Sunday, April 29, 2012

'विदेह' १०४ म अंक १५ अप्रैल २०१२ (वर्ष ५ मास ५२ अंक १०४) PART II



रवि भूषण पाठक
ओक्‍कर तोहर हम्‍मर सपना-
कांटी आ मरिया
जजिमान आ पुरहितक सम्बन्ध
पता नइ कोदारि आ बेंटक संबंध छैक वा कांटी आ मरिया क। बुझाइत तऽ एहिना छइ जे एगो मरिया हेतै तदोसर के कांटी बनय्यै पड़तै ।आ एहनो कोनो जोगाड़ नइ बैसै छैक जे कांटियो रहि के मरिया कमारि नइ खाए पड़ै । आ मरिया रहि के केओ ऋषि मुनि बनल रहए ,से हमरा जनैत तऽ असंभवे बूझू .....ओना हम पुरहित रहियइ आ हमर भरि दिन जजिमनिके मे बीतए ......वियाहे-श्राद्ध नइ ,मारि-पीट , गारि-उपराग ,टोना-मानी सभक हिस्सान ।हअर जोतनइ ,चौकी केनए ,बाउग केनइ ,कमौनी ,पानि देनए ,खाद छिटनइ ,जजात के घोघेनए ,दाना पुष्ट. भेनए ,कीड़ा लागनइ ,दवाइ के स्प्रे ,सूखनए ,काटनए ,दउनी वा झंटेनइ ,कखनो कखनो मशीन सँ दउनी..........अन-पानि सुखेनए आ कोठी अथवा बोरा मे राखनए .......ऐ सब प्रक्रिया मे हमर सक्रिय भागेदारी रहैत छलै आ हम दिने नइ गुनैत रहियइ ,कखनो कखनो सलाहक स्वकरूप समाजिक आ वैज्ञानिक सेहो भजाइत रहै ।हम कोनो मार्क्स वादी बात नइ करैत छी ,ने हम ई मानैत छी जे उत्पा्दन प्रक्रिया मे हमर समान भागेदारी रहै .......ने विश्वाहस कस्तिर पर ने समाजक स्तीर पर ।
अपन भूमिका के अवमूल्य न नइ करितौं ई कहबा मे हमरा कोनो लाज नइ कि मिलै वला प्रतिफल असंतोषजनक ,असमान आ अमानवीय छलै ।कोठी आ खरिहान के भरै मे सांस्कृितिक सहयोगी आ मिलै छलै आसेर ,सेर भर अगऊं ।एगो दूगो बाबू सब छलखिन जे साल मे एक दू बेर पसेरी भरि दाना दैत छलखिन ।आ ई हमर खानदानी कर्त्तूव्यब छलै कि जजिमानक समृद्धि कप्रति विरक्तिक भाव बनेने रहियइ ।भगवती अन्न पूर्णाक पूजा मे कतओ कमी छलै आ अन्निपूर्णों खूब तमाशा देखबैत रहथिन ...........

आ जजिमानक पुरूखा सभक बरखी ,छाया ,एकोदिष्ट कतिथि हमरा मुंहजबानी यादि रहै ......यादि रहै यैह बात नइ ,यादि केनए परमावश्याक रहै ,महाकर्त्ताव्य ............शायदेसंयोग यदि कहियो बिसरि गेलियइ तओइ दिन जजिमान महासामंत भऽ जाइत छलैखिन आ हम महादास......आ मृत्यु.दंड सँ कनिये छोट दंड रहै ई वाक्यन हमरा अहांक कट्टमकट्टी ।हम आब फलां पंमडी जी सँ पूजायब।आ जइ दिन बाबू के ई बात पता लागेन ,हमर देह ,हाथ ,माथ पर हुनकर खड़ाम आ लाठीक चेन्हू अहां गिन नइ पेतियइ .........ओना माए गानैत छलखिन आ कखनो बाबू आ कखनो दुनियो के ......कानबो करथिन आ गारियो देथिन.........

एतबे नइ एकादशी ,त्रयोदशी ,चतुर्दशी ,पूर्णिमा अमावस्यान सब........जेना सूर्य आ चन्द्रनमा हमरे पूछि के डोलैत छथिन ।आ कोन एकादशी करियौ आ कोन छोडि़यौ ...ईहो बात विधिपूर्वक हेबाक चाही ।आ बात-बात पर महादेव पूजा ।पान सौ आ हजार तडेलीए पूजाथिन ,मुदा कहियो कहियो सवा लाख महादेव कबात सेहो होए ...आ ओइ दिन तएकटा उत्सकवक वातावरण बनि जाए ,ओइ दिन बाबू महंत जँका करथिन ,किएक तहजार दूहजार सभक घर मे बनए आ बाबूए हुनका सभ के दक्षिणा बांटथिन ।आ बाबू ईमानदारी पूर्वक दक्षिणा बांटथिन तें हुनका कहियो पंडितक अकाल नइ पड़लेन ।हरदम टोल-पड़ोसक पंडित सभ आगू-पाछू करैत रहए ।आ ई कोनो महादेव पूजे तक सीमित होए ,एहनो बात नइ रहै ,कहियो श्राद्ध कहियो बरखी कहियो उपनेन-वियाह........एहिना चलैत रहए ।आ बाबू चाहथिन छल तखन सभ दिन पारसे आबैत रहतै छल ,मुदा बाबू पारस लेबाक विरोधी छलखिन ।जत्तेि ब्राह्मण होए ,ओतबे कभाड़ा लियओ ,दुनिया कठीकेदारी नइ......

वैदिक कर्म शुभक हो वा अशुभक ,जजिमान सभ एकटा खास नजरि सँ पुरहित कें देखैत छलखिन ।हुनका लेल आदर्श पुरहित ओ भेल जे मैल चिकाठि पहिरने हो ,चाहे धोती हो वा कुरता एक दरजन ठाम ओइ पर चिप्पी हो ।अहांक मोंछ-दारही बरहल हेबाक चाही ,अहां टुटलकी चप्पहल या बिना चप्पओले के यात्रा करैत हो ।यदि अहां साफ-सूतरा कपड़ा-लत्ताह पहिरने छी आ पएर मे जुत्तो. हो तखन तबूझू जे ने केवल अहांक धर्म भ्रष्टा अछि बल्कि जजिमनिका मे कनफुसकी ककेंद्रविंदु सेहो अछि ।सब कहत देखियौ ने कनेक जुत्ताम देखियौ ,बाप के खड़ाम खटखटबैत जिनगी गुजरि गेलेन आ बेटा ......आ फेर तखन बहुत रास खिस्सा एहनो जइ मे हुनकर बाप आ बाबा हमरा बाबू आ बाबा के खाली पएर देखि द्रवित भगेलखिन आ प्लासस्टिक वला जुत्ताह वा चप्पबल वा खड़ाम दऽ देने हेथिन ।

आ भाय लोकनि ध्याटन देबै मैथिली मे एहन कहबी सबसँ बेशी छैक ,जइ मे अहांक तुलनात्मयक महत्ताल स्पएष्टब होइत अछि मतलब नीचा दिस ,खराब दिस ,जेना कि बापक नाम लत्तील फत्तीा ,बेटाक नाम कदीमा ‘ ,’खाए लेल खेसारी आ .....पोछै लेल जिलेबी ‘ , ‘पूजी ....नइ चाभी कझब्बा ‘ , ‘नमहर नाग बैसल छथि आ ढ़ोरहाय मांगै पूजा आदि आदि ।आ ई सभ कहबी जत्तेज लौकिक अनुभव सँ भरल होए अहांक अपमानित करबा लेल पर्याप्तज रहै ।मुदा ई सुनला के बादो कोनो उत्त र नइ देबाक रहए ।एगो बात ईहो छलै जे जकरा कर्म करबाक रहै ,ओ चाहे किछो पहिरए ,खाए ,पीबए ,अहांक लेल खास ड्रेसकोड ।मतलब बाप मरै फलनमा के आ केश छिलाबैथ पंडित राम ।
सम्माान आ अपमानक एहन दुर्लभ संगति हमरा मूने कोनो सभ्य ता ,कोनो समाज मे असंभव अछि ।आ मैथिल ब्राह्मणक चरम लक्ष्य् सभ दिन चूड़े दही रहल ।हरिमोहन बाबूक दार्शनिक अंदाज जत्तेे खट्टर कका कतरंगमे चूड़ा दही चीनी मे विस्ता र लैत अछि ,ओहियो सँ बेशी ।एकटा भोजन ......नइ भोजने मात्र नइ.....अलगे आकर्षण ......अलगे नशा ।एकटा सुस्तीओ ,संतोषक भाव ।त्रिगुण केवल सानै काल तक ,ओकरा बाद विषम भावक सह-अस्तित्वा ।दांत चूड़ा पर प्रहार करैत आ जीभ आ कंठ दही के ससारैत आ चीनी मुंहक सभ अंग सँ मेलजोल बरहाबैत ।अंत मे विषमता समाप्त आ सभ तत्वी अपन अपन वैशिष्ट्यअ के समाप्त करैत .......।आ चूड़ा दही एहन नै बुझियौ जे केवल खाइए वला मे सुस्तीस बरहाबैत हो ,खुएनहार मे सेहो तेहने आलस्यब बरहाबैत छैक । चूड़ा दही खुएबा मे अहांक करबा के की अछि ? चुड़ा कुटाएल बोरा मे राखल ,दही पौरल आ चीनी दोकान सँ खरीदल ,तखन तमात्र अंचारक सहारे सेहो अहांक ग्रेड मिलि सकैत छैक .....हम धर्म ,पुण्यद आ पितरक बात अखन नइ करहल छी ।जे होए चूड़ा दहीक नशा एहन रहै जे इसकुलक समै मे इसकुल कालेजक समै मे कालेज छोड़लियइ ।ने घअर दुआरि ने खेती बाड़ी ।कोन कुटुम कोन कुटमैती ।ने समाजक नौत-निमंत्रण ने पावनि तिहारि ।बस अर्जुन जँका ...संभवत: ओ मांसाहारी रहै तें माछक आंखि मे तीर मारलकए आ हम सर्वाहारी मैथिल ....चूड़ा दही कगंध दिस आंखि मूनने बरहैत आ हमर प्रेम चातको सँ बेशी ,हम्मरर धियान बगुलो सँ बेशी ,हमर क्रोध सिंहो सँ बेशी आ हमर भूख सांपो सँ बेशी आन्हहर।मुदा रूकू महराज हम किछु बेशीए बाजि गेलौं हमर भूख चाहे जेहन होए दुर्वासा आ भृगुक क्रोध किताबे तक सीमित रहलै ,हम अपन जिनगी मे तनइ देखलियै जे केओ जजिमान अहांक उचितो क्रोध कें सकारने हएत ।भृगु अपन क्रोध कें ने छिपेलखिन ने सम्हालरलखिन आ भगवान विष्णुक के धएले लाति करेजा पर मारि देलखिन आ भगवानो केहन तपूछलखिन हे ब्राह्मण श्रेष्ठक चोट तनइ लागल ।हम्म र करेज तपाथरक अछि ,मुदा अहांक पएर तकमलोऽ सँ बेशी कोमल ।ई प्रसंग ब्राह्मणवादक संरक्षणक एकटा नमूना अछि कि कोना वैचारिक स्त र पर यथास्थितिवादक समर्थन कएल गेलै । फेर लक्ष्मीई कक्रोध आ पुन: भृगु कें क्रोधित भऽ कें भृगुसंहिता लिखनए आ लक्ष्मी के संबोधित ई गर्वोक्ति कि जे ब्राह्मण ई पोथी परहत ,ओकरा लग तों दौड़ल जेबहीं

एकटा बात आर अहां अपन दैनंदिनी के चाहे जेना व्यावस्थित राखियौ ,एक चीज लेल हरदम तैयार रहियौ ।अहांक कखनो बुलाहट आबि सकैत अछि .......नइ नइ उपनेन वियाह तपहिले सँ निश्चित रहैत अछि ,मुदा सत्यननारायण कथा ,महादेव पूजा ,कोनो गुप्त् उद्देश्यछक लेल ब्राह्मण भोजन आ एहने सन बहुतो रास प्रसंग ,जइ ठाम अल्प्सूचना पर अहांक उपस्थिति अनिवार्य आ कखनो कखनो लठैत वला भाषा यादि राखब पंडित जी समै खराब छैक छओ सँ सात नइ हेबाक चाही ।आ ग्याारह टा ब्राह्मणक निमंत्रण छैक तग्याउरह टा हेबाक चाही ,औ जी साहेब आब गाम मे नइ छइ तनइ छइ ,हम कतऽ सँ लाबी ।सब गाम छोडि़ के दिल्ली ,पंजाब रहै छैक ।बहुतो लोक गामो मे छैक तअपन अपन काज धंधा मे व्यकस्तस ।ओ चूड़ा दही खेबा लेल तीन घंटा बेरबाद नइ करता ।ओना तकाज चलिए जाए मुदा कहियो काल एहन स्थिति उत्पलन्ऩ होए कि लागै आइ नऽ छऽ भइए के रहत ।कोनो कोनो जजिमान कें होए कि कम ब्राह्मण हम पारस जमा करबा लेल आनलौं ।कखनो कखनो तहद भऽ जाए जजिमान सब नाओ गिनाबऽ लागता ,फलां पंबडित तगामे मे रहैत छथिन ,आ चिल्लांनक भतीजा सेहो ............. आ जजिमनिका कएकटा खास शिष्टा चार रहै ।प्रणाम तसब अहींके करैत छलथि ,मुदा अहां आर्शीवाद एकटा विशेष संबोधन के साथ दिअओ ।खुश रहियौ हाकिम’ ‘आनंद सँ रहियौ सरकार’ ‘जिमीन्दाकरक जय जय हो ‘ ‘राजा सदैव विजयी रहथि ।मतलब जजिमानक प्रणाम सूदि समेत लौटाबए कव्यावस्थाा रहै ।आ कोनो कोनो गुंडा टाईप के पंडित जी ऐ व्यरवस्था के दोसर रूप दऽ दैत रहथिन जेना ओ जजिमान के देखिते चिचियाथिन जय जय बम बम’ , ‘जय हो जय हो आ पता नइ ऐ मे ककर जय आ ककर बम बम रहै ।मुदा ई व्यडवस्थाम विभिन्नू रूपांतरणक साथ आगू चलैत छलै ।आ दूनू तत्व यैह चाहथिन जे हम कांटी नइ मरिये रही ,मुदा ई केवल सोचबाक बात नइ रहै ...........


आब कनेक पुरहितक दृष्टिकोण ।तमाम नीचता कें छुपबैत अपन क्षुद्रता कें गौरवान्वित करैत पुरहित चाहैत छलखिन जे संसारक तमाम सिंहासन हुनके लेल रहै ।कखनो सर्दी-बुखार ,कखनो जाड़क मारि आ कखनो अलसियाइत पं‍डी जी बिन नहेने ,तेल चानन लगा झुठौंआ फूसौंआ के कंपकंपाइत रहथिन कि हुनकर ख्यातति एहन पंडित करूप मे होए जे अपन तपस्याे सँ हवा-बसात के जीति नेने होए ।आ अपन अल्पा संस्कृएत ज्ञान कें कखनो लय ,कखनो रटंतु विद्या सँ सुरक्षित करैत ऐ ठामक सब पंडित ई साबित करैत रहिथिन जे उदयनाचार्यक सब पोथी हुनका पास ।किछु लोकनि ऐ भ्रम के सेहो पोसैत छलखिन कि संभवत: लोक विश्वािस केने जा रहल अछि कि वास्तसव मे उदयनाचार्यक असली वारिस यैह छथि ........
ई पंडित जी छलखिन ,एहन तारनहार जे मंत्रच्यु त ,विचारविहीन आ तर्कशीलता सँ योजन भरि दूर ।अपन जन्मनक बल पर ,तीन-पांचक बल पर ,गाल बजेबाक कौशल आ ठोप-ठंकारक बलें ।मंत्र कतबो मूल्यनवान हो ,दू-चारि टा शब्द अपने गीलने ,दू-चारि टा कुल खानदानक नाम पर आ दू-चारिटा संभावित दक्षिणाक विचारमग्न ता सँ भ्रष्ट होइत.......धियान आबिते फेर सँ हाथ-आंखि हिलबैत भगवान के ठकैत आ जजिमान के भरोस दीबैत कि हमरा सन शुद्ध पूजा केओ ने करा सकैत अछि । मुदा पुरहित आ जजिमान मे एकटा लिखित समझौता रहै ।भोजन कतबो विशिष्टत आ वैविध्यय सँ भरल होए जजिमान कहथिन जे नून चूड़ा छैक ,आबियौ आ ग्रहण करियौ ।आ भोजन कतबो सरल-गेन्हारयल होय पंडित जी कहथिन ऐ सँ बढि़ के बाते होइत छैक ।मुदा कखनो कखनो विजय बाबू सन मर्दराज सेहो छला जे ऐ लीक के अपन स्व भावे तोड़बाक प्रयास करैत छला ।ओ साफ कहथिनपंडी जी चिंता नइ करियौ ,आराम सँ खाएल जाओ ।पर्याप्तक दही छैक ,नून चुड़ा वला कोनो बात नइ’ ,तैयो विजय बाबूक ई यथार्थवादी रूख कोनो स्थारयी प्रवृत्तिक रूप धारण नइ केलकै ।आ ई द्विपक्षीय समझौता संभवत: जजिमानी व्यीवस्थारक सर्वोच्चत तत्वइ रहै ।
यद्यपि पंडित लोकनि जखन एक-दोसरा सँ बात करथि तओ प्राय: दक्षिणा संबंधी होए ।जजिमानक खिधांश ,जजिमनिकाक भोजनक निंदा ,नून ,मिरचाय तेज हेबाक चरचा ,दूध ,दही कम हेबाक बात हरदम सजनिये ,हरदम घिउड़े ,कखनो के सब दिन राम तोरय..........छि: छि: सोहारी मे घृतक नामोनिशान नइ ,आ खीर मे पानि एकदिस आ दूध एक दिस आ चाउर भोकारि पारि के कानैत ।बेलना टूटबाक बात आ मकई करोटी ब्राह्मण के दैत जजिमान सब ।घोर कलियुग ,एहन एहन जजिमान के कतसँ पुण्यो हेतै ।संकल्पज आ दक्षिणा मे एकटका दूटका देबा ,कखनो ऊधारिये रहि जेबाक चिंता ।अपन कुटिल पांडित्ये आ दुनिया दारी सँ लोक कें ठकबा सम्बिन्धीद विस्तृनत विमर्श आ दोसर के फटकारि देबा आ चमत्कृडत करबाक कतेको कथा ।गलत-सलत मंत्र परहेबाक प्रसंग बत्तीरसी के खोलि के हँसबा के अवसर दैत आ अपने मूने त्रुटिरहित चलाकी .......
दोसर दिस जजिमानो सब अपन हकिमई ,जमिंदारी आ लंठई कचर्चा कसंग ।विविध प्रसंग जइ मे पुरहितक गलती कें ओ पकडि़ नेने हो ,एहनो प्रकरण जइ मे पुरहित सब कें अपन दानशीलता सँ ओ मोहि नेने होथि ।कखनो कखनो तएहन बात कि पहिले तबिन जजिमनिका पेट कि पांजरो नइ भरैत रहेन ,मुदा आब कने मजगूत भगेला ।आ ऐ पेट-पांजर कचर्चा प्राय: होइत छलै । जजिमान-पुरहितक ई कांटी-मरिया निरंतर ठोकाइत रहला के बादो हमरा ई कहबा मे कोनो हर्ज नइ कि जजिमनका मे कतेको आदमी एहनो छथिन ,जे ऐ जजिमान-पुरहितक संबंध सँ आगू छथिन ,आ ओ हमरा लेल कोनो बाप-पित्तीभ सँ कम नइ ।चाहे जानकी बाबू होथिन वा मकसूदन बाबू ,इंजीनियर साहेबक परिवार हो वा बैद्यनाथपुर मे शशि के आंगन मे ओ वृद्ध मसोमात ।ई सब लोक हमरा लेल हमरा खानदानक लेल पारिजात बनि के रहला आ हमर सब कष्टे हिनका लोकनि के छाया मे हेरायत चलि गेल ।नित्यरप्रति कभेंट आ हिनकर सभक दुलार कहियो वास्त विकता सँ परिचय नइ होमदेलक ,नइ तपुरहितक जिनगी कोनो माली ,कोनो धानुक ,कोनो धोबी सँ कोन प्रकारे बेशी छैक ।ओहो सब अपन हिस्सार लैत छैक आ हमहूं । यदि फल महत्विपूर्ण छैक तएना सोचनए बहुत बेजाए तनहिये............................... (क्रमश:)
 
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
अमित मिश्र
करियन(समस्तीपुर )



कथा - प्रेमक अंत


आइ भोरे सँ आनंदक मोन कतौ अनत' अटकि गेल छलै । की करबाक चाही , की नै करबाक चाही ? गाम -घर मे की भ रहल छै ? एहि तरहक कोनो प्रश्नक जबाब पता नहि छलै । अपन सूधि-बूधि बिसरि गामक अबारा पशु जकाँ इम्हर-उम्हर भटकि रहल छल । पैघ केश-दाढ़ी , मैल-चिकाठि गंजी-पेँट मे अपना -आप सँ बतियाइत देख जँ केउ अनचिन्हार पागल बूझि ढेपा मारत त' कोनो आश्चर्यक बात नहि । आनंदक इ
डेराउन रूप देख क' गामक लोक सब अपना मे बतियाइ छल जे परसू जखन दिल्ली सँ गाम आएल छल त' बड-बढ़ियाँ सब कए गोर लागि , काकी-कक्का , कहि क' नीक-नीक गप करै छलैए मुदा इ एके राति मे की भ' गेलै जानि नहि? लागै छै जे मगज कए कोनो नस दबा गेलै आ रक्तसंचार बंद भ' जाएबाक कारण मोन भटकि रहल छै । इहो भ' सकै यै जे बेसी पाइ कमा लेलकै तेए दिमाग खराप भ' गेलै वा भ' सकै छै जे
पागल कए दौड़ा पड़ल होइ । आब एसगर कनियाँ काकी की सब करथिन , आब टोलबैये कए मिल क' राँची कए पागल वला अस्पताल मे भर्ती कराब' पड़तै , नै त' काल्हि जँ टोलक कोनो नेना कए पटकि देतै त' ओकर जबाबदेही के लेतै ? अनेक तरहक प्रश्न-उतर , सोच-बिचार के बाद टोलबैया सब निर्णय लेलक जे आइ साँझ धरि देखै छीये ,जँ ठीक नै हेतै त' साँझ मे सब गोटा मिल जउर सँ हाथ पएर बान्हि देबै आ काल्हि भोरका ट्रेन सँ राँची चलि जेबै । जे खर्च-बर्च लागतै से कनियाँ काकी देथिन ,जँ एन.एच लग बला एको कट्ठा घसि देथिन त' ओतबे मे आनंदक बेरा पार भ' जेतै ,आखीर जमीन बेचथिन किएक नहि ,बेटो त' एके
टा छेन । कनियाँ काकी मतलब आनंदक माए सँ बीन पुछने टोलबैया ,सब हिसाब-किताब क' लेलक ।


उम्हर टोलबैया सब जमीन बेचेबाक ,आनंद कए पागल बना राँची पहुँचेबाक जोगार मे छल आ इम्हर आनंद एहि सब सँ अंजान अपन धुन मे कखनो बड़बड़ाइत , कखनो हाथ चमकाबैत गामक पूब गाछी दिश कए बाट धेने जा रहल छल । गाछी मे एकटा झमटगर आमक गाछ त'र बैस रहल ,गाछ सँ खसल टिकुला बिछ क' जमा केलक आ एक-एक टिकुला उठा सामने पड़ल पत्थर पर मारैए जखन सब टिकुला खतम भ' जाए त' फेर सँ बीछ पहिले जकाँ पत्थर पर मार' लागैए । कतेको घंटा एनाहिते करैत रहल । समय आ सुरूज उपर चढ़ैत गेलन्हि आ आब सुरूज देब सीधे माँथ पर आबि गेलन्हि । रौद सीधे आनंदक देह पर पड़लै , जखन गरम लागलै त' ओत' सँ उठि क' गाछक जैड़ मे सटि क' बैस रहल , टिकुला फेकनाइ बंद क' सामने देखलक ,सब किछ बदलल-बदलल बूझहेलै , नै पहिलुका रंग आ नै पहिलुका आनंदक लहर भेटल |

तीन वर्ष पहिले एत' भीड़ लागल रहै छलै गामक युवा वर्गक पहिल पसंद छलै इ मैदान जे आब खेत बनि गेल छलै , गामक नेना-भुटका सँ नम्हर धरि गेंद-बल्ला- बिकेट ल' भोरे सँ मस्त भेल एत' खेलै छलै ।एहि ठामक मजा ल'ग टि.भी वला आइ .पि .एल एको क्षण नै टीक सकै छलैए , मुदा मैदानक मालिक कए इ खेल नीक नहि लागै छलै तेँए एक दिन राता-राती सौँसे मैदान जोति देलक आ राहरि बाउग क' देलक । तहिये सँ खेलक इ आशियाना उजरि गेलै । आनंद कए एहि मैदान मे पाकल गहुमक बालि देखेलै जे हवा सँ टकरा कोनो कमसीन नाच' वाली के पातर डाँर कए लचक जकाँ बेली डाँन्स करैत छलैए । सुरूजक किरण ओहि पाकल बालि कए और स्वर्ण रंग द' रहल छल ।पूरा खेत रावणक सोना कए लंका जकाँ रौद मे चमकि रहल छल , दुपहर कए गर्मी मे चलैत लू सँ काँपैत हवा मे फराक-फराक आकृती सब बनबै छलै कखनो डेराउन त' कखनो मनोरम , एहि दृश्य मे डूबल कखन आँखि लागि गेलै जानि नहि । आँखि लागैत देर नहि आनंद एहि दुनियाँ कए छोड़ि श्वप्न नगर मे चल गेल । ओहि अद्भुत श्वप्न परी कए देश मे यादि आब' लागलै आइ सँ तीन साल पहिलुक ओ दिन . . . ।
............
काँलेजक पहिल दिन , गामक उच्च विद्यालय सँ पास भ' लाखो छात्र-छात्रा नव सपना संग पैघ-पैघ शहर कए नामी काँलेज सब मे नामाँकन करेलक आ तकर बाद 10-10 टा किताब क झोरा छोड़ि दू टा काँपि ल' काँलेजक गेट पर स्वतंत्र मोन सँ छात्र-छात्रा सब कए लागै जे स्वतंत्रताक लड़ाइ जीत लेलक ,गजब कए मुस्कान सबहक अधर पर नाचि रहल छल । स्कुलक टाँप आनंदो अपन काँलेज पहुँचल मुदा काँलेज कए गेट पार करै कए साथ ओहि ठामक काज देख अधरक मुस्कान बीला गेलै । छ'-सात टा लड़का-लड़की एकरा घेर लेलक आ सबाल-जबाब कर' लागल कखनो एकर त' कखनो हेयर स्टाइलक , कखनो पहिराबा कए त' कखनो गाम-खानदान कए मजाक कर' लागल । आनंद कए तामस तरबा सँ मगज धरि पहुँचि गेलै मुदा नव अछि कैये की सकै यै ?

तखने एकटा लड़का एगो गुलाबक फूल दैत कहलक ,"रै , सामने ललकी ओढ़नी मे पिछु घुमल जे लड़की ठाढ़ छौ ओकरा हमरा दिश सँ आइ लव यू कहि क' इ गुलाब देने आ ।"

आनंदक मोन नहि मानै छलै तेँए ओ हिलबे नै केलै ,जखन सब देखलक जे इ नहि जा रहल अछि त' एक चमेटा मारैत घेकलि देलक जै सँ आनंद खसैत-खसैत बचल , ओ समझि गेल जे जँ एकर बात नहि मानब त' मारत तेँए मोन मसोसि क' गुलाब उठा ओहि लड़की लग चल गेल । ओकर पिछ आनंद दिश छलै तेँए ओकर मुँह देखाइ नै पड़लै खैर आनंद कहलक ,"मैडम ,"

इ सुनि लड़की पलटल , आनंद के ओकर मुँह चिन्हार लागलै , लाल लिपिस्टीक सँ रांगल ठोर आँखिल काजर , केशक स्टाइल आ एकर चिर-परिचित परफ्युमक खुशबू ,सब किछ चिन्हार सन लागलै मुदा मोन नहि पड़ि रहल छल जे ओ के छथि?

आनंद अपन बात आगु बढ़ेलक ,"मैडम , हम जे किछ कहब सँ हमरा सँ ओ छौड़ा सब कहबा रहल अछि तेँए हमरा माँफ करब ओ हरीयरका टिशर्ट वला अहाँ कए आइ लव यू कहलक यै आ इ गुलाब देलक यै ।"

गुलाब दै काल ओहि चिन्हार मुदा अनचिन्हार सन लड़की कए हाथक स्पर्श मात्र सँ अंग-अंग एना सिहरि गेलै मानु जे 440 वोल्ट कए झटका लागल हो ।
ओ लड़की गुलाब ल' बाजल ," कोनो बात नै हम खराप नहि मानलौँ ,ओ अबारा छौड़ा-छौड़ी हब हमरो रैगीँग लेलक आ अहूँ कए ल' रहल अछि , ओना अहाँ . . . "
ओ लड़की अपन बात खतमो नहि केने छलै की प्रिंसपल साहेब ओहि ठाम आबि गेलन्हि , प्रिँसपल साहेब कए देख रैगीँग लेनिहार सब छौड़ा-छौड़ी पड़ा गेल । आनंद आ ओ लड़की दूनू प्रिंसपल साहेब कए गोर लागलक आ हुनके संगे क्लास दिश चलि देलक । गामक स्कुल मे लड़का-लड़की अलग-अलग बेँच पर बैसै छलै मुदा एहि ठाम एहन भेद-भाव नहि छलै , जेकरा जत' मोन होइ ओ ओत' जा क' बैसल । आनंद आ ओ लड़की संग एके बेँच पर बैसल , ऐ दिनक बात संयोगे सँ वा जानि-बूझि क' तीन दिन धरि संग उठला बैसला कए बादो कोनो तरहक बात-चित नै भेलै । चारिम दिन पहचान -पत्र पर मोहर लगाबै लेल जखन दूनू समान्य कक्ष गेल त' ओहि लड़की कए नाम-गाम पढ़लक तकरा बाद ओ अनचिन्हार लड़की पूर्णत: चिन्हार भ' गेल तेँए आनंद बाजल ," सीमा , हमर नाम आनंद अछि आ अहीक गाम के छी । दूनू गोटे सतमाँ धरि एकै स्कुल मे पढ़लियै आ तकरा बाद अहाँ बजार आबि गेलौँ आ हम गामे मे रहि गेलौँ , यादि ऐल की नै ?"

सीमा जखन अपना बारे मे एतेक बात सुनलक त' उहो बाजल ,"हाँ आनंद ,सब किछ यादि अछि ।हमरा पहिले दिन सँ होइ छलैए जे अहाँ कए कतौ देखने छी मुदा लाजे किछ नहि बाजै छलौँ" "

आनंद मोने-मोने बड खूश छल कारण एहि अंजान शहर मे केउ त' चिन्हार अछि ।मोहर मरबा दूनू बगीचा मे जा क' बैसल आ पुरना बात कए मोन पाड़' लागल , पाकरि त'र गर्दा आ कंकर भरल भाटि मे बोरा पर बैस क' पढ़ाइ , बूढ़बा इमली गाछक मीठगर इमली . भूट्टू मास्टर साहेब , अपन बचपन मे एतेक हेरा गेल जे
कखन साँझ भ' गेलै पता नहि चलल । जखन गाछ पर चिड़ाँइ अनघोल कर' लागल तखन दूनू बचपन सँ निकलल ।


एहिना समय बीतैत गेलै । एहि व्यस्त शहर कए व्यस्त जीवन मे एक पटरी पर दौड़ैत दूनू कए दोस्ती एक्सप्रेस कखन प्रेमक स्टेशन पर आबि गेलै , दूनू मे सँ ककरो पता नहि चलल । नव उमरि मे प्रेम भेटला कए बाद एकटा अलगे उर्जा कए संचार अंग-अंग मे होब' लागलै , दूनू कए नजरीया सत प्रतीशत बदलि
गेलै , काल्हि धरि किताब-काँपि ,पढ़ाइ-लिखाइ कए बारे मे सोचै वला आइ अपन भविष्यक बारे मे सेच' लागलै , अपन-अपन कैरियर कए लेल सोचबाक लेल नव-नव सपना कए महल बनब' लागलै , राति दिन भोर-साँझ एक-दोसरक नैनक झील मे डूबि जीबनक सब सँ पैघ आनंदक अनुभूति कर' लागलै । बाट चलैत जग सँ अंजान भ' इएह पाँति गुनगुनाब' लागलै

भेटल अहाँ के संग हमरा जहियेसँ
जिनगी हमर लेलक करोटो तहियेसँ

हम एकरा की कहब छल एहन भाग
बैसल छलौँ हम बाट मे दुपहरियेसँ

गेलौँ शिखर पर भेल जे एगो स्पर्श
जुड़ि गेल साँस प्राण संगे कहियेसँ

छी ग्यान{GYAN} के पेटी अहाँ जादू गजल
शाइरक कोनो कलम लागै हँसियेसँ

हम भेल नतमस्तक लिखब कोना शब्द
शाइर "अमित" छी संग हमरा जहियेसँ


कहल गेलै
यै जे जँ सच्चाइ कए संदुक मे बंद क' सात ताला मारि सागर मे भसा देल
जाए तैयो एक-ने-एक दिन ओ ताला तोड़ि समाजक सामने जरूर आबै छै , आ जँ ओ
सच्चाइ लड़का-लड़की कए प्रेमक होइ त' ओ जंगल कए आगि-जकाँ क्षण मे सगरो पसरि
जाइ छै । इ समाज एहन सच्चाइ पर हास्य-व्यंग आ चुटकी लेब' लागै छै ।
आनंद-सीमा कए प्रेमक खिस्सा काँलेजक बाउण्ड्री तोड़ि सीमा कए बाबू जी
डाँ. देबेन्द्र धरि पहूँचि गेल ।ओ आनंद कए डराब'-धमकाब' लागलन्हि मुदा
आनंद आधुनिक लोक रहितो आधुनिक नहि छल , आइ -काल्हि कए लोक प्रेम-प्रेम
नहि वासना बूझैत छथि , हुनका लेल आ आधुनिक प्रेमक अंत मात्र शारीरीक मिलन
होइत धेन आ तकरा बाद ओ प्रेम गटर कए कीड़ा जकाँ अशुद्ध भ' जाइ छै ।
मुदा आनंदक मोन मे ऐ तरहक कोनो बात नहि छलै , ओ अपन प्रेम कए सम्मान द'
वियाह धरि पहुँचाब' चाहै छलैए तेँए कोनो तरहक धमकी एकरा पर असर नहि क'
सकलै , संगे सीमा सेहो डाँ . देबेन्द्र पर अपन प्रेम सफल करबाक लेल दबाब
देब' लागलै । तीनू अपन-अपन बात पर अड़ि गेल । इएह घिचम-तीड़ा कए बीच दूनू
इंटर कए पढ़ाइ खतम केलक । समय बढ़ैत गेल संगे प्रेमक गाछ फूलाइत रहल आ डाँ
. देबेन्द्र पैघ-पैघ ढेला फेक एहि फूलाइल गाछ कए फूल तोड़ैत रहलन्हि ,
अंतत: एक दिन डाँ. साहेब आनंद कए अपन डेरा बजौलनि ।


आनंद गुनधुन मे पड़ल जखन सीमा कए डेरा पहुँचल त' डाँ . देबेन्द्र कहलनि
,"देखू अहाँ दूनू कए प्रेमक आगू हम हारि गेलौँ , हम एहि वियाहक लेल
तैयार छी मुदा वियाह कोनो बच्चा कए खेल नहि छै , वियाहक पश्चात बहुतो रास
जीम्मेदारी माँथ पर आबि जाइ छै । बियाहक बाद सीमा कए कत' राखब ? "

आनंद बाजल ," हमहू जानै छी जे वियाह कोनो खेल नहि छै आ जहाँ धरि वियाहक
बाद रहै कए सबाल छै त' गाम मे अपन-घर अछि । अहाँ जानिते छी अपन जमीनो अछि
' ओत' हमरा दूनू गोटा कए जीवन बढ़ियाँ जकाँ कटि जाएत ।"

"मुदा हमर बेटी गाम मे नहि रहि सकै यै किएक त' ओ बजार मे सब सुबिधा
सम्पन्न घर मे रहि रहल अछि । हमरहमर बेटी गामक भनसा घर मे घुआँ नै पियत
।"

"आब गामो मे विकास भ' रहल छै हमरो गाम मे गैस .सड़क , रेल आ बिजली कए
सुविधा अछि तेँए कोनो तरहक दिक्कत नहि हेतै । तैयो जँ सीमा कए इच्छा बजार
मे रहबाक हेतै त' गामक कोनो जमीन बेचि बजार मे घर बना लेब । " आनंद सँ
लबालब भरल बाजल ।

देबेन्द्र बाबू चाह आ बिस्कुट कए ट्रे आनंद दिश बढ़ाबैत बाजलन्हि ." से सब
' ठीक छै मुदा एतेक जल्दी इ सब नहि भ' सकै यै ।" दु -तीन चुस्की चाह सँ
घेँट भिजेला कए बाद बात आगू बढ़ेलन्हि ," एखन अहाँ दूनू कए उमरि कम अछि आ
ऐ उमरि मे कानून वियाहक आदेश नहि दै छै .दोसर विआहक बाद घरक खर्चा बैढ़
जाइ छै ।एखन अहाँ अपन माए पर निर्भर छी आ माए खेती-बाड़ी पर , आ सब जानै
यै जे खेती सँ एतेक कमाइ नहि होइ छै जै सँ आधुनिक साज-समान कए साथ बजार
मे जीवन ऐश-मोज सँ कटि सकै । जा धरि अहाँ अपन पएर पर नहि ठाढ़ हेएब ता धरि
केऊ बेटी वला अपन बेटी कए हाथ अहाँ कए हाथ मे कोना द' देत आखिर सब
माए-बाप कए किछ स'ख-मनोरथ होइ छै की नै?"

चाहक कप राखैत आनंद कने चिन्तीत मुद्रा मे बाजल ," अहाँक बात सत्य अछि
हमहुँ इ नहि कहै छी जे एखने हमर वियाह क' दिअ , जहाँ घरि अपन पएर पर खड़ा
होइ कए बात छै त' हमर इंटर भैये गेल ।हमर नानी गामक किछ लोक दिल्ली मे
रहै छथि त' हम सोचै छी जे ओतै जा किछ दिन काज करब , तखन धरि उमरि भ' जाएत
तकर बाद हमर वियाह क' देब ।"

डाँ0 साहेब अधर पर कुटिल मुस्कान फैलाबैत बाजलन्हि ." अहाँक इ बात हमरा
नीक लागल ।अहाँ अपन पएर पर ठाढ़ भ' जाउ हम अश्वासन दै छी अहाँ प्रेम सफल
करबा देब ।"

एहि भेँट कए बाद आनंद के सीमा सँ वियाह करबाक सपना सच लाग' लागलै । ओ अपन
प्रेमक सफलाता कए लेल कठीन सँ कठीन काज करबाक लेल तैयार छल । अपन पढ़ाइ
बीच मे छोड़ि दिल्ली जाएबाक मोन बना लेलक । कनियाँ काकी कए सब बात बता तीन
दिन कए बाद दिल्ली कए गाड़ी पकरि दिल्ल चलि गेल । अपन प्यार , अपन गाम .
अपन सीमा सँ हजारो किलोमीटर दूर दिल्ली कए भीड़-भाड़ वला गली , बड़का-बड़का
सोसाइटी मे हेराएल-भुतलाएल काज खोज' लागल । बड दौड़ धूप कए बाद रिश्ता कए
मामा अपन सेठ सँ बात क' 12 घंटा कए नोकरी आ पाँच हजार दरमाहा पर काज धरा
देलकै । भोर सँ साँझ धरि हड्डी तोड़ला कए बादो एते कमाइ नहि होइ छलै जाहि
सँ कहि सकैए जे आब परिबारक भार उठा सकै छी । सब राति सीमा कए फोटो करेजा
सँ साटि कसम खाए जे काल्हि आइ सँ बेसी मेहनत करब । उम्हर आनंद सीमाक
प्रेम मे अपन देह गला रहल छल आ इम्हर सीमा अपन पढ़ाइ आगु बढ़ा रह छलै ।
समय तीब्र गती सँ बढ़ैत गेलै , आनंदो कए परमोसन होइत गेलै , आब 15000 टका
कमाइ बला सुपरबाइजर भ' गेल । आफ ओकरा लाग' लागरै जे ओ अपन आ सीमा कए बजार
मे रहै कए खर्च कमा लै यै त' ट्रेन ध' गाम आबि गेल । गाम आबिते देर नहि ,
सब सँ अपन दोस्त सब सँ सीमा कए बारे मे पुछलक त' पता लागलै जे देबेन्द्र
बाबू ओकर वियाह अपने हाँस्पिटलक डाँ0 सँ ठीक क' देने छथिन ।सीमा कए मोन
बदलि गेल छै आ दू दिन बाद गामे मे वियाह छै । इ शुभ सन अशुभ समाचर सूनै
कए साथ आनंद बौक भ' गेल , किछ फुरेबे नै करै , जकरा लेल पढ़ाइ छोड़लक ,
12-12 घंटा देह गलेल , से ओकरा छोड़ि दोसर सँ वियाह क' रहल छै ।

आनंद कए विश्वास नहि भेलै तेँए ओ सीमा कए घर सँ बहराए कए बाट जोह'
लागल । सँयोग सँ ओहि साँझ गामक बजार मे भेँट भ' गेलै , सीमा कए संगे केउ
नहि छलै तेँए बीना कोनो झंझट कए आनंद सीधे सीमा लग गेर । सीमो आनंद कए
देख रूकि गेलै ।
आनंद सीमा लग जा बाजल ."
सीमा , अहाँक बाबू जे किछ चाहैत छलथि ओ सब हम पूरा क' देलौँ । आइ हम
15000 टका कमा लै छी आ कानून कए मुताबीक उमरि भ' गेल तेँए अपन वियाह मेँ
आब कोनो रूकाबट नहि अछि । अहाँक बाबू जी हमरा अश्वासन देने छलथि मुदा हम
सूनि रहल छी जे अहाँक वियाह काल्हि कोनो डाँक्टर सँ भ' रहल अछि । अहाँ
हमरा सँ प्रेम केरै छलौँ तखन आ सब की भ' रहल छै ? अहाँ एकबेर अपना मुँह
सँ कहि दिअ जे अहाँ मात्र हमरे सँ प्रेम करै छी आ इ वियाहक बात झूठ अछि
।"

आनंदक बात सूनि ओ मृग समान कारी नैन लाल भ' गेलै ,मुँह पर कठोरता कए भाव
नाच' लागलै , ओ मीठ बाजै बला जवान सँ आगिक धधरा जकाँ शब्द बहरेलै
," इ सबटा बात एकदम सत्य छै ,जहिया अहाँ सँ प्रेम केलौँ
तहिया हम बच्चा छलौँ मुदा बाबू जी हमर आँखि खोलि देलनि । हमर बराबरी क'
सकी एतेक अहाँ क ओकाइध नहि अछि । अहाँ मात्र इंटर पास छी आ हमर M.B.B.S
कए फाइनल इयर छै । एकटा 15 हजार कमाइ वला कए हाथ मे अपन हाथ द' हम अपन
जीवन किएक बर्बाद करब ? जतेक अहाँ एक महिना मे कमाइ छी ओतेक हम एक दिन मे
खर्च करै छीयै । जीवनक ग्राफ पर अहाँ बाँटम मे छी आ हम टाँप पर , बाँटम आ
टाँप सदिखन पैरलल रहै छै रहै छै आ अहाँ त' जानिते छी जे पैरलल लाइन कखनो
मिलै नहि छै तेँए अपन दूनूक मिलन संभबे नहि अछि ।अहाँ अपध दिल आ दिमाग सँ
हमर नाम मेटा लिअ । अहाँ हमर संगी छी तेँए वियाह मे आएबाक निमंत्रण द'
रहल छी ,मोन हेएत त' आबि क' देख लेब हमर होइ वला ब'र कए । हमरा बहुत काज
अछि ,हम जा रहल छी ।अहूँ हमरा बिसरि क' घर जाउ|"

इ कहि सीमा कार मे बसि गर्दा उड़ाबैत ओहि ठाम सँ चलि गेल । आनंद ओहि गर्दा
सँ नहा गेल । दुनियाँ नाच' लागलै ,चक्कर आब' लागलै आ आनंद बीच्चे सड़क पर
खसि पड़ल ।

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इ सब सपना बनि गाछ तर सूतल आनंदक आँखि मे नाचि रहल छल तखने गाछ सँ एकटा
टिकुला टूटि आनंदक मुँह पर खसलै । टिकुला के चोट लागैते नीन खुजि गेलै ।
उपर चंदा मामा चमकि रहल छरखिन ,तारा टिमटिमा रहल छर , चारू कात अन्हार
पसरि गेल छलै । गाम दिश देखलक त' गामक छोर पर नव कनियाँ सन सजल घर
साफ-साफ देखाइ देलकै । लाल-पियर-हरीयर बाँल भूक-भूक क' रहल छलै ।डि.जे
वला बैण्ड पर बाजैत नवका धुन बाताबरण मे अनघोल क' रहल छलै ।आनंदक मोन मेँ
गजबे तूफान उठ' लागलै ।सोचै , जकरा लेल एतेक मेहनक केलौँ सएह नै भेटल ।
की हमर गलती इ अछि जे हम गरीब छी? जाति त' एकै छै तखन की हमर गलती इ अछि
जे हम एक समाज आ एक गामकए छी वा इ जे हम कहियो प्रेम केलौँ ?
बहुतो रास सबाल मन मे उठै छल आ बहुतो सबाल आँखि सँ बहैत नोर क' रहल छल ।
तखने अकाश मे बिजुरी जेना चमकि उठलै , उपर लाल-पियर - हरीयर आगिक चिनगी
चमक' लागलै ,ब्राम-ब्रूम क' फटक्का फूट' लागलै । आनंदक आँखि सँ नोरक धार
गाछक जरि के पटा रहल छल । ब्राम ब्रूम फटक्का फूटि रहल छल आ आइ फेर एकटा
प्रेमक अंत भ' रहल छल ।
 

 
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१.राम भरोस कापड़ि भ्रमर’- घरमुहाँ- उपन्यास अंश २.चंदन कुमार झा- बिहनि कथा- समय होत बलबान

 

राम भरोस कापड़ि भ्रमर
घरमुहाँ
उपन्यास अंश

सरिता आइ कैक दिनसं बेटीकेँ चुपचाप घरमे पड़ल देखि रहलीह अछि । पहिने तँ भेलै जे ओकरा देहक कष्ट छै ।
पुछबो कएलकै तँ नहि किछु हएबाक बात कहि कऽ टारि देलकै । मुदा जखन पाँच दिन भऽ गेलै आ ने घरकेँ कोनो काम करैक आने कओलेजे जाइक त मायकेँ मनमे किछु शंका उठलैक । पतिक कहल बातमे ओजन बुझाए लगलैक । किरणकेँ कोठरीमे जाकऽ ओकरा कातमे बैसि गेलि । माथ हंसोतैथ दुलारसँ पुछलकै – ‘बेटी, एना गुम्म किए पड़ल रहैत छे । कोन बात भेलौअ ?’
किरण किछु नहि बाजलि । माय जखन दोबारा पुछैत छैक त ओ उठि कऽ वहराए चाहैत अछि । आ बजैत अछि
– ‘नै गे ! कहने रहियौ, किछु नै होइए ।
तखन कलेज कैला ने जाइछे । देहो हाथके सैहार नै करैछे । केना कोठरीमे किताब आ कपड़ा सभ छिटाएल छौ’ – माय कोठरीमे चारुकात नजरि खिरबैत कहैत छैक ।
ई सब आब कऽ कऽ की हएतै । जखन बेचबाइच कऽ जाही के छैक त सम्हार के कोन काम ।
ई त अपना बशमे नै है बेटी । धमकी अबैहै । बहुतो लोकके उठीवास भऽ गेल है । तैस तोहर बाबू ई निर्णय कएलकौअ ।
त हम कहां कहै छियौ नै जाएला । जहांजहां ल जएबै त जएबे करबौ । तोहर आश्रित सन्तान छियौ ने ।
एना, कटाह बात कैला बजै छे बौआ । बापक मुह आ देहदशा नै देखै छही । केना उजरल आ सुखाएल लगै है । दिन भरि विद्यार्थीमे लागल, मीतक ओत्त खानपीन, गायनवादन ! देखै छही किछु ।
किरण पुनः बैस जाइत अछि । मायक मु्ह दिश एकटक देखए लगैत अछि । आँखिमे नोर छलछला आएल छैक । किरण भावुक भऽ बजैत अछि
– ‘माय हमर मोनमे घरपरिवारक समस्या नै अछि से बात नै । हमरा त रहए हम इंजिनियर बनि कऽ घरके सम्हारब । लेकिन आब संभव लगै
छौ
?’
सरिता चुप्प भऽ गेलि । ओकरा मनमे किछु गुनधुन भऽ रहल छैक
, मुदा बेटीसँ पुछबाक साहस नहि भऽ रहलैक अछि । लेकिन पुछ त पड़तै । मास्टर साहेब ई जवावदेही दऽ देने छथिन । तखन कोना पुछी सएह नहि फुराइ छै सरिताकेँ ।
माय, चुप किए भऽ गेले । बाजने किछु । हम तोरा सबस अलग सोचै छी की ! बाबूजीक अवस्था, दुनू बौआक भविष्य, हमर योजना ई मधेश आन्दोलन गीड़ि लेलक । इएह सोचि कऽ मोन दुखित अछि ।
सरिता कनेक हिम्मत करैए
– ‘बेटी कह त, तों ठीके एहीला दिन राति कनैत रहैछे ।
किरण आश्चर्यसँ पुछै छै
– ‘तोरा के कहलकौ जे हम कनै छी । हम कनै कहां छी, सोचै छी । मन नै लगैए पढ़मे, किछु करऽ मे ।
बौआ, ठीके तों हमरा सभक आशा छे । किछु अओर बात छै त बाज खुलिकऽ । हम सभ आन नै छियौ ने !
किरण नीचाँ मुह कऽ लैत अछि । ओकरो भीतर जेना बिहाड़ि उठल हो । माथ उठबैत छैक आ मायकेँ मुहदिश ताकि भोकासी पाड़ि कान
लगैछ । माय भरि पाँज कऽ छातीसँ लगा चुप कर लगैत छैक ।
कानब कनेक थम्हैत छैक तँ पुछैत छै
– ‘आब कह तों दुखी किएक छे ?’
किरण सम्हरैत अछि आ मायकेँ कथा सुनबैत छैक
– ‘तोरा सभके घर बेचि कऽ अन्त चल जएबाक बात सुनलियौ त ठीके हमरा रहल नै भेल आ आबि कऽ अपन कोठरीमे भरि पोख कनने रही । चलि जएबाक दुख त रहबे करए एकटा दोसरो बात रहैक ।
माय सचेष्ट होइत छैक
– ‘दोसर कोन बात ?’
हम राजीबसं प्रेम करलागल छी । आ दुनू गोटे विवाह करबाक विचारो कऽ लेने छी ।
के छै राजीब गे ? आ एतेक भारी निर्णय विना हमरा सभके कहने कोना कैलही ?’
माय, ओ दक्षिणवारी टोलक बढ़का घरके बेटा छै । बी.एस.सी. मे पढ़ैत छैक । नीक व्यक्ति अछि । कओलेजेमे मीलि गेलै, की करितिऐ । जहां तक तोरा सबके जानकारी देबके बात त तों सपनोमे नै सोच हम विना पुछने किछु करिती ।
, आइ तक बजलिही कैला नै ?’
कहितियौ, ई मधेश आन्दोलन शुरु भऽ गेलै । लोक सडक पर उतिर गेलै । पहाडीमधेशीमे भेद छुटिआबलगलै । हिम्मत नै भेल तोरा सबके किछु कहके । भेलै, शांत होतै त कहबौ । ताबेमे जाएके नियार भऽ गेलै त हम की करितिऐ
सरिता गुम्म भऽ गेल । बेटीक व्यथा बुझवामे ओकरा कोने कसरि नहि रहलै । लेकिन आब किरण की करत से बात धरि बुझए चाहैत छल । पूछलक
– ‘आब की करविही ?’
चोट्टे उत्तर देलक किरण
– ‘की करबै ! हम कहि देलिऐ, आब संभव नै अछि । हम मांबाबूक संग जा रहल छी । सभ विसरि जाउ !
ओ की कहलकौ ?!
ओ त कानलगलै आ ई असंभव थिक बाजल । अहां विना हम एक्को पहर एत्त रहि नहि सकब । बरु जल्दीए आबि जाउ से धरि कहैत रहल ।
तों की कहलही ?’
हम मना कऽ देलिऐ । आब घरपरिवारके एहन हालतिमे छोड़ि कऽ हम कतहु नै जा सकैछी । कहि देने छिऐ । आब फोनो अबैछै त नै उठबै छीऐ । ने कओलेजे जाइछी जे कतहु भेंट ने भऽ जाए... । कह हम की
करु
?!
बढ़का बोझ माथपर धऽ देलकै किरण सरिताकेँ । दुनूक बीच एतेक लगक सम्बन्धकेँ तोड़बो कठिन
, ने ई निचैनसँ रहत ने ऊहे । की करौक ओ, वेचैन भऽ जाइत अछि सरिता ।
माय तों चिन्ता नै कर । जे तों सभ निर्णय लेने छे, हम साथ छियौ । हं, बाबूजीके हालत एखन बड़ खराब छै । चिन्ता घेरने छैक । ई बात हुनका नै कहिहै ।
सरिता बेटीक मुह देखैत अछि आ दुनू हाथसँ लगमे लाबि चुम्मा लऽ लैत अछि । दुनू माय
बेटी भावुक भऽ जाइत अछि ।
सरिता कहैत छैक
– ‘बेटी, तोरा बाबूजीके सभ पता छौ ।
से केना गे ?’
जखन तो कोनटा लगसं आबि अपन कोठरीमे कनैत रही आ राजीवके फोन करैत रही, तखन ओ आंगनमे आएल छलाह आ तोहर कानब सुनि तोहर दरबज्जा धरि गेल छलाह । तखने तोहर बात सुनलखून्ह । ताहीसं एहि बातके खुलासा करलेल हमरा भार देने छलखिन ।
माय, बाबुओ जानि गेलखिन्ह नै ! हम कोन मुहें हुनका सोझा निकलबै ।
सभ ठीक भऽ जएतै । समय घुरतै । बात कैलखिन्ह ह । मन शांत होइते हम तोहर बात कहबनि । ओ जरूर मानि जएताह । खाली ओम्हर मानतै कि नै, ओकर बापमाय !
तकर भार राजीवके छै माय । ओ मना लेत ।’ – किरण प्रफुल्लित देखि पड़ैत अछि । कैक दिनसँ कओलेज नहि गेल रहैछ । ओ तुरत कपड़ा बदलैत अछि । किताब उठबैत अछि आ कओलेज दिश विदा भऽ जाइत अछि । माय टुकुरटुकुर बेटीकेँ खुशीसँ उठैत पयर पर नजरि टिकौने रहैत अछि ।
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राम भरोस कापडि भ्रमरक जनकपुर ललित कला प्रतिष्ठानसं सद्यः प्रकाशित होबबला उपन्यास घरमुहां जल्दीय बजारमे उपलब्ध हएत । प्रतिक्षा करी ।
 
चंदन कुमार झा
सररा
, मदनेश्वर स्थान
मधुबनी
, बिहार

बिहनि कथा
समय होत बलबान

मालिक बाबा..माने श्री सुरुज ठाकुर..जमाना केँ जमींदार. एकटा समय छलै जखन बारह सौ बिगहा जोतैत रहथि. इनार
,पोखरि,कलम-गाछी कथुक अभाव नहि.परोपट्टा मे नाम रहैन्ह. आँगा-पाँछा हरदम चारिटा लठैत रहैत छलन्हि.एही शान-रोआब दुआरे बड़का-छोटका सभ मालिक कहैत छलन्हि..एखनो कहैत छन्हि...कियो मालिक बाबा त' कियो मालिक काका. मुदा आब ओ समय नहि छन्हि.सुख-भोगक पाँछा निर्भूम भ' गेलाह.अपना खेतक लवाणो नहि होइत छन्हि.हँ घरारी एखनो पुरने छन्हि.बीच गामपर कम से कम पाँच बिगहा के. चारू कात जंगल जनमल रहैत छै आ' बिच मे पुरना हबेली छैन्ह.कतेको ठाम ढहल.मुदा रोआब एखनो पुरनके.चिनीया बिमारी छन्हि तइयो डाक्टर ल'ग जेबा सँ पहिने भरि पोख रसगुल्ला खा' लैत छथि. कहैत छथि -फेर सार डाक्टर मना करत. पहिने खा' लेब' दे. बात-बात मे गारि देब आदत बनल छैन्ह मुदा हुनकर गारि ककरो खराप नहि लगैत छैक.सभ असिरबादी बुझैत अछि.
परुका मलकाइन मरि गेलखिन्ह.बडड् प्रेम छलन्हि दुनू परानी मे.जहिया से मलकाइन मरलखिन्ह
, मालिक बाबा बताह बनल रहैत छथि.एकदिन बारीक आमक गाछ पर कोइली बाजब सुनि अनेरे गरियाब' लगलाह.कोनो नेना ई घटना देखि लेलक. मालिक बाबा..कूउ..अनायास ओकर मुँह सँ बहरा गेलै. माइये-बहिन ओकरा गरिया देलखिन्ह.असर्ध गारि सभ. फेर की ई त' खिस्सा बनि गेल..मालिक बाबा ..कूउ..की बच्चा..की चेतन..सभ खौँझाबय लागल आ' असिरबादी सुनय लागल.
काल्हि मलिकाइन के बरखी छियैन्ह. एगारह टा ब्राह्मण के खुएथिन्ह तकरे इंतजाम मे लागल रहथि.घामे-पसेने तर.थाकि गेल रहथि. दरबज्जा पर बसि रहलाह.खरिहान मे एकटा बकरी चरैत रहय.बारी मे फेर कोइली बाजल..कूउ..तामस चढि गेल रहन्हि..मुदा गारि नहि बहरेलन्हि मुँह सँ..आँखि भीज गेलन्हि. गमछा लय मूह-आँखि पोछय लगलाह. बकरी मेमिया उठल..बुझेलन्हि जेना मलकाइन बौसि रहल हो. कहैत होइथिन्ह -"समय होत बलबान"


 
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सुजीत कुमार झा
साधना
 
साँझक सात बाजि गेल छल । साधना एखनधरि नहि आएल छलीह । नेहा वरण्डापर उदास बैसल मम्मीके प्रतीक्षा कऽ रहल छल ।
जीतेन्द्र प्रसाद भितर रुममे दर्दसँ परेशान छलाह । यद्यपि दर्द आइ किछु कम छल मुदा
, ओ भितरकँे कछमछीसँ तनावमे छलाह । साँझक चारि बजे चाह पिलाक बादसँ ओ आ नेहा साधनाक प्रतीक्षाकऽ रहल रहैथि । चारि बजे पंकज ब्याटबल खेलऽ चलि गेल छल । रीना सङीसँ भेट करऽ गेल छल । रहि गेल छला जीतेन्द्र प्रसाद आ नेहा ।
साधना भोरे जलपानकऽ कऽ घरसँ निकलल छलीह
, ई कहिकऽ जे बेरियाधरि चलि आएब । बहुत रास काज अछि कहि गेल छलीह, कपड़ा बेचबाक अछि, मिश्राजीके घर भेट करबाक लेल जएबाक अछि, महिला क्लवमे अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवसक कार्यक्रममे जएबाक अछि आ बजारसँ दोकानक लेल समान किनवाक अछि, बेरियाधरि आबि जाएब ।
जीतेन्द्र प्रसाद सोचि रहल छलैथि
, ‘की भऽ रहल अछि ? साधना हरदम घरसँ बाहर रहऽ लागल छथि । की भऽ गेल छैन्हि हुनका ? पता नहि कपड़ाक व्यपार आ दोकानकँे की भऽगेल अछि ? किए आवश्यकता अछि साधनाकेँ एतेक काज उठएबाक ?’ ओ सोचैत जा रहल छलाह, ‘एखन तऽ आजुक दबाइ सेहो बजारसँ लेबाक अछि । पंकज सेहो खेलकऽ नहि आएल अछि । नहि जानि की भऽगेल अछि एहि घरकेँ ?’
नेहाकँे बजाकऽ ओ अपना लग बैसा लेलैन्हि । जीतेन्द्र प्रसाद आ नेहा दुनू उदास रहैथि । प्रसंग बदलैत जीतेन्द्र नेहाकँे चाह बनएबाक लेल कहलैन्हि । बूझल छलैन्हि जे चिनी समाप्त भऽ गेलै मुदा
, ककरो अनबाक पलखैत नहि छै, तखने नेहा इहो कहलक जे घरमे चाहपत्ती नहि अछि ।
जीतेन्द्र प्रसाद नेहाक बात सुनलैन्हि । क्षण भरिके लेल ओ किछु विचलित भऽगेला आ फेर शुन्यमे ताकऽ लगलाह ।
जीतेन्द्र प्रसादक मोन विद्रोहकऽ उठल
, ‘की एहनो कतहु घर भेलैए, जतऽ कोनो सामञ्जस्यता नहि । एकरा तऽ होटल सेहो नहि कहल जा सकैए, की विमार हएब कोनो अपराध अछि ? ओ जानि बूझिकऽ तऽ विमार नहि पड़ल छथि । डाक्टर तऽ कहैत अछि बहुत बेसी काज कएलासँ बहुत थकावट आबि गेल अछि, शरीरकेँ आराम तथा मस्तिष्ककँे शान्तिक आवश्यकता अछि । मुदा कहाँ अछि शान्ति ?’ ओ सोचैत रहलाह, सोचिते रहला ।
पंकज आबि गेल । रीना सेहो आबि गेल । जीतेन्द्र प्रसाद सभ किछु देखैत रहलाह
, हुनका किछु बाजब, नहि बाजब बराबरे छल । एहि घरक सभ सदस्य पूर्ण स्वतन्त्र छल ।
रीना भानस घरकँे एक सर्वेक्षण कएलक
, फेर पंकजसँ किछु कहलक, पंकज बजारसँ किछु समान अनलक । भोजन बनल । राति आठसँ उपर बाजि रहल छल, दोकान बन्दकऽ कऽ दीपक सेहो चलि आएल छल । रीना दीपककेँ बजार पठाकऽ जीतेन्द्र प्रसादक लेल दबाइ मगबओलक ।
रातिक दश बाजि गेल अछि । नेहा सूति रहल अछि । रीना आ पंकज अपना रुममे किछु पढ़ि रहल छल । जीतेन्द्र प्रसाद ओछाएनपर पड़ल
पड़ल किछु सोचि रहल रहैथि एकटा बात छोड़िकऽ दोसर, दोसर छोड़ि कऽ तेसर ।
साधनाकँे केओ स्कुटरसँ छोड़ि गेलैन्हि । स्कुटरक आवाज सूनिकऽ रीना आ पंकज बाहर आएल । साधना अबिते जीतेन्द्र प्रसादके रुममे चलि अएलीह तथा बगलमे सूति रहलीह । रीना आ पंकज ठकुआएल सन किछु देर ठाढ़ रहल आ चुपचाप घूमि गेल ।
जीतेन्द्र प्रसाद देखिते रहलाह
, फेर बात चलएबाक हिसाबसँ बजलाह, ‘कहाँ छलहुँ एखनधरि, घरमे नहि चाहपत्ती, नहि चिनी, नहि चाउर, नहि दबाइ । बेरिएमे आएब कहने छलहुँ ?
हँ, मुदा कि कहुँ महिला क्लव चलि गेलहुँ प्रीति पकड़िकऽ लऽगेल । ओतऽ सुषमा भेट गेल । अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवसक बैसार छल मनोरमाक घरपर । निन्न आबि रहल अछि । सूति रहू ?’
किए, की बात अछि ? आँखि अहाँक लाल बुझाइत अछि ।
हँ, कनिमनि लऽ लेने छी, लेडिज ड्रिंक । ओतेक नहि लगैत छैक । क्लवक आइ वर्षगाँठ छल । मधु दिससँ पार्टी छल । अगिला बेर हमरे नम्बर अछि ।साधना कहितेकहिते सूति रहलीह ।
जीतेन्द्र प्रसाद सुनैत रहला आ सोचैत रहलाह
, ‘की भऽ गेल अछि हिनका ? की भऽ गेल अछि एहि घरकँे ? केमहर जा रहल अछि साधना ? की हएत आगाँ ? नहि, आब एकर अन्त करहे पड़त । कोना चलत एना ?’ हुनक हृदयक दर्द बढ़ि गेल । ओ हाथसँ छातीकँे दबा करोट फेरैत रहलाह । रुमके बल जरैत रहल, ओ सोचैत रहलाह .....
आइ एहि शहरमे अएला लगभग दश बर्ष भऽ गेल अछि । आएल छला तऽ कनिक तलब छलैन्हि मुदा कतेक शान्त जीवन छल
, कतेक सुखद छल ई घर । साँझ पड़िते अफिससँ घर अएबाक मोन करऽ लगैत छल । कतेक मेल छल घरकेँ एकएक प्राणीमे । तहियासँ कतेक अन्तर आबि गेल अछि एखन । तहियासँ तलबमे सेहो दूगुणा बृद्धि भऽगेल अछि । दश वर्षमे एहि शहरकँे कोनाकोना परिचित भऽगेल अछि । शहरक सभा सोसाइटी सँ सम्बन्ध भऽगेल अछि । ई शहर तऽ आब अपने भऽ गेल अछि ।
साधना आब शहरक महिला क्लवमे जाए लागल छथि । महिला क्लव आब तऽ हुनकापर छा गेल छैन्हि । आब साधनाकँे रुपैयाक लोभ भऽगेल अछि । तहिया कतेक नीक छलीह साधना । थोड़बे रुपैयामे घरक खर्च बढियाँ जकाँ चला लैत छलीह । घरके सभ समान ओहीे पैसासँ कीनल गेल अछि आ आइ की भगेल अछि
? साधना दोसरके देखासिखी दोकानो खोलि लेने छथि । ओहूसँ पैसा अबैत अछि मुदा, तैयो घरक खर्च नहि चलैत अछि । कहियो चाहपती नइँ, कहियो चिनी नइँ, कहियो ई नइँ तऽ ओ नइँ ।
कतेक झगड़ा ! हँ
, ओ झगड़े तऽ छल दोकान खोलबाक लेल । कतेक सम्झओने छलहुँ साधनाकेँ । हमर असली धन तऽ नेहा, रीना आ पंकज अछि । यदि इएह सभ ठीक जकाँ पढ़िलिख लेत तऽ एहिसँ बड़का धन आओर कि हएत । एकरो सभकँे स्कुलसँ अएलाक बाद ममत्व चाही । एकरो सभक विषयमे पुछऽबला होएबाक चाही । मुदा की साधना कोनो बातके बुझती ? मानलहुँ हम दोकानमे किछु नहि करैत छी, मुदा घर तऽ बिगरल जा रहल अछि । बच्चा की बुझैत हएत ? की बुभैmत साधना ई सभकऽ रहल छथि ? ओह, की भऽ गेल अछि साधनाकेँ ?
कपड़ाक व्यपार ! ओहो एकटा कथे अछि । साधना कहैत छलीह
, ‘कपड़ा बढ़ियाँ बिकाएत ।
कतेक बिकाएल कपड़ा
? महिला क्लवक ई दोसर उपहार छल कि महिला क्लवमे लोक कपड़े किनत दैनिक ? के बुझाओत साधनाकेँ ! जयनगर जाउ, सीतामढ़ी जाउ, कपड़ा लाउ, प्रदर्शनी लगाउ तखन जाकऽ थोकमे कपड़ा बिकाइत अछि । की भऽ गेल अछि हमर जीवनकँे ? साँझमे अफिससँ आउ तऽ स्वयं चाह बनाउ । दीपककँे की पड़ल अछि ? आइ हमरा घरमे अछि, काल्हि दोसर घरमे चलि जाएत ।
पैसा कतऽ बँचैत अछि
? हमर तलब अछि, दोकानके पैसा अछि मुदा एकटा छोटको बिमारीमे कर्जा लेवाक अवस्था चलि आएल । लोक ओतबे अछि । इएह पंकज अछि । पहिने क्लासमे प्रथम करैत छल । शिक्षककेँ प्रिय छल । आब फेल होबऽ लागल अछि । कतेक उदास रहैत अछि पता नहि ककरा सभकेँ सङी बना लेने अछि ?
की भऽ गेल अछि एहि दश वर्षमे,’ जीतेन्द्र प्रसाद सोचैत रहलाह, बल्व जरिते रहल । ओ करोट फेरैत रहलाह मुदा, साधना निफिक्किर सूतल रहलीह ।
भोरमे साधना दीपककँे बजार पठाकऽ घरक लेल समान मगबओलैन्हि । घरके ठीक कएलैन्हि । नेहा
, रीना, पंकज सभ साधनाक आगाँ कतेको समस्या सुनओलक । साधना किछु देर सुनैत रहलीह, किछु कालक बाद ओकरा सभकेँ किछु कहलीह मुदा, बातक अन्त भेल नेहाक पिटाइसँ ।
आखिर अहाँ कोन तमाशा बना रहल छी ? की भऽगेल अछि ? अहाँ कतऽ अबैत जाइत रहैत छी ? किछु देर घरोमे रहू आ बच्चाक देखभाल करु,’ जीतेन्द्र प्रसादके तामस बढै
Þत जारहल छल ।
तऽ की करु ? ई सभ काज बन्दकऽ दिऔ ? आब जखन बजारमे कपड़ा बिकाए लागल अछि, दोकान चलऽ लागल अछि, तऽ की बन्दकऽ दिअ दोकानकेँ ? घरमे बैसल रहब तऽ सभ काज ठप्प भऽ जाएत ।
मुदा घरो तऽ नहि चलैत अछि । घरमे कम पैसा तऽ नहि अछि । घर चलएबाक लेल बढ़िएँ तलब भेटैत अछि । एहिसँ कम तलब भेटैत छल तहिया ई हाल नहि छल । एतेक मारिपीट, एतेक झगड़ा नहि होइत छल ।
हम तऽ अहाँके किछु करहोके लेल नहि कहैत छी, हम स्वयं कऽ रहल छी । घर बाहर घूमि रहल छी । शुरुमे तऽ अहुँ मदति कएने छलहुँ, बच्चा आब तऽ छोट नहि रहि गेल अछि, अपन काज स्वयं कऽ सकैत अछि । घरमे एकटा नोकरो अछिए । की हम नोकरनीए बनिकऽ रहू सभ दिन ?’
ओह, अहाँ इहो तऽ सोचू जे हम विमार छी । उठिकऽ स्वयं चलि फिर नहि सकैत छी । बजारसँ समान नहि आनि सकैत छी । बच्चाकँे पढाइ सेहो बढियाँसँ नहि चलि रहल अछि । एहिसँ बढिकऽ तऽ पैसा नहि अछि । जखन हमही सभ नहि रहब तऽ की हएत पैसा लऽ कऽ ? लड़का गुण्डाआवारा भऽ जाएत तऽ की हएत ? अहाँकँे बन्द करऽ पड़त ई सभ कारोवार । ई घर अछि कोनो बजार नहि, होटल नहि । याद राखू, घर अछि ।
चाहे जे भऽ जाउ, हम दोकान बन्द नइँ करब । कपड़ाक व्यपार नहि बन्द करब । चाहे बच्चाकँे होस्टलमे पठाउ वा घरमे पढ़ाउ । अहाँकेँ बेमारीएमे कतेक खर्च भेल अछि, किछु बूझल अछि अहाँकेँ ? घरक खर्च कतेक बढ़ि गेल अछि, किछु बूझल अछि अहाँकेँ ?’
जीतेन्द्र प्रसाद टूटि सन गेल छलाह
, ‘हम की देखू ? बच्चा होस्टल जाएत तऽ खर्चा बढ़त की घटत ? हमरा बिमारीमे पैसा लागल तऽ की हमर पैसा किछु नहि बचल छल ? अहाँ की कहऽ चाहैत छी ? की मतलव अछि अहाँकें ? ’
दुनूके स्वरक आवाज बढै
Þत जा रहल छल । बातचित आब झगड़ाक रुप धारणकऽ लेने छल । तखने रीना चाहक कप लऽकऽ रुममे पहुँचल । चुप्पी ।
साधना चाहक कप जीतेन्दं्र प्रसाद दिस बढ़ा देलीह । किछु देरक शान्ति । दूनु एक दोसरकेँ देखैत रहल मुदा किछु नहि बाजल ।
साधना कपड़ा लऽकऽ बाथरुम चलि गेलीह । जीतेन्द्र प्रसाद चुपचाप पड़ल रहलाह । पाएर लग नेहा बैसल छल । एखनधरि पत्रिका सेहो चलि आएल छल । मोट अक्षरमे महिला दिवस मनएबाक कार्यक्रम छपल छल । शहरक लेडिज क्लवमे महिला वर्ष मनएबाक पुरा कार्यक्रम छल । साधना कार्यक्रमक संयोजक छलीह ।
कलवेल बाजि उठल । नेहा गेट खोललक ।
मम्मी अछि, बौवा ?’
हँ, छैक । अपने के ?’
कहियौन्ह मिश्रा जी आएल छथि ।
मिश्राजीक नाम सुनिते साधना जल्दी
जल्दी वाथ रुमसँ निकललीह ।
बेटी, एक कप चाह पियबियौन्ह, कनी जल्दी ।
साधना कपडा बदलि लेलीह । रीना चाहक कप रुममे रखलक साधना सेहो मिश्रा जी सँग चाह पीलैन्हि आ बैग उठा लेलैन्हि ।
हँ, तऽ हम जा रहल छियौ । जल्दिए अएबाक कोशिस करबौ । रीना, भोजन बनालिहँे । रुपैया अलमारीमे छौ ।जीतेन्द्र प्रसाद चुपचाप सुनैत रहलाह, साधना मिश्राजीक स्कुटरपर बैसि विदा भऽ गेलीह ।
 


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३. पद्य









३.७.डॉ॰ शशिधर कुमर

३.८.चंदन कुमार झा- गजल/ कविता/ हाइकू 
१.कामिनी कामायनी- काशीक घाट २.श्यामल सुमन

 
कामिनी कामायनी
काशीक घाट

बाबन टा घाट सॅ
टघरैत बहैत
नुकैत . . .मुस्कैत
ऐंठैत. . .उमकैत
झूमैत. . हॉफैत
चलि रहल अछि नाह
मद्विम मद्विम .. . .
ऊपरि
आकाश केर
अपन बाहुपाश में नेने
कारी कचोर मेघ
छिटकौने सबटा जट्टा
बनौने बडका छॉहरि
दैत
जेठक जरैत रौद सॅ
बचवा के असीरबाद
पानि कम छै
दूर दूर धरि सूखल कछार
भनभनाति. . .असंख्य बौलक स्वर
पर्यावरणक अधोगतिक
पसारए चाहैत अछि खिस्सा
मुदा
हुनकर पठाओल हकार
हुनक दरबार
नहि सुनब आजु हम
केकरो आनक विलाप
नहिं देखब हम
मंडिल के दुर्गति
पंडा सबहक लूट खसोट
वृद्व आनगर वधू. .. प
विभत्स रस क लेपन
वा चहूॅ दिस पसरल
कूडा कचरा के साम्राज्य
खसत तअवस्स नोर हमर आय
मुदा विश्वनाथे के मंडिल मे जाए
दीवोदास क् राज्य मे
औघड के त्रिशूल पबसल
जे धाम
वएह तहमर काशी
हमर प्राण
वएह
हमर स्वप्नक चिर प्रतीक्षित
गाम ।।
2सारनाथक संत
तपस्वी
इम्हर एकांत में
प्रकृति सुन्नरि के रूप लावण्य निहारि
एतेक ऐश्वर्य पाबि
कतेक आनंद भेटल
अपनेक मुख मंडल सॅ ज्ञात होबि रहल अछि
यद्यपि छी ध्यानमग्न
अपन पॉच शिष्यक संग
गाछक नीचा तीतैत
अविचल .. . . काल वा मौसमक प्रहार सॅ
विजय वा पराजयक आस सॅ पृथक
एकसरि लडैत अपना सॅ
बढैत जा रहल छी र्निद्वन्द्व. . .
सहस्त्रों बरख पहिने देल ओ प्रवचन
अनुगुॅजित भरहल अछि
शंखनाद बनि
मॅह मॅह करैत अछि
वातावरण चारूकात
अपनेक दैहिक सुवास सॅ
ओहि दिन सॅ विलमल समय
. . . चकित ..मुदित
सीखा रहल अछि
अष्टांगी मार्गक चरम ऊद्देश्य
समेटने अपन बोरिया बिस्तरा
नेने हाथ मे.
छडी कमंडल .. . .
ओहि चिरंतन बाट के बटोही
जेकर पाथेय मात्र सत्य छै
जीवनक कटुतम सत्य। ।


२.

श्यामल सुमन
तखने जीयब शान सँ

समय के सँग मे डेग बढ़ाबी तखने जीयब शान सँ
किछु ऊपर सँ रोज कमाबी तखने जीयब शान सँ

काका, काकी, पिसा, पिसी रिश्ता भेल पुरान यौ
कहुना हुनका दूर भगाबी तखने जीयब शान सँ

सठिया गेला बूढ़ लोक सब हुनका बातक मोल की
हुनको नवका पाठ पढ़ाबी तखने जीयब शान सँ

सासुर अप्पन कनिया, बच्चा एतबे टा पर ध्यान दियऽ
बाकी सब सँ पिण्ड छोड़ाबी तखने जीयब शान सँ

मातु-पिता के चश्मा टूटल कपड़ा छय सेहो फाटल
कनिया लय नित सोन गढ़ाबी तखने जीयब शान सँ

पिछड़ल लोक बसल मिथिला मे धिया-पुता सँ कहियो
अंगरेजी मे रीति सिखाबी तखने जीयब शान सँ

सुमन दहेजक निन्दा करियो बस बेटी वियाह मे
बेटा बेर मे खूब गनाबी तखने जीयब शान सँ


आँखि के नोर सँ

भेटेय छै फल अपन कर्मक जखन मानय छी
फुटल नसीब तखन कहिकय कियै कानय छी

खेलहुँ नय नीक-निकुत कहियो ककर दोष कहू
खाय छी कूटि केँ ओतबे नित लूटि आनय छी

रहल छी साल कतेक संगे आबो चीन्ह लियऽ
बुझिकय खाट कियै हमरा नित गतानय छी

लोक मे पानि भऽ रहल कम आओर दुनिया मे
आँखि के नोर सँ नित आटा हमहुँ सानय छी

लगल छी रोज प्रशंसा मे जिनका टाका छै
हुनक खराब छलय नीयत जखन जानय छी

बूढ़ केँ ज्ञान बिसरि कहलहुँ बोझ भऽ गेला
मोन सँ सोचि कहू हुनका के गुदानय छी

टूटल प्रतिज्ञा सुमन जखने तखन हूब घटल
करू प्रयास खूब मन सँ किछुओ ठानय छी


जतबय अछि औकात करय छी

कत्तेक सुन्दर बात करय छी
पाछाँ सँ आघात करय छी

जखनहि स्वार्थ सधल जिनका सँ
तखनहि हुनका कात करय छी

सगरे देख रहल छी प्रायः
झगड़ा हम बेबात करय छी

टाका सबटा गेल दहेजे
डीह बेचि बरियात करय छी

कनिको दुख नहि सुमन हृदय मे
जतबय अछि औकात करय छी
खूब मोन सँ सभक सुनय छी

कनिये कनिये रोज लिखय छी
छात्र एखन, साहित्य सिखय छी

भारी भरकम बात लिखल नहि
घर-आँगन केर बात कहय छी

बेसी वक्ता, कम छै श्रोता
कविता सँ सम्वाद करय छी

कहियो नहि मन-दर्पण देखल
बाहर दर्पण रोज देखय छी

छी असगर ई भाव भीड़ मे
बनिकऽ पानी संग बहय छी

एहि जीवन मे दुख ककरा नहि
दुख मे नित मजबूत रहय छी

कियो सुमन के सत्य सुनल नहि
खूब मोन सँ सभक सुनय छी
 
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१.नारायण झा २.जगदानन्द झा ३. बेचन ठाकुर- कवि‍ता- वनभोज

 
नारायण झा
रहुआ संग्राम
कवि‍ता-

कुर्त्ता उजरे, पैजामा उजरे। कान्ह्पर गमछा उजरे दलाने-दलाने छातथि‍ अगबे गप। करथि‍ वादा हुनकासँ लप्परक-पल दौग-दौग सभ नेना मांगैत छन्हिम‍ पर्चा
बाटेमे नै लगैत छैक कोनो खर्चा।
की हौ मुखि‍या काका, की हेतै हाल मुर्गा बोतल की करतै एहुबरे कमाल। अहुँ सुनबै, तहुँ सुनहक एकर जर्जर हाल देखहक।
अनाज, कि‍रासन, इंदि‍रा आवास
जरूर भेटतैक राखह बि‍सवास। ई गप मारि‍ फटकबाक छै कोनो की करबाक छै। समाजक सेवा परम सेवा दि‍न-दि‍न भेटतैक एकर मेबा। कुर्त्ता उजरे, पैजामा उजरे कान्ह् परक गमछा उजरे।।

 
जगदानन्द झा
गजल-१
हाथी दाँत खे केँ आर, देखाबै कए छै आर
नेता कें कहैक तँ बात आर करै कए छै आर

केलक भोज जे नै दालि बड सुडके, इ जग-जाहीर
भोजक बात आरो छैक, बात किनै कए छै आर

दोसर कें फटल में टाँग, सब कीयो अडाबै छैक
फाटल अपन सार्बजनिक देखाबै कए छै आर

सासुर कें मजा बहुते होइ छै, अपने बुझल सब नीक
कनियाँ सन्ग सासुर में मजा तँ रहै कए छै आर

भाई धन कए गौरब तँ गौरबए बताहे छैक
आ सम्पैत-गौरब बाप जँ कमेलै कए छै आर

(दीर्घ,दीर्घ,दीर्घ,हस्व SSSI, चारि-चारि बेर सभ पांति में )



गजल -२

बेटी नहि होइ दुनिआ में, कहु बेटा लाएब कतए सँ
जँ दीप में बाती नहि तँ, कहु दीप जलाएब कतए सँ

आबै दियौ जग में बेटी के, के कहे ओ प्रतिभा,इन्द्रा होइ
भ्रूण-हत्या करब तँ कल्पना,सुनीता पाएब कतए सँ

मातृ-स्नेह, वात्सलके ममता, बेटी छोरि कें दोसर देत
बिन बेटी वर कें कनियाँ कहु कोना लाएब कतए सँ

धरती बिन उपजा कतए, घर बिनु कतए घरारी
बिन बेटी सपनो में, नव संसार बसाएब कतए सँ

हमर कनियाँ, माए बाबी हमर किनको बेटीए छथि
बिन बेटी एहि दुनिआ में, मनु हम आएब कतए सँ

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-२१ )
 

गजल-३
आई काल्हि तँ राजनीतिक बाजार बहुत गर्म अछि
देखू नेता सभहँक हाल बनल बड्ड बेशर्म अछि

चानन टिका लगा कs ओ बनल बडका-बडका भक्त
नहि पुछू एहि संसार में केने कतेक कुकर्म अछि

जए अछि कर्मयोद्धा धीर बीर, ओ बजैत नहि अछि
चुप्प भs करैत सदिखन अपन-अपन कर्म अछि

भैय्यारी आ सद्भावना इ तँ सबसँ बड़का प्रेम अछि
जे लडाबए एक दोसर सँ ओ नहि कोनो धर्म अछि

हम छी मैथिल, आ नहि कोनो आन हमर धर्म अछि
सपनो में एकरा त्यागि,सबसँ बडका अधर्म अछि

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-२०)
 

गजल -४

नरहीया भुकैए हमर घराडी पर
बसलौं परदेश में हम खोबाडी पर

दूध-दही पान मखान सब छोरि एलौं
छी पेट पोसने तs दु-टुक सुपारी पर

जे किछ कमेलौं हाथ-पएर तोरि कय
साँझ परैत खर्च भेल छूछे तारी पर

बचेलौं बर्ख भरि पेट काति-काति कय
गमेलौं गाम जए-आबक सबारी पर

छोरु दोसरक आसा अपन बसाऊ यौ
घुरि आउ मनु सोनसन घराडी पर

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१५)
 

गजल-५
किस्त-किस्त में जिनगी बिताबै लेल मजबूर छी
माटि पानि छोरि अपन, किएक एतेक दूर छी

आबै जाए जाउ घुरि-घुरि अपन-अपन घर
घर में रोटी नै, रखने माछ-भात भरपूर छी

तिमन-तरकारी बेच-बेच करू नै गुजरा यौ
घुरि आऊ अपन गाम, एतुका अहाँ हजूर छी

परदेश में बनि कतेक दिन रहब परबा
अपन घर आऊ, एतए के अहाँ तs गरूर छी

अपन लोकक मन-मन में मनु अहाँ बसुयौ
परक द्वारि पर बनल किएक मजदुर छी

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१८)


गजल-६
किस्त-किस्त में जिनगी बिताबै लेल मजबूर छी
माटि पानि छोरि अपन, किएक एतेक दूर छी

आबै जाए जाउ घुरि-घुरि अपन-अपन घर
घर में रोटी नै, रखने माछ-भात भरपूर छी

तिमन-तरकारी बेच-बेच करू नै गुजरा यौ
घुरि आऊ अपन गाम, एतुका अहाँ हजूर छी

परदेश में बनि कतेक दिन रहब परबा
अपन घर आऊ, एतए के अहाँ तs गरूर छी

अपन लोकक मन-मन में मनु अहाँ बसुयौ
परक द्वारि पर बनल किएक मजदुर छी
 

गजल -७
करेजा में अहाँक छबी बसल,मोन हमर ह्टैत नहि अछि
अहाँके स्नेह सागर में नहेलौं,एकर पानि घटैत नहि अछि

सुतै-जागैत ध्यान अहींक केने, हम सदिखन रमल रहै छी
अहाँके अछि सुन्नर काया कतेक, कतौ मन ह्टैत नहि अछि

सगर संसार देलहुँ त्यागि हम, केने वरण छी आब अहीं के
अहाँके संग छोरि कतौ, मिसीयो भरि उसास अबैत नहि अछि

अहींके नाम लिखल अछि, मनु कए एक-एक धरकन पर
पुछूनै हमर हाल अहाँ, बिनु अहाँ जीबन कटैत नहि अछि
(वर्ण-२४, बहरे-ह्जज )
 

गजल-८
अहाँ कखनो तँ बाट हमर घरक धरबै
अहाँक हाथे ओहि दिन हम वरक धरबै

लाली सेनुर टुकली श्रृंगार हमर सबटा
अहाँ बिनु एकरा हम कोनो सरक धरबै

एही जीबन में सिनेहिया अहाँ नहि भेटबै
जिबते जीबैत हम तs बुझु नरक धरबै

अहाँ हमर जिबनक पूर्निमाक इजोरिया
अहीं हमर मोन में इजोत भोरक धरबै

अहाँ आब त फूसीयो सँ आबियो घर जाउ यौ
मनु कखनो त कनिको कोनो सरक धरबै
 

गजल-९
खूर देलखिन्ह ओ
सोधि लेलखिन्ह ओ

देख मोका नीक सँ
चाभि पेलखिन्ह ओ

माय-बेटा के देखू
फूट केलखिन्ह ओ

नीक-नीक साडी में
फीट भेलखिन्ह ओ

गाम-गाम घूमी क
नाम केलखिन्ह ओ
 

गजल-१०
धुप-आरती हम कएलहुँ नहि
जप-तप करब जनलहुँ नहि

सैदखन कर्तव्यक बोझ उठोने
अहाँक ध्यान किछु धरलहुँ नहि

की होइत अछि माय-पुत्र के नाता
एखन तक हम जनलहुँ नहि

हम बिसरलहुँ अहाँ के लेकिन
अहुँ एखन तक देखलहुँ नहि

आब हमरो ध्यान लियअ हे माता
स्नेह अहाँक हम पएलहुँ नहि

 


 
बेचन ठाकुर

कवि‍ता
 
वनभोज


सगर राति‍ वनभोज भऽ गेल
मि‍थि‍लांचल छोड़ि‍ दि‍ल्ली चलि‍ गेल।
साहि‍त्य. अपमान भऽ गेल,
कथा गोष्ठी़क कि‍ल्लीऽ तोड़ि‍ देल।
हरि‍नक गवाही सुग्गर देल
दुनू पड़ा कऽ जंगल गेल।
जंगलमे मंगल भेल।
हि‍स्सेऽदारक हि‍स्सा कटि‍ गेल।
जे भेल से नीके भेल,
जेना रमायण महाभारत भेल।
बुधि‍मे बि‍याधि‍ भऽ गेल,
कएल-धाएल पानि‍मे चलि‍ गेल।

 
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।

१.उमेश पासवान २.किशन कारीगर
१.
 उमेश पासवानक पद्य-

मनक बि‍सवास
भेल अन्हाार लगल जेना सभ नि‍पत्ता बहल पछबा चलल हवा टुटल पत्ता हृदए व्यााकुल मि‍लनक आश दौड़ैत-दौड़ैत
भेटल नै ठौर कखनो सफलता कखनो असफलताक डर दृढ़ संकल्पक अटुट बि‍सवास जि‍वनमे आश लेने मनक बि‍सवास देखि‍ रहल छी सुगम पथ उत्सापहक रथ एक दि‍न जरूर पुरा होएत मनक मनोरथ ऐ लेल पीबए परैए कोनो घाटक पानि‍ कि‍एक नै उपछए पड़ए खत्ता भेल अन्हा र लगल जेना सभ नि‍पत्ता।

केहेन वि‍धन
लि‍खलनि‍ वि‍धाता कलजुगमे मेटा रहल मानवता अप्पगन-अप्प न हि‍तक लेल मारि‍ कऽ रहल अछि‍ परोपकारक नै अता-पता केहेन वि‍धना लि‍खलनि‍ वि‍धाता आब ि‍एक भऽ रहल अछि‍ मनुख चरि‍त्र नि‍प्पता सेवासँ सभ नि‍रवि‍त माता-पि‍ता केहेन वि‍धना लि‍खलनि‍ वि‍धाता नि‍त दि‍न मनुख-मनुख करैए हत्याक केकरा दोख दी जेहने गुरु तेहने चटि‍या असली-नकलीमे अन्तपर की माटि‍क मुरुत बनल अछि‍
भाग्य वि‍धाता।
अपनेकेँ की कही
समाजक अइना कही कि‍ फोटोग्राफर प्रोफेसर कही कि‍ पत्रकार कवि‍ कही कि‍ रचनाकार अफसर कही कि‍ बेरोजगार अभि‍भावक कही कि‍ दोकानदार पढ़ै छी रोज अपनेक लि‍खल समाचार खुलि‍ जाइए हमर बुधि‍क सभ द्वार टक-टकी लगेने रहै छी पढ़बाक लेल हि‍न्दुलस्ताढनक समाचार सबहक मनकेँ भावैए अपनेक बेवहार डरे अछि‍ घुसखोर कमी भेल भ्रष्टाएचार सदि‍खन अहि‍ना चुमी अहाँ सफलताक शि‍खर-पहाड़ कोन नाम केर सम्बोिधन करी अपनेक लेल अचरजमे पड़ल अछि‍ कवि‍ चौकीदार।
फुसि‍-फट्टका
हे आब बुझि‍औ बड़ दम खम देखबै छलए चौकीदार-दफेदारकेँ आबि‍ रहल अछि‍ ओ सभ कि‍यो आबए दि‍औ नि‍ति‍श कुमारकेँ घूस लइए तरे-तर ि‍नर्दोशकेँ भि‍तर दोषीकेँ बहार कनि‍याकेँ लऽ कऽ नेपाल तँ कहि‍यो घरपर खाली फूसि‍ फट्टका हे आब बुझि‍औ आबि‍ रहल अछि‍ ओ सभ कि‍यो डि‍यूटी कम-सम खाली छुट्टी मोन जे गरमाएत ओनीहारकेँ तँ लगा देत पुलि‍स लाइनमे डि‍यूटी कि‍ बुझै छि‍ऐ मुख्ता र-मुंशी
, दुनू पार्टीसँ
करैए कनफुसकी थानाकेँ छोड़ि‍ दै छि‍ऐ जे.पी बाबू आर.आर सि‍ंहपर हे आब बुझि‍यो।
हकि‍कत
आँखि‍ बंन्न डि‍ब्बाब गायब अतै हकि‍कत अछि‍ जोर चलैए लबड़ा-चुच्चा क जे मंगैए दऽ दि‍यौ नै देब तँ जानपर मोशि‍बत अछि‍ लोक बनल अछि‍ बहुरुपि‍या
रंग भेषसँ केकरा चि‍न्हिब मोसकि‍ल अछि‍ एतए मनुखक रूपमे शैतान छि‍पल अछि‍ के की छी नै कि‍नको माथपर लि‍खल रहैए आइ मानवताकेँ कऽ रहल अछि‍ कलंकि‍त जे अप्पतन स्वाटर्थ भावमे डुमल अछि‍ मनुख तन पाबि‍ कऽ
प्रभूक भजन छोड़ि‍ कऽ
अहि‍त काममे लागल अछि‍ आँखि‍ बन्न
डि‍ब्बाब गायब एतेक हकि‍कत अछि‍।
पावन भूमि‍
बि‍हारक पावन भूमि‍मे सदा बहैत अछि‍ गंगा
, कोसी कमला बलान एकर ि‍नर्मल जलसँ नि‍खरल अछि‍ एतुक्का खेत ओ खरि‍हान वि‍क्रमशि‍ला वि‍श्ववि‍द्यालय बुद्ध स्पुतत मि‍थि‍ला पेटिंग अति‍तक अछि‍‍ स्वा‍भि‍मान महा कवि‍ वि‍द्यापति‍ आर्यभट्ट, आयाची मंडन जतए छथि‍ महान एतए अति‍थि‍ पुजल जाइत अछि‍ संतकेँ होइत अछि‍ सत्काुर स्वाेगतमे भेटैए पान-मखान भाषा संस्कृ ति‍ सदि‍खन सभकेँ मनमोहने अछि‍ कला संस्कृिति‍केँ अलग-पहि‍चान एतए श्रीराम आएल छथि‍ वनक मेहमान एखन हम कहाँ बि‍सलौं जे कहि‍ गेल महावि‍र बुद्ध भगवान अपन माटि‍ पानि‍सँ जुड़ल छी हम अल्लााकेँ जपै छी पुजै छी श्री राम
छठि‍
, ईद मनबै छी एक संग मि‍लि‍ कऽ
हि‍न्दूँ और मुसलमान देश हमर हि‍न्दुदस्तांन बि‍हारक पावन भूमि‍पर सदा बहैत अछि‍ गंगा कोसी कमला बलान।

एना नै कर
बौआ रौ एना नै कर सुन हमर बात कि‍दु सोची जखन मन रहैए शि‍तल सुख-दुख राखी कऽ मोनमे बि‍सरि‍ कऽ सभ
बात बि‍तल बौआ रौ एना नै कर सुन हमर बात अबेर तक नै रह सूतल भोरे उठि‍ कऽ कर माए-बाबुकेँ प्रणाम तकरबाद धुम-फि‍र टहल मन रहतौ चंचल बौआ रौ एना नै कर सुन हमर बात अपनासँ श्रेष्ठबसँ कि‍छु सि‍खी नै बात करी रटल खेली-कुदी पढ़ी-लि‍खी करी सबहक कहल बौआ रौ एना नै कर सुन हमर बात।
भुतहा मोड़
नि‍त दि‍न होइए नव-नव घटना
साँझ ओ भोर कोइ होइए घाइल तँ कोइ होइए चोटील थोड़बो थोड़ मरि‍ गेलै बुचना तँ मरि‍ गेलै सजन-धजल बर उजरि‍ गेलै केकरो मांगक सि‍नुर उजरि‍ गेलै केकरो घर बि‍हुँसै छै नव कन्याँग कनै छै माए-बाबू-भाए-बहि‍न बहबै छै दहो-बहो नोर चरचामे बनल हृदए वि‍दारक ई घटना चहू ओर मौतक चौराहा बनल अछि‍ एन.एच भुतहा मोड़।
हमरो लेने चलू
हमरो कहि‍ दि‍अ यौ अपने कतए जा रहल छी संग हमरो लेने चलू हमहूँ जाए चाहै छी अपनेक संग अइठाम ऐ दुनि‍याँमे
मोन हमरो औना गेल जेना लागैए हम भऽ गेलौं तंग सभ ई अपनेक बनाओल ई वि‍धना के अप्पनन के पराया सभ अपने छी हम आइ बूिझ गेलौं सभ कि‍छु भऽ गेल मोह माया हमर भंग अपनेक अलौकि‍क छी अन्तकर्यामी छी सभमे छी अंनत रंग खुलि‍ गेल हमर आँखि‍क भरम दुनि‍याँ ई एकटा नाटक अछि‍ केकरो जीवन तँ केकरो मरण ई पार्ट तँ अहि‍ना चलैए हमरो कहि‍ दि‍अ यौ अपने कतए जा रहल छी संग हमरो लेने चलू।
अथाह
पलक झपकैत हम सपनाक दुनि‍याँमे बटोही सन हम हेरा गेलौं जहू दऽ कऽ बाट नै छल तहू दऽ कऽ हम चलि‍ देलौं डेग-डेगपर होइत रहल लोक संगे नोक-झोक जाइत रहलौं हम बेरोक-टोक उलटि‍ कऽ नै देखलौं के भेल खुश के भेल नाराज बि‍नु परवाह केने हम चलैत रहलौं ततेक दूर हम चलि‍ गेलौं हमरो थाह नै लागल निनक नदीक धारामे सपनाक नाहपर सवार हम चलैत रहलौं अवि‍रल मोन वि‍भि‍न्न तरहक वि‍चारक प्रवाह अबैत रहल डगमगाए लागल बि‍च अथाहमे लोभ-क्रोध नै छल हमरा चाहमे पलक झपकैत हम सपनाक दुनि‍याँमे बटोही सन हम हेरा गेलौं।
गारल मुर्दा
श्‍मशानमे गारल मुर्दा छटपटा रहल अछि‍ भि‍तरसँ अाेङरी
अप्प न उठा रहल अछि‍ कहरैत श्वरमे बाजल आजुक मनुखक अस्तिम‍त्वा कि‍ अछि‍ मानवताक गुण वि‍श्वास परम्पअरा सभ कि‍छु बि‍सरि‍ गेल अछि‍ आइ मनुखक दुश्मवन मनुख बनल अछि‍ सभ लोभ-क्रोध मोह-माया केर जालमे ओझरा गेल अछि‍ गारल मुर्दाक प्रश्नसँ हमर हृदए कापि‍ गेलि‍ एकर उत्तर हमरा लग नै छल अनायास हमरो मुँहसँ नि‍कलि‍ गेल आजुक मनुखक अस्तहत्वक कि‍ रहि‍ गेल।
 
किशन कारीगर
 अगिला अंक मे छपत
(हास्य कविता)
रचना भेटल अहाँ के
मुदा अगिला अंक मे ओ छपत
बेसी फोन फान करब त
फुसयाँहिक आश्वासन टा भेटत।

अहाँ के लिखल कहाँ होइए
तयइो हमरा अहाँ तंग करैत छी
हमरा त लिखैत लिखैत आँखि चोन्हराएल
अहाँक रचना हम स्तरीय कहाँ देखैत छी।

रचना कोना क स्तरीय हेतैय सेहो त
फरिछा के अहाँ किएक नहि कहैत छी
हम रचना पर रचना पठबैत छी
मुदा अहाँ त कोनो प्रत्युतरो ने दैत छी।

हम त कहलहुँ अहाँ के लिखल ने होइए
नवसिखुआ के ने लिखबाक ढ़ग अछि
कोनो पत्रिका में त छैपिए जाएत
इहए टा एकटा भ्रम अछि।

ई भ्रम नहि सच्चाई थिक
नवसिखुओ एक दिन नीक लिखत
नहि छपबाक अछि त नहि छापू
लिखनाहर के कतेक दिन के रोकत।

संपादक छी हम अहाँ की कए लेब
मोन होएत त नहि त नै छापब
बेसी बाजब त कहि दैत छी
अहाँ के कनि दिन और टरकाएब।

रचना नुकाउ आ की हमरा टरकाऊ
आँखि तरेरू अहाँ खूम खिसियाऊ
कारीगर ने अछि डरैए वला
किएक ने अहाँ पंचैती बैसाउ।

हे यौ वरीय रचनाकार महोदय
पहिने अहुँ त नवसिखुए रही
आ कि एक्के आध टा रचना लिखी
समकालीन सर्वश्रेष्ठ बनि गेल रही।

सच गप सुनि अहाँ के तामस उठत
तहि दुआरे किछु ने कहब कविता हम लिखब
आश्वासन भेटिए गेल त आब की
ओ त अगिला अंक मे छपत।

 
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
रामवि‍लास साहुक पद्य-
धनरोपनी
सावनक राति‍
इजोरि‍या जरैत पूरबा हवा दोमैत आसन लगौने बैस अकास नि‍हारैत सोचैत छल आश लगेने सावनक बून्न कहि‍या खसत जे भरि‍खरि‍
धनरोपनी हएत कि‍छु दुर नभमे बि‍जली चमकैत ढनमनाइत दस्तजक दैत बादल उमरि‍ गेल धरतीपर बेंगक बाजा नि‍रंतर बजैत झि‍ंगुरक झनकारसँ
धरती धमकाबैत मेघक बरि‍याती सजए लागल कारी काजर सन मेघ उमरि‍ पड़ल बि‍जली छि‍टकैत छि‍टकैत मेघक रास्ताी देखबैत पसरि‍ गेल चारूकात घनघोर बर्खा भेल डबरा-खत्ता भरि‍ गेल खेत चानी सन चमैक गेल खेतक पानि‍सँ
धूर तड़पैत उछलैत इचना-पोठी-टेंगरा चाल दैत कुदकैत देख गामक बच्चाद बेदरू कूदि‍-कूदि‍ माछ पकड़ैत बि‍हानेसँ गजार कदबा हुअए लगल खेत हर जोतैत हरबाह बि‍रहा गाबैत गामक माए-बहि‍न धानक बीज उपारैत भूलल बि‍सरल सोहर समदाउन गबैत धनरोपनी करैत खेत
हर्षित मनसँ कहैत- हरक नाश आ
खेतक चासपर पेट भरबाक अछि‍ सभकेँ आश।

लफंगा
फाटल धोती फाटल अंगा पएरक जूता टुटल फाटल आँखि‍क चश्माग दूरंगा चौंकैत चलैत अछि‍ बेढ़ंगा बात करैत जना लफंगा
लफड़ैत चलि‍ दरि‍भंगा बात-बातमे फॅसाबए दंगा सवाल-जबाब करैत अरंगा जखैन भऽ जाइत दंगा मौका पाबि‍ फनैत नंगा बात-बातमे कहैत लफंगा मन चंगा तँ कठौतीमे गंगा साँच झूठक दोहरी अंगा एकरंगा पहि‍र बनाबै फंदा झूठक खेतीमे उपजाबए बूटी फाटल जेबीमे रखलक मोती राम-नाम रटलासँ नै मि‍लत रौटी नीक काज कऽ बनाएब कसौटी
जखन कि‍नब माेट-मोट पोथी ज्ञानक प्रकाश मि‍लत अनोखी वि‍कासक गंगा बहत चौमुखी।


रूपैआक ढेरी
रूपैआक ढेरीपर करैए खेल दुनि‍याँकेँ नचबैए ठेल-ठेल रूपयाक लालचमे बनल अछि‍ पागल दानव बनि‍ मानवपर करैत राज सुखक भुख मि‍टबैए रूपैआसँ दीन दुखि‍याक तौलैए रूपैआसँ मनुक्खखक चालि‍ छोड़ि‍ चलैए
नाच करैए खंजन चि‍ड़ै सन सुखक चाहमे भटकि‍ गेल राह सोमरसमे समाए गेल मन वि‍चार नंगा नाच करैए रूपैआ ढेरीपर जोशमे होश उड़ि‍ गेल नचबैयाकेँ जखन रूपैआक ढेरी अंत भऽ गेल जि‍नगीक दू कि‍नारा बीच पि‍साए गेल दुखक धारमे बहि‍ गेल रूपैआक ढेरी जहि‍ना मनुख मुठ्ठी बन्न जनमैए हाथ पसारि‍ संसारसँ चलि‍ जाइए रूपैआक ढेरी ओहि‍ना रहि‍ जाइए।

आएल वसन्त

आएल वसन्तर भागल जाड़
फूलसँ सजल धरती दुलहि‍न समान फूलक सुगन्धर चढ़ए आसमान
आम मजरल महुआ पसरल भौंरा करए गुणगान सेरसौं बाजए शहनाइ समान वसन्त रंगमे रंगाएल सभ एक समान ढोल, मजीरा, ढाक, डफली बजबैत गबैत फागुनक गान रंग अबीरमे नहाएल समान भेद-भाव मि‍ट गेल सभ लगैए एक्के समान आमक गाछपर कोइली बजैत सभकेँ दैत प्रेमक वरदान धरती बनल स्वरर्ग समान आएल वसंत भागल जाड़।

अप्पन-पराया
अपना लेल सभ मरै छै पराया लेल नै कोइ जे परायाकेँ अप्प न बूझै छै तँ जग सुन्द र होइ अप्पगन तँ अप्प न होइ छै पराया कि‍अए होइ छै सभ धरतीपर जनम लइ छै एक्केठाम जीबै-मरै छै जाति‍ भेदक अंतर कि‍अए होइ छै अपन करम अपने करै छै
दोसरकेँ अहि‍त कि‍अए होइ छै जखन मनुक्खिक जाति‍ एक्के होइ छै सभ तँ अन्ने-पानि‍ खाए-पीब जि‍बै छै तखन वि‍चारमे कि‍अए अन्तकर होइ छै सबहक वि‍चार जँ एक्के हेतै सभ-आनो-वि‍रानो अप्पान हेतै एक्करंगा समाज बनतै सबहक वि‍कास समरूप हेतै अप्प न-परायक भेद मेटेतै
जग सुन्द‍र बनि‍ जेतै।
बाट बटोही
डेग-डेगपर बाटमे मोड़ होइ छै तैयो राही बाट चलै छै तहि‍ना जि‍नगीमे मोड़ होइ छै बाटक मोड़ करोट नै लइ छै मुदा जि‍नगीक मोड़ करोट लइ छै बाटपर बटोही सभ दि‍न चलै छै जि‍नगीक मोड़ कठि‍न होइ छै बाटक बटोही बदलैत रहै छै तहि‍ना जि‍नगि‍यो बदलै छै
जहि‍ना बाटक दि‍शा होइ छै ओहि‍ना जि‍नगीक दि‍शा सेहो होइ छै सही बाट पकड़ि‍ बटोही
अप्पबन-मंजि‍ल पहुँचै छै गलत बाट पकड़ि‍ बटोही भटकि‍-भटकि‍ चलि‍ थकै छै बाटक ओर-छोड़ नै होइ छै बटोही चलैत थकि‍ मरै छै मुदा सही बाट चलैत बटोही अप्प न जि‍नगीक लक्ष्यह पबै छै।
हाटक चाउर बाटक पानि‍
हाटक चाउर बाटक पानि
बनि‍याँ घरक तरजूकेँ
नै होइ छै कोनो माइन जानि‍-मानि‍ होइ छै हानि‍ जि‍नगी चलै छै उबानि‍
उजरल वनमे फूल-फड़ खि‍लैत-फड़ैत केना ठेलि‍-ठेलि‍ जि‍नगी चलैत केना फाटल वस्त्रू टूटल घरमे जि‍नगी रहै छै अन्हाेरे-अन्हाकर सूखल जि‍नगी केना पोनगत
पोनगि‍-पोनगि‍ सुखि‍-सुखि‍ जाए केना सि‍ंचब नै फुराए सभ दि‍न जि‍नगी अन्हुरि‍ये बि‍ताए इजोरि‍या कहि‍यो नै देखाए सूख तन उजरल मन वन-वन भटकै मृग समान हाटक चाउर बाटे बि‍लाएल घाटक पानि‍ घाटे सुखाएल बि‍नु पानि‍ नै पि‍यास बुझाए।
ज्ञान बाॅटैत चलू
ि‍लखैत पढ़ैत रहू जि‍नगीकेँ सजबैत रहू लि‍खल पढ़ि‍ ज्ञानी बनू लि‍खि‍-लि‍खि‍ ज्ञान बाॅटैत चलू अपन ज्ञान अपने नै दुनि‍याँमे बॉटैत चलू लि‍खैत-पढ़ैत रहू ज्ञानक गीरह नै बान्हूै खोलि‍-सजाय बॉटैत रहू ज्ञानीक ज्ञानसँ दुनि‍याँ सजै छै आज्ञानी वि‍नाश करै छै लोभ-मोह-माया-छोड़ि
दुनि‍याकेँ सजबैत चलू ज्ञान बाॅटलासँ खर्च नै होइ छै नि‍रंत्तर ज्ञान बढ़ैत रहै छै ज्ञानसँ अभि‍मान मेटाइ छै मान-सम्मारन सभ दि‍न भेटै छै ज्ञानक काज राजा-रंककेँ पड़ै छै िबनु ज्ञान दुनि‍याँ नै चलै छै ज्ञान बॉटैत चलू....।
प्रेम आकि‍ पैसा
अहाँकेँ की चाही? प्रेम‍-
प्रेम आकि‍ पैसा प्रेमसँ सुख-शांति‍ भेटत
दुख हरत कल्यारण करत बि‍गरल काज असान करत दि‍लक दरद असान करत एकताक पहि‍चान बनत यश बढ़त इज्ज‍त भेटत वि‍श्वक कल्या ण करत। पैसा-
पेंच फॅसाएत
प्रेमसँ दूर राखत दुखक पोटरी सि‍रपर लादत
ऊँच-नीचक भेद बढ़ाएत धर्म-इमान मेटाएत अपने बलसँ गरीबपर अत्याबचार बढ़ाएत धाक जमाएत जोश बढ़ाएत नीन उड़ाएत दुनि‍याँमे अशांति‍ बढ़ाएत अहाँकेँ की चाही।

कालक पहरा
कालक पहरा चहुओर पड़ैए चंचल चि‍त्त मन चोर बनल अछि‍ कि‍ला बीच दुआरि‍पर पहरा पड़ैए नगर शहरमे ढि‍ढोरा पड़ैए राजा बैसल सिंगहासन डोलैए प्रजा सूतल नीन खिंचैए तही बीच चोर चोरी करैए कालक पहरा चहुओर पड़ैए।
आन्ह र राजा सेवक बहि‍र भूखल प्रजा होइ छै अधीर मंत्री-संत्री चोर बनल अछि‍ अधि‍कारी खजाना लूटैए
आन्हरर राजा भुजा फँकैए
मंत्री मलाइ चटैए भरल खजाना लूटि‍-लूटि‍ नीत होली-दि‍वाली मनबैए देखि‍ प्रजा भूखल सूतैए
कालक पहरा चहुओर पड़ैए। खजानाक माल वि‍देस भेजैए रक्षक भक्षक बनल अछि‍ ि‍नर्वल राजा चोर सबल अछि‍ जनताक लहु चौबटि‍यापर बि‍कैए सिंगहासनसँ सटल राजा लोभ-मोह-माया बीच फँि‍स
टुकुर-टुकुर तकैए खाली खजाना देखि‍ राजा सोगमे सोगाएल रहैए कालक पहरा चहुओर पड़ैए।
पियासल मन
झुलसल तन करि‍याएल सन पि‍यासल मन मन्हुसआएल सन सूखल वन उजरल उपवन तपि‍-तपि‍ धरती जरल सन बि‍नु मेघ तड़सए नयन करेजा कापए भुमकम सन कि‍ हएत बर्खा हर्षित मन नै कोइ जानए ज्योहत्षीि सन मन उदास देखि‍ डोलए पवन मेघकेँ बजबए सिहकि‍ पवन वातावरण भेल मेघौन झरझर बरसए बजए ढनढन सूखल धरती मुरझाएल वन उपवन भेल हरि‍अर कंचन झुमि‍-झुमि‍ नाचए मेघ संग पवन
बि‍जुरी चमकए डरै तन-मन पाखि‍ खोलि‍ नाचए मोर-मोरनी संग सबहक तन-मन जुराएल पि‍यासल मन धरतीकेँ बुझाएल।
दहेजक खेल
दहेज- बि‍आह बि‍गाड़त इज्ज।ति‍ उताड़त तैयो लोक करैत अछि‍ दहेजसँ मेल जखन दहेजक खेल शुरू भेल बि‍आह भेल गरमेल समाजमे भेल बड़-बड़ खेल बि‍आह सन पवि‍त्र बंधनकेँ बि‍गाड़ैत दानव दहेजक खेल बि‍आहक शुभ मुहुर्तमे दहेज दि‍अए अरचन-धोखा बि‍गाड़ैत समाजक नाता परि‍वार आ समाजक
तोड़ि‍ देत दि‍लक नाता आउ हम सभ मि‍लि‍ दहेज मुक्त समाजक ि‍नर्माण करू भेद-भाव मेटा कऽ
बि‍आहक वंधन मजगूत करू। घर परदेश
कतेक दि‍न बाद एलौं हाल-चाल दुखद सुनेलौं राति‍-दि‍न दुख कि‍अए सहलौं घरेमे रहि‍तौं धीरज देतौं सभ मि‍लि‍ दुख सहि‍तौं अधो रोटी खाए कऽ जीबि‍तौं धि‍या-पुता संगे रहि‍तौं अपने समाजमे कमेतौं परदेश पराया होइ छै दुख-सुख कि‍यो नै बॉटै छै रूपैया लेल दुष्कुर्म करै छै नै रूपैया भूखै मरै छै मुदा अपन समाजमे प्रेम होइ छै पैंच उधार सेहो भेटै छै अपन कि‍ आनोकेँ
वि‍पत्तिमे मदति‍ करै छै सभ इज्जातसँ जीबै छै घर छोड़ि‍ परदेश कि‍अए गमेलौं बाल-बच्चातकेँ बि‍लटेलौं रि‍नि‍या महाजन सेहो भेल कर-कुटुमैती सभ छूटि‍ गेल एहेन करम कि‍अए करब ‍जे परदेशमे खटब
काज नै देत मरि‍तो परदेश आब एहेन काज नै करब जीबैले समाज सभसँ पैघ समाजेमे रहि‍ जीअब मरब
गहुमक कटनी-दौनी
अधरति‍येमे नीन टुटल
कच्छिमछाइ सूतल पड़ल गहुमक कटनी माथपर चढ़ल काटि‍-खोंटि‍ घर नै लाएब तँ भरि‍ साल बाल-बच्चाब
की खाएत केना जीअत अही सोचमे पड़ल छलौं
एकाएक मनमे फुराएल सभ धि‍या-पुताकेँ उठेलौं आँखि‍ मि‍ड़ैत हँसुआ लेलौं सभ मि‍लि‍ खेत पहुँचलौं गहुमक खेतक नम्हएर कि‍त्ता सभ मि‍लि‍ काटैत छलौं अधकटनी भेल मुदा चैतक रौद मुँहपर पड़ल आब कि‍ काटब गहुम रौदामे झुलसि‍ गेलौं खाली गहुमे काटब से केना भूख-पियाससँ बहए पसि‍ना मुदा हि‍म्म ति‍ हारि‍ जाएब केना सभ गहुम काटि‍ खेत खसेलौं चैतक रौदमे देह झरकेलौं घूमि‍ घर एलौं सुसतेलौं भानस-भात भेल नहेलौं सभ मि‍लि‍ खेलौं आराम केलौं पानि‍ पीब जुन्ना बनेलौं धि‍या-पुता संग खेत गेलौं गहुमक बोझ बान्हिप‍-बान्हि‍‍
उघि‍-उघि‍ थ्रेसर लग पहुँचेलौं राति‍ भरि‍ दौनी करेलौं गहुमक दाना कोठीमे भरलौं भूसीकेँ भुसकाँरमे टलि‍येलौं
चारि‍ मासक गहुमक फसलि‍ दि‍न-राति‍ खटि‍ कऽ घर केलौं साल-भरि‍ रोटि‍यो खा जीअब तइ चि‍न्ता-सँ दूर भेलौं।

बि‍आह की थि‍क?

बि‍आह की थि‍क दू आत्मा‍क मि‍लन कि‍ दू रक्ति मेल कि‍ दू देहक संगम कि‍ दू वंशक गठवंधन कि‍ स्त्रीक-पुरुषक प्रेम वंधन कि‍ मनुख जाति‍क क्रमश: सृजनात्म‍क सफल प्रयाससँ कि‍ बि‍आह समाजक रीति‍-रि‍वाज बि‍आह की थि‍क?

आजुक दि‍न
समाजक बदलल स्व रूप ने ओ गाम ने ओ नगर ने पहि‍लुका ठाठ-बाठ ओ पुरना वि‍रासतमे भेटल धरोहर भेल वि‍लि‍न ख्‍ाण्ड‍-पखण्डट भऽ टूटि‍ गेल बाबा समैक गाम-समाज पोखरि‍ इनार परती-पराँत सभ कि‍छु बदलि‍ गेल नै अछि‍ कोइ देखि‍बैया समाजक प्रेम टूटि‍ गेल बड़का दलान बड़का परि‍वार टूटि‍ कऽ चकनाचूर भऽ गेल कतेको पड़ाइन भेल तँ कतेको वि‍कासक होड़मे गाम-घर छोड़ि‍ चलि‍ गेल समाजक मर्यादा पानि‍मे बहि‍ गेल आजुक दि‍न नै रहल भाय-भैयारीमे प्रेम सभ अपन रागक डफली अपन-अपन बजबैए बदलल समाजक स्वनरूपमे अपन जि‍नगी बि‍तबैए खान-पान बदलि‍ गेल पालकी-महफा ओहार लगल कठही गाड़ी वि‍लि‍न भऽ गेल डफरा-बसुली कठघोड़ाक नाच आइ समाजसँ उसरि‍ गेल गामक पंचैती गामेमे बड़का दलान बैस करै छल बड़का-छोटका सभ मि‍लि‍ दूघ-पानि‍ बेड़बै छल बाघ-बकरीकेँ एकठाम एकहि‍ घाट नमबै छल आजुक दि‍न ओ रीति‍-रेबाज
गामसँ उसरि‍ गेल बदलल लोक बदलल समाज हि‍त कम अहि‍त बेसी भेल आजुक दि‍न देखै छी।
पुत्र कुपुत्र
आशीर्वाद हम दइ छलौं अहाँ नै उचि‍त समझि‍ सकलौं माए-बापक अरमानकेँ अहाँ पुरा नै कऽ सकलौं पुत्र नै कुपुत्र छी अहाँ
खनदानक मर्यादा नै बचा सकलौं माए-बापक रीनकेँ अहाँ
जि‍नगीमे नै सठा सकलौं स्वार्ग सन सृजल घरकेँ अहाँ लंका जकाँ जरा देलौं भरत सन भक्तर भाएकेँ अहाँ अपन प्‍यार नै दऽ सकलौं देशभक्तन छी अहाँ मुदा अपन घरकेँ जराकेँ जरा देलौं जरल घर ऊजरल परि‍वार समाजोकेँ अहाँ ठोकरा देलौं आबए बला समैमे अहाँ केकरा की जबाब देबै मुँह छुपा अन्हाेरेमे अहाँ आँखि‍क नोर बहेबै मनुख की मनुखताकेँ छोड़ि‍
क्षनि‍क धन-सुख लेल अमुल्यी जि‍नगी गमा देलौं असल जि‍नगी स्वेर्ग छोड़ि‍ नरकक जि‍नगी अपनाए लेलौं आशा बहुत छल अहाँसँ सभकेँ नि‍रास बना देलौं की उदेश अछि‍ अहाँक
हम सभ नै जानि‍ सकलौं की लऽ कऽ एलौं अहाँ की लऽ कऽ जएब सभ अरमानकेँ अहाँ क्षनेमे जराए मेटाए देलौं अहाँपर बहुत गर्व छल सभकेँ माटि‍मे मि‍ला देलौं पुत्र नै कुपुत्रक नाओंसँ दुनि‍याँमे जानल जाएब अहाँ धन पत्नी मि‍त्र बहुत भेटत माए-बाप सहोदर भाए जि‍नगीमे एक्केबेर भेटत टुटल दि‍ल कहि‍यो नै जुटल कुपुत्रक कलंक नै छुटत सभ कि‍छु रहि‍तो जि‍नगीमे आशीर्वाद नै भेटत।
 

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१.जगदीश प्रसाद मण्डल २. नवीन कुमार झा ‘‘आशा’’
१.
जगदीश प्रसाद मण्डलक पद्य-

गुड़ घाव

उपकि‍-उपकि‍ गुड़ घाव तन-तन
, फण-फण करए लगल।
सगर शरीरक आसन बनि‍ थइर अपन बान्ह ए लगल। संग दि‍नक बढ़ि‍-बढ़ैत गुड़ घाव कहबए लगल। पसरि‍-पसरि‍ फोँसरी पसरि‍ सुख-दुख पीड़ रचए लगल। समए संग ससरि‍-ससरि‍ पेड़-फेंड़ बनबए लगल। जड़ि‍ एक रहि‍तो रहैत फेंड़ जोड़ लगबए लगल। संगे मोजरि‍
, फुला संगे संग-संग फलो रचए लगल। संगे-संगे संग चलि‍ आशा फल देखबए लगल। आश बास देखि‍-देखि‍ ति‍रपि‍त मन सि‍हरए लगल। रक्ताभक्तत बनि‍ पीब पकि‍ पीज नि‍कलए लगल। छेदि‍ देह पकड़ि‍ मांस खील बनि‍ खि‍लए लगल। पबि‍ते खील खि‍ल-खि‍ला
राति‍-दि‍न टहकए लगल। टहकि‍-टहकि‍ घुसकि‍-फुसकि
मासु हार पकड़ए लगल। पीड़ा हारक हू-हू-आ-हूहूआ
गरजि‍-तरंगि‍ नि‍कलए लगल। हारक पीड़ मासु-पीज संग दर्द मन बेदर्द बनल। चि‍न्हब-पहचि‍न्ह हराएल देखि‍ हारल-हराएल बेड़बए लगल।
))((
एकटा बताह
जे जनकक संतान कहि‍यो कृषि‍ वृत्ति‍ कि‍सान छलाह।
कृषि‍ कुशल कहि‍-कहि‍ दि‍न-राति‍ मलड़ैत छलाह। भुमकम बाढ़ि‍ रौदीक भार सहि‍ जीवन-यापन करैत छलाह। वेद-बखान नि‍त-प्रति‍दि‍न साँझ-भाेर रटैत छलाह। गति‍ समए केर बीच-बीच दोरस हवा उपकए लगल। नव-पुरान बीच-बीच रंग-रूप बदलए लगल। रंग-रूप बीच रंग भेद पनपि‍-पनपि‍ पनपए लगल। सोहरि‍-सोहरि‍ उठि‍-उठि‍ धन-गर्जन करए लगल। साहोर‍-साहोर‍ मंत्र जपि‍ डंका-ठनका बचए लगल। मानक मान समान लि‍अए झड़कि‍-झड़कि‍ झड़कए लगल। कुहरि‍-कुहरि‍ कलपि‍-कलपि‍ छाउर-आगि‍ खसए लगल। जेना-जेना आगि‍ मड़ि‍आएल शक्तिम‍ श्रम घटए लगल। घटबी पुरबै पाछू बेहाल रीन-पेंइच फँसए लगल। रीनि‍याक रीन कुरीन बनि‍-बनि‍ तरे-तरे घुसकए लगल। पहुँचीसँ बाँहि‍ पकड़ि‍ धोबि‍या खेल खेलए लगल। दसक दाह सम्हाारि‍ पाबि‍ नै मन-मनतर मथए लगल। जे कहि‍यो मि‍थि‍ कहाबए क्षीण शक्त्ि‍ कहबए लगल।
))((

हूसि‍ गेल
हूसि‍ गेल सभ खेल खेलौना हूसि‍ गेल सभ मन-वि‍चार। जीवन संग जि‍नगी पि‍छड़ि‍ ससरि‍ गेल इजोत-अन्हाडर। अन्हासरे उपकि‍ अनचि‍न्ह। अन्हासर केना अधला लगतै। इजोत-अन्हाेर भेद बि‍नु बुझने राति‍-दि‍न भजए लगलै। जेकरे दि‍न तेकरे राति‍ राति‍येक दि‍न कहाबए लगलै। दहि‍ना-वामा रंग-सि‍याही नव-नव शब्द गढ़ए लगलै। जहि‍ना सि‍याह सि‍याही बनि‍ हरि‍अर-लाल कहाबए लगलै। कोरा कागज ऊपर ससरि‍ हारि‍-जीत लि‍खए लगलै। ऊपर उठा
, उठा ऊपर खेल धोबि‍या खेलए लगलै। घुमा-घुमा, नचा-नचा घाट धार पटकए लगलै। मड़ू-अधमड़ू बना-बना घुमा-घुमा फेकए लगलै। गाड़ीक अगुआ पछुआ पकड़ि‍ जुआ जोति‍ खिंचए लगलै। रंग-बि‍रंग जुआ बनि‍-बनि‍ खेल-खेलौना कहबए लगलै। हूसि‍ गेल सभ खेल खेलौना
हारि‍-हारि‍ मन तड़पए लगलै।
 
अखड़ा जि‍नगी
अखड़ा जि‍नगी सखड़ा बनि‍-बनि‍ शुद्ध-अशुद्धक भेद वि‍लीन भेल। शक्ति ‍ चढ़ल जहि‍ना शीशा नयन ज्यो‍ति‍ बदलि‍ चलि‍ गेल। आशा-आश लगौने मनमे फल-कुफल बदलि‍ केना गेल। नै बूझि‍ समझि‍ नै पेलौं बाटे-घाट बदलि‍ चलि‍ गेल। अखड़ा जि‍नगी सखड़ा बनि‍-बनि‍ शुद्ध-अशुद्धक भेद वि‍लीन भेल। जल भरल लोटा अछींजल शक्तिल‍ क्षीण होइत केना गेल। शक्तिल‍ क्षीण होइत हबाइत अवगुण-गुण बदलि‍ केना गेल। मानि‍ मान ससरि‍ सामान खाली-खाली बनि‍ केना गेल। अखड़ा जि‍नगी सखड़ा बनि‍-बनि‍ शुद्ध-अशुद्ध बीच बदलि‍ केना गेल मानने देव नै तँ पाथर जुग-जुगसँ सुनैत एलौं। पाथर बीच देव वि‍राजए
पानि‍-हवा लुढ़कैत एलौं। उड़ि‍ धरती-अकास बीच उड़ि‍-उड़ि‍ उड़ि‍आइत गेलौं पूर्बा-पछबा सम्हातरि‍ पाबि‍ नै चि‍न्हस-पहचि‍न्हल वि‍सरैत गेलौं। अखड़ा जि‍नगी सखड़ा बनि‍-बनि‍ आश-नि‍राश खखराइत पेलौं।

गीत-
जेहने शक्तिव‍क रंग रहै छै
, पकि‍या रंग तेहने धड़ै छै। जेहने शक्तिव‍क रंग रहै छै। जेहन पकि‍या रंग रहै छै, देव सि‍र तेहने चढ़ै छै। जेहन शक्तिि‍क रंग रहै छै, पकि‍या रंग तेहने चढ़ै छै। दुनि‍याँक भँवर जाल बीच, मि‍त्र-इष्टच वि‍ड़ले भेटै छै अशि‍ष्टक, इष्ट।, जालमे सोझर ओझर होइत चलै छै जेहने शक्तिइ‍क रंग रहै छै लीलाक तेहने दृष्यि बनै छै।
))((

गीत-
खेल खेलौना खेल खेलै छी मने-मन बपहारि‍ कटै छी। खेल खेलौना खेल खेलै छी। एक खेलौना छी मन रंजन दोसर जीवन धार बहाबै कदम डारि‍ झुलि‍ झूला
जमुना धार महार कहाबए। नै हँसि‍ कानि‍ नै पाबि‍ मन-मरदन करैत रहै छी खेल खेलौना खेल देखै छी मने-मन बपहारि‍ कटै छी।
))((

गीत-
संच-मंच रहए कहाँ दइए यार यौ
, संचमंच रहए कहाँ दइए मकड़ी फड़ खुआ-खुआ टीक पकड़ि‍ खिंचैत रहैए भजार यौ, संच-मंच रहए कहाँ दइए। चि‍ड़चि‍ड़ी छीट-छीट कखनो ओझरी टीक लगबैए। पोझरी पकड़ि‍-पकड़ि‍ खेल नाच लगबैए। यार यौ, संच-मंच रहए कहाँ दइए। कहि‍यो रंग कहि‍यो कादो सभपर सभ फेकैए। रंग-सि‍याही बदलि‍ आँखि‍ दुइर करैए। यार यौ......।
))((

गीत-

प्रीति‍क रीति‍ कुरीति‍ बनल छै सुबोध सुरीि‍त सुदि‍न केना पेबै। थाल-कीच घर-दुआर सजल छै फल वृक्ष कल्पी कहि‍या देखबै। हे बहि‍ना
, सुरति‍ केना बदलबै प्रीति‍क रीति‍ कुरीति‍ बनल छै सुबोध सुरीि‍त सुदि‍न केना पेबै। जहर भरल फुफकार छोड़ि‍-छोड़ि‍ गहुमन-नाग लपकैत रहै छै। करम-भाग मन-मनतर रटि‍-रटि‍ अगुआ-पछुआ धड़ैत रहै छै। मन-मनुख मानव केना बनबै प्रीति‍क रीति‍ कुरीति‍ बनल छै सुरीति‍ सुबोध सुदि‍न केना पेबै।
))((

गीत-
बाढ़ि‍मे सभ कि‍छु दहा गेल
, मीत यौ, बाढ़ि‍मे सभ कि‍छु दहा गेल। मुँह-दुआरि‍ परदा दहा गेल दहा गेल सभ कुटुम-परि‍वार हि‍त-अपेछि‍त सेहो भसि‍या गेल भसि‍ गेल सभ अाचार-वि‍चार। बाढ़ि‍मे सभ कि‍छु दहा गेल मीत यौ, जि‍नगीक संग जि‍नगी हरा गेल। गुल्लीलडन्टाु खेल दहा गेल दहा गेल दुआर दुआरधार
चि‍न्हआ पहचि‍न्हद सेहो दहा गेल कखनी घुमतै दुआर-दुआरधार।
कानि‍ कलपि‍ केकरा के कहबै अपने बेथे सभ बेथाएल। सुनत केकर के दुख नचारी अपने मनमे सभ बौड़ाएल। मीत यौ
, बाढ़ि‍मे सभ कि‍छु दहा गेल।
))((


नवीन कुमार झा
‘‘आशा’’

यौ भाई दहेज प्रथाक अंत करू
किछु अवश्य षडयंत्र रचु
कतेक दिन मुँह राखब बंद
कखनो तय करू ऐकर अंत
बेटी भेनाई अभिषाप नै थिक
लक्ष्मीक होय ओ दोसर रूप
ओकर सेहो अछि स्वप्न सजल
दहेजक कीड़ाक करू शिकार
जुनि पालि राखु ई विकार
यौ भाई दहेज प्रथाक अंत करू।
किछु अवश्य षडयंत्र गढ़ु
जँ अहाँ बेटा के गढ़लौ
कि ओहि मे निज स्वार्थ देखलौ
बेटा जँ अछि अहाँक हीरा
तॅ बेटी अछि बड़ बहुमूल्य
दूनूक जॅ करि वियाह
दहेजक अभहेलना करि यौ भाई
दहेज प्रथाक अंत करू..............................।


 

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
शि‍वकुमार झा टि‍ल्लू
कवि‍ता-
कर्मयोगी

ने भगता योगी आ ने डलबाह हरखक तरंग नै, नै वि‍पत्ति‍क आह पहि‍लुक दर्शन कहि‍या भेल नै अछि‍ मोन जहि‍यासँ देखैत छि‍यनि‍ वएह गंभीर मुस्की .. ककरो उपहास नै ककरो परि‍हास नै नै ठोरपर वसन्तक गान नै हि‍अमे ग्रीष्मँक मसान नेना सभक प्रि‍य अध्याीपक कर्मयोगी- अपकल कोना भेलनि‍ पि‍तामह चूकि‍?
रीति‍क कालपुरुखक नाओं- कामदेव!!!
कोनो नै काम भलमानुष नि‍ष्कानम तेसर पहरक वि‍झनीक बाद जगतधात्रीक नि‍त्यक दर्शन तामझामक गाममे रहि‍तो
त्रि‍पुंडसँ मुक्तत छुच्छेक हाथे तर्पण आब की मंगैत छथि‍ बाबा?
झबरल आंगनमे शक्तिछ‍ सहचरी जाइ रवि‍-शशि‍क कि‍रणकेँ आत्मरसात् करबाक लेल लोक करैछ अनर्गल प्रलाप व्य र्थ कुटि‍चालि‍ रचैछ चोरि‍ कऽ आडंवर करैछ तनयक रूपमे ओ दुनू बाबाक आंगनक श्रवण कुमार अचलाचंचला बनि‍ देलनि‍ कन्यांक उपहार दु:खक सोतीमे जखन अकुलाइत छैक मनुक्खब तखन आस्तिक‍कता जगैछ भूख मुदा! ति‍रपि‍त बाबा नै करैत छथि‍ भगवानसँ छल सुरधामे जल मन नि‍रमल.... समाजमे छन्हिर‍ शीतलताक आह सदेह कवि‍ नै तखन वैदेहीक चाह?
अपने नेपथ्य मे रहि‍ नाटकक कएलनि‍ ि‍नर्देशन देसि‍ल वयनाक प्रति‍ कर्मक गति‍ अर्पण एकाध प्रहसन लि‍खि‍ अकथ्यप कवि‍ता गढ़ि‍
कतेक आजाद भऽ गेल चि‍न्हा र मुदा! इजोतक स्त्रो तक पि‍रही अन्हाूर कोनो नै छन्हि ‍ छोह सबहक उत्कनर्ष हुअए यएह आश, यएह मोह की ब्राह्मण की अछोप की धानुक की गोप सबहक बाबा...... जे गाछ, छि‍अए छाहरि‍ वएह उतुंग वएह श्रंृग सि‍क्क.ठि‍ हुअए वा नरकटि
स्वीशकार करैए पड़तनि‍ समाजकेँ बाबा सन चेतनशील मनुक्ख केँ जे संस्काेर लुटाबए सबहक कल्यातणक लेल अन्त र्मनसँ सोहर गाबए...। ‍
 



ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
डॉ॰ शशिधर कुमर, एम॰डी॰(आयु॰) कायचिकित्सा, कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) ४११०४४
      
     
आगामी जानकी नवमी / मिथिला दिवस / मैथिली दिवस पर विशेष


भजु धरणिसुता
(किर्तन)



भजु धरणिसुता, तनुजा मिथिला,
जय रामलला दशरथ नन्दन ।
जय गौरि महेश, गणेश, विभो,
जय पवनपुत्र मारूति - नन्दन । *
भजु धरणिसुता ...........................।।

तजि लोभ मोह, धरु राम चरण।
तजि भव माया, गहू राम चरण ।
धरु ध्यान सदा मिथिलेश - सुता,
करू राम रमा सादर वन्दन ।
भजु धरणिसुता ...........................।।


सभ कष्ट - क्लेश - सन्ताप हरथि ।
निज भक्तक बेड़ा पार करथि ।
करथि गरलसुधा, कन्दुक-वसुधा,
हिय वन मे करु हुनि अभिनन्दन ।
भजु धरणिसुता ...........................।।


श्रीराम सिया छथि कण कण मे ।
ओ बसथि सभक अन्तर्मन मे ।
बस ध्यान धरू, सन्धान करू,
करू हुनिकहि मे तन-मन अर्पण ।
भजु धरणिसुता ...........................।।





माँ जानकी वन्दना
(किर्तन)


जगत जननी, कमल नयनी, जनक कन्या, सुता धरणी ।
अवध रानी, रमा रश्मि, जनिक आसन कमल नलिनी ।।

जनिक चरणरज पाबि धन्य भेल,
मिथिला केर पावन धरती ।
मिथिलाक मान बढ़ाओल जग मे,
मिथिला केर बनि स्वयं बेटी ।
क्षिति तनया, श्री मिथिलाङ्गिनी, जनक कन्या, सुता धरणी ।
अवध रानी, रमा रश्मि, जनिक आसन कमल नलिनी ।।

सुर नर मुनि गन्धर्व आ किन्नर,
जनिकर महिमा गाबथि ।
सृष्टि मे कखनहु ने श्री बिनु,
श्रीपति पुर्ण कहाबथि ।
माँ वैदेही, श्रीराम संगिनी, जनक कन्या, सुता धरणी ।
अवध रानी, रमा रश्मि, जनिक आसन कमल नलिनी ।।

जन्म लेलन्हि नारी बनि जग मे,
आदर्शहि लेल अर्पित ।
जिनगी बिताओल सघन विपिन मे,
रामहि लेल समर्पित ।
लवक माता, कुशक जननी, जनक कन्या, सुता धरणी ।
अवध रानी, रमा रश्मि, जनिक आसन कमल नलिनी ।।




किए मैथिलीक आङ्गन उदास लगैए ?
(गीत)


खन आबि केओ कान मे ई बात पुछैए ।
किए मैथिलीक आङ्गन उदास लगैए ?

किए बैसल छथि मैथिल आराम सँ ?
किए उठइछ ने धधरा हरेक गाम सँ ?
किए दिनहु मे गुजगुज अन्हार लगैए ?
किए मैथिलीक आङ्गन उदास लगैए ?

कतए गेलाह शिवसिंह, विद्यापति, जनक ?
किए पड़ल अछि मन्द आइ माथक तिलक ?
किए मिथिला मे उनटा बसात बहैए ?
किए मैथिलीक आङ्गन उदास लगैए ?

कहू ! कनइछ के बैसल एहि कोन मे ?
की ने बाँचल अछि सिंह एकहु बोन मे ?
किए पीयर सनि खेतक जजाति लगैए ?
किए मैथिलीक आङ्गन उदास लगैए ?




हए बसन्ती पवन, कने धीरे तोँ चल
(गीत)



हए बसन्ती पवन ! कने धीरे तोँ चल ।
कने धीरे तोँ चल
ने मचा हलचल ।
हए बसन्ती पवन ! कने धीरे तोँ चल ।।

देखू कनइत अछि नगर - नगर,
सिसकैत अछि गाम ।
बनल पावन विदेह,
अपनहि केर गुलाम ।
हे, सुन, सुन गे सरित !
ने तोँ कर छल-छल ।
हए बसन्ती पवन ! कने धीरे तोँ चल ।।

पुज्य जनकक ई धरती,
मशान बनल अछि ।
लोक रहितहुँ जेना ई,
विरान बनल अछि ।
सुन गे कोयली कने !
ने तोँ गा चञ्चल ।
हए बसन्ती पवन ! कने धीरे तोँ चल ।।

जतए गूँजय छल सदिखन,
विद्यापति केर गीत ।
आइ नचइत अछि ताण्डव,
आ गूँजैत अछि चीख ।
शस्य श्यामल ई भूमि,
अछि बनल मरूथल ।
हए बसन्ती पवन ! कने धीरे तोँ चल ।।

उठू मैथिल युवक,
कहू मैथिलीक जय ।
होहु आबहु सतर्क,
करू मैथिलीक जय ।
फूँक शंख रे मधुप !
चल छोड़ शतदल ।
हए बसन्ती पवन ! कने धीरे तोँ चल ।।




शान्तिक सपूत संग्राम करय
(गीत)




काश्मीर बनय, आसाम बनय ।
शान्तिक सपूत संग्राम करय ।*
नञि दोष हुनिक एहि मे कनिञो,
जँ मिथिला - भू पञ्जाब बनय ।।


हम मैथिल छी - मिथिलाबासी ।
सम अधिकारक छी अभिलाषी ।
जहिना तामिल ओ गुजराती,
तहिना हमहूँ मिथिलाभाषी ।
हमरहु इच्छा, हमरहु मिथिला,
कर्णाटक ओ बङ्गाल बनय ।।


हम माङ्गय छी नञि किछु विशेष,
निज माङ्गय छी अधिकार बेस ।
हमरो प्रगतिक अछि हक ओहिना,
जहिना करइछ आनहु प्रदेश ।
जञो नञि, तँ दोष हुनिक ने कहब,
यदि क्रान्तिक कतहु मशाल जरय ।।


नञि भीख, अपन अधिकार मङ्गै छी,
कोशी कमला धार मङ्गै छी ।
जलथलनभ मे सञ्चार मङ्गै छी,
शिक्षा रोजी व्योपार मङ्गै छी ।
नञि कहब फेर, जञो आइ एखन,
हर मैथिल, हर विकराल बनय ।।

हर प्रदेश, भारत केर हिस्सा,
सभहक दर्जा एक समान ।
तखन किए केओ अमृत लूटय,
ककरो भेटय विष अपमान ।
नञि फेर कहब - हुनिका सँ केओ,
जञो कोसी कमला लाल बहय ।।


* स्वभाव सँ मिथिलाक सपूत / मैथिल / मिथिलाबासी / मिथलाभाषी शान्तिप्रिय ओ सहनशील होइत अछि । ओ ककरहु सँ अनावश्यक युद्ध नञि चाहैत अछि । इतिहास साक्षी अछि कि मिथिलाक कोनहु राजा वा कोनहु व्यक्ति सिर्फ अपन राज्यक सीमाविस्तार वा अपन महत्त्वाकांक्षाक पुर्त्तिक लेल कहियो ककरहु पर अनावशयक युद्ध नञि थोपलक । ओकरा लऽग मे जतबहि भू भाग वा सम्पदा छलै ततबहि मे सन्तुष्ट रहल ।

परन्तु आइ लोक ओकर शान्तिप्रिय ओ सहनशील स्वभाव केँ गलत स्वरूप मे ग्रहण करैछ । ओकरा आधुनिक राजनैतिक तन्त्र व आन विभिन्न सञ्चार माध्यम सँ बेर बेर उदाहरण देल जाइछ किक्या आप तेलंगाना की तरह विरोध प्रदर्शन कर सकते हो ?” ................... ओकर शान्तिपुर्ण माँग सभ केर प्रति धेआन नञि देब आओर संगहि पुर्ण दमनात्मक कार्यवाही करब सर्वथा अनुचित थिक । ओकरा जबरदस्ती अपन शान्तिपुरण रास्ता केँ छोड़बाक लेल उकसाएब थिक ।


स्वभाव सँ मिथिलाक सपूत / मैथिल / मिथिलाबासी / मिथलाभाषी एखनहु शान्तिप्रिय ओ सहनशील छथि । तेँ एहि गीतक माध्यमेँ भारत सरकार ओ तथाकथित समाचार व सञ्चार माध्यम सँ निवेदन जे अपन अनुचित ओ दमनात्मक क्रियाकलाप केँ विराम देथु; गलत जानकारी प्रसारित कए वा जानकारी सभ केँ गलत स्वरूप मे प्रचारित प्रसारित कए मिथिला, मैथिल व मैथिली केँ तोड़बा फोरबाक प्रक्रिया सँ बाज आबथु ।





कहिया तक शान्ति हो ?
(आवाहन गीत)


शान्ति, शान्ति, शान्ति, शान्ति,
कहिया तक शान्ति हो ?
आबहु तँ मिथिला आ मैथिली लेक्रान्ति हो ।।

मैथिलीक उत्थान हो,
मैथिलीक सम्मान हो ।
भारत केर नक्शा पर,
मिथिला केर नाम हो ।
शान्ति नञि, शान्ति नञि, क्रान्तिक आह्वान हो ।
आबहु तँ मिथिला आ मैथिली लेक्रान्ति हो ।।

घर - बाहर सर्वत्र,
मैथिलीक गान हो ।
मैथिलीक मान हो,
मैथिलीक शान हो ।
एहि पुनीत यज्ञ मे, स्वार्थक बलिदान हो ।
आबहु तँ मिथिला आ मैथिली लेक्रान्ति हो ।।

छलहुँ परतन्त्र, तखन
बातहि किछु आओर छल ।
आब छी स्वतन्त्र, मुदा
तइयो ने बात बनल ।*
आबहु किए भ्रमित छी, दिशा केर ज्ञान हो ।
आबहु तँ मिथिला आ मैथिली लेक्रान्ति हो ।।

शस्त्र सँ ने क्रान्ति हो,
शास्त्र सँ क्रान्ति हो ।
क्रांति, क्रांति, क्रांति, क्रांति,
चेतनाक क्रान्ति हो ।
एकताक तीर सञो, लक्ष्यक सन्धान हो ।
आबहु तँ मिथिला आ मैथिली लेक्रान्ति हो ।।


* महान भाषाविद् सर जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सनक अनुसार बिहार केर अन्तर्गत मैथिली एकमात्र एहेन भाषा छल जे वास्तव मे भाषा होयबाक सभ शर्त पूरा करैत छल । ओ मैथिली केँ बिहारक राजकाजक भाषा केर रूप मे स्वीकार करबा हेतु तत्कालीन ब्रिटिश सरकार सँ अनुरोध / अनुमोदन कएने छलाह ।

परञ्च ओहि समय भारतक स्वाधीनता संग्राम अपन चरम पर छल आ कहल गेल कि ग्रियर्शन महोदयक उपरोक्त प्रस्ताव फुटकएबाक नीति सँ प्रेरित थिक तेँ नञि मानल जएबाक चाही । मैथिल लोकनि देशहित मे (भारतक हित मे) सहर्ष बिना कोनहु विरोध केँ मैथिली लेल जिद्द छोड़ि हिन्दीक प्रचार प्रसार करबाक बात केँ स्वीकार कएलन्हि । एहि क्रम मे अंग्रेज लोकनि सँ मित्रता होयबाक बादहु तत्कालीन दड़िभंगा महाराज स्व॰ लक्ष्मीश्वर सिंह देवनागरी (हिन्दी) केर प्रचार बढ़एबाक हेतु निर्देश निर्गत कएलन्हि । एकर मतलब ई कथमपि नञि कि मैथिल लोकनि अप्पन मातृभाषा मैथिलीकेँ बिसरि गेलाह । मोन मे रहन्हि जे भारतक स्वाधीनताक बाद मैथिली आ मिथिला केँ स्वतः अपन स्थान भेटि जायत ।

अस्तु ‍१५ अगस्त ‍१९४७ ई॰ कऽ देश स्वाधीन भेल । पर मैथिली केर संग आशाक एकदम्मे विपरीय पुर्ण भेद भाव कएल गेल । भाषाक आधार पर मिथिला राज्य के कहए अपितु मैथिली केर अस्तित्वहि पर प्रश्न चिन्ह लगाओल गेल, हिन्दीक बोलीक रूप मे घोषित करबाक भरिसक दुष्प्रयास कएल गेल । नहिञे साहित्य अकादमी आ नहिञे आठम अनुसुची मे स्थान देल गेल (जे कि बाद मे कतेकहु संघर्षक बाद भेटल) । एतबहि नञि मैथिली केँ तोड़बाक हेतु आ मैथिल केँ परस्पर लड़एबाक हेतु नऽव नऽव परिभाषा सभ गढ़ल गेल । मैथिली केँ भाषाक अधिकार देमए काल अस्सी मोन पानि पड़ैत छलन्हि परञ्च तिरहुतिया, बज्जिका, अंगिका आदि मैथिलीक बोली सभ केँ स्वतन्त्र भाषाक रूप मे परिभाषित कएल गेल । मैथिल लोकनिक देशहित मे कएल गेल काज वा देशभक्तिक ई केहेन पारितोषिक छल, से नहि जानि ??????




जयति जयति मिथिले
(जन्मभूमि स्तुति गीत)



जय हे !
जयति मिथिला ।
जयति मिथिले ।
जय कवि - कोकिल - अमिय - वाङ्गमय,
जयति, जयति मिथिले ।।

जय मिथिला भू तरण तारिणी ।
श्रीसीते निज गर्भ धारिणी ।
नतमस्तक तोरा आगाँ माँ, जन्मभूमि मिथिले ।।

जय शत् सरिते अमिय वाहिनी ।
मिथिला भू जीवन प्रदायिनी ।
अमिय चरणरज माए मैथिलीक, पाबि धन्य गंगे ।।

जय मिथिला धन जन वन उपवन ।
जय मिथिला केर पुज्य हरेक कण ।
बारम्बार करी स्तुति हम, जयति जयति मिथिले ।।

 
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
चंदन कुमार झा
सररा
, मदनेश्वर स्थान
मधुबनी
, बिहार

गजल/ कविता/ हाइकू
गजल-१
करेजक घर तँ खोलू कने
सिनेहक ताग जोरू कने
अहिँक हिय-बीच चाही बसै
जगह बसबाक छोड़ू कने
बनल बेरस हमर जीवने
अहिमेँ नेहरस घोरू कने
करय फरियाद "चंदन" सुनू
सजल संबंध जोरू कने
(ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ+ ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ+ ह्रस्व-दीर्घ)
 
गजल-2
आन्हर बनल सरकार छै लाचार भेल जनता
व्यापार पोषित नीति से कोना केर एतइ समता
गाम भूखल-पेट देशक खेत उसर भेल छइ
बाढ़ि-रौदीक बीच उपजल छइ मात्र दरिद्रता
कल-करखाना शहर मे चलइछ दिन-राति जे
प्रगति के अछि मापदण्ड आ
' एकात भेल जनता
गाम जा
' बसि रहल शहर जीविका केर जोह मे
महाजन केर ब्याज-तर फुला रहल निर्धनता
ग्राम-वासिनी भारती कियेक गेलीह बसै नगर
कनैत छथि आइ तँइ ई केहन कैलनि मूर्खता
"चंदन" करू आह्ववान
, स्वराज के एकबेर फेर
हँसतीह एही सँ देश खुशहाल बनत जनता
 
गजल-3
नेहक सूत बान्हि रखलियै करेजक कोन ओकरा
बिसरल नइ भेल जकरा ओ
' बिसरि गेल हमरा
जिनगीक बाट जकरे आञ्गुर ध
' चलब सिखेलियै
बिचहि बाट में ओ
' छोड़ि पड़ायल खसितहि हमरा
कहाँ बचल छै कनियो मोल आब अनमोल-नेहक
सौंसे छै खाली टाकाक पुछ आब लोकक पुछ ककरा
"चंदन" टाका त
' छियै हाथक मैल सत्-संबंधक आगाँ
जे नैं बुझैछ ई बात बनैछ तकरे जिनगी फकरा
 
गजल-4
घोघ हुनकर उतरि गेलै
जोत सगरो पसरि गेलै
बहल पुरबा जखन शीतल
हुनक आँचर ससरि गेलै
देखि हुनकहि ठोढ़-लाली
आगि छाती पजरि गेलै
नैन लाजे हुनक झूकल
अटकि हमरो नजरि गेलै
रूप यौवन निरखि "चंदन"
मोन मधुकर मलरि गेलै
I-U-I-I+I-U-I-I
 
गजल-5
जिनगी केर बाट पर काँट सौँसे गाड़ल छै
नियति केर टाट बेढ़ सगरो दफानल छै
माय-बाप
,भाय-बन्धु, छै झुठहि संबध सभ
मोह-जाल ओझरायल जिनगी गतानल छै
कनियो जँ ढीठ बनि सुनलक कियो मन के
छूतहर घैल बनल समाजो से बारल छै
लुटि-कुटि जीवन भरि आनल से बाँटि देल
खाली हाथ आब देखि परिजन खौंझायल छै
बुढ़ भेल
, दुरि गेल फकरा बनि बैसल छै
"चंदन" कहय केहन दुनिया अभागल छै
 
गजल-6
मूरख बड़ा महान ओ
'जे अपना के काबिल बुझै छै
अपन माथक टेटर ठीक्के ककरहु नहि सुझै छै
आनक नीको अधलाह ताकब कबिलताइ कहाबे
अप्पन अधलाहो केर जग मे सबसँ नीक बुझै छै
छह-पाँच नहि किछुओ बुझे नहि मोने कलछप्पन
ऊँच-नीच के भेद ने जाने मूर्ख सबके एक बुझै छै
छल-प्रपंच आ राग-द्वेष तऽ काबिल केर गहना छी
चलैत बाट तइँ ओकरे सभ के भिखमंगो लुझै छै
पर-उपकारे लीन रहै जे सैह अछि अस्सल ज्ञानी
"चंदन" असली ज्ञानी जगमे ओ
' जे नहि खूब बुझै छै
 
गजल-7
शब्द संग खेलाएब हमरा नीक लगैत अछि
शब्दहि ओझराएब हमरा नीक लगैत अछि
मोनक चिनबार पर छी रान्हैत जे मीठ-तीत्त
भावहि से झोराएब हमरा नीक लगैत अछि
सुखक-गीत दुखक-टीस जिनगीक कथा-ब्यथा
जगभरि सुनाएब हमरा नीक लगैत अछि
सुरूजक किरीण चढ़ी स्वर्ग केर विहार करी
धरती में लोटाएब हमरा नीक लगैत अछि
विहग-गीत गाबय छी आ
' विरहनि सुनाबै छी
"चंदन" ई बौराएब हमरा नीक लगैत अछि
 
गजल-8
कौआ कूचरल भोरे अँगना साँझ परैत औथिन्ह सजना
छम-छम-छम-छम पायल बाजे खनकि उठल कंगना
सासुक बोली लगैए पियरगर ननदि बनल बहिना
गम-गम-गमकय तुलसीक चौरा चानन सन अँगना
रचि-रचि साजल रूप मनोहर कत
'बेर देखल ऐना
टिकुली-काजर जुट्टी-खोपा नवका-नुआ चमकय गहना
पहिलहि साँझ बारल दीप-बाती जगमग घर-अँगना
उगल चान असमान हृदय मे उठल विरह वेदना
सेज सजौने बाट तकैत छी एताह कखन घर सजना
"चंदन" सजनी गुनधुन बैसलि की मांगब मुँह बजना
 
गजल-9
हमरा इजोते सँ लगइत अछि आब डर
चुप भेल तैँ बइसल छी हम अन्हार घर
नहि मोन अछि हमरा नाम आ
' परिचय
अनजान छी संसार मे तेँ घुमैत छी निडर
तकैत अछि लोक नाम मे पहचान लोक के
गुण-शीलक आब समाज मे छै कहाँ मोजर
संबंध नहि जकरा सँ बनल सैह समांग
तोड़लक भरोस ओ
' भरोसे छलहु जकर
"चंदन" जगके रीति ओझराउ नहि जिनगी
सुनू खबरदार ! हरदम रहू बेखबर
 
गजल-10
पुनिमक राति केर चान सन चमकैत छी अहाँ
अँगना केर तुलसी चौरा सन गमकैत छी अहाँ
कखनहु मायक ममता बनि झहरैत छी अहाँ
कखनहुँ आगिक धधरा सन धधकैत छी अहाँ
कखनहु संगी-बहिनपा बनि हँसबैत छी अहाँ
कखनहुँ जीवन संगिनी बनि बुझबैत छी अहाँ
कखनहु अबला के रूप धरी फकरैत छी अहाँ
कखनहु काली केर रूप धरी डरबैत छी अहाँ
कखनहु प्रेमक मुरति बनि सिखबैत छी अहाँ
"चंदन" नारी केर रूप अनेक देखबैत छी अहाँ
 
गजल-11
नहि फुरैछ हमरा आब प्रेम गीत
अंतर नहि किछुओ हारि हो वा जीत
टकटकी लगौने रहैत छी राति-भरि
सपनो नहि आबय केयो मनमीत
श्मशान बनल अछि करेज हमर
पैसत के एहिमे सभ क्यो भयभीत
जीवैत छी मुदा बैसल छी मुर्दाघर
मुर्दा संग जीवन करैत छी ब्यतीत
"चंदन" जीवने सँ लगैछ आब डर
मृत्यु सँ हमरा अछि भऽगेल पिरीत
 
गजल-12
चलू एकबेर फेर रंगमंच सजाबी
बहुरूपिया-रूप धरी आ नाच देखाबी
दुनिया बरू बूझत बकलेले हमरा
हमरा अछि सख जे दुनियाके हँसाबी
सुन्दर अभिनेता त
' जगभरि भेटय
हमर मोन जे पाठ लेबराक खेलाबी
दुनिया के रंगमंच जे लागैछ निरस
आउ एकरा जीवन-रस बोर डुबाबी
"चदन" ई जे गुमसूम बैसल जीवन
चलू अपने पर हँसि एकरा हँसाबी
कविता
आकाशवाणीक दरभंगा केन्द्र सँ दिनांक १०-०३-२००४ के तरुण-कुसुम कार्यक्रम मे प्रसारित

फेर हेतइ भोर
 
होइत छैक साँझ जखन
मद्धिम भऽ जाइत छैक सूर्यक प्रकाश
लाल भऽ जाइत छैक पच्छिम भर आकाश
चिड़ै सभ जाय लगैत अछि अपना-अपना आवास
बंद भऽ जाइत छैक कुसुमित कमल
बंद भऽ जाइत अछि ताहि मे भ्रमर ।

एतबहि मे भऽ जाइत छैक अन्हार
भऽ जाइत छैक सभ चीज अनचिन्हार
सूति रहैत अछि थाकल संसार
मुदा, सूतैत नहि अछि भ्रमर ।

सोचैत अछि भ्रमर-
फेर हेतइ भोर
फेर पसरतइ चहुँदिश सूर्यक प्रकाश
फेर हेतइ लाल पुरबक आकाश
चिड़ै छोड़त फेर अपन आवास
नहि रहतइ कतहु अन्हार
जागत ई संसार
फेर फुलेतइ कमल,' ताहि पर नाचत ओ "भ्रमर" ।

हाइकू

सगरो शांत
गुमकी पसरल
आकुल मन ।

निःशब्द वन
चिड़ैक फर्र-फर्र
चुप्पी तोड़ल ।

उठलै बिर्ड़ो
प्रलय मचाओल
संकटे प्राण ।

क्षत-विक्षत
धरती खसलय
चिड़ैक खोँता ।

अंडा टूटल
उजरल दुनिया
मोन उदास ।

सोचि-बिचारि
धरती उतरल
खर बिछैले ।

नवका खोँता
चिडैक चहकब
नव लगैए ।


हाइकू (राम-कथा)

चैत्र-नवमी
अवध नगर मे
रामक जन्म ।

मिथिला भुमि
धनुष के तोड़ल
सिया विवाह ।

दू वरदान
मंगलथि कैकेयी
दशरथ सँ ।

राजा भरत
रामक वनवास
सगरो शोक ।

स्वर्णक मृग
मोहित मन सीता
पकरू राम ।

पर्णकुटी सँ
वैदेही हरलक
रावण दुष्ट ।

किष्किंधा देश
सुग्रीव के ताड़ल
बालि मारल ।

ताकय सीता
चलल चहुँओर
वानर सेना ।

सागर-पार
कपीश हनुमान
लंका जारल ।

पाथर डारि
नल-नील दू भाई
बान्हल सेतु ।

कुंभकरण
रावण के मारल
जीतल लंका ।

घुमला राम
अवध नगरिया
रामहि राज ।
 
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'विदेह' २२८ म अंक १५ जून २०१७ (वर्ष १० मास ११४ अंक २२८)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -  गौरी चोरनी ,  गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर ...