Monday, July 30, 2012

'विदेह' १११ म अंक ०१ अगस्त २०१२ (वर्ष ५ मास ५६ अंक १११) PART I




                     ISSN 2229-547X VIDEHA
'विदेह' १११ म अंक ०१ अगस्त २०१२ (वर्ष ५ मास ५६ अंक १११)

ऐ अंकमे अछि:-
१. संपादकीय संदेश


२. गद्य


२.१.१.मुन्नाजी:बाल गजलः पुरान देहक नव चेहरा २.ओमप्रकाश झा: मैथिली बाल गजलक अवधारणा ३.जगदानन्द झा 'मनु' -बाल गजलक अवधारणा ४.आशीष अनचिन्हार- की थिक बाल गजल ५.चंदन कुमार झा- मैथिली बाल-साहित्य आ' बाल-गजल


२.२.१.योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’- लघुकथा- देववाणी २.नवेंदु कुमार झा- बिजलीक क्षेत्र मे आत्म निर्भरताक लेल सरकार कऽ रहल प्रयास

२.३.१.अमित मिश्र- बाल गजल: कोमल करेजक आखर २.मिहिर झा- बाल गजल

२.४.श्री राज- यात्रीक कवितामे गाम

२.५.मुन्नाजी-विहनि कथा संसार

२.६.आशीष अनचिन्हार द्वारा श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीसँ लेल साक्षात्कार

२.७.१. राजदेव मण्‍डल- जगदीश प्रसाद मण्‍डलक कवि‍ता संग्रह राति‍-दि‍नक समीक्षा २.डॉ. धनाकर ठाकुर- समीक्षा – फूल तितली आ तुलबुल (लेखक -श्री सियाराम झा 'सरस')

२.८.१.जवाहर लाल काश्यप- विहनि कथा- जमाना बदलि गेलै  २.जगदानन्द झा 'मनु'- विहनि कथा- मसोमात/ रहस्य ३.सुजीत कुमार झा- मिथिला पेन्टिङ्गक विदेशमे मांग बढल -छत्तामे मिथिला पेन्टिड्ड४.श्री जगदीश प्रसाद मण्डल- लघुकथा-सूदि‍ भरना


३. पद्य


३.१.१.मुन्नी कामत-सातटा कविता २.रूबी झा- बाल गजल ३.श्रीमती इरा मल्लिक-- बाल गजल

३.२.१. मुन्ना जी २.प्रशांत मैथिल-बाल गजल ३.पंकज चौधरी (नवलश्री)४.जवाहर लाल काश्यप५.क्रांति कुमार सुदर्शन

३.३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल- १.बाल गजल/ २.की भेटल आ की हेरा गेल (आत्म गीत)(आगाँ...) २.कामिनी कामायनी- चिडैक अभिलाष

३.४.१.अमित मिश्र-बाल गजल २. ओमप्रकाश झा- बाल गजल

३.५.१.शिव कुमार यादव- बाल गजल २.शिव कुमार झा- कविता/ गजल३.किशन कारीगर- हास्य कविता

३.६.चंदन कुमार झा- बाल गजल

३.७.१.जगदानन्द झा 'मनु' -बाल गजल २.राजेश कुमार झा- दूटा कविता ३. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक किछु गीत/ कविता

३.८.१. राजीव रंजन मिश्र- बाल गजल २. मिहिर झा- बाल गजल ३.गजेन्द्र ठाकुर- बाल गजल


४. मिथिला कला-संगीत १. ज्योति झा चौधरी २.राजनाथ मिश्र (चित्रमय मिथिला) ३. उमेश मण्डल (मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव-जन्तु/ मिथिलाक जिनगी)



5.बालानां कृते-१.मुन्नी कामत-जड़ैत ज्योत२.पंकज चौधरी (नवलश्री)- मेघक चोर



6. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.]


7.VIDEHA FOR NON RESIDENTS
7.2.8.2.Maithili poem by Sh.Jagdish Prasad Mandal translated from Maithili into English by Sh.Vinit Utpal)
 विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link.
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भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू।



गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज'


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ऐ बेर मूल पुरस्कार(२०१२) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन मूल मैथिली पोथी उपयुक्त अछि ?
Thank you for voting!

श्री राजदेव मण्डलक “अम्बरा” (कविता-संग्रह)  12.5%  

श्री बेचन ठाकुरक “बेटीक अपमान आ छीनरदेवी”(दूटा नाटक)  9.88%  

श्रीमती आशा मिश्रक “उचाट” (उपन्यास)  6.69%  

श्रीमती पन्ना झाक “अनुभूति” (कथा संग्रह)  4.65%  

श्री उदय नारायण सिंह “नचिकेता”क “नो एण्ट्री:मा प्रविश (नाटक)  5.52%  

श्री सुभाष चन्द्र यादवक “बनैत बिगड़ैत” (कथा-संग्रह)  4.94%  

श्रीमती वीणा कर्ण- भावनाक अस्थिपंजर (कविता संग्रह)  5.52%  

श्रीमती शेफालिका वर्माक “किस्त-किस्त जीवन (आत्मकथा)  8.72%  

श्रीमती विभा रानीक “भाग रौ आ बलचन्दा” (दूटा नाटक)  6.98%  

श्री महाप्रकाश-संग समय के (कविता संग्रह)  5.52%  

श्री तारानन्द वियोगी- प्रलय रहस्य (कविता-संग्रह)  5.23%  

श्री महेन्द्र मलंगियाक “छुतहा घैल” (नाटक)  9.01%  

श्रीमती नीता झाक “देश-काल” (कथा-संग्रह)  5.81%  

श्री सियाराम झा "सरस"क थोड़े आगि थोड़े पानि (गजल संग्रह)  7.27%  

Other:  1.74%  

ऐ बेर युवा पुरस्कार(२०१२)[साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन कोन लेखक उपयुक्त छथि ?
Thank you for voting!
श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरीक “अर्चिस” (कविता संग्रह)  27.45%  

श्री विनीत उत्पलक “हम पुछैत छी” (कविता संग्रह)  7.19%  

श्रीमती कामिनीक “समयसँ सम्वाद करैत”, (कविता संग्रह)  6.54%  

श्री प्रवीण काश्यपक “विषदन्ती वरमाल कालक रति” (कविता संग्रह)  4.58%  

श्री आशीष अनचिन्हारक "अनचिन्हार आखर"(गजल संग्रह)  18.95%  

श्री अरुणाभ सौरभक “एतबे टा नहि” (कविता संग्रह)  6.54%  

श्री दिलीप कुमार झा "लूटन"क जगले रहबै (कविता संग्रह)  7.84%  

श्री आदि यायावरक “भोथर पेंसिलसँ लिखल” (कथा संग्रह)  6.54%  

श्री उमेश मण्डलक “निश्तुकी” (कविता संग्रह)  12.42%  

Other:  1.96%  



ऐ बेर अनुवाद पुरस्कार (२०१३) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे के उपयुक्त छथि?
Thank you for voting!
श्री नरेश कुमार विकल "ययाति" (मराठी उपन्यास श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर)  32.65%  

श्री महेन्द्र नारायण राम "कार्मेलीन" (कोंकणी उपन्यास श्री दामोदर मावजो)  13.27%  

श्री देवेन्द्र झा "अनुभव"(बांग्ला उपन्यास श्री दिव्येन्दु पालित)  13.27%  

श्रीमती मेनका मल्लिक "देश आ अन्य कविता सभ" (नेपालीक अनुवाद मूल- रेमिका थापा)  14.29%  

श्री कृष्ण कुमार कश्यप आ श्रीमती शशिबाला- मैथिली गीतगोविन्द ( जयदेव संस्कृत)  14.29%  

श्री रामनारायण सिंह "मलाहिन" (श्री तकषी शिवशंकर पिल्लैक मलयाली उपन्यास)  11.22%  

Other:  1.02%  





फेलो पुरस्कार-समग्र योगदान २०१२-१३ : समानान्तर साहित्य अकादेमी, दिल्ली
Thank you for voting!
श्री राजनन्दन लाल दास  53.09%  

श्री डॉ. अमरेन्द्र  24.69%  

श्री चन्द्रभानु सिंह  20.99%  

Other:  1.23%  

 


1.संपादकीय


ई अंक विदेहक बाल गजल विशेषांक अछि। विदेह प्रारम्भेसँ बाल साहित्य लेल अलग पन्ना रखने अछि, एक बेर बाल साहित्य विशेषांक सेहो निकलि चुकल अछि, मुदा बाल गजल नाम्ना नव विधापर एतेक रास आलेख आ गजल जेना आएल अछि तकर श्रेय आशीष अनचिन्हारकेँ जाइत छन्हि।
बाल गजल स्थापित भऽ बच्चा सभक कण्ठपर चढ़ए आ मैथिलीकेँ जीवन्त राखए तइ आशाक संग।

सुकान्त सोमक एकटा आएल छन्हि मिथिला दर्शनमे। ओइ आलेखमे बहुत रास गलत तथ्य अछि। अतीत मंथन २००७ सँ २००९ मे छपले नै छै से हुनका नै बुझल छन्हि। गामक जिनगी मैथिली साहित्यक सर्वश्रेष्ठ कथा संग्रह छै ई तथ्य ओ स्वीकार नै कऽ सकला। मैथिलीमे कोहुना कोनो पोथीकेँ पुरस्कार भेटौ ई घुमा कऽ कहि अपन मंशा ओ प्रकट कऽ देलन्हि। भगलपुरिया जूरीकेँ ओ दरभंगिया जूरी सन बना कऽ प्रस्तुत केलन्हि, आ अहूमे हुनकर निरपेक्षता घास चरै लेल गेल बुझाइत अछि| सुकान्त सोमकेँ बुझल छन्हि जे कार्यक्रम बंगलोर मे भेलै! जखनकि कार्यक्रम कोच्चिमे भेल रहै। सुकान्त सोम टैगोर साहित्य सम्मानकेँ रवीन्द्र पुरस्कार कहि रहल छथि!! सुकान्त सोमक अघोषित जातिवाद बहुत किछु कहि जाइत अछि।

सन् सैंतालीस...
भारतक स्वतंत्रताक त्रिवार्णिक झण्डा फहरा रहल छल।
मुदा कम्यूनिस्ट पार्टीक माननाइ छल जे भारत स्वतंत्र नै भेल अछि।
असली स्वतंत्रता भेटब बाँकी छै...
मिथिलाक एकटा गाम…
जन्म होइत अछि एकटा बच्चाक.. ओही बर्ख ...
ओइ स्वतंत्र वा स्वतंत्र नै भेल भारतमे...
पिताक मृत्यु...गरीबी..
केस मोकदमा...
वंचितक लेल संघर्षमे भेटलै स्वतंत्र भारतक वा स्वतंत्र नै भेल भारतक जेल....
आइ बेरमामे पाँच-दस बीघासँ पैघ जोत ककरो नै..
ओइ गाम मे जीवित अछि आइयो किसानी आत्मनिर्भर संस्कृति...
पुरोहितवादपर ब्राह्मणवादक एकछत्र राज्यक जतऽ भेल समाप्ति..
संघर्षक समाप्तिक बाद जिनकर लेखन मैथिली साहित्यमे आनि देलक पुनर्जागरण...
जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा बायोग्राफी...गजेन्द्र ठाकुर द्वारा
उन्नैस सए साठि‍क पछाति‍। केजरीबाल हाइ स्‍कूलमे नाओं लि‍खा लेने रहथि। स्‍कूल अबै-जाइक परेशानीसँ साइकि‍ल कीनैक वि‍चार परि‍वारमे भऽ गेल। ओना जखन टेन्‍थ (स्‍पेशल नाइन्‍थ) मे रहथि तखन दू सए बासठि‍ रूपैयामे सैब्रो साइकि‍ल कीनि लेलनि। मुदा जहि‍ना सीमा परक सि‍पाहीकेँ दुश्‍मन सि‍पाहीक हाथ पकड़ेलासँ होइए तहि‍ना समस्‍याक सि‍पाही चारू दि‍ससँ परि‍वारकेँ घेर लेलकन्हि। दुनू पि‍सि‍यौत भाय (जेठ गोनर मण्‍डल आ तइसँ छोट कारी मण्‍डल) केँ अपन बाप-दादाक डीह-डाबर जगलनि‍। कोसी धारक मुँह जे पछि‍म दि‍स जोर केने छलै ओ आब पूब दि‍स जोर केलक, जइसँ कि‍छु गाम जेना हरि‍नाही, मैनही अमही हरड़ी इत्‍यादि‍क गामक जमीनक कि‍छु भाग जागलै। भागल-पड़ाएल गामक लोक, अपन बाप-दादाक डूमल सम्‍पति‍क आशामे कान ठाढ़ केनहि‍ रहथि‍, गाम (हरि‍नाही) घुमबाक वि‍चार केलनि‍। बनल-बनाएल गाममे लोकक एहेन कने स्‍वार्थी प्रवृत्ति‍ बनिए‍ जाइए जे सौंसे गामक सभ कि‍छु हमरे भऽ जाए। प्रवृत्ति‍ बेजाए नै, मुदा खाली सम्‍पत्ति‍ये नै मनुक्‍खोक भार जँ उठा लेथि‍। हरि‍नाहीक कि‍यो कतौ, कि‍यो कतौ, कतौ-कतौ एहनो जे पान-सात परि‍वार एकोठाम छलाह। अपन कुटुमैतीक संग-संग नेपाल धरि‍ पसरि‍ गेल छलाह। सभसँ दुखद स्‍थि‍ति‍ गामक तखन भेल जखन सुभ्‍यस्‍त परि‍वार सबहक, जइ परि‍वारक लोक अपन घर-अंगनाक काजसँ बाहर नै भेल छलि, ओ सभ जखन बोनि‍हारि‍न बनि‍ भरि‍-भरि‍ दि‍न अनका खेतमे जि‍नका घरमे पचसमनी कोठी-बखारी सभ छलनि‍, एक पसेरी (कच्‍ची) अन्नपर अपन श्रम बेचैले मजबूर भेली। मुदा उपाये की? ई बात सत्‍य छी जे समयानुसार हाथकेँ हथि‍यार नै भेटत तँ ओ पाछू भगबे करत, हरहरा-हरहरा कऽ पाकल जामुन जकाँ हुनका सबहक जि‍नगी उतरि‍ गेलनि‍। जि‍नगीक सभ कि‍छु हराए लगलनि‍। हराइये गेलनि‍। भागल-पड़ाएल लोकक आन देश आ आन गाममे सरकारी सहायताक कते आशा होइत ओ तँ सबहक सोझहेमे अछि‍। जे अखनो गाममे ओहन गरीब लोककेँ इन्‍दि‍रा आवास नै भेट रहल छन्‍हि‍ जि‍नका अपना नामे जमीनक कागज नै छन्‍हि‍।

साठि‍ इसवीक काति‍क। अपन गाम देखैले पि‍सि‍यौत भाय गोनर मण्‍डल हरि‍नाही गेलाह। घोघरडीहामे ट्रेनसँ उतरि‍ भाँज लगौलनि‍ तँ पता लगलनि‍ जे पहि‍ने हटनी, हटनीसँ नौआ-बाखरि‍, नौआ बाखरि‍सँ अमही तेकर बाद हरि‍नाही। कते दूर हएत तँ दू कोस। दू कोस बूझि‍ मनमे उत्‍साह जगलनि‍ जे दू कोस जाइमे बेसी-सँ-बेसी दू घंटा लागतन्हि। मुदा ई नै बूझि‍ पौलनि‍ जे घोघरडीहा हटनीयेक बीच तीनटा धार पार करए पड़तन्हि। तहूमे गमैया सवारी छि‍ऐ कि‍ने, लोकेक वि‍चारे ने चलैत अछि‍। चारि‍ घंटामे हटनी पहुँचलाह। हटनी नौआ-बाखरि‍क बीचक सीमामे एकटा सेहो नीक धार माने नम्‍हर धार। सूर्यास्‍त भेलापर हरि‍नाही पहुँचलाह। गोनर मण्‍डलक एकटा दि‍याद पहि‍नहि‍ आबि‍ गेल छलाह जइसँ ओ बीघा डेढ़ेक जमीनक मालि‍क बनि‍ रसाएल खेतक उपजा पाबि‍ कुटुम-परि‍वार दि‍स सेहो ताकए लगलाह। हरि‍नाही पहुँचते दि‍यादी भाय चुल्हाइ मण्‍डलक पाहुन बनि‍ गेलाह। गरूगर रास्‍ता देखि‍ दू दि‍न रहैक आग्रह चुल्‍हाइ मण्‍डल केलखि‍न।

गामक जे पहि‍लुका बास-भूमि‍ छलन्हि ओ गहींर भऽ गेल रहै आ बाध ऊँच बनि‍ गेल छलै। मुदा ओ अखन सुपौल जि‍लाक सीमा कात। घर मधुबनी जि‍लाक हरि‍नाही गाममे आ सभ अगवास सुपौल जि‍लाक हरड़ी गाममे। जइठामक हेमलताजी छथि‍ जे फुलपराससँ वि‍धायक रहि‍ चुकल छथि‍। करीब पनरह परि‍वार आबि‍ गाममे बसि‍ गेल। तइमे दू परि‍वारक खूँटापर बड़दो आबि‍ गेल। बाकी सभ कोदारि‍क जि‍नगीमे। अपन जागल घराड़ी आ पोखरि‍ देखि‍ गोनर मण्‍डल आकर्षित भऽ गेलाह। बास जोग तँ नै मुदा चास जोग जमीन देखि‍ चुल्हाई मण्‍डलकेँ कहलखि‍न-
“भैया अगि‍ला आठम एतै छी।”
चारि‍म दि‍न बेरमा आबि‍ मामीकेँ कहलखनि‍-
“मामी, हम अपन गाम हरि‍नाही जाएब।”
मामी- “केना जेबहक?”
गोनर- “बाँस अपना अछि‍ये। एकटा लऽ जा कऽ पहि‍ने घर बनाएब तखन बूझल जेतैक।”

जहि‍ना कोनो ब्रह्मचारी ब्रह्माश्रमसँ नि‍कलि‍ दुनि‍याँ दि‍स देखि‍ते सतरंगी दुनि‍याँ देखए लगैत तहि‍ना ओहो (गोनर मण्‍डल) देखलनि‍। केना नै देखि‍तथि‍। पूर्बक हराएल गाम-घर, दि‍याद-वाद, सर-समाज जे इति‍हास बनि‍ चुकल छलनि‍, से जे सोझामे आबए लगलनि‍। ओना हुनका (गोनर मण्‍डल) एक बीघा धनहर आ अढ़ाइ कट्ठा बासक भूमि‍ माम (जगदीश प्रस मण्डल जीक पि‍ताजी) कीनि‍ देने छलखि‍न। ओहो दुनू भाँइ (गोनर मण्‍डल आ कारी मण्‍डल) हरि‍नाही बि‍सरि‍ गेल छलाह। केना नै बि‍सरि‍तथि‍ हराएलो जमीनक दस्‍ताबेज, खति‍यान जँ हाथमे छै तँ आशा बनल रहैत छै‍। जइठाम ओहो (दस्‍ताबेज, खति‍यान) नै रहल ओ तँ पानि‍क पाथर जकाँ कतए डुमल अछि‍ तेकर कोन ठेकान। आ जँ हेलबैया (पानि‍क भाँज बुझि‍नि‍हार) रहल तँ भाँजो-भुज लगा सकैए मुदा अनाड़ी तँ अनाड़ि‍ये छी।

सातम दि‍न एकटा बाँस काटि‍ पाँङि-पुङि कऽ गोनर मण्‍डल तैयार केलनि‍ जे काल्हि‍ गाम जाएब। बेरमासँ हरि‍नाही जाएब। चारि‍ दि‍न रहि‍, पहि‍ने रहै जोकर घर बना लेब, तखन आगू बूझल जेतैक। मामीकेँ गोनर मण्‍डल कहलखि‍न-
“मामी, चारि‍ दि‍न रहि‍ पहि‍ने घर बना लेब। पाँचम दि‍न फेरि‍ एतै छी।”
मामी- “बड़बढ़ि‍या, एक अढ़ैया चाउर आ एक अढ़ैया चूड़ासँ तँ काज चलि‍ जेतह?”

असमंजसमे गोनर पड़ि‍ गेलाह। जते अधि‍क बेसी खाइक ओरि‍यान करब ओते रस्‍तामे भारि‍यो हएत। एक तँ सात-आठ कोस धार-धुरक रास्‍ता, तइपर बाँस आ खेबाक समान। बहुत भारी हएत। गाममे माने बेरमामे भरि‍ पेट जलखै कऽ लेलथि‍ आ रास्‍तोले बान्‍हि‍ लेलथि‍। अपन लोटा-थारी, आ लत्ता-कपड़ा नै लेब, सेहो नै बनत। अंतमे एकटा छि‍पली, एकटा लोटा, बि‍छबैले दूटा बोरा, एक अढ़ैया-चूड़ा आ एक अढ़ैया चाउर लऽ कऽ दोसर दि‍न बि‍दा भेलाह। एक तँ ओहन भारी काज जि‍नगीमे कहि‍यो नै केने रहथि‍। हँ एते जरूर छलनि‍ जे बँसबारि‍सँ बाँस काटि‍ आ बाधसँ धानक बोझ उघि‍ कऽ अनैत छलाह तहि‍ना बाधसँ हर जोता दूगोरा चौकी अनै-लऽ जाइ छलाह, मुदा एते भारी काजसँ पहि‍ल दि‍न भेँट भेलनि‍।

बेरमासँ नि‍कलि‍ कछुबी-तमुरि‍या होइत सुन्‍दर-बि‍राजीत जाइत-जाइत बेदम भऽ गेलाह। पाछू हि‍अबैत तँ दुइये कोस टपला, आगू हि‍अबैत, तँ अखन पौनी-चपराम, कलि‍कापुर, मेटरस तँ कोसी बान्हक बाहरे भेल। मेटरसमे ने कोसी बान्‍ह टपि‍ भीतर हेता। तैयो तँ मेटरस टपि‍ दू कोस भीतरो जाइये पड़तन्हि। अबूह लागि‍ गेलनि‍। जि‍नगीक बाटमे बच्‍चा जकाँ बुकौर लागि‍ गेलनि‍। सुसतेलाक कि‍छु काल बाद फेर हूबा केलनि‍। पानि‍ पीब बाँस उठा वि‍दा भेला। मेटरस बान्‍हपर पहुँचैत-पहुँचैत धाह-जाड़ आबि‍ गेलनि‍। एहेन जगहमे के भेँट हएत? क्‍यो चि‍न्‍हारे नै। गाम-घरमे ने माए-बाप रहने बच्‍चा फोसरि‍योकेँ गुड़-घाव कहै छै मुदा नै रहने तँ गुड़ो-घाव फोसरि‍ये भऽ जाइ छै।

बेरमाक पच्‍चीसोसँ बेसी कुटुमैती मेटरसमे तहि‍यो छल आ अखनो अछि‍। कोसी बान्‍हपर बाँस राखल आ हि‍नका (गोनर मण्‍डलकेँ) पड़ल देखि‍ एक गोटे लगमे एलनि‍। ओ बाधसँ गाम पर जाइत रहथि‍। लगमे आबि‍ पुछलखि‍न-
“कतए रहै छी?”
धाह-जाड़सँ कँपैत गोनर मण्‍डल कहलखि‍न-
“बेरमा।”
“कतए जाएब?”
“हेरनाही।”
“एहेन अवस्‍थामे केना जाएब?”
“सएह ने कि‍छु फुड़ैए।”
“एकटा काज करू। हमहूँ कि‍यो आन नै छी। हमरो बहि‍न अहीं गाममे बसैए। कुटुमे भेलौं।”
कुटुमक नाओं सुनि‍तहि‍ जेना एकाएक कतौसँ होश एलनि‍। कहलखि‍न-
“कुटुम नारायण, कहुना-कहुना जँ गाम (बेरमा) घूमि‍ जाएब तँ जान बचि‍ जाएत, नै तँ नै बचब।”
“ऐठामसँ घोघरडीहा गेल हएत?”
“खाली देहे चलि‍ जाएब।”
“सभ समान हमरा ऐठीम राखि‍ दि‍औ आ अहाँ चलि‍ जाउ। यएह (बान्‍हसँ सटले पूब) हमर घर छी।”
आशा पाबि‍ गोनर बजलाह-
“अपना संगमे चूड़ो अछि‍। चलू कनि‍ये खाइयो लेब आ रखि‍ कऽ चलि‍यो जाएब।”

जोशपर तँ घोघरडीहा स्‍टेशन वि‍दाह भेला मुदा रास्‍तामे एहेन स्‍थि‍ति‍ भऽ गेलनि‍। जे ने बाट सुझन्‍हि‍ आ ने डेगे उठनि‍।  ओइ समए चारि‍ बजे गाड़ी नि‍रमलीसँ अबैत रहै। संजोग नीक बैसलनि‍। गाड़ी पकड़ा गेलनि‍। सात बजे साँझमे गाम (बेरमा) पहुँचलाह। एक तँ भरि‍ दि‍नक थाकल तइपर बोखार, गाम अबि‍ते बोम फाड़ि ओहि‍ना कानए लगलाह जेना माए-बापक सोजहाँमे बेटा-बेटी कनैए। अपन पोसलक दशा देखि‍ मामी (जगदीश प्रसाद मण्डल जीक माए) ऐ रूपे कानए लगलीह (डाक स्‍वरमे) जना भागि‍न नै बँचतनि‍। ताधरि‍ दुनू भाँइक बि‍आह-दुरागमन भऽ गेल रहनि‍। दुनू दि‍यादि‍नीयो बेरमेमे। ले बलैया जहि‍ना साँझू पहर एकटा नढ़ि‍या कोनो झारीसँ नि‍कलि‍ पू-पहैत आकि‍ जहाँ-तहाँसँ नढ़ि‍या भूकए लगैत। ततबे नै, पास-पड़ोसक नढ़ि‍या सभ समटा-समटा एकठाम भऽ समवैत स्‍वरमे भुकए लगैए। कि‍अए ने भूकत? डरे जे भरि‍ दि‍न झाड़ी धेने रहैए, ओकरा तँ अन्‍हारे ने संगी हेतइ। जहि‍ना चोर दुनू रंगक होइए दि‍नुको आ रौतुको, तहि‍ना ने नढ़ि‍योकेँ चरौर करैक समए भेटै छै। तहि‍ना मामीकेँ कनि‍ते दुनू दि‍यादि‍नी सेहो झौहरि‍ करए लगली। झौहरि‍ सुनि‍ एके-दुइये टोलक लोक ससरि‍-ससरि‍ आबए लगली। गोनर भैयाकेँ बि‍नु देखनौं लोक आँखि‍ मीड़ि‍-मीड़ि‍ कि‍यो ठुनकए लगली तँ कि‍यो पोथी-पतरा उनटाबए लगलीह। पाँच दि‍न पहि‍ने भदबा बीत चुकल छल मुदा एकटा बुढ़ीकेँ, अंति‍म दि‍न भदबाक पता लगलनि‍। ओ ओही दि‍नसँ जोड़ैत जे आइ छठम दि‍नक भदबा छी। बजली-
“केना पहि‍ले-पहि‍ल डेग भदबामे उठौलक। जानि‍ कऽ आगि‍मे पाकए जाएब तँ जरब नै।”
जइठाम सभ कननि‍हारे जमा भऽ जाएत तइठाम चुप के करत। खैर जे हौ....।

मास दि‍नक पछाति‍ ओ (गोनर) काज-उदेम करैबला भेलाह। अगहनक कटनी बजरि‍ गेल रहै। तहूमे १९५७ ई.मे सेहो नमहर बाढ़ि‍ आएल रहै। कहैले तँ बाढ़ि‍ दहारक कारण छी मुदा उपजोक कारण छी। ई ि‍नर्भर करैत गाम-गामक जमीनक बुनाबटि‍पर। कोनो गाममे गहींर खेत बेसी अछि‍ जइमे जँ शुरूहोमे दूटा नमहर बरखा भऽ जाएत तँ पानि‍ पकड़ि‍ लैत आ एहनो ऊँचगर गाम सभ अछि‍ (बहुआहा गाम) जइमे जतबे काल बरखा भेल ततबे काल पानि‍ रहल, बाकी बरखो गेल पानि‍यो गेल। गाम सुखल कऽ सुखले रहि‍ गेल। ओहन गामक लेल बाढ़ि‍ खेलौना छी, तँए जँ छहरो-बान्‍ह काटि‍ कऽ खेल-खेलल जाए तँ की हर्ज जे एहेन खेल नै हुअए।

दुश्‍मन सि‍पाही हाथे घेराएल सि‍पाही जकाँ परि‍वार घेरा गेल रहए। एक तँ १९५८ ई.क बाढ़ि‍सँ परि‍वार धँसि‍ गेल रहए। कि‍अए ने धँसैत। एक बाढ़ि‍ वा रौदी, कृषि‍ आधारि‍त परि‍वारकेँ पाँच साल धक्का मारैत अछि‍। शुरूहे फागुनमे दुनू भाँइ (पि‍सि‍यौत) एकटा बाँस, खेबा-खरचाक संग हरि‍नाही गेला। बाँसक खुट्टापर मनेजरक कोरो-बातीक घर ठाढ़ कऽ काशसँ छाड़ि‍ लेलनि‍। रहैक ठौर होइते अपन पोखरि‍बला जमीनकेँ साफ कऽ ताम-कोर करए लगलाह। खट्ठा पटेर-झौआक बोन। जहि‍ना बादमे वि‍यतनामक लोक एक-एक इंच भूमि‍, जे बम-बारूदमे नष्‍ट भऽ चुकल छल, खेती योग्‍य बनौलनि‍। तहि‍ना हरि‍नाहीक लोक गामक बोन उजाड़ए लगलाह। बोन एहेन जे दस धुर तमनि‍हार अपनाकेँ मेहनती बुझैत। दुनू भाँइ बोनो तोड़थि‍ आ गाम (बेरमा) आबि-आबि‍ खरचो लऽ जाथि‍। छह मासक बाद पहि‍ल उपजा हाथ लगलनि‍। ढेनुआर गाए जकाँ एक संग जली (धान), मकइ, काउन इत्‍यादि‍‍ हाथ लगलनि‍। परि‍वारक काज बढ़लनि‍। खेतीक लेल एकटा बड़द सेहो कीनि‍ कऽ लऽ गेलाह। परि‍वारक एकटा रूप रेखा तैयार भऽ गेलनि‍।

अखन धरि‍ हरि‍नाही गाममे बीस परि‍वार बसि‍ चुकल छलाह। तीनटा चापाकल सेहो गरि‍ चुकल छल। पानि‍क सुवि‍धा से भऽ गेल छलै। बीस फीट पाइप, छह फीट फील्‍टरमे भऽ जाइ। नगदी फसल पटुआक खेती शुरू भेल। तीस-पेंतीस बीधा जमीन उपजाउक हरि‍नाही गाम बनि‍ गेल।

१९६२ ई.मे कारी मण्‍डल (जगदीश प्रसाद मण्डल जीक छोट पि‍सि‍यौत भाए) बीमार पड़लाह। नीक बीमार। इलाजक कोनो सुवि‍धा हरि‍नाहीमे नै। तइ समैमे दरभंगा जि‍लाक झगडुआ गामक एक गोटे बेरमेमे डॉक्‍टरी करैत छलाह। मुसलमान छलाह। मनसारा मात्रि‍क। मनसारा-झगड़ुआ सटले दुनू गाम। जइसँ हिनका सभक मामा-भगि‍नाक संबंध ओइ डाॅक्‍टर सहाएबक संग बनल छलन्हि। ओना ओ रहै छला मुसलमान टोलमे, मुदा मात्रि‍कक अनेसँ बेसी काल अहीठाम रहै छलाह। हुनका माए कहलकनि‍ जे भैया, भागि‍न बड़ दुखि‍त अछि‍।
ओ जाइले तैयार भऽ गेलाह।

ओइ समए बेरमामे दूटा वैद्य छलाह। पहि‍ल सुन्‍दर ठाकुर आ दोसर छलाह नीरस महतो। सुन्‍दर ठाकुर पंडि‍त छलाह। आचार्य छलाह। मुदा शरीरसँ अबाह (नांगर) छलाह आ थोड़ेक बोली तोतराइ छलनि‍। मुदा ओ जि‍नगीकेँ एते लगसँ देखै छेलखि‍न जे परि‍वारसँ कि‍छु हटि‍ अपन आश्रम बनौने छलाह। औषधालय नाम छलैक। खेत-पथारबला परि‍वार रहने औषधालय अइल-फइलसँ बनौने छलाह। औषधालयक आंगनमे सइयो रंगक जड़ी-बूटी सभ लगौने छलाह। नि‍अमबद्ध जि‍नगी छलनि‍। ओना नि‍अम भंग सेहो होइत छलनि‍। नि‍अम भंगक कारण रहनि‍ वैदागरी करब। वैदागरी (डॉक्‍टरी) ओहन पेशा छी जे जि‍नगीक अंति‍म घाट धरि‍ बसैत अछि‍। तँए कखन कोन घाटक यात्री चलि‍ आओत तेकर ठेकान नै। मुदा वैद्यजी मे कि‍छु कर्मक प्रति‍ मजगुति‍यो रहनि‍। मजगूती ई रहनि‍ जखन ओ पूजा करए लगथि‍ तखन कि‍यो हुनका टोकि‍ नै पबैत। तइले ओ एकटा ओगरबाह रखै छलाह। मुदा मनमे ई कचोट रहबे करनि‍ जे जइले पूजा करै छी जँ ओ देवता आगूमे चलि‍ आबथि‍ तखन की करब? मुदा कि‍छुए दि‍नक पछाति‍ रूटि‍ंग बदलि‍ लेलनि‍। चौबीस घंटाक गाड़ीमे लोक अपना-अपना ढंगसँ रूटि‍ंग (काजक हि‍साबे) बना लैत अछि‍। तहि‍ना ओहो दि‍नक पूजा करब छोड़ि‍ राति‍मे करए लगलाह। जइसँ सभकेँ बराबरे लाभ हुअए लगलनि‍। जि‍नगि‍यो नमहर बनौने छलाह, अठबारे घोड़ापर चढ़ि‍ आन-आन गामक वैद्य सभ ऐठाम जाइ छलाह, हि‍नको ऐठाम अबै छलनि‍। जइसँ वैचारि‍क संबंधसँ लऽ कऽ बेवहारि‍क (जड़ी-बूटीक गाछ लगबैक संबंधसँ लऽ कऽ दवाइ बनबैक ढंग धरि‍) संबंध मजगूत छलनि‍।

दोसर वैद्य छलाह नीरस महतो। पं. सुन्‍दर ठाकुर जकाँ पढ़ल-लि‍खल नै मुदा मनुक्‍खोक तँ अजीव बुनाबटि‍ अछि‍। कि‍यो कओलेजसँ पढ़ि‍ डाॅक्‍टर-इंजीनि‍यर बनैत छथि‍ तँ कि‍यो गामे-घरमे घूमि‍-फि‍रि‍ बनि‍ जाइत छथि‍। तहि‍ना ओहन रामायण आ महाभारत पढ़नि‍हार (गाबि‍ कऽ पढ़नि‍हार) कतेको छथि‍ जि‍नका अपन नाओं-गाओं लि‍खए नै अबैत छन्‍हि‍। माटि‍सँ उपजल वैद्य नीरस महतो छलाह। गाममे दुनू गोटेक इलाज चलैत छलनि‍। मुदा एलोपैथी दवाइक आगमन गाममे सेहो भऽ चुकल छल। जइसँ बेरमाक बगलक गामक टूनीबाबू आ बुचकुन बाबूक आबा-जाही सेहो भऽ गेल छलनि‍। झगड़ुआबला डाॅक्‍टर करीब पनरह बर्ख बेरमामे रहलाह। ओना हुनकर नाओं अखनो नै ककरो बूझल छै। तेकर कारण छै‍ जे सभ ममे कहै छलन्हि आ ओहो भगि‍ने कहै छलखिन्ह‍। जगदीश प्रसाद मण्डलक माइयो भइये कहनि‍ आ ओहो बहीनि‍ये कहथि‍न। टोलक (मुसलमान) लोक डाॅक्‍टर सहाएब कहनि‍ तँ कि‍छु टोलक लोक मोलबी सहाएब कहनि‍। ओना ओ नवाजी सेहो छलाह। कि‍छु टोलक लोक मोलबी सहाएब डाॅक्‍टर कहनि‍ तँए हुनकर असल नाउँए हरा गेल रहनि‍।

जगदीश प्रसाद मण्डलक जेठ भाय (कुलकुल मण्‍डल) माए आ मामा (डॉक्‍टर) तीनू गोटे तमुरि‍यामे गाड़ी पकड़ि‍ घोघडीहा बान्‍ह (कोसी) तक तँ उत्‍साहसँ गेला, मुदा बान्‍हपरसँ जे देखलनि‍ तँ माइयो आ भैयोक मन डरि‍ गेलनि‍। आगू डेग बढ़बैक हि‍आउए ने होन्‍हि‍। बान्‍हक बगलेमे नमहर धार। जेकर पानि‍ काफी तेज गति‍मे चलैत। मामा बूझि‍ गेलखि‍न। ओ धैर्य बढ़बैत कहलखि‍न-
“बहि‍न, ई कोन धार छि‍ऐ, ऐसँ नमहर-नमहर धारमे नाव चलबै छी आ हेलबो करै छी। केहन बढ़ि‍या नाव छै। जहि‍ना सभ पार करत तहि‍ना हमहूँ सभ पार करब।”
तइ बीच एक गोटे हरि‍नाहि‍येक भेट गेलनि‍। बान्‍हेपर पूछ-आछसँ भाँज लागि गेलनि‍। शहर-बाजारमे बि‍ना मतलबे कि‍छु पूछब नीक नै होइ छै मुदा धारक इलाका, बोनक इलाका, मरूभूमि‍क इलाकामे ओहन नीक होइ छै जे संगी भेट जाइ छै।

तीनू गोटे हरि‍नाही पहुँचलाह। डॉक्‍टरक नाओं सुनि‍‍ते आनो-आन परि‍वारक लोक जमा भऽ गेल। पहुँचते सूइया-दवाइ चालू केलनि‍। कारी मण्‍डलक इलाज शुरू भेल।

चाहक नीक अभ्‍यासी डॉक्‍टर सहाएब। ओना चाहे टा अमलो रहनि‍। गाममे चाहक दोकानक कोन बात जे चाहपत्ती चि‍नि‍योक दोकान नै। बेरमासँ जखन वि‍दा भेला वा घोघडीहामे जखन गाड़ीसँ उतरलाह तैयो नै मन पड़लनि‍। मनो केना पड़ि‍तनि‍? बि‍नु देखल जगह केहेन अछि‍ केहेन नै तइ दि‍स नजरि‍ कि‍अए पड़ि‍तनि‍। पहि‍ल दि‍न तँ कहुना खेपि‍ गेलाह मुदा दोसर दि‍न तबाही हुअए लगलनि‍। बि‍नु चाह पीने मने भङठि‍ गेलनि‍। इमहर माइयो आ भैयोकेँ बूझि‍ पड़नि‍ जे कतए आबि‍ गेलौं।

पहि‍ल दि‍नक इलाजसँ हुनका (कारी मण्‍डल) मे कि‍छु सुधार भेलनि‍। मामाकेँ (डॉक्‍टर सहाएब) एक दि‍स चाहक झपनी धेने रहनि‍ तँ दोसर दि‍स रोगक इलाजसँ मनमे खुशि‍यो उपकैत रहनि‍।
अखन धरि‍ गाममे गोर दसेक महि‍सो-गाए भऽ गेल छलै। सहरसा जि‍ला (अखन सुपौल) आ मधुबनी जि‍लाक सीमाक कातमे हरि‍नाहि‍यो आ हरड़ि‍यो बसल अछि‍। बीचमे एकटा मरने धार, जे हरि‍नाहि‍यो आ जएह धार दुनू गामकेँ उपटौने छल। भैयाक घर (गोनर मण्‍डलक) गाममे सभसँ पछि‍म। कि‍एक तँ जहि‍ना बजार आगू मुँहे कऽकऽ घुसकैत चलैए तहि‍ना ने नव गामो चलैए। पूवे-पच्‍छि‍मे गाम, ओना ओ सूर्यमंडल गाम भेल। जे बासक हि‍साबसँ (पहि‍लुका) नीक नै भेल, कि‍एक तँ आगि‍-छाय आ हवा-बि‍हारि‍क दृष्‍टि‍सँ उजार बेसी हएत। धारक भीता-काते-काते जहि‍ना पच्‍छि‍म तहि‍ना पूब। जगदीश प्रसाद मण्डलक अपन दि‍याद चुल्‍हाइ मण्‍डल कहलखि‍न जे सभ दि‍याद लगाइये कऽ घर बान्‍हब। पछबारि‍ भाग हुनकर घर तँए जगदीश प्रसाद मण्डलक भैयो पच्‍छि‍मे दि‍स घर बन्‍हलनि‍। ओइ समए सभसँ पच्‍छि‍म घर रहनि‍ मुदा अखन ओइसँ बहुत पच्‍छि‍म तक गाम बढ़ि‍ गेल अछि‍।

दि‍नक करीब तीन बजे, हरि‍नाहि‍योक महींस आ हरड़ि‍योक पछबारि‍ टोल (जइ टोल परक हेमलताजी छथि‍।) जे फुलपरासक पूर्व वि‍धायक रहि‍ चुकल छथि‍।) हरि‍नाही बीस-पच्‍चीस घरक गाम आ हरड़ी तीन टोलमे बँटल। जे थोड़े हटि‍-हटि‍ कऽ बसल। धारेक पेट आ कि‍नछरि‍मे दुनू गामक महींस सभ चरैत रहै, कि‍ नै आकि‍ चरबाहा सभमे झगड़ा शुरू भेलै। दुनू गाम लगे-लगे। हँसेरा-हँसेरी भऽ गेल। खूब नमहर मारि‍ (लाठी-लठौबलि‍) भेल। कते गोटेकेँ कपार फुटल, हाथ-पएर टुटल। दू जाति‍क दुनू टोल, खूब मनसँ मारि‍ भेल। कम घर रहि‍तो हरि‍नाहीक कि‍छु परि‍वार सि‍ंहेश्वर स्‍थान दि‍ससँ आबि‍ बसल रहए, तीनटा सेसर खलीफा रहए, तँए मारि‍ बेसी हरड़ीबला खेलक। मुदा केश-फौदारी नै भेल। तेकर कारणो रहै जे एम्‍हर फुलपरासकेँ थाना चारि‍ धार टपि‍ आबए पड़ैत तँ ओम्‍हर सुपौल सन्‍मुख कोसीक कते छाँट-छुँट पार करए पड़ैत।

गोनर मण्‍डलक घरसँ करीब पाँच बीघा पच्‍छि‍म मारि‍ भेल। मरदा-मरदी तँ मारि‍ करए गेल रहथि‍ मुदा स्‍त्रीगण आ बच्‍चा सभ तमाशा देखलक। बेरमोक तीनू गोटे- डाँक्‍टरो सहराएब माइयो आ भैयो मारि‍ देखलनि‍। मारि‍ देखि‍ तीनू भयभीत भऽ जाइ गेलाह। तीनूक पाछू अपन-अपन कारण रहनि‍। डाॅक्‍टर सहाएब थाना-कचहरी जनैत रहथि‍ तँए भयभीत रहथि‍। अंदाज रहनि‍ जे जखने थाना औत तखने मारि‍ केनि‍हार गाम छोड़ि‍ देत। मुदा जगदीश प्रसाद मण्डलक.....।
तहि‍ना जगदीश प्रसाद मण्डलक माए आ भायकेँ सेहो बेरमाक १९५६-५७ ई.क पुलि‍सक दौड़ देखल रहनि‍। साँझू पहर सभ वि‍चार केलनि‍ जे काल्हि‍ भारे ऐठामसँ मरीज (कारी मण्‍डल) केँ लेने गाम (बेरमा) चलि‍ जाएब। सहए केलनि‍।

अपना ऐठाम (बेरमामे) तीनटा महींस  आ दूटा बड़द खूँटापर रहैत छलन्हि। समांग घटने महींस तीनसँ एक भऽ गेल। बड़द बि‍ना बनैबला नै। चारि‍-पान साल पहि‍नहि‍ १९५६-५७ ई.मे भाय मि‍ड्ल स्‍कूल छोड़ि‍ अमानत (अमीनी) मे नाओं लि‍खा लेलनि‍ छबे मासक पढ़ाइ। मुजफ्फरपुरसँ एकटा शि‍क्षक (अमीन) आबि‍ गाममे स्‍कूल चलौने रहथि‍। जइमे पहि‍ने दस गोटे नाओं लि‍खौलनि‍। मुदा कि‍छु दि‍न पछाति‍ आबि छह गोटे छोड़ि‍ देलनि‍। चारि‍ गोटे अन्‍तो-अन्‍त पढ़ि‍ अमीन बनलाह।

अखन धरि‍ जगदीश प्रसाद मण्डल महींस पाछू तँ नीक जकाँ नै पड़ल रहथि मुदा भाय सबहक संगे चरबए जाइत रह्थि। समांग घटने भारे पड़़ि‍ गेलन्हि। परि‍वारक आमदनी रहन्हि। पि‍सि‍औत भाइक परि‍वार गेने (हरि‍नाही गेने) परि‍वार कमलन्हि। जइसँ परि‍वारक काजो घटलन्हि। अखन तक माए घरसँ नि‍कलि‍ खेत-पथार नै जाइत छलन्हि, सेहो जाए लगलीह। जगदीश प्रसाद मण्डलक भैयाकेँ (गोनर मण्‍डल) जे जमीन देल गेल रहनि‍ ओ बेचि‍ कऽ लऽ गेला। जइसँ खेतो कमलन्हि। उपजो कमलन्हि। मुदा चारि‍म पीढ़ीमे आइयो ओइ परि‍वारक संग ओहने संबंध बनल छन्हि‍ जहि‍ना पहि‍ने छलन्हि। अखनो उमेश मण्‍डल (पुत्र) संग जे संजय रहैए‍ ओ पि‍सि‍औते भाइक पोता छि‍यनि‍।

हाइये स्‍कूलमे रहथि तखन दुरागमन भेलन्हि। बि‍आह पहि‍नहि‍ भऽ चूकल छलन्हि। पि‍सि‍औत भायकेँ गेलासँ परि‍वारे नै कमलन्हि, घरक कारोबार कमि‍ गेलन्हि। परि‍वारक भीतर अन्‍दरूनी वि‍वादक जन्‍म सेहो भेल। जगदीश प्रसाद मण्डलक पढ़ब वि‍वादक कारण मूलमे छल। जेकर दूटा सि‍र (स्रोत) छलै। पहि‍ल भाय सहाएबक आ दोसर समाजक हि‍त-अपेछि‍तक। खुल्‍लम-खुल्‍ला तँ परि‍वारमे नै छल मुदा भाय सहाएबक क्रि‍या-कलाप बदलए लगलनि‍। जइसँ घरक काज छोड़ि‍ भरि‍ दि‍न नाचक पाछू पड़ि‍ गेला। सासुरोमे नाच पार्टी चलनि‍।

१९६७ ई.क चुनाव आएल। जगदीश प्रसाद मण्डलो कम्‍युनि‍स्ट पार्टीक सदस्‍य बनि‍ गेल रहथि। चुनावमे जि‍ला भरि‍क बूथपर खूब धाँधली भेल। ओना जहि‍ना खूब धाँधली भेल तहि‍ना गामे-गाम मारि‍यो-पीट खूब भेल। केश-मोकदमा खूब बढ़ल। जहलक आबा-जाही सेहो बढ़ल। केश-मोकदमा भेने कोट-कचहरीक काज बढ़ल। राज्‍यमे (बि‍हार) सत्तरहे टा जि‍ला छलै। ओइमे बढ़ोत्तरीक संभावना बढ़ल। सवडि‍वीजन, ब्‍लौक इत्‍यादि‍ सभमे बढ़ोत्तरीक संभावना बढ़ल।

१९६७ ई.क चुनावमे (अखुनका मधुबनी जि‍ला, तइ समए अनुमंडले छल) कम्‍युनिस्ट पार्टीक एम.पी. भोगेन्‍द्र जी (भोगेन्‍द्र झा) भेलाह। दूटा पार्लियामेंट सीटमे एकटा कम्‍युनि‍स्ट पार्टीकेँ आ एकटा सोशलिस्ट पार्टी (शि‍वचन्‍द्र  झा) केँ भेल। ओना जि‍लासँ काँग्रेस जहि‍ना पार्लियामेंटसँ हारल तहि‍ना वि‍धान सभामे सेहो हारल। कम्‍युनि‍स्ट पाटीकेँ चारि‍टा एम.एल.ए. आ एकटा एम.पीक सीट भेटल। राज्‍यक सरकार बदलि‍ गेल मुदा देशक (दि‍ल्‍लीक) सरकार नै बदलल। मुदा वि‍रोधी दलक सदस्‍य बढ़ल। जइ-जइ राज्‍यमे काँग्रेसी सरकार टुटल ओइ-ओइ राज्‍यमे वि‍रोधीक सरकार बनल। मुदा एकछाहा कतौ ने बनल। खि‍चड़ी सरकार बनल। काँग्रेस पार्टीसँ एक ग्रुप टूटि‍ जनक्रान्‍ति‍ दल बि‍हारमे बनौने छल। जेकर नेतृत्‍व माहामाया बाबू करैत छलाह। मुख्‍यमंत्री बनलाह। अखन भ्रष्‍टाचार मुख्‍य समस्‍या बनि‍ गेल अछि‍। मुदा ओहू समैमे चोरनुकबा खूब रहए। चाहे जे कोनो वि‍भाग रहै भ्रष्‍टाचारसँ आक्रान्‍त छल। माहामाया बाबूक सरकार पछि‍ला काँग्रेसी मंत्रीक वि‍रोधमे सुप्रीम कोर्टक जजक नेतृत्‍वमे जाँच आयोग बनौलक। अय्यर आयोग नाओं पड़ल।
बैद्यनाथ राम अय्यर सुप्रीम कोर्टक जज छलाह। दक्षिणक छथि‍। करीब पनचानबे-छि‍यानबे बर्खक छथि‍। जीवि‍ते छथि‍। पूर्व बि‍हार सरकारक छहटा मंत्रीक वि‍रूद्ध अपन जाँच रि‍पोर्ट दऽ देलखि‍न। करोड़ोक लूट सावि‍त कऽ देने रहथि‍न।

१९६६ ई.मे बि‍हार रौदीक चपेटि‍मे आबि‍ गेल। ओना पहि‍ल बर्ख रहने ओते बुझि‍यो नै पड़लै। जँ बूझि‍ पड़ि‍तै तँ १९६७ ई.क चुनावी मुद्दा बनैत से नै बनल। मुदा सरकार बनला उत्तर दोसर बर्ख खूब बूझि‍ पड़ए लगलै। भुखमरी हुअए लगल। सरकारक सोझा जबर्दस्‍त सबाल उठि‍ कऽ ठाढ़ भेल। जमाखोर सबहक वि‍रोधमे अभि‍यान चलबैक ि‍नर्णए भेल। मुदा तेहेन नाटक ठाढ़ भऽ गेल जे अभि‍यान मजाक बनि‍ गेल। नाटक ई भेल जे दस बीसटा ओहन सभ पकडाए लगल जेकर कारोबार (अन्नक कारोबार) घोड़ा-घोड़ीपर चलैत रहए। मुदा सोलहन्नी सएह नै भेल, कि‍छु एहनो जमाखोर पकड़ाएल जेकरा गोदाममे लाखो क्‍वीन्‍टल अनाज रहए।

पार्लियामेंटक शपथ ग्रहण केला पछाति‍ भोगेन्‍द्र जी जखन मधुबनी घुमलाह तँ सकरीमे पहि‍ल आम सभा केलनि‍। एक तँ नव सदस्‍य रहने दोसर अपन पार्टीक रहने करीब पनरह-बीस गाम (बेरमा) सँ सभामे भाग लि‍अ गेलथि। गाड़ीक सुवि‍धा रहबे करन्हि। तहूमे लाल झंडाबला सभ दि‍ल्‍ली तक प्रदर्शन करि‍ते छल। ओना भोगेन्‍द्र जीक भाषणक गुण रहलनि‍ जे ओ पहि‍ने बाजि‍ दइ छलखि‍न जे जि‍नका जे प्रश्न पुछैक हुअए ओ पूछि‍ दि‍अ। जबाब देब हुनका भाषणक मूल बि‍न्दु छलनि‍। भाषणो नमहर करैत छलाह। समए भेटलापर तीन-तीन, चरि‍-चरि‍ घंटा बजि‍ते रहि‍ जाइत छलाह।

ओइ समए ि‍नर्मलीसँ समस्‍तीपुर एकटा गाड़ी चलैत रहए। बड़ी लाइनक कतौ पता नै। मुदा कम्‍युनिस्ट पार्टीक लड़ाइक एकटा मुद्दा ईहो रहए। कखनो उग्र तँ कखनो धीमी गति‍सँ चलि‍ते रहए। ओना पूबोसँ आ पच्‍छि‍मोसँ अबैबला गाड़ीक मेल सकरि‍येमे रहै मुदा से नै भेलै। ककरघटीमे मेल भेने पछबरि‍या गाड़ी पछुआ गेल। स्‍टेशनसँ थोड़बे हटि‍ कऽ दछि‍नबारि‍ भाग सभाक आयोजन भेल।

जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा बायोग्राफी...गजेन्द्र ठाकुर द्वारा (अनुवर्तते...)
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"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २३० म अंक १५ जुलाइ २०१७ (वर्ष १० मास ११५ अंक २३०)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. आशीष अनचिन्हार-  "कतेक रास बात" इंटरनेटपर मैथिलीक पहिल उपस्थिति नै अछि ...