Friday, December 14, 2012

'विदेह' ११९ म अंक ०१ दिसम्बर २०१२ (वर्ष ५ मास ६० अंक ११९) PART III





सत्यनारायण झा
विहनि कथा:--  
सुटिया
अन्हार गुफ्फ ।हाथ हाथ नहि सुझैत । आकाश साफ़ रहैक ।पूरा आकाश तारा सं आच्छादित ।निरवता तँ तेहन रहैक जे हृदय मे अनेरे सनसनाहट बुझाय ।भगजोगनिक यत्र तत्र प्रकाश रात्रिक निरवता कऽ आओर प्रखर केने रहैक ।पक्षी सभ अपना खोता मे तेना ने सुतल रहैक जे कतौ सं कोनो आवाज नहि अबैत रहैक ।एकदम शांत ।वायुक वेग मे केखनो कऽ बाँसक झुरमुट ऊपर नीचा भऽ जायक लगैक जेना कोनो अदृश्य शक्ति ओकरा हिला रहल छैक ।     एहन अन्हरिया राति नहि देखने छलियेक  ।हम ओही दिन कतेको अंतराल कऽ बाद इलाहाबाद सं गाम आयल रही ।हम ओहि समय इलाहाबाद मे पढ़ैत रही ।भोजनोपरांत हम अपन दलान पर सुतल रही ।नींद नहि होयत रहय ।दोसर पहर राति बित गेल रहैक ।कनेके काल पहिने बाँध बोन में गिदरक  हुआ हुआ सुनने रहियैक ।कतबो प्रयास करी नींद हेबे नहि करय ।छटपट करैत परल रही ।तखने दलानक कात कनैलक गाछ लग कुकुर कानय लगलैक ।कुकुरक रुदन हमरा देह मे कपकपी भरि देलक ।कनेक मोन कऽ स्थिर केलौ ।आब बुझायल निद्रा देवीक आगमन भऽ रहल छनि । अर्द्धावस्था मे रही ।तखने बुझायल पुबारी कात सं दुर दुर सं केकरो विलाप करबाक आवाज आबि रहल अछि ।निद्रा देबी पुनः लंक लेलनि ।एतेक राति मे के कानि सकैत छैक ?अनुमान सं बुझायल जे मलहटोली सं कनबाक अवाज आबि रहल छैक ।विलाप तँ एहन करैक जेना अंतरात्मा सं चित्कार करैत होयक ।ओह ,कियो भारी बिपति मे कानि रहल छैक ?ओहिना ओछेन पर  परल रही ,ताबे आँगन दिस सं माय अयलीह आ उठा कहय लगलीह जे लगैत अछि जेना सुटिया कनैत छैक ।ओकर बेटा बच्चेलाल बर जोर दुखित छैक ।मियादी ज्वर लगैत छैक ।सुटियाक नाम सुनिते मोन दुःख सं भरि गेल ।ओ हमरा घरक खबासनी छल ।एकेटा बच्चा भेल रहैक तँ ओकर पति भोकरहा मरि गेलैक ।बेटाक कारण सगाइ नहि केलक ।ओकर निर्बाह हमरे घर सं होयत छलैक ।हमरा सात्विक सिनेह सुटिया सं छल ।हम ओकरा बेटा सं चारि पाँच सालक पैघ रहियैक ।बच्चे रही तँ सुटिया हमरा मायसन सिनेह देने छल ।बर माने ।हम बच्चे सं ओकर पाछू पछु दौड़ैत रहैत छलौ ।आत्मीय सिनेह छल ।गाम आबी तँ सुनिते ओ दौड़ जायत छल ।अपना हाथे पानि पियाबति छल ।हमरा माय कऽ पूरा सम्हारैत छलैक ।आइ नहि आयल तँ मोन में एकबेर ठह्कल मुदा भेल नहि बुझल हेतैक ?आब तँ ओकरो बच्चेलाल सोलह सत्रह बरखक भऽ गेलैक ।मुदा ----।मायक मुँह सं जहिना सुनालियैक ,तुरत ओकरा घर दिस भागलौ ।वास्तव मे बच्चेलाल कऽ तुलसी पीड़ा लग सुता देने रहैक  आ ओकरा देह पर सुटिया अपन देह बजारि चिचिया रहल छलैक  ।हमरा देखिते सुटिया पैर पर अपन कपार पीटय लागल ।ओ  बेहोश भऽ गेलैक  ।ओकर दांती छोरेलियैक मुदा होश मे अबिते ओ ओहिना कपार पिटय लगैक ।बच्चेलाल निष्प्राण भऽ गेल रहैक ।ओ एहि दुनिया कऽ छोरि चुकल छल ।
कनेकालक बाद लोक सभ एकटा ठठरी बना कऽ अनलकै \ ओहिपर बच्चेलाल कऽ धय देलकै आ राम  नाम सत्य  छै ,कहैत ,सभ श्मशान दिस बिदा भऽ गेलैक ।
ओकरा अंगना सं सभ चलि गेल रहैक ।सुटिया असगरे कनैत रहैक ।बगल मे हमहू ठाढ़ रहियैक ।एक बेर ओकर आँखि हमरा आँखि सं मिललय ।ओकर दर्द जेना हमरा पूरा शरीर मे समा गेल ।नहि रोकि सकलौ अपना कऽ आ ओकरा भरि पाँज पकरि अपना करेज मे सटा लेलौ आ जोर जोर सं कानय लगलौ जेना माय कऽ पकरि बेटा कनैत छैक ।

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मुन्नी कामत
 
विहनि कथा-
कैंसर
रोगी- बाप रे बाप ........आब नै जिबै.......
माय गे माय..............हो...........दौड़ऽ होउ लोक सब
डॉक्टर- चुपु, ई अस्पताल छिऐ, अहाँ कऽ दलान नै जे एना ढ़करै छिऐ। की भेल, देखै सँ तँ भला चंगा छी, कोन तकलीफ यऽ।
रोगी- डॉक्टर साहेब, हम एगो आम आदमी छी। हमरा कैंसर भेल अछि जे हमर प्राण लऽ कऽ हमर पीछा छोड़त। हमरा मरै कऽ गम नै अछि पर हमर पुरे परिवार कऽ सेहो ई कैंसर अपना गिरफत मे लऽ रहल अछि। की हमरा आ हमरा परिवार कऽ मुक्ति मिलत?
डॉक्टर- हअ-हइ, किएक नै। दुनियामे एहन कोनो बीमारी नै अछि जकर आइक युगमे इलाज नै होइत अछि। पर अहाँ कऽ आ अहाँक पुरे परिवार कऽ कैंसर अछि ई अहाँ केना जनै छी? एना भइए नै सकैत अछि। देखै सँ तँ अहाँ पागल नै लगैत छी, फेर पागल जेकाँ बात किए करैत छी। पहिले जॉंच कराउ, फेर इलाज शुरू करब।
रोगी- डॉक्टर साहेब, की जाँचब अहाँ, कि हमरा घरमे आइ सात दिन सँ सब उपास यऽ कि नै? सरकार घर मे गोदामक-गोदाम अन्न सड़ैत अछि पर हम गरीब एक मुटठी अन्न लऽ तरसि रहल छी। आकि ई जाँचब जे हम कतेक दिन सँ प्यासल छी। ने देह मे आगि लगबै लऽ मटिया तेल अछि ने जहर खाइ लेल जेब मे पाइ।
डॉक्टर- अहाँ की कहि रहल छी? हमरा समझमे किछु नै आबि रहल अछि।
रोगी- कहियो गरीबी कऽ जिंनगी जिलिऐ हऽ डॉक्टर साहेब। हमरा मंॅंहगाइ, गरीबी, लाचारी आ बेरोजगारी अइ तरहक अनेक बिमारी गरसने अछि जे आब कैंसरक रूप लऽ लेलक। कहुँ अहि लाइलाज बिमारी कऽ इलाज अछि अहाँक डॉक्टरी दुनियामे?
डॉक्टर- ऐ बिमारी सँ तँ कोइ नै बचल अछि। ई तँ दिन-प्रतिदिन भयंकर रूप लेने जाइ यऽ। अकरा सँ मुक्ति तँ मौते दिया सकै यऽ।

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महेन्द्र मलंगिया
मूर्दाः श्रृंगार संघर्ष आ द्वन्द्व

ई सर्वविदित अछि काव्येषु नाटकं रम्यम् । अर्थात काव्यमे नाटक सभसँ आनन्दप्रद अछि । एहिसँ दू टा बात अभरिकऽ हमरा लोकनिक सोझामे अबैत अछि पहिल तँ ई जे नाटक एक प्रकारक काव्य अछि आ दोसर, ओहि काव्यमे सभसँ बेसी आनन्दप्रद । एहि दुनूमेसँ दोसर बातपर कोनो आंगुर नइ उठल अछि । एकरा ध्वनि मतसँ सभ स्वीकार कएलक अछि , मुदा पहिल बातपर आंगुर उठव शुरू भऽ गेल । सभसँ पहिने पंडित जगन्नाथ एहिपर आपत्ति उठौलन्हि । ओ कहलन्हि जँ रसव्यंजककेँ काव्य मानल जाए तँ नाटकीय अंग अभिनय आदिकेँ रसव्यंजक भेलासँ निश्चिित रूपेण एकरा काव्य कहबामे आपत्ति होयत । एहिना अलंकार चिन्तामणिक पंचम परिच्छेदमे जिनसेनाचार्य द्वारा काव्यादौ नाटकादौ कहिकऽ अलगअलग सत्ता स्वीकारल गेल अछि । ओेहूना जँ देखल जाए तँ काव्य काविक कर्म छियै आ नाट्य नटक । संगहि नाट्य खेल अछि जकरा देखल आ सुनल जा सकैछ । एहिमे आँखि आ कान दुनू व्यस्त रहैछ, मुदा काव्यमे काने टा । आचार्य भरत नाटक सम्बन्धमे सेहो कहने छथि व्रक्रीडनीयकममिच्छामो दृश्यं श्रव्यं च यद्भवेत । अर्थात नाटक खेल अछि, देखबाक चीज अछि आ ओ श्रव्य सेहो अछि । एतदर्थ एकरा मंचक विभिन्न प्रक्रियासँ गुजरऽ पड़ैत छैक । एहना स्थितिमे कोनो कवि वा उपन्यासकार वा कथाकार जखन एहि साहित्यिक विधासँ टपिकऽ नाट्य साहित्यक क्षेत्रमे अबैत छथि आ एकर मूल्यांकन करऽ लगैत छथि तँ ओतेक सटीक नइ भऽ पबैत छथि । लेखन आ सम्पादनसँ लसमीक्षा धरि कतेको एहन स्थल हमरा भेटल अछि जतऽ ओ चुकल बुझना जाइत छथि । एहिसभक जँ उदाहरण देबऽ लागब तँ एकटा पोथा तैयार भऽ जाएत तथापि हम एकआध टा उदाहरण अवश्य देबऽ चाहब । यथाजीवन झाक नाटक सुन्दर संयोगमे चतुर्थ अंकक पर्दा खसैत अछि । मंचपर कोनो पात्र प्रवेश नहि करैत अछि, मुदा सातसात टा गीत नेपथ्यसँ चलैत रहैत अछि । एकर बाद रथोद्धतामे दू पाँती गबैछ, मुदा कादम्बरीक प्रवेश नहि देखाओल गेल अछि । पुनः जे नवम गीत अछि ओ नेपथ्यसँ अछि कि मंचसँ तकर उल्लेख सेहो नहि अछि । एकर मतलब जे नाट्यकारकेँ रंगमंचक जानकारीक अभाव छन्हि । एहिना मिथिला मिहिर, १३०५१९६२ ई. मे प्रकाशित राधाकृष्ण चौधरीक नाटक राज्याभिषेकमे राजधर कहैत अछिचलू, आइ संध्याकाल कोनो गाछी दिस घूमि आबी । पुनः कोष्ठमे देल गेल अछि साँझुक पहर, तीनू गोटए गाछीमे पहुँचलाह आ देखलनि ओतऽ हाँजकहाँज छौड़ीसभ विद्यापतिक गीत गाबि रहल अछि । ई लोकनि कातमे बैसि मजा लैत रहलाह ।आब साँझुक पहर, गाछीमे पहुँचब आ हाँजकहाँज छौड़ीसभके विद्यापति गीत गबैतक जानकारी प्रेक्षककेँ कोना भेटतैक ? ने दृश्य परिवर्तन, ने चलबाक माइम, ने कोनो संवाद आ ने दृश्य निर्माण । जखन कि नाट्यकार आ संपादक जानलमानल विद्वान छलाह । आब जँ समीक्षाक बात करी तँ ओकरा हास्यास्पद छोड़िकऽ आओर नहि किछु कहल जा सकैए । एहि बातक पुष्टिक दूतीन वर्षक भीतर प्रकाशित किछु समीक्षासँ कएल जा सकैछ । हमरा नइ लगैए जे नाट्यकर्मक एकोरत्ती छूति हुनका लोकनिमे छन्हि ।
उपर्युक्त बात सभकेँ देखैत आब हम नाट्यकार रमेश रञ्जनपर अबैत छी । ई एकटा सफल अभिनेता रहलाह अछि । तें रंगमंचक जे तकनिक छैक ओकरा हिनका पूर्ण ज्ञान छन्हि । अतः एकर उपयोग अपना नाटकमे सफल ढंगसँ कएलनि अछि । एकर प्रमाण एहि नाटकक संवाद अछि जे अपना लयमे चलैत अछि । संगहि प्रत्येक संवादकेँ बजबामे ओष्ठकेँ सुलभताक अनुभव होइत छैक । किएक तँ संवाद छोटछोट अछि । एकर जड़िमे हिनक अभिनेताबला गुण काज कएलक अछि । आखिर मंचपर संवाद अभिनेते बजैत छैक । तें ओ एहन संवादकेँ किन्नहुँ समावेश नहि करत जाहिमे ओष्ठ सुलभता नहि होइक ।

एतबए नहि, एकटा सफल निर्देशक सेहो रहबाक कारणेँ पात्रसभ सेहो मंचपर सक्रिय रहैछ । मंच निर्देश सेहो उचित ढंगसँ कएल गेल अछि ।
एमहर आबिकऽ किछु गोटे पुरुष एकपुरुष दूअथवा युवक एक एकयुवतीएक कहिकऽ जे नाटकमे पात्र रखैत छथि ताहिपर आपत्ति उठौलनि अछि । मुदा हम कहब जे एहन आपत्तिमे कोनो जान नहि अछि । आओर ई आपत्ति परोक्ष रूपसँ पाठ्य नाटकक ओकालत करैत अछि, मंचीय नाटकक नहि । किएक तँ नाटक पाठक वस्तु नहि, ओ तँ प्रेक्षकक वस्तु छियैक । आओर प्रेक्षकक हेतु नाटकमे युवक, पुरुष, स्त्री तथा युवतीक हेतु नाम दऽ देल गेल रहैत छैक । संवादमे पुरुष, स्त्री, युवक, युवती आदि कहिकऽ नहि अबैत छैक । मंचक आगाँ बैसल प्रेक्षककेँ केओ नहि कहैत छैक जे ई पुरुष एक वा दू छियैक । एहना स्थितिमे पुरुष एक वा दू पर आपत्ति उठाएब बिल्कुल असंगत लगैत अछि ।
एहि नाटकपर दुरुहताक चार्ज लगाओल गेल अछि । मुदा एहि मादे अपन विचार व्यक्त करबासँ पहिने हम प्रेक्षकक सम्बन्धमे किछु विचारणीय तथ्य दिस जाए चाहब प्रेक्षक विभिन्न प्रकारक होइत अछि । आओर ई विभिन्नता वयस, शिक्षा, पेशा आदि पर निर्भर करैत छैक । बच्चा सभक वास्ते ओहन नाटक चाही जाहिसँ ओकर बालसुलभ जिज्ञासाक पूर्ति होइक । मुखौटा लागल पात्र आ अवस्थाक अनुकूल संवाद ओ सभ बेसी पसिन करत । तहिना निरक्षर आ अखरकट्टू प्रेक्षक ग्रामीण कलाकारद्वारा प्रस्तुत लोकनाट्यकेँ बेसी पसिन करत । किएक तँ एकरा बुझबाक लेल ओकरा बेसी मानसिक श्रम नहि करऽ पड़ैत छैक । इएह कारण अछि जे कोनो लोकनाट्यक पाछाँ निरक्षर आ अखरकट्टू जनसमुदाय ढंगरि जाइत अछि । ओहीठाम पढ़ललीखल लोक एहिमे नगण्येक बराबर रहैत अछि । एकरा लोकनिक हेतु ओहिसँ इतर नाटक चाही । एकटा बात आओरदेश, काल आ परिस्थिति नाटकक मीटर होइत छैक जाहिपर नाटक अपने आप बाजऽ लगैत अछि । तें जँ हमरा रेडियो नेपाल सुनबाक अछि तँ मीटरकेँ ओहिपर घुसकाकऽ आनऽ पड़त । हमरा नीक जकाँ मोन अछि जे एकटा मित्रकेँ सैमुअल बैकेटक नाटक इण्ड गेमपढ़ऽ लेल देने रहियनि । एक मासक बाद हुनका कहलियनि जे नाटक पढ़ल भऽ गेल तँ दऽ दिय । एहिपर ओ जवाब देलनि जेपढ़ल तँ नइ भेल अछि , मुदा लेब तँ लऽ लिय । कारण, हम बुझबे नइ करै छियै ।बैकेटक ओ नीक नाटक अछि जे द्वितीय विश्व युद्धक बाद लिखल गेल छल । एकरा हिटलरक पराजय आ वर्लिन पतनसँ जोड़ल जाए तँ सभ मिलि जएतै ।
एहिना ई नाटक मुर्दाअछि । ओहि कालखण्डमे नेपालक शासन राजाक अधीन छलैक । यमराज एहिठाम राजाक प्रतीक अछि । चित्रगुप्त प्रधान दरबारी अछि जे राजाक छत्रछायामे विभिन्न कुकृत्य करैत अछि । देखल ने जाएचित्रगुप्तः हँ सरकार, असलमे मृत्युभुवनकेँ स्वच्छ रखबाक दायित्व तँ हमर अछि । अपने तँ निमित्त पात्र मात्र छी ।
एहि संवादसँ ई बात साफ भऽ जाइत अछि जे मृत्युभुवन अर्थात नेपालकेँ केहन साफ करैत होएतैक । संगहि ई सफाइ ककरा नामपर होइत छैक तकरा लेल तँ निमित्त पात्र अछिए ।
एहि नाटकक केन्द्र विन्दु मुर्दा अछि जे सत्ताद्वारा बनाओल जाइत अछि । किएक तँ ओ मुर्दा मात्र पर शासन कऽ सकैत अछि, जागरुक लोकपर नहि । तें सत्ता चाहैत रहैत अछि जे सभकेँ मुर्दा बना दी । एहिव्रmममे सत्ता दू टा हथियार अपनबैत अछि पहिल तँ ई जे ओ सुखसुविधाक जाल फेकैत अछि । आइ काल्हुक पूजीपतिसभ पूर्वक पूजीपतिकेँ गारि पढ़ैत छैक जे जखन बुझलकै जे मार्क्स एतेक प्रखर बुद्धिक अछि तँ ओकरा सभ सुखसुविधा जुटाकऽ बेकार किएक ने कऽ देलक । एहि बातक चरितार्थ ई नाटक करैत अछि । देखल ने जाए
बूढ़ा ः ओ दूर होइत गेल हमरा सभसँ आ शासनक नजदिक होइत गेल । शासन ओकरा गुड़क ढेप बुझाइक । ओ बुझऽ लागल रहय जे एहिमे सटल रहलासँ हमरा स्वर्गी आनन्द भेटत । शासनक आनन्द अर्थात स्वर्गक आनन्द लेल जीवनकेँ छोड़ि देलक ।
आब तेसर मार्ग छैक दमन । एकर आगाँ लोक मुह नहि खोलि पबैत अछि । एहि बातक पुष्टि निम्नांकित संवाद करैत अछि
बूढ़ा ः एहि सभक बलपर अपना भीतरमे अद्भुत क्षमताक विकास कएनाइ एखन दुलर्भ छै । हवाक गतिक विरुद्ध के ठाढ़ हैत ? उफनैैत नदीक विपरीत दिशामे आगू बढ़बाक के दुस्साहस करत ? शासनक विरुद्ध स्वर निकालबाक इच्छाशक्ति के देखाओत ?
एहि तरहें नाट्यकार दमन आ पोषण सत्ताक दूू टा आँखि मानैत छथि जे अक्षरशः सत्य अछि । देखल जाए ई संवाद
युवक २ ः शासनक आँखिसँ दू टा रोशनी निकलै छै । एकटा जरबऽबला आ एकटा बढ़बऽबला । जे जिन्दा रहल तकरा जरौलक आ जे मुर्दा भऽ गेल ओकरा बढ़ौलक ।
एहिठाम जिन्दाक तात्पर्य ओहि व्यक्तिसँ अछि जे सत्ताक विरुद्ध किछु बजबालए तैयार होइत अछि । एहन व्यक्तिकेँ जराओल जाइत छैक अर्थात नाना प्रकारक कष्ट देल जाइत छैक । एकर विपरीत जे मौन भऽ गेल अर्थात मुर्दा भऽ गेल ओ विभिन्न तरहक सुख भोगैत अछि ।
उपर्युक्त हथकण्डा अपनौलाक बादो विद्रोहक ज्वाला फुटबे करैत छैक । आओर ओहि ज्वालामे केहनो तानाशाह भस्म भऽ जाइत अछि । एहन उदाहरणसँ इतिहास भरल पड़ल अछि । तें नाट्यकार हतोत्साह नहि होइत छथि । ओ एकटा बूढ़ पात्र गढ़ैत छथि जे समयकेँ घीचिकऽ अपना संग लऽ अनैत अछि । एहने वयक्तिपर तँ लोक विश्वास करैत अछि । एही विश्वासक प्रतिफल छैक जे पुरुष एक, दू, तीन आ चारि बूढ़ाक इर्दगिर्द जमा भऽ जाइत अछि । ओ सभ चित्रगुप्त आ ओकर सहयोगीकेँ अपना घेरामे लऽ लैत अछि । एहना स्थितिमे यमराज सत्तासँ कोना अलगथलग भऽ जाइत अछि तकर अनुमान सहजहिं लगाओल जा सकैछ ।
नाटकक महत्वपूर्ण श्रृंगार संघर्ष तथा द्वन्द्व अछि । ई संघर्ष तथा द्वन्द्व स्वीकृत यथार्थ आ अस्वीकृत यथार्थक बीच उत्पन्न होइत अछि । एहि स्वीकृत तथा अस्वीकृत यथार्थक संवाहक क्रमशः खलनायक तथा नायक होइत छैक । एहि दुनूक बीच घातप्रतिघात चलैत रहैत अछि । नायक चाहैत अछि जे स्वीवृmत यथार्थक स्थानपर अस्वीकृत यथार्थकेँ स्थापित करी । अतः नायक आ खलनायकक बीच संघर्ष होइत छैक । एहन संघर्ष एहि नाटकमे भरपूर देखल जाइछ । यमराज अ चित्रगुप्त सभकेँ मुर्दा बनबऽ चाहैत अछि जकर प्रतिकार बूढ़ा करैत अछि । आ, जतऽ प्रतिकार होएतैक ओतऽ संघर्ष नहि होएबाक कोनो प्रश्ने नहि उठैत छैक ।
तहिना प्रस्तुत नाटकमे द्वन्द्व सेहो प्रचुर देखल जाइछ । नाट्यकार देखबैत छथि जे सत्ता लोककेँ मुर्दा बनबैत छैक आ से गुड़क ढेप देखाकऽ अथवा डंटा देखाकऽ । मुदा किछु लोक सोचैत अछि जे एहि दुनूक विरुद्ध ठाढ़ भेल जाए । एहना स्थितिमे युवक आ पुरुष लोकनिमे भयंकर द्वन्द्व उत्पन्न होइत छैक जे नाट्यकारक सफलताक द्योतक अछि ।
कोनो रचनाक वास्ते शीर्षक एकटा महत्वपूर्ण स्थान रखैत अछि । किएक तँ शीर्षक कोनो रचनाक विषयमे बहुत किछु कहैत छैक एहि दृष्टिएँ प्रस्तुत नाटकक शीर्षक मुर्दाबहुत उपयुक्त अछि । किएक तँ मुर्दाक चर्चा प्रस्तुत नाटकमे बेरबेर आएल अछि ।
अन्तमे हम इएह कहब जे प्रबुद्ध प्रेक्षकक बीच एहि नाटकक आदर हेतै से हमरा पूर्ण विश्वास अछि । नाट्य क्षेत्रमे नाट्यकारक भविष्य उजज्वल छन्हि से हम मानैत छी ।

 
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जगदानन्द झा मनु, ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीहटोल, मधुबनी 
लघुकथा-
कमलू
पूष मास, जाड़ अपन चरम सीमापर । लगातार पन्द्रह दिनसँ शितलहरी । गामक एकटा टूटल- फूटल खोपड़ीक असोरा । जाड़सँ बचैक हेतु असोराकेँ बाँकी दुनूकात बोड़ाक ओहाड़ । एकटा पुरान टूटल-फूटल चौकीपर पुआरक ओछैन, ओहिपर करीब सत्तैर बरखक बेमार असहाय कमलु । माए-बाबू बड्ड सिनेहसँ ओकर नाम कमल रखने रहथि, मुदा अभाब आ गरीबीसँ संघर्ष करैत -करैत कमलसँ कमलुमे बदैल गेल ।
गरीबी आ बुढ़ापा ओहिपर बीमारीसँ सताएल जीर्ण-शीर्ण शरीर, अभाबक कारण अप्पन बएससँ दस बरखक बेसीएक लगैत । उपरसँ जाड़क एहन हाल । जाड़सँ कपैत लगातार खोंखी करैत । खाँसैत-खाँसैत कखनो बिचमे राहत भेटै छै तँ मुहसँ, कहु तँ करेजासँ दर्दक थकान संगे दुख मिलल आह ओकर मुहसँ निकलैत । ओहि आहसँ किन्चीत एक बेर पाथरो पिघैल जाए, मुदा कमलुक आह सुनै बला ओकर दर्दकेँ बुझै बला ओहिठाम कियोक नहि । नै कियो देखभाल करै बला आ नै कियो पुछै बला । मुदा कमलुक आह आ खोंखीकेँ शाइद एहि बातक ज्ञान नहि, तैँ तँ ओ रुकैक नाम नहि लए रहल छलै । खोंखी आओर बेसी असहनीय आ विभत्स्यए भेलजा रहल छलै ।।
खोंखीक वेककेँ सम्हालेमे असमर्थ, कमलु एकाएक अपन सम्पूर्ण बलकेँ एकठ्ठा करैत अपन दुनू हाथसँ छातीकेँ कैस कए दबाबैत बैस रहल, कि तहने ओकरा पानिक तलब महसुश भेलै । आ ओकर मुहसँ अनायास निकैल परलै -"पानि -पानि "
मुदा ! अभागा कमलु ! असहाय कमलु ! ओहिठाम ओकर बास्ते एक घूँट पानि दै बला कियोक नहि । इ बिचार कमलुकेँ मोनमे अबैत देरी ओकर मुहपर दर्द भरल व्यंगक एकटा मुस्की चमैक गेलै । जेना ओ अपन वाक्यपर पचता रहल हुए । अपन दर्दकेँ ठोरपर अनि दाँतसँ कटैत, लाठीक सहारा लैत चौकीक निच्चा राखाल पानिक लोटा लेबक लेल झुकल । बहुत संघर्सकेँ बाद लोटा उठाबैत जल्दी-जल्दी दू घोंट पानि अपन हलकमे उतारि लेलक । परञ्च पानि पीबैक बाद ओकरा लग एतेक बल नहि रहलै जे ओ लोटाकेँ फेरसँ नीँचा राखि सकै । लोटा ओकर हाथसँ छूति कए गुरैक गेलैक । लोटाक बचल पानि चारू कात नीच्चाँ बहि कए मानु कमलुक तकदीर आ एकाकीपर ठहाका लगाकए हँसैत होए ।
 
कमलु सेहो अपने खाली लोटा जकाँ चौकीपर पसैर जाइत अछि । परला बाद ओकर दहिना हाथ ओकर दुनू आँखिकेँ झैंप दै छैक । मानु अपन आँखिकेँ झाँपिक नोर नुकाबैक प्रयास कए रहल हुए । मुदा निर्लज्य नोर छैक की रुकैक केँ नामे नहि लए रहल छैक । आ ई नोर छैक, ओकर बुढ़ाड़ीकेँ ?
ओकर बीमारीकेँ ?
ओकर भूख-प्यासकेँ ?
नहि नहि नहि ।
तँ ई नोर किएक ?
केकरा लेल ?
ई नोर छैक ओकर मनोरथक हत्याकेँ । ई नोर छैक ओकर छिरयाइत सपनाकेँ, जेकरा की ओ अपन सोनीतसँ पटेने रहए । ओकर नोर छैक की रुकैक नाम नहि लए रहल छैक । मुदा मोन स्वप्नील दुनियाँक इन्द्रधनुषी अतीतमे हिलकोर मारै लगलै ।
जखन ओ उनैस बीस बरखक जबान सुन्नर युबक रहए । माए बड्ड मनोरथसँ ओकर ब्याह रचेने रहथिन । बाबू तँ कखन एहि दुनियाँसँ गेलखिन ओकरा मोनो नहि । बाबूक सभटा भार माए उठेलखिन । केखनो ओकरा बाबूक कमी नहि होबए देलखिन । ब्याह भेलै । घरमे एकता सुधड़ कनियाँ एलखिन । समय खुशी-खुशी बीतै लगलै । मुदा ब्याहक पाँच बर्ख बादो ओकर घर नेनाक जन्म नहि भेलै । कमलु दुनू व्यक्तिक तँ जे हाल, ओकर माएकेँ तँ नेनाक अभाबमे दिन काटब मुश्किल भए गेलनि । फेर शुरू भेल कोबला-पातिरक दौड़ । माँ भगवतीक मंदिरमे पातैर राखल गेल । भगवान सत्यनारायणक कथाक कोबला राखल गेल । भगवतीक इच्छासँ ओहो दिन आएल । कमलुक कनियाँ गर्भवती भेली आ नियत समयपर एकटा सुन्नर बालकक जन्म भेलै । सून घरमे बसन्तक आगमन भए गेलै । कमलु माएक तँ खुशीक मारे धरतीपर पएर नहि टिकैत छलनि । छ्ठीहार दिन समूचा गाम माछ भात खूएल गेल । सत्यनारायण भगवानक कथा कराएल गेल । माँ भगवती घरमे पातैर देल गेल । बच्चाक नाम राखल गेल, राज ! राज कमल । सम्पूर्ण वातावरण खुशीसँ गमकए लागल । जे आबए कमलुकेँ बधाइ दइत । आखिर दे किएक नहि ? सात बर्खक बाद जे बाप बनल रहए ।
माँ भगवतीक माया जखन नहि देबक रहनि नहि देलखिन । देबए लगलखिन तँ एककेँ बाद एकटा, कमलु चारिटा पुत्रक पिता बनल । घर गृहस्थी खुशी-खुशी चलए लगलै । एहि बीच कमलुक नोकरी सेहो लागि गेलै । आर्थिक चिन्ताक समाधान सेहो भए गेलै । चारू बेटाकेँ यथासामर्थ नीकसँ शिक्षा दिएलक । समयकेँ काल चक्रमे, कमलुक माए अपन जीवनक सम्पूर्ण सुख भोगि स्वर्ग चलि गेली ।
 
देखतए-देखतए कमलुक चारू पुत्र युवा भेल । ओकरो सभहक घर बसबक समय आबि गेल । नीक लोक-बेद देख कए चारू बेटाक ब्याह केलक । कमलुक घर पोता-पोतीसँ भरि गेल । भरल-पुरल घर देखब शाइद नीयतिकेँ मंजूर नहि । अथबा कमलुक भागमे एहिसँ आगाँक सुख भोगब नहि लिखल रहै । आथिक युग आ परिबारक बोझसँ लदल, कमलुक चारू बेटा एक एक कए रोजी रोजगारक खोजमे ओकरा लगसँ दूर होति गेलै । चारू बेटा अपन-अपन परिबारक संगे शहरमे बसि गेल । रहि गेल कमलु आ ओकर संग देबैक लेल ओकर अर्धांगिनी, पत्नी ओकर चारू पुत्रक माए । जेना-तेना दुनू प्राणीक जीवन चलैत रहए । परञ्च केखन तक ? जेना भोरक बाद साँझ होइत छैक, प्रतेक शुरुआतक अन्त होइत छैक, ओनाहिते प्रतेक जीवनक मृत्यु । कमलुक कनियाँ सेहो जीवनसँ लडैत लडैत कमलुक संग नै दए पेली आ एक दिन कमलुकेँ छोरि स्वर्ग लोक चलि गेली । आब कमलु निदान्त असगर रहि गेल ।
आधा तँ कमलु ओहि दिन मरि गेल । बाँकी जीवन जे शेष रहै ओहिसँ निकैल कए अपन अतीतमे हरा गेल छल । मुदा नै जनि कखन ओ अपन अतीतक दुनियाँसँ नीकैल गेल रहए । अथबा कखन निकालि देल गेल रहए, बिधाताक हाथसँ । नोर सुखा कए ओकर गालपर पपड़ी जैम गेल रहै । दुनू आँखि खुजल । ओहे खुजल आँखिसँ अपन अतीतकेँ निहाईर रहल छल, कमलु । आओर ओहे खुजल आँखि आब शाइद केकरो बाट देख रहल छैक । शाइद अपन बेटा सभक ।
अगिला भोरे, गामक किछु लोक एकटा अर्थीकेँ उठेने जा रहल छलै ।
 
"राम नाम सत्य छै, सभक इहे गत छै ।"
 
"राम नाम सत्य छै, सभक इहे गत छै ।"
 
रस्तामे एककात ठार एकटा शहरी युबक, जेकी अर्थी देख कए रुकि गेल रहए । लग एला बाद ओहिमे सँ केकरोसँ पूछैत छै - "के छथि भाई "
ओकर उत्तरमे गामक एकटा लोक बजैत छथि, जे की ओहि शहरी युबककेँ नहि चिन्हैत छथि - "छथि कतए, कहियौंह छलथि । छलथि हमरे गामक एकता अभागल, चारि-चारिटा बेटाक बाप रहितो, असगर । बेचारा ! अभाब एवं बेमारीसँ असगरे लडैत-लडैत मरि गेला । आब मुखाग्नीयो देबैक हेतु अप्पन कियोक नहि, सभ अपने-अपनेमे व्यस्त । कमलु नाम छलनि हिनकर ।"
"कमलु"
कमलु नाम सुनैत देरी ओ शहरी युबक जोर-जोरसँ दहाड़ि मारि-मारि कए कनए लागल । ओकर कनैक कोनो पार नहि । ओकर करून रुदनमे एतेक दर्द रहै कि ओकरासँ सभकेँ सहानुभूति भए गेलै ।
"किए भाई अपने किएक एतेक कानै लगलौं ।"
 
"अरे ! हम अभागल नहि कानब तँ आओर के कानत ।" ई कहैत ओ अपन जेबीसँ एकटा टेलीग्राम निकाइल कए देखेलकै जे कोनो ग्रामीण द्वारा कमलुक बेटा राजकमलकेँ कमलुक बीमारीक खबर लेल लिखल गेल रहै ।

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नवेंदु कुमार झा- मिथिला आ मैथिली बॅटबाक भऽ रहल साजि/ ई गवर्नेंस दिस सरकार बढ़ौलक डेंग

मिथिला आ मैथिली बॅटबाक भऽ रहल साजि
मिथिलांचलक मातृभाषा मैथिलीक प्रति मैथिलीभाषी सभक उदास रवैयाक कारण आब ऐ भाषा पर संकटक मेघ उभरि रहल अछि। संविधानक अष्टम् अनुसूची मे सम्मिलित प्रदेशक एकमात्र ऐ भाषा केँ कमजोर करबाक साजिश राजनेता आ किछु साहित्यिक विद्वान कऽ रहल छथि। एक दिस बज्जिका तऽ दोसर दिस अंगिकाक नाम पर ऐ भाषा भाषी केँ तोड़बाक साजिश भऽ रहल अछि तँ दोसर दिस सीमांचल आ सुरजापुरी आदिक नारा दऽ मिथिलांचल केँ तोड़बाक प्रयास भऽ रहल अछि। बज्जिका आ अंगिका केँ मैथिलीभाषी स्वीकार कएने छथि मुदा किछु लोक अपन राजनीति आ विद्यता केँ स्थापित करबाक लेल अपन मातृभाषा मैथिलीक विरोध मे ठाढ़ भऽ मिथिला आ मैथिली विरोधक काज आसान कऽ रहल छथि। किछु दिन पहिने मुजफ्फरपुर आ वैशालीक क्षेत्र मे बज्जिकांचल आ बज्जिका भाषाक लऽ कऽ आंदोलन चलल छल जे एखन शांत पड़ल अछि तऽ एखन भागलपुरक क्षेत्रमे अंगिकाक नाम पर आंदोलन चलि रहल अछि। अंगिकाकँे संवैधानिक मान्यताक लऽ कऽ पटनामे सेहो आंदोलनक योजना अछि।
दरअसल जहिना भारत केँ अपन देशक लोकसॅ खतरा अछि तहिना मिथिला आ मैथिलीकेँ अपन लोकसॅ खतरा अछि। वर्तमानमे अंगिकाक नाम पर चलि रहल आंदोलनकेँ सेहो मैथिली समर्थक होयबाक दाबा करएबला राज्य सरकारक एक मंत्रीक परोक्ष समर्थन भेटि रहल अछि। मैथिली आ अंगिकाक नामपर मैथिलीभाषीकेँ लड़ा अपन राजनीतिक रोटी सेकऽमे मंत्री लागल छथि। ताज्जूब तऽ ई अछि जे मंत्री जीक ऐ साजिशक बादो हुनकर मिथिला आ मैथिली विरोधी बात केँ लोक ग्रहण करैत छथि। कहल जाइत अछि जे दू कोस पर भाषा बदलि जाइत अछि। ई भाषाक बदली नै होइत अछि अपितु स्थानीय बोलीक रूप भाषाक परिवर्तन होइत अछि। मधुबनीसॅ किशनगंज धरि शिवहरसॅ वैशाली धरि आ बरौनी सॅ मधेपुरा धरि सभ ठामक लोक मैथिली भाषी छथि। अंतर मात्र एतबा अछि जे ऐ भाषाक बोली मे अंतर होइत अछि। ई अंतर तऽ दरभंगा जिलाक समस्तीपुर आ मुजफ्फरपुर जिलाक सटल सीमाक गाम मे सेहो अछि। एकर मतलब ई नै अछि जे ई मैथिली भाषासॅ फराक भाषा अछि।
कहल जाइत अछि जे कमजोरहाक कतेको मालिक होइत अछि आ सभ अपना-अपना हिसाब सॅ मलिकौत करैत अछि। ई मिथिला आ मैथिली पर लागू भऽ रहल अछि। अपन विद्वता मे फूलल मैथिलीक विद्वानकेँ भाषाक विखंडनक भऽ रहल साजिशसँ बचैबाक फुर्सत नै छनि। मात्र साहित्य अकादमी आ आन पुरस्कारक लेल वर्ष भरि चिरौरी मे लागल रहल ई विद्वान सभ अपन हित मे मातृभाषाक हित बिसरि रहल छथि। जइ कारण क्षुद्र राजनेता आ तथाकथित विद्वान मिथिला आ मैथिली केँ कमजोर करबाक गहींर साजिश कऽ रहल छथि आ हमरा सभ कानमे तुर धऽ सूतल छी। एक दिस मातृभाषापर हमला तऽ दोसर मातृभाषाक अस्तित्व मिटैबाक साजिश भऽ रहल अछि। मिथिलांचलक कोसी क्षेत्र मे सीमांचल आ सुरजापुरी कऽ नाम वोटक राजनीतिक लेल मिथ्लिांचलक सामाजिक, सांस्कृतिक पहचान केँ मेटैबाक साजिश भऽ रहल अछि। आब समय सचेत होयबाक अछि। मातृभाषा आ मातृभूमिक पीठ मे छुरा घोपऽ बला असली चेहरा सोझा आनऽ पड़त नै तऽ मिथिलाक माछ जकां मातृभूमि आ मातृभाषाक अस्तित्व मेटा देल जाएत। अंगिका, बज्जिका, सीमांचल सूरजापुरी आदिक नामपर मिथिलांचल आ मैथिलीक विरूद्ध साजिश हएत तँ रहत ऐतिहासिक मिथिला आ मृदुभाषा मैथिली?

ई गवर्नेंस दिस सरकार बढ़ौलक डेग
बिहार ई-गर्वनेंस केँ मजगूत करबामे लागल अछि। सरकार प्रदेश मे कम्प्युटरीकरण केँ बढ़ावा दऽ रहल अछि। सरकारक मानौत अछि जे कम्प्युटरीकरणसॅ काजक गति बढ़त आ भ्रष्टाचार पर लगाम लगबऽ मे सेहो मदति भेटत। ऐ दिशा मे पहिल डेग उठबैत बिहार सरकार सभ पैघ निविदा इलेक्ट्रानिक माध्यमसॅ आमंत्रित करबाक निर्णय लेलक अछि। संगहि सरकार सरकारी कार्यालय केँ पूरा तरहें कम्प्युटरीकृत करबाक निर्णय लेलक अछि। एखन 25 लाख सॅ बेसीक निविदा ई टेनडरिंगक माध्यमसॅ कयल जा रहल अछि। अगिला किछु वर्षमे एकर सीमा घटा कऽ तीन लाख धरि करबाक योजना अछि। ऐसॅ भ्रष्टाचारपर लगाम लगैबा मे तऽ मदति भेटबे करत। ठीकेदार सभ केँ सेहो ई-पेमेन्टक माध्यमसॅ भोगतान करबाक निर्णय लेल गेल अछि।
राज्य सरकार आब अपन कार्यालयक सेहो पूरा तरहे कम्प्युटरीकरण करबाक निर्णय लैत ऐ दिस तेजी सॅ डेंग उठौलक अछि। एकर अंतर्गत राज्य सरकार अपन कर्मचारी सभ केँ कम्प्युटरक प्रशिक्षण कार्यक्रम चला रहल अछि। सरकारक योजना एकरा प्रशासनक निचला स्तर धरि लऽ जयबाक अछि। पंचायत सभ केँ सेहो कम्प्युटरसॅ जोड़बाक योजना बनाओल गेल अछि। एकर अंतर्गत आब सभ पंचायतकेँ इलेक्ट्रानिक माध्यमसॅ भुगतान करबाक निर्णय लेल गेल अछि। केन्द्र सरकारसॅ टाका भेटलाक बाद सात दिनक भीतर ई टाका सीधा पंचायतक खातामे पठा देल जाएत। संगहि सरकार सभ कर्मचारी आ पेंशनधारीक खाता मे पठा देल जाएत। संगहि सरकार सभ कर्मचारी आ पेंशनधारीक नव डाटाबेस बनैबाक निर्णय लेलक अछि जे अगिला छओ मास मे तैयार भऽ जाएत। एकर बाद हुनक भुगतान खाताक माध्यमसॅ भऽ जाएत।
उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी जनौलनि अछि जे काजक गति बढ़ाएब आ भ्रष्टाचार पर लगाम लगैबाक लेल सरकार कम्प्युटरीकरणकेँ बढ़ा रहल अछि। ऐ दिस पहिल डेग ई-टेंडरिंगक उठाओल गेल अछि। जल्दीए सभ सरकारी कार्यालयक कम्प्युटरीकरण करबाक निर्णय लेल गेल अछि आ पंचायत सभ केँ सेहो कम्प्युटरीकरणक माध्यम सॅ जोड़बाक निर्णय लेल गेल अछि। ऐ लेल कर्मचारी सभक लेल प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाओल जा रहल अछि।
  
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३. पद्य









३.७.१.कैलाश दास- नेता जी २. प्रबीण चौधरी प्रतीक३.सत्यनारायण झा-हे भगवान 

३.८.बिन्देश्वर ठाकुर- अभागलमे शुभकामना एक/अस्पतालक हाल/ जनकपुरक रेल्वे/ एक एहनो नारी/गजल
जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल
की भेटल आ की हेरा गेल  (आत्म गीत)- (आगाँ)

हमरहु जीवनकेर उत्सवमे
छल श्रीरामक अवतरण भेल
हमरहु अन्तरकेर सीताकेर
जंगलमे छल अपहरण भेल

आ हमरहु हाथें रावणकेर
दसटा मूडी छल कटा गेल,
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ की हेरा गेल ।

सोचै छी पिता, पितामह सब
हमरा संग एखनहु छथि जिबइत
हम देखि रहल छी अपनामे
सभकें चलइत, हंसइत-गबइत
आइ,काल्हि,परसू सभटा
अपनहि अन्तरमे समा गेल,
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ की हेरा गेल ।

जीवनकें पढलहुं बेर-बेर
जीवनकें गुणलहुं बेर-बेर
जीवनकें देखलहुं बेर-बेर
जीवनकें भोगलहुं बेर-बेर

स्वर्ग, नर्क जिबितहिं सभटा
अपनहि जीवनमे देखा गेल,
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ की हेरा गेल ।

नहि बूझी जीवन केर मतलब
ओहिना जीने चल जाइत छी
नहि जानि पियास हटत कहिया
ओहिना पीने चल जाइत छी

सभ विष शिवशंकर के समान
जे जखन जतए अछि देखा गेल,
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ की हेरा गेल ।

हम जाहि सुखक कामना करी
से दुखमे होइछ परिवर्तित
मुश्किल अछि झंझाबातहुमे
राखब अपनाकें आनन्दित

अपनहि अन्तरमे बैसल क्यो
गीताक पाठ अछि पढा गेल,
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ की हेरा गेल ।

अपनहि हाथें हम छी लिखइत
सौभाग्य अपन,दुर्भाग्य अपन
अपनहि हस्ताक्षर देखै छी
पाछां तकइत छी जखन-जखन
हं, किछु हस्ताक्षर एहनो अछि
जे अछि लेभरल वा मेटा गेल,
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ की हेरा गेल ।
(क्रमशः)


 
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जगदीश प्रसाद मण्‍डल
किछु गीत

१.    गाछक रंग बदलि     .....................
२.    मुँहक हँसी केहेन      .....................
३.    झोंक जुआनी झोंकए   .....................
४.    बैसले-बैसल नाचि     .....................
५.    गुमकीमे बौआए       .....................
६.    भूत बनि‍ भुति‍आएल    .....................
७.    सुखले मे सभ       .....................
८.    दीनक दि‍न केना      .....................
९.    कोढ़ पकड़ि‍         .....................
१०. जाल समाज        .....................
११. मीत यौ, देहक पानि‍ .....................
१२. आश प्रेम संग       .....................
१३. वि‍षय दस         .....................
१४. धर्मक फूल        .....................
१५. कि‍छु ने करै छी     .....................
१६. अपने पाछू         .....................
१७. उठी-बैसी          .....................
१८. गर-मुड़           .....................
१९. मनक बेथा         .....................
२०. रहल नै           .....................
२१. पकड़ि‍ समए        .....................
२२. सतरंग ऐ          .....................
२३. दुनि‍याँक जेहने      .....................
२४. चढ़ि‍ अन्‍हार        .....................
२५. एक ि‍वष......      .....................
२६. पेटक ताप         .....................
२७. जेहन मुँह         .....................
२८. धार संग नाह       .....................
२९. मन मशीन         .....................
३०. खट-मीठ          .....................
३१. झोंकमे           .....................
३२. पबि‍ते पैग         .....................
३३. हेल-मेल जाधरि      .....................
३४. कौशल जखन       .....................
३५. उमकीमे उमकि      .....................
३६. जि‍नगीक कुन्‍ज      .....................
३७. सत-चि‍त          .....................
३८. पड़ि‍ते पएर        .....................
३९. अहाँ कि‍अए        .....................
४०. घट-घट घोंट       .....................
४१. जहि‍ना बारह        .....................
४२. दुनि‍याँ घोड़ाएल      .....................
४३. बहलि‍ बहील        .....................
४४. हलचल जि‍नगी      .....................
४५. टकटक ताक       .....................
४६. भीख मांगि         .....................
४७. बकरी खुट्टी        .....................
४८. अमरा अँचार       .....................
४९. घरे-घरे           .....................
५०. बेटी कि‍अए        .....................
५१. मनक भाव         .....................
५२. ि‍सरजन सि‍र       .....................
५३. दूधक भूखल       .....................
५४. संगे-संग           .....................
५५. चोटी छुबै         .....................
५६. खेल-खेलाड़ी        .....................
५७. ककोड़बा          .....................
५८. सोर बनि          .....................
५९. सेज-सिंगार         .....................
६०. जएह लूरि         .....................
६१. जोति‍ हर          .....................
६२. हर हलक         .....................
६३. हि‍म-गि‍रि          .....................
६४. भुवन भूचलि        .....................
६५. खुजि‍ते आँखि       .....................
६६. मुड़जन मनुहर       .....................
६७. गोधूलि‍-बेल         .....................
६८. दौड़ि‍-दौड़          .....................
६९. चोट-चाट          .....................
७०. चाइन चेन         .....................
७१. दीनक दोख        .....................
७२. सगर समनदर       .....................
७३. चप-चप           .....................
७४. मारी-बेमारी         .....................  
   






गाछक रंग बदलि......

गाछक रंग बदलि‍ रहल छै
मौसम संग सुधरि‍ रहल छै।

थल-कमल जकाँ कहि‍यो
गाढ़-लाल-उज्‍जर बनै छै।
तहि‍ना फूल-फल कोढ़ि‍ जकाँ
झरि-झरि‍ कोनो फलो बनै छै‍।
गाछक रंग बदलि‍ रहल छै
मौसम संग.......।

आशा आश लगा-लगा
जीत अपराजि‍त बनैत रहै छै।
सुधरि‍ रूप बदलि‍ चालि‍
कारी काजर चमकि‍ उठै छै।
गाछक रंग बदलि‍ रहल छै
मौसम संग.......।

लत्ती पानि‍ रूप बदलि‍
थल-कमल बनैत रहै छै
तहि‍ना लत्ती अपराजि‍त
गाछ बनि‍ गछाड़ि‍ धड़ै छै।
गाछक रंग बदलि‍ रहल छै
मौसम संग.......।



मुँहक हँसी केहेन......

मुँहक हँसी केहेन अबै छै
ठोरक रूप देखैत चलू।
छाती केना दलकि‍ रहल छै
सूर-तान भजैत चलू।
मुँहक हँसी केहेन अबै छै
ठोरक रूप.......।

जि‍नगी जेकर जेहेन रहै छै
छाती तेहने तेकर बनै छै।
हलसि‍-कलशि‍ कहैत रहै छै
एेना पारदर्शी बनैत रहै छै।
मुँहक हँसी केहेन अबै छै
ठोरक रूप.......।

जखने पालि‍स शीशा लगतै
झल अन्‍हार बनि‍ते रहतै।
झल अन्‍हार अन्‍हार बदलि‍
एक्कभग्‍गु बनि‍ शीशा रहतै।
मुँहक हँसी केहेन अबै छै
ठोरक रूप.......।

देखि‍-देखि ओ सुनि‍-सुनि कऽ
‍‍हँसैत डेग उठबैत चलू।
मुँहक हँसी केहेन अबै छै
ठोरक रूप.......।



झोंक जुआनी झोंकए......

झोंक जुआनी झोंकए लगै छै
उष्‍मा पाबि‍ उमसए लगै छै।
झोंक जुआनी.......।

जाधरि‍ सि‍र सृजै शि‍शि‍र छै
हार-मासु सि‍हरैत रहै छै।
सुनि‍ते कोइली कुहुकि‍ वसंती
भनभनाइत मन तनतनाए लगै छै।
झोंक जुआनी.........।

रंग-वि‍रंगक वन-उपवनमे
रंग-रंगक फूल फॅुलए लगै छै
पाबि‍ रस मधुमाछी सि‍रजए
कोनो बि‍ख चुभकैत रहै छै।
झोंक जुआनी.......।



बैसले-बैसल नाचि......

बैसले-बैसल नाचि‍ रहल छै
गुड़-चाउर मन फाँकि‍ रहल छै।
सि‍सकैत-सि‍हरैत कतौ देखि‍
संग मि‍लि‍ कऽ कानि‍ रहल छै
बैसले-बैसल.......।

उफनैत-उधि‍याइत धार देखि‍
संग मि‍लि‍ कऽ दाबि‍ रहल छै।
घट-घट घाट बना-बना
धार-वि‍चार बहा रहल छै।
बैसले-बैसल.........।


गुमकीमे बौआए......

गुमकीमे बौआए रहल छी
औल-बौल टौआए रहल छी।
गुमकीमे..........।

घाम-पसि‍ना बहि‍ रहल छै
आश-ि‍नराश चलि‍ रहल छै।
धक्कम-धुक्कम चलि‍ रहल छै
औलाइत-बौलाइत मन कहै छै।
गुमकीमे..........।

कखनो अन्‍हर-बि‍हारि‍ देखै छी
झाँट-पानि‍ बि‍च पड़ए लगै छी।
गुमकीमे............।





भूत बनि‍ भुति‍आएल......

भूत बनि‍ भुति‍आएल छी
मि‍त यौ बनि भूत भुति‍आएल छी।

संगे-संग जगलौं
संगे-संग उठलौं
संगे-संग चालि‍ चलि‍
संगे रहि‍ हराएल छी।
संगि‍या मरि‍ गेल
हम भुति‍आएल छी।

केकरा कहबै भूत भवि‍ष्‍य
वर्त्तमान छि‍ड़ि‍आएल छै।
रग्गर बि‍च फक्कर बनि‍
लाजे-पड़ाएल छै
भूत बनि‍ भुति‍आएल छै
बनि‍ भूत भुति‍अाएल छै।



सुखले मे सभ......

सुखले मे सभ पि‍छड़ि‍ रहल छै
मुँह-कान सभ तोड़ि‍ रहल छै।

सूखल जानि‍ जतए पएर रोपै छै
काह-कूह सभ ततए जमल छै।
सुखले मे सभ.....।

सूखल धरती जतए पड़ल छै
झल-फल नजरि‍ ततए जाइ छै।
सुखले मे सभ......।

अन्‍हर-जाल फरि‍च्‍छ मानि‍ कऽ
भोर-भुरुकबा सूर्य बुझै छै।
सुखले मे सभ......।



दीनक दि‍न केना......

दीनक दि‍न केना कऽ चढ़तै
मन कहाँ कहि‍यो मानै छै।
रतुके काजे दि‍नो गमा कऽ ‍
बढ़ती कहाँ तानि‍ पबै छै।
दीनक दि‍न केना.....।

बि‍नु तनने घोकचि‍-मोकचि‍ जौं
जाड़ माघ अबैत रहै छै।
चैतक चेत चेतौनी ओहि‍ना‍
सि‍र जेठ धड़ैत रहै छै।
दीनक दि‍न केना.....।

तीन जेठ एगारहम माघ
तीनू लोक देखैत सुनै छै।
देह-पसेना सुरकि‍ चाटि‍ कऽ
माघे ने माघो कहबै छै।
दीनक ि‍दन केना.....।



कोढ़ पकड़ि‍......

कोढ़ पकड़ि‍ कोढ़ी कहै छै
कोंढ़ि‍या कोढ़ पकड़ने छै।

केना कऽ फड़बै-फुलेबै
रेहे-देह पकड़ने छै।
कोढ़ पकड़ि‍.....।

देखलोसँ नहि‍ देखि‍ पड़ै छै
सुनलोसँ नहि‍ सुनि‍ पबै छै।
टीश-पीड़ा टीशा पीड़ा
मन घोर-घोर बनौने छै।
कोढ़ पकड़ि‍.....।

नहि‍ कहि‍यो फड़बै-फुलेबै
झखि‍-झखि‍ आशा तोड़ने छै।
सकारथ भऽ अकारथ बनि‍-बनि‍
दि‍न-राति‍ अन्याय करै छै।
कोढ़ पकड़ि‍.....।



जाल समाज......

जाल समाज महजाल बनल छै
हाना बनि‍ परि‍वार सजल छै।
जाल समाज महजाल बनल छै।

बि‍नु नाप हाना बनल छै
हाना मध्‍य खाना सजल छै।
हाना बूझि‍ खाना लपकि‍
खानामे जा-जा फँसै छै।
मीत यौ, जाल समाज.....।

जान गमाएब खेल खेलि‍
बचैक नहि‍ उपाए करै छै
ऊपर कूदि‍-कूदि‍ फानि‍ चाहि‍
गोरि‍या-गोरि‍या गुहारि‍ करै छै।
मीत यौ, जाल समाज.....।



मीत यौ, देहक पानि‍.......

मीत यौ, देहक पानि‍ तखन फुलाइ छै
कोढ़ी बनि‍ काज रूप लगै छै।
देहक पानि‍ तखन फुलाइ छै।

कोढ़ि‍ये ने फुलो-फड़ो संग
बाँहि‍ पकड़ि‍ संकल्‍प कुदै छै।
देहक पानि‍.....।

जाधरि‍ मन संकल्‍पि‍त नहि‍
ताबे केना उद्देश्‍य कहबै छै
संकल्‍पे ने तन-मन बीच
सीमा दइत डेग बढ़बै छै।
मीत यौ, देहक पानि‍.....।

काम-धाम जहि‍ना बनै छै
तहि‍ना ने कर्मो-धर्म कहबै छै
धर्मे ने धारण करैत
पथ-पानि‍ चढ़बैत चलै छै।
मीत यौ, देहक पानि.....।



आश प्रेम संग......

आश प्रेम संग झूि‍म रहल छै
लाल टमाटर बाजि‍ रहल छै।
आश प्रेम......।

वन बीच सन्‍यासी जहि‍ना
झींक दऽ दऽ जात नचबै छै।
नि‍आस कहाँ छोड़ि‍ संग
चि‍क्कस बनि‍-बनि‍ भूमि‍ भरै छै।
आश प्रेम......।

लाल टमाटर बनि‍ सन्‍यासी
खटमीठ रूप धड़ैत रहै छै।
नै मीठ तँ खट्टो नहि‍येँ
अपन नाओं सुनबैत कहै छै।
आश प्रेम......।

गीत गीता गाबि‍ सन्‍यासी
भगवत भजन करैत रहै छै।
सबूर पाबि‍ सबर सबरी
मरि‍तो राम एबे करै छै।
आश प्रेम संग......।



वि‍षय दस......

वि‍षय दस ि‍सलेबस प्रवेश
दसो दि‍शा देखैत रहै छै।
त्रि‍भूज-ज्‍यमि‍ति‍ तहि‍ना
गीत व्‍यास गबैत रहै छै।
वि‍षय दस......।

सून अप्‍पन हि‍स्‍सा कहि‍-कहि‍
ठेहुन रोपि‍ अड़ल रहै छै।
अंकसँ हि‍साबो तहि‍ना
रथ जि‍नगी घि‍‍चैत चलै छै।
रथ जि‍नगी......।

आगू भलहि‍ं काटि‍-छाँटि‍
घटबी घाट बढ़ैत चलै छै।
होइत-हबाइत धकि‍या-धुकि‍या
हि‍स्‍सा अपन कहबैत चलै छै।
हि‍स्‍सा अपन.....।



धर्मक फूल......

धर्मक फूल फुलेबे करतै
बनि‍ फुलबाड़ी सजबे करतै
धर्मक फूल......।

सान धार बनबे करतै
काम-धाम बनबे करतै।
भीड़-कुभीड़ धाम बीच
असंख्‍य-शंख उठबे करतै।
धर्मक फूल......।

धड़ घनेरो धार घनेरो
रूप कृष्‍ण कहबे करतै
बान पकड़ि‍ वाणी बदलि‍
ि‍नसाँस-साँस भरबे करतै।
बनि‍ फुलबाड़ी सजबे करतै।
धर्मक फूल......।

सहस्र नाओं बनि‍-बनि‍
माला जप होइते रहतै।
कुरू-पाण्‍डु बीच सदएसँ
नाद-शंख बजबे करते।
नाद-शंख बजबे करतै।
हे यौ मीत,
धर्मक फूल......।





कि‍छु ने करै छी......

कि‍छु ने करै छी, मीत यौ
कि‍छु ने करै छी।
मीत यौ कि‍छु ने करै छी।

गेड़ू-चौक मारि‍ गनगुआरि‍ बनि‍
दि‍न-राति‍ रमल रहै छी।
मीत यौ......।

जरि‍-मरि‍ गेल मन-कामना
समए संगम संग रमल छी
मीत यौ......।

बोनक बाट आगू छै
उत्तरे-दछि‍ने धार बहल छै
घटि‍-घटि‍ घटि‍या घाट बनि‍
घोंटे-घोट पीबैत रहै छी
मीत यौ......।

ससरि‍-ससरि‍ ससरति‍ रहै छी
गाछ उतरि‍ धरती पकड़ि‍
लछमी-नाग कहबैत रहै छी
मीत यौ......।



अपने पाछू......

अपने पाछू बौआइत रहै छी
मीत यौ, अपने पाछू बौआइत रहै छी।
दि‍न-राति‍ ढहनाइत रहै छी
राति‍-दि‍न गनहाइत रहै छी
मीत यौ, अपने पाछू......।

पछुआ बनि‍ पछुआर पहुँचि‍ते
पेट-पीठ, पाँजर देखै छी
हड्डी छाती छि‍टैक‍-सि‍सैक
पौंखड़ा बनि‍ सूर-तान भरै छी
पौंखड़ा बनि‍ सूर-तान भरै छी
मीत यौ, अपने पाछू......।

जूआ-जुआ, जूआ-जुआ
नांगड़ि‍ ऐँठि‍ चलैत रहै छी
लादक ऊपर लादि‍-लादि‍
टूटि‍-टूटि‍ गीरह बनैत रहै छी
मीत यौ, अपने पाछू......।

अपना के अप्‍पन बूझि‍-बूझि‍
अपने पाछू ओझराएल रहै छी
अपनापन भाव बि‍नु बुझि‍तो
अगुआर-पछुआर नाचि‍ रहल छी।
मीत यौ, अपने पाछू......।



उठी-बैसी......

हमर तेही मे नाम, हमर तेही मे नाम।
हमरा उठलेसँ काम, हमर बैसलेसँ काम
हमर तेहीमे नाम......।

उठी लेब कि‍ बैठी, बाजू-बाजू धड़-धड़ाम
उठी लऽ जँ बैसब, आ कि‍ बैठी लऽ जँ उठब
छुबि‍ते भरब पद पराम
हमर तेहीमे नाम, हमर तेहीमे काम।

खेल खेलाड़ी खेलि‍ खेल
बाल-बोध लि‍खबै छै नाम
खेल जि‍नगीक खेला-खेला
मृत-अमृत पाबि‍ सूरधाम।
हमर तेहीमे नाम हमर तेहीमे काम
हमरा उठले से काम, हमरा बैसले सँ काम।



गर-मुड़......

गर-मुड़ बोझ बनल छै
मीत यौ, गर-मुड़ बोझ बनल छै।
पाबि‍ धार साबे जेना
बाणि‍क बानि‍ धड़ैत रहै छै
कोमल-कि‍सलय कि‍छु ने बूझि‍
पछुआ रूप धड़ैत रहै छै।
गर-मुड़.......।

तहक-तह तहि‍या-तहि‍यासँ
छल-छल छल्‍ली बनैत रहै छै
समटनि‍हार संगी जेहेन-जहि‍या
तेहने तेहेन बोझ बनै छै।
गर-मुड़.......।

गर-मुड़ाह ठनि‍-बनि‍-बनि‍
गर-मुड़ाह चालि‍ चलै छै।
गर-मुड़ाह गीत गाबि‍-गाबि‍
चालि‍ कोइली चलै छै।
चालि‍ कोइली चलै छै।
गर-मुड़.......।




मनक बेथा......

मनक बेथा कहब केकरा, हे बहि‍ना
सभ दि‍नसँ होइते एलै।

बनि‍-बनि‍ बेथा कथा बनि‍-बनि‍
मरण-करण  बनैत एलै।
मृत-अमृत रगड़ि‍-रगड़ि‍
दीन राति‍ कहैत एलै।
मनक बेथा......।

खेरहा बनि‍-बनि‍ कथा-पि‍हानी
राति‍-दि‍न भूकैत एलै।
पेट वायु जहि‍ना भूकै छै
खरही खेरहा कहैत एलै।
मनक बेथा......।

मोटा तर देह थकुचा-थकुचा
पाड़ि‍ ठोह कनैत एलै।
कुहरि‍-कुहरि‍ कानि‍-कानि‍
आदि‍येसँ कहैत एलै।
मनक बेथा......।


रहल नै......

रहल नै तकनि‍हार मीत यौ
नै रहल तकनाहार।
तकति‍यान अपने सि‍र चढ़ि‍-मढ़ि‍
रहल नै देखि‍नि‍हार, मीत यौ
रहल नै......।

रहल सभ दि‍न ताक तकैमे
धाक अपन पकड़ैपर।
जमि‍ते धाक धकेल-धकेल
ठेल खसाओल धरतीपर।
मीत यौ, ठेल खसाओल धरतीपर
रहल नै......।

हेरि‍-हेर, हरणि‍ हरण
अबैत रहल बनि‍-बनि‍ अन्‍हार
घेरा-घेरि‍ मछार बान्हि‍-बान्‍हि
पटकि‍ बैस छातीपर।
मीत यौ, पटकि‍ बैस छातीपर।
रहल नै......।


पकड़ि‍ समए......

पकड़ि‍ समए संकल्‍प नै ठानब
गति‍ कर्म पेबै केना?
बि‍नु बूझल बि‍नु बूलि‍ बटोही
घन-सघन बुझैत जेना।
पकड़ि‍ समए......।

ओर-छोड़ पकड़ि‍-पकड़ि‍
काम-कर्म पहुँचै जेना छै
संग श्रम-समए मि‍लि‍ तहि‍ना
सुफल-फल पाबै तेना छै।
पकड़ि‍ समए......।

बीच संगम श्रम ओ समए
खुशी-खुश खुशि‍आइ जेना छै
पाबि‍ संग संकल्‍प तहि‍ना
धर्म-कर्म सि‍रजैत चलै छै।
पकड़ि‍ समए......।

गनगनाइत कर्म गमगमाइत तहि‍ना
सागर-झील टपबे करै छै।
झील-झि‍लहोरि‍ सरोवर तहि‍ना
जि‍नगीक सान चढ़बे करै छै।
पकड़ि‍ समए......।



सतरंग ऐ......

सतरंग ऐ संसारमे
समरस रंग धड़ैत रहै छै।
धार-कोन अन्‍हार-बि‍हाड़ि‍
राति‍-दि‍न पेबैत रहै छै।
सतरंग ऐ......।

कहि‍ सुलक्षण बनि‍ कुलक्षण
घटि‍या घाट घटैत रहै छै।
जुआ जोति‍ पछुआ पकड़ि‍
दब-उनार करैत रहै छै।
सतरंग ऐ......।

सि‍नेह सि‍नेहि‍ल सहरि‍-बहटि‍
गारा-जोड़ करैत रहै छै।
ि‍सरजमान होइए जतए
काँट-गुलाब हँसैत रहै छै।
सतरंग ऐ......।

संग मि‍लि‍ मधुर डंक जेना
सूर-तान भरैत रहै छै।
रानी-बीच मधुरानी तहि‍ना
पान मधु करबैत रहै छै।
सतरंग ऐ......।




दुनि‍याँक जेहने......

दुनि‍याँक जेहने मंच मंचबै,
तेहने ने रंगमंचो बनै छै।
पात्र बनि‍ जेहेन पाट खेलबै
देखि‍नि‍हारो तेहने देखै छै।
दुनि‍याँक जेहने......।

चाहै सभ छै चैन चीत
दुख-भुख दुनि‍याँ सेहो कहै छै।
सुख सुखाएल सूतल-पड़ल
सि‍र संजीवनी भेटै कहाँ छै।
सि‍र संजीवनी......।
दुनि‍याँक जेहने......।

हरि‍ अनंत हरि‍ कथा अनंता
हँसि‍ गीत भागवत गबै छै।
हेरि‍ शक्‍ति‍ शक्‍ति‍ हरीक
बाघ चढ़ि‍ भगवती कहै छै।
बाघ चढ़ि‍......।
दुनि‍याँक जेहने......।



चढ़ि‍ अन्‍हार......

चढ़ि‍ अन्‍हार पख भरि‍-भरि‍
अमवसि‍या कहबैत अबै छै।
तहि‍ना ने इजोरो बढ़ि‍-बढ़ि‍
मास पूब कहबैत चलै छै।
चढ़ि‍ अन्‍हार......।

काटि‍ इजोर कपचि‍-सपचि‍
पून प्रकाश पाबैत कहै छै।
खेल जि‍नगीक खेलाड़ी
चढ़ि‍-चढ़ि‍ रंगमंच कहै छै।
चढ़ि‍-चढ़ि‍......।

जस-जसोदा भेद बि‍नु बुझने
लीला धड़धड़बैत करै छै।
तीत-मीठ फल फलाफल
सि‍र चढ़ि‍ सि‍रताज कहै छै।
सि‍र चढ़ि‍......।



एक ि‍वष......

एक वि‍ष जहान जहर
जौहरी दोसर जोहि‍ अनै छै।
अजोह सोहि‍ जग-जागि‍
बीस ज्ञान कहबए लगै छै।
वि‍श्व ज्ञान कहबए लगै छै।
एक ि‍वष......।

सुख-दुख संगे संग चलि‍
पटका-पटकी करैत रहै छै।
अपन-अपन रस्‍ता पकड़ि‍
दि‍न-राति‍ सन्‍हि‍ मारि‍ करै छै।
दि‍न-राति‍ सन्‍हि‍ मारि‍ करै छै।
एक ि‍वष......।

ि‍नसां वि‍ष खि‍स्‍सा वि‍ष
कथा वि‍ष बतकथा वि‍ष
बि‍साइत वि‍ष बि‍‍सबि‍सा
देह बि‍खाह बनबै छै।
भाय यौ, देह बि‍खाह बनबै छै।
एक ि‍वष......।




पेटक ताप......

पेटक ताप जहि‍ना तपै छै
तपै छै तहि‍ना मनक ताप।
वेद-पुरण मि‍लि‍त मीलि‍
एक वरदान एक अभि‍शाप।
भाइ यौ......।

तपैक तप तपस्‍या जहि‍ना
सभकेँ तपैक अछि‍ दरकार।
बि‍नु तापे तप केना तड़तै
पेते केना उचि‍त-उपकार।
भाइ यौ......।

वि‍लपि‍-वि‍लपि‍ भगवत मंगै छै
बीच व्‍यास भागवत देखै छै।
शक्‍ति‍ पाबि‍ शालीनी जहि‍ना
सि‍ंह सवार शंख फूकै छै।
भाय यौ......।



जेहन मुँह......

जेहन मुँह तेहन हँसी
सभ दि‍न हँसैत एलैए।
मुँहक जेहन गढ़नि‍-मढ़नि‍
तेहने तान भरैत एलैए।
तेहने......।

जाधरि‍ डोर नै बनि‍-बनि‍
घास साबे कहबैत एलैए।
बनि‍ते डोरी समेटि‍-बटोरि‍
गृह-वास कहबैत एलैए।
गि‍रह-वास कहबैत एलैए।
गि‍रह-वास......।

जीह-दाँत सभ संग पूरै छै
आँखि‍-कान सभ संग एलैए।
लहरि‍ बीच लहरि‍-लहरि‍
हास-हँसी हँसैत एलैए।
हास-हँसी......।




धार संग नाह......

धार संग नाव तखने चलै छै
धार जलदार बनल रहै छै।
जल-जलदार......।

देख मानसून लपकि‍-झपकि‍
धरा-धार बनबैत रहै छै।
ओद्र आद्रा पाबि‍ पबि‍ते
मजि‍ मजरि‍ मोजर धड़ै छै।
मजि‍ मजरि‍......।

जेना-जेना मनसून पबै छै
तेना-तेना नाव धार चलै छै।
पूरबा-पछबा झोंक पाबि‍-पाबि‍
मन-तेज गति‍आइत चलै छै।
मन्‍दतेज......।

गति‍ धार जलधार जहि‍ना
मति‍यो तहि‍ना मनसून चलै छै।
गति‍-मति‍ कखनो संग-साथ
तँ कखनो झहरैत रहै छै।
तँ कखनो......।



मन मशीन......

मन मशीन मंत्रणा करै छै
युग-परि‍वर्तित हेबे करतै।
सभ दि‍नसँ होइते एलैए
सभ दि‍न हेबे करतै।
मन मशीन......।

मथि‍-मथि‍ मन मशीन बनि‍
गति‍ तेज हेबे करतै
साधन युक्‍त परि‍वार जहि‍ना
धरा-धार बहबै करतै।
धरा-धार.....।

एक अलंग मशीन जि‍नगीक
दाेसर नीति‍ कहबे करतै
नीति‍-अनीति‍ कुनीति‍ बनि‍ते
एक-सँ-एक लड़बे करतै।
एक-सँ-एक......।



खट-मीठ......

खट-मीठ बनि‍-बनि‍ चटलौं
सुआद आम केना पेबै यौ
खट-मट खरकैट-खरकैट
चि‍क्कन केना बनेबै यौ।
चि‍क्कन केना......।

तेतरि‍ रोपि‍ तेहेन लगेलौं
गुड़-आम संग पेलौं यौ
रंग बदलि‍ सुआदो बदलि‍
कृत्रि‍म प्रकृति‍ कहेलौं यौ
कृत्रि‍म......।

जेहने फल पेलौं तेतरि‍क
तेहने गढ़ि‍ हवा बनेलौं यौ
चर्क-कुष्‍ट नि‍मंत्रि‍त कऽ कऽ
रोग-मराएल बनेलौं यौ
रोग-मराएल......।

  


झोंकमे......

झोंकमे झोंका गेलौं, मीत यौ
छोड़ि‍ जि‍नगी उड़ि‍या गेलौं।
झोंकमे......।

पार नै पाबि‍ गुन-गुना
धन-धरम कि‍छुओ ने पेलौं।
मान-दान घाट घटि‍-घटि‍
अपसोचमे नहा गेलौं
झोंकमे......।

नै जानि‍ दुनि‍याँ-दि‍वाना
भरल दि‍वाना दुनि‍याँ पेलौं।
प्रेमी-प्रेम पकड़ि‍-पकड़ि‍
अपने तँ कि‍छुओ ने पेलौं।
मीत यौ, झोंमे......।

बि‍नु प्रेम खाली नै दुनि‍याँ
राधि‍-अराधि‍ कि‍छुओ ने पेलौं
मूंडे-मूंडे मति‍-वि‍मति‍ बीच
सुमति‍-कुमति‍ सगतरि पेलौं।
मीत यौ, झोंकमे.......।



पबि‍ते पैग......

पबि‍ते पैग पि‍आलि‍क
घोड़चालि‍ चालि‍ धड़ए लगै छै।
छान-पगहा बीच घोड़ाएल
घोड़छान चालि‍ चलै छै।
घोड़छान......।

उठि‍ते दोसर पैग-पग
सि‍ंह-सि‍ंहासन सजबए लगै छै।
कुदैक-कुदैक फानि‍-फना
फन-फना डुमबए लगै छै।
फन-फना......।

चढ़ि‍-चढ़ि‍ डंक डकडका
गद-गधैया पकड़ए लगै छै
ता-थइ, ता-थइ नाच-नाचि‍
गाम गदह करए लगै छै।
गाम गदह......।




हेल-मेल जाधरि‍......

हेल-मेल जाधरि‍ नै पकड़ब
जि‍नगीक कोनो भरोस नै।
रंग-बि‍रंग सरोवर सगर छै
पार जेबाक संतोष नै।
हेल-मेल‍......।

कोनो थीर, जलजलाइत कोनो
जुआरि‍ भरल छै सजल-धजल।
पबि‍ते पेट उनटि‍-सुनटि‍
देखए रूप जीअल-मरल।
हेल-मेल‍......।

दूर-दूर, हटि‍-हटि‍ सजल छै
दुर्गम दुर्ग सि‍रजैत रहै छै।
अन्‍हर-वि‍हाड़ि‍क झोंक पाबि‍
उनटा-पुनटा नाव चलबै छै।
हेल-मेल‍......।




कौशल जखन......

कौशल जखन कोसल बनै छै
कोसलि‍या एबे करतै।
लाख परयास केलो पछाति‍
ढंस घर हेबे करतै।
कौशल......।

कोसल असगर नै पनपै छै
पनपै छै दाेसर-तेसर।
चालि‍ कुचालि‍ धड़ि‍ पकड़ि‍
भूमि‍ बनैत रहै छै उसर।
कौशल......।

उसर पाबि‍ उसरि‍-उपटि‍
घर परि‍वार समाज उसरै छै
ऊपरे-ऊपर छीटि‍ अछीनजल
फूकि‍ शंख काल भगबै छै।
कौशल......।




उमकीमे उमकि‍......

उमकीमे उमकि‍ गेलै
भाव भँवर भसि‍या गेलै।

अबि‍ते उमकी चि‍त-वृत्ति‍
रमकीमे रमकए लगै छै।
अतल-गहन गहन-अतल
पाबि‍-पाबि‍ बौराए लगै छै।
पाबि‍-पाबि......।

तीले-तील ति‍लकि‍-ति‍लकि।‍
कौओ बेरागी बनै छै
कल्‍प-कल्‍प रमकि‍ झुमकि।‍
अनजनुआ कहबए लगै छै
अनजनुआ......।

उमकि‍-उमकि‍ लपकि‍ झपकि‍
लोल-बोल धड़ए लगै छै।
बि‍नु रंग-रूप बदलनौं
कोकि‍ल स्‍वर भरै छै।
कोकि‍ल स्‍वर......।






जि‍नगीक कुन्‍ज......

जि‍नगीक कुन्‍ज भवनमे
बि‍हार कुन्‍ज करए लगै छै।
दुनि‍याँक भवसार बीच
भव आनन बनबए लगै छै।
भव आनन......।

आनन-फानन बीच-बीच
हजार आँखि‍ देखैत रहै छै।
सरमे-भरमे चुनि‍-चानि‍
सागर भव भरैत रहै छै
सागर भव......।

आँखि‍ बीच अँखि‍या-अँखि‍या
डि‍म्ह डि‍म्हा भाँगैत रहै छै।
क्षीर-नीर नि‍खड़ि‍-नि‍खड़ि‍
घाटे-घाट चुनैत रहै छै।
घाटे-घाट......।




सत-चि‍त......

सत-चि‍त आनन-फाननमे
भव आनन बि‍लटि‍ गेलै।
शील बनि‍ शीला चढ़ा
लोढ़ि‍-बीछि‍ रगड़ए लगलै।
लोढ़ि‍-बीछि‍......।

वाण-वाणि‍ चेत-अचेत
चाल-चालि‍ चलबए लगलै
बीचमान बनि‍ बि‍‍चमानि‍
नीर-छीर मि‍लबए लगलै।
दूधे-पानि‍ मि‍लबए लगलै।
लोढ़ि‍-बीछि‍......।

मुख-बि‍मुख पथ पथरा
गुआरि‍ गर लगबए लगलै।
आनन चि‍त सरि‍-सरि‍या
ढुलकि‍ ढोल बजबए लगलै।
ढुलकि‍ ढोल बजबए लगलै।
लोढ़ि‍-बीछि‍......।



पड़ि‍ते पएर......

पड़ि‍ते पएर हवा पोखरि‍
डेगे-डेग डगरए लगै छै।
झील-मि‍लि‍, हि‍ल-मि‍लि‍ बानि‍
पकड़ि‍ बाँहि‍ संगरए लगै छै।
पड़ि‍ते पएर......।

धक्कम-धुक्का मुक्कामे जहि‍ना
धक्का-धुक्की चलए लगै छै।
सि‍हकि‍ते नाद चि‍हकि‍ छाती
धरा धार धड़धड़बए लगै छै।
पड़ि‍ते पएर......।

हि‍ला-डोला हि‍लोरि‍-हि‍लोरि‍
कि‍नछड़ि‍ कोण पकड़ए लगै छै।
तड़पि‍-तड़पि‍ तड़पन करैत
ठौर अपन धड़ए लगै छै।
पड़ि‍ते पएर......।



अहाँ कि‍अए......

अहाँ कि‍अए रूसल छी हे बहि‍ना
अहाँ कि‍अए रूसल छी हे।

हल-चल, हल-चल
सभ दि‍न करै छी
चल-हल चल-हल
कहाँ पाबि‍ पबै छी
तैयो अहीं मगन
कानि‍-हँसि‍ कुचड़ै छी
कानि‍ हँसि‍......।
अहाँ कि‍अए......।

राति‍ दि‍न एकबट्ट बनौने
सभकेँ सभ लागल रहै छी।
लागि‍ भीड़ कि‍यो, भीड़ लागि‍
रमझौआ करैत छी हे
रमझौआ......।
अहाँ कि‍अए......।




 
घट-घट घोंट......

घट-घट घोंट घोटै छै
मीत यौ, घट-घट घोंट घोटै छै।

तरसैत-तरपैत तनतनाइ छै
तन-फन मन भनभनाइ छै
हक-हका, हकहका कहै छै
अपनमे दरकार धड़ै छै।
घट-घट......।

अपन माइन एकबट्ट मानि‍
हँसमुँह मन मुस्‍की भरै छै।
मन-सम्मान, समान मान
तानि‍ छाती समवाण तनै छै।
तानि‍ छाती......।

जे चि‍न्‍हत तेकरे ने चि‍न्‍हबै
बीच-बीच बि‍चमानि‍ बजै छै।
धर्म सनातन ठुमकि‍-ठुमकि‍‍
राति‍-दि‍न परि‍छान करै छै।
राति‍-दि‍न......।
मीत यौ, घट-घट घोंट घोटै छै।




जहि‍ना बारह......

जहि‍ना बारह दि‍न बजैत
तहि‍ना ने राति‍यो कहै छै।
बीच-बि‍चौबलि‍ बीछि‍-बेड़ा
दुनूमे समतूल भरै छै।
दुनूमे......।
जहि‍ना बारह......।

जेठक बारह नम-नमड़ि‍
बारह राति‍ पटि‍अबै छै।
मघजल्‍ला पसारि‍-पसारि‍
हार जाड़ बढ़ि‍अबै छै।
हार जाड़......।
जहि‍ना बारह......।

कखनो बाम दहि‍न घुसुकि‍
दुनू दि‍स कपचैत रहै छै।
नि‍खरि‍‍-नि‍हारि‍ नहि‍ देखि‍
झपकी-लपकी सहैत रहै छै।
झपकी-लपकी......।
जहि‍ना बारह......।




दुनि‍याँ घोड़ाएल......

दुनि‍याँ घोड़ाएल छै नि‍शाँमे
घट-घोट घोटैत कहै छै।
सुखचन-दुखचन कुहि‍-कुहि‍
भटैक-भटका मारैत रहै छै।
भटैक-भटका......।
दुनि‍याँ घोड़ाएल......।

सुख-चैन सोचि‍-असोचि‍
सुखल धार बहबैत रहै छै।
काँट-कुश बना बना
धार-धड़ि‍ धड़बैत रहै छै।
धार-धड़ि‍......।
दुनि‍याँ घोड़ाएल......।

सुखल-टटाएल रसाएल जि‍नगी
रसाएल जीव कहबए लगै छै।
भुख-पि‍यास पचि‍-पचा
सार-वेद गाबए लगै छै।
सार-वेद......।
दुनि‍याँ घोड़ाएल......।




बहलि‍ बहील......

बहलि‍ बहील बहि‍ला कहै छै
आश हमर कहि‍यो नै करि‍हह
फुलकि‍-फलकि‍ ढेनु-ढेनुआरक
तोड़ि‍ आश तेकरो रहि‍हह।
बहलि‍ बहील......।

बहलि‍ मन दहलि‍-दहलि‍
बाँझ गाछ धड़ैत रहै छै।
पकड़ि‍ डारि‍ डोला-डरा
लस्‍सालोल छोड़बए लगै छै।
लस्‍सा लोल......।
बहलि‍ बहील......।

लटपट-सटपट बझ-बझीन
गीत वधैया गाबि‍ कहै छै।
ता धीन ताधीन धीन ता धीन
सूर-तान टहि‍आए लगै छै।
शूर-तान......।
बहलि‍ बहील......।




हलचल जि‍नगी......

हलचल जि‍नगी हलसि‍-खि‍लचि‍
हर-हरि चालि‍ चलै छै।
बीर्तमान भवि‍ष्‍य कहि‍-सुनि‍
भूत-बंगला सजबै छै।
मीत यौ, भूत-बंगला सजबै छै।
हलचल......।

जहि‍ना आनक पोखरि‍ डरान
अपनो गाछी कहबै छै।
अधसर-अधमर पोखरि‍ सृजए
जम-जजमान फफनै छै।
मीत यौ, जम-जजमान फफनै छै।
हलचल......।

भाग बैसि‍ एक वीणा-धारणी
बहि‍ना बाँहि‍ पकड़ै छै।
वाम-दहि‍न चालि‍ चलि‍-चलि‍
धाम-काम धड़बै छै।
मीत यौ, धाम-काम धड़बै छै।
हलचल......।



टकटक ताक......

टकटक ताक तकै छी हे मइये
आहाँ कि‍अए आँखि‍ मुनने छी।
गड़-गड़ गाल गबै छी मइये
तखन कि‍अए कान खोलने छी।
तखन......।
टकटक......।

जन-मन-धन धि‍यानए मइये
छी छूटि‍, केना जाइ छी।
डारि‍-पात अमृत भरि‍-भरि‍
वि‍ष-रस केना बनै छी।
वि‍ष-रस......।
टकटक......।

कन-कन मणि‍ मन-मन मइये
अन्‍हार कि‍अए छोड़ै छी।
रचि‍ अन्‍हार इजोत-जोत
तखन एना कि‍अए वि‍षवि‍षबै छी।
एना कि‍अए......।
टकटक......।




भीख मांगि‍......

भीख मांगि‍ दुनि‍याँ भि‍खारी
दानी शि‍व कहबै छी यौ।
हे यौ भोलानाथ
दानी शि‍व कहबै छी यौ।

राि‍त-दि‍न समैट‍-समटै छी
भीखमंगा कहबै छी यौ
धड़ि‍ भीख धारा बनै छी
धार भीख बहबै छी यौ
धार भीख......।

शि‍खर सि‍र अकुर-सकुर
चोटी सि‍र पकड़ै छी यौ
धार बनि‍ धड़ा-धड़ा
पहुँचि‍ समुद्र धड़ै छी यौ।
पहुँचि‍ समुद्र......।

हे यौ भोला बाबा
पहुँचि‍ समुद्र धड़ै छी यौ।




बकरी खुट्टी......

बकरी खुट्टी खुटेस-खुटेस
जि‍नगीक जि‍नगी पाठ पढ़ै छै।
कुन्‍ज भवनमे लाल बि‍हारी
लीला रचि‍-रचि‍ रास करै छै।
लीला रचि‍......।

रंग-बि‍रंगक पात खुआ
रस अमरीत चुसबैत रहै छै।
मनक मक्‍खन चोरि‍-छोड़ि‍
गरदनि‍ बान्‍ह पड़ैत रहै छै।
मीत यौ, गरदनि‍......।

बीर्त रहि‍तो बकरी जेना
साँढ़-धाकर कहैत रहै छै।
मनहाएल-मनहाएल रहि‍तो
कुरीति‍‍-रीति‍ गबै छै।
मीत यौ, उरीति‍......।




अमरा अँचार......

अमरा अँचार चटै छै
मीत यौ, अमरा अँचार चटै छै।

अमौर-मौर बनि‍ बना
अबि‍ते रस बदलै छै।
पानि‍ जीह पाबि‍ पनि‍या
चहटि‍ चुहुटि‍ धड़ै छै।
मीत यौ......।

जेहने फड़क रंग-रूप
तेहने ते पातो धेने छै।
नमहर-नमहर गीरह-गाँठ
बि‍नु गि‍रहेक डारि‍ पकड़ै छै।
मीत यौ......।

चटि‍ते अचार अम अमड़ि‍
अमरजोत देखै छै।
जीवन जन छोड़ि‍-मोड़ि‍
मरण वाणि‍ पकड़ै छै।
मीत यौ......।




घरे-घरे......

घरे-घरे ज्‍योति‍ दीप
गाम अन्‍हार पड़ल छै।
घरे-घर समाज कहि‍-कहि‍
अध-मरल गाम पड़ल छै।
अध-मरल......।

इति‍हास मि‍थि‍ला कहि‍
पुर जनक धाम बनल छै।
वक्र आठ गीत गाबि‍
ज्‍योति‍रमान जगै छै।
ज्‍योति‍रमान......।

बनि‍ कनि‍याँ-पुतरा कठपुतरी
मूक नाच नचैत रहै छै।
राति‍-दि‍न एकबट्ट बरहबट बनि‍
नाचि‍ नाच नचैत रहै छै।
नाचि‍ नाच......।




बेटी कि‍अए......

बेटी कि‍अए बनेलौं, शि‍व यौ
बेटी कि‍अए बनेलौं।
भूख पेट दुख बनि‍ बना
हमरे कि‍अए सजेलौं
हमरे कि‍अए......।

सजि‍ साजि‍ सि‍र सजा
दोखाह जि‍नगी कि‍अए बनेलौं
कि‍छु ने कामना मनमे ठनने
एहेन कि‍अए बनेलौं।
बेटी कि‍अए......।

मन-मन माली बैसल छै
मालि‍न कि‍अए बनेलौं
मन-मलि‍न मुँह कानि‍-कानि‍
बेटी कि‍अए बनेलौं।
हे शि‍वदानी हे बमभोला
बेटी कि‍अए बनेलौं।




मनक भाव......

मनक भाव समेटि‍-समेटि‍
मनोभाव पनपए लगै छै।
सुभाव अभाव कुभाव भव
रूप रंग सजबए लगै छै।
रूप रंग......।

महकि‍ महि‍ परखि‍ नि‍खारि‍
भवन भव सि‍रजए लगै छै।
उक-भाव लपकि‍ लपाक
बि‍न भावुक सजबए लगै छै।
बनि‍ भावुक......।

भाव-भावुक रमैक‍-चमैक‍
भाव लोक सि‍रजए लगै छै।
आनन कानन मानन मानि‍
भवानन कहबए लगै छै।
भवानन......।




ि‍सरजन सि‍र......

सि‍रजन सि‍र पकड़ि‍-पकड़ि‍
जड़ि‍ धरती धड़बै छै।
पति‍-पन पाँति‍ पति‍या
उपवन-वन सजबै छै।
भाय यौ, उपवन......।

सजि‍ते वन उफनि‍ उपनि‍
धरती धार बहबए लगै छै।
सुध-असुध कहि‍ सुनि‍-सुनि‍
घटि‍-बढ़ि‍ घाट बनबए लगै छै।
भाय यौ, घटि‍-बढ़ि‍......।

कोने-कानी खूटि‍‍-खूटि‍‍
धोबि‍ घाट सेहो बनबै छै।
नि‍रजन, नि‍रमल बसि‍-बसु
हारि‍-जीत दुनि‍याँ कहै छै।
भाय यौ, हारि‍-जीत......।


 



दूधक भूखल......

कनि‍-कनि‍ कानि‍ कहै छै।
कनी-कनी कान पकड़ि‍-पकड़ि‍
कर्ण-अंग धड़ैत रहै छै।
ि‍नरलोभ, नि‍सकपट बनि‍-बनि‍
अखंड बनि‍ बसैत रहै छै।

रंग-रंग कनजरि‍ बनि‍ वन
रंग-रंग मुँह धड़ैत रहै छै।
रंग-रंग गुनि‍ गुन सुनि‍‍
फलाफल छि‍टकैत रहै छै।
कनि‍-कनि‍......।

जड़ि‍ कोनो फल फलागम
फुलहरि‍ कोनो झड़ैत रहै छै।
जड़ि‍-जड़ि‍ कनकि‍-कनकि‍
कलश-पल्‍लव भरैत रहै छै।
अपेछि‍त, पल्‍लव कलश भरैत रहै छै।



संगे-संग......

घरक नाआें संगे गड़ा गेल
मीत यौ, ई गड़बड़ भेल उ गड़बड़ भेल?
नै यौ, हँ यौ, हँ यौ, नै यौ, हँ....।
ई गड़बड़ भेल, उ गड़बड़ भेल।
घरक नाअों......।

अदलि‍ नीक बदलि‍ अधला
अदलि‍-बदलि‍ बदला गेल।
गारा गर पकड़ि‍-पकड़ि‍, मीत
गारा घेघ बनबैत गेल, मीत यौ.....।
घरक नाअों......।

बाम दहि‍न बि‍नु बुझने-सुझने
छटि‍ बाम बूच छटि‍या गेल।
डाली कसतारा सजि‍ सजबए
ई अधला भेल, मीत यौ ई अधला भेल।
घरक नाअों......।



चोटी छुबै......

चोटी छुबै जखन चट-चटि‍या
चटि‍या चाट चटैत रहै छै।
जीनगानि‍क रंग रभससँ
सुर जि‍न्‍दादि‍ली भरैत रहै छै।
चोटी छुबै......।

बून-बून अकास बनि‍-बनि‍
धड़-धरती छुबैत रहै छै।
चूह चुहुटि‍ साटि‍ सटि‍ छाती
दूध-फूल बनबए लगै छै।
चोटी छुबै......।

करम-धरम खेल सि‍र सि‍रजै‍
नचनी नाच नचैत रहै छै।
बाट-बटोही पकड़ि‍-पकड़ि‍
मूंगबा मुँह बि‍लहैत रहै छै।
चोटी छुबै......।



खेल-खेलाड़ी......

खेल खेलाड़ी खेल ठानि‍
कबडी दौड़ दौड़ैत एलैए।
सीमा बान्‍हि‍ भौक भौकि‍या
छुबि‍-छुबि‍ छुतबैत एलैए।
छुबि‍-छुबि‍ छुतबैत एलैए।
खेल-खेलाड़ी......।

नमगर-चौड़गर परती पराँत
नमहर डेग डेगैत एलैए।
आम छी, जाम छी, करि‍या लताम छी
साँस छोड़ि‍ रेड़ैत एलैए।
साँस छोड़ि‍ रेड़ैत एलैए।
खेल-खेलाड़ी......।

एक साँस चेत कबड्डी
चीका-दरबर करैत एलैए।
भौक बनि‍ भोकि‍या-भोकि‍या
छुबि‍-छुबि‍ छुतबैत एलैए।
छुबि‍-छुबि‍ छुतबैत एलैए।
खेल-खेलाड़ी......।

धरती खुनि‍-खुनि‍ मुदा एहनो
अखड़ाहा बनबैत एलैए।
माटि‍ संग हाथ मि‍ल-मि‍ला
वीर भूमि‍ सि‍रजैत एलैए।
वीर भूमि‍ सि‍रजैत एलैए।
खेल-खेलाड़ी......।





 
ककोड़बा......

ककोड़बा बि‍आन ककोड़बे खाइ छै।
मीत यौ, ककोड़बा बि‍आन ककोड़बे खाइ छै।

बि‍नु सि‍र-पएर सजि‍-सजि‍
चुट्टा-चांगुर चुहुटए लगै छै।
अपने सि‍रजल-जल्‍ला-झल्‍ला
खद-खुद डि‍रि‍आए लगै छै।
ककोड़बा......।

खखैर-खखोड़ि‍ खखरी बनि‍
दन-दनाइत कहैत रहै छै।
माटि‍-पानि‍ सभ हमरे-हमरे
कुम्‍हरा ढेर बनबैत रहै छै।
मीत यौ, कुम्‍हरा ढेर बनबैत रहै छै।
ककोड़बा.......।

जेर नि‍कलि‍ जड़ि‍या-जेड़ि‍या
पाछू पेट छि‍छि‍याए लगै छै।
कतए जाएब कतए जाइ छी
ठेकाने नै रहि‍ पबै छै।
मीत यौ, ठेकान नै रहि‍ पबै छै।
ककोड़बा......।




सोर बनि‍......

सोर बनि‍ सन्‍हि‍या सान्‍हि‍
सि‍र चालि‍ चलए लगै छै।
सि‍र-ि‍सरा सि‍रसि‍रा चुहटि‍
बत-बता बतबए लगै छै।
बत-बता बतबए लगै छै।
सोर बनि‍......।

फुलहरि‍ फूल फड़ फलहरि‍
बड़गद वि‍रीछ बनए लगै छै।
कट्ठा-कहि‍ नट्ठा बनि‍-बना
सघन-घन धड़ए लगै छै।
घन सघन धड़ए लगै छै।
सोर बनि‍......।

पकड़ि मूस मुँह मुसका
शील-सि‍नेह सि‍रजए लगै छै।
पकड़ि‍ पूछ पुछड़ी पकड़ि‍
घाट-घट घटबए लगै छै।
घाट-घट घटबए लगै छै।   
सोर बनि‍......।

कूट चि‍त्र घट-घट घटा
पौरुष-पुरुष गढ़ै लगै छै।
कूट कुटि‍ कूटि‍-पीस
सि‍‍रखणि‍ सि‍र गढ़ए लगै छै।
सि‍रखणि‍ सि‍र गढ़ए लगै छै।
सोर बनि‍......।




सेज-सिंगार......

सेज सिंगार सजि‍ साजि‍-साजि‍
साध सत् धड़ए लगै छै।
दूर-दूर दुरगम दृग दृश्‍य‍
सोरहा सोर करए लगै छै।
सेज-सिंगार......।

बनि‍ते दहाइ एकाइ बदलि‍
सि‍ज फूल सि‍ंगार धड़ै छै।
बाल-भाल लीख-लीख ललाट
धार जि‍नगी कुदए लगै छै।
जि‍नगी धार बहए लगै छै।
सेज-सिंगार......।

सोर पकड़ि‍ शोर सोर शोर
सोड़ह सोरहा करए लगै छै।
जि‍नगीक टपान टपि‍ते टपैत
दोहरी सेज सजए लगै छै।
दोहरी सेज सजए लगै छै।
सेज-सिंगार......।

बदला-बदली करए धन-धेनु
धाम-काम कहबए लगै छै।
मि‍थि‍ मालि‍न मन मलि‍‍-मलि
मि‍थि‍लांगना कहबए लगै छै।
‍मि‍थि‍लांगना कहबए लगै छै। 
सेज-सिंगार......।




जएह लूरि‍......

जएह लूरि‍-बुधि‍ मन पकड़ए
तेहने टा जि‍नगी भाय यौ।
नगर नजरि‍ नि‍हारि‍-नि‍हारि‍
अराधि‍ राखि‍ जि‍नगी ठनि‍यौ।
अराधि‍ राखि‍ जि‍नगी ठनि‍यौ।
जएह लूरि‍......।

लूरि‍-बुधि‍ गरजोड़ बनि‍-बनि‍
गरदनि‍-खूटा मि‍लैत रहै छै।
एक रक्षक एक भक्षक बनि‍
अमृत रस भरैत रहै छै।
अमृत रस भरैत रहै छै।

रंग-रंग फूल माला मालि‍न
मुसुकि‍ मुँह कली कलि‍आइ छै।
मालि‍न माला गढ़ि‍-मढ़ि‍
छत माली छति‍या सजै छै।
छत माली छति‍या सजै छै।
जएह लूरि‍......।





 
जोति‍ हर......

जोति‍ हर हरबाह हकड़ि‍
जि‍नगीक गीत गबै छै।
ले-ऊँच, ऊँच ले बनि‍ वन
चोटी-ढाल बनल छै।
गे भौजी, चोटी......।

बून पपीह स्‍वाती पकड़ि‍
रस अमृत भरैत चलै छै।
कृत्ति‍-वृत्त परकृति‍ पकड़ि‍
तरे-ऊपरे सि‍र सजै छै।
गे भौजी......।

लत्ती बनि‍ लतड़ि‍-पसरि‍
लतमरदन करैत रहै छै।
चोटी जल टघड़ि‍-टघड़ि‍
खून पसीना एक करै छै।
गे भौजी......।

ओहए पानि‍ टघड़ि‍-टघड़ि‍
झील-सरोवर सेहो सजै छै।
बाल-भाल कुशक कलेप
मरू स्‍थल गढ़ैत रहै छै।
गे भौजी......।




हर हलक......

हर हलक हलन्‍तमे
मीर-दोल तेहल बनै छै।
पुर-पुष्‍कर पुरस्‍सर
बाट-घाट घटबी चलै छै।
हल-हलक हलन्‍तमे...

एक-दू-तीन चारि‍ रहि‍तो
गति‍ इंजीन गाड़ी धड़ै छै।
बेहि‍साब-हि‍साब बनि‍ बन
धड़ि‍ धड़कि‍ धड़ैत रहै छै।
धड़ि‍ धड़कि‍......।

लंक-अयोधि‍या सटि‍-हटि‍
संगी-संग चलैत रहै छै।
नि‍रशि‍ परखि‍ बाट-बटोही
फल करनी भोगैत रहै छै।
फल करनी......।


 





हि‍म-गि‍रि......

हि‍म-गि‍रि‍ उत् उतूंग उमड़ि‍
नि‍रमल अमृत धार बहै छै।
सि‍ख-शि‍खर सि‍हैर-सहैर
गंग अकास बहैत रहै छै।
गंग अकास......।

उतरे-दछि‍ने धड़ैन धार
शि‍खर-सगर देखबै छै।
रंग-रंग फूल माल सजि‍
मन गंग साजि‍ सजै छै।
मन गंग......।

हटि‍-सटि‍, सटि‍-हटि‍ बैस-वेस
सागर-शि‍खर धड़ैत रहै छै।
गंग-अकास उतरि‍‍-उतरि‍‍
गंग-अकास......।






भुवन भूचलि......

भुवन भूचलि‍ अकास
रंग-रंग तारा सजै छै।
तीन मि‍लि‍ डंड तराजू
सभक तौल-मपैत रहै छै।
सभक......।

कखनो दायाँ वायाँ कखनो
कीर-कि‍रदानी करैत रहै छै।
तेकठीक आस बि‍नु पौने
उदय-अस्‍त करैत रहै छै।
उदय......।

सातो सगर देखि‍ सतभैंया
कचबच बचकच करैत रहै छै।
भोर होइत भहड़ि‍-भड़ड़ि‍
थकथका थकथका सेज सजै छै।
थकतका......।






खुजि‍ते आँखि......

खुजि‍ते आँखि‍ तड़पि‍ तड़पि‍
पृथि‍वी पग पएर पड़ै छै।
धरती-अकास बीचो-बीच
खम्‍भ भेल देखै छै।
खम्‍भ......।

अकास अमरीत बरसि‍
खोंइछ धरती भरैत रहै छै।
आसा-आस मि‍लि‍ बैसि‍
बरहमासा गबैत कहै छै।
भाय यौ, बरहमासा......।

पर-वत बत-पर संग-संग
हेल समुद्र हेलैत रहै छै।
बालु ऊपर ढेर-बनि वन
ढुइस हेल हेलैत रहै छै।
मीत यौ, अहींकेँ कहै छै
ढुइस......।




मुड़जन मनुहर......

मुड़जन मनुहर पकड़ि‍-पकड़ि‍
तान वि‍रूदावली तनै छै।
दोहन-दौजी कुदि‍-चमकि‍
रचि‍-रचि‍ रास रचै छै।
संगी, रचि‍-रचि‍......।

मुसुक मुसकी मसकि‍-मसकि‍
कन-आनन अनैत रहै छै।
नेंगरा-लुलहा, जरल-मरल
बेणु-वन वीणा तनै छै।
संगी, वेणु-वन......।

शूर-सूर, मूड़ मुड़ि‍-मूड़ि‍
पग-प्रेम पबैत रहै छै।
लट्टा-चूड़ा, खट्टा दही
भोज ब्रह्म गाबि‍ कहै छै।
संगी, ब्रह्म......।










गोधूलि‍-बेल......

गोधूलि‍-बेल डगर डगरि‍
थन-माइक थुथुन थुथबै छै।
आस सूर्ज असतन पाबि‍
तर-ऊपर चमकए लगै छै।
तर-ऊपर......।

अबैत करूआएल काल देखि‍
पग-पगहा पाछू घीचै छै।
पाँचम पहर पहल पहीर
रग-रग रंग रगड़ए लगै छै।
दीब साँझक दि‍व्‍य पाबि‍
सगुनि‍याँ कहबए लगै छै।
सगुनि‍याँ......।

राति‍ दबा दबदबाइत प्रभा
भाेर-भुरुकबा जगबै छै।
दुर-दुरा, दुर-दुरा दूर
प्रात सूर्ज घीचने अबै छै।
प्रात सूर्ज......।




दौड़ि‍-दौड़......

दौड़ि‍-दौड़ दाउर घोर-घन
बाट नहि‍ भेटै छै।
कारी-भारी भारी करि‍-करि‍
अन्‍ह घाट बनबै छै।
अन्‍ह घाट......।

अन्‍हार घर साँपे-साँप
वि‍सवि‍साह बनबै छै।
इजोतो अनरोख भऽ भऽ
घोर-घनघोर करै छै।
घोर-घनघोर......।

लीला बड़ लीलाधर बड़-बड़
राशि‍ रास रचै छै।
मत् मन मत मत-मत
मस्‍ती चालि‍ धड़ै छै।
मस्‍ती चालि‍......।






चोट-चाट......

चोट-चाट चोटि‍या देलकै
मुँह-नाक भसका देलकै।
चोट-चाट......।

कान कनक छीनि‍-वीनि‍
बहीर बौक बना देलकै।
नाक-मुँह-कान ताकि‍
चोट-चाट चोटि‍या देलकै
चोट-चाट......।

बहीर-बौक मि‍लि‍-मि‍लि
मलि‍ आँखि‍ मसका देलकै।
गन्‍ह महक महक गन्‍ह
दि‍न-राति‍ गनहा देलकै।
दि‍न-राति‍......।

साँझ बेला वेली फूलि‍
भोर-भुरुकवा कहै छै।
रातु पार खेपि‍-खेप
पाट सन धड़बैत चल छै।
पाट सन......।






चाइन चेन......

चाइन चेन थर-थीर थि‍ति‍ते
चान-मुँह मुस्‍की भरै छै।
हास-परि‍हास अट्टाहास
लोक सूर्ज पहुँचए लगै छै।
लोक सूर्ज......।

तन-तना तक ताकि‍ तरेगन
हि‍या-हि‍या देखैत रहै छै।
रंग एक रोशनाइ आनि‍
लालटेन राति‍ गढ़ैत रहै छै।
मीत यौ, लालटेन......।

असि‍ते-अस्‍त सुधा ज्‍योति‍ ‍
साँझ पहि‍ल अनघोल करै छै।
बनि‍ सगुनि‍याँ तार-तारा
आगूक दम्‍भ भरैत रहै छै।
आगूक दम्‍भ......।




दीनक दोख......

दीनक दोख कहै छी हे बहि‍ना
दीनक दोख कहै छी।
बात-बात बति‍या कति‍या
हटि‍-हटि‍ हाट हटै छै।
बत-रग्‍गर रगड़ि‍-रगड़ि‍
पीसि‍ पीस पीबै छै।
हे बहि‍ना, पीसि‍-पीस......।

घरे-अंगने बीज कोढ़ीक
छीटि‍-गाड़ि‍ रोपैत रहै छै।
फूल कोढ़ि‍क फलक तेहने
जि‍नगी पाठ पढ़ैत रहै छै।
हे बहि‍ना, जि‍नगी......।

नि‍शाँ पीब नस-नस नसि‍या
नि‍शाएल घाट तकैत रहै छै।
राति‍क हारल दि‍नक मारल
ि‍जनगी गीत गबैत रहै छै।
हे बहि‍ना, जि‍नगी......।




सगर समनदर......

सगर समनदर सड़ि‍ सरि‍त
तन-मन आस सि‍रजै छै।
दुर्गा देवी हे माँ काली
असतन आस धड़बै छै।
मीत यौ, असतन आस......।

थन तन मन पशु धन
परबत सीस सजबै छै।
ढेर धार ढेरि‍आएल घाट
मन मनु माँ कहबै छै।
मीत यौ, मन मनु......।

पाश बैसि‍ बसि‍या बुलकि‍
जि‍नगी तानि‍ नचै छै।
हे माँ, नगर बीच रीति‍-रीत
सती-सावि‍त्री पुछै छै।
मीत यौ, सगर......।




चप-चप......

चप-चप चपचपा चपा
चपचपाइत चाप चपा गेलि‍ऐ।
धार पेट चप-चपीमे
तकि‍ते ताकि‍ तरि‍या गेलि‍ऐ।
मीत यौ, तकि‍ते......।

चपचपाइत मन धकधकाइत तन
काप कपैत कति‍या गेलि‍ऐ।
ओलनि‍-छोलनि‍ घर जहि‍ना
भीत्ता धार भि‍ति‍या गेलि‍ऐ।
मीत यौ, भीत्ता......।

उठि‍ते पूरबा पच्‍छि‍म चलि‍
पछि‍या पूब चलि‍या गेलि‍ऐ।
चप-चप चपचपा चपा
खस्‍सि‍या खर्ग टंगा गेलि‍ऐ।
मीत यौ, खस्‍सि‍या......।




मारी-बेमारी......

मारी-बेमारी के कहए
महामारी बीच पड़ल छै।
के केकरा कहतै-सुनतै
आने-आन धड़ाएल छै।
भाय यौ, आने......।

पानि‍ जरि‍ अगि‍या आगि‍
रस रसराज पबै छै।
केकरा कहबै, कहि‍ के सुनतै
खट-रस रस भरल छै।
भाय यौ, खट......।

खट्टर कका केर खटरास
खि‍या-खि‍या कटकटाएल छै।
मजनी रगड़ि‍-रगड़ि‍ खरकिट्टी
सेनुर-सोहाग बुलबलाएल छै।
भाय यौ, सेनुर......।

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'विदेह' २२८ म अंक १५ जून २०१७ (वर्ष १० मास ११४ अंक २२८)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -  गौरी चोरनी ,  गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर ...