Saturday, September 15, 2012

'विदेह' ११३ म अंक ०१ सितम्बर २०१२ (वर्ष ५ मास ५७ अंक ११३) - PART XI



जगदीश प्रसाद मण्डल
११ गोट गीत

1.  आश प्रेम संग......
1.
आश प्रेम संग झूि‍म रहल छै
लाल टमाटर बाजि‍ रहल छै।
आश प्रेम......।

वन बीच सन्‍यासी जहि‍ना
झींक दऽ दऽ जात नचबै छै।
नि‍आस कहाँ छोड़ि‍ संग
चि‍क्कस बनि‍-बनि‍ भूमि‍ भरै छै।
आश प्रेम......।

लाल टमाटर बनि‍ सन्‍यासी
खटमीठ रूप धड़ैत रहै छै।
नै मीठ तँ खट्टो नहि‍येँ
अपन नाओं सुनबैत कहै छै।
आश प्रेम......।

गीत गीता गाबि‍ सन्‍यासी
भगवत भजन करैत रहै छै।
सबूर पाबि‍ सबर सबरी
मरि‍तो राम एबे करै छै।
आश प्रेम संग......।



2.  वि‍षय दस......
2.
वि‍षय दस ि‍सलेबस प्रवेश
दसो दि‍शा देखैत रहै छै।
त्रि‍भूज-ज्‍यमि‍ति‍ तहि‍ना
गीत व्‍यास गबैत रहै छै।
वि‍षय दस......।

सून अप्‍पन हि‍स्‍सा कहि‍-कहि‍
ठेहुन रोपि‍ अड़ल रहै छै।
अंकसँ हि‍साबो तहि‍ना
रथ जि‍नगी धि‍चैत चलै छै।
रथ जि‍नगी......।

आगू भलहि‍ं काटि‍-छाँटि‍
घटबी घाट बढ़ैत चलै छै।
होइत-हबाइत धकि‍या-धुकि‍या
हि‍स्‍सा अपन कहबैत चलै छै।
हि‍स्‍सा अपन.....।



3.  धर्मक फूल......
3.
धर्मक फूल फुलेबे करतै
बनि‍ फुलबाड़ी सजबे करतै
धर्मक फूल......।

सान धार बनबे करतै
काम-धाम बनबे करतै।
भीड़-कुभीड़ धाम बीच
असंख्‍य-शंख उठबे करतै।
धर्मक फूल......।

धड़ घनेरो धार घनेरो
रूप कृष्‍ण कहबे करतै
बान पकड़ि‍ वाणी बदलि‍
ि‍नसाँस-साँस भरबे करतै।
बनि‍ फुलबाड़ी सजबे करतै।
धर्मक फूल......।

सहस्र नाओं बनि‍-बनि‍
माला जप होइते रहतै।
कुरू-पाण्‍डु बीच सदएसँ
नाद-शंख कहबे करते।
नाद-शंख कहबे करतै।
हे यौ मीत,
धर्मक फूल फुलेबे करतै
फुलबाड़ी बनि‍ सजबे करतै।




4.  कि‍छु ने करै छी......

कि‍छु ने करै छी, मीत यौ
कि‍छु ने करै छी।
गेड़ू-चौक मारि‍ गनगुआरि‍ बनि‍
दि‍न-राति‍ रमल रहै छी।
मीत यौ कि‍छु ने करै छी।
जरि‍-मरि‍ गेल मन-कामना
समए संगम संग रमल छी
मीत यौ कि‍छु ने करै छी।
बोनक बाट आगू छै
उत्तरे-दछि‍ने धार बहल छै
घटि‍-घटि‍ घटि‍या घाट बनि‍
घोंटे-घोट पीबैत रहै छी
मीत यौ कि‍छु ने करै छी
ससरि‍-ससरि‍ ससरति‍ रहै छी
गाछ उतरि‍ धरती पकड़ि‍
लछमी-नाग कहबैत रहै छी
मीत यौ कि‍छु ने करै छी।



5.  अपने पाछू......

अपने पाछू बौआइत रहै छी
मीत यौ, अपने पाछू बौआइत रहै छी।
दि‍न-राति‍ ढहनाइत रहै छी
राति‍-दि‍न गनहाइत रहै छी
अपने पाछू बौआइत रहै छी
मीत यौ......।

पछुआ बनि‍ पछुआर पहुँचि‍ते
पेट-पीठ, पाँजर देखै छी
हड्डी छाती छि‍टैक‍-सि‍सैक
पखुड़ा बनि‍ सूर-तान भरै छी
पखुड़ा बनि‍ सूर-तान भरै छी
मीत यौ, अपने पाछू बौआइत रहै छी।
जुआ-जुआ, जुआ-जुआ
नांगड़ि‍ ऐँठि‍ चलैत रहै छी
लाद ऊपर लादि‍-लादि‍
टूटि‍-टूटि‍ गीरह बनैत रहै छी
मीत यौ, अपने पाछू बौआइत रहै छी
अपना के अप्‍पन बूझि‍-बूझि‍
अपने पाछू ओझराएल रहै छी
अपनापन भाव बि‍नु बुझि‍तो
अगुआर-पछुआर नाचि‍ रहल छी।
मीत यौ, अपने पाछू......।



6.  उठी-बैसी......
6.
हमर तेही मे नाम, हमर तेही मे नाम।
हमरा उठलेसँ काम, हमर बैसलेसँ काम
हमर तेहीमे नाम......।

उठी लेब कि‍ बैठी, बाजू-बाजू धड़-धड़ाम
उठी लऽ जँ बैसब, आ कि‍ बैठी लऽ जँ उठब
छुबि‍ते भरब पद पराम
हमर तेहीमे नाम, हमर तेहीमे काम।

खेल खेलाड़ी खेलि‍ खेल
बाल-बोध लि‍खबै छै नाम
खेल जि‍नगीक खेला-खेला
मृत-अमृत पाबि‍ सूरधाम।
हमर तेहीमे नाम हमर तेहीमे काम
हमरा उठले से काम, हमरा बैसले सँ काम।



7.  गर-मुड़......
7.
गर-मुड़ बोझ बनल छै
मीत यौ, गर-मुड़ बोझ बनल छै।
पाबि‍ धार साबे जेना
बाणि‍क बानि‍ धड़ैत रहै छै
कोमल-कि‍सलय कि‍छु ने बूझि‍
पछुआ रूप धड़ैत रहै छै।
पछुआ रूप......।
गर-मुड़.......।

तहक-तह तहि‍या-तहि‍यासँ
छल-छल छल्‍ली बनैत रहै छै
समटनि‍हार संगी जेहेन-जहि‍या
तेहने तेहेन बोझ बनै छै।
मीत यौ, तेहने-तेहेन बोझ बनै छै।
गर-मुड़ाह बोझ बनल छै।

गर-मुड़ाह ठनि‍-बनि‍-बनि‍
गर-मुड़ाह चालि‍ चलैत रहै छै।
गर-मुड़ाह गीत गाबि‍-गाबि‍
चालि‍ कोइली चलैत रहै छै।
चालि‍ कोइली.......।
मीत यौ.........।



8.  मनक बेथा......

मनक बेथा कहब केकरा, हे बहि‍ना
सभ दि‍नसँ होइते एलै।

बनि‍-बनि‍ बेथा कथा बनि‍-बनि‍
मरण-करण  बनैत एलै।
मृत-अमृत रगड़ि‍-रगड़ि‍
दीन राति‍ कहैत एलै।
मनक बेथा......।

खेरहा बनि‍-बनि‍ कथा-पि‍हानी
राति‍-दि‍न भूकैत एलै।
पेट वायु जहि‍ना भूकै छै
खरही खेरहा कहैत एलै।
मनक बेथा......।

मोटा तर देह थकुचा-थकुचा
पाड़ि‍ ठोह कनैत एलै।
कुहरि‍-कुहरि‍ कानि‍-कानि‍
आदि‍येसँ कहैत एलै।
मनक बेथा......।


9.  रहल नै......

रहल नै तकनि‍हार मीत यौ
नै रहल तकनाहार।

तकति‍यान अपने सि‍र चढ़ि‍-मढ़ि‍
रहल नै देखि‍नि‍हार, मीत यौ
रहल सभ दि‍न ताक तकैमे
धाक अपन पकड़ैपर।
जमि‍ते धाक धकेल-धकेल
ठेल खसाओल धरतीपर।
मीत यौ ठेल खसाओल धरतीपर
हेरि‍-हेर, हरणि‍ हरण
अबैत रहल बनि‍-बनि‍ अन्‍हार
घेरा-घेरि‍ मछार बान्हि‍-बान्‍हि
पटकि‍ बैस छातीपर।
मी यौ पटकि‍ बैस छातीपर।



10.       पकड़ि‍ समए......

पकड़ि‍ समए संकल्‍प नै ठानब
गति‍ कर्म पेबै केना?
बि‍नु बूझल बि‍नु बूलि‍ बटोही
घन-सघन बुझैत जेना।
पकड़ि‍ समए......।

ओर-छोड़ पकड़ि‍-पकड़ि‍
काम-कर्म पहुँचै जेना छै
संग श्रम-समए मि‍लि‍ तहि‍ना
सुफल-फल पाबै तेना छै।
पकड़ि‍ समए......।

बीच संगम श्रम ओ समए
खुशी-खुश खुशि‍आइ जेना छै
पाबि‍ संग संकल्‍प तहि‍ना
धर्म-कर्म सि‍रजैत चलै छै।
पकड़ि‍ समए......।

गनगनाइत कर्म गमगमाइत तहि‍ना
सागर-झील टपबे करै छै।
झील-झि‍लहोरि‍ सरोवर तहि‍ना
जि‍नगीक सान चढ़बे करै छै।
पकड़ि‍ समए......।



11.      सतरंग ऐ......

सतरंग ऐ संसारमे
समरस रंग धड़ैत रहै छै।
धार-कोन अन्‍हार-बि‍हाड़ि‍
राति‍-दि‍न पेबैत रहै छै।
सतरंग ऐ......।

कहि‍ सुलक्षण बनि‍ कुलक्षण
घटि‍या घाट घटैत रहै छै।
जुआ जोति‍ पछुआ पकड़ि‍
दब-उनार करैत रहै छै।
सतरंग ऐ......।

सि‍नेह सि‍नेहि‍ल सहरि‍-बहटि‍
गारा-जोड़ करैत रहै छै।
ि‍सर्जमान होइए जतए
काँट-गुलाब हँसैत रहै छै।
सतरंग ऐ......।

संग मि‍लि‍ मधुर डंक जेना
सूर-तान भरैत रहै छै।
रानी-बीच मधुरानी तहि‍ना
पान मधु करबैत रहै छै।
सतरंग ऐ......।

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१. राजदेव मण्‍डल २.ओमप्रकाश झा
राजदेव मण्‍डल
कवि‍ता-
घरक आँखि‍-

रहै छलौं केतबो व्‍यस्‍त
देखबाक अभ्‍यस्‍त
ठमकि‍ जाइत छल पएर
ठीक ओही स्‍थलपर सम्‍हारि‍
एकबेर झाँकि‍
घरक आँखि‍
मध्‍य ओ मोहक रूप
ठाढ़ भेल गुप-चुप
चि‍त्र आँखि‍मे चमकि‍ उठैत छल
मनक कण-कण गमकि‍ उठैत छल
कि‍छु दि‍नसँ भेल ि‍नपत्ता
बिनु देने अता-पत्ता
तैयो आदति‍सँ लचार भऽ
ठाढ़ भऽ गेलौं शून्‍यमे ओहि‍ना
जहि‍ना पहि‍ने छल तहि‍ना
ओ नै अछि‍
ई छी मनक खेल
ठमकि‍ ठाढ़ भेल तकै छी
ई हमरा की भेल
की हमरा आँखि‍मे
हुनक बास भऽ गेल
आकि‍ हमर आँखि‍ ओ रूप मि‍लि‍
एकेटा अकास भऽ गेल।



अभ्‍यास

नै ऐपार नै ओइपार
खसल छी मँझधार
पानि‍ अछि‍ अगम-अथाह
मनमे नि‍कलबाक चाह
डुमैत भसि‍आइत सम्‍हारि‍ रहल छी
उनटा धाराकेँ झमारि‍ रहल छी
छूटि‍ जाएत घर-पलि‍बार
टूटि‍ रहल अछि‍ मोह केर तार
जरूरी छलै धीरजसँ सीखब
बूझि‍ समझि‍ मनमे लि‍खब
कछेरमे केने रहि‍तौं हेलबाक अभ्‍यास
एना नै टुटैत हमर आस
पछताबासँ नीक
सेाचब आगू की हएत ठीक।
  

ओमप्रकाश झा
गजल

मदीनाक मालिक अहाँ ई करा दिअ
करेजा हमर बस मदीना बना दिअ

हमर मोन निश्छल भऽ गमकै धरा पर
कृपा एतबा अपन हमरा पठा दिअ

बनै सगर दुनिया खुशी केर सागर
सभक ठोर एतेक मुस्की बसा दिअ

दया केर बरखा करू ऐ पतित पर
मनुक्खक कते मोल हमरा बता दिअ

दहा जाइ दुनिया सिनेहक नदीमे
अहाँ "ओम" केँ प्रेम-कलमा पढा दिअ
बहरे-मुतकारिब
फऊलुन (ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ) - ४ बेर प्रत्येक पाँति मे

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१.लालबाबू मण्डल २.किशन कारीगर
लालबाबू मण्डल, सिरहा
जुलुश
जनताकेँ खाइला नै नून रोटी
नेता पीबए ह्विस्की-जूस
बुढ़ोमे नेता जुआन बनैए
जनताकेँ खा कऽ खुश
तइपर निकालै जनता जुलुश
जनता नुकैल डरे जेना
नुकैल बिलमे मुस।
अपने नेता फर्देबाल
घुमैए जापान, इण्डिया, रूस
तइपर निकालै जनता जुलुश
नेताकेँ कोठा सोफा
जनताकेँ टुटली मड़ैआ फुस
जनता सुतैए भुइयाँपर
काटि रहल अछि मच्छड़ भुस
तइपर निकालै जनता जुलुश
चिजबिज रहलासँ होइए
ठंढियोमे गरमी महसूस
कपड़ा नै भेलासँ जनता
मरैए माघ पूस
तइपर निकालै जनता जुलुश



किशन कारीगर




फोंफ काटि रहल सरकार
              (हास्य कविता)
रंग विरंगक डिग्री डिप्लोमा लेने
रोड पर घूमि रहल युवक बेकार
देशक कर्ता-धर्ता चुप्पी लधने छथि
आ फोंफ काटि रहल सरकार।

बुनियादी शिक्षाक दरस एक्को मिसिया ने
खाली किताबी ज्ञान देल गेल छैक
आ परीक्षा पास कए डिग्री लेने
घूमि रहल अछि युवक बेरोजगार।

ओकरा नहि कोनो लुड़ि-भास
तोतारंटत आ परीक्षा पास
बेबहारिक जिनगी मे फेल भ गेल
कियो भूखले मरै अहाँ के कोन काज।

परीक्षा प्रणाली आ पाठ्यक्रम एहेन किएक
अहिं फरिछा के कहू औ सरकार
फुसियाँहिक डिग्री डिप्लोपा कोन काजक
कतेक लोक एखनो अछि बेकार।

कुर्सी पर बैसल छी त कोना बुझहब
कि होइत छैक लाचारी आ बेकारी
रोजगारक अवसर बंद केलियै
कतेक बढ़ि गेल अछि बेरोजगारी।

अहिंक पैरवी पैगाम सँ
अलूइड़ लोक सभ के नोकरी भेट गेल
मुदा मेहनत क पढ़निहार सभ
पक्षपात नीति दुआरे बेकार भ गेल।

दू टा पद दू लाख आवेदन कर्ता
एकटा पद मंत्री कोटा सँ
विज्ञापन पूर्व फिक्स भेल अछि
बिधपुरौआ परीक्षा टा करौताह।

मेहनत क ईमानदारी सँ
लिखित परीक्षा पास क लेब
मुदा इंटरव्यू मे अहाँ के
तेरह डिबिया तेल जरतौह।

ईमानदारी पर अड़ल रहब कारीगर
त इंटरव्यू मे कैंची चलत
योग्यता रहैतो अहाँ भ जाएब बेकार
मुदा फोंफ काटि रहल सरकार।।                        

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
चंदन कुमार झा
गजल


जीवन छै बड़ सुखकर जँ दूर सँ देखबै
भेटत अगनित विर्रो जँ लगीच सँ जँचबै

सदिखन समयक संग चलै छै सुख-दुख
कहू अहीँ एहि फेरी सँ फेर कोना के बचबै

बैसारी के सुख सदति क्षणभंगुर होइ छै
भऽ जायब अस्तित्वहीन जँ श्रम नहि करबै

किएक तकै छी बाट अहाँ अप्पन मरण के
चलबै जँ कर्म-मार्ग त' अमर बनि रहबै

"चंदन" जिनगी सतरंगी भरले प्रकाश सँ
नजरि कोना के आओत मुनि नयन जँ रहबै

बितलै धुरिया साओन सुखले भदबरिया
आब कोना के कटतै ई जिनगीके अन्हरिया

खेतकेर दड़ारि देखि फटलैक करेजिया
गुजरक आस बचलै एक्कहिटा बहरिया

सुखले सगरो बाट-घाट इनारो-पोखरिया
ई के बड़का धूर पर मारै छैक ओंघरिया

परले परती खेत आ' उपटल विरार छै
उपजल छै मंहगी आ' हरियेलै बेपरिया

झलकै हड्डी देहक आर ऐंठलै अंतरिया
भुक्खे-प्यासल ओगरै महाजनक दुअरिया

नै बरिसलै पछबा ने बरिसलै पुबरिया
"चंदन" आब टाँगले हथिए पर नजरिया

---------------वर्ण-१७---------------

राँड़ी बेटखौकी करय ने आबय हमरा
तैँलोक कहैत छै हम रचैत छी फकरा

हमरा सन मूढके कोना देतै से इज्जति
भए गेलैए ज्ञान दूइ आखर के जकरा

हम बकरी बनले छी मैँ-मैँ मेमियाइते
' खुरछारी काटि रहलैए जेना झबरा

हम तकैत छी पंच फरिछौटक खातिर
ओ खरखरिया बजबै जे बझतै झगड़ा

बेशी बुधियारी ब्याधिक कारण छै "चंदन"
हकरी लागल कहि-कहि कहबै ककरा

----------------वर्ण-१६-------------


 
नौ महिना धरि कोखि मे रखलौ
'त पीड़ा सहि हमरा जनलौ

अपना छाती केर दुध पियाकऽ
आँचर तर मे हमरा पोसलौ

हमरा कनियो कष्ट हुए नहि
राति-राति भरि ताहिले जगलौं

कखनो जँ मारल मुँह ठुनका
ठुनकि-ठुनकि कऽ संगे कनलौं

जँ हम रूसि-फुलि कोनटा बैसी
सुग्गा-नेन्ना कहि-कहिकऽ बौंसलौं

नीक कहै केयो केयो अधलाहे
अहाँक नजरि मे नीके रहलौं

अहाँ तऽ ममता बुझि के बाँटल
हम बुझलौं जे अहाँ के ठकलौं

अहीँक देल संसार पाबि केर
अहीँक लेल हम कूड़ी फँटलौं

"चंदन" हमछी कते अभागल
मायक महिमा बुझि नै सकलौं

------------वर्ण-१२-----------


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'विदेह' २२८ म अंक १५ जून २०१७ (वर्ष १० मास ११४ अंक २२८)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -  गौरी चोरनी ,  गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर ...