Sunday, October 14, 2012

'विदेह' ११५ म अंक ०१ अक्टूबर २०१२ (वर्ष ५ मास ५८ अंक ११५)- PART V



१.हेम नारायण साहु- तीन गोट कवि‍ता २.रामदेव प्रसाद मण्‍डल झारूदार’- शासक सुधारक महाझारू

हेम नारायण साहु
गाम- नगर पंचायत ि‍नर्मली, वार्ड नं. ०७, पोस्‍ट-–ि‍नर्मली, जि‍ला- सुपौल, मि‍थि‍ला-बि‍हार

तीन गोट कवि‍ता

जुलुम भऽ रहल अछि‍...

कोनो काज नै बि‍नु घूसक होइए
ई देखि‍ कऽ मन बौड़ाइए।
समए एहेन बि‍त रहल छै
केकरो कोइ नै चि‍न्‍है छै
हाकि‍मक कोन गप कहै छी
चपरासि‍यो नै ओना टेरै छै।
कर्मचारीक तँ जूनि‍ पूछू
रखने एकटा पीठू छै।
जखने पहुँचब झट दऽ कहि‍ देत
एकटामे पाँच सए लगै छै।
पंचायतक तँ बाते छोड़ू
मुखि‍या आँखि‍ मुनि‍ सुरकै छै
बि‍ना टाकाक आवास नै दइ छैक।
एतेक महग एकर साइन छैक
ओ सभ जइठाम बैसल छै
बि‍ना लेने नै बक्‍सै छै।

जेकरा नै छै बोल ऐ युगमे
ओकरा कोइ नै देखै छै।
ओना चलत नै काज आब
सभ कोइ मि‍लि‍ फूकब बि‍गुल आब।
ढाहि‍ देबै घूसक पहाड़केँ
नै छोड़ब ऐ दुष्‍ट समाजकेँ।
नव ढंगसँ नव समाजकेँ
गढ़ि‍ देव ई नव इति‍हासकेँ।

भष्‍टाचार

सभठाम होइए धक्कम-धुक्का
जइठाम जाइ छी खाइ छी मुक्का।
सबहक बन्न अछि‍ चीलम-हुक्का
बैस कऽ जरदगव मारैए मुक्का।
गामसँ लऽ पंचायत धरि‍
ब्‍लॉकसँ लऽ जि‍ला धरि‍।
धुमौआ चेअर बैसल धुरफन्‍दा
एँठ रहल धैर्य सभसँ चन्‍द।
आगू जतेक बढ़ैए जनता
ओतबे पैघ बैसलए हन्‍ता।
कि‍एक ने एकर सोच बदलैए
औंघाएल मनुक्‍ख मुँहभरे खसैए।
कतेक दि‍न एना होइत रहत
ि‍दन-दुखि‍या एना पि‍साइत रहत।

समता

मोन पड़ैए मधुमाछी छत्ता
अनगि‍नि‍त मधुमाछी मि‍लि‍
बना रहल अछि‍ अपन छत्ता।
नै केकरोमे भेद-भाव
सबहक मनमे एके भाव।
दि‍न राति‍ सभ जूटल रहैए
अमृत रस चूसि‍ भरैए रहैए।
बाग-वगि‍यामे धुमैत रहैए
मधुर गीत गबैत नचैए
फूल-पातपर गाबि‍-गाबि‍
लाबि‍-लाबि‍ मधु सृजैए
हृदए सबहक जुड़बैत रहैए।

 
रामदेव प्रसाद मण्‍डल झारूदार
शासक सुधारक महाझारू

जय हि‍न्‍द हे देशक धरती, जय हि‍न्‍द हे देशक जनता।
जय हि‍न्‍द हे ताज देशक, जय हि‍न्‍द सम्‍प्रभुता।।

आस्‍ति‍क-नास्‍ति‍क दुइ भावसँ, बनल प्रकृति‍ द्वन्‍द्व वि‍धान।
आस्‍ति‍क जग ि‍नर्माण करए, नास्‍ति‍क करए जगनाशी काम।।


जब हेतै आस्‍ति‍क गुण राजा
देशक हेतै नव-ि‍नर्माण।
जनता पहि‍रए प्रेमक माला,
एकता धनसँ भऽ धनवान।।

जब हेतै नास्‍ति‍क गुण राजा
जनद्रोही हेतै सभ काम।
बि‍खरए जनता टुटल माला,
देश बनि‍ जाएत दुक्‍खक धाम।।

राज वि‍द्याक खेल नै जानू,
ई जगमे भारी वि‍ज्ञान।
जे गुनलनि‍ अछि‍ पाठ मानवताक
हुनके छन्‍हि‍ एकर पहि‍चान।।

राज वि‍द्याकेँ ओ की जानत
जेकड़ा हाथ लाठी भैंसबार।
लाठीसँ कहीं राज चलै छै,
राज चलाबए कलम तलवार।।

राज हुनकेसँ चलि‍ सकै छै,
जि‍नका रँगमे दानी खून।
स्‍वामी भाव अंग-अंगमे भरल होइ,
और भरल होइ सेवा गुण।

जेकर हाथ हमेशा नि‍चाँ,
उ बाबू नै कुर्सी जोग।
ऐ बुन्नकेँ शासनकर्मी,
ताकए घोटालाक संजोग।।

प्रजावत्‍सल्‍यकेँ जाने भाषा,
जनहि‍तमे बस टि‍कल होइ मन।
रोम-रोम जनताकेँ समर्पित,
और होइ अर्पित जीवन धन।।

जानै नै जे सेवा भाषा,
धन-धारण बस आखि‍री धून।
हाथ हमेशा जेकर नीचाँ,
उ की जनतै दानक गुण।।

मन रंगल होइ सत्‍य भावमे
तन चढ़ल नि‍ष्‍ठा केर वस्‍त्र,
एक हाथमे पालन डोर होइ।
दुजेमे रक्षा केर शस्‍त्र।।

चोरबा-चुति‍या हाथमे परतै,
जब-जब देशक शासन डोर।
लूट-मार चोरी डाका संग,
बलात बढ़तै लगा कऽ होर।।

सच्‍चा शासक हुनके जानू,
मानवतासँ रंगल होइ देह।
नीत-इमानक ताज चढ़ल होइ,
दि‍लमे होइ जन-जनसँ नेह।।

नि‍ष्‍ठाहीन जब शासक हेतै,
समझू देशक वि‍धाता बाम।
पहि‍या वि‍कासी पन्‍चार रहतै,
न्‍यायक रहतै चक्का जाम।।

लाज रहत तब राज ताजकेँ
ब्‍यापै नै एकरा त्रि‍वि‍ध ताप।
पाबै नै एकरा पुत्र प्‍यारा,
सतबै नै एकरा माए-बाप।।

आँखि‍ छोड़ि‍ कऽ कानपर देतै,
जब-जब देशक राजा जोड़।
भुख गरि‍बी सि‍र चढ़ि‍ बैसतै,
उफड़ा जकाँ उपलेतै चोर।।

शत्रु मि‍त्र नै ताजकेँ धरै,
छुबै नै एकरा सुन्‍दर नारी।
ताज नै पकड़ै जाति‍-धरमकेँ,
और नै टोकै पत्नी प्‍यारी।।

तन-मन मैला राजा हेतै,
समझू उ राजा अज्ञान।
रहै ि‍नरक्षि‍त राजक जनता,
देशसँ मेटेतै नीति‍ ज्ञान।

ताल जलै नै क्रोध आगि‍मे,
डुबै नै ई लोभक घोल।
काम मोह नै अहं सताबै,
वर्णा की रहतै एकर मोल।।

पद गौरवकेँ अंधा राजा,
और हेतै मनक वि‍कलांग।
सोना उपजै वाला खेतमे,
तब उपजतै गाजा-भाँग।।

तन अहाँक एक यंत्र मात्र छी, कुछ कराबू एहेन काम।
धरतीपर जे अमर कराबे, ऊँचा कराबै जगमे नाम।।
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
 १.जगदानन्द झा मनु- किछु गजल २.बाल मुकुन्द पाठक- किछु गजल ३.पंकज चौधरी (नवलश्री)- किछु गजल
   
    १.
   जगदानन्द झा मनु 
ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीह्टोंल, मधुबनी 

१.गजल   
हम चान लेबैलए बढ़लौं अहाँ रोकब तैयो तारा लेबै
 
मैथिलकेँ बढ़ल डेग नहि रुकत आब जयकारा लेबै
 

मिथिलाराज मँगै छी हम भीखमे नहि अधिकार बूझि
चम्पारणसँ दुमका नहि देब किशनगंज
 तँ आरा लेबै 

छोरलौं दिल्ली मुंबई अमृतसर सूरतकेँ बिसरै छी
 
अपन धरतीपर आबि नहि केकरो सहारा लेबै
 

गौरब हम जगाएब फेरसँ प्राचीन मिथिलाक शानकेँ
 
विश्व मंचपर एकबेर
 फेर पूर्ण मिथिलाक नारा लेबै 

उठू 'मनु' जयकार करू अपन भीतर सिंघनाद करू
 
फेरसँ निश्चय कए सह सह अवतार बिषहारा लेबै
     

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-२२)
 
  


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२.गजल

हमर कमाई कोन कोनामे परल अछि
 
मंत्री घरमे बैमानीक सोना गरल अछि
 

गरीब बनि गेल आई जब्बहकेँ बकरी
 
चिकबा धनिकाहा गामे गाम फरल अछि
 

डाका परै परोसमे जँ सुतलौं निचैनसँ
 
ई निश्चय बुझू आत्मा हमर मरल अछि
 

ढोंगी भक्तकेँ नहि निकलै रुपैया दानमे
 
भरि थारी लेने खंड माछक तरल अछि
 

शहर नहि 'मनु' गाम गामकेँ चौकपर
 
मनुखसँ सजि शराबखाना भरल अछि
 

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१६)


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३.गजल

बाबा पोखरिकेँ रौहक की कही
यादि अबैए बाबी हाथक दही

अशोक ठाढ़िसँ कूदि पोखरिमे
जाईठ छुबि कोना पानिमे बही

बनसी बनाबी कोना नूका कए
पूल्ली बनाबै लेल काटी खरही

छीन कs नानी हाथक मटकूरी
छोट-छोट हाथसँ छाल्ही मही

जखन अबैत गामक इआद
कनि-कनि कs हम नोरेमे बही

सभ सुख रहितो परदेशमे
माटिक बिछोह कते हम सही

मैरतो 'मनु' सभ सुख छोरि कs
मिथिलाक माटिपर हम रही

(सरल वार्णिक वर्ण, वर्ण-१२)


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४.गजल

घर-घर रावन आई बसल अछि
 
सौभाग्यक सीता कतए भसल अछि
 

करेजाक स्नेहकेँ मोल ने रहि गेल
 
सभहक प्रेम पाईमे फसल अछि
 

कर्तव्य बोध बिसरा गेल सभतरि
 
भ्रष्टाचारमे सभ कियो धसल अछि
 

बैमान बैसल अछि राजगद्दीपर
इमानक मीटर कते खसल अछि
 

देश समाज 'मनु' नहि कुशल आब
 
जमाए बनल आतंकी असल अछि
 

जगदानन्द झा 'मनु'
(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१४)
 



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५.गजल

किछु एहन काज करब हमहुँ
नै फोटोमे टाँगल रहब हमहुँ
 

एलहुँ जन्म लए कए दुनियाँमे
एक नै एक दिन मरब हमहुँ
 

कुकूर बिलाई जकाँ पेट पोसैट
आब जुनि ओहेन बनब हमहुँ
 

आगु बढ़ि नबका समाज बनाबि
नै पाछु आब आगू चलब हमहुँ
 

खाख छनि 'मनु' बहुत बौएलहुँ
 
आब अपने घर रहब हमहुँ
 

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण -१३)

बाल मुकुन्द पाठक
गजल
लोक कहैत छथि जे हम छी शराबी शराब पीबै छी
कियो बात मानै नै छी छै की खराबी शराब पीबै छी

हम तँ दिन राइत घुरिआइ छी मोन पाड़ि रहि रहि
हुनकर याद आएल बात घुराबी शराब पीबैत छी

एक दिन उ हमरा नजरमे बसेला प्यार जगेला
हम दिलकेँ हुनक प्यारमे दौड़ाबी शराब पीबै छी

कहियो गाछीमे बैस नयन मिलेला मोबाइलसँ बतियेला
दिन राति हुनक यादसँ अपनाकेँ सताबी शराब पीबै छी

उ अपन दुनिया बसेलाऽ हमरा पागल बनेला
हुनकर चक्करमे मुकुन्द भेलै शराबी शराब पीबै छी
हे भगवान अपन ताकत देखा दिअ
हुनका क्षण मे हमरा लग बजा दिअ

बहुत दिनसँ तरसैत छी प्रेम लेल
सोलहो श्रृंगार मे एहि ठाम पठा दिअ

दिन- राति आँखि सँ कोसी गंडक बहबौँ
बान्ह टूटल ई गामक गाम बहा दिअ

कानैत कानैत हमरा अहाँ हँसा दिअ
हुनको हमरे सन हालत बना दिअ

असगर बैसल नै नीन्न नै चैन आबै
मुकुन्द हमरासँ तँ गले लगबा दिअ

अहाँक बिना कोना कऽ रहबै हम
चाँन जकाँ मुँह नै बिसरबै हम

बड़ दिनसँ प्यासल छी मिलनले
सिन्धुक गहराइ मे डुबबै हम

अहाँ रुप केर भरल खजाना छी
तँए रुपक दीवाना बनबै हम

अछि मोरनी सन के चालि अहाँ के
अहाँक संगे नाँचि कऽ देखबै हम

ई मोन कहै छै एक ना एक दिन
अहाँ सँ कतौ नै कतौ भेटबै हम

मुकुन्द पुछैत अछि हे मृगनैनी
कहि दिन कनियाँ बनबै हम
अहाँक गेलासँ आब जिनगी एकारि लागै
हमरा तऽ एको दिन साल जकाँ भारि लागै

देह हाथ सुखल हमर केशोँ नै माथामे
अएनामे देखलासँ बड़का बेमारि लागै

खाइ पीयैमे हमरा किछो नीको नै लागैए
भात दालि कि खाएब निको नै सोहारि लागै

कि कहब हम बाबूकेँ केना देखेबै मुँह
पटनामे पढ़ल अनेरे मोन भारि लागै

देखै छी फोटो जौँ उ आर याद आबैत छथि
मुकुन्दकेँ अहाँ बिना रहल लचारि लागै
सरल वर्णिक बहार वर्ण-१६
पंकज चौधरी (नवलश्री)
गजल
एक नजरि हुनकर  पड़लै जे हमरा  पाँजसँ ससरल मोन
दूक्षण लेल भसियेलय जे से एखनो धरि नञि सम्हरल मोन

कात -करोटे ताकैत बस हुनके चारु दिस छइ पसरल मोन
सखी -बहिनपा संग ओझरायल देखिकऽ हुनका पजरल मोन

हुनके आँचरिके अऽढ भेलहुँ जिनका कनखीसँ कचरल मोन
सभ कतरा में प्रेमक -पोखरि सरस एना भेल कतरल मोन

मधुरिम आंइखसँ नेह पीबिकऽ नेह - धरा पर चतरल मोन
हुनकर नेहक अचल मेहसँ स्नेह - लता बनि लतरल मोन

सगर  बाट स्वागत  के सेहन्ते अलकतरा बनि पलरल मोन
स्पर्श  पाबिकऽ पैरक हुनकर मधुर छुअनसँ  सिहरल मोन

हुनका अबिते कोयली कुह्कल बनिकऽ फगुआ मजरल मोन
छोइड़ गेली ओ विरहक रउदी जड़ल-पाकल झखड़ल मोन

प्रेमक पोखरि लए छपकुनिया धिया -पुता सन उमरल मोन
स्वपनलोकमें भुतियाअल सन भूख-प्यास तक बिसरल मोन

गोह्न्छल -लोह्छल भेल मलीन कखनहु पित्ते अकरल मोन
सिनेह - दुलारक तइयो भूखल नञि दुलारसँ अभरल मोन

मुदा आब तऽ गप्पहिं दोसर धन -वैभव आँगन नमरल मोन
अइ कलयुगिया करिया- युग में भावहीन भेल भखरल मोन

सुख -सुविधासँ नेहक परितर दुःख -दुविधासँ हहरल मोन
"नवल" सिनेह केर करुण दशा ई देखि कष्टसँ कहरल मोन

*आखर-२५ (तिथि-०४.०४.२०१२)
काजरसँ शोभा आँखिक की आंखिसँ शोभित काजर
करिया  जादूसँ  केलक  सभके  सम्मोहित काजर

नजरि नञि ककरो लागय जादू - टोना छू- मंतर
डायनो -जोगिन के केलक मोन के मोहित काजर

लागै नजरि नें अपना की लेती प्राण अनकर ओ
फँसल मोन दुविधा में ई देख अघोषित  काजर

सम्हारल जेतै कोना कऽ ई भाव करेजक भीतर
परसैऽ प्रणय  - निवेदन  नैन  नवोदि  काजर

ई मेघो देखि लाजयल जे कारी खट-खट काजर
"नवल" कलंकक सोझा भऽ गेल अलोपित काजर

*आखर-१९

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१.विनीत उत्पल- गजल २.अनिल मल्लिक- दूटा गजल ३.अविनाश झा अंशु ४.किशन कारीगर- पंडा आ दलाल- (हास्य कविता)

विनीत उत्पल 
गजल
बाट जोगैत तँ आँखि पथराएल नै कहियो
प्रेम बिना जे जिनगी सरियाएल नै कहियो
अहाँक सुनि कऽ नाम किछु फुरैत नै हमरा 
लिखै-पढ़ौक लेल किछु फुराएल नै कहियो
 

अहाँक आवाज सुनि थरथराबैत छी हम
 
एहन मीठ बोल कियो सुनाएल नै कहियो
 

देखि कऽ अहाँक ओ मुखड़ा आ ओ सुनर नूर
 
चोन्हराबैत छै आँखि बिसुराएल नै कहियो
 

कहैत अछि उत्पल भाव लऽ कऽ ओ प्रेम संग
 
प्रेम करू वा नै करू, ई नुकाएल नै कहियो
https://mail.google.com/mail/images/cleardot.gif
सरल वार्णिक बहर वर्ण -१७

अनिल मल्लिक
गजल

हे राम पुछैत छी अहाँ सँ कहू किए दोष हमरा पर लादल गेल
जमीन मे समयलौं हम अपने की जीवीतेमे हमरा गाडल गेल

 
अहील्या सुखी छलौं पाथर बनी कS ने बेदना ने कोनो संबेदना छल
उद्धार केलौं किए की अपमान सही कहाँ ओहि दुष्ट के मारल भेल
 

हे श्याम सुन्दर हे मुरलीधर कहू प्रीत मे हमर कोन खोट छलै
बिरह अग्नी मे जरैत रहलौं हम किए प्रीत चिता मे जारल गेल

हे कृष्ण कहैत छलौं सखी हमरा बहीनक हमरा सम्मान भेटल
नोर बनी बहल दर्द हमर जखन पाँच पती सँ बिआहल गेल

हे बालकृष्ण अहि यशोदा के मातृत्वक बदला अहाँ किए अश्रु देलौं
 
गोकुल छोडि मथुरा गेलौं कहियो हाल पुछब से कहाँ आयल भेल

नारी पर अत्याचारक क्रम सुरुआत तहिए सँ भेल स्वीकार करु
नाक जे काटल सु्र्पणखा के कहू कोन न्याय सीद्धान्तक पालन भेल

इतिहास के अपन ईक्षा सँ सभ अपने तरह सँ लिखैत रहल
निधोक घुमैत अछि अन्यायी कहाँ समाज मे एहन के बारल गेल

गजल
चार पर सँ खसैत पानि ओरिआनी मे सँ बहैत रहै
 
ओहि मे जे बच्चा सभहक कागजक नाओ चलैत रहै
 

माँ खिसिआए कनि जलखै खा ले केओ कहाँ सुनैत छलै
गडै गैंची आ कबै माछ लेल पैनी मे बँसी पथैत रहै 

समय नेनपन के एक्को बेर ओह घुमि फेरो अबितै
सँगी बिनु ने दिन कटै बिन बातो केखनो लडैत रहै
 

आम तोडै सभ नजरि बचा कखनो मकै के बालि तोडै
पकडि लै त' कान पकडि क' बाबु के आगाँ लबैत रहै

जिनगी के खाता बही मे यादि के हिसाब लिखैत सभ छै
 
तहिआ ने छलै कोनो चिन्ता निफिकिर सभ घुमैत रहै
 

बितल बरख दशमी मे गेल छलौं हम गाम अपन
 
पोखरि पर ई बात चलल सपना सन लगैत रहै

(सरल वर्ण २१)
अविनाश झा अंशु
गजल
मूँह जाबि देलक आब हरियरी देतै
ई तानाशाही हमरासँ नै सहल जेतै
 

 
बेसी तंग केलक आब करब विरोध, 
हमर धक्कामे पत्ता जेना उड़िया जेतै
 

बदला लेब एहन जे राखत ओ मोन
दोबारा निकट एबाक हिम्मत नै हेतै

बेर-बेर पश्चाताप करत नोर बहा-बहा
आब तहियो ओकरा पर दया नै हेतै
 

घुमत नव जोगाड़ मे इम्हर उम्हर
आब कोनो मूँह जाबि लगाबऽ नै देतै

(बिना रदीफक गजल वर्ण -१५)

 
 

किशन कारीगर


  पंडा आ दलाल
              (हास्य कविता)

एकटा गप साफे बुझहू त
ई दुनू ममिऔते पिसिऔते छि
एकटा अछि जं पंडा
त दोसर अछि दलाल.

साहित्यों आब एकरा दुनू सँ
अछूत नहि रहि गेल
पंडा बैसल अछि पटना में
त दिल्ली में बैसल अछि दलाल.

सभटा साहितिय्क आयोजन में
रहबे करत एककर सझिया-साझ
हँ ओ में छि नहियों में छि
सभटा लकरपेंच लगाबै तिकडमबाज.

की दरभंगा आ की कलकत्ता?
सभ ठाम बैसल अछि तिकडमबाज
अपना-अपना ओझरी में ओझरौत
आ सुढ़िये नहि देत कोनो काज.

पहिने ई काज हमही शुरू केलौहं
बड़-बड़ बाजै भाषाई पंडा
धू जी एककर श्रेय त हमरा
ताहि दुआरे अपस्यांत भेल दलाल.

खेमेबाजी आ गुटबाजी केलक
सत्य बजनिहार के धमकी देलक
अपना स्वार्थ दुआरे ई सभ
भाषा साहित्यक सर्वनाश करेलक.

अपने मने बड्ड नीक लगइए
मुदा आई "कारीगर" किछु बाजत
कहू औ पंडा आ दलाल
एहेन साहित्य समाज लेल कोन काजक?

साहित्य समाज जाए भांड में
एकटा दुनू के कोन काज
साहित्यक ठेकेदारी शुरू केलक
ई दुनूटा भ गेल मालामाल.

 

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।



विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत
१.
ज्योति झा चौधरी



१.
राजनाथ मिश्र
चित्रमय मिथिला स्लाइड शो
चित्रमय मिथिला (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ )

.
उमेश मण्डल

मिथिलाक वनस्पति स्लाइड शो
मिथिलाक जीव-जन्तु स्लाइड शो
मिथिलाक जिनगी स्लाइड शो
मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव जन्तु/ मिथिलाक जिनगी  (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ )


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पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...