Tuesday, August 13, 2013

‘विदेह' १३४ म अंक १५ जुलाइ २०१३ (वर्ष ६ मास ६७ अंक १३४) Part I

विदेह' १३४ म अंक १५ जुलाइ २०१३ (वर्ष ६ मास ६७ अंक १३४)India Flag Nepal Flag

 

अंकमे अछि:-
 बिन्देश्वर ठाकुर-विहनि कथा - पश्चताप - उपकारके चुपकार- प्रतिशोध - जेहन करणी तेहन भरणी 
उपन्यास-भादोक आठ अन्हार-क किछु अंशजगदीश प्रसाद मण्‍डल

राम वि‍लास साहु-वि‍हनि‍ कथा-शि‍क्षाक महत

स्‍वयंवर-(एकांकी नाटक)-जगदीश प्रसाद मण्‍डल

 विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन  

 


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गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज'


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विहनि कथा - पश्चताप - उपकारके चुपकार- प्रतिशोध - जेहन करणी तेहन भरणी 
पश्चताप 

-
जुगल भाई रे एना किय मुह बिझकौने छे ? बुझाइछौ जेना चेहरापर १२ बाजि गेलौ । 
-
हौ भैया कि कहियो हमर सब मेहेनेतपर पानि फेटागेलो । अपन पेट काटि-काटि बेटाके पढौलीयो । जते जते ढौवा मङ्गलकै सब देलीयै । मुदा आइ S.L.C के परिणाम देखि मन बिक्षिप्त भ गेल । 
-
से किय रौ पास नै कयलकौ छौडा से ?
-
हौ कि पास करतै । ७ गोटे बिषयमे लगालेलकै । पढ कहैत छलियै त मनुसगैन्ह लगैत छलै । स्कूल जएबाक बहाना बनाक घरक कोनो काज नै करैत छल । मुदा पढ कि जेतै ओ त स्कूल समयधरि अपन साथी-सङ्गीसँगमे रङ्गरसीया मनबैत छलैक । आब ओकरे साथ साथ पढबला छौडासभके अपन सफलतापर नचैत देखैत छैक ओकर करेज कटैछै । एखन भोरेस पलङ्गपर ओङहरिया देने छै । बफाडि टोडिरहल छै सबेरेस । मोहनाक बेटीसँग मुठ्ठाके मुठ्ठा रुपैया ल क जे सिनेमा देख जाइत छलैक सेहो घट्ना ओकरा काट छुटै छै आ अपन करणीपर बेर बेर पश्चताप करैत छैक । मुदा आब पश्चतैने होएत कि ? समय त गुजैर गेल अछि । आ बितल समय कहु घुरिक फेर एलैय ?


उपकारके चुपकार

हम जयनगरस अबैत छलौ । रस्तामे देखलौ एकटा महिला अपन ६ महिनाक बच्चाके गोदीमे ल क कनैत छल । लगमे जा जखन देखलीयै त ओ हमरे पडोसी मनोजके भन्सीया रहैक । माने हमर गामक भौजी । घर एकेठाम होएबाक कारण हमसब एकदोसरके बड निकजका जनैत छलौ । हमरा देखि ओ आओर जोड जोडस हिचैक हिचैक कानअ लगलीह । कि भेल भौजी छोट बच्चाक लेने एना किय भागल जाइत छी ? प्रश्नके उतरमे ओ बजलीह - "हमरा एहि दुनियाँमे कियो नै अछि । जत ततस हम ठोकरे खाइत छी ते हम मरि जाए चाहैत छी । हमरा छोडि दिअ । ।जत मन होएत तत चैल जाएब । ने त जहर माहुर खा मरि जाएब ।" 
एहन पिडाएल बात सुनि हम नम्रस पुछलीयै - भौजी एना किय बजैत छी ? घरमे फेर झगडा भेल से ? तब ओ अपन दु:ख भरल कहानी बताब लगलीह - बच्चा कानअ लगबाक चल्ते खाना समयपर नै बैन सकल ताहिस हुन्कर ससुर सासु आ पतिदेव सेहो पिटलकनि आ घरस भगादेलकनि । 
पितखीसमे ओहिना बाजल हेताह ओसभ चलु अहा । घर छोडि नै जाउ कतौ । कतेक सम्झौलाक बाद ओ आब लेल राजी भेलनि । जखन हम अपनासँगे मोटरसाइकिलपर लाबि ओकरा दूरापर उतारलौ त उनकर ससुर,सासु आ हुन्कर पती हमरा उपर उल्टे लाल्छना लगौलक । तोरे कारण इ मौगीया अतेक बहसल छै । तोरे सिखाएलपर एके टाङ्गपर नचैत छै । आदि आदि ....
तखन हम महशुस कयलौ जे दोसरके इज्जत बचाएब आ अपना बेज्जत होएब । दोसरके भलाई करब अपन चरित्र हत्या कराएब । उपकारके चुपकार एकरे कहैत छैक । 



प्रतिशोध 

नव विवाहित सुभासके आइ सुहागरात छनि । खानपिन समाप्त भेलाक बाद हजारौ सपना तथा प्रेमपूर्ण आशा बोकि प्रियसी इन्तजार क रहल घरदिस बढल । एगोट पैर असोरापर आ एगोट आङ्गनेमे छलै कि भितरस कन्या बाजल -"कनिक हमर पैरक चप्पल नेने आऊ,हम बिसैर गेलौ ।" नवपत्नीक एहन सन्सकारहीन बात सुनि सुभासके करेजपर ठन्का खस्लै मुदा दाम्पत्य जीवनके पहिल दिन आ प्रियसीके प्रथम राति सोचि जखन ओ चप्पल ल क गेलाह त घोघ उठबैत सिना तानिक कन्या बजलीह -"अहाके हम चप्पल लाबलेल अह्रेबाक प्रयोजन बुझलियै ? अहाक बाबुजी मुहमाङ्गी रकम ल अहाके बेचलक अछि आ हमर बाबुजी एक-एक धुर जमिन बेचि हमरा लेल अहाके किनलक अछि । एहि हिसाबे पैसास खरिदल दास भेलहु अहा जे आवश्यकता पडलापर खरिदार किछु करासकैय ।" इ गप्प सुनि सुभासक गर्दन लाजस झुकि गेलैक आ ओ निरुतर भ गेलाह । तखन कन्या फेर नम्र भ कहलनि - इ हम बस अहाके महशुस करएबाक हेतु एकटा अभिनय कयलौ । आजुक बाद एहन किछु नै करब । एखन लेल क्षमाप्रार्थी छी" 
कन्याक आखिमे अपन बाबुजीस लेलगेल पैसाक ज्वाला छल । टकापर बिकाएबला एहन दानवरुपी पतिप्रतिके प्रतिशोधक भावना छल ।



जेहन करणी तेहन भरणी 

साझक समयमे बुढिया अपन नभकी पुतौहके ल क पोखरिझाखरि जाइत छल । तखने ओम्हरस रामगन्जबाली अबैत छलीह । बिचे बाटमे दुनुके भेटघाट भेल आ रामगन्जबाली पुछलक बुढीयास -
यै काकी एकटा बात फेर सुनलियैय केनादन साच्चे ?
-
गे कि सुनलहीय से ?
-
ए बुढीया धनगढीबालीदिया नै सुनलियैय से, कहादन दोसरो घरबला छोडि देलकै ?
-
ह गे सुनलियय हमहु । दूर बररुपियाके कोन बात । बुढारीमे घिढारी क र गेलै त अहिना हेतै ने । 
-
ह यै काकी हे घरमे ककरो नै गुदानै छलै । अपने मनस जे जे मन होइछलै से से करै छलै । घरबला बिचरा परदेशीया २ साल ३ सालमे एकबेर अबै छलै आ फेर चैल जाइत छलै । मुदा ढौवा रुपैया सब एकरे नामपर पठबैत छलै ।कोनो चुइजके दुखो तक्लिप नै । से रन्डिया दुनु बच्चोके छोडिक सब ढौवा ल क ओइ चमरबा मरदबासँगे कोना उढैर गेलै ? आ आब जखन ढौवा चुसल भ गेलैय त लात मारिक भगा देलकैय । निके भेलै कुकर्मीके जेहने करणी तेहने भरणी । आब छिछ्याइत रहो जिनगीभरि ।




मौलाइल गाछक फूल‍, जिनगीक जीत, उत्थान-पतन, जीबन-मरण, जीबन-संघर्ष, नै धाड़ैए, विधवा-सधबा आ बड़की बहिन उपन्यासक पछाति जगदीश प्रसाद मण्‍डलक भादोक आठ अन्हार उपन्यासक किछु अंश...

उपन्यास   
भादोक आठ अन्हार

जगदीश प्रसाद मण्‍डल

आने दिन जकाँ सुरजाकाका जुन्ना आड़िपर राखि पाँज भरि जनेर कटने रहथि आकि‍ हल्ला जकाँ दूरक अवाज बूझि पड़लनि। घास काटब छोड़ि आड़िपर आबि ठाढ भऽ हियासए लगला। दूरक हल्ला दुरेमे, तँए कोनो तेहेन साफ नै घरघराएले बूझि पड़लनि। मन भेलनि जे कनी टहलि-बूलि हल्लाक भाँजो बूझि ली आ पानि‍ओ पीब लेब। पानि मनमे अबि‍ते, मनेमे कटौझ उठलनि। एकटा मन कहनि “पानि पीब” दोसर कहनि “नै पीब।” दुनूक तर्को अपन-अपन आ चालिओ अपन-अपन। एकक तर्क जे धरतीपर सभसँ शुद्ध पानि होइए। दोसरक तर्क जे पानि नै अन्न होइए। आनो-आनो गामक अन्नमे रोगक दोख नै छै जे पानिमे छै। एक्के गामक दोसर इनार वा कलक पानि पीने सरदी भऽ जाइ छै। मुदा तैयो दुनू संगे शास्त्र-पुरानसँ लऽ कऽ चौक-चौराहा धरि‍ तँ टहलिते अछि। देखिनिहार तँ एक-दोसराक प्रेमी कहबे करत। ओना सुरजाकाका जखनि भोरुका उखड़ाहाक काज शुरू करै छथि तइसँ पहिने अन्न-जल कइए कऽ शुरू करै छथि।
मनमे हल्लाक गुनधुनी लगले रहनि आकि‍ एक गोटे मोटर साइकिलसँ सड़क धेने जाइतो आ बजितो जे कोसी बान्ह टूटि गेल। एक दिसनसँ गामक गाम डुमौने अबैए। बिना किछु दोहरौने सुरजाकाका घासक आँटी बान्हि घर दिस बढ़ला।
दस गोटेक परिवार सुरजाकाकाक। पाँच बीघा खेतक बीचक गिरहस्ती। ओना खेतक आँट-पेट छोट रहनि मुदा अपनाकेँ गिरहस्त मानैत। गिरहस्त तँ वएह ने जे अपन खेत-पथारसँ जीवन-यापनक लग घरि‍ पहुँच सकए। पाँचे बीघाक रकबामे एकटा दस कट्ठाक पोखरिओ छन्‍हि‍ जोत जमीनमे एक बीघा घासोक खेती करै छथि, जइसँ खुट्टापर गिरहस्ती जिनगीक एकटा उद्योग लगौने छथि।
खेतक आड़ि टपिते सुरजाकाकाक मनमे उठलनि, जँ कहीं पछि‍ले बाढ़ि जकाँ आएल तँ सभ घर खसि पड़त। केते दिनसँ विचारै छी जे कुरसीओ भरि पक्का बना लेब जे कमसँ कम बाढ़ि‍सँ घर बँचा लेब। से कहाँ भऽ पबैए। ने सरकारी आशा आ ने बैंकक आशा। जँ घर खसि पड़त तखनि की करब? खेतक घास डूमि जाएत। बड़ सहास करब तँ डुमलोमे हँथोड़ि-हँथोड़ि काटब मुदा ओहो तँ तेसरा दिन सड़ए लगत। मुदा बाढ़ि‍क समए तँ बाढ़िक समए भेल। भुसीएक कोन ठेकान, रहत कि भाँसत, नहियोँ भाँसत आ पाँच दिन पानिमे भीजत तँ सड़िए जाएत। घरक अन्नोक तँ सएह गति हएत। एक तँ ऊपरसँ दिन-राति बरखा लधने अछि तैपर एहेन विपति‍ औत। मनुख तँ अनको घर आ स्कूलोक घरमे जा अपन-अपन जान बँचा लेब मुदा चारू गाएकेँ की करब? खुट्टापर गाए खढ़-पानि बेतरे मरि जाएत। अपनो एते दिनक पछाति जोड़ियाएल रोजगारसँ तँ हाथ धुअए पड़त। गाइएक रोजगार कि पोखरिक माछो तँ चलिए जाएत, खेतक धानो कि बँचत? तखनि परिवार कि हएत?
दस डेग आगू बढ़िते दोसराक मुहेँ सुरजाकाका सुनलनि जे कमलोक छहर टूटि गेल। कमला छहर टुटब सुनना पाँचो मिनट नै भेलनि आकि‍ दोसरा गामसँ हल्ला उठल जे गाम डूमि गेल, हौ अगिला गौआँ सभ अपन गाए-माल बँचाबह। जहिना भूखसँ पेटमे बगहा लगै छै तहिना सुरजाकाकेँ बुधि-सँ-विवेक धरि बगहा लगए लगलनि, जइसँ जहिना कनैत बच्चाकेँ गुदगुदी लगा हँसौल जाइए तहिना काकाक मन गुदगुदेलनि। दरबज्जापर अबि‍ते पहिने चारू गाएकेँ देखि पानि पीओलनि‍। उमसगर समए देखि नहबैक विचार केलनि मुदा लगले मेघ झँपा हवा उठि गेलै। किछु विश्रामक समए भेटलनि। तमाकुल चूना खेलनि। खाइते मनमे उठलनि जुग-जुगक खेलौना कोसी-कमला भऽ गेल अछि। बान्ह टुटलापर आकि छहर टुटलापर गामक गाम उजड़ि जाइए। लोक मरै छै, माल-जाल मरै छै, तइ संग फल-फुलवाड़ी, गाछी-कलम नाश होइ छै। मुदा एक दिस बाढ़ि अबि‍ते विनाश शुरू होइत तँ दोसर दिस रंग-बि‍रंगक महजाल फेकब शुरू होइ छै। गामे-गामे रंग-रंगक खिस्सा-पिहानीक माध्यमसँ रंग-रंगक विचार उड़ए लगै छै। केम्‍हरो उड़ै छै जे सात बहि‍न कोसी संगे मिल समुद्र धरि‍क यात्रा करती तँ केम्हारो उड़ै छै कोसी-कमलाक मिलानी हएत। मिथिलांचलक आध्यात्मिक दर्शन केना दबौल गेल अछि। मिथिला आध्यात्म दर्शनक भूमि रहल अछि, जे दर्शन जिनगीक वास्तवीक मूल्यकेँ मूल्यांकन केने अछि।
जहिना अंधविश्वासक बीच समाज बि‍खंडित अछि तहिना शासन पद्यति‍ बि‍खंडित अछि। रंग-बि‍रंगक जाल पसरल अछि। मिथिलांचलक पुर्बी छोरसँ पछिमी छोर धरि‍ करीब पचासोसँ ऊपर बहैए। जे उतरसँ नेपाल होइत अबैए। खाली मधुबनी जिलाक सीमानमे बीस-पच्चीसटा धार बहैए। चीन-भारतक बीच नमगर-चौड़गर पहाड़ी इलाका अछि। नमहर-ऊँचगर रहने बरफो बनै छै जे पिघलि-पिघलि पानि बनि बहबो करैए। तँए किछु धार बरहमसिआ आ किछु बरसाती अछि। तइ संग समुद्रे जकाँ गाम-गामक चौर (नीचरस जमीन) सभ अछि। जइमे लीढ़-समाढ़ भरल छै आ सालो भरि परता पड़ल रहै छै। धारोक अपन-अपन गुण होइ छै। किछु धार असथिरसँ एक्के जगहपर सएओ बर्खसँ बहैत आएल अछि आ अखनो अछि। मुदा किछु धार कटनमा सेहो होइए। मिथिलांचलक कोसी-कमला तही श्रेणीक छी। मिथिलांचलक पुर्बी सीमासँ लऽ कऽ मधुबनी जिलाक पुर्बी छोर धरि‍ पकड़ि धरतीकेँ तेना कऽ कोसी तोड़लक जे उपजाउ माटि‍ या तँ भाँसि कऽ समुद्रमे चलि गेल वा बालुसँ तोपा गेल। बालुक एते मोट पड़त पड़ि गेल अछि जे उपजाउ शक्तीए छीण भऽ गेल छै। तहिना कमला मधुबनी जिलाक बीचो-बीच बोहि माटिक उपद्रव केने अछि। जहिना कोसी पुबसँ पछिम मुहेँ तहिना कमला पछिमसँ पुब मुहेँ आबि सौंसे मिथिलांचलक माटिक उर्वरा शक्ति नष्ट कऽ देने अछि।
सुपौल, मधुबनी, दरभंगासँ होइत दछिनमे गंगासँ घेराएल अछि। मिथिलांचलक धार उत्तरसँ दछिन मुहेँ आ गंगा महरानी पछीमसँ पुब मुहेँ। उकड़ू बनि अछि। जे गंगा भोजपुरी क्षेत्र टपिते मिथिलांचलक दछिनी छोर बंगालक खाड़ी पहुँचैए। मिथिलांचलक उपजाउ वस्तु एक-रंगाह रहने बंगलादेशक ढाका तक लोकक आवाजाही। किछु बेपारोसँ आ किछु गरीबक रोजगारोसँ। भोजपुर क्षेत्रसँ लऽ कऽ गंगाक उत्तरी क्षेत्रक, मिथिलांचलक खानो-पान आ जिनगीक आनो-आनो काजमे एकरूपता आएल। ओना अहुना केतौ धानक खेती हएत तँ जहिना एकठाम धानक बीआ खसौल जाइए, ओकरा उखाड़ि हाथसँ रोपल जइए आ काटल जाइए, ई संबन्‍ध तँ बनिते रहल अछि आ बनिते रहत। एक तरहक जिनगी जीनिहारक बीच जिनगीमे एकरूपता अबै छै। प्राग ज्योति, द्वार वंग, इत्यादि शब्द किअए बनल? खैर जे होउ।
दरभंगा-समस्तीपुरसँ पूब आ सहरसासँ पछिम कुशेसर स्थान इलाकामे अखनो उजाड़ि पड़ल छै। केना नै पड़त? जइ इलाकामे किछु क्षेत्र बारहो मास आ किछु क्षेत्र तीन मास-सँ-नअ मास धरि‍ पानिमे डुमल रहैए ओइ खेतमे माटिक उपजा केना हएत? माटि रहितो पानि बनल अछि। मनमे अबिते विचार बढ़लनि। जैठाम पानिक ई स्थिति रहत तैठाम माठिक वा पानिक उपयोग केना हएत? ओहन खेती नै भऽ सकैए जे माटिक छी। गाछी-कमल नै लगि सकैए। बड़ हएत तँ बोनही जमुनी हएत। जे अपने अष्टावक्र रूपमे जीवन धारण करैत। मुदा जे होइ इनारक जौमैठ आ पोखरिक घाटक अधिकार तँ ओकरा छइहे। खेतीक स्थिति बि‍गड़ने खेती आश्रि‍त कल-कारखाना केना लागि पौत? कारखानाक बात तँ कनी दूर, जे लगक काज भेल जे बिनु घासक खेतीसँ मबेशी पालन केना हएत? गीत गौने तँ नै हएत की मिथिलांचलमे दूधक धार बोहै छेलै। जैठाम भोजनक असुविधा रहत, काँच घर रहने रखैक असुविधा रहत तैठाम घास कटैबला, दुध दुहैबला हाथक कोन काज। दहेला पछाति समए खटियेने रोपैक समए नै रहै छै, जँ जीबट बान्हि रोपलो जाइ छै तँ फसिल बि‍लम भेने अगिलाकेँ आगू धकेलि‍ दइ छै। जइ धकला-धकलीमे फँसल अपन वाजिब उपज नै दऽ पबैए। बाढ़ि-रौदी सभ दिनसँ होइत आएल अछि आ आगुओ हएत? दुनू मौसमी खेतीक बाधक छी। ऐ बाधाकेँ केना भगौल जाए? पोखरिक माछोक तँ यएह स्‍थि‍ति‍ हएत, ने रौदी भेने हएत आ ने बाढ़िसँ बँचा पएब, तखनि? उदास भेल सुरजाकाकाकेँ बेसल देखि चुनमुनियाँकाकी आबि चहकली-
“कथीक सोग पैसल अछि जे नीको मनकेँ अनेरे मारि कऽ बैसल छी। बाध-बोनसँ एलौं हेन तबधल हएब, झब दऽ छिड़िएलहा काजकेँ सम्हारि नहाएब-खाएब अराम करब कि‍ अनेरे मुरदा जकाँ मन मारने छी।”


राम वि‍लास साहु
वि‍हनि‍ कथा-
शि‍क्षाक महत

जीबछ घरजमैया छल। हुनकर पत्नी रधिया, माए-बापक एकलौती बेटी बड़ दुलारि‍ छलि। रधि‍याक पि‍ताकेँ चारि‍ बीघा चास-बास, कलम-बाँस आ गाए-बड़द छल। खेती-बाड़ीसँ जि‍नगी चलै छेलनि‍। सोझमति‍या रहने कोनो क्षल-कपट नै रहनि। पि‍तमरू छला। परि‍वारमे अक्षरक बोध केकरो नै रहनि‍ खाली जीबछ ट-ब कए कऽ साक्षर छल। रधि‍याक पि‍ता जरूरति‍ पड़लापर जखनि‍ समाजमे कोनो लेन-देन करै छला तँ औंठेक नि‍शान दइ छला।
एक साल एहेन समए भेलै जे इलाकाक इलाका बाढ़ि‍-पानि‍सँ दहि‍ गेलै। ने नेवान करैले अन्न आ ने दाँत खोदहैले नार-पुआर भेलै। दोसर साल रौदी भऽ गेलै। एक तँ बाढ़ि‍क मारल, दोसर रौदीक जरल। गरीब-गुरबाकेँ गुजर कटनाइ पहाड़ भऽ गेलै। केतेको परि‍वार तँ आन-आन गाम अपन-अपन कुटुमैती जा कि‍छु दि‍न समए कटकल। मुदा ई सुवि‍धा सबहक नशीव नै छेलै। गामक नम्‍हर जमीनदार, मालि‍क-गुमस्‍ता जे छला हुनका तँ पहुलके सालक पुरना अन्न बखारीक-बखारी भरल छेलनि। हुनका सभकेँ कोनो चि‍न्‍ता नै छेलनि‍। रधियाक माए-बाप बूढ़ रहने आन गाम जा केना काज करत। ओ दुनू गामेमे मालि‍कसँ कहि‍यो मरूआ तँ कहि‍यो धान तँ कहि‍यो छाँटी चाउर कर्जा लऽ समए काटै छल। कर्जा देनि‍हार मालि‍क सभ वि‍पति‍क समैमे गरीबक शोषण सेहो करैत। एक मन अन्नक बदला दू मन आ दोसर साल चुकेलापर तीन मनक करारीपर कर्जा लगबैत। तेकर बादो औंठाक नि‍शान एकटाकेँ के कहए जे तीन-तीनटा छाप कागतपर लइ छेलखि‍न। गरीब अपन परान बँचाएत आकि‍ छापक परबाह करत। कर्जा खेनि‍हार थोड़े बुझै छल कि‍ छाप देबै कागतपर आ हमर जमीन जत्‍था चलि‍ जेतै तक्खापर।
एक दू साल समए बि‍तलै। जीबछ अपन सौसुराइरिएमे सासु-ससुरक सेवा आ खेती-बाड़ी कऽ गुजर-बसर करै छल। कि‍छु समए पछाति‍ सासु-ससुर मरि‍ गेलखि‍न। श्राद्ध-कर्मसँ नि‍वृत भेलै छल आकि‍ गामक मालि‍क-गुमस्‍ता लोकनि‍ अपन-अपन कागत लऽ जीबछ ऐठाम पहुँचए लगला। कर्जा तँ करारीपर देने रहनि‍। ओ अवधि‍ बीति‍ गेल छल। कर्जा खेनि‍हार पहि‍ले कागतपर छाप देने रहनि‍। ओइ कागतपर मालि‍क-जमीनदार लोकनि‍ जमीनक खाता-खेसरा रकबा लि‍खि‍ कऽ अपन नाओं कऽ लेलनि‍। गरीब सबहक जमीन मालि‍क-गुमस्‍ता हरपि‍ लेलकनि‍। जइमे रधि‍याक जमीन सेहो चलि‍ गेल। आब जीबछ-रधि‍याकेँ दूटा बेटी, एकटा बेटा आ परि‍वारक भरन-पोषण करनाइ कठि‍न भऽ गेल। जीबछ कमाइ खातीर बाहर चलि‍ गेल। बाहरमे पढ़ल-लि‍खल आदमीकेँ नोकरी जल्‍दीए होइ छेलै आ बेसी दरमाहा सेहो भेटै छेलै। जीबछ बेसी पढ़ल तँ नै मुदा साक्षर छल। जइसँ शि‍क्षाक महत जि‍नगीमे केतेक होइ छै से मोने-मन महशूस करै छल।
जीबछ ट--ट काए कहुना कऽ चि‍ट्ठी लि‍खि‍ घर पठेलक। ओइमे बेटा-बेटीकेँ पढ़बैले रधि‍याकेँ प्रेरि‍त करैत कहै छल जे पढ़ाइमे जेते खरच लगत, हम कमाए कऽ पठाएब मुदा अहाँ धि‍या-पुताकेँ पढ़बैमे कोनो कोताही नै करब। रधि‍यो मोने-मन सोचै छेली जे नीक लोक बनबाक लेल शि‍क्षाक बड़ महत छै। जे हम आ हमर माए-बाप जँए नै पढ़ल छेलौं तँए ने सभटा जमीन मालि‍क-गुमस्‍ता हरपि‍ लेलनि‍। जखनि‍ पढ़ल रहि‍तौं तँ ई मुसि‍बत नै अबि‍ताए। हम सभ जे केलौं से केलौं मुदा धि‍या-पुताकेँ जरूर पढ़ाएब। अइले हमरा जे परि‍श्रम आ ति‍याग करए पड़त ओ करब। ओ सभ दि‍न अपन धि‍या-पुताकेँ समैपर संगे जा स्‍कूल पहुँचाबए लगली।
रधि‍याक टोलेमे बुच्‍ची बाबू छला। बुच्‍ची बाबू अंचलमे बाड़ाबाबू छथि‍। छुट्टीमे घर आएल छथि‍। हुनका काल्हि‍ भोरे ट्रेन पकड़ि‍ ड्यूटीपर जेबाक छेलनि‍ से रधि‍याकेँ कहलखि‍न-
रधि‍या, कि‍छु सामान अधि‍क अछि‍। गाममे कएक गोटेकेँ कहलि‍ऐ जे काल्हि‍ भोरके ट्रेन पकड़ब से कनी सामान स्‍टेशनपर पहुँचा दि‍अ, मुदा कि‍यो तैयार नै भेल। तूँ कनी पहुँचा दइ। हम तोहर बड़ उपकार मानबो।
रधि‍या बाजलि‍-
ठीक छै, कअए बजै चलब। कहि‍ दि‍अ हम समान पहुँचा देब।
बुच्‍ची बाबू बजला-
सात बजे भाेरेमे चलब। कि‍एक तँ आठ बजेमे ट्रेन छै। तीन-चारि‍ कि‍लो मि‍टर स्‍टेशन दूरो छै।
रधि‍या भोरे उठि‍ सभ काज कऽ जलखै बना धि‍या-पुताकेँ खाइले दऽ बजली-
तँू सभ जल्‍दीसँ खो, आइ कनी पहि‍नहिए तोरा सभकेँ स्‍कूल पहुँचा दइ छि‍यौ, तखनि‍ बुच्‍ची बाबूक समान पहुँचबैले टीशन जाएब।
     एम्‍हर बुच्‍ची बाबू तैयार भऽ रधि‍याक बाट तकै छला। पाँच मि‍नट पछाति‍ रधि‍या पहुँचली। बुच्‍ची बाबू तमसाइत बजला-
रधि‍या, तोरा कहने छेलि‍ओ साते बजै चलैले, देरी भऽ गेल। ट्रेन छूटि‍ जाएत। तोरा कोनो चि‍न्‍ता नै।
रधि‍या बजली-
अपने तमसाउ नै। धीरे-धीरे बढ़ू हम समान लेने लफरल पि‍ट्ठेपर आबि‍ रहल छी। कनी धि‍या-पुताकेँ स्‍कूल पहुँचबैमे देरी लागि‍ गेल।
बुच्‍ची बाबू-
पहि‍ले सामान पहुँचा दइतैं, हमरा ट्रेन छूटि‍ जाइत। एक दि‍न तोहर बेटा-बेटी स्‍कूल नै जेतौ तँ की हेतै। एक्के दि‍न कोनो पढ़ि‍ कऽ कलक्‍टर बनि‍ जेतौ?”
रधि‍या मोने-मन सोचए लगली, कहै छि‍यनि‍ आगू बढ़ैले से उठि‍ए ने होइ छन्‍हि‍। हम तँ लफरल हि‍नकासँ पहि‍नहि‍ पहुँच जाएब। ट्रेन थोड़े छुटतनि‍। अपने बेगरते आन्‍हर छथि‍। अनेरे गछलौं।
2
स्‍वयंवर
(एकांकी नाटक)



जगदीश प्रसाद मण्‍डल




Jagdish prasad Mandal 6 6जगदीश प्रसाद मण्‍डल

जन्‍म- ५ जुलाइ १९४७
पिताक नाओं : स्व. दल्‍लू मण्‍डल, माताक नाओं : स्व. मकोबती देवी, पत्नी- श्रीमती रामसखी देवी, पुत्र- सुरेश मण्‍डल, उमेश मण्‍डल, मि‍थि‍लेश मण्‍डल। मातृक- मनसारा, घनश्‍यामपुर, जिला- दरभंगा।
मूलगाम- बेरमा, भाया- तमुरिया, जिला-मधुबनी, (बि‍हार) पि‍न- ८४७४१०
मोबाइल- ०९९३१६५४७४२
शि‍क्षा- एम.. (हि‍न्‍दी आ राजनीति शास्‍त्र) मार्क्सवादक गहन अध्ययन। हिनकर कथामे गामक लोकक जिजीविषाक वर्णन आ नव दृष्टिकोण दृष्टिगोचर होइत अछि‍। गामक जि‍नगी लघुकथा संग्रह लेल वि‍देह समानान्‍तर साहि‍त्‍य अकादेमी पुरस्‍कार २०११क मूल पुरस्‍कार आ टैगाेर साहि‍त्‍य सम्‍मान २०११; एवं बाल-प्रेरक वि‍हनि‍ कथा संग्रह ‘‘तरेगन’’ लेल बाल साहि‍त्‍य वि‍देह सम्‍मान २०१२ (वैकल्‍पि‍क साहि‍त्‍य अकादेमी पुरस्‍कार रूपेँ प्रसि‍द्ध) प्राप्‍त।  

साहि‍त्‍यि‍क कृति-‍

उपन्‍यास- () मौलाइल गाछक फूल (२००९), () उत्‍थान-पतन (२००९), () जि‍नगीक जीत (२००९), () जीवन-मरण (२०१०), () जीवन संघर्ष (२०१०), () नै धाड़ैए (२०१३), () वि‍धवा-सधवा (२०१३), () बड़की बहि‍न (२०१३)
नाटक- () मि‍थि‍लाक बेटी (२००९), () कम्‍प्रोमाइज (२०१०), () झमेलि‍या बि‍आह (२०१२), () रत्नाकर डकैत (२०१३), () स्‍वयंवर (२०१३)
लघुकथा संग्रह- () गामक जि‍नगी (२००९), () अर्द्धागि‍नी... सरोजनी... सुभद्र... भाइक सि‍नेह इत्‍यादि‍ (२०१२), () सतभैंया पोखरि (२०१२) उलबा चाउर (२०१३) ‍
बाल-प्रेरक वि‍हनि‍ कथा संग्रह- () तरेगन (२०१०)
वि‍हनि‍ कथा संग्रह- बजन्‍ता-बुझन्‍ता (२०१२)
एकांकी संग्रह- () पंचवटी (२०१२)
दीर्घकथा संग्रह- (1) शंभुदास (२०१२)
कवि‍ता संग्रह- () इंद्रधनुषी अकास (२०१२), () राति‍-दि‍न (२०१२), सतबेध (२०१३)
गीत संग्रह- () गीतांजलि (२०१२)‍, () तीन जेठ एगारहम माघ (२०१२), सरि‍ता (२०१३)




















मि‍थि‍लाक वृन्‍दावनसँ लऽ कऽ बालुक ढेरपर बैसल
फुलवाड़ी लगौनि‍हारकेँ
एवं
नव वि‍हान अननि‍हारकेँ
समर्पित







पात्र परि‍चए-

पुरुष पात्र-
१.    मकशूदन-          २२ बर्ख।
२.    सोनेलाल-           ५२ बर्ख।
३.    सि‍हेश्वर-                 ५५ बर्ख।
४.    रूपलाल-                २२ बर्ख।
५.    जीयालाल-          ४५ बर्ख।
६.    सोहनलाल-          २१ बर्ख।
७.    रौदी-             २२ बर्ख।
८.    मोहनलाल-          २२ बर्ख।
९.    कि‍शोर-                 १५ बर्ख।

नारी पात्र-
    
१.    बुधनी-            ५० बर्ख।
२.    रूक्‍मि‍णी-           ४२ बर्ख।
३.    सुशीला-                 २० बर्ख।


पहि‍ल दृश्‍य-
(सोनेलालक दलान। बेरुका समए। दलानक ओसारक चौकीपर सोनेलाल बैसल आँखि बन्न केने किछु सोचि रहल छथि। मकशूदनक प्रवेश।)

मकशूदन-     काका, छेहा बैसारी भऽ गेल अछि। अहूँ जेना कानमे तूर-तेल दऽ देलिऐ।

सोनेलाल-     हौ, कानमे तूर-तेल कहाँ देलिऐ हेन। केना उपकरि‍-उपकरि‍ लोककेँ कहबै जे हमर काज छह। अनेरे बाबू जन लेब तँ सतरह बापूत अपने छी।

मकशूदन-     उपकरि‍ कऽ केकरो नै कहबै, मुदा काजक उचाढ़ि‍ तँ लगा सकै छी। लोको सभ तेहेन पनिमरू भऽ गेल अछि जे अपनो काज पछुअबैत रहत मुदा समैपर काज नै करए चाहैए।

सोनेलाल-     हौ, लोकोकेँ कि दोख देबै, सभटा समैक किरदानी छी।

मकशूदन-     समैक की किरदानी छी?

सोनेलाल-     तेहेन ने जुग-जमाना आबि गेल जे जेहो किछु पुछै छल सेहो अपने मने मतंग रहैए। किछु कहितो संकोच होइए जे कहीं किछु कहबै आ उनटे मुँह दुसए लगए।

मकशूदन-     हँ, से तँ बेस कहलौं मुदा कनियेँ काजक चालि आ मुँहक बोल बदलैक काज अछि। जखनिए से करए लगब अनेरे जुग संग चलि औत। जुग संग भेल, जमानाक हाथ पकड़ाएल।

सोनेलाल-     कहलह तँ बेस मुदा चालिए ने जिनगी आ बोलीए ने इज्जत छी, जँ सएह उनटि-पुनटि जाएत तखनि तँ जिनगीए ने उनटि‍-पुनटि‍ जाएब भेल।

मकशूदन-     हद करै छी अहूँ काका, एतबो नै सोचै छिऐ जे कोनो वस्त्रक सेखी दिने भरि‍ रहैए, अन्हारमे केकरा के देखैए। केकर ओहन आँखि छै जे देखत।

सोनेलाल-     हौ, कहलह तँ ठीक, मुदा देखै छी जहिना गाम-घरक लोकक ठेकान नै छै तहिना तँ राजो-पाटक सएह छै। केम्‍हर कि करब से बुझैएमे नै अबैए।

मकशूदन-     राज-पाटक कि दैखै छी?

सोनेलाल-     की देखै छी से तूँ नै देखै छहक। हाथमे एटेची नेने आँफिस पहँूच जा, पैघ-से-पैघ काज हाथक-हाथ करौने चलि आबह। मुदा, जँ से नै लऽ कऽ जेबह तँ बड़का आॅफिसकेँ के कहए जे छोटको आॅफिसक काज साल-साल भरि लटकले रहै छै।

मकशूदन-     काका, ओते जे मगजमारी करब से पार लागत। केतौ आगि लगौ आकि‍ बज्जर खसौ अपन कुरथी उलबैक अछि।

सोनेलाल-     हँ से तँ बेस कहलह जे अनेरे अनका दिस मुँह तकै छी। जखनि एके सरकारमे मंत्रीओ सबहक बीच मिलान नै रहै छै, एक-दोसराक काज नै बुझैए, तखनि जनताक तँ जनारदने मालिक किने?

मकशूदन-     हँ, तँ आरो कि। अनकर भजन करैसँ नीक जे अपन दुखनामाक भजन करी।
(रौदीक प्रवेश)

सोनेलाल-           बड़ हलचलाएल देखै छिअ रौदी। केतौ किछु भेल अछि की?

रौदी-        सुनलौं हेन जे गाछ लगबैले सरकार गाछो दइ छै आ देखभाल करैले रूपैओ दइ छै सएह कनी ग्रामसेवकसँ भेँट करए जाएब।

सोनेलाल-     जखनि ओहन काज छेलह तँ पहिने ओम्हरेसँ ने भेल अबितह।

रौदी-        ओमहुरका कोनो ठेकान अछि जे कखनि हएत कखनि नै। तइले अपन मूड बनाएब छोड़ि देब। तोहूमे सौझुका समए छी। ओहो जाबे भरि मन पीब मूडमे नै अबैए ताबे कि सोझ डारिए किछु बजैए।

सोनेलाल-     हँ, से तँ हमहूँ सुनै छी। मुदा सभकेँ अपन-अपन खाँच होइ छै। जेकरा-जेकरा संग खाँच बैसै छै तेकरा तेकरा लेल मूडक जरूरी नै पड़ै छै। सदिखन मूड बनले रहै छै।

रौदी-        काका, खाँच बैसैले एकत्वक जरूरति‍ होइ छै। तइले तँ मने ने राजा छी। सोचलौं जे अपनो भाँग पीबाक समए भइए गेल, से नै तँ मूड बनौनै जाए जे सभ काज करौनै आएब।

मकशूदन-     भजार भाय, कथी सबहक गाछ छै, हमरो मन होइए जे अनेरे तीन कठ्ठा हगनार बनौने छी। ओइमे गाछीए लगा देब नीक हएत।

रौदी-        बहरबैया गाछ सभ छी। अपना ऐठाम अखनि धरि कियो ने लगौने छथि। तँए कनी बेसी मन भऽ गेल अछि।

मकशूदन-     कोन बहरबैया गाछ सभ छै?

रौदी-        सबहक नाओं तँ नै बूझल अछि मुदा एक-आधटाक नाओं मन अछि। ओ छी सागवान, महोगनी आ सौंख?

सोनेलाल-           (मुस्की दैत) फल केहेन होइ छै। आमसँ नम्हर आकि छोट?

मकशूदन-     अहूँ भासि गेलौं काका। आमो तँ सभ अकारक छै किने? सजमनिया, घीबहा सजमनि जकाँ होइए आ बरबरिया सुपारी जकाँ।

रौदी-        ओ गाछ फल ले थोड़े लगौल जाइए। ओकर लकड़ी सुन्नरो आ सकतो होइ छै, जइसँ घरक समान नीक बनैए। तँए महग बिकेबो करैए।

मकशूदन-     किनतै के? धनिकाहा कोठा-कोठी बनाइए नेने अछि बाँकी अछि गरिबाहा। ओ कि करत ओहन लकड़ी। ओकरा तँ जिलेबीओक तख्ताक केबाड़ जँ घरमे लगि जेतै तँ भरि दसमी दु्र्गास्थानमे साँझ देत।
(छिपलीमे भाँगक तीनटा गोली, लोटामे पानि आ गिलास नेने बुधनीक प्रवेश)

सोनेलाल-     (पत्नीसँ) ऐठाम भाँग रखि दियौ आ थर्मशमे छह कप चाह आ पान-सात खिल्ली पान आनि कऽ रखि दियौ, अहाँकेँ छुट्टी भऽ गेल।

बुधनी-       अहाँ छुट्टी देब कि काज छुट्टी देत।

सोनेलाल-     पएर पकड़ि कहै छी अहीं खुशी रहू।

बुधनी-       अहींकेँ खुशीले ने अहू अवस्थामे सिलौट-लोढ़ी रगड़ै छी, तँ कि बुझै छिऐ जे हम भंग पिसनिहारिएटा छी। केतए देखलिऐ जे देवता परसाद खाइ छथिन आकि सुङहनिएटा लइ छथिन।

सोनेलाल-     अखनि जाउ, दोसर गपमे लागल छी। नै जे अहूँ गपकेँ गहियाबए चाहै छी तँ झब दऽ भाँग खेने आउ। ताबे हमहूँ सभ भाँग खा लइ छी।

बुधनी-       जे गप करै छी से जदी सुनि लेब तँ की होइए जे पनचैतीए कऽ देब जे एना टारै छी।

सोनेलाल-     टारै कहाँ छी बहटारै छी। अधखरुआ गप सुनि जे सौंसका पनचैती कऽ देबै तइसँ नीक जे नै सुनू।
 (बुधनी जाइत अछि)

मकशूदन-     अँए यौ काका, अहाँ ब्लौक जेनाइ छोड़ि देलिऐ जे अहींकेँ नै बूझल अछि?

सोनेलाल-     धरमागती पूछह ने तँ ब्लौक दिस जाइमे नै मन लगैए। समए छल जखनि बुझै छेलिऐ जे ब्लौक हमरो छी मुदा तेहेन-तेहेन...।

रौदी-        ई बात अहाँ ठीके कहै छिऐ काका, बी.डी.ओ. छला चौधरीजी जे रस्तो-पेरा चौको-चोराहा कागतपर दसखत कऽ दइ छेला हेन।

सोनेलाल-     चौधरी जीक विषयमे बूझल छह जे केहेन परिवारक छथि।

रौदी-        अहाँ जकाँ हम थोड़े बिडिओ साहैबक चौखरीमे बैसै छी जे केकरो जड़ि-छीप ताकब? 

सोनेलाल-     बौआ, आजादीक लड़ाइमे कालापानीक सजा पबैबला परिवारक छथि चौधरीजी मुदा सभ किछु...।

रौदी-        मुदा की सभ किछु?

सोनेलाल-     किछु ने । बौआ अखनि भाँग नै पीलौं हेन चारि भरिसक बजबो ने कएल, तँए नीक-अधलाक कोनो विचार नै करै छी, मुदा भाँग खेला पछाति शिव जीक दरबार जखनि पहुँच जाइ-छी तखनि गंगा स्नान कऽ गंगासागर धरि टहलि-बूलि अबै छी।

रौदी-        हमहूँ औगताएल छी काका, कि कहब तेहेन-तेहेन मुँह-गरहा सभ भरि‍ दि‍न मुड़ियारी देने रहैए। जे पछुआएब तँ हूसि जाएब।

सोनेलाल-     बौआ रौदी, जहिना भातीज मकशूदन तहिना तूँ छह। शिवजीक स्थानमे पहुँच गेल छी। आगुक थारीमे रखले अछि, हमरो लोक गामक ठीकेदारे बुझैए।

मकशूदन-     काका, बिना कारणे टिटही नै लगै छै। हमरो बजैमे धाक नै होइए। अहूँक खेल-बेल देखले अछि।

सोनेलाल-     देखह, तूँ दोसर नजरिए बूझि गेलहक। भेल कि जे गामेक नाओंपर बीस किलो धानक बीआ दऽ दइ आब कहह जे केना दू सए किसानक बीच बँटाएत?

मकशूदन-     तेकर माने ई नै ने भेल जे सोलहोअना अपनेटा खा जाइए?

सोनेलाल-     तहूँ बिसरि जाइ छहक मकशूदन। ओइबेर अढ़ाइ सए ग्रामबला तोड़ी बिआक जे पौकेट आएल से तोरे ने सोलहोअना दऽ देने रहिहह।

रौदी-        अहूँ सदिकाल काका रग्गड़े तकैत रहै छी। भेल तँ अहाँ धानक बीआ सोलहोअना खेलिऐ, तोड़ीक बीआक जे आएल सोलहोअना मकशूदन खेलक। दुनू गोटे जखनि सोलहन्नीए खेलौं तखनि तँ पनचैतीओ ने सोलहन्नीए हएत। छोड़ू...।

सोनेलाल-     हँ, हँ, छोरह। एकठाम रहब तँ अहिना कनी तीत कनी मीठ होइत रहत, तइले लोक मुहाँ-फुल्ली कऽ लेत।

रौदी-        काका, एकटा बात तँ बिसरिए गेल छेलौं?

सोनेलाल-     (सुनैक जिज्ञासा) की हौ, की हौ...?

रौदी-        अहाँक रमचेलबा घिनौलक?

सोनेलाल-     के रमचेलबा हौ? हमरा तँ गामेमे केतेक ने रमचेलबा अछि। केकरा दे कहै छह?

रौदी-        सोझहेमे जे मकशूदन अछि?

सोनेलाल-     की भेल?

रौदी-        से ओकरेसँ पुछियौ।

सोनेलाल-     की हौ मकशूदन?
(मकशूदनक मुँह लटकल जाइत, चुपचाप निच्चाँ मुहेँ मुड़ी गोंतए लगैत, पुन: सोनेलाले बजै छथि‍।)

सोनेलाल-     अच्छा छोरह मकशूदनकेँ। तोहीं बाजह रौदी?

रौदी-        परसूखन एकटा बम्बइया दोस भँजियाएल। बम्बइसँ आएले रहए। सेठ ओकरा परसादी ले एक किलोक कोन ने कोन रस देने रहै। तइ चढ़बैले हमरो आ मकशूदनोकेँ कहलक, निमंत्रण देलक।

सोनेलाल-     सोझहे रसेटा आकि ओइ लागल और किछु।

रौदी-        अहूँ सभ दिन गमैए रहि गेलौं काका। एक चम्मछसँ पेट भरै छै। खाइओ-पीबैक ओरियान केने रहै की। कि कहाँ ढेरी रहै मुदा सभसँ नीक रसगु्ल्ला रहै।

सोनेलाल-     बीचमे अँठियाएल ने तँ रहह। अच्छा भेल की से बाजह।

रौदी-        एक तँ हम सभ भंगखौका भेलौं तहूमे दिनका नै रौतुका, तइमे ओ किदनिक रस पिआ देलक। आगूमे रसगुल्ला देख मकशूदन चढ़बए लगल। ओहो (घरवैया) बुझहै जे साक्षात देवते पहुँच गेल। आँजुर-आँजुर देने जाइ आ ई (मकशूदन) चढ़बए लगल।

सोनेलाल-           एको दरजन चढ़ौलक की?

रौदी-        अँए, दरजने कहै छिऐ, पचाससँ टपा देलक।

सोनेलाल-           तखनि तँ बहादुर, गामक टेक रखलक।

रौदी-        गामक टेक, ठेक जकाँ रखैत तब ने से खाइते- खाइते पत्तेपर बोमकए लगल।

मकशूदन-     अइमे हमर कोनो गलती नै रहै काका, रहै एतबे जे जइ सीमानक जे नसेरी होइए ओ सभ निसाँकेँ एक्के सीमा तक पचा सकैत। मुदा सीमे नै बूझि पेलिऐ। भेल सएह, नव चीज रहै, लगले चढ़ि गेल। खाइकाल बुझबे ने केलिऐ, इम्हर बड़दक नाँगरि जकाँ पकड़ि-पकड़ि कहए लगल। बेठेकान भऽ गेलै।

सोनेलाल-     अच्छा जे भेल से भेल, एकटा कहह रौदी, जखनि सागबाने लगेबह तखनि आम-महु केतए बिआहबहक?

मकशूदन-     काका, अहूँ बड़ रगड़ी छी। पशुपति नाथक सुखेलहा हड्डी चिबबै छी। अच्छा, काका एकटा कहू जे कौल्हका घटकैतीमे अहूँ जेबै?

सोनेलाल-     केकर जीयालालक? हँ। कहने तँ छथि मुदा जखनि फजहैतमे पड़ै छी तखनि होइए जे अनेरे कोन कुत्ता-बधिया करए चलि एलौं मुदा जखनि अढ़ाइ सए रसगुल्ला आ पाँच किलो मासुक आगि पेटमे बिलाइ जकाँ कुदैए तखनि...।
(बुधनीक प्रवेश)

बुधनी-       निरलज हएब जे घटकैतीमे जाएब। जिनगी भरि तँ घिनेलहे काज केलौं आबो चेतू। बि‍आहक जे बरियाती चौबीस घंटाक छल, ओ भेल चारि-पाँच घंटासँ एक घंटा। तइमे केकर मुँह के देखत?

सोनेलाल-     अहाँ घर आँगनमे रहै छी, गामक बात नै बुझबै। ज‌खनि बरियातीमे जाइ छी आ गौआँ खाइबला खलीफा सँ पल्ला पड़ै छै, तैठाम गामक पाग जँ गामक लोक नै राखत, तँ अनगौआँ केकरा के मदति केलकै हेन।

मकशूदन-     मन हमरो जाइक नै होइए‍, मुदा गुरु भ‍‌ऽ कऽ अहाँ जाइ आ हम संग छोड़ि दी, ईहो तँ पापे हएत किने।

सोनेलाल-     तोरा किअए घटकैती बकछुहुल लगै छह‍?

मकशूदन-     बुझलो बातकेँ अहाँ तेना ने कहै छिऐ जेना अहाँकेँ किछु बुझले ने हुअए?

सोनेलाल-     कोनो कि एकटा काज एकरंगक अछि, काज-मे-काज गांथल अछि। कनी दूर बाजह, मन पड़ि जाएत।

मकशूदन-     गंगबा बिआहमे नै देखलिऐ, दुनू पक्ष तेना उल्लर बना देलक जे छगुन्तेमे रहि गेलौं। जदी अधला काजकेँ नीक बना करैत तखनि‍ नीक बात भेल। मुदा नीक काजकेँ अधला बना दइए, से...?

सोनेलाल-     पिआजु जकाँ सोहैत जेबह, केतौ ने कि‍छु भेततह। मुहेँमे सभटा छै। केतौ देखबहक जे कहतह- “दस मिलि करी काज, हारने-जीतने कोनो ने लाज।” मुदा दोसर चौकपर जाइते-जाइते कहै छै, “संग मिल करी काज, हारने-जीतने कोनो ने लाज।” आ केकर संग? संगीओ तँ संगीए छी।

पटाक्षेप



दोसर दृश्य-

(दलान नमहर। ओसारक एक भाग एकटा टेबूल चारिटा कुरसी लागल। दोसर दि‍स टेबुलक बीच कुरसी लागल। टेबुलपर देखनुक वस्तु राखल। बीचमे सिंहेश्वर ढाढ़। एक भाग मोहनलाल आ सोहनलाल बैसल। दोसर दिस रूपलाल बैसल।)

रूपलाल-     (मुड़ी उठा रस्ता दिस देखि) केते बजेक समए देने छला सिंहेश्वर काका?

सिंहेश्वर-      आब कि हमरा सबहक जुग-जमाना रहल जे समैकेँ समए बूझि लोक चलत, आब तँ गाड़ी-सवारीक जुग एलै। रस्ता बाटमे तेते रूक्तापुर बनि गेल अछि जे जखने पहुँच जाथि तखुनके समए।

मोहनलाल-    काका, ई कि कहि देलिऐ, ‘हमरा सबहक जुग-जमाना’?

सिंहेश्वर-      बौआ, अखनि तूँ सभ कौलेजमे पढ़ै छह जखनि जिनगीक कौलेजमे पढ़बह तखनि हमरा बातक माने लगतह।

रूपलाल-     काका, नस्ता-पानीक तँ ओरियान भइए गेल अछि तखनि औगताइए कथीक अछि, कनी ऐ बातकेँ सोझराइए दियौ। एते तँ जरुर बुझै छी जे पहिने जकाँ चारि गोरे एकठाम बैस जिनगीक गप नै करैए।

सिंहेश्वर-      देखहक, एना जे जहपटार बजबहक तँ सवालक पथार लागि जेतह, जे समटब पार नै लगतह, तइसँ कि हेतह जे कोन सवालक जवाब की भेल से ओझरा जेतह तँए...।

मोहनलाल-    अहाँ विचारकेँ हमहूँ मानै छी काका, रूपलाल भायक प्रश्नकेँ पूरक प्रश्न मानि लिअ। जँ समए भेटत तँ कहि देवनि नै तँ बाँकी रहलनि।

सिंहेश्वर-      ओना मोहन तोरो सवालक उत्तर नीक जकाँ नहियेँ देबह, किअए तँ मन चौचंग अछि जे हुनका सबहक (बरतुहार) समए भऽ गेल। दसे बजेक समए देने छला सबा दस बजैए।

मोहनलाल-    चारू दिस ताकब छोड़ि काका अदहो-छिदहो किछु कहियौ?

सिंहेश्वर-      देखहक मोहन, जुग-जमानाक भीतर बहुत रास बात अछि मुदा तेतेमे नै जा अखनि बिआहेक गप करह।

मोहनलाल-    (मुस्की दैत) हँ, हँ, बड़बढ़ियाँ, बड़बढ़ियाँ।

सिंहेश्वर-      ओना दूटा विचारणीय बात अछि, मुदा समैक लुकझुकी दुआरे पहिने बिआहक बरियातीक बात कहै छिअ?

रूपलाल-     जखनि कहै छिऐ तखनि दुनू घाट मिला कऽ कहियौ, जैइसँ धारक दुनू महारक सीमा बनि जाए, तेना कऽ कहियौ।

सिंहेश्वर-      बुझले छह जे धनिकपाना ढाठीमे पढ़लौं कम बजलौं बेसी, से साफे कहि दइ छिअ। अपना ऐठाम धर्मसूत्र-गृहसूत्र विषयपर ॠृषि-मुनि सोचि-विचारि अपन विचार रखलनि?

मोहनलाल-    ओ सभ तँ साक्षात् सरस्वतीक बड़द पुत्र छला, जे अखनो ओहिना टक-टक अहाँ दिस तकै छथि।

सिंहेश्वर-      हँ, से तँ छेलाहे। अपना ऐठाम बिआह परिवारक संग समाजोक महान यज्ञ छी। ऐ यज्ञ लेल चौबीस घंटाक समए निर्धारित भेल। जे आग्रहपर अड़तालिसो घंटाक भेल आ दुराग्रहपर घंटो भरिक भऽ गेल, मुदा अखुनका जकाँ मड़बा परहक बर जकाँ घूर-बहूर एते नै भेल।

मोहनलाल-    लड़का-लड़कीक (बर-कन्या) पूछ केते छल बिआहमे?

सिंहेश्वर-      सोलहन्नी छल। जेकर जीवंत उदाहरण सीता स्वयंवर छी। कहाँ दशरथ बुझियो सकला जे बेटाक बिआह जनकपुरमे हएत। एहेन स्वयंवर सि‍रि‍फ सीते टाक नै भेलनि, समाजक बीच चलनि‍ छल।

मोहनलाल-    चौबीस घंटाक समए लेल कार्यक्रमो तँ निर्धारित रहल हएत?

सिंहेश्वर-      निश्चित रहल अछि। प्रश्नो नान्हिटा नै नमहर अछि। ओ ई अछि ई समाजक संग दू बेक्‍तीक ओहन मिलन छी जे दुनियाँक रंगमंचपर आबि रहल अछि।

रूपलाल-     सिंहेश्वर काका, भूखे भजन ने होइ गोपाला खाली बरे-कन्या, बिआहक गप करब आकि‍ किछु अनजलोक गप हेतै।

मोहनलाल-    काका, नस्ता-पानीक कथी ओरियान केने छी?

सिंहेश्वर-      एना धि‍या-पुता जकाँ अनाड़़ी किअए बुझै छह जे अ-आ सिखबै छह?

मोहनलाल-    काका, अहाँ दोसर हिसाबे हमरा गपकेँ बूझि गेलिऐ?

सिंहेश्वर-      मोहन बेटा-भातीज छिअ, एकर माने ई नै जे तोरा विचारकेँ कदर नै कएल जाए, मुदा अखनि तँ मने चौचंग अछि नै तँ...।

रूपलाल-     अनेरे अहाँ मनकेँ चौचंग केने छी, अच्छा अहाँ कनियेँ बिलमू, हमसब सभ सरंजाम देखने अबै छी। परसैले तँ सतरह बापूत छीहे, ऐ बातकेँ सम्‍पन्ने कऽ दियौ।

सिंहेश्वर-      आइक जे बरियाती आकि बिआहसँ पहिनुक जे प्रक्रिया अछि, जेना हथपकड़ी, लड़ूपान तिलक इत्यादि-इत्यादि जइमे खेनाइ-पीनाइ चलैए, ओकर की रूप छै समाजमे?

मोहनलाल-    अहाँ जे बात कहै छि‍ऐ ऐसँ तँ समाजे बहबाड़ि भऽ गेल अछि तखनि...?

सिंहेश्वर-      (मुड़ी डोलबैत) बिल्कुल सत कहलह। एहनो होइए जे एक गामसँ दोसर गाम अबै-जाइक आग्रहो होइए आ एहनो तँ होइते अछि जे माछ खाइले परसू अबै छी।

मोहनलाल-    अनेरे कोन खता उपछै भाँजमे पड़ल छी ओकर आड़िए गिलगर माटिक छिऐ, कखनि टूटि जाएत से बुझबो ने करबै?

सिंहेश्वर-      हँ, से तँ अछिए। मुदा अही समाजमे ने जीवो करे छी। तेकरा निमाहैत चली सएह ने नीक हएत। मुदा विचारणीय प्रश्न तँ अछिए जे एक-काजक लेल एक निअम बना चलब आ यत्र-कूत्र चलब, समजक बंधनकेँ ढील करैए।

मोहनलाल-    खैर छोड़ू। बड़ झमेल बूझि पड़ैए। जे कियो बरतुहार औता हुनका भरि मन खुएबनि किने?

सिंहेश्वर-      यएह भारी बात भऽ गेल अछि। एक दिस लोक भरि दिन योगाभ्यासेक चर्च करैए दोसर दिस खाइ-पीबैक ठेकाने ने छै। भरि मन खुआएब असान अछि।

मोहनलाल-    से की?

सिंहेश्वर-      देखै नै छहक जे बाप-बेटा एकठाम बैस बोतल-शीशी पीबैए आ नैतिकताक भाषण करैए। ओना अपन परिवारेक पीबैक चलैन बनि गेल अछि तँए पीबैक ओरियान कि करब ओ तँ रहिते रहै छै। चारि-पाँच गोटे औता एक गोटेक चारि-पाँच दिनक खोराक भेल। मुदा एकटा बात...।

मोहनलाल-    (अकचका कऽ) की एकटा बात?

सिंहेश्वर-      अपना सभ एक गामक छिऐ तँए एक समाज भेलिऐ। जखने एक समाज भेलिऐ तखने सबहक जीवन-मरन भऽ गेल। किएक तँ समाजक प्रतिष्ठा बेक्‍तीक नै समाजक होइ छै। तँए एक बनि हुनका सभ (बरतुहार) सँ डटि‍ कऽ सुआगत करैक छह?

मोहनलाल-    काका, कोन मरदुआरी सवाल उठा देलिऐ, आब कि ओ जुग-जमाना रहल। आब तँ एक आदमी पचास आदमीक सुआगत कऽ सकैए।

सिंहेश्वर-      देखहक बौआ, अपना समाजमे बुढ़बे लोक सभ दिससँ आएल अछि जे जेकर नून खाइए तेकर सरियत दिऐ।

मोहनलाल-    तइमे कोनो सन्देह बुझाइए।

सिंहेश्वर-      बाजलपर बजै छी, अपने बाबाक खिस्सा कहै छिअ। बारीकक दुआरे भोज घिना गेल। मुदा तैयो समाज तँ अथाह समुद्र छी एहेन-एहेन होइते एलैए, ताधरि होइते रहतै जाधरि समाजिक तंत्र कमजोर रहतै।

मोहनलाल-    अखनि  हम सभ परीक्षे पास करै दुआरे प्रश्नोत्तरेसँ काज चलबैत एलौं अछि तँए ई सभ बात नै बुझै छी।

सिंहेश्वर-      देखहक, अपना गाममे कि‍ हमरा अपनो परिवारमे सुनील पहिल डाक्टर बनत तीन महिना पछाति सर्टिफिकेट लऽ कऽ एबे करत।

मोहनलाल-    हँ, से तँ सुनील पढ़ैओमे सभ दिन नीक रहला।

सिंहेश्वर-      ऐठाम प्रश्न सुनीलक अछि आकि समाजक। हरेलहो-भोथलेहोक बिआह दस लाखक भऽ गेल अछि तैठाम तँ ओही नजरिए ने देखए पड़त।

रूपलाल-     से तँ देखै पड़त। जँ से नै देखब तँ आन समाज कोन नजरिए देखत।

सिंहेश्वर-      आन समाजक बात किअए कहै छह, अपनो विचारि कऽ देखहक जे मरूआ-गहुम एके भेल?

रूपलाल-     काका, अहाँकेँ सभ पीछराह कहै छथि तँए अहाँसँ मुँह लगाएब गल-थोथरि‍ हएत मुदा कि मरूआ अन्न नै छी?

सिंहेश्वर-      हद करै छह रूपलाल, के कहै छह जे मरूआ अन्न नै छी, ओइमे आयरन नै पएल जाइ छै। केरलक लोक जे पढ़ैमे ओते तेज अछि से किअए, ओकर खानो-पान तेहने छै।

रूपलाल-     तखनि?

सिंहेश्वर-      हम से नै ने कहै छिअ। कहै छिअ जे मरूआ अन्नो छी, ओइमे पौष्टिक तत्व सेहो पएल जाइ छै मुदा, अन्नके जखनि बिलगेबहक तँ बूझि पड़तह जे अन्नो कि सभटा अन्ने छी। कोनो कुअन छी तँ कोनो सुअन। मरूआ, शाम-कौन इत्यादि कुअन छी। 

रूपलाल-     श्यामा चाउर कतएसँ अबै छै, जेकर तसमै पैघ-पैघ स्थान सबहक भोग्य अन्न छी।

सिंहेश्वर-      देखहक रूपलाल, जलवायुक अनुकूल अन्न, फल, फूल इत्यादिक ग्रहण धरती करैत अछि। ओना किछु प्रकृति प्रदत छै जे धरती अपनो धारण कऽ लइए मुदा किछु मनुखोक अछि।

(आगू-आगू सोनेलाल हाथमे बेंत नेने, तइ पाछू रौदी-मकशूदन आ तइसँ पाछू जीयालाल छता नेने प्रवेश। कनी फड़िक्केमे रूपलाल मोहनलाल, सोहनलाल ठाढ़ होइत)

रूपलाल-     कुटुम नारायण सभ आबि गेला काका, अहाँ बैसले रहू, बतरसिया छी अहाँ।

सिंहेश्वर-      आब तँ उमेराे भेल किने।

रूपलाल-     ठेहुन ठीक अछि किने?

सिंहेश्वर-      ठेहुन कहाँ ठीक अछि, जहिना बाँहि कनकनाइत रहैए तहिना ठेहुनो।

(चारू कुरसीपर चारू गोटेकेँ बैसबैत रूपलाल, मोहनलाल आ सोहनलाल दोसर सत्तरिक कुरसीपर बैसैत। तइ बीच एक गोटे तसतरीमे दस-बारह गिलास ठंडा नेने अबैत। समाजबला टेबुलपर रखि गिलास उठा आगू बढ़ि सोनेलालक आगूमे रखैत अछि।)

सोनेलाल-     बाउ, ई किअए अनलौं। हम सभ कन्यागत छी आगू बढ़ि केना मुँह ऐंठाएब।

सिंहेश्वर-      अपने शास्त्रीए बात कहलिऐ। मुदा समाजो आ समाजक बीच परिवारोक एहेन बेवहार होइ छै जे शास्त्रसँ हटियो कऽ होइ छै। मानलौं अहाँ कन्यागत छी मुदा अखनि तँ बटोही छी। जखनि कथा कुटुमैतीक चर्च चलत तखनि ने अहाँ कन्यागत आ हम सभ बरपक्ष हएब मुदा अखनि तँ से नै भेल अछि?

सोनेलाल-     कहलिऐ तँ बेसबात मुदा दुनू गोटेक मंशा की अछि? यएह ने हम अपन बेटीक बिआह करब आ हम बेटाक।

सिंहेश्वर-      अपनेक सभ बात मानल मुदा कन्यागत आ बटोहीक बीच जे सीमा अछि ओइठाम शंका तँ अछिए।

मोहनलाल-    कुटुम नारायण, ई सभ पुरना जमानाक चलैन भेल, समाज बदलल, समए बदलल, लोक बदलल, विचार बदलल तइ संग बेवहारो बदलत किने। ओ सभ छोड़ू। जहिना अहाँ कहै छी कन्यागत तहिना सिंहेश्वरकाका, भेला बरपक्ष। हम सभ समाज छी, समाजि‍क रूपमे आग्रह करै छी।

सोनेलाल-     जँ समाज बनि कहलौं तँ सहर्ष स्वीकार अछि।
(ठंडा गिलास चारूगोटे हाथमे उठबैत अछि। तही बीच चाह-बिस्कुटबला अबैए। कियो हाँइ-हाँइ ठंडा पीबै लगैए तँ कियो एक्केबेरमे पीब जाइए। कियो हाँइ-हाँइ चाह पीबए लगैए। तही बीच एक गोटे पंचमेबा नेने अबैए।)

सोनेलाल-     जहिना अहाँक समए अछि तहिना हमरो सबहक अछि। तँए नीक हएत जे ईहो सभ चलैत रहतै आ गपो-सपो चलैत रहतै।

मोहनलाल-    कहलिऐ बड़ सुन्नर बात कुटुम नारायण मुदा यएह तँ छी जिनगी? जे धि‍यो-पुताकेँ अपना हाथे किछु पढ़ा-लिखा नै पबै छी। मुदा आशा करै छी अपनेबला बुधि होय। पढ़तै अनकासँ बुधि हेतै अपन। जेकरा पढ़बैक लूड़ि‍ नै छै, मुदा जिनगीक जे क्रिया-कलाप छै, जैपर जिनगी ठाढ़ छै ओ तँ छइहे।

सोनेलाल-     बढ़ियाँ बात कहलिऐ, ओछाइनपर माए-बाप पड़ल काहि काटि रहला अछि, मुदा सेवा लेल समए कहाँ अछि।

मोहनलाल-    (पंचमेवाक टुकड़ी मुँहमे लैत) कुटुम नारायण, लड़कीक कि योग्यता छन्‍हि‍?

सोनेलाल-     डाक्टरी पढ़ै छथि। अंतिम बरखक छह मास शेष रहलनि अछि।

सिंहेश्वर-      लड़का-लड़कीक जोड़ा एक-तरहक अछि। मुदा कुटमैतीमे तँ तीन जोड़ा लगबए पड़ै छै। जहिना बरियाती तीन मन, तहिना ने घरदेखीओ एक जोड़ा लड़का-लड़की दोसर जोड़ा परिवार आ तेसर जोड़ा गाम-समाज।

मोहनलाल-    हँ से तँ बेस कहलिऐ काका, जोड़ा तँ तीनूक हेतै मुदा आब तँ लोक फुद्दी भऽ गेल। बि‍आहक पछाति चतुर्थीसँ पहिने दुरागमने भऽ जाइ छै। कियो केतौ कियो केतौ जा कऽ रहए लगैए तेते समाज आ परिवार पछुएने जेतै।

सिंहेश्वर-      से तँ नै पछुएने जेतै, मुदा आँखि मूनि किछु कइयो लेब नीक नै हेतै।

सोनेलाल-     गप-सप्‍प बहकि गेल।

सिंहेश्वर-      बहकल कहाँ, भूमिका बन्हाएल। अहीं कहू जे अहाँ गामकेँ सुति उठि भोरे-भोर कियो नाओं नै लइए, से किअए?

सोनेलाल-     ई कहिया कतएसँ लोक कहैए मुदा आब समाज आगू बढ़ल। ई नन्हिटा बात जे कोनो समाज लड़की डाक्टर लड़की वैज्ञानीक आ लड़की पायलट पैदा केलक। तँ आब ओइ नजरिए देखए पड़त।

सिंहेश्वर-      एक अर्थमे उचित अछि। मुदा एक जमीन्दार परिवारक डाक्टर आ दोसर साधारण (खेत बेचि पढ़निहार डाक्टर) परिवारक बीच ने कुटमैती भऽ रहल अछि।

सोनेलाल-     हँ, से तँ भइए रहल अछि। ओना जँ दुनू समाजक परिचए भऽ जाए तँ लाभे-लाभ हएत।

मोहनलाल-     पहिने कन्यागत दिससँ हुअए?

मकशूदन-     पहिने जैठाम आएल छी से ने उचित हएत। घरक माइने ने बाहरक माइन।

रूपलाल-     सभ बातमे जोड़े केने ओहिना होइ छै जहिना गाड़ी आकि हरमे एकटा असथिर बड़द रहल आ एकटा फड़काह। एहेन जोड़ासँ काज चलतै। कुटुमेक बात मानि लहुन।

मोहनलाल-    काका, हम सभ छौड़ा-मारड़ि छी गामक तरी-घटी नै बुझै छी, अहाँ तँ परिवारे नै समाजमे श्रेष्ट छी,  नीक हएत जे अपन परिचए दियौ।

सिंहेश्वर-      अपन परिचए कि दियौ, कोनो नुकाएल परिवार अछि। बेसी दूर तँ नै जाएब, ओना पाँच पीढ़ी आ सात पीढ़ीक मिलान तँ कुटुमैतीमे हेबेक चाही।

रौदी-        कुटुम नारायण, कहलिऐ बड़बढ़ियाँ मुदा एहनो समाज अछि जेकर बोही-खतियान नै छै आ एहनो अछि जेकर छै। एहेन स्थितीमे सतो झूठ आ झूठो सत हेतै कि नै?

सिंहेश्वर-      होइक संभावना छै, मुदा गारंटी नै छै। भओ सकै छै नहियोँ भऽ सकै छै।

सोनेलाल-     फेर बात बहकि गेल। कुटुम नारायण जे मन फुरैए जेते मन फुरैए बजैत जाउ। कियो अपन अधकट्टी नाओंसँ परिचए दइ छथि तँ कियो संज्ञाक संग सर्वनाम, विशेषण इत्यादीक संग, मुदा छी परिचाइए।

सिंहेश्वर-      हमर आठम पीढ़ी जमीन्दारी कीनि‍ ऐ गाम ऐला। धर्मात्मा लोक रहथि धर्मसँ बेसी सिनेह रहनि। तइसँ परिवार उठिते गेल। पाँचम पीढ़ी अबैत-अबैत एगारह गामक जमीन्दार भेल।

मोहनलाल-    काका, तेहेन कऽ चासब धड़ौलियनि जे दूओ कठ्ठा समारल हएत कि नै। ओते नै कहियौ लड़का, परिवार आ समाजक विषयमे अखुनका बात बजियौ।

सिंहेश्वर-      देखहक मोहन, भलहिं हिनको बेटी वएह विद्ययालयमे पढ़लकनि जे हमरो बेटा पढ़लक। मुदा खरर्चो आ बेवस्‍थो एक रंग थोड़े रहल। हमरा कि कोनो सेहन्ता अछि जे बेटा नोकरीए करए। मुदा...।

मोहनलाल-    मुदा की?

सिंहेश्वर-      हिनकर बेटी कोनो कि डाक्टरी करती। रानी बनि हाउस वाइफ रहती।

मोहनलाल-    काका, आब अपन बात विसर्जन करू। मुरकुटी गप पुछै छी, दुनू गोटे जवाब दिअ। अनेरे केतौ नै खाँच बैस जेतै। कुटुम नारायण, अपने किछु कहियौ?

सोनेलाल-     जीयाभाय, जे जनै छी से बाजू। थोड़-थार हमरो बूझल अछि पछति जोड़ि देबै।

जीयालाल-     सोनेभाय, अहूँकेँ बूझल अछि जे हमर बाबा दोखतरीपर छथि। तँ कोन गामक परिचए दियनि।

मोहनलाल-    अखनि जइ गाममे छी तेकर परिचए दियौ। गामक कोनो ठेकान नै अछि, लगले पुर सँ पुरा भऽ जाइए आ वहाने-भने गमा, टोलिया बनि जाइए। तँ छोड़ू ओइ झमेलकेँ।

सिंहेश्वर-      तोहू तँ बेटे-भातीज भेलह मोहन, जेहने मांग रहत तेहने ने हाथी जकाँ ढबगर रंगो छजत, से तँ विचार करै पड़तह किने?

जियालाल-     जहाँ धरि सकड़ता हएत तहाँ धरि संग पूरब नै तँ अहूँ अपन बाट धड़ब हमरोले दुनियाँ छै।

सिंहेश्वर-      ई तँ मानै छहक किने मोहन जे जेकरा घराड़ीओ ने छै सेहो पाँच लाखक बि‍आह करैए तइमे हमरा सन लोककेँ केहेन हेबाक चाही?

मकशूदन-     एना झाँपि-तोपि बजला सँ नै हएत। कुटुमैती केना हएत ई जोगाड़ सभ मिलि लगाउ। जखने कियो किछु ि‍कयो कि‍छु टीपबै तखने काज भंगठत।

सिंहेश्वर-      एक्केबेर बाजि दइ छी जे पच्चीसलाख रूपैया कन्यागत खर्च करथि कुटुमैती हेबे करतनि।
(पच्चीस लाख, सुनि गुमा-गुमी पसरि गेल। सभ सबहक मुँह, आँखि उठा-उठा देखबो करैत आ गड़ो करैत। जीयालालक आँखि साैनक मेघ जकाँ भरि जाइ छन्‍हि‍। मुड़ी गोंतने चद्दैरसँ आँखि पोछै छथि। मुदा मकशूदन आ रौदीक आँखि लाल होइत।)

मकशूदन-     जीयाकाका, अपन अंतिम विचार बाजि दियौ, पछाति बूझल जेतै।

जीयालाल-     बौआ मकशूदन, कोनो बड़ पुरान बात नहियेँ छी। चारि-पाँच बर्ख पहुलका छी। पनरह बीघा अपना खेत छेलै साढ़े सत-सत बीघा दुनू भाए-बहि‍नक भेलै। देखते छहक जे बेटी केहेन पढै़मे तेज अछि।

मकशूदन-     ऐमे के दूसत।

जीयालाल-     अपनो मन मानि गेल जे बेटी किछु करत। अधा सम्‍पति‍क बाजी लगा देलौं, बेचि‍ कऽ पढ़ा देलिऐ।

सोनेलाल-     पंचवेदीमे गाए नै खाएब। आहाँ जे कहै छिऐ ओ भरि छाती गंगामे पैसि बजलासँ हुअए वा गीता-रमायण उठौलासँ हुअए। सोलहन्नी सत बजलौं हेन। कुटुम नारायण अखनि धरि जे जीयाभाय बेटीक प्रति उतसरजन केलनि ओ तँ अहींक हएत, तखनि किछु विचार करयौ?

मोहनलाल-    कुटुम नारायण, गंगा-कोसीक जखनि बाढ़ि अबै छै तखनि कोन घर खसौत आ कोन गाम देने कटनिया कऽ धार बनौत, तेकर कोनो ठेकान छै।

सोनेलाल-     हँ, से तँ नहियेँ छै, मुदा...?

मोहनलाल-    अहीं छातीपर हाथ रखि बाजू जे सिंहेश्वरकाका जे बजला, एहेन बजनिहार यएह टा छथि आकि आनो-आनो गाम-समाजमे अछि।

सिंहेश्वर-      पूबारि गामबला पनरहलाख टाका, गाड़ी सोना सभ किछु दइले आएले छला, लड़की डाक्टरी नै पढ़ल छेलनि तँए कुटुमैती नै भेल।

मोहनलाल-    हँ, से तँ लड़केक माँग छन्‍हि‍।

सिंहेश्वर-      किछु भेल तँ पढ़ल-लिखल जवान बेटा भेल किने जे मुँहछोहनि केलक, से जँ पूर्ति नै करबै से केहेन हएत? (रूपलाल दिस इशारा करैत)

रूपलाल-     भाय साहैब, हम सभ बरपक्ष छी, अहूँ बातक मान नै हएत, से थोड़-थाड़ हेबे करत मुदा सिंहेश्वरकाकाक विचार तँ सर्वमान्य हेबाक चाही।

जीयालाल-     (देह थरथराइत) अपने ऐठाम नुकाइले आएल छेलौं जँ नुकाइक जगह नै देब तँ चलिए जाएब, मुदा हमहूँ झूठ नै कहलौं।) (ढबढ़बाएल आँखि चद्दरिसँ पोछए लगला।)
(मकशूदन उठि कऽ ठाढ़ होइए। तइ पाछू रौदी सोनेलाल सेहो उठि कऽ ठाढ़ होइ छथि। जहिना मकशूदन तहिना रौदी सिंहेश्वरपर आँखि गड़ा मने-मन गुम्हरैत। दोसर दिस रूपलाल, मोहनलाल, सोहनलाल सेहो उठि कऽ ठाढ़ भेल। तीनू गोटे कखनो सिंहेश्वर दिस तकैत तँ कखनो जीयालाल दिस।)

सोहनलाल-    (फड़कि कऽ) अँइ हौं, डाँड़मे दम नै छेलह तँ बेटी किअए जनमेलह?

मकशूदन-     (बाँहि समटैत) डाँड़मे दम नै छै। तोरा समाजकेँ डाँड़मे दम नै छह, जे दिन-देखार बेटी हलाल होइत रहै छह आ सभ मुँह तकै छह।

रूपलाल-     (पीहकारी मारैत) बूड़ि कहीं कऽ, बड़ समाजबला भेला हेन। बाजह तँ गाममे केतेक हाथी आ घोड़ा छह। बड़ हेतह तँ कौल्हजोता बड़द आ बोझउट्ठा घोड़ी, तहीपर समाजबला बनै छह।
(रौदी छड़पि कऽ आगू बढ़ैए मुदा सोनेलाल पकड़ि लइ छै।)

सोनेलाल-     बौआ रौदी, एना बिगड़ह नै। कियो अपन महिंस कुल्हि‍रिए सँ नाथत तँ नाथह, मुदा जइ समाजमे विचार नै छै तेकर हम-तूँ कि करबै।
(रूपलाल सोनेलालक गट्टा पकड़ि‍)

रूपलाल-     बड़ उचितवक्ता भेला अछि। बाप-माएक ठेकाने ने छन्‍हि‍ आ प्रवचन झाड़ै छथि।

सोनेलाल-     अखनि दरबज्जापर छी, गारि‍ पढ़ी, मारी अपन मान-प्रतिष्ठा लेल करब। असकर छी जे मन फुड़ए सभ कऽ लिअ।

मकशूदन-     (सोनेलालक हाथ पकड़ैत) काका चलू। सभ अपन-अपन समाजक मालिक होइए। समाजक सभ माए-बहिनकेँ कहबै जे अर्द्धागि‍नी कहौनिहारि वा जीवन-संगीनी कहनिहारिक प्रति जे जोर-जुलुम भऽ रहल अछि ओकर रक्छा अपने नै करब तँ पुरुख सभ दिन अवहेलना करैत आएल आ सभ दिन करैत रहत।)

सोहनलाल-    मुँह कि तकै छह मोहन, दू हाथ चलए दहक।

मकशूदन-     जँ केकरो माए दुध पीएने हेतै तँ हमरो सभकेँ पानि नै पीएलक फड़िछेनइ जेबह।

सिंहेश्वर-      छोड़ू, अनेरे अहाँ सभ बातक बतंगर करै छी। अहूँले दुनियाँ खाली छै, हमरो ले छै। जखने ब्रह्मा गढ़ै छथिन तखने जोड़ाक (जीवन संगीक) नामकरण सेहो कऽ दइ छथिन। जँ एक पुरूख तँ दोसर नारीए नै छी। अहीं दुनूक बीच ने मैत्री होइ छै जे जीवन संगीक रूपमे चलैत जिनगीक नइयाकेँ ऐपर-सँ-ओइपर पार करै छै।

मकशूदन-     सभ झूठ, सभ बकबास। जेहेन समाज तेहेन विचार।

पटाक्षेप



तेसर दृश्य-
(सोनेलालक दरबज्जा। चौकीपर बैस देबालमे ओंगठि आँखि बन्न केने सोनेलाल।)

मकशूदन-     काका, काका, एना किअए कुसमैमे सुतै छी?
(मकशूदनक अवाज सुनि बुधनी अंगने सँ बजैत)

बुधनी-       के छी यौ, के छी यौ। (बजबो करैत आ दरबज्जापर एबो करैत।)

सोनेलाल-     बौआ मकशूदन, आबह-आबह।

मकशूदन-     बड़ भकुआएल बूझि‍ पड़ै छी।

सोनेलाल-     भकुआएल कहाँ छी। किछु बात जिनगीक मन पड़ि गेल सएह बुकौर लगैए जे की चाहै छेलौं आ की भऽ रहल अछि।

बुधनी-       जिनगी भरि तँ छकल-बकलमे लागल रहलौं आ आब बुढ़ाड़ीमे सुमारक होइए।

सोनेलाल-     अहाँ बातक मिसिओ भरि दुख नै होइए, अपनो बूझि‍ पड़ैए जे ठीके छकले-बकले केलौं। पेटक खातीर की ने केलौं। समाजसँ शासन धरि‍‍, जेतए गड़ लागल तेतइ किछु पाबए चाहलौं।

मकशूदन-     आब की उपाए हएत?

सोनेलाल-     की कहबह। एते दिन ठीके बुझै छेलौं जे समाज बनि बजै छी मुदा एहेन बिगड़ान समाज बिगड़ि जाएत, से कहियो मनमे उठलो ने छेलए।

मकशूदन-     गारजन तुल्य छी, बेक्‍तीगतो रूपे तँ किछु विचार देब किने।

सोनेलाल-     विचार देबसँ नीक विचार करब हएत। ( पत्नी सँ) कनी दू-घोंट चाह पीआ दइतौं तँ कंठ सर्ड़ास भऽ जाएत।

बुधनी-       चाह तँ बनिते छल। ओइह छोड़ि कऽ ने आएल छेलौं।

सोनेलाल-     नेने आउ।
(बुधनी जाइत अछि)
बौआ, समाजमे जखनि डाक्टर सन लड़कीक एहेन गति भऽ रहल अछि‍ तखनि कम पढ़ल-लिखल वा नै पढ़ल-लिखलक कि गति हएत?

मकशूदन-     यएह नै बुझै छी काका? कम पढ़ल-लिखल वा नै पढ़ल-लिखलक तँ समस्या अछिए मुदा एते भारी नै अछि।

सोनेलाल-     हमरा तोरा बुते रोकल हएत?
(बुधनी चाह नेने अबैत अछि। तीनू गोटे हाथमे चाह)

सोनेलाल-     श्यामक माए, जिनगीमे ऐते दुख कहियो नै भेल जेते आब होइए। परसू जे घटकैतीमे गेलौं आ जे दशा भेल, से अपने जनै छी। ऐसँ नीक मौगति।

बुधनी-       आब ऐ बुढ़ाड़ीमे कएल की हएत। जखनि‍ करैबला उमेर छेलए तखनि करबे ने केलौं आ आब...?

सोनेलाल-     छातीपर हाथ रखि बजै छी जे बुझबे नै केलौं। कोन बाट कि भऽ जाइ छै से कहाँ बुझै छी।

बुधनी-       एकटा काज करू, मनक सभ मौगति मेटा जाएत।

सोनेलाल-     (जिज्ञासासँ) की?

बुधनी-       समाजके कहि दियनु जे भाए-बहि‍न, हमरासँ जे भूल-चूक भेल तेकरा अहाँ लोकनि माफ कऽ दिअ।

सोनेलाल-     तइ सँ भऽ जाएत?

बुधनी-       भऽ केना जाएत, पैछला बुधिपर आड़ि पड़ि जाएत। आगू जे किछु करब से समाजक राय-विचार सँ करब। समाजक शक्ति समाजे हाथ अछि।

सोनेलाल-     गमैया काज गाममे हएत, मुदा बि‍आह तँ आने समाजमे हएत?

बुधनी-       जहिना ऐ समाजमे बेटा-बेटी छै तहिना ओहू समाजमे ने छै। एक समाजक नीक दोसरोले ने नीक हएत। आकि दोसरले अधला हएत।

सोनेलाल-     से तँ नै हएत।

बुधनी-       तखनि?

सोनेलाल-     मकशूदन, अखनि तक जे किछु नीक-बेजाए केलौं से सभ झूठ। नीको आ अधलो भूत बनि माटिमे गड़ि‍ गेल, मुदा...।

मकशूदन-     मुदा की?

सोनेलाल-     यएह ने, जे कहबह नै। कहने ई होइ छै जे काका कहलनि, ओहिना थोड़े कहने हेता, तइसँ की हेतह जे तूँ ओंगठि जेबह आ हमहँू हुकुमदार जकाँ कहैत रहबह।

मकशूदन-     काका, किछु भेलिऐ तँ अहाँ श्रेष्ठ भेलिऐ किने। जहिना नमहर जिनगी बीतल तहिना ने आमक आँठी जकाँ बुधियो-विचार सकताएल।

सोनेलाल-     तूँ अपन भार फेकै छह बौआ। अपन मन हारि मानि गेल जे अखनि‍ धरिक जिनगीक पानि‍मे चलि गेल। तइसँ नीक बूझि‍ पड़ैए जे तूँ अखनि काैलेजे छोड़लह अछि। तोरामे हमरा जकाँ अधला वृत्ति‍ बेसी नै पैसलह। तूँ बेसी कऽ सकै छह।
           (रौदीक आगमन।) 

रौदी-        काका, किअए समाद पठेने छेलौं। बजार जाइक विचार केने छी। कोनो तेहेन औगताइ अछि?

सोनेलाल-     बौआ औगताइ अछि‍यो आ नहियोँ अछि।

रौदी-        से की?

सोनेलाल-     पचास-पचपनक उमेर भऽ गेल हएत। मुदा...।

मकशूदन-     तइसँ बेसी भेल हएत?

सोनेलाल-     ओना नीक जकाँ ठेकान नै अछि, मुदा तइसँ कमे भेल हएत जे बेसी नै।

मकशूदन-     से केना बुझै छिऐ। देखै छी नीचला दाँतो सँपधड़ू जकाँ हिल्लैए माथक केशो सिलेब-चरक भऽ गेल आ साठि नै टपल हएब?

सोनेलाल-     हौ, तेते ने कोट-कचहरीक डल्डा-फल्डा खेने छी ने जे अछैते उमेर देह खा गेल। देखै नै छहक तौला जकाँ पेट भऽ गेल अछि।

रौदी-        काका, हम औगताएल छी?

सोनेलाल-     हँ, तँ कहै छेलिअ जे अपन पैछला जिनगी दिस तकै छी तँ बूझि‍ पड़ैए जे ओहिना चलि गेल। आगू जे बँचल अछि तेकरा चाहे छी जे काजमे लगाबी।

रौदी-        ऐमे के नै कहत?

बुधनी-       (मुस्की दैत) अहीं सन-सन लोक ने वृद्ध वेश्या तपस्विनी होइ छथि।

मकशूदन-     काका, अहाँ अपना औरदा दऽ दिअ, देखा दइ छी जे केना होइ छै।

सोनेलाल-     हौ, औरदा के देलकै हेन जे हम देबह। ओहिना लोक कहै छै। हँ, अपन विचार, अपन इच्छा, अपन संकल्प दऽ सकै छिअ।

बुधनी-       अहाँ सन-सन पुरूखक जेहने विचार तेहने संकल्प। कौआ जकाँ भरिओ रातिमे तीन बेर विचार बदलै छी।

रौदी-        काका, जखनि अहाँक मनमे एहेन विचार आएल तँ सभ तरहेँ पीठपर रहब। परसुए, अहीं दुआरे गम खेलौं नै तँ देखा दैतिऐ जे ककरो माए दूध पिऔलकै तँ हमरो पानि नै पीएलक।

सोनेलाल-     कि‍यो अपन दुआर-दरबज्जाक मान-प्रतिष्ठा अपने बनबैए। एक दरज्जा ओहन होइए जैठामसँ लोक हँसि कऽ जाइए आ दोसर ओहनो होइए जैठाम लोक कानि कऽ जाइए।

रौदी-        काका, कहलिऐ बेसबात। मुदा जहिना दुनियाँमे ढेरो सवाल छिड़ियाएल अछि तहिना ने ओकर जवाबो छिड़ियाएल छै।

सोनेलाल-     हँ, से तँ छै।

रौदी-        जहिना अहाँ बुझै छी जे कि‍यो अपना दरबज्जापर जँ दोसराकेँ गारिए पढ़ै छै आकि मारबे करै तँ अपन गमबैए नै कि मारि खेनिहारक किछु जाइ छै, तहिना तँ...।

मकशूदन-     हँ काका, जँ कनी-मनी गारि‍ए आकि मारिए खेने रहल तँ देह झाड़ि लेत मुदा जँ मौगति आकि अधमौगति कऽ कऽ मारै तँ के मरत?

सोनेलाल-     (गुम भऽ मुड़ी डोलबैत) हँ, से तँ ठीके कहै छह? मुदा...।

रौदी-        मुदा की। यएह ने जे मारा-मारी करत तँ आन गामक गनल लोक गामक अनगिनत लोकक आगू फीका पड़ि जाएत, मुदा रणभूमि छिऐ।

सोनेलाल-     की रणभूमि?

रौदी-        काका, रणमे मरै दोख नै लागे, ओहिना नै ने महराइमे लोक गबै छै।

मकशूदन-     काका, दुनू गोटे कोन बतकटौबलिमे लागि गेलौं। खाइओ-पीबैक बेर भेल जाइए। जल्दी बि‍सरजन करू।

सोनेलाल-     बौआ, होइए जे आब जेते औरदा अछि आ जेते काज करब, से आइए कि अखने करैले मन तन-फन करैए। तँ नै किछु तँ कि करब से तँ कम-सँ-कम विचारि लेब।

रौदी-        (मुड़ी डोलबैत) बेस कहलिऐ काका। मुदा काजक शुरू कतएसँ करब, सएह ताकब कठिन अछि।

सोनेलाल-     से की?

रौदी-        रोटी जकाँ सौंसे एके रंग अछि‍। ओकर मुँह केनए बनेबै।

बुधनी-       हाथसँ पकड़ि‍ तोड़ि‍ उठा मुँहमे देबै तेतै ने रोटीक मुँह बनत।

सोनेेलाल-     हौ, बड़ भारी ओझरी देखै छी। जहि‍ना खड़ौआ जौरकेँ देखै छहक। कखनो जौर बटला बाद ओझरेतह तँ कखनो पाके उघरि‍ ओझरा जेतह, कखनो बँटैएकाल ओझरा जेतह तँ कखनो खेतक आड़ि‍एपर ओझरा जेतह।

मकशूदन-     तेकर फलो तँ ओकरे होइ छै कि‍ने?

रौदी-        ई पड़ाइक रस्‍ता भेल। भने सोनेकाका कहलखि‍न जे साबे उपजैसँ लऽ कऽ जाबे घरहट नै कऽ लेब, ताबे तक ओझराइते रहैए। मुदा ओकरे नाओंपर घर बान्‍हबो कहल जाइ छै कि‍ने?

सोनेलाल-     तेतबे कि‍अए? जौर तँ पटुआक सेहो होइ छै। जहि‍एसँ गाछ जनमै छै तहि‍एसँ अपना पएरपर ठाढ़ भऽ असगरे रौद-वसात सहैत पानि‍मे सड़ैत अपन रंग नि‍खारि‍ ओहन जौर बनैए, जइसँ उपनैन-बि‍आहक मड़बा ठाठल जाइए।

बुधनी-       आबो कनी होश करू। लगले कि‍छु-लगले कि‍छु बाजि‍ दइ छि‍ऐ।

सोनेलाल-     कोनो झूठ बजलौं, जे अहाँकेँ तामस उठि‍ गेल?

बुधनी-       केना नै तामस उठत। ठि‍कि‍या कऽ एकेटा बात कि‍अए ने बजलौं। जखनि‍ देखै छि‍ऐ जे एक रहि‍तो दुनूक दू जि‍नगी छै, तखनि‍ दुनू कि‍अए बजलि‍ऐ। कोनो एक्केटाक ने ताक केतौ अबै छै।

सोनेलाल-     नै बुझलौं, कनी मुँह खोलि कऽ बजियौ?

चमली-       हमरा कोनो लाज-धाक होइए जे नै बाजब। देखि‍यौ, उघड़ल जौर जकाँ समाजक लोक उघड़ि‍ गेल अछि‍। सभकेँ सभसँ मि‍लाने आ झगड़े रहै छै। तँए एक-एककेँ पकड़ि‍ जोड़ि‍ काजक माध्‍यमसँ समाज बनत। वएह समाज बढ़ैत-बढ़ैत सामाजि‍क प्रति‍ष्‍ठा पाबि‍ फड़त-फुलाएत। जे नान्‍हि‍टा नै अछि‍।

सोनेलाल-     केना नै अछि‍, नेनाकेँ जँ पोसबै-पालबै तँ कि‍ ओ समए पाबि‍ पुरुष नै भऽ सकैए। छोड़ू आब कि‍छु ने, मकशूदन जीयालालकेँ बजाबह। सभ कि‍यो छीहे। अखने वि‍चारि‍ लेब जे आगू की करैक अछि‍। भने परसुका घटना टटके अछि‍। जीयालालकेँ बजाबह।
(मकशूदन जाइत अछि‍)

रौदी-        हमहूँ अखनि‍ बजार जेनाइ छोड़ि‍ दइ छिऐ।
(जीयालाल आ मकशूदनक प्रवेश)

सोनेलाल-     संयोग शुभ बूझि‍ पड़ैए। जेना रस्‍तेपर जीयालाल ठाढ़ भेटि‍ गेल हुअ, तहि‍ना लगले आबि‍ गेलह।

जीयालाल-     सोनेभाय, परसूसँ जेना राति‍ कऽ नीन नै होइए। भरि‍ दि‍न भरि‍ राति‍ मन बौआइत रहैए जे बेटीकेँ अनेरे कि‍अए पढ़ेलौं। जे बेच कऽ पढ़ेलौं तइसँ बि‍आहे‍ कऽ दैति‍ऐ। बापक धरम तँ नि‍माहि‍ लैतौं।

सोनेलाल-     बेटा-बेटीक बि‍आह करब माए-बापक धरम भेल आ पढ़ाएबकेँ की कहबै?
           (जीयालाल गुम भेल। कखनो सोनेलालक चेहरा देखैत तँ लगले आँखि‍ घूमा बुधनीक चेहरा देखैत। लगले फेर रौदीपर नजरि‍ दैत, तँ लगले बाहर दि‍स देखैत।)

मकशूदन-     काका, एना झँपने-तोपने काज नै चलत। दोहरा कऽ ओहनठाम नै जाएब, जैठाम मनुखक खरीद-बि‍करी होइए।

सोनेलाल-     मकशूदन बजलह तँ लाख रूपैयाक, मुदा वि‍वाह-पद्धति‍ तँ दू समाजक काज छी, एक समाजसँ केना बनत?

बुधनी-       कि‍अए नै बनत? जे बेटी जइ समाजमे जनम लेलक कि‍ ओइ समाजकेँ ओकर जीवन दान करैक शक्‍ति‍ नै छै। एक समाज नै सभ समाजक बीच बेटा-बेटी अछि‍। तँए सभकेँ रास्‍ता बनबए पड़तनि‍। सामाजि‍क रोग दहेज छी, जे देव ि‍नर्मित नै मनुष्‍य ि‍नर्मित छी।

रौदी-        जीयालालकाका अहूँ सोल्‍हन्नी भार नै उठा सकै छी। कारण जे महि‍लाकेँ खुद तैयार हुअए पड़तनि‍। हम सभ सहयोगी हेबनि‍।

सोनेलाल-     जँ सभ कि‍यो कहह तँ एकटा बात बाजब?
           (मकशूदन, रौदी, जीयालाल समवेत स्‍वरमे)
बाजू-बाजू।

सोनेलाल-     जीया भाय, अहाँ सुशीलाकेँ कहि‍ दि‍यौ। बेटी जनमसँ लऽ कऽ पढ़ा-लि‍खा कऽ जुआन बना देलि‍अ। अपन, अपन परि‍वार, अपन समाजक नाक-कान बँचबैत तूँ स्‍वतंत्र जि‍नगी जीबैक हकदार छह। अपन करह।

पटाक्षेप




चारि‍म दृश्‍य-
(जीयालालक दरबज्‍जा। जीयालाल बैसल। रूक्‍मि‍णीक अबैत)

रूक्‍मि‍णी-     एना गोबर-गोइठा जकाँ बैसने काज चलत।

जीयालाल-     से तँ नै चलत। मुदा अनेरे पानि‍योँ डेंगाएब तँ काज नहि‍येँ ने छी।

रूक्‍मि‍णी-     की पानि‍ डेंगाएब?

जीयालाल-     कोनो काज करैमे जखनि‍ बाधा उपस्‍थि‍त भऽ जाइ छै तखनि‍ बि‍नु बाधाकेँ भगौने काज थोड़े हएत।

रूक्‍मि‍णी-     से तँ नै हएत, मुदा तँए कि‍ लोक परि‍यास छोड़ि‍ देत।

जीयालाल-     से तँ नै छोड़त, मुदा अगि‍लो परि‍यासक फल नीके हेतै, तेकरो ठेकान तँ नहि‍येँ ने छै।

रूक्‍मि‍णी-     से तँ नै छै, मुदा सोलहन्नी नहि‍येँ छै एहनो तँ नहि‍येँ ने मानल जाएत। भइयो सकै छै।

जीयालाल-     करेज खोलि‍ कऽ चारि‍म दि‍नक बात कहै छी। ओना झँपले-तोपल कहने रही तइसँ भरि‍सक अहूँ नीक जकाँ सभ बात नहि‍येँ बुझलि‍ऐ।

रूक्‍मि‍णी-     यएह ने पुरुखक दोख कहि‍यौ आकि‍ छल-कपट कहि‍यौ जे स्‍त्रीगणकेँ अपन कएल काज मुँह फोड़ि‍ नै करता। ई दोख कि‍ कोनो अहींटामे अछि‍ आकि‍ सभ दि‍नेसँ होइत आएल अछि‍।

जीयालाल-     कहलौं बेसबात, मुदा सभ बात (काजक बात) कहबो तँ नीक नहि‍येँ ने हएत। खैर जे होउ। चारि‍म दि‍न जे सुशीलाक प्रति‍ए बरक भाँजमे गेल रही से कहै छी।

रूक्‍मि‍णी-     आइ जे कहै छी से चारि‍म दि‍न एला पछाति‍ कि‍अए ने कहलौं।

जीयालाल-     कि‍छु एहनो बात भेल जेकरा नहि‍येँ बाजब उचि‍त बुझलौं। तँए नै कहलौं। मुदा अखनि बुझै छी जे बाजबे उचि‍त अछि‍ तँए कहै छी। अपना काजे समाज मारि‍एटा नै खेलनि‍, बाँकी कर्म तँ भाइए गेलनि‍।

रूक्‍मि‍णी-     (जि‍ज्ञासासँ) से की! से की!

जीयालाल-     जखनि‍ सुशीलाक बि‍आहक खर्चक बात उठल तँ बरबला  (लड़ि‍काक पि‍ता) पच्‍चीस लाख रूपैआ खर्च करैक मांग रखलनि‍।

रूक्‍मि‍णी-     अहाँ की उत्तर दि‍लियनि‍?

जीयालाल-     कहलि‍यनि‍ एते सकरता नै अछि‍।

रूक्‍मि‍णी-     केहेन बढ़ि‍या तँ कहलि‍यनि‍ तखनि‍...।

जीयालाल-     (फड़कि‍ कऽ) एह, तखनि‍! पीहकारी-पर-पीहकारी पड़ए लगल। पीहकारीकेँ पीहकारी बूझि‍ पहि‍ने तँ कि‍छु ने कि‍यो बजला मुदा पछाति‍ जखनि‍ गारि‍क बौछार कानमे पड़ए लगल तखनि‍...।

रूक्‍मि‍णी-     ऐ सबहक जड़ि‍ कारण अछि‍ बेटीकेँ पढ़ाएब। अनेरे एते बेटीकेँ पढ़ेलौं। जेते पढ़ेबामे खरच भेल ओते जँ बि‍आहेमे करि‍तौं तँ डाक्‍टर परि‍वार बनि‍ बेटी रहैत।

जीयालाल-     हँ से तँ रहैत। मुदा बेटा-बेटीमे की‍ अन्‍तर छै। बाप-माएले जहि‍ना बेटा तहि‍ना बेटी।

रूक्‍मि‍णी-     बहुत अन्‍तर छै। मनाही केने रहौं जे घर-परि‍वार चलबैक लूड़ि‍ बेटीकेँ भऽ जाए, बस भऽ गेल ओकर पढ़ाइ।

जीयालाल-     कि‍अए?

रूक्‍मि‍णी-     बहुतो कारण अछि‍। मुदा सोझहा-सोझही बूझू जे नारीकेँ पुरुखक संग ऐ दुआरे लगौल जाइ छै जे सन्‍तान पैदा होइसँ पहि‍नौं आ पछाति‍ओ रोग-वि‍याधि‍क बीच पड़ि‍ जाइत अछि‍, तैठाम दोसराक मदति‍क जरूरति‍ पड़ै छै। तइ संग देहोक एते शक्‍ति‍क ह्रास होइ छै, जइसँ दैनंदि‍नक जे क्रि‍या-कलाप छै से नै कऽ पबैए।
(कि‍शोरक प्रवेश)

जीयालाल-     बौआ, स्‍कूल कि‍अए ने गेलह?

कि‍शोर-            पढ़ाइए ने होइ छै तँ अनेरे की करए जाएब।

जीयालाल-     कि‍अए ने पढ़ाइ होइ छै, शि‍क्षक सभ नै छथि?

कि‍शोर-            ने अबैक ठेकान छन्‍हि‍ आ ने पढ़बैक।

जीयालाल-     स्‍कूलक जखनि‍ यएह गति‍ छह तखनि‍ घरोपर तँ ओइ हि‍साबक समए बना पढ़बह तखने ने पासो करबह आ दू अक्षरक बोधो हेतह।

कि‍शोर-      से तँ साँझ-भाेर पढ़ि‍ते छी। चारि‍म दि‍न जे बहि‍नक बि‍आहक वि‍षयमे गेल रही से की भेल?

जीयालाल-     बाल-बोध बूझि‍ तोरा नै कहबह से नीक नै बूझि‍ पड़ैए। बहि‍न तँ तोरे छि‍अ। जि‍नगी भरि‍ तोहीं सोझहामे रहबहक। हम दुनू बेकती तँ बुढ़ाएल जाइ छी। दि‍नो-दि‍न घटि‍ते जाएब कि‍ने।
           (सुशीला अबैत अछि‍)

जीयालाल-     बाउ, आब केते दि‍न पढ़ाइ बाँकी रहलह?

रूक्‍मि‍णी-     आब सुशीलाक बि‍आहोक जोगार करैक अछि‍। 

सुशीला-           (उत्‍साहि‍त होइत) माए, हमर चि‍न्‍ता छोड़ि‍ दे।

रूक्‍मि‍णी-     बेटी जाति‍ छि‍अ एना नै बाजह!

सुशीला-      मुँह बन्न केने थोड़े हएत। चारि‍म दि‍नक सभ बात बूझल अछि‍। जहि‍ना जनकपुरमे सीता धनुष उठा एक संकल्‍प पैदा केलनि‍ तहि‍ना दहेजक खि‍लाफ हमहूँ अपन संकल्‍पसँ संकल्‍पि‍त होइ छी।

जीयालाल-     (खुशी होइत) बाउ, अकलबेराक बाल-बोधक खेल संकल्‍प नै होइ छै। संकल्‍प कठि‍न मेहनति‍ आ साहस मंगै छै।

सुशीला-      जहि‍ना दुनू प्राणी अहाँ हमरा पराने नै जि‍नगी जीवैक प्रण सेहो देलौं तहि‍ना अहीं सोझहामे स्‍वतंत्र जि‍नगी जीवैक प्रण सेहो लइ छी। दुनि‍याँ कि‍छु कहाै, मुदा अहाँ महापुरुषक काज कऽ चुकल छी। हमहूँ कि‍छु करब।

जीयालाल-     बाउ, अही आशा लेल ने एते केलौं। नै तँ आन बापकेँ देखै छि‍ऐ जे खेत कीनैले जे रूपैआ गनि‍ कऽ रखि‍ दइए ओ बोटोक बि‍मारीमे नै खर्च कऽ पबैए, भलहिं बेटा मरिए कि‍अए ने जाउ। तैठाम हम अपन दुनू परानीक हि‍स्‍सा काटि‍ बेचि‍ चुका देलि‍अ। आब बाँकी की बचैए जे...।

सुशीला-      आइए नै अदौसँ नारीक प्रति‍ अवहेलना होइत एलैए। पुरुष प्रधान समाज नव-नव अवहेलनाक बाट सि‍रैज-सि‍रैज अवहेलना करैत एलैए। जेकरा रोकैक जरूरत छै।

जीयालाल-     हँ से तँ छै! मुदा अपन, परि‍वार आ समाजोक प्रति‍ष्‍ठाकेँ अंगीकार करैत ने कि‍यो कि‍छु करत।

सुशीला-      (हँसैत) बाबू, जहि‍ना महान साधक जनक धनुष तोड़ेसँ पहि‍ने सीताक कौमार्य जीवन आ पारि‍वारि‍क जीवनक संबन्‍धमे वि‍चारलनि‍ आकि‍ नै वि‍चारलनि‍, से तँ ओ जानथि‍, मुदा जहि‍ना सासुरमे कि‍यो कनि‍याँसँ माए, माएसँ दादी होइत जि‍नगी गुदस करैए तँ कि‍यो बेटी, बहि‍न, दीदी, दादी होइत सेहो ओतै पहुँच जाइत अछि‍ तहि‍ना...।

रूक्‍मि‍णी-     बेटी, बेटी जाति‍क सीमासँ बाहर नै हुअ। कि‍छु भेलखुन तँ जन्‍मदाता गुरु भेलखुन। अखनि‍ हम छि‍अ जे कहैक छह से हमरा कहह। जँ हम नै रहि‍ति‍अ तखनि‍ तोरा मुँह फोड़ैक अधि‍कार छेलह।

सुशीला-      माए, जहि‍ना समैक परि‍वर्त्तन होइ छै तहि‍ना सभ कथूक होइ छै। सभ कथूक भेने मनुख ओइसँ अलग नै भऽ सकैए। धर्मक (पवि‍त्र जि‍नगी जीवैक मंत्र) जे रूप रहल ओ अकाट्य छी मुदा कि‍छु पुराण पड़ैत तँ कि‍छु नव अबैत, ओकरा तँ देखि‍-सुनि‍ परखए पड़त।

रूक्‍मि‍णी-     हँ, से तँ परखए पड़त, मुदा समस्‍योकेँ पोखरि‍क जाल जकाँ एक्केबेर नै फेकल जाएत। महजाल जकाँ एक भागसँ लगबैत सौंसे पोखरि‍ पसारल जाइ छै।

सुशीला-      हँ पसारल जाइ छै, तइमे सभ माछ फँसि‍ए जाएत से कोनो जरूरी तँ नै छै। जे ढेंग जकाँ ओघराइत जाएत ओ फँसत आ जे जालक भीर अपनकेँ अबै ने दैत ओ तँ छुट्टा रहबे करत।

रूक्‍मि‍णी-     से तँ रहत, मुदा लोको-लाज तँ कि‍छु छि‍ऐ।

सुशीला-      हँ छि‍ऐ, मुदा लोक-लाज की, से तँ वि‍चारए पड़त। समाजमे देखै छी जे बारह बर्खक कन्‍या, जे बि‍आहक पाँच दि‍न पछाति‍ वैधव्‍य प्राप्‍त केलनि‍ आ सए बर्खक जि‍नगी बहि‍न, दीदी, दादीक रूपमे व्‍यतीत करै छथि‍। मुदा हुनका की कहबै! जे दोहरा कऽ दोसर पुरुषक संगी नै भऽ सकैत, ओहन नारी लेल समाज कि‍अए चुप अछि‍?

रूक्‍मि‍णी-     चुपे कहाँ अछि‍। मनुख तँ अपना मनक मालि‍क होइ छै ओ बान्‍ह-छान्‍ह मानै छै। घोड़ा जकाँ छानलो रहै छै तैयो चरि‍-चरि‍ हाथ कुदै छै। मुदा तँू तँ पढ़ल-लि‍खल बेटी भेलह। तोरा तँ ई सभ बात बुझए पड़तह।

सुशीला-      हँ माए, बुझए पड़त। मुदा...।

रूक्‍मि‍णी-     मुदा की?

सुशीला-      माए, जाधरि‍ बेटी माए-बाप ऐठाम रहैए ताधरि‍ जे जि‍नगी छै ओ बि‍आहक पछाति‍ एकाएक बदलि‍ जाइ छै। आ एतैसँ पुरुखक मनमानी शुरू होइ छै।

रूक्‍मि‍णी-     हँ से तँ होइ छै। मुदा माएओ-बापक कि‍छु एहेन कर्तव्‍य अछि‍ जेकर सीमा बनौल अछि‍। तही सीमाक भीतर ने बेटीक बि‍आह सेहो अछि‍।

सुशीला-      हँ अछि‍। मुदा जि‍नगी बदलैक सीमा जे बनल अछि‍ ओकरा सुधारैक अछि‍। अखनि‍ कि‍अए तोरा कि‍अए हमर बि‍आहक जहीन लगि‍ गेल छौ।

रूक्‍मि‍णी-     बाउ, नवकवेरि‍या छह, तँए औगताइ छह। तोहीं कि‍छुए दि‍न पछाति‍ डाक्‍टर बनि‍ नोकरी करए जेबह, असगरे बाहर केना जेबह। केकरा संगे जेबह।
सुशीला-      हम अखनि‍ ने बि‍आह करब आ ने नोकरी करब। जइ समाजक बेटी छि‍ऐ तइ समाजकेँ बाप बूझि‍ सेवा करबै, हमरा सेवाक बहुत बेसी जरूरति समाजकेँ छै।

रूक्‍मि‍णी-     बाउ, हम तँ जन्‍मे देलि‍अ, कर्म तँ अपने करए पड़तह।

सुशीला-      (हँसैत) अहाँ दुनू गोटे असीरवाद दि‍अ जे जँ कोनो समाज दहेजक जाल लगौलक तँ ओइ जालकेँ केना नि‍ष्‍काम बनौल जाए ई तँ करए पड़त।

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'विदेह' २२४ म अंक १५ अप्रैल २०१७ (वर्ष १० मास ११२ अंक २२४)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -    मैथिलानी केर उपराग राम सं आ समाज ...