Sunday, September 30, 2012

'विदेह' ११४ म अंक १५ सितम्बर २०१२ (वर्ष ५ मास ५७ अंक ११४) PART III


 

३. पद्य








३.७.जगदानन्द झा 'मनु'

३.८.किशन कारीगर
जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल
की भेटल आ की हेरा गेल  (आत्म गीत)- (आगाँ)

हमरहि खातिर उनहत्तरिमे
छल बैंकक राष्ट्रियकरण भेल,
भेल तपस्या फलीभूत
आ लागल जे नव जनम भेल

सभ रातिक होइए भोर अपन
अस्तित्व पाठ ई पढ़ा गेल,
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ की हेरा गेल ।

एक दिस चाकरीक सुख-दुख छल
दोसर दिस साहित्यक धारा
तेसर दिस छूटल गाम-घर
छल उड़ल-उड़ल मन बेचारा
सपनामे छल हरियर धरती
आ फूल कते नव फुला गेल,
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ की हेरा गेल ।
ओ मूल,गोत्र आ गाम हमर
बाबाक धएल ओ नाम हमर
ओइ माइक शीतल छाहरि केर
आठो पल, आठो याम हमर

कर्तव्यक पावन धारामे
क्रमशः सभ किछु छल बिला गेल,
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ की हेरा गेल ।

पढलहुँ बच्चन आ दिनकरकें
नजरूल, विमल आ शंकरकें
आशापूर्णा,तसलीमा आ
गुरूदेव रवीन्द्रक आखरकें

नागार्जुन आओर निराला केर
खुट्टा छल मनमे गड़ा गेल,
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ की हेरा गेल ।

मिथिलाकें देखल मिथिलामे
देखल मिथिला सीवानोमे
पावनि-तिहार आ भोज-भात
भेटल समता परिधानोमे

छल एतहु दसानन केर लंका
रहिते-रहिते से बुझा गेल,
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ की हेरा गेल ।

हिमगिरि समान किछु पुरूष छला
किछु भेटला गंगाजल समान
दुविधामे जखन-जखन पडलहुँ
हुनकहि चरित्रकें कएल ध्यान

हुनकहि सिनेह केर छाहरिमे
मोनक सभ दुविधा मेटा गेल,
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ की हेरा गेल ।


 
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१.मिहिर झा-हौ रामचंदर२.राम वि‍लास साहु जीक दूटा कवि‍ता
मिहिर झा
हौ रामचंदर

हौ रामचंदर की दिन छैक
जी सरकार ओ दीन छैक

जमाना देखही तंग करै य
जी दुखी मोन के चंग करै य

दलान किया खाली पडल छै
चाहक लोभ जे नै बचल छै

ठाढ सोझाँ अछि पहिर के चट्टी
सरकार ओकर चलै छै भट्ठी

बेचैन मोन कोना रहू गाम
सरकार अपने के दियौ त्राण

सब छोडब त लोक की कहत
मोन साधब त वाह वाह करत

राम वि‍लास साहु जीक दूटा कवि‍ता-

सि‍म्मर केर फूल

लाल-लाल सि‍म्मर-फूल
देखि‍ सुग्गा ललचाइ
फूल रंग भोगार भेल
सुगा गेल लुभाइ
अपन उद्देश्‍य बि‍सरि‍
सि‍म्मरकेँ सोइरी लेलक बनाइ
सोइरी सेबैत-सेबैत सुग्‍गाकेँ
चि‍ल्‍का गेल हेराइ
फूलसँ फलसँ बनैत धरि‍
सुग्‍गा रहल उपास
फल एहेन ललि‍चगर
लोल मारि‍ते उड़ि‍ जाए
सुग्‍गाक उपास नै टुटल
पारनमे की खाएत
आश लगौने सुग्‍गा
सि‍म्मरपर भेल ि‍नरास
लोभमे फँसि‍ सुग्‍गा
अपने कर्मपर पचताए
शोगाएल सुग्‍गा बाजल
रूप रंग देखि‍ नै लोभाउ
रूपक माया जाल फँसि‍
भुखले तेजब प्राण।



ओलंपि‍क

बच्‍चासँ बूढ़ भेलौं
बड़-बड़ खेल देखैत रहलौं
पैंसठ बरख आजादि‍योक भेल
मुदा पूर्ण आजादी
कहि‍यो ने देखलौं
आइ धरि‍ सरकारक कठखेलमे
ओलंपि‍क खेल शुरू भेल
जनताक वि‍केट गि‍र गेल
देसक रूपैया खेल-खेलमे
मूड़ि-सूधि‍ सभ सधि‍ गेल
सभ शहरमे स्‍टेडि‍यम बनि‍ गेल
गाममे बेरोजगारी बढ़ि‍ गेल
आजाद देशमे के आजाद भेल
आजादीक झंडा फहरौने
की ओलंपि‍क तगमासँ
गरीबी-बेरोजगारी मि‍ट गेल
जखन आजाद देशक जनता
अखनो बाटीमे भीख मंगैए
तखन सरकार ओलंपि‍कमे
अरबो रूपैया कि‍अए लगबैए
एतेक रूपैया खेती-उद्योग
आ रोजगारमे कि‍अए ने लगबैए
जखन देशमे एतेक गरीबी छै
आलंपि‍ककेँ की जरूरी छै
जखन देशक आत्‍मा
गाम-घरमे बसै छै
तँ गाम-वासी कि‍अए
एतेक उपेक्षि‍त छै
जे गामक लोक
नरकमे जीबै-मरै छै
गामवासीक लहु बेचि‍
सरकार ओलंपि‍क खेलै छै
ओइसँ गरीबकेँ की भेटलै
जखन खोदै छै पहाड़ तँ
मूस भागि‍ जाइ छै।


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जगदीश प्रसाद मण्डल
१० गोट गीत
जगदीश प्रसाद मण्‍डलक 10 गोट गीत-

चढ़ि‍ अन्‍हार......

चढ़ि‍ अन्‍हार पख भरि‍-भरि‍
अमवसि‍या कहबैत अबै छै।
तहि‍ना ने इजोरो बढ़ि‍-बढ़ि‍
मास पूब कहबैत चलै छै।
चढ़ि‍ अन्‍हार......।

काटि‍ इजोर कपचि‍-सपचि‍
पून प्रकाश पाबैत कहै छै।
खेल जि‍नगीक खेलाड़ी
चढ़ि‍-चढ़ि‍ रंगमंच कहै छै।
चढ़ि‍-चढ़ि‍......।

जस-जसोदा भेद बि‍नु बुझने
लीला धड़धड़बैत करै छै।
तीत-मीठ फल फलाफल
सि‍र चढ़ि‍ सि‍रताज कहै छै।
सि‍र चढ़ि‍......।



दुनि‍याँक जेहने......

दुनि‍याँक जेहने मंच मंचबै,
तेहने ने रंगमंचो बनै छै।
पाट बनि‍ जेहेन पाट खेलबै
देखि‍नि‍हारो तेहने देखै छै।
दुनि‍याँक जेहने......।

चाहै सभ छै चैन चीत
दुख-भुख दुनि‍याँ सेहो कहै छै।
सुख सुखाएल सूतल-पड़ल
सि‍र संजीवनी भेटै कहाँ छै।
सि‍र संजीवनी......।
दुनि‍याँक जेहने......।

हरि‍ अनंत हरि‍ कथा अनंता
हँसि‍ गीत भागवत गबै छै।
हेरि‍ शक्‍ति‍ शक्‍ति‍ हरीक
बाघ चढ़ि‍ भगवती कहै छै।
बाघ चढ़ि‍......।
दुनि‍याँक जेहने......।



रहल नै तकनि‍हार......

रहल नै तकनि‍हार। मीत यौ
रहल नै तकनि‍हार।
तकति‍यान अपने सि‍र देखए
रहल नै देखि‍नि‍हार। मीत यौ
सभ दि‍न रहल ताक तकए
रहल नै बूझि‍-बुझि‍आर।
हेर हेरि‍ हरण हरैण
रहल दि‍न दुर-काल, मीत यौ
हराएल-ढराएल वन बीच
संगीक रहल अकाल।
पहाड़ बीच समुद्र तहि‍ना
आनए ज्‍योति‍ सकाल, मीत यौ
आनए ज्‍योति‍ सकाल।



पेटक ताप......

पेटक ताप जहि‍ना तपै छै
तपै छै तहि‍ना मनक ताप।
वेद-पुरण मि‍लि‍त मीलि‍
एक वरदान एक अभि‍शाप।
भाइ यौ......।

तपैक तप तपस्‍या जहि‍ना
सभकेँ तपैक अछि‍ दरकार।
बि‍नु तापे तप केना तड़तै
पेते केना उचि‍त-उपकार।
भाइ यौ......।

वि‍लपि‍-वि‍लपि‍ भगवत मंगै छै
बीच व्‍यास भागवत देखै छै।
शक्‍ति‍ पाबि‍ शालीनी जहि‍ना
सि‍ंह सवार शंख फूकै छै।
भाय यौ......।



जेहन मुँह......

जेहन मुँह तेहन हँसी
सभ दि‍न हँसैत एलैए।
मुँहक जेहन गढ़नि‍-मढ़नि‍
तेहने तान भरैत एलैए।
तेहने......।

जाधरि‍ डोर नै बनि‍-बनि‍
घास साबे कहबैत एलैए।
बनि‍ते डोरी समेटि‍-बटोरि‍
गृह-वास कहबैत एलैए।
गि‍रह-वास कहबैत एलैए।
गि‍रह-वास......।

जीह-दाँत सभ संग पूरै छै
आँखि‍-कान सभ संग एलैए।
लहरि‍ बीच लहरि‍-लहरि‍
हास-हँसी हँसैत एलैए।
हास-हँसी......।




धार संग नाह......

धार संग नाव तखने चलै छै
जल जलदार बनल रहै छै।
जल-जलदार......।

देख मानसून लपकि‍-झपकि‍
धरा-धार बनबैत रहै छै।
ओद्र आद्रा पाबि‍ पबि‍ते
मजि‍ मजरि‍ मोजर धड़ै छै।
मजि‍ मजरि‍......।

जेना-जेना मनसून पबै छै
तेना-तेना नाव धार चलै छै।
पूरबा-पछबा झोंक पाबि‍-पाबि‍
मन-तेज गति‍आइत चलै छै।
मन्‍दतेज......।

गति‍ धार जलधार जहि‍ना
मति‍यो तहि‍ना मनसून चलै छै।
गति‍-मति‍ कखनो संग-साथ
तँ कखनो झहरैत रहै छै।
तँ कखनो......।



मन मशीन......

मन मशीन मंत्रणा करै छै
युग-परि‍वर्तित हेबे करतै।
सभ दि‍नसँ होइते एलैए
सभ दि‍न हेबे करतै।
मन मशीन......।

मथि‍-मथि‍ मन मशीन बनि‍
गति‍ तेज हेबे करतै
साधन युक्‍त परि‍वार जहि‍ना
धरा-धार बहबै करतै।
धरा-धार.....।

एक अलंग मशीन जि‍नगीक
दाेसर नीति‍ कहबे करतै
नीति‍-अनीति‍ कुनीति‍ बनि‍ते
एक-सँ-एक लड़बे करतै।
एक-सँ-एक......।



खट-मीठ......

खट-मीठ बनि‍-बनि‍ चटलौं
सुआद आम केना पेबै यौ
खट-मट खरकैट-खरकैट
चि‍क्कन केना बनेबै यौ।
चि‍क्कन केना......।

तेतरि‍ रोपि‍ तेहेन लगेलौं
गुड़-आम संग पेलौं यौ
रंग बदलि‍ सुआदो बदलि‍
कृत्रि‍म प्रकृति‍ कहेलौं यौ
कृत्रि‍म......।

जेहने फल पेलौं तेतरि‍क
तेहने गढ़ि‍ हवा बनेलौं यौ
चर्क-कुष्‍ट नि‍मंत्रि‍त कऽ कऽ
रोग-मराएल बनेलौं यौ
रोग-मराएल......।

  


झोंकमे......

झोंकमे झोंका गेलौं, मीत यौ
छोड़ि‍ जि‍नगी उड़ि‍या गेलौं।
झोंकमे......।

पार नै पाबि‍ गुन-गुना
धन-धरम कि‍छुओ ने पेलौं।
मान-दान घाट घटि‍-घटि‍
अपसोचमे नहा गेलौं
झोंकमे......।

नै जानि‍ दुनि‍याँ-दि‍वाना
भरल दि‍वाना दुनि‍याँ पेलौं।
प्रेमी-प्रेम पकड़ि‍-पकड़ि‍
अपने तँ कि‍छुओ ने पेलौं।
मीत यौ, झोंमे......।

बि‍नु प्रेम खाली नै दुनि‍याँ
राधि‍-अराधि‍ कि‍छुओ ने पेलौं
मूंडे-मूंडे मति‍-वि‍मति‍ बीच
सुमति‍-कुमति‍ सगतरि पेलौं।
मीत यौ, झोंकमे.......।



पबि‍ते पैग......

पबि‍ते पैग पि‍आलि‍क
घोड़चालि‍ चालि‍ धड़ए लगै छै।
छान-पगहा बीच घोड़ाएल
घोड़छान चालि‍ चलै छै।
घोड़छान......।

उठि‍ते दोसर पैग-पग
सि‍ंह-सि‍ंहासन सजबए लगै छै।
कुदैक-कुदैक फानि‍-फना
फन-फना डुमबए लगै छै।
फन-फना......।

चढ़ि‍-चढ़ि‍ डंक डकडका
गद-गधैया पकड़ए लगै छै
ता-थइ, ता-थइ नाच-नाचि‍
गाम गदह करए लगै छै।
गाम गदह......।



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१. राजदेव मण्‍डल २.ओमप्रकाश झा
राजदेव मण्‍डल
दूटा कवि‍ता-

महफा आ अरथी

कारी आ उज्जर वस्‍त्र अछि‍ पसरल
नापैत-जोखैत जा रहल छी ससरल
पैघ भेल जा रहल अछि‍ दूरी
धेने कड़ी आ गोंतने मुड़ी
ऊँच-गहींर आ समतल
नव-नव दृश्‍य बनए पल-पल
काठ-कठोर बनल हरपल
छन मात्र होइत अछि‍ चंचल
टपैत देस-कोस
बनैत दुसमन-दोस
दुखमे होश
सुखमे बेहोश
काल जीत रहल अछि‍
उमेर बीत रहल अछि‍
तैयो जोड़ैत घटी-बढ़ती
आगू शेष ऊसर-परती
कतबो नापब नै होएत
नापल धरती
महफा शुरू केलक
अन्‍त करत अरथी।

काटैत बीआ

छुटैत नि‍साँस जेना नि‍कलए जान
ऊपर ताकए खाली आसमान
नीचा डहि‍ रहल पोसल बीआ
देखि‍-देखि‍ फाटै छै हीया
हँसुआसँ काटि‍ रहल फसल केर सीना
देह भीजल अछि‍ घाम-पसीना
करए पड़त आगूक आस
अपनहि‍ काटैत लगाओल चास
थरथराइत हाथ जानैत अछि‍
बीआ रहि‍-रहि‍ केना कानैत अछि‍
हँसुआ कहै आ सुनै कान
फुलकी फुला गेल बहि‍ गेल नि‍शान
आब कि‍ रोपबह हे कि‍सान
जेतबे बोझ बीआ ततबे धान।

  

ओमप्रकाश झा

गजल

भीख नै हमरा अपन अधिकार चाही
हमर कर्मसँ जे बनै उपहार चाही

कान खोलिकऽ राखने रहऽ पडत हरदम
सुनि सकै जे सभक से सरकार चाही

प्रेम टा छै सभक औषध एहिठाँ यौ
दुखक मारल मोनकेँ उपचार चाही

सभ सिहन्ता एखनो पूरल कहाँ छै
हमर मोनक बाटकेँ मनुहार चाही

"ओम" करतै हुनकरे दरबार सदिखन
नेह-फूलसँ सजल ओ दरबार चाही
बहरे-रमल
दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ (फाइलातुन) - प्रत्येक पाँतिमे तीन बेर

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मुन्नी कामत
भ्रष्टाचारक प्रसाद
एगो खेल खेलैत देखलौं
स्कूलमे
हरा गेल छल खिचरी
सभ प्लेटमे।
देख कऽ भेल अचम्भा
पुछलौं सर ई कोन अछि
जादू
-टोना
सर कहलखिन
कि कहब हम केहन अछि
भ्रष्टाचारक मारि
अबैए तँ यऽ भरल प्लेट
मुदा मिलैत अछि यएह जादूक खेल।
एक मुट्ठी बरका बाबू
एक मुट्ठी छोटका बाबू
दू मुट्ठी अफसर साहेब
आ झपटैत अछि
तीन मुट्ठी कलर्क बाबू
देखते
-देखते गाममे फकाइत अछि
मुट्ठी
-मुट्ठी अहिना बटैत अछि।
जकरा देखू टक लगेने अछि
कहैत छथि हमरा दिअ
ई तँ सत्यनरायण भगवानक प्रसाद अछि।



तब हँसत तुलसी
हम एक पुरूषक बेटी छी
एक पुरूषक बहिन
एक पुरूषक पत्नी
तँ एक पुरुषक मॉं
हर पग-पग पर
हर संघर्षक बीच
हर सुख-दुखमे
हर रूपमे हम पुरूषक संगे ठार छी
हमरो मुँहमे वएह जुवान अछि
हमरो दृष्टि वएह देखैत अछि
हमरो दिमाग वएह सोचैत अछि
हमरो जिगर मे वएह साहस आ हौसला अछि
आइ पुरुषक संगे चलैमे हम समर्थ छी
तँ फेर किए आइयो
१००मे सँ ७५ महिला
घरेलू हिंसाक शिकार अछि
ई हमरा लेल नै
हे बद्धिजीवी अहॉं लेल शर्मक बात अछि।
आबो जागु हे मानुस
विकसित अपन विचार करू
नारीकेँ परितारित करनइाइ छोड़ूू
नव युगक निर्माण करू।
जतऽ नै हएत नारीक इज्जत
ओइ समाजक केना विकास हएत
केना रहत हँसैत तुलसी
केना आंगन मुस्कुरैत
माँक पूजा पहिले करि
नतमस्तक भऽ मन झुकाए
देखयौ फेर काल्हि अपन
कतेक सुन्दर अछि हँसैत खेलाइत।
 
शिल्पकार
आइ हम देखै छी जइ दिस
वएह दिस ठार एगो शिल्पकार अछि
दौड़ रहल यऽ सभक सभ
अइ रेसमे लऽ कऽ अपन औजार
कहि रहल अछि देव हम संसारकेँ
नव रूप रंग आकार।
मुदा ककरो नै
टटोलैत देखै छी खुदकेँ
नै निखारैत अपन
प्रतिभा आ गुणकेँ।
ई संसार तँ परिपूर्ण अछि
सभ लोभ मोह आ भय सँ दूर अछि
फेर अकरा हम कि देव अकार
रूप रंग आ प्रकार।
बनाबै कऽ यऽ तँ बनाउ
अपन प्रतिमा अपन ओजार सँ
निखारू मानवता खुदमे
अपन उच्च विचारसँ।


याद गामक
गामक बर मन पड़ै यऽ
पिपरक गाछ
पुरबा बसात
पिअर सरसो मन पड़ै यऽ।
लटकल आम
मजरल जम
गमकैत महुआ मन पड़ै यऽ।
धारक खेल
कदबा खेत
रोटी-चटनी मन पड़ै यऽ।
बाधक झिल्ली
मुठिया धान
पुआरक बिछौैन मन पड़ै यऽ।
घुरक आगि
पकैल अलुहा
ओ गपशप मन पड़ै यऽ।
गामक बर मन पड़ै यऽ।


आसक किरण
अखार बितल
सौन बितल
बितल जाइ यऽ
भादबक बहार
सुइख गेल सभ
इनार-पोखैर
नै बरसल अबकि एको अछार।
बजर भेल
मॉं धरती
कारी सभ
गाछ-पात
कोन पाप भेल
हमरा सब सँ
आबो तँ बताबऽ हौ सरकार।
नै खाइ लऽ अन्न
नै बुझबै लऽ तरास
अहिना तक बितेबएय
और कतेक मास
आब समटऽ
अपन भाभट
दए हमरा सभकेँ
जिऐ कऽ आसार
हे भगवान तूँ
बरसाबऽ पानिक बोछार।



नारीक पहचान
देख कऽ चिड़ै-चुनमुन
मन होइत छल कि
हमहुँ उड़ी अम्बरमे।
जा कऽ देखी
घरक अलावा
की अछि
अइ संसारमे।
भइया संगे हमहूँ
जाइतौं स्कूल
उलझल रहितौं किताबमे।
मुदा जब निहारलौं
अपन दिस
छल बानहल जंजीर
पएरमे।
माय कहलक
हमर मान आ बाबुक पगरी
छै दुनू तोरे हाथमे।
नैन टा
हमर उछलैत मन
मरि गेल विडम्बनाक अइ संसारमे।
सपना देखैसँ पहिले
जगा देलनि
सुनि मायक वचन
बहुत कचोट भेल मनमे।
हम बेटी छी
आकि अवला
जे चुप रहैक यएह इनाम मिलैत अछि
पुरूष सत्तातमक अइ समाजमे।

आजाद गजल

मनमे आस सफर लम्बा अनहार बहुत
पनपि रहल अछि मनमे सुविचार बहुत

नै डर अछि मिटै कऽ हमरा एको रती
बढ़ैत ने रहए चाहे ई अत्याचार बहुत

सर उठा कऽ चलैत रहब हम सदिखन
दिलमे अछि घुरमि रहल धुरझार बहुत

बेदाग रहत चुनरी सीताक बुझल अछि से
देहमे अछि अखनो प्राण आ इनकार बहुत

चिड़ैैत रहब अनहारक कलेजा छी ठनने
मुन्नीकेँ मिलत अइसँ आगू प्रकार बहुत



मुदत्ते बाद महफिलसँ मुँह झाम निकलल
बेकार छल निकलल जेना काम निकलल

हरा गेल भीड़मे आबि कऽ ताकी निङ्गहारि
नतीजा जे छलै निकलबाक सरे-आम निकलल
 
छिन गेल सरताज हमर खाली माथ हँसोथी
बेबस बनि लाचार शर्मसार अवाम निकलल
 
फेर सत्तामे अबैक उम्मीद नै एक्को रती
घुरब नै फेर आइ ओ देने पैगाम निकलल

सच तँ ई अछि राजनीतिमे दाग लागल
मुन्नी अपनेे करमसँ कत्लेआम निकलल

 
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नन्‍द वि‍लास राय जीक दूटा कवि‍ता-

कन्‍याँदान

हम छी बड़ परेशान यौ बाबू
हम छी बड़ परेशान।
हमरा माथपर लादल अछि‍
तीन-तीन कन्‍याँदान।

खेत-खरि‍हाँन बेचि‍
जेकरा पढ़ेलौं
पढ़ा-ि‍लखा कऽ
मनुक्‍ख बनेलाैं
ऊहो भऽ गेल वि‍रान।
राति‍-दि‍न एतबे
सोचैत रहै छी
केना बचत हमर मान
हमरा माथपर लादल अछि‍
तीन-तीन कन्‍याँदान।

आइक युगमे बेटी बि‍आहब
रहि‍ नै गेल आसान।
ओकरा लेल तँ पहाड़ बनल अछि‍
जे छथि‍ कोनो कि‍सान
मनमे घुरि‍आइत रहैत अछि‍
केना हएत ऐ समस्‍या केर नि‍दान।
डर रहैए हरि‍दम मनमे
इज्‍जत ने हुअए नि‍लाम
जेकरा-जेकरा अप्‍पन बुझैत छलौं
सभ भऽ गेल आन।
अाँखि‍क सामने नचैत रहैत अछि‍
बेटी तीनू जवान
हमरा माथपर लादल अछि‍
तीन-तीन कन्‍याँदान।

दहेज खाति‍र
मानव भऽ गेल दानव
के पोछत हमर नोर
हम केकरा लग कानब
सबहक हृदए भऽ गेल कठोर
वि‍द्वानो सभ भऽ गेल बैमान
हमरा माथपर लादल अछि‍
तीन-तीन कन्‍याँदान।

जहि‍यासँ बरतुहार गेल आपस
हमर कनि‍याँ धऽ लेलीह ओछान।
वर खोजैत-खोजैत
चप्‍पल हमर घँसि‍ गेल
पड़लौं हम बेराम।
हमरा माथपर लादल अछि‍
तीन-तीन कन्‍याँदान।

एहेन मनुक्‍ख आइ धरि‍ नै भेटल
जे करत हमरापर उपकार
बि‍ना दहेजक बेटा बि‍आहि‍ कऽ
हमरा माथसँ उतारत भार।
एहेन मनुक्‍ख जौं हमरा भेटताह
जे करताह एहेन शुभ काम।
चादरि‍-मुड़ेठा मखानक मालासँ
हुनकर करब सम्मान।


बेपार

एक दि‍न कनि‍याँ
हमर बाजलि‍-
यौ, पढ़लौं-लि‍खलौं
मुदा नै भेल कोनो नौकरी
तँ अहि‍ना रहब बेकार
कि‍एक नै शुरू करैत छी
कोनो छोटो-छि‍न बेपार
हे! कहाबत छै
जे ने करए कपार
से करए बेपार।

हम कहलि‍ऐ-
पूजी केर केना हएत जोगार?”

ओ बजलि‍-
हम नैहरसँ आनि‍ देब
पचीस-पचास हजार
तहीसँ शुरू कए लेब
कोनो छोट-मोट रोजगार।
जौं परि‍स्‍थि‍ति‍सँ
अखन जाएब हारि‍
तँ अबैबला धि‍या-पुता
देत अपना सभकेँ गारि।

हम कहलि‍ऐ-
अहाँक बड़ नीक अछि‍ वि‍चार
जल्‍दीसँ नैहर जाउ
आ ओतएसँ ढौआ मांगि‍ लाउ।

भरि‍ दउरा सनेस लऽ
ओ नैहरा गेलीह
भोरे बैरंग आपस एलीह।
हम पुछलि‍यनि‍-
की यै, भऽ गेल ढौआक जोगार?”

हमर कनि‍याँ बजलीह-
हम बाबू-मायसँ कहलि‍यनि‍
हमरा कि‍छु टकाक अछि‍ दरकार
सोचैत छी शुरू करैले कोनो बेपार।
ओ सभ बजलाह,
हम अपने छी लाचार
कतएसँ देब तोरा
टाका पचीस-पचास हजार।

हम कहलि‍ऐ-
ओ सभ छथि‍न अमीर
हम सभ छी गरीब
अमीरकेँ कहि‍या
गरीबसँ रहलनि‍ सरोकार।

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जगदानन्द झा 'मनु' 
ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीह्टोंल, मधुबनी 

गीत- १   

नैहरसँ एलै नै कोनो संदेश
 
पिया घर बसलहुँ दूर परदेश

भैया बिसरलहुँ
 बाबू नहि एलहुँ 
दुनियाँकेँ रीतमे किएक भगेलहुँ

सखी बहिनिपा सभटा छूटल
 
नेनपनकेँ जोड़ल सभटा सपना टूटल

रानी कहि कहि मए अहाँ पोसलहुँ
बर्खसँ आइ मुँहो नहि देखलहुँ

छूटल टोल आ बाट सभ छूटल
 
अपन गामक कौओ नै भेटल
 

नै
 आब  बेसी हम सहि सकबै
आउ भैया 'मनु' नै तँ हम नै जीबै |
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गीत-२
 

भोलेबाबा हौ
खोलबअ केखन अपन द्वार ) -२
 

हम दुखिया जन्मे कए दुखल
 
एलहुँ तोहरे द्वार
 
भोलेबाबा हो - - - - - अपन द्वार
 

तन दुखिया अछि मन अछि दुखिया
 
दुखिए जन्म हमार
सुनि महिमां भोले
 एलहुँ तोरे द्वारे 
करबअ केखन हमर उद्धार
 
भोलेबाबा हो - - - - - अपन द्वार
 

मुनलह तु अपन नयना
 
मुनलह हमर कपार
 
एलहुँ
 भटकैत,भटकैत तोरे द्वारे 
मुनलह किएक अपन केबार
 

 भोलेबाबा हो - - - - - अपन द्वार ) -२ 

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गीत-३
 

लगबियौन-लगबियौन हिनकर बोली ई, दूल्हा आजुकेँ
 
हिनकर बड्ड
 मोल छैन,  तँ दूल्हा आजुकेँ 
हिनकर बाबू
 बिकेलखिन लाखे, बाबा कए हजारी
लगबियौन मिल जुइल कs बोली ई दूल्हा आजुकेँ
 

हिनकर गुण छैन बरभारी, ई रखै छथि दूटा बखारी
दरबज्जा पर जोड़ा बडद,रंग जकर छैन कारी
भैर दिन ई पाउज
 पान करैत छथि, जेना करे पारी
भोरे उठि
 ई लोटा लs s पीबए जाए छथि तारी

साँझु-पहर चौक पर जेता, चाहीयनि
 हिनका सबारी
ई छथि माएक बड्ड -दुलरुआ,हिनका दियौंह एकटा गाड़ी
हिनकर गुण छैन बरभारी ई पिबई छथि खाली तारी
हिनका पहिरs आबै छैन नहि धोती, दियौन जोर भैर सारी
 

लगबियौन-लगबियौन हिनकर बोली ई,दूल्हा आजुकेँ
 
हिनकर बर मोल छैन,
 तँ दूल्हा आजुकेँ 


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गीत-४
 


(आलू
 कोबी मिरचाई यै, 
की
 लेबै यै दाय यै / दाय यै )-२

कोयलखकेँ
 आलू, राँचीकेँ  मिरचाई यै 
बाबा करता बड्ड, बड़ाई यै / बड़ाई यै
आलू
 कोबी - - - - - - -दाय यै 

नहि लेब तँ
 कनी देखियो लियौ 
देखएकेँ
 नहि कोनो पाई यै / पाई यै 
आलू
 कोबी - - - - - - - - दाय यै

दरभंगासँ अन्लौंह विलेतिया ई कोबी
 
खाए कs s कनियाँ बिसरती जिलेबी
 

कोयलखकेँ
 आलू  ई चालू  बनेतै
धिया-पुताकेँ
 बड्ड  ई सुहेतै
राँचीसँ अन्लौंह मिरचाई यै
 
की
 लेबै यै दाय यै / दाय यै 

( आलू
 कोबी मिरचाई यै, 
की
 लेबै यै दाय यै / दाय यै )-२

----------------------------------------------------


गीत-५
 


यै
 सुंदर-सुंदर कनियाँ, अहाँकेँ  बाजे बड्ड  नीक पैजनियाँ |
ई झुमकी,लाली,बिंदियाँ, चम्-चम् चमके अहाँकेँ
 ओधनियाँ ||

कनिको तँ
 संहालू अपन, ओ मुस्की चौबन्नी बाली |
नै तँ लs लेत हमर जान , यै कनियाँ -झिटकी
 बाली ||

ई कल्पतरु सन बिखरल , मनोहारी कंचन-वेश |
बिषधरसँ बेसी मादक , ई सुंदर अहाँक केश ||

रहितों जँ
 हम कवी , रचितहुँ  सुन्नर  कविता |
बस मोने-म़ोन देखै छी, हम अहाँक छबिता ||

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किशन कारीगर

फुसियाँहिक झगड़ा
           (हास्य कविता)
जतैए देखू ततैए देखब झगड़ा
बेमतलबो के होइए रगरम-रगड़ा
जातिवाद त कियो क्षेत्रवाद के नाम पर
लोक करै फुसियाँहिक झगड़ा।

चुनावी पिपही बजैते मातर
की गाम घर, आ की शहर-बज़ार
एहि सँ किछु होना ने जोना
मुदा लोक करै फुसियाँहिक झगड़ा।

फरिछा लेब, हम ई त तूं ओ
हम एहि ठामहक तूं ओई ठामहक
एक्के देशवासी रहितहु हाई रे मनुक्ख
लोक करे फुसियाँहिक झगड़ा।

अपने देश मे एक प्रांतक लोक
दोसर प्रांतक लोक के घुसपैठी कहि
खूम राजनीतिक वाहवाही लूटैए
दंगा-फसाद, आ कि-की ने करैए।

नेता सबहक करनामा देखू
ओ करैथ वोट बैंक पॉलिसी के नखरा
हुनके उकसेला पर भेल धमगिज्जर
आ लोक केलक फुसियाँहिक झगड़ा।

लोक भेल अछि अगिया बेताल
नेता नाचए अपने ताल
कछमछि धेलक चुप किएक बैसब
आऊ-आऊ बझहाउ कोनो झगड़ा।

जातिवाद के नाम पर वोट बटोरू
दंगा-फसादक मौका जुनि छोड़ू
अपना स्वार्थ दुआरे भेल छी हरान
क्षेत्रवादक आगि पर अहाँ अप्पन रोटी सेकू।

की बाबरी आ की गोधरा कांड
बेमतलब के भेल नरसंहार
कतेक मरि गेल, कतेको खबरि नहि
मुदा एखनो बझहल अछि सियासी झगड़ा।

देश समाज जाए भांड़ मे
नेता जी के कोन छनि बेगरता
जनता के बेकूफ बनाउ
हो हल्ला आ कराऊ कोनो झगड़ा।

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विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत
१.राजनाथ मिश्र (चित्रमय मिथिला) . उमेश मण्डल (मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव-जन्तु/ मिथिलाक जिनगी)
१.
राजनाथ मिश्र
चित्रमय मिथिला स्लाइड शो
चित्रमय मिथिला (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ )

.
उमेश मण्डल

मिथिलाक वनस्पति स्लाइड शो
मिथिलाक जीव-जन्तु स्लाइड शो
मिथिलाक जिनगी स्लाइड शो
मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव जन्तु/ मिथिलाक जिनगी  (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ )


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विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती
१. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल)
२.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद
३.कनकमणि दीक्षित (मूल नेपालीसँ मैथिली अनुवाद श्रीमती रूपा धीरू आ श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि)
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बालानां कृते
१.जगदीश प्रसाद मण्डल-बाल विहनि कथा- बुढ़ि‍या दादी २.मुन्नी कामत- दूटा बाल कविता
जगदीश प्रसाद मण्डल
बुढ़ि‍या दादी

नै जानि‍ दादीकेँ एहेन तामस कि‍अए भऽ गेलनि‍। एक तँ ओहुना बैशाख-जेठक सुखाएल जारनि‍ चरचराइत रहैए, खढ़क छौड़ैत-छार पटपटाइत रहैए, तइ हि‍साबे दादीयोक खटखटाएब अनुकूले भल। दादी माने तीन पीढ़ी ऊपर नै कि‍ गामक बनौआ दादी। नवो-नौताड़ि‍ बनौआ दादी होइते छथि‍, उचि‍तो छैक। गुड़-चाउर जे जते खेने हेतीह।

आठ-दस बर्खक पोता अपन कुत्ताकेँ अनठि‍यासँ लड़ा देलक जइसँ कोनचरक सजमनि‍क गाछ टूटि‍ गेलनि‍, तेकरे तामस दादीकेँ पोतापर रहनि‍। जखन टुटलनि‍ तखन बाधमे रहथि‍ तँए नै देखलखि‍न। तखन ततबे, कुत्तेक झगड़ा भरि‍।

बारह बजे बाधसँ अबि‍ते, जहि‍ना हजारो चेहराक बीच प्रेमी-प्रेमि‍कापर जा अँटकैत, तहि‍ना दादीक नजरि‍ सजमनि‍क गाछपर पहुँचि‍ गेलनि‍। लटुआएल-पटुआएल पड़ल देखलखि‍न। नरसि‍ंह तेज भेलन, मुदा परि‍वारक सभ गबदी मारि‍ देलक। तँए अधडरेड़ेपर तामस अँटकि‍ गेलनि‍। जँ अकासक पानि‍केँ धरती नै रोकए तँ पताल जाइमे देरी लगतै?

दोसरि‍ साँझ जखन बाधसँ घूमि‍ कऽ दादी एलीह तँ नीक जकाँ भाँज लगि‍ गेलनि‍ जे पोताक कि‍रदानीसँ गाछ नोकसान भेल। तामस लहड़ए लगलनि‍। छौड़ाकेँ सोर पाड़लखि‍न-
अगति‍या छेँ रौ, रौ अगति‍या?”

नाओं बदलल बूझि‍ गोवि‍न्‍दोकेँ अवसर भेटलै। अन्‍हारे गरे चौकी-दोगमे अन्‍हारे गरे चौकी दोगमे नुका रहल। अपने फुड़ने दादी भट-भटाए लगली-
भरि‍ दि‍न छौड़ा एम्‍हर-सँ-ओम्‍हर ढहनाइत रहैए आ कुत्ता-वि‍लाइ तकने घुड़ैए। मुदा लगले मन ठमकि‍ गेलनि‍। भरि‍सक अंगनामे नै अछि‍, खाइ-बेर भेल जाइ छै, कतए छि‍छि‍आइ ले गेल अखन धरि‍ अंगनामे नै अछि‍। पुतोहुकेँ पुछलखनि‍-
कनि‍याँ, बौआ कहाँ अछि‍।
बेटाकेँ अपन जान सुरक्षि‍त बूझि‍ पुतोहु बजली-
बड़ी कालसँ नै देखलि‍ऐ।
पोताकेँ तकैले बुढ़ि‍या दादी वि‍दा भेली।

सुतै बेर जखन गोवि‍न्‍दा अलि‍साएल आबि‍ दादीकेँ कहलक-
दादी बि‍छान बीछा दे।

गोवि‍न्‍दक बात सुनि‍ दादी पि‍घलि‍ गेली। ओछाइन ओछा कऽ सुता देलखि‍न। सेन्‍धपर पकड़ल चोर जकाँ, क्रोध फेर कड़ुआ गेलनि‍। मुदा नि‍नि‍याँ देवीक करोरामे देखि‍ क्रोध घोंटए लगली। अखन छोड़ि‍ दइ छि‍ऐ, भोरहरबामे पेशाब करैले उठेबे ने करब। बुझतै केहेन होइ छै सजमनि‍क गाछ तोड़नाइ। जाबे सभ करम नै कराएब ताबे चालि‍ नै छुटतै। 
भाेरहरबामे जखन गोवि‍न्‍द दादीकेँ उठबैत बाजल-
दादी-दादी।

दादी गबदी मारैक वि‍चार केलनि‍। मुदा तीन बेरक बाद तँ गरि‍ऐबे करत, तइसँ नीक जे तेसर हाकमे अपने बाजि‍ देबइ। की हेतै, एकटा सजमनि‍येँक गाछ ने टुटल। फेर रोपि‍ लेब।


मुन्नी कामत

बउआ देखहक चांदकेँ
बउआ देखहक चांदकेँ।
चंदा मामा दूर छै
देखहक कतेक मजबूत छै
नित कटै-छटै छै
तइयो हंसैत छै
कतेक अटल निर्भय छै।
बउआ तुहो अहिना बनिहक
दुखसँ नै कहियो घबरैहक
गिरबहक तबे तँ
चलनाइ सिखबहक
लगतऽ चोट तँ
सम्भलनाइ सिखबहक
देखऽ अइ चांदकेँ
जे घटैत-घटैत मिट जाइ छै
पर एक बेर नै घबड़ाइ छै
धीरे-धीरे फेर आगा बढ़ि
परपूर्ण भऽ कऽ पुनः
आसमान मे खिलखिलइ छै।



भोरक सनेस
उठऽ हौ बउआ
उठू यइ बुच्चिया
देखियौ नजारा भिनसरक
भागल अनहरिया
भेल इजोत
करू स्वागत दादा सूरजक।
जतेक भिनसर
उठबहक बउआ
ओतेक नमहर हेतऽ दिन
कुल्ला-आछमन कैर
लए आशीष अपन नमहरक।
भिनसरे नहेने सँ
मन तरो-ताजा हएत
निरोग बनल रहब अहाँ
नै दरकार हएत कोनो डॉक्टरक।
खुब पढ़ि-लिख
बउआ-बुच्ची
आगू-आगू दौड़ैैत चलू
अछि अहीं कंधा पर
भार अपन देसक।


 


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बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥
१०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२)
आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥
आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥
मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।
ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।
हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आसर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आघोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आयुवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आनेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आऔषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आमित्रक उदय होए॥
मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि।
एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।
अन्वय-
ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म
रा॒ष्ट्रे - देशमे
ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त
आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए
रा॑ज॒न्यः-राजा
शुरे॑ऽबिना डर बला
इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण
ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला
म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर
दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली)
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित
सप्तिः॒-घोड़ा
पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री
जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला
र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर
स॒भेयो॒-उत्तम सभामे
युवास्य-युवा जेहन
यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे
वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला
निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे
नः-हमर सभक
प॒र्जन्यों-मेघ
वर्षतु॒-वर्षा होए
फल॑वत्यो-उत्तम फल बला
ओष॑धयः-औषधिः
पच्यन्तां- पाकए
योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा
नः॑-हमरा सभक हेतु
कल्पताम्-समर्थ होए
ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी।

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पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...