Saturday, September 01, 2012

'विदेह' ११२ म अंक १५ अगस्त २०१२ (वर्ष ५ मास ५६ अंक ११२) PART III



जगदानन्द झा 'मनु', ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीहटोल, मधुबनी  

१.रोटीक स्वाद 
आई दस बर्खक
 बाद कियोक पाहून छोटकी काकीक अँगना एलैंह  | पहुनो परख गरीबक घर अँगना किएक एता | छोटकी काकी ओनाहितो गरीब मसोमात एहनठाम कि सेबासत्कार भेटक उम्मीद | 
पाहुनो केँ तँ
  हुनकर बहिनक बेटा | ओकरा ओ बारह बर्ख पहीले देखने रहथि आ आब ओ सत्रह बरखक पाँच हाथक जबान भए  गेल अछि |
आबिते अपन मौसी केँ पएर छू कए
 गोर लगलक |
"केँ बौआ चिन्हलहुँ नहि ?"
"मौसी ! हम लोटन, अहाँक बहीन मालती केँ बेटा |"
मौसी (छोटकी काकी) दुनू हाथे स्नेह सँ लोटन केँ माथ पकैर अपन
 करेजा सँ सटा -" चिन्हबौ कोना, मूडने में  पाँच बर्खक अवस्था में जे देखलीयै से देखने देखने, आई कोना ई गरीब मौसीक इआद  आबि गेलौ |"
लोटन - "मौसी मधुबनी में हमर परीक्षाक सेंटर परल छल आई परीक्षा खत्म भेल
 तँ  मोन में भेल मौसीक घर सौराठ  तँ  एहिठाम सँ कनिके दूर छैक भेट कए  आबि "
मौसी -" जुग- जुग जीबअ नेन्ना, एहि दुखिया मौसीक इआद
  तँ  रहलै | आ मालती केहन ? ओझाजी केहन ?"
लोटन -"सब कियो एकदम फस्ट किलास, दनादन, ओ सब आब छोरु पहिले किछ नास्ता कराऊ, मधुबनी सँ सौराठ पएरे अबैत-अबैत बड्ड भूख लागि गेल |"
सुनिते मातर मौसीक छाती में धक सँ उठल, ओ मने- मन सोचए लगलि - नेन्ना केँ की खुवाऊ ? घर में किछो नहि अपने तँ
   माँगि बेसए क गुजरा कए  लै छी एकर नास्ता भोजनक  व्यवस्था कतए सँ होएत | " 
हुनक सोच केँ बिचे में तोरैत लोटन फेर सँ बाजल -" मौसी जल्दी बड्ड भूख लागल |"
अपना केँ सम्हारैत मौसी -"हाँ एखने हम भात, दालि, भुजिया, तरुआ, नीक सँ बना कए
 नेन्ना केँ दै छी, अहाँ कनी बैसू |" इ कहैत मौसी भंसा घर दिस बिदा भेली, जहन की हुनका बुझल जे घर में किछ नहि अछि |
मुदा हुनका पाँछा-पाँछा लोटन सेहो आबि -" नहि मौसी एतेक काल हम नहि रुकब पाँच बजे मधुबनी सँ बाबूबरहीक अन्तीम बस छै आ चारि एखने बाजि गेलै |"
मौसी अपन घरक हालत देखि लोटनक गप्पक उतर नहि दए
 सोचय लगलि - "आह ! मजबूरी नेन्ना केँ रूकैयो लेल नहि कैह सकै छी |" 
एतबा में लोटन भंसा घरक बर्तन सब केँ देखि बाजल -" एहि बर्तन सब में सँ जे किछ अछि दए दिए |'
"हे राम !"- मौसीक मन कनाल, बर्तन में किछ रहैक तहन नहि | आगु
 हुनक मूह बंद भए गेलैंह, बकोर लगले केँ लगले रहलनि | बड्ड सहास सँ गप्प केँ समटैत बजली -"नहि बौआ किछ नहि छौ, हम एखने बिना देरी केने बनाबै छी |"    
लोटन -"नहि नहि मौसी बनाबै केँ नहि छै, बस छुटि जाएत |" एतबे में लोटनक नजैर टीनही ढकना सँ झाँपल कोनो समान पर परल | आगु जा ढकना उठा -"हे मौसी ई की ?"
मौसी अबाक, कि बजति, पहील बेर नेन्ना आएल आ ओकरा खूददीक रोटी खुआउ ओहो राइते केँ बनल | राति में एकटा खूददीक रोटी बनेने रहथि, आधा खा आधा ढकनी सँ झाँपि राइख देने रहथि |
 
लोटन ओहि रोटी केँ दाँत सँ काटि कए
 खाइत आगाँ बाजल -" एतेक नीक रोटी तँ  हम कहीयो खेन्हें नहि छलहुँ, मए  तँ  खाली छाल्ही भात, दूध-भात, दूध-रोटी, खुआ-खुआ कए  मोन घोर क  दैए | आहा एतेक स्वाद  तँ  पहील बेर भेट रहल अछि |"
मौसी लोटनक गप्प आ ओकर खएक तेजी देख बजली - "रुक-रुक कनी आचारो तँ
 आनि देबअ दए |" ई कहि मौसी अचार ताकै लेल एम्हर -उम्हर ताकै लगली मुदा अचार कतौ रहै तहन तँ  भेटै |
लोटन -"रहअ दीयौ, एतेक नीक इ मोटका रोटी रहै अचार केँ कोन काज | रोटी तँ
 खतम भए गेल | मौसी बकर-बकर ओकर मूह तकैत रहली | 
लोटन -" अच्छा आब हम जाई छी, घर देख लेलीयै फेर मधुबनी एलहुँ
 तँ  अहाँ लग जरुर आएब, मुदा हाँ एहने नीकगर मोटका रोटी बनेने रहब " इ कहैत मौसी केँ गोर लागि लोटन गोली जकाँ बाहर आबि गेल | मुदा बाहर एला बाद मौसीक दयनीय  हालत देखि  ओकर दुनू आँखि सँ  नोरक धार बहैत रहै |      



२. अन्तिम
 जगह 
फेकना
 | मए बाऊ की नाम रखलकै गाम में केकरो  नहि बुझल आ किंचीत ओकरा अपनों इआद होए की नहि | ओ एहि उपनाम सँ गाम भरि में जानल जाइत छल | खेतिहर मजदूर मुदा जीवन भरि उर्मील बाबूक  छोरि दोसर केँ खेत पर काज नहि कएलक | हुनके जमीन पर जनमल आ हुनक एवं हुनके परिवार केँ जीवन भरि  सेबा  करैत एहि संसार सँ अपन पार्थिक शरीर छोरि बिदा भए गेल | जेकर जन्म भेलैक ओकर मृत्यु निश्चिन्त छैक एहि सत्य केँ मोन राखि फेकनाक समांग सब ओकर अन्तिम क्रियाक तैयारी में लागि गेल |
उर्मिल बाबू नोत पुरै लेल दोसर गाम गेल रहथि | गामक सीमा में पएर राखिते
 मांतर कएकरो सँ फेकनाक मृत्युक समाचार भेट गेलैंह | सुनि दुखी मोने  घर दिस डेग झटकारलैंह | किछु दूर एला बाद रस्ते में हुनका फेकनाक  शवयात्राक दर्शन भेलैंह | फेकनाक  समांग सभ हुनका देख ठमैक गेल | उर्मिल बाबू चटे जा कए फेकनाक  झाँपल मूह उघारि ओकरा  मूह देखला आ नम आँखि सँ फेकनाक  बेटा सँ पूछलथि - "अग्निदाह केँ व्यबस्था कतए छैक |"
"
 ठूठी गाछी में मालीक |"
" दूर बुरि कहिंके, कनीक हमरो आबैक इंतजार तँ
 करै जैतअ, जीवन भरि हमर जमीन पर काज केलक आ आब मूइला बाद ठूठी  गाछी.... | चलअ हमर कsलम चलअ, हमर कsलम में नहि जगह केँ कमी अछि आ नहि गाछक ओतए दुनूक व्यबस्था छैक " ई कहैत उर्मिलबाबू आगू-आगू आ सभ हुनक पाछु-पाछु हुनकर कsलम दीस बिदा भए गेल |  




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कैलास दास, पत्रकार, जनकपुर

'अंगना सुखल घरमे पानि'

'अंगना सुखल, घरमे पानि, भरि बर्खा उपछु पानि ।' एकर मतलव स्पष्ट रुपे सभ किओ बुझि गेल होएब जे वर्षा होइते नगरमे रहयवाला सभकेँ कतेक सुख आ कतेक आनन्द अबैत अछि । आनन्दक मतलब सडक पर गंगा जमुना जेकाँ पानिक धार बहैत रहैत अछि आ लोक सभ मोटरसाइकिल, साइकिल, जीपकार चला-चला कऽ आनन्द लैत रहैत अछि । ओतबे नै, बौआ बुच्ची सभ पानिक आनन्द अओर बेसीए लैत रहैत अछि। ओ सभ अपन दुर्दशा बिसरि जाइत अछि, पानिमे खेलबाक क्षणमे । ओतबे कहाँ,  बुद्धिजीवी सभ सडकक दुनू कात बड आनन्द पूर्वक ठाढ. पानिक आनन्द उठबैत रहैत अछि । देखबामे अबैत अछि, सडक कातमे रहल दोकान सभमे पानि घुसल अछि । कोनो दोकानदार समान सभ निचाँ-उपर करएमे व्यस्त नजरि अबैत छथि तँ कोनो पानि उपछैत-उपछैत अपसिहात भेल रहैत छथि । ओइ समयमे ओ दृश्यकेँ कतेको गोटे मनोरञ्जनकेँ रुपमे लैति छथि तँ कतेको गोटे दु:ख व्यक्त करैत छथि। ओना वर्षा बन्द भेलाक बाद दू-चारि घण्टामे सडकक पानि बहि नदीमे चलिए जाइत अछि। मुदा घरमे पैसल पानि एकटा पोखरिक आकार लऽ कऽ दू चारि दिन धरि घर विहीन कऽ  दैत अछि । जिनकर बीस/पच्चीस वर्ष पुरान घर अछि, हुनका घर रहितो गाम घरसँ बेकार जीवन रहय लेल बाध्य कऽ दैत अछि। उपरसँ वर्षा आ निचा घरमे पोखरि जकाँ पानि । आखिर सोचियौ एकर दोषी के छथि? नगरमे रहयवाला लोक वा नगर विकासक सम्बन्धमे सोचएवाला बुद्धिजीवी, कर्मचारी अथवा नेपाल सरकार? कोनो नगर विकासक लेल एकटा कानून होइत अछि । आ ओइ कानूनक दायरामे रहि कऽ विकास करबाक दायित्व सभ गोटेकेँ होइत अछि । मुदा एहेन प्रावधान जनकपुरमे नै अछि । नहिये अखन धरि छलै । एकर नतीजा अछि 'अंगना सुखल घरमे पानि' । प्रत्येक वर्ष नयाँ घर बनैत अछि । पुरनका घर सँ दू चारि फिट उपर । नयाँ सडक बनैत अछि एक दू फिट उपर । एहने यदि बेरबेर होइत रहलैक तँ  नगर भितर रहएबला कहियो शहरक अनुभूति नहिए कऽ सकैत अछि। घर निर्माणक लेल घरक ऊँचाइ, सड़क उचाइक मापदण्ड लाबही टा पड़तै । ओतबे नै आब बनयवाला घर शहरक अनुरुप होएबाक चाही तइपर सभ गोटेकेँ विचार करए पड़तैक । नै तँ जहिनाक तहिना। ई तँ वर्षाक समस्या भेल। गर्मीक समस्या सेहो किछु कम नै अछि। सड़कसँ आगि उगलैत रहैत अछि । बाटमे चलबाक ककरो हिम्मत नै होइत अछि । ओतबे कहाँ जनकपुरक प्राय: सभ कलक पानि सेहो सुखा जाइत अछि । जनकपुर धार्मिक पर्यटकीय स्थल मात्र नै अछि, र्इ एकटा मिथिलाक राजधानी सेहो अछि । धर्म संस्कृति, कला, भेषभूषा आ माता जानकीक जन्म स्थल। किन्तु शहरक जे संरचना होएबाक चाही, विकासक गति आ सोच होएबाक चाही से कोशो दूर पाछु अछि। जनकपुरमे आबि कऽ माता जानकीक दर्शन कएला सँ पर्यटक मात्र धन्य-धन्य नै हएत । पर्यटक लेल पर्यटकीय वातारणकेँ बनाबए पड़तै। पर्यटकक लेल मनोरञ्जनात्क, दार्शनिक, घुमफिर करयवाला शुद्ध वातावरण होएबाक चाही। पर्यटक सभ कोनो समय, मौसम, दिन, महिनामे आबि सकैत छथि । मुदा सोचियौ यदि पर्यटक चैत बैशाखक कडा धूपमे आबि जाए तँ हुनका सभक लेल कोनो पार्किङ्ग, आनन्द करयवाला स्थल, घुमफिर करयवाला बाटघाट नै अछि। कडा धूपमे एक ठाम सँ दोसर ठाम नै आबि जा सकैत छी । सडकपर नाक मुँह कपडासँ झाँपि कऽ चलए पडैत छैक । साउन भादबमे पर्यटक आएल तँ नै नाला आ नै सडकक पता लगा सकैत अछि । सभ गोटेकेँ जनकपुरक बात बुझल अछि मुदा सभक चुप्पी प्रश्न चिन्ह ठाढ. कऽ दैत अछि। जनकपुरक बुद्धिजीवी सभ जनकपुरक शहरीकरण आ धार्मिक पर्यटकीय स्थल बनेबाक लेल कतए हेरा गेल छथि। विचार विमर्श आ विकास दिस अग्रसर होबए लेल हुनका सभकेँ कोन गेठरीमे बान्हि देल गेल अछि से नै खुलि रहल अछि । एकटा कहावत छैक 'आवश्यकता अविष्कारक देन होइत अछि ।' तँए यदि जनकपुरक विकासक आवश्यकता बुझाइत अछि तँ जनताकेँ सडकपर आबहे पडतै । नै तँ 'अंगना सुखल, घरमे पानि, भरि बरखा उपछु पानि ।'
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मुन्नी कामत

नाटक
अंधविश्वास
प्रथम दृश्य
गंगा-     बउआ………..बउआ, सुतल छहक की, देखहक बाबू दरबाजा पर बजबै छऽ।
शंकर-    कि, ..हू हू हू
गंगा-      कि भेलऽ। एना किए कराहै छहक। माय गे, माय हो, देेह तँ झरकैत छह। बउआ आँखि खोलऽ, (रूदन स्वरमे) हयौ सुनै छिऐ, दौड़ू यौ, देखियौ बउआ कऽ कि भेल। यौ, आँखि ताँखि उलटेने छै यौ, जल्दी आउ ने।
(रामाक धोती सम्हारैत आंगनमे प्रवेश)
रामा-          एना चिकरनाइ भोकरनाइसँ काम नै चलत। जाउ दौड कऽ गोसाईं घरसँ गंगाजल नेने आउ।
(गंगा दौड कऽ जाइत अछि आ गंगाजलक डिब्बा नेने अबैत अछि आ कनैत-कनैत कहैत छथि।)
गंगा-      हे काली माइ, हमरा कोइखक लाज राखब। हमर लालकेँ ठीक कइर दिअ। हम सहि कऽ सांझ देब।
रामा-     पहिले गंगाजल लाउ ने तब कोबला-पाती करैत रहब। (रामा अपन पत्नीकेँ हाथसँ झटैक कऽ गंगाजलक डिब्बा छीन लैत अछि आ शंंकरक उपर गंगाजल छीट हुनकर मुॅंह वएह जलसँ धोइ दैत अछि।)
रामा-         बउआ उठऽ, केना लगै छऽ आब।
शंंकर-    बाबूजी, हमर माथा दर्दसँ फाटल जाइत अछि आ जाड़ सेहो होइत अछि।
रामा-     अच्छा लै ई कम्बल ओढ़ि कऽ सुइत रहऽ, कनिकबे कालमे सभ ठिक भऽ जेतऽ। यै सुनै छिऐ शंकरक माय।
गंगा-      कि कहै छिऐ।
रामा-     बउआक माथपर पीरी परहक भभूत लगाउ आ अकरा अराम करऽ दियौ।
                       पटाक्षेप
   
              दोसर दृश्य
(पति-पत्नी अपन कक्षमे बेटाक हालत पर विचार विमर्श करैत।)
गंगा-      कि भेल, किए अहाँ काल्हिसँ चुप छिऐ? कि कोनो अभास भऽ रहल अछि? कहू ने, के भइडाही केने छइ। एक बेर अहाँ नाम कहि दिअ, अखने झोटा पकड़ि पोटा निकालि देबै आ घिसियाबैत पूरा गाम ओंघरेबै। सँइखोउकी बेटखोइकी सभ ककरो नीक देखै लेल नै चाहै छइ।
रामा-     (जोरसँ) बन्द करु अपन सत्यनरायलनक कथा। ई ककरो केलहा नै अपने घरक गोसाँइ अछि। आइ तक ककरो एहेन बोखार देखने रहिऐ। अपन देहमे अतेक आगि देविये रखैत अछि। जरूर हमरासँ
कोनो गलती भेल जे हमरा पर मइया तमसा गेलखिन। हमरा हिनका शांत करै लेल गुहार लगबइये पड़त।
गंगा-     अहाँ तँ अपने भगत छी। कौल्हका दिन निक अछि, काल्हिये बैसकी बैठाउ। हम जाइ छी, पूजाक सामग्री जुटबै लेल।
(गंगाक प्रस्थान होइत अछि आ रामा गम्भीर सोचमे डुबल रहैत अछि।)
                               पटाक्षेप
                   
तेसर दृश्य
(एगो दौरामे पूजा सामग्री एकट्ठा करि गंगा आ शंंकरक आगमन, हुनके पाछू दू-चाइर लोकनी सेहो अबैत अछि।)
गंगा-      बउआ बाबू आबै छऽ, ताबे तूँ पूजा करऽ। ई फूल अक्षत चढा कऽ धूप देखबऽ।
शंकर-    (फूल जल चढबैत कहैत छथि) आब की करब?
गंगा-      अतऽ कल जोइड़ बैठू।
(रामाक संगे चारि लोग जे ढोल आ झाइल लेन अछि, हुनकर प्रवेश।)
रामा-     शंकरक माय सभ तैयारी कऽ लेलौं? गंगाजल संगेमे राखने रहब।
(रामा गोसाँइ निपैत अछि आ फूल अक्षत चढा कऽ माँक प्रार्थना करऽ लगैत अछि। चारू लोकनी डाला बिचमे रखैत माँक गुहार लगबैत अछि आ ढोल झाइल सेहो बजबैत अछि।)
चारू लोकनी-    तोहरे दुआरे मइया हम
             अर्जी लगैलियइ हेऽऽऽऽऽऽऽऽऽ हूंऽऽऽऽऽऽऽ
             बोल जय गंगे,
             बोल जय गंगे,
             बोल जय गंगे।
बोल कि कष्ट छउ, किए बजेलऽ हमरा, बोल, बोल, कि भेलउ?
गंगा-      हे मइया, कि गलती भेल हमरासँ आ हमरा घरवालासँ। सभ दिन तँ अहींक पिरी निपैत आँखि खुलैत यऽ हमर, कि अपराध भेल जे हमरा बेटाकेँ अहाँ चारि दिनसँ मतेने छी।
रामा-     अहिना भूइज कऽ खेबउ। अपना खाय छऽ छप्पन प्रकार आ हमरा लऽ फूल अक्षत। एक दिशसँ सभकेँ भूइज-भूइज खेबउ।
गंगा-      एना किए कहै छऽ, अगर हमरासँ कोनो कुघटी भेल तँ हमरा माफ कइर दिअ, अहाँ जे कहब हम सभ करै लेल राजी छी।
रामा-     तँअ ठिक छइ, हमरा जानक बदले जान चाही। हमरा हर अमावश्याक राइतमे इकरंगा खस्सीक बैल देबही तँ तोहर कल्याण भऽ जेतउ। ले ले, लेह अक्षत, बोल बोल जय गंगे, बोल बोल जय गंगे, बोल बोल जय गंगे।
गंगा-      अहिना हएत भगवान, हम जानक बदले जान देब।
रामा-     होऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ हएऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ बोल जय गंगा, बोल बोल जय गंगे, बोल बोल जय गंगे। आब हम चलै छी।
                         पटाक्षेप

चौथा दृश्य
(ग्रामीणक बीचमे)
गंगा-      हयोउ, जब घरक देवता बैल मांगै छइ तँ अहाँकेँ दइमे कि हिचकिचाहट भऽ रहल अछि। बउआ दिश देखियौ तँ, आइ पॉंच दिन भेल, बेदरा एक बेर नै आँखि खोलइ यऽ।
रामा-     आब अपन गहबरमे बैल नै पड़ैत अछि, हमर बाबा अपन अंगोरिया आंगुर चिर कऽ बैल सौपने रहथि, ओही कऽ बदले लरू चढबैत रहथि। केना फेरोसँ बैल दी वएह सोचै छी।
गंगा-      अहाँकेँ बेटाक चिंंता नै अछि? हम बैल देबै, हम वचन देने छी।
एगो ग्रामीण- हो रामा, किए अतेक सोचै छऽ तूँ। अपना मने तँ नइ दै छऽ। माँ मांगलकऽ। जाधरि तूँ बैल नइ देबहक शंंकर ठीक नइ हेतऽ। बेटा लऽ दऽ दहक।
गंगा-      सुगनी लग एक रंगा खस्सी छइ। लऽ आनू गऽ। हम कहने रहियै तँ कहलकै, लऽ जाउ।
                    पटाक्षेप

                 अंतिम दृश्य 
(ग्रामीणक भीड़क बीच बेहोस अवस्थामे शंंकर।)
गीत-     काली मइया हे कनिये, काली मइया हे कनिये.
होइयो न सहायऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ
रघुनाथ-   हयोउ, कि बात छिऐ। यौ रामा, कक्काक अइठाम अतेक भीड़ कथी कऽ छिऐ।
एगो ग्रामीण- हुनका बेटा कऽ देहमे काली समैल छइ, कहै छइ कि जानक बदले जान नइ देबही तँ अकरा भूइज कअ खेबउ। अखन वएह बैइल दैत अछि, ओकरे भीड़ छिऐ।
रघुनाथ-   कहिया तक ई अंधविश्वास रहत अहि गाममे। चलू चलि कऽ देखै छी।
(रामाक घरमे रघुनाथक आगमन)
रघुनाथ-   काकी, कतऽ अछि बउआ, देखू।
गंगा-      रघुनाथ बउआ, आइब गेलहक सहरसँ। अए, देखहक ने आइ छऽ सात दिन भऽ गेलैए, आँखि नइ खोलै छइ। जाधरि बैइल नइ देबइ, नइ छोड़थिन मइया।
(रघुनाथ शंंकरक नब्ज देखैत आ सिर पर हाथ राखि आँखि देखैत कहैत छथि।)
रघुनाथ-   काकी अहाँ सभ अपन मुर्खताक कारण अकरा जानसँ माइर देबइ। अकरा दिमागी बुखार भेल अछि। अगर इलाजमे देर करबै तँ बेटा कतौ नइ मिलत।
रामा-     बेसी तूँ इंगलिस नइ बतिया, ई कोनो बुखार नइ देवीक केलहा छिऐ, हमरा अपन काज करऽ दे।
रघुनाथ-   हो कक्का, एगो बातक जबाब तूँ सभ ग्रामीण मिल क दए। तोरा दुगो पुत्र छऽ, एगो बिमार छऽ तँ कि तूँ एगो पुत्रक जान लऽ कऽ दोसर पुत्रक जान बचेबहक, नइ ने। तँ फेर माँ काली ई कोना करथिन। हुनका लेल तँ अहि संसारमे रहैबला हर जीव माँक संतान छी। फेर ओ ई कोना करथिन। अंधविश्वासक चादरमे नइ लिपटल रहऽ। जागऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ आबो तँ जागऽ।
रामा-     तूँ आइ हमर आँखि खोइल देलहक। चलऽ बउआकेँ अस्पताल लऽ चली।
          जानक बदले जान देनाइ
           अछि ई अंधविश्वासक बाइन
          करि परन हमसभ ई कि
          नइ लेब आब ककरो प्राण।
                     इति।

विहनि कथा
टूटल मन
एगो जान छल हमरा संगे, ९ महिनाक सुख-दुखक संगी। अनेकानेक सपना हमर, अनेक सवालक जवाब छल। बहुत खुश रहए हमर परिवार। रहै इंतजार सबहक नयनमे कि कहिया ई मास खत्म हएत आ गुॅंजत किलकारी आंगनमे। आइ ओ इंतजार खत्म भेल। हम एगो मासूमकेँ जन्म देलौं, हम अपन अंशकेँ ऐ संसारमे आनलौं। हमरा लेल ओ ने बेटा छल ने बेटी। बस हमर संतति छल, हमर अरमान, हमर सपना, हमर भविष्य छल। पर कोइ नै बुझलक हमर ई आश,
कहलक कि दुनियामे आँखि खोलैसँ पहिले ओ आँखि मूइन लेने छल। हम संतोष कइर लेलौं, ई नै बुझलौं कि बेटाक लालचमे ओ बेटीकेँ माइर देलनि। जे हाथ ओइ मासुमक गला पर छल उ एक बेर नै कांपल, ओकर कान अकर रूदनकेँ नै सुनलक। ई हमरे टा नै बहुत नारीक कथा छी। हम अवला नै पर ऐ समाज आ
अपनाकेँ आगु अवला बनैल गेल छी, जबतक हम जुर्म सहैत रहै छी तबतक हम परित्याग, शांति आ ममताक मूर्ति छी। जब ओकर जुर्मकेँ आगु खरा उतरै छी तँ हम कुलच्छनी आ कलंकनी छी। आखिर हमहूँ ऐ संसारक गारीक एगो पहिया छी,
अगर एगो पहिया निकलि जएत तँ असगर कतेक दूर तक अहाँ नै संसारकेँ लऽ जा सकब।
कहिया तक बेटीक बली चढ़बैत रहब आ मायक कलेजाकेँ छन्नी-छन्नी करैत रहब।

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बलराम साहु
वि‍स्‍मि‍त होइत हमर लोक संस्‍कृति‍
काठक खराम, मुजक चटकुनी, हाथसँ लि‍खल कोहवर, बि‍आहक गीत, सोहर-समदाउन, फगुआक जोगीरा, भोरका पराती, बटलगनी, डोमकच, जट-जटीन, शामा-चकेबा, भगैत, नचारी, अल्‍हाऊदल, ब्रजभान, सीत-बसंत, राजा-सल्हेशक अमर गाथाक नौटंकी, वि‍भि‍न्न अध्‍यात्‍मि‍क-समाजि‍क घटनाक्रमपर आधारि‍त नाटक आ नौटंकी, गामक घूर आ घूर लग होइत पंचपती, पचमेड़क जलखै, ताबापर तरल ति‍लकोरक तरूआ, कोजगराक मखान, चूड़ा-मुरहीक सनेश, पुरनीक पात, ओहार लागल बैलगाड़ी, जवारी भोज,  ससूर-भैंसूरक धाक, पैघक पएर छूबि‍ लेल असीरवाद यएह सभ तँ मि‍थिलाक अद्वि‍तीय संस्‍कार आ संस्‍कृति‍ अछि‍। मुदा अत्‍याधुनि‍क भौति‍कवाद आ अधकचरा पश्चि‍मी संस्‍कृति‍क समागमक कारणें उपरोक्‍त वि‍शुद्ध देशी शब्‍दक अनेकानेक शब्‍द नवका पीठीक लेल अनभुआर भऽ गेल। नवतुरि‍या लोकनि‍ ऐ शब्‍दकेँ वि‍देशज बूूझि‍ रहल छथि‍। जौं‍ कि‍छु परम्‍परागत संस्‍कृति‍ अवशेषक रूपमे बँचलो अछि‍ तँ नव पीढ़ी ओकरा ओछ, घटि‍या आ हीनताक प्रतीक मानैत छथि‍। दोसर दि‍स कि‍छु परम्‍परागत लोक संस्‍कृति‍ आजुक भौति‍कवादी व्‍यवस्‍थाक प्रभावमे अपन स्‍वरूप बदलि‍ नव नाम आ स्‍वरूपसँ प्रचलि‍त भऽ स्‍वयंकेँ वि‍कसि‍त कहेबाक प्रयास कए रहल छथि‍।

सोहर-समदाउन, जट-जटीन, पराती, भगैत, अल्हाक स्‍थान आॅरकेस्‍ट्रा आ फुहर भोजपूरी गीत तँ अल्हा-ऊदल, दीनाभद्री, राजा सल्हेसक अमर गाथा नंग-धरंग अपसंस्‍कृति‍क परि‍चायक थि‍येटरसँ वि‍स्‍थापि‍त भऽ गेल, भाँगक गोली वि‍देशी शराब आ देशी पाउचमे हेरा गेल, गामक पंचायत इति‍हासक हि‍स्‍सा बनि‍ गेल, फगुआक जोगीरा आ जूरशीतलक नचारीपर बैशाखीक भाँगड़ा भारी पड़ि‍ गेल, गामक मेला, हाट-बाजारक मौल संस्‍कृति‍मे पूर्ण रूपेण समावेसि‍त भऽ अपन अस्‍ति‍त्‍व मेटा देलक अछि‍।

हमर समाज वि‍भि‍न्न अवसरपर अल्हा-ऊदल, कुमर व्रजभान, दीना भद्री, सीत-बसंतक अमरगाथा देखि‍ आ सूनि‍ स्‍वयंकेँ गौरवान्‍वि‍त बुझैत राजा हरि‍श्चन्‍द्रक सत्‍यवादी स्‍वरूपसँ प्रेरणा लैत छल तँ श्रवणकुमारक नाटकसँ मातृ-पि‍तृ भक्‍ति‍क ज्ञान प्राप्‍त करैत स्‍वयंकेँ श्रवण कुमार बनबाक प्रयाश करैत छल।

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...