेँ कसि कऽ पकड़।
रामलाल-       सर, अपने सभकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद। अपने सभ हमरा बड्ड पैघ उपकार केलौं। (रामलालक प्रस्थान)
सुशील-       बिन्देश्वर, राम किशुन गप-सप्‍पसँ बड्ड प्रतिष्ठित बुझाइ छल। मुदा अछि ओ बड़का दलाल। कहऽ तँ ओइ गरीबहाकेँ गरदनि‍ छोपि लेलक। जुलुम केलक।
पटाक्षेप।


एगारहम ट्टश्य

(लखन दलानपर सियाराम बैस कऽ जमीन आ घरक सम्‍बन्धमे किछु गप-सप्‍प कऽ रहल छथि।)

सियाराम-      जमीनक दर एक लाखसेँ कम केतौ नै छै अपना सभकेँ। महगाइ चरम सीमापर छै। जन मजदूरक रोज बड्ड बेसी भऽ गेल छै। ओइ सत्तरि हजारमे हम की की करब, किछु नै फुराइए। जाघरि एन.एच. घर नै तोड़ि रहल अछि सएह गनिमत अछि।
लखन-        हमरा तँ तोरोसँ कम छह भेटल। हमरा तँ और किछु नै फुराइ छह।
(रामलालक प्रवेश)
रामलाल-       (खिसिया कऽ) अहाँ सभकेँ कहै छेलौं तँ हमरा बताह बुझै छेलौं। मुदा जखनि अस्सल गप बुझबै तँ अहाँ सभ बताह भऽ जाएब आ दियादी सेहो छूटि जाएत।
लखन-        एहेन बात बजबे नै करह जइसँ खराप भऽ जाए।
सियाराम-      नै भैया, हदमदीसँ नीक काएए। अस्सल गप नै बुझबै तँ मनमे दुगदुग्गी रहत। बाजह रामलाल अस्सल गप की छै?
रामलाल-       ऑफिससँ बूझि‍ कऽ एलौं हेन। लखनक नाओंसँ आठ लाखक, सियारामक नाओंसँ दस लाखक आ राम किशुनक नाओंसँ चौदह लाखक चेक कटल छै जे राम किशुन प्राप्त केने छथि।
(ई सुनि सियाराम अचेत भऽ जाइ छथि।)
लखन-        (हरबड़ा कऽ) रामलाल, रामलाल, काकाकेँ की भऽ गेलह। जा दौगकऽ, पानि और बेना नेने आबह। ताबे हम गमछासँ हौंकै छियनि। (लखन गमछा हौंकि रहल छथि। तखने पानि आ बेना लऽ कऽ रामलालक प्रवेश।)
रामलाल-       तोँ बेना हौंकह काकाकेँ। हम आँखि मुँह पोछि दइ छियनि।
(दुनू बापूत सएह केलनि। किछु काल पछाति सियारामकेँ होश एलनि।)
रामलाल-       आब हम बेसी नै कहब। कारण काकाकेँ मन खराप भऽ जाइ छन्‍हि‍। मुदा एगो अबस्‍स कहि देब जे पेमेंटक चालीस प्रतिशत राम किशुन काकाकेँ खर्च भेल हेतनि। सेहो बेसी-सँ-बेसी। कम-सँ-कम अदहो पेमेंट अपना सभकेँ पुरेता तहन तँ सम्‍बन्ध राखबै। नै तँ कानूनक मदतिसँ हम हुनकासँ फरिया लेबै आ अपन-अपन पाइ लऽ कऽ रहबै।
लखन-        फेर तोँ बताह जकाँ करए लगलह। ओ छल-बल-कलसँ परिपूर्ण छथि। हुनकासँ कोनो चीजमे नै जीतबहक। सुहरदे मुहेँ एक बेर कहक। जदी देलकै तैयो बढ़ियाँ आ नै देलकै तैयो बढ़ियाँ। मुदा झगड़ा-झंझटिबला गप नै हेबाक चाही। सियाराम, अखनि राम किशुन घरेपर हेथुन। कनी बजेने आबह।
(सियाराम अन्दर जा कऽ राम किशुनकेँ बजाए आनै छथि। सभ कियो बैस कऽ गप-सप्‍प करै छथि।)
राम किशुन-    की कहलौं भैया?
लखन-        कहलिअ जे एन.एच.बला पाइ हमरा दुनू भाइकेँ ओतबे-ओतबे हेतै, की औरो हेतै? कहाँदुन पेमेंट बड्ड बेसी बेसी भेलैए।
राम किशुन-    अहाँकेँ के कहलक? (आश्चर्यसँ)
लखन-        हमरा रामलाल कहलक। उ अपने ऑफिससँ पता लगेलक।
राम किशुन-    की पता लगलै?
लखन-        कहक काकाकेँ, की पता लगलह?
रामलाल-       हमरा इएह पता लागल जे लखनक नाओंसँ आठ लाखक, सियारामक नाओंसँ दस लाखक आ राम किशुनक नाओंसँ चौदह लाखक चेक कटल छै। उ तीनू चेक अहीं प्राप्त केने छिऐ।
राम किशुन-    (अनठीअबैत) ई सभ झूठ छै। ऑफिस किछु कहि पार्टीकेँ टिरका दइ छै।
रामलाल-       नै काका, अपना आँखिसँ रजिस्टर देखलिऐ।
राम किशुन-    (मुस्काबैत) ई भए नै सकै छै जे ऑफिसक रजिस्टर पार्टी देखाए। तोँ फुसि बाजि हमरा भैयारीमे आगि लगबै छेँ। की भैया सभ, अहाँ दुनू भाँइकेँ बिसवास होइए जे हम एहेन गदे्दारी करब?
सियाराम-      से तँ बिसवास नै होइए।
लखन-        बिसवास तँ हमरो नै होइए।
राम किशुन-    अँए यौ, जै भाए लेल हम जान दइ ऽ तैयार रहै छी तेकरा संग हम गद्देदारी नै कऽ सकै छी। अहाँ सभ एकरा गपपर बिसवास करब तँ अपनामे इर्खा पेदा हएत। लोक हँसत। हमरो प्रष्ठिा चलि जाएत।
लखन-        हमरा ऐ बतहबापर बिसवास नै होइए। हमरा अहींपर बिसवास अछि।
राम किशुन-    (प्रसन्न मने) तहन अहाँ सभ निफीकीर भऽ जाउ। कोनो तरहक दिक्कत हुअए तँ हम छीहे।
रामलाल-       जदी हमरा अहाँ सभ बताहे बुझै छी तँ आब हम कानूनक शरण लेब। छोड़ब नै।
राम किशुन-    जेतए जेबाक हेतौ जइहेँ आ जे करबाक हेतौ करिहेँ। हा हा हा हाऽ ...

पटाक्षेप।




बारहम ट्टश्य

(अपन दलानपर रामलाल बैस कऽ किछु सोचि रहल छथि।)

रामलाल-       हे भगवती। एहेन बाप केकरो नै देबनि जे धिया-पुता जनमा ओकरा सड़कपर फेंक दैथ आ ओकर भवि‍सक सम्‍बन्धमे किछु नै सोचथि। बापक उचित हिस्सा मंगाबैले बेटाकेँ बलि पड़ि़ जाए। मुदा बाप टससँ मस नै हुअए। बाप हुए तँ एहेन। हा हा हा हा...। मुदा नै बापपर हँसनाइ उचित नै। मन होइए कनी राम किशुन ककेपर हँसितौं। हा हा हा हा...। मुदा ऐ हँसीसँ तँ सेहो काज नै बनत। (किछु सोचि कऽ) जाइ छी एगो दरखास सरपंचकेँ दइ छियनि।
(सरपंच,गंगाराम,लग रामलाल जा रहल अछि। गंगाराम अपन ओकील मोहनक संग अपन कोर्टमे बैस फाइल उनटा रहल छथि। तखने रामलाल गंगाराम लग पहुँचल। चपरासी पंचू ठाढ अछि।)
सरपंच साहैब प्रणाम।
गंगाराम-       कह बौआ, केतए एनाइ भेलै?
रामलाल-       अपने लग एलैं। एगो दरखास छै।
गंगाराम-       ला (रामलाल गंगारामकेँ दरखास देलक। गंगाराम दरखास पढि मोहनकेँ बढाए देलनि।)
ओकील साहैब, एकरा कहियाके समए दइ छियनि?
मोहन-        केस तँ बड्ड छै सरपंच साहैब। मुदा समए तँ दिहे पड़तै। अच्छा, अगिला रविकेँ तीन बजे दिनमे अहाँ केसक सुनवाइ हाएत। (मोहन दरखास पढै छथि।)
रामलाल-       बेस, हम जाइ छी। प्रणाम। (रामलालक प्रस्थान)
मोहन-        सरपंच साहैब, एन.एच. बहुत झगड़ाकेँ फरिया नै सकल; भरिया देलक। जे चलाक छल से बनि गेल आ मुँहदुब्बर सभ उपटि गेल। बरबरि‍ एहेन केस आबैत रहैए।
गंगाराम-       स्वार्थक कारणे लोकक नेत बड्ड गिर गेलैए स्वभाविक छै लोकमे टेन्सन हएत, झगड़ा हएत। ओकील साहैब, राम किशुनकेँ नोटिस कऽ दियौ। (मोहन नोटिस लिखि कऽ गंगारामकेँ देलनि। गंगाराम दसखत कऽ नोटिस मोहनकेँ बढाए देलनि।)
मोहन-        पंचू, पंचू।
पंचू-         जी सर। आज्ञा होइ सर।
मोहन-        ई नोटिस लए। ऐपर मोहर दऽ राम किशुन ऐठाम चलि जा। हुनका दऽ दिहक।
पंचू-         जे आज्ञा सर। तुरंत जाए रहल छी। (पंचू नोटिसपर मोहर दऽ राम किशुन ऐठाम जा रहल अछि।)
मोहन-        सरपंच साहैब, औझका कोर्ट खतम करैक समए भऽ गेल।
गंगाराम-       तहन अबस्‍स खतम कएल जाए।

पटाक्षेप।



तेरहम दृश्य

(राम किशुन ऐठाम लखन आ सियाराम तीनू भाँइ मिलि चाह पीब कऽ गप-सप्‍प करै छथि।)

लखन-        राम किशुन, आब चलै छिअ।
राम किशुन-    आइ बड्ड हरबरी देखै छी। की बात छै?
लखन-        हँ हँ हरबरी छैहे। कनी हटिया जेबाक छै आ एक आदमीकेँ कर्जा अदए करबाक छै।
राम किशुन-    बेस तहन जाउ। (लखनक प्रस्थान)
सियाराम-      दस धूर जमीन तँ लेलौं। बाप रे बा, ऐ नवटोल एत्ते महग जमीन ऐ परोपट्टामे नै हाएत। एन.एच. लऽ कऽ जमीनबला सभ जे अगधाइए जुनि पुछू।
राम किशुन-    से तँ ठीके कहै छिऐ। हमरा नै कीनए पड़ल तँए न, नै तँ हमरो भोंटी चहकि जइतए। धर-दुआर कहिया बना रहल छी?
सियाराम-      जल्दीए हाथ लगाएब। ओना ओतबिए पाइसँ हेतै नै। तोरो मदति करए पड़तह।
राम किशुन-    पहिने हाथ लगौ न। घटती-बढ़तीमे हम छीहे। (पंचूक प्रवेश)
पंचू-         राम किशुन बाबू, प्रणाम।
राम किशुन-    प्रणाम, प्रणाम। की हौ पंचू, आइ केम्‍हर-केम्‍हर घुमै छह?
पंचू-         अहीं लग तँ एलौं। सरपंच साहैब एगो नोटिस देलनि।
राम किशुन-    (आश्चर्यसँ) हमरा नोटिस देलनि। कोन नोटिस छिऐ? लाबह तँ देखिऐ। (पंचूसँ नोटिस लऽ कऽ राम किशुन मने मन पढि मोरिेकऽ जेबीमे रखलथि।)
पंचू-         जाइ छी राम किशुन बाबू।
राम किशुन-    (मुसकाकऽ) धूः मरदे, तूँ कोनो सभ दिन अबै छह। चाह पीब लए; तहन जइह। बैसह। (पंचू कुरसीपर बैस गेल।) राम सेवक, राम सेवक।
राम सेवकः-    (अन्दरसँ) जी पप्पा इएह एलौं।
राम किशुन-    एक कप चाह नेने आएब। (राम सेवककेँ एगो चाह लऽ कऽ प्रवेश।)
पंचू भायकेँ दियनु। (राम सेवक पंचूकेँ चाह देलक। ओ चाह पी रहल छथि) भैया, रामललबा ठीके बाति गेलैए,लगैए।
सियाराम-      से तोँ आइ बुझै छहक। की भेलै से?
राम किशुन-    उ छौड़ा तँ सरपंच साहैबकेँ पेटीशन दऽ देलक हन। आब कानूनमे आएल हन, अच्छा।
पंचू-         सर, आब हम जाइ छी।
राम किशुन-    जाउ। सरपंच साहैबकेँ कहबनि कनी घरेपर रहै लए। हम आबि रहल छी। (पंचूक प्रस्थान) भैया, अहाँ दुनू भाँइ कहि देबनि सरपंच साहैबकेँ जे हमरा सबकेँ पूरा पाइ भेट गेल। छौंरा अपने उल्लू बनि जाएत। बतहपनी छूटि जेतै। बाँकी अपना तीनू भाँइ बूझि‍ लेब।
सियाराम-      सएह हेतै। भैया, अहाँ संग रहथि वा नै रहथि हम तँ छीहे। ओना ऊहो रहबे करता।
राम किशुन-    अहाँ दुनू भाँइसँ हमरा अशो इएह रहाए। भैया, ताबे ई पाइ रखि‍ लिअ। अहाँकेँ आगू बड्ड काज अछि।
(किछु पाइ राम किशुन सियारामकेँ देलथि आ रखलथि)
सियाराम-      हम जाइ छिअ; कनी बाध दि‍स जेबाक अछि। घसबहिनी बड्ड उपद्रव करै छै। उ सभ मौसरीपर बड्ड छ करै छै।
राम किशुन-    तहन जल्दी जाउ। हमहूँ कनी सरपंच साहैबक ऐठामसँ आबै छी। (सियारामक प्रस्थान। राम किशुन रौह माछ लऽ कऽ गंगारामक ऐठाम जा रहला अछि। गंगाराम साधारण पोशाकमे घरपर कुरसीपर बैसल छथि। रामकिशुन गंगाराम ऐठाम पहुँचला।)
प्रणाम सरपंच साहैब।
गंगाराम-       प्रणाम, प्रणाम, आउ बैसू।
(रामकिशुन कुरसीपर बैसला।)
कहू, की हाल-चाल?
राम किशुन-    अपनेक किरपासँ बड्ड बढ़ियाँ। अपने नोटिस पठेने रहि‍ऐ। ओही सम्‍बन्धमे किछु गप-सप्‍प करै एलौं हेन।
गंगाराम-       बाजू, की कहए चाहै छी।
राम किशुन-    उ रमललबा जे छै से बताह भऽ गेलैए। माए-बापकेँ एको रत्ती नै गुदानै छै। बापोसँ कहाँ पटै छै। बापसँ एन.एच.बला पाइ टानि कऽ एम्हर-ओम्‍हर करए चाहै छै। हम रोकै छिऐ तँ हमरेपर उनटल रहैए।
गंगाराम-       उ छिऐ के?
राम किशुन-    हमरे पिति‍यौत भाय लखनक बेटा छिऐ। एहेन उपद्रवी नै देखल।
गंगाराम-       पेटीशनसँ आ गप-सप्‍पसँ तँ बताह नै बुझाइए।
राम किशुन-    कि‍यो सीखा-पढा देने हेतै। ओकर बाप ओकरा पक्षमे नै छै। आब ऐसँ बेसी की कहुँ। सरपंच साहैब, अहाँकेँ भेँट केला बहुत दिन भैयो गेल छेलए। गप-सप्‍पमे हम बिसरिए गेल रही। ई सनेश अपने ए आनलौं हेन।
गंगाराम-       (मुस्‍कीआइत) की आनलौं हेन?
राम किशुन-    ठकैएबला बुझू। एक दम छोट छीन सनेश।
गंगाराम-       कनी बाजि दैतिऐ तँ मनमे बड्ड संतोख होइतए।
राम किशुन-    कहैत तँ लाज होइए। तैयो कहि दइ छी। कनीटा रौह माछ।

गंगाराम-       बाप रे बाप; अहाँ केते कहै छेलौं छोट-छिन सनेश। ऐसँ पैध सनेश हमरा लेल किछु नै। केते दिनसँ आशा पेरी ताकैत रही जे कोनो मोकीर फँसए। जाउ केसमे अहाँकेँ डिगरी भऽ गेल।
राम किशुन-    हा हा हा हा...। हम तँ ई बुझिते रही जे सरपंच साहैब हमरा नै छोड़ता। सर, अपने ई पाइ रखि‍ लैतिऐ तँ बड्ड नीक होइतै। (एक सए टाका निकालि कऽ बढ़बै छथि।)
गंगाराम-       ई कोन पाइ दइ छी हमरा; घूस-तूस यौ। रामक नाओं लिअ। हम कोनो ऐरी-गैरी आदमी छी। ऐ नवटोल पंचाइतक सरपंच छी। सरपंचक प्रतिष्ठा आ एगो जजक प्रतिष्ठा दुनू बरबरि‍ए होइ छै। (राम किशुन चारि सए और निकालि पाँच सए टाका बढ़बै छथि।)
राम किशुन-    सरपंच साहैब, अपने जल्दी औगता जाइ छिऐ। हम अहाँकेँ घूस नै दऽ रहल छी। हम रौह माछक तीमन हेतु नून-तेलक दाम दऽ रहल छी।
गंगाराम-       हँ, ई भेल प्रतिष्ठाक बात। तहन किए नै लेब? लाउ। (पाँच सए टाका गंगाराम लेलथि।) सच्चो कहै छी। अपने हीरा आदमी छी।
राम किशुन-    आब चलैक आज्ञा देल जाउ सर।
गंगाराम-       बेस। (राम कि‍शुनक प्रस्‍थान।)
ऐ पंचाइतमे हमरासँ बेसी प्रतिष्ठा किनको नै भऽ सकै छन्‍हि। कहू तँ, एहेन के हेता जिनका सनेशमे माछ तहूमे रौह आ नून-तेल दाम भेटन्‍हि?

पटाक्षेप।



चौदहम दृश्य

(सरपंचक कोर्टमे गंगाराम, मोहन, पंचू, रामलाल, लखन, सियाराम, राम किशुन आ बीरू उपस्थित छथि।)

गंगाराम-       रामलाल, तोँ बाज। की कष्ट छौ? पेटीशन किए देने छेलही?
रामलाल-       सरपंच साहैब, एन.एच.बला पेमेन्ट हमर बाबूजीक नाओंसँ ऑफिससँ आठ लाखक पास भेलै जेकर चेक काका राम किशुन प्राप्त केलनि। ऐ आठ लाखमे हमरा बाबूकेँ मात्र पचासे हजार किए देलखिन काका?
मोहन-        ऐ पेमेन्टक कोनो सबूत अहाँ लग अछि?
रामलाल-       नै, हमरा लग कोनो सबूत नै अछि। हम अपने भू-र्जन कार्यालयसँ बूझि‍ आएल छी अपना आँखिसँ फाइल देखने छी।
मोहन-        की, राम किशुन, रामलालक कहब केतए धरि साँच अछि?
रामकिशुन-     एकर कहब सोलहन्नी झूठ अछि। एकर बाबूसँ पूछल जाए जे केतेके नोटिस रहै हुनका केते भेटलनि?
मोहन-        (लखनसँ) अपने बजीऔ केतेकक नोटिस रहए आ केते पाइ भेटल?
लखन-        अस्सी हजारक नोटिस रहए। तैमे हमरा राम किशुन पचास हजार देलखिन।
मोहन-        राम किशुन, पचास हजार बला गप तँ रामलालो कहने छल। तहन अहाँ केना कहलिऐ जे एकर कहब सोलहन्नी झूठ अछि?
बीरू-         सर, ओत्ते धरबै तँ भेल्लै। लोक बाजै क्रममे अहि‍ना बाजि दइ छै।
मोहन-        अहि‍ना बाजि पार्टी केसो हारै छै ने?राम किशुन, अस्सी हजारमे पचास हजार देलियनि?
रामकिशुन-     हम अपना घरसँ दैतियनि? अस्सी हजारक 25% घूस ऑफिसेमे लगि गेल। एकर अलावे आँफिस एनाइ -जेनाइमे लागल दस हजार। हमर मेहनति तँ पानिमे जाए। लखनकेँ वा रामलालकेँ पुछियनु जे ई काज कराबैमे कहियो पाँचो नया पाइ देलखिन?
मोहन-        की यौ लखन? की रामलाल?
लखन-        नै, हम एको नवका पाइ नै देलियनि।
रामलाल-       हमहूँ नै देलियनि।
गंगाराम-       ओकील साहैब, लखनकेँ पुछियनु जे राम किशुनसँ पचास हजार टाका पाबि ओ संतुष्ट छथि की नै?
मोहन-        की यौ लखन? अहाँ बाजू, पचास हजारसँ संतुष्ट छी की नै?
लखन-        हम संतुष्ट छी।
मोहन-        तहन रामलालक केसमे जान नै रहलै।
रामलाल-       हमर बाबू मुरूख छथि। न-छ नै बुझै छथिन। सभ किछुमे हँए कहता। पुछबनि गाए बिएलौ तँ हँ आ बरद बिएलौ तँ हँ।
मोहन-        अहों की कहए चाहै छी, रामलाल?
रामलाल-       हम इएह कहए चाहै छी जे कक्काक पासबुक (बैंकबला) इन्क्वाइरी कएल जाए। ओइसँ बुझा जाएत जे केते झूठ बाजै छी।
गंगाराम-       नै तोहर बाबू तोरा पक्षमे छथुन आ नै तोरा लगमे कोनो सबूत छौ। तहन राम किशुनक पासबुककेँ कोन आधारपर इन्क्वाइरी करिऐ। कानूनकेँ तँ चाही सबूत। हमर अदालत ऐ निष्कर्षपर पहुँचलौं जे राम किशुनकेँ ऐ केसमे डिग्री भेलनि पंचैती खतम भेल।
(रामलाल, सियाराम, लखन, बीरू आ राम किशुनक प्रस्थान।)

पटाक्षेप।



पनरहम दृश्य

(लखनक ऐठाम लखन,लक्ष्मी आ रामलाल आपसमे गप-सप्‍प करै छथि।
लखन आ लक्ष्मी बैसल छथि आ रामलाल ठाढ़ छथि।)

रामलाल-       माए, बाबूकेँ पुछहुन जे हम हिनके अधिकार लए लड़ि रहल छी। तइले ई हमरा बताह बुझै छथि। पंचैतीमे हमरा पक्षमे नै रहला। फल ई भेल जे हम हारि गेलौं। कनी तूँ हिनकासँ पुछहीन जे एना किए करै छथिन?
लक्ष्मी-        बौआकेँ केतए गलती छै जे एकरा बताह बूझि‍ संग नै दइ छिऐ? (लखन अबाक भऽ जाइ छथि।) अपने किए नै किछु बाजै छी।
लखन-        हम की बाजौं, केतए राजा भोज आ केतए गंगू तेली। अँए गै, पहाड़सँ टकरेबीहीन तँ के थौआ हेतै? तूँ ही बाज तँ।
लक्ष्मी-        ऐ के मतलब राजा भोज गंगू तेलीकेँ गामसँ उजारि कऽ भगाए देतै आ समाज देखैत रहतै। सएह ने।
लखन-        केकरो कि‍यो देखैबला नै छै। सभ अपना-अपनामे लागल छै। ठनका ठनकै छै तँ सभ अपन-अपन माथपर हाथ राखै छै।
लक्ष्मी-        जखनि केकरो कि‍यो नै छै तँ तूँ अपन पितीयौतपर भरोस किए करै छह?
लखन-        की करबै, नै मामा से कनहा मामा।
लक्ष्मी-        एगो गप कहिह
लखन-        कहिते तँ छेँ और कहैक मन छौ तँ कह।
लक्ष्मी-        रमललबाकेँ जे जनमौलहक तेकर पैतपाल सेहो हमरे-तोरे करैक अधिकार छै। मुँहमे ऊक ओएह देतह तहने पैत हेतह; राम किशुनसँ कोनो पैत नै।
लखन-       की कहऽ चाहै छेँ? खोलि कऽ कह। तोरा एते हम नै बुझै छिऐ।
लक्ष्मी-        बौआ, तूँ की चाहै छह, खोलि कऽ बाबूकेँ कहक।
रामलाल-       बाबू मानथुन थोरहे। तखनि हम अपन करतब करै छियौ। बाबूकेँ कहुन जे ओ राम किशुन कक्काक संग छोड़ि आ अपन अधिकार-कर्तव्यपर धि‍यान दैथ।
लक्ष्मी-        सुनै छहक कीने?
लखन-        (खिसिया कऽ) कान मुँहमे घोंसिया दिऐ। बहीर छी की?
रामलाल-       हम एगो पेटीशन एस.डी..केँ आ दोसर कलक्टरकेँ देबै। दुनूपर बाबूकेँ दसखत करए पड़तनि आ हमरा संग दिअ पड़तनि।
लखन-        से तँ नै भऽ सकै छौ। एकरा पुछहीन तँ हम एकर बाप, की ई हमर बाप।
रामलाल-       जदी अहाँ अस्सल बाप रहितौ तँ हमरा एना अहाँक जीवैत नै परेशानी उठबए पड़ितए।
लखन-        तेकर माने हम नकली बाप छी।
रामलाल-       हँ यौ हँ।
लक्ष्मी-        बौआ, औगताबह नै।
लखन-        चोट्टा कहीं के। जो सार, तोरासे हमरा कोनो माने मतलब नै। जो हरामी एतएसँ मरि जो कटि जो।
रामलाल-       (खिसिया कऽ) सार कहैत कनीओ लाज नै होइए अहाँकेँ? छिः! छिः! लोक हँसत, लोक थुकत।
लखन-        कोन सार हँसत? कोन सार थुकत? केकरो राजमे बसल छिऐ।
रामलाल-       आब हमरा संग लोकोकेँ गरियाबए लगलिऐ अहाँ। कियो आबि कऽ किछु कऽ दिअए वा कहि दिअए, तँ मन केहेन हएत?
लखन-        ओइ सारकेँ देख लेबै, ेते माए दूध पीएने छै? मुदा तूँ भाग ऐठामसँ, हमर। सोझहासँ।
रामलाल-       हम अहाँ कहने नै भागब। माए कहि देत तँ दुनियाँ चलि जाएब।
लखन-        गै लक्ष्मी, कही एकरा एतएसँ चलि जाइ लए।
लक्ष्मी-        हम तँ एकर कोनो गलती नै देखै छिऐ तँ केना कहबै चलि जाइ लए। हम तँ अहीं के गलती देखै छी।
लखन-        (खिसिया कऽ)- हमर गलती छै, हमर गलती छै।
(झोंटा पकड़ि खसाए लातसँ लखन लक्ष्मीकेँ खूब मारै अछि। रामलाल पकड़ैए तँ ओकरो थोपराबए लगै अछि।)
रामलाल-       माए, बाप चलते गम कसने छियौ नै त ऽ ऽ ऽ।
लक्ष्मी-        मरि गेलौं, मरि गेलौं। ई चण्डलबा आदमी नै छी जानवर छी।
लखन-        (हकमैत आ मारनाइ छोड़ि‍ कऽ हकमैत) हमर बौह आ कहैए अहींकेँ गलती। हम चण्डाल छी, जानवर छी।
            (फेर सनकिकऽ जा लक्ष्मीकेँे हाथ-पएरसँ ओंघरा कऽ खूब मारैए।)
लक्ष्मी-        (जोर-जोरसँ) माए गै, बाप रौ, मारि देलक चण्डलबा।
            (रामलाल ई दृश्य देख कनैत-कनैत अन्दर चलि गेल।)
लखन-        आइ नै छोड़बौ हरमजादी। आइ साफ कऽ देबौ। तूँही ऐ छौड़ाकेँ चढ़ा-बढ़ाकेँ तूल कऽ देने छेँ।
            (और बेसी मारए लगैए लखन लक्ष्मीकेँ)
लक्ष्मी-        बौआ रौ बौआ, रमललबा रौ रमललबा। आब नै जीअ देतौ रौ रमललबा, बौआ आबो बँचा। आह! ओह! आह! (रामलालक प्रवेश पूर्ण खिसियाएल मने)
रामलाल-       (माएकेँ छोड़बैत बापकेँ पटकि छातीपर बैस कऽ) हरामी बाप कहीं के। आब बाजू,कोन बाप काज देत? अखनि हम हरमपनी निकालि दी। (लखन अबाक रहैए। ओकरा सस-बस नै चलै छै।)
एहेन सहनशील माएकेँ ई दुर्दशा केलिऐ। एहेन बाप मरि जाए तँ चेनसँ जीअब। हरामी कहींके।
लखन-        कटहर लिहेँ। सभटा घँसि देबौ राम किशुनकेँ। फरियाबैत रहिहेँ जिनगी भरि।
रामलाल-       अखनि निशान दिअ पड़त सौदा कागतपर।
लखन-        ऐ जिनगीमे तँ नै हेतौ। दोसरो जिनगीमे हेतौ की नै हेतौ। राम किशुनकेँ घँसबै-3
रामलाल-       अखनि निशान दिअ पड़त। नै तँ हमर दोष नै।
लखन-        तोरा बुते जे कएल हेतौ से कर। हमरा नै कानूनक डर आ नै जेहलक। रामकिशुन कथीलए छै। एक्के चुटकीमे मीर कऽ नोइस बना देतौ।
रामलाल-       माए, तूँ अन्दर जा कऽ सौदा कागत आ कजरौटी नेने आ। (लक्ष्मी आह ओह करैत अन्दर जा कऽ सौदा कागत आ कजरौटी
आनलथि।) अखनि अहाँ तुरन्त ऐपर निशान दिअ नै तँ देख लियौ अहाकेँ जान हमरा हाथमे अछि। (रत-रत करैत बड़का चक्कू रामलाल देखाबै अछि लखनकेँ।)
लखन-        ला कागत, कऽ दइ छियौ। ला कागत ला।
रामलाल-       माए, ओंठा निशान लऽ ले चारू- पाँचू कागतपर।
लखन-        एगो से बेसीपर नै देबौ।
रामलाल-       सभटापर दिअ पड़त नै तँ बतहबाक हाथे जान चलि जाएत।
(गरदनि‍मे चक्कू सटबै अछि।)
लखन-        अच्छा ला, दऽ दइ छियौ। जए गोपर निशान लेबेँ तए गोपर दऽ दइ छियौ।
रामलाल-       पाँच टा कागतपर निशान दिअ पड़त।
लखन-        ले निशान ले। मुदा जानसँ नै मार।
रामलाल-       माए, पाँचूटा कागतपर निशान लऽ ले। आगू बड्ड काज देतौ।
(लक्ष्मी पाँचूटा कागतपर निशान लेलनि।)
लक्ष्मी-        निशान लेल भऽ गेलह बौआ।
रामलाल-       माए,तूँ अन्दर चलि जो।
लक्ष्मी-        तूहूँ चलह। आब छोड़ि दहक हटबह।
रामलाल-       तोहर आज्ञा छौ तँ छोड़ि दइ छियनि। नै तँ ऽ ऽ...। बेस चल।
(लक्ष्मी आ रामलालक प्रस्थान। लखन उठि कऽ ठाढ़ भऽ जाइए।)
लखन-        सार कटहर लेत। सभटा कागत रखले रहि जाएत। राम किशुनसँ कत्थीमे हाथ मिलेतै।


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पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २२४ म अंक १५ अप्रैल २०१७ (वर्ष १० मास ११२ अंक २२४)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -    मैथिलानी केर उपराग राम सं आ समाज ...