Sunday, October 14, 2012

'विदेह' ११५ म अंक ०१ अक्टूबर २०१२ (वर्ष ५ मास ५८ अंक ११५)- PART VI


विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती
१. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल)
२.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद
३.कनकमणि दीक्षित (मूल नेपालीसँ मैथिली अनुवाद श्रीमती रूपा धीरू आ श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि)
मन्त्रद्रष्टा ऋष्यश्रृङ्ग- हरिशंकर श्रीवास्तवशलभ"- (हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद विनीत उत्पल)
मन्त्रद्रष्टा ऋष्यश्रृङ्ग

पहिलुक परिच्छेद
अंग महिमा
प्राचीन अंगक निर्माणकेँ लऽ कऽ कतेक रास कथा प्रचलित अछि। वाल्मीकि रामायणक मुताबिक, जतए शोभाशाली कामदेव अप्पन अंग छोड़ने छल, ओ अंग देशक नामसँ विख्यात भेल।
अयोध्यासँ सिद्धाश्रम जाए कऽ बाटमे राम-लक्ष्मणक संग विश्वामित्र एक राति गंगा आ सरयूक कातमे बितौने छल। ओतए शुद्ध अंत:करणबला महर्षि सबहक पवित्र आश्रमक परिचय दैत विश्वामित्र बाजल छल जे कहियो एतए भगवान शिव चित्तकेँ एकाग्र कऽ तपस्या करैत छल। ओइ काल कामदेव मूर्तिमान छल। ओ अप्पन देह धारण कऽ विचरण करैत छल। एक दिन भगवान शिव समाधिसँ उठि कऽ मरुद्गणक संग कत्तौ जा रहल छल। ओइ काल ओ दुर्बुद्धि हुनकापर आक्रमण कऽ देलक। भगवान शिव हुंकार कऽ हुनका रोकलक आ अवहेलनापूर्वक ओकरा दिस ताकलक।
फेर तँ कामदेवक सभटा अंग हुनकर देहसँ जीर्ण-शीर्ण हुअए लागल। कठिन तापसँ दग्ध भेल कामदेव ओतएसँ भागि गेल। जइ ठाम पर कन्दर्पक देह पूरा तरहे नष्ट भेल, वएह प्रदेश अंग देशक नामसँ विख्यात भेल। 1 
अंग देशक नामकरण ओतुक्का एकटा राजा अंगक नामपर भेल छल। आनव राज्य, जकर धूरी अंग छल, पाँच टा राज्यमे विभक्त छल, जकर नामकरण राजा बलिक पाँचटा पुत्रक नामपर भेल छल। आनवक अधिकारमे संपूर्ण पूर्वी बिहार, बंगाल आ उड़ीसा छल, जइमे अंग, बंग, पुण्ड्र, सुहा आ कलिंङ्क राज्य छल। अइ मे अंग एकटा बड़ शक्तिशाली जनपद छल।
वाल्मीकि रामायणक मुताबिक सुग्रीव सीताकेँ ताकै लेल अप्पन वानर सैनिककेँ पूरबक देशमे भेजने छल, जइमे अंग सेहो एकटा छल।2 तइ कालमे अंगक विस्तार असीम छल। किएकि बलि पुत्र अंगक बाकी चारि भायक राज्यक सत्ताक केंद्र अंग राज्य छल।
ई तथ्य सेहो विचारणीय अछि जे महाभारतक (शांतिपर्व, 296) मुताबिक, आदिकालमे चारि टा गोत्र छल, भृगु, अंगिरा, वशिष्ट आ कश्यप। ऋग्वेदक दोसर, तेसर, चारिम, छअम आ आठम मंडलमे जइ ऋषि सभकेँ मंत्र प्राप्त होइत अछि ओ अछि, गृत्समद, गौतम, भारद्वाज आ कण्व। आचार्य अश्वलायन अष्टम मंडलक वंशकेँ गोत्र द्योतक मानैत अछि, संग-संग अइ मंडलक ऋषिक प्रगाथा सेहो कहल जाइत अछि। हुनका अनुसार, अइ मंडलक पहिलुक सूक्तक ऋषि प्रगाथ छल जे स्वयं कण्व वंशी छल। अइ मंडलक एगारह वालखिल्य मिल कऽ कुल १०३ सूक्त कण्वक अछि। गौतम आ भारद्वाज अंगिरा वंशक मानल जाइत अछि आ कण्व सेहो अंगिरसेक अछि। अइ तरहेँ अइ पाँच मंडलमे अंगिरसक प्रधानता स्वयं सिद्ध अछि।
अइ मंडलक ऋषि कुल अंगिरस, अंग द्वीपक ऋषि छल। स्वयं इंद्रक ऐरावत हाथी पदमर्दन कऽ देने छल, अइसँ तमसाएल दुर्वासा इंद्रकेँ शाप दऽ कऽ हुनका सत्ताच्युत कऽ देलखिन। इंद्र राजा बलिसँ सहायता मांगलक। राजा बलि इंद्रक संकेतपर देवलोकेपर अधिकार कऽ लेलक। बलि अंगद्वीपक राजा छल।4 ओ अप्पन पाँच शक्तिशाली पुत्रमे अंगक जनपद बाँटि हुनका सभकेँ ओइ ठामक राजा बना देलक। एकर बादो अंग असुर-सुर संस्कृतिक मुख्य केंद्र छल। ऋग्वेदसँ स्पष्ट ज्ञात होइत अछि जे अंगिरस आ हुनकरे वंशज यज्ञ कर्मक जनक छल। ओ अइ रहस्यक पहिलुक ज्ञाता छल जे यज्ञाग्नि काष्ठमे निहित छल। अइ तरहेँ अंगिरिस सभ अग्निक प्रयोगसँ सभसँ पहिलुक यज्ञोत्सवक नींव देने छल।
प्राचीन भारतमे जे सोलह महाजनपदक चर्चा अछि, ओइमे अंग प्रमुख छल। शेष महाजनपद छल, मगध, काशी, कौशल, बज्जि, मल्ल, वत्स, चेदि, पांचाल, कुरु, मत्स्य, शूरसेन, अश्मक, अवन्ति, गान्धार आ कम्बोज।
अंग आ मगधमे निरंतर संघर्ष चलैत रहैत छल। बुद्ध कालमे मगधक राजा बिम्बसार अंगकेँ जीत कऽ मगधमे मिला लेने छल।
अंग वा अइ पूर्वी प्रदेशक लोग आ राजतंत्र ब्रााह्मण ग्रंथमे व्रात्य नामसँ जानल जाइत अछि। व्रात्यक शाब्दिक अर्थ अछि व्रतकऽ धारण करैबला मुदा एतए एकर प्रयोग बड़ गर्हित अर्थमे भेल अछि। एकर तात्पर्य अछि अनार्य, वैदिक कर्मकांड विरोधी आ वर्णसंकर। सावित्री आ उपनयनसँ भ्रष्ट द्विजातिकेँ मनुस्मृतिमे ब्राात्य कहल गेल अछि।
द्विजात्य: सवर्णास्त जनयन्तवुतास्तयान।
तान सावित्री परिभ्रष्टान व्रात्यानिति विनिर्दिशेत।।
मनुस्मृति 10/20
महाभारतमे व्रात्यकेँ पातकी कहल गेल अछि। एकरा मुताबिक, व्रात्यकेँ आग लगाबैबला, विष दैबला, मदिरा बेचैबला, कुसीद भक्षण करैबला, मित्र द्रोही, भ्रूण हत्यारा, व्यभिचारी आ ब्रह्मघाती कहल गेल अछि।5 
अइ तरहेँ व्रात्यकेँ ब्रााह्मण ग्रंथमे पतित कहल गेल अछि।
वेदमे सेहो अइ ठामकेँ बड़ हेय दृष्टिसँ देखल गेल अछि। ऋग्वेदक प्रमगन्द शब्द अंग भंग आ मागध लेल प्रयुक्त भेल अछि। मागधकेँ वेदमे कीकट कहल गेल अछि। एहन लागैत छै जे संपूर्ण पूर्वी प्रदेश कोनो सांस्कृतिक अभिशापक आगिमे झुलसि रहल अछि आ वैदिक राजनीतिक शिकार बनि गेल अछि। अइ ठामक लोकक लेल चुनल-चुनल खराब शब्दक प्रयोग करैमे नै तँ वेद मंत्रकार पाछाँ रहल आ नहिये महामुनि व्यासे।
ऋग्वेदमे एकटा ऋषि इंद्रसँ प्रार्थना करैत अछि, मगधक गाय कोन काजक अछि जकर दूध यज्ञमे अहाँक काज नै आबैत अछि। (यानि कीकटक गायक दूध सेहो अपवित्र अछि आ ओकरासँ यज्ञ कर्म करैक लेल वर्जना अछि) सोमरसक संग मिल कए ओ दूध यज्ञपात्रकेँ गर्म नै करैत छै। तइसँ हे इंद्र! ओइ नैचाशाख प्रमगन्दक (निचला शाखाक अंग बंग आ मागध) ओ धन हमरा दिअ।6
अथर्ववेद तँ एक डेग अओर आगू अछि। अथर्ववेदक एकटा ऋषि कहैत अछि, जेना मनुख आ उपभोगक अन्य सामान एक ठामसँ दोसर ठाम भेजल जाइत अछि, ओइ तरहेँ ज्वरकेँ गन्धार भूजवान, अंग, मगध प्रदेशमे भेजि देल जाइत अछि।7
आखिर वेद ब्रााह्मण ग्रंथकेँ अइ प्रदेशपर एतेक कोप किए अछि? आउ, विचार करी। ब्रााह्मण द्वारा विनिर्मित जइ यज्ञ-योगादि क्रियाक उदय सप्त सिंधुक घाटीमे भेल, बड़ जोर मारलाक बादो ई विधि-क्रिया भारतक अइ पूब क्षेत्रमे अप्पन जड़ नै जमा सकल आ ने ब्रााह्मणवाद आ ब्राह्मण विचारधारा अइ भागमे अप्पन सत्ता काएम कऽ सकल। किएकि व्रात्य आर्य भेलाक बादो वैदिक कर्मकाण्ड, पशु हिंसाबला यज्ञ आ बड़ खर्चबला विधि कर्मक विरोधी छल।
ब्रााह्मण अपनो अइ धरतीपर बसै लेल नै चाहैत छल। एतुक्का निवासी स्वतंत्र विचारक, ज्ञानी आ तपस्वी छल। ओ अपन आचरण, व्यवसाय आ संस्कृतिपर ब्रााह्मणक छाया धरि सहन करै लेल तैयार नै छल। जे कोनो ब्रााह्मण तपस्वी तपस्याक लेल अइ क्षेत्रमे छल, सेहो कमलक तरहेँ जलसँ ऊपर छल। हुनका एतुक्का व्रात्यसँ कोनो संपर्क नै छल। स्वयं ऋष्यश्रृंङ्ग लऽ कऽ रामायणकार वाल्मीकि कहैत अछि- सदिखन पिताक संग रहैसँ विप्रवर ऋष्यश्रृंङ कोनो दोसराकेँ नै जानैत छल।"8 अइसँ स्पष्ट अछि जे ब्राह्मण ऋषि जन-सामान्यक संपर्कसँ अपनाकेँ अलग राखैत अछि।
कौशिकी महिमा, पुण्याश्रम
विश्वामित्र सेहो तपस्याक लेल अइ पूर्वी इलाकाकेँ चुनने छल। कोशीक कातपर ओ बड़ कठिन तपस्या केने छल जइसँ सृष्टिक मूलचक्रे हिल गेल छल। एहन भूभागमे कतेक तत्वज्ञानी क्षत्रिय-ब्रााह्मण केर चलाएल गेल विधि क्रियाकेँ त्यागब प्रतिष्ठित करैपर जोर देलक। अइ भागक पिछड़ल आ गरीब जनताक लेल ई नब आ क्रांतिकारी मार्ग-पद्धति अनुकूल सिद्ध भेल।9
चारू दिस नदीसँ आच्छादित अंगक ई उत्तरबरिया हिस्सा, घना जंगलसँ परिपूर्ण छल। एकर रमणीयता सेहो अद्वितीय छल। तइसँ महर्षि कश्यपक पुत्र विभाण्डक नामक ऋषि अप्पन तपश्चर्याक लेल अइ भूभागकेँ नीक बुझने छल।
ब्रााह्मण ग्रंथक मुताबिक, राजा बलि अंगक शासक छल। हुनका कोनो संतान नै छल। हुनकर स्त्री सुदेक्षणा दीर्घतमा नामक ऋषिसँ पाँचटा पुत्रकेँ जन्म देलक। ई ऋषि आन्हर छल। 10 महाभारतक मुताबिक, ई ऋषि सभ लोकक सोझाँमे स्त्री संभोग करैत छल। 11 हुनकर पिता छल उत्तथ, जिनकर स्त्रीकेँ वरुण भगा कऽ लऽ गेल आ हुनका संग संभोग करलक। बादमे वरुणकेँ दंडित कऽ उत्तथ अप्पन स्त्रीकेँ वापस आनि सुखपूर्वक रहए लागल।12
गर्हित पौराणिक मिथकीय कथा जाल आ ओकर टीकाकार, भाष्यकार, रचनाकारसँ बचैत ई कहएमे कोनो संकोच नै अछि जे पूरा अंगक वासी आ राजतंत्र आर्य आ अनार्य संस्कृतिक संगमपर फल-फूलि रहल छल। विभिन्न जाति, विचार आ संस्कृतिसँ समन्वित ई इलाका प्राचीन षोडश महाजनपदमे प्रमुख छल।13
वैदिक ग्रंथमे जलाशय, जल आ धारक प्रशस्ति अछि। ऋग्वेदमे तँ कतेको ऋचामे ई अछि। जलक पवित्रता प्राकवैदिक अछि यानी आर्यकेँ आबएसँ पहिनेसँ अछि। एकर जीवात्मा आ उर्वरतासँ गहींर संबंध अछि। तइसँ महर्षि कश्यपक तेजस्वी पुत्र विभाण्डक ऋषि अप्पन तपश्चर्याक लेल अइ कोशिकाच्छादित भूभागकेँ सभसँ उपयुक्त बुझलक।
तीर्थ तपस्याक लेल नै होइत अछि। तीर्थक प्रथा तँ अनार्य स्रोतसँ ग्रहीत भेल अछि। हिन्दूक सभटा तीर्थ आर्यक मूल स्थानसँ बाहरक अछि। आर्यक आगमनसँ पहिने एतुक्का धर्ममे तीर्थ छल। आर्यक सम्मिलन स्थल यज्ञ छल आ अनार्यक तीर्थ। ई तीर्थ शब्द सेहो वेदवाह्य अछि किएकि वेद विरोधी मतकेँ तैर्थिक मत कहल जाइत अछि। तइसँ तपस्याक लेल तीर्थ नै, अरण्य आ पवित्र धारक कात सभसँ उपयुक्त अछि। तइसँ व्रात्यक भूमि भेलाक बादो महर्षि विभाण्डक उत्तरबरिया अंगक सघन अरण्य क्षेत्रमे कौशिकीक धारक कातमे अप्पन आश्रम बनेने छल। कोशी एकटा पौराणिक धार अछि। एकर कातमे साक्षात भगवान शंकर बसै छै। इंद्र, विष्णु आ ब्रह्मा केँ भगवान शिवसँ भेंट करहि कऽ पूर्व, निर्दिष्ट आ निर्धारित ठाम ई कोशीक मनोरम तीर अछि।14 अप्पन बहिन कौशिकीक संबंधमे स्वयं विश्वामित्र कहैत अछि,
दिव्य पुण्योदकारम्या हिमवन्तमुपाश्रिता।
लोकस्य हित कार्यार्थो प्रवृत्ता भगिनी मम।।15
अप्पन बहिनक प्रति स्नेहक कारण अइ काजमे विश्वामित्र निअमसँ बड़ सुखसँ निवास करैत छल। ओ यज्ञसँ जुड़ल अप्पन निअमक सिद्धिक लेल अप्पन बहिन कौशिकीक सानिध्यकेँ छोड़ि सिद्धाश्रम आएल छल। अइ कौशिकीक कात विश्वामित्र सहस्र बरख धरि घनघोर आ अतिशय कठोर तपस्या केने छल जइसँ सभटा सृष्टि चक्र हिल गेल छल।
कौशिकी तीर मसाध तपस्तेपे सुदारुणम
तस्य वर्ष सहस्त्रणि घोरं तप उपासते। 
रामायण 1-34-25
वाल्मीकि रामायणमे कतेको बेर कौशिकी सरितां वरा (सभ धारमे श्रेष्ठ कौशिकी) बालकाण्ड श्लोक 11, कौशिकी सरितां श्रेष्ठा कुलो द्योतकारी इव (धारमे श्रेष्ठ कौशिकी सेहो अप्पन कुलक कीर्ति केँ प्रकाशित करैवाली छथिन। श्लोक 21) जेहन उक्ति आएल अछि, जइसँ पुण्य सलिला कोशीक महिमा रेखांकित होइत अछि। तइसँ कश्यप पुत्र महर्षि विभाण्डकक तपस्या लेल कोशीक कात सभसँ उपयुक्त छल, जतए विश्वामित्र कठोर तपस्या कऽ कतेक रास सिद्धि प्राप्त केने छल।
धारक कात सुदूर धरि फैलल पैघ पाथरक अद्भुत श्रृंखला सेहो विद्यमान छल, जे कोशीक तीव्र धारकेँ नियंत्रित करैत छल। लगभग साढ़े सात हजार बरखक भौगोलिक परिवर्तनक परिणामस्वरूप ओ पाथरक (चट्टान) श्रृंखला जमीनक भीतर गहींरमे चलि गेल आ ओकर ऊपर माटिक मोटका परत जमैत गेल।16
वेगवती नदी, विशाल चट्टान, रमणीय प्रकृति, समिधा बाहुल्य, आैषधियुक्त वनस्पतिसँ आच्छादित अरण्य आ कुलांच भरैत मृगादि वन्य पशु, एहन शांत स्थानमे छल विभाण्डक ऋषिक आश्रम, कोशीक धारक कज्जल वनमे।
कोशी आ ओकर छाड़न धारक कातपर अप्पन सघनताक लेल प्रसिद्ध कज्जल वन स्थित पुण्याश्रम पूरे आर्यावर्तमे प्रसिद्ध छल। ई क्षेत्र असुरक प्रभावसँ सेहो मुक्त छल। तइसँ एतए कऽ ऋषि आश्रम निरापद छल। एतए निर्विध्न वेद पाठ चलैत छल आ आश्रमवासीक समए समिधा संचय, अग्निहोत्र आ कृषि काजमे व्यतीत होइत छल। ई आश्रम ऋषि आ  कृषि परंपराक अद्भुत संगम स्थल छल। भूमि बड़ उर्वरा छल। महर्षि विश्वामित्र अप्पन कालक महान कृषि वैज्ञानिक सेहो छल। हुनकर तपस्या आ प्रयोग स्थल कोशीक मनोहर तट सेहो छल। पूरा इलाका वन्य पशुक अभ्यारण्य छल। विश्वामित्र केर अप्पन कठोर तपस्यासँ ऊर्जावान बनाएल इलाका मुनि विभाण्डक लेल सर्वथा उपयुक्त छल। अप्पन वंश परंपराक अनुरूप ओ सेहो विपुल प्रतिभाक पुंज छल। महर्षि व्यास हुनकर वंश परिचय एना देने अछि:-
मरीचि: मनसस्य जज्ञे तस्यापि कश्यप:।
मश्यपात्कारश्यप: जात: तस्यसुतो विभाण्डक: ऋष्यश्रृङ तस्य पुत्रोस्ति।।17
ब्रह्माक मानस पुत्र मरीचक पौत्र विभाण्डक छल। उच्च वंशोद्भव ई ऋषि वेद विहित संस्कारसँ संपन्न छल। कोशीक कातक ई कज्जल वन हुनकर साधना तपस्याक लेल पूर्ण उपयुक्त आ निरापद छल।
अति प्राचीन कालमे (महाभारत, पुराण, वराहमिहिर आ भास्काराचार्यक मतानुसार) भारत नौ खंडमे विभक्त छल। ई खण्ड छल, इंद्र, कसेरुमत, ताम्रवर्ण, गभस्तिमत, कुमारिक, नाग, सौम्य, वरुण आ गान्धर्व। पौराणित साक्ष्य आ एकर पहचानक जे संकेत भेटल अछि, ओकर मुताबिक पूर्वी भारतक ई क्षेत्र इंद्रखण्ड छल। अइ क्षेत्रपर इंद्रक विशेष कृपा छल। तइसँ ई सदिखन हरिअर फल-फूल आ धान्यसँ संपन्न क्षेत्र छल। धार सदानीरा छल।
ऋग्वेदमे अंगक उल्लेख नै अछि। तइसँ एहन लागैत अछि जे उत्तर वैदिक कालमे अंग जनपदक उदय भेल अछि। ऋग्वेदमे कीकट शब्दक प्रयोग भेल अछि जेकरा मगध आ अंग क्षेत्रक लोक लेल प्रयोगमे आनल गेल हएत। मुदा कतेक रास आचार्य एकरा सप्त सिन्धुक पर्वतीय भाग लेल सेहो प्रयुक्त करैत अछि।18 जे भी भेल हुअए, रामायण युगक आर्य सभ्यता केर अइ क्षेत्रमे उदय भऽ चुकल छल। मुदा राक्षसी सभ्यता अओर आर्येतर वानरी सभ्यता एतए अप्पन जमीन नै बना सकल छल। अइ क्षेत्रमे स्थापित ऋषि आश्रम अध्ययन, अनुसंधान आ यज्ञादि क्रियाक संपादन लेल उपयुक्त छल।

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बालानां कृते
१.जगदीश प्रसाद मण्डल- बाल वि‍हनि‍ कथा- घटक काका २.शिव कुमार यादव- बाल कविता ३.जगदानन्द झा मनु- करुण हृदयक मालिक महाराज रणजीत सिंह 
जगदीश प्रसाद मण्डल
बाल वि‍हनि‍ कथा-
घटक काका
एहेन अगि‍आएल क्रोध घटक बाबाकेँ जि‍नगीमे पहि‍ल दि‍न छलनि‍, जेहेन आइ भोरे उठलनि‍। एक तँ ओहुना देह घटने थोड़-थाड़ क्रोध सदि‍खन रहबे करै छन्‍हि‍ मुदा घटबी जि‍नगीमे घटती काज भेने जहि‍ना होइ छै तहि‍ना भेलनि‍। ओना देहक घटबी अनका जकाँ नै छलनि‍, कि‍एक तँ सभ दि‍न रहने केकरो फेहम बनल रहै छै, सभ कि‍छु दुरुस्‍त रहै छै, मुदा तइसँ भि‍न्न घटक बाबाकेँ भेलनि‍। जेना केरा गाछक वा अनरनेबा गाछक पानि‍ सुखने खलपैट जाइए तहि‍ना भेने घरक पहि‍लुका सभ कपड़ो-लत्ता आ जुतो-चप्‍पल भऽ गेलनि‍। दहेजुआ देल कुरतो-गंजी आ जुत्तो-पप्‍पल ढील-ढीलाह बनि‍ गेलनि‍। एकर माने ई नै जे कुरतो-गंजी आ जुतो-चप्‍पल बढ़ि‍ कऽ ताड़ भऽ गेलनि‍ तँए ढील-ढीलाह भऽ गेलनि‍। अपने सुखि‍ कऽ पलास भऽ गेल छथि‍। ओना घरमे तते-रास कपड़ो-जुत्तो-चप्‍पल छन्‍हि‍ जे अपन जीता-जि‍नगीकेँ के कहए जे मुइलोपर दान-पुन करैत उगड़ि‍ये जेतनि‍। मुदा कुछप भेने ओहो सभ कुछपि‍ये जेतनि‍ जइसँ कोनो सोगात नै लगतनि‍। जँ अपनो पहीरता तँ लेबरे जकाँ लगता आ दानो-पुन करता तैयो सएह हेतन। खैर जे होउ, मुदा औझुका अगि‍आएल क्रोध बि‍नु हवोक ने पजरि‍ जाए तेहने लहलही छन्‍हि‍‍।
कनभेंटक सातम श्रेणीक पोती सरस्‍वती जि‍ज्ञासु बनि‍ पुछलकनि‍-
बाबा, पढ़ल-लि‍खल लड़काक संग बि‍नु पढ़ल-लि‍खल लड़कीक बि‍आह कते करौलि‍ऐ आ बि‍नु पढ़ल-लि‍खल लड़काकेँ पढ़ल-लि‍खल लड़कीक संग कते करौने हेबइ?”
पोतीक पुछल प्रश्नक उत्तर बाबा नकारि‍ केना सकै छथि‍। कवि‍ताक तुकवन्‍दी जकाँ कुछप कि‍अए ने होउ, मुदा लय तँ भरबे करत। छ-अनि‍याँ मुस्‍की दैत घटक बाबा कहलखि‍न-
कोनो की डायरी लि‍खि‍ कऽ रखने छी, अनगि‍नती बूझह।
बाल मन सरस्‍वतीक अनगि‍नतीमे ओझरा गेल। मुदा जहि‍ना भूखक तृष्‍णाकेँ पानि‍योसँ कि‍छु समए वि‍लमाओल जा सकैए, मुदा तृष्‍णो तँ तृष्‍णा छि‍ऐ। ठोस जहि‍ना पानि‍मे नै भसि‍आइत, पानि‍ हवामे नै उड़ैत तहि‍ना सरस्‍वतीक तृष्‍णा नै उड़ल। पुन: दोहरा कऽ बाजल-
बाबा, बि‍आह कि‍अए होइ छै?”
पाँच कि‍लो मोटरीकेँ तँ टारि‍ देलि‍ऐ, मनहीकेँ केना टारबै। जहि‍ना पएर पड़ि‍ते साँप फन-फना उठैए तहि‍ना घटक बाबाकेँ फनफनी उठलनि‍। एक तँ ओहुना घटबी देह थरथराइते रहै छन्‍हि‍ तइपर आरो धऽ लेलकनि‍। मुदा जहि‍ना गनगुआरि‍ देख नागक फनकी टूटि‍ जाइत तहि‍ना दस बर्खक पोतीकेँ सोझमे ठाढ़ भेने घटक काकाकेँ भेलनि‍।

शिव कुमार यादव
बाल कविता
बौआ हमरा आब जुनि तंग कर
तोरा सँ आब हम हारि मानै छी

 
भोरे सँ तोँ खूब अपस्याँत कऽ देलैँ
इस्कुल जो आब हम एतबा जानै छी

कानए जुनि देखहीं बौआ बुच्ची इस्कुल छै
भोरे सँ तोरा हम फुसलाबै छी

नीक सँ जो, केकरो सँ नै लड़िहैँ
 
रुक तोहर अंगा आ पेंट सरिआबै छी

खूब जतन सँ पढ़िहैँ अप्पन दैया संग
तोरे सभसँ हम सपना सजाबै छी

गाम-समाज आ देशक नाम ऊँच करिहैँ
"शिकुया" तोरे सँ हम आस लगाबै छी

जगदानन्द झा 'मनु'
ग्राम पोस्ट - हरिपुर डीहटोल, मधुबनी 

करुण हृदयक मालिक महाराज रणजीत सिंह 

पंजाब प्रान्तक राजा महाराजामे सँ महाराज रणजीत सिंहक नाम हुनक न्यायप्रियता एवं सुशासनक लेल पसिद्ध छनि| एक समयक गप अछि, महाराज रणजीत सिंहजी अपन प्रजाक सुख दुख देखै लेल घोड़ापर सबार अपन सिपाही संगे राज भ्रमणपर निकलल रहथि | महाराज सेना सहित रस्तापर आगू  बढ़ैत रहथि की कतौसँ एकटा पाथर उड़ि कs आबि महाराजकेँ बिच्चे माथपर लगलनि| पाथर लगिते हुनकर माथसँ सोनितक टघार बहए लगलनि| महाराज अपन एक हाथसँ घोड़ाक लगाम पकड़ने, दोसर हाथे चट कपारकेँ दाबि लेलनि | सिपाही सभ पाथरक दिसामे  दौड़ल| किछु घड़ी बाद ओ सभ एकटा नअ-दस बरखक फाटल चेथड़ी पहिरने, गरीब नेनाकेँ लेने आएल| महाराजकेँ पुछला उत्तर एकटा सिपाही बाजल जे ई नेना पाथर मारि-मारि कए आम तोड़ै छल, ओहे पाथर आबि कs महाराजक माथपर लागल | महाराज रणजीत सिंह ओइ डरैत नेनाकेँ अपना लग बजा, स्नेहसँ ओकर माथपर हाथ फेरैत एगो सिपाहीकेँ आज्ञा देलनि - "पाँच पथिया आम, दू जोड़ी नव कपड़ा आ सएटा असरफी लए कs ऐ नेनाकेँ आदर सहित एकर घर छोड़ि आएल जाए|
महाराजक आज्ञाक तुरंत पालन भेल | मुदा महाराजक निर्णयकेँ नै बुझि सेनापति, सहास कए कs ऐ तरहक फैसलाक कारण पुछिए लेलक| सेनापतिक प्रश्नक उत्तर दैत महाराज बजलाह -"जखन एक गोट निरीह गाछ पाथर मारला उत्तर फल दs रहल छै तखन हम तँ ऐ प्रान्तक राजा छी| हमर प्रजा हमर पुत्र तुल्य अछि, एहन ठाम हम कोना फल देबऽसँ वंचित रहि जाइ | गाछ अपन सामर्थे फल दै छै, हम अपन सामर्थे, ऐमे अजगुतक कोन गप|
एहन उदार, न्यायप्रिय, वात्सल्य आ करुण ह्रदयक मालिक छलाह महाराज रणजीत सिंह |   



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बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥
१०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२)
आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥
आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥
मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।
ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।
हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आसर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आघोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आयुवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आनेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आऔषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आमित्रक उदय होए॥
मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि।
एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।
अन्वय-
ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म
रा॒ष्ट्रे - देशमे
ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त
आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए
रा॑ज॒न्यः-राजा
शुरे॑ऽबिना डर बला
इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण
ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला
म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर
दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली)
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित
सप्तिः॒-घोड़ा
पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री
जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला
र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर
स॒भेयो॒-उत्तम सभामे
युवास्य-युवा जेहन
यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे
वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला
निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे
नः-हमर सभक
प॒र्जन्यों-मेघ
वर्षतु॒-वर्षा होए
फल॑वत्यो-उत्तम फल बला
ओष॑धयः-औषधिः
पच्यन्तां- पाकए
योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा
नः॑-हमरा सभक हेतु
कल्पताम्-समर्थ होए
ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी।

8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS
8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH
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 विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन  

Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.)
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विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.
१.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम

१.नेपाल भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक
  उच्चारण आ लेखन शैली
(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित)
मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन

१.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, , , न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना-
अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।)
पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।)
खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।)
सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।)
खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।)
उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि।
नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ।

२.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण र् हजकाँ होइत अछि। अतः जतऽ र् हक उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना-
ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि।
ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि।
उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि।

३.व आ ब : मैथिलीमे क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि।

४.य आ ज : कतहु-कतहु क उच्चारण जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही।

५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि।
प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि।
नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि।
सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि।
ए आ क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि।

६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि।

७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि।

८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि:
(क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक।
अपूर्ण रूप : पढ़गेलाह, लेल, उठपड़तौक।
पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक।
(ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह।
अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह।
(ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि।
अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल।
(घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि।
अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि।
(ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक।
अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ।
(च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि।
अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै।

९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि।

१०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए।
-(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित)

१.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि
, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन
ठाम
जकर
, तकर
तनिकर
अछि

अग्राह्य
अखन
, अखनि, एखेन, अखनी
ठिमा
, ठिना, ठमा
जेकर
, तेकर
तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य)
ऐछ
, अहि, ए।

२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल
, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। करगेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

३. प्राचीन मैथिलीक
न्हध्वनिक स्थानमे लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

४.
तथा ततय लिखल जाय जतस्पष्टतः अइतथा अउसदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह
, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।

६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे
के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

७. स्वतंत्र ह्रस्व
वा प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ वा लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे
ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव
लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ
, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। मेमे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। क वैकल्पिक रूप केरराखल जा सकैत अछि।

११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद
कयवा कएअव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

१२. माँग
, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

१३. अर्द्ध
ओ अर्द्ध क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ’ , ‘’, तथा क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय
, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क
लिखल जाय, हटा कनहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

१८. समस्त पद सटा क
लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ ,  हटा कनहि।

१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा
' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६

  २. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम
२.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):-   
दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य मे जीह तालुसँ , मे मूर्धासँ आ दन्त मे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे केँ वैदिक संस्कृत जकाँ सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग
गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि।
ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी।
अछि- अ इ छ  ऐछ (उच्चारण)
छथि- छ इ थ  – छैथ (उच्चारण)
पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण)
आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि।
फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र ।
उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव  http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना
छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू।
रहए-
रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)।
मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए
छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो।
संयोगने- (उच्चारण संजोगने)
केँ/  कऽ
केर- (
केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। )
क (जेना रामक)
–रामक आ संगे (उच्चारण राम के /  राम कऽ सेहो)
सँ- सऽ (उच्चारण)
चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ)  रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)।

केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ
क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक
कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ
सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ
सऽ , तऽ , , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित।
के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति क बदला एकर प्रयोग अवांछित।
नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै

त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)।
राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै)
सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन)
पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल
पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै
ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै)
ओइ/ ओहि
ओहिले/
ओहि लेल/ ओही लऽ
जएबेँ/ बैसबेँ
पँचभइयाँ
देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित)
जकाँ / जेकाँ
तँइ/ तैँ/
होएत / हएत
नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै
सौँसे/ सौंसे
बड़ /
बड़ी (झोराओल)
गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।)
रहलेँ/ पहिरतैँ
हमहीं/ अहीं
सब - सभ
सबहक - सभहक
धरि - तक
गप- बात
बूझब - समझब
बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ
हमरा आर - हम सभ
आकि- आ कि
सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै)
होइन/ होनि
जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन)
पइठ/ जाइठ
आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ
मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ ।
एकटा , दूटा (मुदा कए टा)
बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ
,/ दिय’ , ’, आ नै )
अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)।
अइमे, एहिमे/ ऐमे
जइमे, जाहिमे
एखन/ अखन/ अइखन

केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित)
भऽ
मे
दऽ
तँ (तऽ, नै)
सँ ( सऽ स नै)
गाछ तर
गाछ लग
साँझ खन
जो (जो go, करै जो do)
 तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले
जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले
ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति‍ कतेक दि‍नसँ कहैत रहैत अइ
लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे
लहँ/ लौं

गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ
जइ/ जाहि‍/ जै
जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम
एहि‍/ अहि‍/
अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) /
अइछ/ अछि‍/ ऐछ
तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍
ओहि‍/ ओइ
सीखि‍/ सीख
जीवि‍/ जीवी/ जीब 
भलेहीं/ भलहि‍ं 
तैं/ तँइ/ तँए
जाएब/ जएब
लइ/ लै
छइ/ छै
नहि‍/ नै/ नइ
गइ/ गै 
छनि‍/ छन्‍हि ...
समए शब्‍दक संग जखन कोनो वि‍भक्‍ति‍ जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्‍यादि‍। असगरमे हृदए आ वि‍भक्‍ति‍ जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्‍यादि‍।  
जइ/ जाहि‍/
जै
जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम
एहि‍/ अहि‍/ अइ/
अइछ/ अछि‍/ ऐछ
तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍
ओहि‍/ ओइ
सीखि‍/ सीख
जीवि‍/ जीवी/
जीब 
भले/ भलेहीं/
भलहि‍ं 
तैं/ तँइ/ तँए
जाएब/ जएब
लइ/ लै
छइ/ छै
नहि‍/ नै/ नइ
गइ/
गै 
छनि‍/ छन्‍हि‍
चुकल अछि/ गेल गछि
२.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम
नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही:
बोल्ड कएल रूप ग्राह्य:  
१.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक
२. आ’/आऽ
३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए
४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए
गेल
५. कर’ गेलाह/करऽ
गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह
६.
लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/
७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला /
करैवाली
८. बला वला (पुरूष), वाली (स्‍त्री) ९
.
आङ्ल आंग्ल
१०. प्रायः प्रायह
११. दुःख दुख १
२. चलि गेल चल गेल/चैल गेल
१३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन
१४.
देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह
१५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि
१६. चलैत/दैत चलति/दैति
१७. एखनो
अखनो
१८.
बढ़नि‍ बढ़इन बढ़न्हि
१९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम)
२०
. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ
२१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ
२२.
जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर
२४. केलन्हि/केलनि‍/कयलन्हि
२५. तखनतँ/ तखन तँ
२६. जा
रहल/जाय रहल/जाए रहल
२७. निकलय/निकलए
लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल
२८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए
२९.
की फूरल जे कि फूरल जे
३०. जे जे’/जेऽ
३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/
यादि (मोन)
३२. इहो/ ओहो
३३.
हँसए/ हँसय हँसऽ
३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस
३५. सासु-ससुर सास-ससुर
३६. छह/ सात छ/छः/सात
३७.
की  की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित)
३८. जबाब जवाब
३९. करएताह/ करेताह करयताह
४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस
४१
. गेलाह गएलाह/गयलाह
४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर
४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल
४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि‍ जाइत छल
४५.
जबान (युवा)/ जवान(फौजी)
४६. लय/ लए ’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए
४७. ल’/लऽ कय/
कए
४८. एखन / एखने / अखन / अखने
४९.
अहींकेँ अहीँकेँ
५०. गहींर गहीँर
५१.
धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए
५२. जेकाँ जेँकाँ/
जकाँ
५३. तहिना तेहिना
५४. एकर अकर
५५. बहिनउ बहनोइ
५६. बहिन बहिनि
५७. बहिन-बहिनोइ
बहिन-बहनउ
५८. नहि/ नै
५९. करबा / करबाय/ करबाए
६०. तँ/ त ऽ तय/तए
६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ,
६२. गि‍नतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ  
६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत
६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता
६५. देन्हि/ दइन दनि‍/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि
६६. द’/ दऽ/ दए
६७. (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम)
६८. तका कए तकाय तकाए
६९. पैरे (on foot) पएरे  कएक/ कैक
७०.
ताहुमे/ ताहूमे
 ७१.
पुत्रीक
७२.
बजा कय/ कए / कऽ
७३. बननाय/बननाइ
७४. कोला
७५.
दिनुका दिनका
७६.
ततहिसँ
७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि‍/
 रबेलन्हि/ गरबेलनि‍
७८. बालु बालू
७९.
चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध)
८०. जे जे’
८१
. से/ के से’/के’
८२. एखुनका अखनुका
८३. भुमिहार भूमिहार
८४. सुग्गर
/ सुगरक/ सूगर
८५. झठहाक झटहाक ८६.
छूबि
८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ
८८. पुबारि
पुबाइ
८९. झगड़ा-झाँटी
झगड़ा-झाँटि
९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे
९१. खेलएबाक
९२. खेलेबाक
९३. लगा
९४. होए- होहोअए
९५. बुझल बूझल
९६.
बूझल (संबोधन अर्थमे)
९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह
९८. तातिल
९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ
१००. निन्न- निन्द
१०१.
बिनु बिन
१०२. जाए जाइ
१०३.
जाइ (in different sense)-last word of sentence
१०४. छत पर आबि जाइ
१०५.
ने
१०६. खेलाए (play) –खेलाइ
१०७. शिकाइत- शिकायत
१०८.
ढप- ढ़प
१०९
. पढ़- पढ
११०. कनिए/ कनिये कनिञे
१११. राकस- राकश
११२. होए/ होय होइ
११३. अउरदा-
औरदा
११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand)
११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि‍/ बुझयलन्हि (understood himself)
११६. चलि- चल/ चलि‍ गेल
११७. खधाइ- खधाय
११८.
मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखि‍न/ मोन पारलखिन्ह
११९. कैक- कएक- कइएक
१२०.
लग ल’ग 
१२१. जरेनाइ
१२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/
जरेनाइ
१२३. होइत
१२४.
गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ गरबौलन्हि/ गरबौलनि‍
१२५.
चिखैत- (to test)चिखइत
१२६. करइयो (willing to do) करैयो
१२७. जेकरा- जकरा
१२८. तकरा- तेकरा
१२९.
बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे
१३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं
१३१.
हारिक (उच्चारण हाइरक)
१३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज
१३३. आधे भाग/ आध-भागे
१३४. पिचा / पिचाय/पिचाए
१३५. नञ/ ने
१३६. बच्चा नञ
(ने) पिचा जाय
१३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत
१३८.
कतेक गोटे/ कताक गोटे
१३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई
१४०
. लग ल’ग
१४१. खेलाइ (for playing)
१४२.
छथिन्ह/ छथिन
१४३.
होइत होइ
१४४. क्यो कियो / केओ
१४५.
केश (hair)
१४६.
केस (court-case)
१४७
. बननाइ/ बननाय/ बननाए
१४८. जरेनाइ
१४९. कुरसी कुर्सी
१५०. चरचा चर्चा
१५१. कर्म करम
१५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए
१५३. एखुनका/
अखुनका
१५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ
१५५. कएलक/
केलक
५६. गरमी गर्मी
१५७
. वरदी वर्दी
१५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ
१५९. एनाइ-गेनाइ
१६०.
तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि‍
१६१. नञि / नै
१६२.
डरो ड’रो
१६३. कतहु/ कतौ कहीं
१६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर
१६५. भरिगर
१६६. धोल/धोअल धोएल
१६७. गप/गप्प
१६८.
के के’
१६९. दरबज्जा/ दरबजा
१७०. ठाम
१७१.
धरि तक
१७२.
घूरि लौटि
१७३. थोरबेक
१७४. बड्ड
१७५. तोँ/ तू
१७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य)
१७७. तोँही / तोँहि
१७८.
करबाइए करबाइये
१७९. एकेटा
१८०. करितथि /करतथि
 १८१.
पहुँचि/ पहुँच
१८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि‍
१८३.
लगलन्हि/ लगलनि‍ लागलन्हि
१८४.
सुनि (उच्चारण सुइन)
१८५. अछि (उच्चारण अइछ)
१८६. एलथि गेलथि
१८७. बितओने/ बि‍तौने/
बितेने
१८८. करबओलन्हि/ करबौलनि‍/
करेलखिन्ह/ करेलखि‍न
१८९. करएलन्हि/ करेलनि‍
१९०.
आकि/ कि
१९१. पहुँचि/
पहुँच
१९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा)
१९३.
से से’
१९४.
हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए)
१९५. फेल फैल
१९६. फइल(spacious) फैल
१९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि‍/हेतनि‍/ हेतन्हि
१९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब
१९९. फेका फेंका
२००. देखाए देखा
२०१. देखाबए
२०२. सत्तरि सत्तर
२०३.
साहेब साहब
२०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि‍
२०५. हेबाक/ होएबाक
२०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ
२०७. किछु न किछु/
किछु ने किछु
२०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं
२०९. एलाक/ अएलाक
२१०. अः/ अह
२११.लय/
लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक
२१३.सबहक/ सभक
२१४.मिलाऽ/ मिला
२१५.कऽ/
२१६.जाऽ/
जा
२१७.आऽ/
२१८.भऽ /भ’ ( फॉन्टक कमीक द्योतक)
२१९.निअम/ नियम
२२०
.हेक्टेअर/ हेक्टेयर
२२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़
२२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं
२२३.कहिं/ कहीं
२२४.तँइ/
तैं / तइँ
२२५.नँइ/ नइँ/  नञि/ नहि/नै
२२६.है/ हए / एलीहेँ/
२२७.छञि/ छै/ छैक /छइ
२२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ
२२९. (come)/ आऽ(conjunction)
२३०.
आ (conjunction)/ आऽ(come)
२३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना
२३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि‍
२३३.हेबाक- होएबाक
२३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं
२३५.किछु न किछ- किछु ने किछु
२३६.केहेन- केहन
२३७.आऽ (come)- (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह
२३८. हएत-हैत
२३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें
२४०.एलाक- अएलाक
२४१.होनि- होइन/ होन्हि/
२४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/
२४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ
२४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ
२४५
.शामिल/ सामेल
२४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं
२४७.जौं
/ ज्योँ/ जँ/
२४८.सभ/ सब
२४९.सभक/ सबहक
२५०.कहिं/ कहीं
२५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/
२५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल
२५३.कोना/ केना/ कन्‍ना/कना
२५४.अः/ अह
२५५.जनै/ जनञ
२५६.गेलनि‍/
गेलाह (अर्थ परिवर्तन)
२५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि‍/
२५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन)
२५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी
२६०.पठेलन्हि‍ पठेलनि‍/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि‍/
२६१.निअम/ नियम
२६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर
२६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़
२६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित
२६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -/ कऽ/ के
२६६.छैन्हि- छन्हि
२६७.लगैए/ लगैये
२६८.होएत/ हएत
२६९.जाएत/ जएत/
२७०.आएत/ अएत/ आओत
२७१
.खाएत/ खएत/ खैत
२७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पि‍येबाक
२७३.शुरु/ शुरुह
२७४.शुरुहे/ शुरुए
२७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह
२७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/
२७७.जाइत/ जैतए/ जइतए
२७८.आएल/ अएल
२७९.कैक/ कएक
२८०.आयल/ अएल/ आएल
२८१. जाए/ जअए/ जए (लालति‍ जाए लगलीह।)
२८२. नुकएल/ नुकाएल
२८३. कठुआएल/ कठुअएल
२८४. ताहि/ तै/ तइ
२८५. गायब/ गाएब/ गएब
२८६. सकै/ सकए/ सकय
२८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल)
२८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढ़ैत
(पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि‍। बुझैत-बुझैत आब बुझलि‍ऐ। हमहूँ बुझै छी।
२८९. दुआरे/ द्वारे
२९०.भेटि/ भेट/ भेँट
२९१.
खन/ खीन/  खुना (भोर खन/ भोर खीन)
२९२.तक/ धरि
२९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ)
२९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ)
२९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य
२९६.बेसी/ बेशी
२९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला)
२९८
.वाली/ (बदलैवाली)
२९९.वार्त्ता/ वार्ता
३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय
३०१. लेमए/ लेबए
३०२.लमछुरका, नमछुरका
३०२.लागै/ लगै (
भेटैत/ भेटै)
३०३.लागल/ लगल
३०४.हबा/ हवा
३०५.राखलक/ रखलक
३०६. (come)/ (and)
३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप
३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै।
३०९.कहैत/ कहै
३१०.
रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different)
३११.तागति/ ताकति
३१२.खराप/ खराब
३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि
३१४.जाठि/ जाइठ
३१५.कागज/ कागच/ कागत
३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए)
३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय

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"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...