Sunday, May 13, 2012

'विदेह' १०५ म अंक ०१ मइ २०१२ (वर्ष ५ मास ५३ अंक १०५) PART II


३. पद्य








३.७.चंदन कुमार झा

३.८.नवीन कुमार ‘‘आशा’’-गर्भक आवाज 
श्यामल सुमन
मोन कियै सिंहासन पर
मोन कियै सिंहासन पर
घर मे आफत राशन पर

काज करय मे दाँती लागय
तामस झाड़ी बासन पर

लाज करू जे पाहुन जेकाँ
खाय छी कोना आसन पर

खोज-खबर नहि धिया-पुता के
बात सुनाबी शासन पर

बिना कमेने किछु नहि भेटत
जीयब खाली भाषण पर

कहू सोचिकय कहिया सुधरब
जखन उमरि निर्वासन पर

सुमन समय पर काज करू
आ सोचू निज अनुशासन पर


 
चलू बैसिकय केँ कानय छी
रीति बिगड़ि गेल जानय छी
चलू बैसिकय केँ कानय छी

असगरुआ जौं
 नहि नीक लागय 
आओर लोक केँ आनय छी

समाधान आ कारण हमहीं
बात कियै नहि मानय छी

पैघ लोक के
 बात, सोचबय
के के
 एखन गुदानय छी

आस व्यर्थ छी बिना प्रयासक
फुसिये गप केँ तानय छी

नीक आओर अधलाह लोक केँ
कियै एक सँग सानय छी

लऽ कऽ चालनि सुमन हाथ मे
नीक लोक केँ छानय छी


 
गलती बारम्बार करू
गलती बारम्बार करू
अधलाहा सँ प्यार करू

दुर्गुण सँ के दूर जगत मे
निज-दुर्गुण स्वीकार करू

दाम समय के सब सँ बेसी
सदिखन किछु व्यापार करू

अपने नीचा, मोन पालकी
एहि
 पर कने विचार करू

बल भेटत स्थायी, पढ़िकय
ज्ञानो पर अधिकार करू

भाग्य बनत कर्मे टा फल सँ
 
आलस केँ धिक्कार करू

प्रेमक बाहर किछु नहि भेटत
प्रीति सुमन-श्रृंगार करू

 
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१.दिनेश रसिया- २.उमेश पासवान

दिनेश रसिया
हम पत्रकार


हम छी एकटा पत्रकार
न्याय दिलाबऽ के लेने छी भार
जकर महिमा रहल अछि अपार
मुदा तैयो किए मरैत अछि पत्रकार

कहाबै छी हमहीं देशक तेसर आँखि
लगा कऽ सूर्यपंखी घोड़ाक पाँखि
अन्याय निकाली हम सभ ताकि-ताकि
सत्य आ निष्ठा पर रहै छी अटल
तैयो किए पत्रकारे के गर्दनि कटल

हम सभ करै छी सत्य तथ्य के खोज
सुबहसँ शामतक चाहे भुखल रही रोज
चाहे रहऽ परए रौदमे खजुरक पात जेकाँ सोमत
तब जाके करबै छी जनताकेँ सही बातकेँ अबगत
तैयो किया सब देखाबैये हमरे लग तागत
बाराके मरायल बिरेन्द्र शाह,ककरा आयल छल आह
तब मरायल दिदी उमा सिंह, जकरा केलक संसारसँ बिदा
अखन देखु यादब पौडेलके भेल उहे गती, तैयो नै आयल अछि शान्ति
रोकु ई अत्याचार नै तँ आब करब हम सभ मिल कऽ पत्रकार जनक्रान्ति ।

उमेश पासवानक तीनटा कवि‍ता-

डर

हे यौ केना कहै छि‍ऐ
नै छै डर
आॅफि‍समे हाकि‍मक डर
घरमे घरवालीक डर
देशमे
आतंकवादी-माओवादीक डर
हे यौ केना कहै छि‍ऐ
नै छै डर
जनताकेँ नेतासँ डर
बापकेँ बेटासँ डर
सासुकेँ पुतोहुसँ डर
बि‍जली रहि‍तौ
लॉडस्‍पीकरक डर
खेलमे मैच फि‍क्‍सिंगक डर
रूपैयामे जाली नोटक डर
हे यौ केना कहै छि‍ऐ
नै छै डर
गोसाइकेँ भगतासँ डर
मन्‍दि‍रक चन्‍दाकेँ पण्‍डासँ डर
घी खरि‍दब तँ
डलडासँ डर
प्रेम करब तँ धोखाक डर
हे यौ केना कहै छि‍ऐ
नै छै डर।



नटि‍न

झोटा झोटौबलि‍
हेतौ नटि‍नि‍या
तोरा संग अही बेर गे
करबौ हम चुमौन
अही लगनमे
एतौ घरमे सौतीन
उदि‍न उ दि‍न अबैमे नै छै देरी गे
झोटा झोटौबलि‍
हेतौ नटि‍नि‍या
आठ बजे दि‍न धरि‍
सूतल रहै छेँ तूँ
पुरुषसँ करबै छेँ चूल्ही-चौकाक काम
केहेन करै छेँ तूँ अनहेेर गे
झोटा-झोटौबलि‍
हेतौ नटि‍नि‍या
रहै छेँ घरमे बैसल
करै छेँ उकटा-पेंची
नैहरे लागे तारा नीक गे
टोले-टोले घुमल फि‍रै छेँ
कामक बेरमे अंगनेमे
लागि‍ जाइ छौ दि‍क गे
झोटा-झोटौबलि‍
हेतौ नटि‍नि‍या
बाबू तोहर गामक मुखि‍या
बेटी तेकर दुलारी गे
ससुर-भैंसूरकेँ दि‍अर सन बुझै छेँ
माथपर कि‍एक नै लइ छेँ साड़ी गे
ओल सन तँू
बोल बजै छेँ
केना कही हम तोरा
मि‍थि‍लाक नारी गे
झोटा-झोटौबलि‍
हेतौ नटि‍नि‍या।



बताह

गुम-सुम
बैसल रहै ओ
अप्‍पन हाथक
लकि‍र नि‍हारि‍ कऽ
हँसैए ओ
गुज-गुज अन्‍हरि‍या
राति‍मे असगरे
घुमल-फि‍ड़ैए ओ
गि‍त गुनगुनाइत अछि‍ तँ
कखनो जोरसँ
गबैए ओ
हुनक भेष-भुसा देखि‍ कऽ
लोग कहैए ओ हि‍नका
छथि‍ बताह
सुनि‍ कऽ बि‍खनि‍-बि‍खनि‍
गारि‍ पढ़ैए ओ
पहि‍रने फाटल-अंगा-पेंट
नम्‍हर-नम्‍हर
केश-दाढ़ी
बढ़ेने रहैए ओ
घूि‍म-घूमि‍ कऽ
माँगि‍-चाँगि‍ कऽ खाइए ओ
जखन कि‍यो
दुतकारैए हि‍नका
बोम फाड़ि‍ कऽ कानैए ओ
कि‍ साँचे बताह अछि‍ ओ?


 
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जवाहरलाल कश्यप

पानिक बुंद चढैत अछि आगि पर
पानिक बुंद चढैत अछि आगि पर
बनैत अछि भाफ
मिलैत अछि प्रक्रिति मे
खत्म होएत अछि ओकर अस्तित्व
तखन बनैत अछि
स्वच्छ निर्मल जल /
आदमी चढैत अछि सत्यक ताप पर
बनैत अछि दयाशील
मिलैत अछि प्रक्रिति मे
खत्म होएत अछि ओकर अस्तित्व
तखन बनैत अछि
मानव महामानव /

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ओमप्रकाश झा

गजल
नैनक छुरी नै चलाबू यै सजनियाँ
कोना कऽ जीयब बताबू यै सजनियाँ

नै चोरि केलौं किया डरबै हम-अहाँ
सुनतै जमाना सुनाबू यै सजनियाँ

छी हम पियासल अहाँ प्रेमक धार छी
आँजुर सँ हमरा पियाबू यै सजनियाँ

बेथा करेजक किया नै सुनलौं अहाँ
हमरा सँ नेहा लगाबू यै सजनियाँ

छटपट करै प्राण तकियो एम्हर अहाँ
"ओम"क करेजा जुडाबू यै सजनियाँ
बहरे-सगीर
मुस्तफइलुन-फाइलातुन-मुस्तफइलुन
दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ, दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ, दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ

गजल
तकियो कनी कानैए उघारल लोक
गाडब कते, दुख मे बड्ड गाडल लोक

धरले रहत सब हथियार शस्त्रागार
बनलै मिसाइल भूखे झमारल लोक

छै भरल चिनगीये टा करेजा जरल
अहुँ केँ उखाडत सबठाँ, उखाडल लोक

लोकक बले राजभवन, इ गेलौं बिसरि
खाली करू आबैए खिहारल लोक

माँगी अहाँ "ओम" वोट मुस्की मारि
पटिया सकत नै एतय बिसारल लोक
बहरे-सलीम
दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ, दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व, दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व
मुस्तफइलुन-मफऊलातु-मफऊलातु (पाँति मे एक बेर)
 

कुण्डलिया
आइ-काल्हि बाबा सभक लोकप्रियताक देखैत एकटा रचना प्रस्तुत अछि।
निर्मल मोन सँ बाबाजी दए छथि आशीष।
खाता नंबर अहाँ लिखू, जमा कराबू फीस।
जमा कराबू फीस, बिगडल काज बनत,
केनेए जे हरान, से सबटा कष्ट जरत।
कहैए "ओम" धरू बाबाक चरण-कमल,
फीसक लियौ रसीद, भेंटत कृपा-निर्मल।


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जगदीश प्रसाद मण्डलक पद्य-

 


गीत-३९

हरा-पड़ा ढेरि‍आएल ढेर
भोर-साँझ भूमकैत रहै छै।
भोर-साँझ....।
जइ डीह चढ़ि‍ नढ़ि‍या भूकै
उसरन-वि‍सरन होइत रहै छै
उसरन-वि‍सरन होइत रहै छै।
हरा-पड़ा...।
तान मारि‍, मारि‍ तानि‍ कि‍यो
छि‍नकि‍-छि‍नकि‍ छि‍छि‍आइत रहै छै।
छि‍नकि‍-छि‍नकि‍ छि‍छि‍आइत रहै छै।
हरा-पड़ा...।
बान्‍हल दौन कराम जहि‍ना
उरदा-खेरहा दौन करै छै
आसा-आस लागि‍ लगौने
ति‍ले-ति‍ल ति‍लमि‍लाइत चलै छै।
हरा-पड़ा ढेरि‍आएल ढेर
भोर-साँझ भूमकैत रहै छै।
भाेर-साँझ...।

))((

गीत-४०

घात लगौने घात लगल छै
फल करनी अवघात मढ़ल छै
घात लगौने घात लगल छै
करनी फल अवघात मढल छै।
घात लगौने....।
ति‍नकमि‍या बंशी बनि‍-बनि‍
पानि‍ बीच घति‍या पड़ल छै।
गंध बोर सुगंध कहि‍-कहि‍
मुँह मध्‍य अवघात करै छै।
घात लगौने घात लगल छै।
बि‍नु अवघाते होइत रहै छै
गलफड़ घात लगैत रहै छै।
ही-जी छि‍छि‍या-छि‍नि‍या
उनटि‍-सुनटि‍ सुनगैत रहै छै।
घात लगौने घात लगल छै।

))((

गीत-४१

उठि‍ते आगि‍ तनकि‍ मन
मुक्का छाती मारि‍ कहै छै,
ताल-ताल मि‍ला बेताल
संग बाँहि‍ आवाज भरै छै।
उठि‍ते आगि‍ तनकि‍ मन....।
चढ़ि‍ते काति‍क गाछी-बि‍रछी
गाम-गाम अखाड़ सुनाइ छै,
जाड़-हाड़ संग मि‍लि‍ दुनू
जड़ि‍आएल जाल तोड़ैत रहै छै।
उठि‍ते आगि‍ तनकि‍ मन....।
सुषुम तेल तरहत्‍थी जहि‍ना
बच्‍चा सि‍र धड़ैत रहै छै
धरि‍ते तेल पकड़ि‍ केश
अगि‍आइत आगि‍ पाबैत रहै छै।
उठि‍ते आगि‍ तनकि‍ मन,
मुक्का छाती मारि‍ कहै छै।
ताल-ताल मि‍ला बेताल
संग बाँहि‍ आवाज भरै छै।

))((

गीत-४२

देहसँ नमहर टाँग जेकर
आड़ि‍-धूर वएह कूदि‍ टपै छै।
टपि‍ टपान हाथो कहैत
राही राह पकड़ि‍ चलै छै।
देहसँ नमहर टाँग जेकर...।
टाँग जेकर हाथी सदृश
बालु ऊँट कहाँ बुझै छै
चाि‍ल सुचालि‍ पकड़ि‍-पएर
रच्‍छा अपन करैत रहै छै।
देहसँ नमहर टाँग जेकर...।
मुसुक मन मारि‍ मुस्‍की
मने-मन मुसकान भरै छै।
हहा-हहा हषवि‍ष अबैत
कूदि‍-फानि‍ कहैत रहै छै।
देहसँ नमहर टाँग जेकर छै...।

))((

गीत-४३

रंग सि‍याही रोशनाइ बनि‍-बनि‍
रेहे-रेहे सियाह घोराइ छै।
भाव-अभाव कुभाव बनि‍-बनि‍
गीत प्रेम लेखाइत रहै छै।
रंग सि‍याही रोशनाइ बनि‍-बनि‍
रेहे-रेहे सि‍याह घोड़ाएल छै।
गहराएल गहन पुनि‍ चान जहि‍ना
इजोत-अन्‍हार बनहाएल छै।
तहि‍ना ने दि‍नो-दीनानाथ
भक-इजोत भऽ कनखि‍आइत रहै छै।
रंग सि‍याही रोशनाइ बनि‍-बनि‍
रेहे-रेहे सि‍याह घोराइ छै।
कहि‍ रोशन टघरि‍ सि‍याह
लेख कर्म लि‍खैत रहै छै।
ति‍ले-ति‍ल ति‍लकि‍ जअ जहि‍ना
हवन कुंड जरैत रहै छै।
रंग सि‍याही रोशनाइ बनि‍-बनि‍
रेहे-रेहे ि‍सयाह घोराइ छै।
भाव-अभाव कुभाव बनि‍-बनि‍
गीत प्रेम लि‍खाइत रहै छै।

))((


गीत-४४

जि‍नगीमे जे संग पूड़ैए
संगी वएह कहबैत रहैए।
संग ससरि‍, घुसुकि‍-पुसकि‍
प्रेमी मि‍त्र कहबैत रहैए।
जि‍नगीमे जे संग पूड़ैए
संगी वएह कहबैत रहैए।
मि‍त्र बनि‍ मैत्रेयी पकड़ि‍
जि‍नगीक झूल झूलैत रहैए
लेख-जोख कर्मक करैत
गुण गुण मन गुणैत रहैए।
जि‍नगीमे जे संग पूड़ैए
संगी वएह कहबैत रहैए।
संगी, प्रेमी दोस्‍त भजार
बैसि‍ बाट बति‍आइत रहैए।
संग-कुसंग, कुसंग-संग
नीड़ नोर नि‍नि‍आइत रहैए।
जि‍नगीमे जे संग पूड़ैए
संगी वएह कहबैत रहैए।
संग ससरि‍ घुसुकि‍-पुसुकि‍
प्रेमी मि‍त्र कहबैत रहैए।

))((


गीत- ४५

हे बहि‍ना केना कऽ जेबइ ओइ घरबा
थुक फेकि‍ जइ घर नि‍कललौं
केना जेबइ ओइ दुअरबा हे बहि‍ना
केना कऽ जेबइ ओइ घरबा
थुक फेकि‍...।
केना जेबइ....।
जनि‍-जनि‍ बीआ वाणी-बानि‍‍
लतरै-चतरै छै फुलबतबा
सुबास-कुबास बनि‍-बनि‍
सभ कि‍छु देलि‍ऐ गमबा
हे बहि‍ना केना कऽ जेबइ ओइ घरबा
पुरुखपात रहलै ने एक्को
करतै के बगबटबा
घरहरि‍या एको ने बॅचलै
बन्‍हतै के घरमरबा
हे बहि‍ना केना कऽ जेबइ ओइ घरबा।


गीत- ४६

नढ़ड़ा हेल हेलै छी, भाय यौ
नढ़ड़ा हेल हेलै छी।
ठकि‍-ठकि‍, फुसि‍या-पनि‍या
जि‍नगी संग खेलै छी, भाय यौ
जि‍नगी संग खेलै छी, नढ़ड़ा हेल...
जुग छल जमाना छल
कलपि‍ कूश लागै छल
सोझ-साझ फुलका-फलका
चालि‍ खि‍खि‍र बनल छल।
सुख स्‍मृति‍ पाबैत रहै छी
नढ़ड़ा खेल खेलैत रहै छी।
नढ़ड़ा हेल हेलैत रहै छी।
नढ़ड़ा जहि‍ना गाछ उगै छै
भकराड़ चालि‍ पकड़ि‍ चलै छै।
फड़-फूल बि‍नु रूप गढ़ि-गढ़ि‍
नढ़ड़ा फल देखबैत रहै छै।
देख-देख‍ अलिसाएल रहै छी
नढ़ड़ा खेल खेलैत रहै छी।
भाय यौ, नढ़ड़ा हेल हेलैत रहै छी।
बीटगरहा

टुकड़ा-टुकड़ी बनि‍ अंक जहि‍ना
भूमि‍ भाव संग चलए लगै छै।
अकास-पताल बीच अंतर रहि‍तो
हि‍लमि‍ल-झि‍लमि‍ल करए लगै छै।
जूड़ि‍-जूड़ि‍ अक्षर शब्‍द सधै छै
अंक कूदि‍ गुन-भाग करै छै।
चालि‍-ढालि‍ दुनूक दू रहि‍तो
प्रेमक प्रेमी रूप धड़ै छै।
चालि‍ शि‍कारी घोड़ा जहि‍ना
कूदि‍-फानि‍ रस्‍ता बनबै छै
इकाइयो दहाइ चलि‍ तहि‍ना
गरहनि‍ बीट गरहनि‍ रचै छै।
पुरजा-उरजा बनि‍-बनि‍ अंक
पौआ-अधपइ कनमा-कनइ छै।
अणु-परमाणु जुग जे बनौ
अंक अंक भकराड़ बनल छै।
रूप-गुण सभ ओहि‍ना-ओहि‍नी
मूल तत्‍व आधार बनल छै।

बि‍नु बीटे ठाढ़ केना रहतै
नमगर-छड़गर कड़ची बाँस।
वंशो-वृक्ष तहि‍ना रहै छै
धड़ि‍-धीर धेने छी आस
अटपट-लटपट खेल चलै छै
आमक गाछ महकारी फड़ै छै
गंध आम पसारि‍-पसारि‍
मीठ-तीत सेहो बनबै छै।
भाव-भूमि‍ भवजाल पसारि‍
नजरि‍ खि‍रा ताकैत रहै छै।
दौजी-मुड़हन समेटि‍-समेटि‍
हवा बीच उड़बैत रहै छै।
बि‍र्ड़ो बीच बौआइत-ढहनाइत
देखि‍नि‍हारो देखैत रहै छै।
पकड़ि‍ पेट खोंइचा छोड़ि‍
दूधक फेड़-फाड़ देखै छै।
मुदा तैयो, आंगुर चुट्टा बनि‍
बीछि‍-बीछि‍ बीआ पकड़ै छै।
गनि‍-गनि‍ फुटा-हटा
धरतीक भाव बुझै छै।
सुरकुनि‍या चालि‍ पकड़ि‍-पकड़ि‍
समाढ़-जाल तोड़ैत चलै छै।
जहि‍ना कोंपर रूप बाँस बनि‍
टोपी खोलि‍ अकास धड़ै छै।
पाछू-पछुआ कड़ची सि‍रजि‍
नाओं बाँस धड़बए लगै छै।
आशा-आस लगा एक-दोसर
झूला जि‍नगी झूलए लगै छै।
सोधि‍-ओधि‍ सि‍रजि‍ कोंपर
बीट वंश कहबए लगै छै।
अंति‍म छोर लीला जि‍नगीक
आशा आस लगबए लगै छै।
फड़ि‍-फुला हरि‍आ-हरि‍आ
परि‍वार-गाम बनबए लगै छै।
सर्ग-नर्क उतरि‍ अकास
बोड़ि‍या-बि‍‍स्‍तर समटए छै।

फँसरी- २

फँसि‍ फँसरी लटकि‍ धरनि‍
पीड़ाएल मन तमसाइत केलौं।
रस जि‍नगीक बुझि नै पाबि‍
करनी अपने मरनी बनलौं।
ओझरी तनि‍-तनि‍ दाबि‍ गर-गड़
ऐँठि‍-ऐँठि केलक मन मरदनि‍।
होइत मरद करजनि‍ देखि‍-देखि‍
लुत्ति‍या-लुत्ति‍या केलक गरजनि‍।
जि‍नगीक दोहरी बाट बनल छै
बड़की-छोटकी नाओं कहै छै।
बड़कीपर बड़की चलै छै
छोटकी-छोटकी छि‍छि‍आइ छै।
उठि‍ भोर धार धड़ि‍ दुनू
संगे-संग चलबो करै छै।
मारि‍-आँखि‍ बड़की छोटकी
गर-फाँस लगबैत रहै छै।
गरदनि‍ पकड़ि‍ पछाड़ि‍ पानि‍
हरदा-हरदी बजबए लगै छै।
हारल-मारल आकि‍ मारल हारल
फाँस गर लगबैत रहै छै।
फँसरीसँ नीक फाँसी होइ छै
क‍ऽ धऽ कि‍छु चढ़ैत रहै छै।
पूब-उत्तर देखि‍ नि‍हारि‍
हँसि‍-कानि‍ गाबैत रहै छै।

वि‍चलि‍त मन

पार्टनर, मुँहगर केना नै बनबै?
छअ-पाँच दि‍न राति‍ करै छी
भंग अंग मुखति‍यारि‍ करै छी
घोरि‍-घाड़ि‍ घि‍सि‍आइत चलै छी
कहि‍या धरि‍ एना चलबै
पार्टनर, मुँहगर केना नै बनबै।
कठरा लकड़ी तबला बनै छै
ढोलक-ढोल सेहो बनै छै।
रस-कुरस पकड़ि‍-पकड़ि‍
कारीगर मुँह सेहो बनबै छै।
अहाँ छोड़ि‍ केकरा कहबै
पार्टनर, मुँहगर केना नै बनबै।
कि‍यो मुँहक झालि‍ सदि‍ बजाबे
तँ कि‍यो सूर मुँह भरै छै।
अलापि‍ तान कि‍यो कहै छै
जय-जयकार कि‍यो सेहो करै छै।
तइ बीच केना कऽ चलबै
पार्टनर, मुँहगर केना नै बनबै।
मुँहक तान मान मपै छै
पलड़ा जोड़ लगबैत रहै छै।
मूंग्‍गा, जअ बाट बना-बना
तीन लोक भूभाग तौलै छै।
तइ बीच केना कऽ बचबै,
पार्टनर, आबो कहू कि‍ करबै
पार्टनर, आबो....
दुनि‍याँक रंगमंच सजल छै
राशि‍-राशि‍ दृष्‍टि‍ बनल छै।
मेलाक हाट-बजार बीच
कारी मुँह चून केना सजेबै
कारीख-चून लगेबै,
पार्टनर, कारीख-चून लगेबै।
     ))((
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रामवि‍लास साहुक दर्जन भरि‍ कवि‍ता-

कतेक दुख काटब हरि‍ हे

हरि‍ हे, दुखक ने कोनो ओर
दुखक धार बहए चहुओर
चंचल मन चतुराइ करए
बीच भंवरमे घुरि‍आइत रहए
थाकल तन-मन उबि‍आइत रहए
जनमसँ मरण धरि‍ छी अनाथ
कतेक दुख काटब हरि‍ हे।

अहाँ बि‍नु हम केना जीअब
जनमक बंधन केना तोड़ब
थाकल पाॅव चलब केना
दुख सहैत भेलौं मजबूर
दुखक आस नि‍रास भेल
हरि‍ हे हम छी अनाथ
कतेक दुख काटब हरि‍ हे।

काठक नाव दुखि‍या सबार
चहुओर बहए बयार
बीच धार भौर खेलाइत
उधि‍आएल धारमे डुमै सबार
थाकल तन हारल मन
अहाँक शरणमे छी आएल पड़ाएल
कतेक दुख काटब हरि‍ हे।

सत्‍यक नाव धर्मक पतबारि‍
हरि‍ खेबैया पार लगाबए
अपने मन मंदि‍रमे बसाबए
जन्‍मक दुखसँ मुक्‍ति‍ पाबए
आत्‍माक रहस्‍य जानि‍
भवसागरकेँ हरि‍ पार लगाबए
कतेक दुख काटब हरि‍ हे।

बारहो मास

अगहनक आगमनसँ सभ सुख पाबए
पूसक सर्द हवा दुख बढ़ाबए
ओस कुहेससँ जाड़ बढ़ाबए
माघक जाड़ हार हि‍लाबए
फागुन मास सभ फगुआ गाबए
रंग-अबीर गुलाल उड़ाबए
बाजए कोइली कू-कू
मोर-पपीहा पी-पी
वसन्‍ती हवासँ सभ हर्ष मनाबए
आम-लीची बौरसँ बौड़ाएल
फूलक महकसँ हवा पगलाएल
चैत मास चना-जअ गहुम पकए
महुआक फूल सभ दि‍स गमकए
बैसाखक रौद धरती तपाबए
कुम्‍हार माटि‍क बासन पकाबए
जेठमे खेतीहर खेत जोताबए
धानक बीआ खेत खसाबए
बनि‍याँ-बेकाल अन्नक भंडार बढ़ाबए
असाढ़मे आम-जामुन खाबए
पाकल आमसँ हाट सजाबए
खेताक धूर मजगुत बनाबए
सावन-भादो कि‍सान करए खेत कादो
खेतमे लगाबए धानक चास
बाढ़ि‍-पानि‍ दइ शोक-संताप
आसीन जगाबए पावनि-तोहारक आस
काति‍क मास पेटक दुख सताबए
तेरहम मास कर्जा बढ़ाबए
अगहन आगमनसँ सभ सुख पाबए।

सड़क बीच नाला

साँझक समए पूर्बा बहैत
डुमैत सुरुज चान मुस्‍काइ
घर-घरमे दीप जरैत
अकासमे तरेगन चमकैत
बाग-बगि‍चा मह-मह करैत
चि‍ड़ै-चुनमुन्नीक चहक शान्‍त भऽ गेल
गामक चौबट्टीयापर पसरल
हाट-बजार उसरि‍ शान्‍त भेल
मुदा हमर कान्‍त
नै घर घुमि‍ आएल
ओ एबो करत केना
बैसल अछि‍ दारूखाना
दारू पीब बनल अछि‍ मस्‍ताना
मस्‍तीमे कुश्‍ती केलक
हार-पाँजर तोड़ि‍ बेकाम बनल
काज तँ बड़ घि‍नौना केलक
लड़खराइत नि‍शाँमे चलैत
सड़कपर झुकैत-पड़ैत
नालामे धड़फराइत गि‍रल
नि‍शाँमे बेहोश पड़ल छल
मुदा कहैत छल ई नाला
दि‍नमे रहैए सड़कक कात
राितमे आबि‍ जाइए
सड़कक बीचो-बीच
हमरा गि‍रबैए खि‍ंच अपने दि‍सि‍
मुदा हम तँ छी अपने नीच
जखन हम होशमे एबै
नाला बनेबै सड़कक बीच।

आँखि‍ रहि‍तो आन्‍हर

गहबर-गहबर गोसाँइ खेले
भगता-भगति‍नि‍याँ ठगि‍नि‍याँ
देवी-देवताक ठि‍केदार
असल धर्मराज बनल
पान-फूल अच्‍छत लड़ू
दीप-धूप अगरबत्ती भरल
रंग-बि‍रंगक डाली सजल
डाली लगबए गहबरमे भुति‍नि‍याँ
झालि‍ मृदंगक धाप संगे
झुमि‍-झुमि‍ गाबए देवी गीत
गाेसाँइ खेले भगता-भगति‍नि‍याँ
छत्तीस देवी चौदहो देबान
अखन छौ देहपर ि‍वरजमान
जे मांगब से पूरा करतौ
कारनीक सभ रोग वि‍याधि‍ हरतौ
फूल-अच्‍छतसँ वरदान देतौ
बि‍गरल काज मनोकामना
चुट्की बजि‍ते पूरा करतौ
बदलामे लड्डु-छागर-पाठी मांगतौ
बेङ जेना कूदि‍-कूदि‍ घुमैत
बेंतक छड़ीकेँ हि‍लि‍ते
आहूत जड़ैत देखि‍ते
भूत-प्रेत सभ भागि‍ जेतौ
अरहुल फूलसँ देवी बजाबए
बोल जय गंगाक पुकार लगाबए
भूत-प्रेत लगल कारनीकेँ
झोंटा पकड़ि‍ झुलाबए-भगाबए
कोखि‍या गोहारि‍ गहबरम करए
कबुलामे छागर-पाठी बलि‍ मांगए
बि‍ना देने नै देवी मान्‍तौ
कुल-खनदान बाल-बच्‍चाकेँ सतेतौ
गामक-गाम सुड्डाह करतौ
सभ डरि‍ एकटंगा कल जोड़ि‍
देवीकेँ मनौलक-बुझौलक
मन भरि‍ लड्डू अँचरी चढ़ौलक
छागर-पाठी बलि‍ देलक
तंत्र-मंत्रसँ बान्‍हल जंतर
अपन-अपन कंठहार बनौलक
अखनो धरि‍ समाजक लोक
अन्‍धवि‍श्‍वासमे फँसि‍ मरैए
हि‍ंसा-हत्‍यामे वि‍श्‍वास करैए
एकैसम सदी वैज्ञानि‍क युगकेँ
आन्‍हर बनि‍ कलंकि‍त करैए
धमि‍याँ-ओझा-गुणी भगता-भगति‍नि‍याँ
जंतर-मंतरपर वि‍श्‍वास करैए
आँखि‍ रहि‍तो अखन धरि‍ लोक
आन्‍हर बनि‍ अन्‍हरा कहबैए।

भाग भरोसे

कोनो काज एना नै होइए
सोचल समझल काज बनैए
पूर्ब नि‍योजि‍त मनमे ठानैए
बि‍नु जानि‍ बूझि‍ हानि‍ होइए
गलत सोचसँ राह भटकैए
मान-सम्‍मानपर ठेंस पहुँचैए
जेहेन मन ओहेन काज होइए
कर्मक फल ओहने पबैए
सोचि‍ समझि‍ जँ हुअए काज
अहि‍त कम, हि‍त काज होइए
काजे लेल दुनि‍याँ बनल-ए
काज कोनो नै छोट-पैघ होइए
छोट-पैघ तँ कर्मसँ बनैए
कर्मक फल अवश्‍य भेटैए
राज-रंक हुअए वा फकि‍र
सत्‍ छी कि‍ झूठ से कि‍यो नै बूझैए
सबहक हि‍त ईश्‍वर करैए
ईश्‍वर बि‍नु नै पत्ता हि‍लैए
सभ कि‍छु नाश्वर अमर नै होइए
सत्‍य डगर कठि‍न होइए
मुदा सत् कर्मसँ वि‍जय भेटैए
अपन काज अपना लेल सभ करैए
जे काज लोक दुनि‍याँ लेल करैए
कर्मवीर उहए कहबैए
सूरवीर-धर्मवीर-कर्मवीरकेँ
तीनू लोकमे जगह भेटैए
भाग्‍य भरोसे नै कि‍छु होइए।

फूल-पत्ता

फूल तँ फूल होइ छै
पत्ता ने कोनो कम होइ छै
बि‍नु पत्ता ने फूल फुलाइ छै
पत्ता संगे फूल रहै छै
जहि‍ना दुख-सुख संगे होइ छै
बि‍नु पत्ता नै फूलक शोभा होइ छै
पत्ता फूल संग काटो होइ छै
काट फूलक रच्‍छा करै छै
सुखक संग फूल दइ छै
दुखक संग पत्ता काट दइ छै
फूल-फड़क इच्‍छा सभ करै छै
पत्ताक उपैछा करै छै
फूल तँ फूल होइ छै
पत्ताे ने कोनो कम होइ छै।

भदबा

तीस दि‍नक मासमे
छह दि‍न भदबा रहै छै
साल भरि‍मे
बहत्तरि‍ दि‍न होइ छै
लोक कहैए भदबाकेँ
काजमे बाघा करैए
एहेन कोन बाघा
जइसँ मनुखे प्रभावि‍त होइए
धरतीपर लाखो जीव होइए
केकरो भादबा नै बाघा करैए
मुदा मनुखकेँ महि‍नेमे
छह दि‍न केना हानि‍ करैए
धरती सूर्ज-चान नक्षत्र
सभ दि‍न अपना गति‍ये रहैए
प्रकृित अपन रचना करैए
एहेन पैघ काजकेँ
भदबा कहाँ रोकैए
भदबामे जनम-मरण होइए
तखन भदबा कि‍अए नै रोकैए
भदबामे काज अशुभ होइतै
जखन भदबामे दोख होइतै
तँ सभ काज भदबामे रूकि‍ जइतै
नै भदबामे खेती होइतै
आ ने पेट भरि‍ कि‍यो खइतै
तहूमे भदबा बाघा करि‍तै
भदबाक नै कोनो दोख छै
सभ दोख मनुखेकेँ छै
अपन स्‍वार्थमे आन्‍हर बनि‍
भदबाकेँ बदनाम करै छै
भदबा कोनो बाघा होइतै
सृष्‍टि‍-वृष्‍टि‍केँ रोकि‍ दइतै।

बाबा बले फौदारी

की केलौं की पेलौं
जेहेन करब तेहेन पएब
बाबाक थैली भरोषे
नै चलत कोनो काज
अपना भरोषे होइ छै काज
जौं बाबा भरोषे
फौजदारी लड़ब
तखन पराजय हएत
जे काज जहि‍ना हेतइ
ओहि‍ना ने करए पड़त
अनका भरोषे नै होइ छै काज
अपन काज जौं अपने करब
तखन प्रगति‍ दि‍न-राति‍ हएत
स्‍वावलंबी जाधरि‍ नै बनब
ताधरि‍ परजीवी बनल रहब
की करब सोचि‍ करब
समए संग काज करब
तखन जि‍नगीक महत रहत
वर्त्तमानमे करब तँ भवि‍ष्‍य बनत
भूत तँ बीत गेल वर्त्तमानपर
भवि‍ष्‍य उज्‍जवल रहत
संसार काजसँ चलैए
जाधरि‍ अपन काज
अपनासँ नै करब
ताधरि‍ आत्‍म ि‍नर्भर नै बनब
आत्‍मनि‍र्भर भेनाइ
सबहक कर्त्तव्‍य बनैए
नै तँ एक-दोसराक संग
जि‍नगीक पि‍साइत रहैए
अपन जि‍नगीक भारसँ
लोक स्‍वयं दबल रहैए
दोसराक भार केना सहैत रहैए
दबि‍-दबि‍ जि‍नगी मरैत रहैए
की कहब कहल नै जाइए
से हाल प्रमात्‍मा जनै छथि‍
अपन वि‍कास जौं सभ करत
केकरोपर नै ि‍नर्भर रहत
सभ सुखी, दुखी नै कोइ रहतै।

केकरा ले कानब

हाल-चाल की कहब
जेकरा ले कनै छी
ओकरा आँखि‍ नोर नै
अपन हारल की कहब
दुख कि‍यो थोड़े बॉटि‍ लेत
सुखक साथी सभ बनै छै
दुखमे जानल अनजान होइ छै
केकरा ले कानब
के हमर नोर पोछि‍ देत
सभ देखि‍-देखि‍ मुँह चोरबैए
धीरज देनि‍हारो नै भेटैए
हमरे देखि‍ हँसैत रहैए
जहि‍ना जरलपर
नून छि‍िट घा बढ़बैए
घी दऽ आगि‍ बढ़बैए
केकरो देखि‍नि‍हार कोइ ने होइए
जनए देखै छी अन्‍हारे रहैए
मतलबी यार तँ बहुतो भेटैए
दुनि‍याँमे केकरो कोइ नै
स्‍वार्थमे एक-दोसरकेँ लूटैए
केकरा कहबै के पति‍येतै
जेकरे कहै छी वएह हँसैए
केकरा ले कानब
वएह लति‍यबैए।

परि‍वर्त्तन

पल-पल क्षण-क्षण समए बढ़ैए
क्षणे-क्षण मौसम बदलैए
दि‍न-बदलि‍ राति‍ बनैए
राति‍ बदलि‍ दि‍न कहबैए
खास मौसम ऋृतु कहबै
सभ ऋृतु बदलैत रहैए
कल-कल छल-छल नदी बहैत
सागर मि‍लि‍ महासागर बनैए
काल बदलि‍ युग बदलैए
युगक संग सभ कि‍छु बदलैए
बदलि‍-बदलि‍ नव पुरान होइए
प्रकृति‍ बदलि‍ आकृति‍ बदलैए
तन-मन बदलि‍ चोला बदलैए
परि‍वर्त्तन संसारक नि‍अम छै
उनटि‍-पुनटि‍ संसार चलै छै
करम-धरम नीति‍ बदलै छै
बदलि‍-बदलि‍ जि‍नगी चलबैए
अहि‍ना जँ सृष्‍टि‍ बदलि‍ जाएत
तँ ई संसार केना चलत
सभ कि‍छु बदलि‍तो
सुरुज-चान कहाँ बदलैए।

माइयक ममता

माइयक ममताक नै अछि‍ जोर
नअ मास धरि‍ गर्भमे पालि‍
तीन साल धरि‍ कोरामे खेला
झूला-झुलाबै लोरी सुना
अॅचराक छाँहसँ दुख बचा
जि‍नगी भरि‍ अपन ममतासँ
धीया-पुताकेँ दीर्घायु बनाबै
भगवानक ममतासँ बेसी
माइयक ममता सुख पहुँचाबै
भूखल-दुखलमे छाती लगाबै
माइयक ममता अछि‍ बेजोर
सुक्‍खक खान माइयक ममताक
नै अछि‍ कोनो मोल तोल
सागरसँ गहींर माइयक दि‍ल
धीरज अटल हि‍मालय सन
जे सुख माइयक अँचरामे झाँपल
बच्‍चाकेँ कोरामे मि‍लै छै
ओ सुख ने स्‍वर्गोमे मि‍लै छै
माइयक ममताक नै अछि‍
दुनि‍याँमे कोनो जोर।

परदेशि‍या पाहुन

आएल पहुना बाटे अॅटकि‍ गेल
की गामक बाट भूलि‍ गेल
मन उपकैए झाँकि‍-झाँकि‍ देखि‍तौं
आकि‍ बाट चलि‍ दूर देखि‍तौं
ओर-छोर नै देखै छी
लगैए पहुनाक बाट छूटि‍ गेल
ि‍क दि‍लमे कोनो कचोट भऽ गेल
कि‍ करब कि‍छु ने फुराइए
दि‍न-राति‍ मन घबराइए
कि‍ हमरामे कोनो दोख बुझाइए
जानि‍-मानि‍ ने तँ भेल कोनो हानि‍
मान-सम्‍मानमे जँ कोनो कमी भेल
तँ हमरा कोनो उपरागो नै देल
बि‍नु अपराध पाहुन भूलि‍ गेल
हमरासँ कि‍एक रूसि‍ गेल
सभ दि‍न तँ पहुना लेल
कोन-कोन करम ने करै छी
पहुना परदेशि‍या जखने भेल
अपन घर अंगना भूलि‍ गेल
कि‍ कोनो सौति‍नि‍याँ संग लगि‍ गेल
ओज-टोनसँ मन मोहि‍ लेलक
आएल पाहुन कि‍अए बाट भूलि‍ गेल
पहुना पराया ने तँ बनि‍ गेल
दि‍न-राति‍ सूरता पहुनापर लगल-ए
सूरता करि‍ते होइए मूर्छा
देहक खून सुखि‍ पानि‍ बनैए
पहुना यादि‍ रहि‍-रहि‍ बनैए
गौना पहुना कि‍अए करैलौं
ऐसँ नीक कुमारि‍ये रहि‍तौं
पहुनाक फेरि‍मे कहि‍यो ने पड़ि‍तौं
दि‍लक रोगसँ दूरे रहि‍तौं
कि‍एक एहेन दुख जुआनि‍येमे सहि‍तौं
पाहुन जँ परचट्टा हेतै
अपन जि‍नगी परदेशमे गमेतै
केना कोइ पहुनापर वि‍श्वास करतै
अपन जुआनी-जि‍नगीकेँ नास करतै।

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
चंदन कुमार झा
सररा, मदनेश्वर स्थान, मधुबनी, बिहार
गजल-1
कमला-कोशीक धार मे दहायल जिनगी
थाल-कादो सनायल मटिआयल जिनगी

निशाँ ताड़ीकेर मातल बौरायल जिनगी
माटि चाँगुर सँ कोरैछ भुखायल जिनगी

रौद जेठ केर जारल फुलायल जिनगी
एसी घर देखू बैसल घमायल जिनगी

टुअर-टापर नञ्गटे टौआयल जिनगी
देखू साजि-सम्हारल ओरिआयल जिनगी

देखू हँसैत कनैत आ' खौँझायल जिनगी
"चंदन" रूप अनेकहु देखायल जिनगी
  
गजल-2
सपना नोरक धार बहाओल
जागि-जागि केर राति बिताओल

साज-सिंगार सोहैछ नै किछुओ
विरहा-आगि करेज जराओल

नभ मे चमकल जखने चंदा
हियामे प्रेमक ज्वारि उठाओल

कोइली सौतिन मुँह दुसै अछि
कू-कू-कुहुकि के होश उड़ाओल

अचके बालम ऐलाह अँगना
"चंदन" सजनी मोन जुड़ाओल


गजल-3

लगै अछि लाल अहाँकेर गाल जहिना सिनुरिया आम
अहाँ केर चान सन मुखरा देखि चानो बनल गुलाम

केश कारी घटा घनघोर अमावस राति सन लागय
नैन काजर सजल चमकल बिजुरी के छुटल घाम

जएह बोली अहाँक ठोर केर चुमि कय बहराइछ
महुआ गाछ पर कोइली सैह बाजल बनल सूनाम

डेग राखल जत' धरती माटि बनिगेल ओत' चानन
रुनझुन पजेब-झंकार सँ अँगना बनल सुरधाम

कसमस जुआनी देख सुधिबुधि हमर हेरायल
पिबै लेल नेहरस ब्याकुल भमरा भऽगेल बदनाम

"चंदन"पथिक प्यासल प्रेम केर बाट पर बौआइछ
दिऔ ने नेहरस एकरा पिआय बइसा करेजा-धाम

 गजल- 4

बेचि खेलक इमानो बजार मे
लाज-धाखो सजेलक सचार मे

भाय-बापो सँ देखू लड़ैत छै
प्रेम देखू फुसिए छै भजार मे

आब मातोक ममता बिकाय छै
नेह-नाता भसेलक इनार मे

जे कहाबै लफंगा समाज मे
सैह नामी बनल छै जबार मे 

देखि"चंदन" परल छी विचार मे
साधु-संतो रमल बेभिचार मे
मुजाइफ
212-212-212-12

 गजल-5
हमतऽ कनिते रही आँखिक नोरे सूखा गेलइ
अपने कानब पर देखू हमरा हँसा गेलइ

लोक पुछलक जखन कहल ने भेल किछुओ
असगरे आइ सभ बात अनेरे बजा गेलइ

साओन-बदरी जे आगि उनटे धधकि उठल
आइ सैह आगि एकबूँद पसेने पझा गेलइ

बैसि अँगना भरि राति गनैत छलौँ तरेगन
आइ सैह तरेगन केयो आँचर सजा गेलइ

कतेको साल सँ पटबैत छलौँजे गाछ "चंदन"
आइ अँगना मे सैह रोपल गाछ फुला गेलइ
--------वर्ण-१८-----------

रुबाइ-1
भासल सभटा सपना नोरक धार मे
कण्ठ दबायल जनु हमर गृमहार मे
बैसल छी एकात निजहि परिवार मे
सोंगर खोँसि रहल छी टूटल चार मे ।

रुबाइ-2
लोक भूखले पेट चिकरैछ बाट पर
छै ढ़करैत सरकार सूतल खाट पर
निन्न टुटैछै नेताक आब केवल
कोनो आम जनतासँ लागल चाट पर ।

रूबाइ-3
अपन महीष कुरहरिए नाथब
सुगरे गूँह सँ चिपरी पाथब
छी स्वतंत्र देश के बासी तइँ
की बरछी सँ माला गाँथब ?

आकाशवाणीक दरभंगा केन्द्र सँ दिनांक १०-०३-२००४ के तरुण-कुसुम कार्यक्रम मे प्रसारित  एकटा कविताः-
(1)"हमहू पढबै आब"
बाबू यौ, कीनि दिअ' ने हमरो किताब
बाबू यौ, हमहू पढ़बै क,,,घ आब ।

नित्यदिन हम इस्कुल जेबै,
पढिलिखि कऽ आफिसर बनबै,
करबै हमहू बी.ए.एम.ए. पास,
बाबू यौ, गामो पर करबै सभटा काज,
बाबू यौ, कीनि दिअ' ने हमरो किताब
बाबू यौ, हमहू पढ़बै क,,,घ आब ।

बेटा-बेटी मे नहि रहतै अंतर
हमहू बनबै डाक्टर, इंजीनियर,
नहि करबै आब ककरो आस,
बाबू यौ, नहि रहबै आब हम बेकार,
बाबू यौ, कीनि दिअ' ने हमरो किताब
बाबू यौ, हमहू पढ़बै क,,,घ आब ।



अबला सँ सबला हम बनबै,
देश समाजक सेवा करबै,
नहि सहबै हम ककरो रोआब,
बाबू यौ, चिन्हबै हमहूँ अप्पन अधिकार,
बाबू यौ, कीनि दिअ' ने हमरो किताब
बाबू यौ, हमहू पढ़बै क,,,घ आब ।

दहेज-प्रथा केर भूतो भगतइ,
नारी समाजक शोषण रुकतइ,
तखनहि हेतइ देशक पूर्ण-विकास,
बाबू यौ, जखने पढ़बै हमहू किताब,
बाबू यौ, कीनि दिअ' ने हमरो किताब
बाबू यौ, हमहू पढ़बै क,,,घ आब ।

हाइकू

कारी अकाश
बिजुरी चकमक
बर्षा झहरे

माटिक गंध
गमगम गमके
नाचय मोर

झाँट बिहाड़ि
थकुचलक आम
कुच्चा अचार

आमक गाछी
खोपड़ी छारइछ
पसेना घाम

जोति बिरार
कयलक बाउग
धानक बिया

मुँग जनेर
हरियर कचोर
सगरो बाध

हर बरद
आशान्वित कृषक
जोतय खेत |

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नवीन कुमार
‘‘आशा’’
गर्भक आवाज


गर्भमे तोहर फकसियारी काटी
जुनि हमरा सता गैय माँ ।
एक बेर जन्म लय कय
,
जिनगीक दुःख-सुख सिखय दे गैय माँ।
माँ तुहि बुझमें दुःख हमर
,
दुनिया में पैर पसारैय दे गैय माँ।
दाय
, बाबा आ बाबु कतबो सतेथिन,
मरहम तुहि त लगेमे गैय माँ।
गर्भ में तोहर फकसियारी काटी
,
एक बेर जन्म दय दे गैय माँ।
बाबु कतबो कहथिन अभिशाप
,
हम दूनूक आस बनबौय गैय माँ।
गर्भ में बेटी फकसियारी काटे
,
ओकरा जुनि सता गैय माँ।
बेटी जँ नहि लेते जन्म
,
दुनिया कोणा बढ़तैय गैय माँ।
गर्भ सँ तोहर विनती करियौ
,
जन्म हमरा दय दे गैय माँ ।

 

 
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विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत
राजनाथ मिश्र
चित्रमय मिथिला स्लाइड शो
चित्रमय मिथिला (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ )

.
उमेश मण्डल

मिथिलाक वनस्पति स्लाइड शो
मिथिलाक जीव-जन्तु स्लाइड शो
मिथिलाक जिनगी स्लाइड शो
मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव जन्तु/ मिथिलाक जिनगी  (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ )


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"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २२४ म अंक १५ अप्रैल २०१७ (वर्ष १० मास ११२ अंक २२४)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -    मैथिलानी केर उपराग राम सं आ समाज ...