Sunday, August 12, 2012

'विदेह' १११ म अंक ०१ अगस्त २०१२ (वर्ष ५ मास ५६ अंक १११) PART XI





चंदन कुमार झा
सररा, मदनेश्वर स्थान
मधुबनी, बिहार

बाल-गजल

1
चार पर छै कौआ बैसल,
माँझ अँगना बौआ बैसल ।


घुट-घुट खाथि दूध-भात,
मायक कोरा बौआ बैसल ।


राजा-रानी सुनथि पिहानी,
मइयाँ कोरा बौआ बैसल ।


ओ-ना-मा-सी सिखथि-पढ़थि,
बाबाक कोरा बौआ बैसल ।


सुग्गा-मेना संग खेलै छथि,
"चंदन" अँगना बौआ बैसल ।


वर्ण-१०


2


बाल गजल


कुकरुकू जखन मुरगा बाजल,
किरिण सुरूजक मूँह मेँ लागल ।


कौआ डकलक कोइली बाजल,
आँखि मिड़ैते चुनमुन जागल ।


नहा-सोना के कयलनि जलखै,
इसकुल गेलथि घंटी बाजल


दीदीजी बड्ड नीक लगैत छन्हि,
मास्टर जी के छड़ी लय भागल ।


कान पकड़ि के उठक-बैठक,
तैयो खेले पर मोन छै टाँगल ।


"चंदन" टन-टन घंटी बजलै ,
छुट्टी भेलइ घर दिस भागल


वर्ण-१३


3


बेंग बजय छै टर-टर-टर्र
बगरा उड़य फर-फर-फर्र ।


झरना झहरे झर-झर-झर्र,
बाँस बजय छै कर-कर-कर्र ।


मिल चलय छै धर-धर-धर्र,
साँप ससरलै सर-सर-सर्र ।


चुनमा छाती धक-धक-धक्क,
डरसँ कापय थर-थर-थर्र ।


पप्पा एलखिन भागि गेल डर,
बात पदाबय चर-चर-चर्र ।


वर्ण-१२


4


कौआ कूचरल भोरे अँगना साँझ परैत औथिन्ह सजना,


छम-छम-छम-छम पायल बाजे खनकि उठल कंगना ।






सासुक बोली लगैए पियरगर ननदि बनल बहिना,


गम-गम-गमकय तुलसीक चौरा चानन सन अँगना ।






रचि-रचि साजल रूप मनोहर कत'बेर देखल ऐना,


टिकुली-काजर जुट्टी-खोपा नवका-नुआ चमकय गहना ।






पहिलहि साँझ बारल दीप-बाती जगमग घर-अँगना,


उगल चान असमान हृदय मे उठल विरह वेदना ।




सेज सजौने बाट तकैत छी एताह कखन घर सजना,


"चंदन" सजनी गुनधुन बैसलि की मांगब मुँह बजना ।




वर्ण-२२


5




साँझ परल, बैसि पिपर पर चिड़ै करय पंचैती,
सूगा-मैना ब्याह रचाओत बगुला करय घटकैती ।


फुदकि-फुदकि के फुद्दी नाचय फेर हेतै वनभोज,
कौआ पिजबैछ लोल कोइली गाबि रहल छइ चैती ।


बगरा-परबा अपस्याँत अछि इंतजाम मे लागल,
डकहर बैसल सोचि रहल कोना हेतै कुटमैती ।


पोरकी पिपही बजा रहल छै टिटही पिटै ढोलक,
मोर नचैछै ता-ता-थैया "चंदन" अद्भुत ई कुटमैती ।


वर्ण-२०
6


नवका कुर्ती नवके सलवार
पहिर कय बुच्ची भेल तैयार


ललका फीताक गुहलक जुट्टी
बाजे रुनझुन पायल झन्कार


हाथक बाला खन-खन-खनके
टम-टम चढि के गेल बजार


ढोलक-पिपही आ तमाशा-नाच
सूनल देखल हरख अपार


बाबाक हाथ पकड़ि कए बुच्ची
प्रमुदित घुमय हाट-बजार


वर्ण-१२


7


मस्जिद जखने परल अजान
कोइली ठनलक पराती गान


कौआ डकलक खेत खरिहान
बगुला खत्ता बिच करय स्नान


गर-गर दुध दुहैछ बथान
टक-टक पड़रू लगौने ध्यान


बाबा छथि बाड़ी बान्हथि मचान
बाबी अँगना मेँ लगाबथि पान


टुह-टुह लाल पूब असमान
'चंदन'जलखै मे दूध मखान


वर्ण-१२


8


दऽ रहल छी अपन शपथ, नै कानू बौआ
लेबनचूस लऽ पप्पा औताह, कुचरे कौआ


हम तऽ माय छी सत्ते,मुदा बेबस लाचारे
कीनि खेलौना देब कतऽसँ,नहि अछि ढौआ


भरना लागल खेत, महाजन के तगेदा
फेर कोना के सख पुरौताह बाप कमौआ


अहीँ पुरायब सख सेहन्ता आस धेने छी
अहीँ जुड़ायब छाती बनिकऽ पूत कमौआ


कबुला,पाती,विनय,नेहोरा, करैछी भोला
बेलपात "चंदन" चढ़ायब खूब चढ़ौआ


वर्ण-१६
9


भैया के नबका बुशर्ट आ हमरा दीदी के फेरन


ओ'तऽ सौंसे गाम घूमै छौ हमरा अंगनो मे बेढ़न




चूल्हा-चेकी,बर्तन-बासन, आगाँ से नैकरबौ हम


हमरो चाही कापी-पिल्सिन, बेटा के देलहीजेहन




बौआ छुच्छे छाल्हि खेतौ हमरा नै दूधो परपइठ


जौँ नै करबौ टहल तखन लगतौ मोन केहन




बहुत सहलियौ आब नै चलतौ तोहर दूनेती


हमरो चाही बखरा आब नै चलतौ कलछप्पन




गै माय युग बदलि गेलैए बेटी नै बेटा से कम


"चंदन"गमकैत भविष्य रचबै हमहूँ अपन


वर्ण-१९





१०

एकदिन हमरो हेतइ मकान
एकदिन हमरो हेतइ बथान

एकदिन हमहुँ कीनब समान
हमरो घर बनतै पू-पकवान

एकदिन हमहुँ बुलबइ चान
अंतरिक्ष मे हेतै हमरो दलान

सभकेयो अपने केयो नहि आन
हमहुँ बनबै गाँधी सन महान

विद्या-वैभव के लेल अनुसंधान
करय जे "चंदन" बनय महान
-----------वर्ण-१३-
११
चिक्का कबड्डी खेलबइ खेत पथार मे
हमर नाह चलतइ ओलती धार मे

इसकुल सँ जखन घुमबइ साँझ मे
बाबा संग मे घुमबइ धारक पार मे

आमक गाछी खोपड़ी तर मचान पर
काका संगे हमहुँ बैसबै रखबार मे

गीजल-गाँथल हम नहि खेबौ बाटी मे
माय गै हमरो साँठि के दहीन थार मे

मुरही कचरी झिल्ली खेतै छैक सेहन्ता
"चंदन"तैँ छैक लोढ़हा लोढ़ैत नार मे
----------वर्ण-१५------
१२
पकड़ि के दाबा चलइ छै
खने ठेहुनियाँ भरइ छै

मधुर सनके बोल लागै
जखन माँ-पप्पा बजइ छै

चढ़िकऽ छाती पर कका केँ
भभा के लगले हँसइ छै

सुगा मैना जखन बाजय
सुनिकऽ थपड़ी पिटइ छै

मनोरथ सभटा पुरौतै
बइस के चंदन गुनइ छै
---------वर्ण-१०-------
१२२२ २१२२
बहरे-मजरिअ


१३

माय गै हमरो कीनि देऽ नेऽ चान एकटा
देऽ नेऽ गुड़क पूरी फोका मखान एकटा

चमकै इजोरिया लागै छै कोजगरे छै
बाबा हमरो दीअ ने खिल्ली पान एकटा

चकलेट-बिस्कुटो भऽ गेलै कत्ते महग
पप्पा हमहूँ करबइ दोकान एकटा

छोटको चच्चा केतऽ आब भऽ गेलै ब्याह गै
मैंया हमरो कनिया कऽ दे जुआन एकटा

चान पर घर हेतै तारा पर दलान
"चंदन"हमहूँ भरबै उड़ान एकटा

--------------वर्ण-१५------------------
१४
भोर भेलै शोर भेलै
काँचे निन्न खोर भेलै

माघ मास शीत जल
दहो-बहो नोर भेलै

काँट कंठ मे गड़लै
भोग नहि झोर भेलै

भैंस भेलै पारी तरे
छाल्ही डाढ़ी घोर भेलै

थारी बाटी पिटैत छै
माय मोन घोर भेलै

---वर्ण-८----

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१.जगदानन्द झा 'मनु' -बाल गजल २.राजेश कुमार झा- दूटा कविता ३. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक किछु गीत/ कविता

       १
जगदानन्द झा 'मनु'
ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीह्टोंल, मधुबनी
बाल गजल


हेरौ कोआ खसा दे एगो आम हमरो लेल
देबौ बाली मए जे देतै दाम हमरो लेल


चल-चल गे बूचनी चलै आब खेलएब
भ ' गेल देलकै जे मए काम हमरो लेल


नहि छ्मकै एना लए कँ अपन गुडिया
तोरा सँ सुन्नर देथीन राम हमरो लेल


बहुत केलहुँ काज कमेलहुँ  बड्ड राज
आबो तँ घुरि आउ बाबू गाम हमरो लेल


सबकेँ नाम गे मए कते सुन्नर-सुन्नर
किएक नहि 'मनु' सन नाम हमरो लेल


(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१६)

नेन्ना हम मए केँ आँखि जूराएब
मिथिला केँ अपन सोना सँ चमकाएब


मूरत सभ घरे रामे सिया केँ देखु
एहन आँन कतए मेल देखाएब


गंगा बसति पावन घर घरे मिथिलाक
डुबकी मारि कमला घाट नाहाएब


मुठ्ठी भरि बिया भागक अपन हम रोपि
अपने माटि में हँसि हँसि कँ गौराएब


'मनु' दै सपत घर घुरि आउ काका बाबु
नेन्ना केँ कखन तक कोँढ ठोराएब


(बहरे रजज, २२२१)

चम चम चम चम तारा चमके
बौआ कए हाथक तरुआ गमके


कारी बकरी,नब उज्जर महिष
लाल बाछी किए दौर-दौर बमके


बौआक घोरा सय-सय कए देखू
काका कें घोरा पिद्दी कतेक कमके


बाबी कें साडी मए कें लहंगा बहे
बौआ कें गघरी त कतेक झमके


बौआ हमर आब गुमशुम किए
किएक नै ठुमुक-ठुमुक ठुमके


(सरल वार्णिक, वर्ण-१३ )





मएगै हमर फुकना की भेल
दाई हमर झुनझुना की भेल


बाबा कें कहबैन सब हरेलौं
सबटा हमर खिलौना की भेल


दूध-भात आब हम नहि खेबौ
पेटमुका हमर सन्ना की भेल


हम जे बुललौं बाबा-बाबी संगे
रातिक हमर सपना की भेल


चंदामामा कईल्ह जे अनलैंह
हमर निकहा चुसना की भेल


(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१२)





हे मए  नहि चरबै लए   गाए जेबौ हम
पठा हमरा इस्कूल कोपी पेन लेबौ हम


अपन भाग्य आब हम अपने सँ लिखबौ
कुकूर जकाँ नै   माँडे तिरपीत हेबौ हम


रोगहा-रोगहा सभ कियो  कहए हमरा
एक दिन बनि डाक्टर  रोग हरेबौ  हम


टूटल- फूटल अपन फुसक घर तोरि
सुन्नर सभ सँ पैघ महल बनेबौ हम


हमरा कहैत अछि 'मनु' मुर्ख चरबाहा
पढि कए   सभ चरबाहा केँ पढेबौ हम


(सरल वार्णिक बहर, वर्ण- १६)







बिनु पानिक  नाउ चलाएब हम
बिनु चक्काक गाडी बनाएब हम


हमर मोन में तँ जेँ किछु आएत
बिन सोचने सभ सुनाएब  हम


अपन ब्याह में हम नहि जाएब
सराध दिन बजा बजाएब  हम


कनियाँ केँ लय ओकर नैहर सँ
सासुर सँ खूब  कतियाएब हम


'मनु' मन चंचल टोनए सभकेँ
केकरो हाथ नै घुरि आएब हम


(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१३)



राजेश कुमार झा (कन्हैया), पिताक नाम :- श्री विजय कुमार झा, गाम :- घोघरडीहा (पुबाई टोल), पोस्ट ऑफिस + थाना : -घोघरडीहा , जिला :- मधुबनी, (बिहार ) -847402

छोड़ू  छोड़ू ई पश्चिमी सभ्यता, मानव समाजक अपन सभ्यता पुकारैय
माय - बाप क सेवा परम कर्तव्य छी, ओ बालिग होयते ठुकारावैय.
सेवा- काल तन -मन सँ सेवा करै छी, ओ वृधाश्रम मे पहुँचावैय.
छोड़ू  छोड़ू ई पश्चिमी सभ्यता, मानव समाजक अपन सभ्यता पुकारैय
पुकारैय ..


अर्धांगिनी संग जीवन बिताबै छी, ओ जीवनमे छोड़ैय जोड़ैय
छोड़ू  छोड़ू ई पश्चिमी सभ्यता, मानव समाज क अपन सभ्यता पुकारैय.
रिश्ता - नाता लेल त्याग करै छी, ओ अकरा पाइसँ तौलैय .
संगी - साथी लेल जान दै छी, ओ दिनमे दू चारिटा जोड़ैय तोड़ैय.
छोड़ू  छोड़ू ई पश्चिमी सभ्यता, मानव समाज क अपन सभ्यता पुकारैय


संयुक्त परिवारमे ख़ुशीसँ रहै छी, ओ तनहा असगर रहैय.
अकेलापन तँ महसूसे नै होइ छै, ओ अइ लेल नशा पान करैय .
छोड़ू  छोड़ू ई पश्चिमी सभ्यता, मानव समाज क अपन सभ्यता पुकारैय


नै सिखु हुनकर ई अवगुण, ओ डिस्को पबमे शराब- सिगरेट पिबैय ,
सिनेमा इंटरनेटसँ दुइर भऽ, ओते नाबलिको गलत सम्बन्ध बनबैय.
छोड़ू  छोड़ू ई पश्चिमी सभ्यता, मानव समाज क अपन सभ्यता पुकारैय


सिखु हुनकर किछु निक गुण , ओ शहर सड़ककेँ गन्दा नै करैय.
हुनके चलते आइ औरतो , खुलिकऽ अपन बिचार प्रगट करैय.
छोड़ू  छोड़ू ई पश्चिमी सभ्यता, मानव समाज क अपन सभ्यता पुकारैय

देखियौ देखियौ ई बढ़ैत तामस, अन्यायक बीज अन्कुरेनेयऽ,  .
सहनशक्ति हुनका नै छनि, बात-बात पर लड़ैय.
मरै-मारैपर उतारू होइ छथि, बात किछु नै रहैय.
एक दिन सड़कपर देखलौं, बेकसूर गरीबकेँ मारैय.
तहन शोर मचेलौं, तैयो लोक नै एतऽ आबैय .
लोक  देखैत जाइय, कियो नै एतऽ रुकैय.
तहन ओ आयल हमरा लग, धक्का दैत भगैय.
अबाक देखते रहलौं, ई एना किए करैय,
ओकरा जाइते सब पूछैय चोट तँ बेसी नै लागलय.
पुछलिअनि अपना सभकेँ अकर आदति नै पड़लय,
जखन देश गुलामे छल तखने सँ खूनमे तँ नै बसलय,
पड़ोसी अइ ठान अन्याय होइ छै लोक गेट लगौनेय
अपना सबहक सहन शक्तिए ओकरा बढ़ावा देनेय
उठू उठू आबाज दियौ जों एक नै छी तैं तँ ई  डरेनेय.
छोड़ू छोड़ू ई मांस मदिरा यएह तँ तामसी बनेनैय
आउ सपथ लिअ अइ तामसकेँ शरीरसँ भगौनैय

No comments:

Post a Comment

"विदेह" प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका http://www.videha.co.in/:-
सम्पादक/ लेखककेँ अपन रचनात्मक सुझाव आ टीका-टिप्पणीसँ अवगत कराऊ, जेना:-
1. रचना/ प्रस्तुतिमे की तथ्यगत कमी अछि:- (स्पष्ट करैत लिखू)|
2. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो सम्पादकीय परिमार्जन आवश्यक अछि: (सङ्केत दिअ)|
3. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो भाषागत, तकनीकी वा टंकन सम्बन्धी अस्पष्टता अछि: (निर्दिष्ट करू कतए-कतए आ कोन पाँतीमे वा कोन ठाम)|
4. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो आर त्रुटि भेटल ।
5. रचना/ प्रस्तुतिपर अहाँक कोनो आर सुझाव ।
6. रचना/ प्रस्तुतिक उज्जवल पक्ष/ विशेषता|
7. रचना प्रस्तुतिक शास्त्रीय समीक्षा।

अपन टीका-टिप्पणीमे रचना आ रचनाकार/ प्रस्तुतकर्ताक नाम अवश्य लिखी, से आग्रह, जाहिसँ हुनका लोकनिकेँ त्वरित संदेश प्रेषण कएल जा सकय। अहाँ अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर सेहो पठा सकैत छी।

"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
मुदा ई तँ मात्र प्रारम्भ अछि।
अपन टीका-टिप्पणी एतए पोस्ट करू वा अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ।

'विदेह' २३१ म अंक ०१ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३१)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक चारिटा लघु कथ ा २.२. रबिन्‍द्र नारायण मिश्रक चारिटा आलेख ...