Monday, July 30, 2012

'विदेह' ११० म अंक १५ जुलाइ २०१२ (वर्ष ५ मास ५५ अंक ११०)- PART III



डा. अरुण कुमार सिंह, मैसूर,कर्णाटक

उजड़ैत गाम : बसैत शहर?
                                                             
की कहू, बहुत दिन पर 1जून 2012केँ  महावीर हास्पीटल गेल रही। हास्पीटल की गेलहूँ, मित्र मंडली संग कोशी कात जएबाक अवसर परि लागि गेल। अवसरो एहन जे नागो बाबू सेक्रेटरीक नातिक जन्म-दिन पटनासन शहरकेँ छोड़ि कोशीक कछेर पर बसल बलुआहा आ पूर्वी तटबन्धक कात मे स्थापित महिषी प्रखंडक एकलौता कॉलेज, माने शिक्षकक, छात्रक, समाजक कॉलेज नहि अपितु सेक्रेटरीक वैयक्तिक सम्पत्ति, मे मनाओल जा रहल छल। एहि अवसर पर शिक्षित आज्ञाकारीक फौजमे हमहूँ समाहूत छलहुँ। जहिना ओहि ठाम पहुँचलहुँ कि सेक्रेटरीक नजरि हमरा पर पड़तहि कहि उठलाह, ओ अरूण बाबू! कहिया अएलहुँ, खोजो- खबरि नहि रखैत छी। अपनेतँ मैसूर जाएकेँ हमरा सबकेँ बिसैरियै गेलहुँ। आब हम हिनका सभक लेल कतेक खटू। आब हमरो उमैरि भेल। अहाँ तँ जनितै छियैक, जे काज टाकासँ हैतेक ओ तँ टकै करतै ने। देखियौ ने टाकाक अभावमे कॉलेजक छतक ढलाई रूकल अछि आ, एकटा बात बुझलहुँ कि नहि, एहि बेरसँ फस्ट पार्ट मे एडमिशन सेहो होएत। तखनहि हुनक नाति आबि कहैत छनि जे- नानाजी हमरा पैसाब लागल अछि, हम कतए पैसाब करब, एहि ठाम कतहुँ बाथरूम कहाँ देखैत छियैक? ताहि पर ओहि ठाम जमकल बैसल एम.ए. पाससभमे सँ केओ बाजि उठलाह- एतेकटा फील्ड अछि कतहु अहाँ पैसाब कए लिअ। ओ बच्चा कनेक काल चुप रहल आ सोचैत बाजि उठल- एना कतहुँ खूजलमे बाथरूम कएल जाइत छैक, जँ इन्फेक्शन भए जाएत तँ?’ नामी-गिरामी विश्वविद्यालयसभसँ प्राप्त डिग्रीधारीक लेल एहि प्रश्नक कोनो उत्तर नहि छल। अच्छा छौड़ू, हमहूँ कोन फेरामे फँसि गेलहुँ, आधुनिकता - वैज्ञानिकता एवं प्रकृति - परंपरामे ओझराएल जा रहल छी। अखन जन्म-दिनक केक कटबामे एवं मासुक भोजमे बिलम्ब छल। भगवान जी, अरबिन्द जी, प्रांजलभाइजी एवं विजय जीक विचार भेल जे किऐक नहि एहि बीचक समयमे कोशी पर बनैत पूल देखल जाय। सभगोटे ए.सी.सँ सुसज्जित गाड़ीमे बैसि कोशी बान्ह दिस बिदा भेलहुँ जे कॉलेजसँ मात्र एक किलोमीटर पर छल। बलुआहा बाजारमे ओ लोकनि अपन-अपन पसिन्नक हिसाबसँ खएबा-पिबाक लेल वस्तु-जात किनैत गेलाह। गाड़ीकेँ बान्ह पर लगा सबगोटे ओतुका दृश्य एवं बनैत पूलक कार्यकेर गतिशीलताक आनन्द खाइत-पीबैत लेब प्रारंभ कएल। एहि ठाम हम एकटा बात कहि दी जे विजय जी, जे अपन पंचायतक प्रधान (मुखिया) सेहो रहि चुकल छथि,  सहरसा जिलाक महिषी प्रखण्डक सबसँ पैघ जमींदार स्व. गंगा बाबूक एकलौता पुत्र थिकाह। करीब सतरह वर्ष पहिने प्रो. (डॉ.) सुभाषचन्द्र सिंह (मैथिली प्राध्यापक, ए.एन.कॉलेज, पटना)जीक आवास बहादुरपुरमे  हुनकासँ परिचय भेल छल एवं परिचय आत्मीयतामे परिवर्त्तित भेलोपरांत ओ कहने छलाह कहियो अहाँ हमर गाम चलू; हम अहाँकेँ कोशी नदीमे नाह पर बैसा झिलहरिक संग कोशीक ओहि पारक अपन कचहरी (कामत, बासा) देखाएब। समय सापेक्ष नहि भेलाक कारणेँ एहन संभव नहि भए सकल छल। मुदा आइ कोशी बान्ह पर गप्पक क्रममे ओतेक वर्ष पहिलुका बात चलि पड़ल। ओ बाजि उठलाह- अरूण जी आब हमर कचहरी पर चारि चक्का चलि जाइत अछि।हम सुनि विस्मिततँ भेवे कएलहुँ, अविश्वसनीयता सेहो हुलकी मारि रहल छल बान्हे पर सबगोटेक बिचार भेल जे तेसर दिन हम सब कोशीक ओहि पार कचहरी पर जाएब एवं ओहि ठाम दिन-रातिक भोजन कए रातिएमे आपस भए जाएब। विजय जी ओतहिसँ मोबाइलक माध्यमे अपन कचहरीक मैनेजरकेँ बीस-पच्चीस गोटेक दिनुका एवं रतुका भोजनक व्यवस्था करबाक लेल आवश्यक निर्देश दए देलन्हि। पछाति हम सब कॉलेज आबि भोजनोपरांत सहरसा घुरि गेलहुँ।
पूर्वनिर्धारित कार्यक्रमक अनुसारेँ कोशीक पूबरिया एवं पछबरिया धारक बीच अवस्थित झारा पंचायतक शिशौना गाम जएबाक जे तिथि निश्चित छल ओकरा प्रति हम कनेक उदासीन छलहुँ, किएकतँ सूर्य भगवानक प्रकोपक कारणेँ प्रचण्ड गरमीमे घरसँ बहराएब लू केँ आमंत्रण देब सन छल। की कहू! निर्धारित तिथिकेँ फोनक घंटी बाजब प्रारंभ भए गेल एवं हमरो जाइऐ पड़ल। सहरसासँ जाइबलाक लेल दूटा ए.सी. युक्त स्कारपियो लागल एवं हम सब ओहिमे सबार भए बिदा भए गेलहूँ उजड़ैत गाम बसैत शहर वास्तविकताक अवलोकनार्थ। .सी.युक्त गाड़ी एवं ढण्ढ़ा पेय पदार्थक कारणेँ यात्रामे कोनो बेसी तकलीफ नहि भए रहल छल। हम सब बलुआहामे कोशी पर बनै वला पूल टपि ओहि पार शिशौना गाम दिस बढ़लहुँ। ओहि पंचायतक प्रधान (मुखिया) श्री अरूण यादव जनिक पैतृक गाम शिशौने छनि, सेहो हमरा सभक स्वागतार्थ एवं रस्तामे कोनो तरहक तकलीफ नहि हो, ताहि लेल हमरासभक संग छलाह। कामत पर शीघ्रताशीघ्र पहुँचबाक लेल सड़क मार्गकेँ छोड़ि कोशी नदीक काते कात गाड़ी बढ़ए लागल। बाढ़ि अएबासँ बहुत पहिनहि कोशीक कटनियाँ एवं ओहिसँ उपटैत लोकक दृश्यसँ हृदयतँ द्रबित भेवे कएल, अपितु कोशी मैयाक एहन ताण्डवसँ डरो भेल जे कहीं हमरहुँ सभक गाड़ी कटनियाँक कारणेँ नदीमे नहि समा जाय। ओहि ठामक लोकक जीवनकेर मार्मिक चित्रण मैथिली साहित्यकेँ के कहय, भारतक आनेको साहित्य मध्य विद्वान लेखक लोकनि प्रस्तुत कए चुकल छथि, तेँ ओतुका दुरूहताक  हम की बखान करू, एहन शब्द-सामर्थ्य हमरामे नहि अछि। .सी. युक्त गाड़ी रहलोपर हमसब सुरूज भगवानक प्रकोपक पूर्ण अनुभव कए रहल छलहुँ, परंच ओहि ठामक नेना-भुटका, वृद्ध-वणिता सभ केओ अपन-अपन काजमे मस्त छल। कोशीमैयाक धारमे छोट-छोट नेना-भुटकाकेँ उमकैत देखलहुँ तँ हमर देहक रोइयाँ डरसँ भुटकए लागल जे कही सब भासि ने जाए। सबतँ जेना एहन स्थितिसँ अनभिज्ञ अपनामे मस्त भए कोशीमैयाक धारमे निश्चित भए उमकैत छल जेना मायक कोरामे नेना।
खेत वा खेतक बीच टायर गाड़ी एवं ट्रैक्टरक लीख पर चलैत हमरहुँ सभक गाड़ी धूरा उड़बैत, खीरा, ककरी, परोड़, सजमनि, कदीमा, मुंग एवं मकईक भुट्टाक ठाम-ठाम लागल ढ़ेरीक अनुपम दृश्य देखि लागल जेना अनपूर्णा स्वतः एहि ठाम बास करैत होथि, गंगा बाबूक कचहरी एवं युवा प्रधान अरुण यादवक गाम पहुँचि गेल। शिशौना पहुँचतहि सम्पूर्ण गामक लोक स्वागतार्थ एवं जिज्ञासार्थ आबि गेलाह। महपुरा निवासी श्री रामनरेश सिंह उर्फ मुखियाजी आकाशवाणी पटना, विजयजी, प्रांजल भाईजी एवं अरबिन्दजीकेँ ओतुक्का लोक पहिनहिसँ चिन्हैत छलतेँ हुनका सभकेँ लोकनि नाम एवं सम्बन्धक आधार पर प्रणाम करैत गेलाह। हम, मदनेश्वर ठाकुर उर्फ भगवान जी (महिषी), मिथिलेश, लक्ष्मण एवं सिकन्दरकेँ औपचारिकता एवं आतिथ्यवश प्रणाम करैत बैसाओल गेल। अरूण यादव जे ओहि गामक बेटाक अतिरिक्त विकासपुत्र प्रधान (मुखिया) एवं विजयजी, जे ओहि गामक जमीन्दार छथि, दुनूक लोकप्रियता ओहि ठाम एकत्रित ग्रामीणक आवभगतसँ बुझना गेल। किछु समयोपरांत विजयजीक इशारा पर खस्सीक मासु, भात, रोटी, सलाद एवं दहीक संग भोजन लगाओल गेल एवं हम सब भोजनोपरांत आरामक मुद्रामे आबि गेलहुँ। पाँच-छओ बजे साँझक लकधक हम सब कोशीक पछबरिया धार, जे बेलदाबर नदीक नामसँ जानल जाइछ एवं एहि नदीमे कोशीक कोनो धारसँ पैघ माछ पाओल जाइछ, कात गेलहुँ, जतए हटिया लागल छल। हम सब ओहि बेलदाबर नदीक कछेर पर छोट-छीन हटियाक अवलोकन कएलहुँ एवं पान खाइत ओतुक्का स्थिति पर बात करैत रहलहुँ। हम एवं मुखिया जी (आकाशवाणी, पटना)केँ छोड़ि सभ गोटे बेलदावर नदीमे उतरि खूब उमकैत गेलाह एवं भगवान जी ओहि क्रममे अपन गरक सोनाक बनल मायतारा मैयाक चकती सेहो गमा देलनि।
झलफल भेलोपरांत हम सब कचहरी पर आपस अबैत गेलहुँ। गरमीक अधिकताक कारणेँ ओहि गामक दुइ मंजिला स्कूलक छत पर ओछाओन लगाओल गेल एवं हमसब ओहि ठाम आराम करए लगलहुँ। शिशौनाक पूव भागमे एकटा पैघ भवनक निर्माणकार्य देखि हम पूछि बैसलहुँ जे एतेक पैघ पक्का के बनबा रहल अछि, ताहि पर ओतुक्का मुखियाजी अरुण यादव कहलनि जे ई बाढ़ि राहत सेन्टरक रूपमे सभ गाममे बनाओल जा रहल अछि। कोशीक ढ़ेबमे बसल गाममे दू महला स्कूल, बाढ़ि राहत भवन, कतहु सौलिंग युक्त सड़क तँ कतहुँ-कतहु कच्ची सड़क, जे एक गामसँ दोसर गामकेँ जोड़ैत, एतबे नहि गामक बीचो-बीच सिमेन्टसँ ढ़ालल सड़क देखि एवं ओतुक्का लोकक मुँहसँ नीतिश राज्यक सुशासनक बखान सुनि बिहारक कल्याणक संभावना जगैत देखलहुँ। रातिमे हमसब फेर भात-रोटी, माछ, सलाद एवं दहीक संग भोजन कएलहुँ एवं पान खाए सहरसा आपस जाए देबाक आग्रह कएल तँ ओहि ठामक लोक कहए  लगलाह जे एना कतो भेले यै, जे एतेक रातिकेँ द्वारि परसँ अतिथि बिदा होएत। गौंआ सबकेँ मनबैत हम सभ बिदा भए सहरसा अपन-अपन आवास पर पहुँचि गेलहुँ । मुदा हमर मनमे बसलउजड़ैत गामःबसैत शहरक संगक संग, जे ओही ठाम सभ तरहेँ खारिज होइत प्रतीत भेल, सद्यः देखल कोशीक बीच बसैत गाम शिशौना, ओहि ठाम निवास करैत निश्च्छल लोकक सम्पूर्ण विकास दिस उठाओल सरकारक डेग आओर तेज कोना हो ताही बीच ओझरा गेल।

 
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चंदन कुमार झा
सररा, मदनेश्वर स्थान
मधुबनी, बिहार

मिथिला-मैथिली आंदोलन
मिथिला मे मिथिला-मैथिली-मैथिल के लेल जे कोनो संघर्ष एखनधरि भेल अछि ओहि मे सभसे बेशी साहित्यकारेक भागीदारी देखल गेल अछि. लोकनेता आ'कि आम जनता कहियो मूल आंदोलन वा संघर्ष (किएक तऽ आंदोलन शाइद भेबे नहि केलैए एखनधरि कोनो) से नहि जोड़ल गेल जकर नतीजा छैक जे आइधरि अधिकतर मांग के सत्ता द्वारा ठोकराओल गेलै, संघर्ष अपन मूल उद्देश्य सँ भटकैत रहल आ' संस्था सभ पारिवारिक बनि के रहि गेल अछि. दुष्प्रभाव एहन पड़ल छैक समाज पर जे आमजन आंदोलनकारी सभकेँ चाटुकार सँ बेशी किछु नहि बुझैत छथि. जँ कियो कत्तौ मैथिल अस्मिताक रक्षार्थ कोनो तरहक नव कार्यक्रम ठनैत छथि तऽ ओहि मे लोक के व्यवसाय सँ बेशी किछु नहि देखाय छैक.एहि दुर्गति के लेल मूल रूप से दू टा बात जिम्मेदार छैक. पहिल जे जखन सत्ता समाजक उच्चवर्गक हाथ मे रहै तखन ओ कतिआएल आ' पछुआएल वर्गक लोक के उत्थानक लेल कोनो उल्लेखनीय काज नहि केलक.सभदिन ओहि उपेक्षित वर्ग के जोन-चाकर बना खटबैत रहल.ओकर शोषण करैत रहल.एहि समय मे मिथिला मे सामंतवादी सोचक प्रसार तेहन ने भेल जे एखनोधरि ई अधिकांश लोकक पछोड़ नहि छोड़लक अछि.स्पष्ट छैक जे एहि सँ मिथिलाक विकास अवरोधित भेलै.लोक मे वैमनस्यता बढ़लैक आ क्रमशः उपेक्षित वर्ग मे प्रतिशोधक बीजारोपण केलक.

फेरो जखन ई उपेक्षित समाज एकत्रित भेलै आ' सत्ता हाथ लगलै तऽ एहू समयक राजनेता सभ लऽग प्रायः आमजनताक दुख-दर्द सँ कोनो सरोकारे नहि रहलै.कमोबेश ओहो सभ अपन पूर्ववर्तीक नकले केलक आ' समाज के विभिन्न वर्ग मे बाँटि सत्तासीन रहबाक जोगार करैत रहल अछि.ओम्हर सत्ताच्यूत भेल सामंतवादी लोकक जुन्ना तऽ जड़ि गेलै मुदा ऐँठन एखनो नहि गलैए.एहना मे फाँक-फाँक मे बँटल समाज ककरो आश्चर्यचकित नहि करैत अछि आब, हँ एहि बाँटल समाज के चुचकारि-पुचकारि सभ अपन-अपन स्वार्थ सिद्धि मे लागि गेल चाहे ओ अगरा वर्गक प्रतिनीधि हो किंवा पिछड़ा वर्गक.

शासन-प्रशासनक सहयोग सँ निराश आमजन सेहो एहना मे उदासीन भऽ अपन-अपन रोजी-रोजगार के ईष्ट बुझि दहोदिश छिड़िआय लागल.फलस्वरूप,खण्ड-खण्ड भेल मैथिल समाज दिनानुदिन कमजोर होइत जा रहल अछि.एखनहुँ मैथिली आंदोलनक सरन अधिकांशतः साहित्यकारे वर्ग टेकने छथि वा कियो एनाहियो कहि सकैत अछि जे सरन टेकबाक भौन केने छथि.मैथिली साहित्यकारक विपन्नता आ गुटबाजी क्रमशः हुनकर सभक संघर्षक विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगबैत रहल अछि. आ' जखने अपने घर मे ककरो मोजन नहि रहतै तखन दुनियाक लोक कतऽ से ओकरा मोजर देतै. तइँ ई साहित्यकार आंदोलनकारी सभ सभदिन अपन प्रयास मे विफल होइत रहलाह अछि.

आंदोलन सभक दुर्गतिक दोसर कारण अछि जे एखनधरि जे कोनो आंदोलन चलाओल गेल अछि ओकर मूल उद्देश्य, ओहि सँ समाज के होइ बला फायदा आ' नहि भेलापर होइबला नोकसान, आ आंदोलन विस्तृत रूपरेखा आइधरि कहियो आमजनताक सोँझा नहि राखल गेल वा बेशी काल एहि सभ पर समग्र रुपे आपस मे चर्चा-परिचर्चा नहि कराओल गेल आ' बेशीकाल हरबड़िए मे निर्णय लऽ किछु दसेक लोक आंदोलन ठानि दैत छथि.फेर यदि सामान्य नागरिक अपना के एकात बुझैत अछि तऽ ताहि मे ओकर कोन दोष छैक.

जहिना कारणसभ स्पष्ट छैक तहिना एकर समाधानो एकदम स्पष्ट छैक.कोनो आंदोलन तखने सफल होयत जखन नेतृत्वकर्ता सभ अपन सामंती सोच, आपसी द्वेशक त्याग करताह, समाजक सभवर्गक लोक के ओहि आंदोलन सँ जोड़ताह आ' आंदोलन मूल उद्देश्यक प्राप्ति हेतु ठोस नीति बना ओकरा आमजनक सरोकार सँ जोड़ताह.



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जगदानन्द झा 'मनु' 
ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीह्टोंल, मधुबनी 

दूटा विहनि कथा

 १.जबाड भोज  
एकादशाक भोज, गामक डीलर साब केँ बाबूक एकादशा | डील-डोल सँ सम्पूर्ण जेबाड केँ नोतल गेल | दसो गामक लोक सभ कियो बैल गाड़ी सँ कियो साईकिल सँ कियो पएरे, साँझक छ ए ' बजे सँ लोकक करमान एनाइ शुरू | नोथारी सब आबि-आबि कँ बैसति | बैसअ केँ पूर्ण व्यबस्था | करीब पेंतीस हाथक तँ  डीलर साब केँ दलाने छनि आ आबैबला आगुन्तक केँ धियान राखि दलानक आगाँक बारी-झारी केँ साफ सुथरा कए कँ  एहेन सामियाना लागल जे ओहि में पाँच सए लोग एक संगे बैस सकैत अछि | व्यबस्थाक कोनो कमी नहि | भोजन सँ पूर्ब सब व्यबस्था देखि रमणजी स्वं केँ रोकि नहि  सकला आ अपन लग में बैसल सुबोधजी सँ बजला -
"कीयौ दोस्त डीलर तँ
 कोनो तरहक कमी नहि छोरलनि, एतेकटा सामियाना, एतेक लोक केँ नोतनाइ........."
सुबोध
   - "हाँ"
रमण - "जबाड नोतनाइ कोनो मामूली गप्प छैक ओहू में एतेक डील-डोल सँ, खाजा, मूँगबा, पेन्तोआ, रसगुल्ला आ सभ नोथारी केँ एक-एकटा लोटा सेहो |"
सुबोध - "सुनलहुँ तँ
  हमहुँ इहे सभ | "
रमण
 - " कि अपने की कहै छीयैक, सभटा कतेक खर्चा डीलर केँ लागि जेतैन |"
सुबोध - "हम कोना कहु, हम तँ नहि कहियो जबाड खुवेलहुँ |"
रमण - "छोरु अहाँ केँ तँ
 सदिखन मुह फुलले रहैए, ओना हमारा  हिसाबे  आठ-दस लाख रुपैया तँ  लगबे करतैन |"
सुबोध
 - "आठ-दस लाख रुपैया डीलर केँ लेल कोन भारी ओनाहितो हुनकर बरखो केँ लौलसा छ्लैंह जे कहिया बाबू मरथि आ ओ दिन आबि गेलहि तँ  खुश तँ  हेबे करता, ख़ुशी में आठ लाख की आ दस लाख की..... |"

२. अनाथ  

अस्सी बरखक सोमनाथजी  भरल-पुरल संसार छोरि अपन प्राण विशर्जन कए लेला | सभ मनोकामना पूर्ण तैयो सांसारिक मोह माया सँ बान्हल, सभ कियो हुनक मृत देह केँ चारू कात सँ घेरने, दुखी, व्याकुल, कनैत |
दुटा बेटा, दुनूक पुतौह, पोता-पोती सब संगे, खाली बड़का बेटा मुंबई में नोकरी करैत | हुनको तिन चारि दिन पहिले   सोमनाथजीक  बिगरल स्वास्थ केँ बाबत फोन भए गेल रहनि आ ओ गाम हेतु बिदा सेहो भए गेल रहथि | आब कोनो घड़ी आबि सकैत छलथि |
सोमनाथजी बड़का बेटाक आगमन | हुनका आबैत देरी सभ समांगक कननारोहट में बिरधि भए गेलनि | हुनकर छोट भाई  हुनका देखते देरी  भरि  पाँज  कँ  पकरि कनैत -
"भईया --- बाबू छोरि चलि गेला हुं-हुं ..... आब केँ देखत ... "
बड़का छोटका केँ करेज सँ लगेने हुनक पीठ केँ सहलाबैत स्नेह सँ -"नै रे तूँ  किएक कनै छें, तोरा लेल तँ  एखन हम जीबैत छीयौक तोहर सब कीछ | अनाथ तँ  आई हम भए गेलहुँ, मए चारि बर्ख पहिले चलि गेली आ आई बाबूओ...."


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३. पद्य






३..जगदानन्द झा 'मनु' 
किशन कारीगर


 
मुखिया जी देथहिन 
                       (हास्य कविता)

बेमतलब के कोनो काज राज करैत छि
हम त कहब एक्को टा खरहो ने खोंटू
अहाँ हुनका वोट द दिऔन
सब किछु त मुखिया जी देथहिन.

जबनका के बिरधा पिलसिन
बुढ़बा सब के जबनका पिलसिन
व्यर्थ समय गमाऊ त बेकारी पिलसिन
सभटा पिलसिन त मुखिया जी देथहिन.

डिग्री डिप्लोमा नहि अछि तै सँ की ?
आब पढाई लिखाई एकदम नहि करू
हरदम हुनके संपर्क में रहू
शिक्षामित्र के नोकरी त मुखिया जी देथहिन.

सरकारी खरांत हाई रे पंचायती राज
आब रही नहि गेल कोनो काज राज
बिरधा पेसन पास कराऊ कामिसन खाऊ
रुप्पैयाक बंदरबांट त मुखिया जी करथिन.

ईंटाघर वाला के इंदिरा आवास
टूटलाहा घर वाला के लागल तरास
भुखले मरी जायब त बी. . एल.
अन्तोदय योजना में फेल भेलौहं की पास ?

अप्पन काज राज छोडि के
ब्लोकक चक्कर लगाऊ
मुखिया जी त भेंट भए जेताह
चाहो पान के खर्च त उहे देथहिन.

कमाए खटाए के अहाँ करब की ?
फुसियाँहिक हर कियक जोतब
बँटा रहल अछि सरकारी खरांत
अहाँ दौगल जाउ बाद में हमरा नहि टोकब.

मंगनी के चाउर दाइल सँ पेट भरी जायत
कहियो भुखले नहि अहाँ मरब
कोई ने अहाँ के टोके मुखिया जी ओ.के.
मुखीये जी के कहल टा अहाँ करब.

राहत पैकेज के हेरा फेरी केलन्हि
आब आंखि हुनकर चोन्हरेलैंह
सरकारी लिस्ट में अहींक नाम टा अछि
ओई पर साइन त मुखिया जी करथिहीन.

 
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डॉ॰ शशिधर कुमर विदेह                                
एम॰डी॰(आयु॰) कायचिकित्सा                                   
कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) ४११०४४
सुन्नरि प्रिया



सुन्नरि   प्रिया   तेँ   सुप्रिया,
मम् उर बसल  तेँ  उर्वशी ।
कहबे  करत   सभ  शशिप्रिया,
हम शशि हमर अहँ प्रेयषी ।।



चलैत  मरु  जिनगीक  निर्मम्‌,
कत मरीचि  छकबैत  छल ।
निरस एकसरि  बाट जिनगीक,
मोन   केँ   थकबैत    छल ।
थाकल - प्यासल     बटोही,
घाम  सञो  अपस्याँत  छल ।
पानि  मिसियो,  छाँह  कनिञो,
कतऽ  भेटत  अज्ञात   छल ।

एक दिन एहिना तँ  किछु सनि,
लिखि देलक भाग्यक मसी ।
जाऽ पढ़ल, देखल लिखल छल,
संग  आगाँ   एक  सखी ।।



नीक  कि  अधलाह  ?  पहिने,
पढ़ि कऽ  से नञि  बुझि पड़ल ।
मन   सशंकित   छल   अनेरो,
जानि  ने  विधि  की  लिखल ।
की  हमर   मनोभाव  केँ   ,
अपरिचित सखि  बुझि  सकत ?
वा  अपन  छवि दर्प उबडुब,
अपन    बाटेँ       चलत ।

छलहुँ  गुनधुन  मे  देखल  ता,
संग    बैसलि    रूपसी ।
एकटक      देखैत     हमरा,
ठोर  पर  मुस्की हँसी ।।



की दिवस सपना  देखल  हम,
पर  बूझल,  नञि  साँच  छी ।
नञि जरए,  शीतल  लगए  जे,
   तँ   तेहने   आँच   छी ।
प्यासल  पथिक केँ  पानि भेटल,
छाँह   घनगर   प्रेम    केर ।
लऽग  हीरक   स्वच्छ   आभा,
के  ताकए,   मृग  हेम  केर ।

कविक  मन   भावक  पियासल,
अहीं  छी   मोर  उर्वशी ।
अहीं   उर - अन्तर   समाहित,
काव्य पटलक  शोड़षी ।।






साओन मे विरह



रिमझिम - रिमझिम साओन बरिसय,
हहराबय अछि हिया सखि मोर ।
कारी कारी     बादर     गरजय,
सिहराबय  अछि   पोरे पोर ।।


दिन  दुपहरिया,  राति  निवीड़तम,
झंकृत मन मृदंग  बड़  जोड़ ।
पी  संग  ओहिना  हमहूँ  नचितहुँ,
नाचय  जहिना   हर्षित  मोर ।।


पिक रव, पी पी मदन जगाबय,
गति मोर  जहिना चन्द्र चकोर ।
सखि हे !  भाग्य   हमर  बड़   निष्ठुर,
निर्दयि  केहेन   अछि  चितचोर ।।

सुरभित धरणि रमणि रुचि सुन्नर,
दादुर   टर्र टर्र   करइछ   जोर ।
सिहकय   पुरिबा,    रहि रहि   पछबा,
तरसैत राति  होइछ सखि भोर ।।










अहीं सञो कहै छी



अहीं सञो कहै छी ।
अहाँ नञि सुनै छी ।
पता  नञि  किए,  आइ  निष्ठुर  बनल छी ।।

अहँ  इजोरिये रही ।
हम अन्हरिये सही ।
हे अए (ऐ) चन्ना, कहाँ हऽम चानी मँगै छी ।।

प्रीति नहिञे सही ।
अनाशक्ते    रही ।
मुदा  घृणित  मनेँ,  किए  नैना  फेरै छी ??

छी हमहूँ मनुक्खे ।
मुदा  दोष  एतबे ।
हृदय मे  अहँक,  प्रेम  प्रतिमा  पूजै  छी ।।

डऽर चोरिक किए ?
बरजोरीक   किए ?
एहेन छी ने पतित,  अहाँ  व्यर्थेँ  डरै छी ।।

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जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल
की भेटल आ की हेरा गेल ( आत्म गीत )
जीवनकेर   आंगनमे वसंत
आयल कहियो हंसिते-हंसिते
किछु कोंढी छल से फूल बनल
झड़ि गेल मुदा छुबिते-छुबिते
                                         
से टीस हृदयमे अछि एखनहुं

किछु तप्पत-सन किछु सेरा गेल
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ की हेरा गेल ।
 
बाबा छलाह खिस्सा कहइत
सुनि-सुनि कऽ छल अजगुत लगइत
ई झूठ छलै कि सत्ये छल
रहि गेल मोन गुन-धुन करइत
ओइ कृष्ण-कन्हैया केर  हाथे
छल नाग कोनाकऽ नथा गेल
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल  आ की हेरा गेल ।
 

मोने अछि एखनहुँ ओ बिहाड़ि
मोने अछि ओ फूही-पाथर
मोने अछि ओ रौदी-दाही
मोने अछि एखनहुँ भनसा-घर
चुल्हा लग मायक चुप्पी पर
कए बेर आँखि छल नोरा गेल
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ की हेरा गेल ।
 
अंगनामे पमरिया नचइत छल
सभ कबुला-पाती करइत छल
ओ भोज-भात आ भार-दौर
पाहुन वरियाती चलइत छल
मूड़न- उपनयन- बियाहेमे
छल सभक चेतना खिया गेल
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ की हेरा गेल ।

मोटका-मोटका पोथी पढलौं
पोथी केर सभ पन्ना रटलौं
छल प्रश्न कतेको सोझाँमे
नहि तकर निदान कतहु देखलौं
हम पौलहुँ एकदिन अपनाकेँ
सय-सय बिर्रोमे घेरा गेल
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ की हेरा गेल ।
 
हमरा सोझाँमे छल पर्वत
हमरा सोझाँमे छल इनार
हम कतऽ जाउ हम कोम्हर जाउ
चहुँदिस पसरल टा छल अन्हार
छल अनचिन्हार रस्ता सभटा
छल पयर आगि पर धरा गेल
हम सोचि रहल छी जीवनमे
की भेटल आ    की हेरा गेल ।
                   

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अमित मिश्र
गीत

नैना कने मिला ले
दिल मे अपन बसा ले /2/
 
हमरा भ' गेलौ तोरे सँ प्यार सजनी . . .
नैना कने मिला ले . . . . . . . . .

दिन रहै छी सोचैत .राति रहै छी जागल
हेतै मधुर मिलन इ आश रहै यै लागल /2/
नैना के बाट ध' ' दिल मे उतरि जो
प्रेम नगर मे बसि जो जिनगी गुजरि जो
तोरे नैन मे हमर संसार सजनी
नैना कने मिला . . . . . . . . .

दुनियाँ के रीत केहन .भेल बिपरीत छै
जानि नै तैयो किए लागल प्रीत छै /2/
साथ जे तोहर रहत दुनियाँ सँ लड़ि लेब
एक दू बेर नै सए बेर मरि लेब
नैन मिला क' प्रेम कर स्वीकार सजनी
नैना कने मिला . . . . . . .

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चंदन कुमार झा
सररा, मदनेश्वर स्थान
मधुबनी, बिहार

गजल-1
आखर आखर सजा लिखै छी गीत अहाँ ले सजनी
चाँचर पाँतर हम तकै छी प्रीत अहाँ ले सजनी

अपन करेजा कोड़ि माटि, सौरभ पुनि मिझरेलौ
नेहक रस मे भीजा गढ़ै छी भीत अहाँ ले सजनी

अहाँक रूप के आगाँ हम हारि गेलहु अपना के
अप्पन हारि बिसारि लिखै छी जीत अहाँ ले सजनी

मधुर मिलन के बेला कहियो तऽ मधुघट पीबै
सोचि-सोचि घट-घट पिबै छी तीत अहाँ ले सजनी

अँगना, घर, दलान, सजा, बाट तकैत छी बैसल
"चंदन"नेहक बुन्न तकै छी शीत अहाँ ले सजनी
-----------वर्ण-१९----------





गजल-2
रोटी महग, महगे नून भेल छै
बोटी सुलभ सस्ता खून भेल छै

सौँसे शहर सहसह लोक गज्जले
गामक दलानो-घर सून भेल छै

प्रगतिक पथ भ्रष्टाचार अड़ल छै
नेता समाजक जनु घून भेल छै

खेती करय जे से दीन भेल छै
बइमान बेपारी दून भेल छै

करनी अपन नहि देखैत लोक छै
"चंदन"फुसिक खातिर खून भेल छै
२२१२ २२२१ २१२

बाल-गजल-1
भैया के नबका बुशर्ट आ हमरा दीदी के फेरन
'तऽ सौंसे गाम घूमै छौ हमरा अंगनो मे बेढ़न

चूल्हा-चेकी,बर्तन-बासन, आगाँ से नै करबौ हम
हमरो चाही कापी-पिल्सिन, बेटा के देलही जेहन

बौआ छुच्छे छाल्हि खेतौ हमरा नै दूधो परपइठ
जौँ नै करबौ टहल तखन लगतौ मोन केहन

बहुत सहलियौ आब नै चलतौ तोहर दूनेती
हमरो चाही बखरा आब नै चलतौ कलछप्पन

गै माय युग बदलि गेलैए बेटी नै बेटा से कम
"चंदन" गमकैत भविष्य रचबै हमहूँ अपन
---------------वर्ण-१९---------------
रुबाइ-1
देखलौँ माँझ अँगना ओगरैत सपना
देखलौँ चौबटिया पर लोढैत सपना
देखलौँ हाट ककरो मोलबैत सपना
ककरो झूठक दोबर तौलबैत सपना ।
रुबाइ-2
नील नैन बिच साजल काजर करिया
रूप लगैए अनमन धवल इजोरिया
निश्चय अहाँ जनैत छी टोना-टापर
भेल बताह छै तैँ गामक नवतुरिया.|

रुबाइ-3
कखनो बनि विपक्षी चित्कार करै छै
सत्ता हाथ लगितहि फुफकार भरै छै
नेता वोटक लेल कतबा रूप धरै छै
कत्तहु अनशन कत्तहु इफ्तार करै छै ।

1.) अकान

चुप्पहि रहैत छी
हरदम बस सुनैत छी-
लोकक बाजब,
किदन-कहाँदन, अंटशंट,
बिनु पेनीक बात,
उतरा-चौड़ी, थुक्कम-फज्जति,
फुसिक पंचैती, क्षणिक कुटमैती............ ।

बस देखैत रहैत छी टुकुर-टुकुर-
मारा-पिट्टी, कुकुरक कटौझी,
देयादि भतबारि, सासु-पुतोहुक अड़ारि,
खेतक दड़ारि, बेबस्थाक तियारि,
कनैत पुतोहु आ' पुजति कुमारि,
धधकैत लहास,हास-परिहास,
भोजक उल्लास, महाजन के त्रास............।

चौक परहुक चाहक चुस्की,
घूर लगहक कनफुसकी,
चौबनिया मुस्की,
बपौती वैभव केर दंभ,
पुरखाक कीर्ति-स्तंभ,
नेहक सीमान...........,
बस हरदम रहैत छी अकानति,
बनले बकान,
किछु नहि बजैत छी,
चुप्पहि रहैत छी,
बनिकऽ अकान ।

2.) झमझम बरसै छै बून्नी
झमझम बरसै छै बून्नी
छै नाचि रहल गरचून्नी
सुनि के बेंगक टिटकारी
फँसलीह कबई कुमारी ।।

बगुला टकध्यान लगौने
बैसल छल आस लगौने
बुझू भेलै जबारी ओकरा
भरि पोख पेलकै टेंगरा ।।

कौआ केर भेटलैक चाली
बुझू जेना नूडल्स पाताली
घसि-घसि लोल पिजबैछै
खने खत्ता पानि उपछै छै ।।

जखने चमकल बिजलौका
साकांक्ष भेल घोंघही डोका
केयो जोड़ऽ लागल कुटमैती
केयो करय गेल पंचैती ।।

काँकोड़ बिल सँ बहरायल
ओ लगैछ कने अगुतायल
चाँगुर सँ महल बनेलक
रचि-रचि केहन सजेलक ।।

छै झूर-झमाने मूसरी
सोचै जे कोना के ससरी
घर-दुआरि ओकर दहेलै
बुझू अपटी खेत मे फँसलै ।।

केयो गाबि रहल चौमासा
ककरो लेल खेल तमाशा
हरखित छै खेत-पथार
जंगल,पहाड़ सभ धार ।।

3.)निर्लज्जा के आब भगाबू ।।

कविगोष्ठी मे हमहीं जेबइ
कथो रातिभरि हमहीं बचबै
पागो माथ पर हमरीं सजबै
सभठाँ आगाँ हमहीं बजबै ।।

मंचक मध्य मे हमही बैसबै
सभठाँ भाषण हमहीं करबै
बाबू छलखिन्ह हमहूँ रहबै
बेटो संगहि कुथबै-पदबै ।।

तगमा सभटा हमरे चाही
हमरे कलम बस रहै स्याही
सभ करियौ हमरे वाह-वाही
नहि करबै तऽ लेब हम ढाही ।।

मिथिला-मैथिल हमर बपौती
ऐपार-ओहिपार हमरे कुटमैती
तइँ हमही करबै पंचैती
हमरे टा चलतै जेठरैती ।।

पछुआ सभ ने आगू आबय
देखू, केयो ने गाल बजाबय
केयो ने कतौ कल्ला अलगाबय
बस हमरे सभ जय-जय गाबय ।।

जागू मैथिल आबहु जागू
हे पछिला सभ आबू आगू
मिथिला-मैथिल मान बचाबू
निर्लज्जा के आब भगाबू ।।

4.)हे, बुझलियै की ?
हे, बुझलियै की ?
युग
युग बदलि गेलैए ।
आब लिखनिहार-पढ़निहार,
नीक-बेजायके गुननिहार,
मोटगर पोथी छपेनिहार,
कोनो नवका बात बतौनिहार,
आलोचक किंवा चुप्पहि रहनिहार,
सभक कोनो मोजर नहि छै ।

आब मोजर छैक ओकरे जे-
बजार मे घुमथि,
मंच पर सुतथि,
माइक धऽ कुथथि,
चंदा उघथि,
अनका लुझथि,
गामे-गाम बुलथि,
नोत-हकार पुरथि,
झट अकास छूलथि,
पट पएर चुमथि,
चौक पर बैसथि,
अपना के सैंतथि,
फुसि सगरो परसथि,
'खा-पी के ससरथि ।।

हाइकु
1.)    लालहि लाल
अरुणोदय काल
नील अकास ।                                                                                                                                                                          
2.)    मसुरी दालि
सूर्यास्त-काल मेघ
एक्कहि रंग ।

3.)    सुखले आर्द्रा
पुखो राखल रुखे
बरिसत के ?

4.)    बितलै राति
उगलै भोरुकबा
जगलै आस ।

5.)    अगबे कौआ
निपत्ता छै कोइली
पराती-भास ।

6.)    अरिया नाञ्घ
जलोदीप सगरो
दाहीक छाह ।

शेर्न्यु

1.)    ठाँहि-पठाँहि
जँ कहबै ककरो
जड़तै देह !


2.)    भऽ गेल छैक
मरखाह मनुख
मालहि सन ।

3.)    एक भेल छै
मुद्दई-मुदालह
पंच एकात ।

4.)    पिया विदेशी
अनमन उर्मिला
मिथिला-नारी ।


5.)    बेटीक बाप
बन्हलकै रुपैया
किनतै वर !!

6.)    दिन देखार
केहन अतत्तह
खून-खुनामे ।

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
जगदानन्द झा 'मनु' 
ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीह्टोंल, मधुबनी 

गजल-१ 

देख   मुह  मूंगबा बहुतो बटाई छै 
नाम ककरो गरीबक नहि सुहाई छै 

चाहि निर्धन कए नहि योगरा बाबा 
पेट भरि जाइ सब दीनक दबाई छै 

मीठ भाषण बरख पाँचे  कते दै   छै 
जीत केँ बाद नेतो सब नुकाई छै 

घूस खा 'खा ' कँ  बनलै भोकना पारा
आन दमड़ी सँ चमड़ी बड चबाई छै 

भ्रष्ट नेता घुमे बीएमडब्लू  में 
एखनो हक गरीबक 'मनु' बटाई छै 

( बहरे-मुशाकिल, २१२२  १२२२  १२२२) 

-------------------------------

गजल-२ 

कान नै अपन  देखब  कौआ खिहारब
कहु-कहु कोना आहाँ मिथिला सुधारब 

घोघ तर कनियाँ कोठी तरहक माछ
मोन होइतो कहु कियो कोना निघारब

लागल आगि जीवनक  मिझाएब कोना
की जीवन भरि खड़ेल खड़े पजारब

कहियो तँ   बसब आ ककरो बसाएब
भटकैत सीथ कतेक आरो उजारब 

पानि केखनो 'मनु' पियासलो  केँ पियेब    
की बनि नादान परती पर टघारब

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१५)

--------------------------------------------------------------------

गजल-३ 

सभकेँ हम करि सम्मान सभ बुझैत अछि गदहा 
सभकेँ गप्प हम सुनै छी सभ  कहैत अछि गदहा  

सभतरि मचल हाहाकार मनुख खाय  गेल चाडा
भ्रष्टाचार में डूबि  आई  देश चलबैत अछि गदहा 

नवयुवक फँसल भमर में साधू करए कबड्डी 
देखू  गाँधी टोपी पहिर किछ कहबैत अछि गदहा 

भगवा चोला पहिर-पहिर आँखि में झोँकै मिरचाई 
धर्माचार बनल बैसल    धर्म बेचैत अछि गदहा 

जंगल बनल समाज में, सोनित  सँ भिजल धरती 
शेर सगरो पडा गेलै  चैन सँ सूतैत अछि गदहा 

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-२०) 

----------------------------------------------------------------------


गजल-४ 

हमर अहाँकेँ प्रीतक खिस्सा आब  दुनियाँ  बिसरत नहि 
युग-युग तक लोकक मोन सँ अपन नाम घटत  नहि 

सूर्य चान केँ प्रेमालाप सँ ई दुनियाँ प्रकाशित अछि भेल 
हुनकर संग बिनु कखनहुँ   दुनियाँ चमकत  नहि 

भोला शंकर डमरू बजाबथि पारवती नाचैत अँगना
हुनकर दुनू केँ इक्षा बिनु कएखनो श्रृष्टि चलत नहि

कृष्ण नचाबथि सगरो गोकुल गोबरधन  पर्वत उठा 
बिनु राधिका संग कएखनो हुनक मुरली बजत नहि 

फूल भोंडा केँ प्रीतक खिस्सा सभतरि बहुत पुरान भेलै
'मनु' 'सुगँधाक' नाम बिनु प्रेम कथा आब गमकत नहि  

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-२२) 



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विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत
१.राजनाथ मिश्र (चित्रमय मिथिला) . उमेश मण्डल (मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव-जन्तु/ मिथिलाक जिनगी)
राजनाथ मिश्र
चित्रमय मिथिला स्लाइड शो
चित्रमय मिथिला (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ )

.
उमेश मण्डल

मिथिलाक वनस्पति स्लाइड शो
मिथिलाक जीव-जन्तु स्लाइड शो
मिथिलाक जिनगी स्लाइड शो
मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव जन्तु/ मिथिलाक जिनगी  (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ )


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विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती
१. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल)
२.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद
३.कनकमणि दीक्षित (मूल नेपालीसँ मैथिली अनुवाद श्रीमती रूपा धीरू आ श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि)

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'विदेह' २२४ म अंक १५ अप्रैल २०१७ (वर्ष १० मास ११२ अंक २२४)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -    मैथिलानी केर उपराग राम सं आ समाज ...