Saturday, July 14, 2012

'विदेह' १०९ म अंक ०१ जुलाइ २०१२ (वर्ष ५ मास ५५ अंक १०९) PART V

रामदेव प्रसाद मण्डल झारुदार

झारू- मानवता

ताज मि‍लै सम्‍पूर्ण जगतकेँ, आ बनि‍ जीबए झारूदार।
मानवमे मानवता होइ तँ, बदलै नै ओकर अवतार।।

रंगू नै जीवन जाइत धरमसँ, सभकेँ मानू अप्‍पन मीत।।
नीच ऊँचक भेद भुलि‍ कऽ, गबैत रहु मानवता गीत।।

सत्ता हमर सारे जगतपर, मानवता हमर मेघा वि‍धान।।
पालनमे जे करए ढि‍ठाइ, स्‍वीकारए ओ नरकक खान।।

जन-जनपर हम्‍मर शासन छै, हर चि‍जपर हम्‍मर अधि‍कार।।
कोनो प्रप्‍त अप्राप्‍त कहाँ छै, तर्क लगा करू स्‍वीकार।।

हर अेा मानव हमर सि‍पाही, जि‍नका छन्‍हि‍ मानवता ज्ञान।।
मारू कुचलि‍ दियौ बेमानवता, बढ़ाउ जगमे अपन नाम।।

हमरासँ पहि‍ले कोनो नै शासन, नै छै कोनो धर्मक वि‍धान।।
हमरा बि‍नु जगत सुन्ना छै, हतैबला छै पशु समान।।

हमरा लेल छै कि‍यो नै ऊँचा, नहि‍ कि‍यो नीच नादान।।
जे बरतलक ऐ धर्मकेँ, अटल जगतमे हुनकर नाम।।

हम मानवक मूलाधार छी, सभ धरमक पि‍ता समान।।
पाप पुण्‍यसँ अति‍ परे छी, देवतो छी हम्‍मर संतान।।

मानव वास्‍ते सीमा सरहद, मानवताकेँ सक्कर खेद।।
जाति‍ धरम सरहदसँ अलग छै, मानवतामे कोनो नै भेद।।

१०
जब धरै मानवता मानव, रहै नै भीतर जाइत धरम।।
नि‍ष्‍ठा इमान कऽ करए आदर, और पुजै नि‍त्‍य सत् कर्म।।

११
जब मानव धरै मानवता, तब बढ़ै जन-जनसँ मेल।।
दूर रहै घरसँ सभ टेन्‍शन, ब्‍यापै नै कोनो झगड़ा झेल।।

१२
जब धरै मानवता मानव, पक्का होइ ओकर इमान।।
डर लगै छै असत् कर्मसँ, कि‍न्‍नौं नै बदलै ओकर जुवान।।

१३
जब मानवता धरै मानव, तब उपजै मन लाज लेहाज।।
आदर दीली बड़ा पाबै छै, रहै नै छोट प्‍यारसँ बाज।।

१४
मानव जब धरै मानवता, ओकरासँ कोइ दुखै नै जीव।
और नै दुनि‍याँ ओकरा सताबै, जीवमे देखै अल्‍ला शि‍व।।

१५
मानव जब मानवता धरै, तन पहि‍र नैति‍क परि‍धान।।
धरम इमानक रक्षा खाति‍र, करै न्‍यौछावर धन आ जान।।

१६
मानवता जब धरै मानव, मि‍ट जाए नि‍च ऊँचक शान।।
दुनि‍याँ देखाबै सम बराबर, देखै ने कि‍यो अप्‍पन आन।।

१७
धरै जब मानवता मानव, ब्‍यापै नै ओकरा त्रि‍वि‍ध ताप।।
काम क्रोध ने लोभ सताबै, अन्‍धवि‍श्वासमे करै नै जाप।।

१८
मानवता जब शासक धरै, सुख सम्‍पन्न होइ जनता तमाम।।
मि‍टै मूलसँ भूख गरीबी, रहै नै पाछाँ वि‍काशी काम।।

१९
मानवता जौं न्‍याय कर्मी धरै, कम हेतै केश फाइलक थान।।
कहल मुक्‍त भऽ साड़ी जनता, देखतै फेरसँ नया बि‍हान।।

२०
जौं मानवता धरै सि‍पाही, शुद्ध शासन कऽ रचै वि‍धान।।
झगड़ै नै जन-जनसँ कि‍यो, शान्‍ति‍ होएत सबहक परि‍धान।।

२१
मानव जब मानवता धरै, प्रगट होइ भीतर नीत इमान।।
नि‍ष्‍ठा मर्यादा नैति‍कता, दया धरम सतकरम वि‍धान।।

२२
जब त्‍यागै मानवता मानव, भऽ गेल ओकर शान्‍ति‍ भंग।।
जकरा अखन तक कहै छल अप्‍पन, ओकरेसँ भऽ गेल भारी जंग।।

२३
मानवता जब छोरै मानव, भऽ गेल अेाकर बेड़ा गर्क।।
चि‍क्कारे जगवासी ओकरा, जीबै जीवन बना कऽ नर्क।।

२४
अमूल रत्न मानवता मानू, जे पाॅलक ई जनहि‍त भाव।।
दुख तँ हुनका रहि‍ते नै छन्हि‍, रहै नै कोनो सुक्खक अभाव।।



झारू- ज्ञान

कऽ रहलौं वन्‍दना सभकेँ, हम अज्ञानी नीच नादान।
कऽ कऽ क्षमा सभ भूल-चूककेँ, सभ मि‍लि‍ देबै अभयकेँ दान।

जीवन-मरण पालन केर रचना, प्रकृति‍ केर गजब वि‍धान।
ऐ रचनाकेँ भेदि‍-भेदि‍ कऽ, जानि‍ गेल अछि‍ ई वि‍ज्ञान।।

सूर्या ताप जलवायुक संग, धरती आैर गगणक तीर।
सूत्रवत् सयाेग करै छै, जइसँ जनम-मरण जंजीर।।

अही पंचशक्‍ति‍ केर ज्ञानी, नाम देलनि‍ अल्‍ला-भगवान।
कि‍यो कहै छथि‍ राम प्‍यारसँ, ईसा-मूसा सुक्‍खक धाम।।

एकर प्रमान स्‍कूली पुस्‍तक, कि‍छु बि‍सवास करू श्रीमान्।
पढ़ि‍ कऽ जेकरा आइ जगत भरि, कऽ रहल लोक गजब केर काम।।

आबू जानू वायुमण्‍डल, नाइट्रो अठहत्तर प्रसेंट।
ओ एक्कैस अन एक प्रति‍शत, रहए घेरने हरदम प्रजेन्‍ट।।

आर्गोन कार्वण हि‍लि‍यम हाइड्रो, ओजोन नि‍योनमे एक प्रसेन्‍ट।
कोहरा आंधी-बर्खा बादल, संग तुफान बि‍जली करेन्‍ट।।

एकर ऊँचाइ अठारह कि‍मी, मानू एकरा प्रकृति‍ गर्भ।
प्रलय-प्रभव अहीसँ संभव, अहीसँ चलि‍त जीवन सर्ग।।

तपि‍ कऽ भीज कऽ सूखि‍ कऽ जमि‍ कऽ, करै छै नाइट्रो जग नि‍रमान।
जग रचि‍यता तत्व बेरानबे, सबहक लेल छै ई वरदान।।

१०
नाइट्रोजनमय सौंसे जगत छै, अधि‍क छै सभमे एकरे अंश।
होइ चाहे सौंसे जीव-जगत केर, खाहे ओकर सारा वंश।।

११
जहि‍ना अक्षर ग्रन्‍थ रचै छै, तहि‍ना तत्व रचै छै जीव।
रचना एकर ईसा-मूसा, हजरत तुलसी राम और शि‍व।।

१२
पृथ्‍वीक गुरूत्‍वाकर्षणसँ, सटल वायु धरतीपर।
छी प्रभावि‍त अहीसँ हम सभ, धरती केर सभ चेतन-जड़ि।।‍

१३
गोल-गोल छै अनु-प्रमाणु, रचल छै जइसँ ई जग काण्‍ड।
सूरज चंदा तारा गोल छै, गोल बनल छै ई ब्रह्माण्‍ड।।

१४
कऽ रहलै प्रकृति‍ नि‍यंत्रण, सभकेँ कहाँ छै एकर ज्ञान।
ओ भेद एकर की जनतै, जे नै पढ़लक भूगोल-वि‍ज्ञान।

१५
तन अहाँ केर क्षेत्र मात्र छी, ज्ञाता मात्र प्रकृति‍ जानू।
जे दुनूक भेद जानलक, गीता कहै छै ज्ञानी मानू।।

१६
गूथल छी हमसब प्रकृति‍मे, जहि‍ना धागामे मोती।
अभि‍न्न छी हम सभ एक-दोसरसँ, जहि‍ना बातीसँ ज्‍योति‍।।

१७
प्रकृति‍ एक तरू लता छी, फल-फूल छी जीव तमाम।
कहाँ कल्‍पना हमर ऐ बि‍नु, हि‍नका नै छै हमर काम।।

१८
प्रकृति‍ छी गाए दुधारू, जइ खि‍बै जग सि‍नेहक गाछ।
तकरा भेटै छै दूध दया केर, दुख नै रहै छै तकरा पास।।

१९
प्रकृति‍ छै धागा जइसन, जीव गूथल माला मोती।
सभ रहि‍ जाइ छै मैला पत्‍थल, कि‍छुमे जरि‍ जाइ छै ज्‍योति‍।।

२०
की इच्‍छा अपनेकेँ नै छै, हमहूँ चमकी बनि‍ स्‍टार।।
नि‍श्चि‍त पूड़त अहुँक आसा, छोड़ि‍ असत् करू सत्‍य स्‍वीकार।।

२१
आबू जानू संख्‍या रेखा, मानू एकरा जीवन आधार।
एकरा ि‍वचारि‍ कऽ बाबू-भैया, देखि‍ सकै छी स्‍वर्गक द्वार।।

२२
सुन्‍यकेँ मानू संत बराबर, दाया पलस केर सुख आधार।
वाया माइनस असत् बराबर, एनए ठाढ़ छै दुखक पहाड़।।

२३
सम रहनाइये काफी मानू, भवसारग केर नौका बीच।
धि‍यान हमेशा एते राखू, असत् ने लि‍अए काँटा खि‍ंच।।

२४
सेवाक बटि‍खारा चढ़ाबू, काँटा झूकतै पलस केर ओर।
सुख-शांति‍ जश कृत्ति‍ लऽ कऽ, सभ दि‍न एतै लबका भोर।।

२५
ज्ञान दबाबै पलसमे काँटा, माइनसमे दबबै अज्ञान।
सम-बराबरि‍ रहनाइ काफी, सममे सदा अटल भगवान।।

२६
ज्ञान बराबर ऐ दुनि‍याँमे, छै नै कि‍यो नाशी-पाप।
करू साफ बस तन-मन अपन, बैसतै आबि‍ कऽ अपने आप।।

२७
वि‍ष-अमृत सारे जगत भरल छै, लि‍अए ज्ञानसँ अमृत चूनि‍।
अज्ञानक कुचक्रमे पड़ि‍ कऽ, कि‍अए मरै छी माथा धूनि‍।।

२८
मुश्‍कील बहुत छै ऐ धरतीपर, िमलए कतौसँ सत्‍यक ज्ञान।
जीवन जौं पावन करनाइ अछि‍, छोड़ि‍ सतेनाइ सेवा ठान।।




झारू- कर्म
बहुत कोइ देलकै ऐ दुनि‍याँकेँ, बाबा बनि‍-बनि‍ कऽ उपदेश।
दऽ की सकै छी हम झारूदार, सूनि‍ लि‍अ कर्मक सन्‍देश।।

मानव धारए धनुष धर्मक, नीत इमानक चढ़ा कऽ तीर।
खि‍ंचै प्रत्‍यन्‍चा ज्ञानक गुस्‍सा, लक्ष्‍य कऽ कऽ असत् लकीर।।

कर्म करब अज्ञानक दमपर, हरदम जइमे दुखक आस।
सुख भेटै छै ओइ वन्‍दाकेँ, जेकरा भीतर ज्ञानक बास।।

दुनि‍याँ भरि‍क सुख होइ हमरा, चाहि‍ रहल अछि‍ सारे लोक।
लेकि‍न संभव कहाँ छै केकरो, मात्र भेटै सुखक संयोग।।

सुख-दुख पड़ल छै गोद प्रकृति‍, भेटतै केना जानू तंत्र।
नि‍श्चि‍त सुक्‍खक ओ छै भागी, जे जानलनि‍ सत्कर्मक मंत्र।।

सुख भेटत अछि‍ केकरा चाहने, चाहि‍ कऽ दुख भेल केकर दूर।
ई अज्ञान छी बाबू-भैया, ई नै प्रकृति‍क दसतूर।।

धि‍यान धरू रेडि‍यो धर्मिता, केना चलाबै छै बेतार।
तन-तरंगसँ फलक ि‍नर्णए, करए प्रकृति‍ सेचि‍-वि‍चारि‍।।

एकरे मानू नभ-मण्‍डलमे, जीव जगत केर फल खति‍आन।
कर्म-फलक सबहक लेखा, सत् अटल प्रकृति‍ वि‍धान।।

हवा जल आ सूर्या तापसँ, बनल छै सारे देह स्‍थूल।
सत् कर्ममे एकरा जोरू, जोड़ि‍ असत् मे करू नै भूल।।

१०
सत् कर्मसँ ऐ दुनि‍याँमे, शांति‍क संग छै सुख छै कुल।
असत् संग संगति‍ करब तँ, जीवन गुजरत बनि‍ कऽ शूल।।

११
कर्म मात्र दुइये दुनि‍याँमे, एक सच्‍चा दूजा छी भूल।
सत् असत् केर ऐ चक्करमे, फँसल छै ऐठाम मानव कुल।।

12
जीव दुखाइ नै जानि‍-बूझि‍ कऽ, भऽ सकए जत्ते बाँटू प्‍यार।
शत्रू-मि‍त्र ने बैरी कि‍यो, यएह तँ छी सत् कर्म हमर यार।।

१३
सत् कर्मपर सेवा जानू, जइसँ होइ छै जग ि‍नर्माण।
सूजश मान प्रति‍ष्‍ठा धनसँ, भरल रहै घर-वार मकान।।

१४
असत् कर्मपर पीड़ा जानू, जीवन जइसँ होइ वदनाम।
अपजस और नरक केर भारी, जग द्रोही होइ सभटा काम।।

१५
बड़ा ने कि‍यो जाति‍ लऽ कऽ, नै बड़ा कि‍यो धर्मसँ।
कि‍यो बड़ा अछि‍ ऐ धरतीपर, वस अपने सत् कर्मसँ।।

१६
जब-जब कर्मकेँ कर्मसँ जोड़ू, मन धरू सत् कर्मक धि‍यान।
दुखै ने जगवासी कि‍यो, यएह तँ छी सत् कर्मक ज्ञान।।
१७
काम सभ प्रकृति‍ केर छी, अलग-अलग छै सबहक सूत्र।
अही सूत्रमे जोड़ि‍ तनकेँ, पलि‍ रहल सभ जीवक पुत्र।।

१८
काम सभ प्रकृति‍ केर छी, जइ करै छी अहाँ-हम।
चाहै मेटाउ दुख जगतक, या बूनू दुनि‍याँमे गम।।

१९
असत् कर्मसँ नाता तोड़लक, जोड़ि‍ लेलक सत् कर्मक डोरि‍।
दुखू हुनका चलि‍ पड़ल अछि‍, खूलल द्वार जन्नत केर ओर।।

२०
पुण्‍य मात्र छी परसुख देनाइ, पाप मात्र परदुक्‍खक दान।
आइक ने सदि‍योक बात छी, कहि‍ गेला ज्ञानी ि‍वद्वान।।

२१
धन बल भेटल तँ की भेटल, जौं भेटैत कि‍छु सेवा कर्म।
लऽ लि‍अ शि‍क्षा सत् गुरूसँ, फेराे जानबै एकर मर्म।।

२२
सेवा तँ भगवान मात्र छी, कर्मकेँ जौं मानबै पूजा।
अहीसँ सद्गति‍केँ भेटबै, राह नै छै कोनो दुजा।।

२३
काम-क्रोध मद लोभ मोहसँ, लागल सभ धर्मीमे जंग।
सभ धर्मक कहै छै पोथी, पकड़ू सभ सत् कर्मक संग।।

२४
कर्मक जे कि‍यो देलनि‍ सत्ता, मानलक एकरे अपन भगवान।
जगमे भेटलै ओकरे शांति‍, सुख सम्‍पन्न अछि‍ ओ इन्‍सान।।

२५
कर्म करू सभ नि‍त्‍य धर्मसँ, बनैत रहत अहाँक बात।
फलक इच्‍छा करू ने कखनो, ई तँ अछि‍ प्रकृति‍क हाथ।।

२६
शरीर अहाँक यंत्र मात्र छी, कि‍छु कराउ एहेन काम।
धरतीपर जे अमर कराबए, ऊँचा करए जगमे नाम।।

२७
जि‍नाइ तँ ओकरे जि‍नाइ छी, जे जानलक ई गहरा राज।
धन जीवनक दाउ लगा कऽ, कऽ रहल जगसेवा कार्य।।




झारू- रामायण
पहि‍ल वन्‍दना गुरु चरणमे, दुजे चरण शंकर भगवान।
दुनू चरण अहीं केर नीचाँ, स्‍वीकाररू सत् सत् प्रणाम।।

ओइ घरकेँ तँ अयोध्‍ये मानू, जइ घर करए रामायण बास।।
कर्म रँगल होइ रामायणसँ, दुख नै रहतै तेकरा पास।।

श्‍याम रँग हे राम गोसाँइ, जाति‍-मानवक चश्‍मा उतार।
कर्म-कथा बस देखए रमायण, पूजा-पाठक उतरए बोखार।।

कर्म-कथा छी राम-रामयण, सुख-शांति‍क सत्‍यक प्रतीक।
अपनाकेँ ऐ सत्‍य कर्म कऽ, सभ पहुँचै सुखक नजदीक।।

जइसँ सुधरइ जग-भरि‍ मानव, लि‍खलनि‍ कथा मुनि‍ वाल्‍मि‍क।
ओ की जानतै एकर भाषा, लागल जि‍नका अज्ञानक दीक।।

सभ पढ़ि‍ सुनै छथि‍ एकरा, पुजै छथि‍ सभ आरती उतारि‍‍।
कर्म घारक मूल मंत्रपर, करै नै छथि‍न कि‍यो वि‍चारि‍।।

सभ पढ़ै-सुनै छथि‍ एकरा, भरल अछि‍ भीतर एकर कथा।
ज्ञान मात्रसँ कि‍छु नै होइ छै, धरू भीतर कि‍छु कर्म-बेथा।।

जूटल अछि‍ मानव केर रि‍स्‍ता, धरती केर सभ जीवक संग।
एकरा नि‍माहू सत् कर्मसँ, रि‍स्‍तेदार कि‍यो होइ ने तंग।।

दादा-पोता-बाप आ बेटा, सभ बनै छथि‍ एक्के लोक।
करम-धरम छै सबहक अपन, मि‍लाउ रामायणसँ संयोग।।

१०
पि‍ता बनू अहाँ राजा दशरथ, पुत्र बनू राम भगवान।
भाय भरत लक्ष्‍मण-शत्रुध्‍न, माता बनू कौशल्‍या समान।।

११
पि‍ता बनू अहाँ राजा दशरथ, पुत्रमे देखू अपन प्राण।
पोसू एकरा सत्‍यक कमाइ, और दि‍लाबू सत्तकर्मक ज्ञान।।

१२
पि‍ता बनू अहाँ राजा दशरथ, बच्‍चा भेजू नि‍त्‍य स्‍कूल।
ज्ञान-वि‍ज्ञानक पढ़ा कऽ पोथी, सभमे खि‍लाबू ज्ञानक फूल।।

१३
भाय बनू अहाँ लक्ष्‍मण सन, छोड़ू ने भारी दुखमे संग।
अहूँ ओहीमे हाथ बटाबू, राज-काज जौं कऽ दि‍अए तंग।।

१४
भाइक खाति‍र सभ कि‍छु ति‍यागू, सुख-शांति‍ और राजमहल।
नि‍भा कऽ रि‍स्‍ता धरा धामक, जगमे करू मर्यादा अटल।।

१५
पुत्र बनू अहाँ रामचन्‍दजी, पि‍ता वचन लऽ ति‍यागलनि‍ सुख।
नीति‍ इमान मर्यादा खाति‍र, ईस नै केलनि‍ बनबासक दुख।।

१६
बेटी बनू सि‍या सुकुमारि‍, टारू नै कि‍न्‍नौं बड़क बात।
रहए प्रति‍क्षा हुकुमक सदि‍खन, जेठ, पुस, साैनु आकि‍ दि‍न-राति‍।

१७
कन्‍या बनू सि‍या सुकुमारि‍, ऊँच करू पि‍ताक पाग।।
हुअए भूल ने कोनो एहेन, जइसँ लगए पागमे दाग।

१८
पुत्री बनू सि‍या सुकुमारि‍, बड़ा कऽ सदि‍खनि‍ करू लि‍हाज।
कऽ कऽ सेवा जगवासीक, चढ़ा दि‍औ सि‍र पि‍ताक ताज।।

१९
पत्नी बनू सि‍या सुकुमारि‍, पति‍क खाति‍र ति‍यागू सुख।
हुनके खुशीमे मात्र खुशी होइ, हुनके दुखसँ मात्र होइ दुख।।

२०
पत्नी बनू सि‍या सुकुमारि‍, अहूँ पति‍केँ मानू राम।।
दि‍यौ नै आदेशक मौका, समझि‍ कऽ हुनकर मनक काम।।

२१
पत्नी बनू सतीअनुसुइया, जुबा ने उतरे पति‍क नाम।
पर पुरुष सपनो नै देखल, पति‍केँ मानलनि‍ चारू धाम।।

२२
पत्नी बनू मनदोदरी रानी, पति‍केँ दि‍औ सत् नीत‍ सलाह।
दि‍यौ ने गुस्‍सा केर मौका, कऽ कऽ कोनो नीच गुनाह।।

२३
पुतोहु बनू अहाँ सीता-रानी, सासु पाबए माता केर मान।
ससुर-भैसुर होइ पि‍ता बराबरि, ननदि‍-दि‍अर भाए-बहि‍न समान।।

२४
पुतोहु बनू अहाँ रानी सीता, ससुक छीनू हाथक काम।
गोतनी जेठानी सगी बहि‍न सन, जेठ लगै भाय बड़ा समान।।

२५
शासक बनू अहाँ रमचन्‍द्रजी, जन-जनमे सुख भरू भरपुर।
होइ उत्थान दबल-कुचलकक, और होइ देशक गरीबी दूर।।

२६
पहि‍र कऽ माला मानवताक, देश वि‍कासक लगा दि‍यौ होड़।
अहाँ बनि‍ जाउ चाँद गगनक, नि‍हारए जनता बनि‍ चकौर।।

२७
जनहि‍तकेँ कोनो ठेँस ने पहुँचै, होइ एकताक नारा बुलन्‍द।
नि‍ष्‍ठा चढ़ि‍ कऽ ऊँच शि‍खरपर, करए फूटक कारा बन्‍द।।

२८
जे जेतए करै छी जे कि‍छु, देश सेवाक सभ छी काम।
रक्‍खू सुरक्षि‍त अपन नीति‍, खाउ नै ओइमे अपन इमान।।

२९
जनता बनू अयोध्‍यावासी, शांति‍ केर पकड़ू आधार।
दुखी ने होइ जन-जनसँ कि‍यो, सभमे होइ सेवाक वि‍चार।।

३०
जनता बनू अयोध्‍यावासी, सदि‍खन पाबू सत्‍यक साग।
नीति‍ धरम इमान जलसँ, हरा-भरा होइ सबहक बाग।।

३१
जनता बनू अयोध्‍यावासी, भायचाराक पढ़ि‍ कऽ पाठ।
गुनि‍ कऽ प्रेम दयाक डोरी, बान्‍हु सभ मानव केर गाँठ।।

३२
सबहक सत्रु सबहक दुश्‍मन, काम-क्रोध-लोभ-अज्ञान।
लोभ छै तइमे सबहक नाशी, दया-धरम और नीति‍ इमान।।

३३
की कऽ सकल चतुरेगी सेना, की केलनि‍ जोग जप वि‍ज्ञान।
ध्‍वष्‍त भेल अयोध्‍या नगरी, जब धेलनि‍ केकइ अज्ञान।।

३४
भेल अज्ञान वस रानी केकइ, की पुरा भेल उनकर आस।
जे प्‍यारा राजगद्दी पाबैत, भेज देलनि‍ हुनका बनवास।।

३५
ई करामात अज्ञानक छी, उनटा दइ छथि‍ जजबात।
उलटि‍ गेल अज्ञानसँ सभटा, ऐ धरतीकेँ मानव जात।।

३६
पाइये टामे सभटा सुख छै, घेरि‍ लेलक सभकेँ अज्ञान।
झोंकि‍ देलनि‍ सभ शक्‍ति‍ ऐ लेल, गमा कऽ नि‍ष्‍ठा धरम-इमान।।

३७
काम-क्रोध मद लोभ मोह सन, सभ खेतमे दुखक बीज।
जौं पनपल ई मौका पाबि‍ कऽ, सुख केर भऽ गेल पावर सीज।।

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पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २२४ म अंक १५ अप्रैल २०१७ (वर्ष १० मास ११२ अंक २२४)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -    मैथिलानी केर उपराग राम सं आ समाज ...