Wednesday, April 03, 2013

'विदेह' १२६ म अंक १५ मार्च २०१३ (वर्ष ६ मास ६३ अंक १२६) PART II



http://videha.co.in/Jagdish_Prasad_Mandal.JPGजगदीश प्रसाद मण्डल



रत्नाकर डकैत
(एकांकी नाटक)




जगदीश प्रसाद मंडल




पुरुष पात्र-

  1. रत्नाकर-        60 बर्ख।
  2. महेश-          55 बर्ख।
  3. सुरेश-         55 बर्ख।
  4. गणेश-         25 बर्ख।
  5. भजन लाल-     48 बर्ख।
  6. मि‍सर लाल-     48 बर्ख।
  7. रमण लाल-      48 बर्ख।
  8. मोजे लाल-      60 बर्ख।
  9. बर्वरी-          25 बर्ख।
  10. सुग्रीव-         35 बर्ख।
  11. हनुमान-        25 बर्ख।

नारी पात्र-
    
  1. शबरी-         60 बर्ख।
  2. हरेलही-        40 बर्ख।
  3. बि‍सरलीही-      45 बर्ख।




पहि‍ल दृश्‍य-
(मोजेलाल गरदनि‍मे ढोल, हाथमे लकड़ीक बजौना, नेने आगू-अागू आ भजन लाल पाछू-पाछू।)

मोजे लाल-     (डंका जकाँ बजबैत, कनी काल ढोल बजा, बन्न करैत) नगर-नगर, डगर-डगरसँ गाम-गामक, समाज-समाजक भाए-बहि‍न, काका-काकी, दादा-दादी‍ सभसँ कहै छी, सुनै- जाउ। भजन भाय अहाँ सबहक सोझहामे छथि‍ ओ कहता।

भजन लाल-    गाम-समाजक जे भाए-बहि‍न छी कान खोलि‍ सुनू। जँ नै सुनब आ पछाति‍ कहब जे तेना कान गुजि‍या गेल जे से सुनबे ने केलौं। से नै हुअए।
           
मोजे लाल-     (पुन: जागब ध्‍वनि‍मे ढोल बजा) भजन भाय, अपन वि‍चार कहि‍यौ। 

भजन लाल-    काल्हि‍ भाेरेसँ रत्नाकर भैया ऐठाम पुण्‍योत्‍सव छि‍यनि‍, सएह कहए एलौं अछि‍। छपुआ कार्डक आशा नै करब।

मोजे लाल-     भाय सहाएब, छपुआ कार्ड कि‍ कहलि‍ऐ?

भजन लाल-    आब देखै छी जे गामसँ, परि‍वारसँ एते तक कि‍ बाप-माएसँ करोड़ो योजन दूर छी मुदा बेटा-बेटीक जन्‍मोत्‍सव मना हजारो-लाखाे कार्ड जतए-ततए बि‍लहि‍ दइ छि‍ऐ। मुदा...।

मोजे लाल-     मुदा कि‍?

भजन लाल-    यएह जे पहि‍ने छँटि‍आबए पड़त जे कोन कार्ड हकार सदृश अछि‍ आ कोन भारक संग भोजनक अछि‍। ई तँ नै जे जान ने पहचान, हम तोहर मेहमान

मोजे लाल-     (एक धुन ढोल बजबैत नचबो करैत आ गेबो करैत)
            नोत एलै हौ भैया, हकार एलै हौ
बेन डोलबैत बेना एलै, पीपहीक मुस्‍कान एलै हौ।
फड़-अहि‍वर फड़ बि‍लहि‍ बाँटि-बाँटि‍‍
ज्ञानी-जोगी, डकैत भैया रत्नाकर हौ।
            (दोहरा-तेहरा, ढोलो बजबैत आ गेबो करैत।) असथि‍र होइत-
भजन भाय, नोत-हकारक ढोलहो छी, तँए दोहरा-तेहरा कऽ कहि‍यौ?

भजन लाल-    से की?

मोजे लाल-     जहि‍ना सोना भेटनौं आ हरेनौं प्राश्चि‍त करबए पड़ै छै तहि‍ना ने नतो-हकार छी। सरही आमक पीपही नीक-नीक कलमी डारि‍क जोड़ पाबि‍ नाता जोड़ि‍ सरही-सँ-कलमी बनि‍ जाइत अछि‍ तहि‍ना ने नतो जोड़ल जाइत अछि‍। ई तँ नै ने जे फुर्सत दुआरे ए.टी.एम.क माध्‍यमसँ नोत पूड़ि‍ लेब।

भजन लाल-    से की?

मोजे लाल-     यएह जे कोनो बि‍आह छै आकि‍ मूड़न आकि‍ कोनो आन छोट-पैघ जज्ञ, जखने काज परि‍वारसँ ऊपर उठैत अछि‍ तखने ने परि‍वारसँ उठल सोच-वि‍चारक जरूरत पड़ैत अछि‍, जौं अहाँकेँ अपनेसँ छुट्टी नै हएत तँ केना पछुआएल लोक अहाँ संग सम्‍बन्‍ध बना सकत।

भजन लाल-    जहि‍ना तूँ मोजे लाल बि‍नु खति‍आनक मालि‍क तहि‍ना हम भजना। हरक लागनि‍सँ लऽ कऽ खौजरा-खौजरी चटकबैत वीणाक ओहन स्‍वर समुद्रमे पहुँच जाइ छी जे घंटाे भरि‍ लाड़नि‍ चलौलो पछाति‍ अन्नक लाबा चमकि‍-चमकि‍ खापड़ि‍सँ कूदि‍ माटि‍पर अबैत अछि‍।

मोजे लाल-     भाय सहाएब, अहाँक बात सभ नै बूझत?

भजन लाल-    जहि‍ना भाँटा गाछमे लटकि‍ जीवन यात्रा करैत तहि‍ना मुड़ै माटि‍क तरेमे जीवन यात्रा करैत अछि‍, तँए ओकर जि‍नगीक कोनो महत नै? की ओ जीवनदाता नै छी?

मोजे लाल-     भाय सहाएब, बूढ़ भेने अहाँ भँसि‍या जाइ छी?

भजन लाल-    से केना?

मोजे लाल-     हम तँ गाम-घरसँ शहर बजार धरि‍ ने घुमै छी। जाबे बजार नै बनत ताबे चौकीदार केना फड़त। देखै छि‍ऐ बड़का-बड़का बरि‍आतीमे इंजन गाड़ीक पति‍आनी लगल, तइमे छौड़ा-छौड़ी सभ अपन गाड़ी जोड़ि‍ देत आ भरि‍ राति‍ खा-पी उमैक लइत।
            (ढोलक अवाज सुनि‍ गामक मि‍सर लाल आ रमण लाल अबैत, दुनूकेँ देखि‍ते पाशा बदलैत)
नोत एलै हो भैया, हकार एलै हो....
(मोजे लालकेँ चुप होइते भजन लाल मि‍सर लाल दि‍स तकलक। भावात्‍मक दृश्‍य। केना मि‍सर लालक थरथर कँपैत मन कि‍छु बाजए चाहैत, तहि‍ना भजन लालक पि‍यासल पथि‍कक दृश्‍य इत्‍यादि‍...।)

भजन लाल-    (मि‍सर लालसँ, आेंगरी तानि‍ बाँहि‍ उठा) अहाँ कि‍छु बाजए चाहै छी?

मि‍सर लाल-    हँ।

भजन लाल-    तखन मुँह कि‍अए चोरौने छी। अपना वि‍चारकेँ काज रूपमे दुनि‍याँक बीच नै राखब तँ के केकर कि‍ नीक केलकै तइ आशामे अपनाकेँ राखब। मन असथि‍र कऽ बाजू। ओना अखन उत्‍सवक समए लगि‍चाएल अछि‍ तँए नीक हएत जे अहूँ सभ कपड़ा-लत्ता साफ कऽ ली, केश-दाढ़ी, जुत्ता-चप्‍पल ठीक-ठाक करैमे जते समए लागत तइसँ बेसी समए आब थोड़े अछि‍।

मि‍सर लाल-    (कँपैत) भाय-सहाएब, उत्‍सवमे एहेन तँ ने मंच बनत जे श्रीमान्-श्रीमती होइत-होइत बजैक समैये ओरा जाएत तखन तँ जहि‍ना भोजमे सभ दि‍न धकि‍आइत-धकि‍आइत एेँठार लग पहुँच जाइ छी तहि‍ना।
(बि‍च्चेमे मोजे लाल डि‍गरी चालि‍मे ढोल बजबए लगैए)

भजन लाल-    भाय सहाएब, ने अहाँक बात हमरा धऽ लेत आ ने धड़ैक डर होइए मुदा पैघ काजक आगू छोट काजकेँ कि‍छु वि‍लमा देब नीक होइ छै। नइ, जँ अहाँ बड़ धड़फड़ाएल छी तँ चलू रस्‍ता पकड़ि‍ संगे-संग। काजो चलतै आ भजनो-कीर्तन चलतै।
           
(तइ बीच रमण लाल मि‍सर लालकेँ डपटैत बाजल)
रमण लाल-     बजैले जे सतमसुआ बच्‍चा जकाँ पेटमे उधकै छौ से दाबि‍ कऽ राख नै तँ कहि‍ दइ छि‍औ।

मि‍सर लाल-    कि‍ कहमे, जे कहैक छौ से भने तेहल्‍लाक बीच छँहेँ बाज?

रमण लाल-     अपन बाप-पुरखाक नाआें बूझल छौ? अपन कि‍छु बुझले ने छौ तँ दस गोरेमे की बजबीही।

मि‍सर लाल-    जखन दुनू गोरे संगे रहै छी तखन तूँ पहि‍ने ने कि‍अए चेता देने छेलेँ?

रमण लाल-     तूँ पुछलेँ कहि‍या?

मि‍सर लाल-    अँइ रौ, बि‍नु पुछनहि‍ भरि‍ दि‍न संगे रहै छी। तहूमे जे नजरि‍पर चढ़बे ने कएल से केना पुछबो।

रमण लाल-     अँइ रौ, कि‍ तोरा बूझि‍ पड़ै छौ जे जहि‍ना आरती घुमा लोक भगवानकेँ ठकि‍ भरि‍ राति‍ इजोत मि‍झा अन्‍हारेमे रखै छन्‍हि‍, हम तेना तोरा केलि‍औ।

भजन लाल-    देखू, अहाँ सभ अनेरे अनघोल करै छी। कौल्हुका काज कि‍ सभ अछि‍ से मन पाड़ए दि‍अ।
(सभ जाइत अछि‍)
पटाक्षेप।


दोसर दृश्‍य-

            (भजन लाल, मि‍सर लाल आ रमण लाल आ सुरेश अबैत अछि‍।)
भजन लाल-    भाय, दुनि‍याँक खेल अजीब छै। जेना समुद्रमे जाइठ‍-सीमा नै होइ छै तहि‍ना ने अछि‍। ऐ अथाह माटि‍-पानि‍ बीच टपैक तीनू बाट तेहेन भऽ गेल जे...?

मि‍सर लाल-    भाय, चुप कि‍अए भेलौं?

रमण लाल-     भजन भाय, दि‍लेरक संग दि‍लक जखन भेँट होइ छै तखन एकटा नव अएनाक रंग चढ़ै छै। तँए मुँहक बात घोँटी नै, नइ पचए तँ उगलि‍ दि‍ऐ।

भजन लाल-    (वि‍स्‍मि‍त होइत) भाय, एकटा बाट, तेना बनरा गेल जेना गाछ-वि‍रीछमे होइ छै जे कोढ़ि‍यो-बाती देब छोड़ि‍ दैत अछि‍। दोसर दोगलाइये गेल। तेसर बेटाक रगड़ामे बुढ़ाड़ी धरि‍ वस्‍त्रधारि‍ये रहला सुखदेव जकाँ आड़वन-कोपीन नै लेलन्‍हि‍‍। खएर, जे होउ...। पहि‍ने बैसैक ओरि‍यान करू।
(मि‍सर लाल सतरंजी मोटरी खोलि‍ पसारए लगैत, तीनू गोटे तीन काेण पकड़ि‍ बीछा, जाजीम बि‍छबैत अछि‍। बि‍छान तैयार होइते रत्नाकर मंचपर अबैत अछि‍।
माथमे तीन भीरी केश बान्हल, चानि‍पर तीन लकीर, दुनू दि‍स उजड़ा बीचमे लाल। दाढ़ी-मोछ भयंकर। बाँहि‍ गरदनि‍मे रूद्राक्षक माला, दहि‍ना हाथमे कमंडल, पीढ़ीपर लंगोटामे बान्‍हल पुरान कमलक मोटरी।

(रत्नाकरक प्रवेश।)
(मंचपर रत्नाकरकेँ अबि‍ते तीन गोटे पाछू-पाछू सेहो नारा लगबैत)
रत्नाकर भैया,
जि‍न्‍दावाद।
रत्नाकर भैया
जि‍न्‍दावाद।

रत्नाकर-       (पाछू घुमि‍) सोझे हल्‍ला केने आ नारा लगौने नै हएत। चुप-चाप सभ भऽ जाउ। बेरा-बेरी अपन-अपन जि‍नगीक बात-वि‍चार समाजकेँ सुना दि‍यनु। धर्मराजक न्‍याय भेटत, नै कि‍ यमराजक।

महेश-        भाय सहाएब, अपनेक जीवन यात्रा बहुत नमहर अछि‍ ओते सुनैले ओतेक नि‍चेनि‍योँ चाही ने, से भूखल पेट कतेकाल सुनि‍ अमल करत। जइ इलाकामे साले-साल रौदी, दाहीक संग उपजाउ माटि‍ नष्‍ट भऽ गेल अछि‍ तइ इलाकाक यात्री कते दूर जीवन यात्रा कऽ सकैए?

रत्नाकर-       कि‍ मतलब?

महेश-        भूखे भजन ने होइ गोपाला।
लि‍अ राखि‍ गुरु कण्‍ठी माला।

रत्नाकर-       महेश, अहाँक प्रश्न जेहने सुन्‍दर अछि‍ तेहने कठि‍न। मुदा समुद्रसँ रत्न नि‍कालब आ जंगलसँ सि‍र-शि‍रोमणि‍ आनब, दुनू दू दि‍शा छी।

गणेश-        एना नै हएत, कनी ओंगरीपर (ओंगरीपर जेना हि‍साब जोड़ल जाइत) हि‍साब बैसा कऽ बुझा दि‍अ।

रत्नाकर-       गणेश बाउ, कान खोलि‍ सुनि‍ लि‍अ। ई धरती वि‍शाल रंगमंच छी। माटि‍-पानि‍क बीच रंगमंच सजल अछि‍। जे जेहेन यात्री छथि‍ ओ ओहेन अपन बाट पकड़ि‍ पाड़ करै छथि‍।

गणेश-        कि‍ मतलब?

रत्नाकर-       मतलब यएह जे कि‍यो अपन जि‍नगी हवन दैत छथि‍‍ तँ कि‍यो दोसराक हवन लैत अछि‍। खएर, जे होउ...।

(बि‍‍च्चेमे, मि‍सर लाल अपन बात उठबए चाहलक आकि‍ सुरेश ललकि‍ बाजल)
सुरेश-        अनेरे...।

रत्नाकर-       तखन पहि‍ने फरि‍छा लि‍अ पड़त जे खाइले जीबै छी आकि‍ जीबैले खाइ छी। दान देब नीक आकि‍ लेब नीक। आकि‍ लेब-देब नीक। आकि‍ देब-देब नीक।

गणेश-        लेब-देब नीक छी। दुनू नीक छी। कोनो ने नीक ने अधला छी।

भजन लाल-    तखन?

गणेश-        बेवहारि‍क धरातलपर जे अधि‍क नीक हुअए?

भजन लाल-    अधि‍कोक दू दि‍शा छै?

गणेश-        से की?

भजन लाल-    अधि‍क लोकक शाब्‍दि‍क वि‍चार आकि‍ अधि‍क लोकक जि‍नगीक वि‍चार।

रत्नाकर-       भजन जेहने तूँ साँझ भोर राति‍-दि‍न लय-धुन बदलि‍-बदलि‍ एके बातकेँ औंटै-पौड़ै छह तेहने गणेश छथि‍‍। भारी देखि‍ हाथी चढ़ब नीक बुझलन्‍हि‍‍, मुदा हाथी केना पोसाइत अछि‍ से लूरि‍ये ने भेलन्‍हि‍।

गणेश-        (खि‍सि‍या कऽ, दहि‍ना हाथ ऊपर घुमबैत) तीन लकीर हम दइ छी, ताधरि‍ हम नै मानब जाधरि ओहन भोगी नै आनि‍ देखा देब।

रत्नाकर-       हकार दि‍अए तोहीं ने भजन गेल छेलह, तँए तोरे ने ओहेन हकरि‍यासँ भेँट भेल हेतह?

भजन लाल-    भैया, बुढ़ोमे अहाँ ओहने अगुताह रहि‍ गेलौं जेहने समरथाइमे छेलौं।

रत्नाकर-       (मुस्‍की दैत) हे बुड़ि‍वक, केतबो धड़फड़ा कऽ काज करबह, तँए कि‍ काज पहि‍ने थोड़े भऽ जेतह। काजक जे अपन समए छै ओइ अनुकूल जे करैत अछि‍, ओ कुशल भेल। मुदा...।

सुरेश-        मुदा की?

रत्नाकर-       यएह जे जँ धड़फड़ा कऽ करब तैयो आ अलुरि‍ये करब तैयो या तँ आरो गजपटा जाएत वा उबाणि‍ भऽ जाएत।

सुरेश-        सु-वाणि‍योँ तँ भऽ सकै छै कि‍ने?

रत्नाकर-       संयोगवश, नि‍श्चि‍त नै।

भजन लाल-    (धड़फड़ाइत) भैया, अहाँ अनेरे कोन घंघौजमे लगि‍ गेलौं, मोतीबला सि‍तुआ दोसर होइ छै भलहिं नाओं कि‍यो रखि‍ लि‍अए।
(भाव दृश्‍य) ने कि‍छु रत्नाकर बजैत, मुदा चेहरा कहैत समुद्रक सि‍तुआ आ बरसाती डबराक सि‍तुआ एक वि‍यान केना करत। एक अजर-अमर बीच जीवन-यापन केनि‍हार, दोसर तीन मास ढेनुआर तीन मास रखलाहा, मि‍ला छह मास। (भजनलाल हराएल मुद्रामे बड़बड़ाइत)
मनमे रहि‍तो साँझ-भाेर ओहए गबै छी।
(सबहक मुद्रा अपन-अपन वि‍चारानुकूल। सभसँ भि‍न्न मि‍सरलालक। जेना कि‍छु बजैले मुँह लुस-फुस करैत, तहि‍ना।)
(मि‍सर लालकेँ लुस-फुसाइत देखि‍ सुरेश बजलाह)
सुरेश-        मि‍सर लाल अहाँ कि‍छु बाजए चाहै छी?

मि‍सर लाल-    (दुनू हाथ जोड़ि‍) हँ, भाय सहाएब। हमरा सन लोककेँ बजैक एहेन समए कहि‍या भेटत?

गणेश-        (बिगड़ि‍ कऽ) मि‍सर लाल जौं तोरा बजैक छह तँ जल्‍दी बाजह, अखन धरि‍ चाहो ने भेल अछि‍। तेलि‍या-फुलि‍या लगा-लगा नै बजीहह, घोंच-घाँचमे दू-चारि‍ कड़ी दबि‍ जाइ छै। जइमे अमीन चाेर फड़ि‍ जाइ छै।

भजन लाल-    माने?

गणेश-        माने यएह जे जखन बाँसक सोझका लग्‍गा छलै, मोट-पातर रहि‍तौ लग्‍गी लग्‍गीये छलै तखनो धूर कट्ठा नम्‍हरे छलै। चास-बास घटने तखन इंच-फीटमे पहुँचल। मुदा नपैक यंत्र तेहेन स्‍प्रींगदार भऽ गेल जे केमहर कि‍ भऽ जाइ छै जे थाहे ने पबै छी।

रत्नाकर-       समैपर धि‍यान रखू। भजन देरी कि‍अए होइ छह?

मि‍सर लाल-    भाय सहाएब, दुनि‍याँक रीति‍क अनुसार दुरागमनक अपनो कर्तव्‍य बुझलि‍ऐ। तीनि‍येँ सालमे दूटा बेेटी भऽ गेल।

गणेश-        अपरेशन कि‍अए ने करा लेलौं, जखन दुइये बच्‍चाक कोटा छै?

मि‍सर लाल-    भाय सहाएब, सुनै छि‍ऐ समलौंगि‍क सम्‍बन्‍ध। ओइ कटौतीसँ कोटा नै पुरतै?

रत्नाकर-       आगू बाजू?

मि‍सर लाल-    भाय सहाएब, मन अपनो दुनू परानीक सएह भेल। देखै छी जे एकटा बेटी-बि‍अाहमे जि‍नगी भरि‍क कमाइसँ पारो नै लगै छै, तइठाम दूटाक भार तँ बेसी भेबे कएल।

रत्नाकर-       (मुड़ी डोलबैत) हँ से तँ भेल। तखन...।

मि‍सर लाल-    (अठन्नी हँसी हँसैत) दूटा ओही बीच भऽ गेल, जइ बीच फड़ि‍छेबे ने कएल जे दुनूमे के अपरेशन करबी।

भजन लाल-    तखन...?

मि‍सर लाल-    ओही झंझटि‍क समए दूटा आरो भऽ गेल।

भजन लाल-    एक गण्‍डा भेल?

मि‍सर लाल-    गाहीमे एक कमे अछि‍।

रत्नाकर-       पछाति‍?

मि‍सर लाल-    माइक कानमे अपरेशनक समाचार पहुँचते मधुमाछीक गीत जकाँ गबैत दि‍न-राति‍ एके सोखर गबैत हमरा मौसीकेँ तेरहटा बेटी रहै से पार-घाट लगबे केलै आ एकरा सभकेँ चारि‍ये टामे ढट्ठा ढील होइ छै।

सुरेश-        (मुस्‍की दैत) से तँ ठीके। पछाति‍ की भेल?

मि‍सर लाल-    तत्‍काल भाइक बात मानि‍ गेलौं। अपनो दुनू परानी वि‍चारलौं जे जँ कहीं माइयो-बापक असीरवादसँ आगू बेटे बेटा हुअए।

गणेश-        (खि‍सि‍या कऽ) ईह बूड़ि कहीं केँ, हम एते दि‍न-राति‍ तबाह रहै छी से धि‍या-पुता डरे बि‍आहो ने केलौं आ हि‍नका मुनहरक मुँह खुजि‍ गेलन्‍हि‍‍‍।

(गणेशकेँ क्रोधि‍त देखि‍ मि‍सर लाल ठहाका दैत)
मि‍सर लाल-    (धुनधुना कऽ) बपजेठ जकाँ केहेन गरमी छन्‍हि‍। मुदा जोरसँ कि‍छु नै बजलाह।

भजन लाल-    मि‍सर भाय, एना जे ि‍तलकेँ तार बनेबह तते समए नै अछि‍। जल्‍दीमे अपन बात अन्‍त करह?

ि‍मसर लाल-    हकार दइले जे गेल छेलह से कहने छेलह जे अपन बात धड़फड़ा कऽ बाजि‍ दि‍हक।

रत्नाकर-       देखू वि‍चार दू ढंगे लोक करैए, औपचारि‍क आ अनौपचारि‍क। अनौपचारि‍यो औपचारी बनैए मुदा बीचमे शासकीय सूत्र आबि‍ जाइत अछि‍। अच्‍छा आगू...।

मि‍सर लाल-    हि‍साब जोड़ि‍ लेलि‍ऐ किने। दूटा दुनि‍याँ रीति‍क अनुसार, दूटा दुनू परानीक झगड़ा-मि‍लान, मि‍लान-झगड़ामे।

गणेश-        जते कुल-खनदानक खति‍आन-बही छह से अखने उन्‍टा दहक। रसगुल्‍लाक आसामे कचौरि‍यो सुखि‍ कऽ टाँट भऽ गेल हएत।

मि‍सर लाल-    गणेश बाबू, अपने लग नै बाजब तँ बाजि‍ कतए पाएब। कनी धि‍यानसँ सुनि‍ दृष्‍टि‍-कूट खोलि‍यौ। तखन ने भाँज पेबै।

भजन लाल-    मि‍सर भाय, तों तते ने मेठनि‍ करै छह जे कुशि‍यारो रसकेँ मि‍सरी बनाइये कऽ छोड़बहक।

मि‍सर लाल-    अच्‍छा हुनडे भेल। अखन धरि‍ सात बेटी बला सत बेटि‍या नाओं ग्रहण कऽ नेने छलौं।

रत्नाकर-       पछाति‍?

मि‍सर लाल-    (जेना बि‍ढ़नी कटलापर छटपटाहि‍ होइत) एह भाय सहाएब, की कहब। (दुनू हाथ माथपर लैत) भोरे-भोर एकटा एकरंगा आएल।

भजन लाल-    के रहए?

मि‍सर लाल-    कहलक जे घर तँ अही इलाका अछि‍ मुदा कामाख्‍या सीख छी। हमहूँ एक बेर कामाख्‍या गेल छी। रूपैया हाथे महरानीक दर्शन होइ छै ओतए।

रत्नाकर-       आगू बढ़ू।

मि‍सर लाल-    भाय सहाएब, सबा सए रूपैयाक रसीद काटि‍ हाथमे थमहा देलन्‍हि‍‍‍। हाथमे एकोटा पाइ नै। बि‍नु खेवाक यात्री जकाँ घटवार लग वि‍नती केलौं।

गणेश-        (झोकमे) कि‍ वि‍नती केलौं?

मि‍सर लाल-    कहलि‍यनि‍, बाबा महराज, बेटीक मारि‍सँ मरि‍ गेल छी केना अहाँकेँ खुश कऽ कऽ दरबज्जापरसँ वि‍दा करब।

गणेश-        तखन कि‍ भेलह?

मि‍सर लाल-    ओ जेना बूझि‍ गेला। लगले आँखि‍-ताँखि‍ उनटबैत-पुनटबैत कहलन्‍हि‍‍। जते तोरा बेटी छह तते तोरा एक्केबेर बेटा देबह, बाजह मंजूर छह?

गणेश-        पछाति‍ कि‍ केलह?

मि‍सर लाल-    मन पघि‍ल कऽ राँग-राँग भऽ गेल। मुदा घरवाली धरि‍ कहि‍ देलक जे ई ठकहरबा छी।

गणेश-        पछाति‍ कि‍ भेलह?

मि‍सर लाल-    जे तकदीरमे लि‍खि‍ देने छेलि‍ऐ, से भेल।

गणेश-        हमहीं लि‍खि‍ देने छेलि‍यह।

मि‍सर लाल-    सभ दि‍न भागवत बचै छी अहाँ आ नाओं लगेबे दोसरकेँ।

भजन लाल-    उत्‍सव शुरू होइक समए करीब आबि‍ गेल। जाबे तैयार हएब ताबे समैओ आबि‍ जाएत।

पटाक्षेप।



तेसर दृश्‍य


(मंच। सतरंजी-जाजीमक ऊपर मसलन। रत्नाकर, भजन लाल, मोजे लाल, मि‍सर लाल, रमण लाल, गणेश, सुरेश, सभ बैस उत्‍सवक चर्च करैक वि‍चार करि‍ते रहथि‍ आकि‍ बर्वरीक प्रवेश।)

बर्वरी-        (मंचपर ठाढ़ भऽ) भाय-लोकनि‍, ई बात बि‍ल्‍कुल झूठ छी जे जइपर बि‍सवास करब से फल भेटबे करत?
           
(बीचमे गणेश ठाढ़ भऽ)
गणेश-        (खि‍सि‍या कऽ) ईह, बूड़ि‍ कहीं कऽ, हि‍नका कतौ खच्‍चरपन्नीक गर नै लगलन्‍हि‍‍‍ तँ हहाएल-फुहाएल एतै चल एलथि‍।

बर्वरी-        हाथीक बगए बना लेलह तँ की बूझि‍ पड़ै छह जे हम बड़ बुतगर छी। तोहँए ने ओइ दि‍नसँ मंचपर कहैत एलह जे जेकरा मनमे जेहेन बि‍सवास रहत ओ ओहन फल खाएत। बड़ मने-मन फल खेनि‍हार भेला अछि‍! बूड़ि‍ कहीं कऽ!!

गणेश-        मुँह समेटि‍ कऽ बाजह जे कहलि‍ऐ से कहि‍ते रहबै। से तहि‍यो कहलि‍ऐ आ अखनो कहै छि‍ऐ।

बर्वरी-        पहि‍ने एकटा बात कहि‍ दाए जे केकरो हाइ-ब्‍लड-पेसर होइ छै आ केकरो लो-ब्‍लड-पेसर होइ छै, दुनूक एक्के कारण हेतै। तोरे सनक पट्टा पेटबला ने एक्के कहतै।

गणेश-        (शर्टक बहुँआँ समटैत) तखन फरि‍छाइये लैह।

            (भजन लाल गणेशकेँ पकड़ि‍ बैसौलक। मुदा बर्वरी बड़वड़ाइत रहल..)
बर्वरी-        जेकरा बीत-बीत भरि‍क हाथ-पएर छै आ पट्टा सन पेट आ हाथी सन मुँह रखने अछि‍, से केना भऽ गेलै आ अपन पेट काटि‍...।

भजन लाल-    (बर्वरीक दुनू हाथ पकड़ैत) वि‍धि‍वत उत्‍सवक श्रीगणेश हुअ दहक।

रत्नाकर-       आश्वासन दहुन?

भजन लाल-    वि‍धि‍वत उद्घाटनक पछाति‍ पहि‍ल वक्ता अहाँ हएब।

बर्वरी-        (वि‍स्‍मि‍त होइत) जइ बातक बि‍सवास पुस-पुसतानि‍सँ करैत एलौं, अखन धरि‍ कहाँ भेल!
            (ललकि‍ कऽ) आइ हम ओइ भवि‍ष्‍यवक्‍ता लोकनि‍सँ पुछै छि‍यनि‍, कि‍अए ने भेल?
रत्नाकर-       (हाथक इशारा दैत) हमरा लग आउ। कि‍यो ने सुनताह तँ हम सुनब। जोरसँ बाजऽ अबैए ि‍कने?

(रत्नाकरक बात सुनि‍ बर्वरी सहमि‍ गेल।)
बर्वरी-        जोरसँ बाजब धि‍या-पुताक खेल छी।

(तइ बीच, एक गोटे गि‍लासमे पानि‍, एक गोटे लड्डू नेने गणेशक आगू पहुँच गेल।)
गणेश-        (खि‍सि‍या कऽ) ऐ पानि‍ आ लड्डूसँ थोड़े मन थीर हएत। तेहेन छुछुनरि‍ ने बाट कटलक जे...।

बर्वरी-        ईह, बूड़ि‍ कहीं कऽ, गोलका लड्डू देखि‍-देखि‍ सनकी केहेन चढ़ल जाइ छन्‍हि‍।

(कार्यक्रमक प्रारंम्‍भ। अध्‍यक्षक प्रस्‍ताव। बहुसंख्‍यक समर्थक।)
अध्‍यक्ष-       स-बन्‍धुबान्‍धब, छि‍ड़ि‍आएल दुनि‍याँ एक मंच छी। जे कि‍यो ऐ धरतीपर जन्‍म लेलौं, सबहक अधि‍कार बनैत अछि‍ जे ऐ मंचपर सबमानि‍त कलाकार बनि‍ अपन अधि‍कारक रक्‍छाक संग शान्‍त भऽ शान्‍ति‍सँ शक्‍ति‍ भरि‍ दोसरोक जि‍नगीकेँ तकति‍यान करबै? तइले वक्‍ताक बजला पछाति‍ प्रश्नो ने पुछब उचि‍त हएत।

बर्वरी-        नै अध्‍यक्ष महोदय, अखन धरि‍क मंचक मंचन जे ऐ तरहेँ होइत आएल अछि‍ जे श्रीमान्, श्रीमती करैत-करैत कार्यक्रमक समैये समाप्‍त भऽ जाइए, तँए...।

गणेश-        (बैसले-बैसल ओंगरी देखबैत) बीचमे कतएसँ एहेन अकलहूथ चल आएल हौ?

बर्वरी-        (दोसर दि‍स घूमि‍ कऽ) हाथीक कपार हि‍नकर आ अकलहूथ हम। बड़का डारि खाइबला मुँह हि‍नकर आ अकलहूथ हम। बूड़ि‍ कहीं कऽ, पहि‍ने अपन बात बाजह जे कोन गामक छह।

            दुनू हाथसँ दुनू गोटेकेँ शान्‍त करैत अध्‍यक्ष-
अध्‍यक्ष-       रत्नाकर भैयाक वि‍चार छन्‍हि‍ जे गामक तेहेन दशा भऽ गेल अछि‍ जे एको दि‍न चैनसँ रहब कठि‍न भऽ गेल अछि‍, तँए एहेन गाममे नहि‍येँ रहब नीक।

महेश-        महजालक गीरह बनौने काज नै चलत। कनी सोझरा कऽ कहि‍यौ।

भजन लाल-    भाय, सोझराएले तँ अछि‍ जे जेकरा महजालक कोन खोलैक लूरि‍ भऽ जेतै ओ सौंसे महजाल खोलि‍ लेत।

बर्वरी-        कार्यक्रम शुरू होइसँ पहि‍ने आश्वासन भेटल छल जे पहि‍ल वक्‍ता अहाँ हएब। तइ बीच अहाँ सभ ओझरी लगा समए ससारए चाहै छी, से नै चलत।

गणेश-        बजाओल आएल छह आकि‍ बि‍नु बजाओल हौ?

बर्वरी-        से तोरा पुछैक कोन दरकार छह। हकरि‍याकेँ पुछहक जे केना आएल छी।

गणेश-        (माथपर हाथ मारैत) जेकरा जे मन फूड़ै छै से करैए। आब बुझथुन जे सहरगंजा केहेन होइए। रहड़ि‍या जकाँ दालि‍क बीच राहरि‍ बग-बग करैए कि‍ने।

अध्‍यक्ष-       अहूँ बड़ रगड़ी छी गणेश। जानि‍येँ कऽ तँ बुझै छी जे बर्वरी बोनैया जकाँ गमैया लोक छि‍या, एते तँ वि‍चार करए पड़त कि‍ने?

मि‍सर लाल-    अनौपचारि‍क ढंगे हमर सबाल पेश भऽ गेल तँए पहि‍ने ओकर ि‍नर्णए भऽ जाए तखन दोसरपर वि‍चार कएल जाए।

अध्‍यक्ष-       पहि‍ल आश्वासन मि‍सर लालक छन्‍हि‍। एकर लगले पछाति‍ बर्वरी अहाँकेँ समए भेटत।

महेश-        मि‍सर भाय, एकटा बात नै बूझि‍ पेलौं जे बेटी एते भारी बनि‍ केना गेल जे परि‍वारे सभ उजड़ैए?

सुरेश-        एकटा बात कहू जे गाममे सभसँ पहिने बि‍आह पद्धति‍पर कुड़हरि‍ के मारलन्‍हि‍‍‍!

मि‍सर लाल-    (ओंगरीपर हि‍साब जोड़ैत) ओइ टोलमे फल्लाँ एक लाख बेटा बि‍आहमे लेलक आ फल्लाँ दू लाख आ फल्लाँ पनरह लाख आ फल्लाँ पचास लाख, दू करोड़क गप तँ महि‍ना दि‍न पहि‍ने फल्लाँ केलक।

बर्वरी-        मि‍सर लाल भायक प्रश्न समसामयि‍क छन्‍हि‍, जरूर पहि‍ने वि‍चार हेबाक चाही।

महेश-        बाउ, बर्वरी, बालु परक अल्हुआ खेती नै बुझू। हँ, तखन वि‍चारणीय प्रश्न जरूर अछि‍।

बर्वरी-        आजुक दि‍न जे वि‍चार नै हएत तँ कहि‍या भेलै जे फेर हेतै।

महेश-        (रत्नाकर दि‍स इशारा करैत) भाय सहाएब, जखन अपने मौजूद छथि‍, अध्‍यक्षजी आगूमे छथि, तइठाम पहि‍ल ि‍नर्णायक हम केना हएब। सामूहि‍क ि‍नर्णए हेतै। बेसी-सँ-बेसी, खण्‍डन-मण्‍डनमे अपन वि‍चार राखि‍ सकै छी।

अध्‍यक्ष-       मि‍सर भाय, अहाँक प्रश्नपर कि‍छु आरो वि‍चारक खगता रहि गेल अछि‍, से भेला पछाति‍ जबाव भेटत।

बर्वरी-        अध्‍यक्षजी, पछि‍ला बैसारमे हम नै रही, हमरा कि‍छु ने बूझल अछि‍, हम केना अपन वि‍चार राखब।

अध्‍यक्ष-       बर्वरी, संक्षेपमे पछि‍ला सुना देल जाएत।

बर्वरी-        जे बि‍न्‍दु वि‍चार करैले रहि‍ गेल, बि‍नु बुझने तइ सम्‍बन्‍धमे कथी‍ सोचब। हरबड़ी बि‍आह‍ कनपटी सि‍नूर हएत, जहि‍यासँ शुरू भेल, तहि‍येसँ लोक रस्‍ते-पेरे घटकैती करए लगल।

अध्‍यक्ष-       वि‍चारणीय प्रश्न अछि‍, जइ समाजमे कर्म-धर्म रूपमे छल, ओइ समाजमे कर्मक स्‍थान धन केना लऽ लेलक। प्रति‍ष्‍ठा प्राप्‍त करबाक जे कसौटी छल, तइठाम बि‍आहमे दहेजक आगमन केना प्रति‍ष्‍ठा बनि‍ स्‍थापि‍त भेल।

बर्वरी-        एकटा प्रश्न हमरो अछि‍?

गणेश-        जेकरा जे मन फुड़तै से बाजि‍ देत, दरबारक बैसककेँ रण्‍डीखाना बना देत?

बर्बरी-        (बौहुँआँ समटैत) हौ गणेश, जइ धरतीपर प्रकृति‍ पुरुष-नारीक संयोग सथापि‍त कऽ सृष्‍टि‍क दि‍शा पौलन्‍हि‍‍‍, तइ संग छेड़-छाड़ कतए सँ शुरू भेल?

भजन लाल-    देखू अनेरे अहाँ दुनू गोरे बखेरा ठाढ़ करै छी, एके भगवान भूखल-पेट आ भरल पेटमे बँटाएल छथि‍। गणेशजी केँ ईहो नै पता छन्‍हि‍ जे थारी-थारी मोती-चूरक गोलका लड्डू, तहूमे आब मनही सेहो बनए लागल अछि‍ से तँ राता-राती सठि‍ जाइ छन्‍हि‍ जे प्रात भने टटके चाही।

अध्‍यक्ष-       एना जे इनारेमे भाँग घोड़ि‍ देबे भजन भाय, तखन तँ भेल।

भजन लाल-    भाय, अपने अध्‍यक्ष छि‍ऐ, हम तँए छगुन्‍तामे पड़ल छी जे अखन तक ईहो नै बूझि‍ पेलौं जे के सुतले सूतल सूर-ताल मि‍ला भजैए आ के बोनैया नढ़ि‍या जकाँ बोनेमे भजैए।

अध्‍यक्ष-       सभ प्रश्न वि‍चारणीय अछि‍। बैसारकेँ ताधरि‍ बढाओल जाएत जाधरि‍ सबहक ि‍वचार नै हेतै। चाह-पानक समए भऽ गेल। रत्नाकर भाय, अगि‍ला सत्रक आवाहन करताह।

रत्नाकर-       जहि‍ना माटि‍-पानि‍ मि‍लि‍ ई दुनि‍याँ ठाढ़ केने अछि‍, देखते छि‍ऐ कतौ माटि‍ बेसी तँ केतौ पानि‍ बेसी। मुदा तइ संग ईहो अछि‍ जे माटि‍क सतहे-सतह सेहो पानि‍ मि‍लल अछि‍ आ कतौ पानि‍क समुद्रकेँ अपना छातीपर रखने सेहो अछि‍।

बर्वरी-        भाय सहाएब, केना-केना परत बनल छै से कनी फरि‍छा दि‍औ नै तँ देव बनत कि‍ पाथर आकि‍ पाथरेक देब, ई कठि‍न भऽ जाएत।

रत्नाकर-       अहाँ अपन प्रस्‍ताव दि‍औ?

बर्वरी-        जहि‍या बेटा भेल रहए तहि‍या तते खुशी भेल जे दशरथे जकाँ हुअ लगल जे सभ कि‍छु बाँटि‍ दि‍ऐ। मुदा...।

गणेश-        एना घोंच-घोंचा लगा बाजब, तँ हम उठि‍ कऽ चलि‍ जाएब।

बर्वरी-        कतए जाएब औतै ने महाभारतक सौवा श्‍लोकपर? ओतए तक रबाड़ि‍ कऽ जाएब। हँ भाय-सहाएब, कहै छलौं, ओही घुमशाहीमे एकटा पंडा एला। बच्‍चोक हाथ देखलन्‍हि‍ आ अपनो दुनू परानीक।

सुरेश-        कनी असथि‍रसँ बाजू जे कि‍ कहलन्‍हि‍ ओ पंडा?

बर्वरी-        (वि‍ह्वल होइत) ओ तँ मनेमे सड़ैए। जइ बेटाक खाति‍र एतै केलौं, कतए गेल ओ सेवा? भाय सहाएब कते कहब। जइ बेटा पाछू पमरि‍या, हि‍जरा, बकुनि‍याँ..., कि‍-कि‍ ने नचेलौं, कते कबुला-पाती आ कि‍-कि‍ ने केलौं...।
(बजैत-बजैत कानए लगैत) आइ ओ अबंड, महा अबंड, ि‍दन-राति‍ शि‍खर-पान, ताड़ी-दारू कि‍-ि‍क ने खाइए आ करैए। हमर बुढ़ाड़ी केना कटत?

रत्नाकर-             अखन खाइ-पीबैक समए भऽ गेल। काल्हि‍ रहलै काल्हि‍ आरो बेसी गप-सप हेतै।

पटाक्षेप।


चारि‍म दृश्‍य-

(बैरक डरि‍सँ सजल। वन सदृश मंच। शबरीक घर। मुसहरनीक बगएमे शबरी।
बाढ़नि‍सँ आंगन बहारि‍, बाढ़नि‍ राखि‍ एकटा बर्तनसँ चाउर नि‍कालि‍ सूपमे लऽ शबरी आँकर बीछैत।)
शबरी-        केहेन जुग-जमाना आबि‍ गेल, एक तँ महगक चाउर कीन कऽ लाउ, तइमे तते उजड़ा पत्‍थरबला आँकर रहै छै जे एको कौर घोटब पहाड़ भऽ जाइ छै।

(गणेश आ भजन लालक प्रवेश। एक भाग शबरी अपना आंगनमे सूपक चाउरमे आँकर बीछैत। दोसर दि‍स गणेश-भजनलाल)
गणेश-        भजन भाय, अहीं कहू जे बड़बड़ि‍या जे लप-लप बजै छलए से उचि‍त भेल?

भजन लाल-    गणेश भाय, की उचि‍त आ की अनुचि‍त! से ऐ दुनि‍याँमे ताकब कठि‍न अछि‍। तँए अनेरे अहूँ कि‍अए मत्‍थापचीमे लागल छी, जखन-जहि‍या जे भेल ओ तँ भूतक गर्भमे चलि‍ गेल, तइले अनेरे...।

गणेश-        नै भजन भाय, आदमीकेँ अपनो सीमा-सड़हद, आड़ि‍-धूरक होश रहबाक चाही, जँ से नै भेल तखन ओ मनुक्‍ख केना भेल।

भजन लाल-    गणेश भाय, कि‍ करबै, जँ कि‍यो अपना महींसकेँ कुरहैरि‍येसँ नाथत तेकर सुख-दुख तेकरे हेतै ने। तइले अनका कि‍?

गणेश-        कहलौं तँ बड़ सनगर बात मुदा जँ मनुष्‍य सएह बूझि‍ दोसरसँ सम्‍बन्‍ध हटबए लगत तखन दुनि‍याँमे रहि‍ये कथी जाएत।

भजन लाल-    गणेश भाय, जहि‍ना पोखरि‍-धार, समुद्र पानि‍क भंडार छी मुदा ओहूमे कि‍ सगतरि‍ एके रंग पानि‍ रहै छै। तहि‍ना ने मनुक्‍खोक बीच छै।

(तइ बीच बर्वरीक प्रवेश। बर्वरीकेँ देखि‍ते गणेश बजैए)
गणेश-        भजन भाय, जाधरि‍ ई दुनि‍याँ रहत ताधरि‍ अपना सबहक सम्‍बन्‍ध अहि‍ना बनले रहत। देखते तँ छि‍ऐ जे एक्के भगवानक हजार नाओं अछि‍। जेकरा जे मन फुड़ै छै से कहै छै। तइले भगवानकेँ कि‍ बि‍गड़लन्‍हि‍।

बर्वरी-        गणेश बाबू, अपन बात बूझल अछि‍ जे अनका कहै छि‍ऐ?

भजन लाल-    बर्वरी, जँ तात्वि‍क दृष्‍टि‍सँ गप-सप्‍प करी तँ यएह धरती स्‍वर्गोसँ ऊपर उठि‍ सतलोक, वैकुण्‍ठ, सूर-लोक बनि‍ सकैए आ ओहनो बनि‍ सकैए जे नर्क, धोर नर्क, वेश्‍यालय इत्‍यादि‍ सेहो बनि‍ जाइत अछि‍। तँए...।

गणेश-        बर्वरी, सुनू अहाँसँ कोनो देहा-देही दुश्‍मनी नै अछि‍। मुदा भवि‍ष्‍यक लेल नीक हएत, जे पछि‍ला सभ कि‍छु जानि‍, अाड़ि‍ बान्‍हि‍ भवि‍ष्‍य दि‍स संगे-संग चली।

भजन लाल-    तखन, पछि‍ला फरि‍च्‍छोट कइये लि‍अ। मुदा फरि‍च्‍छोट हएत केना गणेश भाय। अहीं कहू जे सोरहा बि‍आन करैबला मूस केना हाथी सनक देहक सवारी भेल। तालमेल केना बैसाएब।

बर्वरी-        अहाँ तँ भजन भाय अनेरे बौआइ छी। हि‍नका पुछि‍यनु जे कतौ अहाँकेँ महादेवक बेटा लोक बुझैए आ कतौ अहाँक पूजा महादेव पार्वतीक बि‍आहमे होइए।

भजन लाल-    बर्वरी भाय, गणेश भाइक कान हाथीक कान छि‍यनि‍, बड़का कोठामे जहि‍ना कनि‍योँ जोरसँ बजलापर गनगना उठै छै तहि‍ना कानमे झड़ पड़ए लगै छन्‍हि‍। तँए जे कि‍छु बजैक हुअए कम जोरसँ बाजू।

गणेश-        अच्‍छा छोड़ि‍ दइ छि‍ऐ। एक तँ गमैआ लोक भेल दोसर कहुना भेल तँ बाले-बोध भेल कि‍ने।

बर्वरी-        गणेश भाय, जे कि‍छु जोरसँ बजलौं ओ आवेशमे बजा गेल। अहाँ सन आवेशीकेँ जँ आवेश नै करी तँ केकर करी।

भजन लाल-    (ओंगरीसँ देखबैत) गणेश भाय, ई बोन कथीक छि‍ऐ?

गणेश-        बोन तँ बोन छि‍ऐ। तइमे तोहर की‍ कहब छह?

भजन लाल-    बैरक बोन छि‍ऐ। लगसँ देखलापर बूझि‍ पड़त जे एकरा तोड़ैमे कते भीर होइ छै। तहूमे नमहर गाछमे।

गणेश-        बर्वरी बाउ, सुनू। पहि‍ने ई कहू जे बेलक कते गाछ लगौने छी।

बर्वरी-        (मजबुरीक अवस्‍थामे) भाय-सहाएब, अपना गाछी-बि‍रछी लगाएब से जगहो रहए तब ने।

भजन लाल-    गणेश भाय, सवाल बहकि‍ गेल फलपर-सँ-माटि‍पर चलि‍ एलौं। पहि‍ने फलक बात फड़ि‍छा लि‍अ तखन आगू बढ़ब।

गणेश-        भजन भाय, मि‍थि‍लांचलक हस्‍तरेखा बेलक संग मेटाएल जा रहल अछि‍।

बर्वरी-        अहाँकेँ एते दया कि‍अए लगैए, बेलपाते ने जाएत फूल-अच्‍छत तँ रहबे करत?

गणेश-        नीक सुझाओ देलौं बर्वरी। बेल सन फलक महात्‍म्‍य गबै-बजबैले ने अखबारबलाकेँ समै छै आ ने रेडि‍यो स्‍टेशनकेँ। वैज्ञानि‍क लोकनि‍ सहजे वैज्ञानि‍के छथि‍, रौकेटसँ नि‍च्‍चा देखबे ने करै छथि‍। जे बेल, दुनि‍याँक उच्‍च कोटि‍क फलमे अग्रि‍म स्‍थान रखनि‍हार छी, ओकर कि‍ स्‍थि‍ति‍ अछि‍...।
(बजैत-बजैत गणेश आँखि‍ मूनि‍ लेलन्‍हि‍।)

बर्वरी-        गणेशजी, अलि‍सा रहला अछि‍। कतौ ठौर घड़ू।

(चारो दि‍स, दुनू गोरे -बर्वरीओ आ भजन लालो- तकैत)
भजन लाल-    गणेश भाय, एकटा खोपड़ी आगू देखै छी, चलू ओहीठाम आरामो करब आ गपो-सप्‍प हेतै।
(तीनू आगू बढ़ैत...)

भजन लाल-    मायराम, हम सब कि‍छु समए वि‍श्राम करब। तइले जगह भेटितए?

शबरी-        (वि‍स्‍मि‍त होइत) अहाँ सभ के छी, कतऽसँ एलौं।

गणेश-        अभ्‍यागत छी, गाम-ठेकानक कोन जरूरत अछि‍।

शबरी-        अभि‍यागती नै धाड़ैए।

गणेश-        कि‍अए?

शबरी-        सैह नै बूझि‍ पाबि‍ रहल छी।

गणेश-        हाथ बढ़ाउ, हस्‍त रेखा देखए दि‍अ।

शबरी-        जारन काटैमे टेंगारीक बेंट सभटा हस्‍तरेखा चाटि‍ गेल तखन कि‍ देखबै।

गणेश-        मुहेँसँ कहू?

शबरी-        हमर पानि‍ छुबाएल अछि‍, हमर सि‍द्ध अन्न छुबाएल अछि‍, हमर-घर-आंगन छुबाएल अछि‍। छुबाएल अछि‍ इनार-पोखरि‍ आ चापाकल।

गणेश-        ठहरू, अपन इनार-पोखरि‍ छुबाएल अछि‍ आकि‍ छुबाएल अछि‍ समाजक इनार-पोखरि‍।

शबरी-        सभटा छुबाएल अछि‍। अपन छुबाएल अछि‍ एना जे आन-आन पानि‍ नै पीबै छथि‍, समाजक छुबाएल अछि‍ एना जे या तँ घाट फुटा देल गेल अछि‍ वा आगू-पाछूक प्रक्रि‍या अछि‍।

गणेश-        भजन भाय, अहाँ गुबदी मारि‍ घी पीबए चाहै छी। हमर छाती छि‍ड़ि‍आएल जाइए आ अहाँ अनठौने छी।

भजन भाय-     सभ तँ सुनि‍ते छी, तखन अपनेकेँ शंका कि‍अए भेल?

गणेश-        एकटा बातक वि‍चार दि‍अ तँ...।

भजन लाल-    कथी‍?

गणेश-        जइठाम अन्ने-पानि‍ छुबा जेतै, तइठाम अति‍थि‍ सेवा लोक केना करत? जँ अति‍थे सेवा नै करत तँ मि‍थि‍लाक धरोहर की छी?

भजन लाल-    गणेश भाय, अहूँ बड़ औगताह छी, लगले खि‍सि‍या जाइ छि‍ऐ। अहि‍ना अहाँ व्‍यासजीकेँ कहने रहि‍यनि‍ जे जखने अहाँक मुँह बन्न हएत तखने कलम रखि‍ चलि‍ जाएब।

गणेश-        ऐमे हमर गल्‍ती कि‍ भेल?

भजन लाल-    जहि‍ना सभ अपन गल्‍तीकेँ चलाकी कहै छै तहि‍ना अहूँ कहै छि‍ऐ।

गणेश-        से कि‍ यौ?

भजन लाल-    जँ अहाँ अधडरेड़ेपर लि‍खब छोड़ि‍ चलि‍ जैति‍ऐ तखन महाभारत केना लि‍खाइत?

गणेश-        उपाए?

भजन लाल-    अइले हमरा दुखे ने होइए आ अहाँ कि‍अए चि‍न्‍ता करै छी।

गणेश-        केना ि‍चन्‍ता मेटाएत?

भजन लाल-    दूटा प्रश्नक जबाव हम देब। बर्वरी अहूँ सभ बात सुनलि‍ऐ। पहि‍ने अहाँ अपन ि‍वचार दि‍अ।

बर्वरी-        पूर्वाग्रहसँ हम ग्रसि‍त छी। गणेश देवता छथि‍ हि‍नका लग केना कोन बातकेँ घटी-बढी हएत।

भजन लाल-    गणेश भाय, अहाँ नाशी पुरुष नै छी जे नाश हएब मुदा आध्‍यात्‍मि‍क चि‍न्‍तनक जे बानर-बाट अछि‍ तइसँ चि‍न्‍ति‍त भऽ जाइ छी।

गणेश-        कहलौं तँ बेस बात, मुदा...।

भजन लाल-    मुदा-तुदा कि‍छु नै। हमरा एहेन दशा लोक करैए जे गुड़क मारि‍ धोकरे जनै छी। बरहमासा कहि‍ छमासा बना दइए, परातीकेँ साँझ आ साँझकेँ पराती बना दइए तइले दुखे ने होइए आ अहाँ एतबेमे हदि‍आइ छी। ऊपर मुड़ि‍ये अछि‍ आ‍ नि‍च्‍चाँ पेटे, तँ छाती रहत कतऽ सँ।

            (रत्नाकरक प्रवेश)
            रत्नाकर अबि‍ते शबरीपर नजरि‍ देलन्‍हि‍। जहि‍ना शि‍कारी अपन शि‍कार देखि‍ नजरि‍ दैत अछि‍। अजगर साँपक आँखि‍पर पड़ि‍ते जहि‍ना आकर्षित भऽ जाइत तहि‍ना सबरीक नजरि‍।)
रत्नाकर-       (बड़बड़ाइत-हाथक इशारा, जहि‍ना तीर चलैत) ई शबरी, कुरुपक रानी, बंधन मुक्‍त शबरी...।

शबरी-        (हाथ थड़थराइत, ओंगरी उठा रत्नाकर दि‍स देखबैत) रामक रत्नाकर..., रामक रत्नाकर..., अयोघि‍या...., दशरथ...., दशरथ...., सरजुग नदी.....!!
(धीरे-धीरे दुनूक डेग आगू बढ़ैत एकठाम होइते पटाक्षेप।)
           

पटाक्षेप।



पाँचम दृश्‍य-

(मच। बड़का भायक आगूमे। छोटका तीनटा पाछू। एक रत्नाकरक आगू, दोसर गणेश आ तेसर भजन लालक आगू। रत्नाकर बीचमे, बामा भाग- भजन लाल, बर्वरी, मि‍सर लाल, मोजे लाल, दहि‍ना भाग गणेश, महेश आ सुरेश।)

अध्‍यक्ष-       उत्‍सवक अंति‍म पहरमे पहुँच गेल छी। राति‍क अंत दि‍नक शुरूआतक समए उदीयमान अछि‍। आइ अंति‍म दि‍नक अंति‍म बैसार छी। ऐमे तीन बि‍न्‍दुपर वि‍चार-वि‍मर्शक संग समापन हएत। सभसँ पहि‍ने मान्‍यवर रत्नाकर भायसँ आग्रह जे बैसारक सम्‍बन्‍धमे अपन वि‍चार राखथि‍। आगूक सुझाउ सेहो रखताह।
            (सभ थोपड़ी बजबैत अछि‍)

बर्वरी-        गणेश भाय, आब कहू मन केहेन लगैए?

अध्‍यक्ष-       बड्ड बूड़ि‍ लेकि‍न अहूँ छी बर्वरी।

बर्वरी-        से केना?

अध्‍यक्ष-       एक तँ अहूँ बूड़ि‍ छी, तइपर अपना लागल हमरो बनबए चाहै छी। आबो चुप रहू।

बर्वरी-        अँइ यौ अध्‍यक्ष भाय, बच्‍चेसँ सभ थोपड़ी बजा भजन करैत आएल छी, ततबे नै गुरुओजी वि‍द्यालयमे हाथमे माटि‍क ढेप लऽ लि‍खनाइयो सि‍खौलन्‍हि‍‍ आ जोर-जोरसँ पढ़नाइयो। ओ अभ्‍यास अखनो धरि‍ अछि‍ये, तइमे बूड़ि‍पन कि‍ भेल?

भजन लाल-    एक तँ हम अपने बूड़ी छी जे सुखेलहाक माने नै बूझि‍ सभकेँ बड़-बढ़ि‍या कहि‍ दइ छि‍ऐ, तइपर तहूँ कम नहि‍येँ छह। कि‍अए गणेश भायकेँ टोकै छुहुन। अखन मंचपर सभ छथि‍ये।

गणेश-        बड़बड़ि‍या आम जकाँ हवा सि‍हकि‍ते भरभरा जाइए, (बहुँआ समटैत) तँए आइ ओकरा मरदसँ भेँट हेतै।

अध्‍यक्ष-       गणेशजी, अपने सभ गणक ईष छि‍ऐ। बर्वरीक मुँह बन्न कऽ दि‍औ। अपन गुर-चाउर खाइत रहत, अपना सभ बैसारक कार्यक्रम दि‍स बढ़ब।

गणेश-        बौआ बर्वरी, तों कि‍अए एना बजै छह, से हमहूँ बुझै छी। एक दि‍स पावनि‍क उपासक फलहार अल्हुआ-सुथनीसँ होइत अछि‍ तँ दोसर दि‍स सेव-अंगूरसँ। तों जे कहै छह से तँ लोक हमरा अपने नाचक लेबड़ा बना नचबैए।

बर्वरी-        (दुनू हाथ जोड़ि‍ कऽ) भाय, कहल-सुनल सभ माफ कऽ ि‍दअ।

गणेश-        अबैत-जाइत रहि‍हह। हमर घर कि‍ कतौ हराएल अछि‍। मूसोकेँ कहबहक तँ पहुँचा देतह।

बर्वरी-        केना बुझबै जे राजक मूस छी आकि‍ मुसरी-टुसरी वंशक झरहा?

रत्नाकर-       बर्वरी, ई अखण्‍ड वि‍चारक मंच छी। तेकरा मर्यादि‍त करू।

अध्‍यक्ष-       हाथमे तँ मैक भाय सहाएबकेँ छन्‍हि‍येँ...।

रत्नाकर-       अखन धरि‍क वि‍चार-ि‍वमर्शसँ सूर्य वंशीय हरि‍श्चन्‍द्रक वंशक बदलाव दशरथ लग आबि‍ गेलन्‍हि‍‍...।
(तइ बीच एक भाग सुग्रीव आ हनुमान, दोसर दि‍स हरेलही आ बि‍सरलीही महि‍लाक प्रवेश। नव लोकक प्रवेशसँ रत्नाकर चुप भऽ गेलाह।)

सुग्रीव-        हमर कि‍छु अर्ज अछि‍।

रत्नाकर-       ताबे हम बैसै छी, हि‍नकर अर्जीपर वि‍चार करि‍अनु। आइ समापन छी तँए समापनक अंति‍मो समए धरि‍ जँ कोनो अर्ज पहुँचैए तँ ओकर अपन अधि‍कार बनै छै।

अध्‍यक्ष-       गणेशजी आ भजन लाल, दुनू गोटे अपनामे वि‍चारि‍ लि‍अ जे काजक संचालन केना करब?

बर्वरी-        भाय, हमरा मनक खुट-खुट्टी ताबे धरि‍ नै मेटाएत जाबे अपना लेल हम उत्‍सवक महत नै बूझब।

भजन लाल-    बर्वरी, तहूँ बड़ फुलौड़ी-ति‍लौड़ी जकाँ चि‍रौड़ी करै छेँ- बड़बड़ि‍या। बाज जल्‍दी।

बर्वरी-        भाय, अहाँ बि‍गड़ि‍ जाइ छी। खुटखुट्टी अछि‍ जे हरि‍श्चन्‍द्र सभ कि‍छु दान कऽ देलखि‍न। केकरा लेल?

भजन लाल-    अध्‍यक्षजी, बर्वरीक प्रश्नपर आगू वि‍चार हएत।

अध्‍यक्ष-       आगत लोकनि‍, चाह-पान भेलै। आब अपने लोकनि‍क आगमनपर वि‍चार कएल जाएत। क्रमश: अपन-अपन दुखरा रक्‍खू।

सुग्रीव-        बजलोरी हमर पत्नी कब्‍जा कऽ लेल गेल छथि‍...।

गणेश-        वि‍चारणीय प्रश्न अछि‍।

बर्वरी-        बि‍ना सुनने केना बुझबै जे वि‍चारबै। अहाँकेँ हाथी सन कान अछि‍ कि‍म्‍हरो-ने-कि‍म्‍हरोसँ सुनियेँ जेबै मुदा हमरा सन-सन गुजि‍एलहा कानमे फड़ केना लगतै।

भजन लाल-    गणेश भाय, अहूँ जेहने झगड़ी छी तेहने रगड़ी। रि‍धि‍-सि‍धि‍ लि‍खैक अधि‍कार अछि‍ अहाँकेँ आ छुच्‍छे मुहेँ बाजि‍ दि‍ऐ हम सभ।

गणेश-        सुग्रीवक प्रश्न छन्‍हि‍ पत्नीक हरण। मुदा हरण आकि‍ हराएल ई तँ बीचमे अछि‍ये। से केना बुझबै? पछाति‍ बुझैत रहबै। जेहेन खगता बुझौनि‍हारकेँ हेतनि‍ तेहेन काज हेतनि‍।

भजन लाल-    ठीके गणेश भाय, अहूँ मोका-मोकी नै बुझै ि‍छऐ, अनेरे सोरैहि‍या सवारी बना नेने छी।

गणेश-        भजन भाय, कतौ कि‍छु होउ, अपना सबहक संग-साथ थोड़े छुटत।

भजन लाल-    जाबे अहाँ रहब, हमरा भजै पड़त। संगी तँ रहबे करब।

गणेश-        देखि‍यौ भजन भाय, गणना कहै छै धन, जन, मन नै जानि‍ कते रंगक बनल छै। आब कोन बलजोरी भेल से बि‍ना गणना केने हेतै।

अध्‍यक्ष-       बड़बढ़ि‍या, अगि‍ला बैसार धरि‍ ऐ प्रश्नकेँ वि‍चारणीय राखल जाइत अछि‍।

गणेश-        अँए हौ हनुमान, तहूँ सुग्रीवे संग छेलहुन?

बर्वरी-        गणेश भाय-सहाएब, अपने कने चुप रहि‍यौ। पहि‍ने एकटा प्रश्न पुछए दि‍अ।

भजन लाल-    जल्‍दी बाजब बर्वरी भाय, आकि‍ अहूँ पहि‍ने मुँहमे औंट-पौड़ करै छी। तैयार भइये कऽ तप्पत भोजन कराएब।

बर्वरी-        बच्‍चेमे सूर्यकेँ गीर गेलखि‍न, से भेलन्‍हि‍‍ मुदा वि‍पति‍क काल सुझलन्‍हि‍ ने केलन्‍हि‍। अनके भरोसे डारि‍ कऽ बनरा-बनरा बाँझ-बाँझि‍न बनौलखि‍न।

अध्‍यक्ष-       दोसर प्रस्‍तावपर ि‍वचार कएल जाए?

हरेलही-       हम दुनू सहोदरे बहि‍न छी। बच्‍चेमे हरा गेलौं। संजोगसँ भेँट भेल...।

गणेश-        एते लट-पटा कऽ गीरह बान्‍हब से पार लागत, जल्‍दी कि‍अए ने केबाड़ खोलै छी।

बि‍सरलि‍ही-     अहींकेँ गणेशजी हम पंच मानै छी, अहीं कहू जे ई कहैए सहोदरे बहि‍न छि‍औ, से मुँह-कान ि‍मलैए।

भजन लाल-    गणेश भाय, कनी चश्‍मा लगा लेब।

रत्नाकर-       रोग-बि‍याधि‍सँ धरती आक्रान्‍त अछि‍। सभ आक्रान्‍त अछि‍। यएह आक्रान्‍त अंधकार छी। अही लेल प्रकाश चाही। मुदा...।

बर्वरी-        मुदा की?

रत्नाकर-       देखि‍यौ, अपना ऐठाम जे पावनि‍-ति‍हार होइत आबि‍ रहल अछि‍, ओकर मूल तत्वकेँ तेना ने ओझरा देने अछि‍ जे पार पएब कठि‍न भऽ गेल अछि‍। एकटा उदाहरण-

बर्वरी-        (बि‍च्‍चेमे) भाय, कनी सोझरा कऽ कहबै।

रत्नाकर-       साले-साल नि‍श्चि‍त मास, नि‍श्चि‍त ति‍थि‍केँ पावनि‍ अबैत अछि‍। गुण-अवगुण-गुणवेत्ता गुणता मुदा कि‍ एकरा नकारल जा सकैए जे पछि‍ला सालक जि‍नगीक नापक नवीकरणक रूपमे सेहो भऽ रहल अछि‍। अपन समर्पण अहाँक नजरि‍। अध्‍यक्षजी...।

अध्‍यक्ष-       हँ, हँ, भाय सहाएब...।

रत्नाकर-       समापनक जेहन वातावरण रहक चाही से नै रहल। रंग-बि‍रंगक नव-नव समस्‍या आबि‍ गेल अछि‍।

अध्‍यक्ष-       एक घंटा लेल बैसार उसारि‍ दइ छी।

पटाक्षेप।



छठम दृश्‍य-
      
(बैसार शुरू होइत)
रत्नाकर-       बैसारक महमही कहैत अछि‍ जे जेना वसंत हुअए। कि‍अए लोक जुआनी जि‍नगी चाहैए, बुढ़ाड़ी कि‍यो पसन्‍द कि‍अए नै करैए। अजीव तँ ई अछि‍ जे बूढ़ सम्मानि‍त शब्‍द छी, मुदा ओल जकाँ लगै कि‍अए छै।

बर्वरी-        भाय सहाएब, भाय सहाएब, (ओंगरीक इशारा करैत)..।

अध्‍यक्ष-       बर्वरी, जहि‍ना जीवन धार छी तहि‍ना सभ कथूक धार सेहो बहै छै। एके धार पहाड़सँ नि‍कलि‍ समुद्र पहुँचैत-पहुँचैत गामे-गाम नाओं बदलैत पहुँचैए।

रत्नाकर-       समाजक प्रवुद्ध लोकनि‍क बैसार छी। तँए अपन पछि‍लाक नीक-बेजाए देखैत आगूक लेल संकल्‍पि‍त होइ।

अध्‍यक्ष-       गणेश भाय, पहि‍ने अपनहि‍ अपन वि‍चार दि‍औ।

गणेश-        देखू दस-आना, छह-आना जि‍नगीमे बहुत केलौं। जेकर फल भेल कि‍सान घर छोड़ि‍ बनि‍याँ घर गेलौं। मुदा आबो नै चेतब तँ वंश कलंकि‍त हएत।

बर्वरी-        कनी सोझरा-सोझरा कहबै गणेश बाबू।

मि‍सर लाल-    बड़ बूड़ि‍ छेँ बड़बड़ि‍या तूँ। कनी चुप भऽ कऽ सुनही ने।

गणेश-        (वि‍ह्वल होइत) मजाकोसँ नमहर मजाक लोक बना देलक अछि‍। कतौ दूध पीया बोकड़बैत अछि‍ तँ कतौ मोतीचूर लड्डू खुआ।

बर्वरी-        खोंइचा कनी मोटगर अछि‍, छील दि‍औ?

गणेश-        बाउ बर्वरी, की कहब, तेहेन-तेहेन उकट्ठी सभ भऽ गेल अछि‍ जे घरसँ नि‍कलैकाल भूलि‍ जाइ छि‍ऐ। कतौ वाम-दहि‍न भेने जे दुर्घटना होइ छै तँ ओतैसँ गरियबैत रहैए जे सार गणेशबाक मुँह देखि‍ चलल छलौं।

भजन लाल-    (मुड़ी डोलबैत) भाय, दुखरा गौने हेतह। चालनि‍ दुसलक सूपकेँ जेकरा अपने हजारो छेद छै। अनके खचरपनीसँ हमर एहेन गति‍ अछि‍।

अध्‍यक्ष-       गणेशजी, सोझ डारि‍ये कि‍अए ने बजै छी जे एना घुमा-फि‍रा दइ छि‍ऐ।

गणेश-        सएह ने तारीफ अछि‍, अध्‍यक्षजी हमरामे।
            (रत्नाकरकेँ मुस्‍की दैते सभ जोरसँ ठहाका मारलक)

गणेश-        देखि‍यौ नै तँ सुनि‍यौ, दुनियाँ गोल छै। सोझो डाँढ़ि‍ ति‍रछि‍आ कऽ हटि‍ते टेढ़ भऽ जाइत अछि‍। जइसँ सामने-सामनी नै देखि‍ पड़ैत अछि‍।

पटाक्षेप
(((समाप्‍त)))

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। 

No comments:

Post a Comment

"विदेह" प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका http://www.videha.co.in/:-
सम्पादक/ लेखककेँ अपन रचनात्मक सुझाव आ टीका-टिप्पणीसँ अवगत कराऊ, जेना:-
1. रचना/ प्रस्तुतिमे की तथ्यगत कमी अछि:- (स्पष्ट करैत लिखू)|
2. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो सम्पादकीय परिमार्जन आवश्यक अछि: (सङ्केत दिअ)|
3. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो भाषागत, तकनीकी वा टंकन सम्बन्धी अस्पष्टता अछि: (निर्दिष्ट करू कतए-कतए आ कोन पाँतीमे वा कोन ठाम)|
4. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो आर त्रुटि भेटल ।
5. रचना/ प्रस्तुतिपर अहाँक कोनो आर सुझाव ।
6. रचना/ प्रस्तुतिक उज्जवल पक्ष/ विशेषता|
7. रचना प्रस्तुतिक शास्त्रीय समीक्षा।

अपन टीका-टिप्पणीमे रचना आ रचनाकार/ प्रस्तुतकर्ताक नाम अवश्य लिखी, से आग्रह, जाहिसँ हुनका लोकनिकेँ त्वरित संदेश प्रेषण कएल जा सकय। अहाँ अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर सेहो पठा सकैत छी।

"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
मुदा ई तँ मात्र प्रारम्भ अछि।
अपन टीका-टिप्पणी एतए पोस्ट करू वा अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ।

'विदेह' २२४ म अंक १५ अप्रैल २०१७ (वर्ष १० मास ११२ अंक २२४)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -    मैथिलानी केर उपराग राम सं आ समाज ...