Thursday, November 01, 2012

'विदेह' ११६ म अंक १५ अक्टूबर २०१२ (वर्ष ५ मास ५८ अंक ११६) PART II


२. गद्य








१.डॉ अरूणा चौधरी- लघुकथा- छलना २.जगदीश प्रसाद मण्‍डलक आठ गोट वि‍हनि‍ कथा
डॉ अरूणा चौधरी, अध्यक्षा, मैथिली विभाग, मगध महिला कॉलेज, पटना विश्वविद्यालय, पटना
 लघुकथा

छलना
ओकर नाम छलैक
छलना। हम जखन-जखन ओकर नाम सुनैत छलियैक तँ आश्चर्य होइत छल जे एकर माय-बाप केँ आर कोनो दोसर नाम नहि फुरेलैक ? एक दिन संयोग सँ ओकर माय सँ भेंटि भेल। हमरा रहल नहि गेल। देखिते; पुछिये त लेलियैक- ऐँ यै अहाँकेँ आरो कोनो दोसर नाम बेटी लेल नहि फुराएल ?
ओ एकटा दीर्घ निःश्वास छोड़ि हमरा दिस निर्मिमेश दृष्टिएँ तकैत चुपचाप ओतए सँ ससरि गेल। ओकर ताकब हमरा नीक नहि लागल - हम कने अप्रतिभ भए उठलहुँ।
किछु दिनक बाद एक दिन छलना
, हमरा सँ भेँट करए आएल गोड़ लागि पैर लग बैसि गेल। हम कतबो कहलियैक - उपर सौफा पर बैसि, मुदा कथिलए, ओ ओतहि ओहिना बैसल रहल। बड़ी कालक बाद नहुँ-नहुँ बाजल-अपना ऑफिस मे हमरा नौकरी नहि रखा देब! बरू दाइएक काज करब, खुब मन लगाकए काज करबैक, ककरो शिकाए तक मौका नहि देबैक। हम अहाँ केँ अप्रतिष्ठा नहि होमए देब। एके साँसमे ओ समटा बाजि गेल स्वर कने मध्यम, मुदा उत्साह आ उमंग सँ भरल ओकर हृदयक भावना हमरा वंशी जकाँ खींच रहल छल। ओकर बाजब; ओकर शुद्ध-शुद्ध उच्चारण सुनि आश्चर्यचिकित भेलहुँ- पुछलियैक;
किछु
, पढ़लो-लिखल छैं ? ओ मुड़ी निहुरौने बाजल हँ, बी.. पास छी सुनि जेना हम आकाशसँ खसलहुँ। विश्वासे नहि भए रहल छल ओकर बातक। सोचय लगलहुँ-स्त्रीक घरसँ बहराएब, आजुक स्त्री शिक्षाक बात, सरकारक प्रयत्न, महिलाक उत्थानक प्रति लोकक मानसिकता, जागरूकता, वैश्वीकरणक पराकाष्ठा-भक टुटल-देखैत छी ओहिना पैर लग निहुरल बैसल अछि, छलना। हमरा अनुमान छल-कहुना ’ ‘ट केँ पढ़ि लैत होएत भरिसक। मुदा ई एहन साधारण कद-काठीक छौड़ी एतेक पढ़ल होएत से तसपनहुँ मे नहि सोचने छलहुँ। गाम मे पढ़ाई कएने छें ? बाजल-पूना मे बाबू छलथि, ओतहि उच्च विद्यालय सँ मैट्रिक पास कएलहुँ मुदा बाबू चलि बसलाह। बाबूक कमाईसँ कहुना घर चलैत छल। ताहि पर सँ हमर पढ़ाईक खर्च हुनका बड़ शौक छलनि जे बेटी पढ़ि-लिख बडका ऑफिसर बनए। हमहु मने-मन सपना देखैत छलहुँ। मन लगा पढैत छलहुँ जे बाबूक विश्वास नहि टुटैन्ह। मैट्रिक अब्वल नम्बर सँ पास कएलहँु। वजिफा भेटल तँ सपरिवार खूब प्रसन्न भेल। मन मे आन्तरिक सन्तोष भेल जे हमर पढ़ाईक चिन्ता सँ बाबू फारिग भए जएताह ओहिना हुनका पर अपन सात बहिनक दायित्व छलनि। बाबू भाई-बहिन मे सब सँ जेठ। जखन सब छोटे रहथि-हमर दादाक मृत्यु भए गेलनि। ता धरि दसमे मे पढ़ैत छलाह - धरक भार आ बहिन सभक बियाहक समस्या सँ विचलित छलाह। पढुआ कक्का पूनाक एक बैंक मे चपरासीक नौकरी लगवा देलखिन्ह। ताहि सँ सातो बहिन यथासाध्य वर-घर कए निश्चित भए गेलाह।
बाबू पारिवारिक दायित्व सँ चैन भए अपन व्यक्तिगत जीवन दिस अग्रसर होइत माय केँ गाम सँ पूना बजा लेलखिन। तीनू गोटा सुख-सुविधा सँ रहए लगलहँु-
माय घर सम्हारय
, बाबू बैंक आ हम निश्चित सँ कॉलेज......
एक दिन कॉलेज सँ आबि बैग-बस्ता रखिते छलहुँ कि मकान मालकिन स्वर सुनलहुँ - कतए छीयै बैंक सँ फोन आएल अछि- बैंक मे डकैती भए गेल छैक
, किछु गोटे घायल अछि, किछुक मृत्यु भए गेल छैक। करेज कांपए लागल मोन सशंकित भेल- की भेलैया ? दौड़लहुँ बैंक दिस। पता लागल बाबूकेँ गोली लागल छन्हि आ ओ अस्पताल मे छथि, खून बहुत बहि गेल छनि, हमर खून देल गेलनि मुदा हमर खून हुनका बचा नहि सकलनि। हमर सबहक दुनियाँ उजड़ि गेल। माए एहि दुःख सँ एखन धरि उबरि नहि सकल अछि। ओकर अन्तर्मन मे कतहुने कतहु बाबूक मृत्युक एकटा कारण हमहुँ छियैक। कारण लगैछ जेना माए सोचैत छल-आब तीन-गोटेक छोट-छीन परिवार, गाम मे रहब-थोड़-बहुत जमीनक उपजा-बाड़ी सँ गुजर-बसर करब। मुदा हमर पढाई आ बाबूक आस, ओकर मोनक बात पूरा नहि भए सकलैक। बाबूक लालसा छलनि, हमर खूब-पढब-लिखब आ खूब नीक वर-घर मे विवाह, करएबाक-लगैत अछि जेना अर्थाभाव मे बहिन सभक विवाहक कमीहमर विवाह धनी-गणमान्य परिवार मे कराए पूरा करए चाहैत छलाह। अपन हृदयक टीस केँ हमर उज्जवल भविष्यक निर्माण सँ दूर करए चाहैत छलाह। माएक गाम मे रहबाक इच्छा केँ हमर उज्वल भविष्यक निर्माण सँ दूर करए चाहैत छलाह। माएक गाम मे रहबाक इच्छा केँ मोनमे दाबि बैंक मे नौकरी करिते रहि गेलाह। के जनैत छल जे विधिक विधान एहन होएत ? एहि असामयिक घटना सँ माए जेना माटिक मूरत भए गेल। मृत्युक समाद सँ गम्मी लादि देलक कोनो प्रतिक्रिया नहि, निर्विकार भाव सँ लोकक मूँह तकैत रहैत छल। आस-पड़ोसक लोकक प्रयास सँ ओकरा येन-केन प्रकारेण सामान्य अवस्था मे आनल गेलैक तखन जे ओ क्रन्दन कएलक से कहि नहि, सभ लोक भाव-विहुल भए उठल। कनेक शान्त भेलाक बाद, ओ हमरा गारि-श्राप देमए लागल-ओकर मुँह सँ अन्तिम बहराएल शब्द छलैक-छलना। अपन एहि नवीन नामकरणसँ हमहुँ शत-प्रतिशत सहमत छी कारण नहि हमरा पढ़ैक उत्कंठा रहितए आ नहि बाबूक मोन मे हमर उज्जवल भविष्यक एतेक महत्वाकांक्षा त हम सभ माएक इच्छानुसार
गाम चलि गेल रहित हुँ आ हमरा माएक जीवनक संग एतेक टा छल नहि होएत
?

ओकर तँ जीवने उजड़ि गेलैक ! एहने आशा विहीन अन्धकारमय जीवनक कल्पनासँ ओ पुनः जेना बौक भए गेल। एखन ओ सामान्य लोक जकाँ क्रिया-कलाप करैछ किन्तु दिमाग ओकर सुन्न भए गेल छैक। संग रहैत अछि मुदा अनभुआर चलैत-फिरैत
, हिलैत-डोलैत कठपुतली सन। हम, अवाक भेल बडी काल धरि ओकर एकतरफा बार्तालाप आ घटना सुनैत रहलहुँ चुपचाप। मोन दुखी अशान्त अखिन्न भए गेल। तथापि एखनो मोन मे जिज्ञासा बनले रहल ओकर नाम की छियैक?
हम पुछिये बैसलियैक गे तोहर असली नाम की छौक
?
ओ मुड़ी निहुरौने उत्तर देलक
आशा

 
जगदीश प्रसाद मण्‍डलक आठ गोट वि‍हनि‍ कथा-

उड़हड़ि

एक तँ ओहि‍ना जूरशीतलक भोर, चारि‍ये बजेसँ चन्‍द्रकूप बनि‍ इनार अकास-पताल एक केने, सि‍रसि‍राइत वसन्‍त सि‍र सजबै पाछू बेहाल, जे जतए से ततैसँ पीह-पाह करैत। तइपर तीन दि‍नसँ एकटा नवका गप गाममे सेहो उपकि‍ गेल छै। ओ ई जे कपरचनमा उड़हड़ि‍ गेल। रंग-बि‍रंगक खेरहा-खेरही गाममे छि‍टाइत।
     ओना उपरका जहाज जकाँ स्‍त्रीगणक बीच गप हवाइ भेल मुदा पुरुखक बीच कोनो सुनि‍-गुनि‍ नै। तँए कपरचनमाक पि‍ता-रघुनाथक लेल धैन-सन। माए कुड़बुड़ाइत मुदा सासुक डरे मुँह नै खोलैत। ओना परगामी भेने माइयो आ पत्नि‍योक मन ओते घबाह नै होइत। होइत तँ ओतए जतए सीमानक आड़ि‍ धारक बाढ़ि‍मे भसि‍या जाइ छै। कुसमा दादीक माने कपरचनमाक दादीक मनमे मि‍सि‍यो भरि‍ हलचल नै। कोनो कि‍ बेटी जाति‍ छी जे अबलट लागत। बेटा धन छी जतए रहत ओतए खुट्टा गाड़ि‍ कऽ रहल। कि‍यो बजैए तँ अपन मँुह दुइर करैए।
     जूरशीतल पावनि‍, अपने हाथे कुसमा दादी इनारसँ पानि‍ भरि असीरवाद बॅटबे करतीह। तहूमे तेहेन गप परि‍वारक उड़ल छन्‍हि‍ जे बाँटबो‍ जरूरि‍ये छन्‍हि‍। ओना अन्‍हरगरे मनमे उठल रहनि‍ मुदा पहरक ठेकान नै रहलनि‍। जखन गाममे पीह-पाह शुरू भेल तखन फुड़फुड़ा कऽ उठि‍ लाेटा-डोल लेने इनार दि‍स बढ़ली। मनमे ईहो रहनि‍ जे इनार परक असीरवाद बेसी नीक अंगनाक अपेक्षा होइ छै। तँए सभसँ पहि‍ने इनारपर पहुँचब जरूरी बुझलनि‍। आब कि‍ कुशक जौर आ घट थोड़े रहल मुदा तैयो।
     इनारसँ डोल ऊपरो ने भेल छलनि‍ आकि‍ नवनगरवाली समजि‍या-पुतोहु अबि‍ते देखलनि‍ जे दादी असगरे छथि‍ तँए अवसरक लाभ उठा ली नै तँ पचताइये कऽ की हएत। उपरागी जकाँ बजली-
उढ़ड़ा एलनि‍ की नै?”
  नवनगरवालीक बोल कुसमा दादीकेँ मि‍सि‍यो भरि‍ नै कबकबौलकनि‍। मनमे नचैत रहनि‍ जे एके पीढ़ी ऊपरक लोकक ने संकोच करैए, हम तँ दू पीढ़ी छि‍ऐ। बाल-बोधक उकठपनो गपक जबाब उकठपने जकाँ ि‍दऐ से केहेन हएत। नवनगरवालीक आँखि‍मे आँखि‍ चढ़बैत बजलीह-
कनि‍याँ, अहाँ कहुना भेलौं तँ पोते-पोती भेलौं। कि‍छु छी कपरचना तँ बेटा धन छी। जँ ककरो लैयो कऽ चलि‍ गेल हेतै तँ सोचि‍ लेने हेतै जे ठाठसँ जि‍नगी केना बि‍ताएब। जतए रहत जगरनथि‍या खन्‍ती गाड़ि‍ देतै।
     भादवक बर्खा जकाँ कुसुमा दादीक मुँह बरैसते रहनि‍ कि‍‍ इनारक कि‍नछड़ि‍मे कनबाहि‍ भेल दुलारपुरवाली ठाढ़ छथि‍। मुदा ओ दादीक सभ बात सुनि‍ नेने रहथि‍। मन भि‍न-भि‍ना गेल रहनि‍‍। तइपर जूरशीतलक उखमज जे टटका-बसि‍याक भि‍रंत छि‍हे। टटका नीक आकि‍ बसि‍या। बसि‍या नीक आकि‍ तेबसि‍या। तेबसि‍या नीक आकि‍ अमवसि‍या। मुदा टटका? नवनगरवालीक पक्ष लैत बजली-
सभटा कएल हि‍नके छि‍यनि‍। दुनि‍याँमे नाओंक अकाल पड़ि‍ गेल छेलै जे कपरचनमा नाओं रखलखि‍न।
     सतैहि‍या बर्खाकेँ छुटैक आशामे थोड़े छोड़ल जा सकैए। बीचोमे जोगारक जरूरत अछि‍ये।  जँ से नै तँ बि‍ल-बाल होइत कि‍महर-कि‍महर बहि‍ जाएत से थोड़े बूझि‍ पेबै। कुसमा दादी दुलारपुरवालीकेँ कहए लगलखि‍न-
तों सभ फुलक नाओं के बेसी पसि‍न करै छहक, मुदा तोंही कहअ जे जते अपना गाममे फूल अछि‍ ओकर मूल्‍य कि‍ हेबाक चाही। मुदा देखै कि‍ छहक। पोताक नाओं कोनो अधला रखने छी जेहेन चालि‍-ढालि‍ देखलि‍ऐ तेहेन नाउओं रखि‍ देलि‍ऐ।
  दादीक उतारा सुनि‍ नवनगरवाली मुँह चमकबैत बाजलि‍‍-
दादी, अबेर भेल जाइ छै। एक चुरूक असीरवाद देती तँ दोथु नै तँ अपन राखथु।
     अगुआएल काजकेँ पछुआइत देखि‍ दादी डोल नेनहि‍ नवनगरवालीकेँ कहलखि‍न-
मन तँ होइए जे सौंसे डोल उझलि‍ दि‍अ मुदा अखैन काजक बेर अछि‍। जा तोहूँ घर-अंगना देखहक।

~



मत्हानि

भोटक तीन मास पछाति‍ श्‍याम आ कमलनाथकेँ भेँट भेल। ओना एक गामक रहि‍तो ऐनाहे-ओनाहे सम्‍बन्‍ध दुनूक बीच भोटसँ पहि‍ने छल, मुदा महि‍ना दि‍नक दौड़ एते लग आनि‍ देलक जे एक्के गाछक फल जकाँ बूझि‍ पड़ए लगलै।
     एक तँ तीन मासक बाकि‍औता गपो-सप आ अपन पार्टीक हारि‍ आ दोसराक सरकारोक हालि‍-चाि‍ल पार्टी लोकक मुँहे सुनब तँ जरूरि‍ये अछि‍। माटि‍क बान्‍हपर चैत-बैशाखमे धूरा-गर्दा उड़ि‍ते अछि‍, तहूमे तेहेन घोड़दौड़क समए अछि‍ जे आरो उड़ि‍ अकासकेँ अन्‍हरौने अछि‍।
  भोटक हाि‍रसँ कमलनाथक मन झुकल तइ संग परि‍वारक तीन पुस्‍तक सेवा सेहो हराइत-बि‍ड़हाति‍ देखि‍ आरो झूकि‍ गेल। खसल मन कमलनाथ बाजल-
भाय, की हाल-चाल अछि‍?”
  कमलनाथकेँ श्‍याम आंकि‍ लेलक। हारल लोकक बीच चढ़ा-उतड़ी होइते छै। खसैत कमलनाथकेँ देखि‍ चढ़ैत श्‍याम बाजल-
पूरबते।
     श्‍यामक उत्तर पाबि‍ कमलनाथ भक-चकमे पड़ि‍ गेल। पैछला बात बुझने बि‍ना आगू केना बढ़ल जाएत। मने-मन सोचए लगल जे पूर्वतक की अर्थ भेल। मुदा श्‍यामक पूर्वतक अर्थ रहए अपन राजनीति‍। देशक जे हेतइ से देशक लोक जनतै; तइसँ हमरा की। अपन ठीकेदारी, ऑफि‍समे हेरा-फेरीक संग समाजमे सराध-बि‍आह चलैत रहतै, सभ अबाद रहत। ई की सेवा नै भेल?
श्‍यामक उत्तर नै बूझि‍ कमलनाथ पुन: दोहरबैत बाजल-
भाय, नै बूझि‍ पेलौं?”
  अपन गोटी लाल होइत देखि‍ श्‍याम अगुआएल नेता जकाँ वि‍चारए लगल जे अगुआएब तँ ओहए न भेल जे अपन वि‍चारकेँ रूचि‍गर बना दोसरकेँ बुझाएब। मुदा लगले मन चकभौर लेलकै। मुँहा-मुँही बाजब आ मुँह घुमा कऽ बाजब एके भेल। ओहए ने कला छी। अनुकूल होइत श्‍याम बाजल-
भाय, भोटक पछाति‍ जना हमरो मन उड़ि‍या-बीड़ि‍या गेल। पहि‍ने जना करै छलों से आब कहाँ कएल होइए। तखन तँ ढीलो-उड़ीसक दवाइ खा-लेब, से केहेन हएत?”

~




मेकचो

पछुआ पकड़ैत ि‍मथि‍लांचलक कि‍सानकेँ अपनो दोख ओतबे छन्‍हि‍ जते सरकारक। कि‍एक तँ ओहो अपनाकेँ जनतंत्रक कि‍सान नहि‍ बूझि‍ पेलनि‍।
पाँच बीघा जोतक कि‍सान चुल्हाइ। अस्‍सीक दसकमे गहुमक खेतीक संग सरकारी खादक अनुदान आएल। बीघा भरि‍ गहुमक खेती चुल्हाइ करत। एक बोरा यूरि‍या आ एक बोरा ग्रोमर खादक पूँजी लगबैक वि‍चार केलक। ओना समुचि‍त खादो आ पौष्‍टि‍क तत्वो खेतमे देब जुड़ब-पड़ब परक फुड़ब भेल।
ब्‍लौकक माध्‍यमसँ खाद भेटै छै। पाँच दि‍न बरदा चुल्हाइ भी.एल.डब्‍ल्‍यूसँ फर्म भरौलक। तीन दि‍न पछाति‍ कर्मचारि‍यो लि‍खि‍ देलखि‍न। दू दि‍न पछाति‍ बी.ओ. सहाएब लि‍खला पछाति‍ फर्म ब्‍लौक ऑफि‍स पहुँचत जे आठम दि‍न भेटतै।
     फार्म जमा केला पछाति‍ घरपर आबि‍ चुल्हाइ चपचपाइत‍ पत्नी रूसनी लग बाजल-
ऐ बेर अपन गहुमक खेती नीक हएत!”
पति‍क चपचपीमे चपचपा रूसनी चपि‍-चपि‍, गौंचि‍आइत नजरि‍ दैत बाजलि‍-
फगुआमे नवके पुड़ी खाएत।
     तीस दि‍सम्‍बरकेँ चुल्हाइ गहुम बाउग केलक। पच्‍चीस कि‍लो कट्ठा उपज भेल।
     टुटैत उपजाक टुटैत चुल्हाइक मन पत्नीकेँ कहलक-
ऐ बेरसँ नीक पौरुके भेल। चालीस कि‍लो कट्ठा भेल रहए।
  रूसनी- एना कि‍अए भेल?”
  चुल्हाइ- तेहेन चमरछोंछमे पड़ि‍ गेलौं जे मेकचो-पर-मेकचो लगैत गेल। जइसँ बाउग करैमे डेढ़ मास पछुआ गेलौं। तँए उपजा टूटि गेल।‍
  पति‍क घाउपर मलहम लगबैत रूसनी बाजलि‍-
खेती जुआ छि‍ऐ। हारि‍-जीत चलि‍ते रहै छै। तइ ले कि‍ हाथ-पएर मारि‍ बैसि‍ जाएब।
बि‍सवास भरल पत्नीक बात सुनि‍ संकल्‍पि‍त होइत चुल्हाइ बाजल-
फेर एहेन फेरि‍मे नै पड़ब।

~




झुटका वि‍दाइ

जहि‍ना हारल नटुआकेँ झुटका वि‍दाइ होइ छै तहि‍ना ने हमरो सहए भेल; मनमे अबि‍ते प्रोफेसर रतनक चि‍न्‍तन धार ठमकि‍ गेलनि‍।
     पि‍ताक श्राद्ध-कर्म समपन भेलाक तेसरा दि‍न प्रो. रतन दरबज्‍जाक कुर्सीपर ओंगठि‍ कऽ बैस; बीतल काजक समीक्षा करैत छलाह। जहि‍ना नख-सि‍ख वर्णन होइत तहि‍ना ने सि‍ख-नखक सेहो होइए। मुदा काजक समीक्षा तँ मशीन सदृश होइत। जे पार्ट पाछू कऽ लगौल जाइत खोलबा काल पहि‍ने खुजैत अछि‍।
     प्रो. रतन छगुन्‍तामे पड़ल छथि‍ जे समए कतएसँ कतए ससरि‍ गेल आ....। आब‍ कि‍ थारी-लोटा आ कपड़ा-लत्ताक घटबी ओइ तरहेँ अछि‍ जना पहि‍ने छल। कहू जे ई केहेन भेल जे एते रूपैआ लोटा पाछू गमा देलौं। जँ समाजक बात नै मानि‍तौं दोखी होइतो, मानलौं तँ कि‍ मानलौं। लोटाक चर्च हुनका सभकेँ करक चाहि‍यनि‍। तहूमे तेना लाबा-फरही करए गललाह जे इस्‍टिलि‍या केना देबै, लोहा छी अशुद्ध होइए। नि‍अमत: फूल, पि‍तरि‍ वा ताम हेबाक चाही। चानी-सोना तँ राजा-रजबारक भेल। वि‍चार अनि‍वार्य भऽ गेल। फेर एहेन प्रश्न कि‍अए उठल जे घरही नै दऽ बच्‍चासँ बूढ़ धरि‍ जे पंच औताह सभकेँ होन्‍हि‍। सि‍यानोक पनि‍पीबा ओहए हएत जे धीया-पुताक?‍ तखन तँ लोटासँ लेाटकी धड़ि‍क ओरि‍यान करू। तहूमे तेहेन अनरनेवा गाछ जकाँ भरि‍गर गाछ ठाढ़ कऽ केलनि‍ जे हाइ स्‍कूलक शि‍क्षक गंगाधर लोटाक संग धोति‍यो बँटलनि‍। तइठाम एको अलंग नै करि‍तै; से केहेन होइत।
     बजारसँ घुमला पछाति जहि‍ना नीक वस्‍तु देखलापर‍ मनमे उमकी उठैत तँ अधला देखलापर डुबकी लि‍अए पड़ैत, सएह ने भेल। प्रो. रतनक मन कोसी-कमलाक एकबट्ट भेल पानि‍ जकाँ घोर-मट्ठा भऽ गेलनि‍। चि‍लहोरि‍ जकाँ झपटैत पत्नीकेँ कहलखि‍न-
मन बि‍साइन-बि‍साइन भेल जाइए आ अहाँकेँ एक कप चाहो ने जुरैए?”
पति‍क आदेश सुनि‍ सुजीता चाहक ओरि‍यान केलनि‍।
     चाह दैत सुजीता, पॅजरामे बैसि‍ जट-जटीन जकाँ पुछलखि‍न-
की भेल जे एना मन वि‍धुआएल अछि‍?”
  ओना चाहक चुस्‍कीसँ रतनक बि‍सबि‍सी कनी कमलनि‍ मुदा नि‍ड़कटोबलि‍ भऽ कऽ छूटल नै छलनि‍। ओही झोंकमे झोंकि‍ देलखि‍न-
हएत कि‍ झुटका वि‍दाइ भेल।
     पति‍क बात सुजीता नै बूझि‍ सकलीह। बुझि‍यो केना सकि‍तथि‍? मुदा रोड़ाएल दालि‍क सुगंध जकाँ अनुमानए लगली। मनमे जे कुवाथ भेल छन्‍हि‍‍ से जाबे खोलता नै ताबे केना बूझब। जँ कोनो तेहेन बात रहि‍तनि‍ तँ एना साँप जकाँ गैंचि‍या-गैंचि‍या कि‍अए चलि‍तथि‍। बजलीह-
कनी काल अराम करू, हमरो हाथ काजेमे बाझल छलए, ओकरा सम्‍हारि‍ लइ छी।

~
  



मुँहक खति‍यान

ऐ बेर दुर्गापूजाक नव उत्‍साह अछि‍। उत्‍साहो उचि‍ते, हाले-सालमे मलेमासक वि‍दागि‍री भेल अछि‍‍। एक दि‍न माघ बीतने तँ आशा फुड़फुड़ाइत पाँखि‍ झाड़ए लगैत अछि‍, भलहिं पच्‍चीस दि‍नक टप-टप पाला खसैत शीत-लहरी आगू कि‍अए ने हुअए। मुदा से नै, कहि‍यो नावपर गाड़ी चढ़ैए तँ कहि‍यो गाड़ीपर नाव। तहूमे दुनूक बीच, गाड़ी-नावक बीच एहेन रंग-रूपक मि‍लानी रहै छै जे दुनू-दुनूकेँ पीठेपर उठबैए आ पेटोमे रखैए। से ऐ बेर थोड़े हएत, तते ने लोक रौदिआएल अछि‍ जे महारेपरसँ कूदि‍-कूदि‍ उमकत।
     औझुका दि‍न भगवतीक माटि‍ लेल जाएत। भोजक पाते देखि‍ धीया-पुता चपचपाए लगैत जे खूब खेबनि‍। आखि‍र भोज होइते कि‍अए छै। चारि‍ बजे भोरेसँ पीह-पाह शुरू भऽ गेल। ओना रघुनी भायकेँ बूझल रहनि‍ मुदा तैयो पीह-पाह नीक नै लगैत रहनि‍। कारण रहए जे दि‍नक फल भोजन बूझि‍ क्रमि‍क-काजक क्रि‍या बुझैत। जाबे चौकक हवा पानि‍ पीबए पहुँचैत कि‍ तइसँ पहि‍ने चाहक चुल्हि‍ पजरल देखलनि‍।
     अपन मनकामना पुरबैत तेतरा दस कप चाहक भोज केलक। भोजन सत्तरि‍मे भोजैत अपन बात बजि‍ते अछि‍ तहि‍ना तेतरा बाजल-
भाय, ट्रेण्‍ड डरेबर भऽ गेलि‍यौ, भगवती दयासँ आब कोनो दुख-तकलीफ परि‍वारकेँ नै हेतै।
     दोकानक दोसर बेंचपर बैसल पोखरि‍या असामी रामेश्वर सेहो बैसल। तेतराक बात जना रामेश्वरक छातीमे छेदि‍ केलक तहि‍ना रामेश्वरकेँ भेल। झोंक चढ़ि‍ते बाजल-
बाप जे मड़ूआ लेलकै, से तँ अखैन तक सठाएले ने भेलै हेन...?”
     रामेश्वरक बात सुनि‍ते तेतरा लोढ़ि‍औलक। मुदा कएल कि‍ जाए? दुनूकेँ थोम-थाम लगबैत कहलखि‍न-
दू घंटा लोककेँ बातो बुझैमे लगतनि‍ तँए दू घंटा दुनू गोरे घरपर जाउ।
घर ि‍दस रामेश्वर बढ़ैत बाजल-
बाढ़ि‍मे घर खसि‍ पड़ल, नै तँ अखने बही आनि‍ कऽ पंचक बीचमे फेकि‍ दैति‍ऐ।
     घरमुँहा होइत तेतरा बाजल-
कि‍ बूझि‍ पड़ै छै जे बाबेबला सनकी अछि‍, झाड़ि‍ देबइ। जँ ओकर बाकि‍ये छै तँ मनुख जकाँ फुटमे कहैत।



कोसलि‍या

सीकसँ खसल मटकूड़ जकाँ सोमन काकाक मन छहोंछि‍त भऽ फुटए लगलनि‍। बि‍नु भाँग पीनौं अफीमक नशा चढ़ि‍ गेलनि‍। नि‍ताकैत भेल देहकेँ खरौआ जौड़ीसँ घोरल खाटपर चि‍तंग पटकलनि‍। दंगल जकाँ नै जे कि‍छु हारबो करैए, कि‍छु जीतबो करैए आ कि‍छु खि‍चड़ि‍यो बनैए। दोसर कारण छलनि‍। ऊनाइत मन उधि‍या-उधि‍या बजैत जे चारू बेटाक पि‍ता छी, पालन-पोशन करै छी तखन कि‍अए ने बूझि‍ पेलौं जे घरमे कोसलि‍या सेहो बसि‍ रहल अछि‍। मनक सीमा टपि‍ बोल नि‍कललनि‍-
अनेरे परि‍वार-परि‍वार करै छी, सत्तरि‍ बर्खक पसीनाक की मोल रहल। यएह ने जे घरे-परि‍वारेमे एहेन मोइन फोड़ि‍ दुदि‍शि‍या धार बहए लगल। कुट्टी-कट्टा जकाँ जँ दुनू दि‍स धार बनाएब तँ नारक मुट्ठी घुसकबै काल हाथ खड़रेबाक डर रहबे करत।
     सोमन काकाकेँ देख घुरनी काकीक मन मि‍सि‍यो भरि‍ नै हलचलेलनि‍। जि‍नगीक अनेको क्रोध देखने छथि‍। अनुभवी छथि‍। कनी फड़ि‍क्केसँ थर्मामीटर लगा काकी काकाक रोग नपए लगलीह। मुदा पुरना थर्मामीटरसँ तँ पुरना रोग परेखमे अबैत नवका केना आऔत। सहए भेलनि‍। ओना सोमन काकाक अपने ठकमुड़ाए गेल रहथि‍ जे एना कि‍अए भेल? मुदा तैयो घुरनी काकी बीख उतारैतक मंत्र चलौलनि‍-
बेसी भीड़ भऽ गेल। मन थीर कऽ कऽ नहा-खा लि‍अ। खा कऽ जखन अराम करब तखन अपने मन चेन भऽ जाएत।
काकीक खट-मधुर गप सोमन काकाकेँ आरो अमता देलकनि‍। झटकीक झटका जकाँ झटहा झटकि‍ देलखि‍न-
जअ-ति‍ल आनि‍ उसरैग दि‍अ। हमहूँ अहाँकेँ उसरैग दइ छी। कोन भाँजमे अनेरे पड़ल छी। जइठाम द्रौपदीसँ लऽ कऽ रघू बाबू धरि‍ कुरसी जमौने छथि‍। तइठाम पार पाएब असान छै।




हूसि‍ गेल

भोज खा बाबा अबि‍ते रहथि‍ कि‍ पोता-रमचेलबा मन पड़लनि‍। तखने देखलनि‍ जे तीमन-तरकारीक मोटरी माथपर नेने दछि‍नसँ अबैत अछि‍। मन सहमि‍ गेलनि‍ जे सभ दि‍न पोताकेँ संग नेने जाइ छलौं, आ.....। लगले मनमे एलनि‍ जे जे पूत हरि बाहि‍ करए गेल, देव-पि‍तर सभसँ गेल। तइ बीच हाथमे लोटा देखि‍ रमचेलबा पूछि‍ देलकनि‍-
कतए गेल छेलह बाबा हौ?”
  बाबा अवाक भऽ गेला। मुदा, आब तँ ओहए सभ ने करत तँए अनुकूल बना राखब जरूरी अछि‍। नि‍धोख कहलखि‍न-
बौआ, तूँ हाटपर गेलह, इमहर वि‍जो भऽ गेलै, तँए कि‍ करि‍तौं?”
     जहि‍ना नि‍धोख बाबा बजलाह तहि‍ना रमचेलबा बाजल-
बनलह कि‍ने?”
  बाबाकेँ मन पड़ि‍ गेलनि‍। पूर्वांचलक मणीपुरी भोज भोज, जइमे जे वस्‍तु जते नीक रहै छै ओ ओते पहि‍ने परोसि‍ खुआ दइ छथि‍। मुदा अपना ऐठाम तँ अन्नकेँ अन्न बुझनि‍हार आगूमे आएल पहि‍ल अन्नक पूजा करत। बाबा बजलाह-
बौआ, नीक भेलौ जे तों नै गेलेँ।
  अपन बात सुनि‍ रमचेलबा बाजल-
से कि‍ हौ?”
  अनुकूल होइत रमचेलबाकेँ देखि‍ बाबा कहलखि‍न-
धुर हूसा गेल।
  अकचकाइत रमचेलबा बाजल-
से कि‍ हौ?”
  कि‍ कहबौ, भात-दालि‍ बड़ पवि‍त्र बनल छलै, तइपर अल्‍लू-परोड़क तरकारी तेहेन बनल छलै जे देखि‍ये कऽ मन हि‍लसि‍ गेल। खूब खेलौं। तेकर बाद जे नीक-नीक वि‍न्‍यास सभ अबै लगल, ओकरा दि‍स के ताकैत।
  तब तँ खूब बनलह?”
  अपूछ भऽ गेल।




गति‍-गुद्दा

सोलह बर्खक पछाति‍ सुखदेव बम्‍बइसँ गाम आएल। पहि‍लुका सुखदेवा नै जे ठोरनमड़ासँ जानल जाइत छल। ओ सुखदेव जे बम्‍बईक गली-कुचीसँ नोकरी करैत सोलहम जि‍नगी एयर पोर्ट (शि‍वाजी टर्मिनल) पहुँच गेल अछि‍। खाली नोकरि‍ये नै नोकरी तँ ओहनो होइत अछि‍ जे पानि‍ पीऔनि‍हार गलि‍यो-कुचीमे रहैत अछि‍ आ एयरो पाेर्टमे। ओ सुखदेब जे होटलक मसल्‍ला पीसब, टा नै, काजक गति‍ सेहो आ मानसि‍क गति‍ सेहो तेज केलक। ग्रेजुएत सुखदेव, आँफि‍सर सुखदेव, जीप-कार-ट्रकक ड्राइवर सुखदेव।
     गाम अबि‍ते सुखदेव भजि‍औलक तँ भाँजपर चढ़ल जे खुशीलाले बाबा टा एहेन रहला अछि‍ जि‍नकर समांग नै बहड़ेलखि‍न। पुरना ढर्ड़ाक लोक खुशीलाल बाबा। जि‍नगी ओइठामसँ देखने जइठाम पालकी, महफा, ओसारक ओहार, घरक ओहार चलैत छल। आइ कि‍ देखै छी। मन-चि‍त मारि‍ अपन कुल-खनदानक जड़ि‍मे पानि‍ ढारैत जीव रहला अछि‍। जइठाम गाम हमरा छोड़ि‍ देलक, आ हम गामकेँ छोड़ि‍ देलि‍ऐ, एहेन बहैत धारक त्रि‍वेणी मोरपर खुशीलाले बाबा टा छथि‍। कने जि‍रेलाक पछाति‍ भेँट करबनि‍।
     तीन बजेक समय। सुखदेव खुशीलाल बाबा ऐठाम पहुँच गोर लागि‍ अपन परि‍चए देलकनि‍। बैसैक इशारो करथि‍ आ सुखदेवक समाचारो सुनथि‍। मने-मन खुशि‍यो होन्‍हि‍ जे अही माटि‍-पानि‍क बम्‍बईक शि‍वाजी टर्मिनलमे ऑफीसर बनल अछि‍। जहि‍ना साँप अपन छन्‍द सुनबैत-सुनबैत पड़ा गेल मुदा गड़ूल देखबे ने केलनि‍। तहि‍ना खुशीलाल बाबा सुखदेवक समाचारमे हरा गेलाह।
     बजैत-बजैत सुखदेवकेँ बूझि‍ पड़ल जे भरि‍सक हम अपने खि‍स्‍सा सुनबए एलि‍यनि‍। वि‍चार रोकि‍ पुछलखि‍न-
बाबा, अपना दि‍सक कि‍ हाल-चाल अछि‍?”
  जहि‍ना पुरना संगी पाबि‍ हृदय खोलि‍ सभ गप करैत तहि‍ना खुशीलाल बाबा बजलाह-
बौआ, ऐठामक गि‍रहस्‍तकेँ कोनो गति‍-गुद्दा अछि‍। धार माटि‍ दुइर कऽ देलक। कोसी-नहर ठीकेदार खा गेल। मौनसूनी बर्खाकेँ रौदी खा गेल। की कहबह।


 
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
   
डॉ. अजीत मिश्र, मैसूर।
 लघुकथा
व्यथा
भाग, भाग एहि ठामसँ, नहि तँ कोनो दशा बाँकी नहि रखबौक, इह मुँह जे लगैत छनि, भागि जो, नहि तँ कान-कपाड़ फोड़ि देबौक-
बंगला भाषामे किछु एहने-एहने वाक्य सुनितो हम अत्यन्त स्थिर भए ओहि रोगीकेँ सान्त्वना दैत कहए लगलहुँ- हे अहाँ घबराउ जुनि, सभ किछु ठीक भए जाएत। मात्र किछु काल स्थिर भए रहू।
हमर एहन कहला पर ओ आर जोर सँ बपहारि काटए लगलीह, किछु काल लेल तँ हमरो लागल जे कोन कार्यमे फँसि गेलहुँ, मुदा फेर अपनाकेँ मनबैत हुनका शान्त करबाक प्रयास करैत रहलहुँ। मुदा ओहो कोनो एम्हर-ओम्हरकेर माटिसँ नहि बनलि छलीह, लागल जेना भगवान हुनका बनएबामे अपन सभ कलाक प्रयोग कएने छलाह। हमसभ एक दिस आ ओ रोगी दोसर दिस, जे करीब पच्चीससँ तीस वर्षक सुन्दर कायाक एकगोट महिला छलीह, जनिक व्यथा देखि सम्पूर्ण कम्पार्टमेन्टक लोक व्यथित छल, सभ केओ राम-राम, शिव-शिव कए रहल छलाह जे कहुना नीक नहाँति ओ रोगी खड़गपुरधरि पहुँचि जाथि। आइ लागि रहल छलैक जे खड़गपुर हावड़ासँ सए नहि, हजार कीलोमीटर दूर हो। हम एक बेर फेर अपन ज्ञान झाक प्रयोग करबाक निर्णय कए रोगी लग जाए अत्यन्त शान्त स्वरेँ हुनका कहलिएनि
देखू, हमसभ आब मात्र किछुए कालमे खड़गपुर पहुँचि जाएब आ अहाँक उचित प्रतिकार प्रारम्भ होएत। ओतए नामी डॉक्टरसभ आबि अहाँक चिकित्सा करताह, जँ यात्रामे जएबाक योग्य होएब तँ आगाँ चलब, नहि तँ ओतहि उतरि आपस अपन घर चलि जाएब। मुदा एहि एक घंटाक लेल हम किछु दवाइ दैत छी, तकरा मुँहमे राखि जँ अहाँ बीस मिनट धरि किछु नहि बाजब तँ तत्काल अहाँक कष्ट दूर भए जाएत आ हमसभ सेहो गन्तव्य धरि पहुँचि जाएब।
हमर ई कथन कार्य कएलक, ओ हमर आदेशक पालन प्रारम्भ कए देलनि। हम कहलिएनि-
कनी मुँह खोलू तँ, जीहकेँ उपर करु, हँ, हँ, चित्त भए केँ पड़ि रहू।
हमर सभ आदेशक ओ शतश: पालन कए रहल छलीह। ठीक एहने समयमे मन पड़ि आएल मैथिली साहित्यक प्रसिद्ध एकांकी छींक’, जाहिमे एकटा बंगाली डॉक्टर मैथिलक चिकित्सा कएल करैत छथि, एतए हमरा उनटा अवसर भेटि रहल छल। बंगालीक चिकित्सा एक मैथिलक हाथेँ। हम ओहि एकांकीक किछु डॉयलागकेँ स्मरण कए ओतए प्रयोगमे आनब प्रारम्भ कएल, जुआन कहने यौवनक सन्देहक कोनो डर नहि छल, तेँ निश्चिन्त भावेँ हुनक जाँच प्रारम्भ कएल। हुनक जाँच कएलाक बाद हम एकटा दवाइ हुनकर मुँहमे दए एकबेर फेर बीस मिनट धरि नहि बजबाक आग्रह कएल। किछु काल धरि तँ ओ स्थिर रहलीह, मुदा बीच-बीचमे हुनक आह हमरासभकेँ आहत कए रहल छल। भगवानक रक्ष जे हमसभ खड़गपुर एही स्थितिमे पहुँचि गेलहुँ, ओतए पूर्व सूचना रहबाक कारणेँ रेल विभागक किछु प्रसिद्ध चिकित्सक अपन दल-बलकेर सङ उपस्थित रहथि। गाड़ी रुकतहि ओ सभ ओहि रोगीक लग पहुँचि अपन औजार-पाती सरिआबए लगलाह। ओ सभ अपन कार्यमे लगबे करितथि कि रोगी बहुत जोरसँ चिचिआइत गाड़ीसँ नीचाँ उतरबाक लेल गेट दिस दौड़लीह। सभ हाँ-हाँ करैत हुनका पाछाँ लागल, मुदा ओ तँ एकहि छरपानमे प्लेटफॉर्म पर उतरि चिचिआइत रहलीह। हुनक एहन स्थिति देखि चिकित्सक दलक सङ-सङ परिजन दौड़लाह। मुदा ओ रोगी ककरो अपना लग आबए देबाक हेतु तैआर नहि, ओ जोर-जोरसँ बंगला भाषामे किछु चिचिआ रहल छलीह। एक तँ अस्वस्थता आ दोसर स्टेशनक चहल-पहल, हुनक कोनो वाक्य ककरो बुझबामे नहि आबि रहल छल। एहि उहा-पोहमे विचित्र स्थिति भए गेल, एक दिस गाड़ीकेँ खोलबाक व्यग्रता तँ दोसर दिस रोगीक असहजता, ककरो किछु फुरिए नहि रहल छलैक। रोगीक पति द्वारा बीच-बीचमे सहटबाक प्रयासो कएला पर ओ आरो जोरसँ चीत्कार मारि उठथि। आब हमरहु रहल नहि गेल, नीचाँ उतरि ओहि रोगीक दिस ताकल। हमरा तकला पर लागल जेना ओ रोगी अपन व्यथा हमरासँ बाँटि रहल होथि। किछु आशान्वित भए हुनका दिस बढ़लहुँ, ओ निरपेक्ष रहि हमरा दिस तकैत रहलीह। एतबा कालमे हम हुनका लग पहुँचि गेल छलहुँ, आग्रह-अनुरोध करैत ओहि डॉक्टरक दलकेँ चलि जएबाक हेतु कहि रहलि छलीह। हुनक कहब छलनि जे हम एहि डॉक्टरसभसँ नहि देखाएब, ई सभ हमरा मारि देत। हमर सभक एहि वार्तालापक क्रममे हुनक पति सेहो लगमे आबि गेल छलाह। रोगी एक झटकामे बढ़ि हुनका चेतौनी देब प्रारम्भ कएलनि-
जतबा काल ई डॉक्टरसभ नहि चलि जाएत, हम गाड़ीमे चढ़बे नहि करब, हमरा एहि डॉक्टरसभसँ नहि देखएबाक अछि। हमरा सङ तँ एहेन सुन्दर डॉक्टर छथि, तनिका छोड़ि आब हम ककरोसँ नहि देखाएब।
हुनक एहन कहबाक सङ हमर रोइयाँ ठाढ़ भए गेल, हुनक पति सेहो हमरा दिस किंकर्त्तव्यविमुढ़ भेल देखए लगलाह। हमरा दुहूक स्थिति विचित्र भए गेल छल। हम हुनका बुझबैत कहलिएनि-
देखू, सभ विभागक अलग-अलग डॉक्टर होइत छथि, अहाँ केँ जे बीमारी अछि, तकर हम डॉक्टर नहि। ओकर डॉक्टर तँ ओएह सभ थिकाह, तेँ नीक होएत जे अहाँ हुनकासँ देखबा लिअए।
नहि, नहि, एहन नहि भए सकैछ। अहाँ डॉक्टर छी ने ? बस हम देखाएब तँ अहीँसँ, नहि तँ ककरोसँ नहि। एहि बीच गाड़ीक एटेन्डर सेहो आबि हुनका बुझएबाक प्रयास कएलक-
एहि डॉक्टरसभसँ देखा लिअए, ई तँ सङमे चलिए रहल छथि, जँ आवश्यकता पड़त तँ ई फेर देखबे करताह। मुदा एहि सभक हुनका पर कोनो प्रभावे नहि पड़ि रहल छलनि। ओ अपन जिद्द पर अड़ल रहलीह। अन्तत: रेलवे विभागक ओहि डॉक्टर दलमे सँ एकगोटए हमरा सभक सङ भुवनेश्वर धरि लेल सङ कए देल गेलाह, जाहिसँ बाटमे विषम स्थिति अएला पर उचित प्रतिकार कएल जाए सकए।  
   गप्प एहन छलैक जे हम हावड़ा-मैसूर स्पेशल रेलगाड़ीसँ मैसूर जाए रहल छलहुँ। गाड़ी खुजतहिँ हमर अगिला कम्पार्टमेण्टमे हल्ला-गुल्ला मचि गेल। पछाति पता चलल जे एकटा रोगी ओही गाड़ीसँ भेल्लोर जाए रहल छथि, जनिक स्थिति बड़ गड़बड़ा गेल छनि। हुनका संग चलनिहार व्यक्तिक संग-संग देखनिहार-सुननिहार सभ केओ चिन्तित छलहुँ। ओ विचित्र प्रकारक रोगी छलीह, कष्ट तँ ठीके छलनि, मुदा ओ भगल सेहो खूब कए रहल छलीह, जकर अनुमान प्राय: सभ यात्रीकेँ भए रहल छलनि। सभकेँ आश्चर्य लागि रहल छलनि जे हुनक परिवार एहन रोगीकेँ लए एतबा दूर किएक जाए रहल छथि। ओहि रोगीकेँ एकदम ठीक-ठाक रहैत एकाएक एहन दौड़ा अबैत छलनि, जाहिमे ओ अपन सभ किछु बिसरि घोर कष्टमे पहुँचि जाइत छलीह। हुनक परिवारक कहब छलनि जे करीब तीन महीनासँ हुनक इएह स्थिति छनि, गामसँ शहर धरिक प्राय: सभ नामी-गरामी डॉक्टरसँ जाँच भेल, मुदा बीमारीक पता नहि चलि सकल। अन्तत: हारि-थाकि भेल्लोर जाए जाँच करएबाक योजना बनाओल गेल। एही क्रममे हावड़ासँ गाड़ी खुजलाक दसो मिनट नहि बीतल छलैक कि हुनका ओएह दौरा आबि गेलनि। सभ केओ चिन्तित भए उठलाह, तखने अपन आगाँ राखल यात्रीगणक लिस्टमे हमर नामक आगाँ डॉक्टर लागल देखि ओहि बॉगीक एटेन्डर हमरा समक्ष आबि कहि उठल- सर एक मिनट प्लीज
एकाएक एटेन्डरक मुँहसँ बंगलामे एहन वाक्य सुनि पहिने तँ चौकलहुँ, मुदा फेर ओकरा अनुसारेँ अपन सीटसँ उठि ओकर लगीच गेलहुँ।
की यौ की गप्प छैक- हमहूँ मैथिलीमे पूछि देलियैक। ओ कनी आर लगीच आबि कमे जोरसँ फेर बंगलामे पूछलक- की अपने डॉक्टर छिऐक?
हम किछु उत्तर दितियैक ताहिसँ पूर्व एकगोट युवक सेहो हमरा सभक बीच आबि अत्यन्त जिज्ञासु भए हमर उत्तर सुनए लगलाह। हम फेर मैथिलीमे कहलिऐक-
औजी हम डॉक्टर तँ छी, मुदा दवाइ-बारीक नहि, हम तँ पोथी-पतराबला डॉक्टर छी।
हमर एहन कहला पर ओहि दुहूक सपना टूटबाक प्रत्यक्ष दर्शन हमरो भेल। दुहू गोटए माथ पकड़ि लगक सीट पर बैसि गेल, आ हम किंकर्त्तव्यविमुढ़ भेल हुनका सभकेँ देखैत रहलहुँ। किछुऐ क्षणक बाद जेना ओहि एटेन्डरकेँ कोनो उपाय सुझलैक, ओ अत्यन्त तीव्रताक संग उठि फेर हमर लगीच आएल आ फुसफुसाइत कहि उठल-
सर, अपने तँ पोथी-पतराक डॉक्टर छिऐक, पोथी-पतरातँ सभकेँ मार्ग देखबैत छैक, की अपनहुँ हमरा सभकेँ उचित बाट देखा सकैत छी?
ओ निरपेक्ष भावेँ सभ किछु बाजि गेल आ एम्हर हम भँवर जालमे फँसैत गेलहुँ। हमरा तँ किछु बुझबामे आबिए नहि रहल छल, हम कोन आ कोना बाट देखेबैक, से फुरिए नहि रहल छल। एहि बीच तेसर व्यक्ति सेहो उठि ठाढ़ भए हमर लगीच आबि एकटक हमरा देखि रहल छलाह। हम तीनूगोटए तीनूक प्रतीक्षामे रही जे आब ओ बजताह तँ ओ। मुदा सभकेओकेँ ठक्कमुड़ी लागि गेल छल। अन्तत: हमहिं चुप्पी तोड़ैत ओहि एटेन्डरसँ पूछि बैसलिऐक-
औ की गप्प छैक, कनी फरिछाकेँ तँ कहू, जाहिसँ ओहि समस्याक समाधान ताकल जाए, जाहि हेतु अहाँ सभ अत्यन्त व्यग्र छी।
हमर एहि वाक्यक ओहि दुहू व्यक्ति पर अत्यन्त प्रभाव पड़ल। फेर हमरा जे कहलनि से सुनि हमरा तँ बुझू साँप सुँघि लेलक, डेग ने आगू बढ़ि रहल छल आ ने पाछू, ने हँ कहैत बनैत छल आ ने नहि कहैत। एही उहापोहमे फँसल हम किछु मिनटक हेतु आँखि मुनि बैसि रहलहुँ। एक दिस छल परहितक मामिला तँ दोसर दिस छल छद्मक आसरा। एकक रक्षा कएने दोसरक अहित भए रहल छलैक, किछु फुरिऐ नहि रहल छल। एकाएक जेना हृदयक कोनो कोनसँ एकटा उहि आएल आ तनि ठाढ़ भए ओहि दुहू व्यक्तिक अनुसारेँ ढोग करबाक निश्चय कए लेल। हुनका सभक कहब छल जे हम तत्काल पोथी-पतड़ा छोड़ि दवाइ-बीरोक डॉक्टर बनि हुनक रोगीक परीक्षण करी आ तत्काल किछु उपाय ताकी। एतबा सूचना तक तँ हम निरपेक्ष बनल रहलहुँ, मुदा हुनका सभसँ अग्रिम जे सूचना भेटल ताहिसँ एहि छद्म रुप धरबाक योजना बना लेल। ओ सभ कहलनि जे एहि रोगीकेँ कष्ट तँ अवश्य छनि, मुदा ताहिसँ बेसी छनि शंकाक बीमारी। जँ हुनका उचित रुपेँ बुझाओल जाए तँ हुनक विषम कष्टकेँ थोड़ेक कालक हेतु रोकल जाए सकैत अछि। ई सूचना हमरा सोचबाक हेतु बाध्य कएलक जे जखन जीवने एकटा नाटक थिक तँ एहि तरहक नाटक कएने कोनो हर्ज नहि। इएह सभ सोचि हम अपन स्वीकृति हुनका सभकेँ दए देल आ बाट भरि डॉक्टर बनि ओहि मानसिक रोगीक उपचार करैत रहलहुँ। एहि क्रममे कखनो हींगोली तँ कखनो पचनोल, कखनो कॉफी बाइट टॉफी तँ कखनो अल्पेनलीभक डोजदैत काठपाडी स्टेशन धरि पहुँचि गेल छलहुँ, जतए उतरि ओ रोगी अपनाकेँ पूर्ण ठीक मानि अस्पताल जएबासँ मना कए रहलि छलीह। हमर गाड़ी सीटी देलक आ हम छड़पि अपन गाड़ी धएल। अफरा-तफरीमे ओहि व्यक्तिक फोनो नम्बर नहि लए सकलहुँ, जाहिसँ हुनक बादक स्थितिक पता चलि सकितए। एक दिस तँ अपना माथ पर जीतक मुरेठा बान्हल देखि गद्-गद् भए रहल छलहुँ, मुदा हृदयक कोनो कोनमे एखनहुँ ई व्यथा छल जे की हम ठीक कएलहुँ?

 
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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...