Saturday, February 16, 2013

'विदेह' १२३ म अंक ०१ फरबरी २०१३ (वर्ष ६ मास ६२ अंक १२३)- PART V


गद्य-पद्य भारती  

. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल)
.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद
.कनकमणि दीक्षित (मूल नेपालीसँ मैथिली अनुवाद श्रीमती रूपा धीरू आ श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि)
.मूल तेलुगु कविता:http://www.videha.co.in/PASUPULETI_GEETHA.jpgपसुपुलेटि गीता; तेलुगुसँ हिंदी अनुवाद:http://www.videha.co.in/santhasundari.jpgआर.शांता सुंदरी; हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद: विनीत उत्पल (दिल्लीक बलात्कारक घटनापर)- दुमर्जा . मन्त्रद्रष्टा ऋष्यश्रृङ्ग- http://www.videha.co.in/HARISHANKAR_SRIVASTAVA_SHALABHA.jpgहरिशंकर श्रीवास्तवशलभ"- (हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद http://www.videha.co.in/Vinit_Utpal.jpgविनीत उत्पल) 
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मूल तेलुगु कविता:http://www.videha.co.in/PASUPULETI_GEETHA.jpgपसुपुलेटि गीता; तेलुगुसँ हिंदी अनुवाद:http://www.videha.co.in/santhasundari.jpg  आर.शांता सुंदरी; हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद:http://www.videha.co.in/Vinit_Utpal.jpgविनीत उत्पल
 (दिल्लीक बलात्कारक घटनापर)
दुमर्जा
देह भऽ गेल अछि एकटा इतिहास-दोख
दूटा ठोढ़, दूटा गाल
दूटा स्तन, दूटा जांघ
जोड़ा चुहचुही
दुइए युगमे एहन जेना जिनगी भऽ गेल खतम

 
जिनगी एत्ते संकीर्ण भऽ गेल जे
कनियो टा डोलू तँ उघड़ए लागैत अछि
भीतक रहस्य बिनु खुजनहिये
ग्राफिती भटरंग हुअए लागैत अछि
काल्हि नै जानि केकर बेर अछि?

 
खराप नै मानब,
लागए लागल अछि
लगमे ठाढ़ सभटा पुरुख जेना
जांघक बीच अप्पन
भाला लऽ कऽ चलि रहल अछि
समुद्र आ अकासकेँ मिला कऽ बुनलापर सेहो
ऐ अदौक पाथर-युगक उघारकेँ
झपबा लेल
हाथ भरि लत्ता नै भेटैत अछि

आँखि खुजलेपर तँ
बुझाएत
जे भोर भऽ गेल
जइ अंगमे आँखिये नै
ओकरा लेल
आन्हरक-अन्हारे आनंद अछि
अँतड़ीये टा नै
हृदएकेँ सेहो उधेसैत
देहमे अन्हार सोझे खन्ती बनैए
धँसि जाइए
खराप नै मानब,
कीड़ीसँ कीड़ीक नाशक आशा करैत
मृत्युसँ अमृत मांगैत
मालजाल भऽ मालजालक बहिष्कार के करैत अछि?
मानवताक भ्रमजालमे
सिग्नल सभक बीच बड़का सड़क
जखैन बनि जाइत अछि आक्रंदनक गुमकी
कान फाड़ैबला
प्रश्नक गोली जनमि रहल अछि
तँ की भेल?
विवेकपर लाठी बजरि रहल अछि
फुसियाहींक भरोस, बिकट्ठ गारि
नोर पोछि रहल अछि।
प्रहरी-दलक पसार
नोरबला गैसक मेघ बनि
विश्वासपर आच्छादित भऽ रहल अछि।
नग्र एकटा मृत्युक ओजार बनि गेल अछि
अप्पन आ आस-पड़ोसक घर
नव घा बनि औनाए लगैत अछि
हमरा दूनू गोटेक अस्तित्व काएम रहबाक हुअए
तँ अहाँकेँ हमरामे
मनुष्यता बनि झहरऽ पड़त
हमरा अहाँमे पैसि
मातृत्व बनि बहए पड़त
देहक दोखी भेलाक बाद
प्राणक हिलकोर मिझा गेलाक बाद
चण्ठमे अनूदित भेलाक बाद
बालुक पानिक झिल्हरिक बाँझ स्थितिमे
प्रवासी भऽ प्रवेश केलाक बाद...
माँ सेहो अहाँ लेल
एकटा गलत सम्बन्ध बनि कऽ रहि जाएत...
खराप नै मानब,
आब एतए मुर्दाघरक अलाबे
सौरी-घरक कोनो खगता नै!

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मन्त्रद्रष्टा ऋष्यश्रृङ्ग- http://www.videha.co.in/HARISHANKAR_SRIVASTAVA_SHALABHA.jpgहरिशंकर श्रीवास्तवशलभ"- (हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद http://www.videha.co.in/Vinit_Utpal.jpgविनीत उत्पल)
ब्राह्मचर्य एवं अध्ययन
श्री भागवत दर्शक अनुसार, विभांडक सोचैत छला जे अप्सरा उर्वशीक देखलेसँ हुनकर तेज नष्ट भेल। तइसँ ओ अप्पन नेनाकेँ गलतीयोसँ कोनो स्त्रीक दर्शन नै कराएत। ओकरा विशुद्ध ब्रह्मचारी बनाएब, ई सोचि कऽ ओ अप्पन नेना ऋष्यश्रृंगकेँ आश्रमसँ बाहर नै जाइले दै छल। ओ हुनकासँ तप, अग्निहोत्र कराबैत छल, वेद पढ़ाबैत छल आ पैघ-पैघ ऋषिकेँ छोड़ि कऽ ओकरा केकरोसँ भेँटो नै करऽ दै छल। स्त्रीकेँ तँ ओ अप्पन आश्रमक परिधि धरिमे पएरो नै राखऽ लेल दै छल। कोनो बूढ़ ऋषिक स्त्री सेहो ओतए नै आबि सकैत छल। आबैक गप तँ दूर, ओ अपन नेनाक आगू कोनो स्त्रीक नाम धरि नै लैत छल। ऋष्यश्रृंग जानितो नै छल जे मुनिक अलाबे कोनो अओर स्त्री-पुरुख होइत अछि। ओ नै तँ कोनो नग्र देखने छल आ नहिये नग्रक कोनो वस्तुए।9
ऋष्यश्रृंगक समय अग्नि आ अप्पन तपस्वी पिताक सेवामे बितैत छलै। स्त्रीक अस्तित्वक तँ हुनका पतो नै छलनि। तकर बादो ओ वेदक परगामी विद्वान छल।10
रामायणकार हुनका शक्तिशाली महर्षि कहने छथि। हुनका विषय-सुखक कनियो टा ज्ञान नै छल। ओ अखंड ब्रह्मचारी छल।
अप्पन समाजमे एहन मान्यता अछि जे बच्चा सभकेँ विषय-सुखक कनियो ज्ञान नै दियौ तखने ओ पक्का ब्रह्मचारी बनि सकैत अछि। ई विचार प्राकृतिक निअमक विपरीत अछि। ऐ ढोंगसँ जइ दुर्गक रक्षा कएल जाइत अछि, ओ बड़ आसानीसँ शत्रुक हाथ मे चलि जाइत अछि। ऋष्यश्रृंग वृतांत सेहो एहने अछि। हुनकामे काम चेतना सुप्त छल, ओकर संबंधमे रामायणकारक ई टिप्पणी द्रष्टव्य अछि। राजन! लोकमे ब्रह्मचर्यक दूटा रूप विख्यात अछि आ ब्रााह्मण सदा ओइ दुनू स्वरूपक वर्णन केने अछि। एक तँ अछि दंड, मेखला आदि धारण रूप बला मुख्य ब्राह्मचर्य आ दोसर अछि ऋतुकालमे स्त्री समागम रूप गौण ब्रह्मचर्य। ऋष्यश्रृंग जेहन महात्मा ऐ दुनू प्रकारक ब्रह्मचर्यक पालन केने हएत।"11
अप्पन विद्वान पिताक कठोर अनुशासन मे रहि कऽ ऋष्यश्रृंग कतेक रास व्यवहारिक ज्ञान सेहो प्राप्त केने छल। कौशिकीक तट पर निवास करबाक कारण एकर जलक समुचित उपयोग आ व्यवस्थामे हुनका विशेषज्ञता प्राप्त छल। आश्रमक चारू कात ओहिना नदीक जल-प्रवाहकेँ व्यवस्थित कऽ ओ रंग-बिरंगक फूल-मूल उपजाबै छल, सेहो पर्याप्त मात्रामे। वाल्मीकि रामायणक बालकांडक चित्राण्यत्र बहूनिस्र्यमूलानि च फलानि" 10/27 मे उपयुक्त गप रेखांकित अछि।
अंग नरेश रोमपाद वृत्तांत
ओइ काल रोमपाद अंग प्रदेशक नरेश छल। ओ राजा दशरथक मित्र छल। हुनका कोनो संतान नै छल। हुनकर दुख देखि कऽ दशरथ अप्पन पहिलुक रानी कौशल्याक गर्भसँ उत्पन्न शान्ता नामक पुत्रीकेँ हुनकर पुत्रीक रूपमे दऽ देने छल।12
रोमपाद शान्ताकेँ पुत्रीक रूपमे पाबि नेहाल भऽ गेल छल। ओकर लालन-पालन महाशक्तिशाली अंग नरेशक राजकीय गरिमाक अनुरूप राज प्रासाद मे भेल।
राजा रोमपाद ययाति वंशक क्षत्रिय छल। वंशोमन्मन्तरानि च" कऽ मुताबिक, पुराणमे ऐ वंशक राजाक संबंधमे सूचना अछि। विष्णुपुराण 4/18 क मुताबिक, ययातिक चारिम पुत्र अनु" केँ तीन पुत्र भेल, समानल, चक्षु आ परमेषु। ई वंश अनुवंश कहैलक। समानलक पुत्र कालानल भेल आ कालानलक सृंजय, संृजयक पुरंजय, पुरंजयक जनमेजय, जनमेजयक महाशाल, महाशालक महामना, महामनाक उशीनर आ तितिक्षु नामक दूटा पुत्र भेल।
उशीनरक शिवि, नृग, नर, कृमि आ वर्म नामक पाँचटा पुत्र भेल। ऐ मे शिविक वृषदर्भ, सुवीर, केकय आ मद्रक नामक चारि टा पुत्र भेल। विविक्षुक पुत्र रूशद्रथ भेला। हुनकर हेम, हेमक सुतपा अओर सुतपाकेँ बलि नामक पुत्र भेल। ऐ राजा बलिक रानी सुदेक्षणासँ आन्हर ऋषि दीर्घतमा पाँच पुत्रकेँ जन्म देलक, जे अंग, बंग, कलिंग, पुण्ड्र आ सुहा भेल। राजा बलिमे पुत्र उत्पन्न करबाक क्षमता नै छल। हुनकर प्रथम पुत्र अंगसँ अनपान, अनपान सँ दिविरथ, दिविरथसँ धर्मरथ आ धर्मरथसँ चित्ररथक जन्म भेल। ऐ चित्ररथक दोसर नाम रोमपाद छल।
श्रीमदभागवतक अनुसार, वस्तुत: शान्ता महाराज दशरथ आ कौशल्याक पुत्री छल आ अंग नरेश रोमपाद दशरथक सखा छल।13
भवभूति" सेहो अप्पन उत्तर रामचरित..." मे ऐ गपक उल्लेख केने अछि।
कन्या दशरथो राजा शान्ता नाम व्यजीजनत।
अपत्य कृतिका राज्ञे रोमपादाय या ददौ।।
उत्तर रामचरित प्रथमांग
अपत्य शब्द संतान लेल प्रयुक्त होइत अछि आ कृतक (स्त्रीलिंग कृतिका) केर अर्थ अछि कृत्रिमा। ऐसँ स्पष्ट अछि जे शान्ता राजा रोमपादक कृत्रिम (दत्तक) पुत्री छल।
ऋष्यश्रृंगक मालिनी प्रस्थान
रामायणमे रोमपादकेँ महाप्रतापी आ बलवान राजा कहल गेल अछि।14
एहन कहल गेल अछि जे ऐ राजाक धर्मक उल्लंघनक कारण हुनकर राज्य मे घोर अनावृष्टि भऽ गेल छल। ऐसँ जनता भयभीत भऽ गेल। मालिनी सेहो गंगा कात अवस्थित छल। अंगमे जल संसाधनक प्रचुरता छल। तकर बादो जलक समुचित उपयोग नै हेबाक कारणसँ अकालक स्थिति आबि गेल छल। राजा ऐ लऽ कऽ बड़ दुखी छल। ओ एकर निवारणक लेल वेदज्ञ पंडितसँ मंत्रणा केलक। सभटा पंडित, सर्वमतसँ अनुशंसा केलक जे महर्षि विभाण्डक पुत्र ऋष्यश्रृंग वेदक पारगामी विद्वान अछि। हुनका कोनो तरहे ऐ राज्यमे बजा कऽ नीकसँ सत्कार कएल जाए आ वैदिक विधिक अनुसार अप्पन कन्या शान्ताक ब्याह कऽ देल जाए।
दूरदर्शी राजा रोमपाद सहर्ष ऐ प्रस्तावक अनुमोदन कऽ देलक। मुदा हुनका ऐ गपक चिंता छल जे ऐ शक्ति संपन्न ऋषिकुमारकेँ कोना ओतए आनल जाए? ओ अप्पन मंत्री आ पुरोहितकेँ पठा ऋष्यश्रृंगकेँ सत्कारपूर्वक मालिनी अनबाले चाहै छल। मुदा ऐ दबंग ऋषिक स्वभावकेँ ओ जानैत छला तइसँ ओ राजाकेँ स्पष्ट कहि देलनि जे ओ ऐ ऋषिसँ डरैत अछि, तइसँ हुनका ई कार्य नै देल जाए। तकर बादो मंत्रीगण सोचि-समझि राजाकेँ जे उपाय बतौलखिन, ओकरा करएमे कोनो दोष नै छल। संगे-संग ऐ कार्यमे कोनो विध्न-बाधा अएबाक कोनो संभावना सेहो नै छल।
वनचर जीवन व्यतीत करऽ बला ऋषिकुमार श्रृंग कहियो कोनो स्त्री केँ नै देखने छल। ओ स्त्रीकेँ चिन्हितो नै छल आ विषय सुखसँ अनभिज्ञ छल। एहन कठोर चित्तकेँ मथि दैबला मनोवांछित विषयक प्रलोभन दऽ कऽ हुनका मालिनीमे अनबाक योजना बनए लागल। ऐ योजनाक सफलताक लेल तय कएल गेल जे सुंदर आभूषणसँ विभूषित मनोहर रूपवाली वेश्या ऋष्यश्रृंग कतय जा कऽ अनेकानेक उपायसँ हुनका लोभा कऽ मालिनी आनए। राजाज्ञासँ एहने व्यवस्था कएल गेल।
कतेक रास नाओकेँ जोड़ि कऽ बेड़ा बनाओल गेल। ओकरा मनोरम पातसँ सजाओल गेल। नाओमे कतेक रास मिष्ठान आ मधुर फल राखल गेल। नगरक मुख्य-मुख्य रूपवती वेश्याकेँ सभ मंत्रणासँ अवगत करेलाक बाद जलमार्गसँ आश्रम दिस पठा देल गेल। आश्रमसँ कनी दूर ठाम कोशीक पावन कात बेड़ा रोकि देल गेल। वेश्या ओतएसँ ऋषिकुमारसँ मिलय कऽ उपाय करए लागल। अंतर्मुखी स्वभावबला ऋष्यश्रृंग बड़ धीर-गंभीर छल। हुनका अप्पन पिताक सानिध्य बेसी सुखकर लागैत छल। यएह कारण छल जे ओ आश्रमसँ बाहर नै कऽ बराबर निकलैत छल। ओ एत्ते एकांतशील व्यक्ति छल जे वन मे रहि कऽ अप्पन पिताक अलावा स्त्री सभक गप तँ छोड़ू, कोनो दोसर पुरुख धरि केँ नै देखने छल। तखैन भला ऐ ऋषिमे चेतना कोना आैतिऐ? कोनो अज्ञात प्रेरणासँ ऋषिकुमार घुमैत-फिरैत कोशीक ओइ धारक कात पहुँचल, जतए रूपवती वेश्याक बेड़ा ठाढ़ छल। मंद-सुगंध पवनक संग मीठ आवाजमे संगीत सुनाइ दऽ रहल छल। अगरू धूम आ दोसर सुगंधित द्रव्यसँ वातावरण बड़  रमणीय भऽ रहल छल। ऋषिकुमार सुन्नर वेश आ बड़ आकर्षक रूपवाली वनिता सभकेँ देखलक। ऋषिकुमारकेँ अप्पन एतए आएल देखि कऽ वनिता सभ हर्षोत्फुल भऽ गेल। ओ मंद मानक स्वरमे गाबैत ऋषिकुमार लग आएल। ऋषिकुमार सेहो हतप्रभ छल। वनिताक कल्पना तँ ओ केने नै छल। हुनका भान भेल जे ई ऋषिगणे अछि, जे कोनो दोसर लोकसँ आएल अछि। एखैन धरि ओ स्त्री केँ देखने नै छल तँ ओकरा संबंधमे ओ की सोचतिऐ? वनिता हुनकर सत्कार केलक आ स्नेह प्रदर्शित करैत कहलक, हे ब्रााह्मण! अहाँ के छी? की करैत छी? स्त्रीक कमनीयता देखि कऽ ऋषिकुमार मंत्रमुग्ध छल। हुनकर अंतर्मनसँ स्नेहक धारा फूटए लागल। ओ अप्पन पिताक आ अप्पन परिचय देलक। ऋष्यश्रृंग बाजल जे महर्षि कश्यप वंशक महर्षि विभाण्डक हमर पिता छथि। भूमंडलमे प्रसिद्ध छथि। ठामे हमर आश्रम अछि। अहाँक दर्शन हमरा लेल कतेक रास सुखक मूल अछि। अहाँ सभ देखयमे बड़ सुनर छी आ देह सँ आभा सेहो फूटि रहल अछि। अहाँ सभकेँ हम प्रणाम करैत छी। ऋषिकुमार वनिताकेँ अप्पन आश्रम लऽ कऽ आएल। संजोगवश हुनकर पिता आश्रममे नै छल। ऋषि हुनका ऋष्योचित सत्कार आ विधिवत पूजन कऽ कन्दमूल फल-फूल दऽ कऽ संतुष्ट केलक। वनिता सभकेँ ऋषिकुमारक पिता विभाण्डकक एबाक डर सेहो लागि रहल छल। तइसँ ओ तुरंत आश्रमसँ जाइ लेल उत्सुक छल।
(क्रमश:)
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।

 

बालानां कृते
.http://www.videha.co.in/JagdanandJha.jpgजगदानन्द झा 'मनु'- बाल गजल२.http://www.videha.co.in/AmitMishra.jpgअमित मिश्र- बाल गजल -
  

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http://www.videha.co.in/JagdanandJha.jpgजगदानन्द झा 'मनु'
ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीहटोल, मधुबनी 

बाल गजल         

तिला संक्रातिकेँ खिच्चैर खाले रौ हमर बौआ
जेतौ नै तँ कनिए कालमे ओ आबिते कौआ

चलै बुच्ची सखी सभ लाइ मुरही किन कऽ  आनी
अपन माएसँ झटपट माँगि नेने आबि जो ढौआ

बलानक घाट मेलामे कते घुमि घुमि मजा केलक
किए घर अबिते मातर बुढ़ीया गेल भय थौआ

कियो खुश भेल गुर तिल पाबि मुरही खुब कियो फाँकेँ
ललन बाबा किए झूमैत एना पी कए पौआ

सगर कमलाक धारक बाटमे बड़ रमणगर मेला
सभ कियो ओतए गेलै कि भेलै मनुकुनो हौआ

(बहरे रमल, मात्रा क्रम १२२२-१२२२-१२२२-१२२२)


2
http://www.videha.co.in/AmitMishra.jpgअमित मिश्र
करियन ,समस्तीपुर, मिथिला ,बिहार
1.
बाल गजल

लहरि सागरक गाबै छै
गीत कल कल सुनाबै छै

पानि सदिखन मचोरै ओ
ढेह जे बनि कऽ आबै छै

कात आनै कते दूरसँ
शीप मोती बहाबै छै

सूर्यकें जतऽ डुबाबै ओ
चान ओतै उगाबै छै

ई तँ कखनो रुकै नै छै
बढ़ब आगू सिखाबै छै

पानिमे जे लवण घोरल
नीक भोजन बनाबै छै

मान छै ई तँ उपकारी
अपन नदिकेँ बनाबै छै

फाइलातुन-मफाईलुन
2122-1222

2


आइ दीदी लेल एलै बरियात गै
चल सहेली देखबै फेरा सात गै

देख हमरा लेल एलै नव लंहगा
एहिमे लागैछ  सुन्नर सन गात गै

चारि जनरेटर कते मचबै शोर गै
मरकरीमे गाछकेँ चमकै पात गै

लाल छै पंडाल लागल छै भीड़ गै
हाथमे माला लऽ दीदी एकात गै

गारि दै छै समधिकेँ भौजी देख ने
तीन बाजल रातिकेँ भेलै प्रात गै

भेल की कानै हमर माँ परिवार गै
संग छूटल "अमित" आश्चर्यक बात गै

फाइलातुन-फाइलातुन-मुस्तफइलुन
2122-2122-2212
बहरे-जदीद

3.

बाबी कहै पाकड़िपर रहै छै भूत
झटकैत चलि एतै नै तऽ जल्दी सूत

देखै छथिन नीनक देब घर घर जा कऽ
जागल जँ किओ भेटै पकड़ि लै दूत

मालिश करै तेलक गाबि नव नव गीत
काबिल कहै छथि आ नीक छी हम पूत

डिबिया जड़ै छै आ होइ झलफल आँखि
नै आब उठबै भेलै सपन मजगूत

भोरे किए उठबै छथि करै छथि शोर
यदि रातिमे "अमित"सँ ओ कहै छथि सूत

मुस्तफइलुन-मफऊलातु-मफऊलातु
2212-2221-2221
बहरे-सलीम

4.


काँपि रहलै मोबाईल बाजि रहलै ओकर टोन
देख कुचरै छै कौआ जकाँ पड़ल ओ टेलीफोन

गीत गाबै चमकै भूक भाक लागै छै बड नीक
झूमि रहलै सबहक देह नाँच करबै हम भरि मोन

छौंक लागल भनसाघर गमकल बनलै तरुआ फेर
लेर अपने बाहर होइ पड़ल नै छै बेसी नोन

एक बीतक चाली छै पसरल आँगन कादो कीच
आब कोना करबै खेल बचल नै छै कोना कोण

आब नै खेबौ बासी बचल भऽ जेबै हम बेमार
काल्हि कहलनि डाक्टर सबसँ "अमित" जीवन सबहक सोन

फाइलातुन-मफऊलातु
2122-2221
दू बेर सब पाँतिमे

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।

बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥
१०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२)
आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥
आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥
मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।
ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।
हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आसर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आघोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आयुवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आमित्रक उदय होए॥
मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि।
एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।
अन्वय-
ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म
रा॒ष्ट्रे - देशमे
ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त
आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए
रा॑ज॒न्यः-राजा
शुरे॑ऽबिना डर बला
इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण
ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला
म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर
दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली)
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित
सप्तिः॒-घोड़ा
पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री
जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला
र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर
स॒भेयो॒-उत्तम सभामे
युवास्य-युवा जेहन
यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे
वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला
निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे
नः-हमर सभक
प॒र्जन्यों-मेघ
वर्षतु॒-वर्षा होए
फल॑वत्यो-उत्तम फल बला
ओष॑धयः-औषधिः
पच्यन्तां- पाकए
योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा
नः॑-हमरा सभक हेतु
कल्पताम्-समर्थ होए
ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी।
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8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH
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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...