Saturday, July 14, 2012

'विदेह' १०९ म अंक ०१ जुलाइ २०१२ (वर्ष ५ मास ५५ अंक १०९) PART VI



नारायण झा
कवि‍ता

सम्‍मान

हे जगदीश, एहेन दि‍न देखलौं
ऐ मण्‍डल बीच, मण्‍डल पद पएलौं

आरंभ कएल लेखन ऐ रहुआ धरतीसँ
पहि‍ल कथा संग्रह, गामक जि‍नगीक कथासँ
रचना रसधार पटा जेना गंगा जट्टासँ
सुवास गमकैछ कथा, नाटक, उपन्‍याससँ।

हे युगपुरुष, टैगोर पुरस्‍कार पएलौं
रहुआवासीक संग पारसमणि‍ पुस्‍ताकलयक नयना जुड़ेलौं।

अहाँक वि‍वि‍ध वि‍धा, जेना पसरल तरेगन
जीवनक उत्थान-पतनसँ जीवन-मरण
संग इन्‍द्रधनुषी अकास देखैत छी राति‍-दि‍न
आँजुरि‍ भरि‍ अछि‍ पंचवटी, गीतांजलि‍ नीमन
अपनेक लेखनी बढ़ि‍ अकास चढ़हय सदि‍खन।

हे जगदीश एहेन दि‍न देखलौं
ऐ मण्‍डल बीच, मण्‍डल पएलौं।।

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
चंदन कुमार झा
सररा, मदनेश्वर स्थान
मधुबनी, बिहार

1.बाड़ी बदलल वृन्दावन मे

उमड़ि-घुमड़ि घन भरल गगन मे
मोर मगन नाचय उपवन मे
महमह गमके धरणीक कण-कण
जेना मलय मिझरायल पवन मे ।।

छन-छन,झम-झम,बुन्नी झर-झर
झिंगुर केर स्वर, बेंगक टर-टर्र
खोंता बिच करब चिड़ैक फर-फर्र
जनु प्रेम राग पसरल कूंजन मे
उमड़ि-घुमड़ि घन भरल गगन मे ।।

कलश नवल ओढ़लक तरुवर
नवयुवती सन मटकय निर्झर
हँसइत धार मुस्कय सरवर
सुख बरसय प्रकृति केर भवन मे
उमड़ि-घुमड़ि घन भरल गगन मे ।।


चमकय बिजुरी ढनकइत जलद
पपीहा के पिहु-पिहु बोल सुखद
स्वर्गक लावण्य धरणी उतरल
बाड़ी बदलल जेना वृन्दावन मे
उमड़ि-घुमड़ि घन भरल गगन मे ।।

2.
सिखनिहार सँ बेशी सिखौनिहार छै जगमे
सिखौनहार सँ बेशी परिछनहार छै जगमे
परिछनहारो सँ बेशी फरिछेनिहार छै जगमे
सभसँ बेशी प्रमाणपत्र बटनिहार छै जगमे ।

आहार सँ बेशी परसनिहार छै जगमे
परसनिहार सँ बेशी खेनिहार छै जगमे
खेनिहारहु सँ बेशी लुझिनिहार छै जगमे
लुझिनिहारो सँ बेशी लुटनिहार छै जगमे ।

रोजगारो सँ बेशी कमेनिहार छै जगमे
कमेनिहारो सँ बेशी बेरोजगार छै जगमे
बेरोजगारो सँ बेशी मंगनिहार छै जगमे
सभसँ सँ बेशी भूखे मरनिहार छै जगमे ।।


हाइकु
दलान पर
मचलै हरबिर्रो
बरात एलै !

वरक बाप
फनैछ नौ-नौ हाथ
टाका खातिर !

आजुक मैना
कोना परिछतीह
राम जमाय ?

बेटीक बाप
पएर पकड़ने
वर-बाप के ।
चण्डीक रूप
फेर धेलकै बेटी
एलै दलान ।

गर्दमिसान
घुमा देलकै वर
भेलै अजुबा !!
हाइकु

गरजे मेघ
चमकय बिजुरी
मास अषाढ़ ।

बरखे बर्षा
तिरपित धरती
मेटलै प्यास ।

गुड़के डोका
फनकैछ कबइ
पोखरि नाञ्घि ।

नञ्गटा छौड़ा
उपछय डबरा
पोठी खातिर ।

बंशी पथने
रोहुक जोगार मे
बैसल कक्का ।


सगरो बाध
छै छपछप पानि
जगलै आश ।

तानल छत्ता
चमकय घोघही
खेत पथार ।

हर-बड़द
कृषक परिवार
लगलै चास ।


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  जगदानन्द झा 'मनु' 
ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीह्टोंल, मधुबनी 


मोनक व्यथा 

किनका कहियौन  पतिएता केँ
हमर मोनक व्यथा बुझता केँ
 

बंद पिंजरा केँ चीडै जेकाँ
दिन भरि हम फरफराईत छी
 
जुनि बुझु हम नारी मिथिला केँ
 
हम त ' मकड जाल में ओझरेल छी
 

दुनियाँ
  केँ त ' बात नइँ पुछू 
कोना की केलक व्यबहार यौ
 
जननी केँ गर्भ में अबिते देखू
 
बिधाता मुनलैन्ह केबार यौ
 

मयो बाबू हमरे दूख सँ
 
पिचा गेला जीवनक पहाड़ में
 
नैन्हेंटा
  सँ पैन्ख गेल काटल
उडियो नइँ पएलहुँ
 संसार में 

बाबू केँ आँगुर छोडियो नइँ
 पएलहुँ   
पति केँ हाथ धराए गएलहुँ
 
नइँ किछु बुझलहुँ
  रित दुनिआ केँ 
अपन किएक सभ बिसराए गएलहुँ
  

नव
 घर आँगन नव समाज में 
जल्दी कियोक कोना अपनेता
दोख नइँ किछु हुनको छनि लेकिन
 
हमरा किएक कियोक बुझता
 

घर सँ कहियो नइँ बाहर निकललहुँ
  
ऊँच -नीच केँ ज्ञान नइँ पएलहुँ
  
अर्जित
 छल नइँ बुद्धि-बिद्या किछु 
नैन्हेंटा
 में सासूर हम एलहुँ  

कोन अपराध जन्मे सँ कएलहुँ
  
बाबू अहाँ अपन संग नइँ रखलहुँ
  
नइँ पतिएलहुँ
  हमरो में जीवन 
मोटरी बुझि क ' दूर भगएलहुँ
 


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दमन कुमार झा  
एकरा की कहबै...........?
         १.
अहाँक नजरि कतौ शून्य दिस तकैत
बिना कोनो  प्रयोजनकें जोरसं हँसैत
हाथक चूड़ी एखन हरदम खनकैत
पैरक नूपुर बिन प्रयोजने झनकैत
बिना कोनो उत्सबकें लटकें सीटैत
माथक  बिन्दियाकें  दर्पण  हेरैत
        एकरा की कहबै ........?
         २.
वर्षा  भेला  पर  निंद उड़ि  गेनाइ
बिजली चमकला पर सर्द भगेनाइ
बेंगक टरटरी सं व्याकुल भेनाइ
मोरक स्मरण सं छटपट केनाइ
गीतक कोनो  तान  सुनि  चंचल भेनाइ
कनियो कोनो आहट सुनि पुलकित भेनाइ
              एकरा की कहबै .......?

 
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विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत
१. मोना पाण्डेय २.ज्योति झा चौधरी ३.राजनाथ मिश्र (चित्रमय मिथिला) ४. उमेश मण्डल (मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव-जन्तु/ मिथिलाक जिनगी)
१.
मोना पाण्डेय
२.
ज्योति झा चौधरी


 .
राजनाथ मिश्र
चित्रमय मिथिला स्लाइड शो
चित्रमय मिथिला (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ )

४.
उमेश मण्डल

मिथिलाक वनस्पति स्लाइड शो
मिथिलाक जीव-जन्तु स्लाइड शो
मिथिलाक जिनगी स्लाइड शो
मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव जन्तु/ मिथिलाक जिनगी  (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ )


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विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती
१. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल)
२.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद
३.कनकमणि दीक्षित (मूल नेपालीसँ मैथिली अनुवाद श्रीमती रूपा धीरू आ श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि)
बालानां कृते
1.जगदीश प्रसाद मण्‍डल 2.डॉ॰ शशिधर कुमर
1.
जगदीश प्रसाद मण्‍डल
बाल कथा
मान


तराजूक दुनू पलड़ा बीच डंडी लगल रहैत, जइ सहारासँ वस्‍तु-जातक वजन मानल जाइत तहि‍ना जि‍नगीक तराजू सेहो होइत अछि‍। कमल फूलक डंटीक सहारासँ जहि‍ना फूलक सभ अंग समान रूपे खि‍ल-खि‍ल खि‍लैत तहि‍ना जि‍नगि‍योक होइत मुदा से कहाँ होइए?
जि‍नगीक तरजूक पलड़ा दू रंग होइए, एक इमान दोसर बैमान। पलड़ाक घटी-बढ़ी भेने तरजू पसङाह भऽ जाइए जइसँ घटैत-बढ़ैत जि‍नगी जीवनक दू धारामे प्रवाहि‍त होइत चलए लगैए।

एक महि‍ना अखार रहि‍तो दू नक्षत्रमे वि‍भाजि‍त होइत, ओना एक पूर्ण ऊपर ऐ बीच आद्रा नक्षत्र अपन पूर्ण जि‍नगी बि‍तबैत अछि‍। भलहि‍ं अखाढ़क पहि‍ल भाग हो वा मध्‍य वा अंत। पनरह दि‍न अन्‍हार बीत आठ इजोरि‍या मास टपि‍ गेल। हाजरी भुकबए लेल मौसम जोगार लगा नेने अछि‍ मुदा आद्राक उपस्‍थि‍ति‍ दर्ज नै भेल अछि‍। ओना कहैले सालक पाँच बरखा भऽ चुकल अछि‍ मुदा तैयो आद्राक जगह उम्‍मस अपन पूर्ण जुआनीमे जगमगा रहल अछि‍। गोनू झाक हरबाहि‍क जलखैक खीर जकाँ हाल धरतीकेँ छुछुओनहि‍ अछि‍।

दि‍न उगि‍ते जेना दीनानाथक दर्शन होइत तहि‍ना कि‍सानक बीच नव दर्शन आएल। ओ थि‍क श्री-वि‍धि‍सँ खेती करब। मास दि‍न पूर्व धानक बीआ, जैवि‍क खाद, कीटनाशक दबाइ इत्‍यादि‍क बँटबारा, पछि‍ला हि‍साबे इमानदारीसँ भेल। इमानदारी ऐ लेल जे जहि‍ना बैंकक कर्जकेँ लोक चौक परक भुज्‍जा खा सठा दैत तहि‍ना अखन धरि‍क बीआ-बालि‍क हि‍साब रहल। वैचारि‍क रूपमे बीआ पाड़ि‍ खेतीक करैक समए सेहो पौलक। संयोगो नीक रहल जे एकटा बरखा सेहो भेल। बरखा हाथ लगने कि‍छु गोटे बीआ खसौलनि‍। देखबामे बरखा भेल, मुदा बीआ पाड़ैक नै भेल। जइसँ बीआ अधा-छि‍धा जनमल। कि‍छु गोटे कल आ घैलसँ पटा डूमा हाल बना खसौसनि‍। जनमबैमे ओ जीतलाह। मुदा कि‍दु गोटे अखनो बीआ घरेमे आद्राक आशापर रखने छथि‍। ओना अद्रोसँ रोहि‍णीक बीआकेँ नि‍राग मानल गेल अछि‍। मुदा रोहि‍णीक पछाति‍क हि‍साबकेँ अनदेखी केने बीरारेमे बीआ जडबो करैत। खेतीक एक उपाय तँ हाथ आएल मुदा मूल उपाय पानि‍ नै आएल। एक पाशापर भगवान बैसल दोसर २००८ ई.क कोसीक वि‍भि‍वषि‍का नहर खा गेल, तइ लागल १९८७क बाढ़ि‍ आ अठासीक भुमकम बीस बर्ख पहि‍नहि‍ बोरि‍ंग खा गेल छल। जूर-शीतल पावनि‍क चलती कमने पोखरि‍क उड़ाही रूकि‍ गेल जइसँ ओ अपने तेहेन रोगा गेल अछि‍ जे जान लेल रवि‍क संग एकादशि‍यो करैए।
मनुष्‍यक जन्‍म संस्‍कार ओतए पनपब शुरू होइत जतए ओकर जन्‍म होइत अछि‍। ई दीगर बात जे कतौ पेटक बच्‍चाक सेवा पोनगैक पहि‍नेसँ हुअए लगैत आ कतौ रस्‍तेपेड़े जन्‍मो लैत आ पाललो-पोसलो जाइत।

आद्राक कर्त्तव्‍यक लापरवाहीसँ जन-जनक बीच तबाही तँ अछि‍ये श्रमक घटबी सेहो बेसि‍आइये गेल अछि‍। मुदा कि‍छुओ कि‍अए ने हुअए आखि‍र वसन्‍तक उनाड़ि‍यो मास तँ छी। कि‍अए ने बाग-बगीचामे बगवार वसन्‍तक संग चैतावर आ बारहमासा गाऔत। आमक संग-संग जमुनि‍या धार सेहो बहैत अछि‍।

टोलक पाँच गोटेक गाछी एकठाम। साधारण परि‍वार तँए छोट-छोट गाछी। मुदा कलमी-सरही सभ आम लुबधल। करीब पच्‍चीस तीस गाछ सभ मि‍ला कऽ पाँचो परि‍वारक जीवन-शैली एक रंग तँए वि‍चारोमे एकरूपता छन्‍हि‍। एते जरूर छन्‍हि‍ जे बि‍नु कहने कि‍यो कोनो गाछपर ने ढेला फेकैत आ ने हाथसँ तोड़ैत। मुदा खसल आमक कोनो रोक नै। जइसँ चेतन तँ अपन-आनक ठेकान जरूर बुझैत, मुदा बाल-बोध नै। पाँचो परि‍वारक धि‍या-पुता एकेठाम खेलबो करैत आ आम खसलापर दौड़बो करैत। ओना अबोध बच्‍चा रहने, अवाजकेँ ठीकसँ नै अकानि‍ कि‍यो केम्‍हरो कि‍यो केम्‍हरो दौग जाइत मुदा केकरो भेटलापर एते खुशी सभकेँ जरूर होइ जे हराएल भेटल।

राति‍क दू बजैत। उमस भरल दि‍नक संग अधा राति‍यो बीत गेल। एक बजेक बाद पूरबाक लहकी उठल। दि‍न भरि‍क गुमराएल मन नीन दि‍स दौगल।

दुनू बेटाक संग गुलजारी आमक गाछी वि‍दा भेल। अष्‍टमीक चान लुप्‍त भऽ गेल छल। जइसँ अन्‍हारक साम्राज्‍य पसरि‍ गेल। आठ गोटेक परि‍वार जुलजारीक। तीनू बापूत मि‍ला आठटा पाकल आम भेटलै।

आंगन आबि‍ डि‍बि‍याक इजोतमे आठो आम गनि‍ छोटका बेटा राधेश्‍याम बाजल-
जते गोरे घरमे छी एक-एकक हि‍साबसँ आमो अछि‍।
राधेश्‍यामक बात सुनि‍ जेठका भाय गौरीशंकर बाजल-
जहि‍ना छोट-पैघ आम अछि‍ तहि‍ना तँ घरमे लोको अछि‍ कि‍ने। तँए....।
राधेश्‍याम- अखन माएकेँ रखैले दऽ दहक। खाइ बेरमे खाएब।

2.

डॉ॰ शशिधर कुमर विदेह                              
एम॰डी॰(आयु॰) कायचिकित्सा                                   
कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) ४११०४४,

बर्खा रानी - ‍१

बर्खा    रानी !  आऽ  गे  आऽ ।
राति   अएबेँ,  से  एखने  आऽ ।
इस्कूल  जा - जा  रोजे  थकलहुँ,
आइ  अपन  तोँ   खेल  देखा ।।

एखने  ,  गए   एखने  आऽ ।
आइ  अपन  नञि  भाओ  बढ़ा ।
एतेक बरस तोँ झमकि झमकि कऽ,
रस्तेँ पएरेँ   हो   नञि  थाह ।।

बर्खा   रानी !  एहि  ठाँ  आऽ ।
अप्पन  रिमझिम  गीत   सुना ।
दुपहरिया  धरि   खूब   बरसिहेँ,
फेर   कने    लीहेँ    सुस्ता ।।

बर्खा  रानी !  आब  ने  आऽ ।
दम्म   धरै,  तोँ  ले   सुस्ता ।
संगी साथी     शोर    करैए,
खेलब - कूदब करब   मजा ।।
बर्खा रानी - ‍२

बर्खा रानी !  आब ने आऽ ।
दम्म  धरै  तोँ  ले सुस्ता ।
हाथ पएर सभ ठिठुरि गेल अछि, आब तोँ रौदक दरस देखा ।
  बर्खा रानी ! आब ने आऽ ।।

खेल कूद सभ बन्न पड़ल अछि,
संगी साथी    पड़ल   बेमार ।
सर्दीखाँसी,   ढोंढों,  खिचखिच,
ककरो  धएने   अछि  बोखार ।
सभठाँ  एहने सनि  किछु  चर्चा,
एहने सनि किछु  दुखद समाद ।
पसरल  कए ठाँ  रोग  मलेरिया,
हैजा      डेंगू      कालाजार ।
आङ्गन  सगरो  चाली  सह सह,  आब ने एहेन रूप देखा ।
  बर्खा रानी ! आब ने आऽ ।।

बाट घाट   कादो किचकाँही,
डूबल    सौंसे   खेत - पथार ।
मालजाल सभ ठिठुरि मरै अछि,
मच्छर माछीक  बढ़ल पसार ।
लेन कटल अछि, फेज उड़ल अछि,
देखब  टी॰ भी॰  तोहर  कपार ।
दुष्कर     सौंसे     आबाजाही,
कतेक  लोक   करतै   बैसार ?
जतहि सञो अएलेँ ततहि पड़ा जो,  आब ने अप्पन मूँह देखा ।
  बर्खा रानी ! आब ने आऽ ।।


बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥
१०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२)
आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥
आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥
मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।
ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।
हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आसर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आघोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आयुवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आनेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आऔषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आमित्रक उदय होए॥
मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि।
एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।
अन्वय-
ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म
रा॒ष्ट्रे - देशमे
ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त
आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए
रा॑ज॒न्यः-राजा
शुरे॑ऽबिना डर बला
इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण
ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला
म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर
दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली)
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित
सप्तिः॒-घोड़ा
पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री
जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला
र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर
स॒भेयो॒-उत्तम सभामे
युवास्य-युवा जेहन
यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे
वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला
निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे
नः-हमर सभक
प॒र्जन्यों-मेघ
वर्षतु॒-वर्षा होए
फल॑वत्यो-उत्तम फल बला
ओष॑धयः-औषधिः
पच्यन्तां- पाकए
योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा
नः॑-हमरा सभक हेतु
कल्पताम्-समर्थ होए
ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी।

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"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २२८ म अंक १५ जून २०१७ (वर्ष १० मास ११४ अंक २२८)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -  गौरी चोरनी ,  गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर ...