Sunday, August 12, 2012

'विदेह' १११ म अंक ०१ अगस्त २०१२ (वर्ष ५ मास ५६ अंक १११) PART VIII



१.जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल- १.बाल गजल/ २.की भेटल आ की हेरा गेल (आत्म गीत)(आगाँ...) २.कामिनी कामायनी- चिडैक अभिलाष

जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल

बाल गजल

रोज उठैछी भोरे-भोरे
घूमि अबैछी भोरे-भोरे ।

दूर-दूर धरि हरियर धरती
देखि अबैछी भोरे-भोरे ।

धरती मैया सभहक मैया
निहुरि कहैछी भोरे-भोरे ।

आम-डारि पर गाबय कोइली
गीत सुनैछी भोरे-भोरे ।

माए-बाबू भगवान हमर छथि
चरण छुबैछी भोरे-भोरे ।

माटि-पानि ले’ तन-मन-जीवन
प्रण ई करैछी भोरे-भोरे ।



की भेटल आ की हेरा गेल (आत्म गीत)- (आगाँ...)
छल सुप्त हिमालय बरकि उठल
अंतरमे धधरा धधकि उठल
सय सय कोसी-कमला-गंडक
कत घाव मोनमे टहकि उठल
हम देखलहुं दूनू हाथ अपन
मुट्ठी छल अपनहि कसा गेल
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ की हेरा गेल ।

हम थाकि गेलहुं चलइत-चलइत
हम कानि गेलहुं हंसइत-हंसइत
अनवरत अभावक दुर्दिनसं
हम हारि गेलहुं लडइत-लडइत
नहि जानि कखन के सूतलमे
कविताकेर अमृत चटा गेल
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ की हेरा गेल ।

चलिते-चलिते भेटलाह रमण
आ भेटि गेला श्री सोमदेव
कोइलख विद्यापति पावनिमे
भेटल आषीश मधुप किरणक
सस्वर दू रचना केर पाठ
छल पीठ हमर थपथपा गेल
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ की हेरा गेल ।

कविता अयली जहिया संगमे
भ’ गेल पैघ परिवार हमर
यात्री, हरिमोहन, जीवकान्त
शेखर, रवीन्द्र, मणिपद्म, अमर
बाबू कक्का आ भैया सन
छल नाम कतेको जोडा गेल
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ की हेरा गेल ।


कविता संग हम जीबय लगलहुं
बूलय लगलहुं झूलय लगलहुं
जीवनकें उत्सव मानि सतत
नाचय लगलहुं झूमय लगलहुं
कवितासं प्रेमक बात हमर
छल गाम-गाम गनगना गेल
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ की हेरा गेल ।

‘पारो’ पढिक’ छल कना गेल
‘खट्टर कक्का’सं हंसा गेल
‘बाबा डंडोत बच्चा जय सियाराम’
चिंतित मनकें गुदगुदा गेल
‘वस्तु’केर पिहानी ‘नानी’ पढि
नहि जानि कते की सोचा गेल
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ की हेरा गेल ।
(अनुवर्तते...)

कामिनी कामायनी
चिडैक अभिलाष

एक पाखी मीत सॅ
किछु कहि रहल छल
डारि कत्तेक हम देखल
अहि जनम में
भेट नहि पाओल हमरा
कत्तौ बसेरा
आस के एक खड नेने
ठाढ एत्त ।
कखनो त’ कत्तो कोनो
बिरीछ भेटत
घर के एक
नींव राखि .. . .. . . .
खोंता सॅ बाहर
हमहूॅ
भरि पोख हेरब
हमरो अंडा
हमरो चिल्का
हमरो संगी
हमहूॅ कत्तौ चैन सॅ
किछु राग टेरब
मीत घूरल
देर धरि
निःचेष्ट भ’ क’
छोट एतेक
स्वप्न कतैक
ई अकिंचन
भॉपि क’ ओकर
एहेन मनोभावना के
उडि चलल
घबडा क’ ओ
कमजोर पंखी।

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'विदेह' २२४ म अंक १५ अप्रैल २०१७ (वर्ष १० मास ११२ अंक २२४)

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