Wednesday, November 28, 2012

'विदेह' ११८ म अंक १५ नवम्बर २०१२ (वर्ष ५ मास ५९ अंक ११८) - PART IV



नवेंदु कुमार झा
आर्थिक संकट मे चेतना, दू दिनक हएत समारोह
मिथिलांचलक प्रतिनिधि सांस्कृतिक संस्था चेतना समिति द्वारा प्रति वर्ष आयोजित त्रिदिवसीय विद्यापति स्मृति  पर्व समरोह ऐ वर्ष दू दिवसीय हएत। 2627 नवम्बर केँ आयोजित ऐ समारोहक दरमियान कवि गोष्ठी विचार गोष्ठी, सांस्कृतिक कार्यक्रम आ नाटकक मंचन कएल जाएत। सूत्रसॅ भेटल जनतबक अनुसार चेतना समिति, आर्थिक संकटक दौरमे अछि तैॅ ऐ वर्ष मात्र दू दिनक समारोह हएत। समितिक मठ विद्यापति भवनक गोटेक एक वर्षसॅ पुननिर्माणक काज चलि रहल अछि तेॅ समितिक आमदनी घटि गेल अछि। आमदनी घटलाक संग महगीक ऐ दौरमे खर्च कम नै भेल आ समितिपर आर्थिक संकट आबि गेल अछि तेॅ अपन सीमित संसाधनक कारण आर्थिक संतुलन बनाएल रखबाक लेल बहु प्रतीक्षित वार्षिक आयोजनक समय अवधिमे कटौती कएलक अछि।
समारोहक आयोजन लेल भेल बैसारक दरमियान विद्वान सचिव, कर्मठ अध्यक्ष आ जीनियस मार्गदर्शक समितिक आर्थिक संकटक जनतब दैत समारोह मात्र दू दिन आयोजित करबाक निर्णय सुनौलनि तँ समितिक मठाधीश सभक स्वाभिमान एकाएक जागि उठल आ ओ ऐपर अपन विरोध जनौलनि मुदा तीन सदस्यीय ई प्रतिभा सम्पन्न कोर कमिटी ऐपर कान नै देलक आ अपन निर्णयपर मोहर लगैबामे सफल रहल। ओना तॅ देशमे विदेशी निवेशक कारण आर्थिक संकटक बदरि लगबाक आशंका विरोधी दल केँ भऽ रहल अछि मुदा ऐ आर्थिक संकट सभसॅ पहिल शिकार जेना चेतना समिति भऽ गेल अछि।
समितिक ऐ निर्णयसॅ राजधानी पटनाक सक्रिय सामाजिक-सांस्कृतिक मैथिलजन आक्रोषमे छथि। ओ समितिकेँ आर्थिक संकटसॅ उबारबाक लेल अपन योगदान देबऽ चाहैत छथि मुदा चेतनाक मठाधीश कर्ताधर्ता जेना अचेत भऽ गेल छथि। हुनका समाजसॅ सहयोग लेबऽ मे कोनो रूचि नै छनि। ओ अपन असफलताकेँ उजागर नै होमए देबऽ चाहैत छथि तँ बाबा विद्यापतिक मठ बनल चेतना समितिक मठाधीशक गर्दनिमे घंटी बन्हबाक लेल सेहो ओ अपन समयक बर्बादी बुझि रहल अछि। पटनामे एक समय समितिक सक्रियताक कारण तीन दिन विद्यापति स्मृति पर्व समारोह प्रदेश भरिमे चर्चाक विषय बनैत छल। समय दर समय आम मैथिलक प्रति समितिक उदासीनता सॅ ऐ समारोहक दायरा घटैत जा रहल अछि आ कहियो हार्डिंग पार्क सन पैघ मैदान ऐ समारोहक लेल छोट पड़ि जाइत छल तँ आब उद्घाटन समारोह आ कवि सम्मेलनक लेल जगह पैघ भऽ जाइत अछि। मैथिल जनक ऐ समारोहक प्रति घटैत रूचिक कारण समारोह पर अस्तित्वक संकट आबि गेल अछि। तीन दिनक वार्षिक आयोजन आब दू दिवसीय भऽ रहल अछि।
दू दिनक कार्यक्रम आयोजित करबाक निर्णयक बचावक लेल समिति सेहो जोड़गर तर्क रखने अछि। समिति सूत्र ऐ संबंध मे तर्क दऽ रहल अछि जे विद्यापति भवनक पुनर्निर्माण आ कार्यक्रम स्थल नै भेटलाक कारण अवधि घटाओल गेल अछि। कार्यक्रम प्रति वर्ष निश्चित समयपर निर्धारित अछि तँ समिति कार्यक्रम स्थल आरक्षित करबामे विलम्ब किए केलक, ऐपर मौन अछि। दरअसल समितिपर व्यक्तिवादी एकाधिकार हावी अछि। ऐ एकाधिकारक चुनौती देबाक साहस केओ नै करऽ चाहैए। एक दिस समिति ऐ वार्षिक आयोजनकेँ औपचारिकता बुझि रहल अछि तँ राजधानीक मैथिल जन सेहो एकर जयबारी आयोजन बुझि अपन उपस्थिति दर्ज करैबाक प्रयास करैत छथि।
(मुख्यमंत्री पाक यात्राक बिहार सरकारक आन समाद www.prdbihar.gov.in or www.prdbihar.gov.org पर उपलब्ध अछि।  

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com  पर पठाउ।

 

३. पद्य








३.७.रामवि‍लास साहु- बाल कवित

३.८.१.किशन कारीगर- घोटालाबला पाइ २.अजीत मिश्र-दीआबाती ३.श्याम दरिहरे- ओबामा ओबामा ओबामा
जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल
की भेटल आ की हेरा गेल  (आत्म गीत)- (आगाँ)

बाबूकें रहै छलनि हमरा
बुधियार बनएबाकेर चिंता
ओ देखथि लौकिक क्रिया-कर्म
आ काज पड़ल सोझां सभटा
पोथीसं हम्मर प्रेम देखि
ओ छला बहुत किछु डेरा गेल,
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ की हेरा गेल।
से पिता पुत्रसं हारि गेला
आ जीत गेल पोथी-पतरा
की गाम-घर, की क्रिया-कर्म
ओ बिसरि गेला चिंता सभटा,

की जन्मभूमि, की सर-कुटुंब
सभ दुनियादारी बिला गेल,
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ की हेरा गेल।
हमरहि सोझांमे एक राति
बाबूजी अंतिम सांस लेलनि
तजि जीर्ण-शीर्ण एहि कायाकें
नव कायालेप्रस्थान केलनि

चलितो-चलितो एहि दुनियासं
ओ छला बहुत किछु सिखा गेल,
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ की हेरा गेल।

घुरलहुं कए वरखक बाद गाम
उजड़ल उपटल बिलटल देखलहुं
जै घरकें बाबू बना गेला
ओइ घरकें खसल-पड़ल देखलहुं

सभटा लताम, सभटा नेबो
सभटा गुलाब छल सुखा गेल,
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ की हेरा गेल।
छल पथरायल संबंध शेष
किछु वैचारिक अनुबंध शेष
मनकें आनन्दित करबाले
एखनहुं धरि छल किछु गंध शेष

माइक हाथक पारल कोठी
माइक सभटा दुख सुना गेल,
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ की हेरा गेल।

हम देखलहुं उल्कापात कते
हम सहलहुं झंझाबात कते
परिजन-प्रियजनसं बिछुड़न केर
संताप कते, आघात कते
सुख-दुख केर नश्वरताक पाठ
अस्तित्व गुरू बनि पढ़ा गेल,
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ की हेरा गेल।

(क्रमशः)


 
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जगदीश प्रसाद मण्‍डल
गोटेक दर्जन गीत


जोति‍ हर......

जोति‍ हर हरबाह हकड़ि‍
जि‍नगी गीत गबै छै।
ले-ऊँच, ऊँच ले बनि‍ बन
चोटी-ढाल बनल छै।
गे भौजी, चोटी......।

बून पपीह स्‍वाती पकड़ि‍
रस अमृत भरैत चलै छै।
कृत्ति‍-वृत्त परकृति‍ पकड़ि‍
तरे-ऊपरे सि‍र सजै छै।
गे भौजी......।

लत्ती बनि‍ लतड़ि‍-पसरि‍
लतमरदन करैत रहै छै।
चोटी जल टघड़ि‍-टघड़ि‍
खून पसीना एक करै छै।
गे भौजी......।

ओहए पानि‍ टघड़ि‍-टघड़ि‍
झील-सरोवर सेहो सजै छै।
बाल-भाल कुशक कलेप
मरू स्‍थल गढ़ैत रहै छै।
गे भौजी......।

शब्‍दार्थ-
हकड़ि‍- अबाज
लत- आदत
लतमरदन- आदतक फल
कुशक- कौशल कला।
हर हलक......

हर हलक हलन्‍तमे
मीर-दोल तेहल बनै छै।
पुर-पुष्‍कर पुरस्‍सर
बाट-घाट घटबी चलै छै।
हल-हलक हलन्‍तमे...

एक-दू-तीन चारि‍ रहि‍तो
गति‍ इंजीन गाड़ी धड़ै छै।
बेहि‍साब-हि‍साब बनि‍ बन
धड़ि‍ धड़कि‍ धड़ैत रहै छै।
धड़ि‍ धड़कि‍......।

लंक-अयोधि‍या सटि‍-हटि‍
संगी-संग चलैत रहै छै।
नि‍रशि‍ परखि‍ बाट-बटोही
फल करनी भोगैत रहै छै।
फल करनी......।

शब्‍दार्थ-
हलन्‍त- घटबी
धड़ि‍- भीत्ता, धड़कन
नि‍रखि‍- शुद्धि‍, पवि‍त्र।




हि‍म-गि‍रि......

हि‍म-गि‍रि‍ उत् उतूंग उमड़ि‍
नि‍रमल अमृत धार बहै छै।
सि‍ख-शि‍खर सि‍हैर-सहैर
गंग अकास बहैत रहै छै।
गंग अकास......।

उतरे-दछि‍ने धड़ैन धार
शि‍खर-सगर देखबै छै।
रंग-रंग फूल माल सजि‍
मन गंग साजि‍ सजै छै।
मन गंग......।

हटि‍-सटि‍, सटि‍-हटि‍ बैस-बेस
सागर-शि‍खर धड़ैत रहै छै।
गंग-अकास उतड़ि‍-उतड़ि‍
गंग-अकास......।

शब्‍दार्थ-
सि‍हैर सहैर- द्रवि‍त भऽ टघड़ब,
धड़ैन- धरती (धरणी)
बैस-वेस- भेष बना बैसब।




भुवन भूचलि......

भुवन भूचलि‍ अकास
रंग-रंग तारा सजै छै।
तीन मि‍लि‍ डंड तराजू
सभक तौल-मपैत रहै छै।
सभक......।

कखनो दायाँ वायाँ कखनो
कीर-कि‍रदानी करैत रहै छै।
तेकठीक आस बि‍नु पौने
उदय-अस्‍त करैत रहै छै।
उदय......।

सातो सगर देखि‍ सतभैंया
कचबच बचकच करैत रहै छै।
भोर होइत भहड़ि‍-भड़ड़ि‍
थकतका थकथका सेज सजै छै।
थकतका......।

शब्‍दार्थ-
डंड-तरजू- मेघमे तीन तारा मि‍लि‍ सोझा-सोझी रहैत।
सतभैंया- मेघमे सात तरेगन, जेकरा कचबचि‍या सेहो कहल जाइ छै।




खुजि‍ते आँखि......

खुजि‍ते आँखि‍ तड़पि‍ तड़पि‍
पृथि‍वी पग पएर पड़ै छै।
धरती-अकास बीचो-बीच
खम्‍भ भेल देखै छै।
खम्‍भ......।

अकास अमरीत बरसि‍
खोंइछ धरती भरैत रहै छै।
आसा-आस मि‍लि‍ बैसि‍
बरहमासा गबैत रहै छै।
भाय यौ, बरहमासा......।

पर-वत बत-पर संग-संग
हेल समुद्र हेलैत रहै छै।
बालु ऊपर ढेर-बनि वन
ढुइस हेल हेलैत रहै छै।
मीत यौ, अहींकेँ कहै छै
ढुइस......।




मुड़जन मनुहर......

मुड़जन मनुहर पकड़ि‍-पकड़ि‍
तान वि‍रूदावली तनै छै।
दोहन-दौजी कुदि‍-चमकि‍
रचि‍-रचि‍ रास रचै छै।
संगी, रचि‍-रचि‍......।

मुसुक मुसकी मसकि‍-मसकि‍
कन-आनन अनैत रहै छै।
नेंगरा-लुलहा, जरल-मरल
बेणु-वन वीणा तनै छै।
संगी, वेणु-वन......।

शूर-सूर, मूड़ मुड़ि‍-मूड़ि‍
पग-प्रेम पबैत रहै छै।
लट्ट-चूड़ा, खट्टा दही
भोज ब्रह्म गाबि‍ कहै छै।
संगी, ब्रह्म......।

शब्‍दार्थ-
मुड़जन- अगुआएल, एक नम्‍बर
मुनहर- बड़का बखारी
दोहन- दौजी (अन्नमे दोहन, फलमे दौजी, अर्थात् दू नम्‍बर।)
हँसी, खुशी, मुश्‍की, मुसुक इत्‍यादि‍क लि‍ंक छै।
शूर- योद्धा
सूर- कवि‍ सूरदास।








गोधूलि‍-बेल......

गोधूलि‍-बेल डगर डगरि‍
थन-माइक थुथुन थुथबै छै।
आस सूर्ज असतन पाबि‍
तर-ऊपर चमकए लगै छै।
तर-ऊपर......।

अबैत करूआएल काल देखि‍
पग-पगहा पाछू घीचै छै।
पाँचम पहर पहल पहीर
रग-रग रंग रगड़ए लगै छै।
दीब साँझक दि‍व्‍य पाबि‍
सगुनि‍याँ कहबए लगै छै।
सगुनि‍याँ......।

राति‍ दबा दबदबाइत प्रभा
भाेर-भुरुकबा जगबै छै।
दुर-दुरा, दुर-दुरा दूर
प्रात सूर्ज घीचने अबै छै।
प्रात सूर्ज......।




दौड़ि‍-दौड़......

दौड़ि‍-दौड़ दाउर घोर-घन
बाट नहि‍ भेटै छै।
कारी-भारी भारी करि‍-करि‍
अन्‍ह घाट बनबै छै।
अन्‍ह घाट......।

अन्‍हार घर साँपे-साँप
वि‍सवि‍साह बनबै छै।
इजोतो अनरोख भऽ भऽ
घोर-घनघोर करै छै।
घोर-घनघोर......।

लीला बड़ लीलाधर बड़-बड़
राशि‍ रास रचै छै।
मत् मन मत मत-मत
मस्‍ती चालि‍ धड़ै छै।
मस्‍ती चालि‍......।

शब्‍दार्थ-
दौड़- ठेकान
करि‍-करि‍- करब
अनरोध- झलहन्‍हार
मत- वि‍चार
मत- नि‍शाएल।




चोट-चाट......

चोट-चाट चोटि‍या देलकै
मुँह-नाक भसका देलकै।
चोट-चाट......।

कान कनक छीनि‍-वीनि‍
बहीर बौक बना देलकै।
नाक-मुँह-कान ताकि‍
चोट-चाट चोटि‍या देलकै
चोट-चाट......।

बहीर-बौक मि‍लि‍-मि‍लि
मलि‍ आँखि‍ मसका देलकै।
गन्‍ह महक महक गन्‍ह
दि‍न-राति‍ गनहा देलकै।
दि‍न-राति‍......।

साँझ बेला वेली फूलि‍
भोर-भुरुकवा कहै छै।
रातु पार खेपि‍-खेप
पाट सन धड़बैत चल छै।
पाट सन......।

शब्‍दार्थ-
छीनि‍-वीि‍न- छीन कऽ बि‍ड़हाएब।




चाइन चेन......

चाइन चेन थर-थीर थि‍ति‍ते
चान-मुँह मुस्‍की भरै छै।
हास-परि‍हास अट्टाहास
लोक सूर्ज पहुँचए लगै छै।
लोक सूर्ज......।

तन-तना तक ताकि‍ तरेगन
हि‍या-हि‍या देखैत रहै छै।
रंग एक रोशनाइ आनि‍
लालटेन राति‍ गढ़ैत रहै छै।
मीत यौ, लालटेन......।

असि‍ते-अस्‍त सुधा पाबि‍
साँझ पहि‍ल अनघोल करै छै।
बनि‍ सगुनि‍या तार-तारा
आगूक अम्‍भ भरैत रहै छै।
आगूक दम्‍भ......।




दीनक दोख......

दीनक दोख कहै छी हे बहि‍ना
दीनक दोख कहै छी।
बात-बात बति‍या कति‍या
हटि‍-हटि‍ हाट हटै छै।
बत-रग्‍गर रगड़ि‍-रगड़ि‍
पीसि‍ पीस पीबै छै।
हे बहि‍ना, पीसि‍-पीस......।

घरे-अंगने बीज कोढ़ीक
छीटि‍-गाड़ि‍ रोपैत रहै छै।
फूल कोढ़ि‍क फलक तेहने
जि‍नगी पाठ पढ़ैत रहै छै।
हे बहि‍ना, जि‍नगी......।

नि‍शाँ पीब नस-नस नि‍सया
नि‍शाएल घाट तकैत रहै छै।
राति‍क हारल दि‍नक मारल
ि‍जनगी गीत गबैत रहै छै।
हे बहि‍ना, जि‍नगी......।




सगर समनदर......

सगर समनदर सड़ि‍ सरि‍त
तन-मन आस सि‍रजै छै।
दुर्गा देवी हे माँ काली
असतन आस धड़बै छै।
मीत यौ, असतन आस......।

थन तन मन पशु धन
परबत सीस सजबै छै।
ढेर धार ढेरि‍आएल घाट
मन मनु माँ कहबै छै।
मीत यौ, मन मनु......।

पाश बैसि‍ बसि‍या बुलकि‍
जि‍नगी तानि‍ नचै छै।
हे माँ, नगर बीच रीति‍-रीत
सती-सावि‍त्री पुछै छै।
मीत यौ, सती......।
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१.मुन्नी कामत-पाँच टा बाल कविता २.जगदानन्द झा मनु
बाल गजल 
मुन्नी कामत
पाँच टा बाल कविता
बेटी
छोड़ऽ कक्का
बेटा-बेटी कऽ
अंतरक खेल।
सोचऽ तूँ एक बेर
बेटा-बेटी मे
की फरक भेल।
बेटा कनेतऽ
पर बेटी पोछतऽ लोर
बेटा पर एक कुल
मुदा बेटी पर दू कुल
करतऽ इजोत।
थाकि-हारि कऽ जब तूँ
कतौ सँ एबहक कक्का
स्नेह बरसाबै लऽ
आगु जेतऽ बेटी।
कुछ दिन कऽ
मेजमान बनि ई तोरा
घर आइल छऽ
तोहर दुलार आ
आशीष लऽ कऽ
चुप-चाप चलि जेतऽ बेटी।
तब फाटतऽ तोहर कोढ़
आ अंतरमन सँ
एतऽ एगो आवाज कि
अगला जनम तूँ फेर
अइ आंगन मे अहियहन बेटी।
कारी-बजार
कारी-धन कारी-बजारी
कारी चादरसँ लिपटल
हमर देश अछि।
केना बेदाग करब अकरा
सगदर कारी-स्याह अछि।
निचाँ-निचाँ की देखब
जब उपरे अंधकार अछि
कोनो दोसर नै रंग अतऽ
सगदर कारी-बजार अछि।
राष्ट्रपति होए या प्रधानमंत्री
सब कऽ सब दरिद्र अछि
कि कहब बेशर्मी कतेक हद तक
अकरा देहमे समैल अछि।
भगाबू अइ दिम्मक कऽ
अपन घर सँ
नै तँ ई हड्डी तक
खाइ लऽ तैयार अछि
सोचु -बिचारू अपनामे
अहीं कऽ हाथमे
कैलक सरकार अछि।

शब्दक खेल
चुन्नु- अ सँ अनार
    आ सँ आम
रटैत जी थोथरा गेल
     आब नै खेलब हम
     ई शब्दक खेल।
मांॅ-    तँ चलू उराबऽ
     चलि पतंग
     हरियर अपन
     लाल ओकर
     पिअर भइया कऽ
     आब कहू सब मिलाकऽ
     कतेक उड़ि रहल अछि पतंग।
चुन्नु- अतौ तँ अछि सवालक जाल
     मांॅ हमरा पहिले ई बता दिअ
     एक सँ आगाँ कतेक होइ छै
     से सिखा दिअ
मांॅ-    तँ कहू आब
     कहियो नै उबबै
     अइ खेल सँ
     नै उलझबै अंकक अइ जाल सँ
     तब हम अहाँ कऽ सब सिखैब।
     सब सबालक जबाब
     अहाँ कऽ बनैब।

मांॅ बता तूँ एगो बात
मांॅ बता तूँ एगो बात
खोल तूँ ई मेघक राज
के सब रहै छै ओतऽ
कि छै ओकरा सबहक काज।
भोरक सुन्दर सुरज
दुपहर कऽ किए जरबै छै
साँझ पड़ैत फेर
कतऽ हरा जाइ छै।
राइत कऽ अबै छै मामा
सजा कऽ मोतियक थार
कि ओतौ छै बहुत बड़का संसार।
कहियो देखै छी कनिये
कहियो बेसी
कहियो तँ साफे नै देखाइ यऽ
तूँ बता मांॅ मामा एना किए
नुका-छुप्पी कऽ खेल खेलै यऽ।
सुनु बउआ हमर बात
बिना पढ़ने नै खुलत ई राज
जेना-जेना अहांॅ पढ़ैत जएब
सब भेद कऽ भेदैत जएब।
अनहार घरमे हत्या
हम बेटी छी तँ
हमर कोन दोष
हमहुँ तँ एगो जान छी
हमरो आँखि यऽ
कान यऽ मुँह यऽ
हम नै निष्प्राण छी।
नै चलाबू एना कैंची
हमर मन डराइ यऽ
देखियौ हमर कटल हाथ सँ
लाले खुन बहै यऽ।
अनहार घर सँ तँ
निकलऽ दिअ
एक बेर तँ हमरो
अइ निष्ठुर संसारकेँ देखऽ दिअ।
केना लेलक अतऽ जन्म सिता
ओइ रहस्यकेँ जानऽ दिअ
हमरा नै मारू
जकरा लोग पुजै छै
ओइ मायक मँुह देखऽ दिअ।
जगदानन्द झा मनु
बाल गजल 
चलै चुनमुन चलै गुनगुन तमासा घुमि कए आबी
 
जिलेबी ओतए छानैत तोहर भेटतौ बाबी
 

पढ़ैकेँ छुटल झंझट भेल इसकूलक शुरू छुट्टी
 
दसो दिन राति मेला घुमि कए नव वस्तु सभ पाबी
 

करीया बनरिया कुदि कुदि कए नाचै बजाबै बिन
 
चलै चल ओकरा संगे हमहुँ नेन्ना कनी गाबी
 

बनल मेनजन अछि बकड़ी पबति बैसल अचारे छै
 
बरद सन बौक दिनभरि चूप्प रहए पहिरने जाबी
    

बुझलकौ आब तोरो होसयारी 'मनु' तँ बुढ़िया गै
 
लगोने ध्यान वक कतएसँ सम्पति नीकगर दाबी
    

(बहरे हजज)
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राजदेव मण्‍डल
दूटा कवि‍ता

इमानदारी

इमानदारी बि‍कैत छै बेनाम
लाख, करोड़ आ टका-छेदाम
सभ रंग दाम सभ रंग नाम
जेहने इमानदारी तेहने दाम
देहाती दाम शहरी नाम
जेहने टका तेहने काम
इमान कहै सुनू हमर बोल
हमर के लगा सकैत अछि‍ मोल
टूटि‍ रहल अछि‍ पुरना खोल
सहजहि‍ं फूटत नवका बोल।

बेइमानी कठहँसी हँसैत अछि‍
ऊँच आसनपर वएह बसैत अछि‍
ओकरे भेटै आदर सम्‍मान
इमानदारी पाबैत अपमान
हमहँू नै बचल छी पूरा
लगल अछि‍ बेमानीक धूरा
खोजलौं ऐ पार-सँ-ओइ पार
नै भेटल पूरा इमानदार
बजलौं अहाँ बारम्‍बार
कहू के अछि‍ इमानदार?




बीआ

बीआ नै अछि‍ खाली बीआ
माटि, पानि‍, हवा प्रकाश
सँ मि‍लतै आस
छूबि‍ देत अकास

आँखि‍ देख रहल अछि‍ साँच
बीआ मध्‍य आँकुरक नाच
कालकेँ कऽ रहल जाँच
अन्‍तरमे बैसल गाछ
एक-सँ-अनेक पसरल
छेकने जाइत आगाँ ससरल
दैत अछि‍ प्राण वायु
बढ़ैत अछि‍ सबहक आयु।

कि‍छु अछि बेसी
कि‍छु अछि‍ कम
अहीमे मि‍लल अछि‍
सत-रज-तम।

एकरा अन्‍तरमे शक्‍ति‍ अपार
जाएत एक दि‍न धरतीक पार
बीजक प्रस्‍फोटन अछि‍ सार
हरक्षण बनैत नव अाकार।

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
 जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल
               
बाल गीत
सत्य अहिंसाकेर पुजारी  छला महात्मा गांधी
ज्ञानक बड़की पैघ बखारी छला महात्मा गांधी।
ओ कहलनि, एके छथि अल्ला-ईश्वर
एके अछि मंदिर-मस्जिद
एके थिक काबा-काशी,
भारतवासीकेर  मूल एक थिक
जाति एक थिक
सभ छथि भारतवासी
बूझि पड़ैए पड़ैए भव-भय हारी छला महात्मा गांधी
ज्ञानक बड़की पैघ बखारी छला महात्मा गांधी।
सत्याग्रहकेर
केलनि
तेहेन प्रचार,
भागल भुल्ला
लत्ते-पत्ते
सात समुंदर पार
ब्रह्मा, विष्णु और त्रिपुरारी छला महात्मा गांधी
ज्ञानक बड़की पैघ बखारी छला महात्मा गांधी।
ओ कहलनि
सौंसे दुनियाकेँ
बनय एकटा गाम,
सभकें भेटै
रोजी-रोटी
भ चुआबए घाम
दुनियामे सभसँ उपकारी छला महात्मा गांधी
ज्ञानक बड़की पैघ बखारी छला महात्मा गांधी ।
       

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ओम प्रकाश
गजल
करेजक बात नै कहियो बनल एतय
कियो सुनलक कहाँ मोनक कहल एतय

सुखायल गाछकेँ पटबैसँ की हेतै
फरत कोना जखन गाछे जरल एतय

हँसी कीनैत रहलौं सदिखने ऐठाँ
लए छी हम नुका आत्मा मरल एतय

लिखलकै भाग्य बिधि सबहक अलग कलमसँ
कपारक गप कियो नै पढि सकल एतय

गडै पर शूल "ओम"क आह नै निकलै
भऽ गेलौं सुन्न काँटे टा गडल एतय
बहरे-हजज
मफाईलुन (ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ) - ३ बेर प्रत्येक पाँतिमे



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रामवि‍लास साहु
बाल कवि‍ता

मेघक बरि‍आती-

तारबतोर पूरबा बहै
दि‍न-राित बहै नै थके
गति‍ मन्‍द पड़ि‍ते
गर्मी चढ़ल असमान
उसनि‍याँ करनाइ शुरू भेल
एहेन अचरज कहि‍यो नै भेल
गर्मी भगबै ले
मेघक बरि‍आती शुरू भेल
भंडार कोणसँ गरजैत ढनकैत
सेना संगे मेघ धमकि‍ गेल
आगू-आगू अन्‍हर बि‍हारि‍
पाछू संगे शीतल वयार
ढन-ढन ढमकैत बि‍जुरी चमकैत
मेघक बरि‍आती आबए लगल
देखते मेघक बरि‍आती
गर्मी जान बचा भागए लगल
मेघक बरि‍आती पछारैत गेल
झम-झम बर्खा बरसि‍ गेल
गर्मीक परकोपसँ छुट्टी भेल
मेघक बरि‍आती घूमि‍ घर गेल।

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'विदेह' २२४ म अंक १५ अप्रैल २०१७ (वर्ष १० मास ११२ अंक २२४)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -    मैथिलानी केर उपराग राम सं आ समाज ...