Monday, December 31, 2012

'विदेह' १२० म अंक १५ दिसम्बर २०१२ (वर्ष ५ मास ६० अंक १२०) PART II


३. पद्य









३.८.बिन्देश्वर ठाकुर- गीत-गजल-कविता  
जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल
की भेटल आ की हेरा गेल  (आत्म गीत)- (आगाँ)

जे सुख भेटल, जे शांति भेटल
अघ्ययन, मनन आ चिन्तनमे
दुख-सुखकेर परिभाषा जानल
की सफल, सुफल की जीवनमे

एक दृष्टि नव, एक सृष्टि नव
अपनहु अन्तरमे   समा गेल
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ की हेरा गेल।

सपना छल जे छी देखि चुकल
सपना अछि जे छी देखि रहल
सपने संगी अछि बनल हमर
सपनेसँ हम छी सीखि रहल

सपनेमे अहिना पड़ल-पड़ल
हँसिते-हँसिते अछि कना गेल,
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ की हेरा गेल।

जीवनक अर्थ तँ हर्ष भेल
दोसर मतलब संघर्ष भेल
हम ताकि रहल छी अपनामे
की बाँचल आ की व्यर्थ गेल

अछि वैह सुफल दुनियामे जे
अपनाकें  कहुना बचा गेल,
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ की हेरा गेल ।

हम के छी, कतऽसँ आयल छी
अछि अएबा केर  प्रयोजन की
सुख-दुखक चक्रमे घूमि रहल
अनवरत हमर ई जीवन की

हमरा अन्तरमे बैसल क्यो
अछि प्रश्न कैकटा उठा गेल,
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ की हेरा गेल ।

ई देह अतिथि, ई प्राण अतिथि
सम्मान अतिथि, अपमान अतिथि
अछि लोभ, मोह आ मायाकेर
अज्ञान अतिथि, विज्ञान अतिथि

हम अहिना रहब स्थिर तहियो
जहिया देखब सब बिला गेल,
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ की हेरा गेल ।

ई हाथ हमर, ई पएर हमर
ई आँखि हमर, ई कान हमर
ई देह हमर, ई मोन हमर
ई प्राण हमर आ ध्यान हमर

हम छी स्वामी एहि कायाकेर
अछि ई रहस्य क्यो बुझा गेल,
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल  आ की हेरा गेल।

(क्रमशः)


 
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सन्दीप कुमार साफी- कविता-कातिकक पूर्णिमा/ गामक इनार
1
कातिकक पूर्णिमा
जेबै देखैले मेला कमला क
सभ सालमे मेला लागए जोर
नहैले जाएब भोरे भोर
हेतै ओही बाउलपर कुस्ती
खाएब तोड़ि ककुसियार
माए बहीन सभ खेलए
सामा चकेवा
भसबजाए ओइ किनार
चुगलाकेँ चूड़ा दही खुआ क
लेवान दिन चूड़ा कुटाए
उक्खड़िमे।

जोतलाहा खेतमे भसाबए
सामा चकेवाकेँ
पूर्णिमा नहाइले जाइ कमलामे
मेला लागैए दुनू पारमे
नाच तमाशा हुअए अल्हा रूदल
बिकाए झिल्ली मुरही
मिथिलामे माए बहीनक
भाइयक मानल जाए ई पाबनि
सालमे एक बेर नाम लिअए
भाइक सभ बहीन
हमर भइया रहए जुड़ाएल।

2
गामक इनार
चलए मिलान सभ लोककेँ
भरै छलौं एक ठाम पानि
अपनामे रहै चलए बाजा भूकी
रहै चलौं सभ मिलि-जुलि क
घर-घरमे आब भेल कल
लोको सभ भेल अल कल
खीचि ने पाबए इनारक रस्सी
ने रहल टोलमे एकता
के राखए पोखरि इनारक सेखता
साविकक देन कहोइए अभास
कोनाकेँ बुझाएब पियास
विलुप्त भरहल अछि इनार
कतगेल घैलाक पानि
ओही ठाम करै छलौं स्नान
रहै छल गामक शान
देवी-देवता रहै छल प्रसन्न
मन रहै छल शुद्ध
रखै छलौं शुद्ध-अशुद्धक मान।

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जगदानन्द झा मनु, ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीहटोल, मधुबनी 

1.कविता - उगैत सूरज पएर पसारि

उगैत सूरज पएर पसारि 
धरतीक आँगनमे एलै 
लाल रंगक ओढ़नी एकर 
हरीयर खेतमे छिरएलै 

कोंढ़ी सभ मूरी हिला कए 
पंखुड़ीकेँ फैलेलक 
नचि-नचि कए नैन्हेंटा भोंडा 
खुशीकेँ नाच दखेलक    

लए संग अपन साजि बरयाति 
खुशी ओ संग अनने अछि 
संग एकरे उठल चिड़ै सभ 
आर मनुख सभ जगैत अछि 

माए सभ आँचरमे भरि कए 
नेनापर अमृत बरसेलै 
उगैत सूरज पएर पसारि 
धरतीक आँगनमे एलै 

बरदकेँ संग लए हरबाहा 
कन्हापर लादि हर आएल 
गाए महीषकेँ रोमि चरबाहा  
धरतीक आँगनमे बहि आएल 

छोट छोट हाथसँ नेना 
डोड़ी पकैर बकरीकेँ अनलक 
माथ पर ल' ' ढाकी खुरपी 
घसबाहीन झुमति निकलल 

एहन सुन्नर मनभाबक 
दृश्य भोरका कएलक 
उगैत सूरजकेँ तँ देखू 
केहएन सुन्नर दुनियाँ बनेलक ।

उगैत सूरज पएर पसारि 
धरतीक आँगनमे एलै ।

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2.गजल 

जीवन कखन तक छैक नै बुझलक कियो 
कखनो करेजक गप्प   नै जनलक कियो 

भेटल तँ जीवनमे सुखक संगी बहुत 
देखैत दुखमे आँखि नै तकलक कियो 

दुखकेँ अपन बेसी बुझै किछु लोक सभ 
भेलै जँ दोसरकेँ तँ नै सुनलक कियो 

सदिखन रहल भागैत सभ काजे अपन 
आनक नोर घुइरो कs नै बिछ्लक कियो 

जीवन तँ अछि जीवैत 'मनु' सभ एतए 
मइरो कs जे जीवैत नै बनलक कियो 

(बहरे- रजज, 2212 तीन-तीन बेर सभ पांतिमे)

  
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3.गजल

जखन खगता सभसँ बेसी तखन ओ मुँह मोड़ि लेलनि 
जानि आफत छोरि हमरा सुखसँ नाता जोड़ि लेलनि 

देखि चकमक रंग सभतरि ओहिमे बहि  तँ गेली 
जानि खखड़ी ओ हमर हँसिते करेजा कोड़ि लेलनि 

बन्द केने हम मनोरथ अप्पन सदिखन चूप रहलहुँ 
पाञ्च बरखे आबि देख फेर सपना तोड़ि लेलनि 

दुखसँ अप्पन अधिक दोसरकेँ सुखक चिन्ता कएने 
आँखि जे फूटै दुनू तैँ एक अप्पन फोड़ि लेलनि 

चलक सप्पत संग लेलहुँ जीवनक जतराक पथपर 
मेघ दुखकेँ देखते ओ संग 'मनु'केँ छोड़ि लेलनि 

(बहरे - रमल, मात्रा क्रम- 2122 चारि-चारि बेर सभ पांतिमे)   
  
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4.गजल

किए तीर नजरिसँ अहाँकेँ चलैए 
हँसी ई
 तँ घाएल हमरा करैए 

मधुर बाजि खन-खन पएरक पजनियाँ
 
हमर मोन रहि रहि कए डोलबैए
  

छ्लकए हबामे अहाँकेँ खुजल लट
 
कतेको तँ
 दाँतेसँ   आङुर कटैए

ससरि जे जए जखन आँचर अहाँकेँ
 
जिला भरि  करेजाक धड़कन रुकैए 

अहीँकेँ तँ मुँह देखि जीबैत 'मनु' अछि 
बिना संग नै साँस मिसियो चलैए 

(बहरे - मुतकारिब, मात्रा क्रम -122-122-122-122)

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5.गजल

रहब आब नै दास बनि हम
अपन नीक इतिहास जनि हम

जखन ठानलहुँ हम अपनपर
समुद्रो लएलहुँ तँ सनि हम

उठा मांथ जतएसँ तकलहुँ
दएलहुँ
 तँ नक्षत्र गनि हम

हलाहल दुनीयाँक पीने
चलै छी अपन मोन तनि हम

जमल खून मारलक धधरा
लएलहुँ विजय विश्व ठनि
 हम

(बहरे मुतकारिब,
 मात्रा क्रम-१२२)

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हेमनारायण साहु

हम छी नीमक गाछ

जंगल झार बूझि‍ हमरा छोड़ने छी
छी कतेक रोगक-नि‍दान से नै बुझै छी।
बड़ गुनगर छी से बूझि‍ लि‍अ
नै अछि‍ बि‍सवास तँ अजमाए लि‍अ।
हम वातावरणकेँ शुद्ध करै छी
अशुद्ध पवनकेँ शुद्ध करै छी।
पात पीस कंकलि‍पर लगाउ
डारि‍क दत्‍मनि‍सँ पैरि‍या भगाउ।
टूसा तोड़ि‍-तोड़ि‍ मुँहमे खाउ
पेटक कीड़ाकेँ जड़ि‍सँ भगाउ।
फड़ तोड़ि‍ अर्क बनाउ
अल्‍लू गाछकेँ पालासँ बचाउ।
फड़क आँठीसँ तेल बनाउ
बनाए औषधि‍ अनेक रोग भगाउ।
बचल सि‍ट्ठीसँ जैवि‍क खाद बनाउ।
खेतमे मि‍लाए सोना उपजाउ
हम छी नीमक गाछ।
डगर-बाटपर लगाउ
गाम समाजसँ लऽ कऽ पर्यावरणकेँ
नि‍रोग बनाउ।
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मुन्नी कामत केर दुइ गोट कविता-सिया तोरे कारण/ ठिठुराबैत जाड़

सिया तोरे कारण

जनक दुलारी सिया
सहैत एलौं सभ दरद
अहाँ किअए?
रानी भऽ वनमे रहलौं
पतिक खातिर
सभ सुख ति‍यागलाैं
पग-पगपर संघर्ष केलौं
हर परीक्षामे खड़ा उतरलौं
तँ फेर ई समाज नै अहाँकेँ
अपनेलक किअए?
जइ पति ले सभ
किछु अहाँ ति‍यागलौं
वएह अहाँकेँ ति‍यागलक किअए?
किअए ने विद्रोह अहाँ केलौं
नारीक हित ले अवाज उठेलौं।
सदखिन सुनै छी हम एक्के बात।
जहन सति सीता नै बचलै
तँ केना बचतौ तोहर लाज?
जौं एगो सीता जे
अवाज उठैइतै,
तँ फेर कोनो सीता
नै परितारित होइतै।
चुप रहैक ई
सजा मिलैए,
कतेक सीता नित
वनवास भोगैए।




ठिठुराबैत जाड़

एलैए जाड़
लऽ कऽ दुखक पहाड़।
केना कटत दिन-राति‍
केना बीतत
ई जाड़क कड़ारि‍।
उजरल छौइन
टुटल अछि टाट
नै अछि कोनो ओहार
घरक चारू कात
अछि बाटे-बाट।
पुआरक ओर्हना
पुआरेक बिछौना
केकरा कहै छै
लोग कम्‍मल
केना कहै छै
होइ छै जाड़ सुहाना।
कहियो घरसँ निकलि‍ कऽ देखियो
एक राि‍त अतए बिता कऽ देखियो
ठिठुइर कऽ मरैए
लोग नित कतेक जना।
गरिबेकेँ तँ
भगवानो मारै छै
अगर नै!
तँ फेर पत्थरक देह बना
किअए नै भेजै छैक।
जे ढाहि‍ दइ
सरकारक भीखकेँ
अनुदानक नाओंपर
भेटैत मजाकक
इन्‍दि‍रा-अवास आ
सरकारी राहत कोषकेँ।

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१.राजदेव मण्‍डलक तीन गोट कवि‍ता-चि‍र प्रतीक्षा/ हाथ/ ठक२.मिहिर झा- विदागरी

राजदेव मण्‍डलक तीन गोट कवि‍ता-चि‍र प्रतीक्षा/ हाथ/
ठक

चि‍र प्रतीक्षा

नीपलौं-पोतलौं घर-दुआर
कतेक बेर केलौं झार-बहार
अपनो केलौं सोलहो ि‍संगार
कऽ रहल छी इंतजार
उताहुल भेल मन
पि‍आसल अछि‍ तन
बि‍तल जाइत क्षण
कखन हएत मि‍लन
मनमे फुलाइत सुमन
नमरले जाइत प्रतीक्षाक क्षण
असोथकि‍त भऽ गेल नयन
शंि‍कत छी बि‍फल हएत जतन
नि‍न्नसँ बन्न भेल आँखि‍क कोर
दुखाइत देहक पोरे-पोर
मन घेराएल सपनाक शोर
अहाँक झलक बुझाएल थोड़बे-थोड़
चौंकि‍ उठलौं नि‍न्न छल घोर
नै भेल छल भि‍नसर-भोर
पएरक चेन्‍हसँ हम मानि‍ रहल छी
अहाँ अाएल छलौं से जानि‍ रहल छी
पुन: एकबेर देहकेँ तानि‍ रहल छी
बाधाक नि‍न्नकेँ तोड़ि‍-ताड़ि‍
बौआइत सपनाकेँ डाहि‍-जारि‍
खोलि‍ अपन सभ घर-दुआरि‍
चि‍र-प्रतीक्षा तन-मन सम्‍हारि‍।




हाथ-

हाथ ि‍सर्फ नै अछि‍ हाथ
अन्‍हारमे जनमि‍ गेल एेमे
नाक, कान, आँखि‍, दाँत
इजोतेटा मे नै
अन्‍हारोमे रहैत अछि‍ साथ
सूँघैत अछि‍ सभ कात
जानैत टेब-टेब‍ सभ बात
हाथकेँ नै देखैत हाथ
देखैत अछि‍ हाथक करामात
कतए सँ कते धरि‍ पहुँचल हाथ
हाथसँ मि‍लैत हाथ
सि‍रजनक साथ
भऽ जाइत अछि‍ वि‍ध्‍वंसक बात
हाथ तँ अछि‍ हमरे साथ
फेर कि‍एक हेतै अधला बात।




ठक

हम छी ठक
नै कोनो शक
झूठ गप भख
साँचक नै परख
शुरूमे ठकलौं घर-परि‍वार
आगाँ ठकैत दुनि‍याँ-संसार
टका-पैसा हजारक-हजार
लगा देलौं सम्‍पति‍क अमार
ठकैक आदति‍सँ नचार
कतेको कनैत जार-बेजार
आइ छूटल पूरा भक
जखनि‍ हमर लगल ठक
एहेन जीत पार भऽ गेल
जि‍नगी बूझू बेमार भऽ गेल
सभकेँ एहि‍ना उठैत हेतै दरद
आइ हमहूँ करैत छी गरद
साँच कतए सँ आब हम पाएब
ठकबे करब वा ठका जाएब
सोचब कोनो एहेन उपाए
ऐ जालसँ

मिहिर झा
विदागरी
विदागरी
समेटल इयादक
चित्र चलचित्र
मिज्झर होइत
भावनाक ओस
अटकल गाल पर
थरथराइत
 
शब्द स्पर्श सँ
पूर्ण अंदेशा
अनंत सूनपन केँ
शांत हएत
समुद्रक आवाज
श्याम अरुण
रुकल

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पंकज चौधरी (नवलश्री)- चारिटा गजल
गजल
सभ मात-पिता केर शौख-सेहन्ता बौआ करता नाम
मगन  जुआनिक  माया  नगरी  बौआ मनसुख राम

बाबू-पित्ती घरक धरणि थम्हने छथि बनिकऽ खाम
संतति  कर्मसँ  देह  नुकौने  करम केने अछि बाम

बाबुक  अरजल  पर  में  फूटानी  माटि लगै नै चाम
जँ अपना कन्हा हऽर पड़ल तऽ जय-जय सीता-राम

अनतह  शोणित  सुखा  रहल   घर  बहै  नै घाम
बबुआनी  केर  अजबहिं  सनकी  बैरी भऽ गेल गाम

ईरखे  नान्गैर  कटबै  लै जे  तेजलक मिथिला धाम
परदेसक   माया  ओझरायल  घूमि  रहल  छै  झाम

अपना  आँगन  सोन  छोड़ि सभ अनकर बीछी ताम
घर छोड़ि घुर - मुड़िया खेलक  कहिया लागत थाम

मोल  बुझै  नहि  भावक  भाषा भाव पूछए नहि दाम
चलु  रहब  माँ   मैथिल  आँगन  नेह  बहै जहि ठाम

"नवल"  निवेदन मैथिल जनसँ छोडू नै मिथिलाम
छै  पागक शोभा  माथे पर   चरणहि नीक खराम

*आखर-२०
बौआ केर छटिहारक राति मिथिला-विधिए नियारल काजर 
शुभग - सिनेहक ठोप करिकबा  मौसी हाथक पाड़ल काजर

नवरातिक अहि शुभ - बेलामे अबै अष्टमिक राति डेराओन 
माय अपन संतति सभके  तैं आंखि दुनु चोपकारल काजर

अन्हरिया  राति  अमावस  केर ई दीप - पुंज मुंह दूशि रहल 
राति दिवालिक लेसलहुं  टेमी तंत्र - मन्त्र उपचारल काजर 

कते  सुहन्गर  स्वप्न सजोने कजरायल आँखिक पेपनी पर
बरसाति - पंचमी - मधुश्रावनि नवकनिया के धारल काजर 

नव - यौवन के नव - तरंग इ  "नवल" मोन भसियेबे करतै 
गोर - गोर चन्ना सन मुंह पर  सजनी कियै लेभारल काजर

*आखर-२४
सजनी रहि - रहि टेमी बारी
भरि  कजरौटा  काजर पारी 

थोपि रहल छी  काजर सौंसे 
ओहिना  मादक नयना भारी

आंखिसँ आँखिक फेरम-फेरी
जेना  होय  मऊहक़ के थारी 

देह  रहल आ  प्राण  बिलेलै 
नयन - वाण सँ जिबते मारी 

करिया आँखिक पोखरि कात 
स्वपन  सेहन्ता  केर बैसारी 

कहू छोडि इ  आँखिक अमृत 
पीब कियैक  हम दारु - तारी

मोन के जीतैऽ जे  तकरा पर 
"नवल" कियै ने जीवन हारी 

*आखर-११
ई प्रश्न जे उठल  आब  बाबुक बाद के
भऽ गेल कान ठाढ़ सभ दऽर-दियाद के

उपजा के बेरमे तऽ हांसू पिजा रहल 
अहि खेतमे मुदा देत पाइन-खाद के  

ममरी तऽ खागेलै सभ लुझि-लपटि कऽ 
जे पेईनमे बंचल छै  से पीत गाद  के 

बाँटि-चुटि सभकिछु बखरा लगा लिय
सहतैक    अनेरे  बरदिक  लाद  के 

गीजल जे पाईके ओ भीजत की नोरसँ 
वानर की जानऽ गेल आदक सुआद के

भतबऽरी के प्रथा ई चलल गामे-गाम 
कहतै समाद के  आ सुनतै समाद के

करेजसँ  नञि ओ "नवल" पेटसँ छलै 
संबंध  केर  गंध  उड़ल  संग पाद  के

*आखर-१५

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बिन्देश्वर ठाकुर, धनुषा नेपाल, हाल; कतार
बिन्देश्वर ठाकुर, धनुषा, नेपाल। हाल- कतार।
गजल 

एखन धरि पैसा कमेलौं कि नै यै?
खातामे पैसा पठेलौं कि नै यै?
घरक स्थिति भाड़मे जाए मुदा
हमरा लेल हसुली बनेलौं कि नै यै?

फुसक घर हमरा काटऽ छुटैए
शहरमे बिल्डिङ बनेलौं कि नै यै?

फाटल पहिरु अहाँ ताहिसँ गम नै
हमरा लेल चुनरी लएलौं कि नै यै?

बहुते कमाइ छी बुधनाकेँ कहब
हमरा लेल हिस्सा लगेलौं कि नै यै?


 
गीत
अनारसन छिटकल अहाँक जवानी
मदहोस देहियापर लाखो परेसानी
रस टपटप जेना पाकल अरनेबा
एकटा अदापर अछि दुनियाँ दिवाना। 
पायल बजा दिल घायल कएलौं
बिन बादल बर्षा करै छी
आबि आगू कोरामे बैसू
गाल दिअ कनी दाँत कटै छी।

दिल तोड़ब अपराध छिऐक
दिल जोड़ब नै अछि कोनो पाप
बदनमे चोली आ कमरमे लहङा
चाही तँ अहाँ दिअ नाप।

बड नीक लगै छी साड़ी अथबा
सुटो जखन लगबै छी
चाल चली अहाँ हिरनी जैसन
दिल हमर धड़कबै छी।

बाल अहाँक रेशम रेशम
टमाटर जेहन गाल अछि
ओठ जेना स्वीट ललीपप
आ रुपो कतेक बबाल अछि। 
देख अहाँकेँ जिस्म सराबी
बढैत अछि हमर बेताबी
एकबेर बस प्रेम करऽ दी
नै हएत अहाँकेँ कोइ खराबी।

दिल अहाँक निठुर सोना
चान्दी सन चमकैत मन
उपरसँ पिताएब बेसी
मुदा भीतरसँ नम्बर वन।

जरुरी चीज जीवनमे चाही
अहाँ ओ बजार छी
सेब, सन्तोला,अंगूर आ
अहीं हमर अनार छी।

हीरा, मोती, धन-दौलत
अहीं डोली कहार छी
बिन जीवन अन्हार अहाँकेँ
अहीं खुशीक बहार छी। 



 
चेतना 

स्वार्थ-स्वार्थसँ भरल संसार
छिनए सबके सब अधिकार
अपन स्वाभिमान बचएबाक हेतु 
करे लाखो अत्याचार।।१।।

की कहु दुनियाँक रीत
किछु नै समझमे आबैए
अपन झूठ शान सौगात ला
मिथ्या दोस लगबैए।।२।।

मानव भऽ मानवता भुलब
ई केहन अनैतिक बात कहू
नैतिक पतन,अस्तित्वमे दाग लऽ
आब कथीक पश्चताप कहू।।३।।

अपील सुनु धधकैत इनसान
अपनही जैसन सबके मान
स्वार्थ बिना जौँ जिन्दगी टेबब
निश्चित बनत देश महान।।४।।


 

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बालानां कृते

बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥
१०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२)
आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥
आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥
मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।
ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।
हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आसर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आघोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आयुवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आमित्रक उदय होए॥
मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि।
एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।
अन्वय-
ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म
रा॒ष्ट्रे - देशमे
ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त
आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए
रा॑ज॒न्यः-राजा
शुरे॑ऽबिना डर बला
इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण
ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला
म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर
दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली)
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित
सप्तिः॒-घोड़ा
पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री
जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला
र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर
स॒भेयो॒-उत्तम सभामे
युवास्य-युवा जेहन
यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे
वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला
निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे
नः-हमर सभक
प॒र्जन्यों-मेघ
वर्षतु॒-वर्षा होए
फल॑वत्यो-उत्तम फल बला
ओष॑धयः-औषधिः
पच्यन्तां- पाकए
योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा
नः॑-हमरा सभक हेतु
कल्पताम्-समर्थ होए
ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी।
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'विदेह' २२८ म अंक १५ जून २०१७ (वर्ष १० मास ११४ अंक २२८)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -  गौरी चोरनी ,  गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर ...