Wednesday, June 20, 2012

'विदेह' १०८ म अंक १५ जून २०१२ (वर्ष ५ मास ५४ अंक १०८) - PART I



                     ISSN 2229-547X VIDEHA
'विदेह' १०८ म अंक १५ जून २०१२ (वर्ष ५ मास ५४ अंक १०८)NEPALINDIA   
                                            
 वि  दे   विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own script Roman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi
 ऐ अंकमे अछि:-

१. संपादकीय संदेश


२. गद्य


  







३. पद्य








३.७.जगदानन्द झा 'मनु' 

३.८.सन्तोष कुमार मिश्र- इतिहासहिन इतिहास


४. मिथिला कला-संगीत१.वनीता कुमारी ३.राजनाथ मिश्र (चित्रमय मिथिला) ४. उमेश मण्डल (मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव-जन्तु/ मिथिलाक जिनगी)

 

बालानां कृते-डॉ॰ शशिधर कुमर विदेह

 

भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.]


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example

भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू।


example

गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज'



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ऐ बेर मूल पुरस्कार(२०१२) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन मूल मैथिली पोथी उपयुक्त अछि ?
Thank you for voting!
श्री राजदेव मण्डलक अम्बरा” (कविता-संग्रह)  12.88%   
 
श्री बेचन ठाकुरक बेटीक अपमान आ छीनरदेवी”(दूटा नाटक)  10.43%   
 
श्रीमती आशा मिश्रक उचाट” (उपन्यास)  6.13%   
 
श्रीमती पन्ना झाक अनुभूति” (कथा संग्रह)  4.91%   
 
श्री उदय नारायण सिंह नचिकेतानो एण्ट्री:मा प्रविश (नाटक)  5.83%   
 
श्री सुभाष चन्द्र यादवक बनैत बिगड़ैत” (कथा-संग्रह)  5.21%   
 
श्रीमती वीणा कर्ण- भावनाक अस्थिपंजर (कविता संग्रह)  5.83%   
 
श्रीमती शेफालिका वर्माक किस्त-किस्त जीवन (आत्मकथा)  8.59%   
 
श्रीमती विभा रानीक भाग रौ आ बलचन्दा” (दूटा नाटक)  7.06%   
 
श्री महाप्रकाश-संग समय के (कविता संग्रह)  5.52%   
 
श्री तारानन्द वियोगी- प्रलय रहस्य (कविता-संग्रह)  5.21%   
 
श्री महेन्द्र मलंगियाक छुतहा घैल” (नाटक)  7.98%   
 
श्रीमती नीता झाक देश-काल” (कथा-संग्रह)  6.13%   
 
श्री सियाराम झा "सरस"क थोड़े आगि थोड़े पानि (गजल संग्रह)  7.06%   
 
Other:  1.23%   
 


ऐ बेर बाल साहित्य पुरस्कार(२०१२) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन मूल मैथिली पोथी उपयुक्त अछि ? (Poll Closed)
श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जीक तरेगन”(बाल-प्रेरक कथा संग्रह)  47.3%   
 
श्री जीवकांत - खिखिरक बिअरि  27.03%   
 
श्री मुरलीधर झाक पिलपिलहा गाछ  24.32%   
 
Other:  1.35%   
 

 

ऐ बेर युवा पुरस्कार(२०१२)[साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन कोन लेखक उपयुक्त छथि ?

श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरीक अर्चिस” (कविता संग्रह)  22.12%   
 
श्री विनीत उत्पलक हम पुछैत छी” (कविता संग्रह)  7.96%   
 
श्रीमती कामिनीक समयसँ सम्वाद करैत”, (कविता संग्रह)  6.19%   
 
श्री प्रवीण काश्यपक विषदन्ती वरमाल कालक रति” (कविता संग्रह)  4.42%   
 
श्री आशीष अनचिन्हारक "अनचिन्हार आखर"(गजल संग्रह)  23.89%   
 
श्री अरुणाभ सौरभक एतबे टा नहि” (कविता संग्रह)  6.19%   
 
श्री दिलीप कुमार झा "लूटन"क जगले रहबै (कविता संग्रह)  7.96%   
 
श्री आदि यायावरक भोथर पेंसिलसँ लिखल” (कथा संग्रह)  5.31%   
 
श्री उमेश मण्डलक निश्तुकी” (कविता संग्रह)  14.16%   
 
Other:  1.77%   
 

   
 
 

ऐ बेर अनुवाद पुरस्कार (२०१३) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे के उपयुक्त छथि?

Thank you for voting!
श्री नरेश कुमार विकल "ययाति" (मराठी उपन्यास श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर)  33.7%   
 
श्री महेन्द्र नारायण राम "कार्मेलीन" (कोंकणी उपन्यास श्री दामोदर मावजो)  13.04%   
 
श्री देवेन्द्र झा "अनुभव"(बांग्ला उपन्यास श्री दिव्येन्दु पालित)  11.96%   
 
श्रीमती मेनका मल्लिक "देश आ अन्य कविता सभ" (नेपालीक अनुवाद मूल- रेमिका थापा)  15.22%   
 
श्री कृष्ण कुमार कश्यप आ श्रीमती शशिबाला- मैथिली गीतगोविन्द ( जयदेव संस्कृत)  13.04%   
 
श्री रामनारायण सिंह "मलाहिन" (श्री तकषी शिवशंकर पिल्लैक मलयाली उपन्यास)  11.96%   
 
Other:  1.09%   
 



फेलो पुरस्कार-समग्र योगदान २०१२-१३ : समानान्तर साहित्य अकादेमी, दिल्ली

Thank you for voting!
श्री राजनन्दन लाल दास  54.05%   
 
श्री डॉ. अमरेन्द्र  25.68%   
 
श्री चन्द्रभानु सिंह  18.92%   
 
Other:  1.35%   
 

 

1.संपादकीय

विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कार रूपेँ प्रसिद्ध)
- बाल साहित्य लेल विदेह सम्मान २०१२- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जी केँ हुनकर बाल-प्रेरक विहनि कथा संग्रह "तरेगन" लेल ई पुरस्कार देल जा रहल अछि। ई पुरस्कार विदेह नाट्य उत्सव २०१३ क समारोहमे देल जाएत। तरेगनकेँ सभसँ बेशी वोट भेटलै। तीनटा पोथी १.जगदीश प्रसाद मण्डलक तरेगन, २. जीवकान्तक खिखिरक बीअरिआ ३.मुरलीधर झा कपिलपिलहा
 गाछकेँ विदेह www.videha.co.in  पर भऽ रहल ऑनलाइन वोटिंगमे राखल गेल छल। विशेषज्ञक मतानुसार पिलपिलहा गाछमे बहुत रास कथा अछि जकरा बाल कथा नै कहल जा सकैए, तइ दुआरे ऐ पोथीकेँ लिस्टसँ हटा देल गेल कारण ई पुरस्कार बाल साहित्य लेल अछि, ओनाहितो ऐ पोथीकेँ सभसँ कम वोट भेटल रहै। ऐ पोथी सभक अतिरिक्त आन पोथी सभपर विचार नै कएल गेल कारण ओ सभ पोथीक आकारक नै वरन् बुकलेटक आकारक छल।

श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (जन्म १९४७- ) मात्र मैथिलीमे लिखै छथि आ ओ ढेर रास विहनि कथा, लघु कथा, दीर्घ कथा, उपन्यास, कविता आ नाटक लिखने छ्हथि। हुनका मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ भूत आ वर्तमानक लेखकक रूपमे जानल जाइत अछि। हुनकागामक जिनगी” (लघुकथा संग्रह) लेल विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०११ आ टैगोर साहित्य पुरस्कार २०११ सेहो देल गेल अछि।

तरेगन (२०१०) जगदीश प्रसाद मण्डल जी लिखित बाल-प्रेरक विहनि कथा संग्रह थिक।
श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जी केँ बाल सहित्य २०१२ लेल विदेह सम्मान प्राप्त करबा लेल बधाइ।
समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०१२-१३
विदेह सम्मान २०१२- बाल साहित्य लेल (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कार रूपमे प्रसिद्ध)
श्री जगदीश प्रसाद मण्डल केँ तरेगन (२०१०) - बाल-प्रेरक विहनि कथा संग्रह लेल
विदेह मूल साहित्य पुरस्कार २०१२, विदेह युवा पुरस्कार २०१२ आ विदेह अनुवाद पुरस्कार २०१३(वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कार रूपमे प्रसिद्ध) केर घोषणा शीघ्र कएल जाएत।

प्राकृत आ पालि: 
प्राकृतसँ वैदिक संस्कृत बहार भेल आकि वैदिक संस्कृतसँ प्राकृत? वेदमे नाराशंसी नाम्ना जन आख्यान यएह सिद्धकरैत अछि जे दुनू समानान्तर रूपेँ बहुत दिन धरि चलल। ई समानान्तर परम्परा दुनूकेँ प्रभावित केलक। आब ऋगवेद देखू- ओतए दुर्लभ लेल- दूलभ, (ऋगवेद ४.९.८) प्रयोग की सिद्ध करैत अछि? अथर्ववेदमे पश्चात् लेल पश्चा (अथर्ववेद १०.४.१०) की सिद्ध करैत अछि? गोपथ ब्राह्मणमे प्रतिसन्धाय लेल प्रतिसंहाय की सिद्द करैत अछि? (गोपथ ब्राह्मण २.४)। आ वैदिक आ लौकिक संस्कृतकेँ ओइ कालमेे संस्कृत नै वरन क्रमसँ छन्दस (वैदिक संस्कृतकेँ यास्क आ पाणिनी छन्दस कहै छथि) आ भाषा (लौकिक संस्कृतकेँ पाणिनी भाषा कहै छथि) कहल जाइ छल। आ जकरा आइ प्राकृत कहै छिऐ से पालिक बाद ओइ रूपमे बुझल गेल (साहित्य लेखन सम्बन्धमे)।
भरतक नाट्यशास्त्रमे ७ टा आ वररुचि ४ टा प्राकृतक चर्चा करै छथि।
ओना तँ महावीरक वचन अर्ध-मागधी प्राकृत आ बुद्धक वचन मागधी-प्राकृतमे देल गेल मुदा ई दुनू मूलतः जनभाषा रहए।
 
मुदा जखन विभिन्न क्षेत्रक लोक जुमलाह तँ बुद्ध सभकेँ अपन क्षेत्रक भाषामे बुद्धवचन सिखबा लेल कहलन्हि: अनुजानामि भिक्खवे, सकायनिरुत्तियाबुद्धवचनं परियापुणितं- माने भिक्षु लोकनि, अपन-अपन भाषामे बुद्धवचन सिखबाक अनुमति दै छी। आ बुद्धवचनमे प्रधान तत्व जनभाषा मागधीक रहल मुदा आन आन भाषाक तत्व सेहो फेंटाएल; आ से भाषा पालि भऽ गेल।
पालिमे:
”, “लृ”, “”, “अःनै होइए आ अंस्वर नै व्यंजन होइए।
तालव्य श आ मूर्धन्य ष सेहो नै होइए मात्र दन्त स होइए।
संस्कृतक व्यंजन होइए।
संस्कृतक संयुक्त व्यंजन क्ष”, “त्रज्ञनै होइए।
बदलि कऽ ”, “”, “,”, “,भऽ जाइए। वृबदलि कऽरुभऽ जाइए।
लृबदलि कऽ भऽ जाइए।
बदलि कऽ वा भऽ जाइए।
बदलि कऽ भऽ जाइए।
संस्कृतक ह्रस्वक दीर्घ भेनाइ: सिंहः= सीहो
संस्कृतक दीर्घक ह्रस्व भेनाइ: मुनीन्द्रः= मुनिन्दो
निकटकस्वर: निषण्णः= निसिन्नो
बलाघात: मध्यमः= मज्झिमो
प्रसार: जयति=जेति
स्वरलोप: इति= ति
पालिमे ड आ ढ सेहो नै होइत अछि। तालव्य श आ मूर्धन्य ष लेलवा प्रयुक्त होइए; ड लेलआ ढ लेल ल्हप्रयोग होइए।
क बदलैए मे: जेना लौकिकः= लोकियो वा मे जेना शुकः= सुवो
आगाँ-पाछाँ सेहो होइए: जेना मशकः=मकसोः, करेणुः=कणेरु
कवर्ग चवर्गमे बदलैए: कुन्दः=चुन्दो
तवर्ग टवर्गमे बदलैए: प्रथमः=पठमो
उष्मीकृत भऽ मे बदलैए: प्रखरः= पहरो
घोषीकृत भऽ भऽ जाइए: मूकः=मूगो
अघोषीकृत भऽ बनि जाइए: तडागम् = तळाकं
अल्पप्राणीकृत भऽबनि जाइए: झल्लिका = जल्लिका
महाप्राणीकृत भऽ बनि जाइए: परश्ः= फरसु
व्यञ्जनक लोप सेहो होइए: पविसिष्यामि= पविस्सामि
दुर्बल संयुक्त व्यंजनक लोप: क्षत्रियः= खत्तियो
ध्वजः= धजो
आब सरलताक संधान देखोगर्हा= गरहा; रत्नम् = रतनं
पालिमे तीनटा सन्धि अछि: स्वर, व्यंजन आ अनुस्वार (निग्गहीत) सन्धि।
स्वर सन्धि: स्वरक बाद स्वरमे पूर्ववर्ती/ परवर्ती स्वरक लोप वा ककरो लोप नै होइत अछि।
व्यंजन सन्धि: ह्रस्व वा दीर्घ स्वरक बाद व्यंजन एलापर ओ स्वरक्रमसँ दीर्घ आ ह्रस्व भऽ जाइए।
निग्गहीत सन्धि: अनुस्वार (निग्गहेत)क कतौ आगमन तँ कतौ लोप भऽ जाइए। जेना- त+खणे= तंखणे ;आ सं+रागो= सारागो
पालिमे दुइयेटा वचन होइत अछि- एकवचन आ बहुवचन; आ सात टा विभक्ति: पठमा, दुतिया, ततिया, चतुत्थी,पञ्चमी, छट्ठी, सत्तमी, आलपन। ५०० सँ ८०० धरि धातु नौ गणमे आठ लकार (आशीर्लिङ आ लुट् लकार नै होइत अछि) होइत अछि।
 
पालिमे समास संस्कृत सन होइत अछि।
प्राकृतमे:
ओना मूल बात यएह अछि जे सभ प्राकृत शब्दक संस्कृत रूप नै अछि।
साहित्यिक प्राकृतक कएक प्रकार होइत अछि।
पैशाची प्राकृतमे लेल लेल
अर्धमागधी प्राकृतमे मध्यक स्वतंत्र बदलि जाइए ”, “वा मे। दू टा स्वरक बीच बदलि जाइए मे।
शौरसेनी प्राकृतमे दू टा स्वरक बीचक स्वतंत्र बदलि जाइएमे आ बदलि जाइए वा धमे।
 
मागधी प्राकृतमे क स्थानपर ”, “केर स्थानपर य्यवा ज्ज”, “क स्थानपर क प्रयोग होइत अछि।
प्राकृत मे ह्रस्व आ दीर्घ ”, “लृ”, “नै होइत अछि। न केर बदला होइत अछि।
ऋ बदलि जाइए: अ, , , , रि
 
लृ बदलि जाइए: इलि
ऐ बदलि जाइए: ए
औ बदलि जाइए: उ
 
दू स्वरक बीच क, , , , , , , व केर लोप होइत अछि जेना: लोक=लोअ, लावण्य= लाअण्ण
ख परिवर्तित भऽ जाइए ह मे: शाखा= शाहा
प्रारम्भक य भऽ जाइए ज, जेना: यम=जम
श आ ष भऽ जाइए स; क्ष भऽ जाइए ख वा छ वा झ; ज्ञ भऽ जाइए ण; त्व भऽ जाइए च; थ्व भऽ जाइए छ, द्व भऽ जाइए ज; ध्व भऽ जाइए झ।
सन्धि संस्कृत सन अछि। वचन दू- एकवचन आ बहुवचन, विभक्ति सात। संस्कृत जेकाँ धातु दस गण मे रहैत अछि, तुदादिगणक रूपक लोप भऽ जाइत अछि । भूत आ भविष्य मे एक्के-एक्के टा रूप होइत अछि।
प्राकृतमे समास संस्कृत सन होइत अछि।

साहित्य अकादेमीक टैगोर लिटरेचर अवार्ड २०११ मैथिली लेल श्री जगदीश प्रसाद मण्डल केँ हुनकर लघुकथा संग्रह "गामक जिनगी" लेल देल गेल। कार्यक्रम कोच्चिमे १२ जून २०१२केँ भेल।
मैथिली लेल विवादक अन्तक कोनो सम्भावना नै देखबामे आबि रहल अछि। ऐ पुरस्कारक ग्राउण्ड लिस्ट बनेबा लेल एकटा तथाकथित साहित्यकारकेँ चुनल गेल जे प्राप्त सूचनाक अनुसार जातिक आ संकीर्णताक आधारपर पोथीक नाम देलन्हि जाइमे नहिये नचिकेताक पोथी रहए, नहिये सुभाष चन्द्र यादवक आ नहिये जगदीश प्रसाद मण्डलक; संगहि ई ग्राउण्डलिस्ट बनौनिहार तथाकथित साहित्यकार विदेहक सहायक सम्पादक मुन्नाजीकेँ कहलन्हि जे जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ ऐ जिनगीमे टैगोर साहित्य पुरस्कार नै देल जेतन्हि!। रेफरी जखन ७ टा पोथीक नाम पठेलन्हि तखन ओइमे चन्द्रनाथ मिश्र "अमर"क अतीत मंथन सेहो रहए जखन कि ओ पोथी निर्धारित अवधि २००७-२००९ मे छपले नै अछि, तँ की बिनु देखने पोथी अनुशंसित कएल गेल? ऐ तरहक ग्राउण्ड लिस्ट बनेनिहार आ बिनु पढ़ने पोथी अनुशंसित केनिहार रेफरीकेँ साहित्य अकादेमी चिन्हित करए, आ नाम सार्वजनिक कऽ स्थायी रूपसँ प्रतिबन्धित करए, से आग्रह; तखने मैथिलीक प्रतिष्ठा बाँचल रहि सकत। एतए ईहो तथ्य अछि जे साहित्य अकादेमीक मैथिली विभागक संयोजक श्री विद्यानाथ झा विदित अखन धरि ने पुरस्कार भेटबाक सूचने आ ने पुरस्कार लेल बधाइये श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी केँ देलन्हि अछि जखनकि मण्डल जी पुरस्कार लऽ कऽ घुरि कऽ आबियो गेल छथि; संगहि टैगोर साहित्य पुरस्कार मैथिली लेल पहिल बेर श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जीकेँ देल जएबा सम्बन्धमे दरभंगा आकाशवाणी कोनो प्रकारक सूचना प्रसारित नै केलक आ दरभंगा, मधुबनी आदिक हिन्दी समाचार-पत्र सेहो ऐ सम्बन्धमे कोनो समाचार प्रकाशित नै केलक जखनकि देशक सभ राष्ट्रीय अंग्रेजी पत्र ( http://esamaad.blogspot.in/2012/06/tagore-literature-awards-national-media.html ) एकर सूचना बिनु कोनो अपवादक प्रकाशित केलक। साहित्य अकादेमीक मैथिली विभागक, आकाशवाणी दरभंगाक आ दरभंगा-मधुबनीक हिन्दी समाचार पत्रक पत्रकार लोकनिक संकीर्ण जातिवादी चेहरा नीक जेकाँ सोझाँ आबि गेल। मुदा ई तँ मात्र प्रारम्भ अछि। साहित्य अकादेमीक मैथिली विभागक असली चेहरा तखन सोझाँ आओत जखन ऐ बर्खक मूल साहित्य अकादेमी पुरस्कारक घोषणा हएत।
श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जीक "गामक जिनगी" मैथिली साहित्यक इतिहासक सर्वश्रेष्ठ लघु कथा संग्रह अछि। जगदीश प्रसाद मण्डल जीकेँ बधाइ।
सूचना (स्रोत समदिया): टैगोर साहित्य पुरस्कार दक्षिण कोरियाक एम्बैसी (स्पॉन्सर सैमसंग इण्डिया लिमिटेड) क आग्रहपर साहित्य अकादेमी द्वारा शुरू कएल गेल अछि। टैगोर साहित्य पुरस्कार गुरुदेव रवीन्द्र नाथ ठाकुरक १५०म जयन्तीक उपलक्ष्यमे शुरू भेल छल। सभ साल ८ टा भाषा आ तीन सालमे साहित्य अकादेमी द्वारा मान्यता प्राप्त सभटा २४ भाषाकेँ ऐमे पुरस्कृत कएल जाइत अछि। मैथिली लेल ई पुरस्कार पहिल बेर देल जा रहल अछि।
गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुरक १५०म जयन्तीक उपलक्ष्यमे साहित्य अकादेमी आ सैमसंग इडिया (सैमसंग होप प्रोजेक्ट) द्वारा २००९ ई. मे स्थापित कएल गेल छल टैगोर साहित्य पुरस्कार। २४ भाषाक श्रेष्ठ पोथीकेँ तीन सालमे पुरस्कार (सभ साल आठ-आठ भाषाक सर्वश्रेष्ठ पोथीकेँ एक सालमे पुरस्कार) देल जाएत। पुरस्कारमे प्रत्येककेँ ९१ हजार टाका आ प्रशस्ति-पत्र देल जाइत अछि। चारिम साल पहिल सालक आठ भाषाक समूहक फेरसँ बेर आएत। टैगोर जयन्तीक लगाति अवसरपर ई पुरस्कार देल जाइत अछि।

टैगोर साहित्य पुरस्कार २००९ बांग्ला, गुजराती, हिन्दी, कन्नड, काश्मीरी, पंजाबी, तेलुगु आ बोडो भाषामे २००५ सँ २००७ मध्य प्रकाशित पोथीपर देल गेल।
-बांग्ला (आलोक सरकार, अपापभूमि, कविता)
-गुजराती ( भगवान दास पटेल, मारी लोकयात्रा)
-हिन्दी (राजी सेठ, गमे हयात ने मारा, कथा संग्रह)
-कन्नड (चन्द्रशेखर कांबर, शिकारा सूर्य, उपन्यास)
-काश्मीरी (नसीम सफाइ, ना थसे ना आकास, कविता)
-पंजाबी (जसवन्त सिंह कँवल, पुण्य दा चानन, आत्मकथा)
-तेलुगु (कोवेला सुप्रसन्नाचार्य, अंतरंगम, निबन्ध)
-बोडो (ब्रजेन्द्र कुमार ब्रह्मा, रैथाइ हाला, निबन्ध)

टैगोर साहित्य पुरस्कार २०१० असमी, डोगरी, मराठी, ओड़िया, राजस्थानी, संथाली, तमिल आ उर्दू भाषामे २००६ सँ २००८ मध्य प्रकाशित पोथीपर देल गेल।

-असमी (देवव्रत दास, निर्वाचित गल्प)
-डोगरी (संतोष खजूरिया, बडलोनदियन बहारां)
-मराठी (आर. जी. जाधव, निवादक समीक्षा)
-ओड़िया (ब्रजनाथ रथ, सामान्य असामान्य)
-राजस्थानी (विजय दान देथा, बातां री फुलवारी)
-संथाली (सोमाइ किस्कू, नमालिया)
-तमिल (एस. रामकृष्णन, यामम)
-उर्दू (चन्दर भान खयाल, सुबह-ए-मश्रिक-की अजान)


टैगोर साहित्य पुरस्कार २०११ मैथिली, अंग्रेजी, कोंकणी, मलयालम, मणीपुरी, नेपाली आ सिंधी लेल २००७ सँ २००९ मध्य प्रकाशित पोथीपर देल गेल। संस्कृत लेल पुरस्कार नै देल जा सकल।
-मैथिली (जगदीश प्रसाद मण्डल, "गामक जिनगी")
-अंग्रेजी (अमिताव घोष, "सी ऑफ पॉपीज")
-कोंकणी (शीला कोलाम्बकर, "गीरा")
-मलयालम (अकितम अचुतम नम्बूदरी, "अंतिमहक्कलम")
-मणीपुरी (एन. कुंजामोहन सिंह, "एना केंगे केनबा नट्टे")
-नेपाली (इन्द्रमणि दरनाल, "कृष्णा-कृष्णा")
-संस्कृत-
-सिंधी (अर्जुन हसीद, "ना इएन ना")

 

गजेन्द्र ठाकुर

ggajendra@videha.com
 
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२.गद्य

  





जगदीश प्रसाद मण्‍डल
जगदीश प्रसाद मण्‍डलक पाँचटा कथा-
लफक साग, न्‍याय चाही, पनि‍याहा दूध, कर्ज, ति‍लकोरक तरूआ
 
फाँसी
लफक साग

गाममे खेतीक चर्च उठि‍ते लालकाकीक लफक सागक चर्च उठि‍‍ये जाइत अछि‍। ओना चरचोक क्रम अछि‍, मुदा लालकाकीक अलग पहि‍चान रहने उपजासँ उठैत चर्चक संग व्‍यक्‍ति‍त्‍वक चर्च उठि‍ते रामायण-महाभारतक प्रमुख पद्यक चर्च जकाँ हुनको होइते छन्‍हि‍‍। चरचोक भि‍न्न-भि‍न्न क्रममे एना होइत जे कतौ-कतौ खाली गहुमेक चर्च चलैत तँ कतौ अगबे धानक। कतौ खइहनक संग दलहनोक चर्च चलैत तँ कतौ खइहन, दलि‍हन, तेलहनोक उठि‍ जाइत। कतौ अन्नक संग तीमनो-तरकारीक उठैत तँ कतौ तीमन-तरकारीक संग फलो-फलहरि‍क। कतौ एहनो होइत जे खेतीक संग माछो आ दूधोक चर्च उठि‍ जाइत। भनडाराक भजनमे जहि‍ना कतौ साखीसँ भजन शुरू होइत तँ कतौ भजनक बीच-बीचमे, तँ कतौ साखि‍येसँ वि‍सर्जनो होइत।
तहि‍ना लालकाकीक सेहो छन्‍हि‍‍। लफ सागक संग लालकाकीक सि‍नेह खाली सि‍नेहे नै जि‍नगी सेहो ओहन छन्‍हि‍ जेहन वैवाहि‍क बंधन होइत। जहि‍ना कनाह-खोरसँ लऽ कऽ दि‍बड़ा भीड़मे बसैबलाक संग एकसँ एक देवसुनरि‍ अपन जि‍नगी समर्पित कऽ अपन कुल-खनदानक संग समाजक पाग मुरेठा सम्‍हारि‍ रखैत तहि‍ना लालकािकयो छथि‍ये।

जइ दि‍न लालकाकी सासुर एली तही दि‍नसँ लफ साग सेहो संगे-संग एलनि‍। दुरागमन भेलापर जखन लालकाकी सासुर वि‍दा हुअए लगली तँ सतरि‍या धान खोछि‍मे दइले जे राखल रहनि‍ तहीमे लफ सागक बीआ छि‍पा कऽ ओही धानमे ई सोचि‍ मि‍ला लेलनि‍ जे जँ कागजक पुड़ि‍यामे वा लत्तामे बान्‍हि‍ राखब तँ खोछि‍ भरनि‍हारि‍ देखि‍ये जेतीह, जखने देखती तँ खोलबे करती। जखने खोलती आ सागक बीआ देखती तँ हो-ने-हो डाइन-जोगि‍नक फसाद ने कहीं उठि‍ जाए। नि‍छौहैमे कनी समयै ने लगत मुदा कि‍यो बूझत तँ नै। सएह केलनि‍। सागक बीआ नैहरसँ सासुर अनैक कारणो रहनि‍। जहि‍ना हजारोक भीड़मे प्रेमीक नजरि‍ प्रेमि‍कापर रहैत तहि‍ना लालकाकीक प्रेमी साग तँए संग नै छोड़ए चाहथि‍। ओना मनमे ईहो होइत रहनि‍ जे अनेरे कि‍अए सागेक बीआ लऽ जाएब, जइ गाम जाएब तोहू गामे तँ लफ साग होइते हेतै, मुदा मन नै मानलकनि‍। मनोक मानब तँ साधारण नहि‍ये अछि‍। भलहिं साधारणो बात वा काज कहि‍ मना लेब, ई अलग अछि‍। लालकाकीक मन ऐ दुआरे नै मानलकनि‍ जे गाम-गाममे जहि‍ना धानक खेती होइतो एकरंगाहो धान होइत आ नहि‍यो होइत। तहि‍ना ने सागोक अछि‍, कतौ मतौना, ढेकी साग होइत तँ कतौ पालक-ठढ़ि‍या। कतौ ललका ठढ़ि‍या तँ कतौ हरि‍अरका। कतौ उजड़ा भुल्‍ला होइत तँ कतौ सतरंगा सेहो होइत। तँए जहि‍ना गाम-गामक पानि‍, तहि‍ना वाणि‍, तहि‍ना खेती तहि‍ना बाड़ी तहि‍ना झाड़ी, तहि‍ना फुलवाड़ी तहि‍ना ने आनो-आन होइत। तँए कोनो जरूरी नै अछि‍ जे लफ साग ओहू गाममे होइते हेतै। जँ नै होइत हेतै तँ लल्‍लो-वि‍हल्‍लो भऽ जाएब। लइये जाइमे की लागत बूझब जे धाने अछि‍। यएह सब सोचि‍ लालकाकी जहि‍ना तीर्थस्‍थानक यात्री पनपीबा बर्तनक संग सि‍दहो-समर संगे लऽ चलैत तहि‍ना लफ सागक बीआ सेहो लऽ लेलनि‍।

लफ सागक गुण लालकाकीकेँ बूझल रहनि‍। कि‍एक तँ नैहरोमे बेसी काल खेबो करथि‍ आ उपजेबो करथि‍। खेति‍यो हल्‍लुक। जखन सागक गाछ जुआ जाइत तखन ओइमे फड़ल बीआ सेहो रसे-रसे पाकि‍ जाइत। जहि‍ना बुढ़-बुढ़ानुसक वि‍चार बि‍नु पुछनौं फूटि‍-फूटि‍ झड़ए लगैत तहि‍ना सागोक बीआ गाछक आशा छोड़ि‍ खापड़ि‍क लाबा जकाँ चनकि‍-चनकि‍ बहरा जाइत। कतबो पानि‍-पाथर बरसौ आकि‍ ठनका खसौ पृथ्‍वीक कोरामे छअ मसि‍या बच्‍चा जकाँ माइक छातीमे सूति‍ रहैत तहि‍ना सागोक बीआ सूति‍ रहैत। मुदा अचेतन रहि‍तो चेतन भऽ ओइ दि‍न फुड़फुड़ा कऽ उठि‍ जाइत जइ दि‍न उठैक समए होइत। तँए कि‍यो बीआ जोगा समैपर खेतकेँ तामि‍-कोरि‍ बागु करैत तँ नहि‍यो बागु केने ओइ खेतमे अपनो उगि‍ जाइत जइमे पछि‍ला साल भेल रहैक।

लफक सागमे लालकाकी जहनि‍क कारण छन्‍हि‍ जे ओ जनै छथि‍ जे जइठाम लोक नून-भात आकि‍ नून-रोटी खा जीवन बसर करैत अछि‍ तइठाम जँ चारि‍टा लफ सागक पत्ताकेँ एकलोटा पानि‍मे कनी नून दऽ मेरचाइक फाेरनसँ फोरना देबै तँ तेहेन सि‍नेही भऽ भात-रोटीमे सटि‍ ओहन गति‍ पकड़ि‍ लैत जेना खाली सड़कमे बाहन धड़ैत। चारि‍ये पातक मेजनक संग अाधा कि‍लो मीटर ससारि‍ लि‍अ।

जि‍नगी संग पुरनि‍हार साग अपन कथा-बेथा ललकारी छोड़ि‍ केकरा लग बाजत। जे ओकरा दि‍स घुमि‍यो कऽ ने तकैए तेकरा कहि‍ये कऽ की हेतै। खेतक आड़ि‍पर पहुँचते भुखाएल नेरू-पर्ड़ू जकाँ लालोकाकीकेँ साग कहैत-
काकी, आइ नइ हजारो बर्खसँ गेनहारी बथुआ-नोनी इत्‍यादि‍ संगे-संग चलैत एलौं कि‍यो हवाइ जहाजपर भोज-भात करैए मुदा हमरापर कि‍अए ने ककरो नजरि‍ पड़लै। जँ नजरि‍ पड़ल रहि‍तै तँ एहि‍ना धरती धेने रहि‍तौं।
सागक दुखनामा सूनि‍ लालकाकी वि‍ह्वल भऽ कहलखि‍न-
बहीन, कि‍यो अपना भागे-करमे जीबै-मरैए। तइले अनेरे कि‍अए दुख करै छह। जइ दि‍न उपटि‍ जेबह तइ दि‍न बुझि‍हक जे या तँ ई धरती नै रहए दि‍अए चाहैए वा ई धरती रहै जोकर नइए।
साग बाजल- लालकाकी, लोक बड़ कुभेला करैए। नै तँ कहू जे सि‍मटीक अांगन-घर बना कऽ रहैए आ हमरो जँ अखारमे कनी माटि‍ छि‍ड़ि‍या सि‍मटीक अंगनोमे आकि‍ छज्‍जि‍योपर लगा देत तँ कि‍ अासीन-काति‍क तक भाँज नउ पुरबै। मुदा आने साग जकाँ जे फुटा देत जे ई गरमीक छी तँ ई जाड़क। भदवारि‍मे साग खेबोक नै चाही से कहू जे ई होइ?”
सान्‍त्वना दैत लालकाकी कहलखि‍न-
अइले कि‍अए दुख करै छह, तोहर तँ मान-मरजादा एते छह जे बि‍नु तोरे अपन माइयो-बापक उद्धार नै कऽ सकैए। करह दहक जते कुभेला करतह से करह।

मि‍थि‍लांचलक भोज जहि‍ना अदौसँ आइ धरि‍क भोजनक इति‍हास अपना पेटमे समेटने अछि‍ तहि‍ना गामो ने समेटने अछि‍। एक दि‍स भात दालि‍क संग तरकारी, तइ संग संग पानि‍मे बनल अदौरी, तँ तेलमे बनल बर-बरीक संग, दही-चि‍न्नीक संग वि‍सर्जन होइत। जे भोज्‍यक इति‍हास प्रदर्शित करैत तहि‍ना बाधक बनल रखबारक खोपड़ीक संग बहुमंजि‍ला मकानक बीच आदि‍क मनुखसँ लऽ कऽ सभ्‍य -आधुनि‍क- मनुष्‍य तकक इति‍हासक झलकी सेहो दैत अछि‍।

जइ दि‍न लालकाकी सासुर एली तइ दि‍न ओ पनरहे-सोलहे बर्खक रहथि‍। आने-आन जकाँ दुइये बर्खक पछाति‍ पति‍केँ मुइने वि‍धवा भऽ गेली। मुदा दुइये बर्खक अभि‍यन्‍तर लालभौजी, लालकाकी, लालदादीक माला समाज पहि‍रा देलकनि‍। एकोटा संतान नै भेल छलनि‍। जइ दि‍न पति‍ मुइलनि‍ तइ दि‍न एहेन ओझरीमे लालकाकी ओझरा गेली जे भरि‍ पोख कानि‍यो नै सकलीह। ओझरी लगलनि‍ जे जइ समाजमे वैधव्‍य बान्‍ह एते सक्कत अछि‍ जे ता-जि‍नगी वैधव्‍य धारण केने रहैत। तइपर अशुभक उपराग ऊपरसँ। मुदा कि‍ समाज ई भार लइए जे ओकर जि‍नगी इज्‍जतक संग केना चलतै। जे समाज केकरो जीवन नै दऽसकैए कि‍ ओइ समाजकेँ केकरो ओङरी बतबैक अधि‍कार छै? वि‍धवाक संग जे-जे कि‍रदानी समाज करैत आएल अछि‍ आ कइयो रहल अछि‍ कि‍ ओ समाज सामाजि‍क बंधन बनबैक अधि‍कार रखैए? नारी जागरणक लेल ओकर सुरक्षाक पक्का बेवस्‍था सेहो हेबाक चाही जँ से नै तँ ने ओ परि‍वारक संग अपन प्रति‍ष्‍ठा बचा सकैए आ ने बाहर बचा सकैए।

पति‍क परोछ भेलापर माइयो-बाप आ सरो-समाज लालकाकीकेँ कतबो हि‍लौलखि‍न-डोलौलखि‍न, मुदा लालकाकी अड़ि‍ गेलखि‍न जे समाजमे हमरा सन बहुतो छथि‍, जहि‍ना हुनका सबहक जि‍नगी कटतनि‍ तहि‍ना हमरो कटत। जते भोग-पारसमे छल तते भोगलौं आ माँ मि‍थि‍लाक फुलवारी छाेड़ि‍ कतौ ने जाएब। जखन अपने हँसुआ, खुरपी कोदारि‍ चलबैक लूरि‍ अछि‍, तखन कतौ रहि‍ जीवन-यापन कऽ सकै छी। अपन मान-मर्यादा अपने नै बि‍गाड़ब।

अस्‍सी बर्ख पार केलापर लालकाकीक नजरि‍ ओइ दि‍स गेलनि‍ जे-जे नजरि‍सँ देखने रहथि‍। नजरि‍सँ नजरि‍ मि‍लाएब, टकराएब दुनू होइत तहि‍ना लालकाकीक मनमे सेहो उठलनि‍। एहेन नि‍चेनसँ जि‍नगीमे कहि‍यो बैसबो ने कएल रहथि‍ जे बुझबो करि‍तथि‍ आ सोचबो करि‍तथि‍। जइ ि‍जनगीमे बुधि‍-वि‍चार जँ जि‍नगीक संग नै चलत ओ जि‍नगि‍ये केहेन? गुनधुनमे पड़ल एकटा मन कहलकनि‍-
हमरा सन-सन लोकक लेल जे बेवहार चलि‍ रहल अछि‍ ओकर नि‍मरजना के करत?”
दोसर मन उत्तर देलकनि‍-
जे नि‍मरजना करैबला छथि‍ ओ अपने चालि‍ये ओंघराएल छथि‍ तखन अनका कि‍ देखथि‍न। पछि‍म मुहेँक गाड़ी पकड़ि‍ पूब मुहेँ जाए चाहै छथि‍, से केना हेतइ।
मनक घाेंघौज देखि‍ लालकाकी काल्हि‍ये जे ओराहैले बदाम अनने रहथि‍, ओराहैले वि‍दा भेलीह।  
~
न्‍याय चाही

झुनाएल धान जकाँ पचासी बर्खक शंभुकाकाकेँ ओछाइन छौड़ैसँ पहि‍नहि‍ मनमे उठलनि‍ जे आब तँ चल-चालौए छी से नै तँ जि‍नगीक अपन हि‍साब-कि‍ताब दइये दि‍अनि‍, सएह नीक। नै तँ शासनक कोन बि‍सवास केकरो दोख गारा मढ़ि‍ सजा केकरो भेटै छैक। मुदा सोझामे एते तँ जरूर हएत जे अपन बात अपने रखि‍ सकै छी। तइपर जँ नै मानत तँ हमहूँ नै मानबै। लड़ि‍ मरी कि‍ सड़ि‍, शेषे कि‍ बचल अछि‍। जहि‍ना नमहर काजमे समयो अधि‍क लगैत अछि‍ आ छोट काजमे थोर मुदा काज तँ दुनू कहबैत अछि‍। कि‍यो काहू मगन कि‍यो काहू मगन, मगन तँ सभ अछि‍ये। गंभीर प्रश्नमे ओझराएल शंभुकाका, तँए मन-चि‍त्त-देह एकबट्ट भेल रहनि‍।
पत्नी कुमुदनीक मनमे उठलनि‍ जे भरि‍सक सूतले तँ ने रहि‍ जेताह। लगमे पहुँचि‍ छाती डोलबैत बजलीह-
अखन धरि‍ किअए बि‍छान पकड़ने छी?”
पत्नीक स्‍वरलहरीमे लहराइत शंभुकाका हलसि‍ बजलाह-
अखन धरि‍ यएह बुझै छलौं जे अपने केलहाक भागी कि‍यो बनैए, मुदा....?”
बजैत शंभुकाका ओछाइनपरसँ उठि‍ जहि‍ना उगैत सूर्जक दर्शन लोक दुनू हाथ जोड़ि‍ प्रणाम करैत करैए तहि‍ना दुनू हाथ जोड़ि‍ पत्नी-कुमुदनीक आगूमे ठाढ़ होइत बजलाह-
माफी मंगै छी। गल्‍ती भेल अछि‍ मुदा दोसराक गल्‍ती ऊपर मढ़ल गेल अछि‍।
अकचकाइत कुमुदनी, बि‍नु कि‍छु सोचनहि‍ बाजि‍ उठलीह-
से की, से की, एना कि‍अए भोरे-भोर पाप चढ़बै छी।
पाप नै चढ़बै छी जि‍नगीक जे घटल-घटना अछि‍, तइ नि‍मि‍त्ते मांगि‍ रहल छी।
जखन एते कहबे केलौं तखन कि‍अए ने मनो पाड़ि‍ देब। अहाँ तँ बुझि‍ते छि‍ऐ जे बसि‍या भात खेनि‍हारि‍ बि‍सराह होइए मुदा रतुका उगड़ल अन्न फेकि‍ देब नीक हएत।
पतालसँ अबैत बलुआएल पानि‍ जहि‍ना छन-छनाइत पवि‍त्र भऽ अबैत अछि‍ तहि‍ना कुमुदनीक वि‍चार सुनि‍ प्रोफेसर शंभुकाकाकेँ भेलनि‍, बजलाह-
अपना दुनू गोटेक एक जि‍नगी ऐ धरतीपर रहल अछि‍। आकि‍ नै?”
हँ से तँ रहले अछि‍। तँए ने अर्द्धांगि‍नी छी।
हमर देहक अर्द्धांगि‍नी छी आकि‍ जि‍नगीक?”
ई बात अहाँ बुझेलौं कहि‍या जे पुछै छी।
पत्नीक प्रश्न सुनि‍ प्रोफेसर शंभुकाका सकदम भऽ गेलाह। मुदा लगले मनमे उठलनि‍ जे टटको घटना बसि‍या जाइ छै आ बसि‍यो घटना टटका भऽ जाइ छै। ई ि‍नर्भर करैए कारीगरपर। जेहेन कारीगर रहत तेहेन टटकाकेँ बसि‍या आ बसि‍याकेँ टटका बनबैत रहत। खएर जे होउ। पत्नीकेँ पुछलखि‍न-
अपना दुनू गोटे एकठाम केना भेलि‍ऐ?”
एना अरथा-अरथा कि‍अए पुछै छी। जे कहैक अछि‍ से सोझ डारि‍ये कहूँ। एना जे हरसीकार दीरघीकार लगा-लगा बजै छी से नै बाजू। जेकरा नीक बुझबै तेकरा नीक कहब आ जेकरा अधला बुझबै तेकरा अधला कहब। अहाँ लग जे कनी दबो-उनार भऽ जाएत तँ हारि‍ मानि‍ लेब। सएह ने हएत आकि‍ छाउर-गोबर जकाँ छि‍ट्टामे उठा बाध दऽ आएब।

जहि‍ना पोखरि‍क पवि‍त्र जलमे स्‍नान कऽ पूजाक मूर्ति गढ़ि‍ मंत्र पढ़ैत दान कएल जाइत तहि‍ना शंभुकाका बड़बड़ाए लगलाह-
जखन हम चौबीस बर्खक रही तखन अहाँ चौदह बर्खक छलौं। दस बर्खक अन्‍तर। आइ धरि‍ कहाँ कतौ देखि‍ पेलौं जे पुरुष-नारीक बीच उम्रोक वि‍भाजन भेल। जँ से नै तँ....? जँ एको औरूदे दुनू गोटे जीब तैयो तँ अहाँ दस बर्ख वि‍धबे बनि‍ रहब। ऐ वि‍धवाक सर्जक के? समाजमे कलंकक मोटरी देनि‍हार के? की ई बात झूठ जे जइ घरमे जते कम वस्‍तु रहै छै आगि‍ लगलापर ओतबे कम जरै छै मुदा जइ घरमे अधि‍क वस्‍तु रहै छै, आगि‍ लगलापर जरबो बेसी करै छै। पचास बर्खक तपल-तपाएल जि‍नगीक अन्‍त केना हएत।
दुनू हाथ जोड़ि‍ पत्नीसँ माफी मंगलनि‍। मुदा जहि‍ना बच्‍चाकेँ नव दाँत रहने अधि‍क-सँ-अधि‍क काज लि‍अए चाहैत, नव औजार हाथमे एने अधि‍क-सँ-अधि‍क काजो आ अधि‍क-सँ-अधि‍क समेओ संग मि‍लि‍ बि‍तबए चाहैत तहि‍ना कुमुदनीक सि‍नेह आरो जगलनि‍। बजलीह-
माॅफी-ताॅफी नइ मानब? पति‍ छी तँए पुछै छी। एहन गल्‍ती भेल कि‍अए, से जाबे‍ नै कहब ताबे‍ कि‍छु ने मानब।
पत्नीक प्रश्न सुनि‍ शंभुकाका स्‍तब्‍ध भऽ गेलाह। मन कछमछाए लगलनि‍। सत् बड़ कटु होइत अछि‍। मुदा जँ पत्नि‍यो लग सत्यक उद्घाटन नै कऽ सकब तँ दुनि‍याँमे दोसरठाम कइये कतए सकै छी। शम्‍भुकाका साँप-छुछुनरि‍क स्‍थि‍ति‍मे पड़ि‍ गेलाह। एहेन कोनो वि‍चार मनमे उठबे ने करनि‍ जइसँ मन मानि‍ लइतनि‍ जे ऐसँ पत्नी मानि‍ जेतीह। अल्ल-बल्ल कि‍छु बच्‍चाकेँ कहल जाइ दै, एक तँ सि‍यान कि‍ सि‍यानोक अगि‍ला खाड़ीमे पहुँचल छथि‍ दोसर अर्द्धांगि‍नी सेहो छथि‍। कोनो वि‍चारकेँ बलजोरी थोपि‍ नै सकै छि‍यनि‍, जँ थोपि‍यो देबनि‍ तँ मानि‍ये लेतीह सेहो नै कहल जा सकैए। जेत्ते दबाब दऽ कऽ बजबाक अधि‍कार हमरा अछि‍ तत्ते तँ हुनको छन्‍हि‍ये। जँ कि‍छु नै कहबनि‍ तखन तँ आरो स्‍थि‍ति‍ बि‍गड़ि‍ जाएत। जहि‍ना हुनका मनमे गंेठी जकाँ जन्‍मगाँठ पड़ि‍ जेतनि‍ तहि‍ना तँ अपनो मन नहि‍ये बचत। जँ से नै बचत तँ आँखि‍ उठा देखि‍ केना पेबनि‍। जँ से नै देखि‍ पाएब तँ पति‍ कथीक। ि‍सर्फ रंगे-रभस टा तँ पत्नीक संबंध नै छी। जँ ओतबे मानि‍ बुझबनि‍ तँ पति‍-पत्नीक संबंध बुझब थोड़े हएत। पति‍-पत्नीक संबंध तँ ओ छी, जहि‍ना जनकक एक हाथ हवन-कुंडमे आ दोसर पत्नीक करेजपर रहैत छलनि‍, तहि‍ना मुदा जहि‍ना नव जीवनक दि‍शा वि‍पत्ति‍क अंति‍म अवस्‍थामे भेटैत अछि‍ तहि‍ना शंभुओकाकाकेँ भेटलनि‍। थालमे गड़ल मोती जहि‍ना जहुरी हाथमे देखि‍ते नयन कमलनयन बनि‍ जाइत तहि‍ना कक्कोक नजरि‍केँ भेलनि‍। मन मुस्‍कि‍एलनि‍। पति‍क मुस्‍की देखि‍ कुमुदनी मने-मन नमन केलकनि‍। जि‍ज्ञासु छात्र जकाँ पत्नीक जि‍ज्ञासु नजरि‍केँ देखि‍ प्रो. शंभु कहलखि‍न-
देखू, प्रश्न एकेटा नै घनेरो अछि‍, जँ एक-एक प्रश्नक उत्तरो दि‍अए लगब तँ प्रश्ने छूटि‍ जाएत। जँ प्रश्ने छूटि‍ जाएत तखन उत्तरे केना देब। कि‍छु नै, बुढ़ि‍या फूसि‍।
पति‍क वि‍चार सुनि‍ कुमुदनी अधखि‍ल्‍लू कुमुदनी जकाँ जइ अवस्‍थामे भौंरा फरि‍च्‍छ तँ देखैत मुदा अधखि‍ल्‍लू कपाटसँ नि‍कलि‍ नै पबैत तहि‍ना कुमुदि‍नी असमंजसमे पड़ि‍ गेलीह।
पत्नीकेँ असमंजसमे पड़ैत देरी प्रो. शंभुक मनमे उठलनि‍ जे जहि‍ना माटि‍क ढेपा, गोला, चेका जोड़ि‍-जोड़ि‍ पैघसँ पैघ बान्‍ह बान्‍हल जाइए तहि‍ना जँ बान्‍हि‍ दि‍अनि‍ तँ जरूर ठमकि‍ जेतीह। मुदा मन नै मानलकनि‍। पत्नीक बातमे तँ अखन धरि‍ ओझराएल रहलौं। जरूर माए-बापक काज मानल जाएत। मुदा कि‍ हमरे टा परि‍वारमे एना भेल आकि‍ दोसरो-तेसरो परि‍वारमे? जँ एक समाज नै, एक गाम नै अनेक समाज आ अनेक गाममे होइत अछि‍ तँ जरूर दोषक जड़ि‍ कतौ अन्‍तै छै। अन्‍तए कतए छै से कहि‍ देबनि‍, मानती तँ मानती नै आगू कहबनि‍ नेति‍-नेति‍।

जहि‍ना उगैत गुज्‍जर, उगैत कलशकेँ कहैत जे दुनू गोटे संगे-संग रहि‍ दुनि‍याँ देखब। तहि‍ना प्रो. शंभु कहलखि‍न-
सुनू, सभ बात सबहक नजरि‍पर सदि‍खन नै रहै छै, भऽ सकैए जे जे बात दस-बीस बर्ख पहि‍ने कहि‍ देबाक चाहै छल, से नै कहलौं। अपनो धि‍यानमे नै रहल। जहि‍ना असगरे धान तौलि‍नि‍हार गनि‍-गनि‍ तौलबो करत आ उठि‍-उठि‍ लि‍खबो करत तँ गि‍नती-गि‍नतीमे झगड़ा हेबे करैत, जे जोरगर रहैत ओ मन रहैत जे अब्‍बल रहैत ओ हरा जाएत। तहि‍ना ने अपनो दुनू गोटेक बीच अछि‍।
दुनू गोटे सुनि‍ कुमुदनी कछमछेलीह। पाछू उनटि‍-उनटि‍ देखए लगली। प्रो. शंभु बूझि‍ गेलाह जे शि‍कारीक वाण सटीक बैसल। जहि‍ना बाल-बोधक उनटा-पुनटा काज देख सि‍यानकेँ हँसी-लगैत तहि‍ना प्रोफेसर शंभुकेँ हँसी लगलनि‍। मुदा लगले मनमे उठलनि‍ जे अपनो पछि‍ला कएल काज मन पड़ने तँ से होइए। एकाएक मुँह बन्न भऽ गेलनि‍। आने-आन पुरुख जकाँ अपन पुरुषत्‍व देखबैत प्रो. शंभु बजलाह-
आइ धरि‍, अखन धरि‍ कहि‍यो हमरा मुँहसँ फुटल जे हम न्‍यायालयसँ दण्‍डि‍त भेल जि‍नगी जीब रहल छी। कि‍यो एको दि‍न पुछाड़ि‍यो करए आएल जे केना जीबै छी। समाजमे जाधरि‍ बूढ़-बुढ़ानुसक पूछ नै हएत, ताधरि‍ समाजक पछि‍ला पीढ़ी नागरि‍ पकड़ि‍ वैतरणी पार केना हएत। हँ ई जरूर जे साँपकेँ डोरी नै कही, मुदा वि‍चार तँ हेबाके चाही।
घरमे चौंकल बर्तनक ढनमनी जकाँ कुमुदनी ढनमनाइत बजलीह-
जखन अहाँ दुनि‍याँक नजरि‍मे दण्‍डि‍त छी तखन....?”
पत्नीक चि‍न्‍तासँ चि‍न्‍ति‍त भऽ प्रो. शंभु कहलखि‍न-
अखन धरि‍ तँ छि‍पेने रहलौं जे अपन दोख अहाँकेँ कि‍अए दी।
पति‍क बेथासँ बेथि‍त भऽ कुमुदनी बजलीह-
कनी फरि‍च्‍छा कऽ कहू?”
प्रो. शंभु- सेवा-ि‍नवृत्त होइसँ छह मास पहि‍ने प्रि‍ंसि‍पल बनाओल गेलौं। कॉलेजक भार बढ़ल। परीक्षा वि‍भाग सेहो छै। सुननहि‍ हेबे जे कते हो-हल्‍ला भेल। मामला न्‍यायालय चलि‍ गेल। गोल-माल जरूर भेल रहए, जानकारीमे नै रहए। मुदा तैयो जबाबदेहक रूपमे फॅसलौं।
कुमुदनी- अहाँक कि‍छु दोष नै रहए?”
प्रो. शंभु- एकदम नै।
कुमुदनी- फैसला केना भेल?”
प्रो. शंभु- सेवा ि‍नवृत्त लग देखि‍ न्‍यायालय दोषी बना छोड़ि‍ देलक।
कुमुदनी- हुनका सभकेँ?”
प्रो. शंभु- कमो दोखबला बेसी सजा पौलक आ बेसि‍यो दोखबला कम सजा पौलक।
कुमुदनी- एना कि‍अए भेल?”
प्रो. शंभु- जँ पहि‍ने बुझि‍तौं तँ ऐ भीर जेबो ने करि‍तौं मुदा से नै भेल। जाधरि‍ लि‍खि‍त-मौखि‍क रूपमे बेवस्‍था चलत ताधरि‍ एहि‍ना हएत।

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पनि‍याहा दूध

आंगन बहारि‍, बाढ़नि‍ धोय पछबरि‍या दावा लगा राखि‍, सुनयना दरबज्‍जा दि‍स तकलनि‍ तँ बूझि‍ पड़लनि‍ जे मास्‍टर सहाएब (पति‍) भरि‍सक सुतले छथि‍ उठा देब उचि‍त हएत मुदा मन ठमकि‍ गेलनि‍। आठमे दि‍न गाम आएल रहथ तँ चारि‍ बजे भोरेसँ हरवि‍र्ड़ो केने रहै छलाह‍ जे घरमे कोढ़ि‍याक बाढ़ि‍ आबि‍ गेल अछि‍, जे काजक बेरमे सूतल रहत ओकरा कहि‍यो भाभन्‍स हेतइ? मुदा आठे िदनक दूरीमे एना कि‍अए देखै छी। फेर मन घूमि‍ कहलकनि‍ उमेरोक दोख होइ छै, ओना सठि‍या तँ गेले हेताह। तत्-मत् करैत सुनयना दरबज्‍जाआंगनक बीच ठकुआ कऽ ठाढ़ भऽ गेली, ने आगू डेग उठनि‍ आ ने पाछू।

ओना जीवानन्‍दक नीन समैयेपर टूटि‍ गेल रहनि‍, एक तँ ओहुना उमेर बढ़ने खूनो पनि‍या लगै छै आ नीनो पतरा जाइ छै। नीन टुटि‍ते जीवानन्‍दक मनमे उठलनि‍ जे उठि‍ये कऽ की करब? काजे कोन अछि‍ जइ पाछू लागब। आँखि‍ बन्न केने सोचैत रहथि‍। जहि‍ना चि‍न्‍तक चि‍न्‍तन अवस्‍थामे नि‍स्‍तेज भऽ जाइत तहि‍ना रहनि‍। ओना आँखि‍यो खुजैक आ बन्न होइक ढेरो कारण अछि‍ मुदा हुनका से नै रहनि‍। मनमे कतेको रंगक वि‍चार टकराइत रहनि‍, तँए अगि‍ला रास्‍ता देखैमे एकदि‍शाह भऽ गेल रहनि‍। आलमारीक कि‍ताब जकाँ रंग-रंगक वि‍षयक एकेठाम सैंतल रहनि‍, असल वि‍चार परि‍वारमे गड़ल रहनि‍। मुदा परि‍वारसँ पहि‍ने जे अपनापर नजरि‍ पड़लनि‍ ततए गड़ि‍ गेलाह। सेवा-नि‍वृत्त भऽ गेलौं, जीवैक उपाय भलहि‍ं जे हुअए मुदा काज तँ हरा गेल। काजे की अछि‍ जइ अनमेनामे समए गुदस करब। जखन काजे हरा गेल तखन जि‍नगी केना चलत। जँ जि‍नगी चलत नै तँ जीवि‍त-मृत्‍युमे अन्‍तरे की भेल? मनमे लधले रहनि‍ आकि‍ दोसर उठि‍ गेलनि जे करबो केकरा ले करब? पैछला (पूर्वज) कि‍यो छथि‍ये नै अगि‍लो उड़ि‍ये गेल। बीचमे अपनाकेँ पाबि‍ मन दहलि‍ गेलनि‍। सेवा-नवृत्ति‍क तँ एक अर्थ ईहो होएत ने जे काज करै जोगर नै रहलौं। फेर मन ओझरा गेलनि‍। अंधेर नगरी चौपट राजा टके सेर भाजी टके सेर खाजाक पइर भऽ गेल। काजो तँ दू रंगक होइत अछि‍, एक शरीरक शक्‍ति‍सँ कएल जाइत अछि‍ दोसर बौद्धि‍क शक्‍ति‍सँ। हम तँ शरीरक शक्‍ति‍सँ नै बौद्धि‍क शक्‍ति‍सँ करैत छलौं तखन कि‍अए नै करैबला रहलौं। आमक आॅठी जहि‍ना कोइलीसँ धीरे-धीरे सक्कत बनि‍ सृजन शक्‍ति‍ प्राप्‍त करैत, से कहाँ भेल? जँ बौद्धि‍क शक्‍ति‍केँ शरीरक शक्‍ति‍क सीमांकन कएल जाएत तँ केहेन हएत? खैर जे होउ, ठनका ठनकै छै तँ कि‍यो अपना माथपर हाथ दइए। मुदा सेहो तँ नै भऽ रहल अछि‍। जे ठनका शरीरक के कहए जे घरो-दुआर आ गाछो-वि‍रीछकेँ तोड़ि‍-फाड़ि‍ दइए ओही ठनकाकेँ हाथ कते काल बचा सकैए।‍
फेर मन ठमकलनि‍। मुइल धार जकाँ परि‍वारो भऽ गेल अछि‍, कि‍ हमरा बचौने बचत। बचबो केना करत? ने पछि‍ला घूमि‍ औताह आ ने अगि‍ला आबए चाहत। लऽ दऽ कऽ दू प्राणी भेलौं, तहूमे तेहेन पाकल आम जकाँ भऽ गेल छी जे कखन तूबि खसब तेकर कोन ठेकान अछि‍। खैर जे होउ, जाबे आँखि‍ तकै छी ताबे तँ जीबए पड़त आ जाबे जीब ताबे जीबैक उपाए करै पड़त। अपने जीने जि‍नगी आ अपने मुइने मृत्‍यु।

गुन-धुनमे पड़ल जीवानन्‍दक मन समाज दि‍स बढ़लनि‍। समाजे ले की केलि‍ऐ जे हमरा ले करत। जहि‍ना देवस्‍थान दस गोटेक सहयोगसँ ठाढ़ो होइत आ चलबो करैत तहि‍ना तँ समाजो अछि‍। मुदा से तँ कि‍छु ने केलि‍ऐ। थकथकाएल मन कहलकनि‍-
कि‍ ओछाइने धेने रहब आकि‍ उठबो करब?” मुदा लगले दोसर मन कहलकनि‍-
उठि‍ये कऽ की करब?”

मन आगू बढ़ि‍ शि‍क्षक समाज दि‍स बढ़लनि‍। सभ सेवा-नि‍वृत्ति‍ होइ छथि‍। मुदा कि‍ हमरे जकाँ सभकेँ हेतनि‍। भलहि‍ं सभकेँ होन्‍हि‍ वा नै कि‍छु गोटेकेँ तँ हेबे करतनि‍। जखन सबहक जि‍नगी एक वृत्तमे बीतल तखन कि‍अए सभकेँ सभ रंग हेतनि‍। परि‍वारो आ समाजो तँ सबहक सभ रंग छन्‍हि‍। से तँ छन्‍हि‍ये। दीनानाथ बाबूकेँ देखै छि‍यनि‍ जे सेवा-नि‍वृत्ति‍क उपरान्‍तो वि‍द्यालय छोड़ि‍ नै रहलनि‍हेँ। जखन कि‍ सुखदेव बाबू सेवा-नि‍वृत्ति‍ होइसँ पूर्वहि‍ जे तीन बर्ख ओछाइन धेलनि‍ से अखनो धेनहि‍ छथि‍। परि‍वारमे जँ केकरो कि‍छु अढ़बै छथि‍न तँ मुँह दूसि‍ कहै छन्‍हि‍ जे भरि‍ दि‍न कौआ जकाँ काँइ-काँइ करैत रहै छथि‍। मनुक्‍खकेँ जँ कौआ मानि‍ लेल जाए तँ बोलकेँ की कहबै? जीवानन्‍दक मन आरो घुरि‍या गेलनि‍। फेर मनमे उठलनि‍ जे अनेरे औनाइ छी। जतबे रहए ततबे टाँग पसारी नै तँ पओल जाएब। सुतले-सूतल पत्नीकेँ सोर पाड़लखि‍न-
कनी एमहर आउ?”

आंगन-दरबज्‍जाक बीच जे सुनयना ठाढ़ छलीह से आगू डेग बढौलनि‍। केबाड़ लग ठाढ़ भऽ हि‍या-हि‍या देखए लगलीह। पहि‍लुका (सेवा-नि‍वृत्ति‍सँ पूर्वक) अपेक्षा बदलल-बदलल रूप बूझि‍ पड़लनि‍। एना केना भेलनि‍, अखन धरि‍ तँ कि‍छु कहबो ने केलनि‍हेँ। तखन कि‍अए पानि‍ उतरल बूझि‍ पड़ै छन्‍हि‍। केबाड़क एकटा पट्टा खोलि‍ देने रहथि‍न आ दोसर ओहि‍ना लगल रहै। तही बीच जीवानन्‍दक मनमे उठलनि‍ जे जाबे नोकरी करै छलौं ताबे बाहरसँ कमा कऽ आनि‍ पत्नीक हाथमे दैत छलि‍यनि‍, आ अपने अपनाकेँ गारजन बुझैत छलौं। से तँ आब नै हएत। जँ से नै हएत तँ परि‍वार आगू मुँहे केना ससरत? पाहुन जकाँ आठ दि‍नपर अबै छलौं आ कमासुत बनि‍ जाइ छलौं।

पति‍क बदलल रूप देखि‍ सुनयनाक मनमे उठलनि‍ जे अखन धरि‍ कि‍छु करबो ने केलनि‍हेँ आ तरे-तर फटि‍ रहल छथि‍। नवकवि‍रयाक चुटकीक अवाज जकाँ सुनयनाक आगमन बुझि‍तो जीवानन्‍दकेँ उठैक हूबा देहमे नै रहलनि‍। मनोक बोझ तँ माथकेँ ओहि‍ना भरि‍या दैत जहि‍ना कोनो वस्‍तुक बोझ भरि‍अबैत। मनकेँ जि‍नगीक बाेझ ऐ रूपे दबने जेना सवारी कसल घोड़ा वा खलीफा होइत। जाबे धरि‍ बाहरसँ कमा घर अनैत छलौं, जइ बले परि‍वार ससरैत छल ओ तँ टूटि‍ गेल। ओहीपर ने अपनो छहर-महर आ घरो-परि‍वारक छल। मुदा से नै भेने तँ ओहि‍ना भऽ जाइ छै जहि‍ना माटि‍क बनल रास्‍ताकेँ पानि‍क धार काटि‍ अवरूद्ध कऽ दैत अछि‍। की कमाइयेपर गारजनी छल? पत्नि‍येकेँ की सुख हमरासँ भेलनि‍? घर-गि‍रहस्‍ती सम्‍हारैमे दि‍न-राति‍ एकबट्ट केने रहै छथि‍। एक तँ मि‍थि‍लांचलक कि‍सान परि‍वारक अजीव गढ़नि‍ अछि‍, जइठाम एलापर देवि‍यो-देवता भोथि‍या गेलाह। सौंसे जनकपुरमे जनकेक दरवार जकाँ बूझि‍ पड़लनि‍। नान्‍हि‍टा बात थोड़े छी। गाम-गाम व्‍यास भागवत बचै छथि‍, गाम-गाम कीर्तन-भजन, भोज-भनडारा होइत रहैत अछि‍, तइठाम समाज वि‍परीत दि‍शामे बहि‍ गेल, मुदा देखलनि‍ कोइ ने। दरबाजाक सौभाग्‍य छल नीक-नीक बात-वि‍चार करब। तइठाम दरबज्‍जा टूटि‍ आंगन घरक कोठरी बनि गेल अछि‍, जइठाम कम-सँ-कम लोकक पैठ रहैए, जइठाम आनक सुख-दुख सुनैक आ सुख-दुखक दबाइ बुझैक अवसर नै भेटैत तइठाम पति‍-पत्नीक संबंधक आधार कि‍ बनि‍ सकैए। देखा-देखीक दुनि‍याँमे चि‍न्‍ताचि‍न्‍तन कि‍अए रहत। जँ से नै रहत तँ मनक सुखक दि‍शाक धारा कि‍अए ने बदलत। जीवि‍त-मृत्‍युक ि‍नर्णए के करत? केना हएत? कोनो मुसरा गाछ होइ आकि‍ लति‍आएल लत्तीक होइ, ओकर बाढ़ि‍ ताधरि‍ समीचीन होइत जाधरि‍ ओकरा अनुकूल वातावरण भेटैत रहैत। ओना लाखो कीड़ी-मकौड़ी कोमल कि‍सलयकेँ नष्‍ट करैबला अछि‍ मुदा प्रकृतोक तँ गजब गढ़नि‍ अछि‍, एक-दोसराक नष्‍ट करैबला सेहो मौजूद अछि‍। बि‍नु मुँहक गाछ वा लत्तीक दशा तँ ओहने होइ छै जेहेन साँपक मुँह थकुचेलाक पछाति‍ होइ छै।

जीवानन्‍दकेँ एहसास भेलनि‍ जे हमरापर नै पत्नीपर घर-ठाढ़ अछि‍। जँए घर ठाढ़ अछि‍ तँए समाजक परि‍वार कहबैक लाली अछि‍। मुदा समाज तँ ओहि‍ना नै केकरो महत दैत? सेवाक अनुकूल केकरो महत दैत अछि‍। से हमरा से की भेलै? जखन कि‍छु ने भेलै तखन कते महत हेबाक चाही? मुदा जकरा घर-परि‍वार गाम बुझै छी, तेकरा छोड़ि‍ये केना देब। मुदा ई प्रश्न तँ गामक छि‍ऐ, अपन नै। परि‍वारमे जे छहर-महर भेल ओइमे हमरा कमाइसँ की भेल? यएह ने भेल जे बेटीक बि‍आह केलौं, बेटाकेँ पढ़ेलौं-लि‍खेलौं। अंति‍म अवस्‍थामे अपन घर बनेलौं। मुदा बेटीक बि‍आह, पढ़ाइ-लि‍खाइ एते भारी कि‍अए अछि‍ जे जि‍नगी भरि‍क कमाइसँ लोककेँ पारो ने लगै छै। जँ एतबेमे सभ ओझरा जाए तँ समाजक गति‍ केहेन हएत? जँ समाज दुरगति‍क चालि‍ पकड़ि‍ चलत तँ मनुष्‍यक पैदाइस केहेन हएत। जइठामक जेहेन मनुष्‍य तइठाम तेहने दुनि‍याँ।

करोट फेरते जीवानन्‍दक मनमे उठलनि‍ जे हारि‍ मानी झगड़ा पड़ि‍आए। पत्नीसँ क्षमा माँगि‍ लेब। जँ से नै माँगब तँ हुनकर वि‍चार छि‍यनि‍ जे घरमे रहए दथि‍ वा नै। समाजक संग तँ वएह रहलीह। पत्नीक प्रति‍ जे प्रेम हेबाक चाही से कहाँ कहि‍यो भेल। क्षण-पलक संबंध रहल जीवन-लीलाक संबंध कहाँ रहल। हुनकर दुनि‍याँ हमरासँ भि‍न्न रहलनि‍। मुदा आइ तँ ओही दुनि‍याँक जरूरति‍ हमरो भऽ गेल अछि‍। खंड वि‍कसि‍त देशमे जहि‍ना जनता-सरकारक बीच संबंध रहैत, तहि‍ना ने भऽ गेल अछि‍। जेना पति‍ रूपमे ओ सेवा केलनि‍ तेना कहाँ केलि‍यनि‍। जँ से करि‍ति‍यनि‍ तँ ओ ओहि‍ना ओतै अँटकल रहि‍तथि‍, जतए नाओं-गाँवो नै सीखि‍ पेलीह। जतबो समए गाममे बि‍तेलौं, हुनकर कमाइ खेलि‍यनि‍ ततबो तँ हुनका नै कऽ सकलि‍यनि‍।
ततबे नै, दरबज्‍जापर जे माल अछि‍, हुनका (पत्नी) देखि‍ भूख-पि‍यास कहए लगै छन्‍हि‍ मुदा हमरा देखि‍ घि‍रनी जकाँ नाचि‍ भगबए चाहैए। अठबारेयो जँ अबैत रहलौं तैयो तँ अपन बूझि‍ खाइ-पीबै ले कि‍छु ने केलि‍ऐ। कोनो कि‍ मनुख छी जे घड़ी-मोबाइल देखि‍ मि‍नट-सेकेण्‍ड बूझत, ओकरा लेल तँ अठबारैओ सटले-दि‍न भेल। तहि‍ना तँ गाछि‍यो-बि‍रछीक अछि‍। जूरशीतल दि‍नसँ ओकरा जलढार हेबाक चाही, से अनका तँ कहलि‍ऐ, मुदा...?
.....कि‍अए ओ अपन बूझत?

जहि‍ना सासुरमे जमाए सासु-ससुरक आगू लाड़-झाड़ करैत जे ई नै अछि‍ ओ नै अछि‍। तहि‍ना जीवानन्‍द ओछाइनसँ उठि‍, बैसैत पत्नी दि‍स देखि‍ बजलाह-
एते दि‍नक जि‍नगीमे कहयो नि‍ठूर दूध नै खेलौं? आब अहाँक दरबारमे छी, जेना राखी।
पति‍क बात सुनि‍ सुनयना वि‍ह्वल भऽ गेलीह। अपन कर्तव्‍यक बोध भेलनि‍। पति‍क सेवा पत्नीक पहि‍ल दायि‍त्‍व। लटारम्‍ह करैत बजलीह-
एना संस्‍कृतमे नै कहू, भखि‍औटीमे कहू जे कि‍ कहै छी?”
पत्नीक बात सुनि‍ जीवानन्‍दक मन हरा गेलनि‍। जइठाम सुग्‍गा-मेना संस्‍कृत पाठ करैत छल तइठाम मनुष्‍यक दूरी एते कि‍अए भेल? प्रश्नमे ओझराइते बुकौर लगि‍ गेलनि‍। बोली नै फुटलनि‍।

आजुक शि‍क्षक जकाँ जीवानन्‍दक जि‍नगी नै रहलनि‍। शि‍क्षक समाजक प्रति‍ समर्पित छलाह। ओइ समाजक बीच पढ़ाइ-लि‍खाइ प्रति‍ष्‍ठाक मूल बि‍न्‍दु छल। ओ सभ मानैत छथि‍ जे जइ वि‍षयक जरूरति‍ वि‍द्यार्थीकेँ टयूशन पढ़बाक होइ छै ओइ वि‍षयक पढ़ाइमे कमी छै। वि‍द्यार्थीक लेल कि‍छु सहज वि‍षय होइत अछि‍ कि‍छु कठि‍न। मुदा जइ वि‍षयक जे शि‍क्षक होइ छथि‍ हुनका लेल तँ ई समस्‍या नै भेल। जँ हुनकामे शि‍क्षण-कलाक पूर्णता हेतनि‍ तँ वि‍द्यार्थीकेँ कि‍अए समस्‍या ग्रस्‍त रहए देथि‍न। की वजह छैक जे अपना ऐठाम अदौसँ लऽ कऽ अखन धरि‍ शि‍क्षण-संस्‍थानमे छड़ीक चलनि‍ नै रहल मुदा तँए कि‍ कि‍यो पढ़ि‍-लि‍खि‍ विद्वान नै भेलाह। भेलाह।

जइ हाइ स्‍कूलमे जीवानन्‍द शि‍क्षण कार्य करैत छलाह ओइ वि‍द्यालयकेँ अपन छात्रावास सेहो छैक। जइमे पचाससँ ऊपर छात्रो आ आधासँ बेसी शि‍क्षको रहैत छथि‍। मेसमे भोजन बनै छैक आ जएह वि‍द्यार्थीक लेल सहए शि‍क्षको लेल होइत छैक। ओना शि‍क्षक सभ अलगसँ दूध कीनि‍ राति‍मे सुतै बेर पीबै छथि‍। जीवानन्‍दो पीबै छथि‍।

जहि‍ना बाटमे हराएल बटोही दोसरकेँ पुछैत, मुदा उत्तर देनि‍हारो बटोही तँ रंग-बि‍रंगक होइत अछि‍। कि‍यो एहनो होइत जे अपने हरेबाक चर्च करैत तँ कि‍यो हराएब छि‍पबैत आरो दोसरकेँ हराएल बाट देखा दैत आ कि‍यो एहनो होइत जे कहैत जे संगे चलू। ऐ आशाक संग चलैक बात कहैत जे जँ कि‍छु नै कहबै तँ गोंग कहत, मुदा बि‍नु बूझलमे कि‍ जबाबो देल जा सकैए। ओ संग केने ताधरि‍ चलैत रहैए जाधरि‍ आँखि‍गर नै भेट जाइत अछि‍। अर्द्धांगि‍नीक रूपमे सुनयना पुछलखि‍न-
कि‍ सुच्‍चा दूध कहलि‍ऐ?”
जीवानन्‍द- पैंतीस सालक नोकरीमे कहि‍यो सुच्‍चा दूध नै पीब सकलौं। पीलौं जरूर मुदा एकरा आधासँ बेसी खाएब थोड़े कहल जेतैक।
जहि‍ना मृत्तासनपर चढ़ल राहीकेँ सर-समाज आ कुटुम-परि‍वारक लोक आबि‍-आबि‍ जि‍ज्ञासा करैत जे भैया, कि‍ काका, आकि‍ बाबा की खेबा-पीबाक मन होइए तहि‍ना सुनयना पुछलखि‍न-
एते दि‍न जतए अहाँ छेलौं छेलौं, हम छेलौं छलौं। मुदा आब तँ ओतए अहुँ रहब जतए हम छी।
पत्नीक वि‍चारक गांमीर्यसँ जीवानन्‍द आँखि‍ पड़ल अजगर साँपक सोझसँ पड़ा नै पाबि‍, बजलाह-
कहलौं तँ बेस बात मुदा मनुष्‍य तँ मनुष्‍यक बीच कि‍छु बंधन ि‍नर्धारि‍त कऽ रहैत अछि‍। डोरी-पगहाक जरूरति‍ तँ पशुक लेल होइत। मुदा बान्‍ह तँ एकमुड़ि‍या नै भऽ सकैए। ओकरा लेल तँ जाधरि‍ दू-मुड़ि‍या नै लटपटौल जाएत, ताधरि‍ गीरह केना पड़तै। जाधरि‍ कुशि‍यारक गाछ जकाँ गीरह नै बनत ताधरि‍ रस-जल केना समटाएल रहत।

पत्नीक प्रश्न सुनि‍ जीवानन्‍द जि‍नगीक ओझरी देखए लगलाह जे ई बन्‍धन छूटल कहि‍या। तड़सैत मन पत्नीक करेजमे पहुँचलनि‍। जहि‍ना नि‍शाएल लोक अपने अड़-दड़ बजैत तहि‍ना जीवानन्‍द बाजए लगलाह-
कामि‍नी, सेवि‍काक रूप छोड़ि‍ संगी कहि‍या बुझलयनि‍। ई दोख केकर। मुदा दोख तँ दुनू दि‍स देखए पड़त। पत्नी कोन रूप देखलनि‍। सभ दि‍न ओ पति‍ बूझि‍ सेवा करैत एली। कहि‍यो कि‍छु नै मंगलनि‍। अपन परि‍वारक स्‍तर बूझि‍ अपनाकेँ सम्‍हारि‍ रखलीह।
बड़बड़ाइत पति‍केँ देखि‍ सुनयना बजलीह-
हारि‍ मानी झगड़ा फड़ि‍आए। एके बेर बाजि‍ जाउ जे जे हूसल से हराएल। जे जीबए से खेलए फागु।
मरैत रोगी जकाँ जीवानन्‍द बजलाह-
सुच्‍चा दूध आबो नै पीब सकै छी?”
पीब सकै छी। जखन गाए पोसैक लूरि‍ अछि‍ तखन कि‍अए ने पीब सकै छी। मुदा जइठाम दि‍न-राति‍ लुटनि‍हार लूटि‍ रहल अछि‍ तइठाम थनक दूधक कंठ लग पहुँचत कि‍ नै, तेकर कोन बि‍सवास अछि‍।

पत्नीक प्रश्न सुनि‍ जीवानन्‍द जी-जी कऽ उठलाह। बि‍सरल बात मन पड़लापर जहि‍ना ओकर रूपो-रेखा सोझमे अाबए लगैत तहि‍ना भेलनि‍। बजलाह-
शुद्ध-अशुद्ध दूध ने एक परि‍वारक समस्‍या छी आ ने एक गामक। दूधमे पानि‍ देब चलनि‍ भऽ गेल अछि‍। ओना जे अपने गाए-महींस पोसि‍ दूध खाइ छथि‍ ति‍नकर संख्‍या कम छन्‍हि‍‍। जे बेचि‍नि‍हार छथि‍ ओ दूध बेचि‍ चाउर-दालि‍, तरकारी इत्‍यादि‍ कीनै छथि‍, खाली दूधेटामे पानि‍ नै देखै छथि‍न। आनो-आनो तहि‍ना, तखन कएल कि‍ जाए। कुल-मि‍ला कऽ देखलापर यएह ने देखि‍ पड़ैत जे ताड़ी पीयाक गांजा पीयाककेँ गारि‍ पढ़ि‍ कहैत जे फोकटि‍या अछि‍। एहि‍ना एक-दोसरमे सटल संबंध अछि‍। सभकेँ सभ गारि‍ पढ़ैत आ सबहक सभ सुनैत अछि‍। तहूसँ टपि‍ अपने मुँहे गरि‍या अपने सेहो सुनैत अछि‍।

वि‍ह्वल भऽ सुनयना पुछलखि‍न-
तखन उपाय?”
उपाय एतबे जे जते परि‍वारमे खर्च हएत कम-सँ-कम तते उपारजन कऽ लेब तखन परि‍वारक पाड़़ लगि‍ जाएत। गाममे जते खर्च अछि ओते गौआँ मि‍लि‍ उपारजन कऽ लेताह तँ गामक पाड़ लगि‍ जाएत। समाजेक कल्‍याण ने देशक कल्‍याण छी।‍

कर्ज

जमीन नि‍लामीक नोटि‍श पाबि‍ बरीसलालक सभ आशा ओहि‍ना झड़ए लगल जहि‍ना वसन्‍तसँ पूर्व गाछक पतझर होइत वा फलसँ पहि‍ने फूल झड़ए लगैत अछि‍। हलसैत जि‍नगीक आशा देखि‍ बरीसलाल खेती लेल, बैंकसँ कर्ज लऽ बोरि‍ंग-दमकल करौलक। मुदा समैपर कर्ज अदा नै कए पाबि‍, जइले कर्ज लेलक सएह हाथसँ नि‍कलैत देखि‍ सोगसँ सोगाएल अखड़े चौकीपर पेटकान दऽ मने-मन सोचैत जे की करैत की भेल। साओनक मेघ जकाँ दुनू आँखि‍ नोरसँ बोझि‍ल।


बीसम शताब्‍दीक आठम दशकमे हरि‍त-क्रान्‍ति‍क हवा घुसकैत-घुसकैत गाम धरि‍ पहुँचल। नव हवाक सुगंध नाके-नाक खेत-खरि‍हानमे पहुँचल। गामक कि‍सानक सीमांकन शुरू भेल। ओना सीमांक नाम-मात्रेक भेल मुदा भेल तँ। नाम-मात्र एे लेल जे सैद्धान्‍ति‍क रूपमे तँ सीमांकनक रूप रेखाा तैयार भेल मुदा जमीनक ओझरी कँटहा बाँस जकाँ ओझराएल। कड़चीसँ बेसी काँट। एक-एक कड़चीमे सइयो काँट। सोरगर-मोटगर पाकल देखि‍ भलहि‍ं आरीसँ जड़ि‍ काटि‍ दि‍यौ मुदा झोझसँ नि‍कालब तँ असान नै। जइसँ बेवहारि‍क पक्ष कमजोर पड़ल।

चारि श्रेणीक अन्‍तर्गत कि‍सानकेँ राखल गेलनि‍। ढाइ एकड़सँ नि‍च्‍चा एक श्रेणी, चारि‍ एकड़सँ नि‍च्‍चा दोसर श्रेणी, दससँ नि‍च्‍चा तेसर आ तइसँ ऊपर चारि‍म। नि‍चला कि‍सानक लेल सरकारी खजाना खुजल। रंग-रंगक प्रोत्‍साहनक घोषणा भेल। सरकारी घोषणा तँए सभले भेल। मुदा बैंकक माध्‍यमसँ भेटत। जइ माध्‍यमसँ भेटत सएह नगण्‍य। एक दि‍स फौज जकाँ कि‍सान दोसर दि‍स जइठामसँ भेटत, सएह नै। मुदा तैयो गोटि‍ पंगरा तँ दलैहे। सरकारी सुवि‍धा सब्‍सि‍डीक रूपमे भेटत। तेकर कार्यालय भि‍न्न बनल। कि‍सानक बीच प्रोत्‍साहनक घोषणासँ नव जागरणक संचार भेल। गाम-गाममे भी.एल. डब्‍लूक माध्‍यमसँ काजक सूत्र तैयार भेल। आने कि‍सान जकाँ पाँचम श्रेणीक कि‍सान बरि‍सालोक डेग बढ़ल। एक-ति‍हाइ सब्‍सि‍डी सुनि‍ केना नै बढ़ैत। जखने कि‍सानक हाथ पानि‍ आैत तखने चौमसि‍या खेती बारहमसि‍या बनि‍ जाएत। जखने बारहमसि‍या बनत तखने ने कि‍सान डारि‍-डारि‍ झूला लगा बारहमासा गाओत। नै तँ छह मासे, चौमासे ने गाओत। जे चौमास कि‍सानक बराबरी छी, तेहीमे ने भाँग-धुथुर उपजैए।
वस्‍तुगत काज तँ नै मुदा चौरीसँ चौमास धरि‍क, चारि‍ गुणा उपजाक नक्‍शा तँ कि‍सानक मनमे बनबे कएल। बीघा-एकड़क हि‍साब भलहं अखनो धरि‍ नै फड़ि‍आएल मुदा-एकड़-हेक्‍टेयर तँ आबि‍ये गेल। कि‍छु एनए कि‍छु ओनए कऽ कि‍सान हि‍साब तँ बैसाइये लेलक।

अखन धरि‍क जे छोट आ मध्‍यम कि‍सान महाजनीक कर्जमे डूबल छल ओइमे पूँजीपति‍क प्रवेशक दुआर खूजल। कम सूदि‍क बात तँ आएल मुदा छअ मास पछाति‍ सूद मूड़ बनि‍ जाइत से एबे ने कएल। अखन धरि‍ सूदि‍क-सूदि‍ प्रथा नै छल से आएल। भलहि‍ं कतौ महाजन सप्पत खा केकरो घराड़ी लऽ लेने होइ आकि‍ कतौ सप्‍पत खा कर्जा डूमल होइ, ई अलग बात। आजुक दहेज ओते भारी नै छल जते माए-बापक सराध। ओना दहेजोक जड़ि‍ मजगूत बनि‍ रहल छल, कि‍एक तँ शहरक आमदनी गाम दि‍स आबए लगल छल।

गाममे छोट -सीमान्‍त-माध्‍यम- पैघ लगा कि‍सानोक संख्‍या बेसी मुदा बोनि‍हारक संख्‍यासँ कम अछि‍। ओना सभ गामक रूपो-रेखा एक रंग नहि‍ये अछि‍। कोनो गाम एहेन जइमे पाँच प्रति‍शतसँ कम जनसंख्‍या नवे-पनचानबे प्रति‍शत जमीन पकड़ने, तँ कोनो गाम एहेन जइमे दस पनरह-प्रति‍शतक अंतर। एहनो कि‍सान जि‍नका अपन जमीनक अता-पता नै बूझल तँ एहनो कि‍सान जे अपने सबतूर मि‍लि‍ खेती करैत। तइ संग एहनो जे खेतक आड़ि‍पर पहुँचि‍ जूति‍-भाँति‍ तँ लगबैत मुदा अपने हाथे कि‍छु नै करैत। गाछी-खरहोरि‍, बँसबाड़ि‍, घराड़ी लगा बसीसलालकेँ पाँच बीघा जमीन। दू बीघा बेख-बुनि‍यादि‍मे फँसल बाकी तीन बीघा जोतसीम। एकटा बड़द रखने। सफटैती कऽ खेती करैत। ओहू तीन बीघा जोतसीम जमीनमे तीन मेल। पनरह कट्ठा चौरीमे मलगुजारीक संग लगतो साले-साल डुमैत। मुदा छोड़ि‍यो केना देत, आखि‍र खेत तँ खेत छी। रौदी भेने ओहीमे ने उपजा होइ छै। बाकी सवा दू बीघा मध्‍यमसँ भीठ धरि‍। दसो कट्ठा भीठमे मरूआ, भदै-गदैरक संग कुरथी-तेबखा होइत। गहुमक खेती तँ आबि‍ गेल मुदा खेतीक लेल पानि‍ चाही। पटबैक साधन पोखरि‍, जइसँ करीनसँ कि‍छु अगल-बगलक खेती होइत। लोकक बीच ने पढ़बै-लि‍खबैक जि‍ज्ञासा रहै आ ने सुवि‍धा। गनल-गूथल वि‍द्यालय-महावि‍द्यालय। बरीसलालो दुनू बेटाकेँ गामक स्‍कूल धरि‍ पढ़ा‍ खेति‍एक काजमे लगौने। मि‍थि‍लाक कि‍सान खेतक ओहन प्रेमी बनल रहला जेहन पति‍व्रता नारी जे बाल वि‍धव होइतो प्रति‍ष्‍ठाकेँ कमलक माला बना गरदनि‍मे लटका हँसि‍ रहली अछि‍ तहि‍ना कि‍सानो। जँ से नै रहल छथि‍ तँ भागि‍-पड़ा अर्थशास्‍त्री बनि‍ कि‍अए अपन खेत-पथारक अर्थ नै बूझि‍ प्रति‍ष्‍ठाक वस्‍तु बूझि‍ रहल छथि‍। की ओहि‍ना खेतीकेँ उत्तम आ नोकरीकेँ मध्‍यमक वि‍चार देलनि‍। जँ एकरा मुहावरा-कहावत बना देखब तँ मिथि‍लाक चि‍न्‍तनधारा धरि‍ नै पहुँचि‍ पाएब। जइठाम खेतकेँ अपन अधि‍कारक वस्‍तु बूझि‍ अपना हाथक हथि‍हार बना अपन स्‍वतंत्रताकेँ अक्षुण्‍य रखैक वि‍चार सेहो देलनि‍। ई तँ अपन-अपन वि‍चार होइ छै जे कि‍यो हथि‍यारकेँ बम-बारूद बुझैत तँ कि‍यो हाथक यार माने प्रेमी बूझि‍ वि‍चारक बाट बनबैक वि‍चार व्‍यक्‍त करैत अछि‍। तहि‍ना अस्‍त्रशस्‍त्र सेहो अछि‍।

मध्‍यम कि‍सान वा लघु कि‍सानक जीबैक जि‍नगी ब्‍लौटि‍ंग पेपर सदृश बनि‍ गेल छन्‍हि‍ जेकरामे लालो रोशनाइ सोंखैक शक्‍ति‍ छै आ करि‍यो रोशनाइक। बाढ़ि‍-रौदी एकैसम शताब्‍दीक ऊपज नै अदौसँ रहल अछि‍। भलहि‍ं कहि‍ सकै छी जे धार-धूड़क बान्‍ह-छान्‍ह दुआरे हुअए लगल अछि‍, भऽ सकै छै कतौ-होइत  हेतै, मुदा प्रश्न धारेक पानि‍क नै अछि‍। तहि‍ना रौदि‍यो रहल अछि‍। धारोक कटनी-खोंटनी कम नै अछि‍। मि‍थि‍लांचलकेँ कोसी-कमला तेखार कऽ दुब्‍बरसँ धोधि‍गर धरि‍ अछि‍। पानि‍क एक साधन भेल, दोसर बरखा भेल। ओहन-ओहन बरखा होइत रहल अछि‍ जे पनरह दि‍न हथि‍याक बरखाक ओरि‍यान कऽ कऽ पर्वज रखैत छलाह। हथि‍या मात्र एक नै जेकरा बरखा ऋृतुक अंति‍म नक्षत्र कहि‍ टारि‍ देब। ओना पानि‍क कोनो ठेकान नै, माघोमे पाथर खसि‍ उपजल उपजाकेँ नाश करैत रहल अछि‍। अंति‍मक जन्‍म ताधरि‍ नै होइत जाधरि‍ आदि‍ नै होइत बरखा ऋृतुक आदि‍ आद्रा छी। तँए आदि‍ आद्रा अंत हस्‍त ई भेल बरखाक आँट-पेट। पूर्वज सभ स्‍पष्‍ट वि‍चार देने छथि‍ जे बरखाक कोनो बि‍सवास नै, कते हएत। 1971 ई.मे बंगला देशक लड़ाइक लगभग सालो भरि‍ बरखा होइते रहल, ओहन-ओहन बरखा होइत रहल अछि‍ जइमे सएक-सए घर खसैत रहल अछि‍। घरमे दबल-बाल-वृद्ध, धान-सम्‍पति‍ नष्‍ट होइत रहल अछि‍ मुदा तैयो ब्‍लौटि‍ंग पेपर जकाँ सोखि‍ कि‍अए जीबैक बाट धेने आबि‍ रहल अछि‍। दुनि‍याँमे ने सााधकक कमी आ ने साधना भूमि‍क, मुदा मि‍थि‍लांचल श्रेष्‍ट कि‍अए? कतौक जाड़क साधना तँ कतौक तापक तप, जइमे तपि‍ तपस्‍या करैत, तँ कतौ पानि‍क सौभरी ऋृषि‍ बनि‍ करैत। मुदा मि‍थि‍लांचल साधनााक फुलवाड़ी लगा रखने अछि‍। ओइ फुलवारीक फूल सजबै छलीह सीता।
ने मि‍थि‍लाक भूमि‍ बदलल, आ ने बदलल ऋृतु ऋृतुराज बदलि‍ रहल अछि‍ खाली बोतलक रस। घरक समस्‍या कहाँ? समस्‍या तँ तखन उठैत जखन रहैक घरसँ घर भाड़ा असुलैक ि‍वचार जगैत। गाछक नि‍च्‍चा सात-हाथ नौ हाथक घरमे जीवन-यापन कऽ वेद-पुराण सि‍रजलनि‍। की दुनि‍याँ देखि‍नि‍हार मि‍ि‍थलांचल छोड़ि‍ देखि‍ रहला अछि‍, जँ से नै तँ समस्‍याकेँ कोन रूपे देखलनि‍। यएह ने सरकारी योजना जहि‍ना कागजपर औषधालय बना साले-साल मरम्‍मतक नामपर योजना लुटज्ञइत रहैत आ पान सालक बाद माटि‍पर खसा मलबा हटबैक खर्च होइत। खेतसँ उपजल खढ़, बाँस साबेक घर बना समस्‍याक समाधान करैत छलाह। ओ सभ अपन वि‍चारकेँ स्‍वतंत्र रखि‍ स्‍वतंत्र जीवन व्‍यतीत करैत छलाह। पढ़ै-लि‍खैक ओते समस्‍या नै, जेहन जि‍नगी रहत ततबे बुधि‍क ने जरूरत। बेसी भेलासँ तँ लोक छड़पि‍-छड़पि‍ अनको गाछक आम तोड़ए गलैत अछि‍। भलहि‍ं अपन पूर्वजक घराड़ीपर नढ़ि‍या कि‍अए ने भुकए, मुदा दुनि‍याँकेँ मातृभूमि‍ कहि‍ सेवारत् रहैत छी। ओही रूपक फूसघर बना जि‍नगीक गारंटी केने छलाह। अखुनका जकाँ नै जे एक दि‍स लग्‍गी लगा भाँटा तोड़ैक बाट धेने छी आ दोसर दि‍स हजार-दस हजार जीबैबला ऋृषि‍-मुनि‍क दुहाइ दैत छी। एकैसम सदीमे कि‍यो अपनाकेँ अगि‍ला पीढि‍क नजरि‍क पुतली बना रहल छी। जहि‍ना बरखा, तहि‍ना जाड़ तहि‍ना रौद-ताप, बाल जीवनसँ लऽ कऽ वृद्ध तकक अनुभव कऽ अपन जि‍नगीकेँ असथि‍र बना नीक-नीक उमेर पबैत रहला अछि‍।
पश्न उठैत जे की एहेन वि‍चार मरि‍ गेल आकि‍ जीवि‍त अछि‍? ने मरल आ ने स्‍वस्‍थ भऽ जीवि‍त अछि‍। गाम-समाजमे लटपटज्ञएइत जीवि‍त जरूर अछि‍ मुदा.....। जीवि‍त ऐ रूपे अछि‍ जे अखनो खेतीकेँ उत्तम मानल जाइत अछि‍। कृषि‍ जि‍नगीकेँ थ्‍ज्ञाहि‍ चलबैत अछि‍। तहूमे सामाजि‍क स्‍तरपर तँ आरो थाहल अछि‍। जँ जि‍नगीमे दोसराक जरूरत नै हुअए तँ ऐ सँ नीक जीवन ककरा कहबै। आजुक हवा भलहि‍ं जते जोर मारए मुदा हवा असथि‍र वस्‍तुकेँ कहाँ कि‍छु बि‍गाड़ि‍ पबैत अछि‍। अनभुआर धारमे ने नमहर-नमहर जलचरक भय रहै छै कि‍एक तँ धुमैत धारमे जे गहींर-गहींर मोइन खुना जाइ छै तइमे ने डुमैक डर, जँ से नै तँ डुमैक डर कतए। तहि‍ना ने धरति‍योक बीच अछि‍। जहि‍ना पानि‍मे गोहि‍, नकार आदि‍ रहैए तहि‍ना ने धरति‍योपर बाघ सि‍ंह, नाग बास करैए। थाहल जि‍नगीक अर्थ ई जे जँ तीन बीघा वा दू बीघा जमीनकेँ जँ समुचि‍त बेवस्‍था कऽ खेती कएल जाए तँ युगानुकूल मनुष्‍य बनब बड़ भारी नै। जि‍नगी तखन भारी बनैत अछि‍ जखन गरथाहमे जि‍नगी पड़ि‍ जाइत अछि‍। कि‍सानक जि‍नगीकेँ पंगु बना देल गेल अछि‍। जँ से नै तँ सरकारी बेवस्‍था कोन -कि‍सान हि‍तैषी- जि‍नगीक कोन जरूरति‍केँ पूरा नै कऽ पाबि‍ सकैए, मुदा नीको-नीको -दस बीघासँ ऊपरबला कि‍सान- परि‍वार ने अपना बेटाकेँ नीक शि‍क्षा दऽ पाबि‍ रहल अछि‍ आ ने जनमारा बेमारि‍क इलाज कऽ पाबि‍ रहल अछि‍। जहि‍ना सुति‍ उठि‍ सीता-राम, राधा-कृष्‍ण वा सतनामक नाम लेल जाइत तहि‍ना ने आब टाटा-पापा लैत उठै छी। मुदा कि‍ हम सभ नढ़रा मकैक सदृश जि‍नगी नै जीबै छी जे भोगार गाछ रहि‍तो अन्नक कतौ पता नै। कृषि‍ तँ आमक बगीचा वा खीराक लत्ती सदृश अछि‍। जहि‍ना गाछक पल्‍लवक मुँहसँ गि‍रहे-गि‍रहे पल्‍लव नि‍कालि‍ डारि‍ बनैत रहैए, खीरा लत्तीक मुँहसँ लत्ती बनि‍ फुलाइत-फड़ैत रहैए तहि‍ना ने जि‍नगि‍यो छी जे धरतीसँ जनमि‍ फुलाइत-फड़ैत वि‍सरजन करत। खेत तँ ओहन सम्‍पत्ति‍ छी जे जि‍नगीकेँ आगू-बढ़बैक शक्‍ति‍ रखैए। कतबो शक्‍ति‍शाली कि‍अए ने आगि‍ हुअए मुदा जँ ओइमे नव ज्‍वलनशील वस्‍तुक समागम नै हेतै, तँ कते काल ओ टि‍क सकैए। जाधरि‍ धार टपनि‍हार वा सरोवरमे स्‍नान केनि‍हारकेँ पानि‍क थाह नै लगि‍ जाएत ताधरि‍ धार टपब वा स्‍नान करब तँ अथाहे अछि‍। जाधरि‍ अथाह रहत ताधरि‍ असंका रहबे करत। जाधरि‍ आशंका रहत ताधरि‍ वि‍चार प्रभावित हेबे करत। मुदा एतेकक बावजूद हम कि‍अए.....? की हम नै जनै छी जे जाधरि‍ कृषि‍केँ सर्वांगि‍न वि‍कासक प्रक्रि‍या नै अपनौल जाएत ताधरि‍ नचारी-सोहर कते काल सोहनगर हएत। हर आदमी हर परि‍वारकेँ ठाढ़ भऽ चलैक प्रश्न अछि‍, नै कि‍ एक दोसराकेँ छि‍टकी मारि खसबैक।

पाँचटा कि‍सानक संग बरीसलाल सेहो बोरि‍ंग-दमकलक वि‍चारकेँ आगू बढ़ौलक। प्रखण्‍ड कार्यालयसँ फार्म लऽ बैंकमे आवेदन केलक। संगीक जरूरति‍ तँ पड़बे केलै कि‍एक तँ जि‍नगीमे पहि‍ल खेप प्रखण्‍ड कार्यालय आ बैंक पहुँचैक अवसर भेटलै। नव योजनाक काज बैंकमे आएल। ओना गामक आ गामक कि‍सानक हि‍साबे बैंकक संख्‍या दूधक डाढ़ि‍ये छल, मुदा छल तँ। बरीसलालक आवेदन स्‍वीकृति‍ करैत जमीनक बाैण्‍ड बना माइनर एरीगेशनकेँ काज करैक भार देलक। बैंक-कर्जक सूद शुरू भेल।

माइनर एरीगेशनक आँट-पेट छोट। एकाएक काजमे बढ़ोत्तरी भेल। ने काज करैक औजार अधि‍क आ ने करैबला। तँए ठीकेदारीक चलनि‍। तहूमे एक अनुमंडलक बीच एकटा कार्यालय। लेनि‍हार हजार हाथ देनि‍हार एक। मुदा तैयो बरीसलालक आदेश पत्रकेँ फाइलमे लगा देल गेल। एक-ति‍हाइ सब्‍सि‍‍डीक लेल सब्‍सि‍डी कार्यालयक जरूरत। सब्‍सि‍डी कार्यालय जि‍लाक अन्‍तर्गत। दौड़-बरहा करैत बरीसलालकेँ खर्चक संग-संग साल बीत गेल। बरसातमे एक तँ धसना धसैक डर दोसर लोक खेती कहि‍या करत। बोरि‍ंगक काज छोड़ि‍ बरीसलाल खेतीमे लगि‍ गेल। साल बीतल दोसर साल शुरू भेल। ताधरि‍ बैंकक कर्जक चक्रवृद्धि‍ ब्‍याजक दरसँ एते मोटा गेल जे सब्‍सि‍डी उधि‍या गेल।

दोसर साल शुरूहेसँ बरीसलाल काजक -वोरि‍ंग-दमकलक- पाछू पड़ि‍ गेल। आइ-काल्हि‍ करैत माइनरो-गरीगेशनक काज आ सब्‍सि‍डीयो ऑफि‍सक काज लटकले रहलै। चढ़ैत बैसाख -दोसर साल- बरीसलाल रघुनन्‍दनकेँ कहलक-
बौआ, छोड़ि‍ दहक। बोरि‍ंग नइ भेल तँ करजो तँ नहि‍ये भेल। बुझबै जे एते दि‍न घुमबे-फि‍रबे केलौं।

बैंकक प्रक्रि‍या रघुनन्‍दनकेँ बूझल। बरीसलालक बात सुनि‍ अवाक् भऽ गेल। मन कलपि‍ उठलै बाप रे, सूदि‍-मूड़ लदा गेलै, कोट-कचहरीक मुद्दा बनि‍ गेलै। दोख केकरा लगतै। कोन मुँह लऽ कऽ समाजमे रहब। ग्‍लानि‍सँ मन बि‍साइन भऽ गेलै। साहस बटोरि‍ रघुनन्‍दन बाजल-
काका, जँए एते दि‍न तँए दू मास आरो। बैसाख-जेठ बचल अछि‍। काल्हि‍ चलू या तँ अपन काज वापस लेब वा हाथ पकड़ि‍ काज कराएब। तइले जे हेतै से देखल जेतै।

रघुनन्‍दनक बात सुनि‍ बरि‍सलाल ठमकि‍ गेल। बाजल-
बौआ, हम तँ तोरेपर छी, आगि‍मे जाइले कहह आकि‍ पानि‍मे तोरासँ बाहर थोड़े हएब।

बरीसलालक वि‍चार सुनि‍ रघुनन्‍दनक मनमे उत्‍साह जगल। दोसर दि‍न दुनू गोटे -बरीसलाल, रघुनन्‍दन- माइनर एगरीगेशनक कार्यालयसँ बोरिंग गाड़ैक सामान नेने आएल। गाड़ैक दि‍न तकबए गेल तँ आगूमे भदबा पड़ैत रहए। जोड़-घटाओ करैत आठ दि‍न पछाति‍ बोर करब शुरू भेल। ि‍सर्फ ठीकेदारे टा आएल बाकी सभ काज गामेक मजदूर करत। ओना बोरि‍ंगक काजमे गामक मजदूर अनाड़ि‍ये छल मुदा अनाड़ि‍यो तँ कते रंगक होइ छै। जते काज तते जीवनी तते अनाड़ी। जखने काजक लूरि‍ भऽ गेल तखने जीवनी, जाधरि‍ नै भेल ताधरि‍ अनाड़ी। ततबे नै एक काजक जीवनी दोसर काजक अनाड़ी सेहो होइत। तँए जीवनी-अनाड़ीक भेद करब कठि‍न अछि‍। ओना काजक भीतरो जीवनी-अनाड़ी होइत। जहि‍ना एकपर सए खड़ा अछि‍। कहैले तँ एक पहि‍ल सीमा भेल आ सए दोसर सीमा मुदा दुनूक बीच अंतर ओते अछि‍ जते एक प्रति‍शत आ सए प्रति‍शत। तहि‍ना काजोक अछि‍। एके काजक भीतर सइयो रंगक काजक अंश होएत। कि‍छु अंशक बादे जीवनी मानल जाए लगैत मुदा जीवनी -लूरि‍गर- होइतो पूर्ण लूरि‍गर नै मानल जाएत। पूर्ण लूरि‍गर तखन मानल जाएत जखन काज समए सीमाक भीतर होइत। ओना काजोक सीमाक ि‍नर्धाणरण व्‍यास पद्धति‍क अनुकूल होएत। जँ से नै होएत तँ कि‍छु एहनो काज केनि‍हार होइत जे समयो-सीमासँ पहि‍नहि‍ कऽ लैत आ कि‍छु एहनो होइत जे काज तँ कऽ लैत मुदा समए सीमा टपि‍ कऽ करैत। तँए कि‍ ओकरा अनाड़ी कहल जेतैक।

पहाड़ी माटि‍ रहने सबा साए फीट बोर आठे दि‍नमे भऽ गेल। लेयरो बढ़ि‍याँ। चालीस फीट लेयर। ओना जँ नीक लेयर होइत तँ पनरहो फीटमे पाँच हार्स पावरक इंजन पूर्ण पानि‍ दैत, मुदा लेयरोक तँ ठेकान नै। नीक-अधला संगे होइत। कोनो बालु -सौतबी- एहेन होइत जइमे पानि‍क मात्रा पनरह प्रति‍शतक आस-पास होइत आ कोनो एहेन होइत जइमे अस्‍सी प्रति‍शत धरि‍ पानि‍ रहैत। मुदा बरीसलालक बोरक लेयरक स्‍थि‍ति‍ कि‍छु भि‍न्न छल। नि‍च्‍चाक तीस फीट लेयरमे अस्‍सी प्रति‍शत पानि‍ छल आ ऊपरकामे कम। तँए ठीकेदार बाजल-
बरीसलालबाबू, अहाँक तकदीर नीक अछि‍। कहि‍यो बोरि‍ंग भथन नै हएत। कि‍एक तँ तेहेन नि‍चला बालु अछि‍ जे सभ दि‍न पानि‍ दनदनाइते रहत। तँए नीक हएत जे जहि‍ना भीत घरमे ठेमा-ठेमा रद्दा पड़ैए तहि‍ना कि‍छु दि‍न जे बोर ठेमा जाएत तँ धँसना धसैक संभावना समाप्‍त भऽ जाएत। ओना क्रेसि‍ंग-पाइपसँ बोर कएल अछि‍, पाइप लोड करैमे कोनो दि‍क्कत हेबे ने करत, मुदा अहीं हि‍तमे कहै छी।

ठीकेदारक मुँहसँ तकदीर सुनि‍ बरीसलालक मन उधि‍या गेल। ठीकेदारक अगि‍ला बात नीक नहाँति‍ सुनबो ने केलक। अंति‍म हि‍तक चर्च सुनि‍ बरीसलाल बाजल-
ठीकेदार सहाएब, अहाँ कि‍ कि‍यो वीरान थोड़े छी जे अधला करब। अहाँ तँ सद्य: इन्‍द्र भगवान छी, जेमहर ताकि‍ देबइ तेमहर ताड़ि‍ देबै। जेना-जेना अहाँ कहब तेना-तेना करैले तैयार छी।
ठीकेदार- हमरो गाम गेना बहुत दि‍न भऽ गेल। अखन ऑफि‍सक छुट्टीक काजो ने अछि‍। कि‍एक तँ बोर करैक सीमा जते अछि‍ तइ पूरैमे एकबेर गामसँ घूमि‍ आएब। अहूँक काज नीक हएत आ अपनो काज भऽ जाएत। कहि‍ ठीकेदार गाम चलि‍ गेल।

पनरह दि‍न बीत गेल। जेठ चलए लगल। रोहणि‍ नक्षत्रक आगमन भऽ गेल। संयोगो नीक रहल जे अगते वि‍हरि‍या हाल सेहो भऽ गेल। जहि‍ना भक्‍त भगवानक मि‍लन होइत तहि‍ना बरीसलालक मनमे भेल। अपनो हाथ पानि‍ आबि‍ गेल, ऊपरसँ भगवानो देताह। पानि‍क धनि‍क बनि‍ जाएब। जहि‍ना टि‍कुली अपन पाँखि‍क होश केने बि‍ना हवामे उधि‍आइत ओतए पहुँचए लगल जतए ओकर पाँखि‍ बेकाबू भऽ टुटि‍ जाइत। माि‍टक चुट्टी वा गाछक घोड़नकेँ पाँखि‍ होइते मरैक दि‍न लगि‍चा जाइत, मुदा बूझि‍ नै पबैत तहि‍ना बरीसलालोकेँ हुअए लगल।
रोहणि‍या हाल जहि‍ना धरतीक शक्‍ति‍मे नव उर्जा दैत तहि‍ना बरीसलालोक मनमे आएल। पत्नि‍यो आ दुनू बेटोकेँ शोर पाड़लक। तेल वि‍हीन बच्‍चाक मुँह लाली धरैत अनरनेबा जकाँ हरि‍अरसँ लाल होइत जाइत देखलक। तहि‍ना पत्नि‍योक ओ दि‍न मन पड़लै जइ दि‍न हाथ पकड़ि‍ जि‍नगीक भार उठौने रहए। मुदा, कि‍अए ने लोक भार उठाओत? एकटा नव शब्‍द -word- ताधरि‍ संग पूरैत जा धरि‍ ओकर मथन होइत। नै तँ कअए रहत। बड़ीटा दुनि‍याँ छै कतौ बौरु जाएत। पत्नीक नव रूप देखि‍ बेटाकेँ सम्‍बोधि‍त करैत बरीसलाल बाजल-
बौआ, तोरा सभकेँ जहि‍ना कोरा-काँखमे खेलेलि‍यह तहि‍ना हँसी-खुशीसँ जीबैक ओरि‍यान सेहो कऽ देलि‍यह।
पति‍क बात सुनि‍ पत्नी सुशीलालक मन पहाड़क झरनासँ झड़ैत पनि‍क चमकैत रेत जकाँ चमकए लगलनि‍। बजलीह-
सोझे दीक्षा देने नै हाएत। एक-एक दि‍न, एक-एक क्षणक काजक बात बुझा दि‍औ तखन हएत?”

अखन धरि‍ बरीसलाल कोट-कचहरी करैत बहुत कि‍छु सीख नेने छल। गाम-गामक खेती-पथारी, गाम-गामक माल-जाल पोसब, गाम-गाम फल-फलहरी, तीमन-तरकारीक खेती, माछ पोसब इत्‍यादि‍ सुनि‍ चुकल छल। जहि‍ना मि‍ड्ल स्‍कूलक बच्‍चा हाइ स्‍कूलमे प्रवेश नव-नव पोथी देखि‍ ललाए लगैत तहि‍ना बरीसलालक दुनू बेटाक जि‍ज्ञासा जगल। जि‍ज्ञासा देखि‍ बरीसलाल बाजल-
बौआ, माटि‍मे धन छि‍ड़ि‍आएल छै, बीछि‍नि‍हार चाही।

अखन धरि‍ दुनू भाँइ आमक टि‍कुलासँ लऽ कऽ पाकल आम धरि‍ बीछि‍ चुकल छल तँए बीछैक बात सुनि‍ जेठका बेटा महावीर पुछलक-
केना बि‍छबै बाबू?”
बरीसलाल बेटाक प्रश्न सुनि‍ खुशि‍या गेल। आजुक बेटा जकाँ नै जे नोकरि‍यो करैत आ नोकरो रखैत। जखन अपने काज अछि‍ तखन अपनासँ जे समए बचत सहए ने दोसरकेँ देब। बाजल-
बौआ, अखन तँू सभ भारी काज करै जेकर नै भेलहहेँ। ओना कनी-कनी कऽ हेन्‍डि‍ल मारब सीख हलेबह तँ दमकलो चलाएल भइये जेतह। मुदा जँ दस कट्ठामे सालो भरि‍ तरकारीक खेती करबह तँ ओते कोन परदेशि‍या कमाएत। हँ समए बदलने लोक रंग-बि‍रंगक वृति‍यो बदलि‍ लेलकहेँ। जइसँ कि‍छु अनाप-सनाप सेहो भऽ रहल छै। मुदा बुधि‍क संग पूँजी आ पूँजीक संग बुधि‍ नै चलत तँ अनेरे दब-उनाड़ होइत रहत।

जेठक पूर्णिमा दि‍न बोरि‍ंग लोड भेल। लोड होइसँ तीन दि‍न पहि‍ने अपन ऊषा मशीन आबि‍ गेल रहै। बोरि‍ं लोड कऽ ठीकेदार-मजदूर मि‍लि‍ माछक भोज खा, सोलह घंटा पानि‍ चला काज सम्पन्न केलक।

अखाढ़ चढ़ि‍ते मानसून उतड़ि‍ गेल। पहि‍लुके दि‍न एहेन बरखा भेल जे खेत-पथारमे पानि‍ लगि‍ गेल। नीचला खेती बुड़ैक लक्षण धऽ लेलक। तेसरे दि‍न बाढ़ि‍ चल आएल। पोखरि‍-झाखड़ि, चर-चांचर भरि‍ गेल। पानि‍पर पानि‍ आ बाढ़ि‍पर बाढ़ि‍ कते बेर आबि‍ गेल। दहार भऽ गेल। एहेन दहार भेल जे नवान पावनि‍यो लोक बि‍सरि‍ गेल। मुदा काति‍क अबैत-अबैत रब्‍बी-राय छीटब शुरू भेल। गहुमक खोती नै भऽ सकल। अन्नमे गहुमक खेती सभसँ महग खेती होइत। मुदा धान नै भेने कि‍सानक स्‍थि‍ति‍ बि‍गड़ि‍ गेल। एक तँ आेहि‍ना बरीसलालक स्‍थि‍ति‍ दू सालक दौड़-बरहामे वि‍गड़ि‍ गेल तइपर दही आरो बि‍गाड़ि‍ देलक। सालो भरि‍ बोरि‍ंग-दमकल बैसल रहि‍ गेल।

तरकारी खेतीक ओहन दशा बनि‍ गेल जे बजार नै। कच्‍चा सौदा, नष्‍ट होएत।

देखैत-देखैत सतासीक बाढ़ि‍ आ अट्ठासीक भूमकम आबि‍ गेल। जर-जर बसीसलाल फड़-फड़ करैत फड़फड़ा गेल। तही बीच बैंकक पक्षसँ जमीनक नि‍लामीक नोटि‍श भेटलै।
ति‍लकोरक तरूआ

जहि‍ना नमहर दोकानमे प्रवेश करि‍ते जीवनोपयोगी वस्‍तु देखि‍ मन उबि‍आए लगैत जे ईहो कीन लेब, आेहो कीन लेब। मुदा पाइयो आ वि‍चारो तँ ओतै रहैए जतए पहि‍नेसँ वि‍चार भेल अबैए। इच्‍छा रहि‍तो कि‍सुनलाल डेरामे डाइनिंग टेबुल नै लगा ओसारेपर अपनो दुनू परानी आ अति‍थि‍यो-अभ्‍यागतकेँ खुअबैत। कम दरमाहा साधारण जि‍नगी। शहरमे रहि‍तो गामक चालि‍-ढालि‍ बेसी, कारणो स्‍पष्‍ट जे शहरी बनैले शहरी जि‍नगी बनबए पड़ैत। जे ओहि‍ना नै पाइक हाथे बनैत। पाइयक काज मुँहसँ थोड़े होइ छै। भलहिं मुँहक आगू पाइक मोल जेहेन होइ। खास्‍ता कचौड़ी मुँहमे लाड़ैत-चाड़ैत गर लगबैत देवकान्‍त बजलाह-
आह, बुझलह कि‍ने कि‍सुनलाल कि‍छु होउ, दुनि‍याँ सात बेर कि‍अए ने उनटै-पुनटै मुदा अपना ऐठाम गामक जे ति‍लकाेरक तरूआ अछि‍, ओकर तुलना कतए हएत?”
देवकान्‍त भाइक बात सुनि‍ कि‍सुनलालक मनमे कनि‍यो हि‍लकोर नै उठलै। कि‍एक तँ मनमे यएह नाच होइत रहै जे डेरामे गौआँ एलाहेँ तँए ई नै अजस हुअए जे खेनाइयोमे ठकि‍ लेलक। नीक कि‍ दब भरि‍ पेट कहुना खाथि‍। जँ से नै हेतनि‍ तँ दसठाम बजताह जे खाइयो ले भरि‍ पेट नै देलक। तही बीच मनमे उठलै जे पूछि‍-पूछि‍ खुआएब नीक। जे कम-सँ-कम पहि‍लबेर तँ कहता जे हँ इच्‍छापूर्ण खेलौं आब कने अराम करैक ओरि‍यान करह आ तोहूँ सभ खा-पीअह, काज-उदम देखहक। दैन्‍य दृष्‍टि‍ये देखि‍ कि‍सुनलाल बाजल-
भाय सहाएब, खेबा जोकर बनल छै की नै। कहाँ खाइ छि‍ऐ चारि‍टा आरो नेने आबी?”
पहि‍लुक ढकार ढेकड़ैत देवकान्‍त उत्तर देलक-
अँए हौ, तँू हमरा राक्षस बूझै छह जे आगूमे एत्ते वस्‍तु ढेरि‍या देलह हेँ आ तइपर सँ परसन लइले कहै छह?”

जहि‍ना डारि‍मे लागल मचकीक पहि‍ल आस होइत तहि‍ना, कि‍सुनलालक मनमे आस जगि‍ते बाजल-
भाय सहाएब, कनि‍ये-कनि‍ये समान सभ परसै ले घरवालीकेँ कहने छलि‍ऐ। जेना-जेना भोजन करैत जेताह तेना-तेना परसि‍-परसि‍ दैत जेबनि‍।
तहसाना जकाँ तहि‍आएल भोजन पाबि‍ देवकान्‍त भाइक मन गदगदाएल। कि‍सुनलालक बात अंतो ने भेल छलै आकि‍ बि‍च्‍चेमे देवकान्‍त बाजि‍ उठलाह-
अँए हौ कि‍सुनलाल, तँू अनठि‍या बूझै छह। अपन घर छी जे खगत आकि‍ बेसी खाइक मन हएत ओ मांगि‍ कऽ लेब। तइले तोरा मनमे कि‍अए होइ छह जे भुखले उठि‍ जाएब। हम ओहन लोक नै ने छी जे खाइओ लेब आ दुसि‍यो देब।
तखने कि‍सुनलालकेँ पत्नी- सिंहेश्वरी हाथक इशारासँ शोर पाड़ि‍ कहलखि‍न-
ति‍लकोरक तरूआ दऽ भैया की कहलखि‍न?”
कि‍अए?” कि‍सुनलाल पुछलक।
ति‍लकोरक साग आ चटनी तँ खाइ छी, बनबैयोक लूरि‍ अछि‍ मुदा तरूआ नै खेने छी।

ओना सिंहेश्वरी देवकान्‍तसँ अढ़ भऽ कहैत मुदा बोलीमे एहेन टाँस देने जे देवकान्‍तो बुझथि‍न। साग आ चटनी सुनि‍ते मनमे उठलनि‍ जे साग तँ कत्ते दि‍न खेने छी। तहूमे जखन पेशाबक गड़बड़ी रहए तँ पथ्‍यमे यएह चलैए। मुदा चटनी तँ नै खेने छी। लाज-संकोच तँ ओकरा ने होइ छै जेकरा बूझि‍ पड़ै छै जे भारी छी। मुदा हम कोन भारी छी जँ भारी रहि‍तौं तँ बुझले रहैत। नै बूझल अछि‍ तँ बूझि‍ लेब कोन अधला हएत। जँ कहि‍यो खाइयेक मन हएत, बुझलेहे ने काज देत। अचार मुँहमे लैत मुँहक कर समेटि‍ कऽ घोटैत बजलाह-
कि‍सुन, ई की कोनो गाम-घर छी जे कनि‍याँ एत्ते संकोच करै छथि‍। एतै आबह कने एकटा बातो बुझैक अछि‍।
देवकान्‍तक बात सुनि‍ कि‍सुनलाल तँ ससरि‍ कऽ लगमे आबि‍ गेल। मुदा सिंहेश्वरी -पत्नी- कि‍छु आगू बढ़ि‍, कि‍छु पाछू दि‍स आबि‍ कऽ ठाढ़ भऽ गेलीह। जहि‍ना कोनो बच्‍चोसँ कोनो गप बुझए बेरमे रंग-रंगक प्रश्न, पूरक प्रश्न पूछि संतुष्‍ट होइत अछि‍। तहि‍ना देवकान्‍तोक मनमे होन्‍हि‍ जे कोनो बात‍ बूझैले सोझा-सोझी नीक होइ छै लजकोटर तँ बहुत बात छोड़ि‍ये दैत अछि‍ आ बहुत बि‍सरि‍यो जाइत अछि‍। दोखाह तँ दुनू भेल। अपनाकेँ नि‍च्‍चा उतरि‍ सिंहेश्वरीकेँ ऊपर चढ़बैत देवकान्‍त कहलखि‍न-
कनि‍याँ आइ ने कि‍सुनलाल दू-पाइ कमाएल हेँ तँ फुलपेंटो पहि‍रने देखै छि‍ऐ, मुदा जखन गाममे छल तखन तँ वएह एकटा चरि‍हत्थी गामछा छै। डाँड़मे लपेटने रहै छल। गप-सप्‍प करैमे कोनो-लाज-धाक नै हेबाक चाही। हम जे बुझै छि‍ऐ से अहूँ पूछू आ जे नै बुझै छि‍ऐ से हमहूँ कि‍अए ने पूछब। तइले लाज-संकोचक कोन काज छै।
कि‍सुनलाल- भाय सहाएब, कहैले तँ गाममे नै छी मुदा गामे जकाँ एतौ छी। ने ओते कमाइ होइए जे होटल घुमब, ज्‍वेलरी घुमब। बस डेरासँ कारखाना आ कारखानासँ डेरा अबै-जाइ छी। अठबारे -छुट्टी दि‍न- कनी-मनी घूमि‍ लइ छी सेहो पएरे।
पति‍क बात सुनि‍ सिंहेश्वरी पाछूसँ ससरि‍ कनी आगू बढ़ि‍ ति‍रछि‍या कऽ ठाढ़ भऽ बजलीह-
कि‍ कहलखि‍न?”
देवकान्‍त- कहलौं यएह जे ति‍लकोरक चटनी केना बनबै छि‍ऐ?”
देवकान्‍तक प्रश्न सुनि‍ सिंहेश्वरी बजलीह-
भैया, हि‍नका कि‍ कोनो नै बूझल हेतनि‍।
देवकान्‍त- कनि‍याँ, कोनो कि‍ हमरा जँचैक अछि‍, धरमागती कहै छी, नै बूझल अछि‍।
तइ बीच सामंजस्‍य करैत ि‍कसुनलाल बाजल-
भाय सहाएब, ओना हम तरूओ खेने छी, सागो खेने छी आ चटनि‍यो खेने छी। धीया-पुतामे पाकल ति‍लकोरक फड़ सेहो खेने छी। जाबे माए जीबैत रहए ताबे आन दि‍न तँ नहि‍ये मुदा जुरशीतल पाबनि‍मे ति‍लकोरक तरूआ अवस्‍से तड़ए। बड़ खर्चाक चीज छी। ओते खर्च कऽ खाएब असान थोड़े छै।
पति‍क सह पबि‍ते सि‍ंहेश्वरी बजलीह-
भैया, हमर माए-बाप बड़ गरीब छलाह। भरि‍ पेट अन्नो नै भेटैत छलनि‍ तखन जे तरूआ-बगहरूआक सेहन्‍ते करि‍तथि‍ से पार लगि‍तनि‍।
सि‍ंहेश्वरीक बात सुनि‍ मुड़ी डोलबैत देवकान्‍त बजलाह-
हँ, से तँ ठीके। हमहूँ की कोनो बेसी खेने छी। जहि‍या कहि‍यो घरदेखीमे कतौ जाइ छी तखन खाइ छी। सेहो आब उठाबे भेल जाइए। आब तँ सहजहि‍ लोक तेहेन चि‍कनि‍या भऽ गेल जे अल्‍लुऐक पाँचटा पूरा लइए। नवका तूर तँ खाइक कोन गप जे बुझबो ने करैत हेतइ। पात-पुत कहि थोड़े खाएत। अच्‍छा छोड़ू ऐ सभकेँ, असल बात तँ छुटले अछि‍।
वि‍चारक सामंजस्‍य पाबि‍ सि‍ंहेश्वरीक उत्‍साह जगलनि‍, बाजलीह‍-
भैया, साग तँ बुझले हेतनि‍ जहि‍ना कदीमा पात, अड़ि‍कंचन पातकेँ कत्तासँ काटि‍ भुजल जाइ छै तहि‍ना ति‍लकोरो पातक होइ छै।
हूँहकारी भरैत सि‍ंहेश्वरीक बातकेँ मानि‍ देवकान्‍त बजलाह-
हँ-हँ, ति‍लकोरक साग तँ केत्ता दि‍न खेने छी। मुदा चटनी नै।
जहि‍ना नव काज केने, नव जगहपर पहुँचने वा नव लोकसँ दोस्‍ती भेने मनमे खुशी होइत तहि‍ना दस बर्ख पहि‍लुका खेलहाक चरचा करैमे सि‍ंहेश्वरीकेँ सेहो मनमे खुशी उपकलनि‍। मुस्‍कुराइत बजलीह-
भैया, अड़ि‍कंचन पातकेँ कदीमा पात वा आन पातक तरमे दऽ पतौड़ा बना आगि‍मे पकौल जाइ छै, तहि‍ना ति‍लकोरो पातकेँ पकौल जाइ छै। जखन उपरका पात झड़कि‍ जाइ छै तखन बूझि‍ जाइऔ जे ति‍लकोरोक पात सीझ गेल हएत। ओकरा चुल्हि‍सँ नि‍कालि‍ चाहे पानि‍क वर्तनमे दऽ दि‍औ नै तँ कनीकाल सराइले छोड़ि‍ दि‍औ। जखन सरा जाएत तखन ओकरा पतौड़ासँ नि‍कालि‍ सि‍लौटपर थकुचि‍ कऽ पीसि‍ लि‍अ। बहुत मसल्‍लाक काजो नै पड़ै छै। चसगरसँ नून मि‍रचाइ दऽ दि‍औ। बस भऽ गेल। ओना लोक भातोमे खाइए मुदा रोटीक तँ बुझि‍औ जे जहि‍ना भातक दालि‍ तहि‍ना रोटीक ति‍लकोरक चटनी छी।
सि‍ंहेश्वरीक बात सुनि‍ तेसर ढकार ढेकरैत देवकान्‍त लोटा उठा पानि‍ पीबि‍ बजलाह-
कि‍सुनलाल, बहुत खेलि‍अह समानक आगू खेनि‍हार थोड़े ठठत। बड़ ओरि‍यान केने छेलह।
जहि‍ना नीक वि‍द्याथी बोर्ड वा युनि‍वर्सिटीमे टॉप केलोपर झुड़झुड़ाइत जे दुइयो प्रति‍शत नम्‍बर आरो रहैत तँ अस्‍सी प्रति‍शत पूरि‍ जइतए। तहि‍ना कि‍सुनलाल कहलकनि‍-
भाय सहाएब, कनि‍ओ आर खाइऔ।
आग्रह सुनि‍ देवकान्‍त बजलाह-
हम कि‍ कोनो राक्षस छी जे कतबो खाएब तँ पेटे ने भरत। मनुखक जे भोजन छि‍ऐ से तँ खेबे केलौं। तो नै अंदाज केलहक जे लोक कते खाइए। पेटेक कोन बात जे मनो भरि‍ गेल। अच्‍छा एकटा बात कहह जे अपन गौआँ के सभ ऐठाम, बम्‍बइमे रहै छथि‍?”
देकान्‍तक प्रश्न सुनि‍ कि‍सुनलाल मने-मन सोचए लगल बम्‍बइ सनक शहरमे के कतए रहैए ई भाँज तँ मात्र दुइये गोटोकेँ रहै छै। पहि‍ल जे काज नै करैए, दोसर जे कोनो कम्‍पनीक एजेंसी करैए। बाकीकेँ कोन जरूरत छै। अठबारे छुट्टी होइए तइमे कि‍ सभ करब। कपड़ा-लत्ता खींचब आकि‍‍ सप्‍ताह भरि‍क अधखड़ुआ नीन पुराएब, आकि‍ दुनू परानी मि‍लि‍ कोनो नव जगह देखि‍ लेब, आकि‍ भेँट-घाँट करब। तखन तँ ओहुना कि‍यो-ने-कि‍यो दर्शनीय जगहपर भेँट-घाँट भइये जाइ छथि‍। गाम-घरक हालो-चाल बूझि‍ लइ छी आ संग मि‍लि‍ चाहो-पान कऽ लइ छी। अपन मजबूरीकेँ छि‍पबैत कि‍सुनलाल बाजल-
भाय सहाएब, अहूँक जेठजन तँ परि‍वारे लऽ कऽ रहै छथि‍, हुनकासँ सभ भाँज लगि‍ जाएत। तखन हम एत्ते जरूर कहब जे जइ करखानामे काज करै छी‍ तइमे तीन गोटे छी। कहैले तँ उठे काज अछि‍ मुदा सभ दि‍न काजो लगैए आ एकेठाम सात दि‍नक पगारो भेटैए। तइमे रवि‍ दि‍नक सेहो भेटैए।
देवकान्‍त- अझुका तँ छुट्टी लि‍अए पड़ल हेतह?”
कि‍अए छुट्टी लि‍अए पड़त। कोनो कि‍ ओकर दरमाहाबला नोकरी करै छि‍ऐ। अझुका बदला रवि‍ दि‍न काज कऽ देबै। कोनो की स्‍कूल-आँफि‍स छी जे सोलहन्नी बन्न होइए। करखाना छि‍ऐ ने। सभ दि‍न चलि‍ते रहै छै।
परि‍वार कि‍अए गामसँ लऽ अनलहक ऐठामसँ कमे खर्चमे गामक परि‍वार चलैए?”
भाय सहाएब, अहूँ अनठा कऽ बजै छी। गाम-घरक लोकक कि‍रदानी नै देखै छी जे ताड़ी-दारू पीब-पीब कि‍ सभ कि‍रदानी करैए। अपन इज्‍जत अपने सोझामे नीको होइ छै आ लोक बचाइयो सकैए। तखन देखि‍यौ ज मनमे तँ अछि‍ये जे जखने गाममे रहै जोकर, कोनो काज ठाढ़ करै जोकर पूजी भऽ जाएत चलि‍ जाएब।
कते महीना बचै छह?”
एते दि‍न तँ बूझू जे कहुना कऽ गुजल केलौं मुदा आब छह माससँ गोटे महीना हजार रूपैया आ गोटे पनरहो सौ बचि‍ जाइए।
बैंकमे जमा करैत जाइ छह कि‍ने?”
बैक जाएब से छुट्टी होइए। एजेंट-फेजेंट तँ ढेरी अबैए मुदा ओकरा सबहक भाँजमे नै पड़ए-चाहै छी।
कमो पूजीसँ तँ गाममे काज चलै छै। बि‍नु पूजि‍योक चलै छै।
हँ से तँ चलै छै। जेकरा अपन कारोबार नै छै ओ दोसराक काज करैए। मुदा देखते छि‍ऐ जे कते बोनि‍ दइ छै। तहूमे आब कहुना-कहुना दुनू परानीमे आठ हजार महीना उठबै छी, ऐठाम महगी अछि‍ तँए कम बचैए। मुदा गाममे तँ कमसँ कम ओते कमाइ हुअए जे जहुना गुजर कटै छी तहुना पूरा सकी।
अपन कि‍ अन्‍दाज छह जे कते दि‍नमे पूरा लेबह?”
जँ भगवान नि‍केना रखलनि‍ तँ डेढ़-दू साल मे जरूर पूरि‍ जाएत। अहाँ भाय-सहाएब सबहक दोसरे दि‍न-दुनि‍याँ छन्‍हि‍।
भाय सहाएबक नाओं सुनि‍ते जहि‍ना भरल पेटक गरमी होइ छै तहि‍ना देवकान्‍तकेँ फूकि‍ देलकनि‍। मुदा अपनाकेँ सम्‍हारैत बजलाह-
सुथनी भाय-सहाएब। मन भेल जे कनी बमै देखी, दरभंगामे टि‍कट कटेलौं चलि‍ एलौं। तोहर नाओं-ठेकान लऽ लेने रहि‍हह। तँए तोरा डेरापर चलि‍ एलौं। भाइये छि‍आह तँ कि‍ ओइसँ सतरह-बर नीक तँू छह। कम-सँ-कम समाज बूझि‍ तँ सुआगत केलह।
अपन प्रशंसाा सुनि‍ कि‍सुनलाल वि‍ह्वल भऽ गेल। बाजल-
भाय सहाएब, ओते तँ कमाइये ने अछि जे‍ अइल-फइलसँ खर्च करब मुदा समाजक जँ कि‍यो डेरापर औताह तँ अनका जकाँ मुँह नै घुमा लेब।
कि‍सुनलालक सह पबैत देवकान्‍त बजलाह-
कि‍सुनलाल परि‍वारे सभ कोकणि‍ गेल तँ समाज केहेन हएत। मुदा तँए सोलहो आना परि‍वार कोकणि‍ये गेल सेहो बात नइए। जाबे धरतीपर धरम नै छै ताबे चलै केना-ए‍।
कि‍सुनलाल- भाय सहाएबक भेँट करबनि‍ की नै?”
मन तँ एको पाइ नै अछि‍ मुदा जखन ऐठाम आबि‍ गेलौं तखन नहि‍यो भेँट करब उचि‍त नहि‍ये हएत। तोरा तँ हुनकर मोबाइल नम्‍बर बूझल हेतह कि‍ने?”
हँ से तँ लि‍खल अछि‍। मुदा मोबाइल अपना कहाँ अछि‍?”
बुथपर सँ तोहीं कहि‍ दहुन जे देवकान्‍त गामसँ ऐला अछि‍। जँ गप करए चाहता तँ अपने कहथुन नै तँ जानकारी तँ भेटि‍ये जेतनि‍।
भायपर बि‍गड़ल देखि‍ सि‍ंहेश्वरी देवकान्‍तकेँ पुछलकनि‍-
भैया, एना खि‍सि‍आएल कि‍अए छथि‍न?”
देवकान्‍त- कनि‍याँ, की कहब कहैले तँ पाइ-कौड़ीबला कहबै छथि‍। तहि‍ना घरक घरोवाली छथि‍न। अपना तँ कनी-मनी कुल-खनदानक लाजो होइ छन्‍हि‍ मुदा घरवाली जे छथि‍न से तँ भगवाने देल छथि‍न।‍
सि‍ंहेश्वरी- जखन अपने नीक छथि‍ तखन हुनका घरवालीसँ कोन मतलब छन्‍हि‍?”
देवकान्‍त- मतलब पुछै छी। की कहब, बजि‍तो लाज होइए जे एके परि‍वारक छी तखन एना कि‍अए बजै छी। मुदा नहि‍यो बाजब सेहो तँ गलति‍ये हएत। अपने जे भाय सहाएब छथि‍ से मरदे-ने-मौगि‍ये, बलि‍गोबना छथि‍। जहाँ कि‍छु बाजए लगताह आ पत्नीक आँखि‍पर नजरि‍ पड़तनि‍ आकि‍ बोलि‍ये बदलि‍ जाइ छन्‍हि‍।

~
फाँसी

काल्हि‍ बारह बजे बलदेवकेँ फाँसी हएत, रेडि‍यो-अखबार कान-कान जना देलक अछि‍। जहि‍ना बलदेव बुझैत तहि‍ना जहलक उत्तराधि‍कारि‍यो बुझैत अछि‍। जहि‍ना बलदेवक परि‍वार बुझैत अछि‍ तहि‍ना सर-समाज, दोस-महि‍म सेहो बुझैत अछि‍। सबहक मन बारह बजेपर अॅटकल। वएह बारह बजे दि‍न वा राति‍ अपन प्रखर रूपमे दि‍शा दि‍स मैदानक रस्‍ता धड़ैत अछि‍।

जहलक एक नंबर सेल घर। जे घर ओइ अपराधीकेँ ओइ बीच भेटैत अछि‍ जखन न्‍यायालयसँ फाँसीक ति‍थि‍ ि‍नर्धारि‍त होइत अछि‍। सेलक बुनाबटि‍यो, आन सेलो आ वार्डोसँ भि‍न्न बनल अछि‍। ओना सेलक बुनाबटि‍ वि‍चि‍त्र अछि‍ मुदा आनसँ अलग तँ अछि‍ये। कोठरीनुमा घर, कोठरि‍येक आँट-पेट सेहो अछि‍। एक कोठरी ओहन होइत जे नमहर घरमे बनैत आ एक कोठरी ओहन होइत जे घरे कहबैत अछि‍। एक नंबर सेलो तहि‍ना बनल अछि‍। चि‍मनीक एक नम्‍बर ईंट, क्‍यूल-लक्‍खीसरायक बीचक पथराएल बालु, दू-एक सि‍मटीक जोड़सँ देबाल बनल अछि‍। सात एस्‍क्‍वाइर फुटक घर, जे घरक कोठरीओसँ हीने अछि‍। पौने दू फुट आगूक दरबज्‍जा, खि‍ड़की दरबज्‍जा नै, जे भीतर-बाहर अबैत-जाइत अछि‍। लोहाक बनल केबाड़ लगल अछि‍। शेष कोनो देवालमे ने खि‍ड़की-खोलि‍या अछि‍ आ ने पूब-पछि‍म दि‍शा देखबैक कोनो दोसर साधन अछि‍। एक तँ ओहुना जइठाम सभ कि‍छु -दि‍शा-वोधक- रहैत अछि‍ तहूठाम दि‍शान्‍स लगि‍ जाइ छै। आ पूबकेँ पछि‍म, पछि‍मकेँ पूब कहए लगै छै। जि‍नगीक पूर्ण लीला बलदेवकेँ ओइ कोठरीनुमा घरमे पनरह दि‍नसँ होइत अछि‍। ओना तइसँ पूर्वो -१५ दि‍नसँ पहि‍ने- सेहो सात नम्‍बर सेलमे तीन सालसँ रहैत आबि‍ रहल अछि‍।

ओना एक नंबर सेलमे एलापर एतेक सुवि‍धा जरूर भेट गेल छलै जे पहि‍नेसँ नीक भोजन, नीक ओढ़ना-बि‍छौना भेट‍ गेल छलैक। भलहि‍ं घरमे नेहि‍ये बि‍जलीक तार आ ने बाैल लागल मुदा दरबज्‍जा सोझे एहन बाैल लागल छलै जइसँ कोठरि‍योक भीतर इजोत पहुँचैत छल। मुदा कोठरीक बाहर स्‍पेशल सि‍पाहीक बेवस्‍था सेहो भऽ गेलै।
बारह बजे राति‍क घंटी टावरक मुरेड़ापर बाजल। राति‍-दि‍नक पाशा बदलैक समए भऽ गेल। जहि‍ना भूत-वर्तमान आ वर्तमान भवि‍ष्‍यमे बदलैत अछि‍ सएह मुहूर्त अछि‍। राति‍-दि‍नक बाट पकड़त मुदा दूत-भूत एतेक प्रबल जे आरो बेसी उग्र बनैत अछि‍। जहि‍ना राति‍क जनमल बच्‍चा दि‍नेक होइत तहि‍ना बलदेवक राति‍ सेहो दि‍ने भऽ गेलै। राति‍-दि‍न भऽ गेलैक आकि‍ नि‍नि‍ये देवी वि‍ध्‍नवादि‍नीक संग डरे पड़ा गेलखि‍न, से नै कहि‍। ओछाइनपर पड़ल बलदेव उठि‍ कऽ बैस कोठरीक चारू देवाल दि‍स तकलक। अन्‍हारमे सभ हराएल बूझि‍ पड़ल, कि‍एक तँ बाहरक बि‍जलीक इजोत सेहो अन्‍हार चद्दरि‍ ओढ़ि‍ ओहन भऽ गेल जे अपनो भरि‍ नै देखि‍ पड़ैत। देह दि‍स तकलक। हाथ-हाथ नै सुझैत‍, बलदेव अजमा कऽ घरक मुँह लग ससरि‍ कऽ पहुँचल। हाथ बढ़ा देखलक तँ बूझि‍ पड़लै जे यएह घरक मुँह छी। घरक मुँह देखि‍ मनमे बि‍सवास जगलै जे ऐठामसँ अन्‍हार-इजोतक सभ कि‍छु देखब। हि‍या कऽ बि‍जली खूॅटामे लटकल बौलपर नजरि‍ देलक। मरि‍याएल इजोत तइपर असंख्‍यो मच्‍छर-माछी जान गमबैले तैयार नाचि‍ रहल अछि‍। खूॅटापर गि‍रगीटक झुंड। मुँह बाबि‍ खाइले तैयार आसन लगौने अछि‍। नि‍च्‍चामे बेंगक जेर कुदैत। तइ बीच मच्‍छरक जेर‍ गीत गबैत फाटक टपि‍ भीतर पहुँचल। मुदा बलदेवक धि‍यान मच्‍छरपर नै गेल। जहि‍ना शरीरमे अनेको रोग रहलापर बड़का रोग छोटकाकेँ चापि‍ रखैत तहि‍ना बलदेव बाहरक मच्‍छरक भोगकेँ दाबि‍ देलक। केना नै दाबैत, जइठाम जि‍नगीक खूनक कोनो महत नै तइठाम मच्‍छर कत्ते पीबे करत। मुदा तहूसँ बेसी बलदेवक मनमे जागि‍ गेल जे जखन बारह बजे अन्‍ते भऽ रहल छी तइ बीच जँ कनि‍यो उपकार दोसरक भऽ जाइ छै तँ ओहो धर्मे छी कि‍ ने? बलदेवक मनमे पनपए लगलै।
तखने पएर दाबि‍ सि‍पाहीक झुंड सेलक चारूकात चक्कर कटए लगल। अन्‍हारमे सभ हराएल। पएरक धमकसँ बलदेव बूझि‍ गेल। जहि‍ना गाए-महि‍ंस मनुक्‍खक संग कुत्तो-बि‍लाइक चालि‍ अन्‍हारोमे परेखि‍ लैत तहि‍ना बलदेवो परेखि‍लक। मुदा सभ चुप्प। बलदेवक मनमे उठलै, जब कि‍ बारह बजेमे फाॅसि‍येपर चढ़ब तखन कि‍अए एते ओगरबाहि‍क जरूरति‍ छै। एक तँ ओहि‍ना बड़का छहर-देबालीक बीच जेल बनल छै, तइ बीच वार्ड-सेल बनल छै, तइ बीच एते ओगरबाहि‍क कोन जरूरति‍ छै। मुदा लगले वि‍चार बदलि‍ गेलै। वार्ड सभक कैदी तँ अबैत-जाइत रहैए। सभ दि‍न दू-चारि‍ एबो करैए आ नि‍कलबो करैए। मुदा हम तँ आब नि‍कलि‍ नै पाएब। नि‍कलबे नै करब आ कि‍ जि‍नगि‍ये अंत भऽ रहल अछि‍। आँखि‍ उठा आगू तकलक तँ बूझि‍ पड़लै जे साल-महि‍नाक कोन गप जे मात्र कि‍छु घंटाक लेल छी। जइ दि‍न फाँसीक आदेश न्‍यायालयसँ भेल ओही दि‍न कि‍अए ने फाँसि‍यो भऽ गेल। अनेरे कोन सोग-सन्‍ताप देखै-भोगैले पनरह दि‍न जीआ कऽ राखल गेल अछि‍। मन शान्‍त केलक। शान्‍त होइते, जहि‍ना पोखरि‍क अगम पानि‍केँ पूर्बा-पछबा हवा डोलबैत रहैए तहि‍ना मन डोललै। डोलि‍ते उठलै, फाँसी कि‍अए हएत? प्रश्नपर नजरि‍ अॅटकि‍ते उठलै जे फाँसीपर सपूत-कपूत दुनू चढ़ैए। फेर उठलै जे तइ सपूत-कपूतमे हम की छी?

अन्‍हर उठैसँ पहि‍ने जहि‍ना हवा खसि‍ पड़ैत अछि‍, वायुमंडल शान्‍त भऽ जाइत अछि‍ तहि‍ना बलदेवक मन सेहो शान्‍त भऽ गेलै। कोनो तरहक तरंग नै। मुदा लगले मनमे उठलै जे जि‍नगीक अंति‍म सीमापर पहुँच‍ गेल छी। जहि‍ना गामक सीमा टपि‍ते दोसर गाम आबि‍ जाइत अछि‍ तहि‍ना जीवनलोकसँ मृत्‍युलोक चलि‍ जाएब। मुदा एते तँ हेबे करत जे अखन ठेकानल जि‍नगी अछि‍ पछाति‍ बेठेकानलमे पहुँचि‍ जाएब। फेर उठलै, जीवनलोक तँ खाली मृत्‍युक लोक नै छी। जीवनो तँ लोक छी। जहि‍ना कोनो जंगलसँ पड़ाएल जानवर दोसर जंगलक सीमापर पहुँचते चारूकात नजरि‍ उठा कऽ देखैत जे रहै जोकर अछि‍ वा नै, तहि‍ना जीवन-मृत्‍युक सीमापर बलदेवक मन अॅटकि‍ गेलै। धरतीपर जहि‍ना एक-दि‍शासँ दोसर दि‍स बहैत धार रास्‍ताकेँ बाधि‍त कऽ दैत तहि‍ना बलदेवकेँ जीवन धार बाधि‍त कऽ देलक। आगू टपैक आशा नै देखि‍ बलदेव बामा-दहि‍ना दि‍शा पकड़ैत वि‍चार केलक। एक दि‍स पहाड़सँ नि‍कलैत धार धरती टपैत समुद्रमे मि‍लैत तँ दोसर धरती टपि‍ समुद्रमे मि‍लैत। आगू तँ कि‍छु घंटा शेष अछि‍ मुदा पाछू तँ सौंसे जि‍नगी पड़ल अछि‍। कि‍ एक बेरक फाँसी फाँसी, छी आकि‍ फाँस चढ़ल जि‍नगीक फँसरी फाँसी छी। मन ठमकि‍ गेलै। मुदा लगले मनमे उठलै जे गुमसुम भऽ समए काटब नीक नै। कत्तेकाल पहि‍ने बारह बजेक घंटी बजल। जहि‍ना धरतीपर आएल बच्‍चा आस्‍ते-आस्‍ते सकताए लगैत तहि‍ना बलदेवक मन सेहो सकताए लगलै। मन पड़लै पनरह दि‍न पहि‍लुका फाँसीक सजए। मनमे खौंझ उठलै जखन फाँसीक आदेश भेल तखन फेर पनरह दि‍न जहल कि‍अए भेल? कोन अपराधक फल भेटल। जौं ओही दि‍न फाँसी भऽ जाइत तँ पनरह दि‍न जे सोग-सन्‍ताप भेल से तँ नै होइताए। ततबे नै अपनो ऊपर अनेरे भार कि‍अए बढ़ौलक? फेर मनमे उठलै जे अनेरे ओझराइ छी। मन शान्‍त केलक। शान्‍त होइते मनमे उपकलै, सपूत बनि‍ दुनि‍याँ छोड़ब आ कि‍ कपूत बनि‍। कि‍यो हि‍लसैत, पुलसैत दुनि‍याँ छोड़ैए आ कि‍यो वि‍लखैत, डुमैत दुनि‍याँ छोड़ैए। मुदा जे हि‍लसैत-फुलसैत छोड़ैए ओ छोड़ैत कहाँ अछि‍? ओ तँ जीवात्‍माकेँ एहेन चुहुटि‍ कऽ पकड़ैत अछि‍ जे छोड़ौनौं नै छुटैत अछि‍। मुदा हम तँ से नै छी। फेर मन घुमलै। दुनि‍याँ बड़ीटा अछि..,‍ बड़ छोट अछि‍...।
बड़ीटा ओकरा लेल छै जे बरी पाबए चाहैए। मुदा बरी तँ भोजोक अंति‍म पराव नै, घरक मध्‍य सेहो छी। तखन कि‍अए ओकरा लि‍अ चाहैए। फेर मन ठमकि‍ गेलै। अनेरे अछाहे कुकुड़ भूकब नीक नै। अपनो तँ संसार अछि‍। जइमे अकास-पताल, चान-सूर्ज, नदी-सरोवर सभ कि‍छु अछि‍। तखन अपन छोड़ि‍ दोसराक देखब अपनासँ दूर हएब हएत। अपन कर्म, अपन धर्मक मर्म बुझब उचि‍त हएत। जाबे से बूझि‍ दुनि‍याँक रंगमंचमे नै उतरब ताबे कौआ कान नेने जाइए, तइ पाछू दौगब हएत। अपन रंगमंच आ अपन अभि‍नय लग अबि‍ते मन ठमकि‍ कऽ ठाढ़ भऽ गेलै। ठाढ़ होइते अनायास मनमे उठलै। अभि‍नाइयो तँ देखि‍नि‍हारोक लेल आ संसारोक लेल रंग-बि‍रंगक, कतेक स्‍तरक होइत अछि‍। मुदा कहल तँ अभि‍नाइये जाइ छै। कि‍यो लीला रचि‍ अभि‍नय करैत, तँ कि‍यो गुण-गुणाइत अभि‍नय करैए। कि‍यो मूक भऽ करैत अछि‍ तँ कि‍यो प्रेमावेशमे करैत अछि‍। केना एकरा बि‍‍लगाएब? एक दि‍स चि‍त्र-वि‍चि‍त्र बनल अछि‍ तँ दोसर दि‍स कुचि‍त्र सेहो बनल अछि‍। ओझराइत मन झमान भऽ झमा उठलै। अनेरे ओझड़ेने समए ससरि‍ जाएत। गनल कुटि‍या नापल झोर जकाँ समए बचल अछि‍, तेकरा जौं ओझरौठेमे राखब सेहो नीक नै। बारह बजेक घंटी कतेखान पहि‍ने बाजि‍ चुकल अछि‍। हाथमे जौं घड़ी रहैत तँ ठीक-ठीक समैयोक बोध होइत, सेहो नहि‍ये अछि‍। जइ दि‍न जेलमे प्रवेश केलौं तेही दि‍न जहलक मुँहपर जमा कऽ लेलक। जइ दि‍न नि‍कलब तइ दि‍न देत। मुदा नि‍कलब कहि‍या? आइ तँ फाँसि‍येपर लटकि‍ जि‍नगीक वि‍सर्जन करब तखन घड़ी केना लेब आ पहि‍र कऽ समए बुझब? मुदा तँए कि‍ जइ गाममे मुर्गी नै रहै छै तइ गाममे भोर नै होइ छै? पाँच-दस मि‍नट आगू-पाछू, अनुमान तँ कऽ सकै छी। मुदा काजक संग जे समए चलैए ओकर अनुभव आ बि‍नु काजक अनुभवोमे तँ अन्‍तर होइते अछि‍। काजक दौड़क अनुभव बेसी बढ़ि‍याँ होइत अछि‍। कि‍एक तँ काजक संग समए सटि‍ चलैत अछि‍। मुदा हमरा तँ सेहो ने अछि‍। बस दू बेर खाइ छी, ढेंग जकाँ ओंघराएल पड़ल रहै छी। कखन जागल रहै छी आकि‍ सूतल रहै छी, से आनक कोन बात जे अपनो नै बूझि‍ पबै छी। पछतेनौं तँ कि‍छु ने भेटत। फेर मनमे उठलै- फाँसी कि‍अए?
कि‍छु समए गुम्‍म रहलाक पछाति‍ अनायास मनमे उठलै जौं भक्‍ति‍-भावसँ समए कटने रहि‍तौं तँ हँसी-खुशीसँ चढ़ि‍तौं, से नै केलौं तँ कुहरि‍-कलपि‍ चढ़ब। जहि‍ना शक्‍ति‍क स्रोत ज्ञान छी तहि‍ना ने भक्‍ति‍क स्रोत श्रमो छी। फेर मन ठमकलै। जौं भक्‍ति‍क स्रोत श्रम छी तँ हमहूँ तँ श्रमि‍क छि‍हे। जौं से नै रहि‍तौं तँ एत्ते खेल केना केलौं। अचताइत-पचताइत मुँहसँ नि‍कललै। से तँ जरूर केलौं। एक पसीना पत्‍थर तोड़ैमे चुबैए, दोसर पत्‍थर बनबैमे चुबैए। हँ से तँ दुनूमे चुबैए। मुदा कि‍ दुनूक मि‍ठास एक्के रंग छै? से तँ नै छै। तखन श्रम -सेवा- केकरा कहबै? फेर बलदेवक मन ठमकि‍ नजरि‍ उठा-उठा चौकन्ना होइत चारू दि‍स तकए लगल। मुदा अन्‍हारमे कि‍छु देखबे ने करए। मनमे उठलै, अनेरे श्रमक पाछू बौआइ छी। गेल जमाना फेर नै लौटए। आब तँ जि‍नगीक अंति‍म खाड़ीपर चलि‍ एलौं। ने श्रमि‍क छी आ ने श्रमक सि‍रजन कर्ता। अनेरे अनका पाछू बौआए रहल छी। सभकेँ अपन-अपन जि‍नगी छै। अपन-अपन जगह छै, जे समैयोक आ प्रकृतोक प्रभावसँ प्रभावि‍त होइत रहै छै तँए अपन बात जेना लोक अपने बुझैत अछि‍ तेना आन थोड़े बूझत। चारू दि‍ससँ घुमैत-फि‍ड़ैत मन अपना लग बलदेवकेँ एलै। मनमे खौंझ उठलै। यएह मन छी जेकर कि‍रदानीसँ कि‍यो भगवान बनि‍ जाइए आ कि‍यो हत्‍यारा बनि‍ दुनि‍याँक सोझामे फाँसीपर लटकि‍ जाइए। मुदा कहबै केकरा आ सुनत के? मन ठमकलै। हत्‍यारा के? हत्‍या की? आ के पैदा करैए? जहि‍ना कम माछी-मच्‍छर रहने खेबो काल आ सूतबो काल ओते परेशानी नै होइत जते अधि‍क रहने होइत। बलदेवक मन फेर ओझरा गेलै। ओझरी छुटि‍ते अपनापर ग्‍लानि‍ हुअए लगलै। हमहूँ तँ दुनि‍याँक चुनल अपराधीमे छी। जि‍नगी भरि‍ अपनेमे बेहाल रहलौं मुदा बेहाले केना रहि‍ गेलौं, से कहाँ बूझि‍ पेलौं। जहि‍ना धरतीकेँ बेहाल भेने सृजन शक्‍ति‍ कमि‍ जाइ छै तहि‍ना ने हमरो भेल। मन उफनि‍ गेलै। चि‍चि‍आइत बाजल-
हम अपराधी छी, अपराध केने छी। डकैतीक संग हत्‍या केने छी। अखने हमरा फाँसी हुअए?”
पि‍तोक मास्‍चर्य ओइ बेटासँ ओही दि‍नसँ कमए लगै छै जइ दि‍न सुपात्र कुपात्र दि‍स जाइत देखै छै। तहि‍ना बलदेवक कलपैत आत्‍मा मनसँ हटि‍ रहल छै। अनधुन मुँह पटकि‍ रहल छै। अपराधी छी, अपराध केलौं। एक अपराध नै, अनेको, एक दि‍न नै जि‍नगीयो भरि‍। बहुत वि‍लमि‍ कऽ फाँसी भऽ रहल अछि‍। बहुत पहि‍नहि‍ भऽ जाइक चाहै छल। मुदा भेल कि‍अए नै?
एकाएक मुँहमे पर्दा लगल हुमड़ैत मन पाछू दि‍स ससरलै। अंति‍म हत्‍या आ डकैतीक फल फाँसी छी, मुदा आरो जे जि‍नगी भरि‍ केलौं, तेकर की‍ भेल?
मध्‍यमासक स्‍नान जहि‍ना आन मासक स्‍नानसँ अधि‍क सुन्‍दर, अधि‍क शीतल होइत तहि‍ना जि‍नगीक अपराधक बीच बलदेवक मन अॅटकि‍ गेलै। एक दि‍स जि‍नगी दोसर दि‍स अपराध। शीतल भेल शान्‍त मनमे उठलै, कि‍ हमर जन्‍म अपराधि‍ये बनैक लेल भेल छल जे अपराधीक जि‍नगी बि‍‍तेलौं। मुदा बुझि‍यो कहाँ पेलौं जे अपराध करै छी, अपराधी बनै छी। ओझराइत मनकेँ सोझरबैत बलदेव जि‍नगीक एक-एक दि‍न आ एक-एक घटना मोन पाड़ए लगल। मुँहसँ नि‍कललै-
अपन जि‍नगीक बात जत्ते अपना मनमे अछि‍ ओत्ते थोड़े दोसराकेँ हेतइ। ि‍सर्फ हत्‍ये-लूट टा तँ नै केने छी, माए-बहि‍नि‍क संबंध सेहो तोड़ने छी।
मन कलपि‍ कऽ बजलै-
एकबेर नै हजार बेर फाँसी हेबाक चाही।
मन बेकल हुअए लगलै। केकरा ले केलौं? ई बात मनमे उठि‍ते धि‍यान परि‍वार दि‍स बढ़लै। अंति‍म दि‍न पत्नी आ बेटाक दर्शन हएत? ओ सभ बेचैनीसँ भेँट करए जरूर औत। मुदा कि‍ जहि‍ना परि‍वारमे भेँट होइत छल तहि‍ना हएत? से केना हएत? सि‍पाहीक घेरावंदीमे हम रहब आ ओ सभ हटि‍ कऽ कातमे ठाढ़ रहत। मन घुमलै। अनेरे कि‍अए कि‍यो भेँट करए औत? कोन मुँह देखत आ कोन देखौत। तइसँ नीक जे भने हमहूँ हराएल छी आ ओहो सभ हराएले रहए। दुनि‍याँक सभ तँ नै ने चि‍न्‍हतै-जनतै। जौं समाजमे लोक ओंगरी देखौते तँ समाज छोड़ि‍ दोसर समाजमे चलि‍ जाएत। जखने एक समाजसँ दोसर समाजमे जाइए तखने पछि‍ला समाजक बान्‍ह टूटि‍ जाइ छै। बान्‍हक भीतर बनल समाज अपन हि‍तक बात सौचैए। मुदा समाज तँ समुद्र छी, जइमे घोंघा-घोंघीसँ लऽ कऽ गोहि‍-गमार तक छै। बलदेवक मन ठमकि‍ गेल।

जहि‍ना जन्‍म-जन्‍मान्‍तरसँ वा कुरीति‍-कुसमए पाबि‍ बाँसक छाँहमे जनमल लतामक गाछ सेहो समए पाबि‍ कलशि‍ जाइत तहि‍ना बलदेवक मन कलशल। अबोध बच्‍चाक हाथसँ गि‍रल अइना, माए-बापक दुख जकाँ नै मुदा तैयो टुकड़ी बीछि‍-बीछि‍ जोड़ैक कोशि‍श करैत अछि‍ तहि‍ना बलदेवक कलशल मनमे उपकलै। तीन बर्ख जहल एला भऽ गेल। राता-राती घरसँ पकड़ा बन्‍दूकक हाथे जहल आएल रही। नव-नव लोक, नव-नव जगहसँ भेँट भेल। जहि‍ना देशक मि‍थि‍लांचलोक वासी दुनि‍याँक कोण-कोणक बीच बसि‍ अपन पूर्ब परि‍वारक स्‍मरण करै छथि‍ तहि‍ना बलदेवक मनमे परि‍वार सेहो आएल। मुदा लगले जहलक परि‍वार अगुआ गेलै। एक-फाटक टपि‍ दोसरमे घेराएल रही। तलाशीक संग सभ कि‍छु घेरा गेल। बाहरसँ आओत नै अपने घेराइये गेलौं। मुदा तैयो नव-नव चेहरासँ भेँट भेल। भीतर अबि‍ते -वार्डमे- घूस्‍सा-मुक्काक सलामी भेल। जहि‍ना अखड़ाहापर उतरैत खलीफाकेँ पानि‍ उतरए लगैत तहि‍ना उतरल। जि‍नगीक पहि‍ल बेर जहल देखलौं। स्‍वागतक बाद मेट लग पहुँचाओल गेलौं। अखड़ाहा बदलने खलीफाक पानि‍यो बदलि‍ जाइ छै। मुदा.....। मेटक रजि‍ष्‍टरमे नाओं चढ़ि‍ते ढेर हुकुम एक संग उठल। झाड़ू लगबैक ड्यूटी, पैखानामे पानि‍ पहुँचाबैक ड्यूटी इत्‍यादि‍-इत्‍यादि‍। काजक भारसँ मन दबाइत जा रहल छल आ कि‍ मसलनपर पसरल मेटक हुकुम भेल-
एम्‍हर आ, पहि‍ने जाँत तखन दोसर काज हेतइ।
अवग्रहमे फँसल मन हल्लुक भेल। मनमे खुशी उपकल जे कनि‍यो-कनि‍यो कान ऐंठैत तँ काने उखड़ि‍ जइतए। जान बचल तँ लाख उपाइ। एक करोट घूमैत मेटक मैनजन बाजल-
पहि‍ल दि‍न छि‍औ, आइ तोरा खेनाइ नै भेटतौ।
जहि‍ना मुर्दापर अस्‍सी मनसँ नब्‍बे मन जारनि‍ चढ़ि‍ जाइए तहि‍ना चढ़ि‍ गेल। असबि‍सो नै कऽ सकलौं। मुदा तैयो सबुर भेल जे नै खाइले देत, सुतैक तँ जगह भेट गेल कि‍ ने। तइ बीच मैनजनक हुकुम भेल-
कोन केसमे एलेहेँ?”
केसक नाओं सूनि‍ मन दलदल भऽ गेल। जहि‍ना सोग-पीड़ामे नोर बहा केकरो सान्‍त्‍वना दैत काल होइत, तहि‍ना। जहलसँ नि‍कलैक आशाक अँकुर बलदेवकेँ जगलै। हलसि‍ कऽ बाजल-
सरकार, डकैती आ खून संगे छै।
डकैतीक संग खून सूनि‍ मेटक मन ठमकल। अधि‍क दि‍नक संगी हएत। तँए दोसति‍ये करब नीक। पड़ले-पड़ल हुकुम चलौलक-
नवका कैदीकेँ खइयो आ सूतैयो ले दि‍हक।

जहि‍ना जि‍नगीक सुख, खाएब-सूतबमे अबै छै तहि‍ना सूतबक आश देखि‍ बलदेवक मनमे खुशी उपकलै। खुशी उपकि‍ते मन बौआए लगलै। तही बीच मेटक मुँहसँ फुटलै-
तेलक शीशी छेबे करौ, काल्हि‍सँ गोदामे सँ लऽ लऽ अनि‍हेँ।
गोदामक नाओं सुनि‍ते वार्डमे गल-गूल शुरू भेल।
नवका कैदीकेँ गोदाम केना जाए देब। ई अन्‍याय छी।
एक कैदी ठीकेदारकेँ पुछलक-
कि‍ बात छि‍ऐ हौ ठीकेदार भैया? एना कि‍अए हड़बि‍र्ड़ो केने छह?”
ठीकेदार बाजल-
तूँ अखन तड़ी-घटी नै बुझबि‍ही।
से कि‍अए हौ भैया, सुनने लोक सुनबो करैए आ नहि‍यो सुनैए। बुझौने लोक बुझबो करैए आ नहि‍यो बुझैए। पहि‍ने बजबहक तब ने?”
रौ बूड़ि‍बक, सभ गप सभठीम बाजब नीक थोड़े होइ छै। नीको अधला भऽ जाइ छै आ अधलो नीक भऽ जाइ छै।
एकबेर अजमा कऽ देखहक। नरकोमे ठेलम-ठेल करै छह। बहरामे लोक कि‍छु करैए तँ भीतर -जहल- अबैए। ऐठामसँ कतए जाएत। बाजह, तोरा कि‍ बूझि‍ पड़ै छह जे हम ओहि‍ना आएल छी। आकि‍ कि‍छु कए कऽ आएल छी।

ठीकेदारक बढ़ैत संगी देखि‍ कठहँसी हँसि‍ मेट बाजल-
कि‍ रे ठीकेदरबा, कथीक बमकी धेने छौ। सुन....।
एक दि‍सि‍ ठीकेदारकेँ अपन घटैत आमदनी मनमे नचैत तँ दोसर दि‍सि‍ मेटक आदेश। घुसुकि‍ कऽ ठीकेदार लगमे आबि‍ फुसफुसा कऽ बाजल-
मेट भैया, अहाँसँ कि‍ कोनो बात छि‍पल रहैए। बुझि‍ते छि‍ऐ जे दू पाइ बचा कऽ गाम पठबै छी।

ठीकेदारक बातसँ मेटक मनक आगि‍ नै ठंढ़ाएल। मुदा हवाक लहकी जकाँ जरूर लागल। मनमे उठलै दस लंठ तखन ने महंथ, जँ से नै तँ असगर वरसपति‍यो फूसि‍। जहि‍ना गुलाबी लाल आल-अड़हुल बनि‍ जाइत, रंग बदलि‍ अपराजि‍त उज्‍जर-कारी बनि‍ जाइत, दि‍न-राति‍क खेलमे पूर्णिमा अमावस्‍या आ अमावस्‍या पूनो बनि‍ जाइए तहि‍ना बलदेवक मनमे जि‍नगीक जुआरि‍ उठए लगलै। मुदा बि‍ना जारनक आगि‍ जहि‍ना, पि‍यासल बि‍नु पानि‍ जहि‍ना, खेति‍हर बि‍नु खेत जहि‍ना शक्‍ति‍ रहि‍तो हीनशक्ति‍का बनि‍ जाइत अछि‍ तहि‍ना जि‍नगीकेँ सुता कऽ राखब छी। मुदा प्रश्नो तँ अजनव अछि‍। नीक भोजन, नीक नीन इन्‍द्रासनक मुख्‍य द्वार छी, तखन जि‍नगी....?
जि‍नगीक आवश्‍यक तत्वमे सूतबो -नीन- तँ अनि‍वार्य छी। तखन अधला केना भेल? मुदा जखन दस कोठरी बहारैक, साफ करैक भार रहत तखन एक्के कोठरी बहारबो तँ उचि‍त नै। मेटक मन ठमकल। ने आगूक बाट देखै आ ने पाछू घूमि‍ ताकब नीक बुझै। मनमे पुन: उठलै, कि‍यो जोग क्रि‍यामे जोगी बनि‍ जोगि‍या जाइत अछि‍, कि‍यो भोगी बनि‍ भोगि‍या जाइत अछि‍ तहि‍ना तँ कि‍यो काजोमे कजि‍या जाइए। मुदा कज्‍जी भेने तँ अबाहो भइये जाइए। जइठाम नि‍रोगक बलि‍ प्रदान होइत तइठाम अबाहक पूछ केतेक?
सामंजस करैत मेट भाव-वि‍ह्वल भऽ बाजल-
बौआ ठीकेदार, ई दुनि‍याँ खेल छी। अपना सभ जहलमे तीत-मीठ करै छी, आ कि‍यो खुलल धरती-अकास बीच खूलि‍ कऽ खेलाइए। तइठाम तोहीं कहह जे कि‍ नीक हेतइ?”

जहि‍ना चोरोक भरमार अछि‍, कि‍सि‍म-कि‍सि‍मक चाेर अछि‍, तहि‍ना ने एकरंगाहो चोरक भरमार अछि‍। अमती काँटमे ओझराएल जकाँ ठीकेदार ओझरा गेल। जँ चोर चोरि‍ कए कऽ आनए आ जरूरतमन्‍द लोककेँ दऽ दइ तखन ओकरा की कहब? चोरि‍ तँ ओ ने होइत जे चुपचाप आनि‍ चुपचाप रही। जइसँ कि‍यो बुझबो ने करत आ तरे-तर मखड़ैत रहब। ठीकेदारकेँ गुम देखि‍ मेट पुछलक-
गुम कि‍अए छह, ठीकेदार? तोरेपर छोड़ि‍ देलि‍यह जे जे तूँ कहबह सएह करब। जाधरि‍ प्रेम-प्रेमसँ नै मि‍लि‍, आत्‍मा-आत्‍मासँ नै मि‍लि‍, मन-मनसँ मि‍लि‍ कऽ नै चलत ताधरि‍ भरि‍ मन सि‍नेह कतए सि‍ंगार करत।
जबाबक तगेदा सुनि‍ ठीकेदारक मनकेँ नै रहल गेलै बाजल-
मेट भाय, जखन किलो-कि‍लो तेल अहाँकेँ पहुँचैबि‍ते छी, तखन नवका कैदीकेँ कि‍अए गोदाम जाइले कहलि‍ऐ?”
बौआ, मालीमे तेल हथुड़ैत देखलि‍ऐ, तँए बजा गेल।
अपन बढ़ैत पक्ष देखि‍ ठीकेदारक मनमे खुशी पनपल। खुशि‍आएल मन बजलै-
जे आदमी आइये जहल आएल अछि‍, ओकरा सोझे गोदाम पठाएब नीक नै। चोर अछि‍ कि‍ छुलाह अछि‍, से अखन लगले केना बूझि‍ जेबै? जखन हमरे हाथमे गोदाम अछि‍ तखन अहाँकेँ अभाव नै हएत सएह ने?”
ठीकेदारक बात सुनि‍ते मेटक मन तीआइर जालमे फँसल माछ जकाँ ओझरा गेल। चोर तँ चोर भेल, मुदा छुलाह कि‍ भेल? मुदा मेट भऽ पूछबो नीक नै। जेकरे हाथ सभ कि‍छु, सएह नै बुझै, मेटक मनकेँ घुरि‍अबए लगल। एते दि‍नसँ जहलमे छी, ठीकेदारक हि‍साबे छुलाहोक संख्‍या कम नै अछि‍, मुदा नै बूझि‍ पेलौं से केहेन भेल?
शब्‍दक मोड़ बदलैत मेट पुछलक-
कते रंगक छुलाह जहलमे हएत ठीकेदार?”
जहि‍ना नारद धरतीक रि‍पोर्ट अकासमे करैत तहि‍ना ठीकेदार अपनाकेँ महसूस करैत बाजल-
भाय सहाएब, तेहन घुरछी लगल सबाल अछि‍ जे धड़फड़मे छूटि‍ जाएत। तँए वि‍हि‍या कऽ देखए पड़त। पान-सात दि‍नमे पूरा-पूरी कहि‍ देब।

बलदेवक मनमे जहलक पहि‍ल दि‍न नाचए लगलै। पुन: मनमे उठलै, मात्र कि‍छु घंटाक लेल दुनि‍याँमे छी, तखन एक्के दि‍नक काजमे घेराएल रहब नीक नै। मुदा कहबो केकरा करबै आ सुनबो के करत। आगू बढ़ि‍ते मनमे उठलै, जि‍नगीमे जे कि‍छु जे करैए ओ आन देखौ, बुझौ आकि‍ नै देखौ-बुझौ मुदा केनि‍हार तँ जरूर देखबो करैए आ बुझबो करैए। मनमे ग्‍लानि‍ उठए लगलै। जहि‍ना बर्खाक बहैत बुन्नक बेग, घेरामे घेरा जमा हुअए लगैए तहि‍ना जि‍नगीक चलैत चक्रक चालि‍ बलदेबक मनमे समटाए लगलै। कते भारी अपराधी छी जे धरतीक भार बनि‍ गेल छी, जँ हमरा सन अपराधीकेँ फाँसी नै होइ, सेहो अनुचि‍त हएत। मन असथि‍र भऽ गेलै। मनुखे ने मानवो आ दानवो बनैए। दुनि‍याँक ऐ रंगमंचपर कि‍यो वीर बनि‍ तँ कि‍यो कायर बनि‍, पार्ट अदा करैए। मन ठमकलै। पुन: उठलै, जइ धरतीक भार उठबए आएल छलौं ओइ धरतीक भार बनि‍ गेलौं, एना कि‍अए भेल? की जि‍नगी भरि‍ हाथ-पएर मारि‍ रहलौं, सेहो तँ नै अछि‍। चलबैत अाएल छी। तखन भार कि‍अए बनि‍ गेलौं। मन अँटकि‍ गेलै। आइ जरूर बूझि‍ पड़ैए जे जि‍नगी भरि‍ वि‍परीत -बे-पीरि‍त- दि‍शा चलि‍ कुमार्ग पकड़ि‍ लेलौं मुदा से ओइ दि‍न कहाँ बुझलि‍ऐ जे कुमार्ग छी आकि‍ सुमार्ग। काजोमे कतौ बाधा कहाँ उपस्‍थि‍त भेल? जहि‍ना धारक धारा सि‍रासँ भठ्ठा दि‍सि‍ धड़धड़ाइत चलैए मुदा भठ्ठाकेँ सि‍रा दि‍सि‍ ससरैमे सामना करए पड़ै छै। केना-पानि‍ये पानि‍केँ रोकैत रहैए। मुदा बीचमे एकटा तँ होइ छै सि‍रोक पानि‍ आ भठ्ठोक पानि‍ एक-दोसरसँ रोकाइत, ठाढ़ हुअए लगैत अछि‍। ताधरि‍ ठाढ़ होइत जाइत जाधरि‍ धारसँ ऊपर उठि‍ धरतीपर नै छि‍ड़ि‍आए लगैत। मुदा धरति‍योपर तँ दि‍शा अवरूद्ध करि‍ते अछि‍। आइ धरि‍ जे नै बूझि‍ सकलौं ओ अपने केना बूझि‍ पाएब। मुदा नै, जि‍नगीक अंति‍म छोरपर भलहिं सब बात नै बूझि‍ सकि‍ऐ, मुदा कि‍छु नव तँ जरूर बूझि‍ पाबि‍ रहल छी। जँ से नै, तँ कहि‍यो नै बूझि‍ पेलौं जे फाँसी हएत? हमहीं नै सभ एहने वृत्ति‍ करैए, मुदा सभकेँ फाँसि‍ये कहाँ होइ छै। जइठाम पुरजा-पुरजी मनुखक अंग बनल अछि, सभ अंगमे गुण-दोष छै, तइठाम केना जोड़ि‍ कऽ चलाओल जा सकैए। समए पाबि‍ कि‍यो दौड़ए लगैए आ कुसमए पाबि‍ थकथका जाइए। तइठाम सौंसे मनुख बनब, धीया-पुताक खेलौना नै छी। समए अनुकूल बनए-बनबए पड़ै छै, से नै तँ रग्‍गड़मे लोक रगड़ाए कि‍अए जाइए।

बि‍सरि‍ गेल बलदेव बारह बजेक फाँसी। मन आगू दि‍सि‍ बढ़लै। जइठाम अधि‍कांश फूल ओहन अछि‍ जे अनेको रंगक होइए। गंध, रूप, अाकार समान रहि‍तो एक-दोसराक अनुकूलो‍ आ प्रति‍कूलो अछि‍। तहि‍ना गुलाबी आ लाल आलो-लाल आ गाढ़ो लाल बनैए तहि‍ना तँ अपराजि‍त करि‍यो बनैए आ उजरो। आ जँ उजरोपर करि‍ये रंग चढ़ि‍ जाए, जेना एक-दोसरपर चढ़ैए। भलहिं थलकमल उज्‍जरसँ लाल भऽ जाए मुदा सभ तँ थलकमले ने छी।
जहि‍ना फुलवाड़ी फलवाड़ी वा वंशबाड़ी टहललाक उपरान्‍त छाहरि‍मे बैसैक मन होइए तहि‍ना बलदेवकेँ सेहो भेल। दुनि‍याँक दृश्‍य देखि‍ मन हहि‍आए लगलै। ऐठाम के देत? केकरासँ मंगबै? जँ मंगबो करबै तँ जरूरी नै अछि‍ जे नीके देत। अधलोकेँ नीक कहि‍ दैत अछि‍।

जुग-जुगसँ रंग-बि‍रंगक फूल-फलक गाछ रहि‍तो अखनो हराएल अछि‍ आ हराइयो रहल अछि‍। भरि‍सक हराइ-जीताइक खेले ने तँ चलैए। बलदेवकेँ अपने-आपपर शंका उठलै। अखन जहलक सेलमे छी, अकलबेड़ामे फाँसीपर चढ़ब, कहीं बुइधे तँ ने भगंठि‍ रहल अछि‍। भंगठले बुधि‍ ने बताह कहबै छै। मुदा बि‍नु भंगठलोकेँ तँ बताह कहै छै। जहि‍ना धान-रब्‍बीक रग्‍गड़सँ हाँसू मुरछि‍ जाइए तहि‍ना बलदेवक मन मुरछि‍ गेलै। कि‍छु समए नि‍कलि‍ते मनमे उठलै, अझुका बाद के हमरा मन राखत। कोनो कि‍ हम असगरे मृत्‍युदंड पेलौं आकि‍ पबै छी। ि‍कयो गाछपरसँ खसि‍ तँ कि‍यो पानि‍मे डूमि‍, कि‍यो बीखहा दबाइ पीब, तँ कि‍यो वि‍षैला साँपकट्टीसँ....?
मुदा हम तँ ओइ सभसँ भि‍न्न छी? दुनि‍याँक बीच अपराधी छी, ओहन अपराधी जेकरा दुनि‍याँ थूक फेक भगबैए। मनमे हुमड़ैत वायुक दरद बूझि‍ पड़लै। केकरा लेल एते अपराध केलौं? कि‍ अपना ले आकि‍ परि‍वार ले। आइ के हमरा संग फाँसीपर चढ़त? जँ अपना ले केलौं तँ कि‍ हाथ-पएर नै अछि‍। मनमे एकाएक समुद्रक शीतल समीरक झटका लगलै। झटका लगि‍ते मुँहसँ नि‍कलए लगलै- ओ फाँसी केहेन होइए, जे हँसैत अपने हाथे गरदनि‍मे लगबैए। ओहि‍ना हँसैत मुँह लोकक सोझामे हँसैत रहैए। आ ओ फाँसी केहेन जेकरा थूक फेक लोक आँखि‍ मूनि‍ लइए। कि‍यो सपूत बनि‍ फाँसीपर चढ़ि‍ अमर ज्‍योति‍ जरबैत अछि‍ आ कि‍यो करि‍आएल इजोतमे अन्‍हराएल रहैत अछि‍। ऐ धरतीपर केकरो संग कि‍यो नै जाइत अछि‍। सभ अपन-अपन स्‍वार्थक पाछाँ रहैत अछि‍। मन ठमकलै। मनमे उठलै, केना नै जाइत अछि‍। आत्‍माक संग आत्‍मा जरूर जाइत अछि‍। नीकक संग नीक आ अधलाक संग अधला तँ जाइते अछि‍।

राति‍क अंति‍म पहर। एक दि‍सि‍ राति‍ उसरैक बेर तँ दोसर दि‍सि‍ दि‍न चढ़ैक समए। अर्द्धचेत बलदेवक भक्क तखन पुन: खुजल जखन अन्‍हारमे हराएल परुकी संगीक बीच अपन उपस्‍थि‍ति‍ दर्ज करबाक लेल घूटकल, अवाज देलक। अपन-अपन आवेशी अवाजमे गामसँ अान गाम, आ एकसँ अनेक कि‍सि‍मक गाछपर एक जुटताक अवाज देलक। यएह समए छी जे गौतमो ऋृषि‍केँ चन्‍द्रमा धोखा देलकनि‍। सराप चाहे गौतम जे देलखि‍न मुदा एते तँ भेबे केलनि‍ जे आत्‍मासँ खसि‍ देहलोकमे उतरि‍ गेलाह। चन्‍द्रमामे जखन गहन लगि‍ जेतै तखन अन्‍हारमे धरतीपर केकरा के चि‍न्‍हत?
परुकी सबहक अवाज सुनि‍ते बलदेवक मनमे जहि‍ना तरेगन रहि‍तो भुरुकबा तरेगन आल-लाल ज्‍योति‍ धरतीपर हँसैत आबि‍ प्रकाशि‍त करैक परि‍यास करैत, तहि‍ना बलदेवक मनमे सेहो पतराएल प्रकाशक आगमन भेलै। ज्‍योति‍क आगमन होइते उठलै, कोनो कि‍ हमरेटा फाँसी हएत आकि‍ अदौसँ होइते एलै आ भवि‍ष्‍योमे होइत रहतै। मुदा हमरा जि‍नगीमे फाँसी चढ़ैक बाट पकड़ाएल कहि‍या?
बलदेव पाछू उनटि‍ ताकए लागल। हम तँ ओइ दि‍न फाँसीक बाट पकड़ि‍ लेलौं जइ दि‍न डगर छोड़ि‍ डगहर पकड़ि‍ लेलौं। डगरक तँ सीमा-सरहद होइ छै, नि‍श्चि‍त जगहसँ नि‍श्चि‍त जगह पहुँचैए, मुदा डगहर तँ से नै होइत। घुरि‍या-फिड़ि‍या बौअबैत रहैए। मनुष्‍यक तँ डगर होइ छै, डगहर तँ पशु लेल होइ छै जे जंगलमे चरैले जाइत छैक। कि‍ हमहूँ पशुए भऽ गेलौं। मुदा पशुओ तँ जीबे छी आ मनुखो जीबे छी। दुनूक बीच आत्‍माक बास होइ छै। मुदा आत्‍माक बास रहि‍तो पशु कहाँ बूझि‍ पबै छै जे हमरा बीच आत्‍माक बास अछि‍। मुदा मनुष्‍यकेँ तँ से नै होइ छै। मनुष्‍ये नै जीव-जन्‍तुओसँ प्रेम करैत अछि‍ आ प्रेम पबैत अछि‍। सहयोगी बनि‍ जि‍नगीमे सहयोगो करैत अछि‍ आ सहयोगक अपेक्षो रखैत अछि‍। जँ से नै तँ ओ अपन रहैक बेवस्‍था कि‍अए ने कऽ पबैत अछि‍। जेकरा रहैक बेवस्‍था नै हेतै तेकरा जि‍नगीक गारंटी कि‍ भऽ सकै छै। भलहिं बौआ-ढहना घास-पात वा अन्‍य भोज्‍य पदार्थ ताकि‍ पेट भरि‍ लि‍अए मुदा मनुष्‍य जकाँ तँ जि‍नगी जीबैक गारंटी नै कऽ सकैए। मनुष्‍य तँ पातालसँ पानि‍ आनि‍ पीब सकैए, धरतीसँ भोज्‍यपदार्थ उपजा सकैए। फेर मन ठमकलै। सोचती बन्न भेलै! सोचनशक्‍ति‍ रूकलै!

जहि‍ना कटल वा टुटल रास्‍ता देखि‍ राही ठमकि‍ जाइत जे ओइ पार केना जाएब। मुदा कटबो आकि‍ टुटबो तँ रंग-बि‍रंगक होइत अछि‍। एक टुटब ओहन होइत अछि‍ जइमे पानि‍-थाल-कीच होइत अछि‍ आ दोसर ओहन होइत जे सुखले रहैत अछि‍। जइमे सावधानीसँ नि‍च्‍चाँ उतरि‍ पार कएल जाइत अछि‍। तहि‍ना तँ पनि‍आएलो-थलाहमे होइत। कतौ अगम होइत कतौ कम होइत जइठाम कम होइत तइठाम कने कठि‍ने सही मुदा पार तँ कएल जा सकैए। मुदा अगममे तँ डुमबोक आ गड़बोक संभावना बनले रहै छै। फाँसी लगा, गरदनि‍ दाबि‍ हमर प्राण लेत, मुदा फँसरि‍यो लगा तँ लोक मरि‍ते अछि‍। एहेन-एहेन परि‍स्‍थि‍ति‍ पैदा कऽ दैत जे बेवस भऽ लोक अपन गरदनि‍मे फँसरी लगा प्राण गमबैत अछि‍। कि‍ ओ अपराधी छी आकि‍ अपराधीक सजा पबैए। जखन ओ अपराधी नै छी, तखन अपराधीक सजा कि‍अए भेटलै?
वोनक बाघ सि‍ंह कि‍अए दोसराक प्राण लऽ लऽ खून पीबैए? ओकर कि‍ दोख छै? यएह ने जे ओकरा आगू ओ अब्‍बल अछि‍। फेर मन ठमकलै। कि‍यो इनार-पोखरि‍मे डूमि‍ मरैए, कि‍यो आगि‍, पानि‍-पाथर, वि‍र्ड़ोमे मरैए। ततबे नै कि‍यो गाछपर सँ खसि‍ मरैए, तँ कि‍यो गाछपर चढ़ैत-उतरैत काल खसि‍ मरैत अछि‍। प्रकृति‍क तँ अद्भुत लीला अछि‍। क्षण-क्षण पल-पल बाटो पकड़बैत अछि‍ आ धकेल-धकेल नि‍च्‍चाे करैत अछि‍। ऊपर-नि‍च्‍चाक खाढ़ा बना जीवन-मृत्‍युक सीमा बनोनै अछि‍। एक तँ ओहि‍ना आगि‍मे अगि‍आएल अछि‍, पानि‍मे पनि‍आएल अछि‍, हवामे हवि‍‍आएल अछि‍, तखन केना परेखि‍ पाएब। परखैले जेहेन आँखि‍क इजोत चाही तेहेन ने करि‍आएल बादलमे अछि‍ जे बर्खासँ सि‍क्‍त करत आ ने डभि‍आएल धरतीमे अछि, जे धरतीक परतकेँ तेना सि‍र गछाड़ने अछि‍ जे शक्‍ति‍हीन बना देने अछि‍। सूखल माइक छातीमे दूध कहाँ अछि‍ जे चाहि‍यो कऽ बेचारी दऽ सकती। अन्‍हारो राति‍मे, जखन हाथ-हाथ नै सुझैत, जखन अपन देहो हरा जाइत, देहक सभ अंग नि‍ष्‍क्रि‍य भऽ जाइत, तखनो तँ कि‍छु रहि‍ते अछि‍ जे हँथोरि‍यो-हँथोरि‍ कि‍छु दूर धरि‍ लइये जाइत अछि‍। मुदा हम तँ सोलहन्नी आन्‍हरा गेलौं। जखन पीबैयो बला पानि‍ बसि‍या गेने फेका जाइत, तहि‍ना आइ दुनि‍याँसँ फेका रहल छी। अपन फेकाइत जि‍नगीपर नजरि‍ पड़ि‍ते बलदेवक मन सहमि‍ गेलै। ने आगूक बाट देखै आ ने पाछू घुसुकि‍ पाबए। जहि‍ना जि‍नगीक ओहि‍ मोड़पर कि‍यो चारू दि‍ससँ दुश्‍मनसँ घेरा, हारि‍-जीतक तारतम्‍य नै कऽ पबैत तहि‍ना बलदेव सेहो घेरा गेल। हारि‍यो मानने दुश्‍मनक हाथे प्राण गमेबे करब, तखन प्राणक मोह राखि‍ हारि‍यो मानब उचि‍त नै। तइसँ नीक जे सामना करैत सामनेमे जत्तेकाल ठाढ़ रहब ओत्तेकालक जि‍नगीक महत तँ आरो कि‍छु हएत।
मुदा ठाढ़ रहि‍ के सकैए? जेकर शरीर टी.बी., केन्‍सर सन रोगसँ जर्जर भऽ खोखला भऽ गेल रहैए ओ ठाढ़ केना रहि‍ सकैए। पएरमे ओ शक्‍ति‍ कहाँ छै जे ठाढ़ रखतै। बलदेवक मन वि‍चलि‍त भऽ गेलै।

कि‍छु क्षण बाद मनमे उठलै, फाँसी तँ पोखरि‍क जाइठ‍ सदृश जि‍नगीक छी। कि‍यो अगम पानि‍मे डुबकुनि‍याँ काटि‍, माटि‍ नि‍कालि‍ जाइठक मुरेड़ापर लगबैए तँ कि‍यो कि‍नछैरे-कि‍नछैरमे पि‍छड़ि‍ कऽ खसि‍, पि‍छड़ैत-पि‍छड़ैत अगम पानि‍मे डूमि‍, सड़ि‍-सड़ि‍ सड़ैनि‍क गंध पसारैत अछि‍। मुदा जि‍नगीक अंति‍म छोड़पर बुझनहि‍ की हुअए? कमसँ कम जँ अपनो लेल केने रहि‍तौं तँ कनैत कि‍अए, हँसैत कि‍अए ने दुनि‍याँ छोड़ि‍तौं। जि‍नगीक अचूक उपाय कहाँ बूझि‍ पेलौं।

सूर्योदय भऽ गेल। बलदेवक पत्नी कामि‍नी आ बेटा सुशील गुमसुम भेल अपन-अपन काजमे लागल, मुदा मनमे वि‍चि‍त्र स्‍थि‍ति‍ बनल रहैक। ने सुशील माएकेँ कि‍छु कहैत आ ने माए बेटाकेँ। दुनूक मनकेँ बलदेवक फाँसी भीतरे-भीतर खिंचैत रहए। जइसँ मनक पीड़ा बढ़ैत रहैक। मनक पीड़ा ताधरि‍ बढ़ैत जाधरि‍ ओकरा नि‍कालि‍ दोसरकेँ नै कहल जाइत अछि‍। तखने अकासमे एकटा कौआ बाजल। कौआक बोलमे कामि‍नीकेँ अपशगुन बूिझ पड़लनि‍, मुदा सुशीलकेँ सगुन बूझि‍ पड़ल। गुम्‍मी  तोड़ैत कामि‍नी बाजलि‍-
बौआ, कौआक बोल केहेन ओल सन भेल।

ओना बलदेवक फाँसी दुनूकेँ बूझल, मुदा तैयो मनकेँ फुसलबैत बहलबैत कामि‍नी बजलीह। माइक बेथाकेँ सुशील बूझि‍ गेल, मुदा जि‍नगीमे एहि‍ना सोग-पीड़ा अबै-जाइ छैक। छोटसँ-छोट पीड़ा होय आकि‍ पैघसँ-पैघ होय मुदा समैक संग तँ लोक ससरि‍ये जाइत अछि‍। जइसँ धीरे-धीरे कमैत-कमैत मेटा जाइत अछि‍। जहि‍ना चलैले रास्‍ता चाही, से तँ नीक कि‍ बेजाए अछि‍ये। समाज तँ ओहन समुद्र छी जइमे करोड़ो-अरबो जीव-जन्‍तु स्‍वछंद भऽ जीवन-यापन करैत रहैए, भलहिं एक-दोसराक बाटो घेरैत रहै छै, पकड़ि‍-पकड़ि‍ खेबो करै छै मुदा, तैयो तँ रहबे करैए। नीक कि‍ अधला, मनुख मनुखे बीच रहैत अछि‍। माइक पीड़ाकेँ सुशील भाँपि‍ गेल। मने-मन सोचलक जे एक तँ बेचारीकेँ जि‍नगी भरि‍क संगी छूटि‍ रहल छन्‍हि‍ तइपर जँ हमहूँ ओहने बात कहबनि‍ तँ आरो मनमे धक्का लगतनि‍। चोटपर-चोट लगने आरो अधि‍क वेदनाक अनुभव होइ छै। मुदा जहि‍ना कड़ू लगने लोक पानि‍ पीब कड़ू कम करैए तहि‍ना जे दर्द मेटबैक उपाए करब तँ दर्द आगू नै बढ़ि‍ या तँ ठमकल रहतनि‍ वा कमतनि‍। समगम होइत सुशील माएकेँ उत्तर देलक-
माए, कौआ तँ केहेन सुन्नर बाजल। कबकबाएल कहाँ?”
सुशीलक बात सुनि‍ कामि‍नी बजलीह-
आन दि‍न केहेन सुन्नर भि‍नसुरका बोली नि‍कालै छलै आइ केहेन सबसबाएल बोल नि‍काललक।
माइक हृदैक वेदनाकेँ सुशील भाँपि‍ लेलक। ओना मनुष्‍यक हृदैक थाह नै छैक। एक दि‍स रूइयाक फाहा जकाँ बि‍नु हवोक उड़ैए तँ दोसर दि‍स जुआन पति‍, कमाइबला जुआन बेटाक मृत्‍यु, सेहो तँ सहबे करैए। बाट टुटल वा कटल होउ आकि‍ छोटसँ नमहर खाधि‍ होउ, लोककेँ चलैले तँ बाट चाहबे करी। एकठाम बैसलासँ तँ जि‍नगी नहि‍ये चलै छै। कोनो-ने-कोनो उपाए तँ करै पड़ै छैक। कतौ लोक कूदि‍ कऽ खाधि‍ पार करैत अछि‍ तँ कतौ बगलक माटि‍ काटि‍ वा छीलि‍ कऽ ओकरा पहेटि‍ चलैत अछि‍। कतौ एहनो होइ छै जे नमहर टुटान वा कटान रहै छै तँ ओकरा छोड़ि‍ दोसर बाट बना लइए। माइक पीड़ाकेँ कमैत नै देखि‍ सुशीलक मनमे उठल। एक-एक ढेपासँ सेहो बाटक खाधि‍ भरल जाइत अछि‍ आ खाधि‍क हि‍साबसँ चेकान काटि‍ सेहो भरल जा सकैत अछि‍।
सुशील बाजल-
माए, हमरा तँ कौआक बोलमे सकुन बूझि‍ पड़ल। जहि‍ना केकरो कोनो वस्‍तु  हरेलासँ दुख होइ छै तहि‍ना ने भेटि‍नि‍हारकेँ खुशि‍यो होइ छै। बीचक वस्‍तु तँ एकेटा रहै छै। एक्के बात वा वस्‍तु एकक लेल नीक अछि‍ तँ दोसराक लेल अधलो भऽ जाइत अछि‍। जीवन रक्षक पति‍यो होइत अछि‍ आ बेटो होइत अछि‍। मुदा एक काज रहि‍तो दुनूक करैक वि‍धि‍मे कि‍छु-ने-कि‍छु अन्‍तर तँ भइये जाइत अछि‍। वएह अन्‍तर तँ एक-दोसराक बीच अन्‍तरो पैदा करैत अछि‍।

सुशीलक वि‍चार कामि‍नीक वि‍चारक सोझा-सोझी ठाढ़ भऽ गेल। कामि‍नीक वि‍चार ठमकलनि‍। एकाएक ठाढ़ भेने जहि‍ना शरीरमे झोंक अबैत छैक तहि‍ना कामि‍नीकेँ एलनि‍। मनमे झोंक लगि‍ते डोललनि‍। डोलि‍ते नजरि‍ एक दि‍स पति‍पर तँ दोसर दि‍स पुत्रपर वि‍भाजि‍त हुअए लगलनि‍। जइ छत्रछायामे अखन धरि‍ रहलौं ओ तँ टूटि‍ रहल अछि‍। मन नि‍राश हुअए लगलनि‍, मुदा लगले आगूमे पुत्र देखि‍ आशा जगलनि‍। पुत्रो तँ पति‍ये जकाँ प्रहरी होइत अछि‍। नि‍राशाक मचकीमे आशाक आश लगलनि‍। हृदय सि‍हरलनि‍। सि‍हरि‍ते पुत्रक प्रति‍ प्रेम जगलनि‍। ओ प्रेम नै जे प्रेम माइक आशामे पुत्रकेँ होइत। बल्‍कि‍ ओ प्रेम जइ आशामे पुत्रक आश्रयमे माए जीबैत छथि‍। जहि‍ना जलसँ जलकण आ ओससँ ओसकण बनि‍ पुन: जल वा ओसक सृजन करैत अछि‍, तहि‍ना। नि‍राश मनमे खुशीक संचार भेलनि‍। संचार होइते खि‍लैत कली जकाँ मन खि‍ललनि‍। जहि‍ना खापड़ि‍मे मकै वा धानक लाबा एक्के-दुइये फुटि‍-फुटि‍ रंग बदलैत तहि‍ना मनक रंग बदलए लगलनि‍। केना लोक कहैए जे कोनो बीआक लेल अनुकूले वातावरण भेटलापर अंकुर होइ छै। अंकुरक लेल तँ वएह वातावरण अनुकूल भऽ जाइत अछि‍ जइ मूलक ओ बीआ आ बीआक गाछ होइत अछि‍। जँ से नै तँ एक दि‍स अगम पानि‍बला समुद्रमे बीआ अकुरि पनि‍गाछक जन्‍म दैत अछि‍ तँ दोसर माटि‍-पानि‍ बीच सेहो दैत अछि‍। ततबे कि‍अए? दोखरा बालुओ आ चखान भेल पाथरोमे तँ कोनो-ने-कोनो गाछक बीआ तँ अकुरिते अछि‍। जखन दुनि‍याँक सभठाम शक्‍ति‍ मौजूद अछि‍ तखन मि‍थि‍लाक भूमि‍ कि‍अए शक्‍ति‍हीन भऽ जाएत। जे बीत भरि‍क पेटक रच्‍छा नै कऽ सकैत अछि‍। जे धरती भि‍खारीकेँ भि‍क्‍क्षु बना सकैए, भोगीकेँ जोगी बना सकैए, ओ जोगीकेँ कि‍अए ने भोगी आ भि‍क्‍क्षुकेँ भि‍खारी बना सकैए। एक नव शक्‍ति‍क उदय कामि‍नीक मनमे भ‍ऽ चुकल छलनि‍। साैंसे धानक लाबा जकाँ मन दू फाँक भऽ गेल छलनि‍। जहि‍ना खापड़ि‍मे एक-फाँक, दू-फाँक, तीन-फाँक होइत लाबा खापड़ि‍सँ उड़ए चाहैत अछि‍, उड़बो करैत अछि‍ तहि‍ना कामि‍नीक वि‍चार उड़लनि‍। मुदा मुँहक बोल सुखा गेलनि‍। कंठक तरास बढ़ए लगलनि‍। मुदा पति‍-पुत्रक बीच चलैत धारमे अपनाकेँ पाबि‍ कामि‍नीक हृदय छटपटेलनि‍। सुशीलक आँखि‍मे आँखि गाड़ैत बजलीह-
बाउ सुशील, अहाँक पि‍ता आ अपन पति‍क तँ अंति‍म दि‍नक क्षण क्षणकि‍ रहल हेताह‍। चलि‍ कऽ आइ दुनू माए-बेटा भेँट कऽ लि‍अनु?”
माइक बात सुनि‍ सुशीलक मन ठमकल। केकरो मनमे फुलक वर्षा होइत अछि‍ तँ केकरो पानि‍-पाथर बनल ओला-पाथर बरसैए। मुदा जहि‍ना मरबो दुनू करैए तँ जीबो तँ करि‍ते अछि‍। भेँट करए चालैले माए कहै छथि‍ मुदा कि‍ ई उचि‍त हएत? हम सभ जेबे करब तइसँ कि‍ हुनका भेटतनि? आ हमरे सभकेँ भेटत? अस्‍ताचल गामी सूर्यक लाभ तँ ओकरे भेटैत छै जे उदीयमान अछि‍। जे उदीयमान नै अछि‍ ओकरा लेल तँ जेहने दि‍न तेहने राति‍, तखन अस्‍ताचलक महत्‍वे की? हुनका -पि‍ता- कि‍छु ने भेटतनि‍, भेटतनि‍ वएह जे अपना ले फाँसीपर चढ़ि‍ रहला अछि‍ आ परि‍वारक लेल। जँ परि‍वारक लेल तँ कि‍ अधले काजपर परि‍वार चलि‍ सकैए आ नीक काजपर नै चलि‍ सकैए। जँ चलि‍ सकैए तँ ओ खुद नीक बाट छोड़ि‍ अधला बाटपर चलि‍ अंति‍म दर्शन देखा रहला अछि‍। अंति‍म दर्शन की? यएह ने जे धरतीपर कनैत एलौं हँसैत जाएब आकि‍ जहि‍ना कनैत एलौं तहि‍ना कनैत जाएब, तँ कि‍ एहेन जि‍नगीकेँ सुभर जि‍नगी मानबै? कथमपि‍ नै? जखने घरसँ डेग उठाएब तखनेसँ लोक कहबो करत आ थूकबो करत जे खुनि‍या-अधरमीक बहु-बेटाकेँ देखि‍यौ? नि‍रलज जकाँ केहेन धमौड़ दैत जा रहल अछि‍। माइक प्रश्नक उत्तर दैत सुशील बाजल-
माए, कोन मुँह देखए आ देखबए जाएब। सोझ पड़लापर पि‍ता यएह ने कहता जे अहीं सभले जा रहल छी? मुदा अपना सभ कि‍ पुछबनि?”
सुशीलक वि‍चार कामि‍नीक मनमे अभि‍भावकक रूपमे जगलनि‍। जहि‍ना सइयो हाथक लत्ती बि‍ना सहाराक धरतीसँ नै उठि‍ सकैत अछि‍ तहि‍ना ने नारि‍यो अछि‍। डाॅड़मे चोट मारि‍ ने वि‍धातो वि‍धि‍क रचना केलनि‍। बेटाक सहारा देखि‍ कामि‍नीक मनमे अगि‍ला जि‍नगीक आस जगले रहनि‍। वि‍ह्वल भऽ बजलीह-
बेटा, बेटा बनि‍ जँ धरतीपर आबी तँ बेटा कहबैत चली। आब तँ तोंही ने सभ कि‍छु भेलह। वैधव्‍य भेने एक आकुश मात्र लगत। मुदा आरो जि‍नगी तँ संग मि‍लि‍ चलबे करबह कि‍ने, तोहर जे वि‍चार हेतह सएह ने हमरो वि‍चार हएत। कहुना भेलह तँ तूँ पुरुष-पात भेलह? हम कतबो हएब तँ घरे भरि‍ हएब।
माइक बात सुनि‍ सुशीलक मन पसीज गेल। अपन दायि‍त्वक भान भेलै। मुदा लगले मन मुरुछि‍ गेलै। एक दि‍स धरती सदृश नि‍श्चल माए तँ दोसर दि‍स कुकर्मी अपराधी, धरतीक पापात्मा पि‍ता देखए लगल। पि‍ताक प्रति‍ मनक उष्‍मा तेज भऽ गेलै। बाजल-
माए, परि‍वारक बड़का बोझ उतरैक दि‍न........।
सुशीलक बोल बन्न भऽ गेलै। वि‍स्‍मि‍त अवस्‍थामे सुशीलकेँ देखि‍ कामि‍नी बाजलि‍-
सोग नै करह। जइ दि‍नक जे भवि‍तव्‍य छलै ओ भेलै। जहि‍ना जरल-मरल धरती आद्राक बुन्न पाबि‍ ि‍सर्फ जीवि‍ते नै सृजक सेहो बनि‍ जाइत अछि‍। तों तँ सहजे पुरुख छि‍अह। आन के केकरा कहत आ केकर के सुनत। मुदा जहि‍ना तोहर पि‍ता तहि‍ना तँ हमरो पति‍ छथि‍ये। तँए अन्‍ति‍म घड़ीमे श्रद्धापूर्वक स्‍मरण कऽ वि‍सरि‍ जाह। चलह अंगनेक ओसारपर बैस चाहो बना पीब आ गपो-सप करब। दुनि‍याँ कि‍छु कहह, मुदा तोहर मुँह देखि‍ एहेन खुशी भऽ रहल अछि‍ जे जि‍नगीमे कहि‍यो नै भेल छल।
माइक बात सुनि‍ सुशीलक मन ओहि‍ना फड़फड़ा उठल। बाजल-
असगरे लोक जन्‍म लइए आ अपने आशा सभकेँ करैक चाहि‍ये।

बेटाक आस भरल बात सुनि‍ कामि‍नीक हृदए पसीज गेलनि‍। बजलीह-
बौआ, आब तूँ बौआ नै बेटा भेलह। बापक काज कऽ देखि‍ परेखि‍ दुनि‍याँक संग चलैक एक सि‍पाही भेलह। परि‍वार-समाज कर्मभूमि‍ भेलह। ने अनका पढ़ने आनकेँ ज्ञान होइत आ ने अनकर ज्ञान अनका ले सबतरि‍ उचि‍ते होएत। तँए अपन समए, परि‍स्‍थि‍ति‍केँ अॅकैत परि‍वारकेँ आगू मुँहेँ ससारैक तँ भार माथपर आबि‍ये गेल छह। केहेन मनुख बनि‍ धरतीक धारण केलौं, यएह ने जि‍नगीक परीछा छी।

माए-बेटाक बीच जि‍नगी परि‍वारक गप-सपक बीच कामि‍नीक मन कखनो पति‍सँ हटि‍यो जाइत मुदा लगले पुन: आबि‍ मनकेँ पकड़ि‍ लैत। जखन मनसँ हटैत तखन अपनो हाथ-पएर नि‍हारि‍-नि‍हारि‍ देखथि‍ आ सुशीलोकेँ नि‍हारि‍-नि‍हारि‍ देखथि‍। मनमे उठलनि‍ पाँखि‍ तँ टि‍कुलि‍योकेँ होइ छै, अकासमे उड़बो करैए मुदा तँए ओ चि‍ड़ै तँ नै कहाइत। चि‍ड़ै लेल तँ पाँखि‍मे दम चाही। से कहाँ टि‍कुलीमे होइ छै। कनि‍यो कि‍छु होइ छै कि‍ पाँखि‍ टुटि‍ जाइ छै। जइसँ अकास उड़बे बन्न भऽ जाइ छै। तहि‍ना तँ अखन अपनो परि‍वार भऽ गेल अछि‍। हम उमरदार छी तँ घरसँ बहार कि‍छु करबे ने केलौं आ सुशील तँ सहजे कोनो भार बुझबे ने केलक। नै बहराइक कारणो भेल जे अपनाकेँ घरेक सीमामे रखलौं। जे उचि‍तो भेल आ अनुचि‍तो भेल। अर्द्धांगि‍नी होइक नाते जि‍नगीक सभ वृत्ति‍सँ परि‍चि‍त हेबाक चाहै छल से नै भेल। जँ से भेल रहैत तँ जरूर नीक-अधला वृत्ति‍क वि‍चार करि‍तौं। मुदा, अपसोचो केने तँ नहि‍ये कि‍छु हएत। बाजलि‍-
बेटा, जँ ऐ धरतीपर बेटा बनि‍ आबी तँ कि‍छु कऽ देखाबी। जँ से नै तँ बेटाक महत्ते की?”

माइक बात सुनि‍ सुशीलक मन नव कलशल टुस्‍सा जकाँ नव रूपमे पनगल। माइक आँखि‍मे आँखि‍ गाड़ि‍ बाजल-
माए, दुनि‍याँमे सभ अपन-अपन भाग-तकदीर लऽ जि‍नगी बनबैत अछि‍। जेहेन जेकर जि‍नगी जीबैक बाट रहै छै तेहेन से भार उठा चलैत अछि‍।
सुशीलक बात सुनि‍ कामि‍नी वि‍ह्वल होइत बजलीह-
बेटा, जहि‍ना एक बेटा बनल-बनाएल परि‍वार-खनदानकेँ नाश कऽ दैत अछि‍ तहि‍ना एक बेटा बनल-बनाएल परि‍वारकेँ उठा ठाढ़ो कऽ दैत अछि‍।

जहि‍ना कल्‍पवृक्षक नि‍च्‍चा बैसि‍नि‍हार बौड़ाइत रहैए तहि‍ना फाँसीपर चढ़ैत बलदेवक परि‍वारक मन बौड़ा रहल अछि‍। असमसान जाइकाल मुर्दाक पाछू कठि‍यारीबला राम-नाम सत् है, सबको यही गत है।’, कहैत चलैत मुदा घुमति‍यो काल जखन कि‍ मुर्दा नै रहैत, वएह कहैत जे राम नाम सत् है, सबको यही गत है।भलहिं मृत्‍युक आंगन आबि‍ लोह-पाथर, आगि‍ छूबि‍ बि‍सरि‍ जाइत वा छोड़ि‍ दैत। जइठाम बच्‍चासँ सि‍यान धरि‍ मंत्र जपैत तइठाम एहेन जि‍नगीक दशा कि‍एक? जहि‍ना रस्‍ता चलैत बताह कखनो रस्‍तासँ हटि‍ तँ कखनो सटि‍ ललकारो भरैत आ कखनो असथि‍र भऽ बौको बनि‍ जाइत तहि‍ना माए-बेटाक अर्थात् सुशील-कामि‍नीक मन पि‍ता-पति‍क फाँसीक कि‍छु समए पूर्व पुरबा-पछबा जकाँ रस्‍सा-कस्‍सी करैत।
कामि‍नी- बेटा, तीन गोरेक परि‍वारमे एकक अंत भऽ रहल अछि‍ तैयो तँ दू गोरे बँचलौं। तोहर बि‍आह होइते फेर तीन गोरे भइये जाएब।
माइक बात सुनि‍ सुशील बाजल-
एहि‍ना परि‍वार कम-बेसी होइत एलैए आ होइत चलतै। तइले कत्ते माथ धूनब। तखन तँ एकटा बात बुझए पड़त जे आनकेँ केकर परि‍वारक भार उठबैए, अपन परि‍वारक भार तँ अपने उठबए पड़त।
कामि‍नी- हँ, ई तँ बेस बजलह।
सुशील- दुखे कि‍ सुखे परि‍वारक बोझ तँ परि‍वारेक लोककेँ उठबए पड़तै।

सुशीलक बात सुनि‍ कामि‍नीक मन सहमि‍ गेलनि‍। बेटा सहजहि‍ अनाड़ि‍ये अछि‍, अपने कहि‍यो भारे ने बुझलौं। तखन.....?
बकार बन्न भऽ गेलनि‍। जहि‍ना भुमकमक समए धरतीक सभ कि‍छु डोलए लगैत तहि‍ना कामि‍नीक भीतर-बाहर डोलए लगलनि‍।
धारक बहैत पानि‍मे जहि‍ना पएर असथि‍रो कऽ टपैमे थरथड़ाइत तहि‍ना कामि‍नीकेँ हुअए लगलनि‍। सुशीलोक मन वि‍चलि‍त होइत मुदा मनकेँ थीर करैत बाजल-
माए, प्रश्न तँ छुटि‍ये गेल अछि‍। उत्तर कहाँ देलँह।
सुशीलक प्रश्न मन पाड़ि‍ कामि‍नी बजलीह-
अर्द्धांगि‍नी बनि‍ जइ पुरुखक संग पकड़लौं हुनका चीन्‍हि‍ नै सकलि‍यनि‍। आइ बुझै छी जे पुरुखक भीतर सेहो, पुरुख होइ छै आ नारीक भीतर सेहो नारी होइ छै। जँ से बुझने रहि‍तौं तँ एतेक दूरी नै बनि‍ पबैत। ओना परि‍वारक भीतर अपन भार नि‍माहैमे कहि‍यो कोताही नै केलौं मुदा....। आब उपाऐ कि‍ अछि‍?”
बजैत-बजैत कामि‍नी ठमकि‍ गेलीह। जहि‍ना नदी-नालाक पानि‍क बेग आगूमे बान्‍ह  पाबि‍ रूकि‍ जाइत तहि‍ना कामि‍नीकेँ भेलनि‍। सहत बेधल माछ जकाँ छटपटाए लगलीह। छटपटाइत मनमे आबए लगलनि‍, एक दि‍स तत्‍ववेत्ता तात्वि‍क चि‍न्‍तन-वि‍वेचनमे लगल रहैत अछि‍ तँ दोसर दि‍स व्‍यक्‍ति‍-व्‍यक्‍ति‍क बीच सेहो होड़ लगल अछि‍। सभ सभसँ आगू बढ़ए चाहैत अछि‍। जइसँ संगे चलब छूटि‍ जाइत अछि‍। समाज वि‍खंडि‍त भऽ जाइत अछि‍। श्रमि‍क अश्रमि‍कक बीच दि‍शा-दि‍शान्‍तरक अंतर बनि‍ जाइत अछि‍।

दुनू माए-बेटा गुमसुम भेल एक-दोसराक मुँह देखैत। गुम्‍मी तोड़ि‍ सुशील बाजल-
माए, तोहर की इच्‍छा छउ?”
बेटाक बात सुनि‍ कामि‍नीक मन शान्‍त भऽ गेलनि‍। पति‍क फाँसी मनसँ हटि‍ गेलनि‍। मन पाड़ि‍ बाजए लगलीह-
बेटा, बहुत दुनि‍याँ देखलौं। नाना-नानी, दादा-दादी, बाप-माए, मामा-मामी, केत्ते कहबह। पाछू उनटि‍ तकै छी तँ सभ कि‍छु देखै छी मुदा आगू तकै छी तँ तोरा छोड़ि‍ कि‍छु ने देखै छी। जहि‍ना नमहर गाछ खसि‍ रस्‍ता रोकि‍ दइए तहि‍ना आगू बूझि‍ पड़ैए।
माइक बात सुनि‍ सुशील बाजल-
माए, तोहर जे इच्‍छा छोउ, ओकरा जहाँधरि‍ भऽ सकत पूरबैक कोशि‍श करब। जे धरती छोड़ि‍ चलि‍ गेल, ओ तँ सहजे चलि‍ गेल। ओकरा संग कि‍छु थोड़बे जेतइ। मुदा जे अछि‍ ओकर तँ आशा अछि‍ये।

आशा भरल सुशीलक वि‍चारमे आस लगबैत माए बजलीह-
दुनि‍याँक खेल छि‍ऐ जे एकपर सए ठाढ़ अछि‍ आ कखनो सए सए दि‍सि‍ छि‍ड़ि‍आएल रहैए। तँए सभ कि‍छु बि‍सरि‍ जाह। बीतलाहा काल्हि‍ मन राखह आ अगि‍ला काल्हि‍ ले हाथ-पएर उठाबह।

नअ बजि‍ते जहलक भीतर ओहने चलमली आबि‍ गेल जेहने नमहर बर्खा भेलापर वा भूमकम भेलापर होइत अछि‍। कि‍छु गोटे -सि‍पाही- नहाइ-खाइले गेला। तँ कि‍छु गोटे दस बजे जहलसँ नि‍कलैक कागज-पत्तर सरि‍यबैमे लगि‍ गेला। ओना अनदि‍नासँ ऑफि‍सोक रंग बदलल। जेना घंटा-घंटा भरि‍ ऑफि‍सरक अभावमे गेटपर ठाढ़ भऽ प्रति‍क्षा करए पड़ैत रहैत तेना नै। ऑफि‍स समैयेपर खुजि‍ गेल। केना नै खुजैत, आइ बलदेवकेँ जहलक सजाए जे समाप्‍त भऽ रहल अछि‍। फाँसी तँ जि‍नगीक छी। ि‍सर्फ दूटा सि‍पाही बलदेवकेँ सेलसँ नि‍कालि‍ अग्‍नेयक गाछक नि‍च्‍चामे सबजि‍येपर बैसि‍ गप-सप्‍प करए लगल। तहूमे एक गोटे चीलमक भॉजमे लगि‍ गेल आ दोसर बलदेवसँ गप-सप्‍प करए लगल। मुदा तीनू गोटे माने दुनू सि‍पाही आ बलदेवक मन तीन दि‍स बौआइत ढहनाइत। चीलमक भॉज-भूॅज केनि‍हार -पहि‍ल सि‍पाही- तमाकुलबलापर बि‍गड़ि‍ गरि‍अबैत जे साला सभ पानि‍ छीटि‍ अधलो पत्ताकेँ तेहेन डगडगी आनि‍ दइए जे लेनि‍हारकेँ बूझि‍ पड़ैत जे टि‍पगर अछि‍। मुदा स्‍नो-पोडर लगौलहा मुँह तँ ओतबे काल ने चमकैत जतेकाल ओकरा चमकैक शक्‍ति‍ छै, मुदा तँए की सभ मुँह ओहने होइए जे लगले चमकत लगले दबि‍ जाएत, बि‍लि‍न भऽ जाएत। तमाकुलक तामस सि‍पाहीकेँ आगू बढ़ा सरकार दि‍स‍ लऽ गेल। सरकारपर नजरि‍ पड़ि‍ते हँसी‍ लगलै। बड़बड़ाए लगल-
अजीब मदारी-नाच सरकारो करैए। एक दि‍स‍ तमाकुल खेती करैक लाइसेंस, गुटका बनबैक लाइसेंस दइए आ दोसर दि‍स कैंसर रोगक कारण कहि‍ मनाही करैए। मुदा लगले मन घूमि‍ कऽ अपनापर चलि‍ एलै। तीस बर्खक नोकरीक कमाइ अही-गाॅजा-भॉगमे चलि‍ गेल। जखन रि‍टायर करब, आ आधा दरमाहा भेटत तखन कि‍ करब। एक तँ देहमे कि‍छु ने रहल जे दोसरो काज करब, खेनाइ-पीनाइक अभाव सेहो हेबे करत। तइपर बुढ़ाड़ि‍यो तँ बीमारीक जड़ि‍ये छी, कहि‍यो दाँत टुटत तँ कहि‍यो आँखि‍क इजोत कमत। कहि‍यो कानक बहीर हएब तँ कहि‍यो बातरस ठेहुनमे पकड़त। मुदा अपना वि‍षयमे अपने सोचलौं कहि‍या जे बूझब। सि‍पाही दोसर जे बलदेवक आगूमे बैसल रहए, ओकर मन ि‍भन्ने बौआइत। जहि‍ना शराबीकेँ शराबक बोतल आगूमे अबि‍ते शरावक खुमारी आबि‍-आबि‍ नाचए लगैत तहि‍ना ने मृत्‍यु वा फाँसीसँ पूर्वक क्षण होइत। फाँसीसँ पूर्व धरि‍ ने बलदेव अपराधी छी आ हम ओकर पहरुदार सि‍पाही मुदा कि‍छु काल बाद अर्थात् बारह बजेक पछाति‍ के कतए रहब तेकर कोन ठेकान अछि‍। से नै तँ अखन ने हम सि‍पाही आ ने बलदेव अपराधी। कि केने बलदेव एत्ते पैघ अपराधी भेल आ हम ओकर सि‍पाही छी। बलदेवक मन बीरान होइत ऐ दुनि‍याँकेँ देखैत जे जहि‍ना फलसँ लुबधल आमक गाछ बि‍हाड़ि‍क झोकमे खसि‍ पानि‍ फेरि‍ दैत तहि‍ना ने अपनो आ परि‍वारोकेँ भऽ रहल अछि‍। मुदा आब तँ ने सोचै-बि‍चारैक समए रहल आ ने ओकरा पुरबैक।

तीनू गोटे अपने-आपमे मस्‍त। मुदा जहि‍ना तीर्थस्‍थानमे अनठि‍या यात्री एक-दोसर लग बैसि‍ अबैक कारणो पुछैत आ रस्‍ताक भीड़-कुभीड़ सेहो पुछैत तहि‍ना दोसर सि‍पाही चुप्‍पी तोड़ैत बलदेवकेँ पुछलक-
भाय, आइ तँ फाँसि‍येपर चढ़ि‍ जि‍नगीक अन्‍त‍ करबह। मुदा एकटा बात कहह जे केना-केना करैत एहेन सजाएक भागी भेलह?”
सि‍पाहीक प्रश्न सुनि‍ बलदेव मर्माहत भऽ जि‍नगीक समुद्रमे डूमि‍ गेल। जहि‍ना पोखरि‍मे पानि‍क ऊपरक आवाज तँ पानि‍क भीतरोमे पहुँचैत मुदा पानि‍क भीतरक आवाज ऊपर नै अबैत तहि‍ना बलदेवकेँ भेलै। बकार बन्न रहै मुदा कलपैत मन कि‍छु बजैत जरूर रहै। जि‍नगीक समुद्रमे डुमैत बलदेवकेँ, जहि‍ना छठि‍आरीक दूध बच्‍चाकेँ मन पड़ि‍ जाइत छैक तहि‍ना जि‍नगीक ओइ धरतीपर पहुँचि‍ गेल जतए अवोधे नै छेहा अवोध रहैए। मन पड़लै ओ दि‍न जइ दि‍न दोसर बच्‍चाक खेलौना छीनि‍ नुका धेलौं आ माइयो झूठ बाजि‍ लाथ कऽ लेलकै। मन पड़ि‍ते सुबहक सूर्ज जकाँ, लालीसँ दप-दपी चेहरामे आबए लगलै। मुसि‍कि‍याइत बलदेव बाजल-
सि‍पाही भाय, बच्‍चाक ओ दि‍न मनसँ नि‍कलैले छटपटाइए तँए पहि‍ने वएह कहै छी।‍
बलदेवक बात सुनि‍ सि‍पाहीक मन सेहो अपन बालपन आ परि‍वारक बच्‍चापर पड़लै। सड़क नपैत दूरबीन जकाँ कतौ-सँ-कतौ दुनू गोटे नापए लगल। सगतरि‍ बच्‍चे-बच्‍चा देखि‍ पड़ैत। आगूओ बच्‍चा पाछूओ बच्‍चा तइ बीच अपनो दुनू बच्‍चा। बच्‍चाक वनमे दुनू गोटे हरा गेल। हराइते दुनू गोटे सहटि‍ कऽ आरो लग आबि‍ गपकेँ आगू बढ़ौलक।
जहि‍ना दुखक नि‍वारण बोल आ नोर दुनूसँ होइत अछि‍ तहि‍ना बलदेव अपन दुखनामा बजैत बाजल-
भैयारी, बच्‍चामे हम दोसर बच्‍चाक खेलौना छीन कऽ चोरा रखलौं। कनैत ओ बच्‍चा आंगन जा माएकेँ कहलक। बच्‍चाक संगे माए आबि‍ पुछलक। नठि‍ गेलौं। मुदा रखैले माएकेँ दऽ देने रहि‍ऐ। माइयो नठि‍ गेल। तेसर दि‍न वएह खेलौना लेने ओकरे आंगन खेलाइले गेलौं। दुनू माए-बेटा चि‍न्‍ह गेल। कहलक तँ कि‍छु नै मुदा चोरबा नाओं राखि‍ देलक।‍
बलदेवक बात सुनि‍ ठहाका मारि‍ सि‍पाही अपन संगी, दोसर सि‍पाही दि‍स इशारा करैत बाजल-
भैयारी, संगी तँ गाजा पीब मस्‍त छथि‍। बचलौं दुइये गोटे, जेकरा सभक राज-पाट छि‍ऐ से सभ अपन सम्‍हारह। तइसँ हमरा की। अच्‍छा तेकर बाद की भेल?
सि‍पाहीक बात सुनि‍ बलदेव गुम्‍म भऽ गेल। कने काल गुम रहि‍ बाजल-
ओइ दि‍नक नीक आइ अधला बूझि‍ पड़ैए।‍
बलदेवक उत्तर सुनि‍ चौंकैत सि‍पाही बाजल-
से केना, से केना भैयारी?
वि‍स्‍मि‍त होइत बलदेव बाजल-
भैयारी, बात ओतबेपर नै अॅटकल। आगू बढ़ि‍ गेल।‍
की आगू बढ़ि‍ गेल?
पानि‍ भरैले माइयो इनारपर गेल आ ओहो दुनू माइपूत आएल। आरो गोटे सभ रहए। तइ बीच ओ माएकेँ कहलक, अहींक बेटा हमरा बेटाक खेलौना चोरा लेलक। एतबे बजैत, अँएले, वँएले, पछि‍यामे पजड़ल पसाही जकाँ लगि‍ गेलै। दुनूक बीच कहा-कही शुरू भेल। कहा-कहीसँ गारा-गारी हुअए लगल। जहि‍ना सात पुरुखाकेँ हमर माए उकटए लगलै तहि‍ना ओहो उकटए लगल। तइ बीच एक्के-दुइये आनो-आन कहा-कहीमे शामि‍ल हुअए लगल। हल्‍ला सुनि‍ लोको सभ आबए लगल। जे अबै से कोनो दि‍स सन्‍हि‍या जाए। दू पाटीमे बँटि‍‍ खूब गारि‍-गरौबलि‍ चलए लगलै।‍
बलदेव बात समाप्‍तो नै केने छल आकि‍ बीचेमे दोसर सि‍पाही टोनि‍ देलक-
ई तँ नाहकमे एत्ते बात बढ़ल?
से कि‍ ओतबेपर अॅटकल। आरो बेसि‍या गेल। दुनू दि‍सक गबाही कमलेसरि‍ये माता हुअए लगलखि‍न। कारण जे सभ तँ कानो ने कोनो दि‍सक पाटी बनि‍ झगड़ा, गारि‍-गरौबलि‍मे शामि‍ल रहए।
जहि‍ना फुलाएल पानकेँ मुँह बन्न कऽ आनन्‍द लेल जाइत अछि‍ तहि‍ना आनन्‍द लैत सि‍पाही बाजल-
स्‍त्रीगणेक बीच झगड़ा भऽ कऽ रहि‍ गेल। आकि‍ आगू बढ़ल?
सि‍पाहीक प्रश्न सुनि‍ बलदेव बाजल-
मरद स्‍त्रीगणमे कोनो भेद अछि‍। ने मरद‍ मरद जकाँ रहैए आ ने स्‍त्रीगण स्‍त्रीगण जकाँ। मरदो मौगि‍आही चालि‍ पकड़ि‍ मौगी बनि‍ गेल अछि‍ आ मौगि‍यो मरदनमा चलि‍ पकड़ि‍ मरद बनि‍ गेल अछि‍। स्‍त्रीगणक गारि‍-गरौबलि‍ पुरुखक मुँहमे चलि‍ आएल। जहि‍ना एक चम्मच दही तौला भरि‍ दूधकेँ दही बना दइए, जइसँ एक तौलाकेँ के कहए जे कतेको तौला दूध दही बनि‍ जाइए तहि‍ना स्‍त्रीगणक मुँहक गारि‍ पुरुखमे चलि‍ आएल।
सि‍पाही- ‍होतसँ होतान भऽ गेल।
बलदेव- अँए एतबे भेल, स्‍त्रीगण ने भोरसँ साँझ धरि‍ गारि‍येक माला जपि‍ सकैए मुदा पुरुखमे तँ से नै होइए। एकसँ दू गारि‍ मुँहसँ नि‍कालि‍ते हाथ उठए लगै छै। जखने हाथ उठल आकि‍ दोसर‍पर खसल। सएह भेल।
रस चुसैत सि‍पाही बाजल-
तखन तँ मारि‍ भऽ गेल हएत?
सि‍पाहीक जि‍ज्ञासु प्रश्न बलदेवकेँ उत्‍साहि‍त करए लगल। उत्‍साहि‍त होइत बलदेव बाजल-
मारि‍ये भेल की गधकि‍च्‍चनि‍ मारि‍ भेल। मुदा दुनू दि‍स‍ एक रंग नै भेल। हमर दि‍यादी नमहर, तहूमे तेहेन छड़े-छाँट समांग सभ अछि‍ जे देखबोमे राक्षसे जकाँ लगबो करैए। ओकर दि‍यादी छोट माने कम संख्‍याक अछि‍ तँए वएह सभ बेसी मारि‍ खेलक।
सामंजस करैत सि‍पाही बाजल-
‍एतए तँ दुइये गोरे छी, तेसर हमर संगी- पहि‍ल सि‍पही अछि‍, ओ तँ भकुआएले अछि‍। नि‍च्‍चा धरती ऊपर अकास अछि‍। तँए दुइये गोरेक बीच पनचैती करू जे नीक भेल कि‍ अधला?”
सि‍पाहीक बात सुनि‍ बलदेव आगू बढ़ैत बाजल-
पनचैती पछाति‍ करब। अखने अगुता गेलौं भैयारी! अखन तँ पेनि‍यो नै छनाएल अछि‍।‍
बलदेवक बात सुनि‍ सि‍पाही घड़ी देखलक। साढ़े नअोए बाजल। एक तँ ओहि‍ना प्रतीक्षाक समए गड़ूगर होइ छै तइपर जहलक बीचक प्रति‍क्षा! समए पाबि‍ सि‍पाही बाजल-
आरो बात अछि‍ भैयारी?
आरो सुनि‍ जहि‍ना आदि‍-इत्‍यादि‍ नेनमुँह बच्‍चाकेँ हरा दैत अछि‍ तहि‍ना बलदेव हरा गेल। बाजल-
आरो कि‍ कनि‍ये अछि‍ जे धक दऽ नजरि‍ चलि‍ जाएत। मारे-अमार लगल अछि‍। तइ बीचमे सँ बीछए पड़त कि‍ने। नै तँ ओही नेनमुँह बच्‍चा जकाँ जि‍नगी भरि‍ आदि‍-इत्‍यादि‍ करैत रहब, मुदा ओकरा बीछि‍ नै पएब।‍
बलदेवक थीर वि‍चार सुनि‍ सि‍पाही अपनाकेँ थीर करैत बाजल-
अच्‍छा होउ। अखन दू घंटासँ बेशि‍ये समए अछि‍।‍
दू घंटासँ बेसी समए सुनि‍ बलदेव बाजल-
‍दू घंटामे तँ वि‍द्यार्थी परीक्षा पास कऽ लइए। तइसँ बेसी समए लगने बोर्ड-युनि‍वसि‍टीसँ डि‍ग्री लऽ अबैए। अखन बहुत समए अछि‍।
समए पाबि‍ सपाही जेबीसँ सलाइ-सि‍गरेट नि‍कालि‍ एकटा अपनो आंगुरसँ दबलक आ दोसर बलदेवोकेँ देलक। सलाइ खरड़ि‍ सि‍गरेट सुनगा दुनू पीबए लगल। दुनू मुँहक घुआँ मुँहसँ नि‍कलि‍ते तेना मि‍लैत जाए जे फुटा कऽ देखब असंभव भऽ गेल। मुँहक सि‍गरेट सठि‍ते बलदेब बाजल-
भैयारी, कि‍छु घंटाक मेहमान छी, अहाँ कतए रहब हम कतए रहब तेकर कोन ठेकान। मुदा मनमे जे अछि‍ ओ केकरा कहि‍ सकबै। तँए जाबे एकठीम छी ताबे सुनू। जतए धरि‍ भऽ सकत ओते तँ मन हल्लुक रहत।‍
बलदेवक बात सुनि‍ सि‍पाही बाजल-
जखन सुनै लगलौं तँ सुनाउ, जत्ते सुनाएब सभ सुनि‍ लेब। तहूमे बाल-बोधक गप छी, हम सभ नै सुनब तँ के सुनतै। आखि‍र गारजनो तँ छि‍यन्‍हि‍हेँ।‍
मुस्‍कुराइत बलदेव बाजए लगल-
ठीकसँ मन नइए। मुदा वएह सात-आठ बर्खक रही।‍
बीचेमे सि‍पाही टोकलक-
ने सात ने आठ, साढ़े सात भेल। तइले एत्ते ततमताइ कि‍अए छी।‍
बलदेव- एते नीक नहाँति‍ मन अछि‍ जे अनका बाड़ीसँ नेबो, दाड़ीम, लताम चोरा-चोरा खूब आनी। पड़ोसि‍येक नेबो बाड़ी हमरा भाँगक चहटि‍ लगौलक।‍
जि‍ज्ञासा करैत सि‍पाही-
से केना, से केना?
बाड़ी-झाड़ी लगबैमे एकटा पड़ोसि‍या बड़ माहि‍र। भरि‍ दि‍न ओही पाछू बेहाल। मुदा गुणो रहनि‍, ने केकरो‍ बाड़ी-झाड़ी जाइसँ रोकथि‍न आ ने सोझामे छुच्‍छे हाथे केकरो घुमऽ देथि‍न। हुनके बाड़ीसँ सभ दि‍न दूटा नेबो तोड़ि‍ ली, आ चौकपर बेचि‍, भांगो आ पानो खा ली। गुजर करै जोकर खेत-पथार तँ नहि‍ये रहए मुदा तैयो सात-आठ मास खेतक उबजासँ गुजर चलि‍ जाए। कट्ठा दसे-बारहेक करीब बटाइयो खेत बाबू करैत रहथि‍। तइ सब मि‍ला साल-माल लगि‍ जाइत छल। ओना साँझू पहर कऽ जे अन्‍ट-सन्‍ट काजो करी आ बजबो करी तइसँ बाबू बूझि‍ गेल रहथि‍ जे छौड़ा बहबाड़ि‍ भेल जाइए। संगति‍ खराब भऽ गेल छै।
सि‍पाही- बाबू कि‍छु कहथि‍ नै?
बलदेव- कहि‍तथि‍ की माइयक ने दुलारू बेटा रही। जँ कहि‍यो कि‍छु बजौ चाहथि‍ तँ तेना कऽ माए झपटि‍ लन्‍हि‍ जे मुँहे बन्न भऽ जानि‍। अोना भैयारीमे असगरे रही तहूसँ कहि‍यो तेना भऽ नै कहए चाहथि‍।‍
सि‍पाही- तब की भेल?
बलदेव- एक दि‍न कनी पहि‍ने पि‍सुआ भांगक गोली खा लेलाैं तइपर सँ पान सौ नम्‍मर जरदा देल पान कनी पुष्‍टसँ चढ़ा देलि‍ऐ। घरपर अबैत-अबैत खूब नि‍शां लगि‍ गेल। बाबू दरबज्‍जेपर रहथि‍। कहलनि‍ जे एकटा बात पूछि‍यौ, कहलि‍यनि‍ जे एकटा कि‍अए एक हजार पूछू। हमहूँ हाथि‍येपर सवार रही।‍
हाथीपर सवार सुनि‍ सि‍पाहीकेँ हँसि‍ लगि‍ गेल। हँसि‍केँ सम्‍हारि‍ बाजल-
आ जे हाथीपर सँ खसि‍ पड़ि‍तौं तखन की होइतए?
मुस्‍कुराइत बलदेव बाजल-
हद करै छी भैयारी। से जँ बुझैत रहि‍ति‍ये तँ एहि‍ना करि‍तौं। यएह ने नै बुझलि‍ऐ जे केना लोक उट्ठी-बैसी खेल खेलाइए। केना खसलाहा अपनाकेँ चढ़ल बुझैए।‍
सि‍पाही- बाबू की पुछलनि‍?
पुछलनि‍ जे अन्न-पानि‍ तँ जेना-तेना बटाइयो-खोटाइ कऽ साल-माल लगि‍ये जाइए मुदा दूध-दहीक नसीब नै होइए। दूध-दहीक नाओं सुनि‍ अपनो मन चमकल। कहलि‍यनि‍ से कि‍ कहै छहक। कहलनि‍, एकटा महींस पोसि‍या लऽ लइतौं। आब तोहूँ चरबै-बझबै जोकर भइये गेलह।‍
बीचेमे ि‍सपाही टोनलक-
‍बड़ सुन्‍दर बात कहलनि‍।
बलदेव- हँ-हँ। से तँ अपनो नीक लागल। मनमे उठल जे जहि‍ना खेतक उबजाक अगो, तीमन-तरकारीक पहि‍ल फड़क हकदार आने होइत तहि‍ना गाए-महींसबला परि‍वारमे डारहीक हकदार तँ धि‍ये-पुते ने होएत। एक तँ डारहीसँ छालही धरि‍, दोसर दूधसँ दही धरि‍क ओरि‍यान हएत। तइपर सवारी बना महींसपर चढ़ि‍ सौंसे गामो घूमब। बि‍नु कि‍छु केनहुँ काजक मोजर सेहो हेबे करत। आ कनी-मनी संगति‍यो मँुहेँ सुनि‍ र्इहो बुझैत‍ रहि‍ऐ जे गजेरी-भंगेरीक पथ्‍य दूधे-दही छी। जँ से नै खाएत तँ उनटे गांजा-भांग खा जेतइ। जानि‍ये कऽ तँ भांग खाइते छी। अहीमे रमल रहै छी। जे काजुल अछि‍ ओ ने काजमे रमैए आकि‍ जे चि‍न्‍तक अछि‍ ओ चि‍न्‍तनमे। मुदा हम तँ तइ सभमे नै छी। जि‍नगी जँ रमता जोगी बहता पानी नै बनल तँ जि‍नगी सराठि‍ये ने भऽ जाइए।‍
चौंकैत सि‍पाही बाजल-
सराठी जि‍नगी केकरा कहै छि‍ऐ?
सि‍पाहीक बात सुनि‍ बलदेवकेँ हँसी लागल। जहि‍ना एको दाना नून आकि‍ चि‍न्नी अपन सुआद जना दइए। तहि‍ना बलदेवकेँ अपन ज्ञानक सुआद लगलै। मुस्‍की दैत बाजल-
जहि‍ना धारक पानि‍ ताधरि‍ चलता रहैए जाधरि‍ संगे-संग चलैत रहैए। मुदा जखने कोनो खत्ता-खुत्तीमे फँसि‍ जाइए आ बहाउ रूकि‍ जाइ छै तखन माटि‍क संग सड़ए लगैए। सड़ैत-सड़ैत एत्ते सड़ि‍ जाइए जे नहाइ-पीबैक कोन गप जे अपन सड़नि‍सँ ओहन-ओहन बि‍मरि‍याह कीड़ी सभकेँ जनमबए लगैए जे हाथि‍यो सन-सन जानवर आेइमे फँसि‍ जान गमबैए। महींस चरबै जोकर भइये गेल रही। कि‍एक तँ देखि‍ये जे हमरोसँ छोट-छोट छौड़ा सभ चरबैए। कहलि‍यनि‍ नीक काजमे एक्को दि‍न देरी नै करबाक चाही बाबू। जे देरी करैए वएह पछताइए। बाबूओकेँ गप नीक लगलनि‍। एकटा पोसि‍या महींस लऽ अनलनि‍।‍
महींसक नाओं सुनि‍ सि‍पाही बाह-बाही भरैत बाजल-
जखने कमाइ-खटाइ लोक करए लगैए तखनेसँ अपन धरतीक भार उतारए लगैए।‍
सि‍पाहीक बात बलदेवकेँ नीक लगलै। जहि‍ना एके अन्न पेट भरैक संग-संग मनमे आनन्‍दो दइ छै तहि‍ना बलदेवोक मनमे भेलै। गद-गदाएल बाजल-
असलाहा बात तँ कहबे ने केलौं।‍ कहि‍ चुप भऽ कि‍छु मन पाड़ए लगल। जहि‍ना खि‍स्‍सकरक संग हूँहकारी भरने ओकर उत्‍साह उठैत रहै छै तहि‍ना बलदेवोक उठल। राज-काजसँ हूसल रागी-भोगी जकाँ दोहरबैत बलदेव बाजल-
ओह, सुखक दि‍न चलि‍ गेल। आब थोड़े देखब आकि‍ भोगब। ओ हो हो।‍
दुनूक मनसँ बारह बजेक फाँसी हराएल। एक फाँसी ओहनो होइत जइमे संकल्‍प रूपी कल्‍याणी माइक गोदमे बैसि‍ हँसैत-चढ़ैत दोसर एहनो होइत जे खण्‍ड-खण्‍ड टुटल-छि‍ड़ि‍आएल मन शरीरकेँ छौड़ैत। हूँहकारी भरैत सि‍पाही बाजल-
से की। से की?
चानि‍ ठोकैत बलदेव बाजल-
महींससँ दूध-दही हेबे करए। पाँच गोटे एहेन छड़े-छाँट महींसवार रही जे महींस चरा साँझू पहर घुमती काल‍ लोकक खेतक जजातो चरा लि‍ऐ आ धानक महीनामे धानो नोचि‍ लि‍ऐ आ नारो बान्‍हि‍ महींसपर लादि‍ लऽ अनि‍यै। तते अन्न घरमे ढेरि‍या जाए जे खाइक दुखे हरा गेल रहए।
सि‍पाही- सभ  दि‍न महींसे चरबैत रहलि‍ऐ?
आँखि‍-भौं चमकबैत बलदेव बाजल-
हद करै छी अहूँ भैयारी। बुधि‍-बलक संग जि‍नगि‍यो ने घटै-बढ़ै छै। ठीकसँ तँ नै मन अछि‍। मुदा एते मन अछि‍ जे दुरागमन भऽ गेल रहए। बाबूओ मरि‍ गेल रहथि‍। जहि‍ना खेत-पथार बेचि‍ लोक नोकरी करए जाइए तहि‍ना महींस बेचि‍ लेलौं। मुदा पाँचो महींसवारक संबंध आरो बढ़ि‍ गेल। खेनाइ-पीनाइ कथा-कुटुमैतीक संग पनचैती सभ करए लगलौं। गामेमे बहरबैया मालि‍कक जमीनो आ कचहरि‍यो रहए। कचहरीक बराहि‍लसँ दोस्‍ती सेहो भऽ गेल। संजोगो नीक रहल, बराहि‍लगि‍रीक नोकरी भऽ गेल। सए बीघा जमीनक मालि‍क भऽ गेलौं।‍
मालि‍कक नाअों सुनि‍ सि‍पाही बाजल-
तखन तँ मानो-दान हुअए लगल हएत?
मानदान सुनि‍ कठ-मुस्‍की दैत बलदेव अपसोच करैत बाजल-
सोझामे जहि‍ना मान-दान बढ़ल परोछमे तहि‍ना गारि‍यो बढ़ि‍ गेल।‍
से कि‍अए?
कि‍छु मन पाड़ैत बलदेव बालज-
करबो तहि‍ना करि‍ऐ। जेना गमैया नेता सभकेँ देखबै जे उपरका नेताक आगूमे जे कि‍छु बाजत आ करत, लोकक बीच उनटि‍ कऽ मुँहो आ चालि‍यो बदलि‍ लेत। तहि‍ना करए लगलौं। मालि‍कक -जमीनदार- आदमीक बीच कि‍छु आ लोकक बीच कि‍छु करए लगलौं।‍
उनटैत-पुनटैत पाशा देखि‍ सि‍पाही बाजल-
से की?
बलदेव- गामक लोककेँ कोनो मोजर दि‍ऐ। अनेरे केकरो गरि‍या देलौं, बलजोरी कोनो चीज लऽ लेलौं। तहि‍ना स्‍त्रीगणो सभकेँ, केकरो कि‍छु कहि‍ दि‍ऐ, केकरो कि‍छु।‍
कि‍यो जबाब नै दि‍अए?
जबाब कि‍ दइत, जहि‍ना पर्ड़ू खुट्टा देखि‍ चुकड़ै छै तहि‍ना ने रहए। एक दि‍स मालि‍कक धाक दोसर अपन बलउमकी।‍
बीचेमे सि‍पाही बाजल-
की अपन उल-उमकी?
जहि‍ना शरीरेक मुख्‍य अंग आँखि‍यो छी आ कानो छी। मुदा दुनूमे कते अन्‍तर छै से देखै छि‍ऐ। कान बेचारा एहेन सज्‍जन अछि‍ जे नीकसँ नीक आ अधलासँ अधला सुनि‍ कि‍छु नै करैत, मुदा आँखि‍ केहेन लुच्‍चा अछि‍ जे देखि‍ते छि‍ऐ, कखनो ललि‍या कऽ अगि‍या जाइत तँ कखनो कनखि‍या जाइत तँ कखनो गैंचि‍या जाइए। तहि‍ना अपनो अलेल खेने-पीने सदि‍काल रमकी चढ़ले रहैत छलए।‍
सि‍पाहीक मनमे तरंग उठलै। तरंगि‍ कऽ बाजल-
गामक पढ़ल-लि‍खल लोक ऐ बातकेँ नै बुझैत?
सि‍पाहीक प्रश्न सुनि‍ बलदेव गुलाबी हँसी हँसि‍ बाजल-
जहि‍ना कृष्‍ण एक दि‍स भदवरि‍या बूझल‍ जाइ छथि‍ तँ दोसर परव्रह्म सेहो छथि‍। मुदा छथि‍न तँ सभ ले। तँए जे जेहेन तेकरा ले तेहन। तहि‍ना वीणा वादि‍नी सेहो ने छथि‍। जेहेन कर्म तेहेन वोध। तही बीचमे ने समाजक पढ़लो-लि‍खल लोक छथि‍। जखन जेहेन तखन तेहेन।
से केना?
ि‍सपाहीक प्रश्न सुनि‍ अपनाकेँ सम्‍हारि‍ बलदेव बाजल-
जहि‍ना काजोमे लोक एहेन रमान रमि‍ जाइए जे खेनाइ-पीनाइसँ लऽ कऽ अपन जि‍नगीक कि‍रि‍या-कलापक संग घरो-परि‍वार बि‍सरि‍ जाइए तहि‍ना दोसर दि‍स बेरागी सेहो ने व्रह्ममे लीन भऽ सभ कि‍छु बि‍सरि‍ जाइए। रमता जोगी तँ दुनू बनि‍ जाइए। मुदा की‍ दुनू एक्के भेल?
बलदेवक बात सि‍पाही नै बूझि‍ सकल। बाजल-
कनी फरि‍या कऽ कहि‍यौ।
जहि‍ना कारखानाक बनल कपड़ाक थानसँ दरजी काटि‍-काटि‍ रंग-रंगक वस्‍त्र बनबैत तहि‍ना बलदेव बनबैत बाजल-
देखि‍यौ, सप्‍ताह मास आ सालेक लि‍अ। आइ तारीख एक महीना एक छी। ई दू सालक बीचक सीमानपर अछि‍। एकक अंत दोसराक आरंभ छी। बाकी जते अछि‍ से सभ कचि‍या अछि‍। जेना मासक भीतर बाइस दि‍नकेँ कि‍ कहबै? तहि‍ना सप्‍ताहक भीतर पाँच दि‍नकेँ की कि‍ कहबै?
बलदेवक बात सुनि‍ सामंजस करैत सि‍पाही बाजल-
खैर, छोड़ू दुनि‍यादारीकेँ। ठनका ठनकै छै तँ कि‍यो अपना माथपर हाथ दइए।‍
सि‍पाहीक बात अन्‍तो नै भेल छल कि‍ बीचेमे बलदेव बाजल-
भैयारी, आइ बूझि‍ पड़ैए जे गलती नै भेल गलति‍क बाटे पकड़ा गेल।‍
चौंक कऽ ि‍सपाही बाजल-
से की! से की?
उदास होइत बलदेव बजए लगल-
भैयारी, कहैले तँ जते मुँह तते बाट अछि‍। जँ से नै रहैत तँ हृदैसँ नि‍कलि‍ दोसर हृदैमे सटैत केना अछि। मुदा ओते कहैक अखन समए नइए। तँए एतबे कहब जे मनुष्‍यक बीच दू रास्‍ता बनल अछि‍। एक रास्‍ताकेँ लोक‍ मनुखक रास्‍ता बूझि‍ केकरो कि‍यो चलैसँ रोकैत नै अछि‍ आ दोसर अछि‍ जे अपना छोड़ि‍ दोसरकेँ मनुख बुझि‍ते ने अछि‍। रास्‍तासँ हटि‍ जहि‍ना जंगल-झाड़मे चलैत-चलैत डगर बनि‍ जाइ छै, तहि‍ना डगर धड़ा देने अछि‍।‍

जहि‍ना लोहाक कोनो औजार जखन भोति‍याए लगैत तखन कारीगर ओकरा आगि‍मे धीपा, पीटि‍ पानि‍मे पनि‍या दैत, जकरा पानि‍ चढ़ब कहल जाइ छै। तहि‍ना या तँ पाथरपर पानि‍ दऽ दऽ रगड़ि‍ सान चढ़बैए तहि‍ना सि‍पाहीक कारीगर सि‍गरेट पीबाक इच्‍छा जगौलकनि‍। जेबीसँ सि‍गरेट नि‍कालि‍ एकटा अपनो संगी -जे गांजा पीब मस्‍त भऽ सुनैत छल- केँ आ एकटा बलदेवो हाथमे दैत सलाइ खरड़लक। एक दम पीब पहि‍ल सि‍पाही धुँआ फेकैत बाजल-
अनेरे अहाँ दुनू गोरे मगजमारी करै छी। एते छि‍लनि‍ करैक कोन बेगरता अछि‍। देखबै जे भोजमे दर्जनो समान रहने खेनि‍हार एक-दूटा पर चोट करैए। परसनि‍हारक काज छि‍ऐ पूछि‍-पूछि‍ देनाइ। खेनि‍हारक मन छि‍ऐ जे खाएब कि‍ नै। आइ जइ गति‍क फल पबए चलब से केना भेल?
सि‍पाहीक प्रश्नसँ बलदेवकेँ दुख नै भेल। संगीक एहसास भेल। जहि‍ना जुआन-जहानकेँ सासुरक रंगोली कथा संगीकेँ सुनबैत आनन्‍द अबैत तहि‍ना बलदेवकेँ भेल। दुखो तँ दोसरकेँ कहने कमैए। जँ से नै तँ नोरक संग कि‍यो कि‍अए अपन पति‍-वि‍योगक खेरहा सुनबैए। बात मन पाड़ैक समए बनबैत बलदेव बाजल-
भाय सहाएब, औझुका खुशी सन जि‍नगीमे कहि‍यो खुशी नै भेल छल।‍
सि‍पाही- से की?
बलदेव- अपन बेथा-कथाकेँ जँ एकोटा सुनि‍नि‍हार भेट जाए‍ तँ आेइसँ नीक की हएत। तहि‍ना हृदैक वेदना जँ अहाँ सुनए चाहलौं तँ जि‍नगीक अंति‍म दि‍नक अंति‍म पहरमे सीढ़ीक अन्‍ति‍म पौदानक बात कहए चाहै छी।
बलदेवक वि‍चार सुनैक खुशीमे सि‍पाही वि‍ह्वल भऽ बाजल-
जहि‍ना भतभोजक अंति‍म वि‍न्‍यास चीनी होइत तहि‍ना जँ अहाँक मधुर वाणी वाणीक -अपन वाणी- संग मि‍लत तखने ने मि‍श्री बनि‍ पाथर सदृश सक्कत हएत। यएह ने जि‍नगीक ओर-छोर छी।‍
सि‍पाहीक बात सुनि‍ दोसर सि‍पाही बाजल-
भैया, अहाँ भकुआएल मने भकुआ लगा देलि‍ऐ आ भकुआ गेलौं।‍ कनी चि‍क्कन जकाँ कहि‍यौ।‍
सि‍पाहीक बात सुनि‍ पहि‍ल सि‍पाही बाजल-
सभ दि‍न तँ दस कि‍लोक बन्‍दूक कन्‍हामे लटकौने रहै छह, तखन फुलसन वि‍चार पाथर सन भारी कोन कान्‍हमे लटकेबह। वहि‍ना तँ कान्‍ह बदलि‍ दुनू कान्‍ह भकभकाइत रहै छह तखन माटि‍ तँ माटि‍ये छी।
सि‍पाही- कनी फरि‍छा कऽ कहि‍यौ।
सि‍पाही- देखहक जहि‍ना ई दुनि‍याँ माटि‍क बनल अछि‍ तहि‍ना ने ई देहो माटि‍येक छी। तँए देह बुझैले माटि‍ बुझए पड़तह। रंग-रंगक माटि‍सँ ई दुनि‍याँ बनल अछि‍। एकर गि‍नती करब साधारण नै। जहि‍ना देखबहक जे साते रंग तते रंग बनि‍ गेल अछि‍ जे डोराक दोकान, जे साइयो रंगक डोरा बेचैए तेकरो दोकानपर दर्जी घूमि‍ जाइए जे ऐ रंगक डोरा नइए। तहि‍ना माटि‍यो अछि‍। एक माटि‍ थाल बनबैए तँ दोसर चि‍क्कन। ततबे नै एक पाथर सन सक्कत पत्‍थर बनबैए तँ दोसर पानि‍ सनक वस्‍तुकेँ पैदा करैबला लेयर -जल मि‍श्रि‍त माटि‍-। अच्‍छा छोड़ह अपना सभ गप। बेचारा बलदेवक अंति‍म समए गुजरि‍ रहल अछि‍ तँए पहि‍ने ओहि‍ना सूनब होएत जहि‍ना सूर्यास्‍तक समए कोनो दूर जाइत बटोही अनभुआर जगहपर आबि‍ अॅटकैक ओरि‍यान करए चहैत। पहि‍ने अहाँ अपन बात वि‍सर्जन करू बलदेव भाय तखन जे हेतै से हेतै। जे जीबए से खेलए फागु, जे मरए से लेखे जागु।‍
अंति‍म तीर नि‍कलैत जहि‍ना हजारो वाणसँ वेधल ति‍राएलक हृदए सुखसागरक घाटपर पहुँचि‍ हि‍यबैत जे सभसँ सुन्नर जल कोनठाम छै, जइठाम स्‍नान करब। जाधरि‍ पवि‍त्र पानि‍सँ पथ नै पखारब ताधरि‍ पएर पि‍छड़ि‍ते रहत। जाधरि‍ पएर पि‍छड़ैत रहत ताधरि‍ सोझ भऽ चलि‍ नै सकै छी। जाधरि‍ सोझ भऽ ठाढ़ नै भऽ पएब ताधरि‍ कमलासन देखि‍ नै पएब। जाधरि‍ कमलासन देखि‍ नै पएब ताधरि‍ रंग बदलैत कमल कुमुदनीक संग भौराकेँ पराग-जालमे ओझरा लाल-उज्‍जर आॅचरे समेटि‍ राति‍ भरि‍क जीवन-रक्षण ओइ मातृ सदृश करैत जइ सदृश छातीमे सटा मैया यशोदा अपन लाड़लाकेँ जि‍नगीक कथा-बेथा सुना-सुना सुनबैत।‍‍

अंति‍म तीरसँ ति‍राएल वा वाणसँ वेधाएल बलदेवक संकल्‍प-शक्ति‍ जागल। शर्त लगबैत बलदेव बाजल-
भैयारी, दुनि‍याँमे हि‍त-अपेछि‍त, दोस-महि‍म आदि‍ अनेको तरहक होइत अछि‍, मुदा से नै जि‍नगी तँ ओकरे जि‍नगी ने सार्थक होएत जे संकल्‍पि‍त हुअए। भलहिं छोटसँ-छोट संकल्‍प कि‍अए ने होए। मनुष्‍यक पहि‍ल वाण तँ संकल्‍पे वाण ने होइत जँ से नै तँ जि‍नगी की। आइ हमरा ओहनो वि‍चार वोध भऽ रहल अछि‍ जे सपनोमे नै सपनाएल छलौं। ओना सपनो तँ सपने छी। कोनो दवाइ जहाजक सैर करबैत, तँ कोनो मलेरि‍या मच्‍छड़क मेलामे सैर करैत।‍
जहि‍ना कोनो वस्‍तुक जि‍ज्ञासा एते बढ़ि‍ जाइत जे सभ कि‍छु बि‍सरि‍ ओकरा पकड़ैले बाबल बनि‍ जाइत तहि‍ना सि‍पाही बाजल-
समैपर धि‍यान रखए पड़त। कालक गति‍ केकरो बुते ने राेकाइ छै। तँए अपनाकेँ ओइमे समावेश करू।

जहि‍ना भोजक वारीक चंगेरामे खाजा रखि‍ एकटा हाथमे नेने पंचक आगूमे आग्रह करैत, तेहने तगेदा बूझि‍ बलदेव बाजल-
भैयारी, अहाँ तँ भाइक संग, जे माइक संग अबैत ओ यार छी तँए संकल्‍प बूझू जे झूठ नै कहै छी। ई बात आइ बुझै छी अनकर मेहनति‍केँ तागति‍क बलपर लूटैत-चोरबैत एलौं। जेकर चोरोलि‍ऐ ओहो हमरे सन मनुख दूटा हाथ-पएरबला ने छै। हम कि‍अए छुलि‍ऐ। हमरा ओही दि‍न फाँसीपर समाज चढ़ा सकै छल आ अपन नि‍अममे सुधार कऽ सकै छल। मुदा से नै भेल। हम गल्‍ती कहाँ कतौ केलौं गल्‍तीक बाटक जे कर्तव्‍य छै वएह ने केलौं। हम तँ तखन बुझि‍ति‍ऐ जे जखन अपने टा एहेन रहि‍तौं। से तँ नै आगू-पाछू दुनू दि‍स भरल देखलि‍ऐ!
सि‍पाही- भैयारी, एहेन सजाए कि‍अए भेल, से कहाँ कहलि‍ऐ?”
एक टकसँ दुनू सि‍पाहीपर नजरि‍ राखि‍ बलदेव टकटकी लगा देखए लगल। जहि‍ना हजारो मील हटि‍ कोनो वि‍चार जन्‍म लऽ सटि‍ जाइत तहि‍ना सि‍पाही अपराधीक दूरी मेटा गेल। ने सि‍पाही किछु बजैत आ ने बलदेव। मुदा डयूटीक तीर सि‍पाहीकेँ लगल। घड़ी देखि‍ बाजल-
भैयारी, आब सुनैक समए नै पाबि‍ रहल छी।

समैक अभाव देखि‍ बलदेव ओहन कथाकार जकाँ जे जि‍नगीक बेथाकेँ कथा कहैत। घटना-वि‍शेष तँ ओहनो होइत जइसँ गढ़गर घटना सुनि‍नि‍हार भोगने रहैत। मुदा तँए की हुनकर वि‍चारकेँ वि‍चार नै मानबनि‍। तँए समाजक वस्‍तु साहि‍त्‍य छी। वि‍चार-सुझावक लेल पाठक-श्रोताक दरबज्‍जा सदति‍ खुजल रहैक चाहि‍ये। समाधानक अनेको उपाए अछि‍।
तँए जाधरि‍ साहि‍त्‍य समाजक सचि‍त्र नै बनि‍ व्‍यक्‍ति‍-चि‍त्र -वक्रचि‍त्र- बनैत रहत ताधरि‍ दुनूक बीच वि‍षमत नै रहए ओहो अनुचि‍त।
जि‍नगीक अंति‍म मोहक बात अंति‍म मोड़पर आबि‍ बलदेव बाजल-
भैयारी, सरकार वि‍रोधमे हवा उठल। हमहूँ बराहि‍लगि‍री छोड़ि‍ नेता बनि‍ गेलौं। हमरा सबहक जीत भेल। अपनेमे टुटान शुरू भेल सभमे, कि‍सान, बेपारी, वुद्धि‍जीवी, अपराधीमे टुटान भेल। इलाकामे जाल पसरल छल। बुझबे ने केलि‍ऐ जे नेताक टुटानसँ हमहँू टूटि‍ गेलौं। ऊपरे-ऊपर अपेछा रहल, भीतरे-भीतर दुश्‍मनी भऽ गेल। जहि‍ना तीतहा रोगक तीतहो दवाइ होइत आ मीठहो होइत। तेहने टुटानमे फँसि‍ गेलौं। चुनावक समए एलै दोसराकेँ ऐठाम धन लूटैक योजना बनल। मुदा ई नै बुझलि‍ऐ जे ग्रुपमे ओहनो अछि‍ जे खून करए जाइए। भेलै सएह। खून केलक कि‍यो नाओं लागल हमर। अपनो मन कहैए जे खुनी हम नै छी। मुदा सोझामे खून भेल तखन हम केम्‍हर रहि‍ऐ।

तही बीच दर्जनो तैयार सि‍पाहीक प्रवेश भेल। सि‍पाहीकेँ देखि‍ते सि‍पाहि‍यो आ बलदेवाे चौंक गेल। उठि‍-उठि‍ सभ ठाढ़ भेल। जहलसँ नि‍कलि‍ सभ सभकेँ देखए लगल।

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'विदेह' २२४ म अंक १५ अप्रैल २०१७ (वर्ष १० मास ११२ अंक २२४)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -    मैथिलानी केर उपराग राम सं आ समाज ...