Sunday, January 27, 2013

'विदेह' १२२ म अंक १५ जनवरी २०१३ (वर्ष ६ मास ६१ अंक १२२)- PART II


. पद्य










..http://www.videha.co.in/BinitaJha.jpgबिनीता झा-देखू आइ एफबी परक खेल
http://www.videha.co.in/JagdishChandraThakurAnil.jpgजगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल
की भेटल आ की हेरा गेल  (आत्म गीत)- (आगाँ)


भोरे उठि स्मरण करै छी
परिजन, प्रियजन, गुरूजनकें
आसन-प्राणायामक आदति
शुद्ध करैए तन-मनकें
साहित्यक आनन्द हमर
दिनचर्यामे अछि समा गेल,
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ की हेरा गेल ।

के जानय काल्हि रही ने रही
मोनक सभ बात कही ने कही
यात्री, हरिमोहनसं एखनहुं
खाली नहि छथि मिथिलाक मही
से सोचि सूप सन अछि करेज
आ देखि नैन अछि जुड़ा गेल,
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ की हेरा गेल ।

सौंसे दुनियाले एक सूर्य
सौंसे दुनियाले एक चान
लाख तरेगन केर संग
सौंेसे दुनियाले आसमान
ओ कलाकार, ओ वैज्ञानिक
सभ बना कतऽ छथि नुका गेल,
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ की हेरा गेल।

भगवानक दर्शन होइए
शुभ चिन्तनमे, शुभ कीर्तनमे
हरियर धरती, सुन्दर अकास
शुभ दर्पणमे, शुभ अर्पणमे

देखै छी चारूकात हमर
अछि फूल कते नव फुला गेल,
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ की हेरा गेल।
हम छी कृतज्ञ एहि अस्तित्वक
जे जीबा केर आधार देलनि
मंगनीमे भेटल रौद, हवा
आ देखबाले संसार देलनि
दुविधासँ मुक्तिक मंत्र प्रबल
पथ महाजनक अछि सिखा गेल,
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ की हेरा गेल।

हम छी ऊर्जा, जीवन-ऊर्जा
हम उत्सव छी ऐ तन-मन केर
शान्ति, प्रेम, आनन्द मात्र
अछि लक्ष्य हमर एहि जीवन केर

उत्साह भरल, उल्लास भरल
उत्कर्षक पथ अछि देखा गेल,
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ की हेरा गेल ।

(
क्रमशः)


 
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
http://www.videha.co.in/BindeshwarNepali.jpgबिन्देश्वर ठाकुर "नेपाली", धनुषा- नेपाल, हाल- कतार
हमर समाज बौरा गेल/ परदेशी पिया/ जन्मब दुर्लभ ऐ धरतीपर
हमर समाज बौरा गेल
एखनुक सभसँ पैघ सबाल
अछि सगरो बलत्कारे बलत्कार 
गाँउमे बलत्कार, शहरमे बलत्कार 
देशमे बलत्कार, विदेशमे बलत्कार 
बुझू जे घोर कलयुग छा गेल 
माने हमर समाज बौरा गेल ।। 

अत्याचार, आतंक, महिला हिंसा 
निस्तब्ध भऽ सभ केऊ देखैत अछि 
जनता तँ आपसमे फुटले देखब 
लुटेराक त्राससँ सरकारो डगमगा गेल
माने हमर समाज बौरा गेल।। 

सुरक्षाकर्मी पथभ्रष्ट भऽ जुआ खेलै 
शान्तिसेना हिनताबोधमे दारु पेलै 
अशान्तिक भूमरिमे धरती खौझा गेल 
माने हमर समाज बौरा गेल।। 

कतौ फेसबुकसँ बलत्कार 
ककरो स्काइपमे बलत्कार 
कखनो निम्बुजसँ बलत्कार 
तँ कतौ ट्वीटरमे बलत्कार 
एहन अपराध सर्वत्र छा गेल 
माने हमर समाज बौरा गेल।। 

सहनशीलताक प्रतिमूर्ति नारी 
मर्यादाक पराकाष्ठा होइ छै 
माया-प्रेमसँ जगत फुलाबै 
स्वप्न दर्शनक द्रष्टा होइ छै 
मुदा दुर्भाग्य दानवक उदय भेल 
सकुनी मामा संग कंसक आगमन भेल 
द्रौपदीक चीरहरण, सीताक रुपहरण 
निन्दनीय घटना आइ फेर दोहरा गेल 
माने हमर समाज बौरा गेल।। 

की कहु देखलौं घोर अनैतिक बात
जइठाम देखू बलत्कारे बलत्कार 
बेटीक बलत्कार, दीदीक बलत्कार 
मौसीक बलत्कार,पिउसीक बलत्कार
बुझु जे घोर कलयुग छा गेल 
माने हमर समाज बौरा गेल।।

परदेशी पिया 
कोना बिसरलौं मुँहो हमर 
भेलौं अहाँ कोना विरान 
जन्म-जन्मक व्रत-बन्धनसँ 
पलभरिमे भऽ गेलौं आन। 

देख सपनामे छाती फटैए 
बिपदामे देख कऽ दिल धड़कैए 
लोकक पिया घर आबै छथि
हमर आँखिसँ नोर खसैए। 

जन्मेसँ हम भेलौं अभगली 
बचपन छिनल सासुर पौली 
बाली उमरमे भेलौं परदेसी 
बिनु पियाक जीवन बितौली। 

केश फल्कौवामे तेल गम्कौआ 
लऽ जाइत छलौं पान-मखान 
टोकलक बिच्चे बाट मुझौसा 
अहाँ गामक बुढ़बा हजाम। 

नीक नै लागए बिन अहाँके 
लौटब कहिया अपन गाम 
असगर आङ्गन दाँत कटैए 
बिन अहाँकेँ ठाम-ठाम ।
जन्मब दुर्लभ ऐ धरतीपर
जन्मब दुर्लभ ऐ धरतीपर।
माटि-पानि अछि जकर महान।।
सदियोसँ परिचर्चा पौने।
अछि आर्यसमाज बिधमान।।

पूर्वज जिनकर नाना क्षेत्रमे।
कुशल, ज्ञानी, गुणवान छै।।
इतिहासक हर पन्नापर।
एकसँ एक नीक नाम छै।।

एखनुक मैथिल पथभ्रष्ट भऽ।
कुकर्मी-कुसंस्कारी भऽ रहल।।
आधुनिकताक दुर्गन्धित हवासँ।
धाराशाही मिथिलाकेँ कऽ रहल।।

एहन विषम परिस्थितिमे।
अपन कर्तव्यक बोध करब।।
छिड़िआएल, भुलल, भटकल जनकेँ।
लऽ सत्मार्गक ओर चलब।।

ई पुनीत कर्मयोगी सभमे।
अछि हमर चरण बन्दना।।
सम्पूर्ण स्रष्टा एवम् समाजमे।
नवबर्षक शुभकामना।।

 
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
http://www.videha.co.in/JagdanandJha.jpgजगदानन्द झा मनु
ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीहटोल, मधुबनी 

गजल -  

भूतलेलहुँ किए एना मित बना लिअ 
छोड़ि सगरो बहानाकेँ  प्रित लगा लिअ 

वचन नै देब हम नै किछु मोल एकर 
आउ चलि संगमे  हमरो अप्पना लिअ 

काँट पसरल बिछ्ब कहु एतेक कोना 
फूलकेँ लय कs मोनक संसय हटा लिअ 

जुनि बुझू आन जगमे सपनोसँ कखनो 
बूझि अप्पन कनी छू ठोरसँ सटा लिअ 

रूप सुन्नर अहाँकेँ ई ओहिपर बदरा 
जीब कोना करेजामे "मनु" बसा लिअ 

(बहरे - असम, मात्रा क्रम - २१२२-१२२२-२१२२ )

गजल- 

जीवन कखन तक छैक नै बुझलक कियो 
कखनो करेजक गप्प   नै जनलक कियो 

भेटल तँ जीवनमे सुखक संगी बहुत 
देखैत दुखमे आँखि नै तकलक कियो 

दुखकेँ अपन बेसी बुझै किछु लोक सभ 
भेलै जँ दोसरकेँ तँ नै सुनलक कियो 

सदिखन रहल भागैत सभ काजे अपन 
आनक नोर घुइरो कs नै बिछ्लक कियो 

जीवन तँ अछि जीवैत 'मनु' सभ एतए 
मइरो कs जे जीवैत नै बनलक कियो 

(बहरे- रजज, २२१२ तीन-तीन बेर सभ पांतिमे)

गजल- 

जखन खगता सभसँ बेसी तखन ओ मुँह मोड़ि लेलनि 
जानि आफत छोरि हमरा सुखसँ नाता जोड़ि लेलनि 

देखि चकमक रंग सभतरि ओहिमे बहि  तँ गेली 
जानि खखड़ी ओ हमर हँसिते करेजा कोड़ि लेलनि 

बन्द केने हम मनोरथ अप्पन सदिखन चूप रहलहुँ 
पाञ्च बरखे आबि देख फेर सपना तोड़ि लेलनि 

दुखसँ अप्पन अधिक दोसरकेँ सुखक चिन्ता कएने 
आँखि जे फूटै दुनू तैँ एक अप्पन फोड़ि लेलनि 

चलक सप्पत संग लेलहुँ जीवनक जतराक पथपर 
मेघ दुखकेँ देखते ओ संग 'मनु'केँ छोड़ि लेलनि 

(बहरे - रमल, मात्राक्रम- २१२२ चारि-चारि बेर सभ पांतिमे)    

गजल - 

किए तीर नजरिसँ अहाँकेँ चलैए 
हँसी ई तँ घाएल हमरा करैए 

मधुर बाजि खन-खन पएरक पजनियाँ 
हमर मोन रहि रहि कए डोलबैए   

छ्लकए हबामे अहाँकेँ खुजल लट 
कतेको तँ  दाँतेसँ   आङुर कटैए

ससरि जे जए जखन आँचर अहाँकेँ 
जिला भरि  करेजाक धड़कन रुकैए 

अहीँकेँ तँ मुँह देखि जीबैत 'मनु' अछि 
बिना संग नै साँस मिसियो चलैए 

(बहरे - मुतकारिब, मात्राक्रम -१२२-१२२-१२२-१२२)

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
http://www.videha.co.in/ShivKumarYadav.jpgशिव कुमार यादव
गजल

कतऽ नुकेलहीं गे दिलतोड़िया
कतऽ भसेलहीं गे मनतोड़िया

तोहीं तँ हमर मनमीत गे
कतऽ हरेलहीं गे संगतोड़िया

चान सन तोँ हमर सजनी गे
कतऽ बिलेलहीं गे नैनतोड़िया

तोँ तँ हमर भगजोगिनी गे
कतऽ पड़ेलहीं गे पगतोड़िया

"
शिकुया" हेरान तोड़ा लेल गे
कतऽ भसेलहीं गे मनतोड़िया

(
आशीष अनचिन्हार जीक पाँति "कहाँ नुकेलही गे दिलतोड़िया गे मनतोड़िया" के देखि कऽ तुरत्तेमे कहल गेल ई गजल।)

शिकुया "मैथिल"


ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
http://www.videha.co.in/munnikumarivarma.jpgमुन्नी कामतक दूगो कवि‍ता स्वच्छ समाज / माय एक चुटकी नुन दअ दे...
स्वच्छ समाज

छोड़ि‍ जाइ छी एगो चेन्‍ह हम।
हम निस्प्राण भऽ गेलौं
मुदा हमर दरद सदि‍ जीबैत रहत,
हम चुपचाप जा रहल छी
मुदा हमर चिख अहाँकेँ
हरि‍दम झकझोरैत रहत।
दोष हमर नै,
अहाँक मानसिकताक छल
बुराइ हमरामे नै
अहाँकेँ संस्‍कारम छल।
बेजुबान हम नै
अहाँकेँ बना कऽ गेलौं
जा रहल छी,
हम खामोश भऽ कऽ
अपन अवाज बुलंद केने
जा रहल छी ।
अगर अछि अहाँमे
जिंदा कनियो मानवता
तँ बचाउ दोसर दामिनीक लाज,
यएह हमर इच्‍छा अछि
निस्‍पाप हुअए अपन समाज,
करू नै समर्पित हमरापर
फूल आ मोमबत्ती गाड़ि‍
देब हमरा सहि श्रर्द्धाजलि‍
तँ करू संकल्प बनाएब अहाँ
नारीकेँ जीऐ लेल एगो स्वच्छ समाज।
माय एक चुटकी नुन दअ दे...

आइ हम जनलिऐ
बेटी आ बेटामे
कि भेद होइ छै,
गर्भमे बेटी
किअए गरै छै।
नारीक दुःख
नारिये जनै छै,
तँए तँ हर माए
बेटी जनमबैसँ
डरै छै।
जइ बेटीकेँ माए
जीवन दइ छै,
वएह बेटीकेँ
समाजक अत्याचार
मारै लेल मजबूर करै छै।
बेआबरू भऽ कऽ
मरैसँ तँ नीक
माए इज्जत कऽ तँू
मौत दऽ दे
ई पुरूष सत्तात्मक समाज छीऐ
माए जनमि‍ते तूँ हमरा
एक चुटकि नुन दऽ दे।


ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
.http://www.videha.co.in/RajdevMandal.jpgराजदेव मण्‍डलक तीन गोट कवि‍ता-नेंगरा मजदूर/ मनक दुआर/ छाँहक रूप .http://www.videha.co.in/Jagdish_Prasad_Mandal.JPGजगदीश प्रसाद मण्‍डलक पाँचटा गीत-अबि‍ते अगहन./ उपजल खेत./ धूल चरण./ उनटन./ जान वि‍चार......दूटा कवि‍ता- (ति‍लासंक्राति‍क अवसरपर) सतबेध/गुरुत्तर

http://www.videha.co.in/RajdevMandal.jpg
राजदेव मण्‍डलक तीनटा कवि‍ता- नेंगरा मजदूर/ मनक दुआर/ छाँहक रूप
नेंगरा मजदूर

कि‍एक फटकारै छी यौ दरबान
हम नै छी कि‍यो आन
नै करू एना परेशान
नै छी भि‍खमंगा, चाेर, बेइमान
बरख भरि‍ पहि‍ले हमरो रहै अहीं सन शान
हमहीं बनौने रही ई सतमहला मकान
कतेक लगा कऽ लगन
काज केने रही भऽ कऽ मगन
अपन दुख कि‍छु कहल ने जाइ
ऊपरसँ खसल रही दुनू भाँइ
टाँग कटा कऽ हमर बचल जान
सहोदराकेँ उड़ि‍ गेल प्राण
नै छी दुखि‍त केलौं िनरमान
एहेन काजमे होइतै छै बलि‍दान
हमर तँ कर्तव्‍य अछि‍ काजसँ लड़ब
कि‍छु भऽ जेतै काज तैयो करब
देखबाक लीलसा छल एकबेर
आँखि‍ जुरा जाएत रहब कनेक देर।
भागि‍ जो ऐठामसँ रे बकलेल
ई जगह अछि‍ वि‍शि‍ष्‍ट लोकक लेल
मालि‍क एतौ तँ देख लेबही खेल
तुरन्‍तेमे चलि‍ जेबही जेल।

आँखि‍ लगै छै केहेन क्रूर
जेना देहमे कऽ देतै भूर
चोटहि‍ं घूमि‍ गेल नेंगरा मजदूर
अछि‍ चुप्‍पे आवाज नि‍कलै दूर-दूर।


मनक दुआर

अन्‍हार घरमे बैसल लोग
कऽ रहल अछि‍ जेना कोनो
नै देखि‍ रहल एक देासराक मुख
कतए सँ भेटत दरशनक सुख
औना रहल सभ ठामहि‍ं-ठाम
बि‍नु मकसद जि‍नगी बेकाम
अन्‍हार करै अन्‍हारसँ बात
अन्‍हारेसँ झँपने रहू सबहक गात
अनठेकानी हथोड़ि‍या मारैत हाथ
नै जानि‍ के करतै केकरापर आघात
शंकामे डूमल सभ काते-कात
डर नाचि‍ रहल अछि‍ माथे-माथ
कतबो करब छूच्‍छे जाप
अन्‍हार घरमे साँपे-साँप
खोलए पड़त ि‍खड़की-दुआर
अन्‍तर मनक सभ केबाड़
अन्‍हार भऽ जाएत तार-तार
पहुँचत प्रकाश आर-पार
एक देासरसँ जान-पहचान
बढ़त आपसी मान-सम्‍माण।

छाँहक रूप

हम छी अभागल
 जा रहल छी भागल
नि‍न्नमे डूमल या जागल
हरपल पाछाँ लागल
केहेन ई छाँह बि‍नु परबाह
लगैत अछि‍ अथाह
अशोथकि‍त भऽ गेलौं भगैत-भागैत
घूमि‍-घूमि‍ पाछू तकैत-तकैत
मुँहसँ नि‍कलैत अछि‍ आह
केहेन अछि‍ जि‍दि‍याह
जखैन तक अछि‍ ई काया
सँगे लगल रहत ई छाया
बेसी भागब तँ थकि‍त हएत तन
ओझराएल रहत हरक्षण मन
अड़ि‍ कऽ परखब हम ओकर रूप
चाहे चढ़ि‍ ऊपर चाहे खसि‍ कूप
रूप हो कुरूप वा हो अनूप
ओकरे सँगे देखब हम अपन सरूप।



http://www.videha.co.in/Jagdish_Prasad_Mandal.JPGजगदीश प्रसाद मण्‍डलक पाँचटा गीत-अबि‍ते अगहन./ उपजल खेत./ धूल चरण./ उनटन./ जान वि‍चार......दूटा कवि‍ता- (ति‍लासंक्राति‍क अवसरपर) सतबेध/गुरुत्तर
  
अबि‍ते अगहन......

अबि‍ते अगहन ओस ओसा
धड़-धरती धड़ए लगै छै।
चर-चाँचर आँचर पकड़ि‍
उजाहि‍ सि‍ल्‍ली चरए लगै छै।
उजाहि‍ सि‍ल्‍ली......

आँचर धन चाँचर पकड़ि‍
गरि‍ गारा गाबए लगै छै।
अकुल-सकुल रभसि‍ राग
दि‍न-राति‍ बीच गबै छै।
दि‍न-राति‍......

जेकर छलै तेकर गेलै
अपन कहि‍ हहकारि‍ कहै छै।
धनबल मनबल सि‍र चढ़ि
राग-वि‍राग अलपि‍ कहै छै।
राग-वि‍राग......

 
उपजल खेत......

उपजल खेत जजात जेनाही
मुड़हन, दोहन तेहन कहै छै।
कोणे-काणी हि‍हि‍या-हि‍हि‍या
राखी सि‍र सौंति‍ सजबै छै।
राखी सि‍र......

बोन-बाध‍ बि‍नु रखा राखी
ि‍नर्जन ि‍नरबल कहए लगै छै।
आलतू-पालतू फालतू बनि‍
परती-पराँत कहए लगै छै।
परती-पराँत......

मरल धार चहि‍ चहटि‍ पेट
मूर्द-घाट सि‍रजए लगै छै।
बजारि‍ बज्र परति‍यो तहि‍ना
मूड़-धन धाम बनबए लगै छै।
भाय यौ, मुड़......
धूल चरण......
धूल चरण चन्‍द्रामृत कहि‍
काका कबीर कुकुआइत एला
रज सर सि‍र सहजि‍ सजि‍
गोप गोस्‍वामी कहाइत एला।
गोप गोस्‍वामी......

हर क्षण पल पलकि‍
जीअन-मरन चलैत एलै
चीत चेता चकोर चि‍तवन
नकर-सकर बि‍लहैत एला
नकर-सकर......

जीता जी गुहा-भत्ता
मरन रूप सजबैत एला
चरण पकड़ि‍ चन्‍द्र अमृत बनि‍
जल-थल नभ घुमैत एला
जल-थल......

चरण-शरण कहि‍ शरणागत
रूप रोबोट धड़ैत एला
जीवन मुक्‍त मुक्‍ति‍ जि‍नगी
नाम-राम सि‍रजैत एला
नाम-राम......
उनटन......

उनटन उबटन सदि‍-सदि‍ बनि‍
बोध बाल सि‍स चढ़ैत एलै।
अदलि‍-बदलि‍ रीति‍-नीति‍
सून-शून्‍य सुनबैत एलै।
मीत यौ, सून......

दस-बीस, तीस तेबर
जेबर बनि‍-बनि‍ सजैत एलै।
नब्‍बे-अस्‍सी खस्‍सी खसि‍
खड़-खड़ाइत खसैत एलै।
मीत यौ, खड़......

पछि‍या पछ पकड़ि‍ पछुआ
आगू-पाछू ठेलैत गेलै।
वाम-दहि‍ना बाँहि‍ पकड़ि‍
पाट धोबि‍ पटकैत एलै।
मीत यौ, पाट......
जान वि‍चार......

जान वि‍चार अबि‍ते आंगना
जनदार बास कहबए लगै छै।
कर्म-शब्‍द रचि‍-रचि‍ बसि‍
रूप कर्म सजबए लगै छै।
भाय यौ, रूप......

भाव कहै छै अभाव शब्‍द
कर्म गवाही दइत कहै छै।
करता-धरता जे जन जानए
साधि‍-साधि‍ मंगल गबै छै।
भाय यौ, साधि‍......

कर्म-धर्म कि‍ शब्‍द-धर्म
आँखि‍ मि‍चौनी खेल खेलै छै।
ति‍रछा-ति‍रछा तीन-तीनबटि‍या
वि‍रीछ-ति‍रि‍छ रोपए लगै छै।
भाय यौ, वि‍रीछ......
दूटा कवि‍ता-
(ति‍लासंक्राति‍क अवसरपर)

सतबेध

सत् केर शक्‍ति‍ जगैछ भूमि‍ रण
उठि‍-मरि‍, मरि‍ उठि,‍ उठि‍ कहै छै।
कुंज-नि‍कंुज पुरुष परीछा
असत्-सत् सुसत् बनै छै।
इत्‍यादि‍, आदिसँ दादी-नानी
सतबेध खि‍स्‍सा कहैत एली
वेद-पुराण सि‍र-सजि‍ मणि‍
दि‍न-राति‍ सुनबैत एली
भरल-पुरल पोथी-पुराण
सत्-बेध जि‍नगी भरल-पुरल छै।
कखनो जोगीक जोग बेधि‍
तीन सत् वाण रटै छै।
काल कुचक्र चक्र सुचक्र
वाण बेधि‍ मारैत रहै छै।
वाण वाणि‍ नारी-पुरुष संग
साड़ी शक्‍ति‍ सजबैत रहै छै।
मि‍थि‍ला मर्म माथ तखन
मथि‍-मथि‍ माथ मि‍लबै छै।
दान सतंजा बाँटि‍-बि‍लहि
जि‍नगी सफल करैत कहै छै।
चक्री-कुचक्री वाण बनि‍ वन
चालि‍ कुकुड़ धड़ैत एलैए।
जि‍नगी जुआ पकड़ि‍-पकड़ि‍
पछुआ पाट बि‍लहैत एलैए।
पाटि‍-पाटि‍ पटि‍या-पटि‍या
पटि‍या धरती बि‍छबैत एलैए।
नरि‍ गोनरि‍ गमार कुहू कहि‍
तर-उपरा रंग चढ़बैत एलैए।
चि‍क्कन-चुनमुन चुनचुनाइत देखि‍
लोल-बोल बति‍आइत एलैए।
मन-मानूख फुसला-पनि‍या
मनु-मानव कहैत एलैए।
बाणि‍ मोड़ि‍ पकड़ि‍ पग
जंगल नाच देखैत एलैए।
भ्रमर रूप सजि‍-धजि‍-धजि‍
भौं-आँखि‍ चढ़बैत एलैए।
फूल कमल बसोबारा कहि‍
कमल दहल दहलाइत एलैए।
दोबर-तेबर दस-बीस कहि‍
सत् शून्‍य भरैत एलैए।
सैयाँ-नि‍नानबे मंत्र रचि‍ बसि‍
अस्‍सी-खस्‍सी बनबैत एलैए।
बर्जित तन कहि‍-कहि‍
मानव-मन रचैत एलैए।
खस्‍सी-बकरी रूप देखि‍-देखि‍
मासु खून पीबैत एलैए।
लंका दर्शन पूर्व राम
वाण समुद्र पकड़ै छै।
सत्-बेध पाथर पकड़ि‍-पकड़ि‍
सेतु बान्‍ह बनबै छै।

गुरुत्तर

गुरुत्तर भार भरैसँ पहि‍ने
गुरुत्तर पाठ पठैत पढ़ै छी।
सड़ि‍-सड़ि‍ सरि‍या-सरि‍या
सि‍र साटि‍ सजबए लगै छै।
बून-बून बुन्नी पकड़ि‍-पकड़ि‍
धड़ि‍-धड़ि‍ धारण करै छै।
धड़कि‍-धड़कि‍ धड़-धड़धड़ा
गति‍ गीत मीत गबै छै।
शि‍वगंगा पकड़ैसँ पहि‍ने
पथर-माटि‍ बनए लगै छै।
परि‍हास रचि‍-बसि‍ कैलाश
राति‍ शि‍व रचबए लगै छै।
एक-एक जोड़ि‍-जाड़ि‍ पजेबा
महल ताज सजबए लगै छै।
पकड़ि‍ बाँहि‍ अक्षर ब्रह्म
वन-उपवन सजबए लगै छै।
अक्षर-ब्रह्म मि‍लि‍ बैसि‍
शक्‍ति‍ शब्‍द सजबए लगै छै।
हि‍त-सहि‍त पकड़ि‍-पकड़ि‍
मुँह साहि‍त्‍य सि‍रजए लगै छै।

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
http://www.videha.co.in/RajeshJha.jpgराजेश कुमार झा
शराबक लेल
सुनबै छी एकटा शराबीक कथा,
शराबक लेल की की करैए
पहिने शराबकेँ बुझै छै फैशन,
शराबक रंगमे रंगैए
फैशन बुझतै-बुझतै,
शराबक लत पकड़ैए  
पहिने पिआबै छै संगी-साथी,
बादमे अपने पिबैए
पिअ वास्ते हम देखलौं,
परिवारक सम्पति लुटैए
जौं परिवार ओकरा रोकै छथिन,
 
हुनका कुलटा-चरित्रहीन कहैए
जहन परिवारक  सम्पति लुटि जाइ छनि,
परिवार हुनकर भूखे मरैए
तहन करैए पैंच-उधार,
अपन सगा-संबंधीकेँ ठकैए
पैंच तँ आपिस नै करैए,
ऊपरसँ झगरा-झाँटी करैए
तहन  करैए छीना-झपटी,
अइ तरहेँ ओ समाजोकेँ लुटैए
शिकाइतपर जहन पुलिस पकड़ै छै,
जेलोमे गलत संगी बढ़बैए  
जहन जेलसँ बाहर अबैए,
तहन लुटेरा-गिरोह बनबैए
शराबीकेँ चाही बस शराब,
जहन की शराबे शराबी केँ पिबैए
शराब छी अन्यायक बीज,
अकरा बढ़ैसँ रोकैए
बंद कराउ ई शराबक ठेका,
मानवकेँ हैवान बनेने यऽ
उठू गुजरात जकाँ हर राज्य,
शराब बेचैपर पाबन्दी केने यऽ

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देखू आइ एफबी परक खेल

देखू आइ एफबी परक खेल
भेष बदलि लोक अपन भेल 
देखू खेलैत छथि कतेक खेल
बढबैत छथि अंजानसँ मेल 
नाना तरहक छायाचित्र
नुकबैत अपन कायाचित्र
फँसला जे क्यो ऐ जालमे
नाश हुनक छन्हि ऐ कालमे
सतर्क भए आजुक पीढ़ीकेँ
बुझबाक चाही सभ चालिकेँ
राखैत डेग सम्हारि कए निश्चित
कल्याण हुनक तखनहिं टा अपेक्षित l

 
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बालानां कृते
बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥
१०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२)
आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥
आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥
मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।
ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।
हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आसर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आघोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आयुवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आमित्रक उदय होए॥
मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि।
एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।
अन्वय-
ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म
रा॒ष्ट्रे - देशमे
ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त
आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए
रा॑ज॒न्यः-राजा
शुरे॑ऽबिना डर बला
इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण
ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला
म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर
दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली)
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित
सप्तिः॒-घोड़ा
पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री
जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला
र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर
स॒भेयो॒-उत्तम सभामे
युवास्य-युवा जेहन
यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे
वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला
निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे
नः-हमर सभक
प॒र्जन्यों-मेघ
वर्षतु॒-वर्षा होए
फल॑वत्यो-उत्तम फल बला
ओष॑धयः-औषधिः
पच्यन्तां- पाकए
योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा
नः॑-हमरा सभक हेतु
कल्पताम्-समर्थ होए
ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी।
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'विदेह' २२४ म अंक १५ अप्रैल २०१७ (वर्ष १० मास ११२ अंक २२४)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -    मैथिलानी केर उपराग राम सं आ समाज ...