Saturday, April 14, 2012

'विदेह' १०४ म अंक १५ अप्रैल २०१२ (वर्ष ५ मास ५२ अंक १०४) PART I


                     ISSN 2229-547X VIDEHA
'विदेह' १०४ म अंक १५ अप्रैल २०१२ (वर्ष ५ मास ५२ अंक १०४)NEPALINDIA
                                            
 वि  दे   विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own script Roman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi

ऐ अंकमे अछि:-

१. संपादकीय संदेश


२. गद्य


  









३. पद्य










३.७.डॉ॰ शशिधर कुमर

३.८.चंदन कुमार झा- गजल/ कविता/ हाइकू
 


४. मिथिला कला-संगीत१.वनीता कुमारी ३.राजनाथ मिश्र (चित्रमय मिथिला) ४. उमेश मण्डल (मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव-जन्तु/ मिथिलाक जिनगी)

 

६.बालानां कृते-बाल गजल चंदन कुमार झा डॉ॰ शशिधर कुमर विदेह”-नेनपन (बालगीत)

 

७. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.]


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भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू।


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गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज'



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 ऐ बेर मूल पुरस्कार(२०१२) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन मूल मैथिली पोथी उपयुक्त अछि ?
Thank you for voting!
श्री राजदेव मण्डलक अम्बरा” (कविता-संग्रह)  13.56%   
 
श्री बेचन ठाकुरक बेटीक अपमान आ छीनरदेवी”(दूटा नाटक)  10.17%   
 
श्रीमती आशा मिश्रक उचाट” (उपन्यास)  6.44%   
 
श्रीमती पन्ना झाक अनुभूति” (कथा संग्रह)  5.42%   
 
श्री उदय नारायण सिंह नचिकेतानो एण्ट्री:मा प्रविश (नाटक)  5.42%   
 
श्री सुभाष चन्द्र यादवक बनैत बिगड़ैत” (कथा-संग्रह)  5.42%   
 
श्रीमती वीणा कर्ण- भावनाक अस्थिपंजर (कविता संग्रह)  5.76%   
 
श्रीमती शेफालिका वर्माक किस्त-किस्त जीवन (आत्मकथा)  7.8%   
 
श्रीमती विभा रानीक भाग रौ आ बलचन्दा” (दूटा नाटक)  6.78%   
 
श्री महाप्रकाश-संग समय के (कविता संग्रह)  5.76%   
 
श्री तारानन्द वियोगी- प्रलय रहस्य (कविता-संग्रह)  5.76%   
 
श्री महेन्द्र मलंगियाक छुतहा घैल” (नाटक)  7.12%   
 
श्रीमती नीता झाक देश-काल” (कथा-संग्रह)  6.44%   
 
श्री सियाराम झा "सरस"क थोड़े आगि थोड़े पानि (गजल संग्रह)  7.12%   
 
Other:  1.02%   
 

ऐ बेर बाल साहित्य पुरस्कार(२०१२) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन मूल मैथिली पोथी उपयुक्त अछि ?

श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जीक तरेगन”(बाल-प्रेरक कथा संग्रह)  48.33%   
 
श्री जीवकांत - खिखिरक बिअरि  26.67%   
 
श्री मुरलीधर झाक पिलपिलहा गाछ  23.33%   
 
Other:  1.67%   
 
 

 

ऐ बेर युवा पुरस्कार(२०१२)[साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन कोन लेखक उपयुक्त छथि ?

Thank you for voting!
श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरीक अर्चिस” (कविता संग्रह)  24.49%   
 
श्री विनीत उत्पलक हम पुछैत छी” (कविता संग्रह)  7.14%   
 
श्रीमती कामिनीक समयसँ सम्वाद करैत”, (कविता संग्रह)  6.12%   
 
श्री प्रवीण काश्यपक विषदन्ती वरमाल कालक रति” (कविता संग्रह)  5.1%   
 
श्री आशीष अनचिन्हारक "अनचिन्हार आखर"(गजल संग्रह)  24.49%   
 
श्री अरुणाभ सौरभक एतबे टा नहि” (कविता संग्रह)  7.14%   
 
श्री दिलीप कुमार झा "लूटन"क जगले रहबै (कविता संग्रह)  7.14%   
 
श्री आदि यायावरक भोथर पेंसिलसँ लिखल” (कथा संग्रह)  5.1%   
 
श्री उमेश मण्डलक निश्तुकी” (कविता संग्रह)  11.22%   
 
Other:  2.04%   
 
  
 

ऐ बेर अनुवाद पुरस्कार (२०१३) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे के उपयुक्त छथि?

Thank you for voting!
श्री नरेश कुमार विकल "ययाति" (मराठी उपन्यास श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर)  35%   
 
श्री महेन्द्र नारायण राम "कार्मेलीन" (कोंकणी उपन्यास श्री दामोदर मावजो)  12.5%   
 
श्री देवेन्द्र झा "अनुभव"(बांग्ला उपन्यास श्री दिव्येन्दु पालित)  12.5%   
 
श्रीमती मेनका मल्लिक "देश आ अन्य कविता सभ" (नेपालीक अनुवाद मूल- रेमिका थापा)  13.75%   
 
श्री कृष्ण कुमार कश्यप आ श्रीमती शशिबाला- मैथिली गीतगोविन्द ( जयदेव संस्कृत)  11.25%   
 
श्री रामनारायण सिंह "मलाहिन" (श्री तकषी शिवशंकर पिल्लैक मलयाली उपन्यास)  13.75%   
 
Other:  1.25%   
 
  
 

फेलो पुरस्कार-समग्र योगदान २०१२-१३ : समानान्तर साहित्य अकादेमी, दिल्ली

Thank you for voting!
श्री राजनन्दन लाल दास  54.1%   
 
श्री डॉ. अमरेन्द्र  22.95%   
 
श्री चन्द्रभानु सिंह  21.31%   
 
Other:  1.64%   
 
 

 

१.       संपादकीय

जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा बायोग्राफी...गजेन्द्र ठाकुर द्वारा ........शीघ्र

आगू-


जगदीश प्रसाद मण्डल पाँच-छह बर्खक रहथि तखनेसँ भाइक संग स्कू‍ल जाए लगला। गामेमे लोअर प्राइमरी स्कूनल, दू पाली स्कूलल चलैत छल। अखन तँ आठम धरि‍क पढ़ाइ हुअए लागल अछि‍ तहि‍ना एक शि‍क्षकसँ चलैत स्कूथल सेहो सतरह शि‍क्षक धरि‍ पहुँचि‍ गेल अछि‍।
तँए कि‍ शि‍क्षा अगुआ गेल? जि‍नगीक लेल सर्वांगीन वि‍कास अनि‍वार्य अछि‍ जँ से नै तँ ओ अपलांग-वि‍कलांग भेल पड़ल रहत। सामान्य‍ स्कूैल-कअोलेज तँ ठाम-ठीम बनल मुदा तकनीकी शि‍क्षाक वि‍कास नै भेल। परि‍णाम बनि‍ गेल अछि‍ जे काजक दि‍शे बदलि‍ गेल अछि‍। खैर जे होउ, मुदा आजादीक पहि‍नौं आ पछाति‍यो बेरमा राजनीति‍क, शैक्षणि‍क दृष्टिल‍सँ अगुआएल।
आजादीक आन्दो लनमे बचनू मि‍श्र उभड़ला। नवानी वि‍द्यालयमे भनसि‍याक काज करैत रहथि‍। लि‍खनाइ तँ नै सीखि‍ भेलनि‍ मुदा वक्ता भऽ गेलाह। देशक प्रति‍ ओहन समर्पित जे आजादीक दौड़मे तीन मास धरि‍ भट्टे-बैगन बि‍ना नूनक, उसनि‍-उसनि‍ खा दि‍न-राति‍ काज करैत रहलाह, आन्दो़लन गाम-गाम पकड़नहि‍ रहए।
काजेसँ इमानदारी सेहो अबै छै। १९३४ ईं.क भूमकमक पछाति‍ राशनक जे बँटवारा हुअए लागल, तइमे एतेक इमानदारीक परि‍चय मधेपुर थानामे देलनि‍ जे समाजक सभ हुनका गाँधीजी कहए लगलनि‍। तइ संग आरो-ओरो रहथि‍। बेरमा पंचायत बनबैमे हुनकर योगदान बहुत रहलनि‍। जनसंख्याजक हि‍साबसँ, ओइ समयक पंचायतक हि‍साबसँ, बेरमा छोट पड़ैत रहए। सामाजि‍क बुनाबटि‍ एहेन जे गाम-गामक बीच अपन-अपन संबंध। तँए के केकरा संग रहत, ई समस्याए।
मुदा दीप गामक नेतृत्वोक सहयोगसँ, जे अपन पंचायत काटि‍ पंचायत बनबैमे सहयोग केलथि‍, पंचायत बनल।

पछाति‍ बचनू मि‍श्रक दि‍माग गड़बड़ा गेलनि‍। ओना अस्सीहसँ ऊपर बर्खक उमेरमे मुइलाह मुदा प्रभाव कमि‍ गेलनि‍। ब्रेन प्रभावि‍त होइक कारण दूटा भेलनि‍। पहि‍ल पारि‍वारि‍क आर्थिक स्थिक‍ति‍ आ दोसर राजनीति‍क क्षेत्रमे इमानदारीक अभाव। मुदा अंत-अंत धरि‍ समाजकेँ जगबैत रहलाह।
जहि‍ना राजनीति‍क दृष्टिक‍सँ बेरमा गाम जागल तहि‍ना शैक्षणि‍क दृष्टिस‍सँ सेहो ई गाम अगुआएल रहल अछि‍। गाममे स्कूूल कहि‍या बनल, एकर नि‍श्चि‍त ति‍थि‍क जानकारी तँ नै मुदा १९३४ ई. क भूमकममे वि‍द्यालयक भीत खसल, ई जानकारीमे अछि‍। मुदा वि‍द्यालयक जगह बदलि‍ गेल। कि‍एक तँ ओइ जगहकेँ जनमानस अशुभ बुझए लागल। ओना ओ स्थाभन गामक ब्रह्म स्थादन छी, शक्ति्‍शाली जगह। अखन ओइ स्थाननमे बाल-बोधक अांगनबारी चलि‍ रहल अछि‍। ओइठामसँ वि‍द्यालय उठि‍ लछमीकान्तक, रमाकान्त साहुक कचहरीमे चलि‍ आएल। शुरूमे लकड़ीक खुट्टापर बाँसेक घर रहै, मुदा पछाति‍ कचहरी नि‍च्चाल सि‍मटी ईंटा ऊपर खढ़क घर बनौलनि‍। ओइ कचहरीमे १९५२ ई.क पहि‍ल चुनावक केन्द्र सेहो बनल।

अखन वि‍द्यालय तेसर स्थाचनपर अछि‍। जे जगह सरि‍सव-पाहीक प्रो. हेतुकर झाक छि‍यनि‍। ओना ओ रजि‍स्रीमु करैले तैयार भेल छथि‍ मुदा जमीन्दाररीक तेहेन ओझरौठमे पड़ल अछि‍ जे हुनका लि‍खले ने होइ छन्हि‍‍! बुढ़ि‍या गाछीक नाओं जमीनक पड़ि‍ गेल अछि‍। सम्प्र ति‍ पंचायत भवन, आठमा धरि‍क स्कूतल, खंडहर रूपमे अस्परतालक घर आ भव्यु दुर्गास्थामन सेहो अछि‍।

अठारहम शताब्दीयक पूर्वार्द्धमे एकहरे खड़का मूलक परि‍वारमे पं. कंचन झा आ पं. बबुए झा वैदि‍क भेलाह। ओना ओइ समैमे अंग्रेजी शि‍क्षाक प्रचार-प्रसार नै भेल छल, मुदा संस्कृित शि‍क्षाक स्वाुर्णिम युग अवस्सा छल। स्वआर्णिम ऐ लेल जे सामाजि‍क ढाँॅचा, कि‍छु बि‍च्छृवंखला छोड़ि‍, वैदि‍क पद्धति‍सँ चलैत छल। आस्ते-आस्ते बि‍च्छृमंखला बढ़ि‍ते गेल। पछाति‍ अंग्रेजी शि‍क्षाक प्रभाव सेहो खूब पड़ल।
पं. कंचन झाक बालक पं. भुटाइ झा प्रसिद्ध गेठरी झा ख्याृति‍ प्राप्तद वैदि‍क भेलाह। दरभंगा राजसँ सात सए बीघा जमीन लाखेराज ब्रह्मोत्तर रूपमे भेटल छलनि‍। ओइ समैमे कि‍नको ताधरि‍ पंडि‍तक बीच स्थािन नै भेटनि‍ जाधरि‍ ओ काशीसँ पढ़ि‍ नै अबैत छलाह।
पं. चि‍त्रधर ठाकुर हुनके घरक भगि‍नमान परि‍वार। पंडि‍त चि‍त्रधर ठाकुरकेँ तीन बालक, पं. जयनाथ ठाकुर, पं. तेजनाथ ठाकुर आ पं. खर्गनाथ ठाकुर। तीनू पंडि‍त मुदा जेठका भाय खेती करैत कि‍सान बनि‍ गेलाह आ बाकी दुनू भाँइ पं. तेजनाथ ठाकुर आ पं. खर्गनाथ ठाकुर काशीसँ पढ़ि‍ एलाह। उच्चचकोटि‍क श्रेणीमे गि‍नती छलनि‍। पंडि‍त तेजनाथ ठाकुर जीवन-पर्यन्तर लोहना संस्कृथत वि‍द्यालयमे सेवा देलनि‍। तेकर पछाति‍ परि‍वारमे पं. गौरीनाथ ठाकुर, अनि‍रूद्ध ठाकुर आ सुन्दरर ठाकुर भेलखि‍न। शरीरसँ अबाह रहने पं. सुन्द र ठाकुर वैद्यक रूपमे गामे वैद्यागि‍री करैत रहलाह। पं. अनि‍रूद्ध ठाकुर व्या करणक पंडि‍त। सीतामढ़ी जि‍लाक वि‍द्यालयमे जि‍नगी भरि‍ सेवा देलनि‍।
अखन धरि दुइये परि‍वारक चर्च भेल अछि‍ मुदा एतबे नै अछि‍। पं. कामेश्वर झा, जे खगड़ि‍या वि‍द्यालयक संग दीप महावि‍द्यालयमे सेहो सेवा देलनि‍। वेद-व्या करणक प्रकाण्ड पंडि‍त छलाह। पंडि‍त चण्डे श्वर झा अरड़ि‍या मध्यि वि‍द्यालयक संस्थावपि‍त शि‍क्षक बनि‍ अधवयसेमे मरि‍ गेलाह।

पंडि‍त उपेन्द्रम मि‍श्र सभसँ भि‍न्न छलाह। एक संग ज्यो।ति‍ष, वेद व्या करण, साहि‍त्य क वि‍शेष ज्ञाता छलाह। कतेको महावि‍द्यालयमे सेवा दैत शरीर ति‍याग केलनि‍। सभसँ भि‍न्न ओ ऐ अर्थमे छलाह जे कोनो महावि‍द्यालयमे अधि‍क दि‍न नै टि‍क पबैत छलाह। सालक भीतरे कि‍छु ने कि‍छु खटपट भइये जाइत छलनि‍। जखने खटपट होइत छलनि‍, सोझे घरमुँह वि‍दा भऽ जाइत छलाह। मुदा गामो एलापर केकरो कि‍छु कहैत नै छलखि‍न। कि‍यो पुछबो ने करनि‍ जे ओहि‍ना एलौं आकि‍ झगड़ा-दान कऽ कऽ एलौं। अद्भुत गुण छलनि‍ जे अपने-आप वि‍मर्श करैत, समए संग अपन कर्त्तव्याकेँ छुटैत देखि‍ दोसर महावि‍द्यालय दि‍सि‍ वि‍दा होइत छलाह। खराम छोड़ि‍ पएरमे कहि‍यो जूत्ता-पप्पसल नै पहिरलनि‍। परोपट्टाक वि‍द्वानक बीच अपन पहि‍चान छलनि‍, जइसँ कोनो वि‍द्यालय, महावि‍द्यालयमे स्वारगत रहैत छलनि‍।
पंडि‍त उदि‍त नारायण झा, जे गोल्ड‍सँ सम्माभनि‍त छलाह, शि‍क्षण कार्य छोड़ि‍ दोकानदारी व्यववसाय केँ अपन जीवि‍का बनौलनि‍। परि‍वारक स्थिण‍ति‍ खराब छलनि‍। बि‍नु उपारजने चलैबला नै छलनि‍। मुदा कि‍छुए दि‍नक मेहनति‍क फल नीक भेटि‍लनि‍। जीवन-यापन करैत बीस बीघा जमीन परि‍वारमे बनौलनि‍।
पं. रामनारायण झा व्यासकरणक ज्ञाता छलाह। शरीरसँ पुष्ट‍ रहने शुरूमे पुलि‍सक नोकरी शुरू केलनि‍, मुदा वि‍देशी शासनक उठैत वि‍रोधमे नोकरी छोड़ि‍ शि‍क्षण कार्यमे चलि‍ एलाह। बेसि‍क स्कूरल घोघरडि‍हामे प्रवासी जीक संग रहि‍ सेवा देलनि‍।

गामक स्कूिलसँ १९५६ ई.मे जगदीश प्रसाद मण्डल नि‍कलला। गामसँ सटले पूब कछुबीमे मि‍ड्ल स्कूवल बनि‍ गेल छल। तइसँ पहि‍ने पाँचमा धरि‍क स्कू ल छल। मि‍ड्ल स्कूपल अलग बनल। ओना अखन दुनू मि‍लि‍ एक भऽ गेल अछि‍ मुदा पहि‍ने दुनू अलग-अलग छल। पाँचमा धरि‍ फीस नै लगैत छल मुदा छठा-सातमामे अढाइ रूपैआ महीना फीस लगैत छल।
१९६० ईं.मे मि‍ड्ल स्कूछलसँ नि‍कलि‍ केजरीबाल हाइस्कू-ल झंझारपुरमे नाओं लि‍खेलनि। बेरमाक वि‍द्यार्थी तमुरि‍यामे हाइ स्कू ल आ झंझारपुरो हाइ स्कूसलमे साले-साल वि‍भािजत होइत रहैत छल। कारणो रहै। जइ रूपक शि‍क्षकक टीम झंझारपुरमे छल ओइ तरहक टीम तमुरि‍यामे नै छल। तमुरि‍या हाइ स्कू लमे एक-आध शि‍क्षक साले-साल जाइत-अबैत छलाह जखन कि‍ झंझारपुरमे से नै छल, जइसँ झंझारपुरकेँ नीक मानल जाइत छल। जहि‍ना गामक आन-आन वि‍द्यार्थी पएरे जाइत-अबैत छलाह तहि‍ना ईहो जाइत-अबैत छला। कि‍छु गोटे होस्ट लोमे रहैत छला। सालो भरि‍ कि‍छु नै कि‍छु असुवि‍धा रहि‍ते छलनि। ओना अखनो कि‍छु-कि‍छु छन्हिये। सालो भरि‍ ऐ तरहेँ रहै छल।

अगहनसँ माघ धरि‍ दि‍नो छोट होइए, मुदा वि‍द्यालयक समए छोट नै होइत छल। काजक अनुकूल समए भेटने दि‍न-राति‍मे अन्तहर भलहिं नै बूझि‍ पड़ैत छै, मुदा गाम-घरक लेल तँ ई कठि‍न अछि‍ये। मौसमी छुट्टीक नाओंपर दिसम्बरमे बड़ा दि‍नक छुट्टी आठ-दस दि‍न होइत छल, जे परीक्षाेपरान्तक आ रि‍जल्टकसँ पूर्व होइत छल।

गरमि‍यो मासमे असुवि‍धा तँ तहि‍ना मुदा ओ असुविधा दोसर तरहक होइत छल। ओना एकरा आम खाइक छुट्टी सेहो कहल जाइ छै मुदा ग्रीष्मातवकासक नाअों सेहो छै। नमगर छुट्टी, मास दि‍नक होइत छल। नीक परि‍वारक वि‍द्यार्थीकेँ अनुकूल वातावरण रहने दोहरी लाभ होइत छलनि‍, साधारण परि‍वारक वि‍द्यार्थी आम खाइत-खाइत आधा-छि‍धा बि‍सरि‍ जाइत छला। शैक्षणि‍क वातावरण स्पाष्टर रूपमे वि‍भाजि‍त भऽ जाइत छल। जहि‍ना जाड़क मास बरेड़ी छुबैत अछि तहि‍ना गरमि‍यो गाछक फुनगी छुबैत अछि‍। जइसँ अप्रील माने चैत सँ ताधरि‍ वि‍द्यालय भि‍नसुरका होइत छल जाधरि‍ गर्मी छुट्टी नै भऽ जाइत छल।
तमुरि‍या हाइ स्कूरल आ झंझारपुर हाइ स्कूैलमे इहो अंतर छल जे आधा घंटा आगू-पाछू खुजबो करैत छल आ बन्नो होइत छल। कारणो छलैक कमला पछि‍मक गाम मेंहथ, नरूआर आदि‍सँ लऽ कऽ पूबमे बेरमा धरि‍ आ गंगापुर खरबाइरसँ लऽ कऽ अलपुरा-अरड़ि‍या धरि‍क वि‍द्यार्थी झंझारपुरमे पढ़ैत छलाह। नमहर क्षेत्र तँए वि‍लम्बससँ स्कूोल खुलैत छल। साढ़े एगारह बजे वि‍द्यालयमे छुट्टी होइत रहए। तखन पान-सात मील पएरे चलब कठि‍न छल। ओना ई बड़ कठि‍न नै कि‍एक तँ बेरमाक वि‍द्यार्थी पएरे चलि‍ लोहनो वि‍द्यालयसँ पढ़ने छलाह। तहि‍ना बर्खा मासमे सेहो होइत छल। कखन पानि‍-वि‍हाड़ि‍ आबि‍ जाए, तेकर कोनो ठीक नै। तहूमे कतेकाल बरि‍सत तेकरो ठेकान नै। खैर जे हो.....।
केजरीवाल हाइ स्कूछल झंझारपुरमे १९६३ ई.मे हायर सेकेण्ड्रीकक पढ़ाइ शुरू भेल। मुदा थोड़े पेंच लागि‍ गेलै। कला-विज्ञान आ वाणि‍ज्यि तीनूक पढ़ाइ होइत छलैक। कला-वि‍ज्ञानक मंजूरी भेटि‍ गेल वाि‍णज्यलक भेटबे ने कएल। कते रंगक हवा बहए लागल। ओना शि‍क्षकमे बढ़ोत्तरी पछाति‍ भेल मुदा शुरूमे असुवि‍धा रहल।
१९५८ ई.मे जनता कओलेज खुजल। जन-सहयोगसँ कओलेज खुजल। मुदा कओलेजक जे नमगर-चौड़गर घर चाही, जे धड़फड़मे नै भेलै तँए हाइये स्कू।लमे साधारण रूपे पढ़ाइ शुरू भेल। कि‍छु गनल चुनल विषयक पढ़ाइ शुरू भेल। खएर जे भेल मुदा शि‍क्षामे नव जागरण क्षेत्रमे आएल। बहुतोक मनक मुराद पूरा होइक संभावना बढ़ल। बी.ए. तकक पढ़ाइ लगमे हएत, तखन पढ़ैबला बच्चार आ पढ़बैबला गारजनक मनमे कि‍अए ने उत्सााह जगतनि‍। कि‍छु दि‍नक पछाति‍ कओलेजक अपन कँचका ईंटा आ खपड़ाक मकान बनलै।

जगदीश प्रसाद मण्डल १९६५ ई.मे हायर सेकेण्ड्रील पास केलापर बी.ए. पार्ट वनमे नाओं लि‍खेलनि। पहि‍ने दू बर्खक आइ.ए. आ दू बर्खक बी.ए. प्री हुअए लगलैक। दुनू दि‍ससँ वि‍द्यार्थीक प्रवेश हुअए लागल। बी.ए. पार्ट वन केलापर आनर्स पढ़ैक वि‍चार भेलनि। आ-आन कओलेजमे आनर्सक पढ़ाइ होइत छल। जनता कओलेजमे नै होइत छल। एक-दू-तीन शि‍क्षकसँ अधि‍क कोनो वि‍षयमे शि‍क्षक नै छल। हि‍न्दी। वि‍भागमे सेहो दुइये गोटे छलाह। प्राइवेट रूपमे तैयारी करए लगला। सी.एम. कओलेजक नाओंसँ फार्म भराएल आ परीक्षो भेल।
१९५२ ईं.क चुनावक बाद देशक अपन वि‍धि‍वत् सरकार बनल। मुदा एक संग कतेको प्रश्न उठि‍ कऽ ठाढ़ भऽ गेल। सरकारी कार्यलयमे कर्मचारीक जरूरति‍ भेल। जेकर बहालीमे जाति‍वाद आ पैरवी-पैगाम शुरू भेल। आम जनताक जगाएल सरकार जनतासँ बहुत दूर हटि‍ गेल।
ओना जे कोनो नव-स्वदतंत्र देशक स्थि ‍ति‍ होइए तहि‍ना अपनो ऐठाम रहए। मुदा ओइ लेल जत्ते सकारात्म।क सोच आ काजक औसत हेबाक चाहि‍ये से नै भेल। सामंती सोच; आ सामंत मजगूत छल, जइसँ आम-अवामक बीच आक्रोश पनपए लगलै। राजा-रजबाड़े जकाँ शासन पद्धति‍ चलए लागल। तही बीच भूदान आन्दोँलनक उदय सेहो भेल। ओना तेलांगनासँ शुरू भेल भूमि‍ आन्दोहलन देशकेँ डोला देने छल। तइ संग केरल, बंगालक संग छि‍टफुट अनेको राज्यएमे भूमि‍ आन्दोगलन पकड़ि‍ रहल छल। दरभंगा जि‍लामे सेहो भूमि‍ आन्दोेलन शुरू भेल।
१९५७ ई.क चुनावमे काँग्रेस सरकारक स्थिभ‍ति‍ कमजोर भेल। केरलमे वामपंथी सरकार बनि‍ गेल। आजादीक दौड़क जे जागरण छल आे ताजा छल, जइसँ अखुनका जकाँ नै छल। ऐ बीच गोटि‍-पङरा हाइ स्कूरल, कओलेज, प्राइवेट रूपमे बनए लागल छल। मुदा औसत कम रहल। खादी भंडार उद्योगक ह्रास होइत गेल आ होइत-होइत ई मेटा जकाँ गेल। तहि‍ना नगदी पैदावारमे कुशि‍यार सेहो छल, जे उद्योगपति‍क चलैत सेहो मरए लागल।

मि‍थि‍लांचलमे मूलत: जीवि‍काक साधन कृषि‍ छल। ओना सघन रूपमे कृषिक‍ पैघ साधन जीवि‍काक छी, मुदा से नै छल। जेहो छल तहूमे रंग-बि‍रंगक छल-प्रपंच चलि‍ रहल छल। बटाइ खेतीमे अधि‍या उपज उपजौनि‍हारकेँ भेटैत छलैक। जखन कि‍ उपजबैमे, खेती करैमे कि‍छुए अन्नक खेती लाभप्रद छल। उपजाक अनुपातमे लागत खर्च किछुमे कम छल आ कि‍छुमे अधि‍क। जइमे अधि‍क छल ओइमे बटेदारकेँ घाटा लगैत छलैक। तइ संग रौदी-दाहीक प्रभाव ओहन कि‍सानपर सेहो पड़ैत छल जे खेती करैत छलाह। जे बेसी खेतबला छलाह हुनकर खेती अधि‍कतर बटाइक माध्यिमसँ चलैत छल। तइ संग अधि‍क अन्न रहने अन्नक महाजनि‍यो चलैत छलनि‍। महाजनि‍योक प्रथा गाम-गामक फुट-फुट कोनो गाममे सवाइ (एक मोनक सवा मोन, एक सीजि‍नक) तँ कोनो गाममे एगारही (आठ पसेरीक मोन, एक मोनक एगारह पसेरी) तँ कोनो गाममे डेढ़ि‍या, एक मोनक बारह पसेरी। जेकर मतलब भेल जे एक मोनक आधा मोन सूदि‍ये भेल। तइ संग इहो होइत छल जे जँ सालक कर्ज सालमे चुकाएल जाइत छल, आ ने तँ सूदो मूड़े बनि‍ जाइत छलैक। जइसँ दू साल बितैत-बितैत कर्ज दोबरा जाइत छलै। अखुनका जकाँ बि‍आह तँ तते भारी नै छल मुदा माए-बापक सराधमे सामाजि‍क आ जातीय एहेन चाप छल जे खेत-पथार बेचि‍ काज चलैत छल। खेतक हि‍साबसँ चारि‍-पाँच मेलक कि‍सान छलाह। गामक-गाम एक-एक गोटेक छलनि‍। जखने एकठाम जमीन समटाएल रहत तखन दोसर-तेसरक की आ कते हेतनि‍?
खेतमे काज करैबला बोनि‍हारोक स्थि ‍ति‍ बदसँ बदतर छल। एक तँ दि‍न भरि‍क बोनि‍ कम तहूमे सालक गनल दि‍न काज होइत। कि‍सानोक बीच खेतीक नव वैज्ञानि‍क खेतीक पद्धति‍क अभाव छलनि‍। अभावोक कारण छल जे ने सरकारक धि‍यान खेती दि‍स छल आ ने खेतीक साधन उपलब्ध छल।
त्रेता युगक जनकक हर जकाँ खेत जोतैक हर होइत छल! जहि‍ना मरि‍आएल बड़द तहि‍ना जोति‍नि‍हार। तइ संग खेत पटबैक पानि‍क कोनो दोसर बेवस्थाध नै। जहि‍या पानि‍ हएत तहि‍या खेती शुरू हएत। जइसँ बेसमए खेती होइत छल। पोखरि‍-झाँखड़ि‍मे अनेरूआ माछ जे होइ, सएह माछ पोसब कहाइत छल। तहि‍ना तीमनो-तरकारी आ फलो-फलहरीक हाल छल। मोटा-मोटी कृषि‍क ओहन दशा बनि‍ गेल छल जइपर जीवन यापन करब कठि‍न भऽ गेल छल।

पशुपालनक रूपमे गाए-महींस बकरी पोसब मात्र चलैत छल। गाए-महींस पोसैक बीच, महाजनीक एहेन सूत्र लागल छल जे पोसि‍नि‍हार ि‍सर्फ पोसैत छलाह। एक तँ नस्ल पछुआएल रहने पछुआएल कारोबार दोसर एहेन जालमे ओझराएल जे धीरे-धीरे कमि‍ते गेल जे बढ़ैक कोनो संभावना नै रहल।
नगदी फसि‍लक रूपमे कुशि‍यार आ पटुआक खेती छल। मुदा उद्योगपति‍क कारामातसँ ओहो दुनू कमजोरे होइत गेल। मुदा सरकारक प्रति‍ जन-आक्रोश बढ़ल। गाम-घरक लोक सरकारी लाभक माने बुझैत छल मात्र कोटाक वस्तुज धरि‍। सेहो रस्तेि-पेरे लुटाइत छल।

१९६७ ई.क चुनाव आएल। जगदीश प्रसाद मण्डल बी.ए.क वि‍द्यार्थी रहथि। आजादीक पछाति‍ पहि‍ल जन-जागरण छल। पढ़लो-लि‍खल आ वि‍द्यार्थियो मैदानमे उतरल।

सन् सैंतालीस...

भारतक स्वतंत्रताक त्रिवार्णिक झण्डा फहरा रहल छल।

मुदा कम्यूनिस्ट पार्टीक माननाइ छल जे भारत स्वतंत्र नै भेल अछि।

असली स्वतंत्रता भेटब बाँकी छै...

मिथिलाक एकटा गाम

जन्म होइत अछि एकटा बच्चाक.. ओही बर्ख ...

ओइ स्वतंत्र वा स्वतंत्र नै भेल भारतमे...

पिताक मृत्यु...गरीबी..

केस मोकदमा...

वंचितक लेल संघर्षमे भेटलै स्वतंत्र भारतक वा स्वतंत्र नै भेल भारतक जेल....

आइ बेरमामे पाँच-दस बीघासँ पैघ जोत ककरो नै..

ओइ गाम मे आइ जीवित अछि आइयो किसानी आत्मनिर्भर संस्कृति...

पुरोहितवादपर ब्राह्मणवादक एकछत्र राज्यक जतऽ भेल समाप्ति..

संघर्षक समाप्तिक बाद जिनकर लेखन मैथिली साहित्यमे आनि देलक पुनर्जागरण...



जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा बायोग्राफी...गजेन्द्र ठाकुर द्वारा ........शीघ्र
जारी.................................

गजेन्द्र ठाकुर

ggajendra@videha.com
 
http://www.maithililekhaksangh.com/2010/07/blog-post_3709.html

२.गद्य

  







जगदीश प्रसार मण्डलक दीर्घकथा-

फाँसी

काल्हि‍ बारह बजे बलदेबकेँ फाँसी हएत, रेडि‍यो-अखबार कान-कान जना देलक अछि‍। जहि‍ना बलदेव बुझैत तहि‍ना जहलक उत्ताधि‍कारि‍यो बुझैत अछि‍। जहि‍ना बलदेवक परि‍वार बुझैत अछि‍ तहि‍ना सर-समाज, दोस-महि‍न सोहो बुझैत अछि‍। सबहक मन बारह बजेपर अॅटकल। वएह बारह बजे दि‍न वा राति‍ अपन प्रखर रूपमे दि‍शा दि‍स मैदानक रस्ताउ धड़ैत अछि‍।

जहलक एक नंबर सेल घर। जे घर ओइ अपराधीकोँ ओइ बीच भेटैत अछि‍ जखनन न्या यालयसँ फाँसीक ति‍थि‍ ि‍नर्धारि‍त होइत अछि‍। सेलक बुनाबटि‍यो, आन सेलो आ वार्डोसँ भि‍न्न बनल अछि‍। ओना सेलक बुनाबटि‍ वि‍चि‍त्र अछि‍ मुदा आनसँ अलग तँ अछि‍ये। कोठरीनुमा घर, कोठरि‍येक आँट-पेट सेहो अछि‍। एक कोठरी ओहन होइत जे नमहर घरमे बनैत आ एक कोठरी ओहन होइत जे घरे कहबैत अछि‍। एक नंबर सेलो तहि‍ना बनल अछि‍। चि‍मनीक एक नम्बीर ईंट, क्यू‍ल-लक्खी सरायक बीचक, पथराएल बालु, दू-एक सि‍मटीक जोड़सँ देबाल बनल अछि‍। सात एस्वा बन इर फुटक घर, जे घरक कोठरीओसँ हीने अछि‍। पौने दू फुट आगूक दरबज्जाच, खि‍ड़की दरबज्जा‍ नै, जे भीतर-बाहर अबैत-जाइत अछि‍। लोहाक बनल केबाड़ लगल अछि‍। शेष कोनो देवालमे ने खि‍ड़की-खोलि‍या अछि‍ आ ने पूब-पछि‍म दि‍शा देखबैक कोनो दोसर साधन अछि‍। एक तँ ओहुना जइठाम सभ कि‍छु (दि‍शा-वोधक) रहैत अछि‍ तहूठाम दि‍शान्सअ लगि‍ जाइ छै। आ पूबकेँ पछि‍म, पछि‍मकेँ पूब कहए लगै छै। जि‍नगीक पूर्ण लीला बलदेवकेँ ओइ कोठरीनुमा घरमे पनरह दि‍नसँ होइत अछि‍। ओना तइसँ पूर्वो (15 दि‍नसँ पहि‍ने) सेहो सात नम्बपर सेलमे तीन सालसँ रहैत आबि‍ रहल अछि‍।
ओना एक नंबर सेलमे एलापर एतेक सुवि‍धा जरूर भेटि‍ गेल छलै जे पहि‍नेसँ नीक भोजन, नीक ओढ़ना-बि‍छौना भेटि‍ गेल छलैक। भलहि‍ं घरमे नेहि‍ये बि‍जलीक तार आ ने बालु लागल मुदा दरबज्जा सोझे एहन बालु लागल छलै जइसँ कोठरि‍योक भीतर इजोत पहुँचैत छल। मुदा कोठरीक बाहर स्पेरशल सि‍पाहीक बेवस्थाभ सेहो भऽ गेलै।
बाहर बजे राति‍क घंटी टावरक मुरेड़ापर बाजल। राति‍-दि‍नक पाशा बदलैक समए भऽ गेल। जहि‍ना भूत-वर्तमान आ वर्तमान भवि‍ष्यंमे बदलैत अछि‍ सएह मुहूर्त अछि‍। राति‍-दि‍नक बाट पकड़त मुदा दूत-भूत एतेक प्रबल जे आरो बेसी उग्र बनैत अछि‍। जहि‍ना राति‍क जनमल बच्चाम दि‍नेक होइत तहि‍ना बलदेवक राति‍ सेहो दि‍ने भऽ गेलै। राति‍-दि‍न भऽ गेलैक आकि‍ नीनि‍ये देवी वि‍ध्न वादि‍नीक संग डरे पड़ा गेलनि‍, से नै कहि‍। ओछाइनपर पड़ल बलदेव उठि‍ कऽ बैस कोठरीक चारू देवाल दि‍स तकलक। अन्हाेरमे सभ हराएल बूझि‍ पड़ल, कि‍एक तँ बाहरक बि‍जलीक इजोत सेहो अन्हाोर चद्दरि‍ ओढ़ि‍ ओहन भऽ गेल जे अपनो भरि‍ नै देखि‍ पड़ैत। देह दि‍स तकलक। हाथ-हाथ नै सुझति‍, बलदेव अजमा कऽ घरक मुँह लग ससरि‍ कऽ पहुँचल। हाथ बढ़ा देखलक तँ बूझि‍ पड़लै जे यएह घरक मुँह छी। घरक मुँह देखि‍ मनमे बि‍सवास जगलै जे ऐठामसँ अन्हाहर-इजोतक सभ कि‍छु देखब। हि‍या कऽ बि‍जली खूॅटामे लटकल बौलपर नजरि‍ देलक। मड़ि‍आएल इजोत तइपर असंख्योल मच्छखर-माछी जान गमबैले तैयार नाचि‍ रहल अछि‍। खूॅटापर गि‍रगीटक झुंड मुँह बॉबि‍ खाइले तैयार आसन लगौने अछि‍। नि‍च्चाझमे बेंगक जेर कुदैत। तइ बीच मच्छ रक जेरि‍ गीत गबैत फाटक टपि‍ भीतर पहुँचल। मुदा बलदेवक धि‍यान मच्छ‍रपर नै गेल। जहि‍ना शरीरमे अनेको रोग रहलापर बड़का रोग छोटकाक चापि‍ रखैत तहि‍ना बलदेव बारह भोग मच्छनरकेँ दाबि‍ देलक। केना नै दाबैत, जइठाम जि‍नगीक खूनक कोनो महत नै तइठाम मच्छ र कत्ते पीबे करत। मुदा तहूसँ बेसी बलदेवक मनमे जागि‍ गेल जे जखन बाहर बजे अन्तेू भऽ रहल छी तइ बीच जँ कनि‍यो उपकार दोसरक भऽ जाइ छै तँ ओहो धरमे छी कि‍ ने? बलदेवक मनमे पनपए लगलै। तखने पएर दाबि‍ सि‍पाहीक झुंड सेलक चारूकात चक्कर कटए लगल। अन्हाऽरमे सभ हराएल। पएरक धमकसँ बलदेव बूझि‍ गेल। जहि‍ना गाए-महि‍ंस मनुक्ख क संग कुत्तो-बि‍लाइक चालि‍ अन्हाररोमे पकड़ि‍ लैत तहि‍ना बलदेवो पकड़लक। मुदा सभ चुप्प। बलदेवक मनमे उठलै, जब कि‍ बारह बजेमे फाॅसि‍येपर चढ़ब तखन कि‍अए एते ओगरवाहि‍क कोन जरूरत छै। एक तँ ओहि‍ना बड़का छहर दि‍वालीक बीच जेल बनल छै, तइ बीच वार्ड-सेल बनल छै, तइ बीच एते ओगरवाहीक कोन चरूरत छै। मुदा लगले वि‍चार बदलि‍ गेलै। वार्ड सभक कैदी तँ अबैत-जाइत रहैए। सभ दि‍न दू-चारि‍ एबो करैए आ नि‍कलबो करैए। मुदा हम तँ आब नि‍कलि‍ नै पाएब। नि‍कलबे नै करब आ कि‍ जि‍नगि‍ये अंत भऽ रहल अछि‍। आँखि‍ उठा आगू तकलक तँ बूझि‍ पड़लै जे साल-महि‍नाक कोन गप जे मात्र कि‍छु घंटाक लेल छी। जइ दि‍न फाँसीक आदेश न्यालयालयसँ भेल ओही दि‍न कि‍अए ने फाँसि‍यो भऽ गेल। अनेरे कोन सोग-सन्तालप देखै-भोगैले पनरह दि‍न जीआ कऽ राखल गेल अछि‍। मन शान्त केलक। शान्त होइते, जहि‍ना पोखरि‍क अगम पानि‍केँ पूर्बा-पछबा हवा डोलबैत रहैए तहि‍ना मन डोललै। डोलि‍ते उठलै, फाँसी कि‍अए हएत? प्रश्नपर नजरि‍ उटकि‍ते उठलै जे फाँसीपर सपूत-कपूत दुनू चढ़ैए। फेर उठलै जे तइ सपूत-कपूतमे हम की छी?

अन्हिर उठैसँ पहि‍ने जहि‍ना हवा खसि‍ पड़ैत अछि‍, वायुमंडल शान्तक भऽ जाइत अछि‍ तहि‍ना बलदेवक मन सेहो शान्तब भऽ गेल। कोनो तरहक तरंग नै। मुदा लगले मनमे उठलै जे जि‍नगीक अंति‍म सीमापर पहुँचि‍ गेल छी। जहि‍ना गामक सीमा टपि‍ते दोसर गाम आबि‍ जाइत अछि‍ तहि‍ना जीवन लोकसँ मृत्यु‍ लोक चलि‍ जाएब। मुदा एते तँ हेबे करत जे अखन ठेकानल जि‍नगी अछि‍ पछाति‍ वेठेकानलमे पहुँचि‍ जाएब। फेर उठलै, जीवन लोक तँ खाली मृत्युुक लोक नै छी। जीवनो तँ लोक छी। जहि‍ना कोनो जंगलसँ पड़ाएल जानवर दोसर जंगलक सीमापर पहुँचते चारूकात नजरि‍ उठा कऽ देखैत जे रहै जोकर अछि‍ वा नै, तहि‍ना जीवन-मृत्युवक सीमापर बलदेवक मन अटकि‍ गेल। धरतीपर जहि‍ना एक-दि‍शासँ दोसर दि‍स बहैत धार रास्ता केँ बाधि‍त कऽ दैत तहि‍ना बलदेवक जीवन धार बाधि‍त कऽ देलक। आगू टपैक आशा नै देखि‍ बलदेव वामा-दहि‍ना दि‍शा पकड़ैत वि‍चार केलक। एक दि‍स पहाड़सँ नि‍कलैत धार धरती टपैत समुद्रमे मि‍लैत तँ दोसर धरती टपि‍ समुद्रमे मि‍लैत। आगू तँ कि‍छु घंटा शेष अछि‍ मुदा पाछू तँ सौंसे जि‍नगी पड़ल अछि‍। कि‍ एक बेरक फाँसी फाँसी छी आ कि‍ फाँसी चढ़ल जि‍नगीक फँसरी फाँसी छी। मन ठमकि‍ गेलै। मुदा लगले मन पहि‍ने बारह बजेक घंटी बजल। जहि‍ना धरतीपर आएल बच्चाि आस्तेर-आस्ते सकताए लगैत तहि‍ना बलदेवक मन सेहो सकताए लगलै। मन पड़लै पनरह दि‍न पहि‍लुका फाँसीक सजा। मनमे खौंझ उठलै जखन फाँसीक आदेश भेल तखन फेर पनरह दि‍न जहल कि‍अए भेल? कोन अपराधक फल भेटल। जौं ओही दि‍न फाँसी भऽ जाइत तँ पनरह दि‍न जे सोग-सन्ता प भेल से तँ नै होइताए। ततबे नै अपनो ऊपर अनेरे भार कि‍अए बढ़ौलक? फेर मनमे उठलै जे अनेरे ओझराइ छी। मन शान्तए केलक। शान्ता होइते उपकलै, सपूत बनि‍ दुनि‍याँ छोड़ब आ कि‍ कपूत बि‍न। कि‍यो हि‍लसैत, फुलसैत दुनि‍याँ छोड़ैए आ कि‍यो वि‍लखैत, डुमैत दुनि‍याँ छोड़ैए। मुदा जे हि‍लसैत-फुलसैत छोड़ैए ओ छोड़ै कहाँ अछि‍? ओ तँ जीवात्मातकेँ एहेन चुहुटि‍ कऽ पकड़ैत अछि‍ जे छोड़ौनौं नै छुटैत अछि‍। मुदा हम तँ से नै छी। फेर मन घुमलै। दुनि‍याँ बड़ीटा अछि..,‍ बड़ छोट अछि‍...। बड़ीटा ओकरा लेल छै जे बड़ी पाबए चाहैए। मुदा बड़ी तँ भोजोक अंति‍म पराब नै, घरक मध्या सेहो छी। तखन कि‍अए ओकरा लि‍अ चाहैए। फेर मन ठमकि‍ गेलै। अनेरे अछाहे कुकुड़ भूकब नीक नै। अपनो तँ सेसार अछि‍। जइमे अकास-पताल, चान-सुर्ज, नदी-सरोवर सभ कि‍छु अछि‍। तखन अपन छोड़ि‍ दोसराक देखब अपनासँ दूर हएब हएत। अपन कर्म, अपन धर्मक मर्म बुझब उचि‍त हएत। जाबे से बूझि‍ दुनि‍याँक रंगमंचमे नै उतरब ताबे कौआ कान नेने जाइए, तइ पाछू दौगब हएत। अपन रंगमंच आ अपन अभि‍नय लग अबि‍ते मन ठमकि‍ कऽ ठाढ़ भऽ गेलै। ठाढ़ होइते अनायास मनमे उठलै। अभि‍नयो तँ देखि‍नि‍हारोक लेल आ संसारोक लेल रंग-बि‍रंगक, कतेक स्तोरक होइत अछि‍। मुदा कहल तँ अभि‍नाइये जाइ छै। कि‍यो लीला रचि‍ अभि‍नय करैत, तँ कि‍यो गुण-गुणाइत अभि‍नय करैए। कि‍यो मूक भऽ करैत अछि‍ तँ प्रेमावेशमे करैत अछि‍। केना एकरा बि‍‍लगाएब? एक दि‍स चि‍त्र-वि‍चि‍त्र बनल अछि‍ तँ दोसर दि‍स कुचि‍त्र सेहो बनल अछि‍। ओझराइत मन झमान भऽ झमा उठलै। अनेरे ओझड़ेने समए ससरि‍ जाएत। गनल कुटि‍या नापल झोर जकाँ समए बचल अछि‍, तेकरा जौं ओझरौठेमे राखब सेहो नीक नै। बारह बजेक घंटी कतेखान पहि‍ने बाजि‍ चुकल अछि‍। हाथमे जौं घड़ी रहैत तँ ठीक-ठीक समैयोक बोध होइत, सेहो नहि‍ये अछि‍। जइ दि‍न जेलमे प्रवेश केलौं तेही दि‍न जहलक मुँहपर जमा कऽ केलक। जइ दि‍न नि‍कलब तइ दि‍न देत। मुदा नि‍कलब कहि‍या? आइ तँ फाँसि‍येपर लटकि‍ जि‍नगीक वि‍सर्जन करब तखन घड़ी केना लेब आ पहि‍र कऽ समए बुझब? मुदा तँए कि‍ जइ गाममे मुर्गी नै रहै छै तइ गाममे भोर नै होइ छै? पाँच-दस मि‍नट आगू-पाछू, अनुमान तँ कऽ सकै छी। मुदा काजक संग जे समए चलैए ओकर अनुभव आ बि‍नु काजक अनुभवोमे तँ अन्त र होइते अछि‍। काजक दौड़क अनुभव बेसी बढ़ि‍याँ होइत अछि‍। कि‍एक तँ काजक संग समए सटि‍ चलैत अछि‍। मुदा हमरा तँ सेहो नै अछि‍। बस दू बेर खाइ छी, ढेंग जकाँ ओंघराएल पड़ल रहै छी। कखन जागल रहै छी आ कि‍ सूतल रहै छी, से आनक कोन बात जे अपनो नै बूझि‍ पबै छी। पछतेनौं तँ कि‍छु नै भेटत। फेर मनमे उठलै- फाँसी कि‍अए?
कि‍छु समए गुम्मू रहलाक पछाति‍ अनायास मनमे उठलै जौं भक्तिर‍-भावसँ समए कटने रहि‍तौं तँ हँसी-खुशीसँ चढ़ि‍तौं, से नै केलौं तँ कुहरि‍-कलपि‍ चढ़ब। जहि‍ना शक्ति ‍क स्रोत ज्ञान छी तहि‍ना ने भक्ति ‍क स्रोत श्रमो छी। फेर मन ठमकलै। जौं भक्ति ‍क स्रोत श्रम छी तँ हमहूँ तँ श्रमि‍क छि‍हे। जौं से नै रहि‍तौं तँ एत्ते खेल केना केलौं। अचताइत-पचताइत मुँहसँ नि‍कललै। से तँ जरूर केलौं। एक पसीना पत्थिर तोड़ैमे चुबैए, दोसर पत्थखर बनबैमे चुबैए। हँ से तँ दुनूमे चुबैए। मुदा कि‍ दुनूक मि‍ठास एक्के रंग छै? से तँ नै छै। तखन श्रम -सेवा- केकरा कहबै? फेर बलदेवक मन ठमकि‍ नजरि‍ उठा-उठा चौकन्ना होइत चारू दि‍स तकए लगल। मुदा अन्हा रमे कि‍छु देखबे ने करए। मनमे उठलै, अनेरे श्रमक पाछू बौआइ छी। गेल जमाना फेर नै लौटए। आब तँ जि‍नगीक अंति‍म खाड़ीपर चलि‍ एलौं। ने श्रमि‍क छी आ ने श्रमक सि‍रजन कर्ता। अनेरे अनका पाछू बौआए रहल छी। सभकेँ अपन-अपन जि‍नगी छै। अपन-अपन जगह छै, जे समैयोक आ प्रकृति‍योक प्रभावसँ प्रभावि‍त होइत रहै छै तँए अपन बात जेना लोक अपने बुझैत अछि‍ तेना आन थोड़े बुझत। चारू दि‍ससँ घुमैत-फि‍ड़ैत मन अपना लग बलदेवकेँ एलै। मनमे खौंझ उठलै। यएह मन छी जेकर खच्चमरपन्नीसँ कि‍यो भगवान बनि‍ जाइए आ कि‍यो हत्याअरा बनि‍ दुनि‍याँक सोझामे फाँसीपर लटकि‍ जाइए। मुदा कहबै ककरा आ सुनत के? मन ठमकलै। हत्याकरा के? हत्याब की? आ के पैदा करैए? जहि‍ना कम माछी-मच्छ र रहने खेबो काल आ सूतबो काल ओते परेशानी नै होइत जते अधि‍क रहने होइत। बलदेवक मन फेर ओझरा गेलै। ओझरी छुटि‍ते अपनापर ग्लाकनि‍ हुअए लगलै। हमहूँ तँ दुनि‍याँक चुनल अपराधीमे छी। जि‍नगी भरि‍ अपनेमे बेहाल रहलौं मुदा बेहाले केना रहि‍ गेलौं, से कहाँ बूझि‍ पेलौं। जहि‍ना धरतीकेँ बेहाल सृजन शक्तिफ‍ कमि‍ जाइ छै तहि‍ना ने हमरो भेल। मन उफनि‍ गेलै। चि‍चि‍आइत बाजल-
हम अपराधी छी, अपराध केने छी। डकैतीक संग हत्या केने छी। अखन हमरा फाँसी हुअए?”
पि‍तोक मास्च र्य ओइ बेटासँ ओही दि‍नसँ कमए लगै छै जइ दि‍न सुपात्र कुपात्र दि‍स जाइत देखै छै। तहि‍ना बलदेवक कलपैत आत्मास मनसँ हटि‍ रहल छै। अनधुन मुँह पटकि‍ रहल छै। अपराधी छी, अपराध केलौं। एक अपराध नै, अनेको, एक दि‍न नै जि‍नगीयो भरि‍। बहुत वि‍लमि‍ कऽ फाँसी भऽ रहल अछि‍। बहुत पहि‍नहि‍ भऽ जाइक चाहै छल। मुदा भेल कि‍अए नै? एकाएक मुँहमे पर्दा लगल हुमड़ैत मन पाछू दि‍स ससरल। अंति‍म हत्या। आ डकैतीक फल फाँसी छी, मुदा आरो जे जि‍नगी भरि‍ केलौं, तेकर कि‍ भेल?
मध्यीमासक स्ना न जहि‍ना आन मासक स्ना नसँ अधि‍क सुन्ददर, अधि‍क शीतल होइत तहि‍ना जि‍नगी अपराधक बीच बलदेबक मन अटकि‍ गेल। एक दि‍स जि‍नगी दोसर दि‍स अपराध। शीतल भेल शान्त मनमे उठलै, कि‍ हमर जन्म‍ अपराधि‍ये बनैक लेल भेल छल जे अपराधीक जि‍नगी वि‍तेलौं। मुदा बुझि‍यो कहाँ पेलौं जे अपराध करै छी, अपराधी बनै छी। ओझराइत मनकेँ सोझरबैत बलदेव जि‍नगीक एक-एक दि‍न आ एक-एक घटना मोन पाड़ए लगल। मुँहसँ नि‍कललै- अपन जि‍नगीक बात जत्ते अपना मनमे अछि‍ ओत्ते थोड़े दोसराकेँ हेतइ। ि‍सर्फ हत्येल-लूट टा तँ नै केने छी, माए-बहि‍नि‍क संबंध सेहो तोड़ने छी।
मन कलपि‍ बजलै- एकबेर नै हजार बेर फाँसी हेबाक चाही।
बलदेवक मन बेकल हुअए लगलै। केकरा ले केलौं? ई बात मनमे उठि‍ते धि‍यान परि‍वार दि‍स बढ़लै। अंति‍म दि‍न पत्नी आ बेटाक दर्शन हएत? ओ सभ बेचैनीसँ भेँट करए जरूर औत। मुदा कि‍ जहि‍ना परि‍वारमे भेँट होइत छल तहि‍ना हएत? से केना हएत? सि‍पाहीक घेरावंदी हम रहब आ ओ सभ हटि‍ कऽ कातमे ठाढ़ रहत। मन घुमलै। अनेरे कि‍अए कि‍यो भेँट करए औत? कोन मुँह देखत आ कोन देखओत। तइसँ नीक जे भने हमहूँ हराएल छी आ ओहो सभ हराएले रहए। दुनि‍याँकेँ सभ तँ नै चि‍न्हहतै-जनतै। जौं समाजमे लोक ओंगरी देखौते तँ समाज छोड़ि‍ दोसर समाजमे चलि‍ जाएत। जखने एक समाजसँ दोसर समाजमे जाइए तखने पछि‍ला समाजक बान्हं टूटि‍ जाइ छै। बान्हमक भीतर बनल समाज अपन हि‍तक बात सौचैए। मुदा समाज तँ समुद्र छी, जइमे घोंघा-घोंघीसँ लऽ कऽ गोहि‍-गमार तक छै। बलदेवक मन ठमकि‍ गेल।
जहि‍ना जन-जन्मालन्तिरसँ वा कुरीति‍-कुसमए पाबि‍ लतामक गाछ बाँसक छाँहमे जनमल समए पाबि‍ कलशि‍ जाइत तहि‍ना बलदेवक मन कलशल। अबोध बच्चािक हाथसँ गि‍रल अइना, माए-बापक दुख जकाँ नै मुदा तैयो टुकड़ी बीछि‍-बीछि‍ जोड़ैक कोशि‍श करैत अछि‍ तहि‍ना बलदेवक कलशल मनमे उपकलै। तीन बर्ख जहल अएना भऽ गेल। राता-राती घरसँ पकड़ा बन्दूोकक हाथे जहल आएल रही। नव-नव लोक, नव-नव जगहसँ भेँट भेल। जहि‍ना देशक मि‍थि‍लांचलोक बासी दुनि‍याँक कोण-कोणक बीच बसि‍ अपन पूर्ब परि‍वारक स्मगरण करै छथि‍ तहि‍ना बलदेवक मनमे परि‍वार सेहो आएल। मुदा लगले जहलक परि‍वार अगुआ गेलै। एक-फाटक टपि‍ दोसरमे घेराएल रही। तलाशीक संग सभ कि‍छु घेरा गेल। बाहरसँ आओत नै अपने घेराइये गेलौं। मुदा तैयो नव-नव चेहरासँ भेँट भेल। भीतर अबि‍ते (वार्डमे) घूस्सा -मुक्काक सलामी भेल। जहि‍ना अखड़ाहापर उतरैत खलीफाकेँ पानि‍ उतरए लगैत तहि‍ना उतरल। जि‍नगीक पहि‍ल बेर जहल देखलौं। स्वाेगतक बाद मेट लग पहुँचाओल गेलौं। अखड़ाहाक बदलने खलीफाक पानि‍यो बदलि‍ जाइ छै। मुदा.....। मेटक रजि‍ष्टजरमे नाओं चढ़ि‍ते ढेर हुकुम एक संग उठल। झाड़ लगबैक ड्यूटी, पैखानामे पानि‍ पहुँचाबैक ड्यूटी इत्या दि‍-इत्यारदि‍। काजक भारसँ मन दबाइत जा रहल छल आ कि‍ मसलनपर पसरल मैनजनक हुकुम भेल- एम्हपर आ, पहि‍ने जाँत तखन दोसर काज हेतइ।
अवग्रहमे फँसल मन हल्लुक भेल। मनमे खुशी उपकल जे कनि‍यो-कनि‍यो कान ऐंठेँत तँ काने उखड़ि‍ जइतए। जान बचल तँ लाख उपाइ। एक करोट घूमैत मैनजल बाजल- पहि‍ल दि‍न छि‍औ, आइ तोरा खेनाइ नै भेटतौ।
जहि‍ना मुर्दापर अस्सीत मनसँ नब्बेा मन जारनि‍ चढ़ि‍ जाइए तहि‍ना चढ़ि‍ गेल। मुदा असबि‍सो नै कऽ सकलौं। मुदा तैयो सबुर भेल जे नै खाइले देत, सुतैक तँ जगह भेट गेल कि‍ ने। तइ बीच मैनजनक हुकुम भेल- कोन केसमे एलेहेँ?”
केसक नाओं सूनि‍ मन दलदल भऽ गेल। जहि‍ना सोग-पीड़ामे नोर बहा केकरो सान्व्-राना दैत काल होइत, तहि‍ना। जहलसँ नि‍कलैक आशाक अँकुर सेहो जगलै। हलसि‍ बाजल- सरकार, डकैती आ खून संगे छै।
डकैतीक संग खून सूनि‍ मैनजनक मन ठमकल। अधि‍क दि‍नक संगी हएत। तँए दोसति‍ये करब नीक। पड़ले-पड़ल हुकुम चलौलक- नवका कैदीकेँ खइयो ले दि‍हक।

(जारी......................................)


 
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
राजदेव मण्डलक उपन्यास हमर टोल


पछि‍ला खेपसँ आगू-

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दौग कऽ अबै जा हौऽऽऽ। देखहक हौ लोक सभ। हमरा अँगनामे ढेपा बरि‍स रहल छै। पछुआर दि‍ससँ कतेक ढेपा फेँक रहल छै। दौगै जा हाे।
गे माइ गे माइ। कोन उपद्रव शुरू भऽ गेलै गे। कोन देवी-देवता खि‍सि‍सया गेलै हो देव। हौ समाज बचाहब हौ।
हल्ला गुल्लाश सुनि‍ बहुते लोक दुआरि‍पर जमा भऽ गेल छै। देवीपुर वालीक मुँहपर डर नाचि‍ रहल अछि‍।की भेल?”- अड़ोसी-परोसी पूछि‍ रहल छै।
जान बचाहब हौ। पछुआर दि‍ससँ ढेला बरि‍स रहल अछि‍, अँगनामे।
अन्हाचर राति‍मे पछुआरमे केना कऽ देखबै।
फुलचनमा टाॅर्चक इजोतसँ देखही तँ के छी सरबा।
हे, गारि‍ नै देबाक चाही। कि‍नसाइत देवी-देवताक ममि‍ला हेतौ तँ धक्कापर चढ़ि‍ जेबे। बुझि‍ लही, एक्के बेरमे जय-सि‍याराम।
हि‍म्मरतगरहा तीन-चारि‍टा छौड़ा आगू बढ़ल। चारूभर टाॅर्चक इजोत छि‍ड़ि‍या गेलै। कहाँ छै कोइ हौ। नुका तँ नै रहलै।
कोन ठेकान, कहीं भूत-प्रेरक ममि‍ला ने होइ।
भऽ सकै छै। देवीपुरवाली कोनो कबुला-पाती केने होइ आ पूरा नै केलाक कारणे देवीक प्रकोप मचबैत होइ।
देवीपुरवाली लालटेन नेस रहल छै। अँगनामे तँ ढेपाक ढेर लगल छै। एकर बेटज्ञे नै छै।
धुर, उ तँ चौकपर ताड़ी पीब कऽ मतंग हेतै।
देवीपुरवालीक पुतौहु चमकी ओसारपर बैसल छै। बेचारी डरे थर-थर कापि‍ रहल छै। देवीपरुवाली ि‍वधवा रहि‍तो मरद जकाँ काज करैत छै। बेटाकेँ जन्मैेते पति‍ सदाक लेल संग छोड़ि‍ देलकै। ओइ बेटाक भरोसे पहाड़ सन जीनगी काटि‍ लेलकै। ओकर बेटा नकचट्टाआब जुआन भेलै। ओइक संगे आसा जगलै जे एकटा कमौआ पुत भेल आब। कि‍न्तुै ओहो पि‍यक्कड़ भऽ गेलै। काम करत तँ करि‍ते रहि‍ जाएत। कहीं ताड़ी पि‍बाक लेल गेल तँ कखैन आएत पता नै। सासु-पुतौहु मि‍लि‍ कमा-खटा कऽ कहुना गुजर चला रहल अछि‍।कही एकर पुतौहु चमकी डाइन तँ नै छै हो?”
नै-नै, ई बात झूठ छै। एतेक भोली-भाली औरत डाइन केना कऽ भऽ सकै छै।
हँ, हँ, भोला-भाला चेहरा भीतर दि‍ल बेइमान।
हँ रौ भाय। तब ने जइ समैमे पहि‍लुक बेर आएल रहै। लबे-धबे रहै। टोलमे बड़का हो-हल्लाम भेल रहै।
हे रौ, ऊ जइ घरमे ठाढ़ होइ ने ठीक ओकरा कपारक सामने घरक छप्प रमे आगि‍ लगि‍ जाए छलै। उतरबरि‍या घरमे जाय वएह बात। दक्षि‍णवरि‍या घरमे जाय फर वएह बात। ई तँ चट दऽ लोक मुझा दैत छलै नै तँ पूरा घर जरि‍‍ कऽ सुड्डाह भऽ जएतै।
पसरतै केना कऽ। बान्हाल आगि‍ रहै ने। बुझि‍ही, औरति‍याकेँ देह नै रहै, आगि‍क भट्ठी रहै।
तब तँ नकचट्टाकेँ सलाइ कीनबाक कोनो जरूरते नै।
सभ गोटे एक्केबेर खि‍सि‍या कऽ हँसए लगल। उन्मु क्त हास्यल। अरे तोरी कऽ, ई तँ असल अगि‍नदाइ छि‍यौ रौ।
फेर ई बेमारी ठीक केना भेलइ?”
वएह खेलावन भगत कतेक दि‍न तक झाड़ फूंक केलके। तब अगि‍नदाइक देहसँ आगि‍ कम भेलै।
सुनने रही जे ओकरे लग गेलासँ ई खेला शुरू भेल रहै।
हँ मथदुखी झड़ेबाक लेल खेलावन भगत लग लऽ कऽ गेल हरै। ओही दि‍नसँ ई अगि‍लगौना काण्डे हुअए लगलै।
तब तँ कुल करामात खेलावने भगतक रहै।
पछुआर दि‍ससँ अजय सोर पाड़लक- दौग कऽ एने अबै जो। भूत पकड़ा गेलौ।सभ एक्केबेर दौगल। बैगन गाछक झोंझसँ अलटरबाकेँ नि‍कालैत अजय कहलकै- एकरा पंचक पास लऽ चल।
हँ हँ ठीके बात। घोंचाय अपना बेटाकेँ कि‍अए नै सम्हािरैत छै। राति‍-वि‍राइत औआइत रहै छै। राति‍चर भूत जकाँ।
लोककेँ डेरानाइ कोनो नीक गप्पब होइ छै। कहीं आँखि‍मे ढेपा लगि‍ जाय तँ फूटि‍ जेतै।
जन्मेँले टासँ नै होइ छै, पति‍पालो करए पड़ै छै। लऽ चल। पंचसभ नि‍रलय करतै।
डेढ़हथ्थीँ कान्हँपर लेने घोंचाय गरजैत देवीपुरवालीक दुआरि‍पर पहुँचलै।हमरा बेटाकेँ पंचक पास लऽ जेनि‍हार के छी? ई छौड़ा अखने अंगनासँ खा-पी कऽ नि‍कललै। मुतै लेल बाड़ीमे गेल छलै। ई केना कऽ ढेपा फेकतै? छै कोइ गबाह? देखलकै ढेपा फेकैत? अजैया दू अक्षर शहरसँ पढ़ि‍ कऽ की आएल जे सभ जगह अपने कबि‍लगीरी। अोकरा अंगनामे कोनो देवी ढेपा फेकै छै आ नाओं लगबै छै, हमरा बेटाकेँ।
घोचायक स्त्री गारि‍ पढ़ैत पाछूसँ अबै छै।
के नि‍पूतरा हमरा बेटाकेँ पकड़ने अछि‍। कोनो चोरी-डकैती केलकै की। कोइढ़फुट्टा, छोड़ हमरा बेटाकेँ। ने तँ जे ने से कऽ देबै।
झमारि‍ कऽ अपना बेटाकेँ छोड़ौलक। ओकर बाँहि‍ पकड़ि‍ घि‍चने घर दि‍स चलि‍ पड़ैत अछि‍। पाछूसँ फनकैत घोंचाइ जा रहल अछि‍।अखैन तँ बेकारक झगड़ा ठाढ़ भऽ जइतै। अजयकेँ कोन दुसमनी छलै, ओइ छौड़ाक संग।
दुसमनी ओकरासँ नै छै। असल दुसमनी घोंचायसँ देवीपुरवालीकेँ छै।
उचि‍तवक्ता बीचमे आबि‍ कऽ बजए लगल- बेटाक जन्मस भेलापर अंगनासँ बहींगा फेकल जाइ छै। जे घरक ऊपरसँ दरबज्जावपर गि‍रबाक चाही। फेर ओही बहींगामे बैरक झाड़ आ जूता लटका कऽ घरक आगू गाड़ल जाइ छै।
घोंचायक संग की भेल रहै?”
घोंचायक बेटा भेल रहै ने तँ अंगनासँ बहींगा फेकने रहै। ओही समैमे ओकरा ढांगमे गड़ि‍ गेलै। पंचैती भेलै तँ घोंचायकेँ डण्डभ-जरि‍माना लगलै। ओही दि‍नसँ दुसमनी चलि‍ रहल छै।
कहीं ढेलफेक्काे भूतकेँ घोंचाय भेजैत हेतौ।
कुछो हौ। खेलाबन भगतकेँ पूजाक खरचा भेट जेतै। तब देवीपुरवालीकेँ कल्याीण हेतै।
देवीपुरवालीक बेटा नकचट्टा ताड़ी पीब कऽ दुआरि‍पर आबि‍ गेल छै। ओ नि‍साँमे गरजि‍ रहल छै।
हमरा दुआरि‍पर एतेक लोक कि‍एक जमा भेल छै हौ? बुझै छी, ऐ अौरति‍याकेँ। सनकल जा रहल छै। हम घरपर नै रहै छी तँ छौड़ा सभकेँ सोर पाड़ि‍ कऽ रसलीला करैत रहैत अछि‍। कहाँ छै हमर मोटका समाठ बला लाठी। आइ डाँड़ आ पीठी सरका देबै हम।
अगि‍नदाय डरसँ कोठी गोड़ा तरमे नुका रहल अछि‍। पता नै देहपर लाठी कतए-कतए गि‍रतै। रोइयाँ काँटो-काँट भऽ रहल छै। उचि‍तवक्तार दुआरि‍पर सँ बि‍दा होइत बजल- अजय भाय, चलह ऐठामसँ। नै तँ समाठसँ चूड़ा जकाँ कूटल जेबह।
सभ धड़फड़ा कऽ चलि‍ पड़ैत अछि‍। अजय देखैत अछि‍। आसमानसँ चुगला गि‍रैत अछि‍। धरती दि‍स बढ़ैत इजोतक रेखा। चारूभरसँ अन्हायर ओकरा दि‍स दौगल। छनेमे जेना ओकरा पकड़ि‍ घोंटि‍ लेलक। फेर आँखि‍ अन्हाररेमे अछि‍, इजोतक प्रतीक्षा करैत।

...............

जनीजाति‍ सभ अँगनामे गाबि‍ रहल अछि‍।
बाबा केँ अँगना मे लगनहि‍ आएल पोती भेल डुमरी केँ फूल हे एहि‍ बेर लगनमाँ फि‍राय दि‍यौ बाबा सि‍खऽ छि‍यै लूरि‍ बेबहार यौ।
अकलू मड़रक बेटीकेँ बि‍आह हेतै। बरयाती आबि‍ रहल छै। दुआरि‍केँ कते चि‍क्कन-चुनमुन केने छै। लगै छै जेना चनन छि‍टका देने हो। ततेक इजोत चमकै छै जे अन्हा र तँ जेना नि‍पत्ता भऽ गेलै। दुआरि‍ आ अँगनाकेँ सभ चीज दोसरे रँगक लगै छै। चमाचम। एककातमे भनसि‍या सभ अहरी चढ़ा देने छै।
पहि‍ने भात नै, तीमन बनतै। पानि‍ ला रे।
भैया, एक चि‍लम गाजा हमरा घरबारीसँ मंगा दे तँ हम भरि‍ राति‍ खटबौ।
चुप, दारू, गाजा पी कऽ भानस करता।नूनक बदलामे चीनी ढारि‍ देबही। तब की हेतै?”
कि‍छु लोक भोजन-भात बना रहल अछि‍ तँ कि‍छु लोक बरयातीकेँ सूतए आ बैसए लेल बेवस्था कऽ रहल अछि‍। धीया-पुता सभ दलानक आगूमे खेल रहल छै। कि‍दु नाँगट-उघार तँ कि‍छुकेँ देहपर बस्‍तरो अछि‍। नाकमे नेटा
, सुर-सुर करैत। भैया मुतबै हौ।
चुप सार, तोरा तुरत्ते मुतबास लगि‍ गेलौ।
तँ परसादी मँगा दे।
भगवानक पूजा नै हेतै। एकरा अँगनामे बि‍आह हेतै।
हे रे छौड़ा, ऐठाम लगही कऽ देलही।
बूढ़बा लाठी लऽ कऽ फटकारैत बजल-
भाग दुआरपर सँ। नीचा जा कऽ खेल।
अंगनामे गीत गौनि‍हारि‍ सभ उपरौंझ कऽ रहल अछि‍। पहि‍ने तँ एकोटा जनीजाति‍ एबे नेे करै छलै।
जाि‍तसँ अलग। ढाढल बान्हहल छै- अकलू मड़र। ओकरा संगे के जाएत बन्धेनमे पड़ैले।
अकलू मड़रक स्त्री बड्ड चलाकी जनै छै। टोलक मूलगनि‍ घुघुरबत्तीकेँ पटि‍या लेलकै।
दाय हे, जेहने हमर बेटी तेहने तोहर बेटी। कोनो तरहेँ पार-घाट लगा दहक। दोसरा गामकसँ लोक सभ आबि‍ रहल छै। अपना गामक इज्जबति‍क सबाल छै। अपना टोलक गप्प आन लोक कि‍एक बुझतै। रहबै तँ एकेठाम।
केना कऽ मानतै औरति‍या सभ। आखि‍र सुख-दुखमे एकसाथ रहैत आएल छै।
नदि‍या कि‍नारे बाबा हौ कि‍नकर बाजा बाजै, कि‍नकासँ माँगे दहेज हौ, नदि‍या कि‍नारे धाेती तोरे बाजा बाजै हमरासँ माँगे दहेज गे.......।
डि‍म-डि‍म-डि‍मि‍क। ढोलक आ पीपीहीक अवाज।
आरे तोरी कऽ बराती तँ गामक बगलमे पहुँचि‍ गेलौं। जल्दीक सभ प्रवन्धा कर रौ।
इह, कोनो लाट साहेबकेँ बरयाती नै आबि‍ रहल छै।
सुनै छी, जे दू बीघा जमीन छै।
दू बीघा जमीन छै आ सात भाँइ छै। फेर सातोकेँ दू-दूटाक धि‍या-पुता। अंगनामे बेदराक ढेरी लगल छै।
सुनै छी, लड़ि‍का घरक छप्पदर बनबैमे तेज छै। लाड़-पुआर बत्तीक छप्प र। तँए खेतीक अलाबे कि‍छ आमदनी भऽ जाइ छै।
बुझलौं- घरमे फुइस-फाइस बाहरमे धक्का।
अंगनासँ गीतक अवाज-
सोनाक पि‍ंजरा बना दऽ हौ बाबा,
ओहि‍ मे रहब नुकाय हौ। सोनाक पि‍ंजरा बना देबो गे पोती पि‍ंजरा सहि‍त नेने जाय गे.....।

बुढ़बा सभ अपना पगड़ी आ धोतीकेँ ठीकसँ बान्हैसत अछि‍। ढोल-पीपही आ स्पीपकर जोर-जोरसँ बजए लगल। लोगमे हड़बड़ी मचि‍ गेल छै। समाजक लोक दुआरि‍पर एकट्ठा भऽ रहल छै।
बरयाती आबि‍ गेलै। चलै-चल सुआगतमे। खाना-पीना बादमे हेतै। सुआगतमे ति‍रोटी नै हेबाक चाही।
हँ, ठीके गप्पे। दोसरा गामक लोक, अरि‍जन-परि‍जन, कुटुम। ओकरा ठाठ बान्हगसँ की मतलब।
हँ हँ, आखि‍र हमरो धनुकटोलीक कि‍छ शान छै।
अरे तोरीकेँ, नाचक पाटी लौने अछि‍।
हँ, लगही आ झाड़ासँ टोलकेँ महकौतौं।
ई सार तँ नमरी लोफर छै। धि‍याने दोसरे तरफ।
उचि‍तवक्ताल मुड़ी डोलबैत बजल-
असल गप्प। एहि‍ना भकभका कऽ लगै छै। सावधान, नाच देखैते चि‍ड़ै कोनो छौड़ा संगे उड़ि‍ ने जाऊ।
चुप्प , शैतान।
डेढ़ि‍यापर जनीजाति‍क भीड़। वर देखबाक सबहक आँखि‍मे उत्सुपकता। रंग-बि‍रंगक साड़ी-आँगी पहि‍रने। फूल सन फुलाएल मुख। चहकैत छौड़ा सभक दल। पैंट-शर्ट
, लुँगी-कुरतामे सजल। बुड़ सभ धोती-कुरता आ माथकेँ गमछासँ मुरेठा बन्हाने।
पहि‍ले पएर-हाथ धोबाक लेल जलक बेवस्था करह। पूछि‍ लहक सभ बरि‍याती आबि‍ गेलै।
दुल्हाा नै आएल छै?”
आरे बहींचो, बि‍ना वरक बरि‍याती आबि‍ गेलै हौ। बि‍आह केना हेतै?”
कहै छै- गामसँ संगे-संग चललौं। रास्ताामे पछुआ गेल। पता नै कतए रहि‍ गेलै।
छुच्छैी छुतहु फूकै छलै रे। बि‍ना दुल्हेक घर-दुआरि‍। दुआरि‍पर आएल कि‍एक? मार सार बरि‍याती सभकेँ।
ऐमे बरि‍यातीक कोन दोख?”
हे रौ ला तँ सटका। दोष-गुणकेँ फरि‍छाबै छथि‍।
हे रौ, मनकेँ थि‍र करै जो। ठहर, एना नै करै जो।
बरि‍याती सकदम। जेना सबक छातीमे डर ढुकि‍ गेलै। सभ मुँह लटका लेलक। गप-सप्पए बन्न। मने-मन सभ सोचि‍ रहल अछि‍। कहीं भरि‍ राति‍ वर नै एतै तब की हेतै
? एहने स्थिन‍ति‍मे बरि‍याती सभकेँ छौलका छोड़ेने रहै, ढेलपुरा गाममे। चलाक बरि‍याती धोतीकेँ डाँड़मे खोंसि‍ रहल अछि‍। पछुआरक रस्तोा भजि‍आ रहल अछि‍। रंगमे भंग। तमाकूल-बीड़ी सभ बन्न। अंगनामे गीतनादक बदलामे फुसराहटि‍ शुरू भऽ गेल छै। लीलाक भाग्ये। खराप छै। कतेक मेहनति‍ अकलू मड़र केलकै तब सभ चीजक इतजाम भेलै। दू बरि‍ससँ बेचारेकेँ एड़ी खि‍आ गेलै तब जा कऽ बि‍आहक बात तँइ भेलै। आब देखि‍यो...।
छठी राति‍ वि‍धि‍ लि‍खे लीलारा की संकट के मेटनहारा।
बात सुनि‍ लीलाक कलेजामे जेना बरछी भोंका गेलै। ओ मुँहमे नुआ ठूसि‍ कऽ कानि‍ रहल अछि‍। लोकक मनमे शंका औना रहल अछि‍।
कहीं लेन-देनमे कोनो गड़बड़ी तँ नै भेल छलै। अकलू मड़र छै-बड़ा मक्खीआचूस।
तीमन-तरकारी बनेबै की नै?”
धुर, छोड़ि‍ दि‍यौ। की हेतै की नाइ।
उचि‍तवक्ताक केना चुप रहतै।
कानल कनि‍याँ रहि‍ए गेल कानी कटाओल वर घुरि‍ए गेल।
मार सारकेँ रौ। बड़ लबर-लबर करै छौ। एने अकलू मड़रकेँ पाछूसँ नि‍साँस छूटि‍ रहल छै। आ एकरा.....।
अकलू मड़रकेँ दोस-महि‍म
, कर-कुटुम सम्बँन्धीी सभ बाध-वोन दि‍स खोजै लेल नि‍कलि‍ गेल छै।
हल्लोक जे करबै से वरक नाओं जानबे नै करै छी।
स्टेहजपर ढोलक-हरि‍मुनि‍याँ चुप्पेस पड़ल अछि‍। नाच पाटीक लोक सभ चुपचाप बि‍ड़ी पी रहल अछि‍।
हमरा सभ की करबै यौ? एहो लगन ने उधारे रहि‍ जाए।
चुप, ओने दोसर नाच भऽ रहल छै। तोहर नाच के देखतौ। बानर जकाँ कूदल घुमै छेँ तखैनसँ।
नाचक लेबरा चट दऽ बजल-
सभ तँ बानरेक सन्ताेन छी आ बानरे छी। हम छी लड़का बानर।
हे, मुँहकेँ चुप राख नै तँ..।
गौ बाबू आदति‍ नै छौ। पेट फूलि‍ जाएत।
अकलू मड़र सोचि‍ रहल अछि‍- एक तँ जाति‍ आगि‍-पानि‍ बन्न कऽ देने अछि‍। जखैन कि‍ हमर कोनो दोष नै छलए। भैया मरि‍ गेल छलाह। घरमे कुछो नै रहए। ऊपरसँ अकालक तबाही। कतएसँ करि‍तौं भोज
? लोक कहलक खेत बेचि‍।
कहए पड़ल- खेत बेचि‍ लेबै तँ खेती कतए करबै
? कतेक जमीने छै हमरा पास।
दोसरकेँ दुख देखबाक फुरसति‍ केकरा पास छै
? सभकेँ तँ अपने दुख भारी छै। सुआरथमे आन्ह।र भेल टेबैत, हथोड़ैत कहुना चलि‍ रहल अछि‍।
एक साँझ भोज-भात हेतै आ हमर सभ कि‍छो बि‍का जेतै। लेकि‍न कहाँ कोइ सुनल हमर गप्पभ। ओइदि‍न जाति‍सँ अलग कऽ देलक। कतेक मेहनति‍ केलौं। केकरा-केकरा नै गोड़लग्गीक केलौं। कोन-कोन जानवर लग ने माथ लगेलाैं। तब ि‍बआहक गप्पँ नि‍श्चि‍त भेल। ओहोमे कोन दुसमनी लगि‍ गेल से पता नै। वर बाटेमे बि‍ला गेल। के की केलक से नै जानि‍। सभ तँ दुसमने अछि‍। वर नै आएत तँ हमर बेटी कुमारि‍ रहि‍ जाएत। दोसरठाम बि‍आहक गप्‍पो नै होएत। लोक सोचत लड़कीमे कोनो खराबी छै। बाप रे बाप
, कोन उपाए हेतै। कतौ कऽ ने रहबै- हम। सभटा खरच-बरच बेकार चलि‍ जेतै। फेर दोबारा कतए सँ एतेक टाका-पैसाक बनोबस करबै। अफवाह फैलत- बि‍आहमे कोन नाटक भऽ गेलै रौ। केकरो सोझामे केना जाएत। अकलू मड़र अन्हा रेमे बैसि‍ कऽ कानि‍ रहल अछि‍। लोक सभ वरकेँ खोजि‍-खाजि‍ कऽ आपस आबि‍ रहल अछि‍।
कतौ नै भेटलै। बड़की सड़क तक कतौ नै छै।
चारि‍-पाँचटा छौड़ा बौआ रहल छलै। लग जा कऽ पुछि‍ते पड़ा गलै। गुँहे-मूते दौगैत अपने गाम दि‍स आएल।
सभ नि‍साँस छोड़ैत अछि‍। वरक काका चि‍चि‍आइत अछि‍-
आबि‍ गेल। आबि‍ गेल- दुल्हाे। कतए रहि‍ गेल छलही, तूँ सभ रौ।
हंस पलटि‍ गेल-समधीक। सबहक आँखि‍मे उत्सुपकता। शान्तग पोखरि‍मे हलचल। लोकक देहमे जेना गति‍ आबि‍ गेलै। नाच-मंडलीक कलाकार फानि‍ कऽ स्टेतजपर चढ़ि‍ गेलै। ढोलक-हरमुनि‍यााकेँ जना पराण घूमि‍ गेलै।
औरत-सभ खखसि‍‍ कऽ गला साफ कऽ गला साफ कऽ रहल अछि‍। तरे-तर।
लीलाक माए जल्दीक सभ कि‍छो तैयार करू। चुमबैले। समए नै छै।
चलू, पहि‍ने लड़ि‍का देखबै।
ग्रामीण सभ जमा भऽ गेल छै।
समधि‍ कहाँ छै?”
समधीकेँ रतौनी भेल छै। कम सुझै छै।
अहाँक बेटा कहाँ अछि‍? कानमे तँ लंगोटा बन्हने छै- सुनतै केना।
हेयौ दुल्हा कतए छै?”
बरि‍याती सभ चारूकात सँ घेरने अछि‍। बीचमे चारि‍-पाँचटा छौड़ा ठाढ़ अछि‍। ओकरा देहपर कछी-जंघि‍या मात्र अछि‍। उघारे देह-जाड़सँ सुटकौने। मुँह लटकौने। दुल्हाक काका हाथसँ इशारा करैत छै।
वएह छी वर। जेकरा देहपर ललका जँघि‍याटा अछि‍।
उचि‍तवक्ता फेंफि‍या कऽ बजल-
अरे तोरी कऽ। हौ, ओइ गामक एहने रि‍वाज छै। नंगा भऽ कऽ एहि‍ना उघारे बि‍आह होइ छै। नंगटा कहीं के....।
सभ खचरपन्नी समधीक छी। दहेजबला सभटा टाका-पैसा अपना मौगीक पछुआरे राखि‍ कऽ आएल अछि‍।
हँ हौ, बेटाकेँ कछी-जंघि‍या पहि‍रा कऽ कुश्तीक लड़बाक लेल ठाढ़ कएने अछि‍।
सभ ठि‍ठि‍आ कऽ हँसल। हा.... हा.... हा.. ही... ही...।
हे रौ हमरा तँ लगै छौ, भैंस-गाए चरा कऽ बाधसँ एहि‍ठाम चलि‍ एलौ। देखहक तँ कपारमे एको बून तेल छै। बि‍आह हेतै, कोनो खेल नै हेतै। दसटा ग्रामीत देखतै।
माथपर मौड़ कहाँ छै हौ?”
चुप रह, मौड़ की देखबहक। घौड़ देखहक। बेटाबलाकेँ संतोष रहै छै हौ। दैत रहक।
समधी तरे-तर तामसे फुलल अछि‍। बेटाक हालति‍ देखि‍ बजत की। अन्त
मे घोंघि‍या कऽ बजल- जखैनसँ दुआरि‍पर पएर रखलौं तखैनेसँ सभ ओल सन बोल बजि‍ रहल अछि‍। आँत छुबौआ बात। जेना हमर कोनो परति‍ष्ठेए नै। मनुखक बेवहार एहने होइ छै की? सभटा बकटेटि‍या आ लंठाधि‍राज जमा भऽ गेल अछि‍। बेसी तामस चढ़त तँ लड़ि‍काकेँ लऽ कऽ चलि‍ जाएब। सबहक जेना मगजे उनटल छै।
कालू मड़र बीचमे आबि‍ कऽ सम्हाहरैत अछि‍।
सभ बकटेटे जकाँ गप्पं नै करहक। एकरा सबहक संगे की भेलै सेहो तँ बुझबहक।
समधी अपना बेटासँ पुछै छै-
की भेल रहौ बौआ?”
दुल्हाप ठोह पाड़ि‍ कऽ कानए लगैत अछि‍। उचि‍तवक्ता ठि‍ठि‍आ कऽ हँसए लगल।
कनि‍याँ बि‍दागरी कालमे कानै छै। ई केहेन वर छै जे सासुर अबि‍ते काल कानि‍ रहल छै मौगी जकाँ।
पहि‍ने सुनि‍ लहक गप्प ।
हमरा सभ टाएर-गाड़ीसँ आबि‍ रहल छलौं। बाधमे सात-आठटा डकैत धेरि‍ लेलक। जेबीसँ सभटा पैसा-कौड़ी छीन लेलक। टाँर्चसँ हाथ मोचाड़ि‍ कऽ पहि‍ने झपटि‍ लेने रहए। दि‍ल्ली सँ कमा कऽ घुमैत काल जे पंेट-शुट कीनने छलौं सेहो नि‍कालि‍ लेलक। हमरा सभकेँ ठाेंठकरि‍या दैत गाड़ीपर सँ खरस देलक। आ उ सभ टाएरपर चढ़ि‍ बड़दकेँ हाँकि‍ देलक।
हम कहै छि‍यौ, नि‍श्चि‍त मूतनमा डाकू हेतौं। आइ-काल्हि‍मे ऊ जेलसँ छुटल छै।
आब लि‍अ, सुनि‍यौ, सरकार केहेन छै। चोर-डकैतकेँ कतेक छूट दऽ देने छै। कतौ आएब-जाएब मोश्कि ‍ल। सभ अपने कुरसी बचेबाक लेल परेशान। गरीबक तरफ धि‍यान के देतै?”
चोर-चहार नि‍शंक भऽ कऽ साँझ-वि‍हान लुट-पाट करै छै। घूसक टाका-पैसा गनैत-गनैत रक्षा करैबलाकेँ पलखति‍ नै भेटै छै। की करतै
, आदति‍ पड़ल छै हौ। हाय रे, अपने समांग दालि‍-भात।
अच्छाे आब ऊ बात छोड़ि‍ दहक दुल्हातकेँ कपड़ा-वस्तकर पहि‍राबह।
धड़फड़ीमे दोसराक धोती-कुरता वरकेँ पहि‍रा देल गेलै। देहक नापसँ कुरता नमहर छै। लड़ि‍का बाबाजी जकाँ लगै छै। उचि‍तवक्ताो ऊपर-नि‍चा तकैत कहै छै-
हड़बड़ी बि‍आह कनपट्टी सि‍नुर।
टाइम नै छै। वि‍ध-बेवहार शुरू करह।
फेरसँ सबहक मुँह हरि‍आ गेलै। गीत गनगना गेलै। ओने राजा सलहेसक नाच शुरू भऽ गेलै।
अरे तोरी के, देखहक, तालपर डान्स रकेँ नचैत। जेहने रूप तेहने नाच। आइ खूबे जमतै।
अखैनि‍यो मनोरथ मड़र नमहर केश राखि‍ते अछि‍। जुआनीमे लोक ओकरा नटुआ कहै छलै। बीचेमे टपकल-
अरे, ई की देखै छी। एक समैमे हमहूँ नामी डान्सैर छलौं। धनि‍काहा गाम नाच-पाटीमे गेल रहि‍यौ। तीन दि‍नक साटा रहै। भोरेसँ बड़का घरक मलि‍काइन सभ कहै- चाह हमरा घरपर बनतै तँ कोइ कहै जलखै हमरा घरपर। मन तँ हमर उड़ल फि‍रै। लकि‍न की करबै अपना घरक मोह.....।
नाच शरू भऽ गेल छै। राजा सलहेसकेँ रि‍झबैक लेल सती सेालहो सि‍ंगार कऽ रहल छै।
अंगनामे साईत सि‍नुरदान भऽ रहल छै। झोंकपर गीत कान तक आबि‍ रहल छै। दुल्हा सि‍नुर लि‍यौ हाथ
, पान-सुपारीक साथ, दुलहि‍न उघारि‍ लि‍यौ माथ, सि‍नुर लए ले। दुल्हालक सि‍रपर शोभे मोर, दुलहि‍न सभदि‍न पूजत गोड़ दुलहि‍न उघारि‍ लि‍औ मांग, सि‍नुर लए ले। ग्रामीत सभ नाचक रसमे दुबकि‍ गेल अछि‍। गामक झगड़ा-लड़ाइ आ सि‍नेह-परेमकेँ अजय देखि‍ रहल अछि‍। ओ कखनो नाच लग जाइत अछि‍ तँ कखनो कोनचरसँ आंगन दि‍सि‍ हुलकी मारैत अछि‍। चारूभर छड़पटाएल घुड़ैत अछि‍। कि‍न्तु शीलाक कोनो सुर-पता नै भेट रहल छै। अजय तकैत-तकैत अपस्यिक‍ांत। पछुआरमे केराक बड़का-बड़का गाछ लाके जकाँ ठाढ़ छै। छोटका-छोटका झड़-झॉंखुरमे भगजोगनी भुक-भुकाइते रहै छै। ओइ झॉंखुरक अढ़मे माटक ढि‍मका छै। वएह तँ बनल अछि‍, दुनूक परेम मि‍लन स्थतल। ओइठाम दुनू गोटे सभ कि‍छु मोन पाड़ैत अछि‍ आ सभ कि‍छु वि‍सरैत अछि‍। जहि‍यासँ जोड़ लगैत गहुमन ओइ जगहपर मारल गेलै तहि‍यासँ ओम्ह र जेबाक साहस कमे लोक करै छै। अंगनामे शीलाकेँ कछमच्छीु लगल छै। लोकक आँखि‍सँ बचि‍ कऽ ओइ जगहपर जेबाक कोशि‍शमे लगल दै। परन्तुे काजक अंगना अछि‍ तँए कोइ ने कोइ ओकरा सोर पाड़ि‍ लैत अछि‍। पछुआरमे अजयकेँ मच्छिर काटि‍ रहल छै। चोर जकाँ रगड़ि‍ कऽ मच्छिरकेँ मारैत अछि‍ फेर वि‍चारमे हरा जाइत अछि‍। शीला आइ दुलहि‍न जकाँ सजल छै। केना ने सजि‍तै? ओकरा बहि‍नक बि‍आह भऽ रहल छै। छजन्ताि छै। अजय आगूक खत्तामे देखैत अछि‍। पानि‍मे चान थरथराइत टहलि‍ रहल अछि‍।
चन्द्रूमाँक बगलमे दोसर चानकेँ उगैत देखि‍ चकोरकेँ चकवि‍दोर लगैत अछि‍।
अन्हाखरमे चोर जकाँ के बैसल अछि‍?”
मोन आ दि‍लकेँ चोरबैबला चोर।
हँ ठीके मक्ख‍न चोर।
अजय आ शीला सहटि‍ कऽ बैस गेल अछि‍। दुनू एक-दोसरसँ अर्थहीन गप्पि कऽ रहल अछि‍। जइमे अर्थ भरल अछि‍। दुनू तेना कऽ सटि‍ गेल जे लगैत अछि‍ जेना गहुमन साँपक जोड़ी फेर जोड़ लगल। लोभ फाेंफि‍या उठल। हाथपर चढ़ि‍ कऽ कामना ससरि‍ रहल अछि‍। सुगन्धेक स्विरूप बदलि‍ गेल अछि‍। मुखक लाली चारूभर छि‍ड़ि‍या गेल छै। जेकरा ठोर समेटि‍ रहल अछि‍। कामना आ परेमक डोरि‍ बढ़ले जा रहल अछि‍। मन्द बसात सँ केराक गाछ हि‍लैत अछि‍। सुखदानक संगे पत्तापर सँ पानि‍क बून भरभरा कऽ गि‍रैत अछि‍। अंगनासॅ ंकोहबर गीत आबि‍ रहल अछि‍। कथी केर मड़बा कथी केरि‍ कोहबर कथी-केरि‍ लागल केबाड़
,
यौ बि‍नु बाँसक कोहबर सोने केरि‍ मड़ा
, रूपा करि‍ कोहवर
हीला-मोटी लगल दै केबाड़
, यौ बि‍नु बाँसक कोहबर।

(जारी.........................।)

 

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
डॉ. कैलाश कुमार मि‍श्र
इंद्रधनुषी अकास

हम मानव वि‍ज्ञान एवं कलाक शोध छात्र छी। शोध छात्रक भाषा तँ प्राणहीन होइत छैक। उपमा, अलंकार, सौन्दनर्य, स्वलप्न आदि‍ शोधछात्रक हेतु जेना कुनो बाहरी परि‍वेशक वस्तुभ होइक। मुदा छी हम घोर आशावादी आ पॉजीटीव। शायद अपन अही पॉजि‍टीव सोच आ दृष्टि ‍कोणक कारणे हम परमादरनीय जगदीश प्रसाद मण्ड ल केर कवि‍ता संग्रह इंद्रधनुषी अकास केर आमुख लि‍खबाक जि‍म्माह लऽ लेलहुँ। मण्डडलजी वि‍चारसँ प्रगति‍शील आ सभ तरहक लोक-वि‍चारधारा, परिस्थिख‍ति‍ आ परि‍वेशमे सामंजस्यल स्था पि‍त करएबला साहि‍त्याकार छथि‍। अल्ट रनेटि‍व डेवलपमेन्टष आ इकोलॉजि‍कल कन्सेतप्ट्केँ स्थाेनीयताक दृष्टि्‍कोणमे बुझबाक आ अपन ज्ञान गंगाकेँ कथा, उपन्या्स, नाटक एवं कवि‍ताक रूपमे बहेबाक असाधारण क्षमता छन्हिे‍ मण्डटलजीमे। हि‍नकर रचना पढ़ैत जाऊ आ ब्योंपत-पर ब्यौं त सुनैत जाऊ! हि‍नकर बात आ ब्यों त सभ सहज, चमत्का री मुदा वि‍श्वशनीय लागत।
आब बात करी रचनापर। हि‍नक रचना इंद्रधनुषी अकास सरि‍पहुँ कवि‍ताक प्रकार, छोट-पैघक हि‍साबे, भावनाक प्रवाहक हि‍साबे, अनेक वि‍षयमे होबाक कारणे बहुरंगी चुनरी अछि‍। अतेक वि‍स्तृैत वि‍धा आ वि‍षयकेँ समेटबाक कारणे ऐ संकलनक नामकरण अहि‍सँ उत्तम नै भऽ सकैत अछि‍ : वैवि‍ध्य सँ भरल, मनोरंजक, रंगारंग, दीवास्वकप्न, सोहनगर-मनोरंजक आ मनोहारी अकास। ऐमे जीवनक यर्थाथ अछि‍, कवि‍क कल्पंनाक संसार अछि‍, उपमा आ अलंकार अछि‍, जीवनक दर्शन अछि‍, माटि‍सँ सि‍नेहक उद्गार अछि‍, गीत अछि‍, भाव अछि‍, अर्थ वि‍न्या‍स अछि‍, प्रेमक अनुभवजन्यऐ परि‍भाषा आ प्रवाह अछि‍, प्रकृति‍क अनुराग अछि‍, ग्राम्यप-जीवनक झांकी अछि‍ चीर प्राचीन आ चीर नवीन वि‍चार अछि‍।
इंद्रधनुषी अकासनामसँ अपन लि‍खल एकटा छोट कवि‍ता स्मदरण अबैत अछि‍, आ स्म रण अबैत अछि‍ ओ परि‍स्थिक‍ति‍ जइसँ प्रेरि‍त भऽ पाँच वर्ष पहि‍ने इंन्द्रसधनुषपर एक छोट कवि‍ताक ि‍नर्माण केने रही। परि‍स्थि‍‍ति‍ ई छल जे हमर पाँच वर्षीय पुत्र शशांक हमरासँ जि‍द्द करय लागल जे हमरा इन्द्र धनुष देखाउ।मुदा देखाऊ कोना! घोर समस्यार। कि‍छु काल सोचमे पड़ि‍ गेलौं। अन्तँत: कम्युरस् टर खोलि‍ इन्ट‍रनेट चालू कय ओकरा इन्द्रहधनुषक अनेको फोटो देखा देलि‍ऐक। शशांकक बालशुलभ मोन प्रसन्न भऽ गेलैक। राति‍मे सुतबासँ पहि‍ने मोनमे आएल जे ऐपर कि‍छु लीखी। पेन आ कागत लऽ लि‍खए लेल बैसि गेलौं। सोचल कवि‍ता लि‍खल जाए। कवि‍ताक शीर्षक सेहो फुरा गेल- इन्द्र धनुषक वि‍न्याासकवि‍ता स्वोत: प्रारम्भट भऽ गेल-

सुरुजक इजोतसँ भरल आकास दग्धल कतेक अछि‍
गर्मीक धाहसँ मोन वि‍दग्धी कतेक अछि‍
कोना करी एहि‍ प्रचण्डध गीर्मीमे शीतलताक आभाष कोना करी टहटहाइत इजोतमे इन्द्रड धनुषक वि‍न्याभस?
मुदा हारि‍ मानब हमर प्रकृति‍मे कतअ अछि‍ एकाएक बुझाएल जेना इन्द्र धनुष अतअ अछि‍। मोन हरि‍याएल ब्यों्त फुराएल इन्द्र धनुषक ि‍नर्माण हेतु कल्पहनाकेँ सकार कय इन्द्रल-धनुषक रचना हेतु सोचल कोना नै हैत इन्द्र धनुषक वि‍न्याधस?
टहटहाइत सुरुजदेवकेँ ऊपर आँजूरसँ पोखरि‍क पानि‍ छीटि‍, सुखल धरतीकेँ अरि‍यर करबाक हेतु कऽ लेब एकता छोट मुदा यथार्थक इन्द्र धनुषक वि‍न्यालस। फेर की सभ भऽ जाएत सोहनगर, की धरती आ की अकास।

आब बि‍ना इमहर-ओमहर भटकने जगदीश प्रसाद मण्ड‍ल जीक कवि‍ता संग्रहकेँ देखी। 110 कवि‍ताक समेटि‍ने 146 पन्नाक ई पोथी मैथि‍ली साहि‍त्यस केर एकटा अवि‍श्मरणीय धरोहर अछि‍। हरेक छोट आ पैघ कवि‍तामे कि‍छु संदेश, कि‍छु संस्कािर आ कि‍छु नव वि‍चार प्रस्फुेटि‍त होइत छैक। लोक मि‍थि‍लासँ बाहर पलायन करैत छथि‍ तँ मण्डसलजीकेँ कचोट होइत छन्हिन‍। मुदा जखन लोक मि‍थि‍लासँ साफे रि‍श्तात समाप्त कऽ आनठाम बैस जाइत छथि‍ तँ मण्डनलजीक हृदए जेना भोकासि‍ पाड़ि‍-पाड़ि‍ कानय लगैत छन्हिक‍। ऐ बातक सहज अनुभूति‍ उड़ि‍आएल चि‍ड़ैमे परि‍लक्षि‍त होइत अछि‍ :
उड़ि‍आएल चि‍ड़ैक ठेकाने कोन
उड़ि‍ कतऽ जा बास करत। भरि‍ पोख घोघ भरतै जतऽ
दि‍न-राति‍ जा रास करत। ओहन चि‍ड़ैक आशे कोन जे बि‍सरि‍ जाएत डीहो-डावर।

देख! देस परदेस कतहु जाऊ मुदा अपन माटि‍ आ अपन संस्कृआति‍सँ अपनाकेँ बि‍मुख नै करू। शायद यएह बात थीक ऐ कवि‍ताक मूल। अगर आँखि‍ मूनि‍ पलायन करैत रहब आ अवसर एवं सफलता मात्र पेबाक कारणे अपन डीह-डाबर सदाक लेल त्या गि‍ लेब तँ भला अहाँ केहेन मनुक्ख ! अहाँक केहेन संस्काार? छोट कवि‍ताक माध्यासँ कतेक मर्मक बात बजैत अछि‍ जगदीश प्रसाद मण्डकल केर कवि‍ मोन!
एक आर कवि‍ता- चल रे जीवनअहाँकेँ रोकि‍ लेत। कवि‍ता पढ़ु, ओकर शब्द क युग्म केँ देखू आ कवि‍ताक संग अपना-अापकेँ गति‍मान बना लीअ। ने कवि‍ता रूकत आ ने अहाँ। बाह रे बाह! एहेन आसाधारन सम्बतन्ध- कवि‍ता आ पाठकक बीच जीवन गति‍शील थि‍क। ई बात अनेको कवि‍ अनेको भाषा आ कालमे अपन-अपन ढंगसँ कवि‍ताक माध्यपमसँ कहने छथि‍। मुदा अही बातकेँ सर्वहाराक शब्दािवलीसँ कहब। कहब की चलैत पहि‍यापर एना बैसाएब कि‍ पाठककेँ जोश आबि‍ जाइक। ई कला मण्डशल जीमे छन्हिह‍। कवि‍ताक कि‍छु अंश देखू- कि‍छु दैतो चल कि‍छु लैतो चल कि‍छु कहि‍तो चल कि‍छु सुनि‍तो चल कि‍छु समेटतो चल कि‍छु बटि‍तो चल कि‍छु रखि‍तो चल कि‍छु फेकि‍तो चल बि‍चो-बीच तँू चलि‍ते चल। चल रे जीवन चलि‍ते चल।
समए संग चल ऋृतु संग चल गति‍ संग चल मति‍ संग चल। गति‍-मति‍ संग चलि‍ते चल। चल रे जीवन चलि‍ते चल।
हँ, कवि‍ केवल गति‍मान होमाक प्रेरणा टा नै दैत छथि‍। ओ कहैत छथि‍ जे जोश संगे होशमे रहू : गति‍ संग चल/ मति‍ संग चल/ गति‍-मति‍ संग चलि‍ते चल।

सासु-पुतोहु वार्ताकवि‍तामे जेनरेशन गैप आ मनोवैज्ञानि‍क वि‍श्लेषण भेटत। जखन कवि‍ता पढ़ब तँ लागत मनोरंजक अछि‍। जखन सोचब तँ लागत एकटा अनुभवजन्या वि‍श्लेमषण अछि‍। एक-एक शब्द।क चयन कवि‍ताकेँ समाजसँ सीधे जोड़बामे प्रभावकारी अछि‍।अपनेपर हँसै छीशि‍क्षाक घटैत स्तेर, चाेरी, घूस दय नौकरी प्राप्तज करबाक तरीका, अवसरवादी नेता लोकनि‍क पाॅपुलि‍जम आ शि‍क्षा मि‍त्र इत्या दि‍ केर माध्ययमसँ कि‍छु पाइक मासि‍क भत्तामे राखब, ओइ लेल मुखि‍यासँ नेता आ अधि‍कारी धरि‍ घूसक प्रचलन आदि‍ प्रथापर सोझे-सोझ प्रहार अछि‍। जकरा फबलै से बि‍ना पढ़ने नकल कऽ परीक्षा पास कए डि‍ग्री हासि‍ल कय कोनहुना लाख-डेढ़ लाख टकाक ब्यौंअत कऽ नोकरी हथि‍या लेलक। भाँरमे जाउ शि‍क्षा बेवस्था‍ या चौपट्ट होथि‍ वि‍द्यार्थी! शि‍क्षामि‍त्र लोकनि‍केँ ऐ सँ की मतलब???

बाटकवि‍ता कवि‍ रवीन्द्र नाथ ठाकुरक कवि‍ता यदि‍ तोर डाक शुने केऊ न आसे/ तबे एकला चलो रे/ केर स्मथरण करबैत अछि‍। संगहि‍-संग गीताक मूल मंत्रकर्मण्ये-वाधि‍कारस्तेत माँ फलेषु कदाचन,” अर्थात अहाँक अधि‍कार कर्म तक सीमि‍त अछि‍। तँए अहाँ कर्म करैत जाऊ, फलक इच्छा् नै करू... केर सेहो पुनर्स्था?पि‍त करए चाहैत छथि‍।
कवि‍ भावुक सेहो छथि‍। होबाको चाही। भावुक नै भेल तँ कवि‍ताक कोना रचना करत कवि‍! कवि‍क भावुक मोन गीतमे बहय लगैत छैक। गीत-2”मे कि‍छु एहने दशाक वर्णन थि‍क। भावनासँ द्रवि‍त मोन बाजत तँ कोना? बोल कुना फुटतै? :
मुँहसँ बोल कन्ना कऽ फुटतै
दरदसँ दुखाइ छै टीससँ टि‍सकै छै छाती लहि‍-लहि‍ लटुआएल छै मुँहसँ बोल कन्नाल.....। आशाक सभ मेटेलै बाटे सभ घेराएल छै ककरो कहने कि‍छु ने भेटत अपने बेथे बेथाएल छै मुँहसँ बोल कन्ना ... चोटसँ चोटाएल छै मन ढहि‍-ढहि‍ कऽ ढनमनाइ छै तैयो हँसि‍-हँसि‍ नाचय गाबए
राति‍-दि‍न बड़बड़ाइ छै मुँहसँ बोल कन्नाद...।
अही तरहेँ जाल आ गालक उपमा लऽ कवि‍ लोककेँ अगाह करै छथि‍ : जहि‍ना जाल सभ तरहक मांछकेँ पकड़ैत अछि‍, परन्तु. अगर मल्ला ह जालकेँ ठीकसँ नै ओछेलक आ काबूमे नै केलक तँ जाल फाटि‍ जाइत छैक, माछ भागि‍यो जाइत छैक। तहि‍ना मनुष्याकेँ अपन बोलीपर संयम करक चाही : शब्दैजाल छी महाजाल जइमे समटल महाकाल देखैमे जहि‍ना वि‍कराल तहि‍ना अछि‍यो महाकाल। सभ कि‍छु भेटत आँखि‍येमे सभ लटकल अछि‍ जालेमे सभ कि‍छु छै गालेमे।
जे जेहन अछि‍ जलवाह से तेहन फेक फेकैए। गैंची ने गैंचि‍या जाइए रोहु, भाकुर तँ फँसि‍तेए। सभ कि‍छु भेटत जालेमे सभ कि‍छु छै गालेमे। गाल बजबैमे जे जेहन से तेहन जाल फेकैए। इचना-कोतरीकेँ के कहए डोका-काँकोर धरि‍ फॅसैए। सभ कि‍छु छै गालेमे सभ फॅसल अछि‍ जालेमे...।

ि‍वचार तँ वि‍स्ता रपूर्वक अनेकाे कवि‍तापर लि‍खल जा सकैत अछि‍। हि‍नकर ई कवि‍ता संग्रह हाथक आंगुर जकाँ थि‍क। सभ आंगुर स्वेतन्त्रन अछि‍, मुदा सभ जुड़ल अछि‍ तरहत्थीजसँ। तहि‍ना हि‍नकर रचना इंद्रधनुषी अकासनामक मालामे गांथल एक सय दस कवि‍ता स्वितंत्र अछि‍- वि‍षय, भाव, शब्द‍चयन, प्रेम, उपमा आदि‍क स्वाभावसँ परन्तुस अन्तनत: सभ कवि‍ता एक तागसँ गांथल अछि‍ ओ ताग थि‍क जगदीश प्रसाद मण्ड लक व्यकक्तिन‍त्वे आ सोच। सभ कवि‍ता एक-सँ-बढ़ि‍ कऽ एक अछि‍।माटि‍क फूल, गोधन पूजा, झगड़ा, नजरि‍, भभूत, पुरुषार्थ, अगहन, केना मेटत गरीबी, बाढ़ि‍क सनेस, बेरोजगारी, पू-भर, बेथा, एकैसमी शदीक देश, आदि‍ कि‍छु एहन कवि‍ता अछि‍ जकरा पाठक बेर-बेर पढ़ताह।
 
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१.अतुलेश्वर- सगर राति दीप जरए , आन्दोलन आ बभनभोज २.विनीत उत्पल आधुनिक मैथिली नाटक आ टुच्चा नाटककारक जातिवादी रंगमंचक अवधारणा/ साहित्य अकादेमी कथा गोष्ठी: सगर राति दीप जरय: एकटा बहन्ना/ (सम्पूर्ण लेखमे लेखक सेहो शामिल अछि, हुनका परछाय कऽ नै देखल जाए) ३.पूनम मण्डल- आरती कुमारी आ सगर राति दीप जरय ४.आशीष अनचिन्हार- विदेह मैथिली समानान्तर रंगमंच/ जातिवादी रंगमंचक भाषाक बानगी
 
अतुलेश्वर

सगर राति दीप जरए , आन्दोलन आ बभनभोज
कथा साहित्यक प्रकाशन करए वला पत्र-पत्रिका अभावक कारण एकटा प्रश्न ठाढ़ भेल कि यदि मैथिलीक रचनाकारकें अपन रचनाक लेल कोनो मंच नहि भेटत तँ मैथिली आबयवला समयमे रचनाकारक अभाव सँ गुजरि सकैत अछि। आ मैथिली भाषा आ साहियक क्रान्तिकारी पुरुष डा.काञ्चीनाथ झा किरणक जन्म दिवसक अवसर पर लोहना गाममे जे समारोह आयोजन भेल छल ओहिमे पंजाबी भाषामे जहिना भरि रातिक कथा गोष्ठी कयल जा रहल छल ओहिना मैथिली भाषामे आरम्भ कयल जाए। आ कथा साहित्यक पुरोधा आ युवा साहित्यकारक पथपर्दशक स्व. प्रभाष कुमार चौधरीक नेतृत्वमे ई आन्दोलन प्रारम्भ भेल । कहल जा सकैछ जे काल सापेक्ष ई आन्दोलन मैथिली साहित्य लेल वरदान साबित भेल,कारण कतेको कथाकार, आलोचक एहि आन्दोलन सँ मैथिली साहित्य मध्य उपस्थित भेलाह तँ दोसर दिश एक नव आलोचनाक बाट फूजल। मुदा आइ काल्हि तँ एहि मे कथाक चर्चा सँ बेशी मानकीकरण,कखनो जातिवाद,कखनो भत्ताक गप्प होइत अछि। एतेक धरि जे कथाक गोष्ठीक अस्मिता पर कुठाराघात करैत किछु मैथिली अहित सेवी लोकनि ओकरा सरकारी संस्थाक कार्यक्रमसँ जोड़ि ओकर अस्मिता आ स्वतंत्रताक नष्ट करबाक प्रयास करहल छथि। कारण जखनहिं साहित्य अकादेमी आ सरकारी संस्था सभसँ जोड़ल जाएत तँ एहि गोष्ठी सँ जनसहभागिता कम भेल जाएत आ कथा गोष्ठी अपन उद्देश्यक बाटसँ भटकि जाएत ई षडयंत्र हमरा जनैत एहि कारणेँ कएल जा रहल अछि , जे मैथिलीमे नव-नव रचनाकारक अभाव हुअए आ मैथिली साहित्य किछु वर्ग धरि सिमटि जाए। एहि तरहेँ बहुतों गोटा एहि बेरक कथा गोष्ठीकेँ सगर राति दीप जरएक श्रृंखला सँ नहि जोड़बाक आग्रह कयलन्हि अछि समर्थन हमरो अछि,कारण यदि हम सभ विरोध नहि करब तखनि ई लोकनि हमर सभक अस्मिता पर एहिना आघात कयल करताह आ जेकरा रोकब आवश्यक अछि, एहि लेल एकजूट होयब जरूरी अछि।नहि तँ एकटा आन्दोलन षडयंत्रक फाँसमे समाप्त भजाएत।
हँ एहि गोष्ठी मे एकटा बात उठल छल जे बभनभोज। गोष्ठी कथा गोष्छी नहि भबभनभोज भगेल , ई सगर राति दीप जरए लेल एकटा आर आघात भेल । आशा करब आदरणीया विभा रानी सँ जे एहि आन्दोलनक दीपकेँ उद्देश्य सँ नहि भटकय देथि पुनः माँ जानकीक भाषा मैथिलीक आन्दोलन अपन उद्देश्य मे लागि जाए। आ सगर राति दीप जरए मैथिली कथा साहित्यक दीपकेँ मात्र जरौने टा नहि रहए ओ सम्पूर्ण विश्वमे मैथिली कथा साहित्यक दीप जगमगबैत रहए । एहि कामनाक संग हम सभ पुनः अपन आन्दोलनक नेतृत्व स्वयं करी आ घुसपैठिया लोकनिकेँ एहि आन्दोलन सँ भगाबी । एहि उद्देश्य संग दक्षिण भारत आबि आ माँ जानकीकेँ मोन पाड़ि।

विनीत उत्पल

आधुनिक मैथिली नाटक आ टुच्चा नाटककारक जातिवादी रंगमंचक अवधारणा/ साहित्य अकादेमी कथा गोष्ठी: सगर राति दीप जरय: एकटा बहन्ना/ (सम्पूर्ण लेखमे लेखक सेहो शामिल अछि, हुनका परछाय कऽ नै देखल जाए)


लोकतंत्रक परंपरा अछि जे आलोचना हेबाक चाही। जौं आलोजना सहबाक क्षमता केकरोमे नै अछि तँ ओ लोकतांत्रिक तँ कोनो विधिए नै भऽ सकैत अछि। ओ तँ तानाशाह भेल। अहिनामे तँ समाजमे विकृति अएबे करत आ से विकृति मिथिलामे देखल जा रहल अछि। एकरा कहएमे कोनो संदेह नै अछि जे गारि सभ लोक संस्कृतिक हिस्सा अछि। मुदा कोनो भी रचनात्मक लोक अहि शब्दक प्रयोग, जातिवादी गारिक प्रयोग, कोना करैत अछि, अहि पर हुनकर योग्यता आ क्षमताक आकलन कएल जाइत अछि।

दिल्ली मे आयोजित साहित्य अकादमी कथा गोष्ठी तथाकथित ७६म सगर राति दीप जरय (!) संपूर्ण देश आ विदेश मे रहए बला मैथिली भाषीक आगू कतेको रास प्रश्न छोड़ि देलक। जइ राति ई गोष्ठी भऽ रहल छल, मात्र १८ लोक भोर धरि बचल, ३४ टा लोकक सोंझा अप्पन-अप्पन खिस्सा कागज देख कऽ सुना रहल छल, तखने राजधानी दिल्ली सँ एक हजार किलोमीटर दूर मिथिला क कतेको गाम मे रहए बला लोक द्वारा मचान आ चौबटिया पर कतेको रास लोक मुहजबानी खिस्सा-पिहानीक क्षमताक परिचय दऽ रहल छल। हुनका नै तँ कोनो माइकक जरूरत छल, नहिये मसनदक आ नहिये खाइ कऽ चिंता छल। ओ ओ लोक छल जे दिन भरि मजूरी कऽ सांझ केँ बैसि कऽ टाइम पास कऽ रहल छल।
एना मे जे दिल्ली मे कथा गोष्ठी भऽ रहल छल हुनकर आयोजक लोकनि लेल नहिये बंगला कवि रवीन्द्र नाथ ठाकुर महत्वपूर्ण छल (रवीन्द्र नाथ ठाकुर साहित्य अकादेमीक मार्च क्लोजिंगक बचल फण्डक लूट बनि कऽ रहि गेलथि, कारण कथा रवीन्द्रमे रवीन्द्र छोड़ि सभ किछु छल) नहिये मैथिली/ हिन्दीक कवि बाबा नागार्जुन। ई वएह बरख छी जखैन रवीन्द्र नाथ ठाकुरक डेढ़ सएम बरखी मनाओल जा रहल अछि। तमाम संस्थान पाइ उगाहि रहल अछि। जखैन की ई बरख बाबा नागार्जुनक जन्म शताब्दी बरख सेहो अछि। बिहार सेहो अप्पन स्थापनाक सौवां बरख मना रहल अछि। अहि ठाम प्रश्न अछि जे की मैथिली भाषाक लेल रवीन्द्रनाथ ठाकुर अहम छथि वा बाबा नागार्जुन वा दुनू। तखन की मानल जाए जे पूंजी आम लोक आ संस्कृति पर हावी भऽ रहल अछि। एकटा कहबी अछि, पूंजी असगरे नै आबैत अछि, ओ अपना संगे एकटा संस्कृति सेहो आनैत अछि। यएह पूंजी मिथिला केँ खा रहल अछि। मुट्ठी भरि लोकक पाकेट भाषा मैथिली बनि रहल अछि, बाकी सभ मुँह ताकि रहल अछि।
रवीन्द्रक विरोध करबाक कोनो प्रयोजन नै अछि मुदा बाबा नागार्जुन केँ बिसुरि कऽ हम हुनका सम्मान दैक प्रयत्नक विरोध तँ अवश्य हेबाक चाही। जखैन देशक राजधानी दिल्ली मे कथा गोष्ठी भऽ रहल अछि, तखन हम अप्पन भाषाक कवि बाबाक नाम फण्डक लेल नै लऽ कऽ कवि रवीन्द्रकेँ नेमप्लेट बना कऽ सम्मान दिऐ, ई केहन मानसिकता अछि। अप्पन दीपक नीचाँ अन्हार आ भरि शहर ढ़िंढोरा, केहन सिद्धांत अछि? अप्पन घर केँ अन्हार राखि कऽ दोसर घरक लेल दीप लेसी, ई केहेन विकृत दुनियाक दृश्य अछि। एखन जखैन किसान मरि रहल अछि, संपूर्ण मिथिला बाढ़ सँ त्रस्त अछि। ढेर रास लेखन समाजसँ बेरल लोक लिखि रहल अछि आ गद्य/पद्यमे प्रमुखतासँ शामिल अछि। अहि परिस्थितिमे एकटा सामान्य मैथिलीक लोक लेल कवि रवीन्द्र प्रासंगिक अछि वा बाबा नागार्जुन।
दिल्लीक लिट्ल थियेटर ग्रुप, मंडी हाउस मे हिन्दीक लेखक अज्ञेयक रचना पर हुनकर जन्म शताब्दीक लेल नाट्य प्रस्तुति केलक। मुदा जखैन जे संस्था अपनाकेँ नाट्य संस्था कहि कऽ पताका फहराबऽ चाहैत अछि, मुदा ओकरा भंगिमा, अरिपन, कोलकाता आ जनकपुरक रंगमंच आ विदेह समानान्तर रंगमंचक जानकारी नै अछि, ओकर सँ सभ कियो अपेक्षा करत जे ओ बाबा नागार्जुनक रचना पर कोनो कार्यक्रम जरूर करताह। मुदा, ई नहि भेल। किए? किएकि सरकार पाइ नै देलक। तखन सगर राति दीप जरयक माला उठेबाक कोन खगता छल, जोड-तोडसँ अर्द्धनारेश्वरक बोकारोक प्रस्ताव अस्वीकृत भेल (उमेश मण्डल जीक ऐपर विदेहमे विस्तृत रिपोर्ट आएल अछि। जखन राबड़ी बंटैत अछि तखन जे क्यो 'क्यू" मे ठाढ़ हेता, सभकेँ राबड़ी भेटत। मुदा, बलिहारी तखैन ने जखैन अहाँ लीक सँ चलि आ अप्पन शर्तक आधार पर सरकारी फंड लऽ सकी। फंडक लेल हम कोनो उत्सव करी, ई कतय क आ केहन सिद्धांत अछि।

जौ हम कनी कालक लेल मानि ली जे हम रविंद्र सँ प्रभावित छी तखन हुनका सँ सीखैक जरूरत अछि नै की फंड लऽ पेट भरबाक। आइ धरि बंगालक सभ घरमे रवीन्द्र संगीत गायल आ सुनल जाइत अछि मुदा मिथिलाक घर मे विद्यापति संगीतक केहन हाल अछि, ई केकरो सँ नुकायल नै अछि। जातिवादी मैथिली रंगमंच तँ मैथिलीकेँ लेलिये गेल छल मुदा विदेह समानान्तर रंगमंच ओकर सोझाँमे अवरोध बनि आबि गेल। जखैन की कवि विद्यापति कवि रविंद्र सँ कतेक पुरान छथिन, ई सभकेँ बुझल अछि। समूचा बंगाल घुरि कऽ आबि जाउ, ओतय बंगला भाषाटा बाजल जाइत अछि मुदा मिथिलामे अंगिका, वज्जिका जेहन कतेको भाषा अही जातिवादी लेखन आ रंगमंचक कारण मैथिलीसँ निकलि कऽ अप्पन अस्तित्व टा नै बना लेने अछि, मैथिली केँ चुनौती सेहो दऽ रहल अछि।

आइ जकरा काल्हिक जन्मल मैथिली क टुच्चा नाटककार आ नाटक कहि कऽ जातिवादी रंगमंचक भड़ैत भर्त्सना कऽ रहल छथि ओ टुच्चा कोना भऽ सकैत अछि, जे बिना कोनो तामझामक, बिना मीडिया प्रबंधनक, बिना प्रचारक, बिना कोनो संस्थागत सहयोगक, अप्पन रचनात्मकता मे लागल अछि। ओ टुच्चा कोना अछि जिनकर नाटक देखहि बला लोक केँ दू टाइमक रोटी नै भेटैत अछि, मुदा नाटक जरूर देखैत अछि। आ नाटको दलित विमर्शपर, सूचनाक अधिकारपर, जाति-पातिक कट्टरतापर, भ्रूण हत्यापर। हुनका लग अप्पन गाड़ी नै अछि, बुल्लै दू कोस धरि चलि कऽ नाटक देखैत अछि। भरि-भरि राति हुनकर नाटक देखल जाइत अछि, ६-६ घण्टाक नाटक, एतेक पैघ नाटक मराठीमे सेहो एकाधेटा अछि, मैथिलीक जातिवादी रंगमंचक नाटक आ हिन्दीक नाटकक तँ चर्चे ब्कार। आ नै हुनका लग लाइट लेल बड़का-बड़का बल्ब अछि, नै ओतेक तकनीक, मात्र प्रतिभा अछि, समाजकेँ बचेबाक लेल जातिवादी रंगमंचक विरुद्ध समानान्तर रंगमंचक संकल्पना अछि आ तखन ओ टुच्चा कोना अछि। हुनकर नाटक लेल गाम-घरमे, चौबटिया पर गप होइत अछि, मुदा अखबार, मैथिलीक जातिवादी संस्था सभक पत्रिका या विदेहक अलाबे इंटरनेट पर चर्चा नै आबैत अछि, तखन ओ टुच्चा कोना अछि?
जे कियो मैथिली केँ लऽ कऽ 'डिप्रेस्डअछि, तँ ओहेन मानसिकता केँ किछु नै कएल जा सकैत अछि। हिन्दी राजभाषा अछि नै कि अप्पन सभक मातृभाषा। दुनियाक सभ भाषाक सम्मान करबाक चाही, मुदा अप्पन भाषाक दांव पर नै। ई छद्म रंगमंचकर्मी लोकनि अपन जातिवादी नाटकक तुलना हिन्दीक नाटकसँ कऽ गर्व अनुभव करै छथि, जखैन की सत्य अछि जे हिन्दीसँ पुरान साहित्यिक भाषा मैथिली अछि आ हिन्दीबला सभ ज्योतिरीश्वरक मैथिली धूर्त समागमक हिन्दी अनुवाद कऽ कहियासँ नै खेला रहल छथि, ऐ मैथिलीक जातिवादी रंगमंचकर्मी आ नाटककारकेँ ई बुझलो छन्हि जे भारतेन्दुक अन्धेर नगरी...ज्योतिरीश्वरक मैथिली धूर्त समागमक अनुकरण मात्र अछि?

जे कियो असली मैथिल होएत ओ अप्पन मां केँ बेचि कऽ नै खा सकैत अछि। अप्पन मिथिला सीताक मिथिला अछि।,माँकेँ सम्मान दैबला। हिन्दी पेट भरयबला, नौकरी भेटयबला भाषा अछि। मिथिला आ मैथिली सँ सभक आत्म सम्मान जुड़ल अछि। जेकरा लग आत्मा नै अछि ओकरा लऽ कऽ किछु कहल नै जा सकैत अछि।
आइ किछु लोक मिथिलाक गद्य/पद्य क हिन्दी मे अनुवाद कऽ रहल अछि। अहि ठाम सवाल अछि जे की अहि सँ मैथिली भाषाक प्रचार भऽ रहल अछि आ दोसर भाषा मजबूत भऽ रहल अछि? जखैन धरि आन भाषाक रचना मैथिली मे नै आएत ता धरि मैथिली मजबूत कोना होएत, आ जँ अहाँ घरमे मजगूत नै हएब तँ बाहरमे सम्मान भेटत? एक बेर अप्पन मोनमे ताकि कऽ हिम्मत करए पड़त जे हम अप्पन माँ मैथिली लेल की कऽ रहल छी। माँ अप्पन नेना केँ छातीक दूध पिआबै अछि मुदा ओ नेना पैघ भेले पर माँ केँ नै बेच दैत अछि। माँ, माँ होइत अछि। की अहाँ अप्पन माँ केँ जिंस-टॉप पहिरा कऽ बाजार मे लऽ जाइत छी? की अहाँ अप्पन माँ केँ बाजार मे ठाढ़ कऽ नीलाम करैत छी? की अहाँ कोनो पुरस्कार पेबा लेल अप्पन माँ केँ केकरो आर लग पोसिया लगाबैत छी, नै ने। तखन मैथिली संग ई किए कऽ रहल छी, एक बेर कनी सोचियौ तँ।
 
३.
पूनम मण्डल
आरती कुमारी आ सगर राति दीप जरय
डॉ. आरती कुमारी (१९६७-२०१२)क काल्हि रातिमे मृत्यु भऽ गेलन्हि। पति श्री अनिल कुमार रॉय आ पुत्र अनुराग कुमार आ पुत्र उज्जवल प्रकाश केँ छोड़ि ओ चलि गेलीह। हुनकर मृत्युसँ मैथिली साहित्य जगत सन्न अछि। हुनकर एकटा पोथी प्रकाशित अछि "मैथिली मुक्तक काव्यमे नारी"। महिषीमे ७३म सगर राति दीप जरय क माला ओ भागलपुर लेल उठेने रहथि, आ तकरा बाद ओ अस्वस्थ भऽ गेलीह, कोलकातामे ऑपरेशन भेलन्हि। किछु सामन्ती प्रवृत्तिक लोककेँ हुनकर सगर राति दीप जरय क माला उठेनाइ नै अरघलन्हि आ हुनका द्वारा भागलपुरक साहित्यकारसँ माला उठेबासँ पहिने नै पुछबाक, आ "जँ भागलपुर मे सगर राति दीप जरय हएत तँ कियो नै आएत" आदि गप कहि मानसिक वेदना पहुँचा कऽ दीप आ रजिस्टर लऽ लेल गेल, आ सगर राति दीप जरय भागलपुरमे नै भऽ सकल। आ सगर राति दीप जरय पर जे ग्रहण लागल से अखन धरि लागले अछि। हम सभ कहनहियो रहियन्हि जे जँ अहाँ भागलपुरमे सगर राति दीप जरय करय चाहै छी तँ निश्चिन्त भऽ करू, सभ पहुँचत, मुदा ओ कहने रहथि जे ओ सगर राति दीप जरय करय चाहै छथि, मुदा विवादमे नै पढय चाहे छथि। स्व. आरती कुमारीकेँ कृतघ्न समाज दिससँ श्रद्धांजलि।
Shyam Darihare
74wa SAGAR RATI DEEP JARAY-- 10 SEPT 2011. Sthan:- HAZARIBAGH. ( Patna ke taraf sa Hazaribagh me pravesh sa pahile N.H. par Vinoba Vhave University Gate chhaik. University gate sa ek minat baab dahina me ekta barka maidan chhaik waih chhaik HOME GUARDS TRAINING CENTRE. Ohi Gate par sipahi sa puchhari karu o hall dhari pahuncha det. SAB MAITHILI KATHAKAR aa KATHPREMI LOKaNIKE SADAR HAKAR.
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Shefalika Verma and Kislay Krishna like this.
Arvind Thakur बढियां खबर ! बधाइ !रोमन लिपि मे लिखबाक अनेक खतरा छै,एकटा एतहु देखाइत अछि -कथाप्रेमी कें कठप्रेमी पढय मे बेसी सुविधा बुझाइ छै|सभ गोटे देवनागरी मे लिखबाक हिस्सक बनाबी त नीक |हम गोष्ठी मे आयब,दरिहरे जी|
August 11, 2011 at 7:29am
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Hirendra Kumar Jha Bhagalpurak arth ahzaribag hit chhaik ?
August 13, 2011 at 1:13am via
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Hirendra Kumar Jha Bhagalpurak arth Hazaribagh kona bhay sakait chaik ?
ehi san ta prathak samapti bhay jayat. punarbichar karu.
Hirendra
August 13, 2011 at 1:15am via
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Ajit Azad aarti ji goshthi karba me saksham nai chhaith. hunke se puchhla par ee bha rahal chhaik. aarti ji gambhir roop se bimar chhaith aa kolkata me 3 maas se ilaaj kara rahlih achhi.
August 13, 2011 at 6:10am
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Kislay Krishna ee ektaa vikalp rup me sojha aayal achhi....
August 13, 2011 at 8:07am
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Gajendra Thakur आरती जी २४ सितम्बर केँ गोष्ठी करबा लेल तैयार छथि तकरा बादो हुनका सँ मौका छीन कऽ मात्र दस दिन पहिने गोष्ठीकेँ हजारीबाग लऽ जेबाक की प्रयोजन..? Hirendra Kumar Jha जी सँ हम सहमत छी..आब जखन १० सितम्बर तिथि घोषित भऽ गेल तखन आब ओ पाछाँ हटि जाथि से अलग बात, मुदा की हुनका ई भरोस देल गेलन्हि जे अगिला गोष्ठी वएह करेतीह? हम पहिनहियो कहने रही जे हुनकासँ बिना पुछने कोनो निर्णय नै लेबाक चाही..यदि हजारीबागमे गोष्ठी हुअए तँ सशर्त हुअए जे अगिला गोष्ठी आरती जी करेतीह..ई दवाब जे अहाँक अहठाम २४ सितम्बर केँ कियो नै आएत/ अहाँ भागलपुरमे ककरोसँ नै पुछलिऐ..आदि बना कऽ हुनकासँ जबरदस्ती हँ कहेबाक कोनो मतलब नै..
August 17, 2011 at 7:39am
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Ajit Azad jahiya 10 setamber ke ghoshna bhel...tahi se ek ghanta pahine tak aarti ji lag date final naih rahain. ham fon kayliyai ta o kahlih je AAI RAIT ME HAM AHAN KE KAHAB...KARAN JE EK GOTE HAMRA AARTHIK SAHYOG KARBA LEL CHHAITH...YADI O GACHHI LETAH TA HAM 19 YA 20 SEPTEMBER KE KARAB. ham puchhaliyain 19 ke ya 20 ke? o kahalain EHI DOONU TITHI ME SE JAHIYA SHAIN PARTAIK TAHIYA. ham kahaliyain je ehi doonu tarikh ke shain nai parait chhaik. takhan o garbara gelih. hamhi kahaliyain je 24 ke bha sakait achhi muda durga puja 28 se chhaik...ki ahan 3 september ya 10 september me se kono din kara sakait chhi? o taiyar nai bhelih. ham kahaliyain je takhan ahan 24 ke kareba lel swatantra chhi...aa ham aybo karab muda besi lok nai autah...dosar gap je ekhno tak ahank date final nai achhi ( karan, o takhno ber-ber kahait chhalih je ham ek gote se baat karab takhan date ghoshit karab). ham hunak swasthya aa aarthik sthiti ke dekhait kahaliyain je ahan baad me jahiya thik bha jayab tahiya karab. o kahalain JE HAM SANJH ME AHANKE FINALLY KAHAB. baad me o ohi samay pradip bihari ji ke sabhta baat kahalkhin. pradip ji hunka bujhelkhin je ahan ekra presstige issue nai banau...sabh ahank heet me kaih rahlah achhi. o maini lelkhin aa register hunke patheba lel sahmat bhelkhin. ekar baad pradip bihari ji turat hamra fon kaylain je aarti ji taiyar chhith je agila goshthi hazaribagh me hoiek. pradip ji hunka eeho kahalkhin je ahan ee gap ajit ji ya raman ji ke seho kaih diyoun muda o kahalkhin je ham VIDEHA me kaih dait chhiyaik, sabhke khabar bha jaytaik. ham aai tak videha me hunak kono statement nai parhal. hamra lagait achhi je ehi mamla ke tool nai del jai...o yadi agila goshthi karay chahait chhaith ta o karaith, ehi me kakro kiyaik kono aapatti hetaik. ee goshthi june me hebak rahaik...arthat may me date ghoshit bha jaybak chahi chhal. o june me 10 aa 11 ke saharsa me sahitya acsdemik seminar me aayal chhalih...ham takhno hunaka puchhaliyain je kahiya karbaik goshthi...o july me karbak baat kahlain. tabat tak hunak mon kharab bala baat nai rahaik. julu me kolkata me o kavita path karba lel bimarik avastha me aayal chhlih. takhno ham puchhne rahiyain je kahiya karab goshthi? o kahalain je september tak ta ham kolkate me rahab (under treatment). takar baade karab.
August 17, 2011 at 10:55am
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Ajit Azad ek ber ehi tarhak ghatna aar bhel chhaik. dr dhirendra ji janakpur me karbaik prastav darbhanga goshthi me delkhin muda 4-5 maas tak o nai kara saklah takhan pt. govind jha daman kant jha jik sahyog se patna me karoune rahaith. aarti jik paksha me sabh achhi muda hunak sthiti thik nai chhain...ehi mamila me bhagalpurak lok besi nik se kaih sakait chhaith.

आशीष अनचिन्हार
विदेह मैथिली समानान्तर रंगमंच

मैथिलीक समानान्तर रंगमंचक जन्मदाता: सभसँ बेसी मैथिली नाटकक निर्देशन: राजरोगसँ दूर: जातीय रंगमंचक विरुद्ध बेचन ठाकुर जीक संघर्ष (मुन्नाजी आ अजित आजादक सोझाँमे मलंगिया जीक भड़ैत प्रकाश झा जकरा लेल कहै छथि- भरि दिन केश काटैत रहै छल- पाठकक लेल ई सूचना जे जातिवादी रंगमंचसँ जुड़ल लोक केश काटनाइकेँ खराप बुझै छथि, संगहि ईहो सूचना जे बेचन ठाकुर सैम पित्रोदा (जे भारतमे टेक्नोलोजी मिशनक प्रारम्भ केलन्हि) सन बरही जातिक छथि, जातिवादी रंगमंचकर्मी लोकनि हुनकर गौँआ अंतिकाक सहायक सम्पादक श्रीधरमसँ कन्फर्म कऽ सकै छथि): हिनका नामसँ कतेको रेकॉर्ड दर्ज अछि, जेना संस्कृतक बाद पहिल बेर मैथिलीमे भरत नाट्यशास्त्रक रंगमंचक संकल्पनाक अनुसार नाटक, मात्र महिला नाट्यकर्मीक माध्यमसँ ६-६ घण्टासँ ऊपरक नाटकक मंचन (जखनकि जातिवादी नाट्यकर्मी अदहा घण्टा- ४५ मिनटक नाटकक निष्पादन लेल महिला रंगकर्मीक लेल बौखैत रहै छथि, कारण हिनकर सभक बलगोविना प्रवृत्तिक कारण आ कुकुरचालिक कारण बहुत रास महिला मैथिली नाटकसँ दूर भागि गेलीह। मुदा सभ कान्तिदर्शीकेँ जातिवादिताक कोप, गारि गंजन सुनऽ पड़ै छै, मुदा बेचन ठाकुर एक्केटा छथि...हमरा सभ नाट्यकर्मी, रंगमंचकर्मी, नाटककारकेँ हुनकर मैथिली समानान्तर रंगमंच, जे २५-३० सालसँ अनवरत चलि रहल अछि, पर गर्व अछि। मिथिलाक समाज जँ जातिवादी रंगमंचक बावजूद नै टूटल अछि तँ तकर कारण अछि बेचन ठाकुर जीक मैथिली समानान्तर रंगमंच... आ से मलंगिया जीक काल्हि जन्मल भड़ैत सभकेँ नै बुझल छन्हि, मुदा मलंगिया केँ बुझल छन्हि जे हुनकासँ बेशी संख्यात्मक आ गुणात्मक नाटक/ एकांकी बेचन जीक लिखल छन्हि आ ओइ बेचन ठाकुर आ गुणनाथ झाक एकांकी मैथिली एकांकी संग्रहमे नै देलन्हि.. एकलव्यक औंठा द्रोण कटबा लेलन्हि, मुदा एतऽ तँ गुरुक औंठा मलंगियाजी कटबा रहल छथि..

Gajendra Thakur मलंगिया जीक एकटा बयान आयल रहए, जे विदेहमे सेहो आएल रहए, ओ कहने रहथि जे नेपाली नाटकक स्थिति बड्ड दयनीय छै, मुदा ओतुक्का रंगकर्मीक प्रशंसा केने रहथि। विदेहक ऐ न्यूजक बाद हमरा जनकपुरमे हंगामा भेल रहै आ हमरो मेल पर नेपालसँ ढेर रास मेल आएल रहए, ई लिखैत जे मलंगिया जी जइ थारीमे खेलन्हि ओहीमे छेद केलन्हि। हुनकर मैथिली एकांकी संग्रहमे संकलित एकांकी सभक संकलन हुनकर नाटकीय सोचपर प्रश्न लगबैत अछि। ओइमे किछु एहेन एकांकी राखल गेल जे कहियो कोनो रूपमे नाटककार/ रंगमंचकर्मी नै रहथि; ओतै बहुत रास श्रेष्ठ नाटककार जातिक आधारपर बारल गेलाह। ओइ संग्रहक (साहित्य अकादेमीसँ २००३ ई.मे प्रकाशित)क भूमिकामे मलंगिया जीक अभद्रता ओही तरहेँ अछि जेना २०१० ई.मे प्रकाशित हुनकर छुतहा घैलमे अछि.. हुनकर जातिगत कट्टरता आर बढ़ल अछि। हुनकर सोच आर घटल अछि।

Ram Bharos Kapari Bhramar Sthiti aab spast bharahal aichh.Chintaniya aa bicharniye bat aichh. Ashish Anchinhar मलंगिया जीक नाटक विद्वेष बढ़बैत अछि, हुनकर राड़ आ शोल्कन्हक प्रति आ ओकर भाषाक प्रति घृणा गएर ब्राह्म्ण केँ मैथिलीसं दूर केलक अछि। Monday at 09:08
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Lalit Kumar Jha SRIMAN APAN SOCH BADHAU DOSAR KE SOCHAK CHINTA JUNI KARU Monday at 09:10
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Ashish Anchinhar जहिया गजेन्द्र ठाकुर आ भ्रमर अपन सोच बदलि लेता तहिया मैथिली मरि जाएत। Monday at 09:12
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Ashish Anchinhar Lalit Kumar Jha---ठीके कहैत छी भाइ ओना एकटा गदहाक मर्म दोसरे बड़का गदहा बुझि सकैए। एहि मामिलामे मतलब गदहपनमे अहाँ हमर सीनियर भेलहुँ। सधन्यवाद भाइ|... Monday at 09:14
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Ashish Anchinhar गजेन्द्र ठाकुर- छुतहर/ छुतहर घैल/ छुतहा घैल छुतहा घैल महेन्द्र मलंगियाक नवीन नाटकक नाम छन्हि। ऐ छोटसन नाटकक भूमिका ओ दस पन्नामे लिखने छथि। पहिने ऐ भूमिकापर आउ। हुनका कष्ट छन्हि जे रमानन्द झा रमणहुनका सुझाव देलखिन्ह जेछुतहर घैलकेँ मात्र छुतहरकहल जाइ छै। से ओ तीन टा गप उठेलन्हि- पहिल- तों कहियो पोथी के लेखी, हम कहियो अँखियन के देखी।दोसर- यात्री जीक विलाप कविता-काते रहै छी जनु घैल छुतहर आहि रे हम अभागलि कत बड़।आ कहै छथि जे ओइ कविताक विधवा आ ऐ नाटकक कबूतरी देवीकेँ शिवक महेश्वरो सूत्र आ पाणिनीक दश लकारसँ (वैदिक संस्कृत लेल पाणिनी १२ लकार आ लौकिक संस्कृत लेल दस लकार निर्धारित कएने छथि..खएर…) कोन मतलब छै? तेसर ओ अपन स्थितिकेँ कापरनिकस सन भेल कहैत छथि, जे लोकक कहलासँ की हेतै आ गाम-घरमे लोक छुतहर घैलबजिते छैक!! मुदा ऐ तीनू बिन्दुपर तीनू तर्क मलंगियाजीक विरुद्ध जाइ छन्हि। अँखियन देखीआ लोकव्यवहार छुतहरमात्र कहल जाइत देखलक आ सुनलक अछि, घैलचीपर छुतहरकेँ अहाँ राखि सकै छी? लोइटसँ बड़ैबमे पान पटाओल जाइ छै तखन मलंगियाजीक हिसाबे ओकरा लोइट घैलकहबै। घैल, सुराही, कोहा, तौला, छुतहर, लोइट, खापड़ि, कुड़नी, कुरवाड़, कोसिया, सरबा, सोबरना ऐ सभ बौस्तुक अलग नामकरण छै। फूलचन्द्र मिश्र रमण” (प्रायः फूलचन्द्रजी छुतहा घैलशब्दक सुझाव हँसीमे देने हेथिन्ह, आ जँ नै तँ ई एकटा नव भाषाक नव शब्द अछि!!)क सुझाव मानैत मलंगिया जीछुतहर घैलकेँ छुतहा घैलकऽ देलन्हि, ई ऐ गपक द्योतक जे हुनका गलतीक अनुभव भऽ गेलन्हि मुदा रमानन्द झा रमणक गप मानि लेने छोट भऽ जइतथि से खुट्टा अपना हिसाबे गाड़ि देलन्हि। आ बादमे रमानन्द झा रमणचेतना समितिसँ ओइ पोथीकेँ छपेबाक आग्रह केलखिन्ह आ, चेतना समिति मात्र २५टा प्रति दैतन्हि तेँ ओ अपन संस्थासँ एकरा छपबेलन्हि, ऐ सभसँ पठककेँ कोन सरोकार? आब आउ यात्रीजीक गपपर, यात्रीजीकेँ हिन्दी पाठकक सेहो ध्यान राखऽ पड़ै छलन्हि, हुनका मोनो नै रहै छलन्हि जे कोन कविता हिन्दीमे छन्हि, कोन मैथिलीमे आ कोन दुनूमे, से ओ छुतहर घैल लिखि देलन्हि, एकर कारण यात्रीजीक तुकबन्दी मिलेबाक आग्रहमे सेहो देखि सकै छी। आ फेर आउ कॉपरनिकसपर, जँ यात्री जी वा मलंगिया जी घैल छुतहर”, “छुतहर घैलवा छुतहा घैललिखिये देलन्हि तँ की नेटिव मैथिली भाषी छुतहरकेँ घैल छुतहर”, “छुतहर घैलवा छुतहा घैलबाजब शुरू कऽ देत। से कॉपरनिकस सेहो मलंगियाजीक विरुद्ध छथिन्ह। कॉपरनिकसक किंवदन्तीक सटीक प्रयोग मलंगियाजी नै कऽ सकलाह, प्रायः ओ गैलिलीयो सँ कॉपरनिकसकेँ कन्फ्यूज कऽ रहल छथि, कॉपरनिकसक सिद्धान्तक समर्थन पोप द्वारा भेल छल आ कॉपरनिकस पोप पॉल-३ केँ अपन हेलियोसेन्ट्रिक सिद्धान्तक चालीस पन्नाक पाण्डुलिपि समर्पित केने रहथि। खएर मलंगियाजीक विज्ञानक प्रति अनभिज्ञता आ विज्ञानक सिद्धान्तकेँ किवदन्तीसँ जोड़बाक सोचपर अहाँकेँ आश्चर्य नै हएत जखन अहाँ हुनकर खाँटी लोककथा सभक अज्ञानताकेँ अही भूमिकामे देखब। Monday at 09:17
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Ashish Anchinhar गजेन्द्र ठाकुर- छुतहर/ छुतहर घैल/ छुतहा घैल------अली बाबा आ चालीस चोर”- सम्पूर्ण दुनियाँकेँ बुझल छै जे ई मध्यकालीन अरबी लोककथा अछि जेअरेबियन नाइट्स (१००१ कथा)मे संकलित अछि आ ओइमे विवाद अछि जे ई अरेबियन नाइट्समे बादमे घोसियाएल गेल वा नै, मुदा ई मध्यकालीन अरबी लोककथा अछि, ऐ मे कोनो विवाद नै अछि। बलबनक अत्याचार आदिक की की गप साम्प्रदायिक मानसिकता लऽ कऽ मलंगिया जी कहि जाइ छथि से हुनकर लोककथाक प्रति सतही लगाव मात्रकँण देखार करैत अछि। मिथिला तत्व विमर्शवा रमानाथ झाक पंजीक सतही ज्ञान बहुत पहिनहिये खतम कऽ देल गेल अछि, आ तेँ ई लिखित रूपसँ हमरा सभक पंजी पोथीमे वर्णित अछि। गोनू झा विद्यापति सँ ३०० बर्ख पहिने भेलाह, मुदा मलंगियाजी ५० साल पुरान गप-सरक्काक आधारपर आगाँ बढ़ै छथि। हुनका बुझल छन्हि जे गोनूकेँ धूर्ताचार्य कहल गेल छन्हि मुदा संगे गोनूकेँ महामहोपाध्याय सेहो कहल गेल छन्हि से हुनका नै बुझल छन्हि!! गोनू झाक समयमे मुस्लिम मिथिलामे रहबे नै करथि तखन तहसीलदारक दाढ़ीकतऽ सँ आओत। लोकक कण्ठमे छुतहर छै ओकरा छुतहा घैलकऽ दियौ, लोकक कण्ठमे कर ओसूलीकरैबलाक दाढ़ी छै ओकरा तहसीलदारक दाढ़ी कहि साम्प्रदायिक आधारपर मुस्लिमकेँ अत्याचारी करार कऽ दियौ, आ तेहेन भूमिका लिखि दियौ जे रमानन्द झा रमणआ आन गोटे डरे समीक्षा नै करताह। एकटा पैदल सैनिक आ एकटा सतनामी (दलित-पिछड़ल वर्ग द्वारा शुरू कएल एकटा प्रगतिवादी सम्प्रदाय)क झगड़ासँ शुरू भेल सतनामी विद्रोह औरंगजेबक नीतिक विरोधमे छल आ ओइमे मस्जिदकेँ सेहो जराओल गेलै, मुदा गोनू झाक कर ओसूली अधिकारी मुस्लिम नै रहथि, लोककथामे ई गप नै छै, हँ जँ साम्प्रदायिक लोककथाकार कहल कथामे अपन वाद घोसियेलक आ लिखै काल बेइमानी केलक तँ तइसँ मैथिली लोककथाकेँ कोन सरोकार? फील्डवर्कक आधारपर जँ लोककथाक संकलन नै करब तँ अहिना हएत। महेन्द्र नारायण राम लिखै छथि जे लोककथामे जातित-पाइत नै होइ छै, मुदा मलंगियाजी से कोना मानताह। भगता सेहो हुनकर कथामे एबे करै छन्हि। आ असल कारण जइ कारणसँ ई मलंगिया जीक नाटकक अभिन्न अंग बनि जाइत अछि से अछि हुनकर आनुवंशिक जातीय श्रेष्ठता आधारित सोच। हुनकर नाटकमे मोटा-मोटी अढ़ाइ-अढ़ाइ पन्नाक घीच तीरि कऽ सत्रहटा दृश्य अछि, जइमे पन्द्रहम दृश्य धरि ओ छोटका जाइतक (मलंगियाजीक अपन इजाद कएल भाषा द्वारा) कथित भाषापर सवर्ण दर्शकक हँसबाक, आ भगताक भ्रष्ट-हिन्दीक माध्यमसँ छद्म हास्य उत्पन्न करबाक अपन पुरान पद्धतिक अनुसरण करै छथि। कथाकेँ उद्देश्यपूर्ण बनेबाक आग्रह ओ सोलहम दृश्यसँ करै छथि मुदा बाजी तावत हुनका हाथसँ निकलि जाइ छन्हि। आइ जखन संस्कृत नाटकोमे प्राकृत वा कोनो दोसर भाषाक प्रयोग नै होइत अछि, मलंगियाजीक भरतकेँ गलत सन्दर्भमे सोझाँ आनब संस्कृतसँ हुनकर अनभिज्ञताकेँ देखार करैत अछि आ भरत नाट्यशास्त्रपर हिन्दीमे जे सेकेण्डरी सोर्सक आधारपर लोक सभ पोथी लिखने छथि, तकरे कएल अध्ययन सिद्ध करैत अछि। Monday at 09:19
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Ashish Anchinhar गजेन्द्र ठाकुर- छुतहर/ छुतहर घैल/ छुतहा घैल----मलंगियाजीक ई कहब अछि जे नाटक जँ पढ़बामे नीक अछि तँ मंचन योग्य नै हएत, वा मंचन लेल लिखल नाटक पढ़बामे नीक नै लागत? हुनकर संस्कृत पाँतीकेँ उद्घृत करबासँ तँ यएह लगैत अछि। जँ नाटक पढ़बामे उद्वेलित नै करत तँ निर्देशक ओकर मंचनक निर्णय कोना लेत? आ मंचीय गुण की होइ छै, अढ़ाइ-अढ़ाइ पन्नाक सत्रहटा दृश्य, तथाकथित निम्न वर्गकेँ अपमानित करैबला जातिवादी भाषा, भगताक बुझता है कि नहीं?” बला हिन्दी आ ऐ सभक सम्मिलनक ईस्लैपस्टिक ह्यूमर”? आ जे एकर विरोध कऽ मैथिलीक समानान्तर रंगमंचक परिकल्पना प्रस्तुत करत से भऽ गेल नाटकक पठनीय तत्त्वक आग्रही आ जे पुरातनपंथी जातिवादी अछि से भेल नाटकक मंचीय तत्वक आग्रही!! की २१म शताब्दीमे मलंगियाजीक जाति आधारित वाक्य संरचना संस्कृत, हिन्दी वा कोनो आधुनिक भारतीय भाषाक नाटकमे (मैथिलीकेँ छोड़ि) स्वीकार्य भऽ सकत? आ जँ नै तँ ऐ शब्दावली लेल १८०० बर्ष पुरनका संस्कृत नाटकक गएर सन्दर्भित तथ्यकेँ, मूल संस्कृत भरत नाट्यशास्त्र नै पढ़ैबला नाटककार द्वारा, बेर-बेर ढालक रूपमे किए प्रयुक्त कएल जाइए? माथपर छिट्टा आ काँखमे बच्चा जँ कियो लेने अछि तँ ओ निम्न वर्गक अछि? ओकर आंगनक बारहमासामे ओ ऐ निम्न वर्गकेँ राड़ कहै छथि, कएक दशक बाद ई धरि सुधार आएल छन्हि जे ओ आब ओइ वर्गकेँ निम्न वर्ग कहि रहल छथि, ई सुधार स्वागत योग्य मुदा ऐ दीर्घ अवधि लेल बड्ड कम अछि। बबाजी कोना कथामे एलै आ गाजा कोना एलै आ ओइसँ बगियाक गाछक बगियाक कोन सम्बन्ध छै? मलंगियाजी अपन जाति-आधारित वाक्य संरचना, आ भ्रष्ट-हिन्दी मिश्रित वाक्य रचना कोना घोसिया सकितथि जँ भगता आ निम्न वर्गक छद्म संकल्पना नै अनितथि, ई तथ्य ओ बड्ड चतुराइसँ नुकेबाक प्रयास करै छथि, आ तेँ ओ मेडियोक्रिटीसँ आगाँ नै बढ़ि पबै छथि। आ तेँ हुनकामे ऐ नाट्य-कथाकेँ उद्देश्यपूर्ण बनेबाक आग्रह तँ छन्हि मुदा सामर्थ्य नै आबि पबै छन्हि। Monday at 09:19
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जातिवादी रंगमंचक भाषाक बानगी:
Lalit Kumar Jha GAJENDRA JI CHHERAIT CHHAITHI GAJENDRA JI K APRAMANIK TATHA ASANGAT TIPPNI SABH PADHLAK BAD EAH LAGAIT ACHHI JE GAJENDRA JI LIKHAIT NAHI CHHAITH CHHATHI, LIDDI KARAIT CHHATHI. AAOR E BAL- BAL KA NIKLAIT RAHAIT ACHHI. HINAK E LIDDI MAITHILI SANSAR KE GHINA DET. KIYEK TA MAITHILI SANSAR CHHOT ACCHI. TE HINKA ANGREJI ME LIKHBAK CHHAHI. KARAN AKAR CHHETRA VISAL CHHAIK. AK KON ME HINAK LIDDI PACHA LETAIN. Monday at 10:09
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Ashish Anchinhar मलंगिया जीक नाटक विद्वेष बढ़बैत अछि, हुनकर राड़ आ शोल्कन्हक प्रति आ ओकर भाषाक प्रति घृणा गएर ब्राह्म्ण केँ मैथिलीसं दूर केलक अछि। Monday at 10:12
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Ashish Anchinhar lalit ji ahank pita aa ahank bhasha dunu ekke tarahak achhi, abhadra Monday at 10:12
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Ashish Anchinhar मलन्गिया जी छेड़ि घिनौने छथि Monday at 10:13
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Ashish Anchinhar Lalit Kumar Jha---ठीके कहैत छी भाइ ओना एकटा गदहाक मर्म दोसरे बड़का गदहा बुझि सकैए। एहि मामिलामे मतलब गदहपनमे अहाँ हमर सीनियर भेलहुँ। सधन्यवाद भाइ|... लिद्दीक ज्ञान देखि हम आर बेशी सन्तुष्ट छी , अहाँ अवश्य गदहपनमे हमर सीनियर भेलहुँ Monday at 10:14
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Ashish Anchinhar ललित जी अहाँ आ अहाँ पिता मलंगिया जी दुनू गोटेक भाषा एक्के तरहक अछि.. अभद्र Monday at 10:15
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Umesh Mandal मलंगिया जीक जीवनक प्रभाव हुनकर बच्चापर देखबामे अबैत अछि.. एतेक असभ्य? हुनकर (मलंगिया जी क) नाटक लोककेँ घृणा करब सिखेने अछि से सिद्ध भेल। ललित जी, गजेन्द्र ठाकुरक मैथिली/ अंग्रेजी/ तिरहुता मैथिली सभटा ग्रन्थक सूची एतए अछि: गजेन्द्र ठाकुर प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना भाग-१ सहस्रबाढ़नि (उपन्यास) सहस्राब्दीक चौपड़पर (पद्य संग्रह) गल्प-गुच्छ (विहनि आ लघु कथा संग्रह) संकर्षण (नाटक) त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन (दूटा गीत प्रबन्ध) बाल मण्डली/ किशोर जगत (बाल नाटक, कथा, कविता आदि) उल्कामुख (नाटक) सहस्रशीर्षा (उपन्यास) प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना भाग दू (कुरुक्षेत्रम अन्तर्मनक-२) धांगि बाट बनेबाक दाम अगूबार पेने छँ (गजल संग्रह) शब्दशास्त्रम (कथा संग्रह) जलोदीप (बाल-नाटक संग्रह) कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देवनागरी वर्सन KuruKshetramAntarmanak_GajendraThakur.pdf तिरहुता वर्सन KuruKshetramAntarmanak_GajendraThakur_Tirhuta.pdf ब्रेल वर्सन KuruKshetramAntarmanak_GajendraThakur_Braille.pdf सहस्रबाढ़नि_ब्रेल मैथिली (पी.डी.एफ.) सहस्रबाढ़नि_ब्रेल-मैथिली मिथिलाक इतिहास- भाग-२ (शीघ्र) जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा बायोग्राफी (शीघ्र) The Comet The_Science_of_Words On_the_dice-board_of_the_millennium A Survey of Maithili Literature- Vol.II- GAJENDRA THAKUR (soon) Learn Mithilakshar Script तिरहुता (मिथिलाक्षर) सीखू Learn_MithilakShara_GajendraThakur.pdf Learn Braille through Mithilakshar Script ब्रेल सीखू LearnBraille_through_Mithilakshara.pdf Learn International Phonetic Script through Mithilakshar Script अन्तर्राष्ट्रीय ध्वन्यात्मक वर्णमाला सीखू Learn_International_Phonetic_Alphabet_through_Mithilakshara.pdf गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा VIDEHA ENGLISH MAITHILI DICTIONARY जीनोम मैपिंग (४५० ए.डी.सँ २००९ ए.डी.)--मिथिलाक पञ्जी प्रबन्ध जीनोम मैपिंग (४५० ए.डी.सँ २००९ ए.डी.)--मिथिलाक पञ्जी प्रबन्ध (Click this link to download) http://www.box.net/shared/yx4b9r4kab (Click this link to download) OR right click the following link and save target as:- http://videha123.wordpress.com/files/2009/11/panji_crc1.pdf AND click this link to download some of the jpg images of palm-leaf manuscripts of Panji. http://www.esnips.com/web/videha AND CLICK EACH OF THE FOLLOWING 17 LINKS TO DOWNLOAD ALL THE 11000 JPG IMAGES IN 17 PDF FILES. पंजी (मूल मिथिलाक्षर ताड़पत्र) दूषण पंजी मोदानन्द झा शाखा पंजी मंडार- मरड़े कश्यप-प्राचीन प्राचीन पंजी (लेमीनेट कएल) उतेढ़ पंजी पनिचोभे बीरपुर दरभंगा राज आदेश उतेढ आदि छोटी झा पुस्तक निर्देशिका पत्र पंजी मूलग्राम पंजी मूलग्राम परगना हिसाबे पंजी मूल पंजी-२ मूल पंजी-३ मूल पंजी-४ मूल पंजी-५ मूल पंजी-६ मूल पंजी-७ MAITHILI-ENGLISH DICTIONARIES Maithili_English_Dictionary_Vol.I.pdf MaithiliEnglishDictionary_Vol.II_GajendraThakur.pdf ENGLISH-MAITHILI DICTIONARIES EnglishMaithiliDictionary_Vol.I_GajendraThakur.pdf विदेहक सदेह (प्रिंट) अंक VIDEHA print form विदेह ई-पत्रिकाक पहिल 25 अंकक रचनाक संग containing matter from first 25 issues of Videha e-magazine देवनागरी वर्सन SADEHA_VIDEHA_DEVNAGARIVERSION_PART_1.pdf SADEHA_VIDEHA_DEVNAGARIVERSION_PART_2.pdf तिरहुता वर्सन SADEHA_VIDEHA_TIRHUTAVERSION_PART_1.pdf SADEHA_VIDEHA_TIRHUTAVERSION_PART_2.pdf विदेह ई-पत्रिकाक २६ म सँ ५० म अंकक बीछल रचनाक संग containing matter from 26th to 50th issue of Videha e-magazine विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक PANJI_CRC.pdf - File Shared from Box - Free Online File Storage www.box.com Monday at 10:32
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Umesh Mandal ललित जी, सात जन्म लेबए पड़त अहाँकेँ आ मलंगिया जी केँ, अहाँ लिद्दीक विश्लेषण करैत रहू Monday at 10:33
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Ashish Anchinhar ललित जी तँ गदहा छथि तँए खाली लिद्दिएक विश्लेषण कए सकैत छथि Monday at 10:48
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Shiv Kumar Jha सात जन्म नै ललित जी,आ मलंगिया जी केँ,सत्तरि जन्म लेबऽ पड़तन्हि। Monday at 10:55
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Sanjay Kumar Jha हद क देलियै अपने सब. अपना में लड़ी क , गारी फज्जती क क की मैथिलि आ मिथिला के निक होयत, इ अहाँ सब सोचलाहूँ एको बेर. बंद करू इ प्रलाप आ सब गोटे मिली के एहन काज करू जाहि से की मैथिलि आ मिथिला के उन्नति हुअय. धन्यवाद. Monday at 22:02
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Gunjan Shree आई काल्हि सब एक दोसरा के दुसबा में लागल अछी,जौ कियो ग़लत केलक अछी त जिनका खराब लगलैन्ह हुनका चाही जे ओहि सौ आगू आबि क ओहि सौ बढ़िया करै,कोनो डैरि(line) के मेटा क छोट केनेय छोट लोकक काज होइत चेक,ओना facebook पर इ सब झगड़ा नही करय जाय से निबेदन..... Tuesday at 02:30
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Vinit Utpal दिल्ली में भेल साहित्य अकादमी कथा गोष्ठी में मलंगिया जी के सुपुत्र अप्पन पिताजीक नाम से पुरस्कार शुरू करबाक लेल लोक सें निहोरा करैत छलाह. अहि लेल अजित आजाद जी के खुशामद सेहो करैत छल जे अहां हमर बाबूजी के नाम पर अहि काजक ले आगा आबू. अजित आजाद जी के कहब छल जे अहि लेल एक लाख टका अहां कोनो संस्थान के जमा क दियो आ ओकर ब्याज से पुरस्कार शुरू भ जायत. मुदा हमरा जानल ई गप आगू नहि बढ़ल. ललित जी, अहिना गजशास्त्र लिखैत रहू. अहां के बुझले होयत जे 'हाथी चले बाजार, कुत्ता भूके हजार'. हाथी के डर से जंगल के राजा नुकायल घुरैत अछि आ अहां ते चिट्टा ते छी नहि जे गज के नाक में घुसि के किछु क सकब. Tuesday at 04:35
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Ashish Anchinhar गुंजन बौआ, ई ककरो दुसबाक नै वरन् मलंगिया जीक जातिवादी रंगमंचक विरोध छै, आ ओइसँ कए किलोमीटर पैघ डैरि बेचन ठाकुर जी द्वारा खीचि लेल गेल छै, देखल जाए http://maithili-drama.blogspot.in/ विदेह मैथिली नाट्य उत्सव maithili-drama.blogspot.com Tuesday at 07:28
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Umesh Mandal http://maithili-drama.blogspot.com/2011/09/blog-post_25.html Tuesday at 09:28
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Umesh Mandal http://maithili-drama.blogspot.com/2011/08/blog-post_1815.html विदेह मैथिली नाट्य उत्सव: बेचन ठाकुर -बाप भेल पित्ती maithili-drama.blogspot.com Tuesday at 09:29
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Umesh Mandal http://maithili-drama.blogspot.com/2011/08/blog-post_8210.html विदेह मैथिली नाट्य उत्सव: अधिकार- बेचन ठाकुर maithili-drama.blogspot.com Tuesday at 09:29
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Umesh Mandal जाधरि समीक्षाकेँ खिच्चातानी आ खिच्चातानीकेँ समीक्षा अहाँ बुझैत रहबै गुंजनश्रीजी, ललित जी आ संजय जी ताधरि अहाँसभ अहिना ओझरीमे रहब, Tuesday at 09:36
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Ashish Chaudhary कलकत्तामे गंगा झा छथि, नाट्य निर्देशक, ओ मलंगिया जीसँ कहलखिन्ह जे नाटकमे जातिवादी गारि कम कऽ दैले तैपर हुनका मलंगियाजी जवाब देलखिन्ह जे मलंगियाजीकेँ जतेक गारि अबै छनि तकर दसो प्रतिशत नाटकमे नै आएल छै, शर्मनाक। Yesterday at 06:23
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Ashish Chaudhary बेचन ठाकुर नाटककार आ नाट्य निर्देशक http://maithili-drama.blogspot.in/p/blog-page.html मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ नाटककार आ नाट्य निर्देशकक रूप्मे उभरि कऽ आएल छथि, तै पाछाँ बेचन जीक उत्कृष्ट जिनगी आ सोच छन्हि। विदेह मैथिली नाट्य उत्सव: पेटार maithili-drama.blogspot.com Yesterday at 06:26
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Ashish Anchinhar मैथिलीक समानान्तर रंगमंचक जन्मदाता: सभसँ बेसी मैथिली नाटकक निर्देशन: राजरोगसँ दूर: जातीय रंगमंचक विरुद्ध बेचन ठाकुर जीक संघर्ष (मुन्नाजी आ अजित आजादक सोझाँमे मलंगिया जीक भड़ैत प्रकाश झा जकरा लेल कहै छथि- भरि दिन केश काटैत रहै छल- पाठकक लेल ई सूचना जे जातिवादी रंगमंचसँ जुड़ल लोक केश काटनाइकेँ खराप बुझै छथि, संगहि ईहो सूचना जे बेचन ठाकुर सैम पित्रोदा (जे भारतमे टेक्नोलोजी मिशनक प्रारम्भ केलन्हि) सन बरही जातिक छथि, जातिवादी रंगमंचकर्मी लोकनि हुनकर गौँआ अंतिकाक सहायक सम्पादक श्रीधरमसँ कन्फर्म कऽ सकै छथि): हिनका नामसँ कतेको रेकॉर्ड दर्ज अछि, जेना संस्कृतक बाद पहिल बेर मैथिलीमे भरत नाट्यशास्त्रक रंगमंचक संकल्पनाक अनुसार नाटक, मात्र महिला नाट्यकर्मीक माध्यमसँ ६-६ घण्टासँ ऊपरक नाटकक मंचन (जखनकि जातिवादी नाट्यकर्मी अदहा घण्टा- ४५ मिनटक नाटकक निष्पादन लेल महिला रंगकर्मीक लेल बौखैत रहै छथि, कारण हिनकर सभक बलगोविना प्रवृत्तिक कारण आ कुकुरचालिक कारण बहुत रास महिला मैथिली नाटकसँ दूर भागि गेलीह। मुदा सभ कान्तिदर्शीकेँ जातिवादिताक कोप, गारि गंजन सुनऽ पड़ै छै, मुदा बेचन ठाकुर एक्केटा छथि...हमरा सभ नाट्यकर्मी, रंगमंचकर्मी, नाटककारकेँ हुनकर मैथिली समानान्तर रंगमंच, जे २५-३० सालसँ अनवरत चलि रहल अछि, पर गर्व अछि। मिथिलाक समाज जँ जातिवादी रंगमंचक बावजूद नै टूटल अछि तँ तकर कारण अछि बेचन ठाकुर जीक मैथिली समानान्तर रंगमंच... आ से मलंगिया जीक काल्हि जन्मल भड़ैत सभकेँ नै बुझल छन्हि, मुदा मलंगिया केँ बुझल छन्हि जे हुनकासँ बेशी संख्यात्मक आ गुणात्मक नाटक/ एकांकी बेचन जीक लिखल छन्हि आ ओइ बेचन ठाकुर आ गुणनाथ झाक एकांकी मैथिली एकांकी संग्रहमे नै देलन्हि.. एकलव्यक औंठा द्रोण कटबा लेलन्हि, मुदा एतऽ तँ गुरुक औंठा मलंगियाजी कटबा रहल छथि..





Rishi Kumar Jha GAJENDRA JI CHHERAIT CHHAITHI GAJENDRA JI K APRAMANIK TATHA ASANGAT TIPPNI SABH PADHLAK BAD EAH LAGAIT ACHHI JE GAJENDRA JI LIKHAIT NAHI CHHAITH CHHATHI, LIDDI KARAIT CHHATHI. AAOR E BAL- BAL KA NIKLAIT RAHAIT ACHHI. HINAK E LIDDI MAITHILI SANSAR KE GHINA DET. KIYEK TA MAITHILI SANSAR CHHOT ACCHI. TE HINKA ANGREJI ME LIKHBAK CHHAHI. KARAN AKAR CHHETRA VISAL CHHAIK. AK KON ME HINAK LIDDI PACHA LETAIN. — in New Delhi. Like
Monday at 9:58am Shubh Narayan Jha and 3 others like this.

Lalit Kumar Jha bahut badhiya Monday at 10:07am
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Naresh Jha bahut uchit likhne chi rishi Monday at 12:39pm
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Ajit Azad are chhoro bhi yaar...apne dil ko itna bara kar lena chahiye ki isme saundar bhi sama jai


जातिवादी रंगमंचक भाषाक बानगी:

Mukesh Jha vinit utpal pyada/pyaja no -420विनीत उत्पल जी के लेल जिनका आँखी में रतौधी छैन | अपन आलेख मे लिखैत छैथ जे बाबा के उपर कोनो कार्यक्रम नई भेल अछि | यो उत्पल जी जौ नौकरी के बाद जे समय बचैत अछि से यदि चमचैई के अलावा अहि तरहक आयोजन देखबा मे केने रहितियेक त अहि तरहक भ्रम नहि होयत | उम्मीद अछि आगू स ध्यान राखब |

Mukesh Jha Sujhal yo vinit utpal jee

Mukesh Jha
जत्त मलंगिया जी के नाटक के तुलना भारतीय रंगमंच के प्रसिद्ध नाटककार जेना मोहन राकेश, विजय तेंदुलकर, गिरीश कर्नाड, बादल सरकार आदि स भ रहल छैक ओहि ठाम आई कालिह मे जनमल मैथिली के टुच्चा नाटकार आ नाटक स तुलना केनाई बेईमानी अछि |

Mukesh Jha से बेईमान सब स पुछियोक भाई |
23 hours ago
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Anuradha Jha अहि मे कोनो दू मत नई जे महेंद्र मलंगिया मैथिली के सर्वश्रेष्ट नाटककार छैथ |
23 hours ago
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Anuradha Jha मलंगिया जी पर जाही तरह फेस बुक पर किछु लोक अनाप सनाप लिखी क श्रेष्टता पाब चाही रहल छैथ से सर्वदा गलत अछि | श्रेष्टता पेबाक कोनो दोसर बाट ताकल जा सकैत अछि | किछु लोकक पोस्ट आ भाषा घोर आपत्ति जनक अछि | अहि स मिथिला मैथिली के अपमान भ रहल अछि | कुंठा स ग्रसित नई हाउ आ अपन नीक काज कय क अपन स्थान बनाव नई की खिच्चम तानी मे लागल रहैत जाऊ |
23 hours ago
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Prakash Jha मैथिली नाटकक ज्ञान सब के नै छनि. जे लोकनि नाटक वाकि रंगमंच स' जुड़ल छथि हुनका सभ स' विचार लेल जयबाक चाही. जेना कि कुणाल जी, गगन जी, किशोर केशव, प्रेमलता मिश्र प्रेम, शिवनाथ मंडल, यदुवीर यादव आदि आदि....बाँकी फेसबुक पर जे भ' रहल अछि ओकर तह मे किछु आर अछि. कोनो खास व्यक्ति केँ मात्र साहित्य अकादेमी पुरस्कार दियबाक लेल भ' रहल अछि. एही बीच महेन्द्र मलंगिया जीक पुस्तक आबि गेलन्हि कि ई लोकनि डरि गेल छथि... त' लगल्न्हि अछि उंटा चालि चल' ....
23 hours ago
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Mukesh Jha उचित कहल अनुराधा जी मुदा किछु बेकहल लोक के कोना रोकल जा सकैत अछि | जे की अपना आ अपन खानदान के श्रेष्ट बनेबाक लेल सब कर्म करबाक लेल तैयार छैथ | जिनका मे टेलेंट हेतैन तिनका जोर जबरदस्ती नई कर परैत छैक से के बुझेतैन महामुर्ख लोकनि के | मलंगिया जी के नाटक जतेक लोकप्रिय अछि प्रेक्षक के बीच मे किनक नाटक लोकप्रिय अछि से कहौत नबका जन्मौटी नाटक के हितेषी लोकनि ?
23 hours ago
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Mukesh Jha ओहो त एकर मतलब ई जे मात्र ई ओझराब के योजना भरी अछि ?


Ashish Anchinhar
एखन हमरा मोबाइल पर एकटा नम्बर सँ फोन आएल छल जकर नम्बर अछि----08595372399 । फोन करब बला कहलाह जे हम बजरंग मंडल छी। आ इ कहू जे आशीष चौधरी के छथि। हम कहलिअन्हि जे से तँ प्रकाश झासँ पूछि लिअ। ओ हमरा कहलाह जे हम प्रकाश झासँ किएक पुछबै। आ बातचीत क्रममे कहलाह जे हमर नाम किएक फेसबुक पर आएल। हम कहलिअन्हि जे हमरा जे अहाँ भोरमे अहाँ कहलहुँ जे रातिमे इ सभ मारए बला छलाह। मुदा हम रोकबा देलहुँ। बातचीतकेँ अंतमे बजरंग जी इहो कहलाह जे फेसबूक पर इ बात आनि बहुत गलत केलहुँ अछि। सभ गोटाकेँ धआन देआबी जे बजरंग मंडल मैथिली फांउडेशनसँ बेसी जुड़ल छथि जे की मैलोरंगसँ टूटि कए बनल एकटा संस्था अछि। मुदा फोन करए बला कहलाह जे हम दोसर बजरंग मंडल छी। भए सकैए जे दूटा बजरंग मंडल होथि मुदा ई संभव नै छै जे ओ दूनू के दूनू बजरंग मंडल हमरा चिन्हैत होथि। ओना जँ बजरंग जीकेँ अवाजसँ ई स्पष्ट छल जे कोनो दबाबमे जरूर छथि।ओना जँ बजरंग जी चाहथि तँ अपन पहिचान दए सकै छथि। फोन नम्बर सेहो ट्रेस भए जेतै।

संगे-संग प्रकाश झा स्वंय अपने मूँहसँ मुन्ना जीकेँ कहलकै जे अंतो-अंत धरि हम आशीष अनचिन्हारकेँ मारबै ताहि पर मुन्ना जी कहलखिन्ह जे हम अनचिन्हार संगे परिचय करबा दै छी कने छूओ क देखिऔ। ताहि पर प्रकाश झाक एकटा परम ब्राम्हणवादी सहयोगी मुन्ना जीकेँ कहलखिन्ह जे अहाँ बचा लेबै अनचिन्हारकेँ
। ताहि पर मुन्ना जी कहलखिन्ह जे हम सभ कहै नै छिऐ करै छीऐ खाली एकबेर छू क देखिऔ। ताहि पर प्रकाश झा कहलखिन्ह जे कोनो बात नै देखिऔ जे की होइ छै।
जँ साहित्य अकादेमीक ओहि कथा गोष्ठीक फोटो-विडियोकेँ देखल जाए तँ ई स्पष्ट अछि जे प्रकाश झा-मुकेश झा हमरा मरबा लेल व्यग्र छल।उपरमे एकटा फोटो राखि रहल छी जाहिमे की कए रहल अछि प्रकाश से देखू---- मुदा मुन्ना जीक कहलाक बाद डरें किछु नै कएल पार लगलै प्रकाश झा एनड मुकेश झा कम्पनीकेँ।






Ashish Chaudhary
मलंगिया आ प्रकाश झाक इशारापर भ्रमरजीक विरुद्ध मिथिलादर्शन आ आन-आन ठाम चिट्ठी भेजनिहार मुकेश झा आब इन्टरनेट पर आबि गेल अछि, ऐ फ्रॉड आइ.डी.सँ सावधान। ई ककरो दोसरा द्वारा संचालित होइत अछि.. सावधान। ... मलंगिया जीक नाटक लोककेँ बेसी कट्टर बनेलक अछि, गएर ब्राह्मण मैथिलीसँ दूर भागल अछि। ... प्रकाश झा आ मुकेश झा घोषणा केने रहथि जे २४ मार्च २०१२ क साहित्य अकादेमी कथा गोष्ठीमे आशीष अनचिन्हारकेँ मारताह, बजरंग मण्डल ओतए आशीष अनचिन्हारकेँ ऐ मादे सतर्क सेहो केने रहथि। मुदा छूलो भेलन्हि?malangiya ji jatek mehnati lathait posai me lagelanhi tatek jan neek naatak likhbai me lagabitathi te aai mukesh jha, rajiv mishra, lalit jha, prakash jha san nirlajjak aavashyakta nai rahitanhi
Bhaskar Jha भाई एहन ऎहन आपत्तिजनक गप के जतय तुलि देबय ओतय बढत! किनको व्यक्तिगत सोच आ आपत्ति के सार्वजनिक नहिं कयल जयबाक चाही। विद्वजन के अपन अपन मतानतर होयत छई। वोहि मतानतर पर हम - अहां आपस में नहिं लड़ि। दूनू महान व्यक्तित्व के धनी छथि। दूनू गोटे सं हमरा सबके सीखबाक चाही।
7 April at 21:35
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Ashish Chaudhary भाइ पत्रिका सभमे लठैतक छद्म नामसँ चिट्ठी पठेबाक प्रवृत्तिपर किछु तँ कमी आएत।



Ashish Chaudhary भाइ पत्रिका सभमे लठैतक छद्म नामसँ चिट्ठी पठेबाक प्रवृत्तिपर किछु तँ कमी आएत।
7 April at 21:46
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Bhaskar Jha हां सेहो बात सही अछि
7 April at 22:05
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Manoj Jha इ सब मिथिला मैथिली के लेल दुर्भाग्यक गप्प थिक ..
7 April at 22:55 via Mobile
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Umesh Mandal सामंती लोकनि‍क बेवहारि‍क परि‍चय....
8 April at 01:40
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Shubh Narayan Jha kane positive bha chalba sa maithili ke vikas chhaik ne ki ek dosra ke khichay kela sa


Ashish Anchinhar जातिवादी रंगमंचक शब्दावलीक बानगी:-जातीय रंगमंचक भाषाक बानगी:- Prakash Jha सुप्रसिद्ध कथक नृत्यांगना सुश्री ...... आजकल दिल्ली में ही हैं. Like
Unfollow post 4 hours ago Mukesh Jha तो ? 4 hours ago Like Prakash Jha तो इनसे मुलाकात अब जरूरी लगता है.... 4 hours ago Like Mukesh Jha किस वजह से भाई साहेब ? 4 hours ago Like Prakash Jha कुछ विक्षिप्त मानसिकता के लोग इन्हें मैथिली भाषा के सहारे बदनाम करने में लगे हैं. 4 hours ago Like Mukesh Jha क्या बात कर रहे हैं वो बहुत अछि नृत्यागना हैं, उनके बारे मे ये अशोभनीय बात है | 4 hours ago Like Prakash Jha जी, है तो पर... ऎसा नही करना चाहिए... खैर... आगे आगे देखिए होता है क्या.... चलता हूँ रीहर्शल के लिए.... 3 hours ago Like Ashish Anchinhar जातिवादी रंगकर्मीक बलगोविना प्रवृत्तिक कारण आ कुकुरचालिक कारण बहुत रास महिला मैथिली नाटकसँ दूर भागि गेलीह। .... 3 hours ago Like Mukesh Jha आ बहुत रास आहाँ एहन कुकर्मी लेखक के कारण अन्चिहाररजी आ किछु आहाँ लोकनि द्वारा पोसुवा प्यादा के कारण | आब चिन्हार भ जाव यो अनचिन्हार जी | 2 hours ago Like Ashish Anchinhar जातिवादी रंगकर्मीक बलगोविना प्रवृत्तिक कारण आ कुकुरचालिक कारण बहुत रास महिला मैथिली नाटकसँ दूर भागि गेलीह। .... Vinit Utpal जातिवादी रंगमंच क प्राइवेट पार्टी मे ५-१० मिनट यात्री आ राजकमल कें देल गेलन्हि आ ओकर फोटो १०-२० साल धरि बेचल जाएत , ई जातिवादी रंगमंच अखबारक कतरन समेटैत अछि. 4 hours ago Unlike 1 Vinit Utpal (यात्रीक जन्म ३० जून १९११ छन्हि ) 4 hours ago Like Ashish Anchinhar विनीत भाइ ई सभ फण्ड केर खेला छै जहिया फण्ड भेटतै तहिये बाबा मोन पड़तिन्ह आ सातो जन्म धरि फोटो लगा इ बाबू सभ हल्ला मचेताह।.... 4 hours ago Like Ashish Anchinhar भाइ एकट गप्प इहो जे जेना जातिवादी रंगकर्मी सभ अपन दिमाग मे कूड़ा-कर्कट भरने रहै छथि तेनाहित अपन घर-आफिस कतरनसँ भरने रहै छथि। ई कतरन सभ फण्ड उगाही केर नीक साधन छै जातिवादी सभ लेल। जँ ई कतरन नै रहतै तँ फण्ड देतै के। ओना विनीत भाइ अहाँक जानकारी लेल ई कहि दी जे पेड पत्रकारितामे पाइ दए न्यूज छपा लेब जातिवादी सभ लेल कोनो बड़का गप्प नै। फोटोशापसँ ब्रोशर बना लेनाइ सेहो आसान छै। प्रिंटर सँ पर्चा सेहो छपा लिअ। भारत सरकार फण्ड देबा कालमे इएह सभ देखैत छै।.. 4 hours ago Like Mukesh Jha यो अनचिन्हार जी काज कय क हल्ला करैत छीयेक आहाँ और आहाँ के ग्रुप भूते त बाबा के नाम पर एकटा गोष्टीयो नई कायल भेल | 4 hours ago Like Mukesh Jha यो अन्चिहार जाहि ग्रुप के पोसुवा छी आहाँ ओही ग्रुप स एक बेर मंडी हाउस मे एकटा बाबा के नाम पर गोष्टी करबा क देखा दियह | 4 hours ago Like Rajiv Mishra kya bat hai mukesh bhai gargara diye... 4 hours ago Like Ashish Anchinhar जातिवादी रंगकर्मीक बलगोविना प्रवृत्तिक कारण आ कुकुरचालिक कारण बहुत रास महिला मैथिली नाटकसँ दूर भागि गेलीह। .... 12 minutes ago Like Ashish Anchinhar राजीव मिश्रा, प्रकाश झा आ मुकेश झा सन भड़ैतक चलते कियो परिवार आ बहु बेटीक संग जातिवादी रंगमंचक समारोह (प्राइवेट पार्टी)मे नै जाइए। about an hour ago Like Ashish Anchinhar जातिवादी रंगमंचक शब्दावलीक बानगी:Mukesh Jha साहित्य अकेदमी पुरस्कार के कारण भ रहल अछि राजनीति | जातिवाद के हवाला दय कय रहल छैथ किछु चिन्हार आ किछु अनचिन्हार लोक घिनायल राजनीति | यो महामहिम लोकनि साहित्य अकादेमी पुरस्कार कोनो जाती विशेष के नई भेटैत छैक, उत्कृष्ट रचना के देल जायत छैक | सबुर राखु रचना मे दम्म होयत त अवश्य भेटत, अन्धेर्ज जुनि हाउ | जिनका पुरस्कार दियाब चाहैत छियेन हुनका कहियोन जे साहित्य के कोनो एक विधा के मजबूत करताह | खने कविता, खने कहानी आ आब नाटक मे सेहो अपन कलम भाजीं रहला अछि, यो ताहि स नही चलत, | खैर हल्ला करब त दओ दिया से भारी बात नई | मुदा ऐना नई चलत, जाही नाटक के आहाँ लोकनि पुरस्कार दियाबह लेल व्यग्र छि, ताहि मे दम नई अछि, आधा किताब एक सीन मे आ बांकी आधा मे ७ गो सीन, से नई होयत छैक यो सरकार | आ कनि दिमाग लगाब लेल सेहो कहियोन नाटककार महोदय के -- | नाटक के अपन व्याकरण छैक तकरा अनुसरण करैत लिखता त मंचित होमा मे असोकर्ज नई हेतैक | ध्यान दियोक |आ बेसी स बेसी मंचिंत नाटक के महत्व होयत छैक | about an hour ago Like Ashish Anchinhar ई डायलोग- "Mukesh Jha साहित्य अकेदमी पुरस्कार के कारण भ रहल अछि राजनीति | जातिवाद के हवाला दय कय रहल छैथ किछु चिन्हार आ किछु अनचिन्हार लोक घिनायल राजनीति | यो महामहिम लोकनि साहित्य अकादेमी पुरस्कार कोनो जाती विशेष के नई भेटैत छैक, उत्कृष्ट रचना के देल जायत छैक | सबुर राखु रचना मे दम्म होयत त अवश्य भेटत, अन्धेर्ज जुनि हाउ | जिनका पुरस्कार दियाब चाहैत छियेन हुनका कहियोन जे साहित्य के कोनो एक विधा के मजबूत करताह | खने कविता, खने कहानी आ आब नाटक मे सेहो अपन कलम भाजीं रहला अछि, यो ताहि स नही चलत, | खैर हल्ला करब त दओ दिया से भारी बात नई | मुदा ऐना नई चलत, जाही नाटक के आहाँ लोकनि पुरस्कार दियाबह लेल व्यग्र छि, ताहि मे दम नई अछि, आधा किताब एक सीन मे आ बांकी आधा मे ७ गो सीन, से नई होयत छैक यो सरकार | आ कनि दिमाग लगाब लेल सेहो कहियोन नाटककार महोदय के -- | नाटक के अपन व्याकरण छैक तकरा अनुसरण करैत लिखता त मंचित होमा मे असोकर्ज नई हेतैक | ध्यान दियोक |आ बेसी स बेसी मंचिंत नाटक के महत्व होयत छैक |" प्रकाश झा मुन्नाजीकेँ बेचन ठाकुरक नाटकक (जिनका ओ भरि दिन केश काटैबला कहैए) विषयमे ई गप कहने रहन्हि। आब सिद्ध् भेल जे ई मुकेश झा नै प्रकाश झा अछि। 5 minutes ago Like Ashish Anchinhar प्रकाश झा बाउ: टिनही चश्मासँ देखू बेचन ठाकुरक नाटक: "आधा किताब एक सीन मे आ बांकी आधा मे ७ गो सीन"- दुनिया लग ई किताब छै आ अपन भड़ैती जारी राखू, झूठक खेतीक संग: अहाँ भड़ैतीक अलाबे आर किछु नै कऽ सकै छी बाउ। एतए पोथीक लिंक अछि, पढ़ू आ माथ पीटू https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/Home/BechanThakur.pdf?attredirects=0 https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/Home/BechanThakur.pdf?attredirects=0 8869256024489431480-a-videha-com-s-sites.googlegroups.com A few seconds ago Like Ashish Anchinhar मलंगिया जी केँ सेहो पढ़बा देबन्हि- गुणनाथ झा कहै छलाह जे होइ छल जे उमेरक संग मलंगियाजी आधुनिक रंगमंच बुझि जेताह., मुदा काश... https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/Home/BechanThakur.pdf?attredirects=08869256024489431480-a-videha-com-s-sites.googlegroups.com about an hour ago Like Sangeeta Jha gajendra jee prasidh hobay ke lel badhiya chai prasidh aadmi ke aalochna karu.aakhir malangia jee ke naam dekh ka lok kum sa kum aahan ke naam padhiye let.Ona suraj oar thuku tha thukappne par parai chai. mathili ke jeevan ahak soch par nirbhar chai aascharya 54 minutes ago Unlike 1 Gajendra Thakur जातिवादी रंगमंचक महिला विरोधी, दलित पिछड़ा विरोधी प्रवृत्ति दुखी करैत अछि। समानान्तर रंगमंच एकर विरोधमे आजन्म ठाढ़ रहत।

Poonam Mandal काल्हि मलंगिया जीक मैलोरंगक (जकर आइ काल्हि अध्यक्ष देवशंकर नवीन छथि) दूटा सदस्य प्रकाश झा आ मुकेश झा एकटा महिलाकेँ बदनाम करबाक कोशिश (हम कोशिशे कहब, कारण हिनका सभक औकात ततेक नै छन्हि जे ओइमे ई सफल होथि, साहित्यिक सम्वेदनाक विश्लेषण ओ कऽ सकता?) केलन्हि। संगे ई दुनू गोटा जगदीश प्रसाद मण्डल आ बेचन ठाकुर जीक प्रति जातिगत अपशब्द सेहो कहलन्हि। अही तरहक जातिगत टिप्पणी देवशंकर नवीन द्वारा वैदेही पत्रिकामे सुभाष चन्द्र यादव जीक विरुद्ध सेहो कएल गेल रहए। की एक्कैसम शताब्दीक ई सभ लेखक छथि? एक्कैसम शताब्दीक रंगमंचकर्मी छथि? मैलोरंग पत्रिकामे प्रेमराज नामसँ अनलकान्त (गौरीनाथ- अंतिकाक सम्पादक)केँ गारि देनिहार मैलोरंगक वर्तमान वा पूर्व अध्यक्ष अपन नाम किए नै सोझाँ आनलन्हि, किए प्रकाश आ मुकेशक कान्हपर बन्दूक राखि ओ प्रेमराजक छद्म नामसँ गारि पढ़लन्हि, पत्रिकामे जे ई मेल प्रेमराजक देल अछि ओ बाउन्स कऽ रहल अछि। मलंगियाकेँ बुजुर्गक रूपमे सम्मानदेबाक आग्रही जगदीश प्रसाद मण्डल आ बेचन ठाकुर केँ किए गरिया रहल छथि?
Ashish Anchinhar धरती गोल छै..... प्रेमराजकेँ त्रिकालज्ञसँ भेँट भैए गेलै।..
 
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।

'विदेह' २३१ म अंक ०१ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३१)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक चारिटा लघु कथ ा २.२. रबिन्‍द्र नारायण मिश्रक चारिटा आलेख ...