Monday, November 11, 2013

‘विदेह' १४१ म अंक ०१ नवम्बर २०१३ (वर्ष ६ मास ७१ अंक १४१) PART I

                     ISSN 2229-547X VIDEHA
विदेह' १४१ म अंक ०१ नवम्बर २०१३ (वर्ष ६ मास ७१ अंक १४१)  

 

अंकमे अछि:-

हमर टोल- राजदेव मंडल
बाप भेल पि‍त्ती अधिकार- बेचन ठाकुर


भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली]


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हमर टोल







राजदेव मंडल


आमुख-
कल्‍प, यर्थात, स्‍वप्नक तल
माछक जालमे लोक फँसल
माछ पुछैत अछि‍- कीयौ भाय?
लोक कहैत- कि‍छु कहल ने जाए।
हमरे हाथसँ जाल बनल
हमरेपर अछि‍ आब तनल।

समस्‍त मि‍थि‍लांचल
केँ
समरपित...

सुधी पाठक वृंद-
सम्‍मुख ठाढ़ छी लऽ कऽ सुमन
शत-शत नमन
शत-शत नमन।

(नाओं, स्‍थान, घटना आदि‍ कल्‍पनापर आधारि‍त अछि।‍)


पूर्वरूप : ()

अहाँ वसुंधराक कोनो कोनपर छी। ई हमर आत्‍मवि‍श्‍वास कहि‍ रहल अछि।‍ अहाँक नै देखि‍तो हम देखि रहल छी। अहाँक उपस्‍थि‍ति‍क ज्‍योत्‍सना हमरा चारूभर आभासीन भऽ रहल अछि‍। आर ओइ ज्‍योति‍सँ हमर रोम-रोम पुलकि‍त भऽ रहल अछि‍। हमहूँ तँ ओइ नृत्‍यलीलाक अंश छी।
हम बुभुक्षि‍त छी अहाँक सि‍नेह आ आशीरवादक लेल।
हमरा क्षमा नै करब तँ दण्‍ड दि‍अ। कि‍न्‍तु बि‍सरू नै। यएह कामना अछि‍।
अहाँक स्‍मरण कऽ कि‍छु रचबाक प्रयत्‍न कऽ रहल छी।

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()

वि‍शाल सागरक पसरल जलपर धनुकटोली ठाढ़ अछि‍। की ओ हँसि‍ रहल छै? आकि कानि‍‍ रहल छै?
लगैत अछि‍ जेना रंग-बि‍रंगक जलमे ओ उगि‍ आएल अछि‍। चारूभर उड़ैत सुगन्‍धि‍त धुइयाँ। मुँह आ देहमे लटपटाइत बादल जकाँ कारी आ उज्‍जर धुइयाँ। आ लगैत छै जे ऊ आकृति‍ रसे-रस बढ़ि‍ रहल हो। गाम-नगर-महानगर सभटा आकृति‍क भीतर ढुकल जा रहल हो। नजरि‍क जे एकटा बि‍स्‍तार होइ छै, सेहो जेना ओकरा सोझहामे छोट भेल जा रहल छै। ओकरा नि‍साँससँ नि‍कलैत हवा, बुझाइ छै जेना बि‍हाड़ि‍ बहैत हो।
बहुत गोटे जेना एक्के बेर जय-जयकार केलक। मथापर जटा, अधपक्कू दाढ़ी-मोछ, लाल कुंडाबोर आँखि‍ हाथमे बड़कीटा शंख नेने एकटा बाबाजी देखाए पड़ैत छै। ओकरा आँखि‍सँ लहू बहि‍ रहल छै।
हवाकेँ कंपि‍त करैत गम्‍भीर वाणी नि‍कलैत अछि‍-
दैवि‍क दैहि‍क भौति‍क ताप...।‍
आकास फाड़ैबला शंखनादसँ आगूक शब्‍द झपा गेल। संगे बाबा महतोकेँ जय-जयकार हुअ लगल।
धनुकटोली शनै: शनै: जलमे समा रहल अछि‍। ओइ स्‍थानपर उगैत छै- एकटा छोटका टोल। जेना हमर टोल। छोट-पैघ, नीक-अधलाह घर-दुआरि‍। हँसैत-कानैत लोक-वेद, धिया-पुता, माल-जाल, चि‍रइ-चुनमुन्नी, सुखल आ हरि‍यर- गाछ-बि‍रि‍छ, पोखरि‍, इनार गली, सड़क, चौबटि‍या। की ई सपना छी आकि‍ सत्‍य...। आकि‍ सत्‍यक सपना?

mmm





गहवर घर हल्‍ला कऽ रहल अछि‍। सघन अन्‍हार कान ठाढ़ केने सुनि‍ रहल अछि‍। गि‍रहतबाकेँ ईंटाबला घरपर बैसल इजोत हनहना कऽ हँसैत अछि‍। हँसी अन्‍हारमे छि‍ड़ि‍या जाइत अछि‍ कन्‍तु अन्‍हारमे छि‍ड़ि‍आएलो इजोत भकजोगनी जकाँ भुकभुकाइत अछि‍। हड़हड़ाइत हवा आ ओकरा कान्‍हपर चढ़ल भगैतक स्‍वर दड़बड़ मारि‍ रहल अछि‍- सौंसे टोल।
केतेक दूर रहलह हौ सेवक-राजा फुलबरि‍या हौ...। एके कोस रहलह हौ सेवक राजा फुलबरि‍या हौ...लगिगेल चौदहम केवाड़ हौ...।‍
ताल काटैत मि‍रदंग आ झनकैत झाइल। भगैतया सभ गाबैसँ बेसी देह मचकाबैत अछि‍। जेना देह नाचैत अछि‍ टाँग नै। साज-बाजक तालपर नाचैत देह आ मन।
गहवरक पछुआरमे अन्‍हार खटखटा रहल अछि‍। ऊ अन्‍हार नै भूत प्रेतक छाँह छि‍ऐ। नेंगरा बुढ़बा कहैत रहै छै। रौ गहवरक देवी-देवताक डरे सभटा साहन सभ पछुआरमे नाँगटे नाचैत रहैत छै। वएह सभ कखनो काल नढ़ि‍याकेँ कान पकड़ि‍ केंकि‍या दैत अछि‍- भूउउऊ...। ओकरे सुरमे सुर मि‍ला कऽ भूत प्रेत कानए लगैत अछि‍- कुउउऊ...। तखनि टोलक लोक भलहि‍ं सुटैक जाइ कि‍न्‍तु कुताकेँ देखि लियौ ताल। जना नाँगरि‍पर कि‍यो मटि‍या तेल ढारि‍ देने होइ।
गहवरक आगू सौंसे अँगनीमे दीया जरि‍ रहल अछि‍, गोल-गोल पाँति‍मे। अन्‍हरि‍याकेँ गरदनि‍याँ दऽ भगा रहल अछि‍। तैयो उ थेथर जकाँ दोग-दागमे ठाढ़ रहैए चाहैत अछि‍। हे एकोटा दीपक टेमी नि‍च्‍चाँ नै हो।
हँ... हँ एहेन बखतमे भकइजोत बड्ड खराब। डाइन आ भूत केनौ सँ लपकि सकै छौ। अपन-अपन सतरकी। घटलासँ पहि‍ने दीपमे तेल ढारैत रह।
पता छह तेल केते डहतै। महगाइ तँ अासमानमे भूर कऽ देने छै। ओइ कारणे तँ सभकेँ भकभकाइते छै। ‍
यएह तेल जरे केकरो फटै छै एकरो...
झकाश इजोत देखैक छौ तँ देखही शहर जा कऽ। राइतोमे सड़कपर गि‍रल सुइया ताकि‍ लेबही। 
भगतकेँ कोनो कम पामर होइ छै। चाहतै तँ ऐ गाछो सभमे इजोत जरए लगतै।
अच्‍छा चुप। बड़का लाल बुझक्कर भऽ गेलेँ।
हम नै अहाँ बड़का विदुआन।
अहाँ चुप रहू। एम्‍हर देखू।
खेलाबन भगत पूजा ढारि‍ रहल अछि‍। खीर, लड्डू, पान, सुपारी, तुलसी, गंगाजल सभटा डाली सभमे सजाएल छै। मनक तरजूपर तौल कऽ अछत-फूल रखिरहल अछि‍। सभटा पूजाकेँ कुड़ि‍ एके रंग एके आकार। भगत जखनि लि‍हुरि‍ कऽ पूजाकेँ कुड़ि‍ रखैत छै तखनि ओकर पेट बोमि‍या उठै छै।
गै माए, भगत पेटमे बाघ रखने छै। देखै छीही हुमड़ै छै।‍
गै दाइ, देवताे-पि‍तर नै बुझै छौ। तोहर बेटी तँ जुगमे भूर करतौ। अखनि तँ पा-भरि‍क छौ।‍
हे मुँह सम्‍हारि‍ कऽ बाजू। अपन बेटी जेना बड्ड सतबरती। कोन-कोन रसखेल केलक के नै बुझलक।
हे लबरी...
हे चुप...। झगड़ा-झाँटी बन्न। पहि‍ले कहलौं औरति‍या सभकेँ एक कात आ पुरूष सभकेँ एककात बैठाएल जाए।
हँ-हँ सएह कएल जाए।
आइ गहवर घरमे पहि‍लुक डाली जागेसरकेँ लागल अछि‍। ओकरा स्‍त्रीकेँ कोखि‍या गोहारि‍ हेतैक। अोकरा देहपर कखनौ भूत सवार भऽ जाइत अछि‍ आर उ खेलाए लगैत अछि‍।
केना भूत सवार नै हेतै? धर्मडीहीवालीकेँ देहो तँ सवारीकेँ जोग अछि‍। भरल-पूरल जवानी, श्‍याम वर्ण, तेलसँ छट-छट करैत देह, खलि‍आएल आँखि‍, गोल बाहि‍ंपर कसल अँगि‍या। कारी भौंरा केश। आँखि‍केँ जेना स्‍वत: खैंच लैत अछि‍ अोकर देह।
एकर ठीक उनटा जगेसराक शरीर। जेना जुआनीमे घुन लगल हो। तहि‍ना ओकरा देहकेँ बिमारी अधखि‍ज्‍जु कऽ देने अछि‍। कमजोरीक कारणें तामस हरदम नाकेपर चढ़ल रहैत अछि‍। तैपर सँ बाल-बच्‍चा नै होइ छै। तामस आर दुगुना। ई सभटा तामस उतारत धर्मडीहीवालीपर। कखनो फनकए लगैत अछि‍-
सन्‍तानक मुँह केत देखिते ई पपि‍आही।‍ जीनगी भरि‍ तँ कुकरम केने अछि‍।
धर्मडीहीवालीकेँ भरि‍ देह ई बात छूबि‍ लैत अछि‍। अपन असल नाओं नि‍रमला जेकरा उ नैहरमे रखिकऽ अाएल अछि‍। अपना नैहराक बड़ाइ चि‍बा-चि‍बा करए लगैत अछि‍-
हमरा धर्मडीहीकेँ लोक असल धर्म-कर्म करैबला सभ अछि‍। पपि‍आहा सभ तँ अहीठाम भरल अछि‍।‍
दि‍न, दुपहर, राति‍ कखनो दुनू बेकैतमे बकटेटी शुरू भऽ जाइत अछि‍। टोलक बूढ़-सुरकेँ अनसोहाँत लागब स्‍वभावि‍के। जगेसराकेँ कि‍छो तँ कहऽ पड़तै-
हे रौ, नै होइ छौ तँ ओझहो-धामि‍केँ देखाबहि‍। कोनो धरानी एकोटा बाल-बच्‍चा भऽ जेतौ तँ बुझही जे सभ दुख पार। ई भूत-देवी आ तामस-पि‍त सभटा एकरा देहसँ भागि‍ जेतौ।‍
सन्‍तान लेल तँ कोखि‍या गोहारि‍ करबै पड़तौ।‍
केतेक दि‍नसँ जागेसर गोचर वि‍नतीमे लगल अछि‍। कि‍न्‍तु भगत पि‍घलत तब ने। भगतकेँ छुट्टी कहाँ रहै छै। आइ ऐ गाम तँ काल्हि‍ दोसर गाम। नाेते-नत।
आखि‍र पक्का भगत छि‍ऐ रामखेलाबन। दू पीढ़ीसँ ओझहा-धाइमक काज कऽ रहल छै।
पहि‍ने ओकरा गहवरमे गछौटी करि‍यौ। साफ-साफ कहि‍यो पूजामे केतेक खरच करबै। पाठीक बलि‍ देबै। गछि‍ लियौ। तब भगत तैयार हएत।
केतेक खुशामदे आइ तैयार भेल अछि‍ खेलाबन भगत।

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गहवरक अँगनीमे जेना ललका इजोत उतरि‍ गेल छै। अन्‍हारक कोरामे लहुआएल लाल चि‍ल्हका खेला रहल हो, तहि‍ना सन लगैत अछि‍।
धधकैत आहुत, चौमुख जरैत दीप, अड़हुलक लाल फूल, लाल सि‍नूर, ललका डाली। सबहक मुँह जेना ओही लालीसँ ढौंरल हो। लाल टुह-टुह भेल भगतकेँ आँखि‍ सपनामे डूबि‍-उगि‍ रहल हो। पहि‍ले कहि‍ देल गेल छेलै मरद सभ एककात आ औरति‍या सभ एककात। बात के सुनतै? ढीठ सभ मरदक झोंझि‍मे ढुकि‍ कऽ बैसल छै।
दोसरो दि‍स तँ थेथरे सभ अछि‍। मौगि‍याह जकाँ दोगमे ढुकि‍ कनफुसकी कऽ रहल छै।
पता नै चलै छै औरत आ मरदक। एक तँ इजोत तेजगर नै छै। दोसर साड़ीसँ आधा मुँह झँपने छै। आँखि‍क भाग देखलासँ केना ि‍चन्‍हत लोक। दसगरदा जगहपर सभ चलै छै।
सभ की चलतै। उतरबरि‍या कातसँ औरति‍या सभकेँ नै बैठबाक चाही। उत्तरसँ देवताक आवाहन होय छै। गि‍यान तँ छौ नै।
आबि‍ गेलौ संुघहा धान।
सुंधाय मड़रकेँ सभ सुंघहाधान कहै छै। सुंघहाधान छुबि‍ते हाथमे गड़ि‍ जाए छै। टोकैते देरी सुंघाय मड़रकेँ बकटेटी शुरू।
फेर कि‍यो सुंघहाघान बाजि‍ नै सकैत अछि‍। देखि लि‍यौ लाठीक हुड़ाठ। मुँह भाँगि‍ देबै, कि‍यो बजत तँ। मुँहकेँ चुप्‍प राख।
तेरहे बरखक उचि‍तवक्‍ता छै तइसँ की। ओकरासँ गपमे के जीतत। उचि‍त बात फट्ट दऽ बजल-
गोहारि‍, गोसांय सभ बन्न। सुंघाय बाबा कहि‍ देलक। कि‍यो मुँहसँ बाजि‍ नै सकैत छी। भगतो वाक केनाक देत। चलै चलू आब ि‍कछु नैै हएत। के बतीसी लाठीसँ झड़ाएत।‍
भगतकेँ नवसि‍खुआ चेला फनका रपटैत बजल-
देहपर नै लत्ता-चौधरी बोलत्ता। ऐ गामक मालि‍क सुंघाय छि‍यो की जे ओकर औडर चलतौ। अखने सुंघबाकेँ कंठ पकड़ि‍ बाहर दि‍स ठोंठि‍या देबो। बुझि‍ ले, तोरो कोनो बाप नै बचेतौ।‍
उचि‍तवक्‍ताकेँ कपारपर तामस नाचि‍ उठल। सुंघाय मड़र पाछूसँ डाँड़मे लाठी लगौने ठाढ़ छै। बूढ़ देहक भार लाठीपर देने आँखि‍ मूनि‍ देवता-पि‍त्तरकेँ सुमरि‍ रहल अछि‍।
गहवरक सीमामे बकटेटी नै करबाक चाही। हम पपि‍याहा। हमरा छेमा कऽ दि‍अ।
एहेन गप कहत।‍ उचि‍तवक्‍ता फोंफि‍या कऽ उठल आ सुंघाय मड़रकेँ पाछूसँ लाठी खैंच लेलक। लाठी चमकाबैत फनकापर हुड़कल।
सुंघाय मड़र धाँय दऽ डाँड़ भरे खसल। कुहरैत बाजल-
हौ बाप, मारि‍ देलक। ऐ लुकड़बाकेँ जन्‍मे भेल छै मरचायसँ। तब ने एकर बात आ बानि‍ मरचाय जकाँ लगै छै। एकर बाप सभ साल लंगी मरचायकेँ खेती करै छेलै ओहीसँ जोड़ा बरद कीनलकै। ओइसँ की। दारू पी कऽ सि‍रजल चीज केहेन हेतै।‍
उचि‍तवक्‍ताकेँ हाथसँ लाठी छि‍ना गेल छै। महुराइत बजल-
अपना बेटा दि‍स नै तकै छहक। टूटलो डाँड़पर अनकर आड़ि‍ कोदारि‍सँ नै छाँटबहक तँ जलखै नै भेटतह। केहेन कुकरमी छहक, खेलि‍ देबै सभटा बात।‍
नै गौ बाबू, कल जोड़ै छि‍यौ। हमरा उठा कऽ पहुँचा दे।‍
‍अच्‍छा चुप रहू। शान्‍त भऽ जाऊ। देखि‍यो ओने गोहारि‍ शुरू भऽ रहल छै।‍
पहुलका डाली जागेसरक लगल छै। डाली दौड़ कऽ अपने आगू चलि‍ गेलै। सभटा देवताक कि‍रपा छै। देव कि‍रपा बि‍नु डोले नै पात।
आपसी फुसुर-फुसुर भऽ रहल छै। ओकर पति‍ जागेसर गहवर घर दि‍स टकटकी लगौने।
एहेन जवानीसँ भरल देह आ तब बाल-बच्‍चा नै होइ छै।‍
जागेसरक बाछी एहेने बनल छै। एेबेर गाभ टेकतै की नै?
‍खेलावन भगत एे काजमे माहि‍र छै। आब देखि‍यो तँ...।‍
स्‍त्रीगण दि‍ससँ कनी मन्‍द स्‍वर नि‍कलै छै।
भैयाखौकीकेँ लाज-धाक होइ छै की नै। अपने दहकेँ अपने जे करै छै। छि‍नरि‍या...।‍
अइठाम अबि‍ते सभ देवी-देवा चढ़ि‍ जाइ छै। आ नैहरा जाइते सभटा छूटि‍ जाइ छै।‍
सुनै छि‍ऐ जे नैहरासँ एकटा छौड़ा आठे दि‍नपर भेँट करए अबै छै। पछोड़ धेने रहै छै।‍
ई सभ तँ होइते रहै छै। तोरो मन होइ छौ की।‍

एक दोसरकेँ मुक्का मारैत औरति‍या सभ एकसंग हँसैत अछि‍।
चुप। सभ मुँह बन्न कऽ ले। भगतकेँ भाव आबि‍ गेलै।‍
कारणीकेँ एमहर लाबह।‍
भगति‍याक भगैत जोर-शोरसँ शुरू भऽ गेल छै।
जय हौ देव। कनी नीकसँ देखि‍यो। माथ आ पेट दुनूमे दरद छै।‍
खेलावन भगत देह-हाथकेँ ऐंचैत धर्मडीहीवालीक आगूमे बैसैत अछि‍।
मंतर पढ़ि‍ माथ हाथ दऽ रहल छै। माथपर सँ हाथ ओकरा छातीपर गि‍रबैत अछि‍। फेर पेटकेँ हँसोति‍ दइ छै‍। पेटपर सँ हाथ ससरि‍ पुन: माथपर। धर्मडीहीवाली चौंक उठै छै। ओकर देह सि‍हरि‍ उठै छै। भगत फेर माथपर हाथ रखैत काजकेँ दोहरौलक।
चटाक।‍ धर्मडीहीवालीक चमेटा भगतकेँ मुँहपर लगल। संगहि‍ कंठ पकड़ि‍ धकेलि देलक।
आशा नै छेलै से भेल। भगत ओंधरा गेल। तामसे थर-थर काँपैत। लोकमे हड़कम्‍प भऽ गेल। कि‍छु ठाढ़ आ कि‍छु बैसल अछि‍। स्‍त्रीगणक आँखि‍ आश्चर्यमे डुमल।
गे माइ गे माइ। आब की हेतै।‍
आगि‍ बरि‍स जेतै। ठनका गि‍रतै।‍
उचि‍तवक्‍ताकेँ नै रहल गेल तँ बजल-  
भगतकेँ असल भूतसँ पाला पड़ि‍ गेल छै। सभ गुण-मंतर अखनि भीतर भऽ गेल छै। टाँग केना असमान दि‍स ठाढ़ केने छै। लगै छै जेना टि‍टही होइ।‍
फड़फड़ा कऽ उठैत अछि‍- भगत। बेंत लऽ कऽ धर्मडीीवालीकेँ पीठपर तड़-तड़ा दैत अछि‍।
आइ हमसभ भूतकेँ भगा देबै।‍
धर्मडीहीवाली भागैत अछि‍।
रे खुनि‍याँ सभ। रे कोढ़ी फूटतौ रे बेईमनमा। गे माइ गेऽऽ‍।
जगेसरा आगूसँ घेर लैत अछि‍। एक्के धक्कामे जगेसराकेँ गि‍रबैत धर्मडीहीवाली पड़ाइत अछि‍। भगत देहसँ गरदा झाड़ि‍ रहल अछि।‍ जगेसरा हाथ जोड़ि‍ थर-थर काँपि‍ रहल छै।
आब की हेतै यौ भगतजी। कोनो उपए लगाऊ। जे कही अहाँ।‍
‍हेतैक सभ उपए लगतैक। भगतसँ भूत नै जीत सकै छै। कोखि‍या गोहारि‍ हेतै। तूँ परसू आबि‍ कऽ भेँट कर। हमरे नाओं छि‍ऐ रामखेलावन भगत।
पछुआरक अन्‍हारमे कि‍छु करूण क्रदन सन भेल। भगत छड़पि‍ कऽ गहवरमे ढुकि‍ गेल। हवाक झोंक अाएल। कि‍छु दीप मुझा गेल।
लोक सभ पीठपर डरकेँ लादने एका-एकी ससरि‍ रहल अछि‍।

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ढेरूबा नै नाचै छै असलमे जागेसरक मन नाचै छै। सुतरी कटा रहल छै- केतौ मोट केतौ पातर। मन थि‍र रहै तब ने। मनकेँ थि‍र रखब बड्ड कठि‍न। ई तँ कि‍यो साधक कऽ सकैत छै। सभ जँ साधक भऽ जेतै तँ देश दुनि‍याँकेँ कोन गति‍ हेतइ। तँए पहि‍ने मन उड़ै छै तब तन।
जागेसरक मन धारक थौकड़ा जकाँ उपला रहल अछि‍।
आइ तँ भुटाइओ वैध जवाब दऽ देलकै-
धर्मडीहीवालीकेँ सन्‍तान नै हेतौ। वि‍धाता कलम मारि‍ देने छौ। एकर कोखि‍ ऐ जनममे नै भरतौ।
हौ बा आब कोन उपए हेतै हो। पहि‍ने तँ लोक खोंखीबाला कहै छेलै। आब मुँह दाबि‍ कऽ कहै छै-
नि‍रवंशा। 
दुआरि‍पर जगेसरा ढेरूआकेँ गि‍नगि‍ना रहल अछि‍। सँगे ओकर माथा घूमि‍ रहल अछि‍ आ माथामे घूमि‍ रहल अछि‍- धर्मडीहीवाली। कि‍न्‍तु पछि‍ला फूइसक घर थि‍र अछि‍।
ठीके कहै छेलै- उचि‍तवक्ता-
हटा ऐ ठाँठ गाएकेँ। कर दोसर बि‍आह। ला टटका माल। नीक नसल देखि-सुनि‍ कऽ। पुरहि‍या लऽ आन। चाइरे-पान सालमे छौड़ा-छौड़ीसँ खोभारी भरि‍ जेतौ।
नसल तँ एकरो खराब नहि‍ये छै। नमगर-छरहर काजा, भरल-पूरल सीना। जखनी सि‍ंगार कऽ कए नि‍कलै छै तँ संगी-साथीकेँ कहए पड़ै छै-
जगेसरा भागशाली अछि‍। अपना तँ कमजोर, करि‍आएल, बेमरि‍याह अछि‍। कि‍न्‍तु ओकरा मौगीकेँ देखि‍यौ। जँ आगूसँ नि‍कलै छै तँ मन फुरफुरा उठै छै।

भाग्‍यशाली  केतए। भाग्‍य केतएसँ नीक हएत। सुन्‍दर तँ अछि‍ मुदा बाँझ। जँ नि‍पूतर रहब तँ पि‍ण्‍डदान के करत? हमरा बाद सम्‍पति‍केँ के भोगत? बुढ़ारीमे सहारा के बनत?
ओह ऐ औरति‍याकेँ भगबहि‍ पड़त। ठीके कहै छेलै- उचि‍तवक्‍ता। मुदा भगेबै केना? छै तँ ई बड़ जब्‍बर।
ओइदि‍न खेलावन भगतसँ झाड़फूँक करबैले गेलिऐ। एके झापटमे भगतकेँ दाँत चि‍याइर कऽ खसा देलकै। महतो बाबाकेँ थानसँ भभूत लाबि‍ देलि‍ऐ। छाउर बुझि‍ कऽ मूतनारमे फेक देलकै। यएह भोंसड़ीकेँ बि‍सबासे नै छै कि‍छोपर। फल केतएसँ भेटतै?
आब एकरा डेँगा-ठेठा कऽ भगबहि‍ पड़तै। मुदा केना कऽ आँखि‍ उनटा कऽ जँ हमरा दि‍स तकै छै तँ हमरा लघी लगि‍ जाइत अछि‍। तैयो हम तँ मरद छी, देह तानहि‍ पड़त।
हम जँ मौगा बनल रहबै तँ उ बेहया बनि‍ जेतै। संभार तँ हमरहि‍ करए पड़तै। केतेक दि‍नसँ एकर चालि‍-चलन देखि रहल छी। नकोरबा बनि‍याँसँ केतेक सटि‍या कऽ गप करैत रहै छै। छनमाकेँ अँगनामे ढुकै छै तँ नि‍कलैक मने नै होइ छै जेना। हम भूखल रहि‍ जाइयो कोनो बात नै मुदा ई भोरे नि‍कलि‍ जाएत- टोल चक्कर लगबैले। टोलक चक्कर थोड़बे लगबै छै ई तँ दोसरे चक्करमे लगल रहै छै। केतेक बेर भऽ गेलै। भूखसँ पेट दुखा रहल अछि‍। हमरा दि‍स धि‍यान रहै तब ने। धि‍यान तँ आरो केकरोपर रहै छै।
धर्मडीहीवाली अँगनासँ नि‍कलि‍ कऽ टोल दि‍स जा रहल अछि‍। जागेसराक ढेरूआ रूकि‍ गेलै।
- केतए जा रहल छी? छुच्‍छे कूद फान? ऐ अँगनासँ ओइ अँगना? जेना कोनो काजे नै छै। एके लाठीमे टाँग तोड़ि‍ देबौ। अपने घरमे बैठल रहबेँ।
धर्मडीहीवालीकेँ टाँग रूकि‍ गेलै। उनटि‍ कऽ बजल-
देहमे तागद तँ छै नै आ टाँग तोड़ता? देखै नै छी केहेन बिमारी ढुकल छौ, तोरा देहमे। कोढ़ि‍ फुट्टा कहीं कऽ।
झगड़ा बढ़तै। जागेसरकेँ बढ़ि‍या चांस भेँट गेल छै। उ झगड़ाकेँ बढ़ाबए चाहैत अछि‍।
मुँहसँ गारि‍ नि‍कलतौ तँ थुथुन तोड़ि‍ देबौ।
गारि‍ नै देबौ तँ असि‍रवाद देबौ?”
यएह बड़का आएल अछि‍- असि‍रवाद देनि‍हारि‍। नि‍पूतरी, बाँझि‍न। गे भौंसरी, एकटा मूसोकेँ जन्मा कऽ देखही। तोरी माइकेँ।
खबरदार, हमरा माइक नाओं नै ले। पुछलीही नै अपना माएसँ। केत केतए मुँह मारलकौ तब ने तोरा सन बेटा पैदा केलकौ। बेमरि‍याहा...
जागेसर ढेरूआ फेकैत लग चलि‍ गेल अछि‍। करोधसँ थरथरा रहल अछि‍।
मुँह बन्न राखबें आकि‍ देबौ चमेटा।
धर्मडीहीवालीकेँ आँखि‍ तामसे ललि‍या गेलै। उ आरो लग आबि‍ गेलै। देह अड़ि‍ कऽ बाजलि‍-
ले मार। असल बापक बेटा छी तँ मारि‍ कऽ देखही। बापसँ भेँट करबा देबो।
चटाक, चटाक। मुँहपर थप्‍पर पड़ल।
तु थप्‍पर मारलें-हमरा। आइ हम जे न से कऽ देबो। आरो बखतमे टि‍टही जकाँ पड़ल रहैत छै आ मारै कालमे केतएसँ गरमी चढ़ि‍ जाइ छै।
ओ जगेसरा ि‍दस हुड़कैत अछि‍। ओ डाँड़क डोरा आ झाँपल अंगमे लटकए चहैत अछि‍। मुदा जगेसरा तँ लाठी लऽ कऽ तैयार भऽ गेल अछि‍।
नि‍कल हमरा घरसँ- छि‍नरि‍या। कोन-कोन कुकरम कऽ केँ तब हमरा घर अएलें। पता नै। भागबें अइठामसँ आकि‍ चलेबाै डंटा?”
ले मार। आरो मार हमरा। अहि‍ना भागि‍ जेबो तोरा सात पुरखाकेँ घि‍ना देबो। पूरा समाजमे उकैट देबो-सबकुछो।
उ कानि‍-काि‍न कऽ फाेंफि‍या रहल अछि‍। हाथ चमकाबैत जगेसराक लग सटल जा रहल अछि‍।
भगा देबही। छातीपर छि‍पाठी रोपि‍ कऽ रहबो। बहुते बल भऽ गेलो, हाथेमे। थप्‍पर मारबें। कहैत जागेसरकेँ धकेलि देलक। आसाकेँ वि‍परीत जागेसर धड़फड़ा कऽ गि‍र पड़ल। आगि‍ नेस देलक- जगेसरकाकेँ। तामसे काँपैत ओ लाठी नेने उठल।
तोरी माँ की...। आइ तोहर हड्डी तोड़ि‍ देबो। परान लऽ लेबो।
फटाक-फटाक।
धर्मडीहीवालीक पीठ आर जाँघपर लाठी बरि‍स रहल अछि‍।
गे माइ गे माइ। मारि‍ देलक रेऽऽऽ। दौड़ रेऽऽऽ। कोढ़ि‍फुट्टा बेदरादा, रे लकवाबला। गे माइ, मरि‍ गेलियौ गेऽऽऽ।
दूरेसँ टोलक लोक चि‍चि‍या रहल छै।
रे जगेसरा- रूकि‍ जो। मरि‍ जेतै बेचारी। गलत बात। गाए-भैंस जकाँ पीटै छी।
एना मारबें तँ कोनो दि‍न लंका कांड भऽ जेतौ।
आखि‍र कोन झगड़ाकेँ नि‍पटारा नै होइ छै।
ई औरती बड्ड झगड़ालू अछि‍। छुलही कहीं के, आबो अइठामसँ जेबें की अड़ल छँए।
लोक सभ बीच-बचाव करऽ रहल अछि‍। धर्मडीहीवाली दस पन्‍द्रह डेगपर ठाढ़ भऽ गेल अछि‍। आ ओइठामनसँ गरि‍या रहल अछि‍।
हम छुलही? झगड़ाउ? केकरा घरमे सतबरती बैसल छै? हम सभटा जानै छी। सबहक बात सुनै छी। ऐ खुनि‍या, बेदरदाक कारने। रे अनजनुआँ जनमल, देहमे कोढ़ि‍ फुटतौ रेऽऽ। हाथमे घुन लगतौ।
जागेसर गरजैत अछि‍-
ऐ बीचमे नै आबै कोइ। ई औरति‍या सनैक गेल छै। दुसमन सभ एकरा सि‍खा-पढ़ा कऽ तुल-तैयार कऽ देने छै।
कातमे ठाढ़ भेल लोक सभकेँ बाजए पड़ैत अछि‍-
हमरा बुझि‍ पड़ैत अछि‍ मरदे सभ सनकल अछि‍। दू-चारि‍ दि‍नपर अहिना पि‍टाइ प्रोग्राम चलैत रहैत छै।
पि‍टाइ नै करब तँ पूजा करू। कपारपर चढ़ा कऽ राखू।
से कहाँ कहै छी हम। सभ कि‍छुकेँ एगो रस्‍ता होइ छै ने। आकि‍ कि‍छु बुझे ने सुझे फरमा दि‍या फाँसी।
ठीके कहै छै। सबहक औरति‍या कोनो बाँझि‍न छै आकि‍ छुलाहीए छै, ऐँ?”
औरती सभ चुप नै रहि‍ सकैत अछि‍।
हे यौ बउआ मरद भेल सोना। ओकर सभ गलती माफ। औरती भेलै टलहा। ओकर की गि‍नती छै।
चुप रहु अहूँ तँ अपना पुतहुकेँ खोरनीसँ खांेचारैते रहै छि‍ऐ। की बजब।
केकरापर करब सि‍ंगार-पि‍या मोरा आन्‍हरे हे...
धि‍या-पुता कातमे डेराएल सन मुँह केने ठाढ़ अछि‍।
धर्मडीहीवाली चौबटि‍यापर ठाढ़ भऽ कऽ सात पुरखाकेँ गरि‍या रहल अछि‍। जगेसारा लाठी लऽ कऽ रेबाड़ैत अछि‍।
ठाढ़ रह भोंसरी। आइ चौबटि‍येपर बेदशा करबौ।
चोटक मोन पड़ि‍ते धर्मडीहीवाली भागैत अछि‍। पाछुसँ बाघ जकाँ गरजैत जागेसर। लोक तमाशा देखि रहल अछि‍।
कनीके दूर दौगलापर जागेसर हकमए लगैत अछि।
जो अपना बापक पास। एमहर जँ घूमिकऽ एबें तँ प्राण लऽ लेबौ।
कानैत-खीजैत धर्मडीहीवाली जा रहल अछि‍- नैहर दि‍स। नुआ-बस्‍तरक कोनो ठेकान नै। जेना सुइध-बुइध हेरा गेल हो।
ओ कानैत अछि‍। कि‍न्‍तु भीतरसँ बोल फूटि‍ रहल अछि‍।
हमरा तँ बापसँ मोलाकात करबा देलही रे नि‍वंशा। तोरो छोड़बो नै। अठगामा मैनजन-पंच जमा कऽ देबौ- तोरा दुआरि‍पर। आठो गामक लाेकसँ थू-थू करबा देबौ।

जागेसर ओहीठाम बैसि कऽ खांेखि‍या रहल अछि‍।
खों... खों... खों... आक थू...

पता नै ओ थूक केकरापर पड़ल। समाजपर, गामपर आकि‍ ओइ स्‍थानपर, धर्मडीहीवालीपर, आकि‍ अपनहि‍ आपपर। पता नै...

mmm


पंचायत! हँ, हँ बुझलौं गामक पंचैती। जाति‍क सरदार, मैनजन-देमान। करत छान-बान्‍ह‍। मुँहपुरूष आ सरपंचक शान। पंच भगवान। धुर, भगवान नहि‍ बेमान। मुँह देखल पंचैती। जेकर लाठी तेकर जोर। नि‍रबलक आँखि‍मे भरल नोर। कमजोरे लेल सभटा कड़ी।
आब गामे-गाम बनि‍ रहल छै-कचहरी। तैयो पंचैती होइते छै। हँ जाति‍क पंचैती। परजाति‍क पंचैती। जाति‍ तँ जाति‍सँ साइंग होइ छै। दस लोकक नि‍र्णए तँ मानहि‍ पड़तै। नै तँ समाजक नँगटाहा सभ नाँगटे नाचत। समाज, कानून, बन्‍धन, डण्‍ड जरि‍माना। इनसाफक उपए। सभकेँ नि‍साफ मि‍लबाक चाही। नै तँ कहि‍यो गाड़ीपर नाह आ कहि‍यो नाहपर गाड़ी। सएह यौ मड़र।
कालू मड़रक दुआरि‍पर पंचैती भऽ रहल छै। जाति‍क मैनजन। हँ हँ बिच्‍चेमे बैसल छै। आँखि‍ केना नचै छै- मुँहदुसी जकाँ।
धरमडीहीसँ पंच सभ आएल छै। की बुझाइत छै, जगेसराकेँ, छोड़ि‍ देतै ओहि‍ना। ओइ दि‍न मारैत-मारैत थकचुन्ना कऽ देने रहै, अपना घरवारीकेँ। घरसँ भगा देलकै। आ पाछूसँ समादो पठा देलकै।
जे तोहर बेटी बदचलन छौ। चोरनी छै। बाँझ छै। राखह अपना बेटीकेँ कपारपर।
आ रे तोरी कऽ, एहेन डकलीलामी।
धर्मडीहीवालीक बाप तीन-चारि‍ महि‍ना धरि‍ टकटकी लगौने इन्‍तजार केलकै। कोनो कौओ-पंछी सुइध-बुइध लइले नै पहुँचलै। अंतमे ओकर बाप जाति‍क मैनजनकेँ खबैर देलकै।
पूरा टोलक लोक जमा भेल छै। धनुखधारी मड़र, उचि‍तवक्‍ता, ढोढ़ाइ गुरुजी भुटाइ वैद, फतींगा, बि‍डि‍ साहैब, चंतनजी जेकरा सभ चोतबा कहै छै। आर बहुत गोटे कनी पाछू दाबि‍ कऽ बैसल छै। पाछूसँ बीख उगलि‍ मुँह चोरा लेबामे असान होइ छै।
टाटक पाछाँ स्‍त्रीगण कान पाथने अछि‍। ओ सभ आँखि‍ नचबैत फुसुर-फुसुर कऽ रहल अछि‍।
कालू मड़रक नजरि‍ ओतऽ तक पहुँच गेल।
आब मौगी सभ पंचैती करत। एस.पी., डी.एस.पी. मंतरी-संतरी सभ बैनते छै। आब कोनो कम पावर छै, ओकरो पास।
दुनू हाथ जोड़ैत आगू बजल-
तब ने ओइराि‍त जोकरबा दुनू हाथ जोड़ि‍ कऽ नाचमे कहैत रहै- तुम्‍ही हो माता, तुम्‍ही पि‍ता हो।
छौड़ा सभ खि‍खि‍या कऽ हँसैत अछि‍।
बुढ़बा बहुत दि‍न धरि‍ लात तरमे रखिराज केलहक आब सभटा पाछू दऽ कऽ बोकरेतह। धनुखधारी मड़र रपटैत अछि‍-
चुप, गामक इज्‍जत झाँपि‍ कऽ रखबाक चाही। दोसरो गामसँ पंच सभ आएल छै। की कहतौ।
ई काल केतएसँ आबि‍ गेलै। की हौ, कथीक धोलफच्‍चका भऽ रहल छै। हे रौ जा रहल छै तँ जाए दही दोसर जाति‍क मैनजन कि‍एक रहतै।
हँ हँ, जाउ अहाँ। हमरा जाति‍क मामला छै। जय भगवान। ढोढ़ाइ गुरुजी घूस नेने छै।
हँ-हँ, जगेसरासँ पाँच बोरा भुस्‍सा। वि‍ल्‍कुल फ्री। केतेक दि‍न फोकटमे चाह पीतै आ खेतै, से तँ अलगे। बजतै नै तँ घूस केना पचतै।
ढोढ़ाय गुरुजी बीचमे जोरसँ गरजैत अछि‍-
जोरू-जमीन जोरकेँ, नै तँ कि‍सी औरकेँ। अपना औरति‍याकेँ पाँजमे रखैले जगेसरा चारि‍-पाँच लाठी खींचे देलकै तँ कोन जुलुम भऽ गेलै। के सभ ताजनकेँ अधि‍कारी होइ छै से तँ सभ जनि‍ते छि‍ऐ।
धरमडीहीसँ आएल कन्‍हैया मैनजनक कनहा आँखि‍ जखनि चमकै छै तँ सबहक सि‍टी-पि‍टी गुम भऽ जाइ छै। ओ अपन छि‍ड़ि‍आएल मोंछकेँ सि‍टि‍या रहल अछि‍। ढोढ़ाय गुरुजीपर जखनि ओकर ललि‍आएल नजरि‍ पड़ैत छै तँ तत्काल गुरुजी चुप्‍पी साधि‍ लैत अछि‍। पाँच बोरी भुस्‍सा हवामे उड़ि‍ जाइत छै। आ पेटमे बसात औनाए लगैत छै।
उचि‍तवक्‍तासँ नै रहल गेलै तँ टोन कसि‍ देलकै। धुर ई ढोढ़बा की बजत। एकरा बहुकेँ तँ दोसर जाति‍क धरमीलाल पंजाब लऽ कऽ भागि‍ गेल आ अइठाम लबर-लबर करै छै।
ई उचि‍तवक्‍ता फेर टें-टें करए लगल चुप रहबें की नै।
हे, आइ जे पंचैतीमे खचरपन्नी करबें तँ मुँह थकचुन्ना कऽ देबो।
रौ तोरी कऽ। हमर बाप कहने रहै जे पंचैतीमे उचि‍त बात ढेकैर कऽ बजि‍हेँ। आ तूँ मुँह थकुच देबही तँ बजबै केना। ऐ सँ नीक। हम अइठामसँ चलि‍ जाए।ुप्‍पी ि‍आएल नजरि‍ पड़ैत छे तॅ  
बेंगाय बाबा आइ गाँजा नै पीने छै। नै तँ लौडि‍सपीकर जकाँ बजि‍तै। ऊ तँ धरमडीहीवालीकेँ तरफसँ छै। जागेसर दि‍ससँ ढेकैरतै तब ने फ्रीमे गाँजा भेटतै।
धुर नै बुझबहक। ओकर नजरि‍ गड़ल छै। जगेसराक डीहबला जमीनपर। साेचै छै कहुना झगड़ा बढ़तै तँ कम दरपर ई दाव सुतरि‍ जाएत।
हँ आबि‍ गेलौं खि‍स्‍सा कहैबला खि‍स्‍सकर। ई तँ खि‍स्‍सेपर पंचैती कऽ देतौ।
ऊ जमाना गेलै। आब तँ जेकरा पासमे साम-दाम भय-भेद छै आकरे बुत्ते पंचैती हेतै। पंचैती कारणे केते पंच बि‍लटि‍ जाइत छै।
जे दसगोटेमे नै बजल अछि‍। ठाढ़ भऽ कऽ बजैत काल ओकरा थरथरी छुबि‍ दैत छै।
हँ तँ, आब घोंकले गपकेँ केतेक घोंकैत रही। सभ बात जानले अछि‍। करू तसफि‍या।
सुनि‍यौ झटकलाल मड़रकेँ गप। अपन बेटी केकरा संगे भागि‍ गेलै। तकर पत्तो नै लगलै। अच्‍छा छोड़ू। गप सुनू।
यादि‍ अछि‍ ने मड़र। पुबरि‍या टोलपर चुनचुन पहुलका स्‍त्री पहुँच गेलै- थाना। तुरत्तेमे पुलि‍स पहुँच गेलै- दरबज्‍जापर। वर आ वरक बापकेँ तेतेक पीठपर डण्‍टा बरसौलकै जे छर-छर नुआ-बस्‍त्रे... की कहब आब तँ वैह पहि‍लुकी स्‍त्री महरानी बनि‍ कऽ घरमे बैसल छै।
आब तँ औरतकेँ जमाना आबि‍ गेलै। तैयो आकरो कि‍छु दाबि‍-चापि‍ कऽ तँ राखहि‍ पड़तै। नै तँ ऊ सनकि‍ कऽ कि‍छाे बनि‍ सकै छै।
एकर मतलब गाए-भैंस जकाँ आेकरा डेंगा देबै।
नै हि‍साब-कि‍ताबसँ। साँपो मरि‍ जाए आ लाठी नै टूटै।
अइठाम तँ मारैत-मारैत लाठी टूटि‍ गेलै। अपना घरवालीकेँ नै राखै चाहै छै।
जागेसरसँ पुछल जाए। कि‍छु वि‍शेष गप छै। आखि‍र, कि‍एक नै राखए चाहै छै, अपना स्‍त्रीकेँ। कारण तँ दरपन जकाँ साफे छै। चारि‍ सालसँ बेसी भऽ गेलै आ एकोटा बच्‍चा नै जनमा सकलै। यएह गप छै ने हौ जागेसर?
हँ-हँ बात तँ यएह छै, असलमे। दोसर बि‍आह करैले पंचायतसँ औडर भेट जाए। दोसर अपाय तँ छै नै। आखि‍र खनदान आ सम्‍पति‍क रखबार तँ चाही।
गुँर केतौ आ भूर केतौ। ऐ बातक कारणे झगड़ा होइ छेलै। आब बुझलौं तरका गप। ऐमे धर्मडीहीवालीक कोन कसूर?
सभ कसूर ओकरे। जखनि खेत खराब छै तँ...
फेर चुप। एक आदमी तँ दस-दसटा बि‍आह करै छै। यएह, डाँरमे ने डोरा बहु करत जोड़ा।
सार सभकेँ खाइले तँ जुमै नै छै। आ राजा जकाँ हजार गो रानी रखत।
तूँ गारि‍ देबही। मार सारकेँ।
हँ बाजि‍ नै सकै छेँ। आन गामसँ आबि‍ कऽ रंगदारी। पंच छी की डकैत। हड़कंप मचि‍ गेलै। सभ गोटे उठि‍ कऽ ठाढ़ भऽ गेलै। कि‍छु लोक सभकेँ शान्‍त कऽ रहल अछि‍।
भाय एनामे काज नै चलतौ। पाँचटा पंच एकान्‍तमे वि‍चार कर। ने तँ महाभारत भऽ जेतौ।
देखि‍यौ पंच भगवान, ऐ छौड़ाक कि‍रदानी। सभटा हमर लताम तोड़ि‍ लेलक।
लि‍अ पंचक बेटा चोर। आब करू फैसला।
अच्‍छा चुप रहू। एकर निर्णए दोसर दि‍न हएत।
यएह करै छै केना। जेना छोटका जाति‍क पंचैती भऽ रहल हुअए।
अइसँ नीक तँ ओकरे सभ।
इह, हमरा सभसँ बहुत नीचो जाति‍ तँ अछि‍!
तइसँ की। आखि‍र छी तँ शूद्रे।
चुपू हमर छूबल सभ खाइत अछि‍।
हँ हँ छुच्‍छे ठेसी।
एकान्‍तमे वि‍चारि‍ कऽ पंच सभ आबि‍ गेल। सुनल जाए। की कहै छै।
सुनू, जागेसरसँ गलती भेलै। ओकरा औरति‍याकेँ एतेक नै पि‍टबाक चाही। बाल-बच्‍चा नै होइ छै तँ ओझा-गुणीसँ देखाबौ। डागदर वैदसँ इलाज कराबौ। तैयो नै हेतैक तँ दोसर बि‍आह कऽ सकैत अछि‍। कि‍ंतु धरमडीहीवालीकेँ राखहि‍ पड़तै। नि‍र्णए सभकेँ मंजूर अछि‍?”
हँ-हँ, दसक नि‍र्णए, भगवानक निर्णए। मंजूर अछि‍। सभ मानि‍ लि‍औ।
ढोढ़ाय गुरुजी सोचै छै भुस्‍सा मि‍लत की नै।
खेलावन भगत मोंछ पि‍जा रहल अछि‍। गाममे भगत तँ हमहींटा छी।
धर्मडीहीवालीक बाप कनहा मैनजनकेँ कहने छै। जँ अहाँ ऐ सम्‍बन्‍धकेँ नै टूटए देबै तँ जोड़ा भरि‍ धोती देब।
ओकर बामा आँखि‍ फड़कि‍ रहल छै।
उचि‍तवक्‍ता दौड़ल आएल आ बजल-
हे यौ धर्मडीहकेँ कन्‍हैया मैनजन! अहाँकेँ चौबटि‍यापर पुलि‍स खोजि‍ रहल अछि‍। कोनो मोकदमामे नाओं अछि‍ की?”
आऍं।
मैनजन धोती सम्‍हारैत पड़ेला। एकाएकी सभ उठऽ लगल। डरक पंजा जेना बढ़ऽ लगल। सबहक अन्‍तरक दोख जेना ठाढ़ भऽ गेल हुअए। स्‍वर जेना हवामे अलोपि‍त भऽ गेल हो कि‍ंतु पएरक गति‍मे तीव्रता आबि‍ गेल छेलै। धोनाह भऽ गेल असमान दि‍स तकबाक केकरा फुरसति‍ छै।

mmm


स्‍वार्थक कारणे दुनू परानीमे झगड़ा भेनाय स्‍वभावि‍के अछि‍। झगड़ाक बाद देह आ मन अलग हेबे करतै। वएह सुआरथ फेर दुनूकेँ मि‍लन करबौतै। से बात साँचे कि‍न्‍तु झूठे। जे हुए कि‍न्‍तु झगड़ाक बाद मि‍लन एक तरहक नव संचार करैत छै, मोनमे। जेना लगैत रहै छै जे सभ कि‍छो अभि‍नव भऽ गेल हुअए। दमि‍त लीलसा सभ फन-फनाक ठाढ़ भऽ गेल हो। मनक फुलवाड़ीमे नव नव फूलक आगमन। भनभनाइत भ्रमर। आबि‍ जाइ छै- अभि‍नव प्रीत!
धर्मडीहीवाली आपस आबि‍ गेल छै। जागेसर आब डरे कि‍छो नै बजै छै। एक सए झंझटिसँ एकेटा झंझटि ठीक। ठीके कहै छेलै उचि‍तवक्‍ता- ‘मौगीसँ जे अराड़ि‍ करबें तँ सभ नेबाबी भीतरी घोंसारि‍ देतौ आ बोलती बन्न भऽ जेतौ।
धर्मडीहीवालीपर भनभनि‍याँ भूत सवार भऽ गेल छै। जखनि-खनि भनभनाइते रहै छै। कोन ठेकान छै। लोक कनी हटि‍ए कऽ ओकरासँ गप करैत अछि‍।
धर्मडीहीवालीक मोनक बात के बूझत। जखनि ओ असगर होइत अछि‍ तखैने ओकरा अगल-बगलमे सखी, सेहेली, भर-भौजाइ, अड़ोसी-पड़ोसी सभ ठाढ़ भऽ जाइत अछि‍। जहि‍ना नैहरामे ठाढ़ होइ छेलै, तहि‍ना। ओकरा सभकेँ कि‍यो नै देखै छेलै। देखतै कि‍ए। मोनक आँखि‍सँ देखै छेलै मात्र धर्मडीहीवाली, आ गप्‍पो करै छेलै
गे ि‍नरमला, सन्‍तान कोन भारी चीज छै। चाहनेसँ कोन चीज नै होइ छै। कनी दि‍माग लड़ा सभ कुछो ठीक भऽ जेतौ। देखै छी दि‍दि‍याकेँ। ओकरो सासुरमे अहिना झगड़ा होइ छेलै। बेटा जनमैते रानी बनि‍ गेलै।

है शुरूमे तँ बहुतो हल्‍ला-फसाद भेलै। बदचलन छै। बेहया छै। कि‍न्‍तु सभ कि‍छो रसे-रसे दबि‍ गेलै। के केकरा याइद रखै छै, कथी। फुरसैतमे दोसरोक गप मोन पड़ैत छै आ काजक बोझ जँ माथपर रहै तँ अपनो वि‍षयमे बि‍सरि जाइत अछि‍।
ई तँ एहेन दुनि‍याँ अछि‍। जे जखनि ढोल पि‍टैक हएत तखनि केकरो सुगबुगाइतो नै देखबै। आ जँ चुप्‍पी साधि‍ लेबाक बखत हएत तँ बाघ जकाँ गर्जन करए लगत।
के कथी बजै छै से बात छोड़ू। अपना वि‍षयमे सोचू। अहाँकेँ बच्‍चा चाही। ओकरा जन्‍म दि‍अ पड़त। डागदर-वैद्य गहवर-भगत चाहे जतएसँ हुअए।
धर्मडीहीवाली हँसैत अछि‍ भनभनाइत...। फेर तमसा जाइत अछि‍। डरे खोलि‍ कऽ नै बजैत अछि‍ कि‍न्‍तु पति‍केँ देखिते ओर मान घि‍‍रनासँ दुबकिजाइत अछि‍। कोनो काज मोन लगा कऽ नै करैत अछि। जेना उड़ी-बि‍ड़ी लगले रहैत अछि‍।
आब जागेसरो मनकेँ मारने रहैत अछि‍- डरे...। फेर ने पर-पंचैती बैसि जाए। आ समाज थू-थू करए लगे।
समए पाबि‍ मुँह दाबि‍ कऽ कखनो काल कहि‍ दैत अछि‍।
ओइदि‍न खेलावन भगतसँ झगड़ि‍ गेलिऐ। कहू तँ ओकरासँ फेर देखा दी। नै तँ महतो बाबा लग डाली लगबा दी। वि‍सवास नै होइत अछि‍ तँ डागदर-वैध जैठाम चलब ततहि‍ चलू।
कि‍न्‍तु धर्मडीहीवालीकेँ दिल-मोन तँ भरबे नै करै छै, गपसँ जेना। हरदम देहमे आगि‍ लगले रहै छै। सुतैत-बैसैत बेचैन। सोचैत छै- जँ पति‍ चाहैत अछि‍ तँ आइ भगतसँ भेँट करबै।
कौआ, मैना, बगरा सभ एकेठाम खेलाइ छेलै। चि‍ल्हौड़क छाँह देखिते सभटा एकेबेर फड़फड़ा कऽ उड़ि‍ गेलै, अासमान दि‍स...
खुला अकासमे उड़ैत एक खुंडी मेघ। धर्मडीहीवालीक छाती धुकधुका उठल। नै जानि‍ कि‍एक...

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सुनमसान बाधमे असगरे पीपरक गाछ। कोनो बटोहीकेँ छाँह दइले ठाढ़ छै। केतेको दि‍नसँ छै। कि‍न्‍तु आइ उ गाछ नै छै जे पहि‍ने रहए। ओइसँ की? गामक सीमानक निर्णए तँ गाछे करतै। एकरे धोधहैरमे बैसि कऽ प्रेत बोमि‍येतै आ डेरबुक लोक एक कोला हटि‍ कऽ चकोना हएत पड़ैतै। बुधि‍यार लोक सात बेर गोर लगिछाँहमे जि‍रेतै। कौआ जँ छेर दइ तँ तुरत्ते उठि‍ कऽ चलि‍ देतै। असगुन भेलौ भाग...। असगरमे फुनगी दि‍स तकबाक साहस केनाइ बुड़बक सबहक काज छि‍ऐ।
दूबज्‍जी गाड़ीक सीटी ऐ गाछ लग ठाेकले चलि‍ अबै छै। अजय गाछक छाँहमे ठाढ़ भेल। तीन बरि‍सक बाद गाछकेँ देखि रहल छै। ऐ बीचमे कहुना कौलेजक पढ़ाइ पूरा केलक। बी.. पास केनाइ कोनो मामूली गप छि‍ऐ! छाँहक बात मानि‍ ओ रूखगर जगहपर भि‍नभि‍नाइत बैसि गेल।
सबचीज ओहि‍ना छै। तैयो बदलि‍ गेलै। बहुत दि‍न बि‍तला बाद देखलहो चीज अनचि‍न्‍हार बुझाइ छै।
झटकलाल मड़रकेँ लोक सभ झटकू मड़र कहै छै। कारण-कहैमे सुवि‍धा आ झटकू मड़र कोनो तमसाह बेकती नै छै, जे कोनो डर हेतै।
झटकलाल मड़र मनमे बड़का-बड़का लीलसा पोसने छल। चाहे जे करए पड़ए। बेटाकेँ पढ़ेबै। अजय बेसी पढ़त तँ बड़का हाकि‍म बनत। बापोकेँ नाओं जाति‍-जवारमे चमकैत रहत।
खरचा तँ दि‍ऐ पड़तै। आखि‍र बड़का हाकि‍म। जेते तेल देबै ततबे ने गाड़ी दौड़तै। नै छै रूपैआ। की तकै छी? शीशोक गाछ बेच। नै भेलौ तँ बाँस बेच। बेसी पैसा लगतै। कोनो मूतनार-हगनार खेत बेच ले। की यौ मालि‍क?

मालि‍क खेतक जड़सीमनबला रूपैआ दैत टि‍टकारी मारने रहए-
बाप बनौरा पुत्त चौतार, तेकर बेटा नेड़हा फौदार। देखि‍हेँ बादमे बापकेँ सरवेन्‍ट ने कहौ।
कि‍छो करतह कि‍न्‍तु पढ़ावह। पढ़लासँ बुइधगर मनुक्‍ख तँ बनबे करतह।
अजय सुनैत छल- कात-करोटसँ। कि‍छ गप संगी साथीसँ बुझि‍ लैत छल। बीख-अमरीत पि‍बैत चलैत जि‍नगी!
सभ आस तँ पूरे नै होइ छै। कि‍छ बँचलो रहै छै तँए ने जि‍नगीक दौड़ा-दौड़ी होइत रहै छै एक दोसरकेँ पछोड़ धेने दौड़ैत रहै छै। फेर नवका आश ठाढ़ भऽ जाइ छै।
केते कुद-फान केलक-अजय। कि‍न्‍तु मोन मोताबि‍क नौकरी नै भेट सकलै। ओने झटकलालक अभि‍लाषा!
सोचै छै अजय- बाबूजीकेँ केतएसँ पता चलतै जे अइठाम कोन-कोन खेल चलै छै। भ्रष्‍टाचार आ ति‍कड़म केहेन नाच नचै छै। केना उनटा छुरीसँ हलाल होइ छै- लोक। हमरा जाति‍मे तँ कोनो बड़का नेतो नै छै। एक आध जँ छै तँ ओहो झोरउगहा। फेर तरघुसका रूपैआ केतएसँ एतै? ने पैरबी आ ने पैसा तँ सड़कपर टहल लगाउ।
नौकरी-चाकरी नै भेल तँ पढ़लौं कथीले?
जेना पीपरक धोधरि‍मे सँ कोइ पुछलक-
केतए जाइ छहक- अजय? गाम? गाममे के पुछतह तोरा? कोन काज करबहक तूँ? गमैया कोन काज हेतह तोरा बुत्ते? हर-कोदारि‍ चला सकै छहक तँू? रौद-बसातमे रोपनी-कटनी कऽ सकै छहक? गामक वि‍द्वानक बीच रहि‍ सकबहक? ऐठाम केकरोसँ कोइ कम नै बुझै छै। लि‍खनाइ-पढ़नाइ भले नै जनैत छै कि‍न्‍तु सभ छै- ज्ञानवान वि‍द्वान। सबहक अपन-अपन वि‍चार आ थ्‍योरी छै। लाठीक सहारासँ चलैबला साँढ़ जकाँ ढेकरैत अछि‍। जेकरा घरमे एक साँझक खरचा नै छै ओकरो गप करोड़पति‍ जकाँ चलै छै।

अट्टहासक स्‍वर-
हा-हा-हा-हा, गाममे तूँ नै रहिसकबहक। मि‍स्‍टर अजय कुमार, तोरा सभ अजैया कहतह। बी..क डि‍गरी हवामे उड़ि‍ जेतह-फर-फर। ऐठाम शहरी ज्ञान तँ दूरक गप छै, तोहर कोनो बात कोइ नै सुनतह। ही-ही-ही।
अजय गरजैत बजल-
जरूर सुनतै। तँू चुप रह। हम समाजमे पसरल कुरीतकेँ हटेबाक कोशि‍श करबै। ऐठामक जड़ता आ जि‍दकेँ तोड़ए पड़तै। देशक अंग-अंगकेँ साफ आ स्‍वस्‍थ्‍य करए पड़तै। गाम-गाममे सुधार भेलासँ देशक सुधार हेतै। समाज बदलतै। नव समाज बनबए पड़तै। कि‍छ लोककेँ बीड़ा-पान उठबए पड़तै।
अजय हाथ चमकबैत जोर-जोरसँ बाजए लगल।
शीला बड़ीकाल पहि‍नेसँ ओइठाम एकटा झोंइझमे नुकाएल अछि‍। ओ अजयकेँ हाथ-देह फड़कौने आ चि‍चि‍या कऽ असगरेमे बजनाइ देखि रहल अछि‍। उ डेराएल सन सुरमे अजयकेँ टोकबाक प्रयास केलक। कि‍न्‍तु अजय नै सुनलकै। ओकरा पक्का वि‍श्वास भऽ गेलै जे गाछ परक प्रेत अजयकेँ गरसि‍ लेलकै। वएह एकरा देहपर चढ़ि‍ कऽ बजि‍ रहल छै। ऐठाम तँ कोइ छेबो नै करए। केकरा कहतै। कि‍छो जल्‍दी करए पड़तै। आगि‍-पानि‍सँ तँ भूतो-प्रेतो डेरा जाइ छै।
मनमे वि‍चार करैत अगल-बगल देखलक। लगीचेमे एकटा खत्ता छेलै। खत्ताक कोरपर एकटा फूटल बालटी सेहो राखल छेलै। शीलाकेँ तुरन्‍त फुरेलै।
ओ बालटीमे पानि‍ भरलक आ अजयकेँ माथापर उझैल देलकै। अजय चकोना हएत शीला दि‍स दौड़ल।
के छी? एना कि‍एक केलौं। ठाढ़ रहूँ।

शीला उनटि‍ कऽ भागलि‍। जेकरा देहपर भूत चढ़ल छै। से की करत, कोन ठेकान।
अजय झपैट कऽ पाछूसँ शीलाकेँ पकड़लक। तैयो शीला छुटबाक प्रयास कऽ रहल छै। जमीन भीजल छेलै पकड़-धकड़मे दुनू खसल। तरमे शीला ऊपरसँ अजय चढ़ल।
मुँह देखिते अजय चौंकैत बजल-
शीला, अहाँ छी। एना ि‍कएक केलौं।
अहाँ असगरेमे अड़-बड़ बजै छेलौं। हमरा तँ बुझाएल जे अहाँपर प्रेत चढ़ि‍ गेल अछि‍। आब बुझाइत अछि‍ अहाँपर सँ उतरि‍ कऽ हमरापर चढ़ि‍ गेल अछि‍।
तेकर मतलब हम प्रेत छी?”
अहाँ भूत-प्रेत नै चोर छी। तब ने हमरा मनक चोरि‍ केलौं आ नि‍पत्ता भऽ गेल छेलौं। आबो देहपर सँ हटू ने।
नै हटब।
जल्‍दी हटू। नै तँ धकेलि देब। देखै छि‍ऐ कोइ आबि‍ रहल छै।
दुनूक मन केतेक बरि‍स पाछू चलि‍ गेल छेलै से पता नै। जेना पछि‍‍ला स्‍वर्गक सरोवर सोझहा आबि‍ गेल छेलै। आ ओइमे दुनू संगे-संग जल-खेल करए लगल छेलै। गाछ परक चि‍ड़ै-चुनमुनी ओइ खेलकेँ देखैत चुन-चुन करैत ओकरा सभक आनन्‍दमे अपन उपस्‍थि‍ति‍ दरज कऽ रहल छेलै
वि‍रह आ प्रतीक्षाक कथा चलैत रहल। केतेक देरसँ पता नै। वर्तमान उपस्‍थि‍ति‍ भेल तँ अजय पुछलक-
अहाँ एमहर केतए आएल छेलौं?”
शीलाकेँ हँसी लगिगेल कि‍न्‍तु ओकरा आँखि‍मे नोर भरल छेलै
हमर काका-काकी जहि‍या झगड़ा करै छेलै तहि‍या-तहि‍या अइठाम सुनहटमे आबि‍ जाइ छेलौं आ अहाँक बाट जोहैत रहै छेलौंकेतेक माससँ अहाँक इन्‍तजारी करैत समए काटै छेलौं। जखनि कोनो चि‍ड़ै टा समाद नै दइ छेलै तँ कानैत-कानैत आपस घर घूमिजाइ छेलौं। आइ सगुनि‍याँ चि‍ड़ैकेँ दरशन भाेरे भेल छेलै। भेँट भऽ गेल।
हम तँ सोचने रही जे अहाँक बि‍याहो भऽ गेल हेतै। कोरमे बच्‍चा खेलाइत हेतै। कि‍न्‍तु आब बुझाइत अछि‍ जे हमहूँ भाग्‍यशाली छी। शाइत दुनू गोटे एक दोसर लेल बनल छी।
धुर, बि‍याहक बात की करैत छी। हमर पि‍तयौत बहि‍न लीलीयाक बि‍याह होइबला छै। की हेतै से नै जानि‍। जाति‍क सभटा लोक अरचन रोपै छै।
अरचन कि‍एक? ऐठाम लोक तँ बि‍याहकेँ यज्ञ बुझै छै तँए एक-दोसरक सहयोग करै छै।
हँ से तँ ठीके। कि‍न्‍तु हमर पलि‍वार तँ ढाठल छै। बागल छै। हमरा परि‍वारकेँ जाति‍सँ अलग कऽ देने छै।
अजय चौंकैत पुछलक-
जाति‍सँ अलग कि‍एक कऽ देने छै?”
मुड़ी झुकौने शीला मन्‍द स्‍वरे बजली-
बाबूजी केँ मरलापर काका सराध-गैतक भोज नै केलकै। केतएसँ टका लाबि‍तै। ओइ साल फसि‍ल नीक नै उपजल छेलै। सभ मुँहपुरूषकेँ कहलकै- जे हमरा घरमे कोनो उपए नै छै। रोटी नै जुमै छै तँ भोज केतएसँ करब। कि‍न्‍तु भोजक नाओंपर सभ जाति‍ एक भऽ गेलै। ओ सभ कहलकै-
अकलू मड़र दोसराक भोजमे बड़ फानै छेलै। जे भोज नै करए से दालि‍ बड़ सुरकाए। ओकरा सराधक भोज लगबे करतै। जँ पूरा जाति‍केँ भोज नै देतै तँ जाति‍सँ अलग। आगि‍-पानि‍ सभ बन्न।
भोजक एतेक महत्‍व छै अपना समाजमे।
की कहब घरमाबाबूपर घर ढुक्का पंचैती हएत रहए। चट दऽ धरमाबाबू भोज गछि‍ लेलकै आ कहलकै-
उ तँ झूठ-मूठ हमरापर आरोप लगबै छै।
भोजक नाओंपर सभ कुकरम माफ भऽ गेलै। अजय अवाक्! शीलाक मुँह दि‍स ताकि‍ रहल अछि‍। मोनमे बि‍हाड़ि‍ सन उठल छै। जेना ओकरा सौंसे देहमे जाति‍क जाल लटपटा रहल छै।
कोइ आबि‍ रहल छै। अहाँ संगे देखि लेत तँ की हेतै पता नै। कहैत शीला धड़फड़ा कऽ उठल आ टोल दि‍स चलि‍ देलक।
वएह बाट छि‍ऐ कि‍न्‍तु लगै छै ऊ नै छि‍ऐ। अजय अपना घर दि‍स बढ़ि‍ रहल अछि‍। ओ सपनामे छै आकियर्थाथमे पता नै। कि‍न्‍तु गाम दोसर रंगक लगै छै। ओ लवका रंग ओकरा आँखि‍मे छै आकि...


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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

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