Wednesday, April 03, 2013

'विदेह' १२७ म अंक ०१ अप्रैल २०१३ (वर्ष ६ मास ६४ अंक १२७) PART I


                     ISSN 2229-547X VIDEHA
विदेह'१२७ म अंक ०१ अप्रैल २०१३ (वर्ष ६ मास ६४ अंक १२७)India Flag Nepal Flag

 

अंकमे अछि:-

. संपादकीय संदेश


. गद्य


  





. पद्य







..http://www.videha.co.in/munnikumarivarma.jpgमुन्नी कामत फगुआ/ आनहर कानुन

 

. मिथिला कला-संगीत . http://www.videha.co.in/JyotiJhaChaudhary.JPGज्योति झा चौधरी २.http://www.videha.co.in/RajnathMishra.jpgराजनाथ मिश्र (चित्रमय मिथिला) . http://www.videha.co.in/UmeshMandal2.jpgउमेश मण्डल (मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव-जन्तु/ मिथिलाक जिनगी)

 

.गद्य-पद्य भारती:मन्त्रद्रष्टा ऋष्यश्रृङ्ग- http://www.videha.co.in/HARISHANKAR_SRIVASTAVA_SHALABHA.jpgहरिशंकर श्रीवास्तवशलभ"- (हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद http://www.videha.co.in/Vinit_Utpal.jpgविनीत उत्पल)


 

.बालानां कृते-http://www.videha.co.in/Jagdish_Prasad_Mandal.JPGजगदीश प्रसाद मण्डल- बाल उपन्यास- नै धाड़ैए

 

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ज्योतिरीश्वर पूर्व महाकवि विद्यापति। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू।

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गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज'


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संपादकीय

 
गुणाढ्यक पैशाची भाषाक वृहत् कथाक क्षेमेन्द्रक कथा मंजरी वा सोमदेवक कथासरित्सागरक अनुवाद होएबाक कथा कथा कहबाक शैली सेहो भऽ सकैए मुदा ई अनुवादक कथाक प्रारम्भ तँ कहिते अछि।
अनुवादक इतिहास बड्ड पुरान छै। कोनो प्राचीन भाषा जेना संस्कृत, अवेस्ता, ग्रीक आ लैटिनक कोनो कालजयी कृति जखन दुरूह हेबऽ लागल तँ ओइपर चाहे तँ भाष्य लिखबाक खगताक अनुभव भेल आ कनेक आर आगाँ ओकरा दोसर भाषामे अनुवाद कऽ बुझबाक खगताक अनुभव भेल। प्राचीन मौर्य साम्राज्यक सम्राट अशोकक पाथरपर कीलित शिलालेख सभ, कएकटा लिपि आ भाषामे, राज्यक आदेशकेँ विभिन्न प्रान्तमे प्रसारित केलक। भाष्य पहिने मूल भाषामे लिखल जाइत छल आ बादमे दोसर भाषामे लिखल जाए लागल।

मैथिलीसँ दोसर भाषा आ दोसर भाषासँ मैथिलीमे अनुवाद लेल सिद्धान्त: मैथिलीसँ सोझे दोसर भाषामे अनुवाद अखन धरि संस्कृत, बांग्ला, नेपाली, हिन्दी आ अंग्रेजी धरि सीमित अछि। तहिना ऐ पाँचू भाषाक सोझ अनुवाद मैथिलीमे होइत अछि। ऐ पाँच भाषाक अतिरिक्त मराठी, मलयालम आदि भाषासँ सेहो सोझ मैथिली अनुवाद भेल अछि मुदा से नगण्य अछि। मैथिलीमे अनुवाद आ मैथिलीसँ अन्य भाषामे अनुवाद ऐ पाँचू भाषाकेँ मध्यस्थ भाषाक रूपमे लऽ कऽ होइत अछि। अहू पाँच भाषामे हिन्दी, नेपाली आ अंग्रेजीक अतिरिक्त आन दू भाषाक मध्यस्थ भाषाक रूपमे प्रयोग सीमित अछि। अनुवादसँ कने भिन्न अछि रूपान्तरण, जेना कथाक नाट्य रूपान्तरण वा गद्यक पद्यमे पद्यक गद्यमे रूपान्तरण। ऐ मे मैथिलीसँ मैथिलीमे विधाक रूपान्तरण होइत अछि आ अनुवाद सिद्धान्तक ज्ञान नै रहने रूपान्तरकार अर्थ आ भावक अनर्थ कऽ दैत अछि। मैथिलीमे आ मैथिलीसँ अनुवादमे तँ ई समस्या आर विकट अछि।
उत्तम अनुवाद लेल किछु आवश्यक तत्त्व: शब्दशः अनुवाद करबा काल ध्यान राखू जे कहबी आ सन्दर्भक मूल भाव आबि रहल अछि आकि नै। श्ब्द, वाक्य आ भाषाक गढ़नि अक्षुण्ण रहए से ध्यानमे राखू। मूल भाषाक शब्द सभ जँ प्राचीन अछि तँ अनूदित भाषाक शब्द सभकेँ सेहो पुरान आ खाँटी राखू। मूल आ अनूदित भाषाक व्याकरण आ शब्द भण्डारक वृहत् ज्ञान एतए आवश्यक भऽ जाइत अछि। मूल भाषामे मुँह कोचिया कऽ बाजल रामनाथ, उमेशक प्रति सम्बोधनकेँ रामनाथो, उमेशोक बदलामे रामनाथहुँ, उमेशहुँ कऽ अनुवाद कएल जाएब उचित हएत मुदा सामान्य परिस्थितिमे से उचित नै हएत। से शब्द, भाव, प्रारूपमे सेहो आ मूल कृतिक देश-कालक भाषामे सेहो समानता चाही। अनुवादककेँ मूल आ अनूदित कएल जाएबला भाषाक ज्ञान तँ हेबाके चाही संगमे दुनू भाषा क्षेत्र इतिहास, भूगोल, लोककथा, कहबी आ ग्रम्य-वन्य आ नग्रक संस्कृतिक ज्ञान सेहो हेबाक चाही। ई मध्यस्थ भाषासँ अनुवाद करबा काल आर बेसी महत्वपूर्ण भऽ जाइत अछि। ऐ परिस्थितिमे दुनू भाषा क्षेत्रक इतिहास, भूगोल, लोककथा, कहबी आ ग्रम्य-वन्य आ नग्रक संस्कृतिक ज्ञानसँ तात्पर्य अनूदित आ मूल भाषा क्षेत्रसँ हएत मध्यस्थ भाषा क्षेत्रसँ नै। कखनो काल मूल भाषाक कोनो भाषासँ सम्बन्धित तत्त्व वा गएर भाषिक तत्व (सांस्कृतिक तत्त्व) क सही-सही उदाहरण अनूदित भाषामे नै भेटैत अछि आ तखन अनुवादक गपकेँ नमराबऽ लगैत छथि वा ओइ लेल एकटा सन्निकट शब्दावली (ओइ नै भेटल तत्त्वक) देमए लगैत छथि। ऐ परिस्थितिमे सन्निकट शब्दावली देबासँ नीक गपकेँ नमरा कऽ बुझाएब वा परिशिष्ट दऽ ओकरा स्पष्ट करब हएत। ऐ सँ मूल भाषासँ मध्यस्थ माषाक माध्यमसँ कएल अनुवादमे होइबला साहित्यिक घाटाकेँ न्यून कएल जा सकत।
कथा, कविता, नाटक, उपन्यास, महाकाव्य (गीत-प्रबन्ध), निबन्ध, स्कूल-कॉलेजक पुस्तक, संगणक विज्ञान, समाजशास्त्र, समाज विज्ञान आ प्रकृति विज्ञानक पोथीक अनुवाद करबा काल किछु विशेष तकनीकक आवश्यकता पड़त। निबन्ध, स्कूल-कॉलेजक पुस्तक, संगणक विज्ञान, समाजशास्त्र, समाज विज्ञान आ प्रकृति विज्ञानक अनुवाद ऐ अर्थेँ सरल अछि जे ऐ सभमे विस्तारसँ विषयक चर्चा होइत अछि आ सर्जनात्मक साहित्य {कथा, कविता, नाटक, उपन्यास, महाकाव्य (गीत-प्रबन्ध)} क विपरीत भाव आ संस्कृतिक गुणांक नै रहैत अछि वा कम रहैत अछि। संगे एतए पाठक सेहो कक्षा/ विषयकक अनुसार सजाएल रहैत छथि। केमिकल नाम, बायोलोजिकल आ बोटेनिकल बाइनरी नाम आ आन सभ सिम्बल आदि जे विशिष्ट अन्तर्राष्ट्रीय संस्था सभ द्वारा स्वीकृत अछि तकर परिवर्तन वा अनुवाद अपेक्षित नै अछि। सर्जनात्मक साहित्यमे नाटक सभसँ कठिन अछि, फेर कविता अछि आ तखन कथा, जँ अनुवादकक दृष्टिकोणसँ देखी तखन। नाटकमे नाटकक पृष्ठभूमि आ परोक्ष निहितार्थकेँ चिन्हित करए पड़त संगहि पात्र सभक मनोविज्ञान बूझए पड़त। कवितामे कविताक विधासँ ओकर गढ़निसँ अनुवादकक परिचित भेनाइ आवश्यक, जेना हाइकूक मैथिलीसँ अंग्रेजी अनुवाद करै बेरमे मैथिलीक वार्णिक ५//५ क मेल जँ अंग्रेजीक अल्फाबेटसँ करेबै तँ अहाँक अनूदित हाइकू हास्यास्पद भऽ जाएत कारण अंग्रेजीमे ५//५ सिलेबलक हाइकू होइ छै आ मैथिलीमे जेना वर्ण आ सिलेबलक समानता होइ छै से अंग्रेजीमे नै होइ छै। ऐ सन्दर्भमे ज्योति सुनीत चौधरीक मैथिलीसँ अंग्रेजी अनुवाद एकटा प्रतिमान प्रस्तुत करैत अछि। कविताक लय, बिम्बपर विचार करए पड़त संगहि कविता खण्डक कविताक मुख्य शरीरसँ मिलान करए पड़त। कथामे कथाकारक आ कथाक पात्रक संग कथाक क्रम, बैकफ्लैशक समय-कालक ज्ञान आ वातावरणक ज्ञान आवश्यक भऽ जाइत अछि। आब महाकाव्यक अनुवाद देखू, रामलोचन शरणक मैथिली रामचरित मानस अवधीसँ मैथिलीमे अनुवाद अछि मुदा दोहा, चौपाइ, सोरठा सभ शास्त्रीय रूपेँ अनूदित भेल अछि।
संस्कृत भाषाक अनुवादक माध्यमसँ पाठन आंग्ल शासक लोकनि द्वारा प्रारम्भ भेल। ऐ विधिसँ ने लैटिनक आ नहिये ग्रीकक अध्यापन कराओल गेल छल। ऐ विधिसँ जँ अहाँ संस्कत वा कोनो भाषा सीखब तँ आचार्य आ कोविद कऽ जाएब मुदा सम्भाषण नै कएल हएत। जँ कोनो भाषाकेँ अहाँ मातृभाषा रूपेँ सीखब तखने सम्भाषण कऽ सकब, संस्कृति आदिक परिचय पाठ्यक्रममे शब्दकोष; आ लोककथा आ इतिहास/ भूगोलक समावेश कऽ कएल जा सकैत अछि।
संगणक द्वारा अनुवाद: सर्जनात्मक वा निबन्ध, स्कूल-कॉलेजक पुस्तक, संगणक विज्ञान, समाजशास्त्र, समाज विज्ञान आ प्रकृति विज्ञानक अनुवाद संगणक द्वारा प्रायोगिक रूपमे कएल जाइत अछि मुदा कोल्ड ब्लडेड एनीमलक अनुवाद हास्यास्पद रूपेँ नृशंस जीवकएल जाइत अछि। मुदा संगणकक द्वारा अनुवाद किछु क्षेत्रमे सफल रूपेँ भेल अछि, जेना विकीपीडियामे ५०० शब्दक एकटा बेसी प्रयुक्त शब्दावलीआ २६०० शब्दक शब्दावलीक अनुवाद केलासँ, गूगलक ट्रान्सलेशन अओजार आदिमे आधारभूत शब्दक अनुवाद केलासँ आ आन गवेषक जेना मोजिला फायरफॉक्स आदिमे अंग्रेजीक सभ पारिभाषिक संगणकीय शब्दक अनुवाद केलासँ त्रुटिविहीन स्वतः मैथिली अनुवाद भऽ जाइत अछि।


Gajendraगजेन्द्र ठाकुर

ggajendra@videha.com

 

अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।

. गद्य


  




http://www.videha.co.in/RAJKUMARJHA_CLASSICAL.jpgहम आन्हर रही तइसँ प्रैक्टिस खूब केलौं: राजकुमार झा (विनीत उत्पल संग अन्तर्वार्ता)

इतिहासक पन्नामे सभ कलाकारकेँ ठाम नै भेटैत अछि। वएह कलाकारकेँ आइ धरि याद राखल गेल अछि जकरा सत्ता प्रश्रय देने अछि। अहाँ मिथिलाक कतेक ओहन कलाकारकेँ जानैत छी जे बिना किनको प्रश्रय पओने अप्पन साधनाकेँ जीवित राखयमे सक्षम भेल अछि या ओ इतिहासक पन्नामे दर्ज अछि। चाहे दरभंगा राज हुअए या बनैली स्टेट या सोनवर्षा राज, राजदरबारी कलाकारक इतिहास दर्ज अछि। ऐ दरबारी कलाकारसँ फराक कलाकार केँ लऽ कऽ नै तँ अप्पन समाज जागरूक अछि आ नहिये इतिहास लिखएबला। स्वतंत्रता प्राप्तिक बादसँ वएह कलाकार प्रतिष्ठित भेल अछि जे सत्ता प्रतिष्ठानसँ जुड़ल रहल। हुनके मान्यता भेटल जिनकर गीत दरभंगा आकाशवाणीसँ प्रसारित भेल। मुदा ऐ गपसँ इनकार नै कएल जा सकैत अछि जे आइ धरि मुट्ठी भरि लोकक बपौती आकाशवाणी दरभंगाक संगीत विभागमे छाएल अछि।  जखनकि संपूर्ण मिथिलामे अनेको एहन कलाकार अछि जिनका लग संगीत साधनाक नै तँ समुचित साधन अछि आ नहिये हुनकर कोनो लिखित इतिहास भावी पीढ़ीकेँ भेटत। एक दिस रेडियोसँ मैथिली गीत सुनए बला लोक नै भेटैत अछि, ओतए सच्चाई ई अछि जे मुख्यधारासँ बाहर ई कलाकार जखैन गाम-घरक मचानपर अप्पन कलाकेँ प्रदर्शित करैत अछि तँ दर्शकक थपड़ीक आवाजक दम रेडियो स्टेशनसँ भेटएबला चारि-पाँच सए टकाक दामसँ बेसी ताकत राखैत अछि। एहने एकटा कलाकार अछि राजकुमार झा। प्रकृतिक करिश्मा सँ भगवान हुनका आँखि नै देलक मुदा हुनर एहन गलामे सुर आ आंगुरमे थिरकन एहन देलक जे जखैन ओ  संगीत साधना करैत अछि तँ एहन लागत जे सरस्वती सौंसे आबि कऽ हुनका पर सवार अछि। संगीतक एकटा तपस्वी राजकुमार झासँ वरिष्ठ पत्रकार विनीत उत्पलक गपशप-

विनीत उत्पल:अहाँक संगीत शिक्षा कोना भेल?
राजकुमार झा: हम गामे मे रहैत रही। नेनेसँ हमरा लखाह नै दैत अछि, मुदा छाँहीसँ हम लोककेँ कनी चीन्ह जाइत छी। स्पष्ट किछु नहिये बुझाबैए। गाम-घरमे संगीत माने भजन-कीर्तनक, नाटक सभक माहौल छल तेँ हमहूँ गाबए-बजाबएमे लागि गेलौं। हमर पढ़ाइ सोलह बरखक उम्रमे शुरू भेल। हमर गामक भाय नारायण झाक ओइ बरख माय मरल रहथिन। ओइ श्राद्धमे बड़ रास लोक सभ आएल छल। ओइमे नारायण भायक माध्यमसँ हम दरभंगा गेलौं। दरभंगाक नेत्रहीन विद्यालय (श्री कामेश्वरी प्रिया पुअर होम) मने राजकीय नेत्रहीन उच्च विद्यालय, दरभंगामे टेस्ट भेल। संगीतक जाँच भेल आ केलौं। ओतए पाँच बरख रहलौं। पढ़ाइ केलौं। संगीत, अंग्रेजी ओतए पढ़ैत रही। वर्ग एक सँ वर्ग तीन, फेर सीधे पाँच आ तीन बरखमे सतमा पास केलौं। मात्र छह बरखमे। 1988 मे मैट्रिक पास केलौं।
विनीत उत्पल: फेर दरभंगासँ इलाहाबाद कोना गेलौं?
राजकुमार झा: संगीतसँ मैट्रिक केलाक बाद इलाहाबाद आबि गेलौं। प्रयाग संगीत समिति, इलाहाबादसँ एम.. केलौं।
विनीत उत्पल: दरभंगा आ इलाहावादमे अहाँक संगीत गुरू के सभ छल?
राजकुमार झा: दरभंगामे गौतम मिश्र, सुरेंद्र झा सँ संगीत सीखै छलौं। स्कूलमे तबलाक मास्टर कियो नै छल। हारमोनियम तँ हम अप्पन बाबूजी भुवनेश्वर झा सँ सिखलौं। इलाहाबादमे चंद्रभूषण पांडेय छल जे हमरा संगीतक पाठ पढ़एलक। हम गायन गौतम मिश्रसँ सिखलौं। चूंकि हम आन्हर छी तइसँ हम थ्योरी कतौ नै केलौं, प्रैक्टिकल बड़ केलौं।
विनीत उत्पल:अहाँकेँ अप्पन कोनो संगी-साथीक ख्याल अछि?
राजकुमार झा: हमरा संगे राम सागर पासवान, मोहन रावत बारीक, भगत झा, गंगा प्रसाद मेहता, रामवतार मंडल दरंभगामे पढ़ै छल। इलाहाबादमे भरत पांडेय, मक्खनलाल, अर्जुन पांडेय छल, मुदा सभ कियो कतए अछि, नै मालूम।
विनीत उत्पल: अहाँ कोन सभ वाद्य बजा सकैत छी?
राजकुमार झा: हारमोनियम, ढोलक, नाल, बांसुरी, कैसियो, गिटार, तानपुरा सभ किछु बजाबैक लेल जानैत छिऐ। हारमोनियम बजाएब तँ हम गाममे सिखलौं।
विनीत उत्पल: अहाँकेँ संगीतक कोन राग बेसी पसीन अछि?
राजकुमार झा: देखियौ, जे संगीतक आराधक अछि, हुनका कोन राग बेसी पसीन हएत या नै हएत, ई गप हेबाक नै चाही। किएकि राग एक तरहे तरकारीक मसाला छिऐ। जहिना नीक तरकारी बनाबैक लेल सभ मसाला चाही, ताहिना कोनो संगीत आराधककेँ सभ रागक जानकारी हेबाक चाही। मुदा यमन, राग भैरव, खवाज, राग देश, राग भोपाली, राग बिहाग, राग काफी बड़ पसीन अछि। यमनक उत्पति कल्याण ठाठ सँ भेल अछि। कोन मे कत्ते लय अछि, ई जानब आवश्यक अछि।

विनीत उत्पल: अहाँकेँ कोन शास्त्रीय गायकक गायब पसीन अछि?
राजकुमार झा: हमरा बैजू बावराक तान, भीमसेन जोशीक गायब बड़ पसीन अछि। 
विनीत उत्पल: संगीतक प्रोग्राम करए लेल या सुनए लेल जाइत छी?
राजकुमार झा: जखन दरभंगामे पढ़ैत छलौं तँ दरभंगा टाऊन हॉलमे या फेर लहरियासरायमे प्रोग्राम सुनबाक लेल जाइत रही। जहियासँ गाममे रहए लगलौं तँ अपने पंचायतमे भजन-कीर्तन गाबै लेल जाइत छी। ओना बनमनखरी, बठैली, नोहर, दिग्घी (कटिहार), खारा, सिंगारपुर, आलमनगर, बुआरीमे कतेक बरख गाबैक लेल जाइत छी, जखन कियो बजाबैत अछि।
विनीत उत्पल: कोनो नौकरी लेल गेलौं कि नै?
राजकुमार झा: कस्तूरबा संगीत विद्यालय, नागपुर गेलौं तँ ओतए ओरिजनल मांगय लागल। कहलक जे डुप्लिेकट सँ काज नै चलत। हमरा पास डुप्लिकेट प्रमाणपत्र अहि कारण छल जे हम एम.. करहि कऽ बाद एक बेर फेर इलाहावाद गेल रही। ओतएसँ गाम घुरि रहल छलौं तँ इलाहाबादमे हमर ट्रेन रातिक दू बजे छल। हम इलाहाबाद स्टेशनपर आबि कऽ ओतए सुति गेलौं। दू बजे रातिमे ट्रेन आएल तँ एतेक धरफर भेल जे हमर सर्टिफिकेट सभटा कियो चोरा लेलक। एकर अलावा, नागपुरक भाषा दोसर छल, जकरा हम नै बुझि सकैत छलौं तइसँ गाम आबि गेलौं।
विनीत उत्पल: अहाँकेँ संगीत साधनामे कोन तरहक दिक्कत आबैत अछि?
राजकुमार झा: देखियौ, हम बेसी भजन गाबैत छी। ई साज-बाज बजायब सामूहिक काज अछि, कियो असगरे ई काज नै कऽ सकैत अछि। चूँकि हम आन्हर छी तेँ हमरा लोक सभ ठकि लैत अछि। तइसँ लोकपर विश्वास करब कठिन भऽ जाइत अछि। दोसर गप ई जे हमर कियो सहयोगी नै अछि। जौं केकरो राखै छिऐ तँ खच्चरपनी करए लागैत अछि। एनाउंस किछु सुनै छिऐ आ दै किछु आर छै। बाते करलकै एतबय टा मे, आ दै छै किछु अओर।  कतेक पैसा देब, ई कहि कऽ कियो नै लऽ जाइत अछि।
विनीत उत्पल: गाबैक लेल सभसँ बेसी पाइ कतए भेटल?
राजकुमार झा: एक बेर बठैली मे दू राति रहलौं आ 2200 रुपया देलक तँ खुशी भेल जे हमहूँ किछु कऽ सकैत छी।
विनीत उत्पल: एखन अहाँ कोन काज करैत छी?
राजकुमार झा: भैस चराबैत छी।
विनीत उत्पल: गाममे संगीतक लेल कोनो समूह बनल कि नै?
राजकुमार झा:-ठक्कन भाय, रतन भाय, गजो भाय, ठाकुर, बीजो से समूह बनल आरंभ भेल आ बनल रहल। हमरासँ पहिने भुवनेश्वर झा, हरिवल्लभ झा, उमाकांत झा, राधाकांत झा, लक्षो काका रहए। ओइ समयमे खूब चलै रहै। मुदा बादमे लोक सभकेँ घमंड भऽ गेलै। किछु गोटे गामसँ फिरार भऽ गेल, लोक कमाबै लागल आ बाहर चलि गेल।
विनीत उत्पल: कोनो खिस्सा अहाँकेँ याद अछि, जखैन अहाँक योग्यताक मखौल उड़ाएल गेल?
राजकुमार झा: एक बेर ग्वालपाड़ा गेलिऐ, राजपूतक प्रोग्राम छल। संजोगसँ हारमोनियम बजाबैबला कलाकार नै आएल। लोक सभ कहलक जे राजकुमार जी हारमोनियम नीक बजबै छथि। ऐपर हमरा कार्यक्रमक लेल तैयार कएल गेल। मुदा आर सभ कलाकार बाजल, 'ई तँ सूरदास छी, की बजाओत'। सभसँ सीनियर जे छल ओ पुछलक, -की बजबै छी, की गाबै छी। हम बाजलौं, -थोड़ बहुत बजबै छी। -हारमोनियम बजबै छी? की बुझल अछि? थोड़ो-मोर बुझल अछि ने? हम कहलौं- जे हारमोनियम बजबै छथि हुनकासँ कनी बेसी बजाबै छी। जे बेसी बजाबै छथि हुनकासँ थोड़े कम बजाबै छी।
विनीत उत्पल: कोनो नशा करै छी कि नै?
राजकुमार झा: नशा केलाक बाद किछु नै भऽ सकैत अछि। नशा करब गुनाह अछि। मुदा जखैन हम पढ़ाइ-लिखाइ छोड़लाक बाद तम्बाकू खाए लगलौं,  भैंसवार तँ हम रहबे करी, सुमन, बीजो, हम सभ कियो भैंसवार रहिऐ, बीजोक हाथसँ चुनौटी लऽ लेलौं, तइ दिनसँ खाइत छी।
विनीत उत्पल: अहाँ बियाह किए नै केलौं?
राजकुमार झा: कियो पिता लड़की दैक लेल तैयार नै भेल, तइसँ हमर ब्याह नै भेल।
विनीत उत्पल: तखैन मनपर कंट्रोल कोना केलौं?
राजकुमार झा: एखन हमर उमर 47 बरख भऽ रहल अछि। एकटा गप जानि लियौ जे ई मन केँ जतए दौड़ायब ओतए जाएत। मनकेँ कंट्रोल करहि सँ ओकर फाएदा होइत अछि।
विनीत उत्पल: एखन अहाँ किछु सुना सकैत छी?
राजकुमार झा: जब गाबैत छी तँ सभटा राग आगू आबि जाइत अछि। ओना एकटा यमन राग देखू,
नीधागामापारेसा
चले आना, घनश्याम चले आना,
बस तू ही तो मेरे जीवन का आधार बने रहना
मेरे श्याम चले आना।
-जखन सुर मे रहैत छिऐ तँ सभ याद रहै छै। राग ठोर पर आबि जाइ छै। ओना नै फुराइ छै।
विनीत उत्पल: अहाँ कोन तरहक गीत गाबै छिऐ?
राजकुमार झा: जेहन समय तेहन गीत गाबै छिऐ। बसंत ऋतुक होलीक गीत गाबै छी।
अरे मोरे भिनसरवा,
कोयल कूकय छै,
आमक मंजर पर मंजर गूंजय छै,
जिनकर आदमी घरक मंुडेर पर,
बैसल-बैसल काग कूकय छै।
ई गीत बड़गांव (चंदा झा क मातृक) क चंदन क बनायल छै। हम सुनले गाबैत छी।
विनीत उत्पल: अहाँ अप्पन गीत बनाबैत छिऐ?
राजकुमार झा: हम गीत नै बनबैत छी। साज-बाज ठोर पर आबैत छै।


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http://www.videha.co.in/JyotiJhaChaudhary.JPGज्योति चौधरी
एक युग: टच वुड: भाग
लोकल विडियो क्लबक मेम्बर बनल छलौं से जे सभसँ नब फिल्मक सी. डी. ओकरा लग रहैत छलै से दऽ जात छल। परिवारस बात केना टॉनिक छल हमरा लेल नब शहरमे। आ देर तक फिल्म देखैक परिणामस्वरूप रविदिन। सुतनाइ॥ सुतनाइ॥। आ सुतना।।।।
हलाकि ई मात्र किछुए समयक आराम छल। विवाहक पहिल साल बीत गेल मुम्ब-टाटा- भिलाइक यातायातमे। हम कुनो पाबनि नै छोड़ने रही से खुशी अछि हमरा, टच वुड। मे हमर मौसीजीक बहुत कृपा रहनि
हमर विवाह एक साल पहिने तय भऽ गेल छल। हमरा मोन अछि जे हम कतेक उत्सुक रही विवाहक पहिने अपन पतिस बात करबाक लेल। कमस कम हमर नैहरमे तह चलन रहै जे लड़की-लड़काक बात विचार मिलबाक चाही। विवाहक पहिने पहचान बनबाक चाही। हम राखीमे अपन भैया भौजी लग भिला गेलौंॅ। ओत समस्त सासुर भेंट करल मुदा पतिदेव गायब छलथि, कारण छुट्टीक अभाव छलनि। हमर भैंसुर सेहो ऑफिसस सीधे एला मुदा बड्ड  देरस एला, कारण हुनका रस्ता बिसरा गेलनि। स हुनकर खूब मजाक उड़ेलकनि। वापस आबि कऽ हम बहुत दुःखी रह लगलौं। तखन हमर मॉं कहलखिन जे ई त नै हेतै। हमर बेटी पढ़ल-लिखल अछि, ओकर विवाहमे जे स पुरान तरीका चलेथिन से कोना हेतै। तखन ओत ननदिके सम्वाद आल जे हुनका हम स बात कहबनि आ ओ हमर पतिके कहथिन। हमरा सेहो मन्जूर नै छल। फेर हमरा फोनपर बात करबाक अवसर भेटल। भातक सिलसिला किछु बेसिये शुरू छल। मुदा एक दिन हम फोन केलियनि कियो आन फोन उठेलक आ बड़ी भरिमगर आवाजमे पुछलक आवाज नै नीक लागल की’? ई आवाज हम कखनो नै बिसरब। बादमे जखन कखनो ई आवाज हमर जिन्दगीमे दुहरायल, हम बढ़ियास चिन्हलि मुदा पति देव कखनो नै कहला जे ई वह व्यक्ति अछि। मुदा हम हमेशा यह देखलि जे ई व्यक्ति हमर वैवाहिक जीवनमे बहुत दखल दऽ रहल छल। ई एहेन व्यक्तित्व छल जकरा दोसराक निजी जिन्दगीके अपन ढंगस ढालैक बहुत उत्सुकता छलै। हमर दृष्टिस एहेन विचार कखनो दोस्तीक प्रारूप नै भऽ सकैत छै मुदा अपन पतिके कखनो हम लेल राजी नै कऽ सकलियनि
हँ त हम गाम गेलौं आ ओत दुर्गापूजा देखलौं। बाबूजी अष्टमी दिन सिद्धान्त करेलाह। वापस आबि क हमरा जन्मदिनमे एक उपहार भेटल। हमर भावी पति हमरास भेंट कर जमशेदपुर एला। हमरा बहुत खुशी भेल बातक, मुदा बादमे हम अपन मॉं बहिनके कहलियनि जे हमरा त चेहरा मोने नै रहत, कतेक कम काल लेल भेंट भेल। दुनु बहुत खिसियेली तखन भौजी एकटा फोटो देली जे लि, अकरा देखैत रहू। फेर समय बितैत गेल। दिवाली मनेलौं। दिवालियेमे हमरा अपन कार्यमे पहिल दरमाहा भेटल छल। हम अपन विवाहमे अपन मॉं बाबूजीके अपन पसन्दक कपड़ा खरीद कऽ देलियनि। काज केना अतेक पसन्द छल जे ऑफिसमे अपन बॉसके नै कहलियनि जे हमर बिआह ठीक भऽ गेल अछि। कुनो हँसी मजाक ऑफिसमे नै करै छलौं। बादमे बॉसके जखन पता चललनि तँ ओ बजा कऽ पुछला जे की की तैयारी कऽ रहल छी बिआहक। हम अकचका गेलौं। हम कहलियनि जे हम साड़ी किनलौं अपन पसन्दस। फेर ओ पुछला जे ब्यूटी पार्लरपर नै मेहरबान भेल छी अखन तक। हम हँस लगलौं। फेर सर केबिनस बाहर एला आ सके कहलखिन जे हुनकर पत्नी ब्युटी पार्लर गेल छलखिन। ओ जखन पत्नीके घर आनऽ गेला त हुनका पार्लरक अन्दर बैस पड़लनि। अन्दर तीन टा स्त्री फेस पैक लगेने रहै। हुनका बुझेबे नै केलनि जे के हुनकर पत्नी छलखिन। ओना ओ सर हमर वियाहमे सभसँ अमूल्य उपहार काजक अनुभवक प्रमाणपत्र देला जे अखन तक हमर संजीवनी अछि।

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http://www.videha.co.in/Shardanand_Das_Parimal.jpgशारदानन्द दास परिमल
राजनन्दनक आत्मालाप
एहि आत्मालाप  मे प्रथम पुरुष अपन दीर्घकालक यात्राक अनुभव कें अपना मुहें व्यक्त कए रहल अछि जे स्वानूभूत तथ्यक विश्वसनीयता कें गंभीरता  सँ प्रभावोत्पादक बनबैछ ।
एकरा लिखबाक पाछाँ हमर उद्देश्य कोनो व्यक्ति विशेषक प्रसंशा नहिं, मुख्यत: नवका पीढी(नव लोक) कें एहि वास्तविकताक प्रति सजग आ सचेष्ट करब अछि जे कोनो महान उपलब्धिक हेतु ककरो कोन तरहें दीर्घकालिक तपस्या करए पड़ैत छैक ।जेना अदनासन देखाइत छुद्र चूटी(पिपिलिका) सेहो डेगा-डेगी चलि पहाड़ कें टपि जाइछ । ताहि क्रमंे हमरा बुझाइछ जे कर्णगोष्ठीक संग कर्णामृतोक यात्रा सभ तरहें साधन-सम्पन्न नहिं रहितहुं ई विगत बत्तीस वर्ष सँ चलि आबि रहल निरन्तर तपस्याक प्रतिफलन थिक जे "मिथिला-मैथिलीक विकास में कर्णगोष्ठी एवं कर्णपामृतक योगदान(१९७४-२०११)" सकलनक रूप मे हमरालोकनिक सोझाँ प्रस्तुत अछि ।

एहि प्रसंग मे कर्णगोष्ठी मुम्बई आर्थिक सहयोगक अवदान कए यज्ञक पुरोधाक भाँति पूण्यक भागी छथि ।एखनुक जे समसामयिक लोकक(खास क नवका पीढीक) मानसिकता कनिएं क क बहुत हसोथि लेबाक अछि(जेना उगल चान कि लपकू पूआ),ताहि प्रवृतिक संदर्भ  मे कर्णामृतक साधना एवं उपलब्धि द्रष्टव्य अछि ।राज नन्दन बाबूक निष्ठा जे एहि व्याजें सुव्यक्त होइछ ,वोहि मे कोनो तरहक आत्मश्लाघा नहिं भ क मात्र वस्तुनिष्ठ निरपेक्ष प्रदर्शन अछि जे आत्मालापक रचयिता द्वारा कएल गेल अछि ।वो एहि रीतिएंँ  मिथिला मैथिलक कृतज्ञता विज्ञापित कए रहलाह अछि,संगहिं नवका पीढी कें ओकर कर्तव्यक दायित्वबोध करेबाक उपादान सेहो उपस्थित कएलनि अछि ।

एहि आत्मालाप मे एक व्यक्ति नहिं संस्था बाजि रहल अछि जाहि सँ मिथिलालोकक आशा, अभिलाषा आ आकांक्षा संलग्न अछि ,से बात बुझबाक चाही  ।साहित्य मे सत्यक अभिव्यंजना एहुना होइछ,पाठक कें अपन मानस क्षितिज उदार बनाक रखबाक चाही, सैह हमर अभ्यर्थना ।
    आत्मालाप - राज नन्दनक

   हमरा नहिं किछु चाह, मैथिलीक परिप्लावन  लए हमजीबइ छी ।
   सुधी पाठकक लेल पत्रिका कर्णामृत कें नित डेबइ छी ।
   तीन दशक कए पार वयक्रम वृद्ध अपन होइतहु सेबइ छी ।
   यदपि छोट डोंगी कें जलधि मे रहि जलपोत जकाँ  खेबइ छी ।

   नित्तहु प्राच्य क्षितिज सँ दिनकरक अभिवादन अरुणिमा पबइ छी ।
   दिग-देशान्तर पार सँ अनिलक आनल सुखद समाद जे लई छी ।
   बहुधा मेघाच्छन्न दिगन्तक रहनहुँ नभ निर्मेघ पबइ छी ।
   पबइत पाणि-स्पर्श पयोदक संकेतल ,अभिराम रहइ छी ।

   लाभ ई नाम "राजनन्दन "भएने अछि एतवा जे हम ने थकइ छी ।
   आधि-व्याधि बाधा कें पार नहिं जिजीविषा पर पाबै दइ छी ।
  ओतबै नहिं हम व्यवधानहु सँ अभिनन्दित भए राज करइ छी ।
  "मैथिलीक"आशीष अपरिमित मैथिलीक सेवा सँ पबइ छी ।

   "कर्णामृतक" अमिय संपोषित सेवा सँ जे अमृत  पबइ छी ।
   बुन्न मात्र सँ परिप्लावित भए हम अजस्र सुखसिन्धु लहइ छी ।
   "कर्मण्येवाधिकारस्ते" केर मिहिर- बलें घन तिमिर कटइ छी ।
   की आश्चर्य  यदि भरि उड़ान हम सात समुद्रो पारक लइ छी ।

   मैथिली-साहित्यक मंजूषा मे स्वर्णिम संस्कृतिक धरोहर,
   राखल रहए तेना जे भविष्यो पाबए संगति युगतक सुखकर ।
   दिग-दिगन्त कें करति प्रहर्षित सुर-सरगम संगीतक फरहर,
   शिवक नचारि-महेशवाणी सँ गूंजित जनकसुता केर नैहर ।

   गौरव सँ उच्छ्वसित बसातो सौरभ सुमनक सुखद पसारए ,
   मार्तण्डक-ज्वाला प्रचण्ड सँ मैथिलीक हरियरी न हारए ।
   आस्था तुंग हिमाद्रि-शृंग सन व्योम मध्य कीर्ति-ध्वज धारए,
   जकर स्तवन मे आह्लादित मुग्ध भुवन आरती उतारए ।

   "कर्णामृत" सार्थक पीयूष जे अंजलि भरि-भरि जन तक आनए ,
   गरिमा संग माधूर्य तिरहुतक बन्दनवार क्षितिज तक तानए ।
   संभव तैं पुरि संग निसर्गो सुखद संयोग मुहूर्तक ठानए ,
   बत्तिस ग्रं्थक भेल प्रकाशन हेतु प्राप्त अनुदान प्रमाणय ।

   लेसल  गेल "श्रीधरक" कर सौं "कर्णामृतक" जे टिम-टिम वाती ,
   रहलहुँ  से उसकावति टेमी खरिका सँ, सेवति दिन-राती
   निरवधि-काल विपुल पृथ्वी केर छुबइतक्षितिज रहत ई पाँती,
   की न एहन सुधि-संरक्षण सँ होएत तृप्त मातु केर छाती ?

   की न मैथिलीक संतानहुँ कें पथ प्रशस्त होएत लेखा सँ ?
   काल-भाल पर  कर्णामृत सँ टपकल स्मित बुन्न-रेखा सँ,
   दूर अतीतक आँजुर सँ उठि अबइत सरगम अनदेखा सँ,
   सहज सरल सम्बुद्धि सुपोषित प्रज्ञा केर उत्सुक पेखा सँ ।

   होइत रहल गुंजरित "सदुक्तिक" मंजुल स्वन अनवरत कान मे,
   मधुर सारगर्भित प्रस्पन्दन उष्मा भरइत स्वत: प्राण मे ।
   नौ सदीक विस्तार पार करि चलि अबइत उर्जा अम्लान मे,
   कर्णामृतक सैह सुर-सरगम उर्मिल अछि एखनहुं उड़ान मे ।

   अमलिन स्मित-हरित सुधि-सुरभित भूमि ई यावतकाल रहए,
   संस्कृतिक सुकुमार अरुणिमा-दीप्त मैथिलीक भाल रहए ।
   तावत कर्णामृतो पसारति अविरत प्रीतिक ज्वाल रहए,
   कर्णामृतक हिंडोल में झुलइत वृद्ध, वनिता आवाल रहए ।

   चाह हमर मैथिली-मानसक कर्णामृत ई मराल रहए ,
   ताल दैत संतरण मे जकरा दत्त चित दिक् ओ काल रहए,
   अमित उड़ान भरैत कल्पना जाहि छविक प्रतिपा़ल रहए,
   होइत नित मैथिली-मनीषा जइ सँ सदति नेहाल रहए ।

   उत्पत्स्यति कोअपि समानधर्मा" भवभूतिक धार पकड़ने,
   हम ने रहब त हमर तपस्या  धैर्यक पारावार पकड़ने,
   दिवा-रात्रि केर चोरा-नुकी बिच प्रत्यूषक झंकार पकड़ने ,
   बढ़त घार मे कालनिर्झरक ककरो शुभ अवतार पकड़ने ।

   नदी सदानीरा वसुन्धरा सरिताजल पटबैछ साल भरि  ,
   धन्य होइछ आदित्य रश्मि-अभिषेकित भोरे जकर  भाल करि,
   जतए उतरि नीरव-निरभ्र नभमे शरदक हो मुग्ध विभावरि,
   रजनीगंधा केर  वितान मे थकए न मलयानिलो ताल  भरि ।

   नहिं विदेह नहिं सीरध्वज हम तदपि उर्वरा शक्ति उभारल,
   नहिं नृप तइयो मिथिलामाटिक प्रतिभा कें दए  हाक उतारल ,
   कृति कें भोला लाल दास केर दीपदान दए सुधि झंकारल,
   मातृ-पितृ रृण भूमिक प्रति हम निज कृति सँ एहि भाँति उतारल ।

   प्रतिभापूंज मैथिली पुत्रक स्मृति मे जे अंक निकालल,
   अर्घदान आलोकसुछन्दित अमरत्वक झंडा सन गाड़ल,
   सारस्वत स्तंभ मेदिनीक व्योमक राखत छवि अजवारल,
   रहत जाहि सँ लोक चेतना स्पर्शित भए सदति पखारल ।

   दीपशिखा केर रिजु कंपन सँ अट्टहास करि हँसत अमरता,
   सतत सरस्वतिपुत्रक कर सँ उद्घाटित प्रातिभ उर्वरता,
   अंगीभूत करत दर्शावोत मुड़ि इतिहास अपन तत्परता,
   हरति  चलत जे दीर्घकाल तक सकल समाजक बौद्धिक जड़ता  

   पालन, पोषणआ विकास मे जतवा किछु पावोल समाज सँ,
   तकर करति प्रतिपूर्ति किंचितो द क जाइ सुख अपन काज सँ,
   सैह यत्न होइत आएल अछि सेवा में रहि "नन्दन राज" सँ,
   कर्णामृत  कें लेल जुटाबति संगीतक हित साज-वाज सँ ।


   आसक, अभिलाषक,उल्लासक बनि पतंग नभ मे कर्णामृत,
   दैत रहल आश्रय उमेद कें कते भविष्णु लेखकक,उड़ि नित,
   प्रोत्साहन सँ नव प्रतिभा केर सुुष्ठु विकासो कएल सुनिश्चित,
   कर्मनिष्ठ अविरत सेवा सँ अछि गौरवास्पद यशक सुअर्हित ।

   नहिं टिटही टेकल पर्बत सन,हमर भूमिका मैथिलीक प्रति,
   हम होइत अभिसार तकै छी गगनक पार गगन तक उन्नति,
   मैथिली संस्कृति-साहित्यक सम्मान करए उठि विश्वक सम्मति,
   सफल अपन साधना तखन हम बूझि सकब जे पओलक सद् गति ।

   नगर-नगर हम छानति फिरलहुँ लेने कर मे लोटा-डोरी,
   डगर-डगर पानिक तलाश मे कनहा लटकल  बोझने झोरी,
   जते भए सकए लोकक मन सँ भावक संवेदना निचोड़ी,
   किय न चेतना जगबइ खातिर भावक जल मे मधुरस घोरी?

   चलति बाट एकसरो हमेशा हमर इएह पाथेय रहल अछि,
   मातृ-मंदिरक आराधन मे सेवा एहि विधि धेय रहल अछि,
   राग जे कंठ सम्हारि सकए नहिं गीत हमर से गेय रहल अछि,
   वाणी चिरकल्याणी बनि विचरए जन-जन मे श्रेय रहल अछि ।

   यदि नहिं मान बूझत मैथिल चलि जाए न जेना गेलीह वैदेही,
   भेलीह भूमिगत लोकक रहितहु सुधि संवेदनशील,सुगेही,
   ओ छलि मैथिली,इहो मैथिली शंका मन मे उठइछ मेहीं,
   किए कि नवका लोक लगैत अछिमातृ-साहित्यक प्रति नहिं स्नेही ।

   लजविज्जी सुकुमार सदृश अनुराग होइत अछि साहित्यक प्रति,
   से न प्रवाहित हो यदि सहजहिं होइछ संस्कृति कें बड़का क्षति,
   जेना-जेना नव शहरी सभ्यता नवका लोकक मारि रहल मति,
   भौतिक होइत विकासक सोझाँ संस्कृतिक झलकैत अछि अवनति ।

   अन्देसा मांत्सर्य सँ उपगत होइछ क्षितिज पर हमर चेतनक,
   जखन तकै छी गगन भविष्यक एहि संध्या मे अपन जीवनक,
   भेल जा रहल सिमटि संकुचित आपकतामय शील जन-जनक,
   शहरक आकर्षण मे लुब्धल विसरि पुरातन मान साधनक ।

   शारदानन्द दास परिमल
   ४ अगस्त २०१२,नई दिल्ली

रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
http://www.videha.co.in/Sumit.jpgसुमित आनन्द- रिपोर्ट
http://www.videha.co.in/Sumit_100_2615.JPG
http://www.videha.co.in/Sumit_100_2585.JPGhttp://www.videha.co.in/Sumit_100_2588.JPG
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
http://www.videha.co.in/JagdanandJha.jpgजगदानन्द झा मनु’- दूटा विहनि कथा
ग्राम पोस्ट हरिपुर डीहटोल, मधुबनी 
  
.नेनाक सनेस

 
साँझकेँ छह बाजि गेलहि एखन धरि बौआ नहि आएल | भगवानपुर बालीक सेहो अता पता नहि | जा कए भगवानपुर बालीक अँगना देखै छी कि भेलहि |” ई द्वंद अछि एक गोट माएक मनक जीनक दस बरखक नेना दिनक एगारह बजे अपन काकी भगवानपुर बालीक संगे काली पूजाक मेला देखै लेल गेल छल मुदा साँझ परि गेला बादो एखन धरि नहि आएल छल | नेनाकेँ अपनासँ दूर केखनो छोरैक लेल ओ तैयार नहि मुदा नेनाक मेला देखैक लौलसाकेँ देखि ओकरा नहि रोकि पएलिह | जँ अपने जाइतथि तँ बोनिक हर्जाना आ ओहिपर सँ बेसी खर्चाक डर सेहो, कोनो ना पच्चीस रुपैयाक इन्तजाम कए नेनाकेँ काकी संगे पठा देने रहथि |
की भेलै किएक देरी भेलहि एहि उधेरबुनमे रहथि की भगवानपुर बालीक शव्द हुनका कानमे कतौसँ परलनि | देखलनि तँ भगवानपुर बालीक आ हुनक नेनाक संगे संग गामक आओर लोकसभ हँसैत बजैत हाथमे माथपर झोड़ा मोटरी नेने आबैत |
माए झटसँ आगू बढ़ि अपन नेना लग जा ओकर दाढ़ी छुबि, “ऐना मुँह किएक सुखएल छौ, किछु खेलएँ पीलएँ नहि? पाइ हएरा गेलौ की ?”
मुदा नेना चूपचाप ठार |
भगवानपुर बाली, “हे बहिन तोहर ई नेना, नेना नै बूढ़बा छौ |”
माए, “किएक की भेलै |”
भगवानपुर बाली, “सगरो मेला घूमक बादो किएक एक्को पाइ खर्च करत, नै खिलौना, नै मिठाइ, नै कोनो खाए पीबक चीज, भरि मेला पाइकेँ मुठ्ठीमे दबने चूपचाप सभ वस्तुकेँ देखैत रहेए |”
माए, “किएक बौआ, किछु खेलएँ पीलएँ किए नै |”
नेना चूपचाप अपन हाथ पाछू केने ठार | माएकेँ चूप भेला बाद अपन हाथकेँ पाछुसँ आगू अनि, हाथमे राखल डिब्बा माएकेँ दैत, “
माए डिब्बाकेँ देख कए, “ई चप्पल, केकरा लेल ?”
नेना, “तोहर लेल, तुँ खाली पेएरे चलैत छलेँ ने |”
माए झट नेनाकेँ अपन करेजसँ लगा सिनेह करैत, “हमर सोन सन नेना, भरि दिन भूखे पियासे अपन सभटा सऽखकेँ मारि कए हमर चिन्ता कएलक, हमरो औरदा लए कऽ जीबए हमर लाल|”      
.बाबाक हाथी
दिल्लीक कनाट प्लेशक प्रशिद्ध कॉफी हॉउसक आँगन | लूकझिक साँझ मुदा महानगरीय बिजलीक दूधसन इजोतसँ कॉफी हॉउसक आँगन चकमकाइत | एकटा गोल टेबुलक चारू कात रखल चारिटा कुर्सीमे सँ तीनटापर ’, ‘बैसल गप्प करैत संगे कॉफीक चुस्कीक आनन्द सेहो लैत |
केँ बिचक बात-चितमे गरमाहट आबि गेलै | ‘’, “रहए दियौ अहाँक बूते नहि होएत |”
’, “हाँ ई की कहलीयै हमरा बूते नहि  होएत, अहाँ बुझिते कि छियै हमरा बारेमे |”
’, “हम अहाँक बारेमे बेसी नहि बुझै छी परञ्च ई नै .......
’, “हे आगु जुनि किछु बाजु, अहाँकेँ नहि बुझल जे अहाँक सोंझा के बैसल अछि ? हमर बाबाकेँ नअटा बखाड़ी रहनि, दलानपर सदिखन एकटा हाथी बान्हल रहैत छलनि | हमर परबाबाकेँ चालीस गामक मौजे छलनि | हमर मामा एखनो बिहारक राजदरवारमे तैनात छथि | हम स्वम एहिठाम योगाक क्लास रास्त्रपतिकेँ दै छीयनि |”
क गप्प बहुते देरीसँ चुपचाप सुनैत अपन कॉफीक घूंट खत्म कएला बाद खाली कपकेँ टेबुलपर रखैत, “यौ हम आब चली, अहाँक दुनूकेँ हाइक्लासक गप्प हमरा नहि पचि रहल अछि, हम तँ बस एतबे बुझै छी जे हमर अहाँक बाबू-बाबा आ स्वयं हमरा सभमे एतेक बूता होइत तँ हम सभ एना दिल्लीमे १५-२० हजारक नोकरी कए कआ भराक मकानमे जीवन बिता कअपन-अपन जिनगीकेँ नरकमय नहि बनाबितहुँ | ओनाहितो आजुक समयमे हाथी भिखमंगा रखै छैक आ दोसर राजमे पेट ओ पोसैत अछि जेकरा अपन घरमे पेट नहि भरि रहल छैक |”
केँ एकटुक तित मुदा सत्य गप्प सुनि दुनूक मुँह चूप | ‘सेहो ई गप्प बजैत हिलैत डुलैत निसाक सरूरमे ओतएसँ बिदा भए गेल | मुदा ओकर बगलक टेबुलपर बैसल हमरा क गप्प सए टका सत्य लागल |   
*****   

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4 comments:

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5. रचना/ प्रस्तुतिपर अहाँक कोनो आर सुझाव ।
6. रचना/ प्रस्तुतिक उज्जवल पक्ष/ विशेषता|
7. रचना प्रस्तुतिक शास्त्रीय समीक्षा।

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"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २२८ म अंक १५ जून २०१७ (वर्ष १० मास ११४ अंक २२८)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -  गौरी चोरनी ,  गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर ...