Saturday, June 29, 2013

‘विदेह'१३२ म अंक १५ जून २०१३ (वर्ष ६ मास ६६ अंक १३२) PART I

                     ISSN 2229-547X VIDEHA
विदेह'१३२ म अंक १५ जून २०१३ (वर्ष ६ मास ६६ अंक १३२)India Flag Nepal Flag

 

अंकमे अछि:-

 गद्य






.http://videha.co.in/BindeshwarNepali.jpgबिन्देश्वर ठाकुर- प्रवासक वेदना/ सुनि लिअ दू बात हमर/ अन्हार जिनगी .http://videha.co.in/AbdulRazzaq.jpgअब्दुल रजाक- गणतान्त्रिक देश

 .http://videha.co.in/KundanKumarKarn.jpgकुन्दन कुमार कर्ण- बाल गजल .http://videha.co.in/AmitMishra.jpgअमित मिश्र-नेङगरा दरबान

 


 विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन  

 


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example

ज्योतिरीश्वर पूर्व महाकवि विद्यापति। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू।

example

गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज'


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 गद्य


http://videha.co.in/JagdanandJha.jpgजगदानन्द झा मनु’- विहनि कथा-  वसिअतनामा/ बुढ़ारीक डर
ग्राम पोस्ट हरिपुर डीहटोल, मधुबनी 
.      वसिअतनामा
सु०केँ व्याह दूतीवरसँ भेलन्हि | हुनक बएससँ करीब बीस बर्खक बेसी हुनक वर | हुनक वरकेँ पहिलुक कनियाँसँ एकटा बारह बर्खक बेटा | व्याहक पाँच वर्ख बादो सु०केँ एखन धरि कोनो संतान नहि | अपन माएक आग्रहपर सु० दू दिनक लेल अपन नैहर एली | एहिठाम माएकेँ केशमे तेल दैत 
सु० केर छोट भाइ, “दीदीसँ पैघ पतिवरता स्त्री आइकेँ दुनियाँमे कियो नहि होएत |”
सु०, “ ई एनाहिते कहैत छैक |”
छोट भाइ, “नहि गे माए, दीदीकेँ देखलहुँ अपन बुढ़बा वरकेँ एतेक सेवा करैत जतेक आजुक समयमे कियोक नहि करतै |नहबैत-सुनाबैत तीन तीन घंटापर हुनका चाह नास्ता भोजन दैत भरि दिन हुनके सेवामे लागल आ हुनकासँ कनी समय भेटलै तँ हुनक बेटामे लागल अपन देहक तँ एकरा सुधियो नहि रहै छै |”
सु०, “एहन कोनो गप्प नहि छै आ नहि हम कोनो पतिवरता छी | ओ तँ, ओ अपन वसिअतनामा बनोने छथि जेकर हिसाबे हुनक एखन मुइलापर हुनक सभटा सम्पतिकेँ मालिक हुनक बेटा होएत | आ जखन हमरा एकगो संतान भए जाएत तखन हुनक सम्पति, हुनक पहिलका बेटा आ हमर संतान दुनूमे बराबर बटा जाएत ताहि दुवारे बुढ़बाकेँ एतेक सेवा कए कऽ जीएने छी जे कहुना कतौसँ एकटा बेटा की बेटी भऽ जे नहि तँ एहेन बुढ़बाकेँ के पूछैए |”   

.       बुढ़ारीक डर
नेना, “माए बाबीकेँ हमरा सभसंगे भोजन किएक नहि दै छियनि ?”
माए, “बौआ बड्ड बुढ़ भेलाक कारणे हुनका अपन कोठलीसँ निकलैमे दिक्कत होइत छनि तैँ दुवारे हुनकर भोजन हुनके कोठरीमे पठा दै छियनि |”
नेना, “मुदा बाबी तँ दिन कए बारीयोसँ घुमि कऽ आबि जाइ छथि तखन भोजनक समय एतेक किएक नहि चलल हेतैन|”
माए, “एहि गप्प सभपर धियान नहि दियौ, एखन ई सभ अहाँ नहि बुझबै | बुढ़ सभकेँ एनाहिते है छैक |”
नेना, “अच्छा तँ अहुँक बुढ़ भेलापर अहाँक भोजन एनाहिते एसगर अहाँक कोठरीमे पठाएल जाएत |”
अबोध नेनक गप्पक उत्तर तँ माए नहि दए सकलखिन मुदा अगिला दिनसँ बाबीक भोजन सभक संगे होबए लगलन्हि | 


.      जादूक छड़ी
चुनाब प्रचारक सभा | जनसमूहक भीर उमरल | नेताजी अपन दुनू हाथकेँ भँजैत माइकमे चिकैर-चिकैर कए भाषण दैत, “आदरणीय भाइ-बहिन आ समस्त काका काकीकेँ प्रणाम, एहि बेर पुनः अपन धरतीक एहि (अपन छाती दिस इशारा कए) लालकेँ भोट दए कऽ जीता दिअ फेर देखू चमत्कार | कोना नै सभक घरमे दुनू साँझ चूल्हा जरऽत | कोना कियो अस्पताल आ डॉक्टरक अभाबमे मरत | हमर दाबा अछि आबै बला पाँच बर्खमे एहि परोपट्टाक गली गलीमे पक्का पीच होएत | युवाकेँ रोजगार भेटत | बुढ़, बिधवा आर्थिक रूपसँ कमजोर वर्गक लोककेँ राजक तरफसँ पेंशन भेटत | भुखमरीक नामो निशान नहि रहत | बस ! एक बेर अपन एहि सेबककेँ जीता दिअ |”
थोपरीक गरगराहटसँ पंडाल हिलए लागल | नेताजी जिन्दाबादक नारासँ एक किलोमीटर दूर धरि हल्ला होबए लागल |भीरमे सँ निकलि एकटा बुढ़ मंचपर आबि, “एहि सभामे उपस्थित सभ गण्यमान आ आदरणीय, नेताजी एकदम ठीक कहैत छथि |”
ततबामे नेताजीक चाटुकार सभ, “वाहवाह, बाबा केर स्वागत करू |” पाछूसँ दू तीनटा कार्यकर्ता आबि बाबाकेँ मालासँ तोपि देलकनि | बाबा अपन गरदैनसँ माला निकालि कए, “नेताजी एकदम ठीक कहैत छथि | एतेक रास असमान्य कार्य हिनकर अलाबा दोसर कियो कैए नहि सकैत अछि | जे काज ६६ बर्खमे नहि भेल ओ मात्र पाँच बर्खमे भए जाएत किएक की ओ जदुक छड़ी मात्र हिनके लग छनि जे एखने एहि सभामे अबैसँ पहिले भेतलन्हिए |” 
*****
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
http://videha.co.in/AmitMishra.jpgअमित मिश्र
विहनि कथा-दरमाहा/हँसी/अधिकार/ भूख
दरमाहा

-
नमस्कार घनश्याम बाबू, सब नीके ने?
-
नमस्कार, नमस्कार ।सब कुशल अछि ।अपन बताउ?
-
की कहौं, हालत पस्त अछि ।
-
से किए यौ? हम तँ मजामे छी ।
-
छऽ माससँ दरमाहा नै भेटल ।ओना अहाँ तँ अनुबन्धपर छी तखन एते ठाठ-बाठ कोना ?
-
असलमे सरकारी दरमाहा नै अछि तँ की भेल, जनताक दरमाहमे कोनो कमी नै अछि ।
-
जनता अहाँकें पाइ किए देत?
-
आब मूर्खकें के समझेतै? टेबुलपर नै जा कऽ हमरा मार्फत काज करबाएत तँ
दरमाहा देबैये पड़तै ने ?



 हँसी

-
कतऽ गेलियै यै ? किछु बाजू तँ ।
-
दुर . . .हमर बाँहि छोरू ।अहाँसँ बात नै करब हम ।
-
हे हे एना जुनि करू ।अहाँ बतिआएब नै तँ हमर प्राणे चलि जाएत ।
-
जाए दिऔ ।बढ़ियें हेतै ।
-
आखिर हमरापर एतेक तामस कोन बातक अछि ?
-
सभक पति अपन पत्निकें सिनेमा-सर्कस घुमाबै छै आ अहाँ दिन-राति दर्शनो नै
दैत छी ।काजो करैक एकटा सीमा होइ छै ।
-
अच्छे, एकर तामस छै ।कने लऽग आउ . . .हम पाइ कामाइ छी जाहिसँ नून-हरदि
चलैत रहए आ अहाँ चिन्ता मुक्त भऽ सदिखन हँसैत रहू ।असलमे अहाँक हँसी
किनबाक लेल घरसँ बाहर रहै छी ।


 अधिकार

-
रौ कोनमा ,काल्हि कने रधियाक सासुर भार दऽ आबिहें ।
-
मालिक, ककरो आर कहियौ ।काल्हि हमरासँ नै हएत ।
-
से किएक रौ ?
-
अहाँकें नै बूझल अछि काल्हि एलेक्सन छै ।
-
ओहिसँ की ? पेट तँ तोरा हमरे देल पाइसँ भरतौ ।नेता तँ नै एतौ ।
-
तैयो मालिक जहिना हमर अधिकार अछि जे काज केलाक बाद अहाँसँ पाइ लेब
तहिना भारत माता आ संविधानक अधिकार लेबैये पड़त ।छोड़ि कोना देब ।


 भूख

ओ पगली छलै ।पच्चिस-छब्बिस वर्षक भरल-पूरल देह मुदा दिमाग घसकल ।नित दिन
टीसनपर इम्हरसँ उम्हर टहलनाइ ओकर मुख्य काज छलै । फेकल पन्नी वा अखबारक
टूकड़ामे सटल अन्नक किछु दाना ओकर भोजन छलै ।आबैत-जाइत ट्रेन दिश एकटक
देखैत ,कखनो कऽ कोनो खिड़की लऽग चलि जाइ ।फेर की टी॰टी॰क दबाड़ सुननाइ आ
पुलिसक लाठी सहनाइ ,ओकरा लेल सबदिना छलै ।किओ ओकरा छूअ नै चाहै ।
एक दिन भोरे-भोर अखबारमे छपल एकटा खबरपर नजरि अटकि गेल ।काल्हि राति किओ
ओहि पगली संग बलात्कार कऽ ओकर घेंट चापि देने छलै ।हमर मोनमे एकटा प्रश्न
बेर-बेर उठि रहल छल ।की वासनाक भूख एते ताकतबर होइ छै जे जाति-पाति
,
धर्म-कर्म आ मनुखक स्थिती धरि नै देखै छै ?लागि रहल छल जँ भूख एहिना
बढ़ैत रहत तँ महाप्रलय आबैमे कम्मे दिन शेष छै ।

 

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
http://videha.co.in/Jawahar.jpgजवाहर लाल कश्यप
विहनि कथा- सीता
सीता
वाह ! कि सुखद संयोग अछि , वियाहक नवम वर्ख मे मिथिलेश मिसर के एकटा बेटी भेलन्हि आ ओहो जानकी नवमी दिन / खुशी स मोन गदगद भेल रहैन्ह्, स्वंय देवी अबतरित भेलीह / नामाकरन के दिन बच्चा के नाम सीता राखल जाय / अधिकांश लोकक विचार भेल / मुदा बच्चा के माय सुनयना देवी सहमति नहि भेलीह /
मि0- अहॉ कि नाम राखय चाहैत छी ?
सु 0- किछु हो मुदा सीता नहि /
मि0- कियैक , सीता नाम मे दिक्कत अछि ?
किछु उत्तर नहि भेतल ...
मिथिलेश मिसर और जोर स कहलथि, हम पुछैत छी कियैक ?
सुनयना देवी शांति स उत्तर देलखिन्ह " हम नहि चाहैत छी जे हम्मर बेटी के नाम एहन स्त्री के नाम पर राखल जाय जे अपना संग भेल अन्याय के प्रतिकार नहि क सकलीह /"

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
http://videha.co.in/Jagdish_Prasad_Mandal.JPGजगदीश प्रसाद मण्‍डल
लघुकथा
सड़ल दारीम

नीन टुटि‍ते कुमराकाकाक मन ओछाइनेपर चनकलनि‍। भगवानकेँ हृदैसँ प्रणाम करि‍ते मन रमकलनि‍। रमकल रमैत मन दि‍नक फलाहारपर अँटैक गेलनि‍, भोजन अबैए केना? मुदा प्रश्नसँ पहि‍ने उत्तर ताकब चलाक शि‍कारीक पहि‍चान छी, कुमरो काका तँ सहए। अजीव ई दुनि‍याँ सजल अछि‍। बारहो मास फल-पात बनि‍-बनि‍ बि‍लहाइत अछि‍ तँ तहि‍ना ने अन्नोक हि‍स्‍सा छै। बारहो मासक बारहो रंगेमे सजि‍-सजि‍ अबैए। मन ठमकलनि‍। ठमकि‍ते चन्‍द्र कौशि‍क धारकेँ सूर्य कौशि‍कीय धार दि‍स टघरैत देखि‍ मन टघरि‍ गेलनि‍। दारीम फलक समए आबि‍ गेल। दारीमपर नजरि‍ पड़ि‍ते दारि‍मक दानाबला छत्तापर पड़लनि‍। मधुमाछी छत्ता जकाँ ओहो वसहा कागतक आड़ि‍ दऽ दऽ छत्ता सजबैए। चौराएल दानापर नजरि‍ पड़ि‍ते रससँ भरल डब-डबाएल तक पहुँचलनि‍। मनमे खुशी रमकलनि‍ खुशी ई रहनि‍ जे उपजौनि‍हारे ने चौराएलसँ डबडबाएल धरि‍क रस पीअत आकि‍ कोल्‍ड स्‍टोरक बासि‍ छी जे एके रस भेटत। कहुना-कहुना तँ दू मासक जगह भगवानक घर अपनो बनौने अछि‍। चौराएल-सँ-रसाएल धरि‍क समए। लगले मन उनटि‍ गेलनि‍। फल तँ भेटल मुदा गोबरक लेबा कहाँ ऐबेर लगौलि‍ऐ। नव-नव हवा बनने नव-नव किड़ी-फतिंगीक जनम होइ छै। जखने जनम हेतै आकि‍ खाइले दौगत। भलहिं कि‍छु उपकारो कऽ दि‍अए मुदा बेल छोड़ि‍ कहाँ कोनो फल अछि‍ जेकरा किड़ी-फतिंगी दुइर नै करैए। बेलो तँ अपन जान बचा चाननक रूप धेलक तँए, ने तँ कि‍ नारि‍केलसँ मोट खोंइचा होइ छै? गाछमे गुण छै जे जहर-बातकेँ लग अबै ने दइ छै। रभसि‍ मन कुमरा कक्काक बरसए लगलनि‍। कतए गेल सएओ कि‍सि‍मसँ ऊपर बेलक बोन, कतए गेल बम्‍बै-मालदह-फैजली-राइरि‍क बोन। कतए गेल लताम-नेबोक बोन। जेहेन फल तेहने ने फूलो आकि‍ जेहने फूल तेहने फलो। मुदा फूल तँ गाछक अनुकूल होइत। बेलक गाछे सुगन्‍धि‍क नै फूलो तहि‍ना। मुदा धरती तँ धरती छि‍ऐ बोन लगा बनवासी रामक कुटी बनाबी नै तँ जंगल-झार ने भऽ जाए ई तँ मालि‍ए बुते संभव अछि‍...
भि‍नसुरका मन लगले अकछि‍ गेलनि‍ कुमरा काकाकेँ। बेडो टी हाथ नै लागल रहनि‍। अकछि‍ कऽ ओछाइनसँ उठि‍ मनमे रोपि‍ लेलनि‍। जे दारीममे हाथ लगाएब। खाइक समए तारीखक हि‍साबसँ काल्हि‍ए चढ़ि‍ गेल। फेर मन ठमकलनि‍। आठो गाछमे एक्केबेर हाथ लगाएब आकि‍ आगू-पाछू। जौं आगू-पाछू लगाएब तखन तँ अधडरेरे-अधडरेर सभ रहि‍ जाएत तइसँ नीक जे आठोमे एक्केबेर लगाएब। कि‍अए वेदानाकेँ अनाड़क खनदानसँ झगड़ा हेतै आकि‍ नारंगीकेँ दारीमसँ। कि‍अए ने सभ एक्केठाम बैस वि‍चारि‍ लेत जे भाय सभ एक्के खनदानक छि‍अ। मि‍थि‍ला अपन जनमबास भेल, खनदान जे उपटल जाइ छह तइले सभ चलह राजधानी आ कहबै जे दू मासक जे हमर हि‍स्‍सा अछि‍ से लेबे करबह। जंगल राज नै बोनक राज बनेबे करबह।
      जलखै करैसँ पहि‍ने कुमरा काका चाह पीब पथि‍या नेने दारीमक बाड़ी पहुँचला। आड़ि‍पर पथि‍या राखि‍ आठो गाछकेँ एका-एकी हि‍या-हि‍या देखए लगला। फलक गि‍नतीसँ बूझि‍ पड़लनि‍ जे पाँच गोटे परि‍वारक दू मासक अछि‍ए। तोड़ैले हाथ जखने बढ़ौलनि‍ आकि‍ फलक पीठपर नजरि‍ पड़लनि‍। कारी ढि‍मकाक संग मोटगर भूर। भूर देखि मन कानि‍ उठलनि‍। फल सड़ल अछि‍। दि‍वारक ढेरे   देखि‍ दि‍वरलग्‍गुक परि‍चय होइ छै। दोसर देखलनि‍ सेहो छेदाएल, दुनू फल तोड़ि‍ पथि‍यामे लेलनि‍। दोसर-तेसर चारि‍म आठो गाछसँ आठो कि‍सि‍मक फल तोड़ि‍ आड़ि‍पर बैसला। फलक रंग-रूप देखि‍ सोल्हन्नी मन नै कमलनि‍ मुदा कमलनि‍ जरूर।
      गाछपर सँ नजरि‍ उठि‍ते कुमरा कक्काक सोझाँ बाबा आबि‍ गेलखि‍न। पहि‍ल गाछ बाबेक रोपल छि‍यनि‍। हुनके बनाएल मचानो-खोपड़ीक जग्‍गह छि‍यनि‍। गाछक तँ पुरना डारि‍ सुखि‍ गेल मुदा जड़ि‍यो अपन जगह बनबैत जीवि‍ते अछि‍ आ नव-नव गाछ बनैबते अछि‍। जनकक फुलवाड़ीक अमूल्‍य फल दारीम। देशक वि‍कास तेजीसँ भऽ रहल अछि‍ आ जनकक फुलवाड़ी तहि‍ना तेजीसँ घटि‍ रहल अछि‍ मुदा मुँहक मुस्‍की पाने खाएल दाँत जकाँ बूझि‍ पड़ैए। नजरि‍ आगू बढ़ि‍ते दोसर गाछपर कुमरा काकाक अँटलनि‍। ई गाछ बाबूक रोपल छि‍यनि‍। ओही गाछमे -बाबाबला गाछ- कलम लगा रोपलनि‍। ओना बाबाबला गाछ अखनो अछि‍ए मुदा अपना तक अबैत-अबैत तीन पीढ़ीक फलक गाछ छी। मि‍थि‍लाक अदौक फल दारीम।
      ओइबेर अगते आद्रा बरि‍सल रहए। मनसून जागल। हाल रसाइते गाछक डारि‍ माटि‍मे गाड़ि‍ देलि‍ऐ। ओना बाबा कहनाैं रहथि‍ जे बौआ दारीम, लताम, नेबो इत्‍यादि‍क गाछ डारि‍एसँ होइ छै। जेठ-अखारमे आद्रा होइ छै, गरमी मास जुआ कऽ पकि‍ जाइ छै तखन आद्राक समए अबै छै। ओना मौसमक शत-प्रति‍शत ि‍नर्धारि‍त समए नै अछि‍। आनो-आनो समैमे एक-दोसराक रूप पकड़ि‍ लइए। माटिमे भरि‍ बरसात गाड़ल रहत तँ अपने ओइमे सीर नि‍कलि‍ माटि‍ पकड़ि‍ लइ छै। पाछूसँ ओइ डारि‍केँ काटि‍ कि‍छु दि‍न ठेमाइ-ले छोड़ि‍ देल जाइ छै। अगते काति‍कमे उखाड़ि‍ रोपल जाइ छै। मि‍थि‍लांचलक काति‍क धरम मासक गि‍नतीमे अछि‍। मुदा ओकर महत तँ तखन ने जखन धर्म स्‍थल जकाँ सजाएब। ओना अपन सभ अनुकूलता पसारि‍ दइए मुदा बि‍नु हाथ-पएर बुते हएत की? अनेको फलक खेती, अनेको फुलक खेती अनेको अन्नक जन्‍म देनि‍हार पोसि‍नि‍हार मि‍थि‍लाक मास काति‍क छी। मनमे छगुन्‍ता लगलनि‍ जे केहेन करामाती सृष्‍टि‍कर्ता छथि‍ जे केतौ बीआसँ गाछ तँ केतौ लत्तीसँ गाछ, केतौ लत्तीमे फल तँ केतौ गाछमे तरकारी, केतौ डारि‍सँ गाछ तँ केतौ डारि‍एमे सीर। केतौ फूलसँ गाछ तँ केतौ पत्तेसँ गाछ। सृष्‍टि‍कर्ता केना बूझि‍ गेलखि‍न जे बेल सन फल जखन बनबै छी तखन ओगरबाहि‍ लेल काँटो लगा देब नीक हएत। नै तँ धि‍या-पुता गुलाबो फूल आ दारि‍मो सन फलकेँ दुइर कऽ देत।
      दोसर पति‍आनीपर नजरि‍ पड़ि‍ते धक् दऽ मन पड़लनि‍, द्वारका। द्वारका गेल रही ओ इलाका देखैक मन भेल तँ नागपुर सेहो गेलौं।
ओत्तै जखनि‍ नर्सरीमे गेलौं तँए रंग-रंगक दारीमक गाछ सभ रहै। सनेस रूपमे वेदाना कहि‍ दूटा गाछ अनलौं। ओना मन भेल जे एकेटा गाछ किनब कि‍एक तँ एकेटा गाछ रोपैक रहए। मुदा जहि‍ना अपन बात कहलि‍ऐ, तहि‍ना गाछोबला कहलक-
नब्‍बेसँ पनचानबे प्रति‍शत गाछक गारंटी करै छि‍ऐ। एकटा लेब आ ओ पाँच आकि‍ दस प्रति‍शत जे बि‍नु गारंटीक अछि‍ से कहीं अहीं सि‍र ने बि‍सा जाए, एकर गारंटी तँ नै करब।
जँचल, कहलि‍ऐ-
जखनि‍ दूटा गाछ एकक गारंटीमे लेब तखन तँ एकर दामो कम हेतै?”
प्रश्न सुनि‍ गाछबला ठमकैत बाजल-
डेढ़ गाछक दाम दऽ दि‍अ।
आनि‍ कऽ रोपलौं। मुदा ठीके कहलक। एकेटा गाछ लागल। एके संग दुनू कि‍सि‍मक गाछ, एके-जीवनमे जीबैए। फलमे कि‍छु अन्‍तर दुनूक बीच अछि‍ मुदा एकरंगाहे खेती-बाड़ीक बीच उपजैए। ओना माटि‍क गुण, पानि‍क रस फूट-फूट भेने सुआदो आ गुणोमे कि‍छु फुटता आनि‍येँ दइ छै मुदा सए नै पुरने शत नै भेल सेहो तँ नहि‍येँ अछि‍। सतोक जनम तँ सएमे एकेसँ होइ छै। खैर जे होउ...। जहि‍ना बाबाधामक बि‍सवासू फल सोले-साल कामौर उठबा वएह मुंगेर घाट, सूइया पहाड़, शि‍वगंगा पोखरि‍, चन्‍द्रकूप नेपाली माकन जकाँ छोट-छोट मंदि‍र, नौलक्‍खा दर्शनकक संग बासुकीनाथक दर्शन। मुदा फल-फूलक -शवि‍लि‍ंग फूल- दर्शन भइए ने पबैत। जौं होइत तँ जरूर साग-मि‍रचाइ खेनि‍हारि‍ पतरका पहाड़ी मि‍रचाइक बीआ आनि‍ लगैबतथि। कि‍एत तँ चूड़ा-दही खाइकाल जरूर ओइ मि‍रचाइक दर्शन केने हेती। दर्शन तँ दर्शन छी, ओहुना तीमन-तरकारीमे मि‍रचाइ देल जाइए मुदा ओकर मात्र एक गुण, कड़ुपन शेष बँचैए। मुदा चूड़ा-दही तँ मरि‍चाइएक सवारीपर चलैए। अखड़ा चूड़ा, दोखड़ा दही, तेखरा चीनाीक संयोगे ने चूड़ा-दही भोजन भेल। जौं चीनी मुँह मि‍ठौलक तँ दही खटि‍औलक। सम-गम जीहे ने मि‍रचाइक असल सुआदो आ गुणो पाबि‍ सकैए। मुदा ई तँ स्‍थान वि‍शेष गुणक शक्‍ति‍ छी जे आकार्षित करैए। वेदाना गाछ बाबाक फुलवाड़ीमे साले भरि‍ पछाति‍ फूला कऽ फल दि‍अए लगल। ओना पहि‍ल खेप एकेटा फड़़लनि‍। फलक आकांक्षा जगौलक। बाबेधाम जकाँ स्‍थानो-स्‍थान देखबो आ करैऔक उत्‍कंठा बढ़ौलक। वि‍चार भेल जे द्वारकाक फल-फुलबाड़ी आबि‍ये गेल से नै तँ अगि‍ला सल प्रयागमे कुम्‍भ मेला हएत ओतए जाएब आ नर्सरीक सनेस आनब। सएह केलौं। ओहीठामक अनार छी। गाछोक झाड़ ओहि‍ना जहि‍ना दारीमक, पातो तहि‍ना फुलो तहि‍ना फलो तहि‍ना। जेना एक्के कुलखुटक हुअए। पाँचम गाछपर नजरि‍ अँटैकते कुमरा काकाक मन अनारक भीतर प्रवेश कऽ गेलनि‍। मोती सदृश्‍य दानाक छत्ता, मधु सदृश्‍य रस, बसहा कागतमे लपेटल, देवघरक पेड़ा जकाँ। पथि‍याक फल ि‍नहारलनि‍। यएह छी अनार, ईहो छेदाइए गेल अछि‍, भरि‍सक एकरो दाना...। मन तुरूछि‍ गेलनि‍, पथि‍यामे राखल छठम फल नि‍कालनि‍। यएह छी नारंगी। सभ हार-काठ एक रहि‍तो कि‍छु तँ अपनो गुण-धर्म रखनै अछि‍। ओना कुमरा काकाक मनसँ अनार हटि‍ गेल छेलनि‍ मुदा पथि‍यामे जे छेद गरे राखल छल से ओहि‍ना आँखि‍मे गड़ैत रहनि‍। हरि‍द्वारसँ नारंगी अनने रही...
फलक प्रति‍ जि‍ज्ञासा औरौ बढ़लनि‍ मुदा हरिद्वार तँ हरि दुआर छी। जहि‍ना एकटा गाछ नर्सरीबलासँ मांगलि‍ऐ तहि‍ना ओहो बि‍सवासक संग कहलक, अपन नर्सरीक गाछ मरै नइए। ठीके कहलक। वएह छठम गाछ छी। मुदा आगि‍मे जेते घी देल जाइ छै तेते ओकर लहास बढ़ै छै तहि‍ना मनक लहास जागल, सातम गाछ कश्‍मीरसँ अनने रही। अमरनाथक दर्शन आ अनारक गाछ ओहि‍ना अखनो आँखिक सोझहामे अछि‍ जहि‍ना आनि‍ कऽ रोपै दि‍न रहए। जहि‍ना अमरनाथक कश्‍मीर तहि‍ना झंझटि‍यो राज्‍य छीहे। सभ दि‍न ओइठाम झंझटे होइत आएल अछि‍। बि‍हार जकाँ कहाँ असथि‍र अछि‍। अकबरे लगसँ तमाशा होइत आएल अछि‍। अखनो कनी-मनी बीसे भऽ गेल अछि‍ जे उन्नैस नै भेलहेँ‍। खैर जे होउ...। मुदा जे होउ बागक बोन आ झीलक झि‍‍लहोरि‍ बि‍हारसँ बेसी खेलि‍ते अछि‍। जेहने शालीमार नि‍शातक बोन तेहने डल झील। धानक भात-चूड़ा, गहुमक रोटी, मकइ भूजा जहि‍ना अपना सभ खाइ छी तहि‍ना ओहो सभ खाइए मुदा मलड़ैए अपना सभसँ बेसी। कि‍अए ने बेसी मलड़त, अपना सभ पानि‍क बीचो आ सुखलोमे पानि‍ ढारि‍ नहाइ छी मुदा ओ सभ बेसी बरफेमे नहाइए। ओना अकास गंगाक जलधार सेहो होइ छै, मुदा अपना सभसँ कम। अपना सभ एकटामे जरूर पछुआएल छी जे फल सड़ा कऽ नै खाइ-पीबै छी...
तबधल मन कुमरा काकाक तँए बेसी सेरि‍याम दि‍स नजरि‍ नै टि‍कलनि‍। कोनो वस्‍तुपर नजरि‍ टि‍काएब धि‍या-पुताक खेल नै छी, जि‍नगी छी। जि‍नगीक बाट बनौनाइ सि‍खबैए। मुदा जहि‍ना बक्‍सा-पेटीमे तहि‍आएल कपड़ाक बीचमे नि‍चला तह तक जाइत-जाइत मन ओङहाए लगैत तहि‍ना ओङहाइत मन काकाक आठम फलपर गेलनि‍। अनचोकमे जहि‍ना गाढ़ो नीन टूटि‍ जाइत तहि‍ना भक्क खुजलनि‍, ई तँ जगरनाथक सनेस छी। एक दि‍स समुद्रक लहरि‍ तँ दोसर दि‍स अकास ठेकल पहाड़ सेहो ठाढ़ अछि‍। समुद्रक बीच जि‍नगी जहि‍ना हँसैत-खैलैत चलैत तहि‍ना दोसर दि‍स पहाड़क बीचो चलैत। जेकरा ने खेत छै आ ने अपन कि‍छु आन वस्‍तु। मि‍थि‍लांचलक मुख्‍य सम्‍पदाक आधार खेत रहल अछि‍, अखनो अछि‍। मुदा पंगु भेल अछि‍, जइ मि‍थि‍लाक दि‍शा दृष्‍टि‍ टक्कर दैत आएल अछि‍ ओ मि‍थि‍लांचल माटि‍-पानि‍ सएओ कि‍सि‍मक फल-फूल आ अन्न उपजबैक शक्‍ति‍ सेहो रखने अछि‍। बेरोजगारीओ पसरल अछि‍ आ काजो पसरल अछि‍, मुदा...
बारहो मासक खेती, बारहो मास जोत-कोरसँ लऽ कऽ राति‍क नव भोजन धरि‍ मौसमीसँ लऽ कऽ बरहमसि‍या फल-तरकारीक संग दूध-माछ सबहक आधार रहि‍तो बीरान भेल जा रहल छी।
आठो गाछक सोल्हो फल कुमरा काका कत्तासँ कटलनि‍। सबहक भीतर खोइचाक तरमे कोयला जकाँ कारी तइबीच कीड़ो मरल देखलनि‍। छि‍ड़ि‍आएल टुकड़ीकेँ पथि‍यामे समेटि‍ कात जा फेकब नीक बुझलनि‍। एक तँ ओहुना जेहने फल तेहने दागो लगै छै। तैपर आरो कारी-खोरना भेल अछि‍, तेहन दगनियाँ देत जे फटलो वस्‍त्र धेनै रहत। पथि‍यामे उठा कातमे फेक आबि‍ गुम भेल वि‍चारए लगला, जखन एकटा चाउर सि‍द्ध भेने लोक बूझि‍ जाइए तहि‍ना सड़ल फल देखने तँ अनुमान कएले जा सकैए जे अहि‍ना सभ सड़ल हएत। मुदा एकरो तँ पहि‍चान अछि‍, जइमे भूर हेतै ओ सड़ल भेल जइमे नै हेतै वा छोट हेतै ओइमे तँ आशा कएले जा सकैए...। मुदा टुटैत हूबासँ मन असकता गेलनि‍। काल्हुका लेल अगि‍ला काज टारि‍ लेला‍। काजक नि‍चेनी कुमरा कक्काक मनकेँ असथि‍र केलकनि‍। असथि‍र होइते मनमे उठलनि‍, जहि‍ना दारीमक दाना मोती जकाँ सजल रहैए तहि‍ना ने मनुख रूपी दानासँ समाजो अछि‍।
दोसर दि‍न फल तोड़ि‍ अनैसँ नीक कुमरा काका झाड़ीयेक बीच कत्तासँ काटि‍ देखब नीक बुझलनि‍। आठो गाछक सभ फल सड़ि‍ गेल अछि‍। मुदा कि‍ ओकरा काटि‍ कऽ फेक देल जाए आकि‍ समयानुकूल बनौल जाए?


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'विदेह' २२८ म अंक १५ जून २०१७ (वर्ष १० मास ११४ अंक २२८)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -  गौरी चोरनी ,  गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर ...