Thursday, November 01, 2012

'विदेह' ११६ म अंक १५ अक्टूबर २०१२ (वर्ष ५ मास ५८ अंक ११६) PART VI



१.पवन कुमार साह २.बिपिन कुमार कर्ण- कवि‍ता-देखु केहेन ई भारत ि‍नर्माण ३.रामदेव प्रसाद मण्‍डल झारूदार’- झारू
पवन कुमार साह
कवि‍ता

मि‍थि‍ला वासी

कहबै छी हम मि‍थि‍ला वासी
जेकर नै दुनि‍याँमे जोड़।
माथ उठा कऽ, घुमरि‍-घुमरि‍ कऽ
कहबै छी हम बड़ बेजोर।
पलटि‍ कऽ देखू अपन इति‍हास
ने बुझाएत कोनो उपहास।
ई ओ माि‍ट अछि‍
जतए भेल पहि‍ले लोकतंत्रक वास।
हम बुझै छी, लोकतंत्रमे सभ समान
फेर बताउ कि‍एक बनल छी बइमान?
जाि‍त-पाति‍क भेद छै, अपनेमे वि‍भेद छै।
जाति‍क नाओंपर लेने छी कमान
की यहए अछि‍ अपन इमान?
एक वाक् एके गाम
एक पोसाक एके नाम
दरि‍द्र-सम्पन्नक कि‍ काम
ऊँच-नीक सभ एक-समान।

खाउ सप्‍पत एक बति‍या
नै बात हुअए कहि‍यो बसि‍या।
एक छी हम छी बेजोड़
नै टुटत कहि‍यो ई जोड़।


बिपिन कुमार कर्ण
कवि‍ता

देखु केहेन ई भारत ि‍नर्माण

देशक आर्य भेलाह अनार्य
नास्‍ति‍क राज आस्‍ति‍क गमार।
प्रेम वि‍हीन भेल हि‍न्‍दुस्‍तान
देखु केहेन ई भारत ि‍नर्माण।

जनता जागरूक भेल होशि‍यार
नोनि‍याँ रानी, गेनहारि‍क हार।
गोपालकांडाक हवाइ अभि‍यान
देखु केहेन ई, भारत ि‍नर्माण।

अमेरि‍का करता रि‍टेलक बेपार
देशक आन मनमोहन, पवार।
गोल अठन्नी रूपैया महान
देखु केहेन ई, भारत ि‍नर्माण।

देशक हार पंजा सरकार
ड्रोन ठाकरे भेल सरदार।
देशद्रोहकेँ एहेन सम्‍मान
देखु केहेन ई, भारत ि‍नर्माण।

देश हीरो खुर्शिद सलमान
राज भैया केलनि‍ टु जीक दान।
भेल घोटाला खानक खान
देखु केहेन ई, भारत ि‍नर्माण।

ऐ युगक नायक अजमल कसाब
कॉग्रेसक लेल ई भ्रमक जाल।
करू नाथ क्षमा हे, प्रणव ि‍नधान
देखु केहेन ई, भारत ि‍नर्माण।

अन्ना, बाबा घोल मचौलक
गेल लोकपाल सि‍मरि‍या धाम।
आजुक भारतक आत्‍म सम्‍मान
देखु केहेन ई, भारत ि‍नर्माण।

रामदेव प्रसाद मण्‍डल झारूदार
एकटा अनुपम गीत
झारू-
गरीब भूखल कम रहै छै, भूखल बेसी रहै धनवान।
गरीब भूख बस सुखल रोटी, अमीर भूखल हीराक खान।

गीत-
तूमलोग केना कऽ जीवि‍ते ओतए
आपलोग जतए बेमार छै।
असंतोषमे माथ दुखाइ छै
स्‍वार्थक चढ़ल बोखार छै।
अहाँ बाबू बनू बरूआर
हम छी सेवाले तैयार।
मान-सम्‍मानमे सभकेँ बरोबरि‍
जीबैक अधि‍कार छै।
असंतोषमे......।

आप उरू मोटर गाड़ी
साइकि‍ल हमरो रहए तैयारी।
एक दोसरक घाट उतारनाइ
दुनि‍याँक बेवहार छै।
असंतोषमे......।

अहाँ पाबू पुआ-खीर
चुल्हा बुझै ने हमरो भीड़
इज्जतसँ दू वक्‍तक रोटी
हमरो तँ दरकार छै।
असंतोषमे......।

अहाँ पहि‍रू सूट-सफारी
फाटए हमरो ने पढ़ि‍या साड़ी
तन झाँपि‍ हमहूँ जीबी
हमरो तँ सरोकार छै।
असंतोषमे......।

अहाँ शोभा महल अटारी
झोपड़ी हमरो रहै तैयारी।
सीर छुपबैले छत होइ ऊपर
हमरो तँ दरकार छै।
असंतोषमे......।

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१.बाल मुकुन्द पाठक- किछु गजल २.सन्दीप कुमार साफी
दूटा कविता

बाल मुकुन्द पाठक
गजल
गजल

आइ हमर मोन बड्ड खनहन अछि
ककरोसँ हमरा तँ नै अनबन अछि

 
तरुआ तरकारी आ पापड बनि गेल
देखूँ चूल्हा पर भातो ले अदहन अछि

आसिन एलै बजरखसुआँ गर्मी गेलै
ठंढा ठंढा पुरबा बहै सनसन अछि

फेर दुर्गा मेला हेतै नाच आ लीला हेतै
देखूँ खुल्ला पैसा बाजैत झनझन अछि

घर परिवार मे तिहार के दिन एलै
अंगना मे चलैत नेना ढ़नमन अछि

कनिये दिनके तँ छै ई पावैनक मजा
कातिकक बाद फेर ऊहे अगहन छै

सरल वर्णिक बहर , वर्ण 15

 

फेर आइ आँखिसँ नोर बहाबै छी
 

रहि रहि अहीकँ बात घुराबै छी
 

कतै छै सिनेह ई कोना हम कहूँ

चलि आउ एखनो कियै सताबै छी ।

गेलौँ चलि कतौ हमरा बिसरिकँ

साँझेसँ अँहीँ लेल नोर खसाबै छी ।

देखूँ कानि कानि साँझसँ भोर भेलै
 

भोरे भोर हम मदिरा चढाबै छी ।

मदिरोसँ बढिकँ अँहीँ मे नशा ये

ओहि नशा लेल फेरसँ बजाबै छी ।

नीन्नोँ नै आबै जौँ सपनो मेँ देखतौँ

सुतबा ले कतै मोनकेँ मनाबै छी ।

हाथ जोडिकँ ई कहौँ हे भगवान

कियै नै अहाँ मुकुन्दसँ मिलाबै छी ।।

सरल वर्णिक बहर ,वर्ण 13

 
आस टूटल भाग भूटल
आँखि इनहोरे सँ शीतल 

घुरिकँ आबूँ ई जिनगी मेँ
यै छी अहाँ कियैक रुसल 

सिनेह केलौँ तेँऽ दुख पेलौँ
कानियोँ के नै चैन भेटल 

लहर उठल करेजासँ
लागै कि जेना साँस छूटल 

कि करबै जीके ई जिनगी
अहाँक जौँ ना संग भेटल 

आस टूटल भाग भूटल
आँखि इनहोरे सँ शीतल

गजल

आइ हम बड़ उदास छी ,कोना कहौँ ककरासँ

ओहि दिनसँ कानैत छी यौ,अहाँ गेलौँ जहियासँ

हे यौ हमर प्रीतम ,अहाँ एखनो तऽ घर आबूँ

दिन राति हम एतबे , प्रार्थना करै छी दैबासँ

चारिये दिन तँ बुझियौ ,चारि साल सन बीतल

अहाँसँ बतियाइ लेल फोनो माँगलौँ अनकासँ

पछबा के बहलासँ ,बात एगो इयाद आएल

चलि गेलौँ नैहर हम तँ ,रुसल छलौँ अहाँसँ

चाही नै कपडा लत्ता ,और चाही नै धन दौलत

एतबे कहौँ मुकुन्द चलि आबु,जल्दी पटनासँ

सरल वार्णिक बहर
वर्ण-18

गजल

कि लिखूँ हम गजल उमर नादान अछि
हुनकर दीवाना ई दुनिया जहान अछि

 
रुपकँ जलवा देखूँ लागै छथि चान सन
गोल गोल गोर गाल पूर्णिमा समान अछि

केश अहाँक रेशम सन आँखि मृग जेना
धायल भेलौँ देखिकँ होश नै ठेकान अछि

गुलाबी गाल पर नीक लागै ठोरक लाली
अहीँमे अटिकल छौड़ासभँकँ जान अछि

कमर जे लचकैये देखि मोन बहकैये
'मुकुन्द' के लागे जेना हुस्नके दोकान अछि

सरल वर्णिक बहर ,वर्ण 16

सन्दीप कुमार साफी
दूटा कविता
माघ क शीतलहरी
बाप रे बाप होइए प्राण चलि जाएत
मन नै होइए ओछैनसँ उठी
जवान क ई हाल तँ
बूढ़क की
भरि माघ पिअब सभ की
पाइनो बरफ भऽ गेल
दिन भरि धुइनसँ
आँखि नै सुजहाए
ओछाइ-बिछाइ सभ गेल तीति
सन-सन-सन-सन
पछवा बहैए
केरा पातसँ बुन्नी खसैए
हाथ पएर सभ सुन्न भऽ गेल
लोचना करए बाँझीक धधरा
सुटकल रहैए दलानमे बगरा
एक महिनासँ रौद नै भेल
आलू गाछ सभ गलि गेल
बाप रे बाप, होइए प्राण चलि जाएत

रसगुल्लाक जबार
नोत दै छी यौ नोत दै छी
रसगुल्ला जबारक नोत दै छी
हम आएल छी महरैल गामसँ
समुच्चा गामकेँ नोत दै छी
मुखिया जी यौ
लखन काका
आइ सौँझुका हम नोत दै छी
पियोर छेनासँ बनल रसगुल्ला
काशी भाइ यौ नोत दै छी
पहिल तोरमे पहुँचब सभ गोटए
सबेरे सकाल कऽ नोत दै छी
पूरी तरकारी अओर देब
तखन
तइपर सँ देब रसगुल्ला तोपि
नोत दै छी यौ
नोत दै छी
रसगुल्ला जबारक नोत दै छी


ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१.विनीत उत्पल- गजल २.अनिल मल्लिक- गजल ३.किशन कारीगर- (हास्य कविता)

विनीत उत्पल 
गजल
नेनामे जखन कानैत रही, तूँ चुप हमरा कराबैत रहीँ
हम नहि मानैत रही तँ तूँ प्रेमसँ हमरा खुआबैत रहीं

तोहर आंचर छल ई दुनिया नहि हम किछु जानैत रही
मन दब रहला पर हमरा लोरि गाबि कऽ सुताबैत रहीं

पहर धरि काज केलाक बाद तूँ दम साधि कऽ सुतैत रही
हमर टुहैक कानबसँ भरि-भरि राति माय जागैत रहीं

लोकक उलाहना सुनैकऽ बादो नै कखनो तमसाबैत रही
अपना नहि पीबि कऽ ओ दूध हमरा जरूर पियाबैत रहीं

जन्मैत संगे देखै छी मायकेँ पहिने ठाढ़ कियो ओतय रही
आँखिमे भरल नोरक संग उत्पलकेँ देखि मुस्काबैत रहीं
सरल वार्णिक बहर वर्ण -23


अनिल मल्लिक
गजल
 
बहीनक चोटी पकडि कखीचीएै गुल्लक कहियो फोडि दियै 
पुजा करैक लेल फेरो हम ओकरा फूलो कहियो लोढि दियै
 

 
कतेक उछन्नर करीएै ओकरा आओर फेरो मेल कतेक 
खौंझाबय लेल बाउलक घरके कहियो कहियो तोडि दियै
 

बरख बितैत अछि आब तराखी की आ भरदूतिआ केहन
 
पहिले ओकर कोनो पाबनि मे कहाँ एना कहियो छोडि दियै
 

तेरह सँ तीन बननाई रीति छै खून कहूँ पातर होइछै
 
एखन रहि जाइ छै तार टूटले एकरा कहियो जोडि दियै
 

माम अबै छलाह पैदले भिजैत कोशो कोश ओहि बरखा मे
 
सोचिते रहलौं हम जा क' सीनेहक खेत कहियो कोडि लियै
 

गँगा नओतल जमुना कहिते आँखि केहन ओकर चमकै
 
अहि भरदूतीया मे तछी ठनने खुशी मे ओकरा बोडि दियै


किशन कारीगर


 
लोक करे लूटमार जेंका
                         (हास्य कविता)

लोभी बैसल अछि लोभ मे जोंक जेंका
ओक्कर चालि चलब झपटमार जेंका
सरकारी खरांत लेल बेहाल भेल
लोक करे लूटमार जेंका.

लोभी लोकक भीड़ मे केकरा समझाएब
"कारीगर" बैसल अछि चुपचाप बौक जेंका
बेईमान लोक नहि ईमानदारी सीखत?
लोक करे लूटमार जेंका.

डेग-डेग पर भ्रष्टाचारी भेटत
 
ओ जाल बिछौने
  बैसल अछि
चालि चलब प्रोपर्टी दलाल जेंका
लोक करे लूटमार जेंका.

सरकारी व्यबस्थाक हाल बेहाल
भ्रष्टाचारक बढ़ी गेल अछि मकड़जाल
एही ओझरी मे ओझराएल कतेक लोक
मुदा नेता नाचै अपने ताल.

जनताक नाम पर फुसियाहिंक जनसेवा
नेतागिरी के धंधा चमकि गेल
सभ खाए रहल सरकारी मेवा
जहिना बाढ़ी मे अपटल माछ कतेक रेवा.

बेमतलब के करै विदेश यात्रा
विकसित योजनाक नाम पर
बेहिंसाब खर्च करै जेना
सरकारी धन छैक ओक्कर बपौती जेंका.

बाढ़ी-सुखार सँ लोक तबाह भेल
मुदा कोनो स्थाई समाधान नहि कराउत
हवाई सर्वेक्षण मे नेता जी
फुसियांहिक बिधि टा पुराउत.

राहत आ बचाव के नाम पर
रहत पैकेजक बंदरबांट भ रहल
उज्जर कुरतावला सभ सँ आगू
ओक्कर चालि चलब झपटमार जेंका.
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
बालानां कृते
१.शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू- बिना रदीफक बाल-गजल २.मुन्नी कामत- किछु बाल कविता ३.अमित मिश्र- बाल गजल ४.जगदानन्द झा मनु- माटिक बासन 
शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू
बिना रदीफक बाल-गजल

उगल सुरुज उठू बौआ भऽ गेलै भोर
माॅझ आङहमे कौआ कौआ बनल मुँह जोर

आँखि‍ काँची भरल सभ पि‍पनी सटल
मुँह लाले लागय जेना पाकल परोर

झट उठू फट करू अहाँ शौच स्‍नान
बासि‍ भात संग रखने छी गौंचीक झोर

घंटी बाजल गुरुदेव आबि‍ गेलखि‍न
पहि‍ल कक्षाक नेना करय धनधोर

नै मोनसँ पढ़ब तँ कि‍यो मानत केना
जौं मुरुखे बौड़ाएब सभ बूझत चोर

वागीश मात्र एक दीन-दुखि‍याक नाथ
वर्ण आले तँ की ज्ञान दीप हएत गोर

ईश जेठकेँ करु सि‍नेह छोटसँ राखू
नि‍त राखब धि‍यान मान माइक कोर

(वर्ण- 15)

मुन्नी कामत
किछु बाल कविता
जतरा
बाबू आबि रहल
अछि जतरा
लेब अहाँ सँ लब कपड़ा
घुरै लऽ जएब
अहाँ संगे मेला
देखब ओतऽ
कठपुतलीक खेला
कीनब हम
एगो उड़न जहाज
तइ पर बैइठ
घुमब सगरे संसार।
अंकक मेल
चलू खेलब आइ हम एगो खेल
जइमे एक संगे करब कतेक अंकक मेल।
1.2.3.4.5.6.7.8.9.दस
अइ सँ आगू चलत एगो बस।
छुक-छुक नै
ई तेज दौड़ै यऽ
एक पर एक एग्यारह
भऽ जाइए।
एक पर दू बैठ 12
एक पर तीन बैठ 13
एक पर चारि बैठ 14
एक पर पाँच बैठ 15
एक पर छअ बैठ 16
एक पर सात बैठ 17
एक पर आठ बैठ 18
एक पर नअ बैठ 19
दू पर बैठ जिरो बीस भऽ गेल
पहिले एक असगर छल
आब उन्नीस टा भऽ गेल
अहिना एकता अपन जीवन
मे अहूँ लाउ
मिल कऽ अपन शक्ति बढ़ाउ।
माय हमरा एगो
बहिन आनि दे
चल बजार उ
बजैबला गुड़िया
कीन दे।
जे हमरा भइया कहत
हर साल हमरा हाथ
पर राखी बान्हत
उ चुलबुलिया मुनिया आनि दे।
किए तूँ हमरा
असगर रखने छऽ
हमरासँ बहिनक स्नेह
छिनने छऽ
तू अपन कान्हाकेँ
द्रोपदी आनि दे
माय हमरा एगो बहिन आनि दे।
ककर भैया तोरा सतबै छउ
कोन बात छै जे तोहर
आँखि भरै छउ
तूँहो तँ ककरो बहिन छी
तँ फेर किए हमरा
बहिन लऽ कंश बनल छी
हमरा तूँ एगो मैका दऽ दे
माय हमरा बहिनक जिनगी बाझि दे
ई सोन चिरैया चिड़िया आनि दे
माय हमरा एगो बहिन आनि दे।

अमित मिश्र
बाल गजल

माँटिकेँ कर जोड़ि करियौ नमन बौआ
देख रहलौँ आइ सुन्नर सपन बौआ

 
भाग देशक ताग नेहक छी अहाँ यौ
छी अहाँ गमकैत मैथिल सुमन बौआ

पानिमे डूबि जीबै छी मगर यौ
देख लै ई विश्व ताकत अपन बौआ

मारि झगड़ा नै फँसै से मोनमे यौ
शीत शोणित अपन नै छै जलन बौआ

चान सन सब गुण अहाँ एखन गढ़ू यौ
समय छै एखन बनू नव रतन बौआ

फाइलातुन
2122 तीन बेर
बहरे-रमल

 

जगदानन्द झा 'मनु'
ग्राम पोस्ट - हरिपुर डीहटोल, मधुबनी 
माटिक बासन

केदार प्रसाद गामक एकटा कुशल कुम्हार । माटिक बासन जेना  घैल, ढाकन, मटकुरी बना अपन जीवन यापन करै छलाह । माटिक बासन बनेनाइ मात्र हुनक आजीवकाक साधन नहि भs s हुनका लेल  एकटा सुन्नर कारीगरी छल । अपन काज करैकाल ओ ऐना तनमय भs जाइ छलाह जेना एकटा भक्त अपन अराध्य देवताक ध्यानमे अपन तन-मनक सुधि बिसैर जाइत छैक । ओ अपन स्वं साधनासँ धिरे-धिरे छठि मैयाक सुन्नर व आकर्षित हाथी सेहो बनबए लगला । हुनकर बनाएल माटिक बासन आ छठिक हाथीक बड्ड प्रशंसा होइत छल ।
धिरे-धिरे गामक परिवेश बदलए लागल । माटिक बासनक जगह स्टील आ आन-आन धातु लेबए लागल । केदार प्रसादजीक आमदनी कम होबए लगलन्हि मुदा ओ अपन काजक प्रति  निष्ठा आ समर्पणकेँ दुवारे कुम्हारक काज नहि छोरि पएला ।
हुनक सुन्नर सुशिल बेटा बिभू नेन्नेसँ अपन पुस्तैनी काजमे माँजल । ई कहैमे कोनो संकोच नहि जे ओ अपन बाबूओ सँ बीसे । केदार प्रसादजी एहि गपकेँ नीकसँ  बुझैत अपन होनहार पुतकेँ गुणसँ मोने-मोन खुस छलाह आ चिंतीत सेहो । चिंतीत एहि दुवारे की कुम्हारक काजक कि बर्तमान छैक आ कि भबिष्य हेतै से हुनका बुझल मुदा बिभूक हस्तकौशल देखि ओकरा एहि काजसँ बाहर केनाइ उचित नहि बुझलाह । बिभू सेहो इस्कूल पढ़ाइक संगे-संग अपन बाबूक सभटा गुणकेँ  अंगीकार केने गेल ।  अपन  बाबूक छठिक हाथीसँ आगू बढ़ि ओ मूर्तिकलामे अपन हस्तकौशलक उपयोग करै लागल । ओकर बनाएल मूर्तिक चर्चा गाम  भरिमे होबए लगलै । जतए ओकर बाबूक बनाएल छठिक हाथीकेँ एगारह टाका भेटन्हि ओतए ओकर बनाएल छोट-छोट कनियाँ- पुतड़ा सभकेँ सय-सबासय टाका भेटअ लगलै । बिभू अपन बाबूक देख-रेखमे मूर्तिकलामे दिनो- दिन आगू बढ़ए लागल । आब ओकर बनाएल माए सरोस्वती, कृष्णास्टमी, विश्वकर्मा पूजाक मूर्तिक माँग चारूकातक बीस गाम तक होबए लगलै मुदा बिभूक बाबू तैयो ओकर बनाएल मूर्तिमे कोनो ने कोनो दोख निकालि आ ओकरा अओर बेसी नीक मूर्ति बनाबैक प्रेरणा देथिन । बिभू सेहो हुनक गपकेँ मन्त्र मानि आगू आरो नीक मूर्ति बनाबएमे लागि जे ।    
बिभू दसम वर्गकेँ बाद इस्कूली पढ़ाइ छोड़ि पूर्णतः मूर्तिकलामे अपनाकेँ समर्पित कए लेलक । अठारहम बरखक पूर्ण बुझनूक भs गेल आब ओकरा नीक बेजएकेँ ज्ञान भs गेलै । ओकर मूर्तिक प्रशंषा आब गाम नहि, जिला नहि राज स्तरपर होबै लगलै । आब  तँ ओकर बनाएल एक-एकटा मूर्तिकेँ दू-दू तिन-तिन हजार टाका भेटए लगलै । मुदा ओकर बाबू एखनो ओकर मूर्तिमे कोनो ने कोनो दोख निकाइल ओकरा आर सुन्नर मूर्ति बनाबैक निर्देश देथिन । पहिले बिभू हुनक गपकेँ मन्त्र मानि कमी दूर करैक चेष्टामे लागि  जाइ छल मुदा आब हुनक गपसँ ओकर मोन कतौ-ने कतौ आहत होइत छलै । मुदा बिरोध करैक सहाश नहि तेँ मोनकेँ मारि हुनक बताएल निर्देशमे लागि जाइ छल  
जेना-तेना काज आगू बढ़ैत रहल आ ओकर बनाएल गेल मूर्तिक चर्चा आब राजक सीमासँ निकैल बाहर दस्तक देबए लगलै । राजसरकारकेँ गृहमंत्रालयसँ बिभूकेँ पत्र एलै जाहिमे ओकर बनाएल गेल मुर्तिकेँ अखिल भारतीय मूर्ति प्रदर्शनीमे राखक व्यवस्था कएल गेल रहैक । सभटा खर्चा राजसरकारक आ विजेताकेँ देशक सर्वश्रेष्ट मूर्तिकारक सम्मानकेँ संगे-संग एक लाख टाकाक नगद इनाम सेहो ।   ई पत्र पाबि बिभूकेँ बड्ड प्रसंता भेलै । सभसँ पहिले दौरल-दौरल अपन बाबूकेँ एहि गपक सुचना देलक । केदार प्रसादजी सेहो बड्ड प्रसन्य भेलाह हुनकर जीवन भरिकेँ मेहनत रंग लाइब रहल छल । बिभू राति-राति भरि जागि-जागि कए अपन मार्गदर्शक गुरु बाबू संगे लागि गेल ।
एकसँ एक नीक-नीक मूर्ति बनेलक मुदा केदार प्रसादजी सभ मूर्तिमे कोनो ने कोनो कमी निकाइले देथिन । केदार प्रसादजीक बताएल कमीकेँ दूर करैकेँ बदला बिभूक मोनमे आब नकारात्मक प्रवृति घर करए लगले । हुनक बताएल कमीपर आब ओ सबाल-जबाब करए लागल । काइल्ह प्रतियोगता लेल मूर्ति भेजैक अंतिम दिन आ आइ बिभू अपन बनाएल मूर्ति सभमे सँ एकटा सभसँ नीक मूर्तिकेँ अंतिम रूप देबएमे लागि गेल । केदार प्रसादजी बारीकीसँ ओहि मूर्तिकेँ निरीक्षण करैत, बिभूक दिमागमे हलचल चलि रहल छल - "हाँ आब तँ ई कोनो ने कोनो गल्ती बतेबे करता ।"
ततबामे केदार प्रसादजी अपन चुप्पीकेँ तोरैत बजलाह -"सुन्नर ! आइ तक बनाएल गेल मूर्ति सभमे सर्बश्रेस्थ ।" कनीक काल चुप रहला बाद फेर -"  मुदा ।"
मुदा की आब  तँ  बिभूक मोन बिफैर गेलै - "अबस्य कोनो ने कोनो कमी गनेता ।"
केदार प्रसादजी अपन गपकेँ आगू बढ़ाबैत -" ई जँ एना रहितेए तँ  आरो बेसी नीक, आ ई रंग जँ फलाँ फलाँ रहथि तँ  जबरदस्त होइते ।"
नैन्हेटासँ जिनक गपकेँ मन्त्र मानि पूरा करैमे जि-जानसँ लागि जाइ छल आइ हुनक गपकेँ नहि पचा पएलक । बिफैर कए बाजि उठल -"रहै दियौ ! अहाँकेँ  तँ एनाहिते दोख निकालए अबैए, अपन बनेएल ढाकन बसनी  तँ कियो एको टाकामे नहि किनैए आ हम केतबो नीक मूर्ति बना लि कोनो ने कोनो दोख अबश्य निकाइल देब ।"
बिभूक गप सूनिते मातर केदार प्रसादजीक शांत मुद्रा भंग भए सोचनीए भs गेलनि । एकटा नमहर साँस लैत बिभूक पीठ ठोकैत बजलाह -"बस बेटा बस ! जहिया व्यक्तिकेँ अपन पूर्णताकेँ आभाष भs जाइ छैक ओकर बाद ओकर जीवनक विकास ओतहिए रुकि जाइ छैक । पूर्णताकेँ आभास दिमागक आगू बढ़ैक चेतनामे लकबा लगादै छैक ।"
किछु छन चुप्प,दुनू गोटे शांत । बिभूक आँखिसँ नोर टघरैत जे आइ ई की कए लेलहुँ, ओकरा अपन गल्तीक ज्ञान भs गेलै । केदार प्रसादजी आगू - "हमर सपना छल जे हमर बेटा राजक आ देशक नहि वरण दुनियाँक सर्वश्रेष्ट मूर्तिकार  बनत.....मुदा नहि । कोनो गप नहि हमराकेँ जनै छल ? कियो नहि । हमर बेटाकेँ पूरा राज जनैत अछि एकटा नीक मूर्तिकारकेँ रूपमे । हमरा लेल बड्ड पैघ गप अछि । मुदा हमर सपना ------- आब नहि पूरा होएत । ई कहि ओ ओहि कक्षसँ बाहर भs गेला ।    




 

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।

No comments:

Post a Comment

"विदेह" प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका http://www.videha.co.in/:-
सम्पादक/ लेखककेँ अपन रचनात्मक सुझाव आ टीका-टिप्पणीसँ अवगत कराऊ, जेना:-
1. रचना/ प्रस्तुतिमे की तथ्यगत कमी अछि:- (स्पष्ट करैत लिखू)|
2. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो सम्पादकीय परिमार्जन आवश्यक अछि: (सङ्केत दिअ)|
3. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो भाषागत, तकनीकी वा टंकन सम्बन्धी अस्पष्टता अछि: (निर्दिष्ट करू कतए-कतए आ कोन पाँतीमे वा कोन ठाम)|
4. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो आर त्रुटि भेटल ।
5. रचना/ प्रस्तुतिपर अहाँक कोनो आर सुझाव ।
6. रचना/ प्रस्तुतिक उज्जवल पक्ष/ विशेषता|
7. रचना प्रस्तुतिक शास्त्रीय समीक्षा।

अपन टीका-टिप्पणीमे रचना आ रचनाकार/ प्रस्तुतकर्ताक नाम अवश्य लिखी, से आग्रह, जाहिसँ हुनका लोकनिकेँ त्वरित संदेश प्रेषण कएल जा सकय। अहाँ अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर सेहो पठा सकैत छी।

"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
मुदा ई तँ मात्र प्रारम्भ अछि।
अपन टीका-टिप्पणी एतए पोस्ट करू वा अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ।

'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...