Saturday, September 15, 2012

'विदेह' ११३ म अंक ०१ सितम्बर २०१२ (वर्ष ५ मास ५७ अंक ११३) - PART X


३. पद्य








३.७.१.जगदानन्द झा 'मनु'  २.राजेश कुमार झा (कन्हैया) ३.शशिधर कुमर- पूणा प्रवास

३.८.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल’- की भेटल आ की हेरा गेल  (आत्म गीत)- (आगाँ)२.सत्यनारायण झा- ओहिना मोन अछि ओ दिन
१.अनामिका राज- नवका बाट २.नगीना कुमारी झा३.इरा मल्लिक- गीत
अनामिका राज
जन्म तिथि ०७.०५.१९८६, शिक्षा एम.एस.सी. वनस्पति विज्ञान, गाम- विषनपुर (खगड़िया), पिता- दामोदर राम (प्रोफेसर भौतिकी विभाग), पति- अशोक राज (परीवीक्षण अधिकारी, पंजाब नेशनल्ल बैंक, खगड़िया)। विशेष: मैथिली नाटकमे अभिनय।

नवका बाट
आशा आ विश्वासक
बीचमे फाँसल,
गर्त होइत जिनगी भोगनिहार
दुइये लोक होइछ
बोनिहार आकि नारी!
दुनू सामन्त कि पूँजीवादी द्वारा
भोगबाक चीज
बनि रहि जाइछ
भोगनिहार एकर
मर्दन करैत
अपन पुरुषारथ देखेबाक
माउग प्रयास करैए।
आब उलटबासी
काज करए लागल अछि।
फूटए लगलैए बोल
बोनिहारक
कमा कऽ घर चलबै
जोगरक भऽ गेल अछि नारी
अगिला बाट
एकरे हाथमे आबि कऽ
अटकि गेल अछि।
नगीना कुमारी झा 
साहसक डोरी

बहुत भऽ गेल सभक अत्याचार
नै सहि सकब आब आइ अपराध
कतेक सहि कऽ नोर झाइर हम बैसू
आँखिक गहना कतेक हम सुखाउ

सभक बात रहलै एहने सभ दिन
कहियो नैने भेल गेल परिवर्तन
जीवनक धारक बाट भेल दू तीर
काटो सँ बेसी बिझल बोलीक तीर

नै चाहितो भरियाक भेल छी भार
नै सोची तँ फसल छी जीवनक जाल
ऋण पहाड़ बनि रहल कर्तव्यक
उपहास उठि रहल लिखल भवितव्यक

डरक मारल भऽ नै जीबि सकब
सिमरक रुइ जकाँ नै उड़ि सकब
बहुत सभाक उपहास सहलौं आब नै
बहुत सँ मोनक चोट खेलौं आब नै

रीतिक बन्धन सीमा देखु नंघाओल
मोनक बोझक भारी तैयो रहि गेल
देखियौ साहसक डोरी तँ आब टुटि गेल
सभक कर्जा सेहो उधारे अपने रहि गेल

मोन पड़ैए

मोन पड़ैए ओ गोरहा आ ओ चेरा
सब जरि रहल खूब, धाह दऽ रहल
ओ चिन्बारक चुलहाक धधकैत आगि
मोन पड़ैए ओ विवश एक नारी
ढहल गोरहा सन रहथि ओ बेचारी
फाड़ल चेरा सन जीवनक हुनक साड़ी
सन्दुकक पौआ संग बन्हल ओ अबोध
शाइद ओकर चिचियाहटिमे छल प्रतिशोध
शाइद ओ छल दूर मायक दसधार दूध
मोन पड़ैए ओ चकला आ बेलना
गोलमटोल सुप भरिक गेटल सोहारी
अपना लेल ओ ठोकती मरुआक रोटी
मोन पड़ैए फेर ओ सन्दुकक पौआ
तड़सैए ओ जीवन अन्तिम क्षण, जेना
शाइद ओ सोछए अइमे हमर दोष कोना?

दहेज प्रथा

नओ महिना दुख झेल माय गर्भ्वती भेली
आश करैत पुत्र केर जन्मा लेल बेटी
सपना टुटल देखि बाबु माथ पर हाथ धेला
कर्म जरल सोचि अपन भाग्यकेँ सरापता
धीयाक जन्म घरमे बढय लगल चिन्ता
बढ़ैत बेटीक उमेर धेल्कन्हि बिआहक चिन्ता
धीयाक स्वरुप अछि कम नै अप्सरा
लेकिन मारैए बेटी बलाकेँ दहेज प्रथा
केकर दोष देब आह कहू मैथिल समाज
पढ़ि लिखि धीया बनल अछि सर्व गुणी
काका घुमता गाम गाम ताकबाक लेल जमाय
बाबू झमारि खसता सुनि बड़द सँ वरक महगी
वाह मिथिलाबासी अहाँकेँ कोना करी बखान
उपहार स्वरुप अहाँ देलौं दहेज प्रथाक नाम
शाबाश अहाँकेँ, बनबैत छी बेटी बलाकेँ बदनाम
वाह कि गौरव बेटाक मोलमोलाइ करी तँ
लाज शर्म मर्यादा मनवाताकेँ भूली कि करै छी
मानव भऽ मानवक तनिको दुखक आभाष नै करै छी
स्वार्थमे डुबी अबला बना नारीकेँ शूलीपर चढाबै छी
हर समय दृश्यमे नारीकेँ किए कुदृष्टिसँ देखै छी
निर्मल सीतापर किए शंका करै छी
दुःशासन दुर्योधन सँ द्रोपदी केँ किए नै बचबै छी
शंका आ बदनामी हुनकर बड़का अपमान
सभ दर्द सहथिन मुदा नै कलंकित अपवाह
सुनु ध्यानसँ अहूँ सभ छी एकटा बेटीबला
अए केहन प्रथा बोझ बनेलक बेटीक समान धिया
बेटा बला सँ अनुरोध दहेजक करी विरोध
नै लेब नै देब कहि कऽ आबो करी अस्वीकार


इरा मल्लिक
गीत
-----
अहाँ कहै छी ,
बैसू लगमे, नीक लगैए।
नेह नयन निहारब सजना,
बड नीक लगैए।
हाथ केँ हाथ सँ साथ मिलल,
जखन पयलौँ नेह अहाँके,
जीवन डोर मे बान्हि पिया,
सोहागिन बनलौँ अहाँके,
अहाँ हँसै छी सौँसे घर आब ,
झिलमिल चाँद लगैए,
 
नेह नयन निहारब सजना,
बड नीक लगैए।
सुध बुधि नै अछि अपन आब तेँ,
मुखड़ा देखि अहाँके,
सिंगार अहीं छी,
साज अहीं, पिया!
प्यार बसल अँगनामे,
अकछ करै छी पिया हमरा,
तहियो बड नीक लगै छी,
घर मे होली, दशमी, दिवाली,
निशदिन आब लगैए।
अहाँ कहै छी,
बैसू लगमे, बड नीक लगैए।
नेह नयन निहारब सजना,
बड नीक लगैए।

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१.पंकज चौधरी नवलश्री - गजल २.राम वि‍लास साहुक कवि‍ता-रौदी३.प्रमोद रंगीले

पंकज चौधरी नवलश्रीस्थायी पता : (s/o-श्री भागेश्वर चौधरी), गाम-सुगौना, भाया-राजनगर, जिला-मधुबनी, (मिथिला), बिहार-८४७२३५   
पत्राचारक पता : (c/o-श्री मोहन चौधरी ), एच-१९४ (प्रथम तल), प्रताप विहार, सेक्टर-१२, जनपद-गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश-२०१००९ 

गजल

किछु फुरा नञि रहल की करी नञि करी अनचिन्हार के कोनाकऽ मनाएल जाय
 हमर के  हेती हम  हुनकर के छी ई सरोकार कहुना तऽ फरिछाएल जाय

हुनक आंखि लाजे
 धंसल  जा रहल  शब्द ठोढ़क थरथरी में फँसल जा रहल
ओ बजती ने किछु हमरा
 टोकने  बिना ई गप्प कोन ब्योंते फेर अगुवाएल जाय

आंखि हुनका सँ जखने मिला हम लेलौं कारी पोखरि में लागल बिला सन गेलंहु
ने
 रातुक  पहर  ने  तरेगन  उगल   भ्रमित मोन जगले में सप्नाएल जाय

भने
 छलियै  बान्हल  नयन मेहसँ नञि तऽ उधिया कऽ खसितउं हुनक नेहसँ
कते
 काल हेललहुं मगन आंइख में  आब करेजा में सेहो तऽ सन्हियाएल जाय

नहि जानि कोना ई कखन भऽ गेलय छलय अनचिन्हार जे से अपन भऽ गेलय
दू क्षण में कए जीवन
 के ललसा पुड़ल ई सच में भेलै कोना पतियाएल जाय

अपन
 मोन  पर  अपने  अधिकार नञि आब हुनका बिना हमहूँ चिन्हार नञि
हुनके सँ
 छइ अथ-श्री इति-श्री "नवल"  प्रेम में ई मगन मोन भसियाएल जाय

*आखर-३१

राम वि‍लास साहुक कवि‍ता-

रौदी

माथपर हाथ धेने
खेति‍हरक आँखि‍सँ गि‍रलै नोर
धरती सुखलै धान जरलै
खेतमे फटलै दरारि‍
सुखले साउन-भादौ बि‍तलै
खेति‍हरक नसीब फुटलै
खेतसँ उड़ै छै धूल
जरैत खेत देखि‍ दि‍ल जरैत
जरि‍ गेलै सबहक तकदीर
की खेबै अपना
की खेतै धि‍या-पुता
सोगसँ घटलै शरीर
पूर्वा-पच्‍छि‍या फोंक गेलै
सभ नक्षत्र बनलै ठक
ऋृतु बदललै मौसम बदललै
धतरीक दरारि‍ फटले रहलै
पानि‍ बि‍नु सभ जीब
तेजै छै नि‍त्‍य परान
रौदी-दाही बहुते देखलौं
एहेन जुलुम कहि‍यो नै देखलौं
अछैतै ओरूदे गेलै परान
ई मुसि‍बत के हरि‍ लेतै
जखन भगवान, सरकार
दुनू बेमुख बनल छै
खेति‍हारक दुख के पति‍एतै
मांगै छै पानि‍ तँ
डीजलक अनुदान भैटै छै।
प्रमोद रंगीले
नेताजी जिन्दावाद
नेताजी मंचप भाषण दऽ रहलए
सभ दिनक काज ओ कऽ रहलए।
भाषण सुनैत सुनैत एकटा अभागल,
उठल गडगडाकऽ जेना भऽ गेल पागल ।
कनिक देर मनकेँ शान्त कऽ कऽ सहलक ।
तहन जाकऽ मनक बकार फोड़लक।
रौ तोरा सँ वढ़ियाँ कुत्ता........।
सुनबिही कखन जखन लगतौ जुत्ता।
दोसरक माल खा खा कऽ बढालेलेँ पेट।
यएह कारण सँ घटल छौ तोहर रेट।
नेताजी पहिने घबड़ाएल, कनिक धड़फड़ाएल,
तहन जाकऽ मेकमे गड़गड़ाएल।
देखियौ देशमे शान्ति लाइब देली।
पैसा केँ लुटएला भलेही मुँह बाइब देली।
देश एखन राहतक साँस लऽ रहल छै।
भलेही कर्सी आन्दोलन भऽ रहल छै।
देखियौ शिक्षा कतेक आगू भागि गेल।
भले शैक्षिक संस्थामे ताला लागि गेल।
देखियौ विदेशमे बहुतकेँ रोजगारी लगा देली।
भलेहि अपन देशकेँ रोजगारीक पैसा खा गेली।
देखियौ सभतैर बिजलीबती मिल गेल छै।
भलही बिजली बिलमे जनता सभ हिल गेल छै।
देखियौ अपन देशक गरीबी मिट गेल।
भलेहि धनीकहा सभ दस महला पिट गेल।
हमरा जीता देब तँ हम आउर विकास लाएब
ओइमे सँ पचहतर परसेन्ट मात्रेेे खाएब।
अहाँ सभकेँ खुश राखक हमर वादा अइ।
बुझि गेली हमर कि इरादा अइ।
वेवकुफ जनता आउर वेवकुुुफ भऽ गेल।
गलती ओ कऽ कऽ सभ क्रेडिट लऽ गेल।
भाग्य यएह रहत कतनौ होउ बरबाद
प्रेम सँ कहू नेताजी जिन्दावाद ।


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'विदेह' २२८ म अंक १५ जून २०१७ (वर्ष १० मास ११४ अंक २२८)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -  गौरी चोरनी ,  गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर ...