Sunday, January 13, 2013

'विदेह' १२२ म अंक १५ जनवरी २०१३ (वर्ष ६ मास ६१ अंक १२२)- PART I


                     ISSN 2229-547X VIDEHA
'विदेह' १२२ म अंक १५ जनवरी २०१३ (वर्ष ६ मास ६१ अंक १२२)India Flag Nepal Flag

 

अंकमे अछि:-

. संपादकीय संदेश


. गद्य



 

. पद्य










..http://www.videha.co.in/BinitaJha.jpgबिनीता झा-देखू आइ एफबी परक खेल

.गद्य-पद्य भारती:.मूल तेलुगु कविता:http://www.videha.co.in/PASUPULETI_GEETHA.jpgपसुपुलेटि गीता; तेलुगुसँ हिंदी अनुवाद:http://www.videha.co.in/santhasundari.jpgआर.शांता सुंदरी; हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद: विनीत उत्पल (दिल्लीक बलात्कारक घटनापर)- दुमर्जा . मन्त्रद्रष्टा ऋष्यश्रृङ्ग- http://www.videha.co.in/HARISHANKAR_SRIVASTAVA_SHALABHA.jpgहरिशंकर श्रीवास्तवशलभ"- (हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद http://www.videha.co.in/Vinit_Utpal.jpgविनीत उत्पल)


 

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ज्योतिरीश्वर पूर्व महाकवि विद्यापति। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू।

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गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज'


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1.संपादकीय

मैथिली:२०१२
मोबाइलपर जखन हम मैथिलीमे बात करै छी तँ हमर सहकर्मी गौरी भोला कहै छथि- “बड्ड मीठ भाषा अछि।गायत्री व्यंकट कहै छथि- “अहाँक भाषा मैथिली अछि आ हम सभ अपन बेटीक नाम मैथिली राखै छी।
ऐ मिठासक भितुरका खटास हम हुनका बुझा नै पबै छियन्हि।
२०१२ आ मैथिली भाषा आ साहित्य:
२०१२ विभिन्न कारणसँ मैथिली भाषा आ साहित्यक इतिहासमे मोन राखल जाएत। ऐ वर्षक शुरुमे चनौरागंज (झंझारपुर) मे बेचन ठाकुर जीक नेतृत्वमे जातिवादी रंगमंचक विरुद्ध समानान्तर मैथिली रंगमंचकपहिल विदेह मैथिली नाट्य उत्सव२०१२ क प्रारम्भमे सम्पन्न भेल। बेचन ठाकुर विगत २५-३० वर्षसँ मैथिली नाटकक निर्देशक रहल छथि, दर्जन भरि नाटक ओ लिखने छथि, जे अनेकानेक बेर मंचित आ प्रशंसित भेल अछि। ऐ बेरुका नाट्य उत्सवक थीम रहए भरतक नाट्य शास्त्रक परिप्रेक्ष्यमे मैथिली नाटक आ रंगमंच। दू दिनक ऐ दिन-रातिक महोत्सवमे जगदीश प्रसाद मण्डलक नाटकवीरांगना”, बेचन ठाकुरक नाटकविश्वासघातआ गजेन्द्र ठाकुरक नाटकउल्कामुखमंचित भेल। एकर अलाबे नारी सशक्तिकरण/ लोकगाथा आधारित एकाङ्कीक प्रदर्शन सेहो भेल। मैथिली कवि सम्मेलन भेल आ विदेह सम्मान देल गेल जकर विवरण निम्न प्रकारसँ अछि।
विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान
१.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार २०१०-११
२०१० श्री गोविन्द झा (समग्र योगदान लेल)
२०११ श्री रमानन्द रेणु (समग्र योगदान लेल)
२.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०११-१२
२०११ मूल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (गामक जिनगी, लघुकथा संग्रह)
२०११ बाल साहित्य पुरस्कार- ले.क. मायानाथ झा (जकर नारी चतुर होइ, लघुकथा संग्रह)
२०११ युवा पुरस्कार- आनन्द कुमार झा (कलह, नाटक)
२०१२ अनुवाद पुरस्कार- श्री रामलोचन ठाकुर- (पद्मानदीक माझी, बांग्ला- मानिक बंद्योपाध्याय, उपन्यास, बांग्लासँ मैथिली अनुवाद)
नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१२
अभि‍नय
मुख्य अभिनय
सुश्री शि‍ल्पी  कुमारी, उम्र- १७, पि‍ता श्री लक्ष्मेण झा
श्री शोभा कान्ती महतो, उम्र- १५ पि‍ता- श्री रामअवतार महतो,
हास्य-अभिनय
सुश्री प्रि‍यंका कुमारी, उम्र- १६, पि‍ता- श्री वैद्यनाथ साह
श्री दुर्गानंद ठाकुर, उम्र- २३, पि‍ता- स्व्. भरत ठाकुर
नृत्य
सुश्री सुलेखा कुमारी, उम्र- १६, पि‍ता- श्री हरेराम यादव
श्री अमित रंजन, उम्र- १८, पि‍ता- नागेश्वर कामत
चि‍त्रकला
श्री पनकलाल मण्डल, उमेर- ३५, पिता- स्व. सुन्दर मण्डल,
श्री रमेश कुमार भारती, उम्र- २३, पि‍ता- श्री मोती मण्डयल
संगीत (हारमोनियम)
श्री परमानन्दा ठाकुर, उम्र- ३०, पि‍ता- श्री नथुनी ठाकुर
संगीत (ढोलक)
श्री बुलन राउत, उम्र- ४५, पि‍ता- स्वे. चि‍ल्टू  राउत

संगीत (रसनचौकी)
श्री बहादुर राम, उम्र-५५, पि‍ता- स्व्. सरजुग राम
शिल्पी-वस्तुकला
श्री जगदीश मल्लिक, उम्र-५०, गाम- चनौरागंज
मूर्ति-मृत्तिका कला
श्री यदुनंदन पंडि‍त, उम्र-४५, पि‍ता- अशर्फी पंडि‍त
काष्ठ-कला
श्री झमेली मुखिया, पिता स्व. मूंगालाल मुखिया, उम्र- ५५
किसानी-आत्मनिर्भर संस्कृति
श्री लछमी दास, उमेर- ५०, पिता स्व. श्री फणी दास
निम्न सम्मान विदेह नाट्य उत्सव २०१३ क अवसरपर देल जाएत:-
विदेह मैथिली पत्रकारिता सम्मान-२०१२ श्री नवेन्दु कुमार झा आ विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार २०१२ श्री राजनन्दन लाल दास (समग्र योगदान लेल)
2.विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध)
२०१२ बाल साहित्य पुरस्कार - श्री जगदीश प्रसाद मण्डल केँ तरेगनबाल प्रेरक विहनि कथा संग्रह
२०१२ मूल पुरस्कार - श्री राजदेव मण्डलकेँ "अम्बरा" (कविता संग्रह) लेल।
2012 युवा पुरस्कार- श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरीक अर्चिस” (कविता संग्रह)
2013 अनुवाद पुरस्कार- श्री नरेश कुमार विकल "ययाति" (मराठी उपन्यास श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर)
समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध विदेह भाषा सम्मान साहित्य अकादेमीमे एक जाति विशेषक फर्जी साहित्यिक (!) संस्था सभक साहित्य अकादेमी मैथिली विभागपर ४५ वर्षोंक कब्जाक विरुद्ध प्रतिक्रियाक रूपमे सोझाँ आएल। ४४ सालमे मैथिल ब्राह्मण -३६ बेर, कायस्थ-६ बेर, राजपूत-२ बेर आ गएर सवर्ण- ० बेर ऐ पुरस्कारकेँ प्राप्त कऽ सकला। ब्राह्मणमे नीक लेखक जेना ललित, धूमकेतु, धीरेन्द्र ऐ पुरस्कारसँ वंचित रहला आ हरिमोहन झा केँ ई पुरस्कार जिबैत नै देल गेलनि। प्रतिक्रियावादी लेखक सभसँ ऐ पुरस्कारक लिस्ट भरल पड़ल अछि। सुभाष चन्द्र यादव, मेघन प्रसाद, बिन्देश्वर मण्डल, जगदीश प्रसाद मण्डल, नचिकेता आदि गएर ब्राह्मण लेखक जिनका मैथिली साहित्यमे अपार आदर प्राप्त छन्हि, ब्राह्मणवादी साहित्य अकादेमीक कोपक शिकार छथि। मिथिला राज्यक आन्दोलनी लोक सभ द्वारा गुआहाटीमे विद्यापति पर्व (दिसम्बर २०१२) क अवसरपर जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ मुख्य अतिथि बनाओल जएबाक विरोध भेल, जकर घोर भर्त्सना कएल गेल।
विद्यापति:
विद्यापति मैथिलीक महाकवि छथि। परम्पराक अनुसार ओ एकटा हाजाम ठाकुर परिवारक छथि। ज्योतिरीश्वर ठाकुर हुनकर विवरण वर्ण रत्नाकरमे केने छथि आ श्रीधर दास हुनकर पदावलीक उल्लेख उदाहरण सहित सदुक्ति कर्णामृतमे केने छथि। श्रीधर दास आ ज्योतिरीश्वरक परवर्ती संस्कृत आ अवहट्ठक लेखक विद्यापतिक उल्लेख मैथिल ब्राह्मणक पंजीमे भेल अछि। परन्तु किछु ब्राह्मणवादी संस्था सभ द्वारा ज्योतिरीश्वरपूर्व विद्यापति केँ ब्राह्मण बना देबाक आ हुनकापागपहिरा यज्ञोपवीत संस्कारकरबाक प्रयास मैथिलीक यज्ञोपवीत संस्कार करबाक षडयंत्रक रूपमे देखल जा रहल अछि। साहित्यिक जगतमे सम्पूर्ण साल ऐपर चर्चा होइत रहल आ ई मामिला सालक अन्तमे भेल इण्डिया हैबीटेट सेन्टर भारतीय भाषा महोत्सवमे सेहो उठल। विद्यापति पर्वक माध्यमसँ मैथिल ब्राह्मणक एकटा कट्टरवादी ग्रुप जातिवादी रंगमंचक साथ मिलि कऽ मैथिली पर कब्जाक कोशिशमे लागल रहल आ सामान्य लोक ऐसँ दूर भऽ रहल छथि।
टैगोर लिटरेचर अवार्ड:
मैथिलीक लेल पहिल टैगोर लिटरेचर अवार्ड श्री जगदीश प्रसाद मण्डलकेँगामक जिनगीलघुकथा संग्रह पर देल गेल। परन्तु एकर चर्चा दरभंगा सहित मिथिलांचलक कोनो हिन्दी अखबार नै केलक, आकाशवाणी दरभंगा सेहो पूर्ण चुप्पी साधने रहल आ अपन जातिवादी चरित्र लोक सभक सोझाँ राखलक।
गूगल विदेह बुक्स:
विदेह द्वारा गूगलक सहयोगसँ ४०० सँ बेशी मैथिली किताब गूगल बुक्स पर १००% ब्राउज आ डाउनलोडक सुविधाक संग ऑनलाइन कएल गेल। अंग्रेजी-मैथिली शब्दकोषकेँ कॉमन क्रिएटिव शेयर अलाइक लाइसेन्सक अन्तर्गत रिलीज कएल गेल।
साहित्य अकादेमीमे मैथिली समन्वयकक मनोनयन आ साहित्य अकादेमीक पुरस्कारक राजनीति:
साहित्य अकादेमीमे मैथिली समन्वयकक चयनक लेल ६ टा जातिवादी संगठनकेँ साहित्य अकादेमी मान्यता देने अछि। ई संगठन सभ मैथिलीक ८ म समन्वयकक मनोनयन केलक अछि। ई संयोग अछि बा दुर्योग कि आइ धरि एकर सभ समन्वयक मैथिल ब्राह्मण भेल छथि, ऐ बेर सेहो ई क्रम जारी रहल। युवा पुरस्कार देबामे सभ निअम खतम करैत रेफरी द्वारा नाम देल सभ पुस्तकपर विचार करबासँ मना कऽ देलनि आ एक साधारण पुस्तककेँ ई पुरस्कार देलनि जकर लेखक मूलतः हिन्दीमे लिखै छथि।
की मैथिली मात्र मैथिली ब्राह्मणक भाषा छी?
यदि साहित्य अकादेमी आ जातिवादी संस्था सभक वश चलितै तँ उत्तर हँ रहितै। परन्तु समानान्तर विचारधारा आ समानान्तर रंगमंच ऐ धारणाकेँ ध्वस्त कऽ देलक। ऐ लिंक https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर विदेह मैथिली विहनि कथा,  विदेह मैथिली लघुकथा, विदेह मैथिली पद्य, विदेह मैथिली नाट्य उत्सव, विदेह मैथिली शिशु उत्सव, विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना ऑनलाइन उपलब्ध अछि। विनीत उत्पलक आर.टी.आइ. क जे उत्तर साहित्य अकादेमी देलक अछि ओ साहित्य जगतकेँ लज्जित करैत अछि। समन्वयक आ ओकर एडवाइजरी बोर्डक सदस्य सभ जइ तरहेँ सभटा असाइनमेन्ट स्वयं आ सर-सम्बन्धीकेँ दऽ देलनि ओ ऐ संस्था सभक ब्राह्मणवादी प्रवृत्तिकेँ सोझाँ अनैत अछि।
राजदेव मंडल, रामविलास साहु, उमेश पासवान, रामदेव प्रसाद मण्डल झारूदार, जगदीश प्रसाद मंडल, उमेश मंडल, सुभाष चन्द्र यादव, प्रेमशंकर सिंह, डॉ. उदय नारायण सिं‍ह "नचिकेता", मेघन प्रसाद आदि लेखक निःस्वार्थ भावसँ मैथिलीकेँ प्राणवायु दऽ रहल छथि।
पागक राजनीति:
ब्राह्मणवादी पागक राजनीतिकेँ तखन बड्ड पैघ धक्का लागल जखन खरौआमे महाकवि लालदास जयन्तीक अवसरपर पहिल बेर आयोजक लोकनि ई मानलनि जे ई जाति विशेषक परिधान मिथिला मैथिलीक मंचपर प्रयोग नै कएल जएबाक चाही आ ओ सएह केलनि। एकरा समानान्तर विचारधाराक बड़ पैघ विजयक रूपमे देखल जा रहल अछि।
प्राथमिक आ मध्य विद्यालयमे शिक्षाक माध्यम मैथिली माध्यमसँ:
सुप्रीम कोर्टक निर्णयक बादो अखनो मिथिलामे शिक्षाक माध्यम मैथिली नै अछि। ऐ सम्बन्धमे एकटा बैठक निर्मलीमे भेल जइमे जगदीश प्रसाद मण्डल, राम विलास साहु, राजदेव मण्डल, वीरेन्द्र यादव आदिक उपस्थितिमे राहुल कुमार जीक संयोजकत्वमे विदेह विचार गोष्ठी सम्पन्न भेल आ हस्ताक्षर अभियान भेल। परन्तु ई चिन्ता सेहो प्रकट कएल गेल जे मैथिली साहित्यक वर्तमान जातिवादी आ प्रतिक्रियावादी सिलेबसकेँ बदलल जाए, आततायी जातिवादी जमीन्दारक जीवनी कोन गुलाम मानसिकताक अन्तर्गत सिलेबसमे राखल गेल अछि? कोसी पुलक उद्घाटनक अवसर पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमारकेँ ऐ सम्बन्धमे स्मार पत्र देल गेल।
एकर अलाबे विदेह गोष्ठी (परिचर्चा/ प्रैक्टिकल लैबोरेटरी प्रदर्शन) साहित्यक विभिन्न आयामपर सम्पन्न भेल।
नेपाल मे मैथिली:
डेनमार्क एम्बैसीक सहयोगसँ  "बुधियार छौड़ा आ राक्षस" (रमेश रञ्जन लिखित नाटक) कई दर्जन स्थानपर मंचित भेल। विद्यापति पुरस्कारक घोषणा भेल, दू लाखक पुरस्कार रामभरोस कापड़ि भ्रमरकेँ भेटलनि।
रंगमञ्च आयोजनामे जनकपुरमे मैथिली नाटक तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम सम्पन्न भेल। सांस्कृतिक कार्यक्रममे गीत एवं नृृत्य प्रस्तुत भेल।
जानकी नवमी पर जनकपुरमे बम विस्फोट भेल, झगड़ू मण्डल सहित कई संस्कृतिकर्मीक हत्या भेलनि। परमेश्वर कापड़ि घाइल भेला।
स्वस्थ्य महिला स्वस्थ्य परिवार- स्वस्थ्य समाज मूल नाराक संग यदुकोहा आ माची झिटकहियामे सड़क नाटक प्रदर्शन भेल। परिवार नियोजनपर आधारित जंगलमे मंगल नामक मैथिली भाषाक सड़क नाटक पिसिआइ नेपालक सहयोगसँ प्रतिविम्ब रंगमञ्च जनकपुर प्रदर्शित केलक।
युवा नाट्यकला परिषद परवाहा देउरी द्वारा बिक्रमी शम्वत २०६९ क पूर्व सन्ध्यामे अन्तरराष्ट्रिय मैथिली नाटक महोत्सव आयोजित भेल, उदघाटन गणतन्त्र नेपालक पहिल राष्ट्रपति डा.रामवरण यादव केलनि। महोत्सवमे नेपाल आ भारतक आठ नाट्य समूह भाग लेलक।
नचिकेता क "एक छल राजा"क मंचन सरस्वती पूजनोत्सव तथा वसन्त पंचमी मेला २०६८ क अवसर पर तिलाठी मे भेल।
हम जखन बच्चा रही तँ गाममे देशी कौआकार कौआदुनू देखाइ पड़ैत छल, “कार कौआचकमक आ कर्कश, “देशी कौआहल्लुक रंगक आ मधुर आवाजबला। लोक ककरो कर्कश बोलीकेँ सुनि बजै छला- केना कार कौआ सन बजै छेँ।एम्हर किछु बर्खसँ देशी कौआविलुप्त भऽ गेल अछि, लोक सभकेँ एकर दुख छै। चारू दिस कार कौआक साम्राज्य व्याप्त अछि।


Gajendraगजेन्द्र ठाकुर

ggajendra@videha.com

 

अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।

. गद्य




http://www.videha.co.in/ShivJha.JPGशि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू
द्वि‍रागमन
आत्‍मासँ जीबाक प्रवृति रखेबला लोककेँ जखन परि‍स्‍थि‍ति‍वश अवि‍रल स्‍नात जीवन शैलीकेँ जीवाक अनर्गल प्रयत्न करए पड़ैत छैक तँ जीवनक शैलीमे परि‍वर्त्तन अवश्‍यंभावी भऽ जाइत छैक। इहए दशा मौलि‍क रसास्‍वादन करैत अपन साहि‍त्‍य साधनासँ समाजकेँ अनुशासि‍त स्‍वस्‍थ मनोरंजन देबाक प्रयत्न करैबला आशुकथाकारकेँ सेहो होइत अछि‍।
      हरि‍मोहन बाबू हास्‍य सम्राट छथि‍। मैथि‍ली कथाकेँ जनप्रि‍य बनेबाक दृष्‍टि‍ऍं हि‍नक प्रयास अतुलनीय मानल जाइत अछि‍। गंभीर चि‍न्‍तन हेतु अनुशीलन करबाक लेल सामाजि‍क अर्न्‍तद्वन्‍द्व ओ वि‍डम्‍बनाकेँ अपन सरल शैलीमे आरोहन कऽ मैथि‍ली साहि‍त्‍यकेँ मनोरम रसास्‍वादन प्रदान केलनि‍। कि‍छु व्‍यति‍क्रमक क्रममे हास्‍य सम्राट ई बि‍सरि‍ गेलथि‍‍ जे गंभीर वि‍षय हास्‍यक छाल्हीक तरमे पानि‍-पानि‍ भऽ गेल छल। जकर प्रत्‍यक्ष प्रमाण हि‍नक चर्चित उपन्‍यास कन्‍यादान मानल गेल। सगरो आलोचनाक बाढ़ि‍ आबि‍ गेल छलनि‍। बुच्‍ची दाइकेँ एहेन अवस्‍थामे आनि‍ कऽ कि‍एक छोड़ि‍ देलनि‍? ओना ई कोनो असहज नै। मि‍थि‍लाक तथाकथि‍क भलमानुषक परि‍वारमे अखनो बहुत ठाम बुच्‍ची दाइ कानि‍ रहल छथि‍। अपस्‍याँत छथि‍ कतौ अपन सासुरक पीड़ासँ तँ कतौ अपन नैहरक देल लावण्‍य दुखमयी अश्रुसरि‍तासँ। जौं वि‍धवा भऽ जेतीह तँ समाजकेँ स्‍वीकार्य भऽ जाएत कि‍एक तँ उज्‍जर साड़ीमे वाला सवल समाजकेँ मान्‍य छैक। मुदा शि‍क्षा वि‍हीन बुच्‍ची दाइकेँ छोड़ि‍ पाश्चात्‍य जरदगब सी.सी. मि‍श्रा केना भागि‍ सकैत छथि‍...?
बेटी दोसरक लाज होइछ। ओकरा इस्‍कूल नै पठा कऽ लालकाकी केना गलती नै केलखि‍न...
      हरि‍मोहन जीक ऐ उद्देश्‍यहीन उपन्‍यासक आलोचना हि‍नका समस्‍याक तत्काल समाधान करबाक लेल प्रेरणा देलक। आशु कथाकार समाजक देल उपहासकेँ बर्दाश्त नै कऽ सकल आ तत्क्षण एकर समाधान लि‍खबाक लेल उद्यत भऽ गेल। शीर्षक देल गेल द्वि‍रागमन
      स्‍वाभावि‍क छैक बेटी कोनो ढोलनाक ताग तँ नै जे सड़ि‍ गेला बाद नि‍कालि‍ कऽ दोसर तागमे गाँथल जाए। तँए द्वि‍रागमन दोसर केना करत। सी.सी. मि‍श्र पाश्चात्‍य जोकर बुच्‍ची दाइकेँ मॉडर्न वाला बना कऽ द्वि‍रागमन करत। कोनो न्‍यायाधीशसँ साक्ष्‍यक अभावमे नै चाहैत ि‍नर्दोषकेँ सजा दैत छैक तँ ओकर शब्‍द-शब्‍दक तादात्‍म्‍य अनर्गल लगैत। तहि‍ना हरि‍मोहन जीक द्वि‍रागमनमे जइ-जइ समाधानक वि‍न्‍दुक उत्‍कर्ष भेल ओ वएह प्रमाण नै दऽ सकल जकर हरि‍मोहन अधि‍कारी छथि‍।
      द्वि‍रागमन अपन मोनकेँ जवरदस्‍ती मनौअल करा कऽ हरि‍मोहन लि‍खलनि‍। एतेक तँ ि‍नश्चि‍त अछि‍ नैसर्गिक प्रति‍भाक धनी उपन्‍यासकार कतौ ऐ कचोटकेँ प्रत्‍यक्ष नै कएलनि‍। संग-संग कोनो पारखी ई दु:साहस नै कऽ सकैत अछि‍ जे ऐ उपन्‍यासक मान्‍यतापर प्रश्नचि‍न्ह लगाओत। द्वि‍रागमन सेहो कन्‍यादाने जकाँ अध्‍यायमे वि‍भक्‍त अछि‍। प्रयोगवादि‍ताक एहेन प्रमाण मैथि‍ली साहि‍त्‍यक महाकाव्‍य वि‍धामे मनबोध आ प्रवासी तथा काव्‍य वि‍धामे नचि‍केताकेँ छोड़ि‍ संभवत: आनठाम नै भेटत। मि‍स वि‍जली वि‍श्व-वि‍द्यालय अज्ञात यौवना आ मुग्‍धा छथि‍। सी.सी. मि‍श्रा हुनक फैन भऽ गेल छथि‍। सम्‍पूर्ण भाषणमे आर्यक मूल भाषक श्‍लोकक तार्किक वि‍वेचन वि‍श्व वि‍द्यालयक संग-संग चण्‍डीचरणकेँ झकझोकरि‍ देलक। वि‍द्योत्तमा कालीदास केँ कुमारसंभवमक नायक बना देने छलीह तँ ऐठाम चण्‍डीकेँ अपन बुच्‍ची दाइमे सुयोग्‍य पाश्चात्‍य वालाक आश जागव उपन्‍यासक यथार्थवादी क्रांति‍ मानल जाए। जे मैथि‍ली साहि‍त्‍यक लेल तत्‍क्षण तँ बेछप्‍प अवश्‍य छल। मि‍स वि‍जलीक भाषणमे जे आधुनि‍कताक लेब उपन्‍यासकार देखेबाक प्रयास केलनि‍ ओ पुरुष प्रधान संकुचि‍त मानसि‍कतासँ भरल कथाकथि‍त मि‍थि‍लाक सवल अर्थात सवर्ण समाज वि‍शेष कऽ कऽ ब्राह्मणमे अखनो स्‍वीकार्य नै ओहि‍ काल तँ सर्वथा असंभव छल। अखनो हमरा सबहक समाजमे स्‍त्रीकेँ सहचरी नै अनुचरी मानल जाइत अछि‍। अपन वेवाक हास्‍यसँ हरि‍मोहन तत्‍कालीन सार्मथ्‍यवान सबल मैथि‍लक अर्न्‍तदशापर तीक्ष्‍ण प्रहार केलनि‍, मुदा हास्‍य समागम मि‍श्रि‍त रहबाक कारणे ओ समाज एकर मर्मकेँ बूझि‍ नै सकल। जौं सभटा गप्‍प शुष्‍क दार्शनि‍क अंदाजमे लि‍खल जाइतए तँ हरि‍मोहन जीक द्वि‍रागमन ओहि‍ना अक्षोप भऽ जइतए जेना साम्‍यवादी जगदीश प्रसाद मण्‍डल जीक मौलाइल गाछक फूल आ सुभाष चन्‍द्र यादव केर घरदेखि‍याबनैत वि‍गड़ैतक अछि‍। एकटा ब्रह्मण साहि‍त्‍यकार द्वारा मनुवादी प्रवृति‍पर प्रहार समाज द्वारा मान्‍य तँ भेल मुदा मात्र हास्‍य आ रोचकताक कारणे। जौं हास्‍य नै रहि‍तए तँ चतुरानन ि‍मश्रक कला जकाँ दुति‍याक चान मानल जेबाक संभावनाक वि‍शेष छल। अकाण्‍डताण्‍डवमे लालकाकी, आवेश रानी, तारादाइ आ दुलारमनि‍क संवाद रूचि‍गर लगैत अछि‍। ऐठाम मि‍थि‍लाक परम्‍परावादी दृष्‍टि‍कोणकेँ उत्तम देखेबाक मूल कारण उपन्‍यासकार नारी शि‍क्षा ओ चेतनाक संग-संग अनुशीलनक अभाव मनैत छथि‍। एतेक तँ स्‍पष्‍ट अछि‍ जे रेवती रमण सन शि‍क्षि‍त भाइक कारणे सकल ग्राम्‍य नारी पात्रा बुच्‍ची दाइकेँ आधुनि‍क बनेबाक लेल तैयार भऽ जाइत छथि‍। पति‍ परमेश्वर होइत अछि‍। ओकर इच्‍छाकेँ केना नै पूर्ण कएल जाएत। ब्राह्मण परि‍वारक स्‍त्री केना दोसर बि‍आह करतीह? ऐ प्रकारक कल्‍पना हरि‍मोहन करबाक साहस नै कऽ सकलाह। ओ स्‍वयं परम्‍परावादी समाजक अंग छथि‍। तँए परम्‍परा आ आधुनि‍कतामे सामंजस्‍य स्‍थापि‍त कराबाक इच्‍छाशक्‍ति‍केँ नवल रूपेँ सजा कऽ बुच्‍ची दाइकेँ आधुनि‍क बना देलनि‍। कन्‍यादानमे उद्देश्‍यहीन अंति‍म यात्राक परि‍णति‍ इहए भेल जे एकटा मूर्ख वालि‍काकेँ जबरदस्‍ती ततेक आधुनि‍क बना देल गेल जे वर्तमान परि‍स्‍थि‍ति‍मे सेहो ग्राह्य नै भऽ सकैत अछि‍। ओइ कालक लेल तँ सर्वथा अनुपयुक्‍त भेल हएत। जे बुच्‍ची दाइ पहि‍ल राति‍ सी.सी. मि‍श्राक नार्सिग शब्‍दकेँ नरसि‍ंह लगा कऽ गारि‍ बूझि‍ गेली ओ आब डलसीक स्‍थानपर क्रोटनक गमला मंगवाक प्रेरणा अपन माएकेँ दैत छथि‍- ई तँ सर्वथा अपच्‍च मानल जाए। ओना देशी मुर्गी वि‍लायती बोल परि‍स्‍थि‍ति‍ वश संभव छैक मुदा प्रकृति‍ ओहूमे गाममे रहि‍ कऽ वयस भेल मुरुख वालाकेँ शि‍क्षि‍त बना कऽ एहेन परि‍वर्तन करबाक चेष्‍टा उपन्‍यासकारक अदूरदर्शिता मानल जाए।
अशि‍क्षि‍त पुरुष वा नारी जखन परि‍स्‍थि‍ति‍वश पाश्चात्‍य संस्‍कृति‍ आरोहण करैत अछि‍ तँ चालि‍मे परि‍वर्तन संभव छैक।
      मुदा ऐठाम बुच्‍ची दाइमे शि‍क्षाक क्रमि‍क वि‍कास देखाओल गेल। पति‍क आलि‍ंगन आ सि‍नेहसँ वि‍मुख नारीकेँ परीक्षास्‍वरूप आधुनि‍क बनए पड़ल ऐ प्रसंगमे तँ बुच्‍ची दाइकेँ आर गंभीर बना देबाक आवश्‍यकता छल। मात्र लोकप्रि‍यता आ छद्म साहि‍त्‍य लोलपताक कारणे एतेक अलौकि‍क परि‍वर्तनकेँ समाजक लेल कोनो रूपेँ दि‍शा ि‍नर्देशि‍त नै मानल जा सकैछ। हरि‍मोहन सन पारखी रचनाकारक लेखनीक कमाल मानल जाए जे शैली ओ प्रवाहक संग-संग रोचकताक कारणे द्वि‍रागमन लोकप्रि‍य भऽ गेल अन्‍यथा जौं सामान्‍य साहि‍त्‍यकारक ई प्रयास रहि‍तए तँ कोनो रूपे साहि‍त्‍यक लेल उपयुक्‍त नै मानल जइतए। भाषा शैली ओ प्रवाहमे द्वि‍रागमन अभूतपूर्व कृति‍ थि‍क ऐमे कोनो संदेह नै। सरल ग्राम्‍य समाजक शब्‍द धी-डाहीसँ लऽ कऽ पाश्चात्‍य उपक्रम धरि‍ कतौ ई नै बुझना जाइत अछि‍ जे हरि‍मोहन ओइ समाजक अंग नै छथि‍ जइ समाजक लेल संवाद लि‍खल गेल। अर्थात अज्ञसँ लऽ कऽ वि‍ज्ञ धरि‍ गामक जरलाही सन शब्‍द बाजैवाली महि‍लासँ लऽ कऽ मि‍स वि‍जलीक भाषण धरि‍ एकरूपता देखा कऽ ई प्रमाणि‍त तँ अवश्‍य कएलनि‍ जे हुनकासँ पैघ रोम-रोममे पुलकि‍त मैथि‍ली पुत्र ताधरि‍ तँ अवश्‍य नै भेल छल।  

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
http://www.videha.co.in/Jagdish_Prasad_Mandal.JPGजगदीश प्रसाद मण्‍डल-लघुकथा-कलंक

कलंक

दि‍शा-दि‍शान्‍तर दि‍स दृष्‍टि‍ उठा वि‍श्वामि‍त्र देखलनि‍ तँ समुद्रमे जोर-जोरसँ उठैत लहड़ि‍ नजरि‍ पड़लनि‍। लहड़ि‍क गति‍ देखि‍ बूझि‍ पड़लनि‍ जे कहीं भूचाल तँ ने भऽ रहल अछि‍। एहेन भूचाल पूर्वोमे भेल छल आकि‍ पहि‍ल-पहि‍ल भऽ रहल अछि‍। मुदा ई भाँज केना लागत? ने एकोटा पोथी बँचल, सभटाकेँ दि‍वार खा गेल आ ने एकोटा पुरान लोककेँ देखै छी जि‍नकासँ पूछि‍ लेबनि‍। तखन? आँखि‍ बन्न केने वि‍श्वामि‍त्र बन्‍द पि‍पनी तरसँ तकलनि‍ तँ त्रेता युगक मन्‍थरा देखलनि‍।
      मन्‍थरापर नजरि‍ पहुँचि‍ते कालि‍ल प्रभातक सूर्यकेँ अर्ध दैत देखलनि‍। मन वि‍हुँसि‍ गेलनि‍। अनेरे खापड़ि‍क ति‍सी जकाँ जनचना-चनचना उड़ए लगलनि‍। एह, ओहो नौड़ी-छौड़ी कमाल कऽ गेल। अयोधि‍या राजकेँ ढनमना देलक। मुदा लगले मन ठमकि‍ गेलनि‍। पैछला बात इति‍हास-पुरान भेल, अनेरे ओकरा धुनने बड़ हएत तँ मोटका तोसक-सीरक बनत आब ओ युग रहल जे अनेरे पाँच कि‍लो ऊपरो आ पाँच कि‍लो तरोमे तड़तड़ाएत! आब तँ ठंढ़ा हवाक दवाइ बि‍जलीक हीटर भऽ गेल। जि‍नगी असान भऽ गेल, मुदा आचारक कि‍ वि‍चार अछि‍ से कतए हरा गेल अछि‍ जे एना बेर-बेर समुद्रमे लहड़ि‍ उठैत रहैए। वि‍श्वामि‍त्रक मन फेर ठमकलनि‍। ओह अनेरे कोन फेरि‍मे पड़ै छी। घरवाली घर लेती, दाय जेती छुच्‍छे। कते दि‍न जीबे करब जे अनेरे माथमे मोटरी बान्‍हि‍ रखने रहब। मुदा जाबे आँखि‍ तके छी ताबे केना मुनल रहत। जेकर रक्‍छा ओटोमेटि‍क पीपनी करैत रहैत अछि‍। मन नचि‍ते रहनि‍ आकि‍ डेग उठि‍ पूबरि‍या रस्‍ता पकड़ि‍ लेलकनि‍।
      जाधरि‍ भकुआएल रहलाह ताधरि तँ दि‍शाँस लगलाहा जकाँ पूब-पछि‍मक बोध नै रहलनि‍ मुदा आगूक कटारि‍ देखि‍ते वि‍श्वामि‍त्र चौंकलाह। जहि‍ना गाड़ी-सवाड़ीक यात्री जीवन-मरणक बीच चलैत तहि‍ना वि‍श्वामि‍त्रक सवाड़ी मरल-जीअल बाट पकड़लक। आँखि‍ उठा देखलनि‍ तँ मन्‍थराक घर सोझमे पड़लनि‍। जीह हलसि‍ गेलनि‍। कहुना छी तँ राज-दरवारक छी कि‍ने। बैसैले सोनाक पीढ़ी देबे करत। सभ दि‍न तँ सागेक वि‍न्‍यास ने गनै छी मुदा आइ तँ छेनेक वि‍न्‍यास गनब। मुदा लगले जीहक पानि‍ धरतीपर खसि‍ते मन बदललनि‍। की‍ मन्‍थरा जीबैत जीबैए आकि‍ मुइल जीबैए। जहि‍ना कोनो गाममे जँ सभ चोरे भऽ जाए तखन चोर के भेल। कि‍यो नै, मुदा सधुआ गाम नै चौरूआ गाम तँ कहाऔत।
दरबज्‍जापर पहुँचि‍ते वि‍श्वामि‍त्रपर आंगन बहारैत मन्‍थराक नजरि‍ पड़ल। पहि‍लुके नजरि‍मे अखड़ाहाक खलीफा जकाँ माटि‍क सलामी भेटलनि‍। हाथमे बाढ़नि‍ नेनहि‍ आंगनसँ मन्‍थरा बेसोह दौगल आबि‍ डेढ़ि‍यापर बाढ़नि‍ पटकि‍ दुनू हाथे दुनू बाँहि‍ पकड़ि‍ मन्‍थरा आंगन लऽ जा गोड़ लगलकनि‍। असीरवाद दैत वि‍श्वामि‍त्र पुछलखि‍न-
मन्‍थरा, अहीं तँ राम-रावणक बखेरा ठाढ़ केलौं, अखुनका कि‍ हाल अछि‍?”
वि‍श्वामि‍त्रक प्रश्नपर धि‍यान नै दऽ ऋृषि‍क सेवामे चुपचाप लगि‍ गेल।
आति‍थ्‍य-सत्‍कार पछाति‍ मन्‍थरा मुँह खोललक-
बाबा महाराज, इति‍हास-पुरान हमरा कलंकि‍नी बना ठाढ़ केने अछि‍। असगरमे कहि‍यो भेँट हेबाक समए नै भेटल तँए अखन धरि‍ अहाँ कान धरि‍ नै पहुँचा सकल छेलौं, मुदा आइ....
बि‍च्‍चेमे वि‍श्वामि‍त्र पाकल आम जकाँ टपकि‍ खसलाह-
ई तँ हमर दुरभाग्‍य जे अहाँ सन करामातीसँ तीन युगक पछाति‍ भेँट भेल।
वि‍श्वामि‍त्रक आमक रस पाबि‍ मधुआएल मन्‍थरा बाजलि‍-
दरवारमे हम नौड़ी छेलौं। नौड़ी-छौड़ीक मोजर कते होइ छै से अहाँसँ छि‍पल अछि‍। तखन हमरे दोख लगा कि‍अए कलंकि‍नी बनौने अछि‍?”
मन्‍थराक प्रश्न वि‍श्वामि‍त्रकेँ ठमका देलकनि‍। तत्काल बातकेँ टारैत बजलाह-
अखन हम हाल-चाल देखैए चलल छी। अहाँक पुरान बात अछि‍। ओ बि‍ना तात्वि‍क चि‍न्‍तनसँ नै हएत।
मन्‍थरा- तखन?”
यएह जे सात दि‍नक समए दि‍अ। आठम दि‍न आठ बजे अपने आबि‍ कहि‍ देब, नै जँ कोनो काजक ओझरीमे पड़ि‍ गेलौं तखन अहाँ सबा आठ बजे जरूर पहुँच जाएब।   

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
http://www.videha.co.in/BindeshwarNepali.jpgबिन्देश्वर ठाकुर, धनुषा, नेपाल। हाल-कतार।
प्रेम-पत्र / सपनाक अबसान


प्रेम-पत्र 

हमर प्राणप्यारी नम्रता 
मनभरिके माया आ स्नेह मात्र अहाँकेँ। 
हम ऐठाम कुशल रहि अहाँक कुशलताक कामना करैत छी। अहाँक वियोगमे बिना पानिक माछ आ बिना नेहु कऽ माँस बनल हम एतऽ परिवारक भरण-पोषण लेल श्रमजीवीक टोपी लगा दिन काटि रहल छी। 
काल्हिक फोनसँ साच्चे हमर मन बड दुखित अछि। अहाँक उपराग छल जे हमरा बिसरि गेलौं, बराबर फोन नै करैत छी। अहाँकेँ हमर ख्याले नै अछि। मुदा सत्य ई नै छै। किएक तँ हम तँ बस शरीर छी जहिकऽ आत्मा अहाँ छी। जौँ श्वास लेबऽबला फोक्सो हम छी तखन ऑक्सीजन तँ अहाँ छी। आब अहीं कहू जकरा बिना हम एक पल बाँचि नै सकब, ओकरासँ अलग रहबाक कल्पना कोना करब? मुदा तैयो परिस्थिति लोककेँ दोसर कऽ सामने विवश कऽ दै छै। आन लग काम करब, ओहो प्रचण्ड गर्मीमे, बड पैघ बात छै। घरमे बसिया-कुबसिया किछु नै खाइ छलौं। मुदा एतऽ सुखल खबुस चिबाएब लत भऽ गेल अछि। नेपालमे रहैत काल विदेश माने स्वर्ग हएत से कल्पना करैत छलौं। ओतुक्का लोक सभ आनन्दसँ, खुशी साथ जीवन व्यतीत करैत हेताह, से भ्रम छल। पैसा जेना गाछसँ हिला कऽ लाख- दू लाख पठबैत अछि, तहिना बुझाइत छल। शायद एखन अहूँ ओहे सोचैत हएब। मुदा देखू ह्रिदेश्वरी, सत्य ई नै छै। स्वर्ग कहल ई जगह वियोगाभासमे तड़पि-तड़पि मरऽबला स्थान छै। एतऽ पैसाक महत्व संगे मनुष्यक खरीद-बिक्री होइ छै। दोसर दिस रातिमे अहाँ संग बिताएल ओ पल सभ,स्नेहक तीत-मीठ गप-सप बिढ़नीक खोता जकाँ हमरा मानस पटलमे आबिकऽ निन्द तोड़ि दैए। कखनो-कखनो विदेश छोड़ि कऽ अहीं संग ओइठाम साग-पात खा दिवस गमएबाक इच्छा होइए। मुदा विगतक दु:-दर्दसँ मन तरसि जाइए। सच्चे, नीक खाना, नीक कपड़ा आ नीक गहना लेल कतेक तरसि गेल छलौं। नीक खाएब आ नीक लगाएब सपना भऽ गेल छल। 
एतऽ आबि परिवार टेबब एकटा किनर मिलल अछि। दायित्व पूरा करबाक एकटा सहारा अछि। हम एतबेमे खुशी छी। मुदा तैयो फोन करबाक पर्याप्त पैसा आ समय नै हएब, दोसरक वशमे बड़द जकाँ जोताएब, घर- परिवारसँ दूर रहब चिन्ताक विषय थिक। 
एहन विषम परिस्थितिमे हमर साथ देब, आत्मविश्वास बढ़ाएब, अपनामे धैर्यताक बान्ध मजगूत राखब अहाँक कर्तव्य अछि। कारण अहाँक धैर्यता आ आत्मविश्वासे प्रवासमे हमरा हौसला प्रदान करत। 
अन्तमे समय-समयमे फोन करैत रहब से वाचाक संग एखन विराम। बाँकी दोसर पत्रमे। 

अहाँक स्नेही 
एकान्त राम
मरुभूमि टोल,कतार 
 

सपनाक अबसान
एक दिन रमलोचना आंगनमे सँ महेश महेश... किलोल करै छथि। तखन चौकिये परसँ काकी कहै छथिन, बौआ एम्हरे आउ- काकीक मन बड पिड़ाएल आ मन खिन्न रहए। रमलोचना गामक बेटा आ महेसक संगी छल। बुढ़िया रमलोचनाकेँ बजा कऽ महेशकेँ वृतान्त सुनबैत छथिन।
महेश जे तीन साल पहिने गेल छलाह कतार, अपन सपना पूरा करबाक लेल। जयबाक बेर अत्यन्त हर्षित- माएला घर बनाएब, पत्नीक लेल नीक कपड़ा, बच्चा-बुच्चीकेँ नीक स्कूलमे पढ़ाएब आ जबान बहिनक शादी करब। हतपतमे पास्पोर्ट बनौलक। अपन कियो नै रहै विदेशमे। तैयो घरक पड़ोसी मदनक सहयोगमे हुनकर मामासँ वीजा मङौलक। पहिने कनिए पैसामे भऽ जाएत कहितो प्लेनपर चढ़ऽसँ पहिने १ लाख नगद लेबाक जिद करऽ लागल। पैसा नै भेलाक कारणे दोबर कऽ कागज बनबा लेलक। आब दूध-माछ दुनू बातर भऽ गेलै महेशकेँ। की करत घरमे, सभ सदस्यक आँखिक नोर पोछैत ओ गेलाह कतार। मुदा हुनका सभकेँ नै चाही एना, काम नाथुरकेँ कैहक दिन-राति धूपमे तबुक उठाएब आ देह धुनि बिल्डिङ कन्सट्रक्शनमे काम करब। नै खएबाक नीक व्यवस्था, नै सुतबाक। कम्पनी सेहो सप्लाइ। 
घरक याद बड सतबैक महेशकेँ। मुदा प्रतिज्ञाक अटल रहथिन महेश। कतबो दु:ख पीड़ा होइतो काम नै छोड़थिन। ओइठाम ब्याज बढ़ि कऽ घर गिरवी रखबाक स्थिति आबि गेलै। एतऽ पगार जहिनाक तहिना। दिन-दिन सोचि-सोचि कमजोर भऽ गेल बेचारा महेश। एक दिन काम करैत काल करेन्ट लागि गेल हुनका। साथी-संगीक सहयोगमे अस्पताल लऽ जा बचलथि। मुदा हाथ बिना काम कऽ भऽ गेल। ऊपरसँ कम्पनी तोरा गल्तीसँ करेन्ट लागल आ कम्पनीक समान सभ नोकसान भेल कहैत माँस सेहो काटि लेलक। शरीर बिना कामकेँ भेलासँ उपचार करएबाक बदला महेशकेँ घर पठा देलक। महेशक आँखिसँ नोर बर्-बर् टपकैत रहल। 
घर पहुँचलाक बाद ओ माएक स्थिति देखि बौक भऽ गेलाह। जेना मुँहसँ किछु अबाज नै निकलल। माय सेहो अन्तिम साँस रोकने बस महेशक लेल। बौआ-बुच्ची बाबुक सनेसक प्रतीक्षामे। पत्नीक लेल सेहो किछु नै। हाथ खाली। बड ग्लानि भेलनि महेशकेँ। 
किछु दिन बाद उपराग सभसँ महेशक धैर्यताक बान्ध टुटि गेलै। ई बान्ध बड मजगूत होइ छै आ टुटलापर सर्वनाश होइ छै। यएह भेल महेशक साथ। अपन जबान बहिनक विवाह दहेजक कारण नै भऽ सकल आ गामक लोकक ताना सुनि-सुनि ओ पागल भऽ गेलाह। 
महेश बनि कऽ सृष्टिक रक्षा करब उद्देश्य रखने हमर बेटा ऐ गरीबीक चपेटामे जिनगी नरक बना लेलक। आ हम सभ दर-दर भटकि रहल छी। अते कहैत बुढ़ियाक आँखिमे नोर भरल आ जोर-जोरसँ चिचिया उठल आ धिया-पुता जकाँ हुचकि-हुचकि कानऽ लगलीह।


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प्रसुन सिंह, महोत्तरी

नारीक चरित्र सभसँ रंगल कथासंग्रह जिद्दी


जिद्दी कथासंग्रहक बारेमे हम पहिलबेर सामाजिक सञ्जाल फेसबुकके माध्यमसँ जानकारी पएलहुँ । अप्पन गृह जिल्ला महोत्तरीक सदरमुकाम जलेश्वरमें एहि पोथीक विमोचन भेल खबर सुनिकऽ हमरा मनमे स्वभाविक एहि पोथीके बारेमे आओर जानकारी लेबाक इच्छा भेल । अप्पन बाल्यावस्थामें मैथिली भाषा सँ परिचित नहि होएबाक कारणसँ हमरा अप्पन मातृभाषा प्रति आओर वेस रुचि आ स्नेह अछि । एहि भाषाक बारेमे जतेक भऽ सकैय ओतेक जानकारी आ एहि सऽ सामिप्यता बढएबाक इच्छा हमरामे स्वभाविक अछि । संगैह साहित्यके विद्यार्थी आ प्रेमी होएबाक कारण सँ हमरा एहि पोथीक प्रति विशेष जिज्ञासा छल ।
कात्र्तिक मासमे हम विजयादशमीसँ छठि पावनिधरि जलेश्वरमें रहलहुँ । हमर भित्र नागेन्द्रकुमार कर्ण सँ भेटक क्रममें संयोगवश एहि कथा संग्रहक बारेमे हम हुनका सँ पुछलहुँ । भाइटीकाक दिन हुनकर गाम सुगामें चित्रगुप्त पुजाक अवसर पर गेल छलहुँ त ओ हमरा जिद्दी उपहारस्वरुप देलाह । पोथी भेटैत मन खुस भगेल । हमर पहिल मैथिली कृति पढबाक अनुभव केहन हायत से सोचिकऽ हम आओर प्रफुल्लित भऽ गेलहुँ ।
अगिला दिन भोरे उठैत हम जिद्दीके हातमे लेलहुँ । सुरुवातमे रहल टिप्पणी सभ पढिकऽ किछ पूर्वजानकारी लेलाक बाद हम एहि पोथीके पहिल कथा पूmल पूmलाइएकऽ रहलपढलँहु । कथा समापन होइते हमर भितरके पाठक प्रसन्न भगेल । हमरा लागल जे एहि कृत्ति पढबाक लेल हम एतेक बिलम्ब किया कएलहुँ ।
हमरा कथाकार सुजित कुमार झा आ एहि कृति प्रति और विश्वास बढल जखन पहिला कथा पढलाक बाद हमरा आरो कथा पढबाकलेल पन्ना उल्टएबाक इच्छा स्वतस्पूर्mत भेल । एकटा लेखकके विजयक लक्षण इहे छैक जे हुनकर कृत्तिके पाठकगण सुरु स लऽकऽ अन्तधरि पढबाक इच्छा होय
पूmल पूmलाइएकऽ रहलके पिंकीके अपन संगै भेल धोखाके अवसरिमे परिवर्तन करैत देखलहुँ त ओकर विवेकके मन सलाम कयलक । तहिना नव व्यापारकसाधनाक असन्तुष्टि आ नारी अधिकारक अपव्याख्यासँ अप्पन घरसंसार प्रतिके जिम्मेवारी सँ दुर भेल देखलहुँ त लागल अपने अडोसपडोसके ककरो चित्रण छैक । खाली घरव्यर्थक उडानमेमुख्य पात्र सभक मनोवैज्ञानिकपक्षक सूक्ष्म दर्शन भेटल । तहिना लाल डायरीमे एक उत्तम सस्पेन्स थ्रिलरक स्वाद भेटल त जिद्दीक गिन्नी अपने समाजक दीशाहीन नवपुस्ताक यथार्थपरक चित्रण अछि । जिद्दीक आओर कथामे से हो उठाएल गेल विषय वहुत यर्थार्थपरक अछि । एहि संग्रहक कथा पढलाक बाद हमरा लागल जे इ त अपने अडोसपडोसक काका, काकी, भाइ, वहिन, दाइ, आ बाबाक जीवनक चित्रण अछि । मनमे स्वाभाविक रुपसँ एकटा आवाज अवैत छल, ‘ एहन फलानाकसंग से हो भेल छल, फलानाके स्वभाव त ठिके एहिना छैक
जिद्दीक विशेषतासभक बात कएल जाए त एहिके प्रत्येक कथामे नारी मुख्य पात्र (एचयतबनयलष्कत) अछि । नारीक चरित्रक विभिन्न रंगक एहिमे प्रस्तुति कएलगेल अछि । पिंकी आदर्श जीवनसाथीक उदाहरण छथि त साधना एक लापरवाह गृहिणीके । गिन्नी अप्पन लक्ष्यसँ भटकल युवतीक प्रतिनिधि छथि त ममता कल्पनाक पङ्ख लगाबिकऽ उडान करनिहार स्वप्नप्रेमी महिलाक । निमाक पत्नीव्रताक ढोंग आ लालचि चरित्र पाठकक मन सिहोरि दैत अछि त कामनी मैडमक ममत्व करुणाक भाव जगबैत अछि । एहिसँ इ अनुभव होएत अछि जे अप्पन समाजमे बहुतरास महिला छथि जे अप्पन घरसंसार सम्हारिकऽ रहल छथि आ तेहनो महिला छथि जे कोनो नै कोनो कारणसँ अप्पन जीवनक माला समेटिकऽ नहि राखऽ सकल छथि । कथाकार झा एक ख्भचकबतष्भि (बहुमुखी) सर्जक छथि एहि बातक प्रमाण से हो एहिसँ भेट जाइत अछि ।
एक पाठकक नजरसँ देखि त जिद्दी कथा संग्रह पढलाक बाद हमरा एक रोमान्चकारी साहित्यिक यात्राक स्वाद भेटल जाहिमे अप्पन मिथिलाञ्चलक घरघरके कहानी वहुत कुशलतापूर्वक कथाकार झा प्रस्तुत कयने छथि । हुनकर आगामी कृतिक प्रतिक्षा करैत हुनका जिद्दीक लेल बधाइ दैत छी, संगैह हुनकर आगामी रचना सभकलेल शुभकामना दैत छी ।



 
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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...