Sunday, August 12, 2012

'विदेह' १११ म अंक ०१ अगस्त २०१२ (वर्ष ५ मास ५६ अंक १११) PART VII



१. मुन्ना जी २.प्रशांत मैथिल-बाल गजल ३.पंकज चौधरी (नवलश्री)४.जवाहर लाल काश्यप५.क्रांति कुमार सुदर्शन


मुन्ना जी

बाल गजल
1
शुन्य भेल स्वप्न नुका क' राखू
अपन संस्कार जोगा क' राखू

अछि सूट-बूट शिक्षोमे लागू
मोनकेँ मैथिल बना क' राखू

कंप्यूटर गेम अछि सुन्नर
मगज टटका बना क' राखू

नेना लक्ष्यहीन नहि हुअए
तकर जोगार धरा क' राखू

केकरो बानि रहए केहनो
हृदेसँ अपन बना क' राखू


वर्ण----11

2
अ सँ अनार अछि मिट्ठ कसगर
आ सँ आम लागैए बड्ड रसगर

पिज्जा बर्गर तँ घुसि गेल मोनमे
केखनो कतौ दबा दैछ असगर

शिक्षा माध्यममे अंग्रेजी भेल हावी
फैशन अंग्रेजिया छै रभसगर

पीढ़ी नवकाकेँ नव रूपेँ सजाउ
अपन संस्कृति भ' गेल अजगर

तकनीकी ज्ञानमे नेना बढ़ए आगू
पितोक मोन होइछ हुलसगर
वर्ण-----13

3

"ए"सँ एप्पल सेव कहाइए
"बी"सँ बुक ज्ञान दए जाइए


अंग्रेजीमे लीन भ' नेना सभ
माइक बोली बिसरि जाइए


निज खगता जानि क' पढ़ाइ
विकासक सनेश द' जाइए


बूढ़ लोक अछि धरती पर
नेनाक बास चान भ' जाइए


वाइसँ यंग छै किछुए दिन
ज़ेडसँ सभ जीरो भ' जाइए


वर्ण----11

प्रशांत मैथिल


बाल गजल

शब्दक मूर्त्ती गढ'क चाही
खूब मोन स पढ'क चाही

हमही अयाचीक शंकर
इतिहास के रच'क चाही

थैआ डेगा डेगी लऽरे लऽरे
खसि उठिक बढ'क चाही

नञि बाँचल फुनगी डारि
आ चान पर चढ'क चाही

कनिञा पुतरा साम चको
नाम भारती मढ'क चाही
वर्ण-१०

३.
पंकज चौधरी (नवलश्री), बाबूजी- श्री भागेश्वर चौधरी  (लोक स्वास्थ्य अभियंत्रणा विभाग, बिहार सरकार (जमूई) मे कार्यरत), माताश्री- श्रीमती वंदना देवी (गृहणी), जन्मतिथि : ११.०९.१९८०, स्थायी पता: ग्राम+पोस्ट- सुगौना, प्रखंड- राजनगर, जिला- मधुबनी, मिथिला, वर्तमान निवास : नई दिल्ली, शैक्षणिक योग्यता : राम कृष्ण महाविद्यालय, मधुबनी (मिथिला) सँ वाणिज्य विषयक संग स्नातक वर्तमान मे अध्ययन ( ICAI, नई दिल्ली सँ C.A.(फाइनल) एवं I.C.S.I.,नई दिल्ली सँ C.S.(प्रोफेसनल) क संगे एकटा प्राइवेट कंपनी मे सहायक प्रबंधक (वित्त एवं कर) क पदपर कार्यरत।
1
बाल गजल

संचमंच भऽ रह्बौ सदिखन आब नै करबौ हुलहुल गै
मोन लगा कऽ पढ़बौ देखिहन्हि जेबौ सभ दिन इसकुल गै


संगी संगे हिल - मिल रहबै पैघ के सभटा कहल करबै
कान पकड़लौं आब ने करबौ बदमाशी हम बिलकुल गै


खाय-काल नकधुन्नी केलहुं तैं लटि कऽ हम एहन भेलहुं
डाँड़ सँ पेंटो सर-सर ससरल अंगो होई छै झुलझुल गै


सागो खेबय सन्नो लेबय आब नै कखनो मुंह बिचकेबय
परसन देऽ तीमन - तरकारी दालि दे आरो दू करछुल गै


दूध पीबि हम सुरकब दही खूब खेबय खाजा-पनतोआ
तइ पर सँ हम आमो खेबऊ पीयर-पाकल गुलगुल गै


देह्गर-दशगर संगी-तुरिया हमरा आंइख देखाबै जे
कसरत करबै देह बनेबै करतै डरे ओ छुलछुल गै


आशीर्वचन तोहर अमृत सन आँचरि आँगन ममता के
राजा बेटा "नवल" तोहर माँ चहकत बनि कऽ बुलबुल गै


***आखर-२३
2
बाल गजल-८

आमक गाछपर झूला लगाएब ना
अपनों झूलब सभके झुलाएब ना


केरा डम्फोरि आ लत्ती मोटका आनब
सउन बाँऽटि कऽ जउड़ बनाएब ना


कखनहुं ऊंचगर निच्चा कखनहुं
झूले संग हमहुँ आएब-जाएब ना


खसतय गोपी धऽपर -धऽपर- धप
झूला के बहन्ने ठाईढ डोलाएब ना


कियो बीछय गोपी हेतै नहि झगड़ा
हम सभ संगी मिल-जुलि खाएब ना


कसि-कसि कऽ आर झूलाबय हमरा
ऊँचगर जा हम चान के पाएब ना


ठाढ़ि ओदरतय झूला जों टूटतय
"नवल" चट सभ दौड़ पड़ाएब ना


***आखर-१४
3
बाल गजल


इसकुल के बस्ता छै भारी हम नञि टंगबौ टांगै तू
पाइनक थरमस हमरा चाही माँ दऽ दे नै मांगै तू


मोरक चित्र बना कऽ आनऽ देलथि हमरा मैडम जी
फोटो तोड़े पाड़य पड़तउ सुन लेकिन नै रांगै तू


छिट्टा तर जे धैल नुका कऽ भनसा घर गमकलै माँ
संग सोहारी पाकल कोआ खेबय कटहर भांगै तू


ओलती के काते-काते हम ठाढि गुलाबक रोपने छी
ओरिया कऽ धान पसारय माँ फूलक गाछ नै धांगै तू


"नवल" छोट नञि आब ओते काज अढा किछ हमरो
हमरा हाथ पघरिया दऽ दे माँ जारणि नञि पांगै तू


***आखर-२०
4
बाल गजल


काँचे खटहा सरही पड़ मे मारय मूस हबक्का यौ
लड्डूओ नञि खा हेतय ओकरा दांत कोंतेतै पक्का यौ


राति दिवालिक दीप जड़ेबै खेबै हम बताशा लड्डू
हुक्कालोली गेनी भंजबय फोड़बय खूब फटक्का यौ


चिप्स-चरौरी चूड़ा भूजल लागत करू तइयो खेबै
बीछ-बीछ मिरचाय दीयउ भूजा हमरो दू फक्का यौ


बारी मे जा कोना चलेबै अप्पन छोटकी कठही गाड़ी
माटिक नमहर ढेपा तर फँसतै गाड़ी के चक्का यौ


पन्नी ताकू गेन बनाकऽ अंगनें मे किरकेट खेलेबै
गेंद दियौ गुड़कौवा हमरा हमहूँ मारब छक्का यौ


बंटी सँ नञि मीत लगेबै सी नम्मर के छै बदमाश
अपने मारि बझाबै सभ सँ हमरा कहै उचक्का यौ


इस्कुल के बस्ता मे राखल मुरही नै मसुवाई कहीं
"नवल" हाट के बाट तकै छै कचरी आनब कक्का यौ


***आखर-२०

अहि बाटी मे अगबे रोटी चिन्नी संग-संग दूधो कम
ई बाटी छऊ तोहर भईया ई बाटी नहि लेबौ हम


चोरा-चोरा क चिन्नी फंक्लैं माँ के जा कहि देबौ हम
नञि त एकटा फाँक अचारक दे उताइर क खेबौ हम


खुरलुच्ची बनि लुच-लुच करबैं नानी मोन पड़ेबौ हम
आब जों बिठुआ कटबैं भैया दांते कैट कनेबौ हम


सुन गे बहिना तोरो अहिना कहियो मजा चखेबौ हम
ककरो स जो झगड़ा हेतौ आब नञि तोरा बचेबौ हम


हासिल पड़का जोड़ ने कहियो तोरा आब बतेबौ हम
चलहिन इस्कूल मैडम जी सँ पक्का माईर खुएबौ हम


नवलश्री "पंकज"





निश्छल-निर्मल कोमल बचपन
धिया-पुता केर अलगहिं जीवन


चलैत रहछि सभके अंतर्मन
भावक अजबहिं कूटन - पीसन


छै देह लेढायल मोन ई कंचन
कमल-फूल सन लागै अनमन


क्षण ठिठियै क्षण कानै अनढन
चट सलाह आ झट द अनबन


बस टांट सोहारी बसिया तीमन
उठि भोरहरबा सभ सँ नीमन


इस्कूल सँ बचबा लेल धरछन
नीक लगई छई मरुआ मीरन


कितकित पाड़ल सगरो आँगन
चईत-कबड्डी मुँह मे सदिखन


हो मेघ-सुरुज या चान-तरेगन
जहि पर हाथ धेलक से अप्पन


"नवल"कथी फुरि जेतय कक्खन
बाल-मनक नै किछु परिसीमन
वर्ण- १३
(सरल वर्णिक बहर)



मोन  पड़ल  ई  कियै  अनेरे  बात  पुरनगर  बचपन  के
आंखि  नोरेलै  मोन   जड़ेलक याद रमनगर बचपन के


बचपन दाबल - गाड़ल - बिसरल यौवन के मादकता मे
खोलि रहल छी खाली मोटरी बैसल असगर बचपन के


बाबुक-कनहा मायक-कोरा अनुपम झूला सन घुआ-मुआँ
ता-ता-ता थैया आर ठेहुनिया खेल छमसगर बचपन के


ठकि-फुसला क कते खुयेलइन्ह दूध-भात आ गूड़क पूआ
चंदा-मामा आर मौसी-बिलाय नेह हिलसगर बचपन के


बस फूईसक खेती द्वेषक दोषी "नवल" जुआनी निर्संतोषी
धाह  जुआनिक  जड़ा  गेलै ओ गाछ झमटगर बचपन के


 --- वर्ण - २३ ---
(सरल वर्णिक बहर)



कीन दे कचरी-झिल्ली-बऽरी लवणचूस आ कुट-कुट माँरी
लोढि बाधसँ धान जे अनलौं भूजि दे मुरही भुट-भुट माँ


धान अगोअं केऽ जेऽ उसरगल तकर कीन दे फीता-बाला
काकी जे देलखिन्ह बाला से हाथमे होई छई छुट-छुट माँ


ललका फीता गूहल जुट्टी तेल सँ माथा गमकै गम-गम
थकरै केश जहन ककबा लऽ ढील केऽ मारै पुट - पुट माँ


देखि भूख सँ लोहछल नेन्ना दुःख-सुख सभटा लोप भेलै
भंसा घर मे घाम सँ भीजल काज करै सभ चुट-चुट माँ


होय कहाँ अनका देखबैलै "नवल" इ मायक माया-तृष्णा
भेड़ निन्न तइयो कहि खिस्से दूध पियाबय घुट-घुट माँ


--- वर्ण- २२ ---
(सरल वार्णिक बहर)






जवाहर लाल काश्यप

खसलै पर नहिं कनलै बौआ
खसलै पर फेर उठलै बौआ


हाथ पकडि चललै बौआ
हाथ छोडि क चललै बौआ


अपने पैर पर दौडलै बौआ
चान के छू लेलकै बौआ


क्रांति कुमार सुदर्शन

एखन देख'मे छोट लगै छी
तैयो कछुआ चालि चलै छी


पएर हमर डगमग करैए
तैयो हम नभ-चान देखै छी


बोली हमर क क ट ट प प
तैयो महान बनब से स्वपन देखै छी


बहुत दूर अछि दिल्ली
अमेरिकाक नाम सेहो सुनै छी


चढ़ब हम चान आ मंगल पर
आब कहू की हम अँहासँ कम लगै छी

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'विदेह' २२४ म अंक १५ अप्रैल २०१७ (वर्ष १० मास ११२ अंक २२४)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -    मैथिलानी केर उपराग राम सं आ समाज ...