Sunday, August 12, 2012

'विदेह' १११ म अंक ०१ अगस्त २०१२ (वर्ष ५ मास ५६ अंक १११) PART II




गजेन्द्र ठाकुर

ggajendra@videha.com
http://www.maithililekhaksangh.com/2010/07/blog-post_3709.html

२.गद्य
२.१.१.मुन्नाजी:बाल गजलः पुरान देहक नव चेहरा २.ओमप्रकाश झा: मैथिली बाल गजलक अवधारणा ३.जगदानन्द झा 'मनु' -बाल गजलक अवधारणा ४.आशीष अनचिन्हार- की थिक बाल गजल ५.चंदन कुमार झा- मैथिली बाल-साहित्य आ' बाल-गजल


२.२.१.योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’- लघुकथा- देववाणी २.नवेंदु कुमार झा- बिजलीक क्षेत्र मे आत्म निर्भरताक लेल सरकार कऽ रहल प्रयास

२.३.१.अमित मिश्र- बाल गजल: कोमल करेजक आखर २.मिहिर झा- बाल गजल

२.४.श्री राज- यात्रीक कवितामे गाम

२.५.मुन्नाजी-विहनि कथा संसार

२.६.आशीष अनचिन्हार द्वारा श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीसँ लेल साक्षात्कार

२.७.१. राजदेव मण्‍डल- जगदीश प्रसाद मण्‍डलक कवि‍ता संग्रह राति‍-दि‍नक समीक्षा २.डॉ. धनाकर ठाकुर- समीक्षा – फूल तितली आ तुलबुल (लेखक -श्री सियाराम झा 'सरस')

२.८.१.जवाहर लाल काश्यप- विहनि कथा- जमाना बदलि गेलै  २.जगदानन्द झा 'मनु'- विहनि कथा- मसोमात/ रहस्य ३.सुजीत कुमार झा- मिथिला पेन्टिङ्गक विदेशमे मांग बढल -छत्तामे मिथिला पेन्टिड्ड४.श्री जगदीश प्रसाद मण्डल- लघुकथा-सूदि‍ भरना

१.मुन्नाजी:बाल गजलः पुरान देहक नव चेहरा २.ओमप्रकाश झा: मैथिली बाल गजलक अवधारणा ३.जगदानन्द झा 'मनु' -बाल गजलक अवधारणा ४.आशीष अनचिन्हार- की थिक बाल गजल ५.चंदन कुमार झा- मैथिली बाल-साहित्य आ' बाल-गजल


१.
मुन्नाजी
बाल गजलः पुरान देहक नव चेहरा


घड़ीक पेण्डुलम सन झुलैत जिनगीमे स्थिरता भागल फिरैए। ने देह स्थिर आ ने चित्त। केखनो क' तँ अपनो ठर-ठेकान हेराएल सन लगैए लोककेँ। जँ चिन्तनशील भ' ताकब तँ ठकाएल सन अनुभव हएत। एहन स्थितिमे कोनो नव सोच वा नव अवधारणाकेँ घीचा-तीरीमे फँसि जेबाक आशंका घेरि लैए। मुदा रक्षात्मको भ' वएह नव अवधारणा, नव प्रयोग,नव रचना साहित्यकेँ जिया क' रखबाक क्षमता देखबैए।
पद्य विधाक एकटा रूप गजल अपन आ समाजक सौन्दर्यबोध करबैए। हासिक, रसिक भ' प्रेममे ओझरा उब-डुब करैत अपन बाट पर ससरल जाइत देखाइए। गजलक बढ़ैत लोकप्रियता आब अपन विस्तार तकैए। आब गजल सभ भावमे चतरल-पसरल जा रहल अछि। ऐ बीच चर्चित युवा गजलकार आशीष अनचिन्हार जी गजलक क्षेत्रमे एकटा नव अवधारणा रखलन्हि। साहित्य अकादेमी आ मैलोरंगक संयुक्त तत्वावधानमे भेल कथा गोष्ठी २४ मार्च २०१२केँ अनचिन्हार जी बाल गजलक अवधारणाकेँ स्पष्ट करैत कहलन्हि "जेना गद्य विधा वा अन्य विधामे बाल साहित्य लिखल जाइत अछि तहिना गजलमे सेहो बाल मनोविज्ञान पर आधारित बाल गजल लिखल जाए"।२४ मार्च २०१२ के प्रस्तुत कएल गेल बाल गजलक परिकल्पनाक विधिवत् घोषणा अनचिन्हार आखर आ विदेहक फेसबुक वर्सन पर २७ मार्च २०१२केँ होइते बहुत रास परिपक्व बाल गजल सभ सोंझा आएल। घोषणा होइते ऐ विधाक पहिल रचनाकार भेलाह आशुतोष मिश्रा जे की नेपालसँ छथि मुदा यदा-कदा लिखैत छथि। दोसर स्थान पर भेलाह जगदानंद झा मनु आ तकरा बाद तँ अमित मिश्रा, रुबी झा, नवल श्री पंकज, चंदन झा, मिहिर झा, मुन्ना जी आ आन गजलकार सभहँक बाल गजलक प्रकाशनक क्रम बनि गेल। आ ऐँ तरहेँ ऐ अवधारणाक प्रथमे चरण ठोस भ' सोंझा आएल , जाहिसँ एकर मजगूत भविष्यक आकलन कएल जा सकैए। संगे एकर पूर्ण संभावना सेहो जागल देखाइए।


अनचिन्हार आखर द्वारा बाल गजलक महत्वकेँ देखैत " गजल कमला-कोसी-बागमती-महानंदा सम्मान" अलगसँ देबाक घोषणा सेहो कएल गेल। आ ई मार्च माससँ प्रभावी मानल गेल। आ श्रीमती प्रिती ठाकुर जीकेँ मुख्यचयनकर्ती बनाएल गेल। एखन धरि जून मास धरिक प्रारंभिक चरणक चयन भेल अछि जे एना अछि-----------------
१) मार्च लेल श्री मती रूबी झा जीकेँ चूनल गेल।
२) अप्रैल लेल नवलश्री पंकज जीकेँ चूनल गेल।
३) मइ लेल अमित मिश्रा जीकेँ चूनल गेल।
४) जून लेल चंदन झा जीकेँ चूनल गेल।
संप्रति विदेह द्वारा प्रस्तुत बाल गजल विशेषांक एकर आधारकेँ मजगूत करबाक दिशामे एकटा सशक्त प्रयास अछि जाहिसँ एकर विकासक संभावना अक्षुण्ण रहए।

२.
ओमप्रकाश झा
मैथिली बाल गजलक अवधारणा
जेना कि नाम सँ स्पष्ट अछि, बाल गजल माने भेल नेना-भुटकाक लेल गजल। बाल गजलक अवधारणा मैथिली मे एकदम नब अछि आ पहिल बेर २४ मार्च २०१२ केँ श्री आशीष अनचिन्हार ऐ अवधारणा केँ सामने आनलथि। बहुत अल्प समय मे बाल गजल बहुत प्रसिद्धि पओलक आ बाल गजल कहनिहार गजलकार सभक एकटा विशाल पाँति ठाढ भऽ गेल। ऐ मे सर्वश्री गजेन्द्र ठाकुर आ आशीष अनचिन्हार जकाँ स्थापित गजलकार तँ छथि, एकर अलावे नब गजलकार सब सेहो बाल गजल कहबा मे विशेष अभिरूचि देखौलन्हि। बाल गजल कहनिहार नब गजलकार सभ मे सर्वश्री मिहिर झा, मुन्ना जी, इरा मल्लिक, अमित मिश्रा, चन्दन झा, पंकज चौधरी 'नवलश्री', राजीव रंजन झा, जगदानंद झा 'मनु', रूबी झा, प्रशांत मैथिल आदि अनेको गजलकार छथि। "अनचिन्हार आखर", जे मैथिली गजलक एकमात्र ब्लाग अछि, देखला पर पता लागैत अछि जे बाल गजलक अवधारणा अयलाक बाद सँ एखन धरि(ई आलेख लिखबा तक) ७३(तिहत्तरि) टा बाल गजल ऐ ब्लाग पर पोस्ट भऽ चुकल अछि, जे अपने आप मे एकटा कीर्तिमान अछि। खास कऽ एतेक कम समय मे एतेक पोस्ट आएब बाल गजलक लोकप्रियताक खिस्सा कहि रहल अछि। बाल गजलक विधा एकटा स्वतन्त्र विधा बनबाक बाट मे अग्रसर अछि, जे एतेक कम समय मे एतेक संख्या मे बाल गजल कहनिहार गजलकार आ बाल गजलक संख्या सँ स्पष्ट अछि। संगहि किछु लोक केँ मिरचाई सेहो लागब शुरू अछि आ ओ लोकनि बाल गजलक सम्पूर्ण अवधारणा केँ नकारबाक कुत्सित असफल प्रयास मे जत्र कुत्र अंट शंट पोस्ट देबऽ लागलाह। ई गप आर स्पष्ट करैत अछि जे बाल गजलक विधा मजबूती सँ स्थापित भऽ रहल अछि। कियाक तँ सफल व्यक्ति आ विधा सभक आकर्षणक केन्द्र बनैत अछि आ बाल गजल सेहो सभक आकर्षणक केन्द्र बनि चुकल अछि, चाहे ओ गजलकार होईथि, पाठक होईथि, आलोचक होईथि वा जरनिहार लोक सभ होईथि। जखन मैथिलि गजलक चर्च भऽ रहल अछि, तखन श्री आशीष अनचिन्हारक चर्चा स्वभाविक अछि। मैथिली गजलक विकास मे हुनकर योगदान हुनकर धुर विरोधी लोकनि सेहो मानैत छथिन्ह। मैथिली बाल गजलक अवधारणा लेल श्री आशीष अनचिन्हार मैथिली साहित्य मे अपन अनुपम स्थान बना चुकल छथि। बाल गजलक अवधारणा सेहो हुनके छैन्हि, जे बहुत सफल भेल अछि।
आब किछु गप करी मैथिली बाल गजलक रचना सभक संबंध मे। हमरा विचार सँ बाल गजल नेना भुटकाक लेल रूचिगर तँ हेबाके चाही, संगहि ऐ मे कोनो स्पष्ट सामाजिक सनेस होइ तँ ई सोन मे सोहाग जकाँ हएत। ओना तँ सभ बाल गजल कहनिहार गजलकार सभ ऐ मे सक्षम छथि आ नीक सँ नीक बाल गजल लिख रहल छथि, मुदा ऐ सन्दर्भ मे हम श्री गजेन्द्र ठाकुरजीक बाल गजलक उल्लेख करब उचित बूझि रहल छी। हुनकर एकटा बाल गजलक मतला अछिः-
कनियाँ पुतरा छोड़ू आनू बार्बी
जँ रंग गुलाबी छै तँ जानू बार्बी
ऐ गजल केँ पूरा पढि कऽ कने देखियौ। ई गजल कनिया पुतराक उल्लेख करैत नेना-भुटकाक मनोरंजन तँ करिते अछि, संगहि अजुका बाजारवादक बलिवेदी पर कुर्बान भेल मनुक्खक मार्मिक विवेचना सेहो करैत अछि। एहन आरो कतेको बाल गजल सभ "अनचिन्हार आखर" पर भेंटैत अछि, जकरा ऐ ब्लाग पर पढल जा सकैत अछि। ई गजलकार सभक सामाजिक संवेदना केँ प्रकट करैत अछि आ हम ऐ लेल सभ गजलकार केँ साधुवाद दैत छियैन्हि। हम एहने बाल गजलक आस गजलकार सभ सँ लगओने छी। कियाक तँ गजलकारक सामाजिक दायित्व सेहो छै, जे पूरा हेबाक चाही। आधुनिक मैथिली गजलकार सब मे ई क्षमता अछि आ ओ दिन दूर नै अछि जखन एक सँ एक सुन्नर आ बालोपयोगीक संगे सामाजिक समस्या पर बाल गजलक भरमार हएत। व्याकरणक हिसाबेँ मैथिली बाल गजल नीक बाट धएने अछि। अनचिन्हार आखरक टीमक परिश्रमक कारणेँ मैथिली मे बहरयुक्त गजलक काल शुरू भऽ चुकल अछि आ सरल वार्णिक बहर(जकर अवधारणा श्री गजेन्द्र ठाकुरजी देलखिन्ह) केर अलावे आब अरबी बहर मे गजल कहनिहार गजलकारक कमी नै छै। बाल गजल अपन शुरूआते सँ बहरयुक्त अछि, जे बाल गजलक लेल शुभ संकेत अछि। शुरूआतिए समय मे जे आ जतबा बाल गजल लिखल गेल अछि, ओ सभ बहर मे अछि, चाहे सरल वार्णिक बहर होइ वा अरबी बहर। बहरक अलावे रदीफ आ काफियाक नियमक पालन सेहो पूरा पूरा भऽ रहल अछि। व्याकरण पालनक ई प्रतिबद्धता निश्चित रूपे बाल गजलक सफलताक गाथा लिखबा मे सहायक हएत।
मैथिली गजलक बढैत डेग संग आब मैथिली बाल गजलक डेग सेहो उठि गेल अछि। मैथिली बाल गजल जाहि द्रुत गति सँ अपन डेग उठओलक अछि, ऐ सँ तँ यैह लागैत अछि जे अगिला साल आबैत आबैत मैथिली बाल गजलक पोथी प्रकाशित भऽ सकैत अछि। संगहि इसकूलक पाठ्यक्रम मे बाल गजल सम्मिलित हेबाक संभावना सेहो साकार रूप लऽ सकत। पाठ्यक्रम मे सम्मिलित हेबाक बाद मैथिली बाल गजल सभ पढनिहार-पढौनिहारक संज्ञान मे नीक जकाँ आओत आ सामाजिक विकासक संरचना मे अपन महत्वपूर्ण योगदान, जे अपेक्षित अछि, सेहो दऽ सकत।

३.
जगदानन्द झा 'मनु'
ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीह्टोंल, मधुबनी

बाल गजलक अवधारणा

बाल गजलक अवधारणा कोनो बेसी पुरान नहि अछि | आँखिक देखले- देखले चारि महिना  भेल होएत | मुदा जेना कहल जाई छैक, कोनो कार्यक अथबा अबधारनाक सुरुवात कतौ नहि कतौ सँ होएते छैक | आ हम सब एखुनका समकालीन गजलकार (विशेष कए विदेह आ अनचिन्हार आखर सँ जुरल ) शोभाग्यशाली छी जे एहि महान घटनाक्रम केँ परोक्ष अपन आँखि सँ देख रहल छी आ इतिहास में धारनाक गवाह बनि कए आएब |
ओना कोनो कार्य केँ हरदम दूगोट पक्ष होएत छैक एकटा पक्ष में  तँ  दोसर बिपक्ष में | बहुत रास बिपक्षक लोक केँ एखन तक मैथिली में गजल, सेहो नहि पचि रहल छैन आ अगुलका पीढी हुनका सब केँ सामने मैथिली में बाल गजल लए कँ उपस्थित भए गेल | ई हुनका सब केँ लेल अविश्वसनीय आ अपच भेनाई तँ स्वभाबिक छनि | किएक   तँ  बाल गजलक अब्धारनाक उत्पति एखन तक उर्दू आ हिंदीयो में चुप्पे अछि, ओहि ठाम मैथिली में गजल नहि पचबै बला सब केँ सोँझां में करीब चारि महिना में लगभग सय सँ बेसी सुन्नर-सुन्नर नेनपन सँ भरल बाल गजल हुनका सब लेल आश्चर्ज मुदा हमरा सबहक लेल प्रश्नताक विषय अछि | किछु लोक साँप केँ गेलाक बाद लाठी पितै में लागल रहैत छथि   तँ  किछु लोक एकटा सार्थक श्रीजन में, मुदा इतिहास बनाबै बला में नाम सदिखन श्रीजनकर्ता केँ अबैत छैक | हम सब केँ सब एखनका समय केँ श्रीजनकर्ता छी  |
बाल गजलक अबधारना कोना सम्भब भेलै आ कोन-कोन महिना में एकर पूर्ण जानकारी चन्दन झा जीक आलेख में नीक सँ अछि मुदा हम एतेक जरुर कहब जें एहि अबधारनाक जन्म आशीष अनचिन्हार जीक मोन  सँ भेलैंह आ बहुत जल्दीए ई अपन स्वतंत्र छाप जन-जन केँ मोन पर छोरत |
बाल मोनक कल्पना केँ कोनो सीमा नहि छैक, बस ओ कल्पना ओ चरित्र जे जीवनक भागमभाग में कतौ हमरा सब सँ हरा गेल, कनी काल केँ लेल सब किछ बिसरि कए बच्चा बनि कलम चलेने बाल गजल | एहि सन्दर्भ में गजेन्द्र ठाकुर जीक ई उक्ति सय टका ठीक छैन -"जे जतेक बच्चा बनि जेता ओ ओतेक नीक बाल गजल कहता " |
बिनु पानिक  नाउ चलाएब हम
बिनु चक्काक गाडी बनाएब हम
नहि बिना पानिक नाऊक कोनो प्रयोजन आ नहि बिनु चक्काक गाड़ीक कोनो प्रयोजन मुदा उपरका शेर में बाल मोनक परिकल्पना अछि आ ओ बाल मोन किछो कए सकैत अछि | बिनु पानिक नाऊ चला सकैत अछि, बिनु चाक्कक गाड़ी बना सकैत अछि, बाबा केँ घोरा बना सकैत अछि | ओहे बाल मोन जखन गंभीर होएत अछि  तँ परदेश में बसल काका बाबु केँ बजाबैक हेतु चीत्कार करैत अछि -
'मनु' दै सपत घर घुरि आउ काका बाबु
नेन्ना केँ कखन तक कोँढ ठोराएब


आशीष अनचिन्हार
की थिक बाल गजलः


किछु लोक "बाल गजल"क नामसँ तेनाहिते चौंकि उठल छथि जेना केओ हुनका अनचोकेमे हुड़पेटि देने हो। जँ एहन बात मात्र मैथिलिए टामे रहितै तँ कोनो बात नै, मुदा ई चौंकब हिन्दी आ उर्दूमे सेहो भए रहल छै। कारण ई अवधारणा मात्र मैथिलिए टामे छै आर कोनो भारतीय भाषामे नै। जँ हम कोनो हिन्दी-उर्दू भाषी गजलकार मित्रसँ "बाल गजल"क चर्च करैत छी तँ चोट्टे कहैत छथि जे उर्दूक बहुत गजलकार सभ बहुत शेरमे बाल मनोविज्ञानक वर्णन केने छथि खास कए ओ सुदर्शन फाकिर द्वारा कहल आ जगजीत सिंह द्वारा गाओल गजल----- "ये कागज की कश्ती वो बारिस का पानी" बला संदर्भ दै छथि आ ई बात ओना सत्य छै मुदा " बाल गजल"केँ फुटका कए ओकरा लेल अलग स्थान मात्र मैथिलिए टामे देल गेलैए। आ ई मैथिलीक सौभाग्य थिक जे ओ "बाल गजल"क अगुआ बनि गेल अछि भारतीय भाषा मध्य। आ विदेह एकर विशेषांक निकालल ताहि लेल हम एकरा धन्यवाद नै दए सकैत छीऐ कारण विदेह हमहूँ छी आ लोक अपना आपकेँ धन्यवाद कोना देत।


जहाँ धरि बाल गजलक विषय चयन केर बात थिक तँ नामेसँ बुझा जाइत अछि ऐ गजलमे बाल मनोविज्ञान केर वर्णन रहैत छै। तथापि एकटा परिभाषा हमरा दिससँ ----" एकटा एहन गजल जाहि महँक हरेक शेर बाल मनोविज्ञानसँ बनल हो आ गजलक हरेक नियमकेँ पूर्ववत् पालन करैत हो ओ बाल गजल कहेबाक अधिकारी अछि"। जँ एकरा दोसर शब्दमे कही तँ ई कहि सकैत छी जे बाल गजल लेल नियम सभ वएह रहतै जे गजल लेल होइत छै बस खाली विषय बदलि जेतै।


आब आबी बाल गजलक अस्तित्व पर। किछु लोक कहता जे गजल दार्शानिकतासँ भरल रहै छै तँए बाल गजल भैए ने सकैए। मुदा ओहन-ओहन लोक विदेहक ई अंक जे बाल गजल विशेषांक अछि तकर हरेक बाल गजल पढ़थि हुनका उत्तर भेटि जेतन्हि। ओना दोसर बात ई जे कविता-कथा आदि सभ सेहो पहिने गंभीर होइत छल मुदा जखन ओहिमे बाल साहित्य भए सकैए तँ बाल गजल किएक नै ? ओनाहुतो मैथिलीमे गजल विधाकेँ बहुत दिन धरि सायास ( खास कए गजलकारे सभ द्वारा ) अवडेरि देल गेल छलै तँए बहुत लोककेँ बाल गजलसँ कष्ट भेनाइ स्वाभाविक छै।


की बाल गजल लेल नियम बदलि जेतैः


जेना की उपरमे कहल गेल अछि जे बाल गजल लेल सभ नियम गजले बला रहतै बस खाली एकटा नियमसँ समझौता करए पड़त। माने जे बहर-काफिया-रदीफ आ आर-आर नियम सभ तँ गजले जकाँ रहतै मुदा गजलमे जेना हरेक शेर अलग-अलग भावकेँ रहैत अछि तेना बाल गजलमे कठिन बुझाइए। तँए हमरा हिसाबेँ ऐठाम ई नियम टूटत मुदा तैओ कोनो दिक्कत नै कारण मुस्लसल गजल तँ होइते छै। अर्थात बाल गजल एक तरहेँ " मुस्लसल गजल " भेल।


बाल गजलक पूर्व भूमिकाः


तारीखक हिसाबें बाल गजलक उत्पति  २४.०३.२०१२ केँ मानल जाएत मुदा ओकर स्वरूप मैथिलीमे पहिनेहें फड़िच्छ भए चुकल छल। ०९ दिसम्बर २०११ केँ अनचिन्हार आखर पर प्रकाशित श्रीमती शांति लक्ष्मी चौधरी जीक ई गजल देखल जाए ( बादमे ई गजल मिथिला दर्शनक अंक मइ-जून २०१२मे सेहो प्रकाशित भेलै) आ सोचल जाए जे बिना कोनो घोषणाकेँ एतेक नीक बाल गजल कोना लिखल गेलै------------



शिशु सिया उपमा उपमान छियै हमर आयुष्मति बेटी
मैत्रेयी गार्गीक कोमल प्राण छियै हमर आयुष्मति बेटी


टिमकैत कमलनयन, धव-धव माखन सन कपोल
पुर्णमासीक चमकैत चान छियै हमर आयुष्मति बेटी


बिहुसैत ठोर मे अमृतधारा बिलखैत ठोर सोमरस
शिशु स्वरुपक श्रीभगवान छियै हमर आयुष्मति बेटी


नौनिहाल किहकारी सरस मिश्रीघोरल मनोहर पोथी
दा-दा-ना-ना-माँ सारेगामा गान छियै हमर आयुष्मति बेटी


सकल पलिवारक अलखतारा जन्मपत्रीक सरस्वती
अपन मैया-पिताश्रीक जान छियै हमर आयुष्मति बेटी


ज्ञानपीठक बेटी छियै सुभविष्णु मिथिलाक दीप्त नक्षत्र
मातृ पितृ कुलक अरमान छियै हमर आयुष्मति बेटी


"शांतिलक्ष्मी" विदेहक घर-घर देखय इयह शिशुलक्ष्मी
बेटीजातिक भविष्णु गुमान छियै हमर आयुष्मति बेटी


..................वर्ण २२................




तेनाहिते एकटा हमर बिना छंद बहरक गजल अनचिन्हार आखर आ विदेहक फेसबुक वर्सन पर 6/6/2011केँ आएल छल से देखू--------------


होइत छैक बरखा आ रे बौआ
कागतक नाह बना रे बौआ

देखिहें घुसौ ने चोरबा घर मे
हाथमे ठेंगा उठा रे बौआ

तोरे पर सभटा मान-गुमान
माएक मान बढ़ा रे बौआ

छैक गड़ल काँट घृणाक करेजमे
प्रेमसँ ओकरा हटा रे बौआ

नहि झुकौ माथ तोहर दुशमन लग
देशक लेल माथ कटा रे बौआ


तेनाहिते ४ अक्टूबर २०१०केँ अनचिन्हार आखर पर प्रकाशित गजेन्द्र ठाकुर जीक ऐ गजलकेँ देखल जाए----- जे शब्दावलीक आधार पर बाल गजल अछि मुदा अर्थ विस्तारक कारणें बाल आ बूढ़ दूनू लेल अछि-----


बानर पट लैले अछि तैयार
बिरनल सभ करू ने उद्धार


गाएक अर्र-बों सुनि अनठेने
दुहै समऐँ जनताक कपार


पुल बनेबाक समचा छैक नै
अर्थशास्त्र-पोथीक छलै भण्डार


कोरो बाती उबही देबाक लेल
आउ बजाउ बुढ़ानुस - भजार


डरक घाट नहाएल छी हम
से सहब दहोदिश अत्याचार


ऐरावत अछि देखा - देखा कए
सभटा देखैत अछि ओ व्यापार




ऐ तीनटा गजलक आधार पर ई कहब बेसी उचित जे बाल गजलक भूमिका बहुत पहिने बनि गेल छल मुदा विस्फोट 24/3/2012केँ भेलै। आ ऐ विस्फोटमे जतेक हमर भूमिका अछि ततबए हिनका सभकेँ सेहो छन्हि।






1


बाल गजल




ई छौंड़ी थिक बिढ़नी सन
सौंसे नाचै घिरनी सन


बदमाशीकेँ तगमा छै
मूँहक लागै हिरणी सन


बैसल भूतक नानी बनि
लागै छै मुँहचिरनी सन


बच्चा लग बच्चा लागै
बुढ़िया लग बततिरनी सन


ई दुनियाँ झाँपै तैओ
बेटी चमकै किरणी सन


हरेक पाँतिमे दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ


2
बाल गजल




भोरे उठि मैदान गेलै बौआ
ओम्हरहिसँ दतमनि तँ लेतै बौआ


पोखरिमे नीकसँ नहेतै धोतै
चिक्कन चुनमुन बनि क' एतै बौआ


सरिएतै पोथी पहिरतै अंगा
इस्कूलो खुब्बे तँ जेतै बौआ


नै रखतै दोस्ती खरापक संगे
पढ़ि बड़का डाक्टर तँ बनतै बौआ


सभहँक करतै मदति सोना बेटा
सदिखन नीके बाट चलतै बौआ






हरेक पाँतिमे दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ

५.

 चंदन कुमार झा
सररा, मदनेश्वर स्थान
मधुबनी, बिहार

मैथिली बाल-साहित्य आ' बाल-गजल
मैथिली साहित्यक इतिहास करीब ८०० बरख पुरान छैक आ' से एकर समृद्धि विश्व-साहित्य जगत मे अपन फराक आ' बेछप स्थान बनौने अछि ताहि मे कोनो दू मत नहि.मुदा, जखन मैथिली साहित्यक एहि समृद्धि केँ ध्यान मे रखैत मैथिली बाल-साहित्य पर दृष्टिपात करैत छी वा' आन-आन भाषाक बाल-साहित्य सँ एकर तुलना करैत छी तऽ फेर ई नगण्यप्राय बुझना जाइत अछि.मैथिली भाषा मे बाल-साहित्य बहुत कम लिखल गेलैए एखनधरि. लेकिन, एकटा बात जरूर छैक जे मिथिला क्षेत्र मे घरक बुढ़-पुरान द्वारा धिया-पुता सभकेँ विभिन्न तरहक प्रेरणादायी खिस्सा पिहानी सुनयबाक प्रचलन बहुत पुरान छैक मुदा, एकरा बाल-साहित्य केऽ अंतरगत मान्यता नहि देल जायत किएक तऽ ई लिखित रूप मे नहि उपलब्ध अछि. बिभिन्न जगह पर एकर विभिन्न स्वरूप मे कथानक बदलैत रहैत छैक.लिखित रूप मे नहि हेबाक कारणेँ ई खिस्सा-पिहानी सुनब आ' सुनेबाक परंपरा सेहो विलुप्त भेल जाऽ रहल छैक.
मैथिली बाल साहित्यक प्रादुर्भावकाल प्रायः बीसम शताब्दीक उत्तरार्ध केँ मानल जायत.ओना हमरा लग एखनधरि एकर कोनो प्रामाणिक तारीख तऽ उपलब्ध नहि अछि मुदा, बाल-साहित्य लिखनिहार पुरान साहित्यकार सभक रचनाकाल केँ धेयान मे रखैत हम ई बात अपन अनुमानक आधार पर कहि रहल छी.एहि समय मे पं.चंन्द्रनाथ मिश्र "अमर", पं. गोविन्द झा, मुरलीधर झा,कालीकान्त झा "बुच", रामलोचन ठाकुर सदृश मुर्धन्य विद्वान, स्थापित साहित्यकार आ' मैथिलीसेवी सभ अपन कलमक मोसि पिया मैथिली बाल-साहित्य केँ पोसलनि.फेर जीवकांत, सियाराम झा "सरस", सन लोकप्रिय साहित्यकार एकरा अपन आंगुर धरा डेगा-डेगी चलौलनि.एकैसम सदीक शुरुआत मे तारानन्द वियोगी,ले.क. मयानाथ झा, जगदीश प्रसाद मण्डल,गजेन्द्र ठाकुर आ' प्रिती ठाकुर, ईत्यादि सँ मैथिली बाल-साहित्य केँ बेश दुलार-मलार भेटि रहल छैक.वर्तमान मे ऋषि वशिष्ठ आ' डा. शशिधर कुमरक बाल-साहित्यक लेल कयल जा रहल अवदान सेहो उल्लेखनीय अछि.तखन आब ई आशा निश्चित रुपेँ कयल जाऽ सकैत अछि जे मैथिली बाल-साहित्य सेहो क्रमशः जवानी आ' प्रौढ़ावस्था केँ प्राप्त करत आ' चिरंजीवि बनत.एकर एहने उज्जवल भविष्य केँ देखैत साहित्य अकादमी दिल्ली सेहो मैथिली बाल-साहित्य केँ मान्यता दैत एकरा लेल पुरस्कारक प्रावधान कयलक अछि.अस्तु.
मैथिली साहित्य जगत मे गजल सेहो कमोवेश नवके विधा कहल जायत.ओना एकर उद्भव मैथिली मे करीब सय बरख पूर्व भेल रहैक आ' फेर कहियो गजल तऽ कहियो गीतल के रुप मे ई अड़ल रहल मुदा, एहि गीतल-गजल सभ मे गजलक व्याकरण केँ कमोवेश एकात कऽ देल गेलैक.परिणामस्वरूप, मैथिली गजल आ' गजलकार मैथिली काव्यधारा सँ सभदिन कतिआएले रहल आ गजल सेहो सभदिन अपन अस्तित्वक लड़ाई लड़ैत रहल अछि. एकैसम सदीक एखनधरिक बारह बरख मैथिली गजलक इतिहास मे अन्यतम स्थान रखैत अछि. एहि समयावधि मे श्री गजेन्द्र ठाकुर आ' आशीष अनचिन्हारक अवदान अविस्मरणीय अछि. गजेन्द्र जी गजल व्याकरणकेँ पुष्ट करैत नहि खाली गजल लिखलाह अपितु सरल वर्णिक आ' सरल मात्रिक बहरक रूप मे मैथिली गजल संसार केँ दूटा अनमोल बहर वा गजल-छंदक ढाँचा देलखिन्ह जे हमरा सन-सन कतेको नवतुरिया आ' नवसिखुआ केs लेल गजल लिखबा हेतु सहायक सिद्ध भेल अछि.एहि सँ मैथिली गजल केँ अभूतपूर्व समृद्धि भेटि रहल छैक. वर्तमान मे मैथिली गजलक लेल आशीष अनचिन्हारक समर्पण वर्णनातीत अछि. आशीष जी उर्दू आ' अरबीक समृद्ध गजल व्याकरण केँ मैथिली भाषाक आवश्यकतानुसार जाहि तरहेँ सरलीकरण केलथि आ' फेर अनचिन्हार आखरक माध्यम सँ आम जनमानस मे बहर आधारित गजल कहबाक (लिखबाक) लेल रुचि जगा रहल छथि से जा'धरि मैथिली गजल इतिहास रहत ता' धरि हिनकर एहि अवदानक चर्चा अवस्से कयल जायत.
मैथिली मे बाल-गजल एकदम टटका परिकल्पना अछि.आन भाषाक बाल-साहित्य सभ मे सेहो बाल-गजल किन्साइते हेतैक.उर्दू मे गजल माने प्रेमालापे बुझल जाइत छलैक पहिने मुदा, फेर गजलकार सभ एकरा विस्तार दैत एहि मे सामाजिक सरोकार केs सेहो समावेशित कयलनि लेकिन बाल-गजल ओत्तहु जनमल हेतैक ताहि मे हमरा शंके बुझना जाइत अछि. मैथिली मे बाल-गजलक परिकल्पना सर्वप्रथम २४ मार्च २०१२ केs आशीष अनचिन्हार द्वारा कयल गेल आ' फेर २७ मार्च केs आशीष जी सूचना देलनि जे २५ वा २६ मार्च केs मैथिलीक पुरान आ' स्थापित गजलकार मुन्ना जी द्वारा एकटा बाल-गजल लिखल गेल अछि.एहि तरहेँ मुन्नाजीक ई बाल-गजल मैथिली बाल-गजलक इतिहास मे प्रथम होयबाक गौरव पौने अछि.आशा करैत छी जे विदेहक एहि बाल-गजल विशेषांक मे ई बाल-गजल प्रकाशित होयत. बाल-साहित्य सृजनकाल मे बाल मनोविज्ञान केँ धेयान मे राखब परमावश्यक.एकटा उत्कृष्ट साहित्य लेल जरुरी छैक जे ओ' सरल, बोधगम्य आ' प्रेरणास्पद हो.जखन बाल-गजलक परिकल्पना मैथिली गजलकार सभक सोझाँ एलनि तऽ स्वाभाविक रुपेँ हुनका सभक मोन मे ई प्रश्न उठलनि जे एकर रुपरेखा केहन हेतइ.....एकर व्याकरण आ' भावपक्ष केहन हेबाक चाही...ईत्यादि.हुनकर सभक एहि जिज्ञासा केs शांत करैत गजेन्द्रजी कहलखिन्ह जे कायदा-कानून तऽ सामान्ये गजल जेकाँ रहतैक मुदा भावपक्ष एहन हेबाक चाही जे छोट-छोट धिया-पुता के रुचई.ओकर सभक मन-मस्तिष्क केँ पचई आ' तइँ जे गजलकार जतेक बच्चा बनि बाल-गजल कहताह(लिखताह) ओ' ओतेक सफल हेताह.
उत्साह आ प्रतिभा सँ भरल अमित मिश्र,पंकज चौधरी "नवलश्री",जगदानन्द झा "मनु",रुबी झा, मिहिर झा,ईत्यादि सन नवगजलकार सभ गजेन्द्रजीक उपरोक्त कहल बात के पुर्णतः आत्मसात कयलनि.फलस्वरुप, २४ सँ ३१ मार्च २०१२ अबैत-अबैत, एक्के सप्ताह के भीतर गोट दसेक सँ बेशी बाल-गजल हमरा सभक सोझाँ आयल.एहि क्रम मे हमहू एक-दूटा बाल-गजल लिखबाक प्रयास कयलहुँ.मुदा,एहिठाम उल्लेखनीय बात ई जे मैथिली बाल-गजल प्रायः सोइरीये सँ अपन रूप आ भाव सँ आम जनमानस के आकर्षित-प्रभावित करय लागल.बहर आ'व्याकरणक मापदण्ड पर सोंटल आ' बिम्ब आ' भावसँ ओत-प्रोत मैथिली बाल-गजल अपन जन्महि कालसँ संकेत देमय लागल जे मैथिली बाल-साहित्य मे ओकर भविष्य बेश उज्जवल छैक आ'से लगभग चारिए मासक अल्पावधि मे एकसय सँ बेशी बाल-गजल एहि बातक प्रत्यक्ष प्रमाण अछि.
अमित मिश्र एखन जीवनक छात्रावस्था मे छथि आ'से एखन हिनकर एकटा पएर नेनपन तऽ दोसर जुआनीक सोपान पर छन्हि आ' तकरे प्रतिफल छैक जे हिनका बाल मनोभावक सागर मे डूबकी लगबैत देरी नहि लगैत छन्हि.यैह कारण छैक जे ई बाल-गजलकारक पाँति मे सभसँ आगू ठाढ़ भेटैत छथि.एखनधरि गोट तीसेक सँ बेशीए बाल-गजल रचि चूकल छथि आ तइमे अधिकांश अरबी बहर पर आधारित अछि जे हिनकर गजलकारक रूप मे प्रतिभाक परिचायक अछि.ई दरभंगा मे रहैत छथि से हिनकर बाल-गजल सभ मे शहरी आ' ग्राम्य परिवेश मे बच्चा सभक मनोभावक अद्भुत चित्रण-वर्णन भेटैत अछि.ई कतहु-
माटिक चाउर पानिक दूध पातक थारी बनेबै
माटिक चुल्हा पर खीर रान्हि,तरकारी बनेबै
आ'
बालुक चिन्नी कादो के दही गेना फूलक चूडा़ हेतै
घैलक (खपटा) चकला संठी के बेलना से पूड़ी बनेबै ....कहैत भेटताह त' कतहुः-
पीठ पर छै बैग बौआ चलल इस्कुल
लाल पियर ड्रेस चमके भरल इस्कुल
नै पहाड़ा पढ़ब नै सीखब ककहरा
आब छै कंपुटर सिखा रहल इस्कुल....आ' फेर व्यस्त माय-बाप आ' एकाकी होइत बचपन दिशि इशारा करैत कहैत छथि -
नै जो पढ़ाबै के लेल इस्कुल माँ
तू जाइ छैँ बदलै घर त' वनवास मे
पंकज चौधरी "नवलश्री" सेहो प्रवासी छथि आ' गाम सँ दूर हिनका बेर-बेर नेना मे बितायल दिन इयाद अबैत छन्हि.तैँ सहजहि कहैत भेटताहः-
देखि भूख सँ लोहछल नेन्ना दुख-सुख सभटा लोप भेलै
भंसा घर मे घाम सँ भीजल काज करै सभ चुट-चुट माँ
होय कहाँ अनका देखबैलै "नवल" ई मायक माया-तृष्णा
भेर निन्न तइयो कहि खिस्से दूध पियाबय घुट-घुट माँ.....आगाँ कहैत भेटताह...

मोन पड़ल ई किये अनेरे बात पुरनगर बचपन के
आँखि नोरेलै मोन जड़ेलक याद रमनगर बचपन के
बाबुक कनहा मायक कोरा अनुपम झूला सन घुआ-मुआँ
ता-ता-ता थैया आर ठेहुनिया खेल छमसगर बचपन केँ.
रूबी झा एकटा गजलकारि हेबाक संग-संग माय सेहो छथि से हिनकर बाल-गजल मे मायक ममता स्पष्ट दृष्टिगोचर होइत अछि.जेनाः-
रुसिये गेल बौआ मनाएब कोना कए
निर्धन माय बौआ बुझाएब कोना कए...फेर आगाँ कहैत भेटतीहः-
चलल ठुमकि बौआ कते सोहावन लागै छै
बाजल बौआ तोतल माँ मनभावन लागै छै.
मनुजी बेशीकाल बालमन के अपन प्रेरक बाल-गजल सभक माध्यम सँ प्रेरित करैत भेटताह से अहूँ सभ देखू:-
मुठ्ठी भरि बिया भागक अपन हम रोपि
अपने माटि में हँसि हँसि कँ गौराएब
आ' फेर...
हमरा कहैत अछि "मनु" मूर्ख चरबाहा
पढ़ि कए सभ चरबाहा के पढ़ेबौ हम
माय नहि चरबै लेल गाय जेबौ हम
पठा हमरा इस्कुल कॉपी पेन लेबौ हम.
उपरोक्त शेर वा गजलांश सभ तऽ एकटा बानगी मात्र अछि.एखनधरिक बाल-गजल शतक पर यदि दृष्टिपात करब तऽ माय-बापक दुलार-मलार,भाय-बहिनक झगड़ा-झाँटी सँ लऽ के लक्ष्यप्राप्ति हेतु प्रेरणा आ संकल्प सभ किछु भेटि जायत. आ' फेर ई कहबा मे कोनो अतिशयोक्ति नहि रहत जे मैथिली बाल-गजल अपन छठिहारे सँ जीवकांत,सरसजी सन-सन निसन्न कवि सभक बाल-कविताक समकक्षी बनि गेल अछि अछि.
अंत मे कहय चाहब जे विदेह जे ई बाल-गजल विशेषांक बहार करबाक नेयार केलक अछि से निःसंदेह मैथिली बाल-गजल आ' बाल-साहित्य इतिहासक विकास मार्गपर एकटा माइलक पाथर साबित होयत.एकरा आरो ठोस रूप देबाक मादेँ हमर सुझाव रहत जे एहि अंक मे सम्मिलित बाल-गजल आ' बाल-गजल सँ संबंधित आलेख केँ संग-संग एखनधरिक किछु उल्लेखनीय बाल-गजल सभकेँ एकठ्ठा कऽ एकटा छोट-छीन पोथीक रूप मे विदेह परिवार प्रकाशित कराबय आ' संपूर्ण मिथिला क्षेत्रक विद्यालय आ' पुस्तकालय सभमें उपलब्ध कराबय जाहि सँ बाल-गजलक परिकल्पना अपन उद्देश्य के प्राप्त करत.गाम-घरक नेना-भुटका बाल-गजल सँ परिचित हेताह आ' हुनका सभ मे मैथिली बाल-साहित्य पढ़बाक प्रति रुचि जगतैन संगहि मैथिली बाल-साहित्यक गजलकार सभक मेहनति सोकाज लगतनि.एहिठाम हम मिथिला क्षेत्रक ओहन विद्यालय,सामाजिक आ' शैक्षणिक संस्था,गायक,संगीतकार,ईत्यादि, सभ जे आर्थिक रुपेँ सबल छथि,सँ नेहोरा करब जे ओ बाल-गजल के ऑडियो-विडियो कैसेट,सीडी,डीविडी बना गामघरक अंगना-घर मे पहुँचेबाक प्रयास करथि.मैथिली बाल-गजलक भविष्यमे विकासक मादेँ हमर मनोरथ अछि जे ई धिया-पुताक ठोर पर ओहिना सजय जेना मैथिलानीक ठोर पर गोसाउनिक गीत,सोहर,चौमासा,बारहमासा,समदाउन बसल छैक.अस्तु.



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'विदेह' २२८ म अंक १५ जून २०१७ (वर्ष १० मास ११४ अंक २२८)

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