Monday, July 02, 2012

'विदेह' १०८ म अंक १५ जून २०१२ (वर्ष ५ मास ५४ अंक १०८)- PART II



१.सुजीत कुमार झा २.सत्यनारायण झा
                  

सुजीत कुमार झा

कथा
syलाल डायरी


साँझ भऽ गेल छल । घरपर असगरे छलहुँ, अतः लनसँ लागल गेटकेँ बन्देकऽ दी । रुमसँ गेटक दुरी अतेक छल जे ओकरा खुलब आ बन्द करबाक आभास तक नहि होइत छल । केओ धीरेसँ नुकाकऽ बाउण्ड्रीवाल भितर चलि आबे तऽ पते नहि चलत । बच्चा बाहर पढै
Þत अछि । पति अपन बहिनक गाम गेल छथि । वा कही घर पुरे खालीखाली अछि । ओना घरपर एकटा नोकर अछि । जेकरा ओ बहुत निर्देशन दऽकऽ गेल छथि, मुदा कहियो ओ ९ बजेसँ पहिने नहि अबैत अछि ।
खालीपनक ई क्रममे टिभीकँे आविस्कार करऽ बलाकें हृदयसँ आभार प्रगट करैत छी । जखन पत्रपत्रिकासँ मोन भरि जाइत अछि, हम टिभीक कार्यक्रममे डूबि जाइत छी ।
सिरियल शुरु होबऽमे एखन समय छल तँए हम सोचलहुँ ताबत अपना लेल दूटा रोटी बना ली । बच्चा आ पति बाहर रहलाक कारणे हम भानस घरक प्रति एकदम लापरवाह भऽगेल छी । एकटा तरकारी बनबैत छी ओकरो तीन बेर खा लैत छी, कखनो फलफूल खा लैत छी, कखनो दिनक भोजन तऽ गोलेकऽ दैत छी । मोनेमोन अपन निर्णयकेँ सही कहैत चलू कम भोजन कएलासँ स्वास्थ्य बढियाँ रहैत अछि । आब के ओतेक मेहनत करए, भातदालि आ बहुत प्रकारक तरकारी बनाबऽमे किए समय लगाबी । ओना आइकाल्हि बड़ समय रहैत अछि ।
ग्यास जराकऽ हम ताबाकें चुल्हापर राखि देलहुँ आ फ्रिजमेसँ सानल आँटा निकालिकऽ एकटा रोटी बेल ताबापर रखलहुँ आ दोसर बेलऽ लगलहुँ । पहिल रोटी सेकनहे छलहुँ की मूल गेटसँ घण्टीक आवाज आएल । ओह..... के भऽ सकैत अछि, एहि समय ?
आबि रहल छी,’ घण्टी बजबऽ बलाके सन्तुष्टिक लेल हम जोड़सँ जबाब देलहुँ, मुदा फटाफट दोसर रोटी सेकऽ लगलहुँ । किए कि गेट खोलऽसँ पहिने हम अपन सभ काजकऽ लेबऽके पक्षमे छलहुँ । कहूँ बगलमे रहल रामपुर बाली भेलीह तऽ गेलहुँ काजसँ । पाँच मिनट कहिकऽ ओ पुरे घण्टाभरि समय लऽ लैत छथि । पुरे संसारक समाचार, गपक पुरे पेटारा हुनका लग भड़ल रहैत अछि । कोनो विषयपर चाहिकऽ बात कऽ ली । संविधान निर्माण हो वा माओवादी समस्या, मधेशी नेतासभक स्थिति सभ हुनका लग रहैत अछि । कहियोकहियो हम सोचैत छी यदि ओ राजनीतिमे होइतथि तऽ खुब नाम कमैतथि । रामपुरबालीके अएबाक आशङ्कासँ एखन हम हाथमे लागल आँटा धोए रहल छलहुँ कि कल वेल अपन सम्पूर्ण शक्तिसँ घनघना उठल । एस कमिङ्गकमिङ्ग ।हाथ पोछैत हम गेट दिस बढ़लहुँ ।
ओह ! केहनकेहन लोक होइत अछि । एतेक लम्बा घण्टी बजबैत अछि की कमजोर लोकके धड़कन ओतऽके ओतहि बन्द भऽ जाएत ।
मोनेमोन हम बजैत जारहल छलहुँ, मुदा जहिना गेटक नजदिक पहुँचलहुँ हम अपन हाथसँ अपन केस ठीक कएलहुँ, साड़ीकँे ढंगसँ अपन कान्हपर रखलहुँ आ मुँहपर कृत्रिम मुस्की अनैत अतिथिके मोनसँ स्वागत करबाक लेल तैयार भऽ गेलहुँ ।
ओह अपने छी !हम खुशीसँ बजलहुँ, ‘प्रणाम, प्रणाम यादव जी ।विश्वास करु ई हमर अभिवादन लेस मात्र बनाबटी नहि छल । अभिवादनक ढङ्ग आ बातचितक शब्दे व्यक्ति विशेषसँ अपनाक अन्तरङ्गता उजागरकऽ दैत अछि । आगा अभिवादनकें हात जोड़ने पतिक प्रिय मित्र सेवक नारायण यादव ठाढ़ छला ।
बहुत दिनक बाद अपनेकेँ चरण पड़ल अछि,’ हम गेँट बन्द कऽ ड्राइँग रुम दिस बढ़लहुँ ।
फुरसते नहि भेटैत अछि भौजी, जखन लोक काममे लागि जाइत अछि तऽ बस....., हमर वकिल साहेब नहि छथि घरपर की !
स्कूल क्याम्पस सभमे संङे पढ़ल आ तर्कशिला भेलाक कारण यादवजी सहितक हिनकर सभ मित्र हिनका वकील साहेबनामसँ सम्बोधित करैत छथि ।
नहि, ओ तऽ चारिपाँच दिनसँ बहिनक गाम गेल छथि ।
आ अएताह कहियाधरि ......
एखन दूचारि दिन आओर लागिए जाएत आबऽमे, शायद २० गतेधरि अएताह ?’
चलू बढ़िएँ भेल ओ नहि छथि । हमरा अहाँक बीच कबाबमे हड्डी बनितैथि । हम आ अहाँ जमिकऽ चलू गप्प मारैत छी,’ यादव जी दुनू हाथकें रगरैत बजलाह ।
हँ .....हँ.... हँ किए नहि, हम असगरे बोर भऽ रहल छलहुँ, अपने बैसू हम दू मिनटमे अबैत छी ।
कथी लाए एमहर, ओमहर करैत छी बैसू भौजी, ’यादव जी निःसंकोच हाथ पकड़िकऽ बैसबाक लेल अनुरोधकऽ देलैथि । हुनकर ई व्यवहार, ई अपनापन लोककेँ बात नहि टालबाक लेल मजबुरकऽ दैत अछि ।
अहाँ जाति हएब उएह चाहताह बनाबऽ वा एहिसँ मीललजूलल मेहनत करऽ । बेकारके झमेलामे नहि परु भौजी । जतेक मीठ अपनेक बातमे हएत ओतेक चाहमे कतऽसँ भऽ सकैत अछि ।
हुनकर स्पष्टतापर हम मुिस्कया उठलहुँ आ बैसैत कहलहुँ, ‘से तऽ ठीके अछि मुदा अहाँक हाथ एतेक ठण्ढा किएक अछि आब तऽ फागुनो समाप्त भऽ गेल, एतेक ठण्ढो नहि अछि ।
मुदा हम जतऽसँ आबि रहल छी, ओतऽ बहुत ठण्ढ छैक ।
ठीक छैक ओना जनकपुरमे किछु ठण्ढ बेसी पड़ैत अछि ।
ओना वकील साहेबके बिना अहाँ रहि कोना लैत छी, हमहुँ किछु कम थोरहे छी , कोनो आवश्यकता हएत तऽ कहब ।
छल परपञ्च आ बनाबटीसँ दूर यादवजीके बातके कोनो दोसर व्यक्ति सूनि लिअ तऽ हुनकर चरित्रपर सन्देहकऽ सकैत अछि, मुदा जे हुनका चिन्हैत अछि सएह हुनकर साफ हृदयके बूझि सकैत अछि ।
आ कहू बच्चा अपनेके कतऽ पढ़ि रहल अछि ? दिव्या केहन छथि, हमरा यादो करैत छथि वा नहि ?’
सभ किछु बूझि गेलहुँ अपने लग गप्पक कोनो स्टक नहि अछि, तखने चालू गप्प शुरु भऽ गेल, बच्चा केहन अछि, दिव्या केहन अछि आ सुनाउ ........इएह नहि !कोनो बात स्पष्टसँ कहि देब यादव जी के आदत छल ।
ओना हमर इच्छा सेहो अपनेकें बेसी बोर करबाक नहि अछि । चलैत छी ।
नहि..नहि यादवजी अपने तऽ ....हम की सहीमे रुक्ख व्यवहारकऽ रहल छलहुँ हम स्वंयके तौललहुँ आ परेशान भऽ गेलहुँ ।
नहि भौजी, एहन कोनो बात नहि अछि । सहीमे माएके स्वास्थ्य खराब भऽ गेल अछि ओकरे देखऽ आएल छी दोसर बेर आएब तऽ दिव्याकँे सेहो लेने आएब तहियाधरि वकील साहेब सेहो आबि जएतहा तखन जमिकऽ बैसब ।
यादवजी उठैत कहलैन्हि, ‘एकटा चीज तऽ हम बिसरि रहल छलहुँ ।
यादवजी पुनः सोफापर बैसला आ एकटा डिब्बा निकालैत कहलाह, ‘भौजी ई लिअ, ई डायरी अहाँके लेल अनलहुँ अछि । किछु अबेर अवश्य भऽ गेल मुदा कि करितहुँ जनवरीफरवरीमे फुरसते नहि भेटल अएबाक । सोचलहुँ कुरियरसँ पठा दी मुदा हम तऽ डायरी अपन हाथसँ अपनेकँे प्रजेण्ट करऽ चाहैत छलहुँ ।
यादवजी कनी माथ झुकाकऽ डायरी हमरा दिस बढा देलाह ।
धन्यवाद ।हम डायरी लैत कहलहुँ ।
ओह फेर उएह रुक्ख सन धन्यवाद, ईदमे जेना गारा मिलैत अछि तहुना गरा मिलकऽ सेहो खुशी प्रकट कएल जासकैत अछि भौजी ।फेर ओ जोड़सँ हँसलाह ।
वकील साहेव होइतथि तऽ इष्र्यासँ जड़िजैतथि सही बात छैक ने भौजी ! ठीक छै ओ अएताह तऽ नमस्कार कहि देवैन्हि,’ आ उठिकऽ ठाढ़ होइत कहलैन्हि, ‘चलैत छी भौजी ।
नमस्कार’ !’ हम हुनका गेट तक छोडऽ अएलहुँ, फेर आएब ।
हँहँ अबैत रहब अपनेक सपनामे,’ ओ आकर्षित मुस्कान मुँहपर आनैत कहलाह । गेटपर आबऽधरि कतेको बेर पाछू घूमिघूमिकऽ हाथ हिलओलैन्हि । रघु ओतहि ठाढ़ छल ओकर प्रणामके जवाव देलैन्हि आ गेटसँ बाहर चलि गेलाह ।
हम रघुकेँ ताला लगएबाक आदेश देलहुँ आ भितर चलि एलहुँ ।
सोन जकाँ मेटलकेँ मेढ़ल सुन्दर डायरी शोफापर राखल छल । हम ओकर सुन्दरताकेँ देखिकऽ हाथसँ सहलाकऽ देखलहुँ आ पृष्ठ उण्टेलहुँ भितर सुन्दर आ सुदृढ अक्षरमे लिखल छल ।
वकील साहेब आ भौजीकेँ सप्रेम भेट
सेवक प्रसाद यादव ।
नीचा आजुक गते सेहो लीखल छल ।
लिखवाक तरिका गजव छल ।
सेवक प्रसाद यादव एकटा एहने व्यक्ति छथि गोर रंग, लम्बा आ भारी शरीर, उन्नत ललाट हुनकर स्पष्ट बाजब हरेक अवसरकेँ महत्वपूर्ण आ उन्मुक्त हँसी हजारोमे अलग पहिचान देने छल ।
एहने लाल एलबममे अपन एक फोटो संग हमरा प्रजेण्ट कएने छलथि । जहिया हम विवाह कऽकऽ आएल छलहुँ ।ओ अन्य मित्रक बाद विशेष तरिकासँ यादवजीसँ परिचय करबैत कहलैन्हि, ‘ ई छथि हमर सेवक । ओना हम हुनका अपन मित्र बना लेने छी, काज बढ़ियाँ करैत छथि तँए ठीक कहलहुँ ने यादव जी ।
हँ, हँ फेकैत जाउ, फेकैत जाउ मुदा बूझि लिअ अहाँके बातमे ई नहि आबऽ बला छथि,’ हमरा दिस तकैत कहलैन्हि, ‘एखनो समय अछि , हिनका भगाउ वकिली वाहेक हिनका किछु नहि अबैत छैन्हि । दू दिनमे अहाँ हिनकासँ उबि नहि जाएब तऽ फेर हमरा कहब ।
फेर पति दिस तकैत कहलाह, अहाँक विषयमे एक्कहिटा बात कहऽके मोन करैत अछि कौवाक चोचमे अनारकली । आब हमर परिचय ठीकसँ कराएब वा खोलि दिअ अहाँक सभ पोल ।
ठीक छैक...ठीक छैक ...कहि दैत छियैक,’ पति हथियार रखैत कहलैन्हि, ‘एहि लम्बा चौड़ा पहाड़ जेहन शरीरक नाम अछि, सेवक ...., नहि नहि सेवक प्रसाद यादव ।यादवजीकेँ शरीर तानल देखिकऽ हमर पति हँसैत कहलैन्हि, ‘मुदा हम सभ हिनका कहैत छी यादवजी...
मुदा अहाँ चाही तऽ सेवक सेहो कहि सकैत छी भौजी ।यादवजी रोकैत कहलैन्हि । ओना हम विना कहने अपनेकेँ सेवक छी आ जखनजखन एहि वकील साहेबसँ मोन उबिया जाए विना कोनो सङ्कोचके हमरा लग आबि सकैत छी ।यादवजीके कहलाक बाद जोड़सँ हँसी बजरल ।
ओहि दिन अछि आ आजुक दिन । २५ सालक लम्बा समय बित गेल सभ मित्रके केश उज्जर भऽ गेल, सभ एक दूटा नातीपोता बला भऽ गेल छथि । मुदा हुनक स्पष्टता, हुनकर उन्मुक्त हँसी अखनो जहिनाकेँ तहिना अछि । कोनो समारोहक ओ जान होइत छथि । जतऽ ओ बैसथि छथि ततऽ हुनकर अगलबगलमे लोक ओहिना आबि जाइत अछि । हरेक उमेरक लोक हुनकर बातमे इण्ट्रेष्ट लैत अछि । कहियो ओ कहैत छथि, ‘ई जीवनकेँ हँसी ठहक्के तऽ आगाँ बढ़बैत अछि । मित्र ई नहि होइत तऽ जीवनके उजार आ रुक्ख बनाबऽमे कोनो कसर नहि छोड़ने अछि ई समय ? जिन्दा आ मुर्दामे कोनो फरक देखाइत अछि कनीकाल लेल हँसि आ बाजि लैत छी । फेर तऽ चिन्ताक पहाड़ अछि आगाँमे ठाढ, नहि जानि कोन समय उपरसँ बोलाहट आबि जाइ फेर तऽ दू गज जमीन आ किछु मित्रक स्मरण ?’ बात हुनकर सारगर्भित आ सय प्रतिशत सही होइत छल , मुदा हुनकापर ई गम्भीर विषय विल्कुल नहि जँचैत छल । केओ नहि केओ कहिए दैत छल, ‘कि यादवजी अहूँ सन्तक वाणी बाजऽ लागल छी अहाँ तऽ हँसिते नीक लगैत छी ।
ठीक छै चलैत छी ।यादवजी जखन गम्भीर होइत छलाह तऽ उठिकऽ जएबाक लेल उद्यत भऽ जाइत छलैथि फेर मुँहपर एकटा कृत्रिम मुस्कान लबैत कहैथि,‘ नमस्कार ।
हुनका एहिना उठिकऽ जाइत देखि लगैत छल जेना हुनका दुःखक रागकेँ किओ छू देलक अछि ।
ओ आइयो ओहिना उठिकऽ चलि देलाह, हम अपन कएल गेल हरेक व्यवहारकेँ टटोइल रहल छलहुँ । एतेक दिनपर ओ आएल छलाह हमर पति सेहो एतऽ नहि छलाह, हमर कोनो बात हुनका खराव वा अपमान जकाँ तऽ नहि लागल । एहि विश्लेषणमे डुबैत हम डायरीकेँ उठाकऽ अपन डोरमे राखिकऽ सुतबाक तैयारी करऽ लगलहुँ ।
आइ २० गते अछि । हुनका आइए आबि जएबाक छैन्हि । कोन बससँ अबैत छथि एकर सूचना सेहो ओ देने छलैथि आइ कए दिनक बाद हमर भानस घर चमकल छल । घर तऽ ठीके छल किछु विशेष देखाबए लेल हम लनसँ दूचारि पूmल आ पात तोड़लहुँ ओकरा गुलदस्ताक रुप देलियै आ एकटा गिलासमे किछु पानि राखि गुलदस्ताकेँ सजा ओकरा डाइनिङ्ग टेवुलपर रखलहुँ । पूmल तऽ आखिर पूmले होइत अछि । माथमे लगाउ वा टेवुलपर राखी, निखार तऽ आबिए जाइत अछि । स्वयंपर बढै
Þत जारहल लापरवाहीकेँ तत्कालक लेल हम त्यागि देने छलहुँ, केना ने केना हमर चालमे सेहो तेजी आबि गेल छल । अवचेतन मोनमे बैसल एकटा पतिक प्रेमे तऽ कहल जा सकैत अछि । बच्चा घरपर नहि अछि तऽ कहियोकहियो अधेर अवस्थामे सेहो युवा अवस्थाक आभास वा दोसर ढंगसँ कही तऽ आनन्द होइत अछि । अबेर भऽ रहल छल हम बेरबेर मेन गेट दिस तकैत छलहुँ । घण्टी बजिते हम एक्के धापमे मेन गेटपर पहुँच गेल छलहुँ पतिक मुँह उदास देखि हम असमञ्जसमे छलहुँ जे हिनका की भेलैन्हि अछि ? आखिर पुछिए लेलहुँ, ‘ की भेल अछि ? मोन तऽ ठीक अछि ?’
नहि ....उदासी भड़ल जवाव भेटल,‘ थाकल छी कनी आरामकऽ लिअ वा हाथ मुहँ धो लेब तऽ भोजन लगाएब,’ हम चाह दैत पुछलहुँ । पति चाहकेँ टेवुलपर राखि देलैन्हि आ ठण्ढा साँस छोड़ैत जुत्ता सहिते शोफापर पड़ि रहलाह । की भऽ गेल छैन्हि हुनका कतहु वल्डप्रेसर तऽ नहि भऽ गेल छैन्हि हमरा बहुतरास चिन्ता घेर लेलक ।
हमर मित्र सेवक प्रसाद यादव स्मरण अछि अहाँकेँ,’ किछु देर चुप रहलाक बाद शुरु कएलैन्हि । स्मरण किए नहि रहत ? अहाँ एना किए पूछि रहल छी एखन ...........’ एहिसँ पहिने हम अपन बात पूरा करितहुँ एहिसँ पहिने निर्मेष दृष्टि लैत धाराप्रवाह कहऽ लगलाह, ‘ सेवक प्रसाद यादव हमरा सभक प्रिय मित्र, पतिक नोराएल आँखि किछु अनहोनीक संकेत दऽ रहल छल ।
हमर पूरा शरीर कानमे केन्द्रीत भऽ गेल ।हमरा सभसँ रुसिकऽ चलि गेल साक्षी..........।
की ? .......आकाशपरसँ खसबाक पार आब हमर छल । हम किछु कहऽ चाहि रहल छलहुँ मुदा किछु सुनबाक अवस्थामे हमर पति कहाँ छलथि, ओतऽ मात्र बाजि रहल छलाह, ‘हुनकर माय विमार छल, देखवाक लेल अफिसक जीपसँ आबि रहल छलाह । हुनकर आदत छैन्हि, ड्राइवरकेँ ओ पाछू बैसा देलाह आ स्वयं जीप ड्राइव करऽ लगैत छलाह । ओना ओ ड्राइव बढियाँ करैत छलाह, मुदा ओहि दिन नहि जाइन की भेल, शायद सड़कपार करैत एकटा मालकेँ बचएबाक चक्करमे हुनकर जीप उनैट गेल आ खधियामे खसि पड़ल ।
ड्राइभरकेँ तऽ कनीमनी चोट लागल मुदा स्टेरिङ्ग छातीमे घूसि गेलाक कारण यादवजीकेँ घटने स्थलपर मृत्यु भऽ गेल । एखने हुनकर घरसँ आबि रहल छी । दिव्याकेँ तऽ हाले नहि पुछू । हुनकर माए वेचारी कानिकानिकऽ अधमरु भऽ गेल छल । ४७ वर्षक कोनो मरबाक उमेर होइत अछि । तीनतीनटा वच्चा अछि । की हएत ओकर ? हे भगवान अहाँ चूनिचूनिकऽ लोककेँ लऽ जाइत छी ।
हुनका बजा तऽ नहि सकैत छी । काल्हि अहूँ ओतऽ चलि जाएब, लोककेँ सान्तवनो मलहमके काज करैत अछि ।
सुनू हमरो किछु सुनूहमर बात नहि सूनि रहलाक कारण हमरा तामस आबि रहल छल । हुनक मृत्यु कए गतेकऽ भेल छल ।
१७ गते कऽ ।
१७ गते कऽ ....एहि १७ गते कऽ ।हमर आँखि आश्चर्य आ रोमाञ्चसँ भड़ल जा रहल छल ।हँ.. हँ.. इएह १७ गते कऽ ।
मुदा एना कोना भऽ सकैत अछि हमर मतलव एहि १८ गते कऽ अहाँक अनुपस्थितीमे ओ अपना घरपर आएल छलाह आ एही ठाम बैसल छलैथि ...। हमरा संग बातोचित कएने छलैथि ।
की कहि रहल छी अहाँ ? ...होशमे तऽ छी, हुनकर मृत्यु फागुन १७ गते भोरेमे भेल छल आ १८ गते भोरमे अन्तिमो संस्कार भऽ गेल एहि बातक सयकड़ो लोक गवाह अछि । अहाँ कहैत छी जे १८ गतेक साँझमे ओ आएल छलाह । जे मोनमे आएल से कहि दैत छी । किछु स्मरणोतस्मरणो रहैत अछि की नहि ?’
हमर पति हमरापर अनापसनाप कहि रहल छलैथि मुदा, हमर शरीर एहि बातकेँ स्वीकारयके पक्षमे नहि छल बातक सत्यताक ज्ञान एखन मात्र हमरे छल हमर हाथपएर काँपिकऽ ठण्ढा भऽ गेल छल । यादवजीद्वारा पकरल गेल हाथक अनुभव हमरा वेहोशीके अवस्थामे आनि देने छल, मुदा हमरा सत्यताक प्रमाण देवाक छल । शक्ति जमाकऽ हम कहलहँु, ‘ हमरा बढ़ियाँ जकाँ स्मरण अछि ओ १८ गतेक साँझ छल ओहि दिन हम दुधबलाकेँ हिसाब देने छलहुँ हमर बातपर विश्वास नहि हुअए तऽ रघुसँ पुछि लिअ । हुनका जाइत समय ओहो गेटपर ठाढ़ छल । उएह तऽ गेट वन्द कएने छल ।
हँ मालिक मलिकानि ठीक कहैत छथि हमर नमस्कारकेँ ओ हाथ उठाकऽ जवाव सेहो देलैन्हि । बरण्डापर ठाढ़ रघु हमर बातकेँ पुष्टि कएलक । मुदा एना .....कोना भऽ सकैत अछि ।पतिपर एखनो अविश्वासक बादल छाएल छल । तखने हमरा एकाएक यादवजीद्वारा देल गेल डायरीक स्मरण आएल, हम दौड़ैत डोर दिस बढ़लहुँ ओ डायरी एखनो ओहिठाम राखल छल । थरथराइत हाथसँ ओहि डायरीकेँ निकालहुँ हमरा हाथमे छल हमर सत्यताक प्रमाण ।
ओ हमर पाछू आबिकऽ ठाढ़ भऽ गेलाह ।
देखू ई डायरी यादवजी अपने हाथसँ हमरा देने छलैथि । दूइए दिनक बात अछि डायरीक पन्ना उनटऽबैत हम कहलहुँ हमरा अहाँकेँ सम्बोधितकऽ देल गेल डायरीपर हुनकर हस्ताक्षर आ १८ गते लिखल अछि ।
ई रोमाञ्चक बात सूनिकऽ हमर पति मित्रक दुःखसँ उबरिकऽ एहि सोचमे डूवि गेलैथि जे मृत्युक बाद ककरो आत्माकेँ एहि प्रकारे कतहु जाएब आएब सम्भव अछि । की आजुक युगमे केओ एहिपर विश्वासकऽ सकत ? मुदा जतेक ई सत्य अछि यादवजीकेँ मृत्यु १७ गते भेल अछि, ओतवे निर्विवाद सत्य अछि फागुन १८ गतेक साँझ हमरा घरपर हुनक आएब, जेकर सत्यता ई लाल डायरी प्रमाणितकऽ रहल छल ।
हमर पति श्रद्धासँ डायरी सहलौलैन्हि । पहिल पन्नापर लिखल वकील साहेब आ भौजीकेँ सप्रेम भेट । सेवक प्रसाद यादव ।
यादवजीक नाम देखिकऽ ओ पुनः दःुखित भऽकऽ कहलाह, ‘हमरासँ भेटकऽ जइतहुँ मित्र, एकटा स्मरण छोड़िकऽ गेलहुँ मात्र । ओ एकएकटा पृष्ठकेँ एना उण्टाबि रहल छलैथि ओकर मध्य हुनकर मित्र बैसल हो । मुदा की ! भितर पन्नापर जेना घड़ि रुकि गेल हुए । हरेक पन्नापर एकहिटा गते लिखल छल फागुन १८ गते आ मात्र फागुन १८ गते ............

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सत्यनारायण झा
पाहुन:
प्रयाग राजक शिव कोटिक नारायणी आश्रम |गंगाकात मे एहि आश्रमक अनुपम सौंदर्य छैक |पुबारिकात गंगाक कल कल छल छल धारा बहैत छैक |एहि  आश्रम सं सटले बगल मे एकटा फूसक मरैया छैक ,जे बाबाक  प्रेम  कुटी सं प्रसिद्ध छैक |ओहि कुटी मे एकटा साधु लगभग बारह बरख सं रहैत छैक |साधु बर बुढ़ लगैक छैक |सोन सन  उज्जर केस आर पैघ पैघ दाढ़ी आ मोछ |साधु केकरो सं बात  नहि करैत छैक |हँ भोरे चारि  बजे साधु गंगा स्नान करैत छैक आ घंटो गंगा कात मे बैसल गंगाक कल कल छल छल जल  बर ध्यान सं  देखैत रहैत छैक |दु साल पहिने तक साधु कतौ चलि जाइत छलैक ,कइएक दिन तक गायब रहैत छलैक मुदा एम्हर दु साल सं कतौ नहि जायत  छैक |बस नारायणी आश्रम मे कोनो समागम रहैत छैक तअवश्य कतौ कोनो कोन मे बैसल प्रवचन सुनैत रहैत छैक |
एहि चारि पाँच दिन सं साधु कतौ नहि जाइत छैक ,भरि दिन कुटी मे परल रहैत छैक |प्रायः बीमार रहैत छैक |उठियो नहि होयत छैक |राति बारह बजे साधु कबर मोन खराब भगेलैक ,लगैक आइ नहि बचतै  ?कियो लग मे नहि छैक |ओकरा छैहे के ?कुटी मे मुसक बिहरि बहुत छैक |दुटा मुस ओकरा  टुकुर टुकुर  ताकि रहल छैक |
साधु करोट फेरलक |ओकरा मानस पटल पर ओहिना सबटा दृश्य देखाय लगलैक |ओ सोचैत अछि कियो ओकरा महात्मा कहैत छैक आ कियो ओकरा पागल कहैत छैक |कियो ओकरा अंदर मे ओकर दुःख नहि देखैत छैक |ओकरा देखि सभ हँसैत छैक मुदा ओकरा लोकक उपेक्षाक कोनो ध्यान नहि रहैत छैक |ओकरा याद परलैक ,”एकदिन माय बजा ककहने रहैक ,रे बउआ ,गरमीक छुट्टी  मे बहिनक सासुर चलि जो |  ,माय आँहा सही कहैत छी |हम काल्हिये लालगंज चल जायब ,हम माय ककहने रहियैक |  ठीके बहुत दिन भगेल बहिन सं भेट केना |आ सही मे हम भोरे बहिनक सासुर लालगंज चलि गेलौ |ओहि समय हमर आयु  पन्द्रह सोलह बरखक  छल होयत |दु मासक गरमीक छुट्टी रहैक |दु मास ओतहि रहि गेल रही |जेठ मास रहैक |रोहनिया आम पाकय लागल रहैक |सभ बच्चा बुढ़ आमक गाछी मे जखन तखन जायत रहैत छलैक |केखनो कबिहारि उठैक त बाले बच्चे सभ गाछी  दिस भागैक |हमहू ओही बच्चा सभक संग गाछी भागइ  छलियैक |ओहि अन्हर बिहारि मे ने सरिता सं भेट भेल रहय |सरिता हमरे बहिनिक एकटा फरिकक बेटी छलीह |सम्बन्धे हमरा बहिनिक ननदि रह्थीन |सरिता तेरह चौदह बरखक छलीह |एक दिन साँझ में बिहारि उठलैक |सभक संगे हमहू गाछी दिस भागलौ |गाछीक दृश्य बर मनमोहक रहैक |बिहारि ततेक पैघ रहैक जे एक गाछ दोसर कछुबैक |सभ गाछ जोर जोर सं हिलैत छलैक |चारुकात आम भट भट खसैत छलैक |सभ धिया पुता दौड़ दौड़ कआम बिछैक |हमहू खुब दौड़ धुप करी |बच्चा सभ जिम्हरे सं भट शब्द सुनैक तिम्हरे दौड़ लगाबैक |एक बेर एकटा आम खसलैक |भट शब्द सुनिते हम उम्हरे भागलौ |जहिना हम आम उठाबय लगलौ तहिना हमरा सं पहिने सरिताक हाथ आम पर परलैक |हमर हाथ सरिताक हाथक उपर परल |बरीकाल तक ओही हालत मे रहलौ |बरीकालक बाद कोकिल कंठी आवाज सुनलौ |यौ ,पाहुन ,ई आम हमर भेल |पहिने हमर हाथ आम पर परल अछि |हम कहलियनि ,सत्ते कहलौ !अहीक आम भेल |मुदा हम तखन सं दौरिते छी मुदा एकोटा आम हमरा नहि भेटल अछि |खाली हाथ जायब त बहिन की कहती |कहती तोरा कोनो लुरि नहि छह |एकोटा आम अनितह तकम सं कम चटनी तबनितैक ,तै ई आम हमरा ददिअ |सरिता बजलीह , यौ पाहुन, एहन बात कियैक बजैत छी |एकेटा आम लजायब तभउजी  हँसतीह नहि ?अपना झोरी सं ओ दसटा आम हमरा देलनि |हमरो मोन प्रसन्न भगेल |ओहि दिन सं सरिता सं सभ दिन गाछी मे भेट होमय लागल |आब सरिता सं भेट करय हम असगरो गाछी जाय लगलौ |गाछी मे आओर छोड़ी सभ रहैत छलैक |गाछी मे कइएक प्रकारक खेल सभ होयत छलैक |डारि पत्ता ,चोर सिपाही ,कबड्डी ,पचीसी ,कौआ ठुठी आ गोटरस |हुनके सभक संग खेलायत छलौ |एक दिन चोर सिपाही खेल प्रारम्भ भेलैक |एहि खेल मे सभ चोर बनैक आ एकटा सिपाही बनैक |सिपाही जहिना जहिना चोर सभ कतकने जाय ,ओ चोर सिपाही बनि जाय आ दुनू मिलि आब ताकब सुरुह करैक ,एहिना जे भेटल जायक ओ सिपाहीक संग  दोसर कतकै |अंत मे जे पकराय  ओ सिपाही बनैक आ बांकी सभ चोर बनैक |हम सभ चोर बनि नुकाय गेलौ आ एकगोटा  सिपाही बनलाह |सभ जतय ततय नुकाय लेल गेल |कियो कोनो आमक गाछक अढ़ मे ,कियो गाछक झुरमुट मे ,कियो कतौ तकियो कतौ |हम देखलौ जे एकठाम बहुत धानक पुआलक टाल रहैक ,हम उम्हरे नुकाय गेलौ |एकठाम देखलियैक तीन चारिटा टाल सटले सटले रहैक ,ओहि मे दोगी सेहो बनल रहैक |हम उम्हरे बिदा भेलौ |ओही दोगी सं सरिता हमरा इशारा केलनि |हमहू ओही दोगी मे सरिता सं सइट नुका रहलौ |पहिने तसिपाही दिस ध्यान रहे मुदा धीरे धीरे लागे जेना  देह में रोमांच होमय लागल |मोन मे एकटा अज्ञात आनन्दक अनुभव होमय लागल |दिल दिमाग पर जेना नसा चढ़ल जायत छल | सरिताक डाँर पर हमर हाथ  अनायास चलि गेल आ धीरे धीरे हाथ हुनका पीठ पर चलि गेल |सरिता सेहो हमरा पांखुर पर अपन माथ धदेलनि आ बेसुध जकाँ अपन हाथ हमरा गरदनि पर धदेलनि |हमर मोन घबराय लागल आ ओही मुद्रा मे सरिता कअपना छाती सं सटा देलियनि |सरिता एकोरत्ती प्रतिरोध नहि केलनि |एही बीच सिपाही सभ पहुँचि हल्ला करय लागल जे दुटा चोर संगहि पकरायल \दुनू कसिपाही बनय परतैक|हम दुनू संगहि सिपाही बनलौ मुदा हमरा तकिछु देखेबे नहि करय |एखन तक हम मदहोशे रही |बुझेबे नहि करय जे कतय सं की भगेलैक |देह एखनो कोनों अज्ञात आनन्द सं थर थराइत छल |
राति मे भोजन करैत रही मुदा मोन कोनों आनन्द सं आनन्दित छल |बहिन कइएक बेर बजबो  केलनि जे एना मथसुन्न जकाँ कियैक छह |पूछै छियह किछु तजबाब नहि दैत छह ?मोन ठीक छह कि नहि ?हम कहलियैन ,बहिन मोन तठीक अछि ,कनेक माथ दुखा रहल अछि |खा कय सुतय चलि गेलौ |नींद की होयत ?खाली वैह दृश्य दिमाग मे घुमैत छल |एहि सं पहिने एहि तरहक अनुभव कहाँ कहियो भेल छल |ओ आनन्द स्मरण होयते मोन आओर आनन्दित भजायत छल |कहुना कनींद भेल |
दोसर दिन कोनों काज सं सरिता बहिनक घर आयल छलीह |बहिन भनसा घर में कोनों काज में ब्यस्त छलीह |सरिताक नजरि हमरा पर परलनि |पहिने त कनेक लजा गेलीह मुदा पुनः हमरा कहलनि ,यौ ,पाहुन ,भउजी कतय छथिन |हम भनसा घर दिस इशारा केलियनि |ओ बहीन सं जोरन मंगलखिन |बहिन एकटा कटोरी मे कनिक दही जोरन लेल देलखिन |ओ जाय काल कहलनि ,पाहुन ,आइ गाछी नहि जेबैक ?हम कहलियैन , भोजन कयलाक बादे बहिन गाछी जाय देतीह |ओहि दिन तीन बजे कबाद गाछी गेलौ |एखन गाछी मे दोसर कियो नहि आयल रहैक |सरिता सं ओहिना किछु गप्प होमय लागल |हमरा पुछला पर कहलनि जे पढ़य में मोन बर लगैत अछि मुदा गणित बर कमजोर अछि |गाम मे कियो पढ़बै बाला नहि छैक |सरिता वर्ग नवम् मे पढ़ैत छलीह |हम ओहि समय ग्यारह अर्थात मैट्रिक मे चलि आयल रही |
दोसर दिन सं हम सरिता कगणित पढ़ाबय लगलियनि |हम बहुत मनोयोग सं पढ़बैत छलियनि आ ओहो खुब मोन लगाके पढ़ैत छलीह |पढ़बैत काल हम कतबो डटैत छलियनि ओ  हंसय लगैत छलीह |हुनका हसैत देखि हमारो हँसी लागि जायत छल |एहिना मे दस पन्द्रह दिन आओर बित गेलैक | एक दिन हम गाम बिदा भगेलौ |      जाय काल सरिता भेट करय आयल छलीह |याद अछि एकांत पाबि कहने छलीह ,यौ पाहुन ,आब कहिया दर्शन हेतैक ?गाम जाकय तहमरा बिसारिये जायब ?सरिताक आँखि ढबढबा गेल छलनि |एकटा कोनों अदृश्य आकर्षण रहैक जे हमरा दुनू कएक दोसर दिस आकर्षित करैत छल |हमरा गाम जेबाक मोन नहि रहय मुदा स्कूल फूजि गेल छल तै जाय परल |हम सरिता ककहलियनि ,हम शीघ्रे आयब |
गाम आबि पराते दरिभंगा चल गेलौ |ओतय मोन तनहि लागे मुदा एक दु दिनक बाद पढ़नाय पर ध्यान देबय लगलौ |पढ़ाय एकटा साधना छैक |साधना मे जतेक लिप्त रहै छैक ,साधक कतदनुसार फल भेटैत छैक |हमहू एकसाल कतौ नहि गेलौ आ अपन पूरा ध्यान पढ़ाय मे लगेलौ |एहि एकसाल हम सरिता सं सेहो संपर्क नहि कएल
|मैट्रिकक परीक्षा समाप्त भगेल |दु मासक फेर छुट्टी भगेल |हम अपन गाम आबि गेलौ |एक दिन माय ककहलियनि जे एक साल भगेल बहिन कभेट नहि केलियैक अछि से लालगंज जेबाक मोन होयत अछि ?माय तुरत आज्ञा देलनि जे बहिन कगाम चलि जाय लेल |दोसर दिन भोरे लालगंज गेलौ |साँझ मे लालगंज पहुचलउ|बहिन बर प्रसन्न भेलीह |सांझे सं सरिता सं भेट करय लेल मोन छटपट करे मुदा सरिता भेट भेलीह दोसर दिन |सबेरे ओ बहिनक अंगना अयलीह |हमरा असोरा पर बैसल देखि हिनका बर खुशी भेलनि |एकटक सं हमरा दिस तकैत रहथि |हमरो नजरि सरिता पर गेल |ओ नजरि झुका लेलनि |सरिता कदेखि हम तअबाक भगेलौ |अय ,एक साल पहिने जे सरिता फूलक कोढ़ी छलीह से आब अर्द्ध बिकसित फूल भगेल छथि |जे सरिता पहिने एकटा फ्राक पहिरने रहैत छलीह से आब ओढ़नी ओढ़ने छलीह |चंचल सरिता आब गंभीर भ गेल छथि |हुनका देखि हम हरबरा गेलौ |सहसा हमरा मुँह सं निकलि गेल  ,आउ ,सरिता , अहींक बाट  हम रातिये सं  तकैत छी  |सरिता बजलीह ,यौ पाहुन ,एके साल मे आहाँ झुठो बाजय लगलौ अछि |एहन हमरा दिस ध्यान रहैत तएकोटा समाद दि तौ ?ओ तआइ भोरे मदन भाइजी कहैत छलखिन जे साँझ में हमर सार कमल अयलाह अछि |जहिना हम अहाँक नाम सुनलौ ,दौडल आयल छी |सरिता हमरा माफ करू ,गलती भगेल |ओना हम गाम सं अहींक भेट करय आयल छी |सरिता चुप चाप अपन अंगना चल गेलीह |एहिबीच एकटा घटना भगेलैक |हँ ,घटने कहक चाही |बहिन कहलनि ,कमल ,तू आबिये गेल छह ,हमरा दु चारि दिन लेल गंगा स्नान करय सिमरिया जाय कअछि |केकरा पर घर छोड्बैक |तू रह्बह तहम दुनू गोटा निश्चिन्त भजायब |तोहर भोजन ताबे सरिता बना देतह |हम हुनका माय ककहि देलियनि अछि |   ओना बहिन नहि रहती से सुनि नीक नहि लागल मुदा पता नहि एकटा अदृश्य कोनों शक्ति देह मे रोमांच उत्पन्न करहल छल | भोरे बहिन मिसरक संग गंगा स्नान करय सिमरिया चल गेलीह |बहिन भोरे हमरा लेल भोजन तैयार कदेने छलीह |राति में ठीक सं नींद नहि भेल छल |दस बजे स्नान केलौ |तत्पश्चात भोजन कसुति रहलौ |चारि बजे उठलौ आ बहार निकलि पोखरिक मोहार पर टहलय लगलौ |सूर्यास्त भेलाक बाद घर लौटलौ |सरिता कनेक कालक बाद अयलीह |दीप ज़रा हमरा लग बैसलीह |हम कहलियैन ,आइ त आहाँ अपना पाहुन कएको बेर खोजो नहि केलियनि |ओ कहलनि ,नइ यौ पाहुन !हमरा माँ कबुझल छलैक जे दिनक भोजन अहाँक लेल भउजी बना कगेल छथि |ओना हम आयल रही तआहाँ सुतल रही |हम घूमि गेल रही |सरिता फेर पुछलनि ,बाजू ,की खायब ?आहाँ जे खुआयब सैह हमरा लेल अमृत छैक |सत् पूछी तअहांके देखिये कहमर पेट भरि गेल |यौ पाहुन ,कतेक झूठ बजैत छी |सरिता भोजन बनाबय भनसा घर चलि गेलीह आ हम छत पर जा घुमय लगलौ |सरिता एक घंटाक उपरान्त छत पर अयलीह |हम आ  ,पटिया बिछा एकहि
 ठाम बैस गेलौ |
पूर्णिमा दिन रहैक |चान अपन पूरा प्रकाश पसारि देने छलखिन |बसंतक  मादकता प्रकृति  मे पसरल छलैक |आमक  सुगंध चारुकात गमकैत छलैक |भौरा गुंजायमान केने छलैक |कोयलीक कु कु वाताबरण मे मिठास भरि देने रहैक |केखनो कदक्षिण पवन मंद मंद बहैत छलैक | शान्ति ब्याप्त छलैक |दुटा हृदयक धरकनक आवाज हमरा दुइए गोटा  बुझा रहल छल |हम दुनू गोटा पटिया पर बैसल छी |मलयानिल जोर सं चललैक आ सरिताक ओढ़नी उरि हमरा देह कझाँपि देलक |हुनकर केसक लट हुनक लाल लाल कोमल कपोल पर लहरि मारय  लगलनि जेना मेघ चान कढकि दैत छैक |हम सरिताक ओढ़नी हुनका माथ सं ओढ़ा घूँघट बना दैत छियैन आ हुनकर दुनू कपोल पर अपन दुनू हाथ दओहि चान कनिहारैत छी |सरिता एक बेर हमरा दिस तकैत छथि आ नजरि झुका लैत छथि |हुनक ई रूप हमरा एतेक आंदोलित केलक जे हम अपना कनहि रोकि सकलौ |हुनका अपना करेज सं सटा लेलियनि |बरीकाल तक एहिना हुनका अपना करेज सं सटेने रहलियनि |सरिता अपन दुनू हाथ उठा हमरा गरदनि पर दय अपन माथ हमरा हृदय पर समर्पण कदेलखिन |लागल जेना चान कमेघ झाँपि देलकै ,पुरा अन्हार भगेलैक |हमर मोन जेना अपना नियंत्रण सं बाहर होमय चाहैत छल |ओही समय में बाँसक झुरमुट सं एकेबेर पक्षीक समूह कोलाहल करय लगलैक |हमर चेतना घूमि आयल |सरिताक बात तमोन कआओर स्थिर कदेलक |ओ हमरा जांघ पर अपन माथ दकहलनि ,प्रियतम ,चान मे आहाँ की देखैत छियैक ?चानक प्रकाश देखैत छियैक ,चानक मुस्कराहट देखैत छियैक |सरिता पुनः कहलनि मुदा चान में ओ दाग देखैत छियैक |सरिताक बात हमरा अंतरात्मा कछू लेलक |हम कहलियनि ,प्रिये ,ओहि चान जकाँ हमरा चान कदाग नहि लगतैक |हमर चान तओहू चान सं बेसी चमकतै |हम बारी काल तक हुनका माथ में अपन आंगुर चलबैत रहलियनि |आकाश मे चान हमरा सभ कदेखि स्थिर भगेलैक |पक्षी सभ जे कनेक काल पहिने कलरव करैत रहैक  अपना खोता मे शांत भगेलैक ||जेना पक्षी सभ कहमरा प्रेम पर विश्वाश भगेलैक |बाताबरण मे निरवता पसरि गेलैक | नीला आकाशक नीचा मात्र हम आ सरिता |कोनो शब्द नहि |कोनो आवाज नहि |मात्र हमरा दुनुक साँसक आवाजक अनुभूति होयक |
हम दुनू प्रकृतस्थ भेलौ |मुदा सरिता हमरा जांघ पर अपन माथ दआकाश दिस तकैत रहथि |हुनका माथ कसह्लाबैत हम पुछलियनि ,सरिता की सोचैत छी ,की देखैत छी ?ओ कहलनि ,प्रियतम ,हम बहुत दुर टिमटिमायत ओहि तारा क देखैत छियैक |हमरो जीबन ओही तारा जकाँ टिमटिमा करहि जायत |टिमटिमाइत ओही तारा जकाँ हमहू एहि संसार मे ने रहि जाय ?सभक ध्यान तझिलमिल चाने पर रहैत छैक |यौ पाहुन ,हम आइ नीक कएल की बेजाय से हम नहि जनैत छी मुदा हमर रोम रोम अहाँकसमर्पित अछि |आब इ जिनगी अहाँक संग ,नहि त
फेर एहि देहक स्पर्श मृत्वे करतैक |
हमर हृदय चित्कार कउठल |हम अपन प्रियतमाक मुँह पर अपन हाथ धदेलियनि आ हुनका अपना करेज सं सटा लेलियनि |प्रियतमा अहूँ एहि बात  गेठ बान्हि लेब जे प्रियतमा छोरि एहि देह पर मृत्वेटाक बस चलतैक |सरिता सेहो हमरा  मुँह पर हाथ धदेलखिन |सरिता खुशी सं हमर गरदनि मे दुनू हाथ द झुलि गेलीह |”
दुनू बर प्रसन्न |प्रेमालिंगन मे दुनू डूबल |तेसर दिन बहिन बह्नोई गाम अयलखिन |एक सप्ताह के बाद कमल गाम चलि गेलाह |रिजल्ट निकलनि |प्रथम श्रेणी सं पास केलनि |गाम सं पटना आबि गेलाह |पटना साइंस कओलेज मे नाम लिखेलाह |अपना गति सं जिनगी चलय लगलैक |कमल पढ़ाई पर ध्यान देबय लगलाह |बीच बीच में सरिता सं पत्र द्वारा गप्प होयत रहलनि |सरिता सेहो पढ़य पर ध्यान देबय लगलीह |एहि तरहे समय बितैत गेलैक |कमल पटना मे एम् एस सी मे पहुचलाह आ सरिता सी एम कओलेज ,दरभंगा में बी ० ए ० मे पहुचलीह |सरिताक पिताजी विश्व विद्यालय मे काज करैत रहथिन |तै सरिता दरभंगा मे नाम लिखेलनि |दुनुक बीच पत्र ब्यबहार अबाध गति सं होयत छलनि |एहि बीच कहियो कहियो कमल दरभंगा आबि सरिता सं कओलेजक परिसर में भेट कजाइत छलखिन |दुनुक बीच प्रेम प्रसंग अबाध गति सं चलैत छलैक |सरिता आब गुलाबक कोढ़ी वा अर्द्ध विकसित फूल नहि छलीह ,आब ओ गुलाबक पूर्ण फुलायल फूल छलीह ,पूर्ण नव यौवना अ कमल सुन्दर ,सुशील युवक
एकबेर महात्मा करोट फेरबाक प्रयास केलक मुदा निरर्थक |देह मे मात्र अस्थियेटा शेष छैक |एकबेर जोर सं निःश्वास लेलक आ कनेक स्थिर भेल |पुनः ओकरा मानस पटल पर चलचित्र जकाँ  दृश्य  घुमय लगलैक |
कतेक खुशी सं जीबन बितैत रहय |सरिता सन प्रेमिका भेटल छल जिनकर प्रेरणा सं सभ किछु सुन्दर गति सं चलैत छल |प्रेम आ कर्तब्यक बीच झुलैत नहि छलौ |सुन्दर ढंग सं समय बितैत छल |एम० ए० मे विश्वविद्यालय मे प्रथम आयल रही |पटना साइंस कओलेज मे ब्याख्याताक पद पर आरूढ़ भगेल छलौ |”
कमलक प्रत्येक सफलता  सं सरिता खुश  रहैत  छलीह |दुनुक संपर्क सूत्र जुटल छलनि |सरिता सेहो बी० ए० कगेल रहथि |सरिताक रिजल्ट देखि कमल दरिभंगा आयल रहय |दुनूक भेट साँझ मे भेलैक |विश्वविद्यालयक सकटमोचन मंदिर मे, दुनू गोटा बजरंगबली कदर्शन केलाक बाद नौरगना पैलेसक सामने पार्क मे एकठाम बैसल |कमल पूछने रहैक   ,आगुक पढ़ाईक बारे मे मुदा सरिता कहने रहैक  ,पाहुन ,आहाँ पढ़ाइक बात नहि करू |पाहुन ,हम अहाँक प्रेमक आगि मे जरि रहल छी आ हमर पिताजी हमर ब्याहक गप्प सुरुह कदेने छथि |हम आहाँ कोना परिणय सूत्र में बन्हायब ताहि लेल सोचू |कमल कहने रहैक जे सरिता स्थिर रहू |सभ ठीके रहतैक |कमल घूमि कपटना चल गेलाह |किछु दिन एहिना बितलैक |कमल सोचैत छल|  कोना प्रस्ताव पठायल जाय ,ताबे बीचे मे सरिताक पत्र भेटलैक   |  
                                                                             लालगंज ,
                                                                             दि० १५.०२.१९७५.
        प्रियतम ,प्रणाम ,
हम अपन हाल की लिखू |हमर स्थिति तओहि स्वाती चिरइ जकाँ अछि जे बरखाक  एक बूंद जल लेल आकाश दिस तकैत रहैत अछि |हमर एक एक क्षण कोना बितै अछि कहि नहि सकैत छी |हमर ब्याह हमर पिताजी ठीक कलेलखिन |ब्याहक दिन फागुन शुदि पंचमी रवि अर्थात १० मार्च कनिर्धारित भेलैक अछि |हे प्रियतम ,आहाँ कत नुकायल छी |आहाँ तबुझते छी हमर ब्याह तकतेक दिन पहिने भ गेल अछि |आब एहि देह कपर पुरुष कोना छूअत |एहि सं  मरि गेनाइ  नीक |हे पाहुन ,हमरा एहि जाल सं मुक्त करू |शीघ्र आउ ,नहि तफेर एहि लोक मे नहि भेटब |               अहींक प्रतीक्षा मे ,सरिता |

कमल कहाथ मे जहिना पत्र भेटलैक ,लगलैक जेना ई संसार घूमि रहल छैक |कमल कबुझेबे नहि करैक जे कोना एहि बिपति कपार लगायब |ओ तुरत दरिभंगा बिदा भेल |सीधे सरिताक पिताजी सं भेट केलक आ अपन सभ स्थिति स्पस्ट कदेलकनि |सरिताक पिताजी कमल कआश्वस्त केलखिन आ कहलखिन जे सरिता जतय चाहतैक ओतहि ब्याह हेतैक मुदा नव स्थितिक कारण किछु समय लागत |कमल प्रसन्न भपटना लौट गेल मुदा किछु दिनक बाद पुनः एकटा पत्र भेटलैक |
प्रियतम ,
पिताजी आहाँ कठकि लेलनि |हमर ब्याह आइ भगेल |समाजक डर सं हमहू किछु बाजि नहि सकलौ |हमरा सिउथ मे जे सिंदूर देलक अछि ,हमर मोन में तओ नहि  अछि |तै हम निर्णय केलौ अछि जे अपन जीबन लीला समाप्त कली |तै ब्याहक बादे हम घर सं भागि गेलौ |हम अहूँ लग कोन मुँह लजायब ?हमरा आहाँ  लग गेने आहाँ क’  पराभव भजायत |आब हमर जीबन नरक भगेल |आब केकरा लजीयब |पाहुन ,आब एहि जन्म  मे भेट नहि होयत |हमर सभ कहल सुनल माफ करब | मरैयो काल अहाँक हाथक स्पर्श हमरा रोमांचित करहल अछि |पाहुन ,झूठ नहि कहैत छी अहाँक स्मरण होयते पुरा देह ओहिना  काँपि रहल अछि जेना प्रथम अभिसारक समय देह काँपल छल | बस आब किछु नहि कहब |अहूँके दुखे होयत |सकय तहमरा बिसरि जायब |पाहुन ,हमर अंतिम प्रणाम |      अहींक अभागल ,सरिता |
पत्र देखि कमलक आँखि सं अश्रुपात होमय लगलैक |ओ भाव विह्वल भगेल |तुरत पेंट शर्ट पहिर बिदा भेल, सरिताक ताकय |कतय कतय ने सरिता के ताकय लेल गेल मुदा सरिता कतौ नहि भेटलैक |कमल सोचलक ई संसार बेकार छैक |जखन सभ सं  प्रिय  हृदये हेरा गेल तखन आब जीबन मे रहिये की गेल अछि |” आइ बारह बरख सं एहि शिव कोटिक कुटी मे रहैत अछि |संसार मे ओकरा लेल रहिये की गेलैक जेकरा लेल चिंता करत |कियो किछु ददैत छैक तखा लैत अछि ,नहि कियो किछु देलकै तकतेको दिन भुखले रहि जायत अछि |मुदा नित गंगा स्नान करैत अछि आ नित गंगाक कल कल छल छल प्रबाह के देखैत रहैत छैक  |गंगाक प्रबाहे जकाँ ने ओकर सरिताक प्रबाह रहैक |एहिना ने ओहो कल कल छल छल करैत रहैत छलैक |गंगाजले जकाँ ओ हो ने स्वच्छ ,निर्मल आ सीतल छलैक |ओकरा होयत छलैक जे गंगाकाते में ओकरा सरिता सं कहियो ने कहियो भेट हेतैक मुदा एखन तक कहाँ सरिता अयलैक ?
साधुकबुझेलैक आब साँसों लेबा में दिक्कत होयत अछि |मुदा ई की, दुर बहुत दुर की देख रहल छैक  ?उपर नीला आसमान मे सरिता नव बधुक रूप मे ओकरा निहारि रहल छैक | पता ने   ओकरा कतय  सं शक्ति आबि गेलैक  आ जोर सं भागल आ सरिता कभरि पाँज कपकरि कानय लागल |
भोरे कुटी लग बर भीर रहैक |आश्रमक लोक ठठरी बना नेने रहैक |साधु कउठा ओहि पर धदेने रहैक |लोक सभ कुटी कअंदर देखय लगलैक जे कि सभ छैक |सरिताक पत्र छोरि किछु नहि रहैक |लोक आब बुझलकै जे साधु तप्रेमक पुजारी छल |ओहि कुटीक नाम प्रेम कुटी राखि देल गेलैक |   

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राजदेव मण्‍डलक
उपन्‍यास
हमर टोल
गतांशसँ आगू-

खेलावन भगत चौबटि‍यापर चक्कर पूजि‍ रहल छै। एकश दि‍स तकलकै। लगलै जेना अधरति‍या भऽ गेलै। ओना तँ साँझो-परात लोक एनए नै अबै छै तँ राति‍क कोन गप। लोककेँ डर पैसल छै- जे सुनहटमे बाधक चौबटि‍यापर मुँहरगड़ा प्रेत रहै छै। एक दि‍न उचि‍तवक्ताक कक्का चोटपर चढ़ि‍ गेल रहै। खून बोकरैत-बोकरैत आँखि‍ उनटि‍ गलै। के जानि‍-बूझि‍ कऽ आगि‍पर टाँग राखत।
जानि‍ बूझि‍ नर करै ढि‍ठाइ....।
कि‍नकर मैया बाघि‍न जनमे। केकरा ओतेक हि‍म्मति‍ छै जे एमहर एतै। खेलावन भगत पूरा नि‍चेन अछि‍। ओकर आँखि‍ अड़हूल फूल जकाँ लाले-लाल भऽ गेल छै। धोतीकेँ डाँरमे कसने अछि‍। चाकड़-चौरठ देह, नंग-धड़ंग।
आगूमे सजावटि‍क संग पसरल अछि‍। अड़हूल फूल, अरबा चाउर सि‍नूर। एक कातमे मनुक्‍खक खोपड़ीक कंकाल, दाँत कि‍चने। धधकै आहूत। पाँति‍मे जरैत दी।
धूमन आ घी जोरसँ झाेंकैत अछि‍। तँ आहूत धधकि‍ उठैत अछि‍। नि‍शि‍भाग अन्‍हरि‍या राति‍मे धरमडीहीवालीक चेहरा चमकि‍ उठैत छै। नमरह-नमहर खुगल केश। पैघ-पैघ आँखि‍मे नीनक छाँह। जेना नि‍शाँमे मातल होइ। अधभि‍ज्‍जू साड़ीसँ देहक कि‍छु भाग झाँपल, कि‍छु भाग उघाड़। बन्न होइत आँखि‍ खेलावनक गर्जनसँ चौंकि‍ उठैत अछि‍।
जय काली-वन्‍दी-जोगनी
भद्रकाली-कपाली...।

आगूमे जरैत दीप दि‍श ताकए लगैत अछि‍।
ओने नै एमहर देख। धधकैत आगि‍ दि‍श। खेलावन गरजैत अछि‍-
जेना कहै छि‍यौ तहि‍ना करैत जो। हमरा औडरकेँ अवहेलना करबै तँ अलटरबाकेँ स्‍त्री जकाँ सौंसे देह आगि‍ धधकि‍ उठतौ।
धरमडीहीवालीक ठोर सुखा रहल छै। बजतै से सट्ठा नै दै।
नै यौ भगतजी। जहि‍ना कहबै तहि‍ना करबै।
हँ, करैत जो। तइमे कल्‍याण छौ। जय काली।

ऊपर दि‍स तकैत चि‍चि‍या उठैत अछि‍।
गे छुलही गात छोड़ नै तँ जरा कऽ भसम कऽ देबौ।

भगत आँखि‍ गुड़रि‍ धरमडीहीवाली दि‍स तकैत अछि‍।
एमहर देख, हमरा दि‍स। मुँह कि‍अए गाड़ने छेँ। कलशा कऽ जल उठा कऽ पी ले।
आब हम नै पी सकब। हमरा बुत्ते नै हएत। घंटा भरि‍सँ तँ पीते छी- घोंटे-घोटे। गलामे जलन भऽ रहल अछि‍। देहम जेना आगि‍ नेश देने अछि‍। नि‍न्नसँ आँखि‍ बन्न भऽ रहल अछि‍। लगै छै जेना आसमानमे उड़ि‍ रहल छी। कहीं बेहोश भऽ जाएब तब।
चुप छुलाही देखै छी- ब्रह्म पि‍शाचक देल बेंत। ऐसँ अखने....। मन साधि‍ कऽ। पी ले। इलाज भऽ रहल छौ तँ राति‍ भरि‍ कष्‍ट हेबै करतौ।
डरे थर-थर कापैत धरमडीहीवाली कलशा उठा कऽ मुँहसँ लगा लेलक। साड़ी छातीपरसँ ससरि‍ गेल। भगत जीक आँखि‍ नाचए लगल।
कामनाक चि‍ल्हौड़ सुनहट पाबि‍ गन-गना कऽ उड़ए लगल। स्‍पर्शक लेल हाथ आतुर भऽ गेल। मन बन्‍धन मुक्‍त भऽ बनमे बौआए गेलै।
कलशाक बचल नीरसँ अपन पि‍यास मेटबए लगल।
श्राद्ध कर्म एक मास पहि‍ने बीतलै। तहि‍यासँ अजय गप्‍पकेँ भजि‍या रहल छै कि‍न्‍तु कुछो पता नै लगि‍ रहल अछि‍। ओकर भौजाइ कखनो जोगनी जकाँ प्रगट भऽ जाइ छै तँ कखनो भूत जकाँ अँगनासँ नि‍प्पता भऽ जाइ छै। परसू शीलाक गपसँ ओकर माथा ठनकल जखैनसँ धर्मडीहीवाली आ भगतक खि‍स्‍सा ओ सुनलक तखैनसँ जेना ओकरा देहमे आगि‍ नेश देलकै।
अरे तोरी के। पूरा टज्ञेलकेँ सुधारेबला ठीकेदारक घरेमे भोंकार। लाक मने-मन कहैत हेतै- अपन घर-पलि‍बार सम्‍हरबे नै करै छै आ दोसराकेँ उपदेश देने घुड़ै छै। पर उपदेश कुशल...। अँगना लेल तँ अजय बेकूफ छै। पता नै खेलावन भगत की भरने छै दि‍मागमे।

साँझेसँ अजय अपना भौजाइक चमक-दमक देखि‍ रहल छै। बि‍ना कारणे टि‍टही नै लगै छै। अजय ओकरेपर नजरि‍ गड़ौने छलै। कि‍न्‍तु छनेमे छनाक। कखैन नि‍पत्ता भऽ गेलै।
अजय टाँर्च लेलक आ सभ घरमे इजोत घुमेलक। कहाँ छै कतौ। दुआरि‍पर ओकर भाय जागेसर खोंखि‍या रहल अछि‍। अजय सोझे दौगल- गहवर दि‍स। हाय रौ तोरी। भगत गहबरसँ पार भऽ गेल छै। कतए हेतै? शीला चौबटि‍या परक नाओं कहने रहै।
घोड़ा जकाँ दौगल अजय। हकमैत चौबटि‍यापर जूमि‍ गेल आगूमे देखैत अछि‍। खेलावन भगत धरमडीहीवालीक साड़ी खोलि‍ रहल अछि‍। एहनो हालति‍मे धरमडीहीवाली साड़ीकें भरि‍ मुट्ठीसँ धेने अछि‍। चीरहरण सफल नै भऽ रहल अछि‍।
अजय लपकि‍ कऽ भगत जीक बेंत उठौलक आ तड़ाक-तड़ि‍ खेलावनक पीठपर बरसबए लगल।

ऐ अप्रत्‍याशि‍त आक्रमणक लेल भगत तैयार नै छल। ओकर दि‍मागक काज जेना बन्न भऽ गेल। तैयो पलटि‍ कऽ गरजल-
के छेँ? आइ जरा कऽ तोरा राख कऽ देबौ। जय माँ काली.....।
अगि‍ला शब्‍द ओकरा मुँहसँ नै नि‍कलि‍ सकल। फटा-फट बेंत ओकरा कपारेपर खसए लगल। छड़-छड़ा कऽ कपारसँ लहु बहए लगलै। माथ पकड़ने पड़ेबाक कोशि‍श केलक। धधकैत आहूत अजय ओकरा देहपर उझलि‍ देलकै।
हौ बाप हौ। गे माइ गे। डि‍रि‍या उठल।
अजय पाछूसँ गरजल-
ठहर सार, आइ सभटा तंत्र-मंत्र तोरा पाछाँसँ भीतर ठूसि‍ दै छि‍यौ।
हौ बाप आब मरि‍ जेबइ हौ। कहैत लंक लऽ कऽ भागल भगत।
अजय कि‍छु दूर रबारलक। फेर आपस आबि‍ धरमडीहीवालीकेँ सम्‍हारि‍ कऽ उठौलक कहुना घिसि‍याबैत टोल दि‍स चलि‍ देलक।
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 जगदानन्द झा 'मनु'
ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीह्टोंल, मधुबनी
विहनि कथा

 माड  बाडहैन तेसरो बेटीए 
हेमंत बाबूक बेटी रोशनी, अपन नामक अनुरूपे अपन कृतीक पताका  चारू कात लहराबति, आईएएस केँ परीक्षा में भारत वर्ष में प्रथम दस में अपन स्थान अनलथि | समाचार सुनि हेमंत बाबू दुनू परानीक   प्रशन्नताक कोनो ठीकोने नइँ | जे सsर सम्बंधी आ समाजक लोक सुनलनि सेहो सभ  दौड-दौड आबि हेमंत बाबूकेँ बधाइ दैत | रोशनी बड्डका जेठका सभ केँ प्रणाम करैत आशीर्वाद लैत |  
फूलो काकी फूल जकाँ हँसैत- बजैत एलि, रोशनी हुनक दुनू पैर पकरि आशीर्वाद लेबैक लेल झुकलि | फूलो काकी रोशनी के अपन करेजा सँ लगबैत टपाक सँ बजलि- 
"हे यौ हेमंत बौआ, अहाँक तेसर ई  फेक्लाही बेटी त ' सगरो खनदान केँ जगमगा देलक |"  
हुनकर  एहि गप्प पर सभ कियो ठहाका मारि क ' हँसय लागल मुदा हेमंत बाबूक आई सँ एक्किश बर्ख पाछूक यादि में विलीन भय गेला - -
दुटा बेटी भेला बाद कोना ओ बेटाक इक्षा में मंदिरे -मंदिरे  देवता पितर केँ आशीर्वाद लेल  भटकैत   रहथि | मुदा  हुनकर सबटा मेहनत बेकार भेलनि जखन हुनक कनियाँक तेसर प्रसब पीड़ा केँ बाद फूलो काकीक  अबाज हुनकर कान में परलनि -"मार बाडहैन ई तेसरो बेटीए जन्म लेलक....."
एहि  बातक आँगा हुनका किछु नहि सुनाई देलकैंह | जेना की अपार दुख सँ मोन में कोनो झटका लागल होइन, ओ अपन जगह पर ठार केँ ठारे रहि गेल रहथि    |




 - की भगवती हमर घर एती ?

मोहंती बाबा | सगरो गामक बाबा | गाम में सब हुनका बाबा कहि कय संबोधित करै छनि जेकर कारण छैक  हुनकर बएस  | पनचानबे बर्खक मोहंती बाबा अपन कद काठी आ डीलडोल सँ एखनो अपन उम्र केँ पछुआबैत, लाठी टेक क ' गामक दू चक्कर लगा क ' आबि जाई छथि | मुदा अपन गाम भगवतीक दर्शन करैक हेतु कहियो नहि जाई छथि | गाम में बनल विशाल भगवतीक मंदिर, भगवती बड्ड जागरन्त चारू कातक बीस गाम में भगवतीक महिमाक चर्चा छैन्ह | गामक मानयता केँ हिसाबे गामक  सब कियो एक ने एक बेर भगवती घर दर्शन हेतु अबश्य जाई जै छथि
गर्मीक छुट्टी में बाबाक पोता जे की दिल्ली में कोनो प्रतिष्ठित काज करै छला, गर्मी बिताबै आ आम खेबाक इक्छा सँ गाम एला | ओहो गामक परम्पराक निर्वाह करैत भगवतीक दर्शन कय क' एला | एला बाद दलान पर बैसल बाबा संगे गप सप होइत रहलै | गपक बिच संजय बाबा सँ पुछलाह-" बाबा अहाँ भगवती घर नइँ जाई छियैक |"
बाबा -"नइँ"
संजय -"किएक"
बाबा -"हौ बौआ, भगवती घर त' सब कियो जाइत अछि, मुदा भगवती केकरो-केकरो घर जाइ  छथिन | हम अपन मन आ स्वभाब केँ एहेन बनाबैक प्रयास में छी जे भगवती हमर घर आबथि |"
संजय बाबाक मुँह सँ एहेन दार्शनिक गप सुनि अबाक रहिगेल आ सोचय लागल जे की ओकर मन आ स्वभाब  एहेन छैक जे कहियो  भगवती ओकर घर एती ? आ ओकर अबाक रहैक कारण रहै सायद नइँ


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 अतुलेश्वर
सोचब आवश्यक जे......

मिथिला शब्द ककरो लेल अपरिचित नहि, अपने देश वा विदेशक कोनो कोनमे चलि जाउ मात्र मिथिलाक छी कहब तँ ओ अहाँक परिचय बुझि जएताह। सभक मोनमे स्वत: आबि जएतनि जतए राजा जनकक राज-दरबार छल, जतए जनकनन्दनी सीताक जन्म भेल छल, जे महाकवि विद्यापतिक जन्मस्थान थिक। हमरा मोन अछि हम जखन बहुत छोट रही तँ जनकपुरमे एक बेर कोनो धार्मिक समारोह भेल रहए, जाहिमे एक दिस जतए साधुलोकनि जुटल छलाह तँ दोसर दिस बहुतो विद्वान लोकनि सेहो। ओहि मध्य एकगोट विद्वान कहलथिन्ह जे ओ जखन मास्को गेल छलाह तँ ओतए रामायण, महाभारतक सङ-सङ विद्यापतिक पदावली सेहो भेटल छलनि। सभास्थ ओ कहलथिन्ह जे ओतए एकटा पाठक ओहि पदावलीक विषयमे अपन टिप्पणी देने रहथिन्ह जे मैथिली मधुर भाषा नहि अछि। हुनक ओ उक्ति सुनि हमर बालमोनकेँ बड़का झटका लागल, कारण हमर घर मिथिला-मैथिल-मैथिलीक लेल पूर्ण रुपेँ समर्पित छल, जतए आन-आन भाषा मात्र पाहुन भए अबैत छल,  ओहि परिवेशमे बहैत बसात सभ किछु मैथिलीक लेल छल आ तेँ हमरा ओ उक्ति सुनि बड़ चोट लागल छल। मुदा किछु क्षणक विरामक बाद ओ विद्वान आगाँ बजलाह जे मैथिली मधुर नहि, सुमधुर भाषा थिक आ हम आइ ओहि धरती पर आयल छी जतुक्का भाषा सुमधुर अछि जे माँ सीताक पर्यायवाची शब्द थिक।
हुनक ओ कहब हमर बालमनमे पैसि गेल आ हम निश्चय कए लेल जे आबसँ हम अपन परिचय मिथिलाबासीक रुपमे देब। ओ क्षण आयल, जखन हम पहिल बेर मिथिला सँ बाहर पूर्वोत्तरक राज्य असम पहुँचलहुँ। हमरासँ पूछल गेल ओएह प्रश्न आ हमर उत्तरो पूर्व सोचक अनुसारहिँ निकलल। हमर उत्तर सूनि ओ लोकनि सहजहिँ चर्च प्रारम्भ कए देलनि राजा जनक ओ हुनक जगत्जननी सुपुत्री सीताक, अद्वितीय महाकवि विद्यापतिक आ बहुतो मनीषीलोकनिक। हमर छाती गौरवसँ तनि गेल। हमरहि सङ रहथि एकगोट बिहारी मित्र, जे परिचयमे बिहारी शब्द जोड़लन्हि आ विभिन्न तरहक तानासँ ग्रस्त भए गेलाह। केओ चारा घोटालाक विषयमे जिज्ञासु भए गेलाह तँ केओ लालू माहात्म्यमे, केओ दरिद्रताक विषयमे सोचब प्रारम्भ कएलनि तँ केओ ट्रेनक चोड़ीक खिस्सा, जतेक मूह ततेक खिस्सा। एहि प्रसङकेँ उठएबाक कारण अछि हमर-अहाँक सोचक विषयमे किछु सोचब। मिथिलाकेँ बिहारीपनसँ तँ जुझए पड़ैत छैक, मुदा जखन खोआ-राबड़ी-अमिरतीक गप्प अबैत अछि तँ मिथिलाकेँ ताहूसँ वंचिते रहए पड़ैत छैक, ई किएककी! मैथिलमे पौरुषक कमी आबि गेल अछि वा हमसभ एखन धरि अपन अधिकारक महत्तेकेँ चीन्हि नहि सकलहुँ अछि? वा आने कोनो गप्प, मुदा एतबा अवश्य जे हमसभ एखनहुँ दही-चूड़ा-चीनीमे लटपटाएल छी। मिथिलाक स्वर्णीम इतिहास, ओहि ठामक अद्वितीय बौद्धिक प्रकाश, मिथिलाक सांस्कृतिक प्रवासमे आबि आन सभ केओ अपनाकेँ भाग्यशाली बुझैत छथि, मुदा ई क्षेत्र सब दिनसँ अपनहिँ द्वारा ठकल गेल अछि, अपनहिँ द्वारा साधल गेल अछि, ई किऐक? एकरहि फरिछएबाक हेतु जखन एहि ठामक मिथिला राज्य आन्दोलनक अभिप्राय विषय पर विषय-वस्तु ताकब प्रारम्भ कएल तँ एकटा आलेख भेटल- हिन्दी भाषा मे अलग राज्य की माँग क्यों सन्दर्भ मिथिला ओहि मे बिहारक प्रशासन आ मीडियाक मानसिकताक पर संजय मिश्र लिखने छथि-  “सन्दर्भ की बात चली तो थोड़ी बात बिहार की कर लें .......मिथिला के मानस के उद्वेग की। आपके जेहन में उमड़ रहे कई सवालों के जवाब शायद आप तलाश पायें। मिथिला इसी राज्य बिहार का एक अंग है। पौराणिक-एतिहासिक मिथिला का दो-तिहाई हिस्सा बिहार में और शेष नेपाल में पड़ता है। कभी मौक़ा मिले और समय हो तो बिहार के हुक्मरानों के भाषण सुने। इन्हें ही क्यों ....बिहार की मीडिया पर भी नजर गड़ाएं । बिहार की महिमा का जब ये बखान करते तो भगवान् बुध ही इन्हें नजर आते। भगवान् महावीर कभी-कभार याद आते....पर जनक नहीं...माता सीता नहीं। मिथिला का स्मरण करा दें तो इनकी भावें तन जाती। इस इलाके की मिटटी, पानी, हवा...ये सब बिहार की संपदा हुई पर ' मिथिला' शब्द और यहाँ के लोगों से परहेज। यहाँ की विरासत पर गर्व करने की बजाए इन्हें शर्म का अनुभव क्यों ?  आगू लिखने छथि जे - सूना होगा आपने की मैथिली भाषा संविधान की आठवीं सूची में दर्ज है...वो साहित्य अकादमी में भी है। यानि इन जगहों पर बिहार का मान बढ़ा रही । पर क्या राज्य के शाषकों को इस पर नाज है ? हर सेन्सस रिपोर्ट में मैथिली भाषियों की संख्या कम बताने की इनकी साजिस क्या किसी से छुपी रह गई है ? थोड़ा पीछे जाएं...शिव पूजन सहाए जैसे ख्यातिलब्ध साहित्यकारों ने मैथिली की परिचिति खत्म करने का बीड़ा क्यों उठाया था ? पाठ्यक्रमों से मैथिली को बार-बार हटाने के कुचक्र क्या राजकीय गर्व का अहसास हैं? मैथिली जब आठवीं अनुसूची में शामिल की गई तो राष्ट्रीय टीवी चैनलों ने भी इसे प्रमुखता से दिखाया। संविधान संशोधन करना पडा था...लिहाजा ये न्यूज़ थी। लेकिन बिहार के सर्वाधिक लोकप्रिय चैनल ने इस खबर को दिखाने की जहमत नहीं उठाई। इस चैनल को बिहार की स्वर कोकिला शारदा सिन्हा की आवाज नहीं सुहाती...क्योंकि वो मिथिला क्षेत्र से आती हैं...जबकि मनोज तिवारी ' अप्पन ' बने हुए हैं। देश के किसी कोने में चले जाएं...गैर बिहारियों से बात करें। बिहार का नाम लेते ही वो भोजपुरी का जिक्र करेंगे। यही हाल इन जगहों के समझदार समझे जाने वाले पत्रकारों का है। अधिकाँश को पता नहीं की मैथिली बिहार की ही भाषा है। बिहार सरकार की गर्व की अनुभूति और काबिलियत ( ? ) का ये जीता जागता नतीजा है। पटना से छपने वाले हिन्दी के अखबारों को पलट कर देखें। हेडिंग्स और कार्टून के टेक्स्ट आपको भोजपुरी में मिलेंगे। इन अखबारों की ये किर्दानी सालों से है....अछा है...पर मैथिली में क्यों नहीं। इन्हें मिथिला का पाठक/ खरीदार चाहिए पर मैथिली नहीं चाहिए...बिलकुल वैसे ही जैसे राज्यके नेताओं को मिथिला के ' लोग ' चाहिए जिन पर सत्ता की धौंस जमाएं पर इन " लोग ' के हित की परवाह नहीं। एहि ठाम उपर्युक्त उक्ति रखबाक पाछाँ हमर ध्येय ई अछि जे हमसभ किछुओ काल लेल एहि दिशामे सोची। सोची जे, आखिर एहन मानसिकताक जन्म किएक होइत छैक? की! एकर पाछाँ मात्र एतबहि सिद्ध करब अछि जे मिथिला आ मैथिलीकेँ उचित अधिकार निरर्थक छी? की! एखनहु एकर विरोधीलोकनि इएह सोचि रहल छथि जे मैथिल मात्र चूड़ा-दहीमे विश्वास करैत छथि? की! मैथिल एखनहुँ सूतल छी, बिआह होइत अछिमे विश्वास करैत छथि? नहि तँ एहन मानसिकता किऐक? हमरा लगैत अछि जे एहि मानसिकताक पोषण भेल आर-आर तत्वक सङ दरभंगा राजालोकनिक शासनक समयमे। यदि ओ हिन्दी, देवनागरी, उर्दू, फारसी आ अंग्रेजीकेँ सम्पोषित नहि कएने रहतथि तँ आइ मिथिला-मैथिलीक ई दशा नहि भेल रहितैक। एहि प्रकारक उक्ति देबाक पाछाँ ध्येय अछि ओहि कारणकेँ ताकब, जाहि बलेँ मिथिला-मैथिल-मैथिलीकेँ उचित अधिकारसँ वंचित रखबाक साहस प्राप्त कएल जाए रहल अछि, दरभंगा राजक दूरदृष्टिक अभाव आइ धरि मिथिलाकेँ सता रहल छैक।
ओना कारण मात्र ओतबे नहि अछि। हम मैथिल जन सेहो एको पाइ कम दोषी नहि छी, एकर पाछाँ। हमसब आइओ अपन क्षेत्र-अपन मातृभाषाक प्रति सजग-सतर्क नहि भए सकलहुँ अछि, प्राय: एखनहुँ एकर महत्ताकेँ नहि आँकि सकलहुँ अछि। मिथिलाक हृदयस्थली मधुबनी जिलाक झंझारपुर विधानसभाक सदस्य श्री नीतिश मिश्र अपन क्षेत्रमे साधारणो जनसँ मैथिलीमे नहि बाजि पबैत छथि, प्राय: प्रयासो नहि करैत छथि। जँ कदाचित् केओ मैथिल एहि पर टिप्पणी करितो छथि तँ नेताजीक चमचासभ आ मिथिलाक तथाकथित बुद्धिजीवी लोकनिक उक्ति होइत छनि- आह, डाक्टर साहबेक बेटा ने छथिन, सभ दिन बाहरे पढ़लनि, तेँ ई क्षम्य अछि। औजी, मिथिलासँ बाहर पढ़बाक परम्परा मात्र मिश्रेजीक परिवारमे छनि कि आओरो लोक पढ़ि रहल छैक। जँ बाहरे पढ़ि ओहि बुद्धिकेँ प्रयोग करब छल तँ ओहि हेतु आन कतेको माध्यम छैक। मुदा, ई जननेता बनबाक लेल जनसँ जूड़ब आवश्यक आ जनसँ जुड़बाक हेतु जन-जनकेर भाषासँ जूड़ब परम आवश्यक, जन-जनकेर मातृभाषाकेँ पूरब आवश्यक। यद्यपि एहनो राजनेताक अभाव नहि जे मैथिल जनक सङ सभ दिशामे पूरि रहल छथि, नहि तँ मैथिलीक उपर उठब असम्भव छल। मुदा, एहि ठाम ई कहबामे कोनो असौकर्यक गप्प नहि जे मिथिलामे नेतृत्त्वक पूर्व अभाव अछि। केओ राजनेता एहि हेतु कृतसंकल्पितो नहि बुझाइत छथि। परञ्च, एकबेर फेर समस्या आबि ठाढ़ भए जाइत अछि हम-अहाँ साधारण मैथिलक लग। जँ सम्पूर्ण मैथिलबासी एहि हेतु कृत-संकल्पित भए उठथि तँ ककर मजाल जे मिथिला-मैथिल-मैथिलीकेँ उचित अधिकार नहि देत।
मुदा, की हमसभ एहि दिशामे साकांक्ष भए सकलहुँ अछि? हमरा तँ नहि लगैत अछि, ओना अहाँ सभक जे विचार हो। एहि बीच दरभंगा गेल रही, ओतहि रहनिहार एकटा हमर मित्रक पारिवारिक भाषा हिन्दी सुनि चकबिदोर लागि गेल। ओ अपन मैथिल पत्नीसँ हमर परिचय हिन्दीमे करौलनि आ हम हुनक मूह तकैत रहि गेलहुँ। अपनाकेँ सम्हारैत-सम्हारैत अपन परिचय मैथिलीमे देल। जँ दरभंगामे ई परिस्थिति तँ बाहरक गप्पे करब व्यर्थ। एकरा कि कहब? की, ई अपनाकेँ साधारण मैथिलसँ एक ईंच उपर देखएबाक प्रवृत्ति थिक? आ कि आने किछु। मुदा विषय अवश्य विचारणीय अछि, सोचनीय अछि। एकर पाछाँ फेर कारण तकला पर जेना बुझबामे अबैत अछि जे साधारण मैथिल अपनाकेँ मुख्य धारासँ कटैत गेलाह। एतए द्रष्टव्य थिक एकटा उक्ति, जाहिमे   डा.तारानन्द वियोगी रमेश रञ्जनक कविता संग्रह रक्त क आमुख मध्य लिखने छथि भाषाशास्त्रीलोकनि जनैत छथि जे मैथिलीक जन्म जन-बोनिहार गरीब-गुरवा द्वारा अपन सांस्कृतिक तत्वसभक अभिव्यक्ति हेतु, संस्कृतक विरोधमे भेल छल। आ वैह मैथिली आगू चलिकऽ तेहन सम्भ्रान्त आ संस्कृतिनिष्ठ बना देल गेल जे आम लोक अपन भाषा आ भावके लेल ओहिठाम कोनो जगह नहि पौलनि। मुदा, यैह मैथिली जँ संस्कृतक स्थानापन्न भऽ जइतै, एहिमे धर्म-कर्म पूजा-पाठ होबऽ लगितै, शास्त्र-चर्चा होब लागितै तँ एक बात छल। मुदा से किए? संस्कृत अपन बादशाहत तँ कायम कयनहि रहल, एम्हर मैथिली रजनी-सजनीक भाषाटा बनिकऽ रहि गेल।-  एहि उक्तिसँ आन जे किछु हो, एतबा तँ अवश्य कहल जाए सकैत अछि जे मैथिली साधारणजनसँ दूर होइत गेलीह, गुटबाजीक प्रवृत्तिसँ आहत होइत गेलीह आ तेँ अपन उचितो अधिकार प्राप्त करबासँ वंचित होइत रहलीह। अपनेसभ देखि सकैत छी जे किछु मैथिल अपनहिँ पएर पर अपनहिँ कुड़हरि भाँजि हिन्दीक सेवा लेल नाङरि ढ़ोलौने फिरैत छथि, सोच ई जे साहित्यिक प्रभाव एकहि बेरमे हिमालय पहाड़ पर चढ़ि जाएत। ई सभ यथार्थकेँ बिसरि जाइत छथि जे हिन्दीक समृद्धिमे अछि मैथिलीक भूमिका। जँ आइ मैथिली हिन्दीक उपेक्षा करए लागय तँ हिन्दीक स्थिति मिथिलामे सेहो पूर्वोत्तर आ दक्षिण जकाँ भए जाएत, जतए हिन्दी प्रसार समिति आ कि-कि ने खोलए पड़ि रहल छैक। मुदा हमरा लोकनि तँ अपन अस्मिताकेँ ताक पर राखि दोसराकेँ सहेजबामे विश्वास करैत छी, अपन सबकिछु न्योछावर कए दोसराकेँ जीवन दए गर्वक अनुभव करैत छी।
 स्मरण अबैछ सद्य: बीतल ओ दिन, जनकपुर मे मिथिला संघर्ष समिति लेल आन्दोलनक समय बम बिस्फोटमे पांच गोटए शहीद भेल, जाहिमे एकटा मिथिलाक रंगकर्मी रञ्जु झा सेहो छलीह। ओ आइ धरि बिना कोनो स्वार्थकें मैथिली आ मिथिलाक लेल लड़ैत रहलीह आ अन्तमे मिथिलाक लेल अपन बलिदान तक दए देलन्हि, मुदा नेपाली मिडिया खास कए कान्तीपुर मात्र, हुनका प्रति श्रद्धाञ्जलि अर्पित करब अपन कर्त्तव्य बुझलक। एहन बलिदानीक हेतु नेपाल आ भारतक कोनो वरिष्ठ साहित्यकार किछु नहि बजलाह। कोन कारण छल जे भारतीय साहित्यकारलोकनिक सङ नेपालक साहित्यकारलोकनिमे सँ डा.राजेन्द्र प्रसाद विमल, प्राज्ञ रामभरोस कापड़ि भ्रमर, श्री अयोध्या नाथ चौधरी आ महेन्द्र मलंगिया आदिक कोनो वक्तव्य प्रकाशमे नहि आएल? आइ काल्हि छोट सँ छोट खबरि मीडिया मे रहैत अछि, मुदा हिनकालोकनिक संवेदनायुक्त कोनो समाद कतहु देखबामे नहि आएल। पता नहि एकर पाछाँ कोन असंमजसता छलनि। किछु व्यक्तिक सोच छनि जे हमरासभकेँ राजनीतिक सहयोगक आवश्यकता अछि। मुदा, वाह रे ! अपनेक मानसिकता। जाहि राजनेताकेँ हम-अहाँ बनबैत छी ओ सहायता करताह तखन हम डेग उठायब, की उचित? हमरातँ बुझबामे आबि रहल अछि जे किछु एहि प्रकारक लेखक आ साहित्यकार मैथिलीक प्रतिनिधित्व क रहल अछि जनिक मानसिकतामे मिथिला आ मैथिली सँ बेसी अपन हित छनि, अपन अस्तित्वक चिन्ता छनि। मुदा एहन-एहन व्यक्तिक चर्चासँ घबड़एबाक गप्प नहि छैक, कारण आइओ धीरेन्द्र प्रेमर्षि, श्याम सुन्दर शशि, का. रामचन्द्र झा, प्रा. परमेश्वर कापड़ि, गायक सुनील मल्लिक, प्राज्ञ रमेश रञ्जन, का. रोश जनकपुरी सनक लोक नेपालमे सक्रिय छथि जनिक कृतित्त्व आ व्यक्तित्वसँ मिथिलाकेँ गर्व करबाक अवसर बेर-बेर भेटैत रहैत अछि, मुदा प्रश्न ठाढ़क ठाढ़े अछि जे की हमसभ अपन मातृभाषाक लेल कृतसंकल्पित छी?  

 
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१.डॉ. इन्‍दुधर झा-दू-पत्र : एक वि‍श्लेषण २.डॉ॰ शशिधर कुमर विदेह”- पोथी समीक्षा - अम्बरा

डॉ. इन्‍दुधर झा
मैथि‍ली वि‍भाग
ल.ना.ति‍. महावि‍द्यालय मुजफ्फरपुर।
दू-पत्र : एक वि‍श्लेषण
दू-पत्र वस्‍तुत: पत्रात्‍मक शैलीमे लि‍खल मैथि‍लीक पहि‍ल उपन्‍यास थि‍क। मात्र दू गोट पत्रमे समाएल समग्र कथानक। मात्र दू गोट पत्रमे भारतीय नारीक नि‍श्छल, ि‍नर्मल, शालीन ओ प्रौढ़ चि‍त्रांकन। पहि‍ल पत्र अपन स्‍वामी सुरेन्‍द्रकेँ लि‍खने छथि‍ श्रीमती इन्‍दू देवी आ दोसर पत्र एक अमेरि‍कन महि‍ला जेसि‍का द्वारा अपन भारतीय मि‍त्र रमेशक नामे लि‍खल गेल अछि‍। मात्र चारि‍ गोट पात्रक प्रयोग ऐ उपन्‍यासक एक अलग वि‍शेषता अछि‍। सुरेन्‍द्र ि‍नर्विवाद रूपेँ ऐ उपन्‍यासक नायक छथि‍, आ नायि‍का भारतीय नारी श्रीमती इन्‍दू देवीकेँ सेहो कहि‍ सकैत छी आ एक अमेरि‍कन महि‍ला जेसि‍काकेँ सेहो। रमेश छथि‍ मुख्‍य सह-नायक। इन्‍दग देवीक दूर-दराजे सम्‍बन्‍धी भाए आ सुरेन्‍द्रक सार।

कथानक
दू गोट पत्रक माध्‍यमसँ जे मुख्‍य कथानक पाठकक मन:चेतनापर चि‍त्र उकेरैत अछि‍ से ई जे सुरेन्‍द्र अपन बाइसम वर्षक अवस्‍थामे पन्‍द्रह वर्षीय इन्‍दूसँ अपन पूर्ण सहमति‍सँ वि‍वाह कएने छथि‍, जकर माध्‍यस्‍थता आंशि‍क रूपेँ कएने छथि‍ रमेश। रौराठ-सभासँ वि‍आह नि‍श्चि‍त भेल छल। सुरेन्‍द्र इन्‍जीनि‍यरि‍ंगक चारि‍म वर्षक छात्र रहथि‍ आ इन्‍दू नवम वर्गक छात्रा। ओना इन्‍दू दू वर्ष पहि‍नहि‍ गामक स्‍त्रीगण समालक मध्‍य अजग्‍नि‍ सन भऽ गेल रहथि‍ मुदा ओइ सभामे दुनू भाँइ मीलि‍ कथा स्‍थि‍र कऽ लेने रहथि‍। सुरेन्‍द्रक बि‍आह पूर्ण मैथि‍ल रीति‍ऍं इन्‍दूसँ भेलनि‍।

इन्दू, माने श्रीमती इन्‍दू देवी, आब दू बच्‍चाक माए छथि‍ आ सुरेन्‍द्र अमेरि‍कामे रमि‍ गेल छथि‍। आब तँ नअ वर्षसँ कोनो सम्‍पर्क नै रहि‍ गेल छन्‍हि‍, मात्र दू-आखर चि‍ट्ठीक सम्‍पर्क छोड़ि‍ कऽ। असह्य पीड़ासँ झामरि‍ भऽ गेलीह अछि‍। बि‍आहक बाद दू-चारि‍ वर्ष धरि‍ तँ सुरेन्‍द्रकेँ इन्दूसँ दाम्‍पत्‍य प्रेम छलनि‍ आ तकरहि‍ परि‍णाम भेल रहनि‍ दू गोट सखा-सन्‍तान मुदा तँए कि‍ आब तँ अमेरि‍काक एक गौरांगी रमणीक रंग तेनामे तेना ओझराएल छथि‍ जे सम्‍बन्‍ध-वि‍च्‍छेदक प्रस्‍ताव इन्‍दू  देवीकेँ पठओने छथि‍। असलमे पहि‍ल पत्र सुरेन्‍द्रक सम्‍बन्‍ध-वि‍च्‍छेदक प्रस्‍तावक जबाब अछि‍। अपन लोक-वेद, घर आंगन, इष्‍ट-परि‍जनसँ नि‍स्‍पृह भेल नअ वर्षसँ अमेरि‍कामे रहैत अपन जीवन, इच्‍छा-आकांक्षाक एकमात्र आधार, सोहाग-भागक अधि‍ष्‍ठाता, सुख साम्राज्‍यक स्‍वामी, अग्‍नि‍-साक्षि‍त पति‍ सुरेन्‍द्रकेँ लि‍खल हुनक प्रत्‍यागमनक बाट तकैत, पलकक सेज सजौने, वि‍रहाग्‍नि‍मे तड़पैत श्रीमती इन्‍दू देवीक पत्र।

ओना जेसि‍का प्रभावि‍त छथि‍ सुरेन्‍द्रसँ। तहूसँ पहि‍ने रमेशसं भेँट पहि‍ने हुनका सुरेन्‍द्रसँ होइत छन्‍हि‍ आ प्रभावि‍त जे होइत छथि‍ सेहो सुरेन्‍द्रहि‍सँ मुदा अचानक जे रमेश इण्‍डि‍या अबैत छथि‍ तँ रमेशसँ सेाहे प्रभावि‍त भऽ जाइत छथि‍। मुदा रमेशमे भारतीयता ततेक ने वेशी देखैत छथि‍ जेसि‍का जे क्रमश: भारतीयतासँ प्रभावि‍त होइत गेलीह आ रमेशसँ दूरी बनैत गेलनि‍। मुदा इन्‍द्र देवीकेँ वि‍च्‍छेदक प्रस्‍ताव पठौलाक उपरान्‍त सुरेन्‍द्र जेसि‍काक समक्ष अपन मोनक बात स्‍पष्‍ट कऽ देलनि‍। जेसि‍कासँ पहि‍ल भेँट सुरेन्‍द्रकेँ जर्मन क्‍लासमे भेल रहनि‍। दुनूक आवासमे मात्र चारि‍ ब्‍लाकक अन्‍तर रहनि‍। दुनू असगर रहथि‍। मोन मनएबाक हेतु एक-दोसराक घर आबए-जाए लागल रहथि‍। जेसि‍का सुरेन्‍द्रक ओहि‍ठाम जाए भानस भात सेहो करथि‍, कारण, सुरेन्‍द्रकेँ तकर अवगति‍ नै रहनि‍ आ ऐ बातसँ जेसि‍का मि‍श्र रहथि‍। संग उठनाइ-बैसनाइ, पार्क घुमनाइ, सि‍नेमा देखनाइ आदि‍ बात तँ सहजे होमए लगलनि‍। सुरेन्‍द्रक संग जीवन बि‍तएबामे जेसि‍काकेँ कोनो तरहक आपत्ति‍ नै रहनि‍, से ओ मोने-मोन जनैत रहथि‍ आ तँए जे सुरेन्‍द्र इन्‍दू देवीसँ वि‍च्‍छेद आ हुनका संग सम्‍पर्कक प्रस्‍ताव स्‍पष्‍ट कऽ देने रहथि‍न आ संगहि‍ हुनक सम्‍मति‍ मंगने रहथि‍न से जेसि‍काकेँ अस्‍वाभावि‍क नै लागल नहनि‍। जेसि‍का ई जनैत रहथि‍ जे सुरेन्‍द्र पहि‍नौं भारतमे बि‍आह कएने छथि‍, संगहि‍ सुरेन्‍द्रक ऐ तर्कसँ, जे आब वि‍गत नअ वर्षसँ हुनका अपन पत्नीसँ कोनो संपर्क नै छन्‍हि‍ सेहो सहमत रहथि‍ आ सुरेन्‍द्रसँ सम्‍बन्‍ध स्‍थापि‍त करबामे एकरा कोनोटा बाधा नै बुझैत रहथि‍, कारण अमेरि‍की संस्‍कृति‍मे एकर कोनो मूल्‍य नै छैक। मुदा रमेश जे अपन छोट-छीन पत्रक संग सुरेन्‍द्रक नामे लि‍खल इन्‍दू देवीक विस्‍तृत पत्रक अंग्रेजी अनुवाद जेसि‍काकेँ पठओने रहथि‍न तकरा पढ़ि‍ जेसि‍का कि‍ंकर्त्तव्‍यवि‍मूढ़ रहथि‍। एखन इन्‍दू देवीक अंग्रेजी अनुवाद हाथमे अएलनि‍ तँ भारतीयताक असली स्‍वरूपसँ अवगत भेलीह। ओहुना भारतीय आचार-बेवहार, रीति‍-रेवाज, धर्म-कर्म आदि‍सँ प्रभावि‍त रहबे करथि‍।

क्रमश:  
२.
डॉ॰ शशिधर कुमर विदेह”    
पोथी समीक्षा - अम्बरा

                  कोनहु भाषाक जिबैत होयबाक प्रमाण की ? इएह जे जाहि क्षेत्र विशेष मे ओ भाषा बाजल जाइत अछि ओहि क्षेत्रविशेष केर हरेक व्यक्ति (वा अधिकांश व्यक्ति) ओहि भाषा केँ अपन मातृभाषाक रूप मे बजैत हो । हरेकमतलब हर वर्गविशेषक लोक चाहे ओ कोनहु वयसमूहक होचाहे ओ कोनहु जातिक हो, चाहे ओ कोनहु धर्मक हो अथवा कोनहु व्यापार / व्यवसाय सँ जुड़ल हो । मात्र बजैत हो - सएह टा नञि, अपितु ओहि भाषाविशेष मे अपन रचनात्मक ओ सर्जनात्मक योगदान सेहो करैत हो । मैथिलीकेँ सम्पुर्ण रूपेँ ई सौभाग्य आइ धरि कहियो नञि भेँटि सकल ।

               एक दिशि, कोनहु एक समूहकोनहु दोसर समूहकेँ मैथिली नञि बाजय देलखिन्ह वा नञि पढ़ए - लिखए देलखिन्ह आ मैथिलीकेँ अपन बपौती सम्पत्ति बना कऽ रखलन्हि । दोसर दिशि, चुँकि पहिल समूहमैथिली केँ अपन बपौती सम्पत्ति कहि देलन्हि तेँ दोसर समूहसेहो मैथिली बाजब वा मैथिली पढ़ब लिखब छाड़ि देलन्हि । मैथिलीक लेल ई परम दुर्भाग्यक गप्प रहल । घऽर - घरारी आ सम्पत्तिक बँटवारा भऽ सकैत छै, माएक नञि; मैथिल लोकनि केँ से बात बुझबा मे बहुत विलम्ब भेलन्हि । कारण जे हो, पर माए मैथिलीकेँ ई सौभाग्य आन समकक्ष भाषाक अपेक्षा बहुत काल धरि नञि भेँटि सकलन्हि ।

                  सम्प्रति खुशीक बात ई जे पछिला किछु वर्ष सञो समय बदलल अछि आ हरेक वर्गविशेषक लोक अपन रचनाशीलता सँ माए मैथिलीक आँचर भरि रहल छथि । शुरुआत मे गति बहुत सुस्त छल आ श्री विलट पासवान विहंगमवा स्व॰ फजलुर्रहमान हासमीजी सन एक आधहि टा नऽव नाम देखबा मे अबैत छल पर आइ एहेन नाँव सभक संख्या बहुत तेजी सञो बढ़ल अछि । एहने एक गोट वरिष्ठ रचनाकार छथि श्री राजदेव मण्डलजी । आइ हुनिकहि लिखल एक गोट काव्य संग्रह अम्बरा केर समिक्षा लऽ कऽ हम अपनेक सोझाँ उपस्थित छी ।

               “अम्बरा” - रचनाकारक गोटेक पचहत्तरि टा काव्य रचना केँ अपना मे समाहित कएने अछि । सभटा कविता अमित्राक्षर छन्दमे अछि । पर डेरएबाक काज नञि; “अमित्राक्षर छन्द रहितहुँ मित्राक्षर छन्दकेर रचना सन प्रतीत होयत आ पढ़बा मे ओहने लयबद्ध आ रुचिगर लागत । यथा :-

अहाँ कहैत छी कायर बनबसँ नीक
हिंसक भऽ जाएब से अछि ठीक
लोक कहत - वाह-वाह
किन्तु हमरा लगैत अछि ई अधलाह ......................... अहिंसक वीर

              बिनु उचित शब्द केर भाव मरि जाइत अछि आ बिनु भावक शब्द तँ शब्दकोशहि बुझू । पर ई दोष एहि कविता संग्रह मे कतहु देखबा मे नहि आओत । उचित शब्द ओ समीचीन भाव केर अजगुत संगम देखबा मे अबैछ । जेना कि

तप्त रेतपर
फरफड़ाइत माछ
कानि कानि
कऽ रहल नाच
रेतापर फाड़ैत चीस
उड़बाक लेल आसमान दिश
अभागल
देहसँ झड़ए लागल
चाँदीकेँ कण
झूमि उठल
कतेको आँखिक मन
जरि रहल माछक तन ........................ बाउल परक माछ

               सम्पुर्ण काव्य रचना विशुद्ध खाँटी मैथिली मे थिक; हँ कत्तहु कत्तहु किछु हिन्दी शब्दावलीक प्रयोग ठीक सँ मेल नञि खाइत अछि, पर से अत्यल्प । भाषा बहुतहि सहज ओ स्वभाविक थिक आ ताहि कारणेँ पढ़बा काल घटनाक्रम वा वर्णित विषय पाठककेँ अपना समक्ष घटित होइत प्रतीत होएतन्हि । जेना कि देखल जाओ

शब्द नहि रहल दिलक बोल
तेँ नहि रहल ओकर मोल
......................... .................
बजैत रहैत छी अमरीत बोल
भीतर रखने बीखक घोल ......................... दिलक बोल

                  कोनहु साहित्य मे जँ विविधता नञि हो तँ ओ सम्पुर्ण नञि कहबैछ । जहिना भोजन मे षड्‌रस केँ भेनाइ आवश्यक तहिना साहित्य मे नवरस ओ तकर उपरस सभक समावेश परमावश्यक । मात्र शिंगार ओ भक्ति रसोपरस सँ साहित्य समग्र नञि भऽ सकैछ एहि प्रकारक साहित्य श्रृजन एकभगाह ओ असन्तुलित कहबैछ । अम्बरामे ई दोष नञि । एहि छोट क्षिण काव्य संग्रह मे बहुत अधिक विषय - वैविध्यथिक । हरेक रचना भाव स्वभाव मे एक दोसरा सँ भिन्न । आ इएह एकर सभसँ पैघ विशेषता थिक । एक दिशि जातिहम फेर उठबसन रचना जञो सामाजिक वैषम्य पर प्रहार करैछ तँ दोसर दिशि ज्ञानक झण्डासन कविता समाज मे पसरल अंधविश्वास आ अशिक्षा पर । कमजोर वा दलित व्यक्तिक मनोदशाक केहेन मार्मिक चित्रण कएल गेल अछि से देखू

टप टप चुबैत खूनक बूनसँ
धरती भऽ रहल स्नात
पूछि रहल अछि चिड़ै
अपना मन सँ ई बात
आबऽ बाला ई कारी आ भारी राति
कि नहि बाँचत हमर जाति ..... ? ......................... चीड़ीक जाति

        “हथियारक सभाअहिंसक वीरसन रचना कोनहु समस्याक शान्तिपुर्ण समाधान करबा पर ओ अहिंसा पर जोर दैछ आ अनेरोक रक्तपात व नक्शलवादी प्रवृत्ति केँ विरोध करैत बुझना जाइछ । देखल जाओ

सुनह लगाबह ध्यान
खोलह अपन अपन कान
तब भेटतह आजुक सम्मान
बिनु देहसँ गिरौने रकत
कऽ सकैत छह दोसर जुगत
................................................ .........
बिनु हिंसाकेँ जे कएने होयत हृदयपर राज
ओकरे भेटत ई अमूल्य ताज ........................ हथियारक सभा

           एहि पोथी मे मुनियाँक चिन्ताकथीक गाछनामक बालकविता सेहो अछि, जाहिमे बहुत सुन्नर ढंग सँ बाल मनोभाव केँ व्यक्त कयल गेल अछि । मुनियाँक छोट भाए केर जन्म भेलै, पूरा परिवार खुशी मना रहल छल आ मुनियाँ कानि रहलि छलि । पुछला पर की उत्तर भेटलैक से अपनहु सभ सुनू

ई तँ छै खुशीक बात
जनमल तोरा भाए
कतेक खुशी छह तोहर माए
दादी, सबटा जानै छी
हम ओहि लए नहि कानैत छी
चिन्ता अछि हमरा आब के कोराकेँ लेत
दूधो माए पिबऽ नहि देत ........................ मुनियाँक चिन्ता

                 “गाछक हिस्सागाछक बलिदानपर्यावरण असन्तुलन ओ तकर रक्षण दिशि ध्यानाकृष्ट करैछ जखन कि मनोवाणछित चानपरेमक अधिकारकिञ्चित् शिंगार रसक कविता थिक । बाढ़िक चित्रनामक कविता मे २००८ ई॰ मे कुसहा लऽग टुटल कोसीक बान्ह सँ आयल बाढ़िक बहुत मर्मस्पर्शी आ सजीव चित्रण कयल गेल अछि । किछु अंश द्रष्टव्य थिक

एहसरि
अर्धनग्न स्त्री
परिश्रान्त
मुख क्लान्त
बैसल अछि धारक कात
देह स्नात जिअत अछि कि मुइल
साइत सोचि रहल अछि इएह बात
एखनहि निकलल अछि
संघर्ष कऽ बाढ़िक धारा सँ ........................ बाढ़िक चित्र

      सम्प्रति मैथिली साहित्यक दशा दिशा, मैथिलीक प्रति कविक प्रतिबद्धता ओ ताहि सन्दर्भ मे देल गेल स्पष्टीकरण देखल जाओ

दोसरोक माय
अछि हमरे माय
तँ कि यौ भाय
अपना मायकेँ बिसरि जाइ
..........................................
मैथिलीक अछि असीम भण्डार
एहि बात केँ हम सोचि ली
घर भरल हो जखन
दोसरासँ किएक पैंच ली
राखि संतोष करी उपाय
की यौ भाय । ........................ माय

               ओना तँ हरेक कविता चर्चाक अपेक्षा रखैत अछि पर से सम्भव नञि । जहिना भात सीझलै कि नञि से ओहि मे सँ मात्र एक टा दाना केँ छूबि अन्दाज लगाओल जा सकैछ आ तहिना उपरोक्त किछु उदाहरण सभ सँ समग्र पोथीक अनुमान । व्याकरण केर दृष्टिकोन सँ एहि पोथीक एक गोट खास विशेषता अछि जे विभक्ति (कारक चिन्ह वा शब्द) प्राचीन मैथिली जेकाँ मूलशब्द केर संगहि लिखल गेल अछि ।* अन्त मे मैथिलीप्रेमी पाठक लोकनि सँ एतबहि कहए चाहबन्हि कि ई कविता संग्रह हुनिका आशा सञो बेसी रुचिगर लगतन्हि ।

पोथीक नाँव :– अम्बरा ( मैथिली कविता संग्रह)
लेखक :– श्री राजदेव मंडल
प्रकाशक
:– श्रुति प्रकाशन ८/२१, भूतल, न्यू राजेन्द्र नगर, नई दिल्ली - ‍११०००८
दाम :– ‍१०० टाका मात्र


* प्राचीन मैथिली मे संस्कृतक प्रभावक कारणेँ कारक चिन्ह वा विभक्ति मूलशब्दक संगहि लिखल जाइत छल । आधुनिक मैथिली मे बहुधा फुटका कऽ लिखल जाइत अछि अथवा मिश्रित स्वरूप मे ।  मिश्रित स्वरूप - माने कि किछु कारक चिन्ह संग मे (यथा कारणेँ) आ किछु फुटका कऽ (यथा चौकी पर) । संस्कृत मे विभक्ति चिन्ह वा शब्द नञि होइत अछि अपितु मूल शब्द मे विकार उत्त्पन्न कए शब्द वा धातु रूपबनाओल जाइत अछि तेँ ओ हमेशा मूलशब्दक संगहि रहैछ । पर मैथिली समेत आन आधुनिक भारतीय आर्यभाषा सभ मे ई शब्दविकृति वा धातु विकृति नञि होइछ (अधिकांशतः) आ तेँ कारक केर विभक्ति निरूपनार्थ अलग आखर वा शब्द होइत अछि ।

 
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:: दुर्गानन्‍द मण्‍डल
टैगोर साहि‍त्‍य पुरस्‍कारक बहन्ने

तारीख 10/6/2012 दि‍न रवि‍, ि‍नरमलीसँ पटना जेबाक हेतु, स्‍थानि‍य मि‍लानपथसँ संध्‍या 8 बजे सरकारी बस द्वारा गोसाइ-पीतरकेँ सुमरि‍, आरक्षि‍त जगहपर बैसल। मनमे सदि‍खन देव-पीतरक यादि‍, ताकि‍ यात्रा शुभ हुअए। ि‍नर्धारि‍त समैसँ बस खुजल। भुतहा, नरहि‍या, फुलपरास होइत चनौरागंजमे काका (श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल) केँ गोर लागि‍ आदरक संग बैसाओल। हुनका छोड़क हेतु बेरमा गामक कतौक लोक जेना कपि‍लेश्वर राउत, लक्ष्‍मी दास, शि‍वकुमार मि‍श्रा, अखि‍लेश, सुरेश, मि‍थि‍लेश आदि‍ आएल छलन्‍हि‍। राति‍ भरि‍ देव-पीतरकेँ सुमरैत तीन बजे भोरमे दुनू बापुत पटना पहुँचलौं। बससँ उतरि‍ पलेटफार्मकेँ गमछासँ झारि‍ बैसलौं। ओंघीसँ आँखि‍ डोका सन-सन आ रंग अरहुल सन। जाकि‍ आँखि‍ मुनलौं आकि‍ काका उठौलन्‍हि‍ जे उठु-उठु प्रात भऽ गेल। से ने तँ नदी-तदी तरगरे फीर लि‍अ। फरीच्‍छ भेलासँ सुलभ शौचालाइयोमे नम्‍मर लगाबए पड़त। सएह कएल। आँखि‍ मि‍ड़ैत डेग शौचालय दि‍सि‍ बढ़ौल। बेरी-बेरी दुनू बापुत नदी फि‍रलौं। गामक बनाओल दतमनि‍, जेकर अगि‍ला मुँह थकुचल आ पछि‍ला भाग चीरल। मुँहमे दऽ चारि‍ये घुस्‍सा ऐ कातसँ आेइ कात धरि‍ दऽ कुरूर-आचमनि‍ कऽ आगू बढ़लौं। एम्‍हर काका अखि‍यासै छलाह जे चाहक दोकान केम्‍हर छैक। जे पहि‍ने एक-हक गि‍लास चाह पीब लैतौं तखन जे होइतै से होइतै। गाँधीमैदानक उत्तरवारि‍ कातमे धुआँ होइत देखलि‍ऐ। तखन भरोस भेल। सहटि‍ कऽ लग गेलौं। चुल्‍हि‍ पजारनहि‍ छल। ब्रेंचपर बैसेत दू गि‍लास चाहक आग्रह केलौं। समए साफ भऽ गेल रहैक। काका कहलनि‍ जे से नै तँ कोनो टेक्‍सीबलाकेँ ताबत भाँजि‍ ने लि‍अ, जे ओ हवाइ अड्डा जाएत जौं जाएत तँ पाइ कत्ते लेत? एकटा मुँहसच्‍च आदमीकेँ देखि‍ हाक देलि‍ऐ। आबि‍ गछलक। भाड़ा एक साए लेत सेहो कहलक। चाह पीब दुनू बापूत टेक्‍सीमे बैसलौं, बैसि‍ते वि‍दा भेल। दुनू बापूत अनभ्‍ाुआरे रही। नै जानि‍ हमरा कहैमे गलती भेल आकि‍ ओकरा सुनैमे। ओ तँ हवाइ अड्डाक बदला मि‍ठापुर बस अड्डा लऽ अनलक। आब तँ भेल तीतम्‍हा, ओ कहए जे नै सर हमरा तँ अहाँ बस अड्डा कहलौं, हवाइ अड्डा नै। से ने तँ हमरा भाड़ा दि‍अ आ हम जाएब। कनी काल तँ केनादन लागल, मुदा फेर ओकरे कहलि‍ऐ बरनी जे लेबह से लि‍हह मुदा हमरा सभकेँ हवाइ अड्डा उतारह। ओ कहलक ओतए जेबइ तँ और एक साए टाका लेब। ऐ तरहेँ दू साए रूपैआमे हवाइ अड्डा पहुँचलौं।
हवाइ अड्डामे जइठाम परम सि‍नेही श्रीमान् गजेन्‍द्र बाबूसँ साक्षात्‍ दर्शन भेल। नमस्‍कार पाती भेलाक बाद बहुत बेसी उत्‍साहक संग हमरा लोकनि‍केँ अपना गाड़ीसँ हवाइ अड्डाक भीतर लऽ गेलाह। लऽ जाइत जनौलन्‍हि‍ जे हवाइ जहाजक यात्राक की केना नि‍अम होइत छैक। गाड़ीसँ उतरलाक बाद गजेन्‍द्र बाबू हमरा दुनू बापुतक पाँच-सात गोट फोटो खिचलन्‍हि‍। हमहूँ हुनक फोटो अपना कैमरामे लेलौं।
मोबाइलक घड़ीमे सात बाजि‍ गेल छल। हमरा लोकनि‍ एक-दोसरासँ फराक होबक स्‍थि‍ति‍मे आबि‍.....। गजेन्‍द्र बाबू अपना बासापर गेलाह आ हम दुनू बापूत अपन-अपन पहि‍चान पत्र लऽ नीक लोक जकाँ लाइनमे ठाढ़ भऽ गेलौं। जनीजाति‍ जकाँ मोटरी-चोंटरी तँ बेसी छल नै आ ने पंजबि‍या (पंजाब कमाइबला) जकाँ गरमि‍यो मासमे कम्‍मलक मोटा। तँए कोनो दि‍क्‍कतो नहि‍ये भेल। जाँच-परताल करा लेलाक बाद प्रतीक्षालय जा आरामसँ बैसि‍लौं। काकाकेँ कने चाहक खगता बूझि‍ आग्रह करैत अपनो सुतारलौं। ओना आदति‍ भलहि‍ं काकाकेँ छन्‍हि‍ आ से नि‍त्‍य दू बजे स्‍वयं बना कऽ पीबक, मुदा हमरा से नै, पहि‍नहि‍ कहि‍ आएल छी जे भरि‍ रातुक जगरना छल। तँए प्रति‍ कप चालि‍स टाका देबामे अखरल नै। ऐ तरहेँ कि‍छु कालक पछाति‍ पुन: घोषणा भेल आ फेर दुनू बापूत लाइनमे लागि‍ हवाइ अड्डाक भीतर मैदानमे गेलौं। दुइयो डेग तँ ने होइतै तइले अनेरे एकटा बड़का बस छल। जइपर चढ़ि‍ हवाइ-जहाज लग गेलौं। पहि‍ले भरि‍ मन नि‍गहारि‍-नि‍गहारि‍ कऽ देखलौं। पुन: अपना देवता-पीतरकेँ सुमरि‍ हवा-जहाजक सीढ़ीपर चढ़ि‍ भीतर गेलौं। मुँहेपर सि‍लेब रंगक चारि‍टा बच्‍चि‍या नाक-भौह चमका-चमका स्‍वागतमे हाथ जोड़ि‍ अंग्रेजीमे कहलक- वेल्‍कम सर। आ भभा कऽ हँसि‍ देलक जेना पढ़ौल सुगा हुअए। हवाइ जहाजमे सीट दुनू बापूतक एक्केठाम छल। सीट हेरि‍ दुनू बापूत पहि‍ने हबा-जहाजक भीतरक वातावरणक अवलोकन कएल। एना लगए जेना भरि‍ जहाजमे बरफ खसि‍ रहल होइ आ तइपरसँ गम-गम से करैत। बाहरमे जत्ते गर्मी भीतर ओतबए ठंढा कनि‍ये कालक बाद मन एकदम्म शान्‍त भऽ गेल। तेकर बाद दूटा वयस्‍क बालक आबि‍ अंग्रेजीमे कि‍दैन-कहाँदन कहि‍ हि‍न्‍दीमे दोहरौलक। जेकर भाव छल जे हमरा लोकनि‍सँ आग्रह करैत कहल गेल जे आब ई हाबा-जहाज अपना स्‍थानसँ ससमए मुम्‍बइ लेल उड़ान भरत। कुल तीन घंटा तीस मि‍नटक भीतर अपना स्‍थानपर पहुँचत। तँए अपने अपने लोकनि‍ अपना-अपना सीटपर राखल बेल्‍टसँ डाँढ़ बान्‍हि‍ ली। सएह करइ गेलौं। हवाइ-जहाज गुड़कए लगल। करीब बीघा दसे गुड़कलाक बाद वाया मुँहे घूमि‍ अपन दि‍शा आ दशा बना बड़ी जोरसँ गुड़कए लगल। गुड़कैत-गुड़कैत एक्केबर हबा-जहाज साफे कऽ धरतीकेँ छोड़ि‍ अकासमे उड़ए लगल। जी तँ सन् रहि‍ गेल। मुदा कि‍छु कालक बाद स्‍थि‍र भेल। खिड़कीसँ नि‍च्‍चाँ तकलौं। आहि‍रे बल्‍लैया ई तँ कि‍छु कतौ ने देखि‍ऐ। सौंसे उज्जर-उज्जर बादलेटा। बादलक संग हबा-जहाज उड़ल जा रहल छल।

हबा-जहाजक भीतर टेम-टेमपर चाह-जलखै भेटैत रहल मुदा बड़ मगह..। खएर छोड़ू। नअ पाँचमे जे हबा-जहाज खुलल ओ एक-पैंति‍समे मुम्‍बइ हवाइ-अड्डापर पहुँचलौं। करीब पनरह मि‍नटक बाद लोक सभ उतरए लगलाह। पाछू-पाछू हमहूँ दुनू बापूत उतरलौं। उतरि‍ते मुम्‍बइ हवाइ-अड्डा देखि‍ चकबि‍दोर लगि‍ गेल। सभटा तँ देखलो सुनलो नहि‍ये। काकाक सह पाबि‍ कल्‍लौ करबाक लेल एकटा होटल पहुँचलौं। भोजन-साजन कऽ पुन: घूमि‍ हवाइ-अड्डापर आबि‍ लाइनमे लागि‍ सामान चेक-चाक करा टीकट लऽ भीतर प्रवेश कएलौं। काकाक चाह पीबाक समए सेहो भऽ गेल रहनि‍। ई हमरा बूझल छल जे गाममे अपनेसँ बना साढ़े तीन बजेक लबधब पीबै छथि‍न। जहाज तँ चारि‍ चालि‍समे छल। हाथमे एक घंटा समए देखि‍ एक-कप काैफी चारि‍ बीस दस टाकामे कि‍न दुनू बापूत पीबलौं। कनि‍ये कालक पछाति‍ घोषणा भेल पटने जकाँ लाइनमे लागि‍ मुम्‍बइसँ कोच्‍चि‍ लेल भीतर जा बैसलौं। बैसि‍ते अपन घरक गोसाइ आ देव-पीतरकेँ सुमरब सहजहि‍ मनमे आबए लगल। पहुलके जकाँ सभ अनुभव करैत कोच्‍चि‍ पहुँचलौं समए होइत रहै छह चालि‍स। मोबाइलक सुइच ऑन केलौं होइते एकटा संदेश अाएल जे अंग्रेजीमे छल जेकर मैथि‍ली रहए- हम प्रवीन कुमार सहयोगी मोहि‍त रावत दि‍ल्‍ली, उज्जर आ नील रंगक कमीज पहि‍र निकास द्वार लग ठाढ़ छी। हमरा दुनू बापूतकेँ धोती-कुर्ता देखि‍ ओ पुछलनि‍- अपने जगदीश प्रसाद मण्‍डल? हम प्रवीण कुमार। आउ अपनेक लोकनि‍क गाड़ी ठाढ़ अछि‍ जे होटल छोड़ि‍ देत।
गाड़ीक चालक आगू बढ़ि‍ दुनू बैंग लऽ सम्‍हारि‍ कऽ रखलनि‍। दुनू बापूत गाड़ीमे बैसलौं आ गाड़ी आगाँ ससरल। करीब चालि‍स मि‍नटक उपरान्‍त एकटा दस मंजि‍ला मकान पूर्णत: वातानुकुलि‍त, गोकुलम पार्क होटल कोच्‍चि‍, लग रूकल। यूनीफार्ममे सजल दरमान होटलक दरबज्‍जा खोलि‍ ठाढ़ छल। गाड़ीक ड्राइवर बाहरक दरबज्‍जा खोललक। दुनू बापूत बहर भेलौं। दरमान झुकि‍ कऽ स्‍वागत केलनि‍। भीतर गेलौं आकि‍ नजरि‍ एकटा अठारह बर्खक नवयौवना अति‍ वि‍लक्षण स्‍वभाववाली हि‍न्‍दी आ अंग्रेजीमे नीपुण अपन परि‍चए अंग्रेजीमे देलक। जेकर भाव छल, हम पूर्णिमा सैमसंग कम्‍पनीक तरफसँ सेवामे ठाढ़ छी। कहू हम अपनेक की मदति‍ कऽ सकैत छी? पूर्णिमाक दुनू हाथ जोड़ब, नि‍च्‍चा उज्‍जर तंग जीन्‍स आ ऊपर सुगापाखि‍ रंगक टीसर्ट, नम्‍हर-नम्‍हर कारी भौर केशक कि‍छु लट दहि‍ना कातक छातीपर खसल। ति‍लकोरक फड़ सनक दुनू ठोर लाल टुहटुह। भरि‍ आँखि‍ काजर। खूब नम्‍हर-नम्‍हर हाथ आ पोरगर-पोरगर ओगरी सभ जे कोनो नीक कम्‍पनीक चमकीबला नहरंगासँ रँगल। दुनू हाथ जोड़ि‍ मूर्ति जकाँ ठाढ़ छल। देखि‍ते मन गद्गद् भऽ गेल। जे एहि‍ वयस्‍क वालि‍का एतेक शालीन! हमरा अपनो भाग्‍यपर गौरव भेल जे धनि‍ हमर मि‍थि‍ला, धनि‍ हम मैथि‍ल आ धन्‍य हमर मैथि‍ली। जइ प्रतापे हम दुनू बापूत टैगोर साहि‍त्‍य पुरस्‍कार प्राप्‍त करबाक हेतु मि‍थि‍लाक गाम बेरमा, भाया तमुरि‍या, जि‍ला मधुबनीसँ चलि‍ कोच्‍चि‍ पहुँचलौं।

रि‍सेप्‍सनपर उचि‍त आदर-भावोपरान्‍त रूममे नम्‍बर चारि‍ साए छह केर कुंजी जे ए.टी.एम कार्ड जकाँ छल। पूर्णिमा हमरा सबहक संग आइ ओइ कुंजीसँ रूम खोलल। संगे ओही कार्ड रूपी कुंजीकेँ एकटा दोसर खोल्हि‍यामे पैसौलक तँ भरि‍ घर इजोत पसरि‍ गेल। दू बेडक रूप। उज्जर धप्-धप् गद्दा-तोसक तकि‍या आदि‍ अत्‍याधुनि‍क छल। सामने टेबुलपर एकटा एल.सी.डी, फोन आ चाह बनेबाक सभ सरमजाम छल। चाहक सरमजान देखि‍ते काका तँ गद्गद् भऽ गेलाह कहलनि‍- दुर्गानन्‍दजी, सभसँ पहि‍ले एकटा चाह पीबू। सएह कएल।
चाह पीबैत टीबी खोलि‍ कने काल देखलौं। तात् पूर्णिमा मन पड़लीह हुनकासँ हमरा एकटा बेगरतो छल। ओ अपन नम्‍बर देने छलीह डायल केलौं पाँचे मि‍नटक पछाति‍ भीतर एलीह ओही अदाक संग। आग्रहपर बैसलीह। खगता कहलनि‍यनि‍ जे हमर कैमराक बेटरी डॉन भऽ गेल अछि‍ कने चार्ज होइतए। पूर्णिमा हर्षक संग बेटरी लऽ रातुक भोजनक वि‍षयमे सेहो बता देलनि‍। आ ई कहैत बाहर जेबाक अनुमति‍ चाहलनि‍ जे हम अही फ्लोरपर रूप नम्‍बर चारि‍ साए दूमे छी। अपने लोकनि‍केँ कोनो खगता हुअए तँ नि‍:संकोच बजा लेब। हम अहीं सबहक सेवार्थ आएल छी। धन्‍यवाद कहैत दुनू ठोरकेँ वि‍हँुसबैत पूर्णिमा रूमसँ बाहर भेलीह। लागल एना जेना बि‍जली चल गेल हुअए आ रूम अन्‍हार गुज-गुज भऽ गेल हुअए। पछाति‍ थोड़ेकालक, काका मोन पाड़लनि‍ जे भोजनो करबै? हम कहलि‍यनि‍- नि‍श्‍तुकी।
अपन-अपन कुर्ता पहि‍र दुनू बापूत भोजनक लेल द्वि‍तीय तलपर पहुँचलौं। एक नजरि‍ घुमा चारू कात देखलौं। अलग-अलग टेबुल आ कुर्सी लागल। सभ टेबुलपर कनि‍ये टा-टा तोलि‍या, प्‍लेट, उज्‍जर धप्-धप् गि‍लास, पानि‍क बोतल आ काँटा चम्‍मच राखल छल। कने काल धरि‍ दुनू बापूत गुमसुम रहलौं। जे पूछि‍-पूछि‍ परसि‍-परसि‍ खुआओत। मुदा ओतए तँ अपने-अपने परसि‍ खाइबला हि‍साब छल। बड़नी बड़ बेस। एकहक टा प्‍लेट लऽ दुनू बापूत आगाँ बढ़लौं। जे चीज-बौस चि‍न्‍है छेलि‍ऐ ओ एकाधटा टुकड़ी उठा-उठा अपनो प्‍लेटमे राखी आ कक्कोकेँ दि‍यनि‍। मुदा जे अनचि‍‍न्‍हार चीज-वौस छल तइमे पूछए पड़ए। सेहो हि‍न्‍दीमे नै कि‍एक तँ हि‍न्‍दी तँ कि‍यो बुझबे ने करए। मैथि‍ली कथे कोन जे मैथि‍लो आब टाटा-बाइ-बाइ करैए। तखन पूछि‍-पाछि‍ अपन-अपन पसि‍नक सभ सामग्री लऽ भोजन केलौं। भोजनक तँ वि‍न्‍यासे जुनि‍ पूछू, उत्तर भारतसँ लऽ दक्षि‍न भारतक सभ कि‍थुक पूर्ण बेवस्‍था छल। भरि‍ पोख भोजन दऽ दुनू बापूत आगाँ बढ़लौं देखलौं जे एकटा कराहीमे खीर सन कि‍छु खाद्य पदार्थ छलैक। अपना जोगरक लेलौं। खाइते मन गद्गद् भऽ गेल। तत्‍पश्चात आइसक्रीम लऽ भोजन सम्‍पन्न करि‍ते रही ताबत् मोहि‍त रावत जी हमरा लोकनि‍क खोज-पुछाड़ि‍ करैत लग पहुँचलाह। हाल-चाल भेल। आराम करए गेलौं।
 
भीनसर तरगरे उठि नहा धो कऽ तैयार भेलौं। जलपान केलाक बाद दुनू बापूत होटलक नि‍चला तलपर आबि‍ सामाचार पत्र आदि‍ देखि‍ रहल छलौं तखने रेणुका वातरा जी एलीह। सबहक कुशल-छेम जानि‍ आनन्‍दि‍त भेलीह। एक-दोसरक परि‍चए-पात भेल। आ हमरा लोकनि‍ ए.जे हाॅलक लेल वि‍दा भेलौं। हॉल देखि‍ मन गद्गद् भऽ गेल। ए.जे.हॉल पूर्णत: वातानुकुलि‍त बैस पैघ हॉल। जइमे हजारक-हजार वि‍द्वान लोकनि‍ बैस सकैत छथि‍। बेस ऊँचगर मंच। जइपर दहि‍नासँ चढ़क लेल आ वायसँ उतरक हेतु सीढ़ी बनल छल।

कथाकार-साहि‍त्‍यकार लोकनि‍क बैसैक बेवस्‍था, मि‍डि‍याबलाक आ आमंत्रि‍त अति‍थि‍क सबहक अलग‍-अलग बेवस्‍था छल। दि‍नक तीन बजे पत्रकार लोकनि‍क संग भेँटवार्ता छल। एक कात सातो वि‍द्वान, कथाकार, उपन्‍यासकार आ कवि‍ लोकनि‍ आदि‍क बैसैक बेवस्‍था छल जि‍नका आगाँ नाओं लि‍खल नेमप्‍लेट छल। आही दीर्घामे रेणुका वात्रा सेहो बैसलीह। बेराबरी सभ वि‍द्वान लोकनि‍ अपन-अपन पोथीक एक झलक अंग्रेजीमे रखलनि‍। तकर पछाति‍ काका अपन पोथी संबंधी वि‍चार मातृभाषा मैथि‍लीमे रखलनि‍। पूरा कक्ष वि‍भि‍न्न प्रकारक कैमराक फ्लैशसँ चमकि‍ रहल छल जेना साओन-भादवक बद्रीमे रहि‍-रहि‍ बि‍जलोका चमकैत रहैत। वि‍चार रखलाक बाद सभ वि‍द्वान लोकनि‍सँ वि‍भि‍न्न प्रकारक प्रश्न लऽ लऽ पत्रकार लोकनि‍ लूझि‍ पड़ला। सौभाग्‍यसँ हमहुँ वि‍देह प्रथम ई पाक्षि‍क पत्रि‍काक सह सम्‍पादकक प्रति‍नि‍धि‍त्‍व करबाक हेतु उपस्‍थि‍ति‍ रही। आ पत्रकार लोकनि‍केँ मैथि‍लीसँ हि‍न्‍दी आ अंग्रेजीमे भरि‍ पोख संतोष प्रदान कएल। पाँच केम्‍हर दऽ कऽ बजलै सेहो नै बूझि‍ पेलौं। सभ कि‍यो ए.जे. हॉलक सभाकक्षमे प्रवेश कएल। अपन-अपन स्‍थान ग्रहण केलौं। आ शुरू भेल टैगोर लि‍टरेचर अवार्डक कार्यक्रम। ई तेसर पुरस्‍कार समारोह छल जेकर आयोजन ऐबेर कोच्‍चि‍मे भेल रहए। जइमे वि‍भि‍न्न भाषामे साहि‍त्‍यक योगदान हेतु सातटा भारतीय भाषाकेँ चुनल गेल, अंग्रेजी, कोंकणी, मैथि‍ली, मलयालम, मणि‍पुरी, नेपाली आ सि‍न्‍धी रहए। जे पुरस्‍कृत कएल गेल। कोच्‍चि‍क बारह जूनक संध्‍या सैमसंग इण्‍डि‍या आ साहि‍त्‍य अकादेमी द्वारा साहि‍त्‍यमे स्‍वोत्तम योगदानक लेल सातो भाषाक लेखककेँ पुरस्‍कृत करबाक लेल तैयार छल। जेकर चयन साहि‍त्‍य अकादेमीक पंच-परमेश्वर द्वारा भेल छल। एक झलक ओइ महान वि‍भूति‍क लेल जे क्रमश: ऐ तरहेँ उपस्‍थि‍ति‍ छलाह- 1. श्री अमि‍ताभ घोष, अंग्रेजी, सी ऑफ पॉपि‍ज, 2. श्रीमती शीलाकोलम्‍बकर, कोंकणी गैर्र, 3. श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल, मैथि‍ली, गामक जि‍नगी, 4. श्री अॅकि‍थम अच्‍युतम् नामबुदरी, मलयालम- अंथि‍मानाकालम, 5. श्री एन. कुंजमोहन सि‍ंह, मणि‍पुरी, एना कैंगे केनवा माटे, 6. श्रीमती इंद्रमणि‍ दरनाल, नेपाली, कृष्‍णाकृष्‍णा आ 7म श्री अर्जन हसीद, सि‍ंधी, ना अएना ना।

एे कार्यक्रमक मुख्‍य अति‍थि‍, डॉ. एम. वि‍रापा मोइली, ओ.एन.भी कुरूप, एम.पी. वि‍रेन्‍द्र कुमार, श्री अग्रहारा कृष्‍णमूर्ति, सचि‍व साहि‍त्‍य अकादेमी दि‍ल्‍ली आ श्री बी.डी. पार्क प्रेसीडेन्‍ट एण्‍ड सी.ई.ओ. साउथ-वेस्‍ट एसि‍या, मुख्‍य कार्यालय एच.क्‍यू, सैमसंग इलेक्‍ट्रॉनि‍क्‍स छलाह। कार्यक्रमक दौरान नोवेल पुरस्‍कारसँ पुरस्‍कृत महाकवि‍ रवि‍न्‍द्रनाथ टैगोर केर संबंधमे अपन-अपन बहुमुल्‍य वि‍चार रखलनि‍। कार्यक्रमक उद्-घोषि‍काक रूपमे साहि‍त्‍य एवं कलाक दुनि‍याँक प्रसि‍द्ध टी.भी. एंकर, मॉडल रजनी हरि‍दास द्वारा जबर्दस्‍त प्रस्‍तुति‍ सबहक मनकेँ मोहि‍ लेलक।
 
कार्यक्रममे पुरस्‍कार वि‍तरण हेतु उद्घोषणक पछाति‍ वि‍जेता वि‍द्वान लोकनि मंचासीन होथि‍ आ पुरस्‍कृत भऽ अपन-अपन स्‍थानपर आपस आबथि‍। पुरस्‍कारक रूपमे गुरूदेव रवि‍न्‍द्रनाथ टैगोरक एकटा बेस कि‍मती मूर्ति, एकटा चि‍क्कन साल एवं एकानबे हजार रूपैयाक चेक प्रदान कएल गेल। बीच-बीच मि‍डि‍याक कैमरा बि‍जलोका जकाँ लौकैत रहल। पुरस्‍कार पाबि‍ श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डलजी अपन लि‍खल पोथी गामक जि‍नगीक वि‍षयसँ पूर्व पोथी प्रकाशक श्रुति‍ प्रकाशनकेँ धन्‍यवाद दैत वि‍स्‍तारसँ मातृभाषामे अपन वानगी प्रस्‍तुत कऽ मि‍थि‍ला आ मैथि‍लीक मर्यादाकेँ बढ़ौलनि‍।

कार्यक्रमक समापन भरत नाट्यमक प्रसि‍द्ध नरर्तकी, कलाकार पद्मश्री शोभनाचन्‍द्र कुमार द्वारा भयंकर उत्‍साहपूर्ण स्‍तरीय नृत्‍यक संग भेल। पाँच बजे संध्‍यासँ दस बजे राति‍ धरि‍ बूझू जे छओ आंगुर घीऐमे छल जकर सफलताक श्रेय सुश्री रूचि‍का बत्ता, रेणुका भान, सैमसंग इण्‍डि‍या, बी.डी.पार्क आदि‍केँ छन्‍हि‍। जे समस्‍त कार्यक्रमक दौरान काग चेष्‍टा आ बकोध्‍यानम् रूपमे रहला/रहलीह।
ऐ सबहक पश्चात हमरा लोकनि‍ होटल आबि‍ स्‍वरूचि‍‍ भोजन कऽ आराम केलौं। प्रात: भने चारि बजे भोरमे अभि‍वादनक संग हाथ हि‍लबैत गाड़ीमे बैसलौं। मुदा अखनो ओ हमरा मने अछि‍......। ताबत गाड़ी कोच्‍चि‍ हवाइ-अड्डाक लेल प्रस्‍थान‍ कऽ चुकल छल। राति‍ दस-बजैत-बजैत यात्राक सम्‍पूर्ण आनन्‍द लैत दुनू बापूत गाम बेरमा-गोधनपुर आबि‍ गेलौं।


ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
चंदन कुमार झा
सररा, मदनेश्वर स्थान
मधुबनी, बिहार
१. बिहनि-कथा - ठकबुद्धि२.आलेख-भीड़तंत्र बनाम् भ्रष्टतंत्र
बिहनि-कथा - ठकबुद्धि
विलट राम पहिल बेर दूनू प्राणी गाम आयल अछि.संग मे दूनू बच्चा सभ सेहो अयलहि अछि.गंगाधर पण्डित कार सँ उतरैत विलट, ओकर कनिञा आ' बच्चा सभके देखने रहथि.अनमन विदेशी लगैछै. गोर धप-धप बच्चा सभ. कनिञा सेहो बड्ड सुन्नरि छैक.विलट त' पहिनहि जँका अछि.गहुँमक रंग सन मुदा मूँहक चमक बढ़ि गेलैक अछि.किएक नहि बढतै कलक्टरक पोस्ट कोनो मामूली पोस्ट नहि होइ छै.जिलाक राजा होइत अछि कलक्टर.तखन राजसी ठाठ-बाठक चमक त' एबे करतै.कनिञा बिभा कुमार सेहो एस.डी.ओ.छैक.दू बरखक जुनियर छै कनिञा विलट सँ.दिल्लीए मे दुनू प्रेम विवाह केने रहए.बेचनी, विलटक माय दियामान सँ फाटल जा रहल छै.पाँच बरखक पोता राकेश आ' दू बरखक पोती रश्मि के देख ओकर खुशीक कोनो ठेकान नहि छै.बेर-बेर दुनू के करेजा सँ सटाबैत अछि.राकेशक मुँह सँ "दादी" शब्द सुनतहि ओकर आँखि नोरा जाइत छै.आँचरक खूट सँ बेर-बेर अपन आँखि पोछि लैत अछि बेचनी.

भरि गामक लोक करमान लागल छै विलटक दलान पर. गंगाधर पण्डित जी, दयाकांत मास्टर साहेब,किरतु मुखिया,...गामक मुँहपुरूख बच्चा बाबू सेहो कुरसी लगा बैसल छथिन्ह.एतबे मे रश्मि के कोरा मे नेने विलट सेहो आँगन सँ दलान पर अबैत अछि.विलटक अबिते ओहिठाम कुरसी पर बैसल सभ लोक ठाढ़ भऽ जाइत अछि.विलट,बच्चा बाबू,पण्डितजी,मास्टर साहेब,सभ के पएर छूबि गोर लगैत अछि.मास्टर साहेब विलट के भरि पाँज पकरि छाती सँ सटा लैत छथिन्ह.हुनका मूँह पर गर्वक भाव स्पष्ट देखार भऽ रहल छैन्ह जे हुनकर विद्यार्थी आइ कलक्टर बनि गेल.विलट सभ के विनम्र भावे बैसबाक आग्रह करैत अछि.सभ बैसथि अछि.

भरि गौँआ के आइ गर्व भऽ रहल छैक जे ओकरा गाम मे एकटा कलक्टर सेहो छैक-बच्चा बाबू विलट दिस तकैत बजलाह........एक्केटा नहि दू टा बच्चा बाबू -पण्डित जी बिचहि मे बच्चा बाबूक बात कटैत कहलखिन्ह.कनिञा सेहो अगिला साल धरि कलक्टर बनिए जेतीह ने...पण्डित जी आँगा बजलाह.विलट किछु नहि बाजल.खाली मुस्कियाएल रहए कने.

आँगन सँ गोपीया, विलटक पितियौत एकटा छिपली मे पाँच-छह कप चाह नेने आयल.सभ गोटे चाह पिबै लगलाह.एतबे मे बुद्धिनाथ सेहो विलटक दलानक आँगा बाटे कोम्हरो जाइत रहथि....कतौ जाइत नहि रहथि..ओ त' विलटे सँ भेँट करय आयल रहथि मुदा विलट ल'ग बच्चा बाबू के देखि दोसर बाट पकड़ि लेलथि.सात पुरूखा सँ दुनूक परिवार मे एक-दोसराके निच्चा देखेबाक होर मचल छन्हि.पुस्तैनी दुश्मनी चलैत छन्हि."देखहक बच्चा बाबू केहन निर्लज्ज भऽ गेल, बेचनीक दुआरि पर बैसि आब चाह पिबैत अछि....चमारक दुआरि पर..राम-राम." -ई बात कंटीर सँ कहैत काल बुद्धिनाथक स्वर मे अपन दुश्मन सँ पाँछा भऽ जेबाक खौँझी स्पष्ट प्रतीत भऽ रहल छलैन्हि.

राकेश हाथ मे एकटा गेन नेने दलान पर आयल आ' विलट के अपना सँग खेलबाक लेल जिद्द करय लागल. बच्चा बाबू ओकरा अपना कोरा मे बैसा लेलखिन्ह आ' गाल पर चुम्मा लऽ लऽ दुलारऽ लगलखिन्ह.बच्चा बाबूक कोरा मे  अपन पोता के बैसल देखि बेचनी के करीब तीस बरख पहिलुका बात मोन परि गेलइ.छहे मासक रहैक विलटु..हाँ विलट..भरि गौँआ आ' बेचनी सभ तऽ विलटुए कहैत छलै विलट के.बेचनी लेल तऽ विलट एखनहु विलटुए अछि.

ओहि दिन बेचनी एसगरे रहए घर मे.सासु नैहर गेल रहए.ससुर सासु के पहुँचाब गेल रहथिन्ह.विलटक पिता सेहो कोनो आन गाम गेल रहय रसनचौकी बजबै लेल.नवहथ बाली गिरहतनी माने बच्चा बाबू गिरहतक घरबालीके बच्चा होनहारी रहए.प्रसवपीड़ा उठि गेल रहए.बच्चा बाबू गिरहत के हुनकर बाबू माने बड़का गिरहत पठेने रहथिन्ह माय के बजा अनय लेल.असमंजस मे परि गेल रहए बेचनी......घर मे पुरूष-पात नहि छै.ओकरा एखन सालो नहि पुरलैए सासुर बसना. कोना जेतइ घर से बाहर...? छह मासक बच्चा के कत' रखतइ...?.'तऽ आई धरि कहियो, ककरो परसौती करेबो नहि केलकइ....मुदा, नहि जेतइ त' पसारी छियैक गिरहत छुटि जेतइ....बोनि मरि जेतइ....मालिक की कहतइ....तहू मे बड़का गिरहत.....सौसे गाम हुनकर धाक करै छै....बड़का कलेवर बला लोक छथि...अन्ततः बेचनी अपन पितीया सौस के संग कऽ गेल रहए.विलटु के सेहो संगे नेने गेल रहए. छए मासक बच्चा के कत' रखितइ.

सूरेश बाबू जनमल रहथिन्ह.बड़का गिरहत, बच्चा गिरहत सभ गिरहतनि,सभ केयो बड्ड हरखित रहथिन्ह.बेचनी सेहो मोने मोन निचेन भेल रहए जे गिरहत नहि छुटलै.बेटा जनमलैन्ह तै बोइनो बेशी कऽ के भेटतइ.घोघ तनने, विलटुके कोरा मे उठेने विदाह भेल रहए कि तखने पएर मे किछु अभरल रहए.घोघ त'र से नहि देखायल रहए ओकरा. अरे बाप रे ..जुलूम भऽ गेलै..मैँयाक पितरिया लोटा छुआ गेलै...कोनो बच्चा चिकरि उठल  रहए.बेचनी के देह जेना पथरा गेल रहै ई बात सुनितहि देरी...बु......दी,ख...राही..,असर्ध-असर्ध गारि पढ़ैत बच्चा बाबू बेचनी दिस मारय लेल हुरकल रहै..ओ'तऽ बेचनी के पितिया सौस पएर पर खसि परल रहै बच्चा बाबू आ' बड़का गिरहत के तँइ जान बचलै.एकएक टा बात,एकएक टा गारि बेचनी के एखनहु ओहिना मोन छै.एखन धरि नहि बिसरल भेलैए ओहि अपमान के...विलटुआ के बाप जखन गाम अयलहि तऽ सभटा बात बेचनी कहि देलकै आ' दुनू परानि ओही दिन सप्पत खैने रहै जे आब ओ ककरो पसारी बनि के नहि रहत.छुटि गेलै गिरहत..छुटलै कि छोड़ि देलकै...फेर विलटुआक बाप रसनचौकी बजाके आ' बेचनी खेत मे बोइन कऽ के विलटु के पढेलकै.......कलक्टर बनेलकै.परूका साल विलटु के बाप चलि गेलै बेचनी के असगरे छोड़ि के.नहि...नहि ओ एसगर कहाँ अछि......भरल-पुरल परिवार छै.एहन परिवार जकरा देख ककरा ने सेहन्ता लगैत छै.बेचनी के आँखि फेर नोरा गेल रहै.ओ फेर आँचर सँ आँखि पोछि लेलक.एतेक दिन बेचनी के एकटा प्रश्न बेर-बेर मोन मे उठैत छलै जे बच्चा बाबूक पुतोहु डाक्टरनी छै.ओहो तऽ परसौती करबै छै लेकिन ओकर छूअल किछो किएक नहि छुआएत छैक...?..मुदा आई अपना दलान पर बच्चा बाबू के चाह पिबैत देख बेचनी के एहि प्रश्नक उत्तर सेहो भेट गेलै.

मंच सजल छैक.मंच पर विलट बैसल अछि.गामक गणमान्य लोक सभ सेहो बैसल छथि.विलटक सम्मान समारोह आयोजित कयल गेल अछि.सभटा खर्च बच्चा बाबू केलखिन्ह.माइक पर किरतु मुखिया भाषण दऽ रहल छथिन्ह.-"हमर गामक श्री विलट राम,कलक्टर बनि गेलाह. ई हमरा सभक लेल गौरव के बात अछि.हम सभ आइ हुनका समस्त ग्रामीणक तरफ सँ सम्मानित करब..." बच्चा बाबू विलट के पाग, माल आ' दोपटा पहिराय सम्मानित करैत छथिन्ह.विलटक मुँह पर एखनो बस मुस्की टा छै.ओकरा सभटा बुझल छैक.बच्चा बाबूक किरदानी...मायक ब्यथा...समाजक चापलूसी..सभ जनैत अछि विलट आ तइँ ओकरा माथक पाग कोनो ठकक द्वारा पहिराओल टोपी सँ बेशी नहि लगैत छैक.मुदा,आब विलट ठकाइ बला नहि अछि आर तइँ ओकरा बच्चा बाबूक ठकबुद्धि पर हँसी लगैत छैक.

 
आलेख
भीड़तंत्र बनाम् भ्रष्टतंत्र

भ्रष्टचारक विरूद्ध वर्तमान सामाजिक आंदोलनक "प्रतीक पुरुष" श्री अन्ना हजारे जखन सरकार के अपन कर्तव्यबोध करौलन्हि तखन सत्ता पर बैसल तथाकथित जनसेवक सभके ई आंदोलन संविधान विरूद्ध लागय लागल. सांसद के संसदीय गरिमा पर आघात बुझाय लागल. लोकतंत्र के "तंत्र"क वचाव मे सत्तातंत्र संविधानक दोहाइ देबय लागल. मुदा, लोक के सभ बिसरि गेल. लोकक पीड़ा के सभ महत्वहीन बुझय लागल.
चौहत्तरि बर्षक बुजूर्ग के मात्र एक आह्वान पर जखन देशक कड़ोरो जनता सड़क पर आबय लागल आ' अपन अधिकारक हेतु लड़य लागल तऽ "सत्ता"क नजरि मे ई "भीड़" बनि गेल. सत्तासीन लोक कहय लागल जे देश मे लोकतंत्र अछि भीड़तंत्र नहि. कानून बनयबाक अधिकार मात्र संसद के छैक. मतलब साफ जे चुनावक बाद जनप्रतिनिधि अपना के शासक बुझैत छथि और जनता पर अपन हुकूम चलायब संविधान प्रदत्त अधिकार.जनसेवाक सपथ धय सिंहासन धरि पहुँचला उपरांत ओ सेवा आ शासन मे भेद बिसरि जाइत छथि.ओ बिसरि जाइत छथि जे लोकतंत्र मे लोक प्रधान होइत छैक तंत्र नहि.
यैह भीड़ जखन कोनो चुनावी रैली मे कोनो राजनैतिक दलक झण्डा उठौने एकठ्ठा होइत अछि तखन ई मतदाता बनि जाइत अछि, तखन ई देशक जनता रहैत अछि.नेता एकरा अपन भाग्य-विधाता बुझैत छथि और राजनैतिक रैली मे गेल जनताक प्रत्येक उचित-अनुचित कृत्य जनभावनाक द्योतक कहबैत अछि किएक तऽ यैह मतदाता प्रत्येक नेताक लेल सत्ता-प्राप्तिक साधन होइत अछि.वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य मे राजनीतिज्ञक दृष्टिकोण सँ "मत"क मतलब मात्र चुनाव दिन एकटा वोट सँ अछि.मतदाता के चुनावक बाद अपन अभिमत प्रकट करब चूनल प्रतिनिधि के बर्दाश्त नहि होलइत छैक. ओ एकरा अपन अधिकार मे हस्तक्षेप बुझैत छथि.
जनता जखन नेताक जय कहैत अछि तखन ई देशक जागरूक नागरिक कहबैत अछि. राजनेता सभकेँ ई तखन लोकतंत्रक कर्णधार बुझना जाइत छन्हि.लेकिन यैह जनता जखन सरकारी तंत्रक तन्द्रा तोड़बाक हेतु "भारत माताक जय" कहैत अछि किंवा "वंदे मातरम्" के नारा लगबैत अछि और हाथ मे राष्ट्रध्वज लय कुव्यवस्थाक विरोध मे आवाज उठबैत अछि तखन ई सरकार आ राजनेताक नजरि मे असभ्य, उदण्ड, आ लोकतंत्रक ओ संविधानक विरोधी बनि जाइत अछि.
बात सत्य छैक जे जनता अपन प्रतिनिधि के चुनाव करैत अछि आ बहुमतक आधार पर चुनल एहि प्रतिनिधि सभके भारतीय संविधान जनहित मे नियम-कानून बनयबाक अधिकार दैत छैक मुदा जखन जनप्रतिनिधि आ सरकारी तंत्र अपन एहि संवैधानिक अधिकार के समुचित उपयोग नहि कऽ पबैत अछि और जनहितार्थ कानून बनेबा मे विफल भऽ जाइत अछि तखन जनता अपन अस्तित्व बचेबाक हेतु, अपन भविष्यक निर्माणक हेतु एवं लोक कल्याण हेतु स्वयं ठाढ़ हेबाक लेल बाध्य होइत अछि आ फेर जनभावना आंदोलनक रूप धारण करैत अछि.सामजिक सरोकार लोकतंत्रक आधार होइत छैक लेकिन जखन सरोकारक अर्थ सरकारी शब्दकोषमे संकुचित भऽ जाइत छैक अथवा किछु खास वर्गक लोकक विशेषाधिकार बनि जाइत छैक तखन वंचित समाज अपन सरोकारक हेतु लड़बा लेल मजबूर भऽ जाइत अछि.
भ्रष्टाचारक विरूद्ध वर्तमान जनभावना, यथास्थितवादी भऽ चुकल जनता मे नव-चेतनाक प्रतीक अछि. खास कऽ एहि मे युवावर्गक सहभागिता भ्रष्टतंत्रक लेल स्पष्ट चेतावनी अछि जे आबय बला समय सामाजिक परिवर्तनक समय अछि. समाजक मध्यम एवं निम्नवर्ग मे आयल जागृति ई संकेत दऽ रहल अछि जे लोकतंत्र मे राजा आ प्रजाक बीच कोनो भेद नहि होइत छैक, ई एकटा समतामूलक एवं विकसित समाजक निर्माणक दिशा मे एकटा पैघ एवं महत्वपूर्ण संकेत अछि. सामाजिक न्याय, समानता एवं वंचित समाजक उत्थान, जे एखन धरि मात्र नारा तक सीमित अछि एवं विभिन्न राजनैतिक दलक वोटबैंक-राजनीति के शिकार अछि, एहि दिशा मे आब जन-जागृतिक प्रवल आशा कयल जा सकैत अछि. संभबतः राजनैतिक दल सभ सेहो एहि बदलैत व्यवस्था सँ किछु सिखत और राजनीति मे जनताक सेवा के सर्वोपरि बूझल जायत.
स्वतंत्रता प्राप्तिक बाद एखनधरि समाज के जाति-धर्म, अमीर-गरीब, ईत्यादि विभिन्न वर्गक आधार पर बाँटि प्रत्येक राजनैतिक दल सत्तासुख प्राप्त कयलक अछि. निजी स्वार्थ भारतीय राजनीति के एखन धरि मूल भावना रहल अछि और दिनानुदिन आम जनता एकात होइत गेल अछि. वर्तमान आंदोलन के तोड़बाक हेतु सेहो सत्ता लोलुप समाजक दिस सँ प्रयास कयल गेल मुदा एहिबेर एकर मार्ग मे जे कोनो बाधा-विघ्न आकि कानूनी दाँव-पेचक तिकड़म आयल सभटा घोटाला आ घुसखोरी सँ तंग जनाक्रोशक ज्वारि मे बहि गेल संगहि एकबेर फेर साबित भेल जे दृढ़ इच्छाशक्ति, आत्मबल, आ संयम लक्ष्यप्राप्तिक अमोघ अस्त्र अछि. ई तखन और आसान भऽ जाइत छैक जखन केयो एहन मार्गदर्शक समाज के भेटि जाय जकरा पर सभ के विश्वास हो.
एहना मे जखन देशक प्रधानमंत्री, देशक सर्वोच्च संवैधानिक संस्था, संसदक पटल सँ एहि आंदोलन और आंदोलनकारी के सलाम ठोकैत छथि और देर-सवेर समस्त जन-प्रतिनिधि जनता के अपन मालिक मानय लेल बाध्य भऽ जाइत अछि तखन " जनताक इच्छा संसदक इच्छा" बनि जाइत छैक. संगहि सत्तालोलूप और चाटुकारी सभके संकेत दैत अछि जे जनआंदोलन लोकतंत्रक कारक होइछ संहारक नहि.

करीब एकबर्ख पहिने "मिथिला समाद " मे प्रकाशित

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'विदेह' २२४ म अंक १५ अप्रैल २०१७ (वर्ष १० मास ११२ अंक २२४)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -    मैथिलानी केर उपराग राम सं आ समाज ...