Saturday, September 15, 2012

'विदेह' ११३ म अंक ०१ सितम्बर २०१२ (वर्ष ५ मास ५७ अंक ११३) - PART IX


३.
डा.राजेन्द्र विमल
नवनव क्षितिजक सन्धान करैत सुजीतक जिद्दी

साहचर्यसम्भूत रसोद्भावनाक चतुर, युवा कथाकार सुजीत कुमार झाक कथा मिथिलाञ्चलक महानगरोन्मुख शहरक विविधतापूर्ण परिवेश आ पात्रक स्थितिमनस्थितिक सूक्ष्म चित्राङ्कन प्रस्तुत करैत अछि । प्रत्येक कथा कोनो एक गोट एहने शहरी पात्रक जीवनमे झटका नेने आएल कोनो निर्णायक मोड़क नाटकीय रुपमे जखन प्रत्यक्षीकरण करबैछ तऽ पाठक चिहँुकि उठैत अछि ।
सामान्य घटनासभक श्रृङ्खलासँ आरम्भ भेल कथा मध्यधरि अबैतअबैत सूच्याग्र भऽ जाइत अछि आ अन्तमे एकटा करेण्टजेकाँ लगबैत अछि । जेना सामान्य यात्रामे चलैतचलैत केओ आगाँमे फँेच कढ़ने, नाङरिपर ठाढ़ गहुमन देखि नेने हो ! शिल्पक ई वैशिष्ठ्य हिनका मैथिलीक अन्य कथाकारसँ अलगहे फराक कए दैत अछि ।
महानगरोन्मुख समाजक चित्राङ्कनक संगहि कथा एक गोट मनोवैज्ञानिक सत्यक उद्घाटन करैत अछि । कथामे एक गोट एहन स्थल अबैत अछि जखन आश्चर्यचकित भेल पाठक सोचैत अछि, ‘ अरे ! ई की भऽ गेलै ?’ – आ तखने कथाक अन्त भऽ जाइ छै । अमेरिकी कथाकार ओ. हेनरीक स्मरण भऽ अबैछ । अवग्रहमे पड़ल पात्रक प्राण जेना अकस्मात् मुक्तिपथ पाबि
लैछ !
कथाकार सुजीत कुमार झाक कथाकारिताक दोसर उल्लेखनीय निजत्व थिक अनतिदीर्घता अर्थात् संक्षिप्तता । हिनक कथाक घटनापरिघटना ज्यामितीय चित्र जेकाँ एकदोसरकेँ कटैत, ओझराइतसोझराइत आगाँ नहि बढ़ैछ । कथाक तीर सनसनाइत जाइत अछि आ अर्जूनक लक्ष्यभेद जेकाँ चिड़ैक आँखिटा देखैत ओकर भेदन करैत अछि आ कुशल धनुर्धरक धनुर्विद्याक सफलताक प्रमाणसँ धन्य भऽ जाइत अछि । तँए कथासभमे एकटा प्रभावान्वितियुक्त त्वरा छैक ।
हिनक सभ पात्र खाँटी मैथिल थिकाह विभिन्न जाति, वर्गक मध्यवित्तीय मैथिल । सुजीत कुमार मध्यवित्तीय मैथिल जीवनक सफल कथाकार छथि । परम्परागत मूल्यक सिमेण्टसँ ठोस बनल संयुक्त परिवारमे देखल जाइत पारस्परिक स्नेह, विश्वास, वलिदान, सेवा, करुणा, अनुशासन आदि श्रेष्ठ मानवीय गुणमे लागल पश्चिमी सोचक नोनीसँ उत्पन्न दरार देखि कथाकारक हृदय दरकि जाइत छैन्हि आ हुनक लगभग प्रत्येक कथा खण्डित होइत एहि मूल्यकेँ पुनस्र्थापित करबाक कलात्मक चेष्टा बनि जाइत अछि ।
सहजस्वभाविक कथोपकथनक मुक्तावलीसँ बनलबूनल ई कथा सभक कथाकारक अपन परिवेशक भोगल यथार्थ सभक चित्रावलीसँ सजाओल सुन्दर अलबमथिक ।
कथाकार सुजीत कुमारक कथाक सेहो एक गोट प्रमुख तत्व थिक सहज मानवीय रागबन्ध । सुप्रसिद्ध आलोचक ई.एम.एलब्राइड लिखने छथि जे कथासाहित्यक समस्त भावात्मक तत्वमे एकटा प्रेमे एहन थिक जकर सर्वाधिक प्रयोग भेल अछि, कारण प्रेम मानवस्वभावक सर्वव्यापक तत्व थिक ।
पूmल फुलाइएकऽ रहलकथाक उच्च कुलशीला, सुशिक्षिता नायिका पिंकी अन्तद्र्वन्द्वक भंवरमे फँसि उबडुब करैत मुक्तिक हेतु तखन हाथ पएर भाँजऽ लगैत छथि । जखन हुनका पता लगैत छैन्हि जे जाहि पुरुषकेँ सहायक स्टेशन मास्टर कहि हुनक विवाह रचाओल गेल छल आ जकरा अपन सम्पूर्ण संचेतना समर्पण दऽ ओ इन्द्रधनुषी कल्पनाक इन्द्रजालमे ओझराएलि अपन सुधिबुधि हेरा चुकलि छलीह से सहायक स्टेशन मास्टर नहि एकटा साधारण पैटमैन अछि जे वस्तुतः अपन मालिक स्टेशन मास्टर आ सहायक स्टेशन मास्टरक घरलए बजारसँ झोड़ाक भोड़ा तरकारी कीनिकऽ अनैत अछि तऽ ओ सातम आसमानसँ खसैत छथि । मुदा, ई स्वयंसिद्ध नायिका अग्निकेँ साक्षी राखि लेल गेल पतिब्रत्य संकल्पकेँ स्मरण कए एकटा नव अवतार लैत छथिअपन चिताक छाउरसँ पुनः उड़ि आसमानकेँ छुबैत मिथकीय पन्छी स्फिङ्सजेकाँ ! नायककेँ एम.ए.धरि पढ़बैत छथि । अन्ततः नायक सहायक स्टेशन मास्टरक पदपर प्रतिष्ठित होइत छथि ।
नयाँ व्यपार’–क रोगग्रस्त नायक जितेन्द्र प्रसादक हँसैतखेलैत गार्हस्थ जीवन महत्वकांक्षाक बबण्डरमे उधियाकऽ तहसनहस भऽ गेल अछि । स्वयं रोगशैय्यापर पड़ल छथि, बच्चासभ अपनअपन व्यवसायसंसारमे हेराएल अछि आ पत्नी साधना सड़कपर चलैत लोकक आँखिमे गरदा झोंकैत, मिश्राजीक स्कूटरपर बैसि, अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवसमे सहभागी होएबाक लेल उड़ि जाइत छथि । कथा वर्तमान पारिवारिक जीवनक विद्रूपता आ विसङ्गतिकेँ रेखाङ्कित करैत अछि ।
खाली घर’–क नायक जयचन्द्र आ नायिका जानकी रेलक पटरी जेकाँ जीवन पर्यन्त समानान्तर चलैत छथि, मुदा कहियो, कखनो मीलि ने पबैत छथि । तकर कारण छैक पतिकेँ आदेशअनुवर्तिनीरोवोटनारीक चाहिऐन्हि, सासुससुरकेँ पुतहुक पटमासि कएल बहिकिरनीक बेगरता छैन्हि । मुदा पति अपन स्व’–क संग जीवाक आकांक्षिणी छथि । एकटा शीतयुद्धमे जीवन बीति जाइत अछि, रीति जाइत अछि ।
लाल किताबपरामनोविज्ञानपर आधारित रहस्यरोमाञ्चसँ भड़ल कथा थिक । सेवक प्रसाद यादवजी १८ गतेकेँ अपन कक्षमे एकसरि बैसलि कथा नायिका मित्रपत्नीकेँ अत्यन्त अनुराग पूर्वक एक गोट लाल डायरी भेंट कऽ गेल रहै छथि । मित्रपत्नीकेँ जबर्दस्ती हाथ पकड़ि ओ अपना लग बैसबै छथिहाथ अकल्पित रुपें सर्दहेमाल किए लगै छल से ओ बूझि नहि पबैत छथि । मुदा जखन मित्रक मृत्युपर शोकविह्वल भेल नायिका पति बाहरसँ आबिकऽ सेवक प्रसादक मृत्यु सत्रहे गते भऽ गेल होएबाक सूचना दै छथिन्ह तऽ ओ काँपि उठैत छथि ।
मायक सह पाबि गिन्नी पढ़ाइ छोड़ि नृत्यमे प्रशिक्षित भऽ आय दिन नवनव पब्लिक शोकरऽ लगलीह । बाप अपन बेटीकेँ ग्लैमर दिशि आकृष्ट देखि चिन्तामग्न रहै छथि, मुदा जिदाहि पत्नीक आगाँ विवश रहै छथि । परिणामतः जखन पता चलल जे गिन्नी व्यसनी, व्यभिचारिणी आ गर्भिणी भऽ गेलि छथि तऽ वातावरण हाक्रोशकऽ उठैत अछि । ताबत बहुत बिलम्ब भऽ गेल रहैत छैक ।
जादूकथाक नायिका सिम्मी घरपर जा कम्पनीक उत्पाद बेचऽबाली सेल्सगर्ल छलीह, मुदा हुनक मधुरवाणी आ शिष्ट व्यवहारक जादू रेणु आ हुनकर पतिक दिमागपर एना ने चढ़ल जे रेणुक पति हुनका अपन कम्पनीक नीक पदक हेतु अफर दऽ देलथिन्ह ।
परम्परावादी मूल्यक खण्डहरपर ठाढ़ होइत बलुआही पारिवारिक संरचनापर कठोर प्रहार अछि कथा– ‘ आदर्शपरम्परावादी पति आ सासुकेँ लात मारि घर छोड़ि चलि तऽ अबै छथि अद्र्धआधुनिका शिक्षिका नायिका, मुदा पन्द्रह वर्षक पश्चात् जखन अपन कक्षामे एक गोट भविष्णु युवकक नाम आदर्शसूनि ओ चिहुँकि उठै छथि जेना ककोड़विच्छा अनचोकेमे डंक मारि देने होइक । आदर्शक पिताक नाम छै अरुण, जिला न्यायाधीश, अर्थात् ओकर पूर्वपति । स्टाफ रुममे आबिकऽ धम्म दऽ बैसि जाइत छथि, मस्तिष्कमे अन्हड़विहाड़ि नेने । एहि स्थलपर आबि विखण्डनवादी मूल्य हारि जाइत अछि आ संयुक्त परिवारक परम्परावादी मूल्य विजय घोष करैत अछि ।
अर्थहीन यात्राक नायिका नेहा अपन पति माधवसँ एहि दुआरे असन्तुष्ट रहैत छथि जे ओ महत्वकांक्षाक उन्मादसँ ग्रस्त नहि छथि, पार्टीक्लवक सौखीन नहि छथि, भौतिक चमक दमकमे विश्वास नहि करैत छथि, नेहाक लेल गिप्mनहि अनैत छथि आदि । तलकालए ओ जानकीरामसँ विवाह करैत छथि, बेटी तेजिकऽ । फेर ओ जानकी रामकेँ छोड़ि अन्य पुरुष संगे रहए लगैत छथि पति पत्नीवत्, मुदा अविवाहित । पश्चिमसँ आएल लिविङ्ग टूगेदर’–क चपेटिमे पड़लि नेहा अन्ततः अपनहि लेल निर्णायक कारण पश्चातापक आगिमे धूधूकऽ जरऽ लगैत छथि । प्रस्तुत कथा सेहो पछबा हवाक विरोध आ पुरवाक समर्थनमे देवाल जेकाँ ठाढ़ अछि ।
नारी मनोविज्ञानक सुन्दर आ यर्थाथवादी विश्लेषण प्रस्तुत करैत कथा व्यर्थक उड़ान’–क नायक कार्यालयक काजसँ जे विराटनगर गेलाह तऽ दूचारि दिन विलम्ब की भेलैन्हि नायिका ऊनी स्वेटर जेकाँ मोनमे लहराइत भावक रंगविरंगी लच्छाकेँ ओझरबैतसोझरबैत जँ दुर्भाग्यसँ वैधव्यक पहाड़ टूटि पड़ल होइन्हि तऽ शेष यात्रा कमलसंग बितएबाक, ओकरा संग हनीमून मनएबाधरिक कल्पनामे डूबि जाइ छथि कि धम्म दऽ पति जूमि जाइत छथिन्ह । ओ पतिकेँ भरि पाँज पजियाकऽ हबोढ़कार भऽ कानऽ लगै छथि ।
निष्ठा कि देखाबाएक गोट घोर यथार्थवादी मार्मिक कथा अछि । नीमाक पति सोहनक दुनू किडनी सड़ि गेल छैक जकर प्रत्यारोपण डाक्टरक सलाह अनुसार भेल्लोरमे जा करएबाक बदला ओ पतिकेँ जल्दीसँ जल्दी गाम एहि दुआरे लऽ जाइत छथि जे सम्पति सम्बन्धी कागजात सभपर हुनकर हस्ताक्षर लेल जा सकए । पतिकेँ मरबाक चिन्ता नहि, सम्पति डुबबाक चिन्ता बेसी घेरने छैन्हि । मुदा भाग्यक व्यंग्य ई थिक जे अन्तिम साँसधरि पति हुनका पतिपरायणा मानैत छथि ।
केहन सजायएक गोट टुग्गरि बालिका चमेलीक कथा अछि । जकरा कोनो सन्तानहीन सम्भ्रान्त दम्पती गोद नेने छल, मुदा जखन ओहि दम्पतीकेँ अपन औरसँ सन्तान जनमि जाइत छैक, चमेली ओहि घरमे नहि, ‘महिला सदनमे पठा देल जाइत छथि । ओ तऽ धन्य कही संस्थाक नव अध्यक्षा आ पूर्व प्रधानाध्यापिका कामिनी मैडमकेँ जनिक करुणापूर्ण प्रयाससँ ओ रितेशक संग परिणय सूत्रमे बन्हा जीवनक भसिआइत नाओक लेल किनार पाबि लैत छथि ।
मेनकाक कोमल नारी हृदयकेँ हँथोड़ैथि मेनकाजीवन झँझावातक आघातप्रतिघातसँ नारी हृदय समुद्रमे उठैत उत्ताल तरङ्गक विक्षोभकारी कथा थिक । मेनका परित्यक्ता थिकीह । हुनक पति चन्द्रभूषण सुन्दरी युवती नीनाक मोहपाशमे ओझरा हुनकर परित्यागकऽ देने छलथिन । नारीअहंपर चोट लगैत अछि । मेनका प्राध्यापन सेवामे संलग्न छथि, जतऽ हिनक सम्पर्क विवाहित सहकर्मी राजीव सरसँ होइत छैन्हि । राजीव सरक व्यक्तित्वक चुम्बकीय प्रभावमे मेनकाक व्यक्तित्व लौहकण जेकाँ आकृष्ट होइत अछि, मुदा जखन ओ सोचै छथि जे राजीवपत्नी आरतीक हेतु हुनक प्रणयलीला नीनाकर्मसँ कम हिंसक किंवा घृणित नहि होएत तऽ ओ अपनामे सिमटिकऽ कठोर लौहपिण्ड बनि जाइत छथि, जे चुम्बककेँ घीचि सकैत अछि, मुदा चुम्बकसँ घिचा नहि सकैत अछि ।
कथाकार सुजीत कुमार झाक कथाक विषयचयन, बनाबट आ बुनाबट, भाषा शैली आ कलात्मक उच्चतामे उत्तरोत्तर प्रौढ़ता अबैत जाएत आ ओ मैथिली कथाक हेतु एहिना विषय आ शिल्पक नवनव क्षितिजक सन्धान करैत नव प्रतिमानक स्थापनामे सफल होएताह, हमर विश्वास अछि ।

 
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१.वि‍देह बाल साहि‍त्‍य सम्‍मान २०११ सँ सम्मानित ले.क. मायानाथ झासँ उमेश मण्डलक साक्षात्कार २.हम पुछैत छी: विदेह मैथिली समानान्तर रंगमंचक संस्थापक मैथिली नाटक आ रंगमंचक आइ धरिक सभसँ पैघ नाम बेचन ठाकुरसँ मुन्नाजीक गपशप 

१.
वि‍देह बाल साहि‍त्‍य सम्‍मान २०११ सँ सम्मानित ले.क. मायानाथ झासँ उमेश मण्डलक साक्षात्कार
उमेश मण्‍डल- सभसँ पहि‍ने वि‍देह बाल साहि‍त्‍य सम्‍मान २०११ लेल अपनेकेँ बहुत-बहुत बधाइ...।
अहाँक नजरि‍मे साहि‍त्‍यक उद्देश्‍य की अछि‍?
मायानाथ झा-    साहि‍त्‍य समाजक दर्पण थीक। सामाजि‍क गति‍वि‍धि‍, एवम् क्रि‍या-कलाप साहि‍त्‍येसँ प्रति‍वि‍म्‍बि‍त होइत अछि‍। मनुष्‍य तँ नश्‍वर होइत अदि‍, कि‍न्‍तु ओकरहि‍ंसँ ि‍नर्मित साहि‍त्‍य अक्षुण्‍ण होइत अछि‍। कोनो देश एवम् कालखण्‍ड साहि‍त्‍यक बलेँ चि‍रकाल धरि‍ जीबैत अछि‍। से ि‍नर्भर करैत अछि‍ जे भावी पीढ़ी कोन रूपेँ ओकरा सहेज-समटि‍ कऽ रखने रहैत अछि‍।

उमेश मण्‍डल-   अहाँक साहि‍त्‍यमे इति‍हास/संस्‍कृति‍ (खास कऽ मि‍थि‍लाक) केना वर्णित होइत अछि‍?
मायानाथ झा-    हमर साहि‍त्‍यक मुख्‍य वि‍धा अछि‍- कथा। कथा एवं कवि‍ताक माध्‍यमसँ हम पुरान एवं प्रचलि‍त बात, वा घटना सबहक वर्णन केलौं अछि‍ जइमे इति‍हास-संस्‍कृति‍क पुट अछि‍। कथोकेँ खि‍स्‍सा-पि‍हानी जकाँ वर्णित केलौं अछि‍। चारि‍त्रि‍क एवं सांस्‍कृति‍क झलक ओइमे मूलत: छैके।

उमेश मण्‍डल-   दि‍नानुदि‍नक अनुभवक अहाँक साहि‍त्‍यमे कोन तरहेँ वि‍वेचन होइत अछि‍?
मायानाथ झा-    आक्रोश एवं आन्‍तरि‍क वेदनाक रूपमे। आधुनि‍क बदलैत परि‍वेशमे जखन अपन उत्तम आचार-वि‍चार, उत्‍कृष्‍ट परम्‍परा एवं समृद्ध संहि‍ताकेँ वि‍लाइत देखैत छी तँ घोर दु:ख होइत अछि‍ आ तखन सहए ने वाणी वा लेखनीसँ नि‍कलतैक, जेना-
नहि‍ कनिञों संकोच छै, माय बापक बोझ नहि‍ उठेवामे।
लाज तऽ छैक नहि‍, धाखोसँ कटि‍ जयबामे।
उतकि‍रना बुझाइत छैक, प्रदूषण फैलाबएमे।
हेठी बुझाइत छैक, मातृभाषा बजबामे।
की अटपट गप्‍प अछि‍, केहन भारी वि‍डम्‍बना अछि‍!”

उमेश मण्‍डल-   साहि‍त्‍यक शक्‍ति‍क वि‍षएमे अपनेक की कहब अछि‍?
मायानाथ झा-    साहि‍त्‍यक शक्‍ति‍क प्रसंग पुछलौं तँ हमरा मोन पड़ि‍ आएल अछि‍ रामधारी सि‍ंह दि‍नकरक कवि‍ता-
दो में से क्‍या तुम्‍हें चाहि‍ए कलम या कि‍ तलवार?
तन में अजय शक्‍ति‍, या मन में जागे उच्‍च वि‍चार।
साहि‍त्‍यक शक्‍ति‍ अजेय, अपरि‍मेय होइत अछि‍। अपन समाज कि देश साहि‍त्‍ये शक्‍ति‍क बदौलति‍ वि‍श्वमे एतेक चर्चित-अर्चित अछि‍। तहूमे हमरा लोकनि‍ वि‍शेष रूपेँ। मि‍थि‍लावासी आन्‍दोलनकारी नहि‍ऍंटा होइत अछि‍। आइ धरि‍ साहि‍त्‍यक शक्‍ति‍क बलेँ अपनाकेँ अधि‍कृत वा प्रति‍ष्‍ठि‍त रखैत एलाह अछि‍।
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उमेश मण्‍डल-   अहाँक साहि‍त्‍यमे पाप-पुण्‍यक विश्लेषण केना होइत अछि‍?
मायानाथ झा-   परोपकाराय पुण्‍याय, पापाय परपीड़नम् रूपमे। सत्‍कर्म धर्म थीक आ दुष्‍कर्म पाप। साहि‍त्‍य सेवनसँ जँ चरि‍त्रक ि‍नर्माण भेल तँ पुण्‍य कमेलौं नै तखन पापोन्‍गामी हएब सुनि‍श्चि‍त। दु:खक गप्‍प जे वर्तमान परि‍प्रेक्ष्‍यमे चारि‍त्रि‍क गठनपर कम जोर देल जाइत अछि‍। धनोपार्जन संबंधि‍त शि‍क्षा तइपर बेशी हाबी भेल जा रहल अछि‍।

उमेश मण्‍डल-   कल्‍पना आ यथार्थक समन्‍वय अहाँ अपन साहि‍त्‍यमे केना करैत छी?
मायानाथ झा-    कल्‍पनाक हवा-महलपर हमरा उड़ए नै अबैत अछि‍। तँए हमर रचनामे कल्‍पनाक आधार भीत्ति‍-प्रायेः कतौ दृष्‍टगोचर होएत। परम्‍परागत वि‍म्‍बकेँ अभि‍नव वि‍म्‍बक संग हम समन्‍वय करैत छी जे हमर भोगल एवम् अनुभवक आधारशि‍लापर ठाढ़ रहैत अछि‍। वि‍वि‍ध भावक संग जुड़ल वि‍वि‍ध वि‍षय आत्‍मीयताक डोरी पकड़ि‍ नि‍स्‍सरि‍त होइत अछि‍।

उमेश मण्‍डल-   अहाँक साहि‍त्‍यमे पात्र जीवन्‍त भऽ उठैत अछि‍, तेकर की‍ रहस्य?
मायानाथ झा-    पात्र यथार्थताक संग जुड़ल रहैत छथि‍, लाग-लपेट वा आडम्‍बरक तामझामक बीच ओझराएल नै रहैत छथि‍ आ तँए बुझाइत अछि‍ जे शब्‍द वि‍न्‍यास, वाक्-पटुताक आलम्‍बन नहि‍यो रहैत ओ मुखर भऽ उठैत होथि‍‍। पाठकक दृष्‍टकोण एवम् अभि‍रूचि‍ सेहो ऐ प्रसंग अपन महत रखैत अछि‍।

उमेश मण्‍डल-   साहि‍त्‍य लेखन, वि‍शेष कऽ मैथि‍ली साहि‍त्य लेखन अहाँ लेल कोन तरहेँ वि‍शि‍ष्‍ट अछि आ एकर प्राथमि‍कताकेँ अहाँ कोन तरहेँ देखै छी?
मायानाथ झा-    हि‍न्‍दी कवि‍ताक दू पाँति‍ मोन पड़ैत अछि‍-
जि‍नको न नि‍ज देश का, नि‍ज भाषा का अभि‍मान है।
वह नर नहीं वह पशु ि‍नरा और मृतक समान है।
अपन भाषाक प्रति‍ हमरा अगाध सि‍नेह अछि‍। सेनामे प्रवासक संग ई प्रेम आओर प्रगाढ़ भऽ गेल बंगला एवं दक्षि‍णक नि‍वासीकेँ देखि‍ कऽ‍। भाषाक प्रति‍ ओ लोकनि‍ खूब कट्टरवादी होइत छथि‍। दोसर, कि‍छु अपवाद छोड़ि‍ हम इएह देखैत अएलौं अछि‍ जे लोक जतेक अपन भाषामे मुखरि‍त होइत अछि‍ ततेक आन भाषामे नै। हमर शि‍क्षा गामहि‍-घरमे भेल अछि‍ तँं हि‍न्‍दी-अंग्रेजी नीक जकाँ लि‍खबाक-पढ़बाक लूरि‍ रहि‍तो हम अपन भाषामे बेशी सहज रहैत छी। अवकाश प्राप्‍ति‍क बाद हम अपन डोरि‍ सेहो आबि‍ गेलौं, तँ हम मैथि‍ली साहि‍त्‍यकेँ प्राथमि‍कतासँ लेल अछि‍। अपन तँ अपनहि‍ ने होइत छैक, जँ अनकर वस्‍तु बड्ड प्रि‍य आ अपन बड्ड अधलाहक मनोवृत्ति‍क संक्रमणसँ ग्रसि‍त नै होइ।
 
उमेश मण्‍डल-   की अहाँ कोनो तथ्‍यक झँपलाहा भाग उघारैत छि‍ऐक? अगर हँ तँ केना आ नै तँ किएक?
मायानाथ झा-    तथ्‍यक झँपलाहा भाग की भेल? कोनो पात्रक वा कोनो रीति‍क अशोभनीय अंश ओकर विद्रुपता, कुरूपता, अश्‍लीलता। जखन अहाँ वि‍वेचना करबैक तँ नींक-अधलाह दुनू देखबहि‍ पड़त। वि‍द्रूपताक वि‍श्लेषणात्‍मक वर्णन तँ बड्ड नीक मुदा ओकर बखि‍या उघाड़ब वा चीरहरण करब हमरा अवांछनीय लगैत अछि‍। सुधी पाठकक लेल इंगि‍त कऽ देब मात्र वेश भऽ जाइत छैक। सकारात्‍मक पक्षकेँ वि‍शेष रूपेँ दर्शाएब प्राय: सभ रचनाकारक उद्देश्‍य रहि‍ते छन्‍हि‍ कारण नीक साहि‍त्‍य आखि‍र कोन भेल वएह ने जे नीक तथ्‍यकेँ अमूल्‍य नीधि‍ साबि‍त कऽ सकए। तथ्‍यक उत्तमता, उत्‍कृष्‍टता पाठककेँ बि‍नु झकझोरिने नै छोड़ए।

उमेश मण्‍डल-   अहाँ कहि‍या-सँ-कहि‍या धरि‍ प्रवास केलौं? प्रवासमे एतेक दि‍न बि‍तेलाक बादो अहाँक रचनामे मि‍थि‍ला आ ओकर संस्‍कृति‍ मुख्‍य रूपसँ भेटैत अछि‍, की ई नोसटेलजि‍या छी? की प्रवास रहि‍ ओतुक्‍का अनुभवक लेखनक अहाँ प्रथमि‍कता अहाँ नै बुझै छि‍ऐक?
मायानाथ झा-    भारतीय थल सेनाक डाक शाखामे हम अपन जीवनक छत्तीस वर्ष आठ मास सत्रह दि‍न (13. 09. 1969 सँ 31. 05. 2006) बि‍ताओल। इहए हमर प्रवास काल-खण्‍ड थीक। लगभग चारि‍ दशकक बेदाग दीर्घ सेवापर हमरा गर्व अछि‍।
            सैन्‍य वि‍षयपर हम कि‍छु वि‍शेष नै लि‍खलौं अछि‍ से सही, कि‍न्‍तु तकरा हम अपन नैटटेलजि‍या नै मानैत छी। हमर पोथी सभमे लि‍खल भूमि‍का सैन्‍य जीवनक अनुभव आ परि‍पाटीक आधारेपर वर्णित अछि‍। एकटा कवि‍तामे छोटछीन बातक जि‍क्र सेहो अछि‍, नवीन रचना हास्‍य ऊर्जामे अनेक चुटकुलाक समावेश अछि‍। मोनमे जे एकटा वि‍शेष रचना (आत्‍म कथाक रूपमे) अकार नेने अछि‍ तकरा साकार नै कए सकलौं अछि‍। जाधरि‍ भगवतीक कृपा नै हएत ताधरि‍ नै भए सकत कारण हमर वि‍श्वास ओहीपर आधारि‍त अछि‍। जे भवतव्य हो सएह।

उमेश मण्‍डल-   अहाँ कहि‍यासँ लेखन प्रारम्‍भ केलौं, केकरा लेल लि‍खलौं, आइ-काल्हि‍ केकरा लेल लि‍ख रहल छी?
मायानाथ झा-    हम बाल्‍यावस्‍थेसँ लेखन प्रारम्‍भ केलौं। स्‍वजन गुरुजनकेँ कि‍छु फकरा-पि‍हानी जकाँ बना कऽ सुना दैत छलि‍यनि‍। मोन अछि‍ बहि‍नक सासुरमे बकरी मीयाँ दर्जीपर कि‍छु कड़ी जोड़ि‍ कऽ सुना देने रहि‍ऐ 1956-57क बीच। चवन्नी पारि‍तोषि‍क भेटल रहय। तकर बाद सांस्‍कृति‍क कार्यक्रम सभमे हम अपन भाषा सेनामे हि‍न्‍दी वा भोजपुरीमे पौरोडी बराबरि‍ बनबैत रहलौं अछि‍। पैरोडी गीत आकर्षणक वि‍शेष माध्‍यम बनि‍ जाइत छल। बराबरि‍ सराहना भेटैत रहल। सेनाक अपन शाखाक पत्रि‍का (मेल-मि‍लाप) मे हमर कवि‍ता आ आलेख बराबरि‍ छपैत रहल। पहि‍ल बेर प्राय: 1977-78 मे। कर्णामृत मैथि‍ली पत्रि‍कामे हमर क्रमश: दू गोट कवि‍ता छपल अछि‍, 2004 क सन्‍धि‍ कालमे।
हमरा जनैत कि‍यो लि‍खैत अछि‍ पहि‍ने अपना लेल। अपन लेखन हमरा भरपूर स्‍वान्‍त: सुख दैत अछि‍। तखन तँ लेखक अपन वि‍चार, भाव, मनोव्‍यथा, मोनक खुशी सभटाकेँ लेखनीक माध्‍यमसँ दोसरा तक पहुँचाबए चाहि‍ते अछि‍। भनसीयाक कएल भानसकेँ आन जखन खाइत छैक तखने ने ओकरा नीक भेलैक कि बेजाए से कहैत छैक। सएह बात लेखकोक प्रति‍ होइत छनहि‍। पाठके ने हुनक कृति‍क अवलोकन कए गुण-दोषक वि‍वेचना करैत छथि‍।
ओना हम वि‍शेषतया लि‍खैत छी, बच्‍चा, कि‍शोर, एवं युवा वर्गकेँ धि‍यानमे रखैत। हुनका लोकनि‍मे आजुक ि‍शक्षासँ सशक्त चारि‍त्रि‍क गठन होइत नै देखाइत अछि‍ जे अत्‍यन्‍त दयनीय एवं चि‍न्‍तनीय बात बुझाइत अछि‍। अर्थोपार्जनजनि‍त शि‍क्षा नैति‍कताक आधारशि‍ला कथमपि‍ नै गढ़ि‍ सकैत अछि | दोसर समस्‍या अछि‍ नवका पीढ़ीक अपन भाषासँ वि‍मुख होएब। ओहू पाछू ओएह अर्थ-पि‍शाच आबि‍ गेल छैक। वि‍द्वान भएक पूजि‍त हएब आजुक पीढ़ीक सेहन्‍ता  नै प्रत्‍युत-अरबपति‍ बनि‍ नाम कमाएब नि‍यति‍ छैक।

उमेश मण्‍डल-   की अहाँकेँ ई लगैत रहल अछि‍ जे मुख्‍य धारासँ अहाँ कति‍याएल गेल छी? अहाँक रचनामे समाजकेँ बाहरसँ देखबाक प्रवृति‍क की कारण?
मायानाथ झा-    प्रश्न पूर्णतया बोधगम्‍य नै प्रतीत होइत अछि‍। हमर कोन रचना मुख्‍य धारासँ कति‍आएल लागि‍ रहल अछि‍? मुख्‍य धारासँ अपनेक की तात्‍पर्य अछि‍? हमरा नै बूझि‍ पड़ैत अछि‍ जे हमर कोनो रचना ई लक्षि‍त करैत अछि‍ जे हमर प्रवृत्ति‍ समाजकेँ बाहरसँ देखबाक अछि‍। व्‍यक्‍ति‍क समष्टि समाज होइत छैक‍। समाजसँ बाहर व्‍यक्‍ति‍क अस्‍ति‍त्‍व तँ अर्थहीन भऽ जाइत अछि‍। हँ, बुद्धि‍जीवी समाजक आलोचक,वि‍वेचक एवं चि‍न्‍तक तँ होइते अछि‍। हम तँ अपनाकेँ अपन रचनाक माध्‍यमसँ कोनो रूपमे तइ सीमाक पार जाइत नै बूझि‍ रहल छी।

ि‍वदेह-        अपन साहि‍त्‍य आ रचनामे की स्‍वयंकेँ पूर्णरूपसँ इमानदार राखब आवश्‍यक छै?
मायानाथ झा-    रचनामे कोनो लेखकक ई अभि‍लाषा रहैत छैक जे ओ तथ्यके चरम बि‍न्‍दु तक लऽ जा सकए आ ई ि‍नर्भर करैत छैक ओकर लेखनीक शक्‍ति‍ आ चातुर्यपर। लेखकक ईमानदारीक निर्णायक होइत छथि‍ पाठक। पाठक होइत छथि‍ वि‍भि‍न्न रूचि‍ एवं वि‍चारक। तँए एक्के रचनाक प्रति‍ वि‍भि‍न्न पाठकक प्रति‍क्रि‍या वि‍भि‍न्न होइत अछि‍। रचनाकार अपन हि‍साबेँ अपने जगहपर रहि‍ जाइत अछि‍।

उमेश मण्‍डल-   मैथि‍ली साहि‍त्‍य आइक दि‍नमे की ई सभ (साहि‍त्‍यकार)क सामुहि‍क दोष स्‍वीकृति‍क रूप नै बुझना जाइत अछि‍?-
मायानाथ झा-    पुन: प्रश्न स्‍पष्‍ट नै अछि‍। तँए हमर कोनो प्रति‍क्रि‍या नै।

उमेश मण्‍डल-   की अहाँकेँ लगैत अछि‍ जे अहाँक पोथीकेँ हि‍न्‍दी, बंग्‍ला, नेपाली, अंग्रजी आदि‍ भाषामे अनुवाद कएल जाएत? तइ स्‍थि‍ति‍मे ओतए एकर कोन रूपेँ स्‍वागत हेतैक? की अहाँक साहि‍त्‍य ओइ भाषा आ संस्‍कृति‍ सभ लेल ओतबे महत्‍वपूर्ण रहतै जते ओ मैथि‍ली भाषा आ संस्‍कृति‍ लेल छै? अहाँक लेखन भाषा-संस्‍कृति‍ नि‍र्पेक्ष कि‍अए नै भऽ सकल?
मायानाथ झा-    हमर पोथी जँ अन्‍य कोनो भाषामे अनुवाद हुअए तँ ओ ओतबे स्‍वागत योग्‍य हएत जतबा ओ अपन भाषामे अछि‍। ओकरामे कोनो एहन बात नै छैक जे दोसर भाषामे अनुवाद भेने ओकर महत्ता न्‍यून भऽ जाइक। हमर पोथीक कोनो कथा भाषा-संस्‍कृति‍सँ तेना भऽ कऽ आबद्ध नै अछि‍ जे दोसराक लेल अग्राह्य बनि‍ जाएत।
 
उमेश मण्‍डल-   अहाँक भाषा तँ मैथि‍ली अछि‍ मुदा अहाँक लेखनपर बाहरी भाषा, संस्‍कृति‍, वि‍चारधाराक प्रभाव पड़ल अछि‍, कतौ-कतौ ई स्‍पष्‍ट अछि‍ मुदा बेसी ठाम नै, एकर की कारण?
मायानाथ झा-    सैन्‍य जीवनक क्रममे हम भारतक वि‍भि‍न्न क्षेत्रमे रहलौं खास कए कऽ पूर्वी एवं उत्तर-पूर्वी क्षेत्रमे। वि‍भि‍न्न भाषासँ पाला पड़ल। मुदा हाबी रहल मुख्‍यतया अपने भाषा। छि‍टपुट रूपेँ आनो भाषाक शब्‍द वि‍शेष रूपमे ऊर्दूक प्रयोगमे आबि‍ गेल हएत। ओना कौखनक कथानकपर वि‍शेष जोर देबाक गैर-भाषीय शब्‍दक प्रयोगकेँ हम अनुचि‍त नै बुझैत छी। सेनामे भाषाक शुद्धतापर ओतेक जोर नै देल जाइत छैक जतेक कथनक स्‍पष्‍टतापर, भलहि‍ं भाषा खि‍चड़ी कि‍एक नै भऽ जाए।

उमेश मण्‍डल-   अहाँक रचनाक प्रचार ऐ पुरस्‍कारक बाद भयंकर रूपसँ भेल अछि‍, अहाँकेँ ऐसँ केहेन अनुभव भऽ रहल अछि‍?
मायानाथ झा-    प्रसन्नता होइत अछि‍, उत्‍साह बढ़ल अछि‍। कि‍न्‍तु, प्रचार जे भेल हो, मुदा पोथीक मांग आइ धरि‍ कतौसँ नै आएल अछि‍, तँए प्रचारकेँ प्रस्‍तर बुझी तँ से आखि‍र केना?
            वि‍देह साहि‍त्‍य सम्‍मानक प्रति‍ सादर आभार।

हम पुछैत छी: विदेह मैथिली समानान्तर रंगमंचक संस्थापक मैथिली नाटक आ रंगमंचक आइ धरिक सभसँ पैघ नाम बेचन ठाकुरसँ मुन्नाजीक गपशप 

गमैया नाटकक परि‍वेशजन्य आधुनिक मैथिली समानान्तर नाटक आ रंगमंचक सृजनकर्त्ता एवं नि‍स्वा‍र्थ भावनासँ रचनारत श्री बेचन ठाकुर जीसँ हुनक रचनात्मक प्रक्रि‍या मादे युवा विहनि कथाकार मुन्नाजी द्वारा कएल गेल वि‍भि‍न्न प्रश्नक उतारा अहाँ सबहक समक्ष देल जा रहल अछि‍।

मुन्नाजी- प्रणाम ठाकुरजी!
बेचन ठाकुर- प्रणाम मुन्ना भाय!

मुन्नाजी- साहि‍त्यक मुख्य‍: दू गोट वि‍धाक एतेक रास प्रकारमे सँ अपने नाटकक सर्जनकेँ प्राथमि‍कता देलौं कि‍ए? एकर कोनो वि‍शेष कारण तँ नै अछि‍? अहाँक समानान्तर रंगमंच जे आन्दोलन शुरू कएने अछि ओकर मादेँ किछु कहए चाहब।
बेचन ठाकुर- मुन्नाजी, अहाँकेँ तँ बुझले हएत जे मैथिलीमे जातिवादी रंगमंच, खास कऽ महेन्द्र मलंगिया (ओकर आंगनक बारमासासँ लऽ कऽ छुतहा घैल धरिमे ई जातिवादी शब्दावली भरल अछि) आ हुनकर विचारधाराक लोक, कोन तरहेँ पत्र-पत्रिकाक माध्यमसँ आ सरकारी आ गएर सरकारी फण्ड आ सहयोगक माध्यमसँ गएर सवर्णक प्रति गारि आदिक प्रयोग कऽ रहल छथि, ओकर संस्कृतिकेँ तोड़ि कऽ प्रस्तुत कऽ रहल छथि, ओकरा लेल एहेन मैथिलीक प्रयोग कऽ रहल छथि जकरासँ ई सिद्ध हुअए जे ओ सभ मैथिली भाषी छथिए नै, कतौ बाहरसँ आएल छथि। आब मलंगियाक संस्था ई काज हिन्दीसँ मैथिलीमे अनूदित नाटकमे सेहो केलक, रामेश्वर प्रेमक नाटकक मैथिलीमे जल डमरू बाजेरूपमे घृणित अनुवाद आ मंचन भेल, गएर सवर्ण लेल तथाकथित छोटहा मैथिलीक प्रयोग कएल गेल, हिन्दीमे रामेश्वर प्रेम ऐ तरहक प्रयोग नै केने छथि, रामेश्वर प्रेम सेहो ई हेबऽ देबा लेल दोषी छथि।  हिन्दी सन कोनो भाषा आ मैथिलीकेँ मिश्रित कऽ ओ लोकनि ई सिद्ध करबामे लागल छथि जे ईएह मिश्रित भाषा मिथिलाक भाषा छी, आ ऐ तरहेँ मैथिलीकेँ मारबा लेल बिर्त छथि; किछु थोपड़ीक लोभेँ सेहो ओ ई कऽ रहल छथि। ओना तँ जइ पत्रिका आ सरकारी-गएर सरकारी माध्यममे एकर चर्च होइए ओकर पढ़निहारक संख्या तँ शून्ये अछि मुदा ओ सभ जँ अहाँ पढ़ू तँ लागत जे जे अछि से जातिवादी रंगमंचे अछि, ओना ओ वास्तविकतामे मैथिली रंगमंचक दसो प्रतिशत नै अछि। आ यएह सभ कारण शुरूसँ विद्यमान छल जइ कारणसँ हम समानान्तर रंगमंच पछिला २५ सालसँ चलबैत रहलौं। मुदा एकर कोनो विवरण मैथिलीक जातिवादी पत्रिकामे नै आएल। मुदा जखन पहिल विदेह मैथिली नाट्य उत्सव २०१२ भेल तँ ९०% लोकक समानान्तर रंगमंचक धाह ओइ जातिवादी रंगमंचकेँ/ मानसिकताकेँ बुझा पड़ऽ लगलै। रामदेव झा अपन दूटा पुत्र विजयदेव झा आ शंकरदेव झाक संग मैदानमे आबि गेलाह आ अपशब्दक प्रयोगक शुरुआत केलन्हि। मलंगिया जी अपन दुनू पुत्र ललित कुमार झा आ ऋषि कुमार झाक संग मैदानमे आबि गेलाह आ अपशब्दक प्रयोगक शुरुआत केलन्हि। तँ दुनू गोटेमे (रामदेव झा आ महेन्द्र झा मलंगियामे) समानता फेर सोझाँ आबि गेल। जातिवादी रंगमंच साहित्य अकादेमी पुरस्कारक लेल मलंगियाक नाम उठेलक, कमल मोहन चुन्नू नाटककारकेँ नाटक लेल पुरस्कार देबाक गप केलन्हि आ महेन्द्र मलंगिया लेल ऐ पुरस्कारक अनुशंसा केलन्हि, ओ कहलन्हि जे आइ धरि ई नै भेल अछि जे मैथिलीमे नाटककारकेँ नाटक लेल पुरस्कार भेटल अछि, ओ रामदेव झाकेँ भेटल पुरस्कारकेँ खारिज करैत कहलन्हि जे रामदेव झाकेँ जइ नाटक- एकांकी लेल पुरस्कार भेटलन्हि से कथाकेँ कथोपकथनमे लिखल मेहनति मात्र अछि (मिथिला दर्शनमे हुनकर लेख)। आ जखन महेन्द्र मलंगियाकेँ जातिवादी रंगमंचक मैथिली एकांकी संग्रहक ठेका साहित्य अकादेमीसँ चन्द्रनाथ मिश्र अमर”-रामदेव झा (ससुर-जमाएक जोड़ी)क अनुकम्पासँ भेटलन्हि तँ ओ मैथिलीक (जातिवादी रंगमंचक) १९ टा सर्वश्रेषठ एकांकीमे रामदेव झाक पिपासालेने रहथि, आब लिअ, रामदेव झा सर्वश्रेष्ठ नाटककार भऽ गेलाह!! आ ओइ पोथीक भूमिकामे चन्द्रनाथ मिश्र अमर”-रामदेव झा केँ खुश रखबा लेल गोविन्द झा आ सुधांशु शेखर चौधरीक मजाक तँ उड़ेनहिये छथि संगमे राधाकृष्ण चौधरी आ मणिपद्मकेँ किए ओ ऐ संग्रहमे शामिल नै केलन्हि, ओइ लेल हास्यास्पद तर्क सेहो देने छथि। गुणनाथ झाकेँ ओ शामिल किए नै केलन्हि!! सर्वहाराक रंगमंचकेँ ओ शामिल किए करितथि, ई संकलन तँ जातिवादी रंगमंचक छल किने!! आ जँ अहाँ जातिवादी रंगमंचक विरोध करब तँ मलंगिया जीक दुनू बेटा ललित कुमार झा, ऋषि कुमार झा फोन नम्बर +२३४८०३९४७२४५३ सँ अहाँकेँ धमकी देत जेना ललित कुमार झा उमेश मण्डल जी केँ देलन्हि वा विजयदेव झा +९१९४७०३६९१९५ नम्बरसँ धमकी देत जेना ओ उमेश मण्डल जी केँ २६ अगस्त २०१२ केँ धमकी देलन्हि आ आब अहाँ सोचमे पड़ि जाएब जे ई लोकनि कखन एक दोसराक पक्षमे आबि जाइ छथि आ कखन विरोधमे, कखन रामदेव झा नाटककार बनि जाइ छथि आ कखन खारिज भऽ जाइ छथि। जातिवादी रंगमंच आपसमे खण्ड-पखण्ड अछि, मुदा विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन आ विदेह मैथिली समानान्तर रंगमंचक विरोधमे ई सभ एक भऽ जाइत अछि। कमल मोहन चुन्नूकेँ नाटककार जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ लघुकथा संग्रह गामक जिनगीलेल टैगोर साहित्य सम्मान भेटलासँ एतेक कष्ट भेलन्हि जे ओ एक बेर फेर घर-बाहरमे मलंगिया जीकेँ साहित्य अकादेमी पुरस्कार भेटए, से फतवा जारी कऽ देलन्हि ई कहि कऽ जे मलंगिया जी मैथिलीक (जातिवादी रंगमंचक दृष्टिकोणसँ) सर्वश्रेष्ठ नाटककार छथि, मुदा ऐबेर ओ ई सतर्की केलन्हि जे सर्वश्रेष्ठ समालोचक, लघुकथाकार आ कविक नाम सेहो जोड़लन्हि, आ हुनको सभकेँ साहित्य अकादेमी भेटए से चर्च कऽ देलन्हि, जे आरोप नै लागएकहबाक आवश्यकता नै जे ऐ लिस्टक सभ समालोचक, लघुकथाकार आ कवि चुन्नू जीक ब्राह्मण जातिक छथि दोसर हुनका पढ़ल नै छन्हि। सर्वहारा वर्ग नीक जेकाँ बुझि गेल जे ई साहित्य आ ई रंगमंच ओकरा लेल नै अछि, से ओ अपनाकेँ ऐसँ कात कऽ लेलक, आ जँ विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन आ विदेह मैथिली समानान्तर रंगमंच नै अबितए तँ मामिला खतमे छल। हम आगाँ २५ साल धरि ई समानान्तर रंगमंच चलबैत रहब। पछिला २५ सालमे जतेक सफलता भेटल अछि ओइसँ हम उत्साहित छी, अगिला पचीस सालमे जँ हम जातिवादी रंगमंचक किरदानीक कारण मैथिलीसँ भागल सर्वहारा वर्गक किछु आर गोटेकेँ मैथिलीसँ जोड़ि सकब आ जे काज हमरासँ छूटि जाएत से अगिला पीढ़ी करत। जातिवादी रंगमंच आब सरकारी आ गएर सरकारी संस्थाक हथियार बनि कऽ रहि गेल अछि, ई ढहब शुरू भऽ गेल अछि, किछु ऊपरी सुधार, नामे लेल सही, ई कऽ रहल अछि। हमर लक्ष्य अछि जे अगिला पचीस सालमे ई जड़िसँ खतम भऽ जाए।

मुन्नाजी- अहाँक नाटकक कथानकमे केहेन स्थिति वा परि‍वेशक समावेश रहैए।
बेचन ठाकुर- जखन हम परि‍वारक संग वा पड़ोसीक संग गमैया नाच वा नाटक देखैले जाइत रही तँ हुनके सभसँ प्रेरि‍त भऽ नाटकक प्रति‍ अभि‍रूचि‍ जागल आ दि‍नोदि‍न बढ़ैत रहल आ तँइ हमर नाटकक कथानकमे समाजक स्थिति-परि‍स्थिति आ ओकर यथासंभव समाधानक परि‍वेश रहैए।

मुन्नाजी- अहाँ जहि‍या नाटक लेखन प्रारम्भ केलौं, कहू जे तहि‍या आ आजुक सामाजि‍क, सांस्कृिति‍क उपस्थापन वा बदलावक प्रति‍ अहाँक नजरि‍ये केहेन स्थि़‍ति‍ देखना जाइछ?
बेचन ठाकुर- कओलेज जीवनसँ कि‍छु-कि‍छु लि‍खैक प्रयास करैत रहलौं जैमे नाटक मुख्य रहल। नाटकक दृष्टि‍एँ प्रारंभि‍क सामाजि‍क आ सांस्कृतिक स्थिति तथा आजुक स्थितिमे बड्ड अंतर देखना जाइए। गमैया नाटक जस-के-तस पड़ल अछि‍, कनी-मनी आगू घुसकल अछि‍। मुदा शहरी नाटक अपेक्षाकृत आगू अछि, मुदा ओतए सोचक अभाव अछि‍।

मुन्नाजी- आइ नाटक कथानक, शि‍ल्प एवं तकनीकी दृष्टिकोणे उम्दा स्तरक प्राप्तिक संग थि‍येटरमे आबि जुमल अछि‍, अहाँ थि‍येटरमे प्रदर्शित आ गमैया नाटकक बीच कतेक फाँट देखै छी। आ कि‍ए?
बेचन ठाकुर- कथानक, शि‍ल्प एवं तकनीकी दृष्टिएँ थि‍येटर आ गमैया नाटकमे बड्ड फाँट देखै छी। दर्शकक आ कलाकारक साक्षरता, स्त्री-पुरूषक भूमि‍का, साज-बाजक ओरि‍यान, इजोतक जोगार इत्यादि‍मे बड्ड फाँट अछि‍। फलस्वरूप गमैया नाटक अपेक्षाकृत पछुआएल रहि‍ गेल अछि मुदा विषय वस्तुमे ई आगाँ अछि‍।

मुन्नाजी- गाममे आइयो बाँस-बत्ती आ परदाक जोगारे नाट्य प्रदर्शन होइछ आ दर्शक सेहो जुटैछ तँ अपने गमैया नाटक अतीतक दशा आ भवि‍ष्यक दि‍शा मादे की कहब?
बेचन ठाकुर- गमैया नाटकक प्रदर्शनमे दर्शकक भीड़ रहैए। कारण गाम-घरमे मनोरंजनक साधनक सामूहि‍क स्तरपर अभाव छै। शहरक देखादेखी आब गामो-घरक स्थितिमे सुधार भऽ रहलैए। तैं गमैया नाटकक दशा भवि‍ष्यमे अवश्य सुधरत, वि‍श्वास अछि‍।

मुन्नाजी- अहाँ एतेक रास वि‍भि‍न्न तरहक नाटक लि‍ख मंचन कैयौ कऽ हेराएल वा बेराएल रहलौं, कि‍ए? मलंगिया जीक रंगमंचक एकटा निर्देशक प्रकाश झा हमरा कहलन्हि जे अहाँ भरि दिन केश कटैत रहैत छी, रंगमंच अहाँ किए ने गेलिऐ!
बेचन ठाकुर- हम एकटा नि‍जी शि‍क्षकक दृष्टिएँ अपन वि‍द्यार्थीक बौद्धि‍क वि‍कास हेतु अपन कोचिंगक प्रांगणमे कोनो वि‍शेष अवसरपर, तैमे खास कऽ सरस्वती पूजामे, रंगमंचीय सांस्कृति‍क कार्यक्रमक बेबस्था‍ करै छी जैमे अपन निर्देशनमे वि‍द्यार्थी द्वारा कार्यक्रम संपादि‍त होइए। ओइ तरहेँ दर्जनो नाटकक मंचन सराहनीय ढंगसँ भऽ चुकल अछि‍। 
मलंगियाजीक जातिवादी रंगमंचक विरोधमे समानान्तर रंगमंच अछि तँ अहाँ हुनका लोकनिसँ की आशा करै छी! (हँसैत) ओना हमर ठाकुर टाइटिल सँ हुनका लोकनिकेँ भेल हेतन्हि जे हम नौआ ठाकुर छी, तेँ ओ ई बाजल छथि। मुदा जँ किओ ई काज कऽ रहल छथि आ अपन संस्कृतिक रक्षा कऽ रहल छथि, जेना नौआ ठाकुर लोकनि, तँ की हर्ज। विद्यापति ठाकुर, जे बिस्फीक नौआ ठाकुर रहथि, केँ बिदापत नाचक माध्यमसँ जिआ कऽ राखलन्हि नौआ ठाकुर लोकनि, विद्यापति आ मैथिलीकेँ हजार साल धरि जिआ कऽ राखलन्हि, तँ ऐमे ककरो किए कष्ट छै? आब तँ ओ लोकनि विद्यापतिकेँ ब्राह्मण बनेबामे लागल छथि। ओना हम बरही जातिक छी, से महेन्द्र झा मलंगिया जी आ प्रकाश झा जीकेँ अहाँ भेँट भेलापर कहि देबन्हि।
सूत्रक अभावमे हम हेराएल रही।  मुदा आब प्राप्त सूत्र आ बेबस्थाक कृतज्ञ छी।

मुन्नाजी- अहाँ नाटकक अति‍रि‍क्त अओर की सभ लि‍खै छी, सभसँ मनलग्गू कोनो वि‍धाक कोन प्रकारक अहाँ प्रेमी छी आ कि‍ए?
बेचन ठाकुर- हम नाटकक अति‍रि‍क्त विहनि कथा, लघुकथा, राष्ट्रीय गीत, भक्तिगीत, कवि‍ता, टटका घटनापर आधृत गीत इत्यादि‍ लि‍खबाक प्रयास करैत रहै छी। गोष्ठीमे उपस्थित भऽ कऽ कथा पाठो केलौंहेँ। सभसँ मनलग्गू वि‍धा  हमर संगीत अछि‍। ओना हमर प्रति‍ष्ठाक वि‍षय गणि‍त अछि‍।

मुन्नाजी- जाति‍-वर्ग वि‍भेद अहाँक रचनाकेँ कतेक प्रभावि‍त कऽ पौलक अछि‍, अपने ऐ जातीय वि‍षमताक टापर-टोइयामे अपनाकेँ कतऽ पबै छी?
बेचन ठाकुर- जाति‍-वर्ग वि‍भेद हमर रचनाकेँ अंशत: प्रभावि‍त केलक। ऐमे हम अपनाकेँ अपन जगहपर अड़ल पबै छी।

मुन्नाजी- नाटक वा अन्यान्य रचनात्मक सक्रि‍यताक मादे अपनेक अगि‍ला रूखि‍ की वा केहेन रहत?
बेचन ठाकुर- नाटक वा अन्यान्य रचनात्मक सक्रि‍यताक मादे अपन अगि‍ला रूखक संबंधमे कि‍छु नि‍श्चि‍त नै कहल जा सकैए, समानान्तर रंगमंच तँ चलिते रहत। इच्छा प्रबल अछि‍। जतए धरि‍ संभव भऽ सकत करब।

मुन्नाजी- अपनेक अमूल्य उतारा हेतु बहुमूल्य समए देबाक लेल हार्दिक धन्यवाद!
बेचन ठाकुर- अपनेक प्रश्नक यथासंभव जबाबसँ अपनाकेँ गौरवान्वित बुझि‍ अपनेकेँ हार्दिक धन्यवाद ज्ञापि‍त करैत हमरो अपार हर्ष होइए।



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पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २३० म अंक १५ जुलाइ २०१७ (वर्ष १० मास ११५ अंक २३०)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. आशीष अनचिन्हार-  "कतेक रास बात" इंटरनेटपर मैथिलीक पहिल उपस्थिति नै अछि ...