Sunday, May 05, 2013

'विदेह' १२९ म अंक ०१ मई २०१३ (वर्ष ६ मास ६५ अंक १२९) PART I


                     ISSN 2229-547X VIDEHA
विदेह'१२९ म अंक ०१ मई २०१३ (वर्ष ६ मास ६५ अंक १२९)India Flag Nepal Flag

 

अंकमे अछि:-

. संपादकीय संदेश


. गद्य









 गद्य-पद्य भारती:मन्त्रद्रष्टा ऋष्यश्रृङ्ग- http://www.videha.co.in/HARISHANKAR_SRIVASTAVA_SHALABHA.jpgहरिशंकर श्रीवास्तवशलभ"- (हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद http://www.videha.co.in/Vinit_Utpal.jpgविनीत उत्पल)


 बालानां कृते-http://www.videha.co.in/AmitMishra.jpgअमित मिश्र- .राति दिवालीक .जनमदिनक शुभकामना

 

 विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन  

 


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ज्योतिरीश्वर पूर्व महाकवि विद्यापति। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू।

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गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज'


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संपादकीय

 

Gajendraगजेन्द्र ठाकुर

ggajendra@videha.com

 

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. गद्य


http://www.videha.co.in/KAMINI_KAMAYANI.jpgकामिनी कामायनी   

लघुकथा- माटीक मुरुत

चारहु कात कुहेस् क साम्राज्य ,मोटका ,मोटका ,उज्जर ,धप धप, धूस ओढ़ने गाछ बिरिछ ,सोझा के लतामक गाछ जे घर स दस डेग पर ठिठुरति ठाढ़ छल ,आंखिक दर्शन शक्ति स, बाहरि , , हिमालय के तराई मे बसल अहि छोट सन शहर प,अहिना पहिनहु स ,शरद रानी बिशेख वात्सल्य प्रेम स आविर्भूत रहैत रहल छली,आ एखन त, सद्यः हुनके प्रिय समय आ, साम्राज्य । ओहि प्रलयंकारी शीतलहरी मे घरक भीतर लोक वेदक हाथ पैर सुन्न भेनाय स्वाभाविक छल ,मुदा कोढ़ फाड़ैत करून चित्कार  गै म्या, गै म्या सुनि कियो नहिं सिरक क तर नुकायल रहि सकल छल,धड़ाधड़ि अड़ोसीया  पड़ोसिया के दरवज्जा खुलि गेल छले। ओढ़ना ,कंबल ,मोफलर ,सौल मे बांहल ,छेकल लोग हिम मानव बनल  टौवाइत टौवाइत एक दोसर स, ओहि अनुत्तरित प्रश्नक समाधान पाबए लेल बेकल ,मुदा केकरो किछू नहि बुझल जे मिसेज ठाकुर के किएक गाड़ी प, उठा पुठा क, अस्पताल ल जायल गेल ,वा  के एना हाक्रोश करि रहल छल । गप्प खुजबा मे कनि काल त, अवस्स लागले ,मुदा तखन ककरो बिस्वास ने भ रहल छल मिसेज ठाकुर त, एना सपनों मे नहि करि सकैत छली ,तहन केकरो पेट मे पईस क त लोग नहीं देख सकैत अछि ।
    असंख्य सम्बोधन स संबोधित मनुख सन हुनको संग समय भेष बदलि क; डेगा डेगी आगा आगा चलैत ,लुका छिपी खेलाइत पाया कातक ओहि राज्य मे जा क नूका रहल छल ।
 एक बीत्त के घोघ तानने, ओ दस बरखक बहुरिया पाँच हाथ क  ललका नुआ मे लेपटायल भट भट खसैथ, त बेस लाम चाकर सौसक बज्र बोलक लगाम तुरत हुनक कान मे पड़ेंह की खुआ क  माए बाप पोसलक ,जे दु डेग चललों ने होएयै 
    सासुर मे त जेकर जे रिश्ता नाता होए ,तही स,संबोधित करेन्ह,मुदा परोछ मे सबहक लेल भानपुर बाली रहैथ,। अपन जन्म स्थानक नाम जेना अपन पीठ पखोदबा क, स्त्रीगन सासुर जैत अछि ,,जीवनपर्यंत ओकर वएह नेसान बनि जैत छैक । आब नीक सुभाव रहल ,ठोर मुंह नीक रहल,पीत्तमरू रहल   ओहि गांमक मान मरजाद बढल,बदियल ,मरखाह ,गुमान वाली भेली त, परात उठि क, किओ ओहि गामक नाम  लेबा के सोचिओ नहि सकैत छल ।
     भानपुर बाली के गोतियो सब हुनक अदम्य जीवट आ, संघर्षशील जीवनक  चर्च  परोछ में करईत कखनों ने कखनों नतमस्त्क त  जाएत हेताह ,मुदा प्रत्यक्ष मे लोक ओहि लोक क प्रशंसा केनाय उचित नहीं बुझे छै ,जेकरा स कोनो प्रकारक लाभ नै होय ।
    एक सधल नटी सन दु टा खुट्टा पर बांहल ज़ोर प पएर ,आंखि एकदम ,सीध मे ,माथ पर चारी पाँच टा घैल ,, , भानपुर बाली एहीना पएर संभारि क, कतेको बेर अहि खूँट स ओहि खूँट आ, ओहि खूँट स, अहि खूँट आबैत जैत रहली ,मुदा तखन त हुनक धुआ देखि क दियाद  सभक हिय झरकि जाए । पेलवार क नजरि मे ओ अबला कतछलिह ,भरि मुह दांत भ गेल  छलन्हि,पीत्त देखाय पड़ लागल छल,, माथ , कनी टा टा सींघ सेहो देखाय पड़य लागल छल । मुदा ओ त बाद मे ।  ,
  करि क जोडि जाड़ि क चीठी पटरी लिखबा योग्य साक्षरता ,बेटी के पढ़ालिखा क जज बनेबा के छै की ?फुकते त चूल्हिए, बाला जमाना मे ,अतीतक ड्योढ़ि जे आब नब जमाए लेल पायस बनेबाक सेहो सामर्थ नहि रखैत छल,नवम दसम होइत ,सुखी सम्पन्न घर देखि अपन माथ क बोझ उतारि देल ,आब सासुर मे जे जेकर भाग्य ,भोगतै जिनगी ओहि भांति ।
 तखन अपन छोट छोट हाथ स ओसारा प राखल बड़का सिलौट प मोटका लोढ़ी स मसल्ला पिसइत ,बड़की दियादिनी स नहु नहुं बजैथ हम सबटा काज करि दैत छिएइन्ह,ई भानस करि लौथ हमारा रानहय नहि आबैत अछि,बाबू बड़ खिसियाय लागैत छथिंह,’ । दियादिनी मुसुकि क रही जायथि ,ससुर के गारि बात आंखि क सोझा नाचि उठेक ई भानस मनुक्ख खेबा  जोगर छै ,दालि अनोन ,तरकारी मे एक ढ़ाकी नून ,’। सौस आगि ओडिका ल क घी ढ़ारैथ सोइत्क बेटी छथि,सुकुमारि 
        गोर नारि ,पातर छितर ,कलसगर ,नीक आंखि नाक ,भानपुर बाली ,पीअर ,हरियर नुआ के देह मे ऊपर सनीचा लपेटने निहुरि निहुरि क ओते बड़का टा आंगन मे दुनु  सांझ झाड़ू बहाड़ू करैत हाफ़य लागैत त पनभरनी बिजूरी लग आबि क छीन लेन्ह बाढ्नि है लभकी कनिया ,आहाँ किए छूबे हीए बाढ़्नि,हम कथि  ले हिये। त घोघ क, नीचा स हुनक दाड़िमक बीज सन दांत चमकि जायन्ह।सिखबाक चाहि नै,तखन नै बुझबे काज कोना होइत छै
   पाबनि तिहार मे जे नब नूआ आबै त पहिने घरक सब स्त्रीगन अपन अपन पसीन्न के चुनि लइथ,आब हुनका हरियर नै नीक लगे ,मुदा उपाय की ,दू नॉर कानि लइथ ,कतेक दिन धरि ओ नूआ ओहिना सन्दुक प राखल रहि जाए ,सब हुनक  अईठी प हसैत रहे कोन  कोन नै फकड़ा पढल जाए ,हारि क हुनका ओ नूआ पहिरैए पडैक ।
  नहु नहु  आब हुनको सौख मौज जागय लागल रहेंह । अपन बड़का बड़का आंखि मे काजरि लगा क नीक जका नूआ पहिरै लागल छलिह । भरल दुपहरिया मे ,अपन कोठरिक दरबज्जा सटा , नीचा पटिया  ओछा क सीकी के बड़का पौती स कजरौटी,पोडर अफगान स्नो ,अलता ,टिकुली ,सिंदूरक कीया, किलिपक पत्ता ,ककबा संग बीत्त भरि के एना निकालि क पौती के सोझा ठाढ़ करैत । अपन बड़का बड़का केस के जुट्टी स निकालि क नारिकेर् क  तेल स बड़ी बड़ी काल धरि माथ् क मालिस करैत रहेथ 'फेर ककबा स' थकड़ईत थकड़इत पहिने बाम कात के जुट्टी गुथेथ,ओकर नीचा मे ललका फीता के खूब पैघ बड़का फूल बनाक ,ज़ोर स पीठ प फेक ,दोसर दिस क  जुट्टीगुथेथ, फूल बनाबैथ ,फेर दुनु के एक दोसर मे फसा क बीच माथ स कनी नीच क्लिप लगा  खोंपा  बनाबथि। गमछा के एक कोन के लोटा के पानि मे भिजा क' सबुंदानी मे राखल साबुन प रगड़ि मुह  पोछि  आंगुर स स्नो दुनु गाल प लगा बढ़िया स पचा क  पोडर लगेला के बाद  , टीकुली कपार प साटैथ,आखि मे काजर लगाक ,एना के हाथ मे उठा कनी काल धरि अपना के निहारैथ ,फेर नहीं जानि की सोची क' मुसुकि क ,सब चीज बोस्त ओरिया क मौनी मे ध ,कोठी के ऊपर राखि अपन पलंग प कनी काल पडल पडल घरक़ धरनि तकेत आंखि मुनि लइत छलिह ,की बेरहट लेल आंगन मे धिया पुता के आवाजाही सुरू भ जाय छल,फेर रतुका भोजनक ब्योंत ।कहिओ जखन अहि टोल,ओहि टोलक ससुर् बासि बेटी सब नैहर आबैथ त बड़का बाबा के हवेली के नब कनिया के देखय एबे करे जायथ,बड़की दादी हुलसि क हुनका सभके अपन ओसारा प राखल चौकी प,बैसबा स पहिने चद्दरी बिछेनाय नहिं बिसरथि । आ कनि काल् क गप्प सप्प के बाद पछबरिया घरक केबाड़ लग जा क बाजथि  दाय सब एलखीन हें कनी बहरैयों घर स मुंह देखा दिओ छोटकी कनिया केबाड़ लग आबी क;   बड़का टा घोघ निकालि ,मुड़ी गोतने अपन दुनू पएर प  बैस रहैथ
दादी कनि झांकी क देख लैथ फेर ,संतुष्ट भाव स ,केबाड़ खोलि आगाँ बढि कहथि गे फूलो ,तुही देखा दहि नबकी भौजी के मुंह अपन विवाहक बाट जोहैत पितियौत ननदि फूलो चट स घोघ उठा क, मुड़ी पकड़ि तीनों दिस घुमा दैक ।  कनिया बड़ सुन्नरि , केहेन परोड़क फाँक सन उछलल उछलल आंखि,  ठाढ़ नाक ,पनमा ठोर  । कनिया के सुन्दरताई प अपन विचार परगट करि क जायत काल हुनका सबके  दादी आने की भानपुर बाली के सौस् क विलाप करेज  मे छूरा सन गड़य लागे माटी के मुरुत एक टा गढ़ि क ध देलक,’  तेकरा बाद हुनक विपन्न नैहरक खोईचा छोड़ा क बखानय लगेथ त सुननहारों के अनसोहात लगे जाए दिओ,बाप क धन स की होई छै, नीक लोक त भेट गेल किओ ने कियो बजिए उठेक ।
  गरमी मे सकाले भानस भात भ जाए आ  घरक स्त्रीगण सब सेहो नीफिकिर भ; कखनों पछबरिया ओसारा प;कखनों पुबरिया बाड़ी बाला दुमुहा हवादार घर मे अपन किसिम किसिमक गप्प क पेटार खोलथि। टोल भरिक बेटी पुतहु सबहक बाजब, भूकब ,व्यवहार ,रूपरंग के  अपन अपन तराजू प जोखैत ,कखनों ओकिल त, कखनों जज के मुद्रा मे आबि जायथ। ओहि बइसारी में बुढ़ पुरनिया सौस लेल जगह नै रहे ,एक्छहे जुबती सब ;,बियाहल ,कुमारि, । ओत्त  पानिभरनी, कुटिया पिसिया करनिहारि ,मालिन ,धोबिन ,खबासिन तेकरो सभक पैठ छल,मुदा उमरि के मामले मे कोनो दरेग नहीं ,आब हस्सी ठठा लोक अपने तुरीया  मे करते न । बाजए के सबके समान अधिकार त नहि छले,मुदा किओ चुप्पों नै रहे ,मुंह दाबि क त पुतौह सब हँसे ,गामक बेटी त, ठिठिएबे करे ज़ोर स ।
 एहने जेठक सुनसान दुपहरिया मे ,जखन एक दिन अपन कोठरिक केबाड़ ओठङ्गा क सिंगार पटार करबा लेल पटिया ओछा क जुट्टी खोलि कोठी पर स एना ककबा उतारक लेल हाथ बढोलन्हि की पएर दाबी क चुप्पे स पईसल छलखींह, उघरल माथ कपार ,छिटकल केस ,भानपुर बाली के जेना ठकबकी लागि गेले ,देहक शोणित बरफ भ दिमागक सबटा गतिबिधी के अवरुद्ध करि देलके , हुनक अहि मनोदशा के फायदा उठबईत  टुनटुन भैया झट दनी हुनका बाम हाथ स पजियाबईत दाहिना हाथे हुनक मुंह बन्न करि देलथि। खूब बुझल छलनहि,एखन आँगन मे कियो नहि ,माय अपन भगिनी के बियाह क हकार  पुरय लेल अपन नैहर गेल छली,बड़की भौजी अपन छोटकी बहिनक दुरागमनक लेल अपन नैहर गेल छलथि ,तीनों बहिन अपन  अपन सासुर ,खबासीन दुनु ,सेहो लगनक समय मे नौत हकार पूरय  कत्तों कत्तों आन गाम  गेल ,
 टुनटुन भैया के मनोरथि प, भानपुर बाली धधकैत अँगोरा फेकलथि ,अचानक ओ सिंहनी बनि हुनक पकड़ि स, छूटि हुनक दाहिना हाथ प ततेक ज़ोर स अपन दांत गडौलथि जे हुनक छरपट्टी छुटि गेलन्ह ,एतबा मे ओ केबाड़ खोलि सोझे दलान दिस प्रेत बाधा स ग्रसित मनुख जका पड़ेली,पितिया सौस जनार्दनक माए ,जे अपन दलान स उतरि टेटरा म्या स, बांगक गाछ लग ठाढ़ भ गप्प करैत छली, बड़की काकी के आँगन स दौड़बक आबाज सुनी दुरखा लग आबी चिहुकि उठली की भेल ये कनिया ,गई म्या , ,”बड़का बड़का केस ओहिना खुजल ,माथ  प नुआ ने , आंखि मे भयानक भय ,ज़ोर ज़ोर स, चलैत साँस,मुंह स त किछू नहीं बहरेलन्हि,मुदा ओ हुनका भरि पाँज पकड़ि ज़ोर ज़ोर स कानय लागल छलिह । इमहर उमहर कान ठाढ़ केने लोक बेद के देखि क जनारदनक माए हुनका हुनके आँगन मे पछबरिया ओसारा धरि डाढ़ पकड़ि क आनलखिन्ह । कनी काल धरि हुनक माथ प, हाथ राखि नोर पोछि,सप्पत तप्पत दइथ ,सब टा खिस्सा उगलबेलखिन । घर बला पढुया छलथी त, बेसि  काल पर्देसिए बनल । फेर त जा धरि सौस नहीं आपस अयली ताबे तक हुनका ओगरि क ओ हुनक ओसारा प सुतैत रहल छली ।
     सौस के कान मे जखन खिस्सा गेलन्हि , ससुर आ भैसुर संग ओहो त्रिया चरित त्रिया चरितक डिडिंबी नाद करैत  हुनक हाथक  छूल नहिं खेबा क सप्पत संग पेटकुनिया द पुतौह के सरापय  लागल छलिह ,किएक त  ओहि दिन स टुनटुन भैया निपता भ गेल छलईथ । 
  उमहर  एहने नीफिकिर दुपहरिया मे जुबती सबहक बइसारी मे भानपुर बाली हीरोइन भ  गेल छलिह । किओ कहेकगाल प दांत गड़ा दैतथि नै, जे जिनगी भरि के चेनहासी भ जयतइन्ही। किओ कहे हम जे रहितिये त तेहन ठाम नै लात मरितिएई जे ज़नानी के नाम धरि बिसरि जैतथि एहने चालि प घरबाली छोड़ि देने हेतैन्ह। तेकरा बाद सब अपन अपन गामक छिनार पुरुखक अनंत खिस्सा बांचैत।
   , दोसर ठामक बैसारी मे,जतए ,थकुचल ,झुरकुट ,खुर्राट सौस सबहक गप्प चले ,टुनटुन बाबुके सुधपनि के;हरेराम कका के माए अपन गरदनि के मोटका हसूली छूबेत ,मिचिया मिचिया क बाजेथ     कहिओ हमरा सब दिस नजरि उठा क, नहिं देखलन्ही, तेहेन लजकोटर ओ ,सदिखन माठ झुका क छलेथ  यै गरिब् क बेटी आनलहु बीयाहि क तखन त एहने सन दिन नै देखौता बिधाता। कानक माकड़ी झूलबईत अनारस बाली बाबी बाजैथ । आ ओहि बइसारी मे जनार्दनक माय सेहो रहेत हम सब मुरुख छल प्रपंच की बुझबई  ,कहबी छै जे घोर कलिजुग आबि गेले,’।टुनटुन बाबू के जननी नॉर पोछि बाजेथ ओ बतहा के की पता छले जे ओसारा  प राखल लोटा उठा क कल स पीबा लेल पानि भरनाय ओकरा एतेक महग पड़ते ,देह मे त अहि कुलछनी के आगि नेसने रहे छै
छले त टूटल जमींदारी ,मुदा एखनों बड़का गिरहस्थ ,,जमीन जायदाद गाछी ,माल जाल  संगे दस टा धिया पुत्ता बाला नामी घर ,दू तीन टा पूत त ऊच शिक्षा प्राप्त करि बढ़िया नौकरी सेहो करय लागल छलथि। अहि प्रसंगक बाद भानपुर बाली के घरबला कोलेजक  एक टा छुट्टी मे जखन गाम एलथी , फेर ओ आपस अपन कोलेजक मुंह देखे नहीं गेला ,कनिया लग जे दु चारि पाय जोडल छल , पेटी मे आ देह पर जे सब आभूषण छल संग ध ,दुनु बेक्ती ओहि घर क मधुर छाहरि स निकलि दुनिया के अथाह महासमुंदर मे दहिया भसीया क  अपन बाट ताकय लेल जायत रहल छला ।
 कतेको बेर एहेन देखल गेले जे साधारण सन बाट ,कखनों क तेहन भयौन मोड़ ल लेत छै ,जे एक दिस उंच पहाड़ आदोसर दिस लोंमहर्षक खाधि। लोकबेद के कहब छै जे अप्पन  बाट मनुक्ख अपने कहाँ बनबे छै ,ओकर बस चलिते त ओ चिक्कन चुनमुन गंगाजल स धोल रस्ता प,पएर रखिते,मुदा जीबनक रस्ता त वैह बनबैत अछि ,जे जीबन बनेबक ,ओकर संचार करबाक , ओकर संहार करबाक भार उठौने अछि । तखन सुंदर ,सूचिक्कन बाट सेहो काँट कूस ,पाथर  ,पानि स भरि दुसाध्य भ गेले कोना ,से अदृष्ट जानेथ।भानपुर बाली संग  किछू एहेने भेल छले।ओहि जमाना के  इंजीनियरीङ्ग्क पढ़ाई डेढ़ बरख पहिनहि छोड़ि घर बाला सड़क प बौआ रहल छलथी। कनिया के मोसियौत बहिनक घरबला अहि मुसीबतक घड़ी मे सुग्रीव जका हुनक संग धेने रहल।मास दिन धरिअपन घर क छत हुनको माथ   राखि डिस्टिल्ड वाटर के फैक्ट्री में नौकरी के सेहो बेबस्था करा देलकन्हि।
   भानपुर बाली के की नाम छल हेतैन्ह की पता ,मुदा तत्कालीन रिवाज् क मोताबिक ,पहिलोठ संतान के नाम स म्या के नाम पड़ी जाए ,असेसरक माय ,बीन्नी के माय । धिया पुत्ता के बेर मे सेहो बिधाता जेना बाम बैसि रहल छलथी। मुदा कतेक बरखक बाद एक पर एक तराउपरि चारि टा धिया पुता स भगमान आचरि आ घर भरिदेलखिन्ह।आ ओतुक्का लोग हुनका सोना के माँ के नाम स चिन्ह लागल छल।  घरबला के त बुधिए बाम भ गेल रहेंह । अपन कुल खानदान क घमण्डक संग ओहि अधखिज्जु डिग्री के दंश हुनका सनकी सन बना देने छलन्हि। अपना ऊपर केकरो रोब जतेनाय हुनक पीत्त के तुरन्ते एड़ी स मगज धरि पहुंचा दैक। कार्य स्थल प नित्त दिन झंझट होमए लागल । घर आबि क भानपुर बाली प तामस झाड़ईथ अहीके चलते हमरा आय ई दिन देखय पड़ि रहल अछि ,बड़ कष्ट छल त नदी पोखरि मे भसिया जयतों ,जहर माहुर खा सूती रहितों : तिरिया चरित्र मे फसि क, हम बर्बाद भ गेलों। की करितथि भानपुर बाली ,बज्र सन बोल सुनैत सुनैत पाथर भ गेल छलथी पहिनहि स । बच्चा चारु इसकुल मे पढ़ैत छलेय । तनखा त कोनो खरापो नहिं छल ।
    प्रतिदिन भोर मे काज प ज़ेबा काल पति कलह मचबैत  अहाँ की बुझबै ,अपने त दरिद्रक बेटी छी, स्वाभिमान की होय छैक। आय हम अपन हिसाब करबा क रहबे ,ने बरदास होइत अछि कनहा के बोल। भानपुर बाली आगा बढ़ी क हुनक माय बनी जायथ  हमर गप्प छोड़ू ने ,मुदा अहा केकरो स याचना करय थोड़े जाय छी ,मेहनत करे छी,दुनिया करे छै, आब ई कोनो निषिद्ध चाकरी बाला जमाना त रहले नहिं ,देखियो बच्चा सब के निक इसकुल भेट गेले,सब त अहिं प, आश्रित अछि ने
एक बेर  केकरो मुंह स  कत्तों सुनली ,जे सेना मे नीक नौकरी भेटेय छै । एक दिन घरबला के नीक मूड देखि क बजली त हुनक रौद्र रूप आ चिकरनाय सुनि क सब धिया पुत्ता कोठरी के मुंह लग आबि क ठाढ़ भ गेले    हे देखैजाही एकर बुद्धि , तोहरि बाप रहतौ घर मे आ हम जाऊ सेना मे मरय
  मुदा कतेक दिन ,आखिर मे ओ नौकरी स इस्तीफा  देलथि। तखन एहने सन किछू भवितब्य के सोचि विचारि होसियारि भानपुर बाली पाँच  कोठरी के अपन मकान पहिनहि बनवा नेने छलथी ,एक टा बाईस कट्ठा के जमीन सेहो कीन लेने छलिह। आब घरबला जखन  त्यागपत्र द देलखीन त जे बकाया रुपैया भेटलनही,ओहि स खाली जमीन प, दू टा कोठरी गिलेबा प, ठाढ़ करि  जुत्ता के फैक्ट्री खोललन्हि। तीन टा कारीगर रखली । घरक सबटा काज सम्पन्न करि सीधे फैक्ट्री पहुंचथि ।  कखनों पतिदेव के अनेरे क्रोध देखि ,कारीगर सब के पोल्हा  क चाह पानि पिया क बुद्धि स काज लईथ। किछुए काल मे बिजनेस गति पकड़ि नेने रहेक । दुनु बेटी के कन्यादान करि गंगा नहा नेने छलैथ । मुदा बिपदा के ई कोना सोहेतेंह। ओ अपन चक्र चालि फेर स तेज करि देली । किओ कहलकैन सौस बड़ बीमार,किओ नै सेबा करे छेंन । जे पुतौह सब बड़ नाम गाम बाली छलिह ,धिया पुत्ता के पढ़ाबए के लाथे अपन अपन घरबला संगे बाहरि जायत रहली । एक टा बेटा त भागिए गेल छलेंह,मुदा तइयो पाँच टा पुतौह त बसिते छल ,आय बुढ़ारी मे ,बीमारी मे कियो काज क नै ।ई सुनि हुनक मोंन  कचोट स भरी गेलन्ही,आखिर ओ हमर स्वामी के माँ बाबू छथि,आ शास्त्र  बिधान अनुसारे हुनको धर्मक माँ पिता , हुनक करतब्य बोध हिय मे  उत्पात मचबए लागल । सबटा काज छौड़ि सौस लग आबि गेल रहैथ।ओ रोबदाब बाला धूवा ,मुट्ठी भरि के ठठरी बनल   बिछौन स सटल,ससुर सेहो दलान प पड़ल। मास दिन रहि क सब व्यवस्था दुरुस्त केली । जखन हुनक मुंह मे ओ कौर खुवाबथि सौस के आंखि स हर हर नॉर बहे लगै ,अपन दुनु हाथ जोडि ओ जेना हुनका स क्षमा मांगेथ । भानपुर बाली हाथ पकैड़ अपन माथ प राखि लइथ। ओछौने प नदी ,लग्घी होयन्ह , अपने स बिन घिनेने साफ करैथ ,दू टा मटकूड़ि राखीदेलथी,महेशक बेटी के हुनका कोठरी मे सूते के ,आ हुनक सब तरहक धियान राखय लेल  गछबा क  ओकर बियाह दानक सब टा  भार गछि लेलथि। भनसीया सेहो  राखि देलथी  हम पाय देब आहाँ दुनू प्राणी के सेवा करबै खेबा पीबा मे ,पथ परहेज मे कोनो कोताहि नहिं हेबाक चाहि । कनी डेरो प हमरा देखनाय जरूरी अछि। आ एक पएरसासुर आ दोसर डेरा प, रखने बरख धरि काटि देने छलिह । माय बाप संग ,गांमक लोग के आत्मा जुड़ा गेलय,आब हुनक कुल सील क डंका पिटाय लागल ।
   किछू बरखक बाद जुत्ता फैक्ट्री बंद भ गेले ,घरबला के चिनिया बीमारी आ, ब्लड प्रेशर दबोचि लेलकन्ही। बेरा बेरी ससुर आ, सौस अपन अपन ठाम जायत रहला । इहों सबहक संग  ससुरक संपत्ति मे अपन हिस्सा बटबा लेलथी । मुदा बटाई प, ने लगा क, अपने स जन मजूर राखि खेती करबाबए के ठनली। परदेशक जमीन आ मकान बेचि कगाम स सट्ल शहरि मे जमीन खरीद क मकान बना लेलथी जतय दियाद सबहक सेहो चास बास छलेन्ह। मकान क चारु कट छहरि द क  सोझा बदक फाटक सेहो ल्गबा लेलथी ,आंच  कट्ठा के ओहि चास बास मे आगा पाछा फल फूल के किसिम किसिम क गाछ  बिरीछ लगाबा लेलथि ।गाम प  बटला के बाद चालीस बीघा जमीन त हिस्सा मे पड़बे केलन्हि,आ ओ पोखरा पाटन बड़का हबेली मे छ टा कोठरी सेहो हिस्सा मे भेटलन्हि। अन्न पानि, उपजा बाड़ी बड़ नीक, गाय भइस पोसिया  लगा देने छलथी।
साल भरि केअन्न  ओहि ठाम राखि  बाकी खेते स बेच दैथ। बड़का लग्गा बाला उपजाऊ जमीन ,जिनगी नीक जका कटय लागल । आ ई सबटा काज भानपुर बाली जनानी भईयो   अपने करैथ ।आब उमरि सेहो भेलन्हि, बेतहासा रौद बसात सहैत सहैत हुनको देह मे बीमारी पइस गेलन्ही।छोटका बेटा के  डाक्टरी मे नाम लिखा गेल छल, माय के सदी खन कहे , बस कनी दिन रुकि जाऊ ,चारि बरख आउर ,हम नौकरी धेलउ की आहा के रानी जका बैसा क राखब ,ई बातरस ,ई दम फुल्ली सबटा दूर करि देब । बड़की पुतौह अपने सन कुलसील बाली आनली।बी एड करि रहल छल । पद्गाई के संगे गृहकार्य मे सेहो दक्ष ,अपन परिस्थिति के बुझए बाली ,पूजा पाठ करय बाली,सौस ससुर्  मान सम्मान देबए  बाली ।
 मुदा पहिने कहल जे बिपदा के ने सोहेले बिन हड़ हड़ खट खट के जिनगी ।ओ कोना चाहितेथि जे आस क किरण कोनो ने कोनो दोग स हुनक जिनगी के इजोत स भरि दैक ।
    दुनिया भरि के व्रत । ओहि नरक निवारण चतुरदसी  के परात उठली त घरबला के पलंगक नीचा खसल देखि सन्न रहि गेलिह ।बेटा पुतौह के मददि स कहुना करि ओछौन प सुथौलथी स्वास चलइ छल। अपने दौड़ गेली पड़ोसिया डाक्टर लग ,ओहो ओहिना भोरका चाहक कप सोझा क टेबुल प राखि झटकारैत संगे चलि अयलैन्ह। नॉरखसेबक काल नहीं छल ,तुरत एंबुलेंस मे लादि हुनका  नर्सिंग होम मे भरतीकराओल गेल ।  पक्षाघात क अटैक छल। शरीरक बाम अलंग सून।
  अहि बिपत्ति मे दुनु हाथ क मोटका सोनक बाला आ कांगुरिया आंगुरक बराबरि मोट गरा के चेन बिका गेलन्ही। मुदा संतोष छल सत्ती माय हुनक जान त बकसि देलखिन। पहिनहु ओ घरे मे रहैत छला,आब ओछौन प ,मुदा आंखिक सोझा त छलेथ ,आस त मन मे रहबे करेन्ह जे आए नै काल्हि,सखरा भगवत्ति के किरपा स उठि क अप्पन पएर प ठाढ़ त अवस्स हेता।आब  जे साधू ,संत ,बैद,डाक्टरक  अजगुत चमत्कारक  खिस्सा लोग सुनबे ओ आस् क डोरी पकड़ने दूर दूर धरि दौगति रहली । कोन जड़ी ,कोन  बूटी ,कोन तेल मालिस ,जादू टोना ,की सब नहि अजमबेत रहली ,मुदा हार नहि मानली ,बिसबास जीवित छलेनह।
   अहि मध्य खबरि भेटलनही जे छोटका बेटा जे अखन पहिले  बरख मेडिकल मे छल ,कोनो पहाड़िन स विवाह करि लेलके । दुख की आ कतेक होयतन्हि,किछू दिन भगवती के सोझा रिरियाती रहली ,मुदा मोंन  नै मानलकैन्ह त बस पकड़ि ओतेक दूर बेटा पुतौहक मुंह देखय औ बरखा बूनि के  परबाह नहिं करि क चलि पड़ल छलिह। फोन प गप्प भेल रहेंह ,सपूत बरुन बस स्टेंड प आबि दुनिया के सोझा माय के निहुरि क गोड़ लगलक । होटल मे ल जाक खुआदेलकईन्ह,आ फेर ओहि घूरती बस मे, ओहने मौसम मे रतुका  टिकस कटा क चढ़ा देलकेंह । सोचने रहैथ ,केकरो स विवाह करि लेलके त की ,आब त ओ हमर पुतौह भेली  ,त अपन कर्णफूल छोटका डिब्बी मे राखि पर्स मे ओरिया क ध नेने छलथी,कनिया के खाली हाथ कोना देखब । किछू टाका सेहो राखि लेलथी ,नब नब गिरहस्थी छै,ककरा स मांगते ।
 अनहरिया रा ति ,कड़कैत बिजुरी ,बरसैत मेघ मे  तितति भीजति ,जखन ओ दरबज्जा खटखटौली,पुतौह के डरे हदास पईसी गेले ,अंदेसा भेलन्हि,खिड़की स झकलि ,माँ के देखि किछू पूछताथ करितथि तेइ स पहिनहि घर मे पएर रखैत बड़की पुतौह के भरि पाँज धरि मोन भरि कनली केहन भ गेल बरुन ,अपन डेरो नै ल गेल ,आन लोक सन होटल मे खुआ क  अहि प्रलय काल मे ,बिन किछू सोचने रातराती बिदा करि देल।
कतबों कहलिए कनी कनिया के मुंह देखा दे ,कहलक कोन सुन्नरी छै जे देखबै
  कनी दिनक बाद बरुनक फोन आबए लागले ,जायदाद मे  हमर बख़रा द दीय । हम अहि ठाम घर कीनब
घर मे भूकंप आबी गेले ,चारुकात क धरतिए टा नहि,ऊपर अकास धरि डोलए लगलै। भानपुर बाली के सोझा परसल थारी निरैठे रहए लगलै ,हाथ पएर मे बग्घा लागए लगले,माथ टनके ,अनेरे बड़ बड़ाए लागल छलिह। कोन  कोन दिन देखेता बिधाता ,जायदाद मे हिस्सा के मतलब जे ई घर बेचू ,गामक जमीन आधा करू ,गामक मकान आधा करू । तखन कोना करि क जीबनक भवसागर पार करब । तखन लोकबेद सलाह देलकेंह , बाटल जेते दादा के संपत्ति,बापक अरजल प हुनका अछैत
किओ ने अपन जुईत चला सकैत अछि आ येह गप्प बड़का बाबू के सरबेटा जे नामी ओकिल छलथि सेहो कहलखिन ।अशक्त बीमार बाप के सेवा करबा के फुरसति नहीं छेंन आ, संपति मे बख़रा तुरत चाहि, पढ़ाई लेल जे पाय पठा रहल छी ,सेहो बंद करू एहेन कपूत के
   मौसम अहि बेर केहेन तांडव केने छल। भयंकर ठंड । कम्मल ,सीरक मे भरि  दिन लपेट क त ओ बैसयबाली प्राणी नहिं छली , हाथक बुनल मौज़ा पएर मे ,साया के नीच गरम पैजामा ,कार्डिगनऊपर स मोटका पशमीना शौल मे अपना के नीक जका बानहि छेक क ब्रम्हबेला के  स्नान ,पूजा के बाद स इमहार उमहर लुड़ूखुड़ू मे लाइग जायथ । पुतहुक परीक्षा चलैत छलै। सबके चाह द क ,बाहर आँगन मे बोरसी मे आगि सुनगा क राखि देली,कनी काल मे निधु भ जेतैक त’ घरबला के कोठरी मे राखि,हुनकर मालिस करितथि। ताबैत  चाह लक बेसकी मे आबि गेलिह ,थर थरी लागए लगलैन्ह तपर्दा लग रखल हीटर जे कनी खराप छलै ,कतेक दिन स  सोचने रहेथ ठीक करबाबक ,मुदा आय कपकपी बरदास नै भेलन्हि त जरा लेलखींह ।
    कनिए काल मे गों गों के आबाज सुनि पुतौह पढ़ाई छोड़ि दौडलनन्हि,ओकरा भेले बाबूजी के कोठरी स स्वर आबि रहल अछि। मुदा ओ त बैसकी स आबेत  छ्लैखिड़की के परदा पकड़ने ओ त नीक जका झरकि चुकल छलिह सबटा कपड़ा सुड्डाह  ,बाक बंद ,तुरत हुनक उठा क ,सूती चादरि ,कम्मल मे लपेटि   बड़का अस्पताल ल जायल गेल डाक्टर नीचा  मुंह करि नीरास भ मुड़ी हिला देलकेनब्बे प्रतिशत झरकल ।   तीन दिनक भनक  कष्ट क उपरांत आखिरी मे माटि के मुरुत माटि जका भखरि गेल छलिह ।
   इम्हर,मनुक्खक जातिकियो कियो बिररो उड़ा देलके  ,आत्मह्त्या करि लेलथि,बेटा स परेसान छलखिन ,मुदा ओत्त उपस्थित सम्पूर्ण समाज किओ ने पतिएलके ,एहेन जीबट स्त्री त बड़ कम गढ़ैत छथिंह भगबती  ।कानेत कानेत पुतौह बजली “हीटर खराप छल ,ओहि मे करेंट आबैत छलै
    

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लघुकथा- ममता

युग बदलतै समय नहि लगैत अछि । युग सँगहि मनुष्य नहि बदलि सकल तऽ ओकर बीच मजधार मे छोडिकऽ समय आगा निकलि जाइत अछि । एहने भेलन्हि ममता आ ओकर माय बाबु के । समय अनुसार ममताके माय बाबु नहि बदलल आ ममता के समय साथ नहि देलक ।
कहैत अछि, ‘अभावे झगडाके जडि होइत अछि ।जतए अभाव नहि छैक ओतह द्वन्द नहि होइत अछि । फेर तऽ बेटी होए वा बेटा सभ एक समान ।
२५ वर्ष पहिने जहिया ममता के जनम भेलन्हि चारुगाम सोर भऽ गेल रहैक, ‘गुमस्ता बाबा के पोती भेलन्हि ।दू पुस्तासँ ओहि खनदानमे एको गो बेटी नहि भेल रहथि । ओना गुमस्ता बाबा चाउरगामक जमिनदार सेहो छथि । बड धुमधामसँ खुशीयाली मनाओल गेल । ममताक छठिहारक दिन चारुगामा नौतल गेल रहैक । डिविया दशपैसीकेँ नाच सेहो आएल छल । छठिहारक दिन गुमस्ता बाबा नाचएवालाके सोनाके सिकरी दऽ देने रहथि ।
ममताके बड लार प्यार आ दुलार सँ लालन पालन भेल रहैक । मुदा भविष्य मे की हएतै कोई नहि जनैत अछि । गाममे बेटी बढत लिखत तऽ बिगडि जाएत रहल मनसाय के गुमस्ता बाबा तोडलक । ओ अपन पौती ममता के पढा लिखा कऽ निक डाक्टर बनाबए चाहैत छल । मुदा भेल ओकर उल्टा ?
ममता स्वयं नहि बुझि पाबि रहल छल जे एहिमे गल्ती कतए भऽ गेल । ओ अपन खिडकीबाटे लोकके अबैत जाइत देखि रहल छल । एहिसँगहि अपन वर्तमान आ भविष्यकेँ सेहो तौल रहल छल ।
जहिया ओ विद्यालयमे पढैत छलथि तऽ सभ विद्यार्थी ममतेसँ प्रतिस्पर्धा करैत छल । चंचल तऽ ओ छलैए, पढएमे सेहो बड तेज रहैक । पाँच कक्षा धरि ओकरा कोई नहि प्रथम भेला सँ रोकने छल । मुदा जखन ओ छ कक्षा मे गेल तऽ दोसर विद्यालयसँ आएल राजेश सँ प्रतिस्पर्धा होबए लागल । प्रतिस्पर्धाक क्रममे कहियो काल दुनू गोटे बीच झगडा सेहो भऽ जाइत छल । सात कक्षा धरि जाइतजाइत राजेश प्रथम स्थान ललौक आ ममता दोसर ।
राजेश मनिपुरसँ ममताक गाम घारोपुर मे रहल विद्यालयमे पढए अबैत छल । देखएमे राजेश तऽ ओतेक सुन्दर नहि रहथि मुदा पढएमे ओतबे तेज रहथि ओ एके वर्षमे ममताक नम्वर तऽ तोडबे कएलथि, सँगहि विद्यालयक विद्यार्थी आ शिक्षक सभक चहेता सेहो बनि गेल रहथि ।
ममता राजेश के देखि कऽ मनेमन खुब जरैत छल । किछु दिन धरि तऽ राजेशके टोकबो नहि कएन्हि । ममताक बाहेक राजेशके विद्यालय के सभ छात्रछात्र बजबैत छल आ राजेशो ओकरा सभके पढाईमे कोनो समस्या होइत छल तऽ सल्लाह दैति छल । एहिसँ ममताके आओर बेसी जलन होबए लागल । मुदा एगो इर रहैक ममताके जे राजेश पहिने बजाओत तऽ बजाएब नहि तऽ नहि । जतबे ममताके राजेशके बजाबएके मन करए ततबे पितो लहरए । जेना जेना समय वितैत गेल ममता राजेशके बजाबएके प्रयास करए लागल मुदा कोनो बहना नहि भेटलाक कारण बात नहि बनि पाबि रहल छल ।
संयोगे कहुँ परीक्षा समाप्त भेलाक बाद विद्यालयक पिकनिक मनाओल गेल । ओना ई पिकनिक विद्यालयकेँ छात्रा सभके मात्र होईत अछि । छात्रासभ खाना बनाकऽ शिक्षक सभके खिएबैत अछि । मुदा राजेश विद्यालयके सभसँ तेज आ आज्ञाकारी भेलाक कारण ओहि पिकनिकमे ओकरो रहिकऽ सहयोग कऽ देवाक लेल छात्रा आ शिक्षक सभक कहने रहथि ।
ओही क्रममे ममता पियाउज काटि रहल छल आ अपन सहेली सभसँ सेहो बात चित कऽ रहल छल कि हासु उछैटकऽ लागि गेलन्हि आ धरधरकऽ खुन बहए लागल । खुन देखिकऽ ममताक सहेली सभ बाजलगे केना हात कटि गेलहुँ, किछु बानहु ला नहि अछि । किछु देर पानिमे हात राखि लेबे तऽ खुन बन्द भऽ जएतो ।कहिते छल कि राजेश अपन जेबसँ रुमाल निकालिकऽ चट दऽ ओकर हात बान्हि देलक आ हातके किछु खानधरि अपने हातमे दबौने रहल ।
राजेश के ई बानि देखिकऽ ममताके आँखिमे नोर आबि गेल मुदा किछु बाजि नहि सकल । ओहि दिनसँ ममताक सहेली सभ ओकरा खौझाबए सेहो लागल । कखनो काल ममताक सहेली सभक कहैत छलथि,‘ममता घमण्ट सँ भरल अछि मुदा राजेश सभके भले चाहैत अछि । पढहुँ मे तेज आ व्यवहारमे निक ।
एक दिन ममता विद्यालयके वर्क बनाबएके बिसरि गेलथि । जखन स्कूल आएल तऽ ओकरा स्मरण भेलन्हि हम वर्क बनाबही के विसरि गेली । टेबुल के तेसर बेन्च पर राखल झोलामे सँ ममता काँपी निकालिकऽ झट दऽ होम वर्क बनाबए लागल । किछुओ देरक बाद मास्टर क्लस मे आबि गेल । राजेश होम वर्क काँपी सभ विद्यार्थी सभसँ लेबए लागल । मुदा जखन ओ अपन बेंग खोलए त ओहि मे होम वर्गवाला कापिए नहि छल । ओ सोचए लागल शायद आई घरहि मे तऽ नहि भेल गेलहुँ । किछु खानधरि ठाढ भऽ सोचि रहल छल कि ममता राजेश के कापी देति बाजल साँरी ! हम होम वर्क बनाकऽ नहि आएल छलहुँ तएँ अपनेक कापी सँ सहयोग लेलीए ।
कोई बात नहि, मुदा कहि देने रहथि तऽ...राजेश कहलक
आब कहिएके लेल ।ममता बाजल ।
एहिना बातबिचतक क्रमम एसएलसी अबैत अबैत ओ सभ बहुत घनिष्ट मित्र भऽ गेलथि आ फेर जेना अन्य प्रेममे होइत अछि तहिना ओहो सभ विवाहक लेल तयारी शुरु कऽ देलन्हि ।
ममताक माए बाबुक कहब छल राजेशके माथ पर घडारी बाहेक किछु जमीन नहि अछि फेर एहि गामक जमिन्दारक बेटीसँग कोना विवाह करत ।
जातिके बात ओतेक नहि छल कारण दुनू स्वजातीय छली । मुदा बाबुक जमिन्दार अहमके परवाह नहि करथि ओ दुनू गोटे भागिकऽ विवाह कऽ लेलथि ।
राजेशके पढाईमे तेज होबएके फाइदा सेहो भेटल । भलहि ओ एसएलसीए पास छलथि मुदा हुनका एकटा कम्पनीमे जुनियर एकाउन्टेण्ट पदमे नोकरी भेट गेल । अपन घरसँ दूरे किए नहि होइक मुदा नोकरी भेटलाक कारण दुनू गोटेके जीवन बढिया जेकाँ चलए लागल ।
दुनू गोटे आइए सेहो कऽ लेलन्हि । भगवानके इच्छा किछु आओर छल । राजेश बिमार भऽ गेलथि । ममताके किछु फुराइए नहि रहल छल । आब की कएल जाए ? नैहरि सँ तऽ पुरे सम्बन्धे तोडि लेने छलथि । राजेशके गाम पर माएबाबु जिबैत नहि छल । भैया भौजी ककरा के होइत छैक । ओ बढिया जेकाँ बुझैत छली । तैयो ममता सभसँ पहिने भैया भौजीसँ सहयोगक याचना कएलन्हि । मुदा जेना बहुतो भैयाभौजी सँ होइत छैक तहिना हिनको निराशे भेटलन्हि । ममता दियादनी सल्लाह देलन्हि, ‘अहाँ अपन बाबुसँ कहियो सहयोग करबाक लेल, तिलको नहि लेने छिएन्हि ।
ममता बुझि गेली भैसुर आ दियादनीसँ सहयोगके बात करब कोनो अर्थ नहि रखलक । ममता माएबाबु लग जाए नहि चाहैत छली मुदा कोनो विकल्प नहि भेटलाक बाद गेली । हुनका लागल छल बहुत दिनक बाद बेटीके देखलाक बाद कहुँ माएबापके मोन डोलि जाइक मुदा से नहि भेल । ओ घरमे बैसहुँ नहि कहलन्हि ।
बाबु मुसीके कहिकऽ भगा देलन्हि । जे मुंसी काकाके एक बेर हल्ला करैत छलथि तऽ तीन बेर हाजिर हाजिर करैत छलाह से हुनका घरसँ निकालि देलन्हि ।
ममता राजेशके कोनो हालतमे गमाबए नहि चाहैत छली । ओ अन्तमे राजेश अफिसमे गेली । राजेशक म्यानेजर सहयोग तत्काल नहि कएलक मुदा नोकरी देबएके वचन देलन्हि । राजेशके कहुनाकऽ दवाई आ घरक खर्चा हुनक आगा ठाढ छल । ओ हारिकऽ नोकरी करबाक लेल तैयार भऽ गेलथि ।
राजेशके घरमे छोडि ओ नोकरी करथि आ फेर घर पहुँचते फेरसँ राजेशके सेवा करए लगथि । म्यानेजरक आँखि हुनके पर घुरि रहल छल । ओ बढिया जेकाँ बुझि रहल छली । मुदा उपाय किछु नहि छलन्हि । एक दिन म्यानेजर किछु काजसँ हुनका रोकि लेलक फेर हुनकासँ गलत व्यवहारक प्रयास करए लागल । हुनका बुझए मे नहि आबि रहल छल आब कि कएल जाए । एकदिस म्यानेजरके बात नहि मानला पर राजेशक जीवन आ घर परिवार आ दोसर दिस एहि जीवनके नाम पर एतेक बडका धोखा । ममता म्यानेजरके आगूमे बहुत कनलथि तैयो कोनो प्रभाव नहि पडल ।
एक दिन राजेश के हालात बहुत बिगरि गेल । एहिसँ पहिने शहरक बढिया बढिया क्लीनिक सभमे राजेश के उपचार करा चुकल छल । मुदा किछु दिन सुधार रहल तकरबाद फेरसँ ओकर हालात बिगरैत गेल । ममताक किछु नहि फुरा रहल छल । ओकर दिमाग मे एकेटा बात रहैक जे शहरक बढिया बढिया डाक्टर सभसँ राजेशक इलाज नहि भऽ सकल तऽ आब कहाँ इलाज कराओल जाए । कतहुँ जाएबाक लेल पैसा चाही मुदा अखन तऽ पैसा नहि अछि ।
कोन परीक्षा भगवान लऽ रहल छथि । अब त एके टा भरोसा भगवाने पर । एक बेर सरकारी अस्पतालमे लऽ जाएल जाए । मुदा अस्पताल धरि लऽजा कऽ उपचार कराबी ममतासँग पैसा नहि छल । महिनो पुरा होबएमे पाँच सात दिन बाँकिए छल । राजेश के हालत देखिक ममता विलकुल विचलित होबए लागल । ओकरा किछु नहि फुरा रहल छल की करु की नहि ।
एहिसँ पहिने एक दिन कम्पनीक मालिक किछु काजसँ ममताके रोकि लेने छल आ ओकरासँग किछु गलत व्यवहारक प्रयास सेहो कएने छल । एहि सँ ममता कम्पनीसँ पैसा माँगए नहि चाहि रहल छल । मुदा कएल की जाए । ममता किछु खान धरि चुपचाप सोचैत रहल । फेरसँ अपन साहस जुटाकऽ कम्पनीमे गेल आ राजेशक स्थितिके बारेमे कहलक ।
कम्पनीक मालिक मुस्कुराइत बाजल, ‘ममता एखनो अहाँ के किछु नहि बिगरल अछि । सुन्दर मात्र नहि अहाँक अखण्ड रुप अछि । अहाँ एक बेर बाहि फैलाकऽ त देखु । राजेश आब बेसी दिनक मेहमान नहि अछि । फेर अहाँक ई सुन्दरता कोनो कामके नहि रहि जाएत ।
तब हम की करु मालिकममता बाजल ।
हमर सल्लाह मानब तऽ अहाँ छोडि दिए राजेश के, अहाँक लेल हम एकटा पक्का घर दऽ देब आ नोकरीमे पद सेहो बढा देब, मुदा हमरा सँग रहए पडत ।कम्पनीक मालिक बाजल ।
ममता बहुत बडका असमन्जसमे पडि गेल की करु, नहि करु सोचैत सोचैत हुनकर माथा मे चक्कर देवए लागल । फेर अपन बिखरल साहसक समेटिकऽ ममता बाजल, ‘मालिक ! राजेश के जिते जी कतबो सम्पति हमरा लेल किछु नहि अछि । हम एकटा वियाह महिला छी । वियाहल महिलाक लेल सभ अस्मिता अपन पुरुष के लेल होइत अछि । हम जहर खा सकैत छी मुदा ई कुर्कम हमरा सँ नहि हएत । हमर तलव दऽ दिए ।कहैत ममता अपन तलव लऽकऽ आबि गेल आ राजेश के सरकारी अस्पतालमे भर्ना करा देलक ।
राजेश के सात दिन धरि अस्पतालमे रखलक । ओकर बाद दू सय के दवाई डाक्टर साहेब लिखकऽ डिसचार्ज कऽ देलक आ कहलक ई कोनो बडा रोग नहि अछि, आतमे मल जमि गेल अछि । चिन्ता करबाक कोनो हात नहि अछि । सभ ठिक भऽ जाएत । हा.. मुदा किछु दिन धरि राजेशक सुसम दुध दिए नहि बिसरब । किछुए दिनमे राजेश ठिक भऽ गेल । ममता सोचए लागल दुःखके जीवन कतेक कठिन होइत अछि । साँचेमे मानव जीवन कतेक स्वार्थी अछि । दोसर मे शहरक बहुत ठाममे राजेशक उपचार नहि भेल मुदा छोटछिन सरकारी अस्पतालमे राजेशक उपचार भेल । ऐकरा हम की बुझी परीक्षा आ पतिपत्नी बीच धर्म सोचैत कानए लागल ।

 

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http://www.videha.co.in/Jagdish_Prasad_Mandal.JPGजगदीश प्रसाद मण्‍डल
लघुकथा-बगवाड़ि‍
बगवाड़ि‍

अदरा अपन चौदहम दि‍न बि‍ता काल्हि‍ चलि‍ जाएत। बहुत दि‍नक पछाति‍ अदराकेँ एहेन जश भेल। जशो केना ने होइत, पहि‍ल दि‍न अबि‍ते बरि‍स गेल जइसँ धू-धू जरैत धरतीकेँ असमानी पानि‍ भेटि‍ते मन ति‍रपि‍त भेलै तँ दोसर दि‍स पछि‍ला सात सालक पछाति‍ एहेन आम-कटहरसँ भेँट भेलै। तहूमे पछि‍ला सालक छगाएल मन आमक अभावमे रहने आरो बेसी सि‍नेहासि‍क्‍त भऽ गेल। दोसर साँझ जारन-काठी चुल्हि‍ लग ओरि‍या फुलि‍या पति‍-हराननकेँ अदरा नक्षत्रक अंति‍म दि‍न मन पाड़ैत कहली-
काल्हि‍ए भरि‍ अदरा अछि‍, तँए...?”
फुलि‍याक बात सुनि‍ हरानन ओहि‍ना मनमे औंटए-पौड़ए लगला जहि‍ना नेबोरस, चीनी आ पानि‍केँ औंट-आँटि‍ शर्बत बनाैल जाइ छै। बातकेँ औंटैत-पौड़ैत हरानन बजला-
काल्हि‍ जाए कि‍ परसू जाए, आकि‍ नहि‍येँ अबि‍तए-जाइतए तइसँ अपना की। ने आम-कटहर अछि‍ आ ने खुट्टापर लगहरि‍ गाए-महिंस। तखन अदराकेँ एने आ गेने की?”
हराननक बात फुलि‍याकेँ आन घरक जनि‍जाति‍ जकाँ छुलकनि‍ नै बल्‍कि‍ पति‍क वि‍चारकेँ गौर केलनि‍। कहै तँ ठीके छथि‍ मुदा साल भरि‍क पावनि‍ छी, बाल-बच्‍चा घरमे केना छोड़ि‍यो देब। एकबेर छुटने तँ जि‍नगीए भरि‍ छूटि‍ जेतै। बजली-
नै पान तँ पानक डंटि‍ओसँ पावनि‍ नै करब से केहेन हएत?”
फुलि‍याक आग्रह सुनि‍ हरानन सामंजस करैत बजला-
घरमे रहने सभ दि‍न पावनि‍ए-पावनि‍ होइ छै आ नै रहने पावनि‍योँ फोंक भऽ ओहि‍ना चलि‍ जाइ छै जहि‍ना आन दि‍न जाइ छै।
फुलि‍या-
हँ, से तँ जाइ छै मुदा पावनि‍क अपन रूपं मधुरम् ति‍लकंमधुरम होइ छै।
फुलि‍याक बात सुनि‍ मुस्‍की दैत हरानन बजला-
हँ से तँ होइ छै। मुदा एहनो तँ होइ छै जे सालक सत्ताइस नक्षत्रमे अदरो एकटा छी। जे पनरहो दि‍न अरबा चाउर, दूध-चीनी, आम-कटहरसँ पूजल जाइए आ दोसर एहनो नक्षत्र तँ होइते अछि‍ जेकरा एको दि‍न पूजन-पावनि‍ नै होइ छै। तँए कि‍ ओ सालक नक्षत्र नै भेल?”
भेल कि‍अए ने, मुदा सभकेँ लौल रहै छै कि‍ने जे आगत-भागत हुअए।
फुलि‍याक बात ओराएलो ने छेलनि‍ कि‍ बि‍च्‍चेमे हरानन टपकला-
लौलो-लौलमे भेद होइ छै। कि‍यो अपन सेवा कएल छागड़ बलि‍ चढ़बैए आ कि‍यो नगद नारायणसँ कीनि‍ चढ़बैए, चढ़बैत तँ दुनू अछि‍। मुदा अहीं कहू जे दुनू एक्के मोने चढ़बैए?”
जखन घरमे अरबा चाउर नै अछि‍, दूधक जोगार नै अछि‍, ओहो जे बगवाड़ि‍मे आम-कटहर होइ छलए सेहो छीना गेल, तखन तँ ठीके...। छुछ मुहेँ शंख बाजत?”
हँ से तँ नै बाजत। मुदा...?”

साठि‍ बर्खक हरानन अपन अंति‍म हार पछि‍ला साल तखन मानि‍ गेला जखन अपन लगौल-सजौल गाछी-कलमक टुकलोसँ बंि‍चत भेला।
      पि‍ता परोछ भेला पछाति‍ हरानन पाँच बीघा चास, तीन कट्ठा बास आ आठ कट्ठा गाछी-कलमक रक्षक छला। ओना चास-वास अरजैमे हराननक कोनो योगदान नै छेलनि‍ मुदा आठ कट्ठा गाछी-कमल लगबैमे तँ छेलनि‍हेँ।
दस-बारह बर्खक जखन हरानन रहए तखने पि‍ता-रूपलाल अपन पुरना गाछी उपटबैक वि‍चार केलनि‍। उपटबैक कारण रहनि‍ जे एक तँ आम सभ नीक नै अछि‍ दोसर जेहो छलै से पुरान भेने या तँ फड़बे नै करैत या तँ फड़ला पछाति‍ रोगाइए जाइ छलै। रूपलालक मनमे उठलनि‍ जे गाछी-कलम कि‍ लोक अपना नापसँ लगबैए जे हम तीस बर्ख जीब तँए आमो गाछ तीसे बर्ख रहत। तीन-तीन-चरि‍-चरि‍ पुश्‍तक गाछी-कलम, पोथी-कलम सभसँ परि‍वार सुख करैए। से नै तँ दस बारहे बर्खक हरानन अछि‍ तइसँ कि‍ मुदा अपना संगे ओकरो कि‍छु भार देबै। दुनू बापूतक सीमानपर एकटा गाछि‍यो रहत। पुरना गाछीक गाछ हटा रूपलाल पाँच बर्ख जोत-कोर केलनि‍। अन्न उपजौलनि‍। गाछी लगबैसँ पहि‍ने हराननकेँ कहलखि‍न जे बौआ नीकहा आमक आँठि‍ बीछि‍ एकठाम रोपि‍हअ आ कलम लगबैले सहरगंजा एकठाम। हाथ-हाथ भरि‍पर रोपि‍ दि‍हक जे उखाड़ैमे असान हएत। अपन लगौल गाछी-कलम अधि‍क बि‍सवासू होइए।  समए तेहेन भऽ गेल अछि‍ जे बि‍सवास अपन चेहरे बदि‍ल लेलक। जे नर्सरी गाछी-कलम, वाड़ी-फुलवाड़ीक बीआ बेचैए ओहो ओहन भऽ गेल अछि‍ जे कहत सागवानक गाछ छि‍ऐ आ भऽ जाइए वौनैया काँट। खैर जे होउ, अपन गाछी अपने लगाएब।
      सालभरि‍ पछाति‍ आँठीसँ डेढ़-डेढ़, दू-दू हाथक गाछ भऽ गेलै। सरहीकेँ मुसरा काटि‍, बड़द जकाँ सुरेब बनैले थल्ला उखाड़ए कहलखि‍न। अपने आगूमे आबि‍ केना खुरपी उनटा-सुनटा चलत तइ ताकमे बैसला। आठे कट्ठा कलम-गाछी लागत तइमे गाछे केत्ते रोपल जाएत। तहूमे नवका बौना कि‍स्‍म नै, बड़का कि‍स्‍म छेलै। मेल-पाँच कऽ सरही एक भाग आ कलमी एक भाग लगाएब नीक हएत। सएह केने रहथि‍। अपन खेती-पथारीक जि‍नगी हराननक तँए झूठ-फूससँ कम भेँट।
      एक्कैस बर्खक अवस्‍थामे हराननकेँ बेटा भेलनि‍। तीन मास पछाति बच्‍चाक माथ नम्‍हर हुअए लगलै। साल भरि‍ जाइत-जाइत असर्द्ध देखैमे लगए लगलै। दुनू परानी हरानन ि‍वचारलनि‍, कोखि‍क पहि‍ल सन्‍तान छी। केना छोड़ि‍ देबै। जमीन-जत्‍था लोक कि‍अए रखैए। से नै तँ जाबे तक जीबैक आशा रहतै ताबे तक तकति‍यान करबै। तइले जे होउ। खेत-पथार रहौ आकि‍ चलि‍ जाउ। जौं मनुख बँचत तँ ओहूसँ बेसी अरजि‍ लेत आ जौं मनुक्‍खे ने रहत तँ खेते-पथार कोन काजक। गणेशजी माथ सन ओइ बच्‍चाक माथ भऽ गेलै। एनमेन हाथी माथ सदृश।
समाजक चलैनानुसार हरानन दुनू दि‍स बढ़ल। एक दि‍स गामक डॉक्‍टरी-इलाज तँ दोसर दि‍स झाड़-फूक, टोना-टापर। बि‍मारीक चक्रमे पड़ने दुनू बेक्‍तीक जीवनचक्रे बदलि‍ गेलै। एक दि‍स हरानन भरि‍-भरि‍ दि‍न झाड़-फूक केनि‍हारक भाँजमे बौआइत तँ दोसर दि‍स फुलि‍या घरेक आइ-पाइमे समए गमबए लगली।
एक दि‍स सओनक बून जकाँ खर्च बरसए लगलनि‍ तँ दोसर दि‍स खेती-पथारीसँ वि‍मुख भेने आमदनी हराए लगलनि‍। छह मास बि‍तैत-बि‍तैत तीन बीघा बि‍का गेलनि‍। मुदा अखनो आशा ओहने बनल छन्‍हि‍ जहि‍ना छह मास पहि‍ने छेलनि‍। जे कि‍यो डॉक्‍टरसँ लऽ कऽ झाड़-फूक केनि‍हार धरि‍ देखैत ओ कि‍यो ने कहैत जे रोग नै छूटत। एते बोल-भरोष दैत जे रोग नि‍श्चि‍त भगबे करत। जइ खेतक अन्नसँ हराननक परि‍वार चलै छेलनि‍ वएह खेत बेचि‍-बेचि‍ अपनो खाए लगला। ठाकुरक बरि‍आती जकाँ सभ ठाकुरे-ठाकुर। उचि‍त-अभ्‍यागतक भाँजमे अपनो दुनू परानी हरानन सएह बनैत चलि‍ गेला। खेत बीक रहल अछि‍ आ रोगो बढ़ि‍ रहल अछि‍। समुद्रमे भँसैत नाव जकाँ कतए जाएत कोनो ठीक नै। बि‍नु महारक पानि‍मे एहि‍ना होइ छै।
दस मास पुड़ैत-पुड़ैत बच्‍चा मरि‍ गेलै। बच्‍चा तँ मरि‍ गेलै मुदा परि‍वारोक कोनो तन-भगन नै रहए देलकै। खेतक लूट भऽ गेलै। कि‍यो उचि‍त मूल्‍य दऽ लेलनि‍, तँ कि‍यो हथपैंच एकक तीन केलनि‍। घराड़ी छोड़ि‍ हराननकेँ कि‍छु ने बँचलनि‍। खाली एतबे जे चास बटाइ करता आ गाछी-कलम ओगरवाहि‍।
बेटो-मृत्‍यु तँ सबहक एक्के रंग नै होइत। कि‍यो जनमि‍ते मरि‍ जाइए तँ कि‍यो रोग-वि‍याधि‍सँ चट-पटा मरैए। मुदा तइ संग ईहो ने होइ छै जे कि‍यो जनमरोगी बनि जीबैए तँ कि‍यो रोगाएले जि‍नगीक आनन्‍द लुटैत जीबैए। जहि‍यासँ हरानन बेटाक बेमारीक इलाजक पाछू बढ़ला तहि‍येसँ दुनू बेक्‍तीक मन-मोटाउ सेहो बढ़ए लगलनि‍। मन-मोटाउक कारण रहनि‍ दुनूक दू धारणाक धारा। हराननक मनकेँ पकड़ने जे डॉक्‍टरी इलाजसँ रोग भागत। मुदा फुलि‍याक मन झाड़-फूकमे पकड़ाएल। जेकर फलाफल डाॅक्‍टर आ झाड़-फूक केनि‍हारकेँ एलापर स्‍पष्‍ट देख पड़ैत। जइठाम हरानन डॉक्‍टरक आइ-पाइ नीक जकाँ करै छला तइठाम फुलि‍या झड़नि‍हार-फूकनि‍हरकेँ। काजक दौरमे परि‍वारोक बीच एहि‍ना होइ छै। कि‍यो काजकेँ काज बूझि‍ करैए आ कि‍यो काजकेँ काज बुझैए। भलहिं कि‍यो काजक आ कि‍यो अकाजक कि‍अए ने बनि‍ जाए। बि‍लाइक झगड़ामे बानर पंच। जखन मंतरि‍या अबैत तँ घंटो बैस डॉक्‍टरी इलाजकेँ अदखोइ-बदखोइ करैत। दुनूक बीचक लट-पट-सट-पट दुनू बेक्‍ती हराननक वि‍चारपर सेहो पड़ि‍ते छेलनि‍। रोगकेँ कमैत नै देखि‍ दोसर-तेसर साँझमे सभ ि‍दन दुनूक बीच एक आखर होइते छेलनि‍। एक दि‍स खेत बोहाइत देखि‍ हरानन झाड़-फूककेँ अनुचि‍त खर्च बूझि‍ झपटथि‍ तँ दोसर दि‍स फुलि‍या डॉक्‍टरी इलाजकेँ। पंच कि‍यो ने। दुनू पार्टी लड़ि‍ए कऽ पड़ि‍येता। जे दसम मासमे ि‍नर्मूल भेल।
हरानन बोनि‍हार बटेदार नै कि‍सान बटेदार बनि‍ नव जीवन धारण केलनि‍। जि‍नगी बदलने बहुत कि‍छु बदलैओ पड़ै छै आ बहुत कि‍छु अपनो बदलि‍ जाइ छै। हराननक अपन खड़ि‍‍हाँन उसरि‍ गेलनि‍। खेतक उपजा अदहा-अदही सेहो अपना मोने ने लगा सकै छी ने काटि‍ सकै छी आ आमक बगवाड़ि‍ कलमी चारि‍मे एक आ सरही तीनमे एक भेटतनि‍। भलहिं कलमीसँ सरहीए कि‍अए ने नम्‍हरो आ गुदगरो हुअए।
वसन्‍त पंचमीक दि‍न। सरस्‍वती पूजाक संग कि‍सान हरो ठाढ़ करता। जोड़ा बड़दक बटेदार कि‍सान रहि‍तो हरानन हर कतए ठाढ़ करता। कि‍सान तँ अपन ओजार -हर-कोदारि‍-खुरपी-हँसुआ- बड़ही ऐठामसँ सान करा अपना घरमे पूजा करत आकि‍ अपन हाथ आ हाथक ओजार अनका घर? हर ठाढ़ कतए करब, हराननक मनकेँ हौंड़ि‍ देलकनि‍! सतंजा अन्न सतंजा तीमन-तरकारी जकाँ हरानन बेड़ा नै पाबि‍ रहला जे कि‍ की छी। अपन रंगे बदलि‍ नेने अछि‍। खेतमे मेहनति‍ ओतबे करब मुदा उपजा अधि‍या हएत। जइ साल रौदी-दाही हएत तइ साल बटेदारक खर्च जाएत आकि‍ खेतबलाक खेत। मुदा उपाएओ तँ दोसर नहि‍येँ अछि‍। फेर मन घुमलनि‍, कि‍छु खेती जोति‍-कोरि‍ होइ छै आ कि‍छु ओहुना-छि‍टुआ- सेहो होइ छै, तइमे की‍ नीक? आगू सीमा घेरल अछि‍। अधि‍या। जखन अदहे हएत तखन कि‍अए ने लागतमे कटौती कएल जाए। ओते तँ बँचत हेबे करत कि‍ने। मुदा जौं बीए खा जाएब तखन खेती कथीक करब। श्रमक ह्रास मन्‍थर गति‍ए नै द्रुत गति‍ए भेल। जहि‍ना साओनक झटकीमे पानि‍क नम्‍हर-नम्‍हर बुन्नक संगबे हवा भेने आरो दगनि‍याँ रूप पकड़ि‍ बरि‍सैए तहि‍ना श्रमक ह्रास भेने रंग-बि‍रंगक रोग श्रम-शक्‍ति‍केँ धेलक। केतौ श्रमक चोरि‍ तँ केतौ श्रमक बेइमानी, कतौ अनदेखी तँ केतौं बलजोर!
तेसर सालक पंचायत चुनाव हराननकेँ आरो धकि‍यौलकनि‍। जि‍नगीमे दुनू परानी हराननकेँ छल-प्रपंच, गरीब भेनौं नै छूबि‍ सकलनि‍। भगवानक लीला बूझि‍ सभ दुख-सुखकेँ दुनू परानी घोंटि‍ गेला। मनो मानि‍ लेलकनि‍ जे जहि‍ना बेटा आएल तहि‍ना गेल। दुनि‍याँ थोड़े दोखी बनाएत जे बेटाक तकति‍यान नै केलिऐ। धर्म-कर्म धने ने सुधन कहबैए। की ई हमर सफलता नै जे बेटा लेल अपन सर्वस्‍व गमा लेलौं। मुदा दोखोक तँ एक नै अनेक कारणो छै। जेकर फलो सोझहे अछि‍।
तीन गोटे पंचायतक मुखि‍या लेल उम्‍मीदवार रहथि‍। तीनूमे के नीक ओ वि‍चारि‍ दुनू परानी हरानन भोट देलखि‍न। जि‍नका हाथे गाछी-कलम बेचने रहथि‍ आ अखन हुनके बगवार बनि‍ गाछी ओगरवाहि‍ करै छला। अपन बगवार बूझि‍ हराननकेँ अपन भोटर बुझै छला कुलानन। चुनावक हार हराननक कपारपर हड़हड़ा कऽ खसौलनि‍।
अंगनाक ओसारपर दुनू परानी हरानन अपन द‍ीन-दुनि‍याँक गप-सप करैत रहथि‍। साठि‍ बर्खसँ ऊपरेक दुनू बेक्‍ती। जि‍नगीक संगी खाली लभे-मैरेजक नै, चलैत-फि‍ड़ैत समाजोक बन्‍धन तँ छि‍ऐ? एहेन स्‍थि‍ति‍मे दू-दि‍लक दि‍लराजक बास कतए हएत? ओहुना लोक बुझैए जे ओल्‍ड बेटल, ओल्‍ड वाइन आ ओल्‍ड वाइफ बेसी चसगर होइ छै। दुनू परानी फुलि‍याक अवस्‍था चेहराक रूपे-रंग बि‍गाड़ि‍ देने अछि‍। फुलि‍याक मुँहमे तीनटा चहु बाँचल आ हराननकेँ सेहो नै। बि‍नु दाँतक मुँहसँ अदन्‍त बच्‍चा जकाँ गुलावी हँसी हँसैत हरानन फुलि‍याकेँ कहलखि‍न-
आब ऐ दुनि‍याँमे रहैक मन नै होइए। होइए जे जल्‍दी मरि‍ जैतौं जे अपनो भार हटि‍तए आ दुनि‍योँक भार घटि‍तै।
जि‍नगीक तीत-मीठ जे फुलि‍या आ हराननकेँ पति‍-पत्नीक रूप बि‍गाड़ि‍ देने छल ओ ठमकि‍ पुन: जि‍नगीक धार लग पहुँच गेल। एक तँ उमेरक उपजा दोसर संगी बनि‍ संग-संग चलैक। बजली-
कहलौं तँ बैस बात मुदा एते दि‍न जे केलौं से केलौं। जहि‍ना अहाँ केलौं तहि‍ना हमहूँ केलौं, मुदा आबो जे ओहि‍ना पहि‍लुके जकाँ करब से थोड़े मानि‍ लेब?”
फुलि‍याक बात सुनि‍ हरानन ठमकला। ठमकैक कारण भेलनि‍ पछि‍ले जकाँ आब नै जीबए चहै छथि‍। वैचारि‍क मेल-मि‍लानक मन बना जीबए चहै छथि‍। पुछलखि‍न-
एना कि‍अए कड़ुआएल बात बजलौं?”
पति‍क शान्‍त भाव देखि‍ फुलि‍या सह पौलनि‍। भरि‍यबैत बजली-
जखन दुनू बेक्‍ती संगीए नै अर्द्धांगि‍नीयोँ छी तखन एहेन बात बि‍ना वि‍चारने कि‍अए बजलौं जे मरि‍ जाएब। अहाँकेँ जीबैक मन नै अछि? अकछिगेलौं तँ मरि‍ जाउ! मुदा हमरा जे मारब से दोखी के हएत?”
वि‍धवो नारी तँ अधमौगैते जि‍नगी जीबै छथि‍। तहूमे फुलि‍या-हराननक उमेरक दूरी मात्र साले भरि‍क। तहूमे साल भरि‍ फुलि‍या आरो नि‍च्‍चे। गुम्‍म भऽ हरानन वि‍चारि‍ते रहथि‍ आकि‍ कुलानन बेधड़क आंगन पहुँच हराननकेँ कहलखि‍न-
हमरा गाछी भीर काल्हि‍सँ कि‍यो नै जइहह। देखि‍ लेलि‍अ जे केहेन हि‍तैषी बगवार छह।
जहि‍ना ध्‍वनि‍ साधनाक समए बमक अबाज साधनाकेँ भंग करैत तहि‍ना फुलि‍याक बात बि‍सरि‍ हरानन कुलाननकेँ उत्तर देलखि‍न-
बेटा चलि‍ गेल से छातीए लगा मारलौं आ बगवाड़ि‍क जे आमे चलि‍ जाएत तेकर सोच अछि? जे मन फुड़ए से करब।
हारैत-हारैत हरानन जि‍नगी हारि‍ चुकल छला। मि‍सि‍ओ भरि‍ कलेज नि‍राेग कहाँ रहि‍ गेल छेलनि‍ जइसँ हूबा कऽ बजि‍तथि‍ जे अही हाथक लगौल गाछी-कलम छी, हि‍स्‍सेदारी टूटि‍ गेल मुदा अखनो ओहि‍ना मन अछि‍ जे लोटे-लोटा जड़ि‍मे पानि‍ देने रहि‍ऐ।
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
http://www.videha.co.in/Jagdish_Prasad_Mandal.JPGजगदीश प्रसाद मण्‍डल
लघुकथा-बेटी, हम अपराधी छी
बेटी, हम अपराधी छी

सही समैसँ सालभरि‍ पहि‍ने मनोहरकेँ सेवा मुक्‍ति‍क चि‍ट्ठी ऑफि‍समे थम्‍हा देलकनि‍। थम्‍हबैक कारण रहनि‍ काजक गजपटी। काजक गजपटीक कारण रहनि‍ मनक संताप। आॅफि‍सक सभ मानि‍ लेलकनि‍ जे मनोहरक मन चढ़ि‍ गेलनि‍ तँए समुचि‍त काज करए जोग नै रहला। आॅफि‍सेक कुरसीपर बैसल रहथि‍ आकि‍ चपरासी आबि‍ हाथमे चि‍ट्ठी थम्‍हा   देलकनि‍। पहि‍ने तँ नै बूझि‍ सकला जे सेवामुक्‍त भऽ रहल छी मुदा पढ़ला पछाति‍ केकरोसँ पुछौक जरूरति‍ नै रहलनि‍। कोनो लेन-देनक कारण नै बतहपनीक कारण स्‍पष्‍ट लि‍खल रहनि‍। जहि‍ना बर्खा होइकाल अनायास मेघ ढनढ़नाए उठैत तहि‍ना एकाएक मनोहरक मनमे भेलनि‍। जेकरो कहबै सेहो बताहे बूझि‍ सुनबो ने करत। तखन कहबे कि‍अए करबै। अनेरे मुहोँ दूरि‍ करब। मनोहरक मन जेना बेर-बेर चनकए लगलनि‍। टुकड़ी-टुकड़ी भेल मनमे उठलनि‍ जे सभटा-कागत-पत्तरकेँ छीट-छाटि‍ दि‍ऐ, टेबुल-कुरसीकेँ उनटा-पुनटा दि‍ऐ आ नि‍कलि‍ जाइ। मुदा मनक लगामकेँ बुधि‍ पाछू खिंचलकनि‍। बदलैत सोच वि‍चार केलकनि‍ जे एक तँ लि‍खतन बताह बनाइए देलक तइपर एहेन काज जौं करब तँए थि‍रोरी-प्रेक्‍टीकल संग भऽ जाएत, तखन बतहपनीक सजाक हकदार बनैमे कते देरी लागत। कुरसीसँ उठि‍ सोझे घरमुहाँ रस्‍ता पकड़लनि‍। डेराक सुधि‍ए ने रहलनि‍ जे भड़ो-कि‍राया फड़ि‍छा लि‍तथि। बेसुधि‍ मनमे बेठेकान सोच उठनि‍ आ पानि‍क बुलबुला जकाँ फूटि‍ जान्‍हि‍।
      गामक सीमा परक बड़क गाछ देखते भकइजोत जकाँ भेलनि‍। भकइजोतेमे देखलनि‍ जे इएह गाम अपन छी। मनमे अपन अबि‍ते पएर जवाब देलकनि-
आगू नै बढ़ब। गाममे मुँह देखबैबला नै छी।
मुदा तपाएल मुँह लगले पएरकेँ कहलकै-
ईह बूड़ि‍ रे, मुँह देखबैबला नै छी, ई समाज मुँह देखबैबला नइए। सदि‍काल वि‍वेक-वि‍वेकक भांग घोड़ि‍-घोड़ि‍ इनारेक नि‍शाँएल पानि‍ बना देने अछि‍ आ ि‍नर्लज जकाँ बजैमे लाजे ने होइ छै, सुझबे ने करै छै जे जखन पाइक हाथे शि‍क्षा वि‍काइए ओ शि‍क्षा पाइबलाक हएत आकि‍ बि‍नु पाइबलाक। जइ समाजमे रोग-वियाधि‍ पाइक हाथे छोड़ौल जाइ छै तइ समाजमे बि‍नु पाइबलाक गति‍-मति‍ कि‍ हेतै। रौद-बसात, जाड़, पानि‍-पाथरक रक्‍छा केना करत। अदौसँ अबैत नर-नारीक संबन्‍धक बीच जखन दान-दहेज एहेन बड़का मोनि‍ घारक पेटमे फोड़ि‍ देने अछि‍, जइ टपानमे कते हाथि‍यो-घोड़ा फँसि‍ जान गामा रहल अछि‍। तइ मोनि‍मे अदना-अदनीक अह्लादे केतै कएल जा सकैए। महिंसक आगू वीणक कोन मोल छै।
मोने-मन मनोहर घर दि‍स बढ़बाक हूबा करथि‍ मुदा पएर उठैले तैयार नै होन्‍हि‍। जौं पएर थोड़े तैयारो होन्‍हि‍ तँ आँखि साफे नै। नि‍च्‍चाँ ओंघराएल मनोहरक सभ सुधि‍-बुधि‍ हरा कऽ छि‍ड़ि‍या गेलनि‍।
मोबाइलक जुग रहने समाचार पसरैमे देरि‍ए कि‍अए लागत। गाम-समाजक बच्‍चा-बच्‍चा बूझि‍ गेल जे मनोहर बताह भऽ गेला, नोकरीसँ नि‍कालि‍ देलकनि‍। पेन्‍शनो आने-आन लूटतनि‍।
पत्‍नी सुनैनाकेँ पहि‍ने बि‍सवास नै भेलनि‍। आइ धरि‍क जे पति‍-प्रेम मनोहरसँ भेटल छलनि‍ ओ अनकासँ बहुत बेसी छलनि‍। मुदा जानकीक काँच बुधि‍ मानि‍ गेल रहै जे पि‍ता पागल भऽ गेला, नोकरीसँ भगा देलकनि‍।
गामे लोकक जेर संगे दुनू मायधी अर्थात् सुनैना आ जानकी, वि‍दा भेली। लोकक बीच रंग-रंगक घौचाल चलैत। कोनो नीको मुदा बेसी अधले। घौचाल सुनि‍ दुनू मायधीक मन वि‍चलि‍त हुअए लगलनि‍। बेटीक मुँह सुनैना नि‍हारैत आ माएक मुँह जानकी। पोखरि‍ घाटपर जहि‍ना रंग-रंगक चालि‍ रंग-रंगक भुरही-माछ दैत तहि‍ना रंग-रंगक चालि‍क बात दुनू गोटे सुनैत। कचकूह मन जानकीक तँए बेसी वि‍चलि‍ते होइत गेलै। बताह भऽ बाबू छोड़ि‍ पड़ाए जेता, समाज सहजहि‍ हमरा सन-सनकेँ भगाइए रहल अछि‍। तखन माएक कि‍ गति‍ हेतै।
अधबटि‍या पछाति‍ सुनैनोक मन मानि‍ गेलनि‍ जे पति‍ पगला गेला। जानकीपर नजरि‍ अँटका मोने-मन सोचए लगली जे बाइस बर्खक कुमारि‍ बेटीक मुँह सिंह दुआरि‍पर केना देखब। कि‍ दुनि‍येँ उजड़ि‍ रहल छै आकि‍ उजाड़ि‍ चढ़ा देलक अछि‍? एको बीत धरती नै बँचल अछि‍ जतए नोरक धार सुखौल जाएत।
जहि‍ना दंगलक खलीफा पटका चारू नाल चीज खसैए तहि‍ना मनोहर बड़का गाछक नि‍च्चाँ जि‍नगीक अखड़ाहापर चारूनाल चीत भेल पड़ल मोने-मन सोचथि‍, अपन जि‍नगीक हारि‍क कारण अपने छी तँए पत्‍नि‍योँ आ बेटि‍यो लेल अपराधी छी। मुदा फेर मन कहनि‍ जे अपराध कथी केलौं जे अपराधी भेलौं। भवसागरमे डुमल मनोहरक शरीर चेतनशून्‍य भेल रहनि‍। तखने पत्‍नि‍योँ आ बेटि‍यो लग पहुँच मुँह नि‍हारए लगलनि‍। दुनूक मन कहलकनि‍ मुँहक रूखि‍ कहाँ कहै छन्‍हि‍ जे कोनो रोग छन्‍हि‍। रणभूमि‍क हारि‍क रोग आ बि‍मारीक रोग अपन बात अपने चि‍कड़ि‍-चि‍कड़ि कहै छै जे कि‍ छी। मुदा बन्न मुँह देख मनोहरक छातीपर दुनू गोरे अपन-अपन सती हाथ रखलनि‍। छातीक धुकधुकी समतूले बूझि‍ पड़लनि‍। मुदा आखि‍र कि‍छु छथि‍ तँ एकक पि‍ता दोसराक पति‍ये छथि‍ ने। दुनूकेँ अपना-अपना बि‍सवासमे शंका भेलनि‍। शंका होइते एक-दोसराक मुँह दि‍स तकलनि‍। आँखि‍-आँखि‍क बीच पुल-सड़क बनल। सुनैनाकेँ सान्‍त्वना दैत जानकी बाजलि‍-
माए, हृदए तँ ओहि‍ना पवि‍त्र देखै छि‍अनि‍।
कदमक गाछक झूला जकाँ दहि‍ना आस मारि‍ सुनैना कहलखि‍न-
बेटी, पुरुखक छातीपर बहुत भार छै। जेकरा माथपर जारनक बोझ आकि‍ अन्न-पानि‍क बोझ पड़बे ने कएल ओ ओइ बोझ उठबैबला छातीक धकधकी गनि‍ केना सकैए। से नै तँ छातीए डोला कऽ देखहुन जे मुँहसँ केहेन बकार नि‍कलै छन्‍हि‍।
माइक वि‍चार सुनि‍ जानकी आरो जाँच-पड़ताल करब नीक बुझलक। जहि‍ना कलि‍आएल अड़हूल फुलाइत रहैए आकि‍ कलीक अवस्‍थामे रहैए तहि‍ना जानकीक मन छातीसँ ससरि‍ हाथ दि‍स बढ़ल। केना नै बढ़ैत कहुना अछि‍ तँ छातीक ऊपरेसँ ने लटकल अछि‍। बाजलि‍-
माए, से नै तँ छातीक धुकधुकीसँ अपनो मन धुकधुकाइते अछि‍। हाथक नारी पहि‍ने देख लहुन।
      नारी तँ नारी छी। एक पुरखि‍याह। छाती जकाँ दुनू गोटे एक्केबेर थोड़े पकड़ि‍ सकै छथि‍। मुदा पहि‍ने के देखत, दुनूक बीच ओझरी लगि‍ गेलनि‍। एक पुरुष हजार रूप। की मनोहर जानकीयो लेल वएह छथि‍ जे सुनैना लेल? मुदा कि‍ मनोहर सुनैनाक छि‍अनि‍ आ जानकीक नै? तखन? जानकी सुनैनाकेँ कहलक-
माए, छातीक धुकधुकी तँ जोरसँ चलै छै, गनल भऽ जाइए मुदा हाथक नारी आइ धरि‍ कहाँ गनलौंहेँ।
      बेटीक बात सुनैनाकेँ सोहनगर लगलनि‍। ऐठाम कि‍यो आन अछि‍ जे अछि‍यो ओ तमसगीरे अछि‍, उकटा-चाल करत। बामा हाथसँ तरहत्‍थी पकड़ि‍ दहि‍ना हाथ सुनैना मनोहरक बाजूपर देलनि‍। आँगुरसँ नारी पकड़ि‍ते कानमे झड़झड़ाए लगलनि‍-
सुनैना, बहुत आशा जि‍नगीसँ केने छेलौं। मुदा, टूटि‍ कऽ सभटा छि‍ड़ि‍या गेल। समाजक डर हमरा नै होइए मुदा अहाँ पत्नी छी तँए कहै छी। बताह बना बतहपनीक फड़मान हाथमे धरा देलक। कमेलहो खेलक आ अगि‍लो कमाइ मारलक। जखने घरसँ नि‍कलब धि‍या-पुता जानि‍-जानि‍ देहपर कि‍यो गोला फेकत, कि‍यो काँट फेकत, कि‍यो गोबर माि‍ट फेकत। केकरा कि‍ कहबै, हमरा बातकेँ कि‍यो कान धड़त। आइ दस बर्खसँ जानकीक बि‍आहक पाछू पड़ल छेलौं, मास दि‍न पूर्ब जवाब भेटल जे वैवाहि‍क संबन्‍ध भंग भऽ गेल।
आरो कान लगमे आनि‍ सुनैना मनोहरक हाथ उठा कानमे सटौलनि‍। धड़धड़ाइत सुनए लगली। हम ओइ जुगलासँ पुछै छि‍ऐ जे कोन बुधि‍ए जमाए बना एते सेवा करौलक। बाइस बर्खक बेटीक मुँह देखल जाएत। जखनि‍ घरक भार उठबैमे अक्षम भऽ गेलौं अनेरे जीबि‍ए कऽ कि‍ करब। मुदा परि‍वार? सेहो कहाँ राखि‍ पौलौं। दस बर्खक अवस्‍थामे बेटी कन्‍यासँ कनि‍याँक रूप धारण करए लगैए तइठाम जानकीक चर्च पत्‍नी दस बर्ख पूर्ब बारह बर्खक अवस्‍थामे केलनि‍। अपनो ओइ पाछू पड़लौं। काजोक अगुताहत नहि‍येँ बूझि‍ पड़ल कि‍एक तँ समयानुसार परि‍वर्त्तन हेबेक चाही। बीस-बाइस बर्खक बच्‍चि‍या समाजक कुमारि‍ बच्‍चि‍या छी तँए समाजमे केकराे चहु अलगबैक अधि‍कार नै छै जे ओकरा अलग बुझए। जौं जमीनो बेचि‍ जानकीक बि‍आह कइए लइ छी, तँ कि‍ समाज भार उठौत जे एहेन काज आगू नै हएत?
वि‍ष्‍मि‍त भेल सुनैनाकेँ देखि‍ जानकी बाजलि‍-
माए, कनी हमरो बाबूक नारी देखए दे।
जानकीक बोल सुनि‍ सुग्‍गाक लोल सुनैना नि‍हारए लगली। यएह अवस्‍था छी, लोक सती बनैए। यएह अवस्‍था छी, लोक बेश्‍या बनैए। यएह अवस्‍था छी, जइमे लोक मातृ-पि‍तृ भक्‍त बनि‍ भगवत भजन करैए। मुदा जानकी...?
पति‍क हाथ सुनैना जानकीक हाथमे दैत कान ठाढ़ कऽ मुँह नि‍च्‍चाँ गोड़ि‍ लेलनि‍। पि‍ताक कब्‍ज पकड़ि‍ते जानकीक कानमे घनघनाइत आएल-
बेटी जानकी! हम अपराधी छी। हमरासँ अपराध भेल।
नै बाबूजी नै, सौंसे दुनि‍याँ भलहिं कहए मुदा अपन जुआन नै नि‍कलि‍ सकैए। चौथारि‍ सीमा धरि‍ आबि‍ अहाँ परि‍वारक सेवा करैत रहलि‍ऐ। दुनि‍याँ बौक कहए आकि‍ बताह कहए, कहअ दि‍औ। मुदा अपन इमान कखनो धरमसँ वि‍चलि‍त नै हएत। हम मि‍थि‍वाला छी, हमरा वाजूमे शक्‍ति‍ अछि‍। जहि‍ना अपन कालखंड इमानदारीसँ टपलौं तहि‍ना अगि‍ला खंड हमरो छी। अपना दरबज्‍जापर बैस भगवत भजन करैत रहब, देहक चि‍न्‍ता नै करब। हमहूँ तँ सन्‍ताने छी कि‍ने। बेटा रहैत तँ बहि‍न बनि‍ भार दैति‍यनि‍। मुदा जखन भाए नै अछि‍ तखन तँ हमहीं ने बेटा-बेटी भेलौं। ई प्रश्न हमरो भेल कि‍ने? बि‍आह हएत, सासुर बसब मुदा अहाँकेँ ऐ अवस्‍थामे छोड़ब कते उचि‍त हएत। नीक-बेजाएक भार के उठौत। अपना जीबैत अपन माए-बापक एहेन गति‍ भऽ जान्‍हि‍ जे अनसोहाँतो-सँ-अनसोहाँत भऽ जाए, ई दोख केकरा सि‍र सवार हएत। मुदा समाजो तँ तेहेन अछि‍ जे छातीक कोन बात कोढ़-करेज धरि‍ खोखड़ि‍-खोखड़ि‍ खाइते आएल आ रहत। हे शि‍व, एहेन धनुष उठबैक भार जौं अपने नै लेब तँ कि‍ ई समाज उठा सकैए? कि‍ मि‍थि‍लांगना अखनो धरि‍ ई नै बूझि‍ सकली जे माए-बाप जनमदाते टा नै छथि‍ जि‍नगीक हारि‍-जीतक सूत्रधार सेहो छथि‍, जौं से नै तँ सासु-पुतोहुकेँ भि‍खमंगनी बेटी कहि‍ कि‍अए मुड़ी गोतबै छथि‍न। जरूरत अछि‍ समायानुसार शक्‍ति‍ उपका संचय करैक। जाबे तक से नै हएत ताबे तक पुरुखक नजरि‍ नि‍च्‍चाँ केना कऽ पाबि‍ सकै छी। देखए पड़त अपन भूत आ भवि‍ष। जाधरि‍ अपन भूत-भवि‍ष देख नै लेब, अपन-अपन बीर्तमानक लक्ष्‍मण रेखा खींच रक्षाक भार स्‍वयं नै उठा लेब ताधरि‍ ऋृषि‍का, सती-सध्‍वी, पति‍व्रता आदि‍-इत्‍यादि‍ शब्‍दक साकार जि‍नगी केना बनि‍ सकत?”
      जहि‍ना नट-नटीनक नाचमे दर्शक चारू दि‍स घेरि‍ बैसैत आ बीचमे दुनू अपन जि‍नगीक राग अलापति‍ तहि‍ना समाजक लोकक बीच मनोहर, सुनैना आ जानकी, जि‍नगीक राग अलापि‍ घर दि‍स वि‍दा भेली। आगू-आगू सुनैना-जानकी मनोहरक दुनू हाथ पकड़ने आ पाछू-पाछू धि‍या-पुतासँ चेतन धरि‍।
      घरक मुड़ेरा देखि‍ते मनोहर दुनूक हाथ झमाड़ि‍ बाँहि‍ छोड़ा बमकि‍ बजला-
बि‍सवासघात..., बि‍सवास घाती छी...। जमाजमे जेहने मनुख रहत तेहने ने बनत। बि‍सवास देने छल जे बुढ़ाड़ीमे अहाँ गर्त्तमे खसब। ओ सभ पागल बना देलक।
पुन: झोंकमे-
नै सुनत दुनि‍याँ नै सुनह मुदा जाबे घटमे प्राण-घटवार रहत ताबे यात्री कहबे करबै। कहि‍ते रहबै।
     
सातम दसकमे मनोहर जि‍ला-कार्यलयमे कि‍रानीक नोकरी शुरू केलनि‍। समाजक पहि‍ल वि‍द्यार्थी जे पहि‍ल श्रेणीसँ मैट्रि‍क पास केलनि‍। कौलेज लगमे नै रहने आगू पढ़ैक आशा तोड़ि‍ जि‍नगीक मैदानमे उतरल। मुदा रि‍जल्‍टक कागत आँखि‍क सोझ अबि‍ते मनमे उपकि‍ गेलै जे जहि‍ना प्रथम श्रेणीक फल भेटल तेहने फलक गाछ रोपि‍ ओकर सेवा टहल जि‍नगी भरि‍ करैत अपनो आ समाजोकेँ नीक फल खुएबनि‍।
एक तँ सरकारी कार्यालयमे काज नै जे पढ़ल-लि‍खलक अँटाबेस होइत, दोसर स्‍कूलो-कौलेज कम रहने लोक पढ़ि‍यो नै पबैत छल। संयोग नीक बैसलै जि‍लाक कृर्षि वि‍भागमे कि‍रानीक नोकरी मनोहरकेँ भऽ गेल। जहि‍ना दशमीमे दुर्गास्‍थान साँझ दि‍अए जाइसँ पहि‍ने साँझ-देनि‍हार अपन-अपन घरक भगवतीक आगू साँझ दऽ लइए तखन ने दसनामा देवालयमे जाइए, तहि‍ना मनोहर नोकरीपर जाइसँ पहि‍ने माता-ि‍पताक असीरवाद लऽ लेब जरूरी बुझलक। खुशी तीनू गोटेक मनमे। मुदा तीनूक तीन रंगक। कि‍अए ने तीन रंगक होइत। हजारो रंगक फूलमे सुगंध होइ छै, सभकेँ अपन-अपन सुगंध सि‍रजन कऽ पसारैक हक छै।
दलानक ओसारपर सतदेव कोदारि‍मे पच्‍चर लगबैत रहथि। मनोहरकेँ खुआ आंगनसँ माए असीरवाद देलक। आंगन-दलानक बीच मनोहरक मनमे उठल ओह माएकेँ तँ कहि‍ देलि‍यनि‍ जे नोकरीपर जाइ छी, ओ असीरवादो देलनि‍ जे आब तोंही सभ ने ऐ घरक खुट्टा भेलहक। हम सभ तँ पाकल आम भेलौं। मुदा से नै जौं माइक एक रूप छन्‍हि‍, पि‍ताक एक रूप छन्‍हि‍ तँ तइ बीच एकटा संयुक्‍तो रूप तँ छन्‍हि‍हेँ। तँए दुनू गोटेक ओइ रूपकेँ प्रणाम कऽ असीरवाद लेब। डेढ़ि‍ए परसँ बाजल-
माए, कनी एम्‍हर आ।
शुभ काजमे वि‍लमैक दोख अपनापर माए केना लेती। अँइठे हाथे दरबज्‍जपर पहुँच बजली-
कि‍ कहलह
पि‍ता-सतदेवकेँ मनोहर गोड़ लागि‍ बाजल-
बाबू, नोकरी करए जाइ छी।
नोकरीपरकानमे पड़ि‍ते सतदेवक मन खुशि‍या गेलनि‍। सुगंधि‍त फूलक फुलवारी आ बि‍नु सगंधक फुलवारीक हवा जहि‍ना दोरस रहैत तेना नै बूझि‍ पड़लनि‍। असीरवाद दैत सतदेव मनोहरकेँ कहलनि‍-
बौआ, डि‍क्‍शनरी जकाँ जौं तीनिए टा शब्‍दक कोष बना लेबह तँ मुइला पछाति‍यो बेर-बेर दर्शन होइते रहबह। भरल-पूरल देख आत्‍मा जुड़ाइते रहत।
सि‍नेह सि‍क्‍त सतदेवक शब्‍द सुनि‍ मनोहर सहमि‍ स्‍वीकारैत पुछलकनि‍-
ओ तीन शब्‍द कि‍ छि‍ऐ?”
बौआ, झूठ नै बजि‍हह। दोसर, केकरोसँ एक्को पाइ डँड़ि‍हक नै। तेसर, दरबज्‍जापर जे मनुख-शक्‍लक आबथि‍ हुनका एक लोटा पानि‍क आग्रह जरूर करि‍हनु।
      पि‍ताक शब्‍दकेँ गुरु-पि‍त वचन बूझि‍ तत्काल तँ मनोहर गीरह बान्‍हि‍ राखि‍ लेलक, राखबो जरूरी छेलै। एगारह बजे आॅफि‍स पहुँचक छेलै। मुदा पि‍ताक वचनकेँ हास्‍य शब्‍दकोषमे नै हहासक डरसँ चाइलेंजकोषमे लऽ अंगीकार केलक।
      दुरगमनि‍याँ कनि‍याँ जकाँ मनोहर अपन उपस्‍थि‍ति‍ दर्ज करा, सभकेँ प्रणाम-पाती करैत, कोहवरमे असकरे कुरसीपर बैस गेल। कोनो काज नै देखि‍ चुनौल तमाकुलक गीरह जकाँ गामक गीरह खोलए लगल तँ भक्क दऽ पि‍ताक असीरवाद मन पड़लै। होइतो अहि‍ना छै जे जखन रॉकैत तैयार भऽ उड़ैक रूप धारण करैए तखन धरती छोड़ैसँ पहि‍ने उनटा जाँच-पड़ताल होइ छै। मनोहरोकेँ जि‍नगीक पैछला कोनो बात मन नै पड़लै, पहि‍ने पि‍ताक वएह तीनू शब्‍द  मन पड़लै जे तीन प्रश्न बनि‍ जि‍नगीक आगूमे ठाढ़ भेल। जौं अपन प्रश्नक जवाब दइ जोकर नै छी तँ कोनो लजेबाक बात नै जे अपन कमजोरी केना सुहकारी। जाबे तक कोनो खेतमे नव सि‍रासँ जोति‍ नव बीज नै देल जाइ छै ताबे नव फलक आशा केना हएत। कुरसीपर बैसल मनोहरक मनमे पि‍ताक असीरवादक तीनू शब्‍द तीन प्रश्नक गाछ रूपमे ठाढ़ भेल। कुशल माली जहि‍ना सभ फूलक अपन-अपन पति‍आनी हि‍यबैत तहि‍ना मनोहरो अपन तीनू शब्‍दक पाँति‍ हि‍याबए लगल। मुदा सतरंगा मकान बनौनि‍हार इंजीनि‍यर जकाँ गुनि‍याँ-परकालसँ नै गुनि,‍ संकल्‍प बूझि‍ वि‍चारए लगल। ओना वि‍चारक खण्‍डन-मण्‍डन जेते बेसी होइ छै ओकर बीज-स्‍वरूप दूधक मक्‍खन जकाँ ओते भेटै छै। मुदा मात्र दू घंटा ऑफि‍समे रहैक छै। डेरो-डंटा ठीक नहि‍येँ भेल छै, तीन घंटा रस्‍ता काटि‍ गामो जाएब छै। तँए जते खण्‍डन-मण्‍डन हेबाक चाही तते तँ नै मुदा तात्वि‍क वि‍चार जरूर केलक। ओना हनुमानजी जकाँ कखनो अकास मार्गपर नजरि‍ पड़ै तँ वि‍हाड़ि‍ जकाँ भऽ जाइ, मुदा लगले महावीर जकाँ बदलि‍ लि‍अए। झूठ नै बाजब।कोन बड़का प्रश्न भेल। नान्‍हि‍टा प्रश्न अछि‍। ने हमरा एक सेलक जीवाणुक इति‍हास देखक अछि‍ आ ने सोनाक लंका। चौबीस घंटाक दि‍न-राति‍मे जे समए संग अबैत जाएत आ वि‍वेक कहैत जाएत तेतबे करबाक अछि‍। मनमे खुशी भेलै। जहि‍ना तीन प्रश्नक उत्तरमे एक प्रश्न हल भेने पास नम्‍बर चलि‍ अबैत तहि‍ना मनोहरक मनमे पासक आशा जगलै। पास बदलि‍ पासापर दोसर आस मारलक। दोसरकेँ नै डाँड़ब।ईहो बड़ भारी प्रश्न कहाँ अछि‍? अपन खर्चमे कमी-बेसी भेने ने लोक कर्जदार होइए आकि‍ कर्जदाता। जौं सरपट चालि‍ पकड़ि‍ चलब तँ कि‍अए दुनूमे सँ कि‍यो भेँट हएत। मुदा समाजक बीच परि‍वारकेँ रहबाक छै। सोल्हन्नी सरपट नै देखि‍ मनोहरक मन अँटकल मुदा लगले घोड़ा जकाँ मन हीहीएलै-
खगताकेँ जते तक पचा सकब ओते पचाएब। आ बढ़ता ले समाज अछि‍।
दू-तहाइ अंकक आशा नहि‍योँ देख मनोहरक मन मानि‍ गेलै जे कोनो बेसी ओझरी नहि‍येँ अछि‍। तेसर प्रश्न दरबज्‍जपर एक लोटा पानि‍ पर नजरि‍ पड़ि‍ते मन ठमकि‍ गेलै। अपने घरसँ तीन घंटाक रस्‍ता दूर रहब, दरबज्‍जापर बारह बजे दि‍न आकि‍ बारह बजे राति‍ जौं कि‍यो आबि‍ जाथि‍ तखन अपना बुते कि‍ हएत। अखैन माता-पि‍ता जीबै छथि‍ तँ अपन दुआर-दरबज्‍जाक मुड़ेरा अकास ठेकेता मुदा परोक्ष भेला पछाति‍ की करबै? जौं अखैन नै वि‍चारि‍ बाट पकड़ि‍ लेब तँ बेर-वि‍पत्ति‍ पड़लापर तँ सहजहि‍ लोकक बुधि‍ हरा जाइ छै, तखन वि‍चारि‍ पाएब। वस्‍त्रक एक-एक सूत वि‍लगा-वि‍लगा जखन मनोहर देखए लगल तँ बूझि‍ पड़लै जे प्रश्न भारी कहाँ अछि‍। पीसक हले-हल बनबैक जन्‍मभूमि‍ मातृभूमि‍ भेल, सेवाभूमि‍ कर्मभूमि‍ भेल। मातृभूमि‍ कर्मभूमि‍ चलए तेतबे वि‍चारैक अछि‍।
      नोकरी भेलाक पनरह बर्ख पछाति‍ मनोहरक माता-पि‍ता मरि‍ गेल छेलनि‍। अखैन धरि‍ मनोहर अठवारे गाम-अबै जाइ छल। गामक तसवीर तँ तेना भऽ नै सुधरल मुदा अपना घरसँ खा-पी कऽ बच्‍चा बी.. तक पढ़ि‍ सकैए। घंटा बि‍तैत-बि‍तैत डाॅक्‍टर ओइठाम पहुँच सकैए। तखन गाम छोड़ब-तोड़ब नीक नै। जहि‍ना माता-पि‍ताक समए अबै जाइ छेलैं तहि‍ना अगि‍लो परि‍वार सेने रहब। यएह सोचि‍ मनोहर अपन परि‍वारकेँ गामे रखलनि‍।
      जोडा बड़दक जोत परि‍वार सतदेवक छेलनि‍। ओना जोड़ा बड़दक जोतक अर्थ वि‍कृत भऽ गेल अछि‍। वि‍कृत ई भऽ गेल अछि‍ जे सए-सए बीघा जमीनबला खुट्टा उसरन कऽ लेलनि‍! तर्क देता ट्रेक्‍टर-थ्रेसरक मुदा अपने परदेशसँ अगहने-अगहन गाम पहुँचता। से नै, सतदेव मेहनती गि‍रहस्‍त छला। गि‍रहस्‍तीकेँ सभ रूप सजौने छला। आदि‍-आदी धरि‍क कलमी-सरही आमक गाछी पाँच कट्ठा छन्‍हि‍हेँ। दू कट्ठा बँसवाड़ि‍, एक कट्ठा करजान, पाँच कट्ठा घराड़ीयो छन्‍हि‍हेँ। तीमन-तरकारीसँ लऽ कऽ वाड़ी-झाड़ी छन्‍हि‍हेँ। पानि‍क अपन बेवस्‍था केनहि‍ छथि‍। जेहने सासुक चालि‍-चलनि‍ तेहने पुतोहु-सुनैनोक भऽ गेलनि‍। गि‍रहस्‍ति‍यो काज सतदेवकेँ बँटाएले जकाँ रहनि‍। अढ़ाइ बीघा बाधक खेती अपन रहनि‍। तीमन-तरकारी, वाड़ी-झाड़ी-फुलवारीक भार पत्‍नीक रहनि‍। जे सुनैनाक हृदैक रूप बनि‍ गेलनि‍। मुदा सासु-ससुरकेँ परोछ भेने घरक सोल्हनी भार सुनैने उठा नेने छेलीह। सुनैनाक अभ्‍यन्‍तर कहनि‍ जे ऐ घरक सोल्‍हन्नी कर्ता-धर्ता अपने छी। तेकरा जौं अपना जकाँ नै राखि‍ बि‍नु आड़ि‍-मेड़क घर बना लेब तखन कि‍अए कहै छि‍ऐ जे नारी शोषण होइए। कि‍ एहेन नारी नै छथि‍ जे पुरुखसँ मालि‍स करबै छथि‍। मुदा से नै ई भेल गप-सप।
      जि‍ला कार्यालयमे कि‍ खाली सरकारि‍ये काम-काज होइए आकि‍ जि‍ला भरि‍क कथा-कुटुमैती, गाए-बड़द महिंसक खरीद-वि‍क्री, राजनीति‍ कूटनीति‍, छलनीति‍, दुर्नित सभ कथुक जि‍ला छी। भलहिं कामकाजी लोक काजक धड़फड़ीमे तारि‍कोपर जेता मुदा पाछूसँ वारंट नेने औता। मुदा तेतबे तँ नै अछि‍, कचहरी जाइ छी, भरि‍ दि‍न कतए बैस समए गमाएब। तइसँ नीक कि‍अए ने पूर्बा हवाक गरपर बैस गांजाक गंध पसारि‍ सभ गजेरीकेँ एकठाम समेटब नीक। एक चेहरा अनेक रूप दुनि‍याँक नव हाल भऽ गेल अछि‍। के अपराधी आ के अपराध रोकि‍नि‍हार। वि‍चि‍त्र स्‍थि‍ति‍ अछि‍। जौं दू-तीन-चारि‍क जोगकेँ खि‍चड़ी कहब तँ चाउर, दूध, चीनी, मसालाक जोग खीर केना भऽ गेल। जौं से नै चाउर-दालि‍-अल्‍लू-पानि‍क बीच चीनि‍योँ दऽ दि‍ऐ तखन कि‍ भेल। तँए सोझे नोन-चीनीक बात नै अछि‍।
      सिंचाइ वि‍भागक बड़ाबाबू छला जुगल कि‍शोर। आब सेवा ि‍नवृत्ति‍ भऽ गेला। इलाकाक एके जाति‍क नै अधि‍कांश जाति‍क पजि‍आरीक पेशा सेहो अपनौने। कार्यालय सभमे अहि‍ना होइ छै एक चि‍न्‍हारे भेने तीन दि‍नमे हजार चि‍न्‍हरबा भऽ जाइ छै। सरकारि‍ये काजक भाषाक जुगल कि‍शोर। नि‍पुणे नै घटकैतीक भाषाक सेहो पाकल पड़ोर। हुनके भाँजमे मनोहर पड़ि‍ गेला।
      जखने जानकी एगारहम बर्ख टपि‍ बारहममे पएर रखलक तखने सुनैना मनोहरकेँ जानकीक बि‍आहक भार सुमझा देलखि‍न। अखैन धरि‍ मनोहरकेँ कथा-कुटुमैतीक बोध नै। भाँज लगलनि‍ जे जुगल-कि‍शोरक हाथमे छपड़ि‍या पैकार जकाँ सएओ जोड़ा बड़द-गाए रहि‍ते अछि‍। जि‍ला कार्यालयमे मनोहरकेँ अपन पहि‍चान छेलनि‍। जइसँ काजक बोझो कम रहैत छेलनि‍। एक दि‍न चारि‍ बजे छुट्टी होइते जुगल कि‍शोरसँ भेँट करैत अपन बात जानकी बि‍आहक रखलनि‍। जेना जुगल कि‍शोरकेँ जीएपर राखल रहनि‍ मनोहरकेँ कहलखि‍न जे कृष्‍णकान्‍त बी.. पास कऽ नोकरी लेल बौआइए मुदा लेन-देन दुआरे काज नै भऽ पबै छै। से जौं अहाँ अपनेसँ जा कऽ कहि‍यनि‍ तँ ओहि‍ना माने बि‍नु लेन-देनेक काज भऽ जेतनि‍ आ अहूँकेँ बि‍आहमे लेन-देनक भार नै पड़त। मनोहरक मन मानि‍ गेलनि‍ जे एक परि‍वारकेँ ठाढ़ होइक प्रश्न छै से जौं कहलासँ भऽ जेतै तँ उचि‍त-उपकार दुनू भेल। अपनो काज ससरि‍ जाएत।
      बीचमे एकटा बाधा ठाढ़ भेल, ओ ई जे पहि‍ने नोकरी होइ आकि‍ बि‍आह। घटकैती भाषमे जुगला कि‍शोर कहलखि‍न-
मनोहर बाबू, अहूँ सभ दि‍न कागतेमे ओझड़ाएल रहलौं, एतबो ने बुझै छि‍ऐ जे जइ घर बेटी जाएत तेकरा घरो ने छै। दू-चारि‍ मास कमा कऽ घर बनौत तखन नि‍चेनसँ बि‍आह हेतै। अखैन एगारहे-बारहे बर्खक बेटी अछि‍, आब कि‍ कोनो उ जुग-जमाना रहलै, आब तँ बीस-बाइसक चलनि‍ भऽ गेल अछि‍। नीको अछि‍।
सोझमति‍या मनोहर जुगल कि‍शोरपर सोल्हनी बि‍सवास कऽ लेलनि‍। समए बि‍तैत रहल बि‍तैत रहल मनोहर नि‍चेन जे बीस-बाइस बर्खक बीचक काज टरि‍ गेल।
      स्‍थायी रूपे जखन कृष्‍णकान्‍त बेवस्‍थि‍त भेल तखन जुगल कि‍शोर अपन बेटीक बि‍आह कृष्‍णकान्‍तसँ पाँच लाख नगद गनि‍ करा लेलनि‍। कृष्‍णकान्‍तो अपन पूर्ब जन्‍मक कमाइ बुझलक। एक पट्टीमे नोकरी, दोसर पट्टीमे पाँच लाख संग कनि‍याँ। के हमरा सन भागमन्‍त हएत।
      जानकी जखन बाइसम बर्खमे पहुँचल, तखन सुनैना अंति‍म वारनिंग मनोहरकेँ देलखि‍न। तखन मनोहरकेँ चाँकि‍ जगलनि‍। धर्म-कर्म बूझि‍ मनोहर जुगल कि‍शोरक गाम पहुँचला। तीन साल पहि‍ने जुगल िकशोर सेवा-ि‍नवृत्त भेल रहथि‍। दरबज्‍जापर बैसल जुगल कि‍शोरक मन मनोहरकेँ कि‍छु मोट बुझहेलनि‍। मुदा अपन काज तँ पहाड़ी इलाकामे लोक गदहो चढ़ि‍ कऽ लइए। खैर, हमहूँ कोनो कुटुमैती थोड़े एलौं जे मान-रोख राखब। काजे एलौं काज करब जाएब तइ बीच समैए कखन बँचत जे पहुनाइ करब। बुढ़ाड़ि‍यो बाघि‍न तँ फेर बाघि‍न छि‍ऐ कि‍ने। मनोहरकेँ देखि‍ते जुगल कि‍शोर चपाड़ा दैत अभि‍वादन केलकनि‍-
आउ-आउ मनोहरबाबू, आब तँ भेँटो दुर्लव। केम्‍हर-केम्‍हर...
मनोहर कहलकनि‍-
जानकी बाइस बर्खक भऽ गेल, सएह काजे आएल छी।
अखैन धरि‍ मनोहरकेँ नै बूझल जे कृष्‍ण कान्‍तक बि‍आह जुगल कि‍शोरेक बेटीसँ भऽ गेलनि‍। मुदा ई दुनि‍याँक खेल छी जे दुनि‍याँमे रहि‍तो लोक दुनि‍याँकेँ नै जानि‍ पबैत अछि‍। जुगल कि‍शोरक मनमे भेलनि‍ जे मास दि‍न पहि‍ने काज भेल आ आइ ई ताना-मारए दरबज्‍जापर चलि‍ आएल। अपना सीमा कुकुरो बताह। जुगल कि‍शोर सोझे कहलखि‍न-
ऐठामसँ चलि‍ जाउ, नै तँ पुलि‍सकेँ बजाएब?”
      ओना जुगल कि‍शोरक बात मनोहरकेँ तते कठानि‍ नै लगलनि‍ जते लागक चाही। कि‍एक तँ अपन दरबज्‍जापर उचि‍त-अभ्‍यागत लेल पुलि‍स आनी, सएह तँ मि‍थि‍लाक दरबज्‍जा छी। मुदा पुलि‍स नाओं सुनि‍ मनोहर भरमे-सरमे घरमुहाँ भेला।
तही दि‍नसँ आॅफि‍सक काजमे उन्‍टा-फेड़‍ हुअए लगलनि‍। जइसँ पागल घोषि‍त कऽ देल गेला।

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'विदेह' २२८ म अंक १५ जून २०१७ (वर्ष १० मास ११४ अंक २२८)

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