Wednesday, April 03, 2013

'विदेह' १२६ म अंक १५ मार्च २०१३ (वर्ष ६ मास ६३ अंक १२६) PART III



http://videha.co.in/JagdanandJha.jpgजगदानन्द झा मनु’- दूटा विहनि कथा
ग्राम पोस्ट हरिपुर डीहटोल, मधुबनी 
  .आस्था
डोकहर राजराजेश्वर गौरी शंकरक प्राचीन आ प्रशिद्ध मंदिर | मंदिरक मुख्यद्वारकेँ आगू एकगोट अस्सी-पच्चासी बरखक वृद्धा, सोन सन उज्जर केश, शरीरक नामपर हड्डीक ढांचा, डाँर झुकि गेल | मुख्यद्वारक आँगाक धरतीकेँ बाहरनिसँ पएर तक झुकि कए बहारैत |
दुनू परम मित्र, एक दोसरक गुण दोषसँ परिचीत, दुनू संगे मंदिरक आँगासँ कतौसँ कतौ जा रहल छलथि | मंदिरक सोंझाँ अबिते देरी दुनू हाथ जोड़ि प्रणाम कएलनि | ‘सेहो तुरंते दुनू हाथ जोड़ि, झुकि कए मोने-मोन स्तुति करैत ओतुका धरतीकेँ छुबि माँथसँ लगा ओहि ठामसँ आगू बिदा भेला |
ओतएसँ दस डेग आगू गेलाक बाद ’, ‘सँ – “हे यौ अहाँ कहियासँ एतेक आस्तिक भऽ गेलहुँ, जे मंदिरक सामने जाइत मातर कल जोड़ि लेलहुँ ओहो हमरासँ पहिले |” आगू आरो चुटकी लैत – “भगवानो देख कए हँसैत हेता जे देखू ई महापातकी आइ आस्तिक भऽ गेल |”
शांतिकेँ तोरैत – “पहिले तँ ई अहाँकेँ के कहि देलक जे हम नास्तिक छी, हमहूँ आस्तिक छी, हमहूँ देवता पितरकेँ मानैत छी परञ्च अहाँक जकाँ पाखण्डी नै छी |  अंतर एतवे अछि जे अहाँ मंदिर मंदिर भगवानकेँ तकैत रहै छी, हम हुनका अपन मोनमे तकैत छी आ अपन करेजामे बसेने छी | आ रहल एखनका गप जे हम मंदिरकेँ सामने हाथ जोड़लहुँ, ओ तँ हम सदिखन अपन मोनमे बसेने हुनका हाथ जोड़ैत रहैत छी मुदा एखुनका हाथ जोड़ब हमर भगवानकेँ नहि, भगवानक ओहि भक्तकेँ छल, ओहि बृद्धाकेँ जिनक बएसकेँ कारने डाँर झुकि गेल रहनि मुदा एतेक अवस्थोमे भगवानक प्रति एतेक अपार श्रधा भक्ति, कतेक प्रेमसँ मंदिरक मुख्यद्वार बहारि रहल छली | हम ओहि भक्तक भक्तिकेँ, हुनक भगवानक प्रति आस्थाकेँ, हुनक बएसकेँ नमन केने रही |”     
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.तरेगन

इजोरिया राति, चन्द्रमाक दूध सन इजोतसँ राइतो दिन जँका बुझाइत | माँझ आँगनमे पटीयापर, अपन बाबीक पाँजरमे सुतलसँ जागि कए तीन बरखक नेना एकटक मेघक तरेगन दिस टकटकी लगोने ताकैत | आँखिक पपनी एकदम स्थीर, उपरकेँ उपर आ निँचाकेँ निँचा, जेना की कोनो हराएल प्रिय वस्तुकेँ ताकि रहल हुए |
किछु घड़ीबाद नेनाक बाबीक निन टूटल तँ नेनाकेँ बैसल देख ओहो हरबड़ा कए उठैत, “की बौआ किएक बैसल छ, आ ई मेघमे की देखै छ |”
नेना धनसन बाबीक बोल ओकर कान तक तँ जाइ मुदा दिमाग तक नहि जाइ | ओ तरेगन दिस एतेक तन्मयतासँ देखेए जे ध्यान उम्हरे एकाग्र |
नेनाक बाबी दुनू हाथसँ नेनाकेँ हिलाबैत, “बौआ की भेल, की देखै छी |”
तरेगन गनैछी |”
किएक |”
काइल्ह सरजू कहलक जे मुइलाबाद लोक तरेगन बनि जाइ छै तैँ हम तरेगन गानि कए देखै छी जे कोन कोन तरेगन बेसी अछि ओहिमे सँ अवस्य एकटा हमर माए हेती |”
बाबी, नेनाकेँ दुनू हाथसँ अपन पाँजमे भरैत, “हमर नेना कतेक बुधियार भऽ गेलै, केकरो नजरि नै लगेए | अहाँक माए कोनो आजी गुजी थोरे रहथि जे ओ आजी गुजी तरेगन बनति, ओ देखू ओओ सभसँ बेसी चमचमाइत तरेगन, ओ अहींक माए छथि |"     

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जगदीश प्रसाद मण्‍डल
लघुकथा-

उलबा चाउर

अगहनक पूर्णिमाक दि‍न। काल्हि‍ पूस चढ़त। अधा-अधीपर जाड़ आऔत। महि‍ना दि‍नक पछाति‍ पूर्णिमा आऔत। संक्रान्‍ति‍केँ पूर्णिमासँ कोनो सरोकार नै छै। सरोकारो केना रहतै, एकटा दि‍नक हि‍साबे चलै छै दोसर मासक हि‍साबे। ओना  दुनू दि‍न-राति‍ संगे चलै छै, संगे रहै छै मुदा कखन के अगुआ जाइ छै आकि‍ पछुआ जाइ छै से ओ जानए। मुदा आब अगहनुआँ जाड़ थोड़े रहल, तहूमे ऐबेरक अगहनमे तेहेन शीतलहरी भेल जे माघोक कान काटए लगल। जहि‍ना कोनो खेल आकि‍ काजमे हानि‍-लाभ संगे चलै छै मुदा के कखन अगुआइ छै आ के कखन पछुआ जाइ छै से जानब सबहक काज थोड़े छी। जँ से रहैत तँ एके भैयारीमे कि‍यो बर-बेमारीक तर पड़ि‍ तरोटा बनि‍ जाइ छै आ कि‍यो बेटाक दहेज लऽ कऽ उपरोटा बनि‍ जाइ छै। एक कील रहने कि‍ हेतै। तरोटा ने सधाएल रहत उपरौटा तँ छुट्टे रहत। तहि‍ना जाड़ोक भेल। अगहनक शीतलहरी, समैसँ पूर्वहि‍ माघकेँ बजा अनलक। पूस तँ बि‍चहि‍मे रहि‍ गेल। अगहन-माघकेँ भेँट भेने पूस हरा गेल। कि‍एक तँ जहि‍ना गोटे-गोटे गाइयो महींसकेँ आ मनुखोकेँ समए पूर्वहि‍ जुआनीक सभ वयकरन अपने आबि‍ जाइ छै तहि‍ना जाड़ोक भेल। पल-पल ओस पला पाला बनबै करत। लतड़ि‍-लतड़ि‍ गोरा रोपि‍ लतड़बे करत। अनुकूल अवसरो भेटलै। कश्मीरी वर्फ-वारी संगबे भऽ गेलै। समैसँ पूर्व भेनौं आम जकाँ ने कोलि‍-फट्टू भेल ने रस-फट्टू आ चोकरेबो नहि‍येँ कएल। मुदा एते तँ भेबे कएल जे पछि‍या अगते पकड़ने ओसो मोटा-मोटा पाला बनि‍ पलड़बे‍ करत। जे हवा संग चलैत छल ओ ओसक बून बनि‍ टप-टप नाकपर होइत खसबे करत। मेघौन नै रहि‍तो सूर्य तेना झपाएल रहैत जे दि‍नो राति‍ये जकाँ भऽ गेल। भरि‍सक दशतारक ने तँ छी!!
जाड़क बैसारी भेने घूरोक चलती आएल आ गपो-शपक, पोथि‍यो-पुरानक। पुरुखे जकाँ स्‍त्रीगणोक बीच शास्‍त्रार्थ चलए लगल। कि‍यो ग्रह कहैत तँ कि‍यो ग्रहक करतूत। मुदा गपक गरमी ओतए मद्धि‍म पड़ि‍ जाइत, जतए ि‍नर्णए होइत, जौं अपना बड़दकेँ कुड़हरि‍येसँ कि‍यो नाथत तँ अनका की। तइले हम सभ अनेरे मुँहा-ठुठी कऽ कऽ फूला-फुली कि‍अए करब। जाड़ेक मसि‍म छि‍ऐ ओकरो ति‍हाइ हि‍स्‍सा तँ छइहे। ओकरा जे मन फुरतै, जेना मन हेतै तेना अपन करत। अपने केने ने कि‍यो जीबैए‍। ओहि‍ना तँ नै कहल गेल अछि‍ जे अपने मुइने जग मरए।
बुढ़-बुढ़ानुसक बीच तेसरे झमेल ठाढ़ भेल। कि‍यो कहैत जे पूस-माघमे शीतलहरी तँ देखैत एलौं, अगहनमे तँ नै देखने छलौं। मुदा हि‍नको सबहक गप ओइठाम जा अॅटकि जान्हि‍ जतए जुग-जमानाक चर्च उठि‍ जाइत। बापेक-बेटाक सम्‍बन्‍ध जे बनि‍ गेल ओ कते उचित‍ छै, जखन जुगे बदलि‍ गेल तखन कि‍ बदलत आ कते बदलत तेकर काेनो ठेकान छै। समुद्रक भॅसि‍आएल नाव, लहड़ि‍क धक्का सहत तखन ने कि‍नछरि‍ धड़त। नै तँ केकर मजाल छी जे नावकेँ बचा लेत। मुदा गाम-घरक बात उठि‍ते सभ गप तर पड़ि‍ जाइत। समस्‍या ठाढ़ भऽ कहैत जे केना बाधक लक्ष्‍मी एहेन समैमे घर औती। नै औती तँ उसनि‍याँ केना हएत आ के करतीह। उसनि‍याँ नै हएत तँ उसना चाउर केना बनत। नै बनत तँ सुपच्‍च खेनाइ केना हएत। अरबा-अरवानि‍ तँ राजा-महाराजाक छि‍ऐ, कि‍सान परि‍वारक तँ उसने छि‍ऐ ने। भलहिं नोकरि‍या-चकरि‍या अपना लेने हुअए। परि‍वारक ओ औरत जे जते परि‍वारक लेल करैत ओ ओते आेइ घरक गि‍रथानि‍ होइए कि‍ने। जहि‍ना खेतक धान, पानि‍क संग चुल्हि‍पर चढ़ि‍ अपन व्‍याकरण बदलि‍ उसनल धानसँ उसना चाउर बनि‍ उसना भात बनैत जे सुस्‍वादुक संग सुपाच्‍चो होइत अछि‍, तहि‍ना ने घरक लछमि‍यो होइ छथि‍।
पनरह-बीस दि‍नक शीतलहरि‍ भरि‍सक छँटत। पौ फटि‍ते रवि‍या एकचारि‍क घूर लग बैस पीढ़ि‍येपर खुरपी लऽ कऽ तमाकुल मि‍लौल गांजा कटैत। पनरह-बीस दि‍नक परता भेने खुरपि‍यो अधवि‍ज्‍झू भऽ गेल। जहि‍ना चालि‍ कमने पएरक होइ छै। तँए धार मोटा गेल। खुरपीक बेंटकेँ जोरसँ लेटाओल गांजापर दबि‍ते मनमे उठलै। बुदबुदाएल-
कते दि‍नसँ नि‍आरै छी जे गुलाब-तख्‍ती आ प्रेमकटारी लेब से तेहेन ने समए भऽ जाइ छै जे कि‍ लेब। बुझै छि‍ऐ जे अपन प्रेमकटारी आ गुलाब-तख्‍ती खुरपि‍ये-पीढ़ि‍या छी।
घूरसँ खड़ौआ जौड़क गूल नि‍कालि‍ चीलममे चढ़ा भोग लगबैत मंत्र पढ़लक-
जीवैत-मरैत जे जतए छह आबि‍ जाह। कहि‍ दमसा कऽ दम मारलक। जहि‍ना चारक वा भीतक दाबसँ घरक मुँहक चौकठि‍क केवाड़ कसकसा कऽ बन्न रहैत मुदा जोरसँ धक्का पाबि‍ खुजि‍ जाइत तहि‍ना रवि‍याक कपाट खुजल। बाजल-
दि‍लरामक माए, कनी एमहर आउ?”
जड़ाएल पति‍क अवाज सुनि‍ रूपनी सि‍ड़सि‍ड़ाइत आबि‍ आगूमे ठाढ़ भऽ गेली। ने दोहरा कऽ रवि‍या कि‍छु बजैत आ ने रूपनी। एक रंगक रोगी दोसराक कि‍ हाल-चाल पूछत। मुदा नहि‍योँ पुछने तँ नहि‍येँ हेतै। मुँहक काजे कि‍ छि‍ऐ। खाइये कालमे ने कनी, वाकी तँ वैसारि‍ये रहै छै कि‍ने। तहूमे वैसारि‍यो कि‍ एक रंगक होइ छै केतौ खेलहा तँ केतौ बि‍नु खेलहा सेहो होइ छै। तइ बीच तँ बीचमानि‍ तखने चलत कि‍ ने जखन दुनूकेँ नीके कहत। जँ से नै कहत तँ मुँहक मानि‍येँ कि‍ भेल? मुदा वि‍हंगरो कम रहै तखन ने जे दुनूकेँ अगल-बगल जोड़ि‍यो कऽ  चलत। जइठाम अकासे फाटल छै तइठाम दरजि‍ये बेचारा कि‍ करत, कते करत। कि‍यो खाइक रोगसँ पीड़ि‍त भऽ सुखाइत तँ कि‍यो भूखल रोगसँ। मुदा तहूसँ नमहर बि‍हंगरा तँ ओतए उठैत जतए भुखेलहासँ बेसी भुखाएल-खेलहाक खेल चलैत छै।
      दुनू परानी, रवि‍या-रूपनी एक दोसरपर आँखि‍ अँटकौने जेना आगू-पाछू दुनू दि‍स दुनू दुनूकेँ देखैत। मुदा गांजाक चढ़ल मन रवि‍या अपन मौन तौड़ैत बाजल-
बुझलौं कि‍, से कि‍ने से, आइ खि‍चड़ी खाइक मन होइए। ति‍लासंकान्‍ति‍क भरोसे कि‍ रहब।
पति‍क बात सुनि‍ रूपनी कि‍छु बाजल नै। मुदा रूपनीकेँ अनसोहाँत जकाँ रीब-रीब लागल। रीबरीबाइत बाजलि‍-
एना कि‍अए अहाँ ति‍ला-सकराँइतक खिंधाँश करै छी। सोझ मुहेँ कहू जे खि‍चड़ी खाएब।
पत्नि‍क बात रवि‍याक कंठक नि‍च्‍चा नै उतरल। गल-गलबैत बाजल-
एगो खि‍स्‍सा कहै छी। एगो रहै अन्‍हरा एगो रहै डि‍ठरा। दुनू मि‍लि‍ काति‍कमे एकटा खत्ता उपछलक। तइमे फँसल एकटा अन्‍है। डि‍ठरा कि‍ केलक जे नांगरि‍ दि‍ससँ अन्‍हराकेँ पकड़बैत जहाँ उधडरेड़पर आएल आकि‍ जोरसँ कहलकै। छोड़-छोड़ ने तँ धाए लेतौ साँप छि‍ऐ। ओ छोड़ि‍ देलकै। से हम थोड़े छी। अहीं कहू जे आब लोक दुरागमन करैए आकि‍ माल-जाल फड़ि‍छबै छै। हे मानि‍ लेलौं जे वर-कनि‍याँक दुरागमन भेल। मुदा बेटा-बेटीक की हएत। घरेक काजमे एना दू रंग कि‍अए भेल जाइ छै।
      रवि‍याक बात सुनि‍ रूपनी पघि‍ल गेलीह। वि‍स्‍मि‍त होइत बजलीह-
उसना चाउर ऐछे कनी नून दऽ कऽ टभका लेब। कचका मि‍रचाइ चीर कऽ दऽ देबै। तइले अहाँ कि‍अए लल-वेकल छी।
जहि‍ना ठीकेदारकेँ बि‍ल-भुगतानक ि‍दन होइत जे रोहू लेब कि‍ मंुगरी, तहि‍ना रवि‍याकेँ भेल। गरीबक गोनरि‍ जहि‍ना दुनू कात चि‍कने होइ छै तहि‍ना दुनू परानीक भेल। रवि‍या बाजल-
अरबा चाउरक प्रेमी छि‍ऐ दूध-चीनी आकि‍ नून छि‍ऐ। मुदा अपन सबहक तँ नूने छि‍ऐ कि‍ने? जखन खि‍चड़ि‍ये भेल तखन चाउर, पानि‍, नून-मि‍रचाइ पड़बे कएल, एते जइमे पड़त से खि‍चड़ी केना नै भेल।
खाइक ओरियान देखि‍ रवि‍याक मन घुमल, गंभीरता देखबैत मि‍ड़मि‍ड़ाइते बाजल-
बाध गेना बीस दि‍नसँ ऊपर भऽ गेल। बाधमे कि‍ भेल हएत कि‍ नै। तहूमे तेहेन ने सि‍ल्‍लीक उजैहि‍या आएल अछि‍ जे सभटा धान चाभि‍ देने हेतै।
पति‍क बात सुनि‍ रूपनी अगुअबैत बाजलि‍-
पैछला बेर देखलि‍ऐ जे बीघा भरि‍ सोनाइ काकाक सूर्यमुखी फूलकेँ सुग्‍गे खा गेलै। बेचारे कते आशा लगा खेती केने छेलखि‍न।
पत्नीकेँ भँसि‍आइत देखि‍ रवि‍या लोहछैत बाजल-
हमरा एते सौंसे गामक हि‍साब-बारी जोड़ैक काज नइए। हम माल-जालक ओगरवाही करै छि‍ऐ आकि‍ चि‍ड़ैयो-चुनमुनीक। खेलकै तँ गि‍रहतक खेलकै। हमर बड़ खेलक तँ राखी। साक्षात् वैरागी बनि‍ रवि‍या ि‍नर्विकार भऽ पत्नीकेँ कहलक।
ि‍नर्विकार पति‍केँ देखि‍ रूपनी सूर्यक धाही देखि‍ते चड़ि‍अबैत बाजलि‍-
हम चुल्हि‍क ओरि‍यानमे जाइ छी। अहाँ झब दे बाध चलि‍ जाउ। नै तँ गि‍रहत अबलट जोड़त। जँ पहि‍ने चलि‍ जाएब आ गि‍रहतकेँ देखब तँ अगुआइये कऽ कहबै जे तते ने सि‍ल्‍ली आबि‍ गेल छै जे एको कनमा धान नै होइबला अछि‍।
      पत्नीक ि‍वचार रवि‍याकेँ जँचल, मुदा भरल पेट जहि‍ना ओछाइन दि‍स तकैत तहि‍ना एक तँ घूरक अगि‍यासीक ताउ तइपर गांजाक रंग, उठैक मन नै भेलइ। मुदा अगि‍योक तँ अपन गुण होइ छै, चाहे तँ उपयोग करू नै तँ घर जराऔत। मुदा से रवि‍याकेँ नै भेल। मन छड़पलै। फुसफुसाएल-
कोनो गामक नइँर-गइँर नीक नै छै। कहू जे जखन एके नाओं सबहक छै माने गाम- तखन कि‍अए कोनो गामक बाधक रखवारि‍ बीघामे दस धूर छै तँ कोनो गामक पाँच धूर। कोनो गामक चारि‍ धूर छै तँ कोनो गामक दू धूर। मन ठमकलै। अनेरे कोन चक्करमे चकराइ छी। ई तँ रखवारि‍क भेल। जेकरा ने माए छै आ ने बाप। मुदा माइयो-बापबला केँ तँ देखते छि‍ऐ जे कोनो गामक लग्‍गी (खेत नपेबला लग्‍गा) साढ़े छह हाथक छै तँ कोनो गामक पौने सात हाथक। कोनो गामक साढ़े सात हाथक छै तँ कोनो गामक नअ हाथक। धूउ अनेरे अनकर रोग अपना सि‍र सि‍रजै छी। साबे बोझ जकाँ सदि‍काल गँड़ि‍मुराहे होइत रहैए तखन तँ कहुना कऽ सम्‍हारि‍ खरि‍हान पहुँचू जे पसारि‍ कऽ सुखा लेब। बड़-बड़ लीला सभ छै। कते देखब। जखन एके गामक एके आड़ि‍क खेतक मलगुजारी बढ़मोत्तर कहि‍ रेन्‍ट मुक्‍त अछि‍ तँ बगले बलाक ओते अछि‍ जे मलगुजारी भुगतानपर बटाइ खेत रहै छै।
अगि‍ला बात मनमे अबैसँ पहि‍ने रवि‍या फुड़फुड़ा कऽ उठल। शीतलहरीक चलैत अगते कुतरूमोमे फूलक कोढ़ी आबि‍ गेल, से रवि‍या देखने। पत्नीकेँ कहलक-
बाड़ीसँ कुतरूमो आनि‍ लेब। बाध दि‍ससँ भेल अबै छी। कहि‍ रवि‍या बाधक रस्‍ता धेलक।
      करीब अस्‍सी बीघाक दछि‍नवरि‍या बाध। जेकर रखवारि‍ रवि‍या करैत। संयोग नीक भेल जे तीन साल पूर्व पैछला रखवार पंजाब गेल जे रवि‍याकेँ बाधक भार देने गेल। पचास बीघासँ ऊपर जमीन नि‍च्‍चाँ आ पच्‍चीस-तीस बीघा ऊपरक बाध रहए। तइमे बीघा पाँचेक उस्‍सर, जइमे भरि‍-भरि‍ जाँघक कुश उपजैत। परदेशि‍या सबहक कि‍रदानीसँ पान-सात बीघा छाहेँ भऽ गेल। तइपर रौदी भेने उपराड़ि‍ खेत अबादे नै भेल। खोपड़ी लग पहुँचि‍ते रवि‍याक मनमे उठल- अनेरे एहेन ठंढ़ामे पएरमे बेमाए कि‍अए फटाएब। तइसँ नीक जे खोपड़ी अपन छि‍हे। आगि‍ सुनगा घूरे तापब। उपराड़ि‍ चौरक बीच परतीपर रवि‍याक रखवारि‍क खोपड़ी।
      घूर पजारि‍ रवि‍या बैस गेल हाथ-पएरक कन-कनी कमि‍ते रवि‍याक मनमे उठल। अनका जे होउ, मुदा भगवान पक्षक काज केलनि‍। उपराड़ि‍ नै उपजल तँ नै उपजल, नि‍चला तँ उपजल अछि‍। नै साल भरि‍ तँ छबो मासक बुतात तँ हेबे करत। मुदा गामेमे देखै छी जे अही चौरी-टामे नहर नै भेनौं नहरक पानि‍ एलै। बाकी गाम तँ रौदि‍याहे भऽ गेल अछि‍।
      सि‍ताएल नढ़ि‍या जकाँ सूर्य तँ उगल मुदा सि‍रसि‍राइत। नव वि‍हान देखि‍ गि‍रहस्‍तक बीच चलमली आएल। धान (पानि‍क धान)मे कनी ठंढ़े ने लागत मुदा सूर्योक तँ धाही छइहे। हो--हो कहीं पूस-माघ अगुआएल अछि‍ आ जौं कहीं पैछला डेग नपलक तँ फेर ओहि‍ना भऽ जाएत। एक तँ रौदि‍याह समैक अन्न, तेकरो जँ जानि‍ कऽ छि‍जानैत करब तखन तँ आरो केतौ भऽ कऽ नै रहब।
      कि‍सानक चलमली देखि‍ रूपनी हाँइ-हाँइ कऽ भानस केलक। आठ बजैत-बजैत हँसुआ नेने सभ नि‍कलि‍ गेल। जन-गि‍रहतसँ बाध भरि‍ गेल। अपने रूपनी दि‍लरामक संग खा पति‍-ले बाधे खाएक लऽ वि‍दा भेल। सात बर्खक बेटा दि‍लराम अंगनासँ नि‍कलि‍ते रूपनी बेटा-दि‍लरामकेँ कहलक-
बौआ, आइ उलबा चाउर खाएब।
आगू-आगू दि‍लराम आ पाछू-पाछू रूपनी बाध दि‍स वि‍दा भेल। कि‍छु दूर गेलापर रूपनीक मनमे उठल। भगवान कूह फेड़लनि‍। नै तँ कोनो दशा बाकी नै रहि‍तए। जहि‍ना अन्नक गति‍ होइत तहि‍ना जरनाक। ओहो तँ माघ ले रखने छलौं जे पार लागल। नै तँ कठुआ कऽ मरैमे कोनो भांगठ छलए।
      गांजा पीबैत रवि‍या आगू-आगू बेटा आ पाछू-पाछू पत्नीकेँ अबैत देखि‍, बुदबुदाएल-
जे जीबए से खेलए फागु। हमरा सबहक जि‍नगि‍ये कि‍ अछि‍ जे अगि‍ला आशापर जीब। जहि‍या हेतै ति‍ला-सकराँइत तहि‍या होउ। अपन तँ आइये छी।
मुदा लगले मन ठमकि‍ गेलै। आन पावनि‍ खीरक होइ छै आ ति‍लासंक्रान्‍ति‍ कि‍अए खि‍चड़ीक होइ छै। तहूमे उजरा अरबा चाउरक संग करि‍या ति‍ल-गुड़-पानि‍क संग परसाद कि‍अए बनै छै...?
आँखि‍ मूनि‍ रवि‍या वि‍चारि‍ते छल कि‍ रूपनी लगमे आबि‍ बाजल-
जहि‍ना गामपर रहै छी तहि‍ना बाधोमे भकुआएले रहै छी।
रवि‍याक बनल मन बाजल-
गामपर तँ अहाँ देखि‍ भकुआ जाइ छी मुदा बाधमे तँ अपने देखै छी कि‍ने।
      तहि‍ बीच बीघा दुइये हटि‍ धानक खेतमे कटनि‍हार सबहक बीच हल्‍ला  भेल। हल्लाक कारण रहै एक भाग सि‍ल्‍ली धान चाभि‍ देने रहै। धान नै देखि‍ जन-सबहक बीच पाहि‍ धड़ैक हल्‍ला रहए। हल्‍ला देखि‍ रूपनी पति‍केँ कहलक-
कनी जा कऽ देखि‍यौ, जे कि‍अए झगड़ा होइ छै।
गांजाक असकताएल मन रवि‍याक, बाजल-
हम बाधक रखवार छि‍ऐ कि‍ गामक पंच छी। अपन गि‍रहत फड़ि‍याबह...
रवि‍याक बात रूपनीकेँ जँचल। आगूमे थारी बढ़बैत बाजल-
बेटाकेँ आइ उलबा चाउर खुआइयो देबै आ मोटरि‍यो बान्हि‍ देबइ।
उलबा चाउर सुनि‍ रवि‍या वि‍स्‍मि‍त भऽ गेल। मन पड़लै अपन माए। माए मन पड़ि‍ते मनमे उठलै ओ दि‍न, जइ दि‍न दि‍आरी पावनि‍ रहै। धान अधपक्कू भऽ गेल रहै, मुदा सुभ्भर नै पाकल रहै। लछमी पूजा दि‍न रहने ओहए अधपक्कू धान काटि‍, पएरसँ मीड़ि‍ खापड़ि‍मे भूजि‍ चाउर कूटि‍ खेने रही। हाथ-मुँह धोय रवि‍या दि‍लरामकेँ कहलक-
बौआ, अहूँ कनी खा लि‍अ।
भरल पेट दि‍लराम नकारैत बाजल-
नै खि‍चड़ी नै खाएब, उलबा चाउर खाएब।
उलबा चाउर सुनि‍ रवि‍याक मनमे खीझ उठल। बाजल-
उलबा चाउर लगले कतए सँ औतै। बड़ अगुताएल छेँ। के तोरा मन पाड़ि‍ देलकौ।
नि‍ष्‍कपट दि‍लराम बाजल-
माए कहलक।
माइक नाओं सुनि‍ रवि‍या ठमकि‍ गेल। जहि‍ना मंदि‍र जाइसँ पहि‍ने ने भगवान आबि‍ राशि‍ लगा लऽ जाइ छथि‍न, तहि‍ना ने गाछोक पीपही रोपि‍ते-काल पाकल आम आगूमे आबि‍ जाइ छै।
      फेर दोसर खेतमे हल्‍ला उठल। पानि‍क तरमे आड़ि‍ डूमल। खाली आड़ि‍क खरही टि‍क-टि‍क करैत। मुदा सभ ठामक ओगरवाहि‍ कि‍ बन्‍दूके हाथे होइ छै। खरहोरि‍क कड़ची केना ओगरवाहि‍ करैत अछि‍। झगड़ाक कारण रहै एकटा खेतक धान चतड़ि‍-लतड़ि‍ दाेसरा खेतमे चलि‍ गेल। पहि‍ने तँ रवि‍याकेँ सोझ-साझ बात बूझि‍ पड़लै, मुदा लगले मन ठमकि‍ गेलै। पानि‍क संग माटि‍क प्रश्न उठि‍ गेलै। ई केहेन होइ छै जे लोक कलम-गाछी लगबै-काल आड़ि‍क कातमे झमटगरहा गाछ लगा दइ छै जे नमड़ि‍ कऽ दोसरा खेतक उपजा खा जाइ छै। बुढ़-बुढ़ानुसक सेहो कहब छन्‍हि‍ जे घर लग बँसबारि‍ नै लगाबी, एक तँ लत्ती-गाछक सीमापर बसल अछि‍ दाेसर तेहेन सि‍राह होइ छै जे जते दूर ओकर छाँह जाइ छै तते दूर ओकर सीरो जाइ छै। जँ जेबे टा करि‍तै तखन तँ नै कोनो मुदा तरे-तर तेहेन खच्‍चरपनी करै छै जे जते दूर जाइ छै दोसराक बास नै हुअए दि‍अए चाहै छै। खि‍चड़ीसँ मन भरि‍ते रवि‍या पत्नीकेँ कहलक-
हमरा अङौस-मङौस करैके मन होइए, अहाँ बाध घुमने आउ।
पति‍क समर्पण देखि‍ रूपनी बाजलि‍-
थाल-पानि‍मे बौआकेँ केना लऽ जेबै। एतै छोड़ि‍ दइ छि‍ऐ।
खेते-खेत रूपनी टहलि‍ घूमि‍ कऽ आबि पति‍केँ कहलक-
बलौकि‍या धान छोड़ि‍ सभ ऊपरा-ऊपरी छै। बजैत-बजैत मनमे उठलै, घरमे कोठी-भरली तँ नहि‍येँ अछि‍ एते धान राखब कतए। सोगसँ सोगाइत स‍ँठलक-
आब कि‍ धान-चाउरक चोर रहल जे कि‍यो चोरा लेत। आब तँ हि‍स्‍सा-बखराक चोरि‍ देखाइयो आ छि‍पाइयो कऽ होइ छै।
रवि‍या पुआरक ओछाइन सरि‍अबैत नि‍नि‍या देवीक स्‍तुति‍ करि‍ते छल कि‍ पत्नीक बुदबुदाएल बात सुनि‍ गेल। मन मुरुछि‍ कऽ तुरुछि‍ गेलै-
बड़ लाल बुज्‍झकर बनै छथि‍, अच्‍छा एकटा कहू जे जइ गाममे सभटा चाेरे रहत ओइ गाममे चोर के भेल?”
पति‍क बि‍गड़ैक कारण बूझि‍ रूपनी नहाएल आ बि‍नु नहाएल अवस्‍थामे पड़ल जकाँ बाजलि‍-
पड़ू-पड़ू। लाउ घुट्ठी दाबि‍ दइ छी।
पि‍याससँ पहि‍ने पानि,‍ भूखसँ पहि‍ने अन्न आगू एलासँ क्षुधाक धार रोकाइ छै। दू-अढ़ाइ बजि‍ते धान कटनि‍हार सबहक शक्ति‍ सि‍हरए‍ लगल। एक तँ मड़ि‍आएल रौद तइपर जट्ठर पानिक संग पछबाक लहकी। एक्के-दुइये धानक बोझ लऽ लऽ खेतसँ नि‍कलए लगल। बोझ देखि‍ रूपनी बाजलि‍-
हम राखी कटने अबै छी।
पेमेंट, बेतन, महि‍ना, पगार, तलब, तनखा आकि‍ दरमाहा उठैकाल जहि‍ना नोकरि‍याक मनमे तरंग उठै छै तहि‍ना रूपनीक मनमे उठए लगल। तते खेत कटाएल जे एते राखी काटब पार लागत। तहूमे बेरो खसल आ जाड़ो बेसि‍येबे करत। लगले मन मानि‍ गेलै जे कोनो कि‍ जमा-जि‍गि‍र अछि‍ जे एते पुरेबे करत। जेतबे सम्‍हरत तेतबे काटब। बाकी आन दि‍न काटब। एते दि‍न कि‍यो चोरेबे ने केलकै आ एक-दू दि‍नमे कि‍ उनटन भऽ जाएत। सोचि‍ते-वि‍चारि‍ते पहि‍ल खेत रूपनी पहुँचि‍ गेल। आँखि‍ उठा हि‍या कऽ देखलक (पानि‍क दुआरे) जे कोन कोणमे राखी अछि‍। दुइये धूर हएत तइसँ की,‍ हएत तँ कोनो कोणेपर। मुदा नमहर खेत रहने अधोसँ कम खेतक धान कटाएल, तखन राखी केना बनत? दोसर-तेसर-चारि‍मो खेत तहि‍ना। पाँचम-टामे राखी बेराएल। काम-धान देखि‍ रूपनीक मनमे सबुरक सबुरदाना छि‍ड़ि‍या गेल। पाँजो भरि‍ धानक आँटी बान्‍हि‍ माथपर उठौने धानक गदाएल पानि‍ देहपर टघरैत खोपड़ी लग रूपनी पहुँचल। अारामसँ पति‍-पुत्र देखि‍ वि‍भोरसँ वि‍सरभोर भऽ गेल। मोने ने रहलै जे माथपर धानक भारी आँटी अछि‍। धानक आँटी देखि‍ रवि‍या मुस्‍की दैत बाजल-
एहेन जे अहाँ छी जे बेटा-दि‍लरामकेँ बाधे अबैकाल उलबा चाउर गछि‍ लेलि‍ऐ आ अखैनसँ जे छाल-छोड़ाओत से केहेन लगत।
वि‍हुँसि‍ कऽ रूपनी बाजलि‍-
जइ बेटाकेँ गछलि‍ऐ तेकरा पूराकऽ छोड़बै। ऐठामसँ जाएब, एक पाट हएत मलि‍ लेब। चुल्हि‍ पजारि‍ गरमा लेब। साँझे परतै तँ कि‍ हेतै, कोनो कि‍ अनका आंगना जाएब जे भरली साँझ नै कुटए देत। अपन ढेकी अछि‍ जखैन पलखति‍ भेटत तखैन कुटब। तँए कि‍ बेटाकेँ....
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
http://videha.co.in/rbkapariphoto.jpgराम भरोस कापडि भ्रमर, सदस्यः नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान,काठमाण्डू
यात्रा प्रसंग- रायपुरक मिथिला महोत्सबः उत्साहक बाढि आ मनीष झा

हम दू मास पूर्व इन्टरनेटपर रायपुर (छतिसगढ़, भारत)क मैथिली प्रवाहिका (मासिक पत्रिका)क आयोजनमे होबयबला अखिल भारतीय मिथिला महोत्सवक सूचना पढने रही । हिन्दीमे । किछु अनसोहाँत लागल रहय । किछु गोटे अपन प्रतिक्रियामे ई बात लिखबो कएने रहथि । जे से हम एकरा बिसरि गेल रही । मुदा एक दिन जखन दरभंगासँ गप्प करैत काल भाई चन्द्रेशक हडबडी शैलीमे ई सूचना भेटल जे हमरा रायपुर जएबाक अछि आ ओत्तय ओसभ हमरा सम्मानित करता तऽ जिज्ञाशा बढल । चिट्ठीक खोजबिन कएल । चिट्ठी राजविराज चल गेल बताओल गेल । जे सत्य नहि छल । तखन हम जिज्ञाशा कएल तऽ ओम्हरसँ एकटा हडबडाएल सन अध खिच्चडि भाषा मैथिली आ हिन्दीमे एकटा स्वर सुनि पडल –‘हम पठा देने छी, नहि भेटल अछि तऽ तुरन्त पठा रहलल छी ।कहबाक जरुरति नहि ई श्वर महोत्सवक संयोजक मनीष कुमार झाक रहनि , मैथिली प्रवाहिकाक सम्पादक । स्वरसं किछु बेशी व्यस्त, धडफडाएल आ उत्साही लोक लागल छलाह । एहिसं बेसी हमरा किछु जानल बुझल नहि छल ।
http://videha.co.in/udghatan%20karait.pnghttp://videha.co.in/Raipur-3%20copy.jpghttp://videha.co.in/manishjha.jpghttp://videha.co.in/bhramarreport.JPG
हम जाएब तएँ पटनामे जमायकेँ कहि दू गोट थर्ड एसीक टिकट बनबा लेने रही । अन्ततः पत्र हमरा मेलमे आएल आ हम सभ औपचारिकता पूरा कऽ रायपुर गेलहुँ । रायपुरमे होइत कार्यक्रम हमर जिज्ञाशा केन्द्रमे तऽ रहबे करे , एहि प्रवासमे जाहि उत्साहसँ एतेक भव्य आ पैघ कार्यक्रम करबाक साहस कएनिहार ई मनिष जी के छथि , ई हमर सभसँ बेसी जिज्ञाशाक विषय रहय ।
चौबीस घण्टाक रेल यात्रामे भागलपुरक डा. केष्कर ठाकुर जीक सानिध्यमे किछु बात बुझबो कएने रही जकरा आओर फरिछौलनि भाई योगानन्द झा जी । ई लोकनि रायपुर घुरि आएल रहथि वा मनिषसँ सम्पर्कमे रहथि । ओना तऽ डा. बुचरु बाबु सेहो मनीषक मनुसत्वक दर्शन कऽ चुकल रहथि आ ओहो हमर आगमनक समाद निरन्तर मनीष जी लग प्रवाहित करैत छलाह ।
जे से फागनु ११ गते (फरवरी २२ तारिख कऽ) ८ बजे राति कऽ जखन रायपुर रेलवे स्टेशनपर उतरलहुँ आ आन सहयात्री मित्र सभक प्रतिक्षा करैत छलहुँ तऽ डा. केष्कर ठाकुर जी हमरा दिश संकेत करैत एकटा पुष्ट देहयष्टिक छोटेकाँटछाँटक व्यक्तिकेँ देखौलकनिइएह छथि कापडि जी ! हम पलटलहुँ, आँखि मिलल , ओ व्यक्ति हाथमे राखल बडका बुकी( गुलदस्ता) हमरा दैत लगभग पैरपर झुकैत प्रमाण कएलक । डा. ठाकुरकेँ हुनक परिचय देबासँ पहिने हम बुझि गेलहुँ , ई हो न हो, मनीषेजी हएताह ।
बातो सएह रहैक । मनीष जी अपन दुलकी चालिमे अगिला डिब्बा दिस बढलाह आ एकटा छोटछिन गुलदस्ता एकटा महिलाकेँ धरबैत हमरा सभ लग आनि परिचय करौलनि । ओ जमशेदपुरसँ आएल रहथि । तखन हमरा सभकेँ स्टेसनसँ बाहर लऽ गेलाह आ सभकेँ गाडीसँ होटल पहुँचाओल गेल । हमराले छतिसगढ प्रशासनक न्यू सर्किट हाँउसमे आवासक व्यवस्था कएल गेल रहय । बीस पचिस मिनट पैदल आ १० मिनेट गाडीसँ जएबाक ठाममे । ई हमरा लेल दोसर सम्मान छल । एक मन भेल संगीसभक संग होटलमे बैसी, मुदा मनीष जीक आग्रह जे राज्य सरकारसँ हमरा लेल छुटिआयोल गेल आवासमे जाएब जरुरी । हमर खानपीनक व्यवस्था सभ ओतहि छल । मुदा हमर ई शर्त रहए , हम दिन भरि खानपीनक संग संगीसभक संग होटेलेमे बिताएब । सुविधा इहो जे ओतहि खानपीन आ कार्यक्रम स्थल सेहो ।
हम सर्किट हाउसमे गेला पर देखलहुँ पाँच सितारा होटलक सभ सुविधा ओतय रहैक । मनीष जीक इन्तजाम पर हम फेर मुग्ध भेलहुँ । चारि दिन चारि राति हम ओत्तय बितौलहुँ । एकोरति आन ठामक आभास नहि भेल । कार्यक्रमसँ आयोजन धरि मनीष जी मात्र मनीष जी । एकटा बात खटकल–( ई एसगरिए किए कऽ रहल छथि । फेर भेल अपने दिल से जानीए पराए दिलका हाल , काज करैत काल एहिना काज कर पडैत छैक । मुदा से सभ क्षेत्रमे एहि तरहे दृष्टि दौडबैत हिनक सामथ्र्यपर हमरो मन हारि मानि लैत अछि । सभक ख्याल, सभक चिन्ता । वाह मनीष जी
हमरा लेल तेसर सम्मानकेँ अवसर तखन आएल जखन १२ गते कऽ अर्थात २३ तारिख कऽ भिन्सर ११ः३० बजे उदघाटन सत्र प्रारम्भ भेल । रायपुर क्षेत्रक संगहि मध्य प्रदेश, विहार, झारखण्डसँ एक सँ एक विद्वान, भाषा सेवी, मैथिल सभक वृहत उपस्थितिमे जखन कार्यक्रम शुरु भेल तऽ मंच संचालक डा. अशोक अबिचल हमरा अध्यक्षता करबाक लेल बजौलनि । मंचपर विहार सरकारक पूर्व संयुक्त सचिव डा. विद्यानन्द झा, विहार सरकारक बाल संरक्षण आयोगक अध्यक्ष श्रीमती निशा झा, मैथिली हिन्दी सुप्रसिद्ध गीतकार डा. बुद्धिनाथ मिश्र, टाटा मोटरक पूर्व वरिष्ठ सहायक मैनेजर , सेवानिवृत प्रो. चन्द्रशेखर खान , अन्तर्राष्टिूय मैथिली परिषद, उत्तर प्रदेशक प्रान्तिय अध्यक्ष पं. जगदिश चन्द्र शर्मा , मिश्र इस्पात प्रालिक अध्यक्ष राजेश्वर मिश्र,छत्तीसगढ पर्जटन मंडलके अध्यक्ष कृष्ण कुमार राय,विख्यात शिक्षा शास्त्री व इतिहासविद् डा.कृष्ण कुमार झा,ईन्दिरा गांधी राष्टीय कला केन्द्र नई दिल्लीके साउथईस्ट एशिया हेड डा. वच्चन कुमार,बख्शी सृजन पीठ छत्तीसगढके अध्यक्ष डा. रमेन्द्रनाथ मिश्र सन सन दिग्गज व्यक्तित्व विराजमान छलाह । हम तखन आओर अचम्भित भऽ गेलहुँ जखन ओहि महत्ता समारोहक उदघाटन करबाक लेल हमरा आग्रह कएल गेल । ई सभ कार्यक्रम पूर्व निर्धारित छल , ई बात एकटा स्थानीय दैनिकमे छपल विज्ञापन देखलाक बाद ज्ञात भेल छल ।
मनीष लोककेँ बजबऽ मात्र नहि जनैत छथि । ओकर सम्मान करय सेहो जनैत छथि ई बात सभकेँ बुझयमे आबि गेल छलै । दरभंगाक डा. बैजु चौधरी सेहो एहने सन आयोजन करैत छथि मुदा गुणवत्तामे एकर चारियो अना नहि भऽ पबैत अछि । एसकरे ओहो , एसकरे इहो । दूनुमे बहुत अन्तर छैक । राजनीतिसँ बेसी विद्वतजनकेँ सम्मान रायपुरमे होइत देखल गेल यद्यपि मनीष जी सेहो राजनीतिक लोक छथि । छतिसगढक मुख्यमन्त्री डा. रमण सिंह लग पहुँच छनि । इहो कार्यक्रम छत्तिसगढ शासनक संस्कृत मन्त्रालयक सहकार्यमे भऽ रहल छनि । सभ किछु व्यवस्थितआवास भोजन, आ कार्यक्रम स्थल । हँ कनेक त्रुटि कएलनि कार्यक्रमक रुपरेखा निर्धारित करैत काल समयक ठेकान नहि रखलनि । सम्मान करबाक क्रम निरन्तर जारी रहने निर्धारित कार्यक्रम बाधित होइत रहल । आ पहिल दिनक कार्यक्रम तऽ जेना तेना ठिके रहल । दोसर दिनक कार्यक्रममे बेसी कठिनाई भऽ गेलै । बारह घण्टाक बैसार । विचार गोष्ठी आ कार्यपत्रक बीच सम्मानक कार्यक्रम । डा. बुद्धिनाथ मिश्र खिसिआ गेलाह एहना स्थितिमे हम नहि आएब । मनीष जी चुपचाप सहैत रहला , निर्मिमेष भावें ।
उदघाटनक बाद सम्मानक अवसर आएल । आयोजनक दोसर स्तम्भ अशोक चौधरीक हाथें मिथिला विभूति सम्मानसँ हमरा सम्मानित कएल गेल । निरन्तर फोनपर बनल मनीष जी एको क्षण मञ्चपर नहि बसि पौलाह । एम्हर सँ ओम्हर दौडैत । सभकेँ चित्त भरैत ।
आ से आबहु कालमे ककरो दुखी नहि कएलखिन्ह । आन कार्यक्रमसभ जकाँ अतिथिकेँ विदाई काल हर हर खट खट नहि भेल । सभ प्रसन्न भऽ घुरलाह मनीष जीक सक्रियता, व्यवस्था आ उदार हृदयक प्रशंसा करैत ।
हुनक आग्रह जे काठमाण्डूमे हम हुनका अएबाक संयोग जुड़बियनि, हमरा पर भार अछि , देखी कहिया ई अवसर अबैत अछि ।


 
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
http://videha.co.in/Ramesh%20ranjaan%20jha.JPGरमेश रञ्जन

मैथिली बालनाटक सीमा विस्तार करैत — ‘चौआरि

प्राध्यापक परमेश्वर कापड़िक चौआरि नाटक सङ्ग्रह उत्कृष्ट पाण्डुलिपीक रुपमे विद्यापति पुरस्कार कोषसँ पुरस्कृत भऽ चुकल अछि । विद्यापति पुरुस्कार कोष वर्ष ०६८क प्रतिस्पर्धामे आएल विभिन्न विधाक पाण्डुलिपीमेसँ चौआरिकेँ पुरस्कृत करबाक निर्णय कएने छल । पुरस्कृत नाट्य सङ्ग्रह प्रकाशित भऽ रहल अछि । ई प्रसन्नताक विषय अछि ।
http://videha.co.in/Chauaaer%20Vimochan.JPGhttp://videha.co.in/Chauaair%20ke%20photo%202.jpghttp://videha.co.in/Chauaair%20ke%20photo.jpg
मैथिलीक यशस्वी प्राध्यापक तथा त्रिभुवन विश्वविधालय मैथिली विभागाध्यक्ष परमेश्वर कापड़िक रचनामे बाल आकर्षण रहलन्हिें । ओ बालमन आ बालपनसँ रचनाक जटिलतम प्रक्रियासँ यात्रा करैत छथि । तें स्वाभाविक आ यथार्थ घटनाक्रम सहितक रचना करबाक हुनका लग दक्षता छन्हि ।

वस्तुतः नेपालक मैथिली साहित्यक अवस्था देखल जाए तँ बाल साहित्यक अवस्था सन्तोषजनक नइ मानल जा सकैए । ताहूमे बाल नाटक लेखन तँ नहिए जकाँ भेलैए । एहनमे निरन्तर बाल नाटक लेखन कऽ कऽ ओ मैथिली साहित्यक दुर्वल पक्षकेँ सवल बनएबाक प्रयत्न कऽ रहल छथि । ताहू दृष्टिए ई कृति महत्वपूर्ण अछि ।

बहुतरास विद्वान कहलन्हिें आ हमहूँ कहैत छी जे कोनो नाटकक पूर्णता रङ्गमञ्चपर गेलाक बादे होइत छै । अर्थात नाटकक कसौटी छै मञ्च । एहि नाटकक मादे हमरा लग जे सूचना अछि ताहि आधारपर ई नाटक रङ्गमञ्चपर अखनिधरि नइ चढ़ल अछि । अर्थात प्रर्दशन पक्षकेँ परिक्षण होएब बाँकी छै । मुदा ई सर्वमान्य सत्य छै जे कोनो नाटकक सिर्जनक बहुआयामिक रुपके आरम्भ लेखन कार्यसँ होइत छै तें अहि नाटकक ताहि रुपमे विवेचना होएबाक चाही ।

जखन बाल नाटकक हमसभ बात करै छी तँ स्वाभाबिक रुपें ई प्रश्न जनमैत छै जे सामान्य रंङ्गमञ्च आ बच्चाक हेतु रंङ्गमञ्चमे की अन्तर छै ? एकर सौन्दर्यक स्तरपर विवेचना करबाक प्रयत्न होइत रहल अछि । मुदा सौन्दर्यात्मक स्तरपर रंङ्गमञ्चकेँ पृथकपृथक आयुवर्गक लेल पृथकपृथक रंङ्ग व्याख्या नइ कएल जा सकैए । कलाक दृष्टिए ई विभाजन असंभव छै । बच्चाक हेतु तैयार हुअऽवला प्रर्दशनमे ओहने शोध, कल्पना आ सौन्दर्यक आवश्यकता होइत छै । कोनो प्रकारक सिमीतता वा वाध्यात्मकता बाल रंङ्गमञ्चकेँ कमजोर बनौतै । एहनसन अवस्थामे रंङ्गप्रेक्षककेँ भूमिका महत्वपूर्ण भऽ जाइत छै । बाल दर्शक बिनु आग्रह आ वयस्क दर्शक पर्याप्त पूर्वाग्रहसँग नाटक देखबाक लेल अबैत अछि कापड़िजीक ई नाटक बच्चाद्वारा मात्र प्रर्दशन होमए जोग नाटक अछि ? अथवा बच्चाद्वारा अभिनित बच्चा दर्शक हेतु ? अथवा सभ उमेर समूहक लेल ओतबे उपयोगी अछि ? निश्चये एहि आधारपर विवेचन अत्यन्त दुरुह छै , मुदा समान्यतः ई कहल जा सकैए जे बच्चाक हेतु नाटक रचना कएनिहारक आत्मा बच्चासन होएब अनिवार्य अछि । ओ लेखक बच्चासँ प्रेम करैत होइक आ बाल प्रतिक्रियाकेँ आदर ।

कोनो लेखककेँ अपन जीवन अनुभव आ अनुभूति लेखनकर्मकेँ दिशा प्रदान करैत छै । जाहि परिवेशमे पलैतबढैत अछि तकर सौन्दर्य आ कुरुपताकेँ सुक्षम विशलेषण रचनाकेँ सहो अर्थवान बनबैत छै । परमेश्वर कापड़ि मिथिलाक सुच्चा ग्रम्य जीवनक अनुभूतिज्ञ छथि । हुनक अनुभूति मिथिलाक गामक सीमाकेँ अतिक्रमण नइ करैत छै । ओहि चौहद्दीक अन्तर विशिष्टताक सँग ओ रचैबसै छथि ।

अहि नाटक सङग्रहमे ले बलैया हिलोरि कऽबच्चा सभ घोंघाँउज आ झगडादनसँ नाटक आरम्भ होइत अछि । पढ़ाइ ग्रामिण मिथिलाक कोनो ने कोनो रुपमे सभ वर्गक हेतु अनिवार्य भेल जा रहल छै । मुदा विधालयीय संस्कार आओर पारिवारिक संस्कारक बिचमे एकटा पैघ विषमता छै । जीवनक यथार्थ परिवशकेँ अस्वीकार कऽ कऽ कोनो तरहक औपचारिक शिक्षा पूर्णता दिस नइ जा सकैए । जीवन सुन्दर होइ छै, ओ कखनो अपरोजक आ अभद्र लागि सकै छै मुदा ओकर अन्तर सुन्दरता ओतबे निर्मल आ पवित्र होइ छै । अपना परिवेशगत यथार्थकेँ अस्वीकार कऽ कऽ कोनो विकासक्रम आगू नइ बढलैए । एहने कथावस्तुपर नाट्य सिर्जन कएल गेल अछि । हमरा बुझने नाट्यकार कने बेसिए वाल विधार्थीक हेतु शैक्षिक सामग्रीक प्रयोग कऽ देने छथिन । भाषाक स्तरपर सेहो अत्यन्त अस्वभाविक संवाद छै । मुदा नाटकियता बेजोड़ छै ।

चोआरि नाटक सङ्ग्रहमे नाटक एलौ परिक्षाक पात्र, परिवेश आ कथ्य कोनो स्तरपर ग्राम्य सीमाक भंजन नइ करैत छै । मुदा लेखक अपन वौद्घिकता जतऽजतऽ प्रयोग करै छथि नाटकक गतिमे अवरोध अबै छै । परीक्षाक समयमे मात्र गम्भिर होएबाक वा परीक्षाकेँ भयावह अतंक जकाँ प्रस्तुत करबाक आम मनोविज्ञानकेँ नाट्य रुप देबाक क्रममे नाटक सम्प्रेषणक आधार संवाद बनैत अछि । कथाक सहज प्रवाहमे आरोपित सन्देश देबाक प्रयत्न सेहो छै । यथार्थवादी शैलीक ई नाटक रोचक छै, मुदा कथा, घटनाक्रम आ कथोपकथनमे विश्वासक संकट सेहो छै । बच्चाक बोलीमे प्रौढ़ताक प्रक्षेपण भेल छै । संवाद पात्रक उमेर आ परिपक्वतासँ बेसी प्रौढ़ भेलाक कारण अस्वाभाविक सेहो बुझाइत छै । जे नाटकक शौष्ठवकेँ क्षति करैत छै । अंग्रजी भाषाक अनावश्यक मोहसँ बचब जरुरी छलै । ग्राम्य भाषाक प्रयोगमे एकरुपता अहि नाटककेँ अओर शक्तिशाली बना सकै छलै ।

अहि सङ्ग्रहक दोसर नाटक छै बोनिपर। किछु वर्ष पहिनेक नेपालक मिथिला क्षेत्र अभाव, गरिवी आ प्राकृतिक विपदाक संगम स्थल छल । सामन्तवादी चेतना, राज्य व्यवस्थामे एक जातीय वर्चस्व आ छुआछुत, भेदभावक चरम रुप भयावह छलै । निम्नवर्ग हिनतावोधमे जिबैत छल । ओ वर्ग ने सपना देखै छल आ ने सपनाकेँ सकार होएबाक कोनो आधार छलै । नियतवादी चेतना मिथिलाक श्रमिक वर्गक मूल चरित्र बनि गेल छलै । नाटककार परमेश्वर कापड़ि बोनिपर नाटकक माध्यमसँ ओहि वर्गक अवस्था चित्रण मात्र नइ केलन्हि अछि । आोहि वर्गमे भऽ रहल परिवर्तन संकेतकेँ सेहो चिन्हित केलन्हि अछि । ओकर सपना आ यथार्थकेँ सुन्दर नाट्य रुप । खास कए ओहि वाल पात्रक माध्मसँ मिथिलाक श्रमिक वर्गक आङ्गनक यथार्थ त्रासदीकेँ स्थापित करब निश्चये विलक्षण अछि । अपना आङ्गनक पीड़ासँ परिचित ओ बालचरित्र सामाजिक अवस्था आ परिवर्तनक अपेक्षाकेँ सहज आ प्रवृतिगत अभिव्यक्ति दैत अछि । बच्चामे अनुकरणक बेजोड़ क्षमताक सेहो ई नाटक एकटा वानगी बनि गेल अछि । जाहि विषयकेँ अत्यन्त गम्भिर आ जटील संरचनाक माध्यमसँ नइ कहल जा सकै छलै ओ बातकेँ खेलखेलमे बच्चा कहि दैत छै । कखनो बुझाइत छै, सामाजिक परिवर्तन, सत्तामे सहभागिता आ स्वयंकेँ भागिदार बनएबाक प्रक्रियाक अते विशिष्ट विचार अहि बालपात्रक माध्यमसँ कहाएब अनुचित तँ नइ छै । मुदा ओ पात्र अपना इर्दगिर्दक सुगबुगाहटकेँ अकानै छै, सामाजिक उथलपुथलकेँ प्रत्यक्षदर्शी बनै छै आ खेलक माध्यमसँ ओहिकेँ सिर्जनात्मक साँचामे ढालै छै । मने बच्चाक मनोचेतनाक अन्तर यात्रा नइ कएनिहार एहन नाट्य सिर्जना नइ कऽ सकैए । प्राध्यापक परमेश्वर कापड़िक ई कृति हुनक परिवेशगत विशिष्टता आ बालचेतनाक अन्तर अध्येताक सिर्जन प्रतिफल मानल जएतनि ।

तेसर नाटक लील्लामे गील्ला काण्ड। मिथिलाक पारम्परिक खेलमे धार्मिक मीथक अद्भूत प्रयोग भेल अछि । राम, सीता वा रावणसन चरित्रकेँ बालमन बुझैत अछि लीलाक माध्यमसँ । लीलामे वर्णित पात्रकेँ अनुकरण करबाक क्रममे नाट्यरुप ग्रहण करैत अछि । आ ओ पात्रसभ समाजक समकालीन चरित्रकेँ स्थापित करैत अछि । समाजिक अवस्थिति, विद्रुपता, विडम्वनापर बाल नाटकक माध्यमसँ मारुक प्रहार होइत अछि । विकृतिजन्य विषयकेँ सेहो अत्यन्त सहजताक सँग प्रक्षेपित करैत अछि आ समाज गलत परम्परापर व्यंग्य करैत अछि । धार्मिक मीथक सजीव, सहज आ नव भावभूमिमे व्याख्या भेल अछि अहि नाटकमे । अहि बालनाटकमे स्त्री विमर्शक बात हएब चकित करै छै । अपना आङ्नमे महिला हिंसा अनेको रुप देखैए बच्चासभ । पुरुष आ महिलाप्रतिक सामाजिक आ पारिवारक दृष्टिकोणक ओ प्रत्यक्ष अनुभूति करैए । ओकरा सभमे अक्रमकता आ सहनशीलताक मनोविज्ञान ओहि तरहें निमार्ण होइ छै अथवा विद्रोह सेहो ओएह रुप छै जे सामान्यतः पुरुषवादी समाज निर्धारण कएने छै । करुण आ छटपटी छै जाहिमे संधर्षसँ बेसी निरिहता छै । इएह छै मिथिलाक नारीक अवस्था । ताहूमे निम्नवर्गिय परिवारक नारी तँ आओर ही्रसक पुरुषक सामना करक लेल वाध्य अछि । अहि यथार्थकेँ अत्यन्त सहजताक सँग धार्मिक मीथ आर आम प्रर्दशनक माध्यमकेँ नाट्य अर्थात लीलाक माध्यमे प्रकटीकरण भेल अछि ।

प्रा. परमेश्वर कापड़िक साहित्यकेँ बुझबाक लेल आवश्यक भऽ जाइत छै जे पाठक आ कि दर्शक लोक मर्मज्ञ हुअए । लोक आचारविचार आ कि संहिता नइ बुझनिहारक हेतु हुनक साहित्य बुझबामे दुरुहता अनुभूति हेतै । मिथिलाक बच्चाक बात करी तँ खेल, गीत, फकड़ा आ कथापिहानीसँ सीधा संगति होइत छै । आधुनिक जीवनक सांस्कृतिक प्रदुषणक प्रभाव किछु वर्ष पहिने धरि मिथिलाक निम्न वर्गिय समुदायक आङ्गनमे प्रवेश नइ कएने छलै । एहनमे ओहि आयुमे प्रविष्ट कएल विषयप्रसंङ्ग सदैवक लेल मनोमष्तिष्कमे सुरक्षित रहि जाइत छै । बालमनकेँ अत्यन्त जिज्ञासु कहल गेलैए । ओ सम्पूर्ण कथापात्रकेँ बुझबाक आ अपनहिं ढंगसँ विशलेषण् करबाक हेतु प्रवृति रहैए । अहि नाटकमे ओहि समयकेँ ओ यथार्थपरक ढंगसँ पकड़लनि अछि । बच्चाक सिर्जन संसारकेँ बुझबाक आ ओहिकेँ गहींरगर अन्वेषण माध्यमसँ नाट्य सिर्जन करबामे ओ सफल भेलाह अछि ।

अहि सङ्ग्रहक चारि गोट नाटकक परिवेश, पात्र, चरित्र, आ कथोपकथन, दृश्यवन्धमे खास नविनता आ विविधता नइ अछि । नाटककार नाटक अन्त करबाक हड़बड़ीमे छथि । विषय क्रम अहिं तरहें अबै छैक जेना एक्के नाटकक चारि टा दृश्य होइक । नाटक संरचनाक स्तथर परम्परासँ पृथक तँ नइ अछि मुदा समाजिक मूल्य आ विघटनक अवस्थाकेँ नव अर्थ जरुर प्रदान करैए ।

कोनो नाटककेँ सम्प्रेषणीयताक हेतु विभिन्न नाट्य तत्वक प्रयोग होइत छैक । मुदा नाटककार कथ्यकेँ नाट्य रुप देबाक क्रममे संवादकेँ आधार बनौलन्हि अछि । बच्चा शरीर क्रियाक माध्यमसँ बहुतरास अभिव्यक्ति देबऽमे सक्षम रहैत अछि । बहुतो खेलमे शरीर भाषाक उन्नत रुप देखल जा सकै छै । अहि नाटकसभमे खेलक मौलिक रुपकेँ भितरमे नाट्य अवस्थितिक निमार्ण आ कथ्यकेँ संयोजित करबाक प्रयत्न होएबाक चाही छलै जे नाटककेँ अओर कलात्मक, प्रभावकारी आ शिल्पगत नविनता दिस लऽ जइतै।

नाटकमे सभसँ बेसी बहश हुअऽवला पक्ष अछि संवाद । संवाद कहबाक नाट्यकारक अपन विशिष्टता छन्हि । अहि परिवेशक ओ मात्र अवलोकनकर्ता नहि भोक्ता छथि । तें भाषाक स्तरपर ई नाटक मैथिलीक सुच्चा नाटक बनल अछि । कोनो बातक ग्रहण करबाक आ प्रक्षेपण करबाक मौलिक रुप आ भाषा छै । प्रशिद्व नाटककार महेन्द्र मलंगिया छोटछोट संवाद आ शक्तितशाली पात्रोचित भाषा गढ़िकऽ मैथिली नाटककेँ उच्चता प्रदान केलन्हि । ई कहब अनुचित नइ जे हुनक परवर्ती बहुतरास नाटककारपर मलंगियाक संवादशैलीक प्रभाव छै । कापड़िजीक पात्र ओहिना छोटछोट मुदा शक्तिशाली संवादक माध्यमसँ नाटककेँ प्रभावकारी बनबैत छथि ।

नाटकक संवादकेँ रुपमे किछु एहन शव्दकेँ प्रयोग भेलैए जकरा गाड़ि कहल जाइ छै । मैथिली समाज आ शव्दकोषमे ओ शव्द गाड़िक रुपमे चिन्हित अछि । मुदा ई पहिल बेर नाट्यकार परमेश्वर कापड़ि मात्र प्रयोग केलन्हि से बात नइ छै । सभ्य समाज आ ऐ समाजक रुचिअरुचि साहित्यक मापदण्ड एकटा खास खण्डमे निर्धाित करैत रहलै । मुदा साहित्यक मर्यादाक नामपर ओहि परम्पराकेँ ढोइत रहबाक प्रयोजन समाप्त भऽ गेल छै । तखन प्रशन ई जरुर छै जे पात्र, परवेश, कथ्य आ घटनाक्रम नाट्यभाषाक निमार्ण कऽ रहल छै कि नाट्यकार । जे नाटककार कथित अपशव्द बलात नाटकमे लएबाक प्रयत्न करै छै तँ ओ दोष जरुर छै । मुदा विशिष्ट नाटकीय अवस्थामे विशिष्ट नाटकीय भाषा मात्र नाटककेँ मुखर आ सान्दर्भिक बनौतै । अहि नाटकक पाठक आ नाट्यदर्शक भाषाक समूचित कि अनुचित ? अहि पर वहश विवेचन करए ।

नेपालक समकालीन मैथिली साहित्यमे लेखन गति अत्यन्त सुस्त अछि । तेहनसन अवस्थामे कापड़िजीक नाट्य सङ्ग्रह अहि भाषाक नाट्य परम्परा आ विकासक्रमक एकटा कड़ीक रुपमे खास महत्व राखत । अहि नाटकक मञ्चन अखनधरि नइ भऽ सकब निश्चित रुपें दुर्भाग्य अछि । मैथिली भाषी क्षेत्रमे बहुतरास नाट्य संस्था सक्रिय अछि, जाहि संस्था सभक लेल ई नाटक अत्यन्त उपयोगी भऽ सकै छलै । आबहु संस्था सभकेँ प्रर्दशन दिस आकृष्ट होएबाक चाही खास कए बहुतरास निजी आ सरकारी विधालय सभ अखनो शिक्षाक नामपर अत्यन्त धोकन्त विद्या दिस उन्मुख अछि । विद्यार्थीक समग्र वौद्विक विकासक हेतु सिर्जनात्मक चेतनाक विकास कतेक अपरिहार्य छै से बुझि अहि नाटक सभकेँ विधालय सभमे प्रर्दशनक उचित व्यवस्थापन कएल जा सकैत अछि ।
प्रर्दशन नाटककेँ पूर्णता प्रदान करै छै मुदा प्रर्दशनक मुहतक्कीमे नाटक लेखनपर विराम नइ देल जा सकै छै । नाट्यपाठ सेहो साहित्यक अन्य कोनो विधासँ प्रभावकारी आ संवेदनशील सिर्जन भऽ सकै छै । तें नाट्य लेखनक कोनो तरहक अवरोधकेँ अस्वीकार करैत सिर्जनशील सक्रियताकेँ स्वीकारल जाए । हम नाट्यकारक नाट्य विधामे निरन्तर सक्रिय लेखनक अपेक्षा रखैत मैथिली बाल नाट्य साहित्यकेँ श्रीवृद्विमे हुनक योगदान होइत रहए से कमना सेहो करब ।

अन्तमे महाकवि विद्यापति पाण्डुलिपी पुरस्कारसँ पुरस्कृत चौआरि नाटक सङ्ग्रहक पाण्डुलिपीक हेतु हार्दिक वधाइ । ई पोथी मैथिली नाट्य संसारमे जरुर आदर पाओत ताहि अपेक्षाक सँग ।

[
रमेश रञ्जन नेपाल सङ्गीत तथा नाट्य प्रज्ञाप्रतिष्ठान, कठमाण्डूक प्राज्ञ परिषद सदस्य छथि । ]


 
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'विदेह' २३० म अंक १५ जुलाइ २०१७ (वर्ष १० मास ११५ अंक २३०)

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