Tuesday, November 13, 2012

'विदेह' ११७ म अंक ०१ नवम्बर २०१२ (वर्ष ५ मास ५९ अंक ११७)PART II


२. गद्य







रामभरोस कापडि भ्रमर
यात्रा प्रसंग

ह्वेन सांगसं चीनमे भेंटघांट

हमसभ हाइस्कूलक पाठ्यक्रममे ह्वेनसांगकेँ सम्बन्धमे पढैत छलहुँ । चिनी यात्रीसभ भारतधरि पहुँचि बौद्धधर्मक ग्रन्थसभकेँ संकलन कऽ चीन लऽ गेल छल । विकट वाट
अथक यात्री । महिनोक सफर ।
हमसभ चीनक सांस्कृतिक राजधानी सियानमे आबि गेल छी । विजिंगसं दूघंटाक उडानक बाद काल्हिए एत्त आएल रही । आसीन ७ गतेसं नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक नौ सदस्यीय प्रतिनिधि मण्डल सात दिनक चीन भ्रमणमे अछि । सात गते काठमाडौसं चायना ईस्टर्न एयरलायन्ससं हमसभ कुनमिंग आयल रहीआ ओत्तसं ओही दिन विजिंग पहुंचल रही राति ११ बजे करिब । विजिंगमे तीन दिन रहि क काल्हि चीनक सांस्कृतिक राजधानी सियान आयल रही । आ आई सियानक बासी रहल ह्वेन सांगक विशिष्ट कृतित्वक अध्ययनमे लागल छी ।
सरिपहुं आइ एकटा विशिष्ट व्यत्तित्वक कृतित्वसँ साक्षात्कारक समय छल । हमर चुलबुले गाइड मोनिका (पश्चिमी नाम) हमरासभकेँ डा.सीन टेम्पलमे लऽ जा रहल छली । एतय ओकरे शब्दमे सियान जौैंग अर्थात हमसभ जकरा ह्वेन सांग कहैत छिएै
,क बासस्थान, कृतिसभसँ परिचय कराबय लेल ओ बेसब्र छलीह, मन्दिर बनौल गेल जत्त ओ बौद्ध कृतिसभक चिनी अनुवाद कएलन्हि । हुनक अनुवाद कएल किछु कृति ओतहि राखल अछि । भारतसँ घुरलाक बाद तत्काले सम्राटद्वारा कएल गेल स्वागत आ अन्य क्रियाकलापसभ देवालपर लिखल भव्य चित्रसभ बताबि रहल छल । प्रकोष्ट भितर ह्वेन सांगकेँ भव्य प्रतिमा सेहो स्थापित अछि । तहिना बाहर कम्पाउण्डमे सेहो हुनक विशाल प्रतिमा राखल गेल अछि । ओ सियानके बासी छलाह । तएँ सियानवासी हुनका बहुत बेसी सम्मान करैत अछि आ हुनका स्मृतिकेँ सम्बद्र्धन करएमे दत्तचित्त भऽ लागल अछि ।
११९ ई सन पूर्व सियानमे बेस्टर्न हान डाइनेस्टी समय दिस सिल्क कारोबार ओतय होइत छल । पाछु इएह सिल्क व्यापार सियान होइत समुद्रतट धरि पसरल । ई व्यापारिक बाट पाछु सिल्करोडक नामसँ प्रसिद्ध भऽ गेल । जखन चीनमे सन २५ दिस इस्टर्न हान पिरियडक समयमे भारतीय बुद्धिज्म चीनमे प्रवेश पौलक
, सम्भवतः ओकर बाट सेहो इएह सिल्करोडे छल ।
तांग राजवंशक प्रारम्भिक समय ६२९ सन दिस ह्वेन सांग ओएह सिल्करोड होइत भारतधरिक यात्रा कएने छलाह
बुद्ध साहित्य,दर्शन प्राप्त करबा लेल ।ओ सन ६४५ मे सियान घुरलाह आ बडका ध्ष्मि नययकभ एबनयमब या म्ब ऋष्भल त्झउभि कँ निर्माण भेल ।
ह्वेनसांग सन ६०० मे जन्मल छलथि
, ६१३मे बौद्ध भिक्षु बनलान्ह, ६२९ सँ ६४५ धरि भारत भ्रमण कएलन्हि, ६४५ सँ ६६४ धरि बौद्ध साहित्यक अनुवाद कएलन्हि , सन ६६४ मे हुनक देहाबसान भ गेलन्हि ।
हमरासभकेँ विस्तारपूर्वक ओहि पैगोडाकेँ जानकारी प्राप्त भेल । मनमे उठल अनेको जिज्ञाशाकेँ सेहो शान्त करबाक अवसर पौलहुँ ।
चीनमे देखय लायक बहुत चीज अछि । आठ हजार ई.पूर्वधरिक अवशेषसभ संग्रहालयमे देखलहुँ तऽ ३००० सँ ५००० हजारधरि ई पूर्वक साबूत आ विकसित सामग्रीसभ देखलाक बाद सभ्यता आ संस्कृतिक विकासमे चिनियां भूमि अन्य क्षेत्रसँ आगां आ बेसी सम्पन्न किए अछि से आभास होइत अछि । आव विश्वास होइत अछि जे लिपिक विकास किया चीनेमे भेल छल ।
चीन भ्रमणक एहि प्रसंगमे अनेकौं ऐतिहासिक तथ्यसभसं साक्षात्कार करबाक अवसर भेटल । तखन लागल चीन मात्र सातम् आश्चर्यक लेल मात्र नहि
, अपना भितर अनेकौ आश्चर्यसं भरल सामग्रीसभ संरक्षित क रखने अछि, जकरा देखा क एखन आर्थिक उपार्जन मात्रे नहि अपन परम्परा आ सांस्कृतिक सम्पदाकें विश्वकें अगाडी समधानि क प्रस्तुत करबाक पैघ काजसेहो क रहल अछि ।
चीनक विकासक गति ठीके प्रशंशायोग्य मानल जएबाक चाही ।

 
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
   
जगदीश प्रसाद मण्‍डल
पाँचटा वि‍हनि‍ कथा-

पुरनी भौजी

बीस दि‍न बरि‍साइत भेनौं धुर-झाड़ आम पाकब शुरू नै भेल अछि‍।
     बि‍नु बरखाक गरै जकाँ मेघक रूखि‍ पकड़लक। दसो पोता-पोतीकेँ नेने पुरनी भौजी रोहनि‍या आमक झमटगरहा गाछ लग बैस दसोकेँ कहलखि‍न-
जे पहि‍ने पाओत से मीरा, जे दोसर पाओत से दोहल, जे तेसर पाओत से तेहल आ जे चारि‍म पाओत से चौहल।
     पुरनी भौजीकेँ तीनटा बेटा छन्‍हि‍। बि‍नु गहबर गेनौं पोती-पोतीक ढवाहि‍ लागल छन्‍हि‍। बच्‍चा देखि‍ माएक ममता तँ स्‍वाभावि‍क अछि‍। बाप तँ भरि‍ दि‍न बोनाएले रहै छथि‍।
     दस बर्खक पोता जे मि‍ड्ल स्‍कूलमे पढ़ैए; टेटि‍याह सुग्‍गा जकाँ टाहि‍ मारलक-
मीरा माने कि‍ भेल?”
     बि‍हाड़ि‍ तँ बि‍ड़हा गेल मुदा हवाक सि‍हकी उठल। ढेनुआर जकाँ धऽ कऽ भरभड़ा गेल। के पहि‍ने पौलक तेकर ठेकाने ने रहल।

~




पोखला कटहर

पान सए रूपैआ खर्च भेला पछाति‍ झबरी काकीकेँ आधा छूटपर एक हजार रूपैआ बैंकसँ लोन भेटलनि‍। अखन धरि‍क जि‍नगी बोनि‍-बुत्ताक रहलनि‍ तँए ओहन रोजगार चाहैत रहथि‍ जे कए सकथि‍। ओना घरे लग रोजगरि‍नी सभ छन्‍हि‍ मुदा जाति‍क वि‍भाजन काजेाकेँ कम सक्कत वि‍भाजि‍न नै केने अछि‍। तँए लगमे रहि‍तो अनाड़ीक-अनाड़ि‍ये झबड़ी काकी। मुदा पुछबो केकरा करथि‍न। एक हजार रूपैआक बात अछि‍। के केना झपटि‍ लेतनि‍ तेकर ठीक नै।
     काकीक घरक आगू रस्‍तापर देने श्‍याम जाइत रहथि‍ हुनका देखि‍ते काकी टोकि‍ देलखि‍न-
बौआ सि‍याम, तोहीं सभ ने बेटा-भातीज भेलह। रोजगार करैले एक हजार रूपैआ लोन देलक हेन।
     झबड़ी काकीक बात सुनि‍ श्‍याम नजरि‍ खि‍रौलनि‍। बगलेमे देखि‍ कहलखि‍न-
पचहीवालीकेँ सोर पाड़ि‍यौ।
  पचहीवालीकेँ अबि‍ते श्‍याम कहलखि‍न-
भौजी, अहाँ अपना संगे तरकारी बेचैक लूरि‍ सि‍खा दि‍औ। अपनो कि‍छु पूँजी भइये गेलनि‍। एेबेर तत्ते आम फड़ल अछि‍ जे कटहरकेँ के पूछत। ओना बेसी फड़ने पौखुलाहे कटहर बेसी अछि‍ मुदा चौथाइ कमाइ लऽ कऽ बेचि‍ लि‍अ।

~



सरही सौबजा

दि‍न भरि‍ सात गोटेक संग झंझरपुरि‍या-बेपारी आम तोड़ि‍, काँच-पाकल, फुटल बेरा टोकड़ी बना, ट्रकक प्रति‍क्षामे टहलैत गामक चाहक दोकानपर आबि‍ अनेरे बजैत-
एहेन ठकान जि‍नगीमे नै  ठकाएल छलौं, जेहेन आइ ठकेलौं?”
  चाहे दोकानक छर्ड़ा बूझि‍ आनो-आन छर्ड़ा छोड़ैत-
झंझरपुरि‍या तँ इलाकाकेँ ठकैए, ओकरा ठकि‍ लेत हमर गौआँ?”
बेपारि‍योकेँ मनमे कि‍छु रहै तँए पाछू हटैले तैयार नै। बत-कटौवलि‍ एहेन चलि‍ गेल जे ने एकोटा ऐ गामक नीक अछि‍ आ ने झंझरपुरि‍या। बोलीक मारि‍ तँ धुड़-झाड़ होइत, मुदा आगू बढ़ैक साहस कि‍यो ने करए। एकटा गामक प्रति‍ष्‍ठा बूझि‍ दोसर घोड़न-कटान बूि‍झ।
     ओना चौकक रोहानी ठीक रहै कि‍एक तँ सूर्यास्‍तक समए रहए। जटा भाय चौकक रोहानी देखि‍ते चाहे दोकानपर बैसलाह। सामाजि‍क प्रश्न तँए हस्‍तक्षेप कएल जा सकै छै। बजलाह-
कथीक घोंघाउज छी?”
  झंझारपुरबला-बेपारी- अहीं गाममे लखनजी सँ पाँच हजारमे सौबजा आमक एकटा गाछ लेने छलौं तइमे ठकि‍ लेलनि‍।
     अपन चर्च सुनि‍ लखनजी सेहो मोबाइलि‍क दोकानपर सँ चाहक दोकानक आगूमे आबि‍ ठाढ़ भेला। बेपारीक प्रश्न उठि‍ते लखनजी पुछलखि‍न-
कि‍ ठकि‍ लेलौं, बाजू।
  बेपारी- कलमी बूझि‍ लेने छलौं, सरही दऽ ठकि‍ लेलौं?
  लखनजी- कत्तेमे नेने छलौं कत्ते के आम भेल?”
  से तँ नफगर अछि‍, पाँच हजारमे लेने छलौं। खर्च-बर्च काटि‍ कहुना पाँच हजार बचबे करत?”
  जटा भाय- तखन जे एना बजै छी से उचि‍त भेल?”
  बेपारी- हमर बात दोसर अछि‍। सौबजा कलमी होइ छै। हि‍नकर अॅठि‍आहा छि‍यनि‍, माने सरही छि‍यनि‍। ओना साइजोमे ठीक छन्‍हि‍।
  जटा भाय- अहाँ केना बुझै छी जे मुँह-नाक एक रहि‍तो सरही छी?”
  बेपारी- जटा काका, अहूँ भासि‍ जाइ छी। कहुना भेलौं तँ बेपारी भेलौं कि‍ ने। कुमारि‍-बि‍औहि‍तीक भाँज जँ नै बुझबै तँ घटकैती कएल हएत।

~



तेरहो करम

अबेर कऽ भाँज लगने कनटीर काका खेत देखए नै गेला। ओना मनमे उठलनि‍ मुदा भदवारि‍ जानि‍ नै गेला। वि‍चारि‍ लेलनि‍ जे इजोरि‍या छीहे भोरगरे देखि‍ लेब।
     छगाएल मन साढ़े तीनि‍ये बजे नीन टूटि‍ गेलनि‍। नीन टुटि‍ते नजरि‍ दौड़ कऽ काज पकड़ि‍ लेलकनि‍। तीन-हत्‍थी ठेंगा लऽ बाध दि‍स वि‍दा भेलाह।
     श्रीवि‍धि‍ खेती लेल जे धानक बीआ भेटल छलनि‍ वएह धान। रौदीक कि‍रतबे वि‍धि‍ तँ भंग भऽ गेलनि‍ मुदा सए रूपैये घंटा पटा बीघा भरि‍ खेती केलनि‍। संयोगो नीक बैसलनि‍। कोसी नहरि‍क पहि‍ल पानि‍ हाथ लगने सुतरलनि‍।
     नबे दि‍नक पाकल धानमे भरि‍ जाँघ पानि‍, चुट्टी-पीपड़ीसँ लदल सीस देखि‍ कनटीर काकाक मन चोटसँ चोटाए लगलनि‍। असहाज होइते बमछैत घर दि‍स घूमि‍ गेलाह। मोहनलालक घर लग अबि‍ते आरो बमकि‍-बमकि‍ बमछी छोड़ए लगलाह। आँखि‍ मीड़ि‍ते मोहनलाल अंागनसँ नि‍कलि‍ लगमे आबि‍ पुछलक‍नि‍-
काका, एना कि‍अए भोरे-भोर बमकै छि‍ऐ?”
ओना कनटीर काका आ मोहनलालक उमेरक दूरी बीस बर्खसँ बेसी हटल मुदा वि‍चारक दूरी लगीच बनौने तँए दुनूक बात दुनू सुनबो करै छथि‍, कहबो करै छथि‍न आ मानवो तँ करि‍ते छथि‍।
बमकी सुनि‍ कनटीर काका ठमकि‍ गेला। ठमकैत बजला-
की कहि‍यऽ बौआ, परसू धान काटि‍ तोड़ बागु करैक वि‍चार केने छलौं। तोहूँ तँ खेती करि‍ते छह, तोहीं कहह जे धानक-नारक कि‍ गति‍ हएत, छनुआमे कते भीड़ होइ छै से कि‍ कोनो नै बुझै छहक। तइपर कहि‍या खेतक पानि‍ सूखत आ कि‍ फेर दोहरा कऽ पानि‍ औत तेकर कोन ठेकान छै?”
  कनटीर काकाक दहलाइत छातीकेँ खढ़ फेक असथि‍र करैक वि‍चार मनमे उठि‍ते मोहनलाल बाजल-
डुमैक कोन अाशा करै छी उगैक आस करू।
मोहनलालक तोष जते संतोष देलकनि‍ तइसँ बेसी असंतोष बनौलकनि‍। मनमे एलनि‍ जे एक तँ ठेकानि‍ कऽ नहरक पानि‍ नै अबैए तइपर जे छहरक बान्‍ह-छेक नि‍यमि‍त नै अछि‍। सरकार कहत जे कानून अपना हाथमे नै लि‍अ। बजलाह-
एको कर्म बाकी नै रहत। तेरहो कर्म भइये जाएत। सबहक नजरि‍ दैछने खाइपर लटकल छै से केना उतरतै?”
मोहनलाल- काका, कूदै-फानै तोड़ै तान, से राखए दुनि‍याँक मानबि‍सरि‍ गेलऐ?”
  कि‍छु मन पाड़ैत कनटीर काका बजलाह-
हौ छोड़ि‍यो केना देब, अकाल मृत्‍यु केना हुअए देब।

~



डुमैत ि‍जनगी

डुमैत कारोबार देखि‍ झड़ीलाल डुमैत जि‍नगी, जहि‍ना ओछाइनपर पड़ल चारक कोरो-बत्ती लोक देखैत तहि‍ना देखि‍ रहल छथि‍। तड़पैत मन बेथि‍त भऽ दुनि‍याँ नि‍हारि‍ते बुदबुदेलनि‍-
एतेटा दुनि‍याँमे अपन कि‍छु ने रहल।
मुदा लगले मन ठमकि‍ गेलनि‍। जि‍नगी तँ परती खेत जकाँ नै अछि‍ जे जेमहरसँ तेमहर जेबाक हुअए ति‍म्‍हरे-सँ-ति‍म्‍हर कोना-कोनाी रस्‍ता बना लि‍अ। जि‍नगीक तँ नाप अछि‍।
     ओना पचास बर्खक झड़ीलाल अखन धरि‍ हारि‍ मानैले तैयार नै छलाह मुदा एकाएक मृत्‍युक समीप देखि‍ थर-थरा गेलाह। हारि‍ नै मानैक कारण छलनि‍ जे जे गौरव गाममे केकरो नै देखैत छलाह ओ अपनामे देखैत छलाह। ओ छि‍यनि‍ समैया फसि‍ल जकाँ भि‍न्न-भि‍न्न नाओं। अनेको नाओंसँ अपन प्रति‍ष्‍ठा बनौने छथि‍। कि‍यो बेपारी भाय, तँ कि‍यो डाक्‍टर भाय, कि‍यो दि‍लीप भाय कहैत छन्‍हि‍। मुदा स्‍त्रीगणक बीच झड़-झड़हा नाओं चलैत। यएह छलनि‍ झड़ीलालक जि‍नगीक मान-प्रति‍ष्‍ठा। मुदा जे होउ झड़ीलाल अपनाकेँ मेहनती बेपारी जरूर बुझै छथि‍।
     सालमे तीन-चारि‍ जोड़ मुइल-टुटल बड़द (गाड़ीक टुटल, घास-पानि‍क टुटल, रोगाएल इत्‍यादि‍) सस्‍तामे आनि‍, दुनू परानी जमि‍ कऽ सेवा करै छथि‍ आ डेढ़ि‍या-दोबरमे बेचि‍ अपना जीवि‍काक आधार बनौने छथि‍। घूमै-फि‍ड़ैबला छथि‍ये तँए तीनू बेटीक बि‍आह एहेन नजरि‍ये कऽ लेने रहथि‍, जे कहि‍यो भार नै बुझलनि‍।
     अंति‍म खेप माने ऐ खेपमे ठका गेलाह। आठे दि‍न खूँटापर बड़द अनला भेलनि‍ कि‍ पाँचे दि‍नक बीच जोड़ो भरि बड़द‍ मरि‍ गेलनि‍।
     खूँटापर पड़ल मरल बड़द लग बैसल दुनू परानी झड़ीलाल। अक-वक बन्न। तरसैत मन कलपैत देवसुनरि‍क, जहि‍ना रौद, पानि‍ वा शीतमे सि‍ताएल चि‍ड़ै पाँखि‍ फड़फड़बैत; तहि‍ना मन फुड़फुड़ेलनि‍-
भगवान हाथक काज छीन लेलनि‍?”
पत्नीक बातक उत्तर झड़ीलालकेँ नै फुड़लनि‍। फुड़बो केना करि‍तनि‍, जि‍नगीमे कहि‍यो पहरनि‍याँ देवीक पूजा पहाड़पर चढ़ि‍ नै केने छलाह। मुदा तैयो घिंघि‍याइत स्‍पष्‍ट उत्तर देलखि‍न-
दुनि‍याँ बड़ीटा छै, एकटा काज छि‍नाएल दोसर-तेसर-चारि‍म ताकि‍ लेब।
पति‍क उत्तरसँ देवसुनरि‍केँ झॅपन-तोपन बरसाती सूर्य जकाँ अाशाक कि‍रण फुटलनि‍, मुदा लगले फेर तोपा गेलनि‍। बजली-
काज ले तँ लूरि‍ चाही, से....?”

 
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
नागेन्द्रकुमार कर्ण
सुजित कुमार झा पर

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हालहि मैथिली साहित्यक नवउदयीमान कथाकार एवं पत्रकारसुजीतकुमार झाक कथा संग्रह जिद्दीक सम्बन्धमे किछु लिखबाक प्रयत्न कएने छी ।
इएह भादव २३ गते महोत्तरी जिल्लाक जलेश्वर स्थित नेपाल पत्रकार महासंघ महोत्तरी शाखाक सभाहलमे आयोजित समीक्षा तथा परिचयात्मक कार्यक्रममे उठल सवालसभकेँ सेहो मनन कएलहुँ आ ई कथा संग्रह पढि कऽ अपन मोन भितर उठल बातसभकँे एतह रखवाक प्रयास कएलहुँ अछि ।
साहित्यकँे विविध विधासभमे सँ कथा विधा सेहो एक अछि ।
गद्य विधाकेँ एक सशक्त आ छोट समयमे पढि कऽ सम्पन्न करय बला आ प्रशस्त सन्देश देवाक सामथ्र्य कथामे होइत अछि ।
कविशेखर ज्योतिरीश्वर ठाकुर सँ शुरु भेल मैथिली साहित्यकँे गद्य अखन धरि अनवरत रुपमे आगु बढि रहल अछि आ गद्यकँे एक सशक्त विधा कथा रहल अछि ।
कथामे कोनो एक पक्षक बातकेँ उठाओल गेल अछि जे ई विधा पुरान मानल जाइत अछि । । पहिनेपहिने उपदेशात्मक कथासभ, नैतिक कथासभ, परिक कथासभ , भगवान आ दैत्यक कथासभ सुनाओल जाइत छल । धीरे धीरे सामाजिक घरातलक यर्थाथताकेँ समेटि कऽ यर्थातवादी कथासभ लिखाए लागल ।
मैथिली कथा साहित्यकेँ बात कएल जाए तऽ बहुत लम्बा परम्परा नहि रहलाक बादो एहिकँे गुणात्मक रुपमे नीक स्थिती रहल अछि ।
संस्कृतक कथासभकँे अनुवाद सँ शुरु भेल मैथिली कथा साहित्यकँे शुरुवात पत्रपत्रिका सँ भेल तथ्य रहल अछि ।
मैथिली पत्रपत्रिकाक प्रकाशन संगहि मैथिली कथा साहित्यकँे शुरुवात भेल मैथिली साहित्यिक इतिहास पुस्तकमे उल्लेख अछि ।
बासुदेव ठाकुरक सप्तध्याधा सँ शुरुवात भेल मैथिली कथा साहित्यकँे इतिहास अखन धरि रातो नदिमे बहि रहल पानि जेकाँ अछि ।
कोनो नदिमे जहिना बाढि अबैत अछि आ चलि जाइत अछि । ओहिना साहित्यमे सेहो प्रकाशनक बाढि आएल आ सुखाएल ।
संख्यात्मक रुपमे ओतके कथा संग्रहक प्रकाशनसभ नहि रहलाक बादो गुणात्मक रुपमे कोनो भाषा सँ मैथिली कथाक स्तरीयता कम नहि अछि । कथाक विभिन्न वादसभमे मैथिली साहित्यकारसभ कलम चलौने देखल गेल अछि ।
बासुदेव ठाकुरक सप्तध्याधा सँ शुरु भेल मैथिली कथा साहित्य लेखनीक इतिहासमेृ पं. सुन्दर झा शास्त्रीक अखनु बखारी नै फुजलै, डा.धीरेन्द्रक हिचुकैत बहैत सेती, डा.राजेन्द्र बिमलक इ कथा हमरे थिक, राम भरोस कापड़ी भ्रमरक कथा संग्रह तोरा संगे जयबौ रे कुजवा, डा.रेवती रमण लालक माधव नहि अएला मधुपुर सँ, डा.सुरेन्द्र लाभक कथायात्रा, अयोध्यानाथ चौधरीक एकटा हेरायल सम्बोधन, राजेश्वर नेपालीक सोमली, वृशेष चन्द्र लालक माल्हो आ सुजीतकुमार झाक चिडैं पश्चात आएल जिद्दी कथा संग्रह मुख्य अछि ।
एहिकेँ बाहेक बहुत कथा संग्रह आ कथासभ मैथिली साहित्यमे प्रकाशन भेल अछि जे उत्कृष्ट सेहो अछि ।
डा. धीरेन्द्रक अभिभावकीय परम्परामे बढल मैथिली कथा साहित्यमे विषयवस्तुक व्यापकता, राजनीतिक वदलावक प्रभाव, नेपालीय माटिपानिक गंध, पारिवारीक, सामाजिक, साँस्कृतिक आ राजनैतिक जीवन आ ओतए सँ पड़ल उतार चढाव देखल जाइत अछि ।
कथाशिल्पक दृष्टि सँ नवनव प्रयोग सेहो देखल गेल अछि ।
तहिना उतारचढावक बीच वितल समयमे नेपालीय माटिमे मैथिली कथा संग्रह जिद्दीक प्रकाशन भेल अछि ।
कथाकार सुजित कुमार झाक पहिल कथा संग्रह चिडै आ तकरबाद आएल रिपोर्टर डायरी आ तेसर कृतिक रुपमे आएल कथा संग्रह जिद्दी वास्तवमे मैथिली साहित्य भण्डारमे बृद्धि भेल अछि ।
हुनकर दुनू पुस्तक सँ परिमार्जित आ सशक्तरुपमे जिद्दी कथा संग्रह आएल कहबामे कोनो भांगठ नहि अछि ।
कथा संग्रह जिद्दीमे नेपालीय मैथिली नारीसभक विषयवस्तुसभ उठाओल गेल अछि ।
एहि संग्रहक मुख्य पात्रसभ नारी अछि तऽ कथा सेहो नारीक आसपास घुमैत रहल कथा संग्रह जिद्दी नारीवादी कथासंग्रहकेँ रुपमे आगा आएल अछि ।
कथाकार सुजित कुमार झाकेँ नारीवादी कथाकारक रुपमे देखल गेल अछि ।
कथा संग्रह जिद्दीमे कथाकार नारीक सामाजिक, साँस्कृतिक, राजनीतिक स्तर पड़ल प्रभाव, एहि सँ सामाजिक जनजीवनमे पड़ल असर, अगामी दिनमे एहि सँ पड़ल जाएबला सामाजिक विखण्डनक खतराकेँ सुक्ष्मरुपमे देखल गेल अछि ।
कथा संग्रह यर्थातक धरातलमे ठाढ़ अछि ।
यद्यपि ई कथा संग्रह बेसी आदर्शोन्मुख यर्थातवाद दिस गेल अछि ।
एक दर्जन कथा समाविष्ट रहल कथासंग्रह जिद्दीमे हरेक कथा एक अलग छाप छोड़ए सफल भेल अछि ।
कथाक अन्त नहि पढए धरि कथावस्तुक शिर्षक अपुर्ण लगैत अछि । मुदा कथा पढलाक बाद एक निमेषमे मिथिलाञ्चलक धरातलीय यर्थात मानस पटलपर आबि जाइत अछि ।
पारस्परिक स्नेह, विश्वास, बलिदान, सेवा, करुणा, अनुशासनक धरातलमे रहि कऽ अपन मोन, सम्मान बचौने मिथिलाञ्चलमे ओ बातसभ समयानुक्रममे घटल घटनाक प्रेरणा सँ कथा जन्मल अछि ।
आ कथाकार कथासभक मार्फत ओ बातसभकेँ पुनःस्थापना होएबाक बात पर जोड़ देने छथि ।
सरसरती रुपमे माला बनाएल शैलीमे आगा बढैत जाएब आ अन्तमे पाठककेँ सोचमग्न बनाबैत कथाक इतिश्री करब कथाक महत्वपूर्ण बाट अछि ।
कथा संग्रहमे रहल १२ टा कथासभ मे सँ सभ उत्कृष्ट रहल अछि ।
पहिल कथा पूmल फुलाइए कऽ रहलमे महिलाक अथक प्रयास आ दृढ इच्छाक नमुना प्रस्तुत कएल गेल अछि तऽ महिलाकेँ एक्को् बेर नहि पुछि अभिभावक लडकीक विवाह करब, विवाहक समयमे लड़का पक्षद्वारा झुठ बाजब, दहेज आ रंगक कारण विवाहमे समस्या आएब सहितक समस्याकेँ सेहो देखाओल गेल अछि । जे समस्या मिथिलाञ्चलक घरघरमे रहल अछि ।
जेना उच्च विचार आ अथक प्रयास पश्चात इलेनोर रुजबेल्ट सँ अपन अपांग पतिकेँ राष्ट्रपति सन गरिमामय पदमे पहुँचाओल गेल छल ।
पूmल फुलाइएकऽ रहलमे जगदीशकेँ पिंकी अपन दृढ इच्छा शक्ति आ प्रयत्न सँ सहायक स्टेशन मास्टर बनाए कऽ छोडलन्हि ।
तहिना दोसर कथा नव व्यपारमे आधुनिक होइत गेल महिलाक जीवनशैली आ एहि सँ पड़ल जाएबला पारिवारिक कलहकेँ एकटा विम्वक आधारमे उजागर कएल गेल अछि ।
खाली घर सँ साउस, पुतहुँ आ पति बीचक अन्तरद्धन्द्ध, साउस पुतहुँक कलह, दाइकेँ पोतापोती प्रतिकँे मोहक संग संग दोसर भावनाकेँ कदर नहि कएला पर परिणामकेँ उजागर कएल गेल अछि ।
दू विचार, दू समयक प्रतिनिधित्व सेहो कएने अछि ।
तहिना लाल डायरी कथा हिन्दु आ मैथिली समाजमे रहल अन्धविश्वासकेँ देखाओल गेल अछि । जिद्दी कथा सँ अभिभावक जेना बेटा बेटीकेँ अनुशासनमे रखैत अछि । तहिना बेटा बेटी बनबाक यर्थातताकेँ स्वीकार कएने अछि ।
तहिना समयमे नहि चेतल गेल तऽ जिद्दीक परिणाम की होइत अछि से प्रष्ट अछि ।
बिना छलकपट, निर्देष आ व्यवहारिक भऽ मेहनत कएलापर सफलता अवश्य भेटैत अछि सन्देश जादु कथा छोडने अछि ।
ओतबे मात्र नहि आदर्श, अर्थहीन यात्रा, व्यर्थ उडान आ निष्ठा की देखावा कथामे नारी चरित्रक मनोविष्लेषण कएल गेल अछि ।
समाज की कहत ? दिखावाकँे लेल समाजमे भऽरहल कृकृत्य आ हदकँे वयान ओ कथासभमे कएल गेल अछि ।
तहिना केहन सजायमे धर्मपुत्रीक रुपमे घरमे आएल चमेलीकेँ हुनक घरपरिवार आ सतबा माएकेँ अपन बेटा भेलाक बाद कएल गेल व्यवहार आ ओकरबाद चमेली भोगने पीडाकेँ देखाओल गेल अछि ।
अन्तिम कथा मेनकामे राजिव सरकँे व्यवहार आ स्नेह सँ मेनकाक मोन भितर उब्जल उतार चढावकेँ देखाओल गेल अछि ।
समग्रमे कहल जाए तऽ कथा संग्रह जिद्दी बेसी आदर्शबादक नमुना प्रस्तुत कएने अछि तऽ महिलाकेँ मुख्यपात्रक रुपमे ठाढ़ अछि ।
समाजक विकृति, विसंगती, नीक बेजाए सभक हकदार प्रत्यक्ष वा अप्रत्यक्ष रुपमे महिला भेल वयान कएने अछि ।
तहिना मिथिलाक नारीसभकेँ आगा आ स्वछन्द भऽ आगा बढबाक प्रेरणा सेहो ई कथासंग्रह देने अछि ।
महिलासभक पक्षमे वकालत सेहो करैत अछि । मुदा की अपनासभक समाजमे आबि रहल पश्चिमी संस्कृति आ ओकर विकृति, विसंगतीक जिम्मेवार महिला अछि ।
की महिला आब जननीक बदला संहारकर्ता बनि रहल अछि ।
की मिथिलाक नारी आब सीता जेकाँ प्रतिव्रता आ सीता जेकाँ बनए सँ चुकल छथि ?
यावत गम्भीर प्रश्नसभ सेहो ई कथासंग्रह उठौने अछि ।
पुरुषवादी सोच आ मानसिकताक कारण ई प्रश्नसभ जायज हएत ? मुदा महिलाक कारण समाज बदलल, समाज नीक आ सुशिक्षित बनैत गेल यर्थात कथाकार देखए नहि सकल अछि ।
साहित्यकार समाजक यर्थातताकेँ लाबि कऽ अपन रचना मार्फत सभक समक्ष पहुँचेबाक काज कएने छथि ।
कहल जा रहल अछि कोनो समाजक अध्ययन करवाक चाही तऽ ओ समाजक साहित्य पढलापर पहुँच जाएत ।
एहि सँ साहित्यकारकेँ गम्भीर आ चेतनशील भऽ रचना करय लेल प्रेरित करैत अछि ।
कथाकार पुरुषकेँ दोष नहि देखौने छथि ।
की मैथिली समाजमे सभ दोष महिलेके होइत अछि पुरुष मात्र रबर स्टाम्प अछि ।
ई सभ बात नहि आएब कथासंग्रहक कमजोर पक्ष सेहो देखल गेल अछि ।
कतिपय कथा दुखान्त सँ सुखान्त दिस आगा बढल अछि ।
कतेको स्थानमे दुःखान्त सँ शुरु भऽ दुःखान्तमे जा समाप्त होइत अछि । कथाकार सुजित कुमार झाक रचनासभ आओर उत्कृष्ट रचनासभ आबैक तकर अपेक्षा अछि ।
एक प्रकारक शैली सँ कथासंग्रहकेँ कनी ओझराहटिमे रखलाक बादो यर्थातताकेँ दृष्टिकोण सँ अब्बल अछि ।
भाषाशैली, मैथिली कहवी, प्रकृति तथा व्यक्ति वर्ण सेहो बढिया आ मिठासपूर्ण रहल अछि । पुस्तकक नामाकरण युगानुकुल कथासभ आएल अछि से सुखद बात अछि ।
मैथिली कथा साहित्यमे रौदी पड़ल समयमे एकहि वर्षमे दू दू टा कथा संग्रह आएब वास्तवमे कठिन काम अछि । मुदा ओ चुनौतीकेँ सेहो स्वीकार करैत सुजितक संग्रह प्रशंसनीय अछि ।
तहिना आफन्त नेपाल सेहो कथा संग्रहकेँ प्रकाशन कऽ बजार धरि लौने प्रति धन्यवादक पात्र रहल अछि ।
मैथिली साहित्य क्षेत्रकेँ एकटा आशाक केन्द्र आ भरोसाक साहित्यकारकेँ आगा बढाएब प्रात्ेसाहन कएने काजक लेल आफन्त नेपालकेँ साधुवाद देबहे पड़त ।


रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।


खुशबू झा
रुपाली

बउवा,बउवा .........। कत गेल बउवा ?’ माए बजली कतौ खेलाइत हैत ।अतेक कहैत माए अपन काजमे लागि गेली । इम्हर बाबुजीके अपन छोटकी बेटी सँग बतिएब आ बेटीके लाड करब पसिन छलन्हि । ताएँ जाऽ धरि बेटीके नहि देखब हुनकर नयनके चयन नहि भेटतन्हि । ताबतेमे जेठकी बेटी बजली, ‘पापा बउवा गार्डेनमे असगरे गाछ बृक्ष सँग बतियाति छली ।
अएँ कि भेल ? असगरे एना किए ? कियो किछु कहि देलक ?’ एकै स्वाँसमे पुछल गेल पापाक प्रश्नक जबाब देब बउवाक बसके बात नहि छल । बस शुरु भऽ गेल लाड ।
तखने बेटा आएल बैसि गेल पापाक पजरामे आ ओ पोल खोलैत बाजल, ‘पापा अहाँ बउवाके अतेक लाड किया करैत छी ? बुझल अइ बउवाके पढैमे नहि मौन लगैत अछि । तएँ हम डँटने छलहुँ ।बस बेटाक बात सुनिते बाबु खिसिया गेला आ बजलथि, ‘तु बौवाके डटबएँ तँ निक नहि हएतौ । तोरा कि बुझाइत छौ बउवा नहि पढतै ? देखिहे एक दिन हम्मर सपना इहे पुरा करत ।
इ सुनिते बउवा तऽ खुसि सँ फुलि गेल मुदा सभ किछु सुनि रहल माएँ बेटाक पक्ष लऽ बजली, ‘हमर बेटा ठिके तऽ कहैय, .........’ताबतेमे सभक बातके रोकैत बडकी बेटी बैसाली बजली,‘ बुझल अछि पापा अपन गाममे सेहो आब बोर्डिङ स्कुल खुजल अछि । ताएँ बउवा रुपालीके अहिमे एडमिशन करा दिऔ ।बैशाली छली बड टैलेन्ट , सभ क्षेत्रमे हुनकर हात पकरय बला किओ नहि । पढाई खेलकुद आ घर घरुवारी सभमे आगा । अपना सँ बडका व्यक्ति सँग बात चति करब हुनका पसिन छलन्हि । तँए जानकारी सेहो बड बेसी, आ नम्र सेहो ओतबए । तखन तऽ घरमे माँए पापाक बाद दुनु भाए बहिन दिदिक बात कहियो नहि नकारथि आ जे कहब उएह करब । तँए अपन दिदीक गप्प सुनैत भाए सेहो समर्थन कएलन्हि । ओ तऽ स्कुलक पुरा डिटेल कहि देलक । ओना सोनुक कम्पिटशन सेहो अपना सँ सिनीयर व्यक्ति सँग रहनि । अर्थात बैशाली सँ चारि बर्षक छोट भाए सोनु सेहो अपन दिदी सनक सभ क्षेत्रमे आगू । इएह कारण छल जाहि सँ बाबू जखन नोकरी पर सँ अबैथ तऽ दुनु भाए बहिनक पढाईके सम्बनधमे बुझय एक बेर अबश्य पहुँचैथ हाई स्कुल । ओतय पहुँचैत गर्भ सँ माथ उँच भऽ जाइन कारण सभ शिक्षक दिस सँ बेटी बैशाली आ बेटाक बडाई सुनयके भेटनि हुनका । दुनु अपनाअपना कक्षाक लिडर । आब एहन होनहार बच्चाक बात नहि मानब एहन कोन पिता हएता ? तँए ओ सेहो कहलथि ठिक छई हम आइए बोर्डिङ स्कुलक प्रिन्सीपल सँग भेट करब ।
अतेक बात भेल मुदा एकान्त प्रिय, परीक दुनियामे भुतलाए बाली रुपाली किछु नहि बजली । हुनका तऽ जेना किछु लेल सोचहे नहि पडैन । अतेक ध्यान राखय बला माए बाबु जी आ भाए बहिन जे भेटल रहैक । बस रुपालीके सोचबाक छल तऽ एक्कहिटा बात की परीक दुनियाँ हुएय जतय अपने पाँचु गोटे सधि खन सँगे रही । बेसी बाजब, सँगी बनाएब अहि सभ सँ दुर रहल रुपालीक दिनचर्या सभ सँ अलग । खाएब आ गार्डेनमे खेलाएब बस इतबए रुपालीक दिनचर्या । अबोध रुपालीके बुझल नहि छल की ओहो कहियो जीवनक यात्रा पर असगरे निकलत । दोसर दिन पापा गेलथि स्कुलक प्रिन्सीपल सँग भेट करबा लेल । बातचीत भेल, ओहिके दोसर दिन सँ तय भऽ गेल बउवाके स्कुलक यात्रा । घरमे सभकेउ खुशी रहैक रुपालीक एहन यात्राक लेल । सँगहि अबोध रुपाली सेहो बिन बुझले खुशीके हिसा बनि रहल छल । भोरेभोरे सभ किओ रुपालीक चिंतामे जुटि गेलथि । इम्हर बउवा अपने चकीत छल किए सभकेउ ओकरा एना कऽ तैयार कऽ रहल अछि । खाना बनल बउवाके खुवाओल गेल, एकटा अलग पोशाक पहिराओल गेल । रुपालीके दहि चिनी खुवा माए बिदा कएली आ पापा हाथ पकरि स्कुल दिस गेला । ओतय पहुँच रुपाली बच्चाक जमात, शिक्षकसभक भिड देखि कानय लागल मुदा रुपालीक कानब पापा ओहि दिन बेवास्ता कऽ ओहिठाम सँ आगू बढि गेलथि । बस ! इएह पहिल दिनक यात्रा रुपालीक जीवनक अनन्त यात्रा बनि गेल । कहिया बउवा रुपाली समझदार आ बुझनिक घरक सदस्य बनि गेल एहि बातक किनको अनुभवो नहि भेल । सभ किछु बदलि गेल । रुपालीक उमेर, पारीवारीक सदस्य, सभ किछु । दिदी बैशालकि आब अपन अलग छोट सुन्दर परिवार भऽ गेल, भइया सोनु अपन लक्ष्य प्राप्तीक बाटमे व्यस्त, पापा नोकरीक अन्तिम समयक लुफ्त उठा रहल आ माँए एखनो रुपालीक चिन्तामे व्यस्त । मुदा जँ किछु परिवर्तन नहि भेल ओ छल रुपालीक स्वभाव । परीक दुनियाँ एखनो रुपालीक लेल महत्वपुर्ण अछि । सभक सँग रहब रुपालीक सपना एखनो मरल नहि अछि । मुदा ई अधुरा सपना कहियो पुरा नहि भेल कियक तऽ रुपाली सनक सफा हृदयक व्यक्तिके एहि ठाम भेटल तऽ मात्र निराशा । अपन पढाईक क्रममे जखन रुपाली नौ, दश कक्षा पार कएलक तखन ओकरा किछु सँगी भेटल जे रुपालीक अपन बिबाहीत दिदीक बिछोडक बादके कमी पुरा कऽ रहल छल । मुदा दिदीक कमी पुरा करब कठिन छल किएक तऽ ओ रुपालीक लेल मात्र दिदी नहि सहेली छलथि । अचानक दिदीक बिबाह रुपालीक मनके नहि निक जँेका प्रभावीत कएलक । किछु दिन तऽ किनको सँग बातो नहि करैक ओ । जेना कोनो सिख भेटल हुएय रुपालीके । दिदीके गेलाक बाद रुपाली बुझि गेल ककरो पर आश्रित नहि होयबाक चाहि । दिन बितैत गेल मुदा असगर रहि रहल रुपालीके पापा, भईया आ दिदीक दुरी एकटा प्रश्न ठाढ कऽ दैक । जेना ई दुरी रुपालीक लेल स्लो प्वाइजन हुएय ? जे समयसमयमे अपन बिसके असर देखा दैक ।
स्कुल जिबनमे पारीवारीक व्यक्ति सँग बनय लागल दुरी कलेजक यात्राक बादो एकटा प्रशनक जवाफक खोजिमे लागल रहल रुपाली । सभ किछु बुझलक मुदा सम्बन्धके लऽ कऽ मनमे प्रश्न घुमैत रहैक । रुपालीके तिनचारि महिना पापाक लेल इंतजार करय पडला सँ अबोध मनमे नोकरीक प्रतिक दृष्टि नकारात्मक बनि गेल । एहन काज किए करी जे परिवार सँ दुर कऽ दिए ?’ रुपालीक ई प्रश्नक उत्तर देब सम्भव नहि छल । तँए अहिके केउ पागलपन कहि बातके टारि दैक । सम्बन्धके लऽ कऽ बहुत पोजेसिव रहल रुपाली । जतय ओ किछु सोँचैथ होइक ओहि सँ बहुत अलग । ई दुनियाँ अपनेमे व्यस्त । इएह व्यस्त दुनियाक हिस्सा बनल रुपाली सम्बन्ध तऽ बनौलक जाहिमे किओ रहैक ओकर सँगी तऽ किओ पे्रमी । मुदा एहि सम्बन्धमे सेहो भेटल तऽ एकटा प्रश्न । एकान्त प्रिय रुपालीक आगू फेर सँ एकटा प्रश्न सामने आएल ।कि अपन स्वार्थ पुर्तिक लेल मात्र सम्बन्ध बनाएल जाइत छैक ?’ रुपालीक मनक एहन प्रश्न दुनियाँक आगू प्रस्तुत भेल । रुपाली अपन सँगी ओ अपने बनौने रहैक । मुदा सभ मतलबी, अपन आबश्यक्ताक समयमे रुपालीके याद सभ किओ करैक मुदा जखन रुपालीके उपर किछु समस्या हुएय तऽ सभकिओ साइड लागि जाइक । बस समयसमयमे कखनो सँगीक स्वार्थीपना तऽ कखनो पे्रममे धोखा एहि सभ सँ रुपालीक मनमे गहिर घाउ बना देलक । मुदा तखनो रुपालीक यात्रा समाप्त नहि भेल ओ आगा बढल । आब आरम्भ भेल रुपालीक अफिसीयल यात्रा । ओ अपन पढाई समाप्त कऽ काज शुरु कएलक । बहुत खुशी छल ओ अपन माँए बाबुक लेल किछु करबाक मौका भेटला पर । एकटा नयाँ रुपालीक जेना जन्म भेल हुए । एकटा नयाँ जोश जाँगर देखबाक भेट रहल छल रुपालीमे । मुदा एखनो ओकर मनक अबोधपना समाप्त नहि भेल छल । बस फरक छल तऽ एकैटा आब ओ एहि संसार आ परीक दुनिया बिचक फरक बुझि गेल छल । मुदा एखनो ओ अपन अस्तीत्व खोजि रहल छल परीक दुनियामे । उमेर सँ परीपक्व मुदा हृदय पुरा पुर बच्चा जेहन अबोध । मुदा ई रुपालीक मजबुरी कहि वा आबश्यक्ता एहि सजिव दुनियाँके घृणा करय बाली रुपाली अपना लेल एकटा जगह स्थापीत कएलक । शायद ई पे्ररणा ओकरा अपन पारीवारीक सदस्य सँ भेटल हुएय । तँए छल कपट, धोखा आ दानवीय विचार सँ भडल एहि समाजमे ओ आगु बढैत गेल आ बस बढैत गेल.......। मुदा एकटा अलग संसारक परीकल्पना ओकरा एखनो पाछु नहि छोडलक । एखनो पे्रम, स्नेह, मित्रता आ भातृत्व सँ भडल अलग संसारक कल्पना रुपालीक हृदयक एकटा हिस्सा बनल अछि मुदा ई ओकर हृदय धरि सिमीत रहि गेल......। किओ आगू नहि अएल रुपालीक एहि काल्पनीक संसारक हिस्सा बनबाक लेल । आ बस अधुरा आ एकल बच्चा आई परीपक्व रुपाली भेलाक बादो अधुरा अछि ।
 
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डॉ. कैलाश कुमार मि‍श्र
मेवाड़ आ मालवाक सांझी लोककला : एक परि‍चय
महि‍ला संस्कृति रक्षण केर संवाहि‍का छथि‍। ई परम्परा सनातनसँ शाश्वत अछि‍। संस्कृति अगर लोक संस्कृतिहो तँ महि‍ला लोकनि‍केँ लगभग एकाधि‍कार भऽ जाइत छन्हि‍। जइ कार्य, संस्कार, रीति‍ इत्यादि‍केँ शास्त्रीय परम्परा द्वारा महि‍ला लोकनि‍ नै कऽ पबैत छथि‍ तकरा लोकपरम्परा आ लोक वि‍धान द्वारा विस्तारसँ करैत छथि‍। मि‍थि‍ला संस्कृति ‍मे तुसारी, मधुश्रावणी, आम-महु बि‍आह, जटा-जटि‍न, बि‍आहक पश्चात् कोहबर घरमे सम्पादित अनेक दि‍नक वि‍धि‍-बेवहार एकर उदाहरण अछि‍। लोक परम्परा समन्वित परम्परा होइत अछि‍। एक वि‍धि‍क संग अनेक क्रि‍या-कलाप आ रचनात्मकता संलग्न रहैत अछि‍- पूजा पाठ, तंत्र-मंत्र, पि‍तृ आराधना, गीत-संगीत, जादू-टोना, वस्‍त्र वि‍न्‍यास, वि‍भि‍न्न कलाक प्रदर्शन इत्‍यादि‍। सभ आपसमे ताना बाना जकाँ जुटल। एक-दोसरक प्रति‍ समर्पित। एककेँ बि‍ना दोसरक सम्‍पादन असंभव।
          15 दि‍नक पि‍तृपक्ष एखने अर्थात् 15 अक्‍टुबर 2012क समाप्‍त भेल अछि‍। ऐ पन्‍द्रह दि‍नमे हमरा लोकनि‍ अपन समस्‍त स्‍वर्गवासी पि‍तृ एवं मातृकेँ स्‍मरण करैत हुनका लोकनि‍केँ तील-जलसँ तृप्‍त करैत छी। आवाह्न तर्पन आ पुन: जयबाक ि‍नवेदन :
          ऊँ आगच्‍छन्‍तुमे पि‍त्र इमम्  ग्रहनन्‍तु जलाजलि‍म्।।
"हे पि‍त्र (मातृ) आऊ आ जलकेँ स्‍वीकार करू। आब अहाँ देवलोकमे छी। तँए हमरा लोकनि‍क कल्‍याण करू।" )
          पि‍तृ पक्षमे लगातार पन्‍द्रह दि‍न धरि‍ राजस्‍थानक मेवाड़ (अर्थात् उदयपुर, महासमद) आ मध्यप्रदेशक मालवा (उज्‍जैन, इन्‍दौर ग्‍वालि‍यर आदि‍))))) ) मे कुमारि‍ कन्‍या सभ सांझी पूजैत छथि‍। सांझीमे अनेक तरहक चि‍त्रकलाक आ वि‍म्‍बक ि‍नर्माण करैत छथि‍, गीत गबैत छथि‍ आ अन्‍तत: सांझीकेँ जलकरमे भसा दैत छथि‍। सांझीक पूजा स्‍वर्गीया मातृ लोकनि‍क, आवाह्न आ कृतज्ञताक अर्पन मानल जा सकैत अछि‍।
          सांझीक पूजा आ प्रचलन ओना तँ राजस्‍थान, मध्‍यप्रदेश, पश्चि‍मी  उत्तर प्रदेश, उतराखण्‍ड , उड़ीसा आ अपन मि‍थि‍लोमे कुनो ने कुनो रूपमे व्‍याप्‍त अछि‍। हरि‍याणामे ई सेहो बहुत उत्‍कृष्‍ठतासँ मनाएल जाइत अछि‍। सांझी केर अनेक नाम  यथा- सांझी, सांजी, संझ्या, संध्‍या, संधा, हांजी, हज्‍जा इत्‍यादिसँ जानल जाइत अछि‍।
          पि‍तृपक्षमे पन्‍द्रह दि‍न धरि‍ मेवाड़ आ मालवाक कुमारि‍ कन्‍या लोकनि‍ घरक बाहरी देबालपर गाएक गोबरसँ  आ माटि स   मोटगर लेप बना एक तरहक वर्गाकार आकृति‍ कऽ ओइपर वि‍भि‍न्न तरहक चि‍त्रांकनक ि‍नर्माण करैत छथि‍। संगे अनुष्‍ठान, गीत-नाद, पूजा-पाठ सेहो चलैत रहैत छैक। ओइ समैमे अगर उज्जैन शहरक सि‍ंहपुरा आदि‍ क्षेत्रमे जएब तँ लागत जेना कुनो कला ि‍दर्घाक  वीथिका मे आबि‍ गेल छी। कलाकृति‍केँ देखि‍ भाव-वि‍भोर भेने बि‍ना नै रहब। तेरहम दि‍न कि‍ला-कोटक ि‍नर्माण होइत छैक। कि‍ला कोटक अर्थ भेल कलाकेँ चारुदिस सँ राजमहलक कि‍ला जकाँ गढ़ बना देनाइ। अन्‍तत: पन्‍द्रहम दि‍न सांझीक पूरा रूप प्रसस्‍त भऽ जाइत छैक। पन्‍द्रहमे दि‍नक सांझमे तमाम चि‍त्रकेँ खुरेचि‍ कुमारि‍ कन्‍या, नव ब्‍याहल लड़की (जे बि‍आहक प्रथम वर्षमे सांझी देवीक उद्यापन करैत छथि‍।) समस्‍त खुरचल सामग्रीकेँ लऽ पोखरि‍ धार, नदी आदि‍मे वि‍सर्जन कऽ दैत छथि‍। वि‍सर्जनक दृश्‍य बड्ड भावमय होइत छैक। लड़की सभ गबैत, नचैत नव वस्‍त्रसँ सजल माधुर्यक वातावरण बनेने रहैत छथि‍।
          सांझीमे प्रयुक्त वि‍म्‍ब आ रूप सांझी लोककथाक आधारपर होइत छैक। गोबरसँ नीप बेस बना ओइपर फुलक पंखुरी, चमकम कागत आदि‍सँ चि‍त्र बनाएल जाइत छैक। सांक्षी देवीक गीत गएल जाइत छैक। कि‍छु चि‍त्र एहनो होइत छैक जे नव ब्‍याहताकेँ पारि‍वारि‍क जीवनक आवश्‍यकताकेँ सूचि‍त अथबा प्रदर्शित करैत छैक। ओइ श्रेणीमे टी.वी., फ्रीज, मोटर बाईक, गैसक चुल्हा आ सि‍लि‍ण्‍डर इत्‍यादि‍ सेहो मनोहारी ढंगसँ चि‍त्रि‍त कएल भेट जाएत।
सांझी के छलीह? ऐ सम्‍बन्‍धमे अनेक तरहक दंत कथा छैक। जेना कि‍ सांझी दुर्गाक एक रूप छथि‍; ब्रह्माक पुत्री छथि‍; सांझी पार्वती अर्थात शि‍वक अर्धांगि‍नी छथि‍; सांझी वैदि‍क देवी छथि‍ जि‍नकर उपासना संध्‍या  अर्थात् सांझमे कएल जाइत अछि‍; सांझी लक्ष्‍मी नारायणक प्रति‍रूप छथि‍; सांझी नवदुर्गाक प्रति‍मूर्ति छथि‍; सांझी बृन्दावन धामक देवी छथि‍; सांझी राजस्‍थानक संगानेरक कन्‍याक छथि‍ जि‍नकर बि‍आह अजमेर छलन्‍हि‍; सांझी कुमारि‍ कन्‍यासबहक अराध्‍य आ प्रीय देवी छथि‍, सांझी राजस्‍थानक बगड़ावत क्षेत्रमे लोक आख्‍यायनमे प्रशंसि‍त देवी थीकीह आ अन्‍तत: सांझी सूर्य देवक  अर्धांगि‍नीक रूपमे सेहो जानल जाइत छथि‍।
          चि‍त्रि‍त चि‍त्रांकन आ मनुक्‍खक आकृति‍सँ एना ज्ञात होइत अछि‍ जे सांझी एक ब्‍याहल कन्‍या छलीह। जिनकर वैवाहक जीवन सफल नै रहलनि‍। अनमेल बि‍आह छलन्‍हि‍। पति‍, सासु, समाज सभ शोषण केलकन्‍हि‍।
          कुमारि  कन्‍या सभ भोरे उठि‍ ताजा गोबर चूनि‍ फूल, पत्तीक बेवस्‍था कऽ सांझी कलाक  निर्माण  मे लागि‍ जाइत छथि‍। देबाल एक क्षेत्रकेँ वर्गाकार आकृति‍केँ गोबरक आ  माटिक  लेपसँ भरल जाइत अछि‍। परम्‍परा आ व रूचि‍केँ मि‍श्रण कऽ मोटीफ केर निर्माण होइत अछि‍। हरेक कन्‍याक कल्‍पनाशीलता भि‍न्न होइत छन्‍हि‍। माय, पि‍ति‍याइन सभ सेहो मदति‍ करैत छन्‍हि‍ जइसँ सांझी रमणगर आ सौन्‍दर्यसँ परि‍पूर्ण भऽ जाइक। बनेबाक सामग्रीक रूपमे गोबर, फूल, पात, धास, मक्कैक बालि‍, रंगारंग कागज, टीन फ्वाइल, कौड़ी, बांसक -बत्ती, सि‍न्‍दुर कुमकुम इत्‍यादि‍क प्रयोग सबतरि‍ भेटत। मालवा अर्थात उज्‍जैन दि‍स गुल-तेवारी, गेन्‍दा लाल, चमेली, बरमासा फूल जेकरा सदा सुहागन सेहो कहल जाइत छैक केर प्रयोग होइत छैक। गुलाबी, उज्‍जर, पीकीस ब्राउन, आदि‍ रंगक वि‍शेष स्‍थान होइत छैक।
सर्वप्रथम आंगुरसँ प्रथम परतक निर्माण   कैल जाइत छैक। जकरा गोहाली कहल जाइत छैक। ऐमे वर्गाकार क्षेत्र अथवा अष्‍टकारक निर्माण गोबर आ माटि‍क मोट लेपसँ देबालपर कएल जाइत छैक। प्रथम तीन आंगुरक सहायतासँ फीगरक निर्माण केलाक बाद फुल, पात, घास, आदि‍सँ साटि‍ फीगरकेँ सजाएल जाइत छैक। प्रथम दिनक  डि‍जाइनकेँ दोसर दि‍न उखाड़ि‍ देल जाइत छैक। प्रत्‍येक ति‍थि‍क अनुसारे मोटीफक  निर्माण कएल जाइत छैक। राजस्‍थानक एक  गाममे प्रयुक्त तेरह दि‍नक सांझी चि‍त्रण हमरा एना भेटल-
एकम (पहि‍ल)- वन्‍दरावल
बीज (दोसर)- बीजना (पंखा)
तीज (तेसर दि‍न)- तीन, ति‍वाड़ी (तीन खि‍ड़की)
चौठ (चारि‍म दि‍न)- चौपड़
पंचम (पॉचम दि‍न)- पांच कुवारे (पाँच कुमार बालक)
छठम (छठम दि‍न)- फूल छड़ी (फूलक डंडा)
सातम (सातम दि‍न)- साति‍या (स्‍वास्‍ति‍क)
आठम (आठम दि‍न)- अष्‍टकोणी बाजोट (बैसैबला टूल)
नम (नवम दि‍न)- डोकरा-डोकरी (बुढ़आ बुढ़ी)
दशम (दसम दि‍न)- दस पकवान (दस तरहक ब्‍यंजन)
ग्‍यारस (ग्‍यारहम दि‍न)- जनेऊ
बारस (बारहम दि‍न)- सीड़ी (सीढ़ी)
तेरस (तेरहम दि‍न)- कोंट (ऐ दि‍नक सांझीमे सभ दि‍नमे युक्‍त चि‍त्रक ि‍नर्माण कएल जाइत छैक। एकरा अलाबे आरो बहुत रास बि‍म्‍वक  निर्माण  होइत छैक।)

सांझी कलाक रूप आ ओकर अर्थ लोक कलामे आश्चर्यजनक ज्ञान आ परम्‍पराक समावेश होइत छैक। कुनो चीज निरर्थक  नै भेटत। जेना कि‍ कतौ-कतौ सातम दि‍न हत्‍यारी-हतम केर रूपक वि‍न्‍यास करबाक परम्‍परा छैक। तइ दि‍न ओइ आत्माक स्‍मरणमे रूपकेँ गढ़ल जाइत छैक जि‍नकर या तँ हत्‍या भऽ गेलन्‍हि‍ या ओ स्‍वयं आत्‍महत्‍या कऽ लेलन्‍हि‍। नवम दि‍नमे डाकरि‍या नम बनैत छैक। ओइ दि‍न बुढ़ आ बुढीक चि‍त्रण होइत छैक जे नवमी तिथि में अई जीवनकेँ ति‍याग केलन्‍हि‍। बीजना या बीजनी खजुर पंखाकेँ कहल जाइत छैक। तेसर दि‍न ति‍वाड़ी अर्थात तीनटा खि‍ड़कीक निर्माण  कएल जाइत छैक। चौपड़ खेलक चि‍त्रण चारि‍म दि‍न कएल जाइत छैक। कतौ-कतौ छठम ति‍थमे फूल छाबरी अर्थात् फुलडालीक निर्माण  करबाक परम्‍परा भेटत। सति‍या अथवा हति‍या स्‍वास्‍ति‍ककेँ कहल जाइत छैक। एकर निर्माण  सामान्‍यतया सातम दि‍न कएल जाइत दैक। अठकली फूलक निर्माण आठम दि‍न कएल जाइत छैक। कतौ-कतौ नवम ति‍थि‍मे नंगटा-नंगटी (वाद्य यंत्र) रचना सेहो कएल जाइत छैक।
लोक परम्‍परा शास्‍त्रीय परम्‍परामे सेहो प्रयुक्‍त कएल जाइत छैक। राजस्‍थानक श्रीनाथ जीक मंदि‍रमे मुर्तिक पाछाँ पि‍छवाइ कला आ केराक पातपर सांझी बनैत छैक। एकर दोसर ठाम जलमे सांझी बनैत ैछक। वृन्‍दावनमे फर्शपर रंगोलीक रूपमे अनेक तरहक रंग आ चाउरक आंटाक प्रयोगसँ कलात्‍मक सांझी राधा आ कृष्‍णक प्रेमकथा आ भक्‍ति‍केँ स्‍मरण करबाक अप्रतीम कलाक रूपमे बनाएल जाइत छैक।
बहुत तँ जानकारी नै अछि‍ परन्‍तु बुझना एना जाइत अछि‍ जे मि‍थि‍लामे सांझ पूजक परम्‍परा आ कुमारि‍ कन्‍या सभ द्वारे तुसारी  पूजन सांझीक परम्‍पराक एक रूप अछि‍। नेपाल आ उत्तराखण्‍डमे सेहो कि‍छु एहन परम्‍पराक वि‍धान छैक।
एक दि‍न राजस्‍थानक उदयपुरसँ हल्‍दी धाटी घूमए लेल गेल रही। ओतए केर सांझी स्‍थानीय फूलक सहायतासँ बनाएल जाइत छैक। आ ओइमे राधा-कृष्‍णक प्रेमक प्रबलता दृष्‍टि‍गोचर भक्‍ति‍-भावसँ कलात्‍मक रूपे होइत छैक। फूलक एहेन वि‍न्‍यास अन्‍यत्र असंभव। ओना लोककलामे कून नीक आ कोन खराप ई कहब असंभव मुदा मालवा  अबि‍ते मातर सांझीक कलासँ कुनो बटोही मंत्र मुग्‍ध भऽ जाइत अछि‍। ओतए केर नायि‍का केर आँखि‍ अतेक कतरगर  जे मोन करत दखि‍ते रही। जेहने कि‍शोरी तहने चि‍त्रकला। मोन करत केकर प्रशंसा करी चि‍त्रक अथवा चि‍त्र बनेनि‍हारि‍केँ?
राजस्‍थानमे एक कथा पता लागल। संझा छलीह सांवरि‍ आ सामान्‍य गरीब घरक कन्‍या। हुनकर बि‍आह कि‍छु खाश परि‍स्‍थि‍ति‍मे एकटा नांगर ब्रह्मण जेकर नाम खोड़या ब्राह्मण रहैक- करा देल गेलन्‍हि‍। बेचारी संझाकेँ सासुरमे बड्ड कष्‍ट भेलन्‍हि‍। पति‍ कहि‍यो हुनकर भावनाकेँ सम्‍मान नै देलकन्‍हि‍। नैहरमे जनम हेबाक तुरंत बाद माय मरि‍ गेलथि‍न्‍ह। कष्‍टेमे जनम भेलनि‍, वि‍कट स्‍थि‍ति‍मे बि‍आह भेलन्‍हि‍ आ कष्‍टेमे मरि‍ गेलीह सांझा। हुनका मरला उत्तर दैव लोकमे स्‍थान भेटलनि‍। आ जे कुमारि‍ कन्‍या श्राद्ध पक्षमे हुनकर तेरहसँ पन्‍द्रह दि‍न अराधना करतीह ति‍नकर वैवाहि‍क जीवन सफल रहतैक। अही तरहक लोक मान्‍यता ओइ क्षेत्रमे छैक।
मि‍थि‍लाक सामा-चकेबा पाबनि‍ जकाँ मालवामे सांझीक भाइ-बहि‍नक सम्‍बन्‍धकेँ मधुर बनेबैबला लोक-उत्‍सव मानल जाइत छैक। लड़की सभ अपन बीराजी (भैय्या)क लेल मंगल कामना करैत छथि‍। जे चीज नै भेटैत छन्‍हि‍ तइ लेल भायसँ नि‍वेदन कऽ ओइ चीजकेँ मंगा संझाक नीक जकाँ  निर्माण , पूजा-पाठ करैत छथि‍।
अन्‍तत: यएह कहल जा सकैत अछि‍ जे सांझी लोक परम्‍पराक एक अनुपम उदाहरण अछि‍. अहेन उदाहरण  जइमे चि‍त्रकला, नृत्‍यकला, संगीतकला, वस्‍तुकला आदि‍क सम्‍न्‍वि‍त समावेश भेटत। ऐ तरहक अनुपम लोक कलाक रक्षण भेनाइ अनि‍वार्य।


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गजेन्द्र ठाकुर
विद्यापति: किछु प्रचलित कुप्रचारक निराकरण (भाग-३)

फणीश्वरनाथ रेणु बिदापत नाचपर रिपोर्ताज लिखलनि जे १ अगस्त १९४५ ई. केँ साप्ताहिक विश्वमित्रमे प्रकाशित भेल। ऐ रिपोर्ताजक महत्व अछि, कारण ई ऐ विषयपर ज्योतिरीश्वर द्वारा लिखित विवरणक ७०० बर्ख बाद लिखल गेल आ ऐ ७०० बर्खमे जे विद्यापतिकेँ समानान्तर परम्परा जिआ कऽ रखलक।
आ जे एकरा जिआ कऽ रखलक ओकरासँ अनचोक्के विद्यापति छीनि लेल गेलन्हि। बिदेश्वर ठाकुर विद्यापति गीत

गबैत आ हाक्रोश करैत मृत्युकेँ प्राप्त केलन्हि जे विद्यापतिकेँ पाग पहिरा कऽ ब्राह्मण सभ छीनि लेलक। ब्रह्मपुराक कानूनगो बद्री प्रसाद ठाकुर, पोखरिभीड़ाक बिनोद ठाकुर, रुद्रपुरक सरयुग ठाकुर आ मेंहथक जयराम ठाकुर आ बिस्फीक सौँसे गाम आइयो ई रटि रहल छथि। शालिग्राम यादव, अवधिया ठाकुर बिस्फी गामक परम्पराक गवाह छथि। विद्यापति कर्मकाण्डीय अपहरण मे हुनकर जन्म आदिक प्रति सभ तरहक अनर्गल तर्क उपस्थित होइत रहल मुदा हुनकर समानान्तर परम्पराक मादे कोनो शोध-पत्रमे चर्चो धरि नै भेल। ई आलेख बिदेश्वर ठाकुर सन हजारक हजार समानान्तर परम्पराक लोकक प्रति समर्पित अछि जे बिदापतक ज्योतिरीश्वर आ फणीश्वरनाथ रेणुक दुनू आलेखक बीच विद्यापतिकेँ जिआ कऽ रखलन्हि।

मिथिलाक शतपथ ब्राह्मणक परम्परा आ मिथिलाक समानान्तर परम्परा:
वैदिक संस्कृतक प्राचीनतम ग्रन्थ ऋगवेदसँ पहिनेसँ भाषा अस्तित्वमे रहल हएत। कतेक मौखिक साहित्य जेना गाथा, नाराशंसी, दैवत कथा आ आख्यान सभ ओहिमे रचल गेल हएत। एहने गाथा सभक गायकक लेल गाथिन”, “गातुविद्गाथपतिऋगवेदमे प्रयुक्त भेल।
वैदिक कालेसँ गाथा आ नाराशंसी समानान्तर रूपमे रहल।
प्राकृतसँ वैदिक संस्कृत बहार भेल आकि वैदिक संस्कृतसँ प्राकृत? वेदमे नाराशंसी नाम्ना जन आख्यान यएह सिद्ध करैत अछि जे दुनू समानान्तर रूपेँ बहुत दिन धरि चलल। ई समानान्तर परम्परा दुनूकेँ प्रभावित केलक। आब ऋगवेद देखू- ओतए दुर्लभ लेल- दूलभ, (ऋगवेद ४.९.८) प्रयोग की सिद्ध करैत अछि? अथर्ववेदमे पश्चात् लेल पश्चा (अथर्ववेद १०.४.१०) की सिद्ध करैत अछि? गोपथ ब्राह्मणमे प्रतिसन्धाय लेल प्रतिसंहाय की सिद्द करैत अछि? (गोपथ ब्राह्मण २.४)।
जे आर्य छथि से भारतक पच्छिम भागसँ मिथिलामे एलाह, आ हुनका सभक एबासँ पूर्व वेदक किछु अंश विद्यमान छल, तेँ ने बहुत रास शब्द जे मैथिलीमे अछि, बहुत रास उच्चारण जे मैथिलीमे अछि ओ वैदिक संस्कृतमे अछि, मुदा लौकिक संस्कृतमे नै अछि। अविद्या, कर्मसिद्धान्त, जन्म आ पुनर्जन्मक आवाजाही आ मोक्ष ई सभ अनार्यसँ आर्यकेँ भेटलै। तेँ ने उपनिषदमे मोक्ष प्राप्तिक मार्ग छै, स्वर्ग प्राप्तिक नै। मोक्ष भेटत कोना? यज्ञ केलासँ? नै, ई भेटत ज्ञानसँ आ मनन-चिन्तन आ समाधिसँ। राजा जनकक संरक्षणमे याज्ञवल्क्य बृहदारण्यक उपनिषदक तिरहुतक अनार्य क्षेत्रमे रचना केलन्हि।
वाचस्पति मिश्र सांख्यकारिकाक सन्तावनम सूत्रक व्याख्या करैत कहै छथि जे की ई कहि सकै छी जे अचेतन दूध केर पोषणसँ परु पोसाइए आ अचेतन प्रकृतिक संचालनसँ जीवकेँ मुक्तिक ज्ञान भेटैए? ईश्वर तँ स्वयंमे पूर्ण छथि तँ ओ कोन उद्देश्ये विश्वक सृष्टि करताह आ जीव लेल जँ ओ सृष्टि करताह तँ सृष्टिक बादे तँ जीव बन्हाइए आ सृष्टिसँ पूर्व तँ बन्हेबाक प्रश्ने नै अछि, तखन जीवक प्रति कथीक दया? से प्रकृति द्वारा सृष्टि होइए आ जीव अपन प्रयाससँ अपवर्गक प्राप्ति करै छथि। आ विवेकसँ होइए प्रलय। से ईश्वरवाद नै निरीश्वरवाद अछि वाचस्पतिक व्याख्या। प्रकृति संचालनमे जँ ईश्वर भाग लै छथि तँ ओ चेतन प्रक्रिया हएत जे कोनो उद्देश्येसँ हएत आ तकर कोनो खगता ईश्वरकेँ छन्हिये नै। न्यायसूत्रक रचना केनिहार मिथिलाक गौतम सोलह पदार्थक ज्ञानसँ जीवक निःश्रेयस प्राप्त करबाक चर्च करै छथि, मुदा ऐ सभमे ईश्वरक कतौ चर्च नै अछि जे हुनको द्वारा मुक्ति सम्भव अछि। वैशेषिक सूत्र कहैए जे वेद विद्वान लोकनि द्वारा रचल गेल अछि नै कि ईश्वर द्वारा। कुमारिल भट्ट कहै छथि जे सृष्टिक पूर्व ईश्वरक विषयमे कोनो विश्वसनीय चर्चा असम्भव अछि।
 

शतपथ ब्राह्मणक तथाकथित मुख्य धारा, आ तकर समानान्तर मुख्यधारा:
ब्राह्मण आ गएर ब्राह्मणवाद मिथिलामे शुरुएसँ रहल अछि। ज्योतिरीश्वर लिखै छथि- बौध पक्ष अइसन- आपात भीषण। अगतिशील शतपथ ब्राह्मणक परम्परा नामक साम्यताक कारण संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिकेँ पूज्य बनबैपर बिर्त अछि। ऋक् आ नाराशंसी, महाकवि विद्यापति आ पागबला विद्यापति, मोक्ष आ स्वर्ग-नर्क ई दुनू परस्पर विरोधी विचारधारा मिथिलामे रहल।
 
शतपथ ब्राह्मणक विदेघमाथव आ पुराणक निमि दुनू गोटेक पुरोहित गौतम छथि से दुनू एके छथि आ एतएसँ विदेह राज्यक प्रारम्भ। माथवक पुरहित गौतम मित्रविन्द यज्ञक/ बलिक प्रारम्भ कएलन्हि आ पुनः एकर पुनःस्थापना भेल महाजनक-२ क समयमे याज्ञवल्क्य द्वारा। मैत्रेयी, याज्ञवल्क्य, सीता, जनककेँ रटैत-रटैत ई परम्परा विद्यापतिक यज्ञोपवीत संस्कार आ पाग प्रतिष्ठापन जइ तीव्र गतिये केलक से ओकर शतपथ ब्राह्मणक तथाकथित मुख्य धाराक अनुकूल छल।
 

१७६० ई.क माधव सिंहक शाखा पञ्जीक आदेशक बाद मिथिलामे ब्राह्मण आ कायस्थ मध्य नव-कुलीनवादक प्रसार भेल आ भलमानुस (बत्तेसगमिया) उपजातिक कर्ण कायस्थमे आ स्रोत्रिय उपजातिक मैथिल ब्राह्मणमे उत्पत्ति भेल, ओइसँ शारीरिक आ मानसिक बीमारी ऐ दुनू उपजाति मध्य भयंकर रूपसँ बढ़ल, संगे बहुविवाह, बाल-विवाहक आ विधवाक संख्यामे अत्यधिक वृद्धि भेल। आ ईहो जइ शान्तिपूर्ण रूपसँ आ तीव्रगतिसँ भेल से शतपथ ब्राह्मणक तथाकथित मुख्य धाराक अनुकूल छल।
 

विद्यापतिपर दिनेश्वर लाल आनन्द आ रामवृक्ष बेनीपुरीक विचार!!
दिनेश्वर लाल आनन्दकेँ भ्रम रहन्हि, ओइ कालमे पञ्जी गुप्त चीज रहै, जे संस्कृत आ अवहट्ठ बला विद्यापतिक विषएवार बिस्फीकेँ पञ्जीमे जयवार (निम्न कोटिक) कऽ देल गेल रहै। शाखा पञ्जी १७६० ई.सँ पहिने रहबे नै करै आ तकर प्रमाण अछि जे अयाची मिश्रक मूलक निचुलका पीढ़ी स्रोत्रिय उपजातिमे अछि आ ब्राह्मण उपजातिमे सेहो। ई ओहिना अछि जे सिन्धु घाटी सभ्यतामे बड़द रहै मुदा गाय नै (सीलपर), मुदा बिनु गाय बड़दक उत्पत्ति कोना हएत। दिनेश्वर लाल आनन्दकेँ पञ्जीक सभ तथ्य उपलब्ध नै रहन्हि, प्रायः पदावली बला विद्यापति आ संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिक एक्के हेबाक दुष्प्रचारमे हुनका लागल हेतन्हि जे अवहट्ठमे लिखबाक कारण जँ विषएवार बिस्फीकेँ पञ्जीमे जयवार करबाक सम्बन्धसँ जोड़ल जाए तँ विद्यापति ठक्कुरः किए क्रान्तिकारी भेलाह से व्याख्या कएल जा सकत। मुदा दिनेश्वर लाल आनन्द सेहो मानै छथि जे पदावलीक हुनकर (विद्यापतिक) हाथक तँ छोड़ू, हुनकर कालोमे संगृहीत पदक कोनो विवरण नै अछि। मुदा से कोना सम्भव जखन संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापति अपन संस्कृत आ अवहट्ठ ग्रन्थ सभ टहंकारसँ आरम्भ आ समापन करै छथि, के राजा-रानी हुनका प्रेरित केलखिन्ह, ककर आश्रित छलाह, सभ वर्णन दैत। पूर्ण लेखकीय अन्दाज, सरस्वती आ लक्ष्मी दुनुक बल; तखन पदावलीमे से किए नै? दिनेश्वर लाल आनन्द गुम्म छथि। संस्कृत आ अवहट्ठ बला विद्यापति अपन आश्रयदाताक विषयमे लिखने छथि मुदा कोनो संस्कृत आ अवहट्ठ ग्रन्थमे अपना विषयमे किछुओ नै लिखने छथि। ओ अवह्ट्ठ लिखबोमे दवाबक अनुभव करै छथि, जे तखुनका मुख्य परम्पराक साहित्यिक भाषा छल। मुदा ज्योतिरीश्वरपूर्व विद्यापतिक प्रभाव एतेक छलन्हि जे हुनका संस्कृत नाटक गोरक्षविजयमे मैथिली गीत लिखऽ पड़लन्हि (जेना विदाञोतक पहिल रिपोर्ताज लिखनिहार ज्योतिरीश्वरकेँ संस्कृत नाटक धूर्तसमागममे मैथिली गीत लिखऽ पड़लन्हि)।
गोविन्द झा ज्योतिरीश्वरक विदाञोतमे विद्यापतिक परम्परा देखि लै छथि, चर्च करै छथि मुदा ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापतिकेँ आगाँ किए नै बढ़ा पबैत छथि जखन बिदेश्वर ठाकुर गाबि-गाबि कऽ प्राण त्यागि रहल छथि? विद्यापति नाटकमे विद्यापतिकेँ प्यास जतऽ लगलन्हि ओ नाटक लेखकक गाम कोना भऽ जाइए? सभ अपना-अपना हिसाबसँ हम्मर विद्यापतिपर नाटक लिखि रहल छथि।

रामबृक्ष बेनीपुरी लग सेहो पञ्जीक तथ्य नै छन्हि। एकटा उपजातिक बनोतरी आ किंवदन्तीक आधारपर ओ केशव मिश्रक विद्यापतिपर हँसब लिखै छथि; द्वैत परिशिष्टक ई केशव मिश्र वाचस्पति-२ (१४००-१४९०) क पौत्र छथि। एकटा आर केशव मिश्र (११५० लगभग) छथि जे तर्कभाष लिखै छथि आ जकर समीक्षा तत्वचिन्तामणिकारक गंगेशक पुत्र वर्धमान तर्कप्रकाशमे करै छथि। आनन्द कुमारस्वामे जतेक शोध १९१५ ई. मे केने रहथि ओइसँ एक्को डेग आगाँ नहिये बेनीपुरी जा सकलथि नहिये आनन्दस्वामीक सए बर्ख बाद कियो दोसर मुख्यधाराक शोधकर्ता जा सकल छथि। वएग उगनाक कथा बेनीपुरी कहै छथि, मुदा महादेव संस्कृत आ अवहट्ठक कट्टर विद्यापतिक शैवसर्वस्वसारपर कैलाशमे नचता आकि ज्योतिरीश्वरपूर्व विद्यापतिक नचारीपर, ओइपर गुम छथि। आनन्द कुमारस्वामी जकाँ बेनीपुरीकेँ बुझल छन्हि जे संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापतिक हाथक लिखल भागवत उपलब्ध अछि आ इहो जे विद्यापतिकेँ गंगालाभ कोना भेलन्हि, गंगा हुनका अपनामे लीलि लेलखिन्ह। आनन्द कुमारस्वामी जकाँ बेनीपुरीकेँ संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापतिक लिखल पुरुषपरीक्षाक विषयमे सुनल छन्हि मुदा पढ़ल नै छन्हि, आ से नै तँ हुनका बुझल रहितन्हि जे संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापति गंगालाभक कथा बोधि कायस्थक विषयमे लिखने छथि। ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापतिक विषयमे ई कथा उगनाक कथा सन प्रचलित छल जे बादमे संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापतिसँ कर्मकाण्डीय रूपमे जोड़ल गेल आ पुरुषपरीक्षाक कथा बोधि कायस्थ एकर प्रमाण अछि। कीर्तिपताकाकेँ बेनीपुरी मैथिली गीतक संग्रह कहै छथिइ!! पूछि-पाछि कऽ शोध कएल जाइ छै? जे आधार कुमारस्वामी सए बर्ख पहिने रखलन्हि, ओइपर सुखाएल मुख्यधारा किए नै आगाँ बढ़ल कारण ई शतपथ ब्राह्मणवादी मुख्यधारा ओकरा एकर अनुमति नै दै छै। मुदा बिना कोनो प्रमाणक शिवसिंहक मित्र पुरादित्यकेँ भूमिहार ब्राह्मण सिद्ध कऽ दै छथि, ओहिना जेना गोविन्ददास (झा) केँ रमानाथ झा स्रोत्रिय बतेलन्हि (सुकुमार सेन तकरा हास्यास्पद मानै छथि), आ रामदेव झा ब्राह्मण सिद्ध करै छथि आ कालिदासकेँ वर्माजी (लालदास स्मारिकामे) कायस्थ सिद्ध करै छथि।
संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापति पूर्ण कर्मकाण्डक संग पुस्तकक प्रारम्भ आ अन्त करै छथि, राजा-रानी-आश्रयदाताकेँ मोन पाड़ै छथि मुदा अपन चर्च नै करै छथि। मुदा पदावली लोककण्ठमे किए रहि गेल, पुस्तकक तामझाम ओ तकरा किए नै देलन्हि, कारण ओ हुनकासँ कए सए पूर्वक रचना छल, जखन पागक उत्पत्ति मिथिलामे नै भेल छल। पदावलीमे रूपनारायण, शिवसिंह, लखिमा, देव सिंह, हर सिंह, पद्म सिंह, विश्वास देवे, अर्जुन-अमर, राघव सिंह, रुद्र सिंह, धीर सिंह, भैरव सिंह, चन्द्र सिंह आदि बादमे घोसिआएल गेल, जे गीतक लयकेँ प्रभावित करैत स्पष्ट रूपसँ दृष्टिगोचर होइत अछि। संस्कृत-अवहट्ठबला विद्यापति भू-परिक्रमा (देव सिंह), कीर्तिलता (कीर्ति सिंह आ वीर सिंह), कीर्तिपताका, गोरक्षविजय (शिव सिंह), लिखनावली (पुरादित्य), दान वाक्यावली (रानी धीरमति) आदि स्पष्ट रूपसँ राज्याश्रित रचना छल। गोरक्षविजय नाटक भैरव पूजाक अवसरपर लिखल गेल आ ऐ मे धूर्त समागम सन मैथिली गीत छल जे ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापतिक भयंकर प्रभाव स्वरूप छल। नामक असमानता नै रहैत तँ ज्योतिरीश्वकेँ ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापति बना देल जाइत।
 
तत्वचिन्तामणिकारक गंगेश १२००० ग्रन्थक बराबर एकटा ग्रन्थ लिखलन्हि। प्रोफेसर दिनेशचन्द्र भट्टाचार्य हिस्ट्री ऑफ नव्य-न्याय इन मिथिलामे लिखै छथि- “The family which was inferior in social status is now extinct in Mithila…Gangesha’s family is completely ignored and we are not expected to know even his father’s name.” आ ई सभ सूचना, ओ लिखै छथि, हुनका प्रो. आर.झा (रमानाथ झा) देलखिन्ह!
आब आउ पञ्जीमे वर्णित तथ्यपर- ओइमे स्पष्ट रूपसँ लिखल अछि जे तत्वचिन्तामणिकारक गंगेशक जन्म पिताक मृत्युक पाँच वर्ष बाद भेलन्हि आ ओ चर्मकारिणीसँ विवाह केलन्हि, तँ ई गप रमानाथ झा दिनेशचन्द्र भट्टाचार्यसँ किए नुकेलन्हि? एकटा उपजाति द्वारा हिनकर मूर्खसँ विद्वान बनबाक गपपसारल गेलन्हि आ हिनका खतम करबाक साजिश भेल।
गंगेशक पुत्र वर्द्धमान गंगेशकेँ सुकविकैरवकाननेन्दुः कहै छथि। मुदा गंगेश सन प्रसिद्ध विद्वानक कविता कोन साजिशक अन्तर्गत आइ उपलब्ध नै अछि से ऊपर देल उदाहरणसँ स्पष्ट अछि। बंगालक वासुदेव पक्षधर मिश्रक सहपाठी रहथि, मिथिला पढ़ैले एला, शलाका परीक्षा उत्तीर्ण केलन्हि आ सर्वभौम उपाधि भेटलन्ह्। वासुदेव गंगेशक तत्वचिन्तामणि आ उदयनक न्यायकुसुमांजलिक कारिकाकेँ कंठस्थ कऽ लेलन्हि। पक्षधर आ आन मिथिलाक शिक्षक तत्वचिन्तामणि लिखबाक (प्रतिलिपि करबाक) अनुमति नै दै छला! वासुदेवक शिष्य रघुनाथ शिरोमणि अपन गुरु पक्षधर मिश्रकेँ शास्त्रार्थमे हरा प्रमाणित करबाक अधिकार लेलन्हि। नव्यन्याय स्कूलक नवद्वीपमे वासुदेव-रघुनाथ द्वारा स्थापना भेल। पक्षधर मिश्र संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिक समकालीन छला। आ रघुनाथक संग बंगालसँ मिथिला विद्यार्थीक आगमन बन्द भऽ गेल।

शिवसिंह द्वारा संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिकेँ जे बिस्फी ताम्रपत्र देल गेल तकरा ग्रियर्सन फर्जी कहलन्हि कारण ओ विद्यापतिक पदावलीसँ परिचित रहथि आ बूझि गेल रहथि जे ओइ विद्यापतिकेँ ई ताम्रपत्र भेटब असम्भव छल। मुदा ई ताम्रपत्र तँ संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिकेँ भेटल छलन्हि आ दुनूक बीचक अन्तर ग्रियर्सन नै सोचि सकला। मुदा से म.म. हरप्रसाद शास्त्री सोचलन्हि आ ऐ ताम्रपत्रकेँ असली बतेलन्हि।

श्रीधरदासक सदुक्तिकर्णामृतमे कैवर्त पपीहाक गंगापर स्तुति गीत अछि। राधाकृष्णक गीत अछि। लक्ष्मणसेनक राज कवि धोयी (जोलहा) रहथि। लखिमा ठकुराइन पदावली नै लिखलन्हि संस्कृतमे पद्य लिखलन्हि (ग्रियर्सन)। श्रीधरदासक अभिलेख अंधरा ठाढ़ीमे अछि आ ओ नान्यदेव आ गंगदेवक मंत्री रहथि। हुनकर वंशज अमिअकर संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिक समकालीन रहथि। गंगदेवकेँ उपेन्द्र ठाकुर कलचुरी मानै छथि। विजय कुमार ठाकुर कलचुरि कर्णक स्तुतिमे सदुक्तिकर्णामृत (श्रीधरदास)क विद्यापतिक गीतकेँ मानै छथि। राधाकृष्ण चौधरीक मत ऐ सँ भिन्न छन्हि। कोनो परिस्थितिमे ई विद्यापति ज्योतिरीश्वर पूर्व रहथि। रामचरित”- विग्रहपाल-३ कर्णकेँ हरेलन्हि, ऐ सम्बन्धमे बेगूसरायसँ उत्तर १६ किमी. नौलागढ़सँ दूटा पाल अभिलेख राधाकृष्ण चौधरीकेँ भेटलन्हि। ओहो कर्ण ११म शताब्दीक छथि। धूर्त समागम सेहो दक्षिण भारतमे प्रसिद्ध अछि।

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जगदानन्द झा मनु
प्रेमक बलि


प्रवल आ सुमन एक दोसरसँ बहुत प्रेम करैत छल | दुनू संगे- संग बितल पाँच बरखसँ पढि रहल छल आ ओहि समयसँ दुनूक बिचक चिन्हा परिचय कखन अगाध प्रेममे बदैल गेलै से दुनूमे सँ केकरो सुधि नहि रहलै | आब दुनूक प्रेम अपन चरम सीमा पर पहुँच चुकल छैक आ एक दोसरकेँ बिना जीवनक कल्पनो दुनूक लेल असहनीय छैक | दुनूक प्रेम आब दुनूक एकान्तीसँ निकैल कालेज कम्पलेक्समे गमकए लगलै आ तरे-तरे गाम तक  सेहो | मुदा  रुढ़िवादी ताना-बानामे बुनल समाजक व्यवस्थामे दुनूक मिलन आ  विवाहक कल्पनो असंभव छलैक | किएक तँ  प्रवल ब्राह्मण आ सुमन तेली जातिकेँ छल आ प्रवलक मए बाबू आ समाजकेँ लोग एहि बिजातीय विवाहकेँ पक्षमे कोनो हालतमे तैयार नहि | एहि सभ गप्पक अनुभब प्रवल आ सुमनकेँ सेहो भेलैक मुदा ओहो दुनू अप्पन प्रेमसँ बन्हल वेबस | करए   तँ करए की ? समाजक व्यबस्थाक कारणे विवाहक कल्पने मात्रसँ देह सिहैर जाई | दुनूक प्रेम आब ओई   सिखर पर पहुँच गेलैक जतएसँ वापसीक कोनो गुंजाइस नहि | मए बाबू  सभटा जनितो समाजक डरे  गप्प मानैक तैयार नहि |
एक दिन दुनू गोटा एहि विषय पर गप्प करैत रहे, प्रवल बाजल -" चलू दुनू गोते दिल्ली,मुम्बई भागि ओहि ठाम विवाह कए लेब नहि कोनो समाज नहि गाम आ नहि मए बाबूक डर |"
सुमन - "से   तँ ठीक छैक मुदा हम अपन जीवन जीबैक लेल हुनक जीवनसँ कोना खेलव जीनक जीवैक आसा अपना दुनू गोते छी | सोचू हमरा भगला बाद हमर मए बाबूकेँ आ अहाँक भगला बाद अहाँक मए बाबूकेँ समाजमे की प्रतिस्ठा रहि जेतैंह आ ओकर बाद हुनक जीवन केहन हेतैंह आ एहेन कए कs की हम दुनू अपन जीवनकेँ खुश राखि पाएब | प्रेम  तँ तियागक नाम छैक | ऐना एकटा अनुचीत डेग उठा कए हम अपन प्रेम कए बदनाम कोना कए सकै छी | रहल मिलन आ वियोगक गप्प तँ  मिलनकेँ लेल एकैटा जन्म नहि छैक, एहि जन्ममे नहि अगिला जन्ममे अपन मिलन अबस्य होएत |"
सुमनकेँ ई गप्प सुनि प्रवल किछु नहि बाजि पएल ओकरा अपन करेजासँ सटा जेना सभ किछु बिसरि जएबाक प्रयास कए रहल अछि |
अगिला भोरे-भोरे गामक पोखरि मोहार पर पीपड़  गाछक निच्चा भिड़क करमान लागल | सामने पीपड़ गाछसँ प्रवल आ सुमनकेँ मुइल देह फसड़ी लागल लटकल | दुनूकेँ आँखि बाहर निकलल जेना  समाजसँ एखनो किछु प्रश्न कए रहल अछि - ऐना कहिया तक, प्रेमक बलि लेब ?
 
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३. पद्य








३.७.१.शिवनाथ  यादव अर्चना  कुमाी २.हेम नारायण साहु ३.शिव कुमार यादव

३.८.१.अनिल मल्लिक २.अंशु माला पाण्डेय ३.शान्तिलक्ष्मी चौधरी ४.आशुतोष मिश्र
  

जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल
की भेटल आ की हेरा गेल  (आत्म गीत)- (आगाँ)

 
हम गाम, शहर घुमइत रहलहुं
भारतक भूमि चुमइत रहलहुं
सभ जलकें गंगाजल समान
देखइत रहलहुं छुबइत रहलहुं

छत्तीसगढक ओइ धरती पर
मिथिलाकेर धूआ देखा गेल,
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ की हेरा गेल ।

बस नाव-नदी    संयोग कहू
पूर्वक किछु कर्मक भोग कहू
पाप-पुण्यकेर योग कहू
अथवा नुकाइले दोग कहू

सतपुराक ओ हरियर जंगल
हमरहु अदिष्टमे लिखा गेल,
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल  आ की हेरा गेल ।

रामक  वन-गमन जरूरी छल
राजाकेर ओ मजबूरी छल
सीताक हरणकेर पाछां  तं
रावणकेर दसटा मूड़ी छल

कैकेइक माथ पर ई कलंक
मन्थराक हाथें लिखा गेल,
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ की हेरा गेल ।

छल धोन्हि बहुत लागल ओत्तहु
छल लोक बहुत बांटल ओत्तहु
देखलहुं सभठां  जंगलमे
छल लोक बहुत जागल ओत्तहु

नवकलश बहुत देखलहुं लेकिन
छल  गाछ कतेको सुखा गेल,
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ की हेरा गेल ।

माएसं भेटल जे शीतलता
ओ निर्मलता आ भावुकता
पाथेय बनल से हमराले
ओ लोचकता आ व्यापकता

कएटा पिच्छड़ छल बाट जतय
खसबासं हमरा बचा गेल,
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ की हेरा गेल ।

संततिक बिछोहक दारूण दुख
भरिसक जननी नहि सहि सकली
चिंतासं जर्जर कायामे
नहि सालो भरि ओ रहि सकली

नहि जानि कोन नव दुनियामे
प्राणक पंछी उड़ि पड़ा गेल,
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ की हेरा गेल।    
(क्रमशः)


 
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जगदीश प्रसाद मण्‍डल
सातटा गीत

खेल-खेलाड़ी......

खेल खेलाड़ी खेल ठानि‍
कबडी दौड़ दौड़ैत एलैए।
सीमा बान्‍हि‍ भौक भौकि‍या
छुबि‍-छुबि‍ छुतबैत एलैए।
छुबि‍-छुबि‍ छुतबैत एलैए।
खेल-खेलाड़ी......।

नमगर-चौड़गर परती पराँत
नमहर डेग डेगैत एलैए।
आम छी, जाम छी, करि‍या लताम छी
साँस छोड़ि‍ रेड़ैत एलैए।
साँस छोड़ि‍ रेड़ैत एलैए।
खेल-खेलाड़ी......।

एक साँस चेत कबड्डी
चीका-दरबर करैत एलैए।
भौक बनि‍ भोकि‍या-भोकि‍या
छुबि‍-छुबि‍ छुतबैत एलैए।
छुबि‍-छुबि‍ छुतबैत एलैए।
खेल-खेलाड़ी......।

धरती खुनि‍-खुनि‍ मुदा एहनो
अखड़ाहा बनबैत एलैए।
माटि‍ संग हाथ मि‍ल-मि‍ला
वीर भूमि‍ सि‍रजैत एलैए।
वीर भूमि‍ सि‍रजैत एलैए।
खेल-खेलाड़ी......।




ककोड़बा......

ककोड़बा बि‍आन ककोड़बे खाइ छै।
मीत यौ, ककोड़बा बि‍आन ककोड़बे खाइ छै।

बि‍नु सि‍र-पएर सजि‍-सजि‍
चुट्टा-चांगुर चुहुटए लगै छै।
अपने सि‍रजल-जल्‍ला-झल्‍ला
खद-खुद डि‍रि‍आए लगै छै।
ककोड़बा......।

खखैर-खखोड़ि‍ खखरी बनि‍
दन-दनाइत कहैत रहै छै।
माटि‍-पानि‍ सभ हमरे-हमरे
कुम्‍हरा ढेर बनबैत रहै छै।
मीत यौ, कुम्‍हरा ढेर बनबैत रहै छै।
ककोड़बा.......।

जेर नि‍कलि‍ जड़ि‍या-जेड़ि‍या
पाछू पेट छि‍छि‍याए लगै छै।
कतए जाएब कतए जाइ छी
ठेकाने नै रहि‍ पबै छै।
मीत यौ, ठेकान नै रहि‍ पबै छै।
ककोड़बा......।




सोर बनि‍......

सोर बनि‍ सन्‍हि‍या सान्‍हि‍
सि‍र चालि‍ चलए लगै छै।
सि‍र-ि‍सरा सि‍रसि‍रा चुहटि‍
बत-बता बतबए लगै छै।
बत-बता बतबए लगै छै।
सोर बनि‍......।

फुलहरि‍ फूल फड़ फलहरि‍
बड़गद वि‍रीछ बनए लगै छै।
कट्ठा-कहि‍ नट्ठा बनि‍-बना
सघन-घन धड़ए लगै छै।
घन सघन धड़ए लगै छै।
सोर बनि‍......।

पकड़ि मूस मुँह मुसका
शील-सि‍नेह सि‍रजए लगै छै।
पकड़ि‍ पूछ पुछड़ी पकड़ि‍
घाट-घट घटबए लगै छै।
घाट-घट घटबए लगै छै।  
सोर बनि‍......।

कूट चि‍त्र घट-घट घटा
पौरुष-पुरुष गढ़ै लगै छै।
कूट कुटि‍ कूटि‍-पीस
सि‍‍रखणि‍ सि‍र गढ़ए लगै छै।
सि‍रखणि‍ सि‍र गढ़ए लगै छै।
सोर बनि‍......।




सेज-सिंगार......

सेज सिंगार सजि‍ साजि‍-साजि‍
साध सत् धड़ए लगै छै।
दूर-दूर दुरगम दृग दृश्‍य‍
सोरहा सोर करए लगै छै।
सेज-सिंगार......।

बनि‍ते दहाइ एकाइ बदलि‍
सि‍ज फूल सि‍ंगार धड़ै छै।
बाल-भाल लीख-लीख ललाट
धार जि‍नगी कुदए लगै छै।
जि‍नगी धार बहए लगै छै।
सेज-सिंगार......।

सोर पकड़ि‍ शोर सोर शोर
सोड़ह सोरहा करए लगै छै।
जि‍नगीक टपान टपि‍ते टपैत
दोहरी सेज सजए लगै छै।
दोहरी सेज सजए लगै छै।
सेज-सिंगार......।

बदला-बदली करए धन-धेनु
धाम-काम कहबए लगै छै।
मि‍थि‍ मालि‍न मन मलि‍‍-मलि
मि‍थि‍लांगना कहबए लगै छै।
‍मि‍थि‍लांगना कहबए लगै छै। 
सेज-सिंगार......।



जएह लूरि‍......

जएह लूरि‍-बुधि‍ मन पकड़ए
तेहने टा जि‍नगी भाय यौ।
नगर नजरि‍ नि‍हारि‍-नि‍हारि‍
अराधि‍ राखि‍ जि‍नगी ठनि‍यौ।
अराधि‍ राखि‍ जि‍नगी ठनि‍यौ।
जएह लूरि‍......।

लूरि‍-बुधि‍ गरजोड़ बनि‍-बनि‍
गरदनि‍-खूटा मि‍लैत रहै छै।
एक रक्षक एक भक्षक बनि‍
अमृत रस भरैत रहै छै।
अमृत रस भरैत रहै छै।

रंग-रंग फूल माला मालि‍न
मुसुकि‍ मुँह कली कलि‍आइ छै।
मालि‍न माला गढ़ि‍-मढ़ि‍
छत माली छति‍या सजै छै।
छत माली छति‍या सजै छै।
जएह लूरि‍......।




जोति‍ हर......

जोति‍ हर हरबाह कहै छै
मीत यौ, हर जोति‍ हरबाह कहै छै।

नीचा-ऊपर खेत बनि‍ वन
चोटी-ढाल बनल छै।
बून पपीह सु-आती पकड़ि‍
मृत-अमृत रसपान करै छै।
मृत-अमृत......।

कीर्त-वीर्त परकृत
तारा-ऊपरी सि‍र सजै छै।
पसरि‍ लतड़ि‍-लतड़ि‍ लत्ती
लत-मरदन करैत रहै छै।
मीत यौ, लत......।

चोटी पानि‍ टघड़ि‍-टघड़ि‍
झील-सरोवर सजैत रहै छै।
बाल-भल कुशक कलेप
स्‍थल-मरू बनबैत रहै छै।
मीत यौ, स्‍थल......।




हर हलक......

हर हलक हलन्‍तमे
मीर-दोल तेहल बनै छै।
पुर-पुष्‍कर पुरस्‍कर
घाट-बाट घटैत रहै छै।
हल-हलक......।

एक-दू तीन चारि‍ चालि‍
गति‍ इंजीन गाड़ी धड़ै छै।
अन्‍हा-गाहिंस छड़ छूटि
फरकेसँ फीफीआइत रहै छै।
फरकेसँ‍......।

लंक मारि‍ लपकि‍-लपकि‍
संगे-संग चलैत रहै छै।
करनी, मरनी भरनी बीच
धार अगम बहैत रहै छै।
धार अगम......।

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जगदानन्द झा मनु
१.गजल 
        
जकर मोनक रावण नै मरलै
राम आजुक कोना ओ बनलै

डशल साँपक पइनो मंगै छै
डशल मनुखक कनिको नै कनलै 

गेल आँगन घर सभ पलटै छै
मोन भेटत कोना जे जड़लै

हाथ रखने सभतरि भस्मासुर 
निकलितो साउध बाहर डड़लै

छोड़ि ढेपापर चुगला 'मनु'केँ
शहर दिस नेन्ना भुटका भगलै

(मात्राक्रम-२१२२-२२-२२२)

******************************

२.गजल  

सुरशाक मुँह बेएने महगाइ मारलक
बरख-बरख पर पाबि
 बधाइ मारलक

छलहुँ भने बड़ नीक
 बिन बन्हले कतेक
गोर-नार कनियाँ संगक सगाइ मारलक

झूठक रंगमे डूबि जीबितहुँ कतेक दिन
रंग ह्टैत देरी झूठक बड़ाइ मारलक

सुधि बिसरि कए सभटा निसामे बहेलहुँ
दिन राति पीया कए गाम गमाइ मारलक

भौतिक सुखमे डूबल 'मनु' सगरो दुनियाँ
जतए ततए फरजीकेँ उघाइ मारलक
   

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१७)

**************************************

३.गजल

जे हँसी हमर सुनलहुँ अहाँ
दर्दकेँ नै तँ बुझलहुँ अहाँ

दाँतकेँ बीचमे जीभ सन
मोनमे अपन मुनलहुँ अहाँ

प्रेमकेँ नै किए चिन्हलहुँ
देख मुह हमर घुमलहुँ अहाँ  

स्नेह आ प्रेम सभटा बिसरि
मोनकेँ तोरि झुमलहुँ अहाँ

हाथ संगे खुशीकेँ पकरि
हृदय मनुकेँ तँ खुनलहुँ अहाँ
 

(बहरे मुतदारिक, २१२-२१२-२१२)

**********************************
४.गजल 
अनकोसँ सम्बन्ध जोड़ाबै छै पाइ
छोटकाकेँ बड्डका बनाबै छै पाइ 

फूसियो बिकाइ छै मोलेमे आइ तँ  
सतकेँ सभतरि नुकाबै छै पाइ

ज्ञानक कनिको मोले नहि रहल  
प्रवचन सभटा सुनाबै छै पाइ 

नहि माए बाबू नहि भाइ बहिन
दुनियाँमे सभकेँ कनाबै छै पाइ 

चिन्हार नै अनचिन्हार एहिठाम 
'मनु' आइ सभकेँ हँसाबै छै पाइ 

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१३)    

***********************************

५.गजल 

सभकियो दुनियाँमे किएक आँखि चोराबै छैक  
माँगि नहि लिए कियो तेँ सभकिछु नुकाबै छैक  

गरीबी भेलैक बहुते केहन ई व्यबस्था छैक 
गरीबी नहि सरकार गरीबेकेँ मेटाबै छैक 

साउस भेली सरदार गलती नहि हुनकर 
जतए ततए किएक पुतोहुकेँ जड़ाबै छैक 

जतेक दर्द बेटामे  बेटीयोमे ओतबे सभकेँ 
बेटा बिकाइ किएक बेटीकेँ सभ हटाबै छैक 

दुनियाँक रीत  एहन 'मनु'केँ नै सोहाइ छैक 
रहए जे खोपड़ीमे सभक घर बनाबै  छैक  

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१८)  


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राजदेव मण्‍डल
दू गोट कवि‍ता-
राजदेव मण्‍डल जी
दूटा कवि‍ता-

उपयोग

हे यौ श्रीमान्, अहाँ छी अदभुत लोग
अहीं सँगे पौलौं हमहूँ सुख-भोग
भरल-पूरल रहल हमरो घोघ
भागल रहल दुखि‍या सोग
देखलौं एहेन-एहेन दोग
जे हमहूँ भऽ गेलौं बड़का लोग
जतए तक पहुँचलौं
ठीके नै छलौं ओइ जोग
कि‍न्तु आइयो हम वएह छी
कहाँ भेलौं नि‍रोग
जे छल अपन तेकरो लग
बनि‍ गेलौं आब कुलोग।
काज पड़ल तँ ला ताकि‍ कऽ
नुकाएल छौ कोन दोग
भऽ गेल काज तँ हटा तुरत
इहए छि‍औ संक्रामक रोग।
आइ जनलौं कारण
की छलै असली रोग
अहाँ करैत रहलौं
हरपल हमर उपयोग।

(ई कवि‍ता उपयाेग श्री गजेन्‍द्र ठाकुरकेँ समर्पित, राजदेव मण्‍डल...)




द्वन्‍द

अधरति‍या भऽ गेल छै साइत
अखने पहुँचलौं बौआइत
सुनहट बाड़ीमे कोयलीक तान
श्वेत शि‍लापर बैसल अछि‍ चान
आधा मुखपर केश-पाश
आधापर अछि‍ नोर, नि‍राश
तैयो आस-पास छि‍टकि‍ रहल प्रकाश
बि‍आहक बन्‍धन तोड़ि‍-ताड़ि‍
घर-पलि‍वारकेँ छोड़ि‍-छाड़ि‍
आएल अपने इच्‍छा
कऽ रहल हमर प्रतीक्षा
चि‍र प्रति‍क्षि‍त पि‍यासल मन
कछ-मछा रहल तन छन-छन
केना कऽ राखब मनकेँ सम्‍हारि‍
अन्‍तरमे उठल आन्‍ही-बि‍हाड़ि‍।
बढ़ाएब हाथ अहाँ दि‍स
लोककेँ उठतै रि‍श
खुशीसँ भरत हमर मन
दुसमन सभ करत सन-सन
आपस घींच लेब हाथ
तँ समाज रहत साथ
अपने मनसँ हएत लड़ाइ
लोक करैत रहत बड़ाइ।
बाँहि‍ पसारि‍ बढ़ेलौं हाथ
तरेतर घुमि‍ रहल अछि‍ माथ
वि‍मूढ भऽ अड़ल छी
द्वन्‍दमे पड़ल छी।

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 जवाहर लाल कश्यप 
ऑंखि सँ जे झहरल नोर तकरा सब देखलक,
आह मे जे जरि गेल तकरा के देखतै/

मन्जिल जे छुलक, वाह वाह सब केलक/
राह मे जे रहि गेल तकरा के देखतै/

पंख छल छोट मुदा, छुबय आकाश छल/
हिम्मत नहिं हारब, अतेक विश्वाश छल/

जे छुलक आकाश तखरा सब देखलख/
बिच मे जे रहि गेल तकरा के देखतै/

नाव छल छोट मुदा जायब सागर के पार छल
छोट पतवार मुदा, साहस अपार छल/

जे पार केलक तखरा सब देखलक/
बिच मे जे डुबि गेल तकरा के देखतै/
       

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१.कपि‍लेश्वर राउत२.ओम प्रकाश

कपि‍लेश्वर राउत

रौदी

रौदीक मारल सभ रि‍रि‍आइए
चि‍रै-चुनमुनी चुन-चुना
माल-जाल सेहो रि‍रि‍आइए
माथ पकड़ि‍ मनुषी चि‍चि‍आइए
रौदीक मारल सभ रि‍रि‍आइए।

नहरक बनाबटो अजीबे
नहरक पानि‍ अछैत बहैए
ऊपरका खेत पानि‍क बि‍ना
नि‍चला खेत दहा रहलए
रौदीक मारल सभ रि‍रि‍आइए।

कि‍सानक हालत कि‍यो ने पूछू
सभटा धन उपजामे दइए
कहि‍यो दाही कहि‍यो रौदी
मेहनती कि‍सान तैयो हँसैए
रौदीक मारल सभ रि‍रि‍आइए।

जेकरा हाथमे पानि‍ छै
ओकर खेत लह-लहा रहल-ए
दाही-रौदीमे जि‍नाइ जे जीलक
ओ हरदम चैनसँ जि‍बैए
रौदीक मारल सभ रि‍रि‍आइए।

कर्मयोगी जे बनल ि‍कसान
ओ कर्मेकेँ प्रधानता दइए
नसाखोरी आ गप-सपसँ रहबला
तकर दि‍न अदि‍न होइए
रौदीक मारल सभ रि‍रि‍आइए।

सांख्‍य योगी सुदामा बनली
दरि‍द्र जीवन जि‍बैए
कर्मयोगी कृष्‍ण बनि‍ कऽ
स्‍वाबलम्‍बीकेँ सभ पूजैए
रौदीक मारल सभ रि‍रि‍आइए।

पोथी-पतराक भवि‍ष्‍यवाणी
वैज्ञानि‍को तर्क हेरैले रहैए।
समए देखि‍ जे सुधरल
तकरे सभ गुणगाण गबैए
रौदी-दाहीमे वएह जि‍बैए
रौदीक मारल सभ रि‍रि‍आइए।
ओम प्रकाश
गजल

आँखिसँ नोर खसाबै छी किया एना
मोती अपन लुटाबै छी किया एना

खाली बातसँ भेंटत नै किछो एतय
तखनो बात बनाबै छी किया एना

सुनि बेथा तँ मजा लेबे करत दुनिया
बेथा अपन सुनाबै छी किया एना

अपने सीबऽ पडत फाटल करेजा ई
अनकर आस लगाबै छी किया एना

अमृतक घाट तकै छी बिखक पोखरिमे
अचरज "ओम" कराबै छी किया एना

(दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व) + (ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ) + (ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ)
(मफऊलातु-मफाईलुन-मफाईलुन)- १ बेर प्रत्येक पाँतिमे


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पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २२८ म अंक १५ जून २०१७ (वर्ष १० मास ११४ अंक २२८)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -  गौरी चोरनी ,  गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर ...