Saturday, September 15, 2012

'विदेह' ११३ म अंक ०१ सितम्बर २०१२ (वर्ष ५ मास ५७ अंक ११३) - PART V



बेचन ठाकुर
बाप भेल पि‍त्ती
(महान सामाजि‍क मैथि‍ली नाटक)
पहि‍ल अंक
दृश्‍य- एक


     (स्‍थान- लखनक घर। दलानपर लखन, लखनक कक्का मोतीलाल, भाए बौहरू बड़का बेटा मनोज आ छोटका बेटा संतोष उपस्‍थि‍त छथि‍। लखन चि‍न्ति‍त मुद्रामे छथि‍। सभ कि‍यो चौकीपर बैस वि‍चार-वि‍मर्श कए रहल छथि‍। बारह वर्षीय मनोज आ दस बर्षीय संतोष दलानपर माटि‍-माटि‍ खेल रहल अछि‍।

मोतीलाल-     लखन, चि‍न्‍ता-फीकीर छोड़ू। की करबै? भगवानकेँ जे मर्जी होइत अछि‍, ओकरा के बदलि‍ सकैत अछि‍? अहाँ कनि‍याँकेँ एतबे दि‍नका भोग छेलै। आब अहाँक की वि‍चार भऽ रहल अछि‍?

लखन-       कक्का, अपने सभ जे जेना वि‍चार देबै।

मोतीलाल-     हम सभ की वि‍चार देब? पहि‍ने तँ अहाँक अपन इच्‍छा।

लखन-       दूटा छोट-छोट बौआ अछि‍। ओकर पति‍पाल केना हाएत? जँ कुल-कनि‍याँ नीक भेटत तँ दोसर कऽ लइतौं।

मोतीलाल-     भातीज, अहाँक नीक वि‍चार अछि‍। ऐ उमेरमे अहाँक ि‍नर्णए हमरो उचि‍त बुझना जाइत अछि‍।

बौहरू-       कक्का, एगो कहबी जे छै ‘सतौत भगवानोकेँ नै भेलै’ से?

मोतीलाल-     बौआ, तोहर की कहब छह? लखनकेँ बि‍आह नै करबाक चाही की?

बौहररू-      हँ, हमर सहए कहब रहए। भैया कनी ति‍याग कऽ दुनू छौंराकेँ पढ़ा-लि‍खा कऽ बुधि‍यार बनाबि‍तथि‍। ओना भैयाकेँ कनि‍याँ केहेन भेटतनि‍ केहेन नै।

मोतीलाल-     हमरा वि‍चारसँ लखनक परि‍स्‍थि‍ति‍ बि‍आह करैबला अवस्‍स अछि‍।

लखन-       कक्का, नजरि‍मे दऽ देलौं। जदी सुर-पता लगए तँ जोगार लगाएब।

मोतीलाल-     बेस देखबै।

पटाक्षेप।


दृश्य- 2

(स्‍थान- मदनक घर। ओ अपन बि‍आहल बेटीक बि‍आहक चि‍न्‍तामे लीन छथि‍। कातमे पत्नी-गीता दलान झाड़ि‍ रहल छथि‍। मोतीलालक समधि‍क समधि‍ हरि‍चन मोतीलालकेँ मदनक ऐठाम कुटुमैतीक संबंधमे लऽ जाए रहल छथि‍। हरि‍चन मदनक ग्रामीण छथि‍ हि‍नका दुनूक पहुँचैत मातर गीता घोघ तानि‍ अन्‍दर चलि‍ जाइत छथि‍। दलानपर तीन-चारि‍टा कुर्सी लागल अछि‍। मोतीलाल आ हरि‍चनक प्रवेश।)

हरि‍चन-      (कर जोड़ि‍) नमस्‍कार मदन भाय।

मदन-        नमस्‍कार नमस्‍कार।

मोतीलाल-     नमस्‍कार कुटुम।

मदन-        नमस्‍कार नमस्‍कार। बैसै जाइ जाउ।
(दुनू जन बैसलाह।
संजय, संजय, बेटा संजय, संजय।

संजय-       (अन्‍दरसँ) जी पि‍ताजी, हइए ऐलौं। (संजयक प्रवेश।)

           (हरि‍चनकेँ मदन पकड़ि‍ कऽ अंदर लऽ जाइत छथि‍।)

मदन-        लड़ि‍काकेँ बेटा दुगो छै आ अस्‍था-पाती?

हरि‍चन-      गोटेक बीघाक अन्‍दरे छै। अपना भरि‍ कोनो दि‍क्कत नै छै।

मदन-        की करी की नै, कि‍छु नै फुराइए।

हरि‍चन-      हमरा सभकेँ लट होइए। यदि‍ वि‍चार हुअए तँ हुनका लड़ि‍की देखाए दि‍यनु। नै तँ कोनो बात नै।

मदन-        बेस अपने दलानपर चलू। हम बुच्‍चीकेँ लेने आबै छी।
(हरि‍चन दलानपर आबि‍ गेलाह कि‍छुए काल बाद मदन सेहो आबि‍ गेलाह।)

मदन-        चलू, देखल जेतै। कऽ लेबै। आगू भगवानक मर्जी। हम लड़ि‍कीक बाप छि‍ऐ। तँ हमरा लड़ि‍का देखबाके चाही। मुदा हम सभ दि‍न अहाँपर वि‍श्वास करैत रहलौं। आइ कोना नै करब?

हरि‍चन-      हम अहाँक संग बि‍सवासघात केलौं?

मदन-        से तँ कहि‍यो नै। ओना दुनि‍याँ बि‍सवासेपर चलै छै।
(वीणाक संग मीनाक प्रवेश। मीना सभकेँ पएर छूबि‍ गोर लगैत अछि‍।)

हरि‍चन-      कुर्सीपर बैसू बुच्‍ची।
(मीना कुर्सीपर बैसैत अछि‍। वीणा ठाढ़े अछि‍।)
मोतीलाल बाबू, लड़ि‍कीकेँ कि‍छु पूछबो करबनि‍, तँ पुछि‍यौ।

मोतीलाल-     की पुछबनि‍, कि‍छु नै।

हरि‍चन-      बुच्‍ची अहाँ चलि‍ जाउ।
(मीना सभकेँ गोर लागि‍ अन्‍दर गेलीह।)

मदन-        हरि‍चन भाय, लड़ि‍की अपने सभकेँ पसीन भेलीह?

मोतीलाल-     हँ, लड़ि‍की हमरा लोकनि‍केँ पसीन अछि‍।

मदन-        तहन अगि‍ला कार्यक्रम की हेतै?

हरि‍चन-      जे जेना करीऔ। ओना हम वि‍चार दैतौं जे बि‍आह मंदि‍रमे कऽ लैतौं। चीप एण्‍ड बेस्‍ट।

मदन-        कहि‍या तक?

हरि‍चन-      कहि‍या तक, चट मंगनी पट बि‍आह। काल्हि‍ये कऽ लि‍अ। बढ़ि‍या दि‍न छै। कुटुमैती लगा कऽ नै रखबाक चाही।

मदन-        भाय, ओरि‍यान कहाँ कि‍च्‍छो छै?

हरि‍चन-      जे भेलै सेहो बढ़ि‍या, जे नै भेलै सेहो बढ़ि‍याँ। आदर्शेमे आदर्श।

मदन-        बेस, काल्हुके रहए दि‍औ।

हरि‍चन-      जाउ, जे भऽ सकए, ओरि‍यान करू। हम सभ सेहो जाइ छी। जय रामजी की।

मदन-        जय रामजी की।
(हरि‍चन आ मोतीलालक प्रस्‍थान।)
होनी जे हेबाक हेतै, सएह ने हेतै। आप इच्‍छा सर्वनाशी, देव इच्‍छा परमबल:।

पटाक्षेप।



दृश्‍य- 3
(दूश्‍य- लखनक बरि‍आतीक तैयारी। वर-लखन, मोतीलाल, बौहरू, मनोज आ संतोष मदनक ओइठाम जा रहल छथि‍। मदन अपन घरक कातमे एकटा शि‍व मंदि‍रक प्रांगणमे बि‍आहक पूर्ण तैयारी केने छथि‍। सात गोट कुर्सी आ एक गोट टेबूल लगल अछि‍। पंडीजी गणेश महादेवक पूजा कए रहल छथि‍। मदन, मीना, गीता हरि‍चन, संजय आ वीणा मंदि‍रक प्रांगणमे थहाथही कए रहल छथि‍ तथा बरि‍यातीक प्रतीक्षा कए रहल छथि‍। मीना कनि‍याँक रूपमे पूर्ण सजल अछि‍। बरि‍याती पहुँचलाह। डोलमे राखल पानि‍सँ सभ बरि‍याती हाथ-पएर धोइ कऽ कुर्सीपर बैसलाह आ लखन बरबला कुर्सीपर बैसलाह। बापेक कातमे एक्के कुर्सीपर मनोज आ संतोष बैसलाह। मदन प्रांगणमे आबि‍ जलखैक बेवस्‍था केलनि‍। सभ कि‍यो जलखै कऽ रहल छथि‍।)

मनोज-       पापा, पापा, नाच कखैन शुरू हेतै?

लखन-       धूर बूरबक, अखैन कि‍छु नइ बाज। लोक हँसतौ।

मनोज-       कि‍अए हौ, लो हँसतै तँ हमहूँ हँसबै। कहऽ न नटुआ कखैन औतै?

लखन-       चुप चुप, नटुआ नै कही। लड़ि‍की औतै।

मनोज-       कए गो लड़ि‍की औतै? कार्केस्‍ट्रा कखैन शुरू हेतै? लड़ि‍की संगे हमहूँ नचबै, गेबै आ रूमाल फाड़ि‍ कऽ उड़ेबै। पापा हौ, लड़ि‍कीकेँ कहबै खाली रेकाँडि‍ंगे हांस करैले। अगबे भोजपूरीयेपर।

लखन-       चूप बड़ खच्‍चर छेँ रौ। आर्केस्‍ट्रा नै हेतै। डंस नै हेतै।

मनोज-       तखन एतए की हेतै हौ पापा?

लखन-       हमर बि‍आह हेतै बि‍आह।

संतोष-       पापा हौ, तोहर बि‍आह हेतै आ हमर नै।

लखन-       हँ हँ, तोरो हेतै।

संतोष-       कहि‍या हेतै?

लखन-       नमहर हेबहीन तहन हेतौ।

संतोष-       हम नमहर नै छि‍ऐ। एत्तेटा तँ भऽ गेलि‍ऐ। आब बि‍आह कहि‍या हेतै?

लखन-       बीस साल बाद हेतौ।

संतोष-       बीस साल बाद बुढे भऽ जेबै तँ बि‍आह कए कऽ की हेतै? हम आइये करब।

लखन-       आइ तोरा ले लड़ि‍की कहाँ छै?

संतोष-       आँइ हौ पापा, तोरा ले लड़ि‍की छै आ हमरा ले नै छै। केकरोसँ कऽ लेबै।

लखन-       केकरासँ करबि‍हीन?

संतोष-       मौगी सभ औतै न तँ ओइमे जे सभसँ मोटकी मौगी हेतै, ओकरेसँ करबै। दूधो खूब पीबै नम्‍हरो हेबै आ मोटेबो करबै। पापा हौ, हमरा लोकनि‍यामे तोरे रहए पड़तह।

लखन-       बेस रहबौ बौआ।
(जगमे पानि‍ आ गि‍लास लऽ कऽ संजयक प्रवेश। सभ कि‍यो पानि‍ पीलनि‍ आ हाथ-मुँह धोइ अपन-अपन जगहपर बैसलाह। पंडीजी पूजा पूर्णाहुति‍क पश्चात बर लग बैस जलखै केलाह।)

गणेश-       अहाँ सभ वि‍लंब कि‍अए करै छी? बि‍आहक मुहुर्त्त हुसि‍ रहल अछि‍। हौ, हौ, जल्‍दी चलै चलू। कोनो चीजक टेम होइ छै कि‍ने?
           (लड़ि‍कीक संग सरयातीक प्रवेश। सभ कि‍यो मंदि‍रपर गेलाह। सतहपर बि‍छाएल दरीपर बैसलाह।)
गणेश-       आउ लड़ि‍का-लड़ि‍की, हमरा लग बैसू।
(लखन आ मीना पंडीजी लग बैसैत छथि‍। पंडीजी दुनूकेँ अपन रामनामबला चद्दरि‍ ओढ़ा दैत छथि‍न। दुनूकेँ हाथमे अरबा चाउर आआेर कुश दइ छथि‍न।)

गणेण-       लड़ि‍का-लड़ि‍की पढ़ू-
मंगलम् भगवान विष्‍णु, मंगलम् गरूड़ध्‍वज:
           मंगलम् पुण्‍डरीकाक्ष मंगलाय तनोऽहरि‍:।।

लखन, मीना-   मंगलम्.....।

           (पंडीजी तीन बेर ई मंत्र पढ़ा कऽ अपना बगलमे राखल सेनूरक पुड़ि‍यामे सँ एक चुटकी सेनूर लड़ि‍काक हाथमे देलनि‍।)

गणेश-       बि‍आहक मुहुर्त्त बीति‍ रहल छल। तँए हम एक्केटा मंत्र बि‍आह करा दै छी। आब सि‍न्‍दुरदान होइए।
लड़ि‍का, लड़ि‍कीक मांगमे सेनूर दि‍अनु।
           (लखन मीनाक मांगमे सेनूर देलनि‍।)
आब अपने सभ दुर्वाक्षत दि‍अनु।
(पंडीजी पैघ सबहक हाथमे दुर्वाच्‍छत देलखि‍न।)
मंत्र- ऊँ. अाब्रह्न ब्राह्मणो।

मि‍त्राणामुदयस्‍तव।
(मंत्रक बाद सभ कि‍यो लड़ि‍का-लड़ि‍कीकेँ दुर्वाक्षत देलखि‍न।)
लाउ, दुनू समधि‍ दक्षि‍णा-पाती। सस्‍तेमे अहाँ सभ नि‍महि‍ गेलौं।
(दुनू समधि‍ एकावन-एकावन टका दक्षि‍णा देलखि‍।)
इएह यौ, एक्को कि‍लो रहुक दाम नै। खाइर जाउ।

मदन-        पंडीजी लड़ि‍की-लड़ि‍कीकेँ असीरवाद दि‍अनु।
           (लड़ि‍का-लड़ि‍की पंडीजीकेँ पएर छूबि‍ प्रणाम करैत छथि‍। पंडीजी असीरवाद दइ छथि‍न।)

मोतीलाल-     पंडीजी मोनसँ असीरवाद देबै।

गणेश-       हँ यौ, दक्षि‍णे गुणे ने असीरवाद भेटत।
           (सभ कि‍यो जा रहल छथि‍।)

पटाक्षेप।



दृश्‍य- चारि‍
       

(स्‍थान रामलालक घर। रामलालक दुनू पत्नी लक्ष्‍मी आ संतोषी घरमे हुनका सेवा कऽ रहल छथि‍। लक्ष्‍मी पक्षमे दूगो बेटी-एगो बेटा छन्‍हि‍। तथा संतोषी पक्षमे एगो बेटी-दूगो बेटा छन्‍हि‍। छओ भाए-बहि‍न एक्के पब्‍लि‍क स्कूलमे पढ़ए गेल छथि‍।)

रामलाल-     लड़की सभ धि‍या-पुता नीक जकाँ घरपर पढ़ै-लि‍खै अछि‍ न? हम तँ भि‍नसर जाइ छी से राति‍येमे अबै छी। पेटक पूजा तँ बड़ पैघ पूजा छै कि‍ने? हम नै पढ़लौं से अखैन पछताइ छी।

लक्ष्‍मी-       छौड़ाक लक्ष्‍ण अखैन बड़ नीक देखै छि‍छे, अग्रि‍म जे हुअए। हमरा सभकेँ पढ़ैले कहए नै पढ़ै अछि‍।

रामलाल-     छोटकी, अहाँ कि‍छु नै बजै छी।

संतोषी-      दुनू गोटे एक्के बेर बाजि‍ देब तँ अहाँ की सुनबै आ की बुझबै?

रामलाल-     कोनो तकलीफ अछि‍ की?

संतोषी-      जेकरा अहाँ सन घरबला रहतै, तेकरा तकलीफो हेतै आ अहुँसँ होशगर बड़की छथि‍। स्‍वामी, एगो गप्‍प पूछी?

रामलाल-     एक्के गो कि‍अए, हजार गो पूछि‍ते रहू।

संतोषी-      अहाँ, एहेन चि‍क्कन घरवालीकेँ रहैत दोसर बि‍अाह कि‍अए केलि‍ऐ?

रामलाल-     बड़कीसँ बेटा होइमे कि‍छु बि‍लंब देखलि‍ऐ तँए दोसर केलि‍ऐ।

संतोषी-      नै यौ, दोसर गप्‍प भऽ सकै छै।

रामलाल-     हमरा तँ नै बूझल अछि‍, अहीं बाजू दोसर की भऽ सकै छै?

संतोषी-      अहाँकेँ अहाँकेँ अहाँकेँ एगोसँ मोन नै भरल।

रामलाल-     बस करू, बस करू, अहाँ तँ लाल बुझक्करि‍ छी। अहाँ तँ अंतर्यामी छी। ओना मोनकेँ जतए दौगेबै, ओतए दौगतै।
           मन ही देवता, मन ही ईश्वर,
मन से बड़ा न कोइ।
मन उजि‍यारा जब जब फैले,
जग उजि‍यारा होय।।
(इसकूल पोशाकमे सोनीक प्रवेश।)

सोनी-       पापा, पापा, इसकूलक फीस दि‍यौ।

रामलाल-     माएकेँ कहि‍यौ बुच्‍ची।

सोनी-       माए, इसकूलक फीस दहि‍न।

लक्ष्‍मी-       कत्ते फीस लगतौ?

सोनी-       तों नै बुझै छीही छअ गो वि‍द्यार्थीक छअ सए टाका।

लक्ष्‍मी-       छोटकी, जाउ, दऽ दियौ ग।

संतोषी-      बेस लेने अबै छी।
(संतोषी अन्‍दर जा कऽ छअ सए टाका आनि‍ सोनीकेँ देलनि‍ आ फेर पति‍ सेवामे भीर गेलीह।)

रामलाल-     छोड़़ै जाइ जाउ आब। अंगना-घर देखि‍यौ। अहुँ सभकेँ कनी काज होइ छै।
(दुनू पत्नी चलि‍ गेलीह।)

पटाक्षेप



दृश्‍य- पाँच

(स्‍थान- रामलालक घर। रमाकान्‍त मुखि‍याक संग बलदेब वार्ड सदस्‍यक प्रवेश।)

बलदेव-      (दलान परसँ) रामलाल रामलाल भाय।

रामलाल-     (अन्‍दरेसँ) हइए एलौं भाय। दलानपर ताबे बैसु। जलखै कएल भऽ गेल।

बलदेव-      मुखि‍योजी एलाह, कने जल्‍दि‍ये एबै।

रामलाल-     तहन तुरन्‍त एलौं।
(हाथ-मुँह पोछि‍ते प्रवेश। प्रणाम-पाती कऽ अन्‍दरसँ दूटा कुर्सी अनलनि‍। रमाकान्‍त आ बलदेब कुर्सीपर बैसलाह मुदा रामलाल ठाढ़े छथि‍।)

रामलाल-     मुखि‍याजी, आइ केम्‍हर सूरूज उगलै? आइ रामलाल तरि‍ गेल सरकार। कहि‍यौ सरकार हम केना मन पड़लौं। इनरा आवासबला कोनो गप्‍प छै की?

बलदेव-      गप्‍प तँ इएह छै। मुदा पहि‍ने कुशल-छेम, तहन ने अगि‍ला गप-सप्‍प। कहु अपन हाल-समाचार।

रामलाल-     अपने सबहक कि‍रपासँ हमर हाल-समाचार बड्ड बढ़ि‍याँ अछि‍। भाय, अपन हाल-चाल कहु।

बलदेव-      भाय, एकदम दनदनाइ छै।

रामलाल-     आ मुखि‍याजी दि‍शि‍का।

रमाकान्‍त-     हमरो हाल-चाल बड़ बढ़ि‍या अछि‍। वएह एलेक्‍शन नजदीक छै तँए पंचायतमे घुमनाइ अावश्‍यक बुझलौं। संगे संग अहुँक काज रहए।

रामलाल-     तहन अपने कि‍अए एलि‍ऐ, हमहीं चलि‍ अबि‍तौं।

रमाकान्‍त-     देखि‍यौ, जनता जानार्दन होइ छै। पहि‍ने जनता तहन हम। जनता मुखि‍याकेँ बड़ आशासँ चुनै छै। ओइ आशाक पूर्ति केनाइ हमर परम कर्त्तव्‍य छै।

रामलाल-     अपने महान छि‍ऐ। अपनेक आगू हम की बजबै?

बलदेव-      मुखि‍याजी, कने ओकरो ऐठाम जाइक  छै। हि‍नकर काज जल्‍दी कऽ दि‍यनु।

रमाकान्‍त-     तहन दऽ दि‍यनु।
(बलदेव बेगसँ बीस हजार टाका नि‍कालि‍ रामलालकेँ देलखि‍न।)

रामलाल-     (पाँच सए टाका नि‍कालि‍) मुखि‍याजी, ई अपने राखि‍ लि‍औ।

रमाकान्‍त-     नै, ई नै भऽ सकैए। ई अपने रखि‍यौ। हमरा पेट ले बहुते फंड छै। कहबी छै- ओतबे खाइ जइसँ मोंछमे नै ठेकए।

रामलाल-     भगवान, एहेन मुखि‍या सगतर होइ छै।

बलदेव-      रामलाल भाय, जतए-ततए सुनै छी अहाँक परि‍वारक संबंधमे। तँ मन हर्षित भऽ जाइए। एहेन सुन्‍दर ढंगसँ परि‍वार चलेनाइ आइ-काल्हि‍ असंभव अछि‍।

रामलाल-     सभ भगवानक कि‍रपा छनहि‍ आ अपन करतब तँ चाहबे करी।

रमाकान्‍त-     हमरा लोकनि‍ जाइ छी। जाउ, अहुँ अपन काम-काज देखि‍यौ।
(रमाकान्‍त आ बलदेवक प्रस्‍थान)

रामलाल-     धन्‍यवाद बलदेव भाय, धन्‍यवाद मुखि‍याजी एहि‍ना सभ जनतापर खि‍आल रखबै।

पटाक्षेप।



दृश्‍य- छह

(स्‍थान- लखनक घर। मीना अपन बेटी रामपरी आ बेटा कृष्‍णाक संग बैडमि‍ंटन खेल रहल अछि‍।

रामपरी-      मम्मी, कसि‍ कऽ मारहीन ने। काँर्क नै उड़ै छौ।

मीना-        बेसी कसि‍ कऽ नै लगै छै। कम-सँ-कम बौओ जकाँ बमकाही ने?
           (मनोजक प्रवेश)

मीना-        ओएह, एलौ सरधुआ भांड़ैले।

रामपरी-      आबए दहीन ने मम्‍मी। भायजी छथि‍न।

मीना-        भायजी छथि‍न। कप्‍पार छथि‍न। काँर्क फूटि‍ जेतौ तँ आनि‍ कऽ देतौ?

रामपरी-      मम्‍मी, भायजी कतए सँ आनि‍ कऽ देतै, तोंही कह तँ। आकि‍ पापा आनि‍ देथि‍न।

मीना-        पापाकेँ हम जे कहबै, से करथुन। तोहर कहल नै करथुन।

रामपरी-      मम्‍मी, ई गप्‍प तोहर नीक नै भेलौ आ पापोकेँ नीक नै भेलनि‍।

 मीना-       तों पंचैती करैले एलँह की बैडमि‍ंटन खेलैले? खेलबाक छौ तँ खेल नै तँ जो एत्तएसँ।

रामपरी-      तोंही सभ खेल, हम जाइ छी।
(खीसि‍या कऽ रामपरीक प्रस्‍थान। रामपरीबला बैटसँ मनोज बैडमि‍ंटन खेलए लगैत अछि‍। मीना बएटेसँ ओकरा मारैले छुटैत अछि‍। फेर दुनू माय-पुत बैडमि‍ंटन खेलए लगैत अछि‍।)

कृष्‍णा-       मम्‍मी, तोरा दीदी जकाँ खेलल नै होइ छौ। कने पापाकेँ कहबीन सीखा दइले से नै।

मीना-        बौआ, पापा हमरा की सि‍खेलखुन, हमहीं सीखा दइ छि‍ऐ।

कृष्‍णा-       तेकर माने तों पापासँ जेठ छीही?

मीना-        उमरमे भलहि‍ं छोट हएब मुदा अकलमे नि‍श्चि‍ते जेठ।
(संतोषक प्रवेश)

संतोष-       हमहूँ खेलबै कृष्‍णा। (बैट लऽ कऽ खेलए लगैत अछि‍। झटसँ मीना संतोषक हाथसँ हाथ मोचारि‍ कऽ बैट लऽ लैत अछि‍। टुनकीबला आ मुड़ीमचरूआ कहि‍ बैटसँ मारैले दौगैत अदि‍। संतोष भागि‍ जाइत अछि‍। ओइपर खीसि‍या कऽ कृष्‍णा एक बैट मम्‍मीकेँ बैसा दैत अछि‍।)

कृष्‍णा-       तों बड़ खच्‍चर छेँ मम्‍मी। खेलल-तेलल होइ छौ नहि‍येँ आ जमबै छेँ। अखैन संतोष भायजी रहि‍ते तँ खूम बैडमि‍ंटन खेलतौं की नै।

मीना-        संतोशबा तोहर भायजी नै छि‍औ। जेकर छि‍ऐ से बुझतै। तोरा ओकरासँ कोनो मतलब नै।

कृष्‍णा-       कि‍अए मम्‍मी? उहो तँ हमरे पापाक बेटा छि‍ऐ ने?

मीना-        मुदा तोहर मम्‍मीक बेटा नै ने छि‍ऐ।

कृष्‍णा-       बुझबीहीन तँ कि‍अए नै हेतै? नै बुझबीहीन तँ हमहूँ-हमहूँ तोहर दुश्मन छि‍औ।

मीना-        बकबास नै कर। काल्हि‍ जनमलेँ आ बुढ़बा जकाँ गप्‍प करै छेँ। सभ बात तों अखैन नै बुझबीहीन। आब काल्हि‍ खेलि‍हेँ चल।
           (बैट-काँर्क लऽ कऽ मीना-कृष्‍णाक प्रस्‍थान।)

पटाक्षेप।


अंक दोसर

दृश्य- एक

(स्‍थान- रामलालक घर। संतोषी बि‍स्‍तरपर पड़ल अछि‍। पाँच भाय-बहि‍न इसकूल गेल अछि‍। मुदा सोनी घरेपर अछि‍ सोनीक तबीयत ठीक नै अछि‍।)

संतोषी-            सोनी बुच्‍ची, कनी देह दबा दि‍अ तँ?

सोनी-       हमरा अपने माथ दुखाइए। तँए इसकूलो नै गेलौं। अखन धरि‍ बासि‍ये मुँहेँ छी। खैर अहाँ तँ छोटकी माए छी। अहाँक अज्ञाक पालन केनाइ हमर परम कर्त्तव्‍य छी।

संतोषी       बुच्‍ची अहाँ बुधि‍यार छी ने।
           (सोनी संतोषीक देह दबाए रहल अछि‍।)

साेची-       छोटकी माए, बड़ भुख लागल-ए, कनी खाइले दि‍अ।

संतोषी-            हमरा नै हएत। जाउ अपनेसँ लऽ लि‍अ गऽ।

सोनी-       एक दि‍न अहीं कहने छेलि‍ऐ, अपनेसँ खाइले कहि‍यो नै लइले। धि‍या-पुताकेँ घटि‍ जाइ छै। तँए हम अपनेसँ नै लेब।

संतोषी-      लि‍अ वा नै लि‍अ। हमरा बुते नै हएत देल। अपना देहमे करौआ लागल अछि‍।

सोनी-       जाइ छि‍ऐ बड़की माएकेँ कहैले।
(सोनी, लक्ष्‍मीकेँ कहैले अन्‍दर गेलीह एम्‍हर संतोषी और गबदि‍आ कऽ पड़ि‍ रहलीह। सोनी आ लक्ष्‍मीक प्रवेश।)
लक्ष्‍मी-       छोटकी, छोटकी, छोटकी।

सोनी-       अखने जगले छेलै। तुरन्‍ते देखही। गै माए सूतल लोक ने जगैए, जागल की जगतै।

लक्ष्‍मी-       (जोरसँ) छोटकी, छोटकी, छोटकीऽ ऽ ऽ ऽ।
           (संतोषी फुरफुरा कऽ उठै छथि‍।)

संतोषी-            की कहलि‍ऐ दीदी?

लक्ष्‍मी-       सोनीकेँ अहाँ कि‍अए कहलि‍ऐ, देहमे करौआ लागल अछि‍?

संतोषी-            हम से कहाँ कहलि‍ऐ। हम अपना दऽ कहलि‍ऐ जे हमरा देहमे करौआ लागल अछि‍ की। एतबेपर बुच्‍ची भागि‍ गेलीह।

सोनी-       अपन बेटाक माथपर हाथ रखि‍ कऽ कहबै?

संतोषी-            हम बजबे नै केलि‍ऐ। एतेक आगि‍ कि‍अए उठबै छी सोनी।

साेनी-       आगि‍ तँ अहाँ उठबै छी आ लगबै छी। हमरे माथपर हाथ रखि‍ कऽ बाजू तँ।

संतोषी-      हँ यै साँच बात कि‍एक ने बाजब। आउ, लग आउ।

लक्ष्‍मी-       बूझि‍ गेलौं अहाँ कत्ते साँच बजै छी। अनकर बेटा-बेटी उपरेमे अबै छै आ अपन बड़ कसेब कऽ छै। ि‍नर्लज्‍जी नहि‍तन। झूठ बजैत कोनो गत्तरमे लाजो नै होइ छन्‍हि‍।

संतोषी-      ि‍नर्लज्‍जी तँ अहाँ छी जे बेटीक पक्ष लऽ कऽ फेफि‍या कऽ उठै छी।

लक्ष्‍मी-       ि‍नर्लज्‍जी ि‍नर्लज्‍जी करब तँ अखैन झोंटा पकड़ि‍ कऽ पोटा ि‍नकालि‍ देब।

संतोषी-      कनी देखि‍यौ तँ झोंटा पकड़ि‍ कऽ।
(रामलालक प्रवेश)

रामलाल-     अहाँ सभ कतीले हल्‍ला-फसाद करै छी? चुपै जाउ। छोटकी, की बात छै?

संतोषी-      दुनू माइ-धीन हमरा कहैए, झोंटा पकड़ि‍ कऽ पोटा नि‍कालि‍ देब।

रामलाल-     बड़की, अहाँ से कि‍अए कहलि‍ऐ?

लक्ष्‍मी-       हँ हँ, हमरा सींग बढ़ि‍ गेलै तँए दुआरे। ओकरे पुछि‍ऐ तँ।

रामलाल-     की बात छै छोटकी?

संतोषी-      ओकरे सभकेँ पुछि‍यौ।

रामलाल-     की भेलै बुच्‍ची?

सोनी-       हमरा माथा दुखाइ छेलए। इसकूलो नै गेलौं। बासि‍ये मुँहेँ रही। छोटकी माएकेँ कहलि‍यनि‍ खाइले दि‍अ। तँ ओ कहलनि‍, अपनेसँ लऽ लि‍अ। देहमे करौआ लगल अछि‍। ई बात बड़की माएकेँ कहलि‍यनि‍ तँ ओ माएसँ लड़ैले तैयार छथि‍।

रामलाल-     हमरा तोरापर वि‍श्वास अछि‍ बुच्‍ची। तों फूसि‍ नै बाजि‍ सकै छेँ। हम बात बूझि‍ गेलौं। छोटकी, सोलहन्नी अहाँक गलती अछि‍। बड़कीसँ अहाँ लगती मानू। नै तँ एहेन घारवाली हमरा नै चाही। अपन जोगार देखू। जेहने हमर परि‍वारक सुबेवस्‍थाक चर्चा सौंसे गाम होइ छेलए तेहने परि‍वारक प्रति‍ष्‍ठाकेँ माटि‍मे मि‍लबए चाहैत अछि‍। तुरन्‍त सोचि‍ कऽ बाजू, की चाहै छी?

संतोषी-      (कि‍छु सोचि‍ कऽ, बड़कीक पएर पकड़ि‍) हमरेसँ गलती भेलै। आब गलती कहि‍यो नै हेतै।

रामलाल-     बड़की, आइ माफ कऽ दि‍यनु। आइ दि‍नसँ गलती नै करतै। सदि‍खन मीलि‍ कऽ रहै जाइ जाउ।
“जहाँ सुमति‍ वहाँ सम्पत्ति‍ नाना।
जहाँ कुमति‍ वहाँ वि‍पत्ति‍ नि‍धाना।”

पटाक्षेप।



दृश्‍य- दू

(स्‍थान- लखनक घर। लखन दलानपर बैसल छथि‍ आ पारि‍वारि‍क स्‍थि‍ति‍क संबंधमे सोचि‍ रहल छथि‍।)

लखन-       की करी नै करी, कि‍छु ने फुराइत अछि‍। बेटी रामपरी सेहो ताड़ जकाँ बढ़ि‍ रहल अछि‍। आमदनी कम छै आ परि‍वारमे खर्चा बड़ छै।
           (मनोज आ संतोषक प्रवेश।)

मनोज-       पापा, बहुते छौंड़ा सभ इसकूल जाइ छै पढ़ैले। हमहूँ सभ जाएब। हमरो सभकेँ नाम लि‍खा दि‍अ ने सरकारी इसकूलमे।

लखन-       नाम लि‍खबैमे पाइ लगतै, कि‍ताब-कोंपीमे पाइ लगतै, टीशन पढ़ैमे पाइ लगतै। हमरा ओतेक सकरता नै अछि‍। हमरा बुते नै हेतौ। पहि‍ने पेटक चि‍न्‍ता कर।

संतोषी-      पापा, रामपरी आ कृष्‍णा जे पब्‍लि‍क इसकूल जाइ छै से? ओकरा सभकेँ पाइ नै लगै छै?

लखन-       से मम्‍मीसँ पुछही गऽ। पाइ कोनो हम दइ छि‍ऐ।

संतोषी-      मम्‍मीकेँ बजा कऽ एत्तऽ आनू। कनी अपनेसँ कहबनि‍।

लखन-       जो बजा आन।
           (संतोष शीघ्र मीनाकेँ बजा कऽ अनैत अछि‍।)

मीना-        की कहै छी?

लखन-       की कहब। मनोज-संतोष कहैए हमहूँ पढ़ब, से की करबै।

मीना-        कप्‍पार करबै, अंङोरा करबै, धधकलहा करबै।

लखन-       एना कअए बजै छी? बोलीमे कनि‍यो लसि‍ नै अछि‍। हरदम निशाँमे चूर रहै छी।

मीना-        बड़ फटर-फटर बजै छी। मुँह बन्न करू नै तँ बूझि‍ लि‍अ। जाउ अहाँ एत्तएसँ। एकरा सभकेँ हम जबाब दइ छि‍ऐ।
(लखनक प्रस्‍थान)
की कहलेँ मनोज?

मनोज-       मम्‍मी, हमरो सभकेँ इसकूलमे नाम लि‍खा दि‍अ बहुते छौड़ा सभ इसकूल जाइ छै।

मीना-        बड़ पढ़ुआ भऽ गेलेँ तो सभ? गाँड़ि‍मे गूँह नै माए गै हग्‍गब। बि‍ना ढौए के पढ़ाइ छै की खेनाइ होइ छै? पेट भरै छौ तँए फुराइ छौ। एत्तऽ सँ अक्खैन भाग। नै तँ बढ़नी देखै छीहीन। कमा कऽ लाऽ तँ खो वा पढ़। नै तँ घर नै टपि‍ सकै छेँ तों सभ।

मनोज-       मम्‍मी, हमरा सभकेँ कमाएल हेतै। जन मे के रखतै?

मीना-        नै कमाएल हेतौ तँ भीखे मँगि‍हेँ आ ओम्‍हरे खँहिहेँ।

संतोष-       अपना बेटा-बेटीकेँ पढ़ाबै ले होइए आ हमरा बेरमे की होइए?

मीना-        भगलेँ सरधुए सभ की?
           (बढ़नी लऽ कऽ मारैले दौगल। संतोष भागि‍ गेल। मनोज पकड़ा गेल। “पढ़ुआकेँ सार अछि‍ भगलेँ एत्तए से” कहि‍ कहि‍ मनोजकेँ मीना बढ़नीसँ झँटलक। अन्‍तमे हाथसँ छूटि‍ कऽ कनैत-कनैत भागि‍ गेल।)
पढ़ैए। फोकटेमे पढ़ाइ होइ छै।
           (हकमैत-हकमैत) ऊपरेमे अल्हुआ फड़ै छै।

पटाक्षेप।


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'विदेह' २२८ म अंक १५ जून २०१७ (वर्ष १० मास ११४ अंक २२८)

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