Saturday, February 16, 2013

'विदेह' १२३ म अंक ०१ फरबरी २०१३ (वर्ष ६ मास ६२ अंक १२३)- PART IV


.http://www.videha.co.in/poonammandal.jpgरिपोर्ट- पूनम मण्डल- महा वि‍द्यालय सांस्‍कृति‍क कार्यक्रम-2013 .http://www.videha.co.in/Sumit.jpgवाद-सुमित आनन्द- शो-पत्रिका मैथिली केर लोकार्पण
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http://www.videha.co.in/poonammandal.jpgरिपोर्ट- पूनम मण्डल
महा वि‍द्यालय सांस्‍कृति‍क कार्यक्रम-2013
एकांकी- तामक तमघैल-
नाटककार- जगदीश प्रसाद मण्‍डल
ि‍नर्देशक- हेम नारायण साहु।
सह ि‍नर्देशक- कपि‍लेश्वर साहु।
मंच उद्घोषक- उमेश मण्‍डल।
नृत्‍य ि‍नर्देशन- रामवि‍लास साहु।
तबला वादक- श्री प्रमोद कुमारी साह।
नाल वादक- अशोक जी एवं पि‍न्‍टूजी।
ऑगेन वादक- जीबछ कुमार छोटू।
हारमोनि‍यम वादक- शेखर कुमार।
ध्‍वनि‍ विस्‍तारक यंत्र- पवन कुमार मण्‍डल।
मंच सज्‍जा- मदन प्रसाद साहु तरूणा टेन्‍ट हाउस।
वि‍डि‍योग्राफी- अरूण कुमार साहु।
कार्यक्रम अध्‍यक्ष- प्रो. जय प्रकाश साहु।
कार्यक्रम उपाध्‍यक्ष- मनोज कुमार साहु।
अवसर- 64म गंणतंत्र दि‍वस।
स्‍थान- अशर्फी दास साहु-समाज इण्‍टर महि‍ला महावि‍द्यालय- ि‍नर्मली (सुपौल)
दि‍नांक- 26 जनवरी 2013

कार्यक्रम-

गोसाओनि‍ गीत- जय-जय भैरवि‍सँ
प्रस्‍तुति- सुश्री अपर्णा कुमारी
भाव नृत्‍य-
प्रस्‍तुति- सुश्री अपर्णा कुमारी आ ि‍नधि‍ कुमारी।
देश भक्‍ति‍ गीत-
प्रस्‍तुति- सुश्री सरीता कुमारी।
भाव संगीत-
सुश्री अपर्णा कुमारी आ नि‍धि‍ कुमारी।
नारी शि‍क्षापर आधारि‍त संगीत-
प्रस्‍तुति- सुश्री कंचन कुमारी, लाली कुमारी आ नि‍धि‍ कुमारी।
देश भक्‍ति‍ गीत-
प्रस्‍तुति- सुश्री लाली कुमारी आ लक्ष्‍मी कुमारी।
नारी शि‍क्षापर आधारि‍त- बकरी नै चरेबो माए गइ...
प्रस्‍तुति‍- सुश्री लक्ष्‍मी कुमारी, कंचन कुमारी।
एकांकी तामक तमघैल
पात्र-परि‍चय केर प्रस्‍तुति-
स्‍त्री पात्र-
रागि‍नी- भूमि‍कामे सुश्री अपर्णा कुमारी।
बलाटबाली- भूमि‍कामे- सुश्री नि‍धि‍ कुमारी।
पीपरावाली- भूमि‍कामे- सुश्री नि‍धि‍ कुमारी।
अनुराधा- भूमि‍कामे- सुश्री मोनि‍का कुमारी।
पुरुष पात्र-
रवि‍न्‍द्र- भूमि‍कामे- सुश्री चन्‍दन कुमारी।
चन्‍द्रदेव- भूमि‍कामे- खुशबू कुमारी।
सुन्नरलाल- भूमि‍कामे- प्रि‍यंका कुमारी।
नशा मुक्‍ति‍पर आधारि‍त गीत- सुश्री सोनी कुमारी।
नाटकक पहि‍ल दृश्‍यक प्रस्‍तुति-
साम्‍प्रदायि‍क एकतापर आधारि‍त समूह गीत-
प्रस्‍तुति‍- सुश्री साधना कुमारी, आशा कुमारी, कंचन कुमारी, लाली कुमारी, संजू कुमारी, लक्ष्‍मी कुमारी, सुमन कुमारी आ नीतू कुमारी द्वारा....
नारी शि‍क्षापर आधारि‍त गीत
http://www.videha.co.in/TAMAK_TAMGHAIL.JPG
प्रस्‍तुति‍- सुश्री रूबी कुमारी।
लोक गाथा- लोक संगीत जट-जटि‍न
प्रस्‍तुति‍- सुश्री लक्ष्‍मी कुमारी, साधना कुमारी, नीतू कुमारी, लाली कुमारी, कंचन कुमारी, आशा कुमारी आ संजू कुमारी द्वारा...
तामक तमघैल केर दोसर दृश्‍य प्रस्‍तुति-
नारी सशक्‍ति‍करणपर आधारि‍त गीत-
प्रस्‍तुति‍- सुश्री कंचन कुमारी आ लाल कुमारी द्वारा....
भाव संगीत-
प्रस्‍तुति‍- सुश्री सरीता कुमारी।
समूह गीत- देश भक्‍ति‍-
प्रस्‍तुति‍- सुश्री लक्ष्‍मी कुमारी, लाली कुमारी, नीतू कुमारी, साधना कुमारी आ आशा कुमारी द्वारा....
तामक तमघैल केर तेसर दृश्‍य-
नारी शि‍क्षापर आधारि‍त समूह गीत-
प्रस्‍तुति‍- सुश्री साधना कुमारी, आशा कुमारी, कंचन कुमारी आ कवि‍ता कुमारी द्वारा...
देश भक्‍ति‍ गीत-
प्रस्‍तुति‍- सुश्री लक्ष्‍मी कुमारी।
तामक तमघैल केर अंति‍म दृश्‍यक प्रस्‍तुति-
मि‍थि‍लाक प्रसि‍द्ध झरनी गीत-
प्रस्‍तुति‍- सुश्री लक्ष्‍मी कुमारी, साधना कुमारी, नीतू कुमारी, लाली कुमारी, कंचन कुमारी, संजू कुमारी आ आशा कुमारी द्वारा...
भाव संगीत-
प्रस्‍तुति‍-
सुश्री अपर्णा कुमारी, चंदन कुमारी, खुशबू कुमारी, ि‍नशा कुमारी, नि‍धि‍ कुमारी आ मोनि‍का कुमारी द्वारा...
देश भक्‍ति‍ गीत-
प्रस्‍तुति‍- सुश्री अपर्णा कुमारी आ साधना कुमारी द्वारा...
अंतमे, पारि‍तोषि‍क वि‍तरन सत्र
मंचासि‍न महानुभाव-
श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल, राजदेव मण्‍डल, रामवि‍लास साहु, प्रो. जय प्रकाश साहु, श्री मनोज कुमार साहु, श्री हेम नारायण साहु, श्री कपि‍लेश्वर साहु आ श्री भागवत साहु।  

2
http://www.videha.co.in/Sumit.jpgवाद-सुमित आनन्द  
शो-पत्रिका मैथिली केर लोकार्पण
http://www.videha.co.in/Sumit_Report_1.JPGhttp://www.videha.co.in/Sumit_Report_2.JPG
शो-पत्रिकाक लगातार आठ अंकक प्रकान एकटा महत्वपूर्ण गप्प थिक। सँ भाषा साहित्यक विकास हत। ई गप्प ल. ना. मिथिला विश्वविद्यालयक कुलपति डॉ. समरेन्द्र प्रताप सिंह कहलनि। ओ सराहनीय कार्यक हेतु विभागाध्यक्षा डॉ. वीणा ठाकुर एवं अन्य विभागीय शिक्षक लोकनिकेँ धन्यवाद देलनि। अवसरपर प्रति कुलपति डॉ. ध्रुव कुमार कहलनि जे मैथिलीक विकासेसँ मिथिलाक विकास हत। हेतु सभकेँ गम्भीरतासँ डटल रह पड़त। वित्तीय परामर्शी सी. आर. डीगवाल कहलनि जे शो-पत्रिकासँ भाषा साहित्यक विकासक संग ओकरा नव दिशा सेहो भेटैत छैक। अवसरपर डॉ. सुरेश्वर झा चिंता व्यक्त कलनि जे सामान्यतया लेखक लोकनि अपन प्रकाशित सामग्री शो-पत्रिकाकेँ दए दैत छथि से नीक बात नै। ओ लोकनि नव लेखन करथु  ओतहि डॉ. भीमनाथ झा शो-पत्रिकाक चयनित रचनाकेँ पुस्तकाकार करबापर बल देलनि संगहि मे डॉ. रामदेव झा सन विद्वानक ब्दकोषकेँ संकलित करबाक हेतु प्रसन्नता व्यक्त कलनि। अवसरपर मिथिला आवाजक सी. . . श्री अजित कुमार आजाद शो-पत्रिकाक प्रकानपर प्रसन्नता व्यक्त करैत मिथिला आवाजक हेतु रचनाकार लोकनिसँ सहयोगक बात सेहो कहलनि। कार्यक्रममे विचार व्यक्त कनिहार अन्य वक्ता लोकनि छलाह डॉ. धीरेन्द्रनाथ मिश्र, डॉ. शशिनाथ झा, डॉ. रमाकान्त मिश्र, डॉ. मित्रनाथ झा एवं डॉ. कृष्णचन्द्र झा मयंक। कार्यक्रममे उपस्थित अन्य प्रमुख व्यक्ति सभ छलाह- डॉ. वैद्यनाथ चौधरी वैजू, डॉ. फूलचन्द्र मिश्र रमण, डॉ. नीता झा, डॉ. रमे झा, श्री अमलेन्दु शेखर पाठक, डॉ. विभूति चन्द्र झा इत्यादि।
कार्यक्रमक अध्यक्षता, स्वागत भाषण एवं अध्यक्षीय भाषण विश्वविद्यालय मैथिली विभागक अध्यक्षा डॉ.  वीणा ठाकुर कलनि तथा मंच संचालन एवं धन्यवाद ज्ञापन विभागक प्राचार्य डॉ. रमण झा कलनि। अमृृता, अर्चना एवं शीतल केर समवेत मंगलाचरणसँ प्रारम्भ भेल कार्यक्रममे श्री सुमित आनन्द स्वागत गीत प्रस्तुत कलनि।
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
http://www.videha.co.in/Satyanarayan_Jha.jpgई० सत्य नारायण झा, ग्रा० -पिलखवाड़,मधुबनी


स्मरण
आइ एकटा पुरान फोटोक एल्बम भेटल |जिज्ञासुबस उलटाकय देखय लगलौ \तीन
चारिटा फोटो एहन भेटल जेकरा देखि स्मृति पटल पर एखनो ओ दृश्य उपस्थित भ
गेल |मोतीलाल नेहरु रीजिनल  इंजिनियरिंग कओलेज ,इलाहाबाद मे पढ़ैत रही |हम
सभ मैथिल विद्यार्थी मिलिकय कओलेज मे मैथिली साहित्य परिषदक स्थापना केने
रही | मास मे दु बेर नियमितरूप सं बैसक होयत छलैक आ  बैसकीक विवरण मिथिला
मिहिर मे  छपबाक लेल पटना पठा देल जाइत छलैक आ मिथिला मिहिर मे सबटा
विवरण छपैत छलैक |हमरा लोकनि मिथिला मिहिर कओलेज मे मंगबैत छलौ |कओलेज मे
ओना चारिटा शिक्षक मैथिल छलाह मुदा नियमित बैसक मे भाग लैत छलाह तत्कालीन
इलेक्ट्रोनिक्सक  प्रोफ़ेसर डा० बी० डी० चौधरी ,जे प्रायः  ओहि कओलेजक एखन
 वर्तमान डायरेक्टर छथि |चौधरी जी नियमित बैसक मे भाग लेथि आ हमरा सभ क
मार्गदर्शन सेहो करथि \परिषदक हम अध्यक्ष रही | परिषद नीक जकाँ चलि रहल
छल |परिषद ततेक बढ़िया चलैत छल जे कतेक ननमैथिल बिहारी छात्र संस्था सं
जुरय लगलाह आ  आयोजन सभ  मे भाग लैत छलाह |मैथिली छोडि कोनो दोसर भाषाक
प्रयोग नहि कएल जाइत छलैक फलस्वरूप बहुत ननमैथिल सभ मैथिली छिट फुट बाजय
लगलाह |
मैथिली भाषाक रीढ़ प्रो० डा० श्री जयकांत मिश्र ओहि समय इलाहाबाद
विश्वविद्यालय मे अंग्रेजीक  बरिष्ठ शिक्षक छलाह |मैथिली भाषाक कर्ता
धरता ,साहित्य अकादमीक मैथिली भाषाक प्रतिनिधि |डाक्टर मिश्रक मैथिली
प्रेम आ हुनक काज जग जाहिर छल |मैथिली भाषा कोना आगा बढ़त ताहि लेल ओ अपन
सभ शक्ति लगा देने छलाह |हम हुनकर ख्याति  बहुत पहिने सं जनैत छलौ |डा०
मिश्र अखिल भारतीय मैथिली साहित्य परिषदक अध्यक्ष छलाह |तै जखन इलाहाबाद
मे नाम लिखायल तमैथिली लेल एकटा ललक छल |इलाहाबाद डा० मिश्रक नगरी छनि
,
तैं मैथिली मे बहुत किछु जनबाक ,सिखबाक सुअवसर प्राप्त होयत ?सत्य पुछी
 एहि नगरी मे मैथिलक  एकटा खास प्रतिष्ठा छलैक |मैथिल कएहिठाम बहुत
इज्जत सं देखल जाइत छलैक |जखन ओहि नगर मे पहुचलौ तमैथिल तभेटथि मुदा
मैथिली नहि भेटय |कोनो खास एक्टिभिटी नहि देखियैक |आश्चर्य लागे ?अपना
मोन नहि माने जे एहि नगरी में मैथिलीक कोनो एक्टिभिटी नहि ?नव लोक एबं नव
छात्र रहने कतौ नीक सं संपर्क नहि होयत छल मुदा जहिना जहिना समय बितैत
गेलैक आ हमरा सबहक परिषद जहिना नीक जकाँ स्थापित भ; गेल ,धीरे धीरे
संपर्को बढ़य लागल, तहन एतबा बुझबा मे भांगट नहि रहल जे एहि ठाम मैथिली
साहित्यक काज तजरुर होयछ मुदा मैथिलक संगठन बहुत कमजोर छैक |एहिठाम
मैथिल संगठन मृत प्राय छैक | जखन हमरा ई बात मोन मे दृढ़ भगेल तहम
एकटा लेख लिखलौ |लेख कशीर्षक छलैक मैथिलीक दुर्दशा आ प्रयाग “|लेखक
आशय यैह रहैक जे प्रयाग मे मैथिलक कोनो संगठन नहि छैक |एहिठामक मैथिली
मरणासन अवस्था मे छैक | लेख मिथिला मिहिर कभेज देलियैक |मिथिला मिहिर
में लेख अक्षरशः छपलैक |ओहि समय मे हमहू तछात्रे रही तै संगठन कविषय
मे ओतेक ज्ञान नहि छल ,तै ई बात नहि बुझि सकलियैक जे ई लेख सं किनका दुःख
हेतनि |
एकदिन कबात छैक |भोरे भोर लगभग ५बजे  रूमक दरवाजा खटखटेबाकक अवाज सुनबा
मे आयल |नींद टूटि गेल |सोचल कोनो संगी होयत |इंजीनियरिंग कओलेज मे छात्र
लोकनि राति मे देर तक जगैत छथि कारण अगिला दिनक काज रातिये मे करय परैत
छैक |भोर मे ८.३० सं क्लास प्रारम्भ भजाइत छलैक  |तै बर अनमनस्कक संग
उठलौ आ दरवाजा खोलि देलियै | आश्चर्य सं आँखिक पुतली उपरे उठल रहि गेल
|
एक महानुभाव धोती पहिरने ,पायर मे कपड़ाक जुत्ता आ मौजा आ उपर सं ओभरकोट
आ माथ मे मोफलर बन्हने |हमरा आश्चर्यचकित देखि ओ पुछलनि ,आप सत्य नारायण
झा हैं ?हम अपन मुड़ी सहमति मे डोला देलियैन |ओ महानुभाव मैथिली मे बजलाह
,
हमर नाम थीक प्रो० डा० जयकांत मिश्र ,इलाहाबाद विश्वविद्यालय |किछु
क्षणक लेल हम विस्फारित नेत्र सं हुनका दिस तकैत रहलौ मुदा तुरत
प्रकृतस्थ होयत गोर लगलियनि आ कुर्सी दय बैसय लेल आग्रह केलियनि |वास्तव
मे हमरा खुशीक ठेकान नहि छल |एतबे मोन मे आबे,  सामने जे बैसल छथि ओ
विश्वविद्यालयक वरिष्ठ प्रोफ़ेसर आ मैथिलीक योद्धा डा० श्री जयकांत मिश्र
छथि |हम अगल बगल सं कइएक संगी सभ कबजा लेलियैक |- गोटा हमरा रूम मे
पहुँच गेलाह |
डा० मिश्र हमरा पुछलनि जे मिथिला मिहिर मे अहीं मैथिलीक दुर्दशा आ
प्रयागनामक आलेख लिखल अछि|  मिथिला मिहिर  कोटक जेबी सं निकालि देखेलनि
|
हम कहलियैन ,जी हमही लिखने छी |ओ सीधा प्रश्न पुछलनि ,”आहाँ मैथिली क
बिषय मे की जनैत छियैक ,प्रयाग में किनका किनका जनैत छियैक ?हमरा बुझा
गेल जे मामला किछु टेढ़ छैक तै हम चूपे रहलौ |ओहुना मैथिलीक भीष्म पितामह
लग हमर औकाते की छल ?जे मैथिली भाषाक इतिहास पर डी०फ़िल० केने छलाह ,हुनका
लग हमरा सन तुच्छ लोक जेकरा वास्तव मे मैथिलीक इतिहासक कोनो अध्ययन नहि
छलै ,की बजितै ?ओहुना आइ काल्हिक युवक जकाँ हमर समय मुहफट नहि छल ,जे
हमही सभ सं बेसी काविल छी |ओहन उदभट विद्वान लग हम की जिरह करितौ ?
कहलनि चुप रहने काज नहि चलत ?,आहाँ सं गलती भेल अछि |आहाँ माफीनामा लिखि
मिथिला मिहिर  के भेजू |हम कहलियैन ,सर ,हम तमैथिली भाषा दनहि लिखल
अछि |हमर स्पस्ट लेख मैथिल संगठन सं सम्बंधित अछि ,जे वास्तव मे संगठित
नहि छैक \जखन संगठने नहि तखन भाषा ,समाज आ क्षेत्रक उत्थान कोना हेतैक ?
ओ कहलनि संगठन लेल काज करब ?हम कहलियैन ,निश्चय काज करब |कहलनि माफी नामा
नहि लिखब ?हम कहलियैन ,हम अपनेक विश्वविद्यालयक छात्र छी ,हमरा सं जौं
भूल भगेल होय तमाफ कएल जाय |कहलनि ,अच्छा ,ठीक छैक |मुदा आहाँ अपना
टीमक संग अगिला रवि दिन गंगा नाथ झा रिसर्च संस्थान मे  ४बजे साझ मे भेट
करू |चलू ,आब आहाँ सबहक संग प्रयाग मे एकटा सशक्त संगठन तैयार करी |ओ चलि
गेलाह |
हमरा सभहक देह मे एकटा नव संचार जन्म लेलक |अगिला रबि कहम ५-६संगीक संग
रिसर्च संस्थान पहुचलउ |ओ ओतहि रहथि |ओहिठाम आओर लोक सभ रहथि मुदा मुख्य
छलाह डा० किशोर नाथ झा |ओहिठाम संगठन पर चर्चा भेलैक आ संगहि एकटा कमिटीक
गठन कएल गेलैक |आब हम सभ पुरा शहर हरेक रबि कघुमय  लगलौ |हम ओहुना
हुनका आबास पर जाय लगलौ |हमरा बहुत अंतरंगता भगेल |मैथिलीक इतिहास
भूगोल सभ हुनका मुहें सुनी |कहियो कहियो मैथिलीक पुस्तक सेहो हुनका सं ली
आ पढ़ी |एहि तरहे संगठन सं लोक सभ जुरय लागल |बहुत दिनक बाद एकटा बैठक मे
निर्णय भेल जे विद्यापति पर्व समारोह मनायल जाय ,जाहि सं दुटा बात होयत
|
पहिल मैथिल सभ कएक सूत्र मे जोड़ल जायत आ दोसर  संगठन कतेक मजबूत भेल
तेकरो आकलन भसकतैक | विद्यापति पर्व सफल हुए ताहि मे हम सभ जी जानि सं
जुटि गेलौ |एहि काज लेल पुरा शहर कभ्रमण पुनः कएल गेलैक |डा० मिश्र
अपनहु बेसी काल हमरा सबहक संग घुमैत छलाह |एक एक लोक सं संपर्क कएल गेलैक
|
इंजिनियरिंग कओलेज ,एग्री कलचर कओलेज ,कुलभास्कर आश्रम कओलेज ,मेडिकल
कओलेज ,युनिभर्सिटी ,केनटोमेंट एरिया ,वमरौली एयर फ़ोर्स तथा रेलबेक संग
नगर ककइएक मुहल्लाक हम सभ कतेको बेर घुमलौ |नीक संख्या मे लोक उपस्थित
होयबाक सम्भावनाक अनुमान लगायल गेल |सभ दिन घूमी आ साँझ मे डाक्टर साहेब
रिपोर्ट दैत छलियैन |ओ कतेक खुशी होयथि तेकर वर्णन नहि   सकैत छी
|
एक मैथिल कदोसर सं खुब संपर्क भगेलैक |आब विद्यापति समारोहक रूप
रेखा तैयार होमय लगलैक |निर्णय भेलैक जे उदघाटन कर्ता हास्य सम्राट श्री
हरिमोहन झा जी ,मुख्य अतिथि कवि वर श्री राम कुमार वर्मा केर निमंत्रण
पठायल जाय |स्वागताध्यक्ष डा० श्री एस० एन० सिन्हा ,एच० ओ० डी०
,
इंजिनियरिंग कओलेज कबनायल गेल |महासचिव हमरा बनायल गेल ,सचिव श्री
सुरेश चन्द्र झा ,हमर प्रिय संगी,  संगहि  कार्यकारणीक सदस्य सभ बहुत
गोटे  रहथि |ओहि समय कतमाम कलाकार ,कवि सभ कनिमंत्रण पठायल गेल |ओहि
समय कमिथिलाक लोक प्रिय जोड़ी रविन्द्र महिंद्र कआमंत्रित कएल गेल आ
ई लोकनि आयलो रहथि |निमंत्रित सबहक रहबाक ब्यबस्था इंजिनियरिंग कओलेज मे
कएल गेल रहैक |सांस्कृतिक कार्यक्रम मे गीतनादक अलाबा एकांकी नाटक सेहो
राखल गेल रहैक |नाटक रहैक उपनयनाक भोजजे विशुद्ध हास्य नाटक छलैक
|
नाटक मे हम   ब्राह्मण बनल रही ,जमींदार बनल रहथि हमर प्रिय सहपाठी
पुरुषोत्तम झा जी  ,टूनटूनमा ,जमीन्दारक नौकर बनल रहथि श्री हीरा कान्त
झा ,अन्य कलाकार युनिभर्सिटी करहथि |
निर्धारित दिन कविद्यापति पर्वक कार्यक्रम प्रारम्भ भेलैक |अपूर्व
सफलता भेटलैक |अथाह जन समूह उपस्थित छल |नाटक सभ कार्यक्रम  सं बेसी सफल
भेलैक |नाटकक कथानक पूर्ण रूपे हास्य छलैक |’बहुरी झाक बेटा कउपनयन
छलनि |समूचा गाम कनोत रहैक मुदा धोखा सं ब्राह्मण कनोत छुटि गेलनि
|
समूचा गाम खुब कच्ररमकुट कभोज  खयलक मुदा ब्राह्मण भुखले रहि गेलाह
|
आब ब्राह्मण सोचलनि जे एहन तिकरम लगाबी जे हुनको नोत भेटनि |ओ बहुरी झाक
एकटा कुटुम्बक घोड़ा चोरा ककतौ जंगल मे नुका देलखिन्ह |घोड़ा ताकल गेल
मुदा नहि भेटलैक |ब्राह्मण अपन पत्नी द्वारा प्रचार करबा देलखिन जे
ब्राह्मण बहुत पैघ गुनी छथि ,ओ नह  पर काजर लगा चोर कपकरि लैत छथिन
|
अपने चोरायल घोड़ा कतंत्र बल सं कोना कताकि दैत छथिन आ कोना फेर सं
नोत परैत छनि ,यैह नाटकक मुख्य कथानक छलैक |
हमरा सब जखन जखन नाटक कअभ्यास करी ,डा० साहेब ओतहि रहैत छलखिन आ जहाँ
त्रुटि भेल तुरत सुधार करथीन |नाटक बढ़िया होबक  चाही , ताहि लेल नीक दिशा
निर्देश देथिन |साज श्रृगार करय लेल एकटा बंगाली रंग कर्मी कमंगायल गेल
रहैक |ओहि मोशायक नाम माया दास रहनि मुदा हम हुनका मेकप सं संतुष्ट नहि
रही तै हम अपन मेकप अपने केलौ |हमरा याद अछि हम जहिना स्टेज पर गेलौ
,
हमरा देखिये कदर्शक भभा कहंसय लागल |नाटक अत्यंत सफल भेलैक |लोक
हँसैत हँसैत  लोट पोट भगेलैक | नाटक ततेक सफल भेलैक जे हर साल नाटकक
मंचन होमय लगलैक |दोसर साल हथ टुट्टा कुर्सी आ हिचकीक टोटमा मंचन
भेलैक |बहुत दिन तक डा० जयकांत मिश्रजी सं सम्बन्ध रहल मुदा राउरकेला
स्टील प्लांट मे नौकरी करबाक बाद धीरे धीरे संपर्क कम होयत गेल आ बाद मे
लगभग संपर्क खतम भगेल |
एखनो इलाहाबादक स्मरण भजाइत अछि |इलाहाबाद हमरा लेल सभ सं पैघ गुरु
घराना अछि |आइ १९७२ ई० मे मनायल गेल विद्यापति पर्व समारोहक किछु फोटो
एल्बम मे देखबाक सुअवसर भेटल आ स्मृतिपटल पर सभटा चल चित्र जकाँ उभरि आयल
|
कतेक सुखद दिन छल ओ |


ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
http://www.videha.co.in/JagdanandJha.jpgजगदानन्द झा मनु
ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीहटोल, मधुबनी 
दूटा विहनि कथा- जुग-जुग जीबए/ समय चक्र

.जुग-जुग जीबए...

एखन ओ कतए अछि, कोना अछि, की करैत अछि, हमरा किछु पता नै, बस एतबेए बुझल अछि जे आइ ओकर जन्म दिन छैक |”
पचपन बर्खक, उज्जर सारीमे लपटल बूढ़ बिधबा माएक दिमागक ई गप्प | एककेँ बाद एक खोल हुनक इआदक केथरीसँ निकैल-निकैल कए इन्द्रधनुषी आकाशमे हिलकोर मारि रहल छल | बैसल, हुनक सामने माटिक एकचूल्हीयापर चढ़ल भातक हाँड़ीसँ बरकैकेँ खड़-खड़-खड़केँ अबाज आबि रहल छल | भात जड़ि कए कोयला भऽ गेल रहति जँ चेराक आँच अपने जड़ैत-जड़ैत चूल्हासँ निकैल कए बाहर नहि जड़ए लगितै |
पन्द्रह बर्ख पहिने कहि गेल दिल्ली जाइ छी, खूब पाइ कमाएब | नीक घर बनाएब | तोरा नीक नीक सारी कीन कऽ आनि देबौ | बाबूक लेल सुन्नर साईकिल कीनब | मुदा ! सभ बिसैर गेल | शुरू-शुरूमे दू-तिन मासपर चिठ्ठीयो आबेए, छह महिना बरखपर किछु पाइयो आबेए मुदा बादमे सभ बन्द | कोनो खोज खबरे नै | ओकर गेलाक छह बरखक बाद बलचनमा मुँहे सुनलहुँ जे ओ दिल्ली बाली मेमसँ बियाह कए लेलक | आर कोनो समाद नाहि | बापोकेँ मुइला आइ पाँच बरख भऽ गेलन्हि, ओइहोमे नहि आएल | ओकरा तँ बापक दिया बुझलो हेतै की नै---- | आइ ओकर जन्म दिन छैक, लऽगमे रहैत तँ बड्ड रास आशीर्वाद दैतियैक मुदा दुरे बड्ड अछि | जतए अछि खुश रहेए.... जुग-जुग जीवेए... हमर लाल |”   

      



.समय चक्र 

किशुनक विशाल ड्राइंग रूम । तीन बीएचके फ्लेटमे आलीशान २५० वर्गफूटक हॉल नूमा ड्राइंग रूम ओहिमे ४८ इंचक सोनीक एलसीडी  टीवी लागल । डीस टीवी, म्यूजिक प्लेयर, फर्सपर जड़ीदार लाल रंगक विदेशी  क़ालीन । दवाल सभपर मनभावन मधुबनी पेंटिंग घरक सोभामे चारि चान लगाबैत । मोट- मोट गद्दाक बनल मखमली सोफा सेट, ओहिपर किशुनक मामा-मामी ओकर वेसबरीसँ बाट जोहैत, जे कखन ओ आएत आ ओकरासँ दूटा गप्प कए अपन समस्याक समाधन करी । हुनक दुनू प्राणीक  दू घंटाक प्रतीक्षा बाद किशुन, बोगला सन उज्जर चमचमाइत  बरका कारसँ आएल । घरक डोरवेल बजेलक घर खुजल । भीतर प्रवेश कएलक । भीतर पएर धरैत देरी ओकर नजैर अपन मामा- मामीपर परलैक । तुरन्त आगू बढ़ि हुनकर दुनू पएर छुबि आशीर्वाद लेलक । हाल समाचार पुछैत अपनो एकटा सोफापर बैसैत - "कएखन एलीऐ"
मामी - "इहे करीब दू घंटा भएले"
किशुन अप्पन कनियाँकेँ आवाज़ दैत - "यै, सुनैछीयै ! किछु चाह पानि नास्ता देलियैन्हेकी"
मामा - "ओसभ भए गेलै, बस अहाँसँ किछु जरूरी गप्प करैक  छल"
किशुन - "हाँ हाँ कहु ने, हमर सोभाग्य जे अपनेक किछु सेबाक मोंका भेटत"
मामा कनखीसँ इसारा कए मामीक दिस देखलाह, आ ओकर बाद मामी - " बौआ ! अहाँ तँ सभटा बुझिते छियै जे मामाक नोकरीक आइ- काल्हि की दशा छनि । कएखनो छनि तँ कएखनो नहि । रहलो उत्तर ई सात- आठ हजार रुपैया महिनाक नोकरीसँ की है छैक ...... (कनी काल चूप, आगू  सोचैत ) अहाँकेँ तँ बुझले अछि, बरुण आइ आइ टीक प्रवेश परीक्षा पास कए लेलक । आब ओकर एडमिशनकेँ आ किताब आदी लेल दू लाख रुपैया चाहीऐ । हिनका अपना लग तँ एको रुपैया नहि छनि, आ अहाँ तँ बुझिते छियै दियाद बाद कएकराकेँ दै छैक । बहुत आशा लए कए अहाँ लग एलहुँहेँ , अहाँ किछु रुपैयाक व्यवस्था कए देबै तँ छौड़ाक जिनगी बनि जेतै"  
सभ चूप्प । पिन ड्राप सैलेन्श । किशुन अपन आँखिसँ चश्मा निकालि दुनू आँखिक कोन कए सभसँ नूका कए पोछ्लक । कियो ओकर आँखिक कोनसँ खसैत नोरकेँ नहि देखने हेतै मुदा ओकर दुनू आँखिक कोनसँ नोरक दू दू टा मोती सरैक कए ओकर रुमालमे हड़ा गेलै । पुनः अपन चश्मा पहिरलक आ अपन आँखिक नोरक पाँछाँ करैत बीस बर्ख पाछू चलि गेल ।
जखन किशुनक माए बाबू आ मामा मामी एके झोपड़पट्टीक एके गलीमे रहैत छला । एक दिन ! महिनाक अन्त तक ओकर बाबूक हाथ खाली भए जेबाक कारण घरमे अन्नक अभाबे ओ अपन माएकेँ कहलापर एहि मामीसँ जा कहने रहनि दू सेर चौर देबएक लेल । मामी चौर तँ देलखिन मुदा ओहिसँ पहिने ठोर चिब्बैत कहने रहथिन - " की बाप पाइ नहि दए क गेलाह, एहिठाम कोन बखाड़ी लागल छैक "
ओ गप्प किशन आइ तक नहि बिसरल । आ ओकर आँखिक नोरक कारण इहे गप्प छल । ओहि  गप्पक कारणे आइ ओ झोपरपट्टीसँ निकैल एकटा नव दुनियाँमे पएर रखलक । पुनः अपनाकेँ वर्तमानमे आनैत किशन चट्टे अपन कोटक जेबीसँ चैक बुक निकालि, ओहिपर दू लाख रुपैया भरि मामाक दिस बढ़ेलक ।
मामा चैक लैत - "बौआ अहाँक ई उपकार हम कहियो नहि बिसरब, एखन तँ नहि चारि वर्खक बाद वरुणक नोकरी लगलापर सभसँ पहिने अहींक पाइ वापस करत"
किशन - "की मामा अहुँ लज्जित करै छी ई सभ कएकर छैक, की वरुण हमर भाइ नहि अछि । ई हमरा दिससँ एकटा छोट भेंट अछि । एकर चिंता अहाँ नहि करब ।
*****
 
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com  पर पठाउ।


. पद्य











...http://www.videha.co.in/BindeshwarNepali.jpgबिन्देश्वर ठाकुर "नेपाली"-प्रेमक फल/ पिया अहाँक यादमे  .http://www.videha.co.in/kishankarigar.jpg किशन कारीगर- मनुक्ख बनब कोना?
.http://www.videha.co.in/JitendraKumarJhaJitu.jpgजितेन्द्र जितु.http://www.videha.co.in/Ramvilas.jpgरामवि‍लास साहुक दूटा कवि‍ता- पुसक रात/ केना कहब भारत महान .http://www.videha.co.in/ShivJha.JPGशि‍व कुमार झा टि‍ल्‍लू-कवि‍ता- पुरीक यात्रा

यथार्थ
http://www.videha.co.in/JitendraKumarJhaJitu.jpgजितेन्द्र जितु
यथार्थ
शर्मा जी चलि गेलाह
घर, परिवार
समाजसेवा राजनीति धर्म
सभ छोड़िकऽ
शून्य अछि घर परिवार
स्तब्ध सहकर्मी, सहपाठी आ समाज
शुन्यता आ स्तब्धताक बिच
पञ्चतत्वमे विलीन
विलीन भऽ गेला शर्माजी

बड़का आलीसान कोठा
चमचमौआ कार
नोकर चाकर
राजसी ठाठबाठ
सभ आइ भतोभंग
ई सब अरजबाक लेल
की नै केने छल मुनचुन बाबु
मुदा किछु नहि अपन
दु हाथक चेथराक साग
विलीन
विलीन भऽ गेलाह
पञ्चतत्वमे ओहो

सभ जाएत, सभ चलि जाएत एक दिन
मंगली एतबै रटैत छली
आ लोक ओकरा
बताहि कहैत छल
बतैहिया, सेहो नहि रहलीह
सभ मिलि ओकरो दऽ एलै कोसी कात
आ विलीन
विलीन भऽ गेलि
पञ्चतत्वमे ओहो
http://www.videha.co.in/Ramvilas.jpgरामवि‍लास साहुक दूटा कवि‍ता-

पुसक राति‍

पुसक राति‍
जाड़क मारल
थरथराइत देह
केना बचाएब प्राण।
फुइसक घर खोपड़ी सन
केना िबताएब पुसक राति‍
घरक टाट-ठाठ झलफाँफी
कनकनी हवा
छुबैए प्राण
घुराड़ी जरा-जरा
बचबै छी कहुना प्राण
मुदा धि‍या-पुताक
केना बचतै प्राण।
नार-पुआरक बि‍छौना
गोनरि‍क छै ओढ़ना
पजरेमे सटि‍
बि‍लाइ दुबकल छै
अबगरहमे छै ओकरो जान
सबहक मुँहेँ सुनै छी
पुसक राति‍केँ फूसि‍ नै बुझि‍यौ
कतेकोकेँ लइ छै प्राण
माघो मास अगुआएले छै
सुनि‍ कऽ करेजा दरकैए
केना भेटत ऐसँ त्राण
आब लगैए नै बचत प्राण
के करत गरीबक कल्‍याण।

केना कहब भारत महान
जे देशक लेल ति‍याग करैए
ओकरे जि‍नगी नरक सन बनल-
गरीबक दुख कोइ नै बुझैए
हाथ रहि‍तो नै छै कोनो काम
सुखल खेत नै भेलै धान
जि‍नगी बि‍तै छै बैसल मचान
तौनी कोपीन पहि‍र जे रहलै
गाम-समाजकेँ पकड़ि‍ चललै
आफतमे मि‍ल देशकेँ बचैलकै
गोली खा देलकै बलि‍दान
देश अजाद भैलै मुदा
दि‍न-दुखि‍याक दुख कि‍यो ने बटलकै
गरीब बनल छै अखनो गुलाम
सभ धन सरकारे लेल छै
गरीब जनताक हक छि‍नलकै
आइ धरि‍ नै भेलै गरीबक उत्‍थान
भुखले पेट तेजै छै प्राण
जे लहू पसि‍ना सभ दि‍न बहबै छै
आगू बढ़ि‍ सीना तानि‍
ओकरे दुख नै सरकार बुझलकै
ठेल देलकै नरकमे जानि‍
मरलकेँ मारैत रहलै
जानि‍ बूझि‍ बि‍नु लाभ-हानि‍
देशक समस्‍या बढ़ैत जाइए
सरकार ओकरा दबबैत जाइए
समस्‍या बनल अछि‍ ज्‍वालामुखी समान
केना कहब भारत महान।


http://www.videha.co.in/ShivJha.JPGशि‍व कुमार झा टि‍ल्‍लू
कवि‍ता
पुरीक यात्रा

जीवन यात्रा थि‍क
जैव पथि‍क
अजैव दर्शक
शरीर शाश्वत नै
ई क्षणभंगुर-नाश्वर
आत्‍मा मौलि‍क तत्व
जइपर पंच रचि‍त-
शरीरक कोनो ि‍नयंत्रण नै
ऐ अधम शरीरक एक्को क्षणक
कोनो गारंटी वा वारंटी नै
तँए सदि‍खन अपन पथपर
चलैत रहू- चलैत रहू
जतेक क्षणक जीवन
जतेक दि‍न उगैत सुरुजक दर्शन
आनंद उठबैत रहू
सभ भगवत कृपा थि‍क
बूढ़-बुढ़ानुसक मुखसँ सुनैत छलौं
आब देख रहल छी
मोबाइल खरीदैत काल
एक बरखक वारंटी कार्ड भेटल
सोचए लगलौं
भगवान हमरा जनमैकाल
कि‍अए ने मायकेँ
हमरा संग मि‍नटो भरि‍क
वारंटी कार्ड देलनि‍...?
एकर उत्तर देनि‍हारि‍ माय
हमर बौद्धि‍क वि‍काससँ पूर्वहि
अरुप भऽ गेली
मर्त्‍य भुवनमे पठबैबला
पर ब्रह्म तँ सहजे ि‍नरंकार छथि‍
केकरासँ पूछब...?
‍अंत कालमे बाबाकेँ खोआ खएबाक
सख लगलन्‍हि‍..
जेना दुरगमनि‍याँ कनि‍याँ होथु
आश्चर्य...
कफ, पि‍त्त आ वायुक त्रि‍वेणी
कंठकेँ घेर नेने छल
तैयो मुइलाक कोनो जि‍ज्ञासा नै
कोनो इच्‍छा नै-
केना हएत-
कतए जाएब?
गरुड़ पुराण आ श्राद्ध
समाज स्‍वीकार कऽ रहल
मृतात्माकेँ स्‍वर्ग पठा रहल
मुदा मरनि‍हार- अचंभि‍त
ओकरा केना पता लागए
जे ओ कतए जाएत...?
सभ अन्‍हारेमे वाण चलबैछ-
तँए बेटा-पुतोहुक गारि‍-मारि‍
खाइयो कऽ बाबा जीबए चाहैत छला
हुनक यात्रासँ आजुक यात्राक-
कोनो तुलना नै
बाबाक अंति‍म यात्रासँ पथि‍क सभ
जतरा बनौने छल-
आजुक यात्रा केकरो पसि‍झा देत
प्रस्‍तुत अछि‍ पुरीक यात्राक गाथा
कोनो जगन्नाथ परी वा द्वारि‍का पुरी नै
हमर सहकर्मी सहधर्मी पुरी
पहि‍ने सरुप छल
आब अनूपसँ अरूप भऽ गेल अछि‍
की मनुक्ख...
एतेक आनंदि‍त रहि‍ सकैत अछि‍...?
युवावस्‍थामे ि‍नर्वाणक लगि‍च आबि‍ कऽ
जीवन पथक शि‍खर लग
नै-नै अधगेरसँ पूर्वहि‍
स्‍थाय वि‍श्राम अवश्‍य हएत
ई जनैत एतेक शांत मंद मुस्‍कान
आब! भ्रम दूर भऽ गेल
आनंद सि‍नेमा देखैत काल
बाबूजी सँ पुछने छलि‍यनि‍
की ऐ तरहक घटना संभव छैक...?”
हम तँ नै देखने छी
भऽ सकैछ अहाँ देख लेब!
साहि‍त्‍येसँ सि‍नेमा बनल
भलहिं ई व्‍यवसायि‍क साहि‍त्‍य अछि‍
परंच साहि‍त्‍यकारक परि‍कल्‍पना सेहो
ईह लौकि‍के होइत अछि‍
एकटा साहि‍त्‍यकारक तर्ककेँ
तखन तँ काटि‍ देने छलौं...
मुदा! आब तँ भ्रम अवश्‍य दूर भऽ गेल
तीन-तीन अवोधक पि‍ता
अनूप अरूप हएत
जनैत छल
केकरो नै कहलक
जीबाक भुभुक्षामे
व्‍याधि‍सँ मुक्ति‍क आशमे
अपन अर्जित सभटा धन
पि‍तृ धर्म आ कंत धर्मक
रक्षा हेतु नष्‍ट कऽ देलक
जीवाक पि‍आसकेँ बढ़बैत गेल
मृत्‍युसँ लड़ैत गेल
अपनहि‍मे सि‍मटि‍
दोसर लग हँसैत
चलि‍ देलक
अंति‍म यात्रामे
केकरोसँ यात्रामे
केकरोसँ नै कहलक
अपन अंर्तव्‍यथा
अपन अंत:करणक पथराएल
पि‍पासा वा उच्‍छवास
अंति‍म आश्चर्य...
जेकरासँ अन्नय सि‍नेह करैत छल
ओइ अर्द्धांगि‍नीसँ केना नुका लेलक...?
हमरो जीवनक तमाम सत्‍यकेँ
ओइ सबला- जे आब अवला!!
कहि‍ नुका सकल
ओकरासँ ओकरे अधि‍कार
केना छीन लेलक...?
बि‍नु कि‍छु कहने छोड़ि‍
चलि‍ देलक कनैत
कोनो गप्‍पकेँ हुनकासँ
नै छल नुकबैत
अथाह व्‍यथाक इनारमे
कनि‍याँकेँ कनैत...
की ओ पाथर छल
एतेक कठोर तँ पाथरो नै
सद्य: ओ छल-हीरा
कठोर टीससँ भरल हीरा
ऊपरसँ चमकैत रहल
कि‍रणक संग हँसैत रहल
हारि‍ गेल तँ चलि‍ देलक
हँसि‍ते चलि‍ देलक
एक बून नोर जौं खसबो कएल
तँ अपन जेठकी अबोध कन्‍याकेँ देख
वाह रौ साहसी
तोहर जबाव नै
ऐ अदम्‍य साहसकेँ
कोटि‍-कोटि‍ नमन!!!
गृहस्‍थ धर्मक एहेन पालन देख
धर्मराज जौं हएत
तँ अवश्‍य लजा गेल हएत
ऊपर जा कऽ ओकरा संग-संग
आन दैवा सभसँ पूछि‍ तँ लि‍हैं
आब तीन-तीन अबोधक संग-संग
ऐ अवलाक झाँझ बनल नाह
केना ऐ कुटि‍ल अथाह भव सागरमे
वि‍चरण करतै...?
एहेन अन्‍यायकेँ दैवि‍क चक्र
लोक केना कहतै...?

 
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
 http://www.videha.co.in/AmitMishra.jpgअमित मिश्र
करियन ,समस्तीपुर
मिथिला ,बिहार  
जीवन एहिना चलैत रहै छै/  जागू/ मित्र/ समयक संग/ नारीक रूप
.
जीवन एहिना चलैत रहै छै

कखनो घटाउ आ कखनो जोड़ै छै
कखनो गुणा कखनो भाग करै छै
कखनो आगू कखनो पाछू घुसकै छै
जीवन एहिना सतत चलैत रहै छै

कखनो दुखक भूकंप सुनामी आबै छै
कखनो सुखक गमगम फूल बरसै छै
कखनो भीड़मे कखनो एकान्त जीबै छै
जीवन एहिना सतत चलैत रहै छै

कखनो पिछरै कखनो दौड़ै छै
कर्मक पथपर काँट-रोड़ो भेटै छै
नदी नाला सब बाधा लाँघै छै
जीवन एहिना सतत चलैत रहै छै

किछुए दिनकेँ साँस भेटै छै
जे किओ एक्को पल नै रुकै छै
घड़ीक सुइया संग जे किओ बढ़ै छै
वएह मानव एतऽ अमर रहै छै
जे बैसल समय व्यर्थ करै छै
वएह मनुख सब दिन कानै छै
एहन लोक लेल किओ नै रूकै छै
जीवन एहिना सतत चलैत रहै छै

जागू

कान्हपर धेने झोरा-झपटा
सौँसे माँथ चानन-ठोप्पा
हाथ कमण्डल आरो चुट्टा
दाढ़ी लटकल कोशो जट्टा
नङ-धरङ रगरने भभूत
नेने भागै बूझि कऽ भूत
टाका-अन्न माँगैथ लऽ रामक नाम
पैदल जाथि घर घर सब गाम
एहिमे किछु छथि सत्ते भक्त
आ किछु छथि ढोंगी ससक्त
गलत काज आ अंधविश्वास
हुनक खूनमे केने छै वास
सब रोगक उपचारक दावा
एह भेषमे ई सब छथि गामक बाबा
.सी घर आ फूलक ओछेनपर
धुमन आगरबत्तीक महक  आठो पहर
शिष्य मण्डलीमे नर कम बेसी नारी
सरकारी वा नीजी लागल पहरेदारी
ई छथि सब शहरक बाबा
हिनको छै बड पैघ पैघ दाबा
सब समस्याक हिनका लग उपचार
लाखक-लाख टाका देलापर भेटत साक्षात्कार
किओ फेकबेलनि घरसँ बाहर मूर्ति
किओ अपनेकेँ बतबै छथि अवतरित देवी
अंधविश्वासक हिनको लग हल्ला
पढ़ल जनताकेँ मूर्ख बनाबथि खुल्लम खुल्ला

जागू जागू एखनो यौ भाइ
बादमे की हएत पछताइ
दऽ दिऔ भूखलकेँ दूध-मेवा
बाँटि दिऔ गरीबमे सब टाका
नाङटकेँ पहिरा दिऔ कपड़ा
एकरे दुआसँ शान्त हएत ग्रह-नछतरा
तखने करताह भगवानो भलाइ
जागू जागू एखनो यौ भाइ

.
मित्र

किछु पुरना मित्र जेकर
बस इयादे टा छल बचल
बाधक गीत इस्कूलक खेल
क्षणमे झगड़ा क्षणमे मेल
किछु नीक किछु बेजाए गपशप
बाल दिनक खून करै रपरप
जेकरे संगे होइ छल साँझ-भोर
ओ चन्ना आ हम चकोर
मुदा समयक संग सब किछु बदलल
सबपर आब टाकाक रंग पोतल
सबहक मोन एना बदलि देलक
आब देखिते ओ मित्र मुँह फेर लेलक ।

.
समयक संग

नै शेष बचल कोनो उमंग
ठमकल सन जिनगीक तरंग
कोना कऽ उड़तै मोनक पतंग
आशक डोर बीच्चेमे भेल भंग
सब ठाम राजनीतिक बड़का जंग
अपनौती भैयारी भेल अपंग
सालक साल एक्के ठाम सब प्रसंग
टूटल छै देशक समाजक विकासक अंग

मुदा सदिखन बदलै छै जीवनक रंग
बैसल रहलासँ नै जीतब कोनो जंग
छोरू सबहक चिन्ता बनबू अपन एक ढंग
अपन विकासक लेल करू अपनेकेँ तंग
रूकू नै बढ़ैत रहू सदिखन समयक संग

.
"
नारीक रूप"
सब दिन देखैत छी
सब अखबारक पहिल पन्नापर
आइ एतऽ तँ काल्हि ओतऽ
छीन लेल गेल नारिक इज्जत
डाहि देल गेल कोमल कायाकेँ
वा चापि देल गेल घेँट कोनो निसबद रातिमे
हाट बजार सब ठाम देखैत छी
छेड़छाड़ होइत कोनो नवयौवना संग
आ ओहि नवयौवनाक राँगल चामपर
आबै छै कने लाजक वा क्रोधक लाली
सुरमासँ कारी भेल आँखि आ रंगीन पिपनीपर
खीँच जाइ छै गोस्साक चेन्ह
संगहि राँगल ठोरसँ निकलैछ मीठ तरंग
"
की तोरा घरमे बहिन नै छौ?"
कहबाक मने रहै छै एक्के टा जे
हमर सम्मान कर
भऽ सकै यै ,हमरा बहिन नइ होइ
भऽ सकै यै ,हम कहियो पति बनबे नै करी
तखन नारिक ई दुनू रुपकेँ हम सम्मान नै करब
तँ की हम नारिक अपमान करब?
नै ।हम एखनो नारिक एकटा रूपकेँ मानै छी
जे रुप हमरा जीवन देलक
ओ रूप जेकर कोरामे खेलल छी
ओ रूप थिक माएक रूप
तेँ हम नारिक इज्जत कोनो पत्नी-बहिन रूपमे नै
बल्कि अपन जननीक रूपमे करब

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
.http://www.videha.co.in/ShivKumarYadav.jpgशिव कुमार यादव-गजल -४ २.http://www.videha.co.in/JagdanandJha.jpgजगदानन्द झा मनुगजल -
http://www.videha.co.in/JagdanandJha.jpgजगदानन्द झा मनु
ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीहटोल, मधुबनी 

गजल -  

भूतलेलहुँ किए एना मित बना लिअ 
छोड़ि सगरो बहानाकेँ  प्रित लगा लिअ 

वचन नै देब हम नै किछु मोल एकर 
आउ चलि संगमे  हमरो अप्पना लिअ 

काँट पसरल बिछ्ब कहु एतेक कोना 
फूलकेँ लय कs मोनक संसय हटा लिअ 

जुनि बुझू आन जगमे सपनोसँ कखनो 
बूझि अप्पन कनी छू ठोरसँ सटा लिअ 

रूप सुन्नर अहाँकेँ ई ओहिपर बदरा 
जीब कोना करेजामे "मनु" बसा लिअ 

(बहरे - असम, मात्रा क्रम - २१२२-१२२२-२१२२ )

गजल- 

जीवन कखन तक छैक नै बुझलक कियो 
कखनो करेजक गप्प   नै जनलक कियो 

भेटल तँ जीवनमे सुखक संगी बहुत 
देखैत दुखमे आँखि नै तकलक कियो 

दुखकेँ अपन बेसी बुझै किछु लोक सभ 
भेलै जँ दोसरकेँ तँ नै सुनलक कियो 

सदिखन रहल भागैत सभ काजे अपन 
आनक नोर घुइरो कs नै बिछ्लक कियो 

जीवन तँ अछि जीवैत 'मनु' सभ एतए 
मइरो कs जे जीवैत नै बनलक कियो 

(बहरे- रजज, २२१२ तीन-तीन बेर सभ पांतिमे)

गजल- 

जखन खगता सभसँ बेसी तखन ओ मुँह मोड़ि लेलनि 
जानि आफत छोरि हमरा सुखसँ नाता जोड़ि लेलनि 

देखि चकमक रंग सभतरि ओहिमे बहि  तँ गेली 
जानि खखड़ी ओ हमर हँसिते करेजा कोड़ि लेलनि 

बन्द केने हम मनोरथ अप्पन सदिखन चूप रहलहुँ 
पाञ्च बरखे आबि देख फेर सपना तोड़ि लेलनि 

दुखसँ अप्पन अधिक दोसरकेँ सुखक चिन्ता कएने 
आँखि जे फूटै दुनू तैँ एक अप्पन फोड़ि लेलनि 

चलक सप्पत संग लेलहुँ जीवनक जतराक पथपर 
मेघ दुखकेँ देखते ओ संग 'मनु'केँ छोड़ि लेलनि 

(बहरे - रमल, मात्राक्रम- २१२२ चारि-चारि बेर सभ पांतिमे)    

गजल - 

किए तीर नजरिसँ अहाँकेँ चलैए 
हँसी ई तँ घाएल हमरा करैए 

मधुर बाजि खन-खन पएरक पजनियाँ 
हमर मोन रहि रहि कए डोलबैए   

छ्लकए हबामे अहाँकेँ खुजल लट 
कतेको तँ  दाँतेसँ   आङुर कटैए

ससरि जे जए जखन आँचर अहाँकेँ 
जिला भरि  करेजाक धड़कन रुकैए 

अहीँकेँ तँ मुँह देखि जीबैत 'मनु' अछि 
बिना संग नै साँस मिसियो चलैए 

(बहरे - मुतकारिब, मात्राक्रम -१२२-१२२-१२२-१२२)

http://www.videha.co.in/ShivKumarYadav.jpgशिव कुमार यादव
गजल

कथिक उसार छै
लोकक बैसार छै

जिनगी हमरे छै
बोनक उजार छै

लोकक करनी छै
तेकरे अचार छै

घरक उठान छै
लोकक बिचार छै

धधरा उठल छै
आगिक पजार छै

हमरे जड़ान छै
राखक पसार छै

"
शिकुया" मरल छै
तेकरे हेंजार छै



भइया मोने हम बड नीक
भौजीक मोने हम बड तीत

भइया सोझाँ हमहीं काबिल
भौजीक मोने हम बड बीख

भइया हमर बात मानए
भौजीक मोने हम बड हीठ

भइया सँ अछि सबकेँ रीत
भौजीकेँ नै सोहाइ बड प्रीत

एक दिन घर सँ भागि गेलौँ
भौजीकेँ लगलनि बड नीक


सब अछि बनल हीत अहाँके
छी हम एकेटा तीत अहाँके

हमरा सँ ऐना किएक बजै छी
छी नए हम की मीत अहाँके

पजरामे रहए छी हम तैयो
छी नइ घरक भीत अहाँके

किएक कचोटै छी मोन हमर
नीक नइ छी ई पीत अहाँके

सर-समाज सँ कात भेलौँ हम
तैयो नइ अछि प्रीत अहाँके

एना किएक भसियाइ छी अहाँ
"शिकुया" कनए पतीत अहाँके


भइया हमर छथि बड कहबैका यौ
गामक सभ केओक काज करबैका यौ

गाम-गमाइत खूब नाम चलैत अछि
भोजमे चूड़ा-दही केँ बड सुड़बैका यौ

थाना-ब्लौकमे सभ केओ जानैत अछि
कोट-कचहरी सेहो बड जनबैका यौ

मीठ बाजिकऽ सभकेँ हीत बनाबए छै
लोक समाजमे संगे-संग रहबैका यौ

"शिकुया"क भइया छै बड हितलग्गु
सभ केओकेँ नीमन बाट सुझबैका यौ


ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
.http://www.videha.co.in/AshishAnchinhar.jpgआशीष अनचिन्हार गजल -२ २.http://www.videha.co.in/sumit_kariyan.jpgसुमित मिश्र  गजल -

http://www.videha.co.in/AshishAnchinhar.jpgआशीष अनचिन्हार
गजल
 
हाथ बढ़लै दुन्नू दिससँ
डेग उठलै दुन्नू दिससँ

थरथराइत देहक भास
ठोर सटलै दुन्नू दिससँ

कहि रहल ई गर्मी आब
आगि लगलै दुन्नू दिससँ

लात फेकै छै जनतंत्र
लोक फँसलै दुन्नू दिससँ

घोघ उठलै साँझे राति
चान उगलै दुन्नू दिससँ

बान्ह टुटलै एलै पानि
लोक भगलै दुन्नू दिससँ

दीर्घ-लघु-दीर्घ-दीर्घ + दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-लघु हरेक पाँतिमे


गजल

काशी काबा एक छै
सभहँक दाता एक छै 

मतलब छै काजहिसँ ने
खुरपी खाता एक छै

धधकै छै स्त्री घरहिमे
चुल्हा जाँता एक छै 

बँचले रहिअह सदति तों.
नेता नारा एक छै 

ई छै दोसर सभ मुदा
धरती माता एक छै 

हरेक पाँतिमे-- दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-लघु-दीर्घ

मतला सधुक्करी पाँतिक अनुवाद अछि।

http://www.videha.co.in/sumit_kariyan.jpgसुमित मिश्र
गजल

प्रेमक पवन बहै दर्द हेबे करत
शीतक समीर तँ सर्द हेबे करत

बाटक दिक नै भुतिया गेलौं संसारमे
कि श्वप्नक खजाना गर्द हेबे करत

जखन भाग्यक ठोकर लागत मनुख केँ
कर्तव्य-कर्मक पथ फर्द हेबे करत

जँ बीच बजार लुटतै केकरो इज्जत
आगू बढ़ि जनानियों मर्द हेबे करत

तोड़ि देलौँ करेजक नस एक झूठ सँ
आब अपनो समांग बेदर्द हेबे करत

गामक लोक बसि रहल शहर जाकऽ
निज संबंध सुमित फर्द हेबे करत



चंचल चलै बसंत बहि आयल
हर्षित मोन चिहुँक कहि जागल

हुनकर रूप देख मोन व्याकुल
जेना चिड़ैयाँ वाण सहि कऽ घायल

दुख केर देख मनुख किए कानै
मयूर घटा कारियो देखि नाचल

अनकर पीड़ देखि खुश होइ छी
निज दुख मे मनुख किए कानल

चाँदनी कें संग चान बहरायल
"
सुमित" प्रेमक छटा देखि पागल

वर्ण-13



बीतल समय नै घुरि कऽ आबै छै
सबटा लोक बैस एतबे गाबै छै

समय सँ बड़का नै कोनो खजाना
जिनगी मे जीतल जीत हराबै छै

मोल एकर जे बूझि नै सकलनि
तँ किए नहुँ-नहुँ नोर बहाबै छै

कपट द्वेष सँ मोन आन्हर अछि
आँखि मुनि भाग्य ठोकर पाबै छै

झुलसि दुपहरिया बाट चलै छै
थम्हि कऽ मीठगर राग सुनाबै छै

समय संगहि सब दौड़ लगाबै
"
सुमित"कर्मक फल फरियाबै छै

वर्ण-13


ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
http://www.videha.co.in/KaminiKamayini.jpgकामिनी कामायनी

आधुनिक   स्त्रीगण
1
एसगरि  चलैत/
निहारैत खेत, पथार, मचान  /
आँकैत अपन बल/
झुकौने नहि धड़ /
तकैत सीधा /
चौकन्ना आँखि
स्थिर मुखमंडल/
जाइत अछि स्कूल /
खेलाइत अछि  /
डोला पाती / गोटरस/ कबड्डी/ खो-खो /
टेनिस / बैडमिंटन /
आबै छै जोड़ऽ हिसाब /
पढ़ै छै विज्ञान /
आब नै  ओ छै अज्ञान।
   2
दलान पर राखल लालटेम /
नै छै खाली बौआ  भाय सभक लेल /
जाँत/ चक्की /, गोबर /, गोइठा,/ चूल्ही /, बासन /,छौड़ ,/
नहि डराबे छै आब /करबाक ओकरो छै होम वर्क /
जनबाक छै प्रकाश वर्ष /
समय आ दूरी पर /
बनेबाक छै ढेर रास सवाल ।
पोखरि सँ भरैत काल डोल,
मन करैत छै किल्लोल,
की छै आर्कमिडीजक सिद्धांत।
आनै छै पेठियासँ बेसाहि कऽ
नून/ तेल/ तरकारी/
घरक समान/
करै छै होम वर्क,
माएक काज आसान।
बेलै छै चकलापर,
उनटाबै छै  ताबा परका सोहारी,
रटै छै एच टू एस ओ फोर।
लगबै छै मइयाक फाटल बेमायमे /
मरहम ।
देखै छथि दादी ,/ पिंजरासँ बहराएल सुगनीकेँ/
ऊपर पसरल ,/  उड़बा लेल /नील आसमान /
धिया ने बोझ  /जुड़ाइत  छनि छाती आब ।
  3
पिकी पाड़ैत छौड़ाकेँ / नोचलक  टीक जखन/
किओ ने दूर छी कहलकै ,/
सब धैलकै  ओकर मान /
आबै छै ओकरा मचबए सोर/
देखिकऽ चोर ।
करै छै निधोक भऽ भाय ,बाबूसँ गप्प /
देखै छै टीवी / बुझै छै / कानून /दंड संहिता  /
छेड़छाड़ ,बलात्कारी केँ /
ताड़ै छै दस लग्गी फराके सँ/
चलै छै झुण्डमे / जेना मृग ,गज /
धुक धुकी करेजक ,भगबे छै स्वासक जोरसँ /
नाचै मजूर बनि , मुदा ओहिने चौकन्ना।
नइ  सुनबै छै किओ आब / फकड़ा सभ ,सोन बराबरि हेबाक/
देखैत छै  सपना ओहो / जीवन सुधारबाक/
सोचै छै वैज्ञानिक, समाजशास्त्रीक धारपर
संघर्ष जीवनकेँ आगाँ बढ़ेबाक नाम छै/
तखन ओ किए नै निहारe पूर्ण चान केँ ।
नव संविधानक प्रस्तावना लए जे बेकल /
ओ समाज आइ ओकर भूमिका गढ़ि रहल ।
साम सँ नै दाम सँ दंड सँ नै भेद सँ/
दीपदान करि रहल बाटकेँ प्रकाशमान।
पीठ पर ओकर अछि गार्गी /,मैत्रेयी/,सीताक अतीत /
नब जुगक कथा जागृतिक सूर्य भेल /
हाथमे रुमाल छै/
तँ दोसरमे मशाल सेहो/
आँखिमे आँखि देने /
समयसँ ओ पूछि रहल/
कोन एहेन  विषम  मार्ग /
जइ पर हम नै चलि सकब ?

4
संपत्ति
ओ नै आब संपत्ति /
ओकरो चाहि संपत्ति ।
खेत मे /पथार मे /
मकान मे /दोकान मे /
ज्ञात  आ अज्ञात मे /
देथिन पिता हिस्सा ओकर /
ओहो तँ हुनके तनज़
बुढ़ापेक लाठी ओहो /
सेवाक ओहो हकदार /
पठौतन्हि नै हुनका/
भयौन ओल्ड होम मे।
5
आदेस लऽ /विदेशमे/
पतिक गृह प्रदेशमे/
आएल अछि देबएले सुख /
चाही ओकरो डगरा भरि सुख।
प्रताड़णा वा लांछना /
कटु /तिक्त वेदना /केँ ताप मे भस्म करि/
तखन ई कोन जिंदगी ?
सिनेहकेँ सिनेहसँ/
कर्तव्यकेँ कर्तव्यसँ/
प्रेमकेँ प्रेमसँ/ सींचब तँ बाजत बाँसुरी /
कुरुक्षेत्र ने बनए /छत /देवाल सँ घेरल जगह /
प्रयास  इहै रहै /
सभ ठाम हो रोशनी ।
नहि वीभत्स रूप हो /
वसन्ते वसंत हो सदा /
कर्तव्यक अधिकारक  /सूली पर /
नहि चढ़ए पड़ैक।
 संकुचित विचार पर/ पद  प्रहार करि रहल /
नब जुगक, नब कुसुम, नब चेतनासँ भरल।
बातरसक दर्दसँ/
लोथ बनल सौस लेल/ बेकल बनल ओ ताकि रहल/
बातरसक दबाइ/
ससुरक मोतियाबिंद/ जोहि रहल बाट ओकर/
देखाबक छै सम्पूर्ण खेत खरिहान/
समस्याक जा नहि समाधान/
ताधरि नै ओकरा विराम/
सम्पन्न करब छै  होमवर्क/ एतबै ओकरा भान छै।
कॉलेजक प्रांगण हो/
वा  घरसँ फराक कतौ/
चिंतन विशाल छै/
हटेबाक अंधकार छै/
धरती स्वर्ग बनै/
बूनै छै सपना जे/
आधुनिक समाजक रचनामे लागल ओ/
ओकरा कत्तऽ पलखति छै/
सुनबा के आलोचना ।

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
.http://www.videha.co.in/RajdevMandal.jpgराजदेव मण्‍डलक दू गोट कवि‍ता .http://www.videha.co.in/Jagdish_Prasad_Mandal.JPGजगदीश प्रसाद मण्‍डलक तीनटा गीत

http://www.videha.co.in/RajdevMandal.jpg
राजदेव मण्‍डलक
दूटा कविता-

बाबा केर लाठी

ठरल हवामे टौआ रहल छी
टोले-टोले बौआ रहल छी
बाबाक देल घण्‍टी गलामे टाँगने छी
गामक मुँहपुरखी हम नै कोनो माँगने छी
घण्‍टी टनटनाइते भूकए कुकुड़
लुच्‍चा छौड़ा सभ तकए भुकुर-भुकुर
हुनके देल छलै तेल पि‍आओल लाठी
दूध-भात खेबाक लेल फूलही बाटी
छुच्‍छे बाटी भटकिरहल अछि‍
सूखले भात अटँकि‍ रहल अछि‍
लाठी हाथमे देखते लोक करए सन-सन
इशारा करैत बजैत अछि‍ मने-मन
देखि‍यौ देह हाथ सूत सन
लगै छै हाथमे बन्‍दूक सन।
मि‍त्र कहैत अछि‍-
नै करू फर-फर
तामसे कि‍अए कँपै छी थर-थर
छै सभकेँ समानताक अधि‍कार
लड़बै तँ उजरि‍ जाएत घर-दुआर
नै चलत आब पुरना लाट
ओ भऽ गेल कुबाट
एकर अछि‍ एकटा काट
चलए पड़त आब नवका बाट।

गीतक पूर्व संगीत

नै भेल दरस
तँ केना हएत परस
कहाँ जनलौं अहाँक प्रीत
पूर्वमे नै सुनलौं पद्य ध्‍वनि‍ संगीत
हे यौ मीत
दूरसँ सुनलौं गीत
बुझलौं गीतक पूर्व बजै छै संगीत
अहि‍ना होइत हेतै नि‍त
आब तँ अवधि‍ गेल बि‍त
कहाँ भेल हमर जीत
पहि‍ने जँ जानि‍तौं
एना नै कानि‍तौं
आदरसँ अरि‍आइत अानि‍तौं
छतीसो व्‍यंजन छानि‍तौं
कतए चलि‍ गेलौं भऽ कऽ अनेर
नै पाबि‍ रहल छी अहाँक टेर
जेना टूटि‍ गेल पुरना घेर
फेर जनम भेल एकबेर।

http://www.videha.co.in/Jagdish_Prasad_Mandal.JPGजगदीश प्रसाद मण्‍डलक तीनटा गीत-

गणतंत्र दि‍वस- २०१३क अवसरपर

अजादीक उमंग उमकि‍
घाटे-बाट छि‍छि‍या गेलौं।
सत्-समुद्र पहाड़ बीच
पगे-पग बौआ गेलौं।
भाय यौ, घाटे-बाट......

तल मोड़ि‍ तम पताल
छुबूधि‍ भऽ छुछि‍या गेलौं।
अजादीक उत्‍साह उमंग पाबि‍
दि‍न-राति‍ बौआ गेलौं।
भाय यौ, घाटे-बाट......

प्रशान्‍त-शान्‍त लाल-कारी
जोर पकड़ि‍ डि‍रि‍या गेलौं।
डि‍रियाइत पताल-अकासमे
डोह डाबर झाड़ कहेलौं।
अजादीक उत्‍साह उमकि‍
घाटे-बाट बौआ गेलौं।
भाय यौ, घाटे-बाट......

बोन-बोनैया गीत गाबि‍
बनि‍ शि‍कारी वीन बजेलौं।
मोड़ि‍ मनुआ तोड़ि‍ जि‍नगी
दि‍ने-देखार बहकि‍ गेलौं।
बाटे-घाट भोति‍या गेलौं
भाय यौ, घाटे-बाट......

ठाढ़े-ठाढ़ ठि‍ठु ठि‍ठुरि‍
रौद पाबि‍ लू-लुआ गेलौं।
बनि‍ बरखा बरसाती बनि‍
तरे-ऊपरे दहा गेलौं।
अजादीक उमंग उमकि‍
घाटे-बाट बौआ गेलौं।
भाय यौ, घाटे-बाट......



ओल ओड़ि‍......

ओल ओड़ि‍ ओलि‍-ओलि‍
रब-रब, कब-कब गाड़ि‍ देलकै।
कन्‍दकेशौर मुँह मुंगबा दऽ दऽ
तड़ि‍-तड़ि‍ तड़ुआ बनौलकै।
मीत यौ, तड़ि‍-तड़ि‍......

बेधि‍ सि‍र डभ-कुश कुशि‍यार
तड़तड़ाइत तर तामि‍ देलकै।
उनटा-पुनटा सुखा-अबा
मुंगरी मारि‍ सोझ केलकै।
मीत यौ, मुंगरी मारि‍......

बेवहार वि‍धि‍ सजि‍ सहजि‍
तर-ऊपरा रंग मढ़ि‍ देलकै।
कचे-बचे फल-फूल लटका
हवामे उड़ि‍या देलकै।
हावामे उड़ि‍या......

हीय चढ़ि‍ हाथ-पएर पसारि‍
नापि‍-नापि‍ मनुख बना देलकै।
कंट गुल गुलाब सजि‍-धजि‍
कीच कमल कोखि‍या देलकै।
मीत यौ, कीच कमल......

कोसा कोख रगड़ि‍-रगड़ि‍
तानी-वाणी रंग चढ़ौलकै।
नख-सि‍ख, सि‍ख-नख रचि‍-बसि‍
नचनी-नाच नचा देलकै।
मीत यौ, नचनी-नाच......




नि‍रजन वन......

नि‍रजन वन ि‍नरजल पक्षी
गुड़-गृह गुरु गुहारि‍ रहल छै।
सतरंगी-बहुरंगी संसारमे
अपन पएर पखाड़ि‍ रहल छै।
अपन पएर......

सुरूजो एक धरति‍यो एक्के
अग-जल हवा सि‍हकि‍ रहल छै।
खल-खल खलि‍ खलि‍या
टूक-टूक टुकड़ी तोड़ि‍ रहल छै।
टूक-टूक टुकड़ी......

जइसन जल-थल जतए
सि‍रजन सि‍र ततए रचै छै।
मन-तन धधकि‍-धधकि‍ ततए
पछ सरि‍ पंछी बनैत रहै छै।
नि‍रजन वन......
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   http://www.videha.co.in/BalMukundPathak.jpgबाल मुकुन्द पाठक
1
गजल

आँखि सूतल छै मोन जागल कियै छै
गाछ सूखल छै पात लागल कियै छै

भटकि रहलौँ हम नौकरी लेल जुग मेँ
भाग भूटल छै आस लागल कियै छै

प्रेम मेँ हुनकर टूटि गेलै करेजा
शांत मन तैयोँ आगि लागल कियै छै

गाम रहि रहि केँ याद आबैत रहतै
मोन विचलित छै फेर भागल कियै छै

अपन पीड़ा बेसी बुझाएत तैयोँ
शीश काटल छै देह लागल कियै छै

राति दिन ई सोचैत बाजै मुकुन्दा
नाम ई ओकर आब पागल कियै छै

बहरे - खफीफ ,मात्रा क्रम २१२२-२२१२-२१२२

(2)

गजल

साहीक कांट घटैत गेलै रुप सोहागक बरहैत गेलै
तेल आ बाती सठैत गेलै भूख प्रकाशक बरहैत गेलै

लूट काट दंगा फसादसँ समाज एतोँऽ बनल कुलषित
लोक जतै कटैत गेलै समाज सुधारक बरहैत गेलै

धर्मक व्यापार करै लोक एतोँऽ ठगै निज भेष बदलि कऽ
लोकक आस्था घटैत गेलै काज पंडितक बरहैत गेलै

छैन मातृभूमिक नै कोनो चिँता धन लेल ई नेता बनथि
आ मुद्रास्थिति खसैत गेलै गरीबी देशक बरहैत गेलै

लोक एतोँऽ अछि बनल हत्यारा बेटी जानि भूर्ण हत्या करै
स्त्रीक संख्या घटैत गेलै आ राशि दहेजक बरहैत गेलै

देखि सिनेमा बढ़ल फैसन देखूँ मिथिला यूरोप बनल
संस्कार कियै घटैत गेलै नग्नता देहक बरहैत गेलै

सरल वार्णिक बहर ,वर्ण 22

(3)


गजल

हमरासँ जौँ दूर जाएब अहाँ
रहि रहि इयादि आएब अहाँ

सिनेह लेल अहीँके बेकल छी
छोड़ि कऽ हमरा कि पाएब अहाँ

खोजि खोजि के तँ पागल बनलौँ
बताउ कि कतऽ भेँटाएब अहाँ

किएक लेल एहन प्रेम केलौँ
जौँ ई बुझलौँ नै निभाएब अहाँ

बदलि गेलियै अहाँ कोना कऽ यै
हमरासँ नै बिसराएब अहाँ

हमरा छोड़ि गेलौँ मुकुन्द संग
आब कतेक के फसाँएब अहाँ

सरल वर्णिक बहर ,वर्ण12

(4)

गजल 

सुनु अहाँ कियै हमरा सँ दूर गेलौँ यै
अहीँक चलतै हम तँ नाको कटेलौँ यै

रुप अहाँक देखिकऽ हम तँ मुग्ध भेलौँ
ओहि परसँ कियै ई कनखी चलेलौँ यै

मगन छलौँ अहाँ मेँ काज धाज छोड़िकऽ
प्रेम मेँ तँ हे प्रेयसी जग बिसरेलौँ यै

पढ़बाक उमरि छल छलौँ इक्कीस के
काँलेज के छोड़िकऽ अहाँमेँ ओझरेलौँ यै

मुकुन्द अछि प्रेमी अहाँकँ सभ जानैये
जानसँ बेसी चाहे जे तकरा गंवेलौँ यै

सरल वर्णिक बहर ,वर्ण 15

(5)

गजल

बिना दागक हमर छल ई चान सन मुँह
कुकर्मी नोचि लेलक मिल राण सन मुँह

कि सपना देखलौँ आ लुटि गेल जिनगी
घटल एहन बनल देखूँ आन सन मुँह

रमल रहियै अपन धुनमेँ आ कि एलै
चिबा गेलै हमर सुन्नर पान सन मुँह

बनल नै स्त्री समाजक उपभोग चलते
किए तैयो मनुख नोचै चान सन मुँह

हमर सभ लूटि गेलै ईज्जत व चामोँ
कि करबै जी कऽ लेने छुछुआन सन मुँह

बहरे-करीब मने 
"
मफाईलुन - मफाईलुन-फाइलातुन"
मात्रा क्रम-1222 - 1222 - 2122

 
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
.http://www.videha.co.in/BindeshwarNepali.jpgबिन्देश्वर ठाकुर "नेपाली"-प्रेमक फल/ पिया अहाँक यादमे  .http://www.videha.co.in/kishankarigar.jpg किशन कारीगर- मनुक्ख बनब कोना?
http://www.videha.co.in/BindeshwarNepali.jpgबिन्देश्वर ठाकुर "नेपाली"
धनुषा नेपाल , हाल:कतार
प्रेमक फल 

शीसा फुटल दिल टुटल
सकनाचुर भऽ छिड़िया गेल 
डोलीमे ओ गेली पिया घर 
हाथमे दारु थमा गेल। 

दारुए हमर साथी-संगी 
बिनु ओकर सहारा नै 
कखनो ठर्रा कखनो प्याक 
बिनु ओकर गुजारा नै। 

जिनगी अपन नरक बनेलौं 
ओइ लजबिज्जीक प्यारमे 
मरणासनमे सास अछि लटकल 
ओ मजा करए ससुरालमे। 

प्यार करब पैघ बात नै 
निभाएब बड़का बात छै 
प्रेमसँ ककरो जीवन सबरल 
ककरो जीवनमे घात छै ।


पिया अहाँक यादमे 

मेघसन कारी केशपर 
गोर गोर गाल यौ 
आमक रस सन लाल ओठपर 
पिया अहाँके नाम यौ।। 

हम दु जोड़ी संग-संग जियब 
गायब प्रेमक गुणगान यौ 
मरऽ सँ पहिने आ मरलाक बाद 
बस रहब अहाँक गुलाम यौ।। 

हे प्राणेश्वर लौटब कहिया 
करब कखन आराम यौ 
घाइल दिलके मल्हम अहाँ 
दिल अछि अहाँक मकाम यौ।। 

राति-राति भरि निन्द नै आबए 
बड जोर झकझोरए याद यौ 
बिन अहाँके जिनगी बीतल 
अहाँ दिल्ली, अरब, असाम यौ।।

नोर बहैए नयनसँ हमर 
राह देखैत सौ बार यौ 
अपने भेलहुँ परदेशी बाबु 
हम छी एतऽ बेकार यौ।। 

बिनु पानिक मछली बुझु 
फुटल अल्मुनियम थाली यौ 
बिनु रोहितके जिन्दा लाश 
भेल यऽ अहाँक रुपाली यौ।।

http://www.videha.co.in/kishankarigar.jpgकिशन कारीगर
आकाशवाणी, दिल्ली

मनुक्ख बनब कोना?

छीः छीः धूर छीः आ छीः
मनुक्ख भ मनुक्ख सँ घृणा करैत छी
ओही परमेश्वर के बनाउल
माटिक मूरत हमहूँ छी अहूँ छी।

केकरो देह मे भिरला सँ
कियो छुबा ने जाइत अछि
आबो संकीर्ण सोच बदलू
ई गप अहाँ बुझहब कोना?

अहिं कहू के ब्राह्मण के सोल्हकन?
के मैथिल के सभ अमैथिल
सभ त मिथिलाक मैथिल छी
आबो सोच बदलू मनुक्ख बनब कोना?

अपना स्वार्थ दुआरे अहाँ
जाति-पाति के फेरी लगबैत छी
मुदा ई गप कहिया बुझहब
सभ त माँ मिथिले के संतान छी।

पाग दोपटा मोर-मुकुट
सभटा त एक्के रंग रूप छी
मिथिलाक लोक मैथिल संस्कार
एसकर केकरो बपौती नहि छी।

एकटा गप अहाँ करु धियान
सभ गोटे मिथिलाक संतान
जाति-पातिक रोग दूर भगाउ
सभ मिली कए लियअ गारा मिलान।

अपने मे झगरा-झांटी बखरा-बांटी
एहि सँ किछु भेटल नहि ने?
सोचब के फर्क अछि नहि कोनो जादू टोना
अहिं कहू आब मनुक्ख बनब कोना?

बेमतलब के गप पर यौ मैथिल
अहाँ एक दोसरा सझगरा करैत छी
माए जानकी दुखित भए कानि रहल छथि
ई गप किएक नहि अहाँ बुझहैत छी?

सामाजिक-आर्थिक विकास लेल काज करु
मिथिलाक माटि-पानि उन्नति करत कोना
केकरो सकोनो भेदभाव नहि करु
सप्पत खाउ अहाँ मनुक्ख बनब कोना?

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। 

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"विदेह" प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका http://www.videha.co.in/:-
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"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २२४ म अंक १५ अप्रैल २०१७ (वर्ष १० मास ११२ अंक २२४)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -    मैथिलानी केर उपराग राम सं आ समाज ...